मौसम….तेरी यादों का—(पंडित दयानंद शास्त्री )

मौसम….तेरी यादों का—(पंडित दयानंद शास्त्री )

तेरी यादों का मौसम हर मौसम पे भारी हुई बारिश भी हैराँ, क्यूँ बारिश है हारी । हाँ जिया था जीवन “अंजाना”जब हुए थे तुम ‘हम’ फिर मिले हैं सीने को, ज़ख्म तेज धारी । समेटने में तुमको खुद ही बिखर गए हम आज खुद की तलाश में,है “अंजाना”ये कैसी लाचारी । घेरा तेरी बाँहों का “अंजाना”तेरी यादों से जो छूटा रुक गई है ज़मीं,गहरे हलचल है जारी । अब खुद को खोजना है पर कैसे,कब,कहाँ से हर टुकड़े में तेरा अक्स,तलाश फिर भी जारी । टूट कर बिखर गए हैं अब जुड़ें कैसे भला बह गए मोती,नयनों का समंदर है जारी । तोड़ दिया तुमने “अंजाना”जिसे ना तोड़ सका कोई ताकत पे अपनी है तुम्हे,तभी ये खुमारी ।

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