ज्योतिष में मंगल ग्रह का महत्त्व-(मंगल, अमंगल (मंगलदोष )और अन्य मंगलीक प्रभाव/योग)——

ज्योतिष में मंगल ग्रह का महत्त्व-(मंगल, अमंगल (मंगलदोष )और अन्य मंगलीक प्रभाव/योग)——
 
—मंगल ग्रह को पृथ्वी का पुत्र कहा जाता है I ग्रहों में मंगल का महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है I हमारे शरीर में मंगल रक्त में निवास करता है I जो व्यक्ति खेलकूद जैसे कि कुश्ती, क्रिकेट, बाक्सिंग आदि के खिलाड़ी होते हैं वे मंगल के अधीन आते हैं I सेना में अधिकारी, पुलिस, सर्जन इत्यादि मंगल के अधीन होते हैं I मंगल के साथ शनि का संयोग व्यक्ति को डाक्टर बनाता है यदि मंगल अधिक बलवान हो तो वह सफल डाक्टर बनता है तथा उसका कार्य चीरफाड़ से सम्बंधित होता है  I  शनि अगर अधिक बलवान हो तो दोनों के संयोग से कारावास या जेल से सम्बंधित आजीविका होती है  I इस सन्दर्भ में बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि शनि व मंगल किस नक्षत्र में हैं और उनके अंश कितने हैं या उनका बल कितना है दोनों में से कौन अधिक बलवान है I मंगल व शनि को एक दूसरे का शत्रु माना जाता है परन्तु एक साथ जन्म कुंडली में इन दोनों के किसी भी स्थान में बैठे होने से बहुत से योग बनते तथा बिगड़ते हैं I अगर दोनों साथ बैठे हैं तो समझ लेना चाहिए कि मांगलिक योग होगा भी तो उसका प्रभाव कम हो जाएगा I फिर भी ऐसे जातक जातिका का विवाह मंगलीक से ही होना चाहिए  …
 
—भारतीय वैदिक ज्योतिष में मंगल ग्रह को मुख्य तौर पर ताकत और मर्दानगी का कारक माना जाता है। मंगल प्रत्येक व्यक्ति में शारीरिक ताकत तथा मानसिक शक्ति एवम मजबूती का प्रतिनिधित्व करते हैं। मानसिक शक्ति का अभिप्राय यहां पर निर्णय लेने की क्षमता और उस निर्णय पर टिके रहने की क्षमता से है। मंगल के प्रबल प्रभाव वाले जातक आम तौर पर तथ्यों के आधार पर उचित निर्णय लेने में तथा उस निर्णय को व्यवहारिक रूप देने में भली प्रकार से सक्षम होते हैं। ऐसे जातक सामान्यतया किसी भी प्रकार के दबाव के आगे घुटने नहीं टेकते तथा इनके उपर दबाव डालकर अपनी बात मनवा लेना बहुत कठिन होता है और इन्हें दबाव की अपेक्षा तर्क देकर समझा लेना ही उचित होता है। 
 
—-मंगल आम तौर पर ऐसे क्षेत्रों का ही प्रतिनिधित्व करते हैं जिनमें साहस, शारीरिक बल, मानसिक क्षमता आदि की आवश्यकता पड़ती है जैसे कि पुलिस की नौकरी, सेना की नौकरी, अर्ध-सैनिक बलों की नौकरी, अग्नि-शमन सेवाएं, खेलों में शारीरिक बल तथा क्षमता की परख करने वाले खेल जैसे कि कुश्ती, दंगल, टैनिस, फुटबाल, मुक्केबाजी तथा ऐसे ही अन्य कई खेल जो बहुत सी शारीरिक उर्जा तथा क्षमता की मांग करते हैं। इसके अतिरिक्त मंगल ऐसे क्षेत्रों तथा व्यक्तियों के भी कारक होते हैं जिनमें हथियारों अथवा औजारों का प्रयोग होता है जैसे हथियारों के बल पर प्रभाव जमाने वाले गिरोह, शल्य चिकित्सा करने वाले चिकित्सक तथा दंत चिकित्सक जो चिकित्सा के लिए धातु से बने औजारों का प्रयोग करते हैं, मशीनों को ठीक करने वाले मैकेनिक जो औजारों का प्रयोग करते हैं तथा ऐसे ही अन्य क्षेत्र एवम इनमे काम करने वाले लोग। इसके अतिरिक्त मंगल भाइयों के कारक भी होते हैं तथा विशेष रूप से छोटे भाइयों के। मंगल पुरूषों की कुंडली में दोस्तों के कारक भी होते हैं तथा विशेष रूप से उन दोस्तों के जो जातक के बहुत अच्छे मित्र हों तथा जिन्हें भाइयों के समान ही समझा जा सके। 
—-मंगल एक शुष्क तथा आग्नेय ग्रह हैं तथा मानव के शरीर में मंगल अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा इसके अतिरिक्त मंगल मनुष्य के शरीर में कुछ सीमा तक जल तत्व का प्रतिनिधित्व भी करते हैं क्योंकि मंगल रक्त के सीधे कारक माने जाते हैं। ज्योतिष की गणनाओं के लिए मंगल को पुरूष ग्रह माना जाता है। मंगल मकर राशि में स्थित होने पर सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं तथा मकर में स्थित मंगल को उच्च का मंगल भी कहा जाता है। मकर के अतिरिक्त मंगल को मेष तथा वृश्चिक राशियों में स्थित होने से भी अतिरिक्त बल मिलता है जोकि मंगल की अपनी राशियां हैं।  
—-मंगल के प्रबल प्रभाव वाले जातक शारीरिक रूप से बलवान तथा साहसी होते हैं। ऐसे जातक स्वभाव से जुझारू होते हैं तथा विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी हिम्मत से काम लेते हैं तथा सफलता प्राप्त करने के लिए बार-बार प्रयत्न करते रहते हैं और अपने रास्ते में आने वाली बाधाओं तथा मुश्किलों के कारण आसानी से विचलित नहीं होते। मंगल का कुंडली में विशेष प्रबल प्रभाव कुंडली धारक को तर्क के आधार पर बहस करने की विशेष क्षमता प्रदान करता है जिसके कारण जातक एक अच्छा वकील अथवा बहुत अच्छा वक्ता भी बन सकता है। मंगल के प्रभाव में वक्ता बनने वाले लोगों के वक्तव्य आम तौर पर क्रांतिकारी ही होते हैं तथा ऐसे लोग अपने वक्तव्यों के माध्यम से ही जन-समुदाय तथा समाज को एक नई दिशा देने में सक्षम होते हैं। युद्ध-काल के समय अपनी वीरता के बल पर समस्त जगत को प्रभावित करने वाले जातक मुख्य तौर पर मंगल के प्रबल प्रभाव में ही पाए जाते हैं।   
—–कर्क राशि में स्थित होने पर मंगल बलहीन हो जाते हैं तथा इसके अतिरिक्त मंगल कुंडली में अपनी स्थिति विशेष के कारण अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव के कारण भी कमजोर हो सकते हैं। कुंडली में मंगल की बलहीनता कुंडली धारक की शारीरिक तथा मानसिक उर्जा पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है तथा इसके अतिरिक्त जातक रक्त-विकार संबधित बिमारियों, तव्चा के रोगों, चोटों तथा अन्य ऐसे बिमारीयों से पीडित हो सकता है जिसके कारण जातक के शरीर की चीर-फाड़ हो सकती है तथा अत्याधिक मात्रा में रक्त भी बह सकता है। मंगल पर किन्हीं विशेष ग्रहों के बुरे प्रभाव के कारण जातक किसी दुर्घटना अथवा लड़ाई में अपने शरीर का कोई अंग भी गंवा सकता है। इसके अतिरिक्त कुंडली में मंगल की बलहीनता जातक को सिरदर्द, थकान, चिड़चिड़ापन, तथा निर्णय लेने में अक्षमता जैसी समस्याओं से भी पीड़ित कर सकती है।  
—-राहू मंगल के संयोग से व्यक्ति जासूस बनता है I मंगल अधिक बलवान हो तो निश्चित ही व्यक्ति सफल जासूस होता है या फिर किसी गुप्तचर एजेंसी में कार्यरत होता है I राहू के बलवान होने कि स्थिति में मंगल को नुक्सान पहुंचता है व मंगल राहू के योग से जुए या शराबखाने में, हथियारों की फैक्ट्री में काम करता है I ऐसा व्यक्ति गद्दार, आतंकवादी, चोर, मुखबिर, धोखेबाज तथा कातिल हो सकता है I
—-चन्द्र मंगल के योग वाला व्यक्ति नेवी में अफसर होता है I मंगल का अधिक बलवान होना तथा चन्द्र का भी मित्र राशी में होना इस योग के लिए आवश्यक है I अभिप्राय यह है कि चन्द्र पानी का तथा मंगल सेना का प्रतिनिधित्व करते हैं I अगर इन दोनों के योग से व्यक्ति कुछ बनता है तो मंगल बलवान होने की स्थिति में वह जलसेना में तथा चन्द्र बलवान होने पर समुद्री जहाज में अपनी आजीविका प्राप्त करता है I वह प्रयोगशाला में वैज्ञानिक (चन्द्र के बहुत अधिक बलवान होने पर) या ब्लड बैंक में डाक्टर हो सकता है I
—-बुध मंगल से व्यक्ति चालाक ठग या चोर बनता है I इसके लिए बुध का बलवान होना आवश्यक है I राहू का भी यदि इस योग में योगदान हो तो निश्चित ही व्यक्ति चोरों का नेता या ठग होता है I क्योंकि बुध चालाकी के लिए जाना जाता है और अगर उसे मंगल का साहस या शक्ति प्राप्त हो जाए तो उसकी हिम्मत बढ़ जाती है और चूंकि दोनों परस्पर शत्रु हैं इसलिए इन दोनों का योग व्यक्ति पर बुरा पड़ने कि संभावना बढ़ जाती है तथा राहू इस योग में आग में घी का काम करता है I इससे नकारात्मक प्रभाव निश्चित हो जाता है और व्यक्ति बुराई कि तरफ चल पड़ता है इ
—-गुरु मंगल व्यक्ति को सेना में ट्रेनिंग देने वाला पद दिलवाते हैं I गुरु शिक्षक होता है I उसका काम शिक्षा देना है क्योंकि वह वास्तव में गुरु है I गुरु मंगल के योग में अगर गुरु बलवान हो तो सेना या पुलिस में होते हुए भी वह आधिकारिक पद पर तैनात रहता है I गजेटेड आफिसर का पद भी गुरु कि ही देन होता है I
—-केतु मंगल से व्यक्ति अग्नि से सम्बंधित कार्यों में आजीविका प्राप्त करता है I
—-सूर्य मंगल से व्यक्ति हड्डियों का डाक्टर बन सकता है इ
—–मेष लग्न में मंगल लग्न, दशम, नवम, पंचम, तृतीय भाव में शुभ परिणाम देगा। वृषभ में तृतीय भाव में सुख, चतुर्थ और नवम भाव में शुभ परिणाम देगा, मिथुन लग्न में एकादश, दशम, पंचम, षष्ट भाव में अनुकूल परिणाम मिलेंगे। कर्क लग्न में पंचम, नवम, सप्तम तृतीय भाव में शुभ परिणाम देगा। सिंह लग्न में नवम पंचम, लग्न चतुर्थ, तृतीय भाव में शुभ परिणाम देगा। कन्या लग्न में चतुर्थ भाव में कुछ शुभ परिणाम देगा।
 
—-तुला लग्न में अकाकर होगा, वृश्चिक लग्न में पंचम लग्न में हो तो शुभ परिणाम देगा। धनु लग्न में, पंचम भाव में नवम भाव में, चतुर्थ भाव में, तृतीय भाव में शुभ परिणाम देगा। मकर लग्न में स्थिति अनुसार स्वयं को परिणाम मिलेंगे। कुंभ लग्न में सप्तम, चतुर्थ दशम पंचम भाव में द्वादश भाव में परिणाम शुभ रहेंगे।
 
—-मीन लग्न में लग्न नवम, दशम, तृतीय भाव में शुभ परिणाम देगा। इसी प्रकार शुक्र की स्थिति अनुकूल रही तो परिणाम दोगुने होंगे। भारत के राष्ट्रपति रहे स्वर्गीय डॉ. राजेंद्रप्रसाद मृगशिरा नक्षत्र के प्रथम चरण में हुए थे। आपकी पत्रिका में धनु लग्न की होकर पंचमेश नक्षत्र स्वामी मंगल लग्न में दशमेश बुध के साथ था, वहीं शुक्र राशि स्वामी एकादश भाव में स्वराशि तुला का था।
 
—–लग्नेश गुरु की स्थिति भाग्य नवम भाव में थी वहीं राहू दशम भाव में मित्र राशि का था। आपको मंगल के बाद राहू गुरु का परिणाम अति शुभ परिणाम देने वाला साबित होकर भारत के राष्ट्रपति पद तक पहुँचे।
—–मंगल यदि अनुकूल स्थिति में हो तो कष्ट नहीं होता। यदि मंगल नीच राशि में होकर द्वितीय या सप्तम या अष्टम भाव में हो तो जन्म के समय मृत्युतुल्य कष्ट भोगना पड़ता है। इस नक्षत्र में पड़ने वाले नाम वे, वो है। मंगल के बाद राहू, फिर गुरु की महादशा चलती है। मंगल जहाँ कम समय के लिए हैं, वही राहू की महादशा बाल्यावस्था से लेकर युवा होने तक चल सकती है, अतः राहू की स्थिति को भी जान लेना होगा। राहू यदि जन्म पत्रिका में नीच का या अशुभ स्थिति में हो तो उस बालक का बचपन उद्दण्ड तरीके से व्यतीत होगा ही, इसके बाद उसमें बदलाव आकार सुधार आएगा, लेकिन पढ़ाई की उम्र निकल जाएगी और फिर वह बालक पढ़ने में ध्यान नहीं लगाएगा।
——मंगलदोष केसे देखें एवं क्या होंगे प्रभाव —
—–किसी भी कुंडली में मंगल दोष हो व मंगल की महादशा में मंगल का अंतर चल रहा हो या मंगल की महादशा में शनि का अंतर हो या मंगल की महादशा में दूसरी स्थान की राशि के स्वामी या सातवें स्थान की राशि का अंतर हो तो विवाह से बचना चाहिए नहीं तो दुर्घटना का सामना करना पड़ सकता है। 
—मंगल के साथ शनि 1, 4, 7, 8 का भाव 12 में हो या फिर मारक भाव 2 में हो तो विवाह में सावधानी रखना चाहिए। शनि की मंगल पर तीसरी, सातवीं या दसवीं दृष्टि पड़ती हो तो विवाह में कुंडली को अवश्य मिलाना चाहिए। 
 
—–मंगल-शनि का योग तब तक कष्ट नहीं देता है जब तक वह एक-दूसरे की राशि में हो या इनमें से किसी एक ग्रह पर गुरु की दृष्टि पड़ती हो। उपरोक्त सभी नियम वर-वधू दोनों पर प्रभावी होते हैं। यदि कुंडली मिलान कर विवाह किया जाए तो भावी दुर्घटना से बचा जा सकता है। सुखी वैवाहिक जीवन के लिए मंगल दोष को नजरंदाज ना करें।
——मंगल दोष यूँ तो जन्म लग्न, लग्न से 4, 7, 8 व 12 भाव में मंगल हो तो वह माँगलिक पत्रिका मानी जाती है। लेकिन मंगल दोष में एक और भाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। वो है द्वितीय मारक भाव यदि इस भाव में मंगल है तो माँगलिक दोष माना जाएगा।
——-मंगल यदि लड़के की कुंडली में लग्न में हो तो उसे लड़की की कुंडली में 4 या 7 भाव में देखना चाहिए। जिसकी कुंडली में मंगल पर गुरु की दृष्टि पड़ती हो या मंगल-गुरु के साथ हो तो मंगल दोष नहीं लगता। लड़की की कुंडली में भाव 2 में गुरु हो तो भी मंगल दोष नहीं लगता, क्योंकि स्त्री की कुंडली का द्वितीय भाव उसके भावी जीवनसाथी की आयु का होता है। 
ध्यान दीजिये इन वनोषधियों के प्रयोग से होता हें मंगल दोष/योग में लाभ—-
सौर मंडल में सूर्य के बाद दूसरा सबसे उग्र ग्रह मंगल ही है। यह धरती का बेटा है। इसीलिए इसका एक नाम भौम भी है। इसे कुज एवं वक्र के नाम से भी जाना जाता है। अन्य ग्रहों की तरह यह भी कुंडली में बारहों भावों में भ्रमण करता रहता है। स्थिति, योग एवं संबंध के अनुरूप जातक को फल देता रहता है। 
 
इससे उत्पन्न दोषों की शान्ति हेतु समृद्ध प्रकृति के पास वनौषधि भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। आयुर्वेद में इसका कई जगहों पर उल्लेख हुआ है। मंगल से संबंधित वनस्पतियों का उल्लेख प्रस्तुत है। आचार्य मणिबंध कृत ‘पाकनिर्झरा’ में बताया गया है कि-
 
‘मौद्गल्योऽथकुटिलः प्रेतस्‌ त्रिजातेक्षु पिंकरादुधी। जानक्योऽविराभूता पुंकरस्रग्ध दक्षा कुजाः।’ 
 
इसका विशेष विवरण निम्न प्रकार है।
1. मौद्गल्य- इसका वास्तविक नाम उदाल है। किन्तु शास्त्रों में इसे मौद्गल्य के नाम से जाना जाता है। कारण यह है कि सर्वप्रथम मुद्गल ऋषि ने अपनी पालिता पुत्री विभावरी की शादी मात्र इसलिए कर सकने में असमर्थ थे कि विभावरी की जन्मकुंडली में प्रथम भाव में मंगल-कर्क राशि का एवं सातवें भाव में गुरु, सूर्य, मकर राशि का होकर बैठे थे। 
 
मंगल पर पवित्र ग्रह गुरु की दृष्टि होने के बावजूद भी मांगलिक दोष की प्रचंडता के कारण उसकी शादी बाधित हो रही थी। फिर तपोबल से ऋषि ने इस मंगल की औषधि को ढूँढा। इसीलिए इसका नाम मौद्गल्य पड़ गया। मोटे तथा छोटे एवं गोल पत्तों वाला यह पौधा परजीवी होता है। 
 
यह अक्सर बड़े पेड़ों के कोटरों, या कही अगर किसी पेड़ के किसी हिस्से में मिट्टी जमा हो गई तो उस मिट्टी में अपने आप उग जाता है। इसमें फल एवं फूल लगते हैं। किन्तु इसका बीज कहीं बोने से नहीं अंकुरित होता। यह तमिलनाडु, आँध्रप्रदेश, कर्नाटक आदि दक्षिणी प्रदेश में ज्यादा पाया जाता है। जब किसी व्यक्ति की कुंडली में प्रथम भाव में मंगल दोष देने वाला हो गया हो तो इसका प्रयोग किया जाता है।
 
2. कुटिल- इसे स्थानीय भाषाओं में कटैला कहते हैं। इसके काँटे टेढ़े होते हैं। यदि कपड़े में फँस जाते हैं। तो बहुत ही कठिनाई से निकलते हैं। इसका तना पतला, हरा एवं पत्ते बहुत छोटे होते हैं। यह झाड़ी के आकार का होता है। मध्य भारत के प्रत्येक क्षेत्र में यह पाया जाता है। यह देहात में फोड़े-फुँसी की बहुत ही प्रचलित औषधि है। जब किसी व्यक्ति की कुंडली में दूसरे भाव में मंगल के कारण वाणी दोष, चर्मरोग या वित्तपात दोष हो तो इस वनस्पति का प्रयोग किया जाता है।
 
3. प्रेतस्‌- इसका स्थानीय नाम पितैला या तिलैया है। इसके पूरे तने पर सफेद रोम भरे पड़े होते हैं। यह पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके कोमल नवोदित पत्तों की बहुत लोग सब्जी भी बनाते हैं। इसका पत्ता चबाने पर खट्टे स्वाद का होता है। भाई बंधु या संबंधियों को पीड़ा हो या कुंडली में मंगल के तीसरे स्थान में बैठने के कारण यदि हमेशा भय बना रहता हो तो इसका प्रयोग किया जाता है।
 
4. त्रिजात- इसे राजस्थान में लोंठ, मध्यप्रदेश में मलीठा, तथा बंगाल, बिहार एवं उत्तरप्रदेश में तिनपतियाँ के नाम से जाना जाता है। इसकी चटनी बहुत स्वादिष्ट होती है। इसके पत्ते अरहर के पत्ते के समान होते हैं। यह चूहों का परम प्रिय भोजन है। इसका पेड़ जहाँ पर होता है। वहाँ पर अमूमन चूहे अपना बिल बना लेते हैं। कुंडली में चौथे भाव में मंगल के कारण दोषयुक्त हुई कुंडली के दोष निवारण हेतु इसका प्रयोग होता है। इसे वैधव्य दोष निवारण की बहुत सशक्त औषधि मानी जाती है।
 
 
5. इक्षु- गन्ने या ईख को इक्षु कहा जाता है। यह किसान की सर्वविदित फसल है। शास्त्रों में मंगल के पाँचवें भाव के दोष निवारण हेतु मंगल की चतुर्भुजी मूर्ति बनाकर ईख के रस से स्नान कराने की विधि बताई गई है। यह वीर्य, ओज एवं रसवर्धक माना गया है। संतान बाधा एवं देवदोष निवारण में इसका प्रयोग किया जाता है।
 
6. पिंकर- औषधि विज्ञान में इसे सरसों की एक प्रजाति बताई गई है। किन्तु सरसों दो रंगों का होता है। पीले वाले सरसों का प्रयोग निषिद्ध माना गया है। यहाँ लाल रंग वाला सरसों ही गुणकारी है। छठे भाव के मंगल कृत दोष निवारण हेतु यह प्रयोग में लाया जाता है। 
 
7. आदुधी- इसे दुधिया भी कहते हैं। इसका रूप रंग ब्राह्मी घास जैसा होता है। यह जमीन पर फैल कर आगे बढ़ता है। पत्ते बिल्कुल छोटे होते हैं। इसे कहीं से तोड़ने पर दूध बहने लगता है। सातवें भाव में मंगल के कारण उत्पन्न मांगलिक दोष एवं दाम्पत्य जीवन की कटुता के निवारण हेतु इसका प्रयोग किया जाता है। 
 
8. जानकी- इसे देहाती भाषा में दाँतर कहा जाता है। लगातार कभी न अच्छे होने वाले रोग एवं उग्र वैधव्य दोष के अलावा पति अथवा पत्नी की लम्बी उम्र के लिए इसका दातुन करते हैं। लंका निवास के दौरान माता जानकी भगवान राम की लम्बी उम्र के लिए इसी का दातुन करती थी। यह सिंहल द्वीप की औषधि है। अन्यत्र यह उपलब्ध नहीं है। 
 
पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार यह एक खूबसूरत पत्तों वाला टहनीदार किन्तु कसैले स्वाद वाला वृक्ष है। नासूर एवं भगन्दर आदि रोगों की रामबाण औषधि मानी गई है। आठवें भाव में मंगल के कारण उत्पन्न दोष के निवारण हेतु इस वनस्पति का प्रयोग किया जाता है। 
 
9. अविराभ- सम्भवतः यह भटकटैया ही है। इसके पत्ते चिकने, गोल, तना छोटा, फल गोल कोमल छिलके वाले, स्वाद मीठा एवं टहनीदार झाड़ी के आकार का पौधा बताया गया है। इसके फल का रंग सिन्दूरी, लाल अथवा कत्थई होता है। बताया गया है कि इसका फल कवचावृत अर्थात किसी ढक्कनदार आवरण से ढका होता है। मंगल के कारण उत्पन्न भाग्य एवं धर्म दोष का निवारण इससे होता है। 
 
10. पुंकर- इसका एक नाम प्लक्ष भी है। यह एक अतिप्रचलित वृक्ष है। इसके पत्ते तोड़ने पर दूध बहने लगता है। कहीं-कहीं देहातों में इसके नवोदित कोमल कलियों की सब्जी भी बनाई जाती है। बरगद के फल के समान इसके फल होते हैं। मैदानी इलाके में यह ज्यादा पाया जाता है। 
 
इस वृक्ष के साथ पीपल एवं बरगद का पेड़ हो तो यह तीनों मिलकर हरिशंकरी के नाम से जाने जाते हैं। जिसकी पूजा की जाती है। पिता या नौकरी के संबंध में यदि मंगल के कारण कोई बाधा पहुँचती हो। अथवा दशम भाव संबंधी कोई मंगल कृत दोष हो तो इसका प्रयोग किया जाता है।
 
11. सरगंध- इसे सरपत भी कहते हैं। गाँव देहात में इसका प्रयोग छप्पर डालने के लिए किया जाता है। यह अक्सर नदी तालाब के किनारे पाया जाता है। इसके पत्तों की धार बहुत तेज होती है। इसके तने से बहुत दिनों पहले छोटे बच्चे कलम बनाकर लिखने का काम लेते थे। मंगल के कारण आमदनी में बाधा पहुँचती हो अथवा संतान संबंधी कष्ट हो या मंगल के कारण कुंडली का ग्यारहवाँ भाव दूषित हो तो इसका प्रयोग किया जाता है।
 
12. दक्ष- इसे दो नामों से जाना जाता है। महाराष्ट्र के सुदूर दक्षिणी प्रान्तों में इसे कहीं-कहीं आलू कहते हैं। गुजरात के खंभात इलाके में इसे कन्द के लिए प्रयुक्त करते हैं। जम्मू में भी इसे शकरकन्द के लिए ही प्रयुक्त किया जाता है। किन्तु केरल में इसे नारियल के अन्दर वाले हिस्से को कहते हैं। 
 
आसाम एवं बंगाल में दाक्षी नाम का एक स्वतंत्र पौधा भी होता है। उड़ीसा में भी दाक्षी ही कहते हैं। दाक्षी एक जहरीला पौधा है। इसके पत्ते निचोड़कर लोग कीट पतंग मारने के काम में लाते हैं। ये दोनों ही वनस्पतियाँ बारहवें भाव के मंगल दोष को शान्त करती हैं।
 
शुभ फल/परिणाम भी देता हें मंगल( आर्थिक सुख का कारक होता हें)—
 
——एक तरफ मंगल जहाँ दाम्पत्य जीवन के लिए सबसे खराब ग्रह कहा गया है। तथा मांगलिक दोष के कारण वैवाहिक जीवन को तहस-नहस करने वाला कहा गया है वहीं पर यह मंगल आर्थिक सम्पन्नता एवं भूमि-भवन, वाहन आदि की समृद्धि को भी दर्शाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मंगल के द्वारा कुंडली मांगलिक होने पर दाम्पत्य जीवन को कठिनाई का सामना करना पड़ता है। किन्तु यहाँ यह बात भी नहीं भूलना है कि इस मंगल का वैवाहिक जीवन पर दुष्प्रभाव तभी पड़ सकता है जब यह मंगल वास्तव में योग, भाव, राशि एवं दृष्टि संबंध के द्वारा अशुभ हो। 
——यदि मंगल इस प्रकार अशुभ नहीं है तो यही मंगल वैवाहिक जीवन को अत्यंत मधुर, सुखी एवं संपन्न बना देता है। मंगल चौथे अथवा सातवें भाव में बैठा हो तो कुंडली मांगलिक कहलाएगी ही। किन्तु यदि यही मंगल मेष राशि का होकर लग्न में सूर्य के साथ अथवा चौथे भाव में मकर राशि का होकर शनि के साथ हो तो वह व्यक्ति धन-धान्य से संपन्न होकर सबसे सुखी एवं शांत जीवन व्यतीत करेगा इसमें कोई संदेह नहीं है। इसी प्रकार यदि मंगल भले ही आठवें हो किन्तु लग्नेश एवं सप्तमेश की युति किसी भी केंद्र में हो तो उस जातक का वैवाहिक जीवन बहुत ही सुखी एवं यशस्वी होगा। 
—–मंगल भले ही बारहवें भाव में हो, किन्तु यदि गुरु या शुक्र में से कोई भी एक उच्चस्थ होकर एक-दूसरे के साथ किसी भी केंद्र में बैठा हो तो दाम्पत्य जीवन सुखी होगा, इसके विपरीत देखे तो दसवें भाव में मंगल रहने से कुंडली मांगलिक नहीं होती है। तो हम इस भाव में मंगल को उच्च मकर राशि में दसवें भाव में मान लेते हैं। तथा दशमेश को शुभ केंद्र लग्न में शुभ ग्रह बुध के साथ युति मान लेते हैं। इस प्रकार सभी तरह से मंगल के शुभ होने पर भी वैवाहिक जीवन अनर्थकारी हो जाता है। 
—–जातक दर-दर का भिखारी एवं जाति, समाज से बहिष्कृत हो जाता है। इसमें तो कोई संदेह ही नहीं है कि अगर कुंडली में मंगल कमजोर हुआ तो आदमी गरीब हो जाता है। 
कहा जाता है की मंगल अगर आठवें अथवा बारहवें भाव में हो तो आदमी मांगलिक हो जाता है। किन्तु अगर मंगल आठवें या बारहवें भाव में अपने घर में हो या आठवें घर में बारहवें घर के स्वामी के साथ अथवा बारहवें घर में आठवें भाव के स्वामी के साथ हो तो आचार्य मीनराज के शब्दों में सरल एवं विमल नामक शुभ योग बनते हैं। कुंडली मांगलिक होने की मात्र कुछ एक शर्तें ही हैं। जिससे कुंडली मांगलिक हो जाती है। अन्यथा कुंडली में मंगल अगर पापपूर्ण अथवा अस्त आदि से कमजोर न हो तो जीवन धन-धान्य पूर्ण शांत एवं सुखी होता है। 
—–नाम के अनुरूप मंगल हमेशा मंगल ही करता है। परन्तु विविध भ्रांतियों ने इस देवग्रह की महिमा ही खंडित कर दी है। जो मंगल भूमि-भवन एवं वाहन का द्योतक है, जिस मंगल के कारण वंश वृद्धि होती है, जो मंगल स्थायी संपदा का द्योतक है, जो मंगल विवाह जैसा पवित्र बंधन प्रदान करता है। उस मंगल को इतना बदनाम कर दिया गया है की आम जनता इससे सदा भयभीत रहती है। यह जान लेना चाहिए की मंगल यदि कमजोर हो तो वंश वृद्धि रुक जाएगी। धन-संपदा नष्ट हो जाएगी। साहस एवं पराक्रम क्षीण हो जाएगा। 
——आचार्य व्याघ्र पाद के शब्दों में कुंडली मांगलिक प्रायः तभी होती है जब लग्न से पहले वाली राशि जन्म राशि हो अथवा अगली राशि जन्म राशि हो तथा मंगल मांगलिक सूचक भावों अथवा घरों में बैठा हो। अन्यथा मंगल चाहे कहीं भी क्यों न बैठा हो कुंडली मांगलिक नहीं हो सकती है। अपितु इसके विपरीत मंगल ऐश्वर्य एवं स्थायी धन-संपदा को देने वाला हो जाता है।
इनके उपयोग/प्रयोग द्वारा पायें मंगलदोष/योग से मुक्ति/छुटकारा—-
—–किसी भी जन्म कुंडली में मंगल तीसरे, छठे और दसवें घर का कारक ग्रह है। इसका रंग लाल है। मंगल का प्रभाव दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर तो होता ही है साथ ही खाने की वस्तुओं पर भी पड़ता है। मंगल का प्रभाव ऐसी वस्तुओं पर होता है जिनका रंग मंगल की तरह होता है। मंगल का प्रभाव ऐसी वस्तुओं पर भी होता है जिनकी प्रकृति मंगल की तरह उत्तेजक होती है।
——–मंगल से प्रभावित भोज्य पदार्थ अनार, गाजर, मोठ, लाल चौलाई, चुकंदर, टमाटर, लौंग, मसूर, लाल मक्का आदि है। मंगल देव को प्रसन्न करने के लिए इन चिजों का दान दिया जाता है। दान देने के साथ ही अगर इनका सेवन भी किया जाए तो मंगल देव की कृपा बनी रहती है। हमारे शरीर में खून का कारक ग्रह भी मंगल होता है। अगर मंगल की वस्तुओं का सेवन करें तो शरीर में खून से सम्बन्धी सभी दोषों से मुक्ति मिल जाति है। मोठ को अंकुरित कर के रोज सुबह कच्चा चबा कर खाएं तो शरीर में खून के लाल कणों की वृद्धि होती है। सर्दियों में मक्की के आटे की रोटी खाएं। बादाम को भिगो कर रोज सुबह खाएं तो बल बढ़ता है। अगर आप मंगल की वस्तुएं खाएं तो मंगल वैसा ही प्रभाव करेगा जैसा कुंडली में उच्च राशि के साथ स्थित होकर करता है।
##### शुभम बवातु..कल्याण हो…..
पं0 दयानन्द शास्त्री
विनायक वास्तु एस्ट्रो शोध संस्थान ,
पुराने पावर हाऊस के पास, कसेरा बाजार,
झालरापाटन सिटी (राजस्थान) 326023
मो0 नं0 … 09024390067 ;09411190067 ;09711060179 ;
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