आइये जाने लाल किताब एवं वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली में कर्ज/ ऋण योग :-

आइये जाने लाल किताब एवं वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली में कर्ज/ ऋण योग :- 


पंडित दयानंद शास्त्री (मोब-09024390067) के अनुसार मनुष्य  जिंदगी और घर-गृहस्ती के कामों के लिए इंसान कमोबेश ऋण लेता रहता है| यह कर्ज तब तक भार नहीं लगता है, जब तक वह चुकता रहता है| लेकिन समस्या तब बढ़ जाती है, जब कर्ज लेकर कर्जा चुकाएं या कर्जे पर कर्जा बढ़ता चला जाए| ऐसा क्यों होता है और ज्योतिष की दृष्टी से इसके कारण निवारणों पर ध्यान दिया जाए तो यह पता चलता है कि इस तरह के कुछ योग होते हैं जिनमे कर्ज चुकने में ही नहीं आता है|
 
पंडित दयानंद शास्त्री (मोब-09024390067) के अनुसार ज्योतिष में फलित करते समय योगों का विशेष योगदान होता है। योग एक से अधिक ग्रह जब युति, दृष्टि, स्थिति वश संबंध बनाते हैं तो योग बनता है। योग कारक ग्रहों की महादशा, अन्तर्दशा व प्रत्यन्तर दशादि में योगों का फल मिलता है। योग को समझे बिना फलित व्यर्थ है। योग में योगकारक ग्रह का महत्वपूर्ण भूमिका होती है। योगकाकर ग्रह के बलाबल से योग का फल प्रभावित होता है। अब यहां ज्योतिष योगों कि चर्चा करेंगे जो इस प्रकार हैं।
 

जन्म कुंडली के छठे भाव से रोग, ऋण, शत्रु, ननिहाल पक्ष, दुर्घटना का अध्ययन किया जाता है| ऋणग्रस्तता के लिए इस भाव के आलावा दूसरा भाव जो धन का है, दशम-भाव जो कर्म व रोजगार का है, एकादश भाव जो आय का है एवं द्वादश भाव जो व्यय भाव है, का भी अध्ययन किया जाता है| इसके आलावा ऋण के लिए कुंडली में मौजूद कुछ योग जैसे सर्प दोष व वास्तु दोष भी इसके कारण बनते हैं| इस भाव के कारक ग्रह शनि व मंगल हैं|

सामान्यत: पूरा परिवार ही ऋण से प्रभावित होता है। इसलिए इनके उपाय पूरे परिवार के सहयोग से करेने पडते हैं। यदि किसी की कुण्डली में ग्रह राजयोग का निर्माण कर रहे हों और वही ग्रह ऋण संबंधी योग का गठन भी कर रहे हों तो केवल बुरे फल ही मिलते हैं।
लक्षण : लाल किताब के अनुसार जब किसी की कुण्डली में शुक्र, शनि, राहु या केतु पाँचवें भाव में स्थित हों, तो जातक स्‍वयं के ऋण से पीडित माना जाता।
कारण: आपके पूर्वजों या पितरो नें परिवार के रीति-रिवाज़ों और परम्पराओं को नहीं माना होगा अथवा उन्होंने परमात्मा पर विश्वास नहीं किया होगा।
संकेत: घर के नीचे आग की भट्ठियां होंगी या छ्त में सूर्य की रोशनी आने के लिए बहुत सारे छेद होंगे।


ऐसे देखे धन-नाश/ कर्ज/ऋण योग: ——–

पंडित दयानंद शास्त्री (मोब-09024390067) के अनुसार दूसरे भाव का स्वामी बुध यदि गुरु के साथ अष्टम भाव में हो तो यह योग बनता है| जातक पिता के कमाए धन से आधा जीवन काटता है या फिर ऋण लेकर अपना जीवन यापन करता है| सूर्य लग्न में शनि के साथ हो तो जातक मुकदमों में उलझा रहता है और कर्ज लेकर जीवनयापन व मुकदमेबाजी करता रहता है| 12 वें भाव का सूर्य व्ययों में वृद्धि कर व्यक्ति को ऋणी रखता है| पंडित दयानंद शास्त्री (मोब-09024390067) के अनुसार अष्टम भाव का राहू दशम भाव के माध्यम से दूसरे भाव पर विष-वमन कर धन का नाश करता है और इंसान को ऋणी होने के लिए मजबूर कर देता है| इनके आलावा कुछ और योग हैं जो व्यक्ति को ऋणग्रस्त बनाते हैं|

1. षष्ठेश पाप ग्रह हो व 8 वें या 12 वें भाव में स्थित हो तो व्यक्ति ऋणग्रस्त रहता है|
2. छठे भाव का स्वामी हीन-बली होकर पापकर्तरी में हो या पाप ग्रहों से देखा जा रहा हो|
3. दूसरा व दशम भाव कमजोर हो, एकादश भाव में पाप ग्रह हो या दशम भाव में सिंह राशि हो, ऐसे लोग कर्म के     प्रति अनिच्छुक होते हैं|
4. यदि व्यक्ति का 12 वां भाव प्रबल हो व दूसरा तथा दशम कमजोर तो जातक उच्च स्तरीय व्यय वाला होता है और 5. निरंतर ऋण लेकर अपनी जरूरतों की पूर्ति करता है|
6. आवास में वास्तु-दोष-पूर्वोत्तर कोण में निर्माण हो या उत्तर दिशा का निर्माण भारी व दक्षिण दिशा का निर्माण हल्का हो तो व्यक्ति के व्यय अधिक होते हैं और ऋण लेना ही पड़ता है|

आइये जाने की किस गृह का कोनसे भाव पर क्या प्रभाव होता हें——–

पंडित दयानंद शास्त्री (मोब-09024390067) के अनुसार 

——-सूर्य से स्वऋण: पंचम भाव में पापी ग्रहों के होने से जातक को स्वऋण होता है। प्राचीन परंपराओं के अपमान और जातक के नास्तिक स्वभाव के कारण यह ऋण होता है। इस ऋण के प्रभाव से जातक को शारीरिक कष्ट, मुकद्दमे में हार, राजदंड, प्रत्येक कार्य में संघर्ष आदि अशुभ प्रभावों से गुजरना पड़ता है और जातक, निर्दोष होते हुए भी, दो

षी बन जाता है। 

 

उपाय: जातक को अपने सगे-संबंधियों से बराबर-बराबर धन ले कर यज्ञ करना चाहिए। तभी जातक को ऋण से मुक्ति मिलेगी।——-

चंद्र से मातृ ऋण: चतुर्थ भाव में केतु स्थित होने से मातृ ऋण होता है। माता का अपमान करना और उसे यातनाएं देना, घर से बेघर करना आदि अशुभ कर्मों के कारण यह ऋण होता है। इसके प्रभाव से जातक को व्यर्थ धन-हानि, रोग, ऋण और प्रत्येक कार्य में असफलता का सामना करना पड़ता है। 

 

उपाय: जातक द्वारा रक्त संबंधियों से बराबर-बराबर भाग में चांदी ले कर चलते पानी में बहाने से इस ऋण से मुक्ति मिलती है।——–

मंगल से सगे-संबंधियों का ऋण ः पहले और आठवें भाव में बुध और केतु ग्रह हों, तो संबंधियों का ऋण होता है। इस ऋण के प्रभाव से जातक को अचानक भारी हानि उठानी पड़ती है। उसका सर्वस्व स्वाहा हो जाता है। जातक संकटों से घिर जाता है। यह प्रभाव मुख्यतः 28 वें वर्ष में होता है। 

 

उपाय: परिवार के प्रत्येक सदस्य से बराबर-बराबर धन एकत्र कर के किसी शुभ कार्य हेतु दान में देने से इस ऋण से मुक्ति मिलती है।——-

बुध से बहन का ऋण: लाल किताब जन्मकुंडली में तीसरे, या छठे भाव में चंद्रमा होने से बहन का ऋण होता है। लड़की, या बहन पर अत्याचार करने, उसे घर से निकालने, अथवा किसी लड़की को धोखा देने, या उसकी हत्या कर देने से यह ऋण होता है। इस ऋण के बोझ से जातक को आर्थिक रूप से कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उसका जीवन संघर्षमय हो जाता है और उसे मित्रों, या सगे-संबंधियों से कोई सहायता नहीं मिल पाती है। 

 

उपाय: इस ऋण से मुक्ति के लिए जातक समस्त परिवार के सदस्यों से बराबर-बराबर पीले रंग की कौड़ियां एकत्र कर के, उन्हें जला कर, राख करे। उसी राख को बहते पानी में बहाना चाहिए।———

गुरु से पितृ ऋण: दूसरे, पांचवें, नवें और बारहवें भाव में शुक्र, बुध और राहु स्थित होने से पितृ ऋण होता है। श्राद्ध न करने, मंदिर, या पीपल के वृक्ष को क्षति पहुंचाने, अथवा कुटुंब के कुल पुरोहित का परिवर्तन करने से यह ऋण होता है। इसके फलस्वरूप जातक को विशेष कर वृद्धावस्था में अनेक कष्ट भोगने पड़ते हैं। उसके जीवन भर की संचित पूंजी व्यर्थ कार्यों में नष्ट हो जाती है। 

 

उपाय: कुटुंब के प्रत्येक सदस्य से धन एकत्र कर के किसी शुभ कार्य हेतु दान में देना चाहिए तथा घर के निकट स्थित मंदिर, या पीपल के पेड़ की देखभाल करें।——-

शुक्र से पत्नी का ऋण: दूसरे और सातवें भाव में सूर्य, राहु और चंद्रमा स्थित हों, तो पत्नी का ऋण होता है। पत्नी की हत्या, या उसे अपमानित कर मार-पीट करने से यह ऋण होता है। इस ऋण के प्रभाव से जातक को अनेक दुखों का सामना करना पड़ता है। विशेष कर मंगल कार्यों में कोई अप्रिय घटना घटित हो जाती है।

 

उपाय: कुटुंब के प्रत्येक सदस्य से बराबर-बराबर धन एकत्र कर 100 गायों को भोजन कराने से इस ऋण से मुक्ति मिलती है।——–

शनि से असहाय का ऋण: दसवें और ग्यारहवें भाव में सूर्य, चंद्र और मंगल स्थित होने से असहाय व्यक्ति का ऋण होता है। जीव हत्या करने, धोखे से किसी वस्तु पर अधिकार कर लेने और किसी असहाय व्यक्ति को कष्ट देने से यह ऋण होता है। इस ऋण से जातक और उसके कुटुंब को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जातक की उन्नति में अनेक बाधाएं आती हैं और उसका जीवन नरक सदृश बन जाता है। 

 

उपाय: कुटुंब के समस्त सदस्यों से बराबर-बराबर धन एकत्र कर के सौ मजदूरों को भोजन कराना चाहिए।——

राहु से अजन्मे का ऋण: बारहवें भाव में सूर्य, शुक्र और मंगल होने से अजन्मे का ऋण होता है। इस ऋण से जातक को सगे-संबंधियों से भी धोखे का सामना करना पड़ता है। जातक को शारीरिक चोट पहुंचती है और कार्य- व्यवसाय में हानि होती है। कुटुंब के सदस्य भी परेशान रहते हैं। जातक को चारों तरफ से हार का सामना करना पड़ता है और निर्दोष होते हुए भी उसे जेल जाना पड़ता है। 

 

उपाय: कुटुंब के प्रत्येक सदस्य से एक-एक नारियल एकत्र कर बहते पानी में बहाने से इस ऋण से मुक्ति मिलती है।———

केतु से ईश्वरीय ऋण: छठे भाव में चंद्र, मंगल होने से ईश्वरीय ऋण होता है। लालच में आ कर किसी की हत्या कर देने, सगे-संबंधियों से विश्वासघात करने और नास्तिक प्रकृति का होने से यह ऋण होता है। जातक का कुटुंब बर्बाद हो जाता है। जातक की संतान नहीं होती है। उसे विश्वासघात का सामना करना पड़ता है। उसका जमा धन धीरे-धीरे व्यर्थ के कार्यों में नष्ट हो जाता है। 

उपाय: कुटुंब के प्रत्येक सदस्य से धन एकत्र कर के 100 कुत्तों को भोजन कराने से इस ऋण से मुक्ति मिलती है।
 

ये भी होते हें धनहीनता के ज्योतिष योग——-पंडित दयानंद शास्त्री (मोब-09024390067) के अनुसार ज्योतिष में फलित करते समय योगों का विशेष योगदान होता है। योग एक से अधिक ग्रह जब युति, दृष्टि, स्थिति वश संबंध बनाते हैं तो योग बनता है। योग कारक ग्रहों की महादशा, अन्तर्दशा व प्रत्यन्तर दशादि में योगों का फल मिलता है। योग को समझे बिना फलित व्यर्थ है। योग में योगकारक ग्रह का महत्वपूर्ण भूमिका होती है। योगकाकर ग्रह के बलाबल से योग का फल प्रभावित होता है। अब यहां ज्योतिष योगों कि चर्चा करेंगे जो इस प्रकार हैं।

धनहानि किसी को भी अच्छी नहीं लगती है। आज उन ज्योतिष योगों की चर्चा करेंगे जो धनहानि या धनहीनता कराते हैं। कुछ योग इस प्रकार हैं-

१. धनेश छठे, आठवें एवं बारहवें भाव में हो या भाग्येश बारहवें भाव में हो तो जातक करोड़ों कमाकर भी निर्धन रहता है। ऐसे जातक को धन के लिए अत्यन्त संघर्ष करना पड़ता है। उसके पास धन एकत्रा नहीं होता है अर्थात्‌ दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि धन रुकता नहीं है।

२. जातक की कुंडली में धनेश अस्त या नीच राशि में स्थित हो तथा द्वितीय व आठवें भाव में पापग्रह हो तो जातक सदैव कर्जदार रहता है।

३. जातक की कुंडली में धन भाव में पापग्रह स्थित हों। लग्नेश द्वादश भाव में स्थित हो एवं लग्नेश नवमेश एवं लाभेश(एकादश का स्वामी) से युत हो या दृष्ट हो तो जातक के ऊपर कोई न कोई कर्ज अवश्य रहता है।

४. किसी की कुंडली में लाभेश छठे, आठवें एवं बारहवें भाव में हो तो जातक निर्धन होता है। ऐसा जातक कर्जदार, संकीर्ण मन वाला एवं कंजूस होता है। यदि लग्नेश भी निर्बल हो तो जातक अत्यन्त निर्धन होता है।

५. षष्ठेश एवं लाभेश का संबंध दूसरे भाव से हो तो जातक सदैव ऋणी रहता है। उसका पहला ऋण उतरता नहीं कि दूसरा चढ़ जाता है। यह योग वृष, वृश्चिक, मीन लग्न में पूर्णतः सत्य सिद्ध होते देखा गया है।

६. धन भाव में पाप ग्रह हों तथा धनेश भी पापग्रह हो तो ऐसा जातक दूसरों से ऋण लेता है। अब चाहे वह किसी करोड़पति के घर ही क्यों न जन्मा हो।

७. किसी जातक की कुंडली में चन्द्रमा किसी ग्रह से युत न हो तथा शुभग्रह भी चन्द्र को न देखते हों व चन्द्र से द्वितीय एवं बारहवें भाव में कोई ग्रह न हो तो जातक दरिद्र होता है। यदि चन्द्र निर्बल है तो जातक स्वयं धन का नाश करता है। व्यर्थ में देशाटन करता है और पुत्री एवं स्त्री संबंधी पीड़ा जातक को होती है।

८. यदि कुंडली में गुरु से चन्द्र छठे, आठवें या बारहवें हो एवं चन्द्र केन्द्र में न हो तो जातक दुर्भाग्यशाली होता है और उसके पास धन का अभाव होता है। ऐसे जातक के अपने ही उसे धोखा देते हैं। संकट के समय उसकी सहायता नहीं करते हैं। अनेक उतार-चढ़ाव जातक के जीवन में आते हैं।

९. यदि लाभेश नीच, अस्त य पापग्रह से पीड़ित होकर छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तथा धनेश व लग्नेश निर्बल हो तो ऐसा जातक महा दरिद्र होता है। उसके पास सदैव धन की कमी रहती है। सिंह एवं कुम्भ लग्न में यह योग घटित होते देखा गया है।

१०. यदि किसी जातक की कुण्डली में दशमेश, तृतीयेश एवं भाग्येश निर्बल, नीच या अस्त हो तो ऐसा जातक भिक्षुक, दूसरों से धन पाने की याचना करने वाला होता है।

११. किसी कुण्डली में मेष में चन्द्र, कुम्भ में शनि, मकर में शुक्र एवं धनु में सूर्य हो तो ऐसे जातक के पिता एवं दादा द्वारा अर्जित धन की प्राप्ति नहीं होती है। ऐसा जातक निज भुजबल से ही धन अर्जित करता है और उन्नति करता है।

१२. यदि कुण्डली का लग्नेश निर्बल हो, धनेश सूर्य से युत होकर द्वादश भाव में हो तथा द्वादश भाव में नीच या पापग्रह से दृष्ट सूर्य हो तो ऐसा जातक राज्य से दण्ड स्वरूप धन का नाश करता है। ऐसा जातक मुकदमें धन हारता है। यदि सरकारी नौकरी में है तो अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित या नौकरी से निकाले जाने का भय रहता है। वृश्चिक लग्न में यह योग अत्यन्त सत्य सिद्ध होता देखा गया है।

१३. यदि धनेश एवं लाभेश छठे, आठवें, बारहवें भाव में हो एवं एकादश में मंगल एवं दूसरे राहु हो तो ऐसा जातक राजदण्ड के कारण धनहानि उठाता है। वह मुकदमे, कोर्ट व कचहरी में मुकदमा हारता है। अधिकारी उससे नाराज रहते हैं। उसे इनकम टैक्स से छापा लगने का भय भी रहता है।

मूलतः धनेश, लाभेश, दशमेश, लग्नेश एवं भाग्येश निर्बल हो तो धनहीनता का योग बनता है।

पंडित दयानंद शास्त्री (मोब-09024390067) के अनुसार उक्त धनहीनता के योग योगकारक ग्रहों की दशान्तर्दशा में फल देते हैं। फल कहते समय दशा एवं गोचर का विचार भी कर लेना चाहिए।(मेरे द्वारा सम्पादित ज्योतिष निकेतन सन्देश अंक ६४ से साभार। सदस्य बनने या नमूना प्रति प्राप्त करने के लिए अपना पता मेरे ईमेल पर भेजें ताजा अंक प्रेषित कर दिया जाएगा।)

 
इन उपाय से होगा लाभ——–(किसी योग्य आचार्य की देखरेख में ही ये उपाय करें,अपनी जन्मकुंडली के अनुसार)
 
पंडित दयानंद शास्त्री (मोब-09024390067) के अनुसार ——-
——-

नित्य गोपाल विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें|

 

——

विधि-विधान पूर्वक लक्ष्मी-यन्त्र की स्थापना कर लक्ष्मी-स्तोत्र व कवच का पाठ करें या कराएं|

——सभी परिजनों से एक-एक नारियल लेकर उन्हें एक जगह इकट्ठा करें और उसी दिन नदी में प्रवाहित कर दें
——सारे सम्बंधी पीले रंग की कौड़ियाँ खरीद कर, एक जगह इकट्ठी करके जलाकर राख कर दें और उस राख को उसी दिन नदी में बहा दें।

 

—–

 लक्ष्मी- गायत्री मंत्र ‘ॐ महालक्ष्म्मै च विद्महे, विष्णु पत्नये च धीमहि, तन्नो लक्ष्मिः प्रचोदयात’ का जप करें या कराएं|

 

——

एक दिन में सभी परिजनों के सहयोग से सौ कुत्तों को मीठा दूध या खीर खिलानी चाहिए।

 

——

 अपने पास में रहने वाली उस विधवा स्त्री की सेवा करके उससे आशीर्वाद प्राप्त करना करें जो कम उम्र में ही विधवा हुई हो।

 

 अलग-अलग जगह की सौ मछलियों या मज़दूरों को सभी परिजन धन इकट्ठा करके एक दिन में भोजन कराएँ।

—–अपने सभी रक्त (सगे) संबंधियों से बराबर-बराबर मात्रा में पैसे लेकर उसे दूसरों की मदद के लिए किसी चिकित्सक को दें। 
——-अपने सभी रक्त (सगे) संबंधियों से बराबर-बराबर मात्रा में पैसे लेकर उससे दवाएं खरीद कर धर्मार्थ संस्थाओं को दें।
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