गुप्त नवरात्री आज से होंगें आरम्भ

गुप्त नवरात्री आज से होंगें आरम्भ—

क्या है गुप्त नवरात्र—-

प्रिय पाठकों/मित्रों, पंडित दयानंद शास्त्री का कहना है कि हिन्दू धर्म में नवरात्र मां दुर्गा की साधना के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। नवरात्र के दौरान साधक विभिन्न तंत्र विद्याएं सीखने के लिए मां भगवती की विशेष पूजा करते हैं। तंत्र साधना आदि के लिए गुप्त नवरात्र बेहद विशेष माने जाते हैं। आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली नवरात्र को गुप्त नवरात्र कहा जाता है। इस नवरात्रि के बारे में बहुत ही कम लोगों को जानकारी होती है। शिशिर ऋतु के पवित्र माघ मास में शुभ्र चांदनी को फैलाते शुक्ल पक्ष में मंदिर-मठों और सिद्ध देवी स्थानों पर दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते। की शास्त्रीय ध्वनि सुनाई देने लगती है। 

पंडित दयानंद शास्त्री का कहना है कि मान्यतानुसार गुप्त नवरात्र के दौरान अन्य नवरात्रों की तरह ही पूजा करनी चाहिए। नौ दिनों के उपवास का संकल्प लेते हुए प्रतिप्रदा यानि पहले दिन घटस्थापना करनी चाहिए। घटस्थापना के बाद प्रतिदिन सुबह और शाम के समय मां दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन के साथ नवरात्र व्रत का उद्यापन करना चाहिए।

इस वर्ष माघ मास की गुप्त नवरात्रि 28 जनवरी 2017 (शनिवार) से शुरू हो रहे हैं, जो 5 फरवरी 2017 (रविवार)तक चलेंगे। 

पंडित दयानंद शास्त्री का कहना है कि 28 जनवरी से 5 फरवरी तक नवरात्रि में इस बार सुस्थिर योग बन रहा है जो मन के भटकाव को समाप्त कर चित्त को शांत करने वाला है। 

आज घट स्थापना का समय—

सनातन धर्म में कोई भी धार्मिक कार्य आरंभ करने से पूर्व कलश स्थापना करने का विधान है। पृथ्वी को कलश का रूप माना जाता है तत्पश्चात कलश में उल्लिखित देवी- देवताओं का आवाहन कर उन्हें विराजित किया जाता है। इससे कलश में सभी ग्रहों, नक्षत्रों एवं तीर्थों का निवास हो जाता है। पौरणिक मान्यता है की कलश स्थापना के उपरांत कोई भी शुभ काम करें वह देवी-देवताओं के आशीर्वाद से निश्चिंत रूप से सफल होता है।

आज घट/कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त- 

प्रात: 09:33 बजे से 10:47 बजे तक है। इसके साथ सर्वार्थ व अमृत सिद्धि योग के अलावा श्रवण नक्षत्र का चतुग्र्रही योग बनेगा जो विशेष फलदायी रहेगा। 

आषाढ़ और माघ की गुप्त नवरात्रि में पूजा, अनुष्ठान का भी विशेष महत्व है। पंडित दयानंद शास्त्री का कहना है कि इस बार जो गुप्त नवरात्र प्रारंभ हो रहे है उसमें कई विशेष फल प्राप्त होंगे। खासतौर पर जिनका मन अस्थिर है वे देवी मां की पूजा अर्चना करेंगे तो मन को शांति मिलेगी। गुप्त नवरात्र अर्थात, तांत्रिक-यांत्रिक-मांत्रिक साधना का सर्वोत्तम काल और पूरे नौ दिनों तक कन्यारूपिणी शक्ति-कुमारी माता दुर्गा का पूजन-अर्चन-वंदन और पाठ करना होता है। ‘दुर्गासप्तशती’ में देवी दुर्गा स्वयं कहती हैं कि ‘नवरात्र में जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति के साथ मेरी पूजा-अर्चना करेगा, वह सभी बाधाओं से मुक्त होकर धन, धान्य व संतान को प्राप्त करेगा।’ उसके सभी कष्ट भी दूर होंगे। 

गुप्त नवरात्रि का महत्त्व—

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार जिस तरह वर्ष में चार बार नवरात्र आते हैं और जिस प्रकार नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है, ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है। इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान लोग लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं।गुप्त नवराक्षों में कुलदेवी या कुलदेवता की पूजा करने से भी लाभ होता है। 

गुप्त नवरात्रि के दौरान मां काली, तारा,भुवनेश्वरी, त्रिपुरसुंदरी, छिनमस्तिका, त्रिपुर भैरवी, धूमावति, बगलामुखी, मातंगी, मां कमला देवी की अराधना करनी चाहिए। इन नवरात्रों में प्रलय एवं संहार के देव महादेव एवं मां काली की पूजा का विधान है। इन गुप्त नवरात्रि में जो साधक गुप्त सिद्धियों को अंंजाम देते हैं और चमत्कारी शक्तियों के स्वामी बन जाते हैं।ध्यान रखें की पूजा अर्चना करते समय फल की इच्छा कभी ना करें. अगर आप किसी मंशा से माता रानी की पूजा अर्चना करते है तो माता आपकी इच्छा पूर्ण नहीं करती. माता बहुत दयालु है, अपने सभी भक्तों की माता जरुर सुनती है | इस गुप्त नवरात्रि में वामाचार पद्धति से उपासना की जाती है। 

कूर्मपुराण में धरती पर देवी के बिम्ब के रूप में स्त्री का पूरा जीवन नवदुर्गा की मूर्ति में स्पष्ट रूप से बताया गया है। जन्म ग्रहण करती हुई कन्या ‘शैलपुत्री’, कौमार्य अवस्था तक ‘ब्रह्मचारिणी’ तथा विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल व पवित्र होने से ‘चंद्रघंटा’ कहलाती है। इसी तरह नए जीव को जन्म देने लिए गर्भधारण करने से ‘कूष्मांडा’ व संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री ‘स्कंदमाता’ के रूप में होती है। संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री ‘कात्यायनी’ एवं पतिव्रता होने के कारण अपनी व पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से ‘कालरात्रि’ कहलाती है। सारे संसार का उपकार करने से ‘महागौरी’ तथा धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले पूरे परिवार व सारे संसार को सिद्धि व सफलता का आशीर्वाद देती नारी ‘सिद्धिदात्री’ के रूप में जानी जाती है। यही वजह है कि जो भी श्रद्धा-भक्ति से पूजा करता है उसे मनचाहा लाभ मिलता है।        

यह समय शाक्य एवं शैव धर्मावलंबियों के लिए पैशाचिक, वामाचारी क्रियाओं के लिए अधिक शुभ एवं उपयुक्त होता है। इसमें प्रलय एवं संहार के देवता महाकाल एवं महाकाली की पूजा की जाती है। साथ ही संहारकर्ता देवी-देवताओं के गणों एवं गणिकाओं अर्थात भूत-प्रेत, पिशाच, बैताल, डाकिनी, शाकिनी, खण्डगी, शूलनी, शववाहनी, शवरूढ़ा आदि की साधना भी की जाती है। यह साधनाएं बहुत ही गुप्त स्थान पर या किसी सिद्ध श्मशान में की जाती हैं। 

दुनिया में सिर्फ चार श्मशान घाट ही ऐसे हैं जहां तंत्र क्रियाओं का परिणाम बहुत जल्दी मिलता है। ये हैं उज्जैन स्थित चक्रतीर्थ श्मशान और विक्रांत भैरव का सिद्ध पीठ स्थित शमशान  एवम तारापीठ का श्मशान (पश्चिम बंगाल), कामाख्या पीठ (असम) का श्मशान, त्रयंबकेश्वर (नासिक)  । गुप्त नवरात्रि में यहां दूर-दूर से साधक गुप्त साधनाएं करने यहां आते हैं।

गुप्त नवरात्रि की प्रमुख देवियां—-

गुप्त नवरात्र के दौरान कई साधक महाविद्या (तंत्र साधना) के लिए मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा करते हैं।

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आज होगी कलश स्थापना —

पंडित दयानंद शास्त्री का कहना है कि सनातन धर्म में कोई भी धार्मिक कार्य आरंभ करने से पूर्व कलश स्थापना करने का विधान है। पृथ्वी को कलश का रूप माना जाता है तत्पश्चात कलश में उल्लिखित देवी- देवताओं का आवाहन कर उन्हें विराजित किया जाता है। इससे कलश में सभी ग्रहों, नक्षत्रों एवं तीर्थों का निवास हो जाता है। पौरणिक मान्यता है की कलश स्थापना के उपरांत कोई भी शुभ काम करें वह देवी-देवताओं के आशीर्वाद से निश्चिंत रूप से सफल होता है। प्रथम गुप्त नवरात्रि में दुर्गा पूजा का आरंभ करने से पूर्व कलश स्थापना करने का विधान है। जिससे मां दुर्गा का पूजन बिना किसी विध्न के कुशलता पूर्वक संपन्न हो और मां अपनी कृपा बनाएं रखें। कलश स्थापना के उपरांत मां दुर्गा का श्री रूप या चित्रपट लाल रंग के पाटे पर सजाएं। फिर उनके बाएं ओर गौरी पुत्र श्री गणेश का श्री रूप या चित्रपट विराजित करें। पूजा स्थान की उत्तर-पूर्व दिशा में धरती माता पर सात तरह के अनाज, पवित्र नदी की रेत और जौं डालें। कलश में गंगाजल, लौंग, इलायची, पान, सुपारी, रोली, मौली, चंदन, अक्षत, हल्दी, सिक्का, पुष्पादि डालें।

आम, पीपल, बरगद, गूलर अथवा पाकर के पत्ते कलश के ऊपर सजाएं। जौ अथवा कच्चे चावल कटोरी में भरकर कलश के ऊपर रखें उसके बीच नए लाल कपड़े से लिपटा हुआ पानी वाला नारियल अपने मस्तक से लगा कर प्रणाम करते हुए रेत पर कलश विराजित करें। अखंड ज्योति प्रज्जवलित करें जो पूरे नौ दिनों तक जलती रहनी चाहिए। विधि-विधान से पूजन किए जानें से अधिक मां दुर्गा भावों से पूजन किए जाने पर अधिक प्रसन्न होती हैं। अगर आप मंत्रों से अनजान हैं तो केवल पूजन करते समय दुर्गा सप्तशती में दिए गए नवार्ण मंत्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे’ से समस्त पूजन सामग्री अर्पित करें। मां शक्ति का यह मंत्र समर्थ है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूजन सामग्री लाएं और प्रेम भाव से पूजन करें। संभव हो तो श्रृंगार का सामान, नारियल और चुनरी अवश्य अर्पित करें। नौ दिन श्रद्धा भाव से ब्रह्म मुहूर्त में और संध्याकाल में सपरिवार आरती करें और अंत में क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।

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गुप्त नवरात्रि के पहले दिन करें मां शैलपुत्री की पूजा —

पंडित दयानंद शास्त्री का कहना है कि गुप्त नवरात्रि के पहले दिन (28 जनवरी, शनिवार) को मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, देवी का यह नाम हिमालय के यहां जन्म होने से पड़ा। हिमालय हमारी शक्ति, दृढ़ता, आधार व स्थिरता का प्रतीक है। मां शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है। नवरात्रि के प्रथम दिन योगीजन अपनी शक्ति मूलाधार में स्थित करते हैं व योग साधना करते हैं।

हमारे जीवन प्रबंधन में दृढ़ता, स्थिरता व आधार का महत्व सर्वप्रथम है। अत: इस दिन हमें अपने स्थायित्व व शक्तिमान होने के लिए माता शैलपुत्री से प्रार्थना करनी चाहिए। शैलपुत्री का आराधना करने से जीवन में स्थिरता आती है। हिमालय की पुत्री होने से यह देवी प्रकृति स्वरूपा भी है। स्त्रियों के लिए उनकी पूजा करना ही श्रेष्ठ और मंगलकारी है।

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जानिए सभी राशियों पर इस गुप्त नवरात्री का प्रभाव—

मेष : धर्म, कर्म में रूचि, तीर्थ यात्रा के योग, 

वृषभ : शारीरिक, मानसिक, आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव, 

मिथुन : यात्रा अधिक, परिश्रम, लाभ कम, 

कर्क : आर्थिक स्थिति में सुधार, 

सिंह : संतान संबंधी समस्या, 

कन्या : शनि की ढैय्या से परिवार में परेशानी, 

तुला : शनि की साढ़ेसाती उतरने से आरोग्यता, आर्थिक लाभ, 

वृश्चिक : आखिर की शनि की ढैय्या कार्य से लाभ-उन्नति, 

धनु : शनि की बीच की साढ़ेसाती से रोग, भय, 

मकर : शनि की साढ़ेसाती से कष्ट, 

कुंभ : शुभ-लाभ, कम समय में उन्नति 

मीन : आर्थिक विकास में अस्थिरता।

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इस गुप्त नवरात्रि में करें ये उपाय, भारी मुनाफे से दुकान का गल्ला भरा रहेगा—

यदि आपके व्यापार में घाटा पड़ रहा है या आपकी अपेक्षानुसार ठीक नहीं चल रहा है तो आप किसी भी गुप्त नवरात्रि की प्रात: अपने घर के पूजा स्थान पर स्नानादि से निवृत्त होकर एक पटड़े पर लाल रेशमी कपड़ा बिछाएं । इस पर 11 गोमती चक्र और 3 लघु नारियल रखें । रुद्राक्ष या स्फटिक की माला से यह मंत्र पढ़ते जाएं :  —

‘ऐं क्लीं श्रीं’

इसकी 11 माला करने के बाद, पोटली बांध कर अपनी दुकान या आफिस के मुख्य द्वार पर किसी ऊंचे स्थान पर टांग दें । इसके अलावा आप दक्षिणावर्ती शंख में चावल भर  कर लाल वस्त्र में लपेट कर पूजा स्थान पर किसी सुयोग्य कर्मकांडी द्वारा शुद्धि करवा के इस मंत्र से अभिमंत्रित करवा के स्थापित करवा दे। 

 ‘ओम् ऐं सर्वकार्यसिद्धि कुरु  कुरु स्वाहा’ 

आप देखेंगे कि गुप्त नवरात्रि में किए गए इस प्रयोग द्वारा आपके व्यवसाय में सुख, समृद्धि, शांति व हरित क्रांति का आगमन होने लगेगा । इसके अलावा आप स्वयं इस मंत्र का जाप धन वृद्धि हेतु वैसे तो प्रतिदिन कर सकते हैं परंतु गुप्त नवरात्रि में इसका महत्व कुछ और ही बढ़ जाता है ।

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इस गुप्त नवरात्री में पूजा निम्नलिखित कारणों के लिए किया जा सकता है—

सुख, धन, स्वास्थ्य, और जीवन में समग्र समृद्धि हासिल करने के लिए।

आत्मविश्वास, सही और सक्रिय निर्णय लेने को पाने के लिए

दुश्मनों पर विजय हासिल करने के लिए

अलौकिक प्रकृति के बुरे सपने से छुटकारा पाने के लिए

छात्रों को शैक्षणिक क्षेत्र में अच्छी तरह से करने में मदद के लिए

बीमार फेफड़ों के रोग, नेत्र दर्द, त्वचा रोग और शरीर में दर्द से पीड़ित लोगों के लिए |

इस गुप्त नवरात्रि और दान की पूजा निम्नलिखित में सफलता प्राप्त करने का एक बहुत प्रभावी तरीका है—

—दुश्मन, विरोधियों या मुकदमों पर विजय हासिल करने के लिए

—-ऋण से छुटकारा पाने के लिए और समृद्धि लाने के लिए

—–स्थितियों के लिए अनुकूल बनाने के लिए

—–व्यापार के मामलों में सुधार करने के लिए

—–परिवार के संबंधों में सुधार

—-सिद्धि प्राप्त करने के लिए

—-आर्थिक समृद्धि और स्थिरता प्राप्त करने के लिए

 

 

 

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