जानिए गृह वास्तु पूजन का प्रभाव, वास्तु पूजन का महत्त्व और वास्तु पूजन के लाभ-हानि —

जानिए गृह वास्तु पूजन का प्रभाव, वास्तु पूजन का महत्त्व और वास्तु पूजन के लाभ-हानि —

प्रिय मित्रों/पाठकों,वास्तु का अर्थ है एक ऐसा स्थान जहाँ भगवान और मनुष्य एक साथ रहते हैं। हमारा शरीर पांच मुख्य पदार्थों से बना हुआ होता है और वास्तु का सम्बन्ध इन पाँचों ही तत्वों से माना जाता है। कई बार ऐसा होता है कि हमारा घर हमारे शरीर के अनुकूल नहीं होता है तब यह हमें प्रभावित करता है और इसे वास्तु दोष बोला जाता है।

 

 

 

 

जानिए क्या है वास्तु शांति पूजा—

 

प्रिय मित्रों/पाठकों, अक्सर हम महसूस करते हैं कि घर में क्लेश रहता है या फिर हर रोज कोई न कोई नुक्सान घर में होता रहता है। किसी भी कार्य के सिरे चढ़ने में बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। घर में मन नहीं लगता एक नकारात्मकता की मौजूदगी महसूस होती है। इन सब परिस्थितियों के पिछ वास्तु संबंधि दोष हो सकते हैं। हम माने या न माने लेकिन वास्तु की हमारे जीवन में बहुत अहम भूमिका है यह हर रोज हमारे जीवन को प्रभावित कर रहा होता है। घर में मौजूद इन्हीं वास्तु दोषों को दूर करने के लिये जो पूजा की जाती है उसे वास्तु शांति पूजा कहते हैं। मान्यता है कि वास्तु शांति पूजा से घर के अंदर की सभी नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं घर में सुख-समृद्धि आती है।

प्रिय मित्रों/पाठकों, नवीन घर का प्रवेश उत्तरायण सूर्य में वास्तु पुजन करके ही करना चाहीये | उसके पहले वास्तु का जप यथाशक्ती करा लेना चाहिये | शास्त्रानुसार गृह प्रवेश में माघ ,फाल्गुन ,वैशाख, ज्येष्ठ , आदि मास शुभ बताये गये है | माघ महीने में प्रवेश करने वाले को धन का लाभ होता है | जो व्यक्ति अपने नये घर में फाल्गुन मास में वास्तु पुजन करता है , उसे पुत्र,प्रौत्र और धन प्राप्ति दोनो होता है | चैत्र मास में नवीन घर में रहने के लिये जाने वाले को धन का अपव्यय सहना पडता है | गृह प्रवेश बैशाख माह में करने वाले को धन धान्य की कोई कमी नहीं रहती है | जो व्यक्ति पशुओ एवँम पुत्र का सुख चाहता हो, ऐसे व्यक्ति को अपने नये मकान मे ज्येष्ठ माह में करना चाहिए | बाकी के महीने वास्तु पुजन व गृह प्रवेश में साधारण फल देने वाले होते हैं| 

शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर कृष्णपक्ष की दशमी तिथी तक वास्तुनुसार गृह प्रवेश वंश वृध्दि दायक माना गया है | धनु मीन के सुर्य यानी के मळमास में भी नये मकान में प्रवेश नहीं करना चाहीए | पुराने मकान को जो व्यक्ति नया बनाता है , और वापस अपने पुराने मकान में जाना चाहे , तब उस समय उपरोक्त बातों पर विचार नहीं करना चाहीए | जिस मकान का द्वार दक्षिण दिशा में हो तो गृह प्रवेश एकम् , छठ , ग्यारस आदि तिथियों में करना चाहिए | दूज , सातम् और बारस तिथि को पश्चिम दिशा के द्वार का गृह प्रवेश श्रेष्ठ बतलाया गया है|

नवीन घर का प्रवेश उत्तरायण सूर्य में वास्तु पुजन करके ही करना चाहीये | उसके पहले वास्तु का जप यथाशक्ती करा लेना चाहिये | शास्त्रानुसार गृह प्रवेश में माघ ,फाल्गुन ,वैशाख, ज्येष्ठ , आदि मास शुभ बताये गये है | माघ महीने में प्रवेश करने वाले को धन का लाभ होता है | जो व्यक्ति अपने नये घर में फाल्गुन मास में वास्तु पुजन करता है , उसे पुत्र,प्रौत्र और धन प्राप्ति दोनो होता है | चैत्र मास में नवीन घर में रहने के लिये जाने वाले को धन का अपव्यय सहना पडता है | 

गृह प्रवेश बैशाख माह में करने वाले को धन धान्य की कोई कमी नहीं रहती है | जो व्यक्ति पशुओ एवँम पुत्र का सुख चाहता हो, ऐसे व्यक्ति को अपने नये मकान मे ज्येष्ठ माह में करना चाहिए | बाकी के महीने वास्तु पुजन व गृह प्रवेश में साधारण फल देने वाले होते हैं| शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर कृष्णपक्ष की दशमी तिथी तक वास्तुनुसार गृह प्रवेश वंश वृध्दि दायक माना गया है | धनु मीन के सुर्य यानी के मळमास में भी नये मकान में प्रवेश नहीं करना चाहीए | पुराने मकान को जो व्यक्ति नया बनाता है , और वापस अपने पुराने मकान में जाना चाहे , तब उस समय उपरोक्त बातों पर विचार नहीं करना चाहीए | जिस मकान का द्वार दक्षिण दिशा में हो तो गृह प्रवेश एकम् , छठ , ग्यारस आदि तिथियों में करना चाहिए | दूज , सातम् और बारस तिथि को पश्चिम दिशा के द्वार का गृह प्रवेश श्रेष्ठ बतलाया गया है| वास्तु पूजा के लिये स्वस्तिवचन, गणपति स्मरण, संकल्प, श्री गणपति पूजन, कलश स्थापन, पूजन, पुनःवचन, अभिषेक, शोडेशमातेर का पूजन, वसोधेरा पूजन, औशेया मंत्रजाप, नांन्देशराद, योग्ने पूजन, क्षेत्रपाल पूजन, अग्ने सेथापन, नवग्रह स्थापन पूजन, वास्तु मंडला पूजल, स्थापन, ग्रह हवन, वास्तु देवता होम, पूर्णाहुति, त्रिसुत्रेवस्तेन, जलदुग्धारा, ध्वजा पताका स्थापन, गतिविधि, वास्तुपुरुष-प्रार्थना, दक्षिणासंकल्प, ब्राम्हण भोजन, उत्तर भोजन, अभिषेक, विसर्जन आदि प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। वहीं सांकेतिक पूजा में कुछ प्रमुख क्रियाएं ही संपन्न की जाती हैं जिन्हें नजरअंदाज न किया जा सके। लेकिन वास्तु शांति के स्थायी उपाय के लिये विद्वान ब्राह्मण से पूरे विधि विधान से उपयुक्त पूजा ही करवानी चाहिये। 

जब हम किसी भी भूमि पर घर की चारदिवारी बनतें ही यह वास्तुपुरूष उस घर में उपस्थित हो जाता है और गृह वास्तु के अनुसार उसके इक्यासी पदों (हिस्सों) में उसके शरीर के भिन्न-भिन्न हिस्से स्थापित हो जाते हैं और इनपर पैतालिस देवता विद्यमान रहते हैं, वैज्ञानिक दृष्टि से किसी भी मकान या जमीन में पैतालिस विभिन्न उर्जायें पाई जाती है और उन उर्जाओं का सही उपयोग ही वास्तुशास्त्र है।इस प्रकार वास्तुपुरुष के जिस पद में नियमों के विरुद्ध स्थापना या निर्माण किया जाता है उस पद का अधिकारी देवता अपनी प्रकृत्ति के अनुरूप अशुभ फल देते हैं तथा जिस पद के स्वामी देवता के अनुकूल स्थापना या निर्माण किया जाये उस देवता की प्रकृति के अनुरूप सुफल की प्राप्ती होती है।

हिन्दू संस्कृति में गृह निर्माण को एक धार्मिक कृत्य माना है। संसार की समस्त संस्कृतियों में गृह निर्माण सांसारिक कृत्य से ज्यादा नहीं है। हिन्दू संस्कृति में व्यक्ति सूक्ष्म ईकाई है। वह परिवार का एक अंग है। परिवार के साथ घर का सम्बन्ध अविभाज्य है। इस धार्मिक रहस्य को समझने मात्र से ही हम वास्तु के रहस्य को जान पाएंगे, भवन निर्माण में से वास्तु विज्ञान को निकाल दिया जाए तो उसकी कीमत शून्य है। भूमि पूजन से लेकर गृह प्रवेश तक के प्रत्येक कार्य को धार्मिक भावनाओं से जोड़ा गया है।

महर्षि नारद के अनुसार- अनेन विधिनां सम्यग्वास्तुपूजां करोति य:। आरोग्यं पुत्रलाभं च धनं धान्यं लभेन्नदर:॥

अर्थात्ï इस विधि से सम्यक प्रकार से जो वास्तु का पूजन करता है, वह आरोग्य, पुत्र, धन, धन्यादि का लाभ प्राप्त करता है।

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गृह प्रवेश के पूर्व वास्तु शांति कराना शुभ होता है। इसके लिए शुभ नक्षत्र वार एवं तिथि इस प्रकार हैं-

शुभ वार- सोमवार, बुधवार, गुरुवार, व शुक्रवार शुभ हैं।

शुभ तिथि- शुक्लपक्ष की द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी एवं त्रयोदशी।

शुभ नक्षत्र- अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, उत्ताफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, रेवती, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, स्वाति, अनुराधा एवं मघा।

अन्य विचार- चंद्रबल, लग्न शुद्धि एवं भद्रादि का विचार कर लेना चाहिए।

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जानिए क्या होती हैं गृहशांति पूजन न करवाने से हानियां—

गृहवास्तु दोषों के कारण गह निर्माता को तरह-तरह की विपत्तियों का सामना करना पडता है।

यदि गृहप्रवेश के पूर्व गृहशांति पूजन नहीं किया जाए तो दुस्वप्न आते हैं, अकालमृत्यु, अमंगल संकट आदि का भय हमेशा रहता है।

गृहनिर्माता को भयंकर ऋणग्रस्तता, का समना करना पडता है, एवं ऋण से छुटकारा भी जल्दी से नहीं मिलता, ऋण बढता ही जाता है।

घर का वातावरण हमेशा कलह एवं अशांति पूर्ण रहता है। घर में रहने वाले लोगों के मन में मनमुटाव बना रहता है। वैवाहि जीवन भी सुखमय नहीं होता।

उस घर के लोग हमेशा किसी न किसी बीमारी से पीडित रहते है, तथा वह घर हमेशा बीमारीयों का डेरा बन जाता है।

गहनिर्माता को पुत्रों से वियोग आदि संकटों का सामना करना पड सकता है।

जिस गृह में वास्तु दोष आदि होते है, उस घर मे बरकत नहीं रहती अर्थात् धन टिकता नहीं है। आय से अधिक खर्च होने लगता है।

जिस गृह में बलिदान तथा ब्राहमण भोजन आदि कभी न हुआ हो ऐसे गृह में कभी भी प्रवेश नहीं करना चाहिए। क्योंकि वह गृह आकस्मिक विपत्तियों को प्रदान करता है।

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जानिए गृहशांति पूजन करवाने से लाभ—–

यदि गृहस्वामी गृहप्रवेश के पूर्व गृहशांति पूजन संपन्न कराता है, तो वह सदैव सुख को प्राप्त करता है।

लक्ष्मी का स्थाई निवास रहता है, गृह निर्माता को धन से संबंधित ऋण आदि की समस्याओं का सामना नहीं करना पडता है।

घर का वातावरण भी शांत, सुकून प्रदान करने वाला होता है। बीमारीयों से बचाव होता है।

घर मे रहने वाले लोग प्रसन्नता, आनंद आदि का अनुभव करते है।

किसी भी प्रकार के अमंगल, अनिष्ट आदि होने की संभावना समाप्त हो जाती है।

घर में देवी-देवताओं का वास होता है, उनके प्रभाव से भूत-प्रेतादि की बाधाएं नहीं होती एवं उनका जोर नहीं चलता।

घर में वास्तुदोष नहीं होने से एवं गृह वास्तु देवता के प्रसन्न होने से हर क्षेत्र में सफलता मिलती है।

सुसज्जित भवन में गृह स्वामी अपनी धर्मपत्नी तथा परिवारीकजनों के साथ मंगल गीतादि से युक्त होकर यदि नवीन गृह में प्रवेश करता है तो वह अत्यधिक श्रैष्ठ फलदायक होता है।

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जानिए वास्तु देव पूजन का क्या है महत्व—

जब किसी भवन, गृह आदि का निर्माण पूर्ण हो जाता है, एवं गृहप्रवेश के पूर्व जो पूजन किया जाता है, उसे गृहशांति पूजन कहते है। यह पूजन एक अत्यंत आवश्यक पूजन है, जिससे गृह-वास्तु-मंडल में स्थित देवता उस मकान आदि में रहने वाले लोगों को सुख, शांति, समृद्धि देने में सहायक होते हैं। यदि किसी नये गृह मंे गृहशांति पूजन आदि न करवाया जाए तो गृह-वास्तु -देवता लोगों के लिए सर्वथा एवं सर्वदा विध्न करते रहते है। गृह, पुर एवं देवालय के सूत्रपात के समय, भूमिशोधन, द्वारस्थापन, शिलान्यास एवं गृहप्रवेश इन पांचों के आरम्भ में वास्तुशांति आवश्यक है।

गृह-प्रवेश के आरंभ में गृह-वास्तु की शांति अवश्य कर लेनी चाहिए। यह गृह मनुष्य के लिए ऐहिक एवं पारलोकिक सुख तथा शांिन्तप्रद बने इस उद्देश्य से गृह वास्तु शांति कर्म का प्रतिपादन ऋषियों द्वारा किया गया। कर्मकाण्ड में वास्तुशांति का विषय अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि, जरा सी भी त्रुटि रह जाने से लाखों एवं करोडों रूपये व्यय करके बनाया हुआ गृह जरा से समय मे भूतों का निवास अथवा गृहनिर्माणकर्ता, शिल्पकार अथवा गृहवास्तु शांति कराने वाले विद्वान के लिए घातक हो सकता है। वास्तुशांति करवाने वाले योग्य पंडित का चुनाव ही महत्तवपूर्ण होता है, कारण कि वास्तुशांति का कार्य यदि वैदिक विधि द्वारा पूर्णतः संपन्न नहीं होता तो गृहपिण्ड एवं गृहप्रवेश का मुहूर्त भी निरर्थक हो जाता है। अतः गृह निर्माण कर्ता को कर्मकाण्डी विद्वान का चुनाव अत्यधिक विचारपूर्वक करना चाहिए।

वास्तु प्राप्ति के लिए अनुष्ठान, भूमि पूजन, नींव खनन, कुआं खनन, शिलान्यास, द्वार स्थापन व गृह प्रवेश आदि अवसरों पर वास्तु देव पूजा का विधान है। घर के किसी भी भाग को तोड़ कर दोबारा बनाने से वास्तु भंग दोष लग जाता है। इसकी शांति के लिए वास्तु देव पूजन किया जाता है। इसके अतिरिक्त भी यदि आपको लगता है कि किसी वास्तु दोष के कारण आपके घर में कलह, धन हानि व रोग आदि हो रहे हैं तो आपको नवग्रह शांति व वास्तु देव पूजन करवा लेना चाहिए। किसी शुभ दिन या रवि पुण्य योग को वास्तु पूजन कराना चाहिए।

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वास्तु देव पूजन के लिए आवश्यक सामग्री इस प्रकार हैः—

 

रोली, मोली, पान के पत्ते, लौंग, इलायची, साबुत सुपारी, जौ, कपूर, चावल, आटा, काले तिल, पीली सरसों, धूप, हवन सामग्री, पंचमेवा, शुद्ध धी, तांबे का लोटा, नारियल, सफेद वस्त्र, लाल वस्त्र-2, पटरे लकड़ी के, फूल, फूलमाला, रूई, दीपक, आम के पत्ते, आम की लकड़ी, पंचामृत (गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) स्वर्ण शलाखा, माचिस, नींव स्थापन के लिए अतिरिक्त सामग्री, तांबे का लोटा, चावल, हल्दी, सरसों, चांदी का नाग-नागिन का जोड़ा, अष्टधातु कश्यप, (5) कौडि़यां, (5) सुपारी, सिंदूर, नारियल, लाल वस्त्र घास, रेजगारी, बताशे, पंचरत्न, पांच नई ईंटे। पूजन वाले दिन प्रातःकाल उठकर प्लॉट/घर की सफाई करके शुद्ध कर लेना चाहिए। जातक को पूर्व मुखी बैठकर अपने बाएं तरफ धर्मपत्नी को बैठाना चाहिए। पूजा के लिए किसी योग्य विद्वान ब्राह्मण की सहायता लेनी चाहिए। ब्राह्मण को उत्तर मुखी होकर बैठना चाहिए।

 

मंत्रोच्चारण द्वारा शरीर शुद्धि, स्थान शुद्धि व आसन शुद्धि की जाती है। सर्वप्रथम गणेश जी का आराधना करनी चाहिए। तत्पश्चात नवग्रह पूजा करना चाहिए। वास्तु पूजन के लिए गृह वास्तु में (81) पव के वास्तु चक्र का निर्माण किया जाता है। 81 पदों में (45) देवताओं का निवास होता है। ब्रह्माजी को मध्य में (9) पद दिए गए है। चारों दिशाओं में (32) देवता और मध्य में (13) देवता स्थापित होते हैं। इनका मंत्रोच्चरण से आह्वान किया जाता है। इसके पश्चात आठों दिशाओं, पृथ्वी व आकाश की पूजा की जाती है। इस सामग्री में तिल, जौ, चावल, घी, बताशे मिलाकर वास्तु को निम्न मंत्र पढ़ते हुए 108 आहुतियां दी जाती हैं।

 

मंत्र- ऊँ नमो नारायणाय वास्तुरूपाय, भुर्भुवस्य पतये भूपतित्व में देहि ददापय स्वाहा।।

 

तत्पश्चात आरती करके श्रद्धानुसार ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। इस प्रकार वास्तु देव पूजन करने से उसमें रहने वाले लोगों को सुख, शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

नीव पूजन, वास्तु शांति एवं गृह प्रवेश के लिए ब्राह्मण की आवश्यकता है तो आप हमसे अवश्य संपर्क करें–09669290067,…09039390067…

ये हैं पंचांग अनुसार वर्ष 2017 के वास्तु पूजन शेष मुहूर्त-

23-01-2017 एकादशी (Ekadashi-11) सोमवार (Monday) अनुराधा (Anuradha) 1400 तक कलश चक्र अशुद्ध
02-02-2017d> षषष्टि (Shashthi-06) गुरुवार (thursday)/td> रेवती (Rawati) कलश चक्र अशुद्ध
06-02-2017d> ददशमी (Dashmi) सोमवार (Monday) रोहिणी (Rohini)  
13-02-2017 तृतीया (Tritiya-03) सोमवार (Monday) पूर्वा फाल्गुनी (Purva Fal) 0900 से 1600 तक कलश चक्र अशुद्ध
15-02-2017d> पपंचमी (Panchmi-05) बुधवार (Wednesday)/td> हस्त (Hasta) 1140 से 2000 तक कलश चक्र अशुद्ध
16-02-2017td> पंचमी (Panchmi-05) गुरुवार (thursday) चित्रा (Chitra) कलश चक्र अशुद्ध
18-02-2017d> ससप्तमी (Saptmi-07) शनि (Saturday) विशाखा (Vishakha) के बाद कलश चक्र अशुद्ध
01-03-2017d> ततृतीया (Tritiya-03) बुधवार (Wednesday) ररेवती (Rewati) 15-20  तक कलश चक्र अशुद्ध

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