जानिए ज्योतिष और उदर रोग (पेटदर्द ) का सम्बन्ध (ज्योतिषीय कारण)

जानिए ज्योतिष और उदर रोग (पेटदर्द ) का सम्बन्ध (ज्योतिषीय कारण) —

प्रिय पाठकों,ज्योतिष शास्त्र ग्रहों के चलन, उनके समागम या वियोग से सामान्य जन जीवन, पृथ्वी व मनुष्य जाति पर होने वाले शुभाशुभ प्रभावों का निर्धारण तथा उससे होने वाले परिवर्तनों (सुख-दुख) का ज्ञान कराता है। आकाशीय पिंडों, ग्रहों के परिचालन द्वारा उत्पन्न होने वाले योगों की गणना एवं उनसे होने वाले दुष्प्रभावों को गणना द्वारा प्रतिपादित करना इस शास्त्र का प्रमुख उद्देश्य है जिनमें दुखरूपी व्याधि, अनिष्ट कृत्य, किसी कार्य में विलंब तथा संखरूपी व्याधि परिहार, मांगलिक कार्य इत्यादि का संपादन करता है। ज्योतिष शास्त्र में अनेक प्रकार के रोगों का वर्णन किया गया है। आयुर्वेद के अनुसार कहा है कि ”शरीर व्याधि मन्दिर“ अर्थात शरीर रोगों का घर है। जब रोग होंगे तब रोग के प्रकार होंगे, किस अवस्था में कौन सा रोग होगा इसका वर्णन ज्योतिष के होरा शास्त्र में वर्णित है। 

षड्यन वेदांगों में ज्योतिष शास्त्र जिसे वैदिक वांङमय के मतानुसार वेदों के नेत्र रूप में निर्देशित किया गया है। अर्थात बिना इस शास्त्र के ज्ञान के हमें काल ज्ञान नहीं हो सकता। 

यजुर्वेद के इस मंत्र द्वारा यह कामना की गयी है – 

भद्रं कर्मेभिः श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्य जत्राः। 

स्थिरैरजै तुष्टवा सस्तनूभित्र्यशेयहि देवहितं यदायुः।। 

ज्योतिष शास्त्र में अनेक प्रकार के रोगों का वर्णन किया गया है। आयुर्वेद के अनुसार कहा है कि ”शरीर व्याधि मन्दिर“ अर्थात शरीर रोगों का घर है। जब रोग होंगे तब रोग के प्रकार होंगे, किस अवस्था में कौन सा रोग होगा इसका वर्णन ज्योतिष के होरा शास्त्र में वर्णित है। मनुष्य स्वस्थ व दीर्घ जीवनयापन करता है। इसके लिए आवश्यक है कि समय से पूर्व उचित निदान, यह तभी संभव हैं जब कारण के मूल का ज्ञान बहुत से रोगों के कारण ज्ञात हो जाते हैं पर बहुतों के कारण अंत तक नहीं ज्ञात होते। रोगों का संबंध पूर्व जन्म से भी होता है। 

आचार्य चरक लिखते हैंः कर्मजा व्याध्यः केचित दोषजा सन्ति चापरे। 

त्रिषठाचार्य ने भी लिखा है– जन्मांतरम् कृतं पापं व्यधिरुपेण जायते। 

अर्थात कुछ व्याधियां पूर्व जन्मों के कर्मों के प्रभाव से होती हैं तथा कुछ व्याधियां शरीरस्थ दोषों (त्रिदोष-वात, पित्त, कफ) के प्रभाव से होती हैं। आचार्य कौटिल्य का कथन है कि सभी वस्तुओं का परित्याग करके सर्वप्रथम शरीर की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि शरीर नष्ट होने पर सबका नाश हो जाता है। महर्षि चरक ने भी उपनिषदों में वर्णित तीन ऐषणाओं के अतिरिक्त एक चैथी प्राणेप्रणा की बात कही है जिसका अर्थ है कि प्राण की रक्षा सर्वोपरि है। जैसा कि महाभारत के उद्योग पर्व में कहा गया है- 

मृतकल्पा हि रोगिणः। रोगस्तु दोष वैषम्यं दोष साम्यम रोगत। 

(अष्टांग हृदय 1/20) 

शरीर को स्वस्थ रखने के लिए इन तीन दोषों को संतुलित रखना पड़ता है क्योंकि सब रोगों का कारण त्रिदोष वैषम्य ही है। सभी रोगों के साक्षात कारण प्रकुपित दोष ही हैं । 

हमारे आचार्यों ने मनुष्य के प्रत्येक अंगों की स्थिति ज्ञात करने के लिए ज्योतिष शास्त्र में काल पुरुष की कल्पना की है, काल पुरुष के अंगों में मेषादि राशियों का समावेश किया गया हैः काल पुरुष के अंग सिर मेष मुख वृष बांह मिथुन हृदय कर्क उदर सिंह कटि कन्या वस्ति तुला गर्दन वृश्चिक उरु धनु जानु मकर जंघा कुंभ चरण मीन जातक स्कंध में मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं को लग्नादि बारह भावों में विभक्त कर द्वादश भाव तनु, धन, सहज, सुहृत, सतु, रिपु, जाया, मृत्यु, धर्म, कर्म, आय व व्यय के नाम से जाने जाते हैं। इन बारह भावों में छठा भाव रिपु भाव है। इसे रोग भाव भी कहा जाता है। छठे भाव से रोग व शत्रु दोनों का विचार किया जाता है। आठवें व बारहवें भाव तथा भावेश का भी संबंध रोग से होता है।

पेट दर्द (उदर रोग विकार) उत्पत्र करने में भी शनि एक महत्वपुर्ण भुमिका निभाता हैं। सूर्य एवं चन्द्र को बदहजमी का कारक मानते हैं, जब सूर्य या चंद्र पर शनि का प्रभाव हो, चंद्र व बृहस्पति को यकृत का कारक भी माना जाता है। इस पर शनि का प्रभाव यकृत को कमजोर एवं निष्क्रिय प्रभावी बनाता हैं। पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार बुध पर शनि के दुष्प्रभाव से आंतों में खराबी उत्पत्र होती हैं। 

वर्तमान में एक कष्ट कारक रोग एपेण्डीसाइटिस भी बृहस्पति पर शनि के अशुभ प्रभाव से देखा गया है। शुक्र को धातु एवं गुप्तांगों का प्रतिनिधि माना जाता हैं। जब शुक्र शनि द्वारा पीडि़त हो तो जातक को धातु सम्बंधी कष्ट होता है। जब शुक्र पेट का कारक होकर स्थित होगा तो पेट की धातुओं का क्षय शनि के प्रभाव से होगा।बहुत आश्चर्य का विषय है की पेट का रोग और ज्योतिष द्वारा समाधान कैसे संभव है , लेकिन यह हर प्रकार से संभव है ! आज के इस युग में हर व्यक्ति उदर रोग से ग्रसित है ,किसी की समस्या ज्यादा , किसी की कम , लेकिन हर कोई परेशान है ,जो व्यक्ति ज्योतिष में रूचि या विश्वास रखते है उनके लिए यह एक जानकारी है की आप अपने कुंडली को देख कर मालूम कर सकते है की आप अपनी कुंडली के किस ग्रह से कब प्रभावित हो सकते है |

 ज्योतिष शास्त्र में उदर का स्थान कालपुरुष की कुंडली में उदर का स्थान पंचम भाव है जिसकी राशि सिंह है। सिंह राशि जो पंचम भाव का कारक हैः उससे प्रभावित अंग उदर है जिसमें मन्दाग्नि, गुल्म, पथरी, पाण्डुरोग, यकृत इत्यादि के रोग उत्पन्न होते हैं। अतिसार संग्रहणी, प्लीहा, उदरशूल, अरुचि या मुंह का स्वाद बिगड़ना, अजीर्ण इत्यादि। चिकित्सकों का विचार है कि वीर्य का देह में विशेष महत्व है, वीर्य के क्षीण होने पर वायु विकृत हो जाती है जिससे पाचन तंत्र बिगड़ जाता है तथा मन्दाग्नि, गैस या गुल्म सरीखे रोग पैदा होते हैं। 

उदर रोग के प्रमुख ज्योतिषीय कारण पराशर आचार्यों ने उदर रोग को निम्न प्रकार से रेखांकित किया है। षष्ठ भाव फलाध्याय में लिखते हैं कि षष्ठेश अपने घर, लग्न या अष्टम भाव में हो तो शरीर में व्रण (घाव) होता है। षष्ठ राशि में जो राशि हो उस राशि के आश्रित अंगों में रोग उत्पन्न होता है। राहु या केतु हो तो पेट में घाव होता है। जातकालंकार में लिखते हैं कि षष्ठेशे पापयुक्ते तनु निधन गते तनु निधनगते नु शरीरे व्रणास्युः जातक के जन्मांग चक्र में रोग का विचार मुख्यतः षष्ठ भाव, षष्ठेश, षष्ठ भावस्थ ग्रह, अष्टम भाव, अष्टमेश, अष्टम भावस्थ ग्रह, द्वादश भाव, द्वादशेश, द्वादशस्थ ग्रह, षष्ठेश से युक्त एवं दृष्ट ग्रहों द्वारा एवं मंगल ग्रह द्वारा किया जाता है। इसमें हमें ग्रह राशियों का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि ये निर्बल, दोष युक्त या पुष्ट दोषयुक्त होकर रोगकारक, मारक या रोग निवारक बन जाते हैं। 

उदररोग के ज्योतिषीय कारण जो प्रमुख रूप से उदर रोग को निर्देशित करने में सहायक होते हैंः ƒ सूर्य, मंगल, शनि, राहु-केतु में से तीन ग्रहों का एक स्थान पर युति करना पेट में विकार देता है। ƒ नीच राशि का चंद्रमा लग्नस्थ होकर मंगल, शनि या राहु से दृष्ट हो तो उदर रोग देता है। ƒपंचम भाव का संबंध पाचन तंत्र, पाचन क्रिया से है। सूर्य को पाचन तंत्र का नियंत्रक माना जाता है। हमारे प्राचीन विद्वानों का मत है कि पाचन क्रिया में रश्मियों का महत्वपूर्ण योगदान है। जब भी सूर्य आभाहीन होता है उदर में गड़बड़ी देता है। ज्योतिष का नियम है- औषधि, मणि, मंत्राणां, ग्रह नक्षत्र तारिका। भाग्य काले भवेत्सिहि अभाग्यं निष्फलं भवेत्।। सत्य ही कहा गया है कि जहां भौतिक विज्ञान की सीमाएं समाप्त होती हैं वहीं से अध्यात्म विज्ञान की सीमाएं प्रारंभ होती हैं। 

शनिकृत कुछ विशेष उदर रोग योगः-

1 कर्क, वृश्चिक, कुंभ नवांश में शनिचंद्र से योग करें तो यकृत विकार के कारण पेट में गुल्म रोग होता है।

2 द्वितीय भाव में शनि होने पर संग्रहणी रोग होता हैं। इस रोग में उदरस्थ वायु के अनियंत्रित होने से भोजन बिना पचे ही शरीर से बाहर मल के रुप में निकल जाता हैं।

3 सप्तम में शनि मंगल से युति करे एवं लग्रस्थ राहू बुध पर दृष्टि करे तब अतिसार रोग होता है।

4 मीन या मेष लग्र में शनि तृतीय स्थान में उदर मंे दर्द होता है।

5 सिंह राशि में शनि चंद्र की यूति या षष्ठ या द्वादश स्थान में शनि मंगल से युति करे या अष्टम में शनि व लग्र में चंद्र हो या मकर या कुंभ लग्रस्थ शनि पर पापग्रहों की दृष्टि उदर रोग कारक है।

6 कुंभ लग्र में शनि चंद्र के साथ युति करे या षष्ठेश एवं चंद्र लग्रेश पर शनि का प्रभाव या पंचम स्थान में शनि की चंद्र से युति प्लीहा रोग कारक है।

बहुत आश्चर्य का विषय है की पेट का रोग और ज्योतिष द्वारा समाधान कैसे संभव है , लेकिन यह हर प्रकार से संभव है ! आज के इस युग में हर व्यक्ति उदर रोग से ग्रसित है ,किसी की समस्या ज्यादा , किसी की कम , लेकिन हर कोई परेशान है ,जो व्यक्ति ज्योतिष में रूचि या विश्वास रखते है उनके लिए यह एक जानकारी है की आप अपने कुंडली को देख कर मालूम कर सकते है की आप अपनी कुंडली के किस ग्रह से कब प्रभावित हो सकते है !

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार कुंडली में लगन में राहू और सप्तम स्थान में केतु हो तो व्यक्ति को लिवर में इन्फेक्शन होता है ! आठवे भाव में बुध सूर्य के साथ मकर राशि के हो के बैठा है तो निश्चित तोर पर उस व्यक्ति को पेशाब से सम्बंधित समस्या होती है जैसे किडनी में स्टोन या इन्फेक्शन होता है ! कुम्भ लगन में सूर्य हो तो वह व्यक्ति हमेशा एसिडिटी ,बदहजमी तथा पेट में तनाव रहता है ,लगन कुंडली के बारहवे भाव में सिंह राशि का केतु शनि हो तो बवासीर की समस्या तथा गुदा रोग होता है ,अगर बृहस्पति सप्तम या अष्टम भाव में हो तो पीठ तथा पैरो में दर्द देते है !कुंडली देख के तमाम उन समसयाओं का समधान हो सकता है जो देखने में तो कम लगता है लेकिन असधारण होता है !क्यो की हर ग्रह का प्रभाव का एक हिस्सा होता है ! और उस आधार पर किस ग्रह का प्रभाव किस अंग पर पड़ रहा है तथा उसका दुस्प्रभाव क्या होगा इसका अध्यन कर इनके रोगों से बचा जा सकता है ! उपचार कई तरीके से होता है जैसे ग्रहों की शान्ति , रत्न धारण कर ,दान तथा उपवास द्वारा हर रोग का उपचार संभव है !

उदर योग ज्योतिषीय दृष्टिकोण भी रोगों का कारण उदर रोग को माना जाता है। जब तक पाचन शक्ति अच्छी रहती है तब तक जातक का शरीर भी हृष्ट पुष्ट रहता है। पाचन शक्ति की प्रबलता में कंद मूल या प्याज से रोटी खाने वाला भी तरोताजा एवं हृष्ट पुष्ट दिखता है। वहीं पाचन शक्ति कमजोर हो, तो पंचमेवा का सेवन करने वाला भी अति दुर्बल हो जाता है। वास्तव में पाचन क्रिया का समाप्त होना ही मृत्यु समझा जाता है। पाचक रसों में विकृति आने पर शरीर पर रोगों का आक्रमण आसानी से होता है। 

रोग दो प्रकार के माने जाते हैं- निज रोग जिसे शारीरिक एवं मानसिक में विभक्त किया गया है और आगंतुक रोग जिसमें दृष्टि निर्मित व अदृष्ट निर्मित रोग आते हंै। शारीरिक रोग शरीर में वात पित्त व कफ की कमी या अधिकता से होते हैं और मानसिक रोग भय, शोक तथा क्रोध के कारण। ये रोग अष्टम भाव में स्थित राशि व उसके स्वामी अष्टमस्थ ग्रह व अष्टम भाव पर दृष्टि कारक ग्रह से युति दृष्टि किसी ग्रह या भाव कारक से होने पर होते हैं। आगंतुक रोग में दृष्टि रोग घात के कारण होते हैं तो अदृष्ट रोग देवी देवताओं के प्रकोप के कारण। इन रोगों का विचार छठे भाव, भावेश, षष्ठस्थ ग्रह व षष्ठ भाव पर दृष्टि कारक ग्रहों के अनुसार किया जाता है।

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार यदि जन्मांग में पंचम भाव, भावेश या कारक ग्रह का छठे भाव से सबंध हो, तो दोष विकृति के कारण रोग होता है। आगंतुक रोग होने पर जातक के लिए तंत्र मंत्र यंत्र का उपचार ही प्रभावी होगा।

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ज्योतिष के अनुसार रोग विशेष की उत्पत्ति जातक के जन्म समय में किसी राशि एवं नक्षत्र विशेष पर पापग्रहों की उपस्थिति, उन पर पाप दृष्टि,पापग्रहों की राशि एवं नक्षत्र में उपस्थित होना, पापग्रह अधिष्ठित राशि के स्वामी द्वारा युति या दृष्टि रोग की संभावना को बताती है। इन रोगकारक ग्रहों की दशा एवं दशाकाल में प्रतिकूल गोचर रहने पर रोग की उत्पत्ति होती है। प्रत्येक ग्रह, नक्षत्र, राशि एवं भाव मानव शरीर के भिन्न-भिन्न अंगो का प्रतिनिधित्व करते है।

चिकित्सकीय उपचार से राहत की बजाय परेशानी होती रहती है। उदर के कारक भाव के विषय में उत्तर कालमृत में कहा गया है। 

गम्भीर्यघनता रहस्यविनया वृतान्तसंलेखनं। क्षेमस्नेह प्रबन्ध काव्यरचना कार्यप्रवेशोदराः। 

अर्थात् गंभीरता, दृढ़ता, रहस्य, विनय, वृत्तांत लेख, क्षेम, स्नेह, प्रबंध, काव्य रचना, कार्य प्रारंभ एवं उदर पंचम भाव के कारक हैं। प्रत्येक ग्रह उदर रोग देने में सक्षम है। 

लेकिन उदर व उदर व्याधि हेतु चंद्र ‘‘मुखकान्तिश्वेतवर्णोंदरा’’ एवं वृह ‘’पुत्र पौत्र जठर व्याधि द्विपात्सम्पदो’’ प्रमुख माने गए हैं। चंद्र एवं गुरु को यकृत का कारक भी मानते हैं। हमारे शरीर में यकृत एक महत्वपूर्ण अंग है। यकृ त से उत्पन्न पित्त से ही भोजन का पाचन होता है। यदि चंद्र व गुरु शुभ होकर कमजोर हों एवं पाप पीड़ित हो तो पित्त की कमी के कारण भोजन का पाचन सही नहीं रहेगा। किंतु उक्त दोनों ग्रह अशुभ होकर बली हों तो पित्त की अधिकता  के कारण पाचन तंत्र विकृत हो जाएगा। फलतः उदर रोग दोनो स्थितियों में जटिल हो जाता है। जन्मांग में चंद्र व गुरु शुभ होकर बलवान हों तो जातक को शुभफल की प्राप्ति होती है। 

दूसरी तरफ इनकी शुभता से पाचन शक्ति व्यवस्थित रहती है। फलतः जातक का सर्वांगीण विकास होता है। उदर रोग के प्रमुख ज्योतिषीय योग- यदि लग्नेश, षष्ठेश व बुध एकत्र हों, तो जातक पित्त जनित रोग से और यदि लग्नेश, षष्ठेश व शनि एकत्र हो तो गैस व्याधि से पीड़ित रहता है। लग्नेश, षष्ठेश, बुध व शनि का चतुर्विध कोई संबंध बन रहा हो, तो पित्ताधिक्य व गैस व्याधि होती है अर्थात जातक एसिडिटी से ग्रस्त होता है जो आजकल आम है। मंगल लग्न में हो व षष्ठेश निर्बल हो, तो अजीर्ण और लग्न में पाप ग्रह व अष्टम में शनि हो तो कुक्षि में पीड़ा होती है।

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पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067 ) के अनुसार लग्न में पाप ग्रह राहु व केतु हों, तो इनकी दृष्टि पंचम पर होगी व अष्टमस्थ शनि की दृष्टि भी पंचम पर होगी। यदि इस स्थिति में गुरु भी पीड़ित हो, तो जातक एपेंण्डिसाइटिस से ग्रस्त होता है। लग्नेश यदि शत्रु राशि या नीच राशि में हो, मंगल चैथे भाव में व शनि पापग्रह से दृष्ट हो, तो जातक उदर शूल से ग्रस्त होता है। सूर्य व चंद्र छठे भाव में हो, तो वायु विकार से पाण्डु रोग और इनके साथ मंगल की युति हो, तो उदर शूल होता है। 

यदि सप्तम भाव में शुक्र पाप ग्रह से युत या दृष्ट हो, तो जातक संग्रहणी रोग का शिकार होता है। द्वितीय स्थान में शनि या राहु हो या कारकांश कुंडली में पंचम स्थान में केतु हो तो भी संग्रहणी रोग होता है। लग्न में राहु व बुध एवं सप्तम स्थान में शनि व मंगल हों या लग्नेश व गुरु त्रिक भाव में हों, तो जातक अतिसार से ग्रस्त होता है। लग्नेश व बुध या गुरु की युति त्रिक भाव में हो या पंचम भाव में नीच राशि में बुध या गुरु स्थित हो, तो जातक पित्त का रोगी होता है। 

षष्ठेश चंद्र पाप ग्रह के साथ हो या पंचम स्थान में शनि व चंद्र हों या लग्नेश व सप्तमेश चंद्र पर केवल पाप ग्रहों की दृष्टि हो या जन्मराशि व षष्ठेश केवल पापग्रहों से दृष्ट हों या सूर्य व मंगल के मध्य चंद्र हो व सूर्य मकर में हो, तो जातक प्लीहा रोग से ग्रस्त होता है। छठे या बारहवें भाव में शनि व मंगल हों या सिंहस्थ चंद्र पाप पीड़ित हो या लाभेश तृतीय स्थान में हो या केंद्र त्रिकोण भावों में स्थित हो तो जातक शूल रोग से ग्रस्त होता है। सप्तम में राहु व केतु का होना या लग्न में चंद्रमा व अष्टम में शनि का होना भी उदर रोग का कारक है। 

जन्मांग में यदि पंचम भाव में शुभ ग्रह बली होकर स्थित हो, पंचमेश व पंचम कारक भी बली हो, तो जातक को उदर रोग सामान्यतः नहीं होता है। लेकिन पंचम भाव में पाप ग्रहों का होना पंचम भाव पर पाप ग्रहों की दृष्टि होना, पंचम भाव व पंचमेश का पाप कर्तरी प्रभाव में होना आदि उदर रोग के कारक हैं। पाप ग्रहों का प्रभाव जैसे-जैसे पंचम भाव, पंचमेश व पंचम कारक पर बढ़ता जाएगा उदर रोग उतना ही जटिल होता जाएगा। अर्थात उदर रोगों के होने या उनसे मुक्ति में ग्रहों की भूमिका गोचर व दशाकाल के आधार पर निर्भर होती है।

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भाव मंजरी के अनुसार-

मेष राशि सिर में, वृष मुंह में , मिथुन छाती में, कर्क ह्नदय में, सिंह पेट में, कन्या कमर में, तुला बस्ति में अर्थात पेडू में, वृश्च्कि लिंग में , धनु जांघो में, मकर घुटनों में, कुम्भ पिंण्डली में तथा मीन राशि को पैरो में स्थान दिया गया है। राशियों के अनुसार ही नक्षत्रों को उन अंगो में स्थापित करने से कल्पिम मानव शरीराकृति बनती है।इन नक्षत्रों व राशियों को आधार मानकर ही शरीर के किसी अंग विशेष में रोग या कष्ट का पूर्वानुभान किया जा सकता है। 

शनि तमोगुणी ग्रह क्रुर एवं दयाहीन, लम्बे नाखुन एवं रूखे-सूखे बालों वाला, अधोमुखी, मंद गति वाला एवं आलसी ग्रह है। इसका आकार दुर्बल एवं आंखे अंदर की ओर धंसी हुई है। जहां सुख का कारण बृहस्पति को मानते है। तो दुःख का कारण शनि है। शनि एक पृथकत्ता कारक ग्रह है पृथकत्ता कारक ग्रह होने के नाते इसकी जन्मांग में जिस राशि एवं नक्षत्र से सम्बन्ध हो, उस अंग विशेष में कार्य से पृथकत्ता अर्थात बीमारी के लक्षण प्रकट होने लगते हैंै। शनि को स्नायु एवं वात कारक ग्रह माना जाता है । 

नसों वा नाडियों में वात का संचरण शनि के द्वारा ही संचालित है। आयुर्वेद में भी तीन प्रकार के दोषों से रोगों की उत्पत्ति मानी गई है। ये तीन दोष वात, कफ व पित्त है। हमारे शरीर की समस्त आन्तरिक गतिविधियां वात अर्थात शनि के द्वारा ही संचालित होती है।

आयुर्वेद शास्त्रों में भी कहा गया हैः-

पित्त पंगु कफः पंगु पंगवो मल धातवः।

वायुना यत्र नीयते तत्र गच्छन्ति मेघवत्।।

अर्थात पित्त, कफ और मल व धातु सभी निष्क्रिय हैं। स्वयं ये गति नहीं कर सकते । शरीर में विद्यमान वायु ही इन्हें इधर से उधर ले जा सकती है। जिस प्रकार बादलों को वायु ले जाती है। यदि आयुर्वेद के दृष्टिकोण से भी देखा जाये तो वात ही सभी कार्य समपन्न करता है।

इसी वात पर ज्योतिष शास्त्र शनि का नियंत्रण मानता है। शनि के अशुभ होने पर शरीरगत वायु का क्रम टूट जाता है। अशुभ शनि जिस राशि, नक्षत्र को पीडीत करेगा उसी अंग में वायु का संचार अनियंत्रित हो जायेगा, जिससे परिस्थिति अनुसार अनेक रोग जन्म ले सकते है। इसका आभास स्पष्ट है कि जीव-जन्तु जल के बिना तो कुछ काल तक जीवित रह सकते है, लेकिन बीना वायु के कुछ मिनट भी नहीं रहा जा सकता है। नैसर्गिक कुण्डली में शनि को दशम व एकादश भावों का प्रतिनिधि माना गया है। इन भावो का पीडित होना घुटने के रोग , समस्त जोडों के रोग , हड्डी , मांसपेशियों के रोग, चर्च रोग, श्वेत कुष्ठ, अपस्मार, पिंडली में दर्द, दाये पैर, बाये कान व हाथ में रोग, स्नायु निर्बलता, हृदय रोग व पागलपन देता है। 

रोगनिवृति भी एकादश के प्रभाव में है उदरस्थ वायु में समायोजन से शनि पेट मज्जा को जहां शुभ होकर मजबुत बनाता है वहीं अशुभ होने पर इसमें निर्बलता लाता है। फलस्वरूप जातक की पाचन शक्ति में अनियमितता के कारण भोजन का सहीं पाचन नहीं है जो रस, धातु, मांस, अस्थि को कमजोर करता है। समस्त रोगों की जड पेट है। पाचन शक्ति मजबुत होकर प्याज-रोटी खाने वालो भी सुडौल दिखता है वहीं पंचमेवा खाने वाला बिना पाचन शक्ति के थका-हारा हुआ मरीज लगता है। 

मुख्य तौर पर शनि को वायु विकार का कारक मानते है जिससे अंग वक्रता, पक्षाघात, सांस लेने में परेशानी होती है। शनि का लौह धातु पर अधिकार है। शरीर में लौह तत्व की कमी होने पर एनीमिया, पीलिया रोग भी हो जाता है। अपने पृथकत्ता कारक प्रभाव से शनि अंग विशेष को घात-प्रतिघात द्वारा पृथक् कर देता है। इस प्रकार अचानक दुर्घटना से फे्रकच्र होना भी शनि का कार्य हो सकता है। यदि इसे अन्य ग्रहो का भी थोडा प्रत्यक्ष सहयोग मिल जाये तो यह शरीर में कई रोगों को जन्म दे सकता है। जहां सभी ग्रह बलवान होने पर शुभ फलदायक माने जाते है, वहीं शनि दुःख का कारक होने से इसके विपरित फल माना है कि-

आत्मादयो गगनगैं बलिभिर्बलक्तराः।

दुर्बलैर्दुर्बलाः ज्ञेया विपरीत शनैः फलम्।।

अर्थात कुण्डली में शनि की स्थिति अधिक विचारणीय है। इसका अशुभ होकर किसी भाव में उपस्थित होने उस भाव एवं राशि सम्बधित अंग में दुःख अर्थात रोग उत्पन्न करेगा। गोचर में भी शनि एक राशि में सर्वाधिक समय तक रहता है जिससे उस अंग-विशेष की कार्यशीलता में परिवर्तन आना रोग को न्यौता देना है। कुछ विशेष योगों में शनि भिन्न-भिन्न रोग देता है।

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पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार शनि को सन्तुलन और न्याय का ग्रह माना गया है.जो लोग अनुचित बातों के द्वारा अपनी चलाने की कोशिश करते हैं,जो बात समाज के हित में नही होती है और उसको मान्यता देने की कोशिश करते है,अहम के कारण अपनी ही बात को सबसे आगे रखते हैं,अनुचित विषमता,अथवा अस्वभाविक समता को आश्रय देते हैं…

शनि उनको ही पीडित करता है.शनि हमसे कुपित न हो,उससे पहले ही हमे समझ लेना चाहिये,कि हम कहीं अन्याय तो नही कर रहे हैं,या अनावश्यक विषमता का साथ तो नही दे रहे हैं.यह तपकारक ग्रह है,अर्थात तप करने से शरीर परिपक्व होता है,शनि का रंग गहरा नीला होता है,शनि ग्रह से निरंतर गहरे नीले रंग की किरणें पृथ्वी पर गिरती रहती हैं.शरी में इस ग्रह का स्थान उदर और जंघाओं में है.सूर्य पुत्र शनि दुख दायक,शूद्र वर्ण,तामस प्रकृति,वात प्रकृति प्रधान तथा भाग्य हीन नीरस वस्तुओं पर अधिकार रखता है. 

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067) के अनुसार शनि सीमा ग्रह कहलाता है,क्योंकि जहां पर सूर्य की सीमा समाप्त होती है,वहीं से शनि की सीमा शुरु हो जाती है.जगत में सच्चे और झूठे का भेद समझना,शनि का विशेष गुण है.यह ग्रह कष्टकारक तथा दुर्दैव लाने वाला है.विपत्ति,कष्ट,निर्धनता,देने के साथ साथ बहुत बडा गुरु तथा शिक्षक भी है,जब तक शनि की सीमा से प्राणी बाहर नही होता है,संसार में उन्नति सम्भव नही है.शनि जब तक जातक को पीडित करता है,तो चारों तरफ़ तबाही मचा देता है.जात को कोई भी रास्ता चलने के लिये नही मिलता है.करोडपति को भी खाकपति बना देना इसकी सिफ़्त है. अच्छे और शुभ कर्मों बाले जातकों का उच्च होकर उनके भाग्य को बढाता है,जो भी धन या संपत्ति जातक कमाता है,उसे सदुपयोग मे लगाता है.

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067 ) के अनुसार शरीर में वात रोग हो जाने के कारण शरीर फ़ूल जाता है,और हाथ पैर काम नही करते हैं,गुदा में मल के जमने से और जो खाया जाता है उसके सही रूप से नही पचने के कारण कडा मल बन जाने से गुदा मार्ग में मुलायम भाग में जख्म हो जाते हैं,और भगन्दर जैसे रोग पैदा हो जाते हैं.एकान्त वास रहने के कारण से सीलन और नमी के कारण गठिया जैसे रोग हो जाते हैं,हाथ पैर के जोडों मे वात की ठण्डक भर जाने से गांठों के रोग पैदा हो जाते हैं,शरीर के जोडों में सूजन आने से दर्द के मारे जातक को पग पग पर कठिनाई होती है.

दिमागी सोचों के कारण लगातार नशों के खिंचाव के कारण स्नायु में दुर्बलता आजाती है.अधिक सोचने के कारण और घर परिवार के अन्दर क्लेश होने से विभिन्न प्रकार से नशे और मादक पदार्थ लेने की आदत पड जाती है,अधिकतर बीडी सिगरेट और तम्बाकू के सेवन से क्षय रोग हो जाता है…

अधिकतर अधिक तामसी पदार्थ लेने से कैंसर जैसे रोग भी हो जाते हैं.पेट के अन्दर मल जमा रहने के कारण आंतों के अन्दर मल चिपक जाता है,और आंतो मे छाले होने से अल्सर जैसे रोग हो जाते हैं.शनि ऐसे रोगों को देकर जो दुष्ट कर्म जातक के द्वारा किये गये होते हैं,उन कर्मों का भुगतान करता है.जैसा जातक ने कर्म किया है उसका पूरा पूरा भुगतान करना ही शनिदेव का कार्य है.

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इन उपायों-मंत्रो से होगा रोग निवारण–

शनि ग्रह की पीडा से निवारण के लिये पाठ,पूजा,स्तोत्र,मंत्र, और गायत्री आदि को लिख रहा हूँ,जो काफ़ी लाभकारी सिद्ध होंगे.नित्य १०८ पाथ करने से चमत्कारी लाभ प्राप्त होगा.

विनियोग:-शन्नो देवीति मंत्रस्य सिन्धुद्वीप ऋषि: गायत्री छंद:,आपो देवता,शनि प्रीत्यर्थे जपे विनियोग:.

नीचे लिखे गये कोष्ठकों के अन्गों को उंगलियों से छुयें.

अथ देहान्गन्यास:-शन्नो शिरसि (सिर),देवी: ललाटे (माथा).अभिषटय मुखे (मुख),आपो कण्ठे (कण्ठ),भवन्तु ह्रदये (ह्रदय),पीतये नाभौ (नाभि),शं कट्याम (कमर),यो: ऊर्वो: (छाती),अभि जान्वो: (घुटने),स्त्रवन्तु गुल्फ़यो: (गुल्फ़),न: पादयो: (पैर).

अथ करन्यास:-शन्नो देवी: अंगुष्ठाभ्याम नम:.अभिष्टये तर्ज्जनीभ्याम नम:.आपो भवन्तु मध्यमाभ्याम नम:.पीतये अनामिकाभ्याम नम:.शंय्योरभि कनिष्ठिकाभ्याम नम:.स्त्रवन्तु न: करतलकरपृष्ठाभ्याम नम:.

अथ ह्रदयादिन्यास:-शन्नो देवी ह्रदयाय नम:.अभिष्टये शिरसे स्वाहा.आपो भवन्तु शिखायै वषट.पीतये कवचाय हुँ.(दोनो कन्धे).शंय्योरभि नेत्रत्राय वौषट.स्त्रवन्तु न: अस्त्राय फ़ट.

ध्यानम:-नीलाम्बर: शूलधर: किरीटी गृद्ध्स्थितस्त्रासकरो धनुश्मान.चतुर्भुज: सूर्यसुत: प्रशान्त: सदाअस्तु मह्यं वरदोअल्पगामी..

शनि गायत्री:-औम कृष्णांगाय विद्य्महे रविपुत्राय धीमहि तन्न: सौरि: प्रचोदयात.

वेद मंत्र:- औम प्राँ प्रीँ प्रौँ स: भूर्भुव: स्व: औम शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तु न:.औम स्व: भुव: भू: प्रौं प्रीं प्रां औम शनिश्चराय नम:.

जप मंत्र :- ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनिश्चराय नम: । नित्य २३००० जाप प्रतिदिन.

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इन रोगों-बिमारियों का कारण भी शनि देव/गृह ही होते हैं—–

===उन्माद नाम का रोग शनि की देन है,जब दिमाग में सोचने विचारने की शक्ति का नाश हो जाता है,जो व्यक्ति करता जा रहा है,उसे ही करता चला जाता है,उसे यह पता नही है कि वह जो कर रहा है,उससे उसके साथ परिवार वालों के प्रति बुरा हो रहा है,या भला हो रहा है,संसार के लोगों के प्रति उसके क्या कर्तव्य हैं,उसे पता नही होता,सभी को एक लकडी से हांकने वाली बात उसके जीवन में मिलती है,वह क्या खा रहा है,उसका उसे पता नही है कि खाने के बाद क्या होगा,जानवरों को मारना,मानव वध करने में नही हिचकना,शराब और मांस का लगातार प्रयोग करना,जहां भी रहना आतंक मचाये रहना,जो भी सगे सम्बन्धी हैं,उनके प्रति हमेशा चिन्ता देते रहना आदि उन्माद नाम के रोग के लक्षण है.

====वात रोग का अर्थ है वायु वाले रोग,जो लोग बिना कुछ अच्छा खाये पिये फ़ूलते चले जाते है,शरीर में वायु कुपित हो जाती है,उठना बैठना दूभर हो जाता है,शनि यह रोग देकर जातक को एक जगह पटक देता है,यह रोग लगातार सट्टा,जुआ,लाटरी,घुडदौड और अन्य तुरत पैसा बनाने वाले कामों को करने वाले लोगों मे अधिक देखा जाता है.किसी भी इस तरह के काम करते वक्त व्यक्ति लम्बी सांस खींचता है,उस लम्बी सांस के अन्दर जो हारने या जीतने की चाहत रखने पर ठंडी वायु होती है वह शरीर के अन्दर ही रुक जाती है,और अंगों के अन्दर भरती रहती है.अनितिक काम करने वालों और अनाचार काम करने वालों के प्रति भी इस तरह के लक्षण देखे गये है.

====भगन्दर रोग गुदा मे घाव या न जाने वाले फ़ोडे के रूप में होता है.अधिक चिन्ता करने से यह रोग अधिक मात्रा में होता देखा गया है.चिन्ता करने से जो भी खाया जाता है,वह आंतों में जमा होता रहता है,पचता नही है,और चिन्ता करने से उवासी लगातार छोडने से शरीर में पानी की मात्रा कम हो जाती है,मल गांठों के रूप मे आमाशय से बाहर कडा होकर गुदा मार्ग से जब बाहर निकलता है तो लौह पिण्ड की भांति गुदा के छेद की मुलायम दीवाल को फ़ाडता हुआ निकलता है,लगातार मल का इसी तरह से निकलने पर पहले से पैदा हुए घाव ठीक नही हो पाते हैं,और इतना अधिक संक्रमण हो जाता है,कि किसी प्रकार की एन्टीबायटिक काम नही कर पाती है.

====गठिया रोग शनि की ही देन है.शीलन भरे स्थानों का निवास,चोरी और डकैती आदि करने वाले लोग अधिकतर इसी तरह का स्थान चुनते है,चिन्ताओं के कारण एकान्त बन्द जगह पर पडे रहना,अनैतिक रूप से संभोग करना,कृत्रिम रूप से हवा में अपने वीर्य को स्खलित करना,हस्त मैथुन,गुदा मैथुन,कृत्रिम साधनो से उंगली और लकडी,प्लास्टिक,आदि से यौनि को लगातार खुजलाते रहना,शरीर में जितने भी जोड हैं,रज या वीर्य स्खलित होने के समय वे भयंकर रूप से उत्तेजित हो जाते हैं.और हवा को अपने अन्दर सोख कर जोडों के अन्दर मैद नामक तत्व को खत्म कर देते हैं,हड्डी के अन्दर जो सबल तत्व होता है,जिसे शरीर का तेज भी कहते हैं,धीरे धीरे खत्म हो जाता है,और जातक के जोडों के अन्दर सूजन पैदा होने के बाद जातक को उठने बैठने और रोज के कामों को करने में भयंकर परेशानी उठानी पडती है,इस रोग को देकर शनि जातक को अपने द्वारा किये गये अधिक वासना के दुष्परिणामों की सजा को भुगतवाता है.

=====स्नायु रोग के कारण शरीर की नशें पूरी तरह से अपना काम नही कर पाती हैं,गले के पीछे से दाहिनी तरफ़ से दिमाग को लगातार धोने के लिये शरीर पानी भेजता है,और बायीं तरफ़ से वह गन्दा पानी शरीर के अन्दर साफ़ होने के लिये जाता है,इस दिमागी सफ़ाई वाले पानी के अन्दर अवरोध होने के कारण दिमाग की गन्दगी साफ़ नही हो पाती है,और व्यक्ति जैसा दिमागी पानी है,उसी तरह से अपने मन को सोचने मे लगा लेता है,इस कारण से जातक में दिमागी दुर्बलता आ जाती है,वह आंखों के अन्दर कमजोरी महसूस करता है,सिर की पीडा,किसी भी बात का विचार करते ही मूर्छा आजाना मिर्गी,हिस्टीरिया,उत्तेजना,भूत का खेलने लग जाना आदि इसी कारण से ही पैदा होता है.इस रोग का कारक भी शनि है,

===पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067 ) के अनुसार अगर लगातार शनि के बीज मंत्र का जाप जातक से करवाया जाय,और उडद जो शनि का अनाज है,की दाल का प्रयोग करवाया जाय,रोटी मे चने का प्रयोग किया जाय,लोहे के बर्तन में खाना खाया जाये,तो इस रोग से मुक्ति मिल जाती है.

===इन रोगों के अलावा पेट के रोग,जंघाओं के रोग,टीबी,कैंसर आदि रोग भी शनि की देन है.

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उदर रोग का एक महत्व पूर्ण प्रयोग —

इस साधना को करने से से पेट की तमाम बिमारिओ से निज़ात पाई जा सकती है | बद हज्मी, पेट गैस ,दर्द और आव का पूर्ण इलाज हो जाता है | इसे ग्रहन काल ,दीपावली और होली आदि शुभ महूरतों में कभी भी सिद्ध किया जा सकता है | आप दिन या रात में कभी भी कर सकते है | इस मंत्र को १०८ वार जप कर सिद्ध कर ले प्रयोग के वक़्त ७ वार पानी पे मन्त्र पढ़ फुक मारे और रोगी को पिला दे जल्द ही फ़ायदा होगा |

साबर मन्त्र —

|| ॐ नमो अदेस गुरु को शियाम बरत शियाम गुरु पर्वत में बड़ बड़ में कुआ कुआ में तीन सुआ कोन कोन सुआ वाई सुआ छर सुआ पीड़ सुआ भाज भाज रे झरावे यती हनुमत मार करेगा भसमंत फुरो मन्त्र इश्वरो वाचा ||

आधा सिर दर्द —

आधा सिर दर्द और माई ग्रेन एक बहुत बड़ी समस्या है | उस के लिए एक महत्व पूर्ण मन्त्र दे रहा हू | इसे भी ग्रहन काल दीपावली आदि पे उपर वाले तरीके से सिद्ध कर ले | प्रयोग के वक़्त एक छोटी नमक की डली ले कर उस पर ७ वार मन्त्र पढ़े और पानी में घोल कर माथे पे लगादे आधे सिर की दर्द फोरन बंद हो जाएगी |

साबर मन्त्र :-

को करता कुडू करता बाट का घाट का हांक देता पवन बंदना योगीराज अचल सचल ||

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शनि की जडी बूटियां—–

बिच्छू बूटी की जड या शमी जिसे छोंकरा भी कहते है की जड शनिवार को पुष्य नक्षत्र में काले धागे में पुरुष और स्त्री दोनो ही दाहिने हाथ की भुजा में बान्धने से शनि के कुप्रभावों में कमी आना शुरु हो जाता है.

शनि सम्बन्धी दान पुण्य—–

पुष्य,अनुराधा,और उत्तराभाद्रपद नक्षत्रों के समय में शनि पीडा के निमित्त स्वयं के वजन के बराबर के चने,काले कपडे,जामुन के फ़ल,काले उडद,काली गाय,गोमेद,काले जूते,तिल,भैंस,लोहा,तेल,नीलम,कुलथी,काले फ़ूल,कस्तूरी सोना आदि दान की वस्तुओं शनि के निमित्त दान की जाती हैं.

शनि सम्बन्धी वस्तुओं की दानोपचार विधि——

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, (मोब.–09669290067के अनुसार जो जातक शनि से सम्बन्धित दान करना चाहता हो वह उपरोक्त लिखे नक्षत्रों को भली भांति देख कर,और समझ कर अथवा किसी समझदार ज्योतिषी से पूंछ कर ही दान को करे.शनि वाले नक्शत्र के दिन किसी योग्य ब्राहमण को अपने घर पर बुलाये.चरण पखारकर आसन दे,और सुरुचि पूर्ण भोजन करावे,और भोजन के बाद जैसी भी श्रद्धा हो दक्षिणा दे.फ़िर ब्राहमण के दाहिने हाथ में मौली (कलावा) बांधे,तिलक लगावे.जिसे दान देना है,वह अपने हाथ में दान देने वाली वस्तुयें लेवे,जैसे अनाज का दान करना है,तो कुछ दाने उस अनाज के हाथ में लेकर कुछ चावल,फ़ूल,मुद्रा लेकर ब्राहमण से संकल्प पढावे,और कहे कि शनि ग्रह की पीडा के निवार्णार्थ ग्रह कृपा पूर्ण रूपेण प्राप्तयर्थम अहम तुला दानम ब्राहमण का नाम ले और गोत्र का नाम बुलवाये,अनाज या दान सामग्री के ऊपर अपना हाथ तीन बार घुमाकर अथवा अपने ऊपर तीन बार घुमाकर ब्राहमण का हाथ दान सामग्री के ऊपर रखवाकर ब्राहमण के हाथ में समस्त सामग्री छोड देनी चाहिये.इसके बाद ब्राहमण को दक्षिणा सादर विदा करे.जब ग्रह चारों तरफ़ से जातक को घेर ले,कोई उपाय न सूझे,कोई मदद करने के लिये सामने न आये,मंत्र जाप करने की इच्छायें भी समाप्त हो गयीं हों,तो उस समय दान करने से राहत मिलनी आरम्भ हो जाती है.सबसे बडा लाभ यह होता है,कि जातक के अन्दर भगवान भक्ति की भावना का उदय होना चालू हो जाता है और वह मंत्र आदि का जाप चालू कर देता है.जो भी ग्रह प्रतिकूल होते हैं वे अनुकूल होने लगते हैं.जातक की स्थिति में सुधार चालू हो जाता है.और फ़िर से नया जीवन जीने की चाहत पनपने लगती है.और जो शक्तियां चली गयीं होती हैं वे वापस आकर सहायता करने लगती है |

क्या करें उपाय–

किसी अनुभवी ज्योतिषीे या हस्तरेखा विशेषज्ञ से सलाह लेकर विधिपूर्वक मूंगा रत्न धारण करने से भी पेट के रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है। 

इसके अतिरिक्त प्राकृतिक चिकित्सा के कुछ घरेलू उपाय इस प्रकार हैं– 

रात को दूध में आधा चम्मच हल्दी डालकर पीना चाहिए। 

एक चुटकी छोटी हर्र गर्म पानी में मिलाकर पीने से पेट दर्द में आराम मिलता है। जीरा तथा सेंधा नमक पीसकर गर्म पानी के साथ खाने से भूख में कमी, पेट फूलने, दस्त, कब्ज और खट्टी डकारों से मुक्ति मिलती है। 

एक गिलास गर्म पानी में दो चम्मच शहद और एक नींबू का रस डालकर पीने से अधिक चर्बी व मोटापे से छुटकारा पाया जा सकता है। 

एक गिलास पानी में पांच ग्राम फिटकरी घोलकर पीने से हैजे में लाभ होता है। 

रात को सोने के पहले दूध में मुनक्का उबालकर पीने से कब्ज से छुटकारा मिलता है। 

यदि समय रहते किसी योग्य हस्त रेखा विशेषज्ञ अथवा अनुभवी विद्वान् ज्योतिषी से सलाह लेकर उक्त उपाय किए जाएं, तो पेट के रोगों से रक्षा हो सकती है।

 

 

 

 

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