सामूहिक विवाह सम्मलेन के फायदे(लाभ) और नुकसान

सामूहिक विवाह सम्मलेन के फायदे(लाभ) और नुकसान —

सामूहिक विवाह समाज के भगीरथ बंधुओ द्वारा समाज हित में एक सार्थक सोच व अंगद कदम हैं। सामूहिक विवाह मात्र एक विवाह का आयोजन भर नहीं हैं अपितु इसके प्रभाव व समाज हित में लाभ बड़े दूरगामी हैं।किसी कमजोर, जरूरतमंद या असहाय परिवार की कन्या का विवाह करानें से बढ़कर कोई अन्य पुनीत कार्य नहीं है। इस बात का प्रमाण है कि आज हर छोटे-बड़े जिलों, कस्बों या शहरों में कई वैवाहिक संस्थाएं मिलजुकर सैकड़ों कन्याओं के हाथ सामूहिक विवाह के माध्यम से पीले कर रही हैं। जिनमें से कुछ सर्वजातीय वैवाहिक समितियां तथा कई सजातीय संस्थाएं क्रमश: सभी जातियों के तथा अपनी जाति के सामूहिक विवाह में सक्रिय हैं। ये संस्थाएं विवाह जैसे सामाजिक पुण्य कार्य में अपनी सराहनीय भूमिका निभाती हैं। प्रशंसनीय बात यह भी है कि अब इन सामूहिक वैवाहिक कार्यक्रमों में अपेक्षाकृत अच्छी संख्या देखी जा रही है। इन संस्थाओं के बैनरतले शादियां कराने पर समय की बर्बादी, दान-दहेज व फिजूलखर्ची जैसी कुरीतियों से भी समाज को मुक्ति मिल सकती है। लेकिन, इसके लिए जरूरी है कि समाज का बड़ा वर्ग भी इसमें सम्मिलित हो ताकि कोई भी जरूरतमंद व कमजोर परिवार अपनी नजरों में हीन व हास का पात्र न महसूस करे। 

सामूहिक विवाह सम्मेलन वर्तमान की आवश्यकता — क्या समाज के आमजन स्वयं आगे आएंगे।

दहेज लेना और दहेज देना कानूनी अपराध है।

तिलक नहीं दहेज नहीं, शादी कोई व्यापार नहीं, खरीदा हुआ जीवन लड़की को स्वीकार नहीं’।

 

इस कुरीति के चलते कई निर्धन परिवार की बेटियों के हाथ पीले नहीं हो पाते हैं, जिसके चलते निर्धन परिवार के माँ-बाप दलालों के चक्कर में पड़कर अपनी बेटियों की शादी दूसरे शहरों में अयोग्य वर से कर देते हैं और इसके बदले उन्हे पैसे भी मिलते हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो वो माँ-बाप अपनी बेटियों को गरीबी के कारण बेच देते हैं। अधिकतर इस प्रकार के शादियों में बेटियों के साथ गंभीर अपराध भी होते हैं। इस अपराध को समाप्त करने और निर्धन कन्यायों का घर बसाने के लिए संभ्रांत लोगों को आगे आना होगा। 

सम्मेलन की ही तरह सामूहिक विवाहों के आयोजन किए जाना समाज के लिए अच्छा कदम हें। इस कार्यक्रम के माध्यम से जो धन, झूठे सामर्थ्य प्रदर्शन व्यय होता हे वह, नई दम्पत्ति के लिए उन्नति का सहारा हो सकता हे। कुछ लोग कह सकते हें की हम इस विवाह व्यय का बोझ उठाने में समर्थ हें। वे यह क्या यह भूल जाते हें की इससे असमर्थ व्यक्तियों पर मानसिक दवाव बनता हे। वे भी अपनी पुत्र या पुत्री के लिए सक्षम परिवार में रिश्ता करना चाहते हें, इस लिए सामुहिक विवाह को नहीं अपना कर, अन्य पक्ष की इच्छा या मानसिकता के आधार पर सामर्थ्य से अधिक व्यय कर आर्थिक बोझ के नीचे दव जाते हें। ओर यह भी हे की कोई भी स्वयं को असमर्थ या कमजोर ,गरीब साबित नहीं होने देना चाहता, चाहे इसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े, कितना भी कर्ज क्यों न लेना पड़े।

नव जवान युवक ओर युवतियों से आज यह आशा की जा सकती हे, की इन बातों को वे समझ कर अपने परिवार को सामूहिक विवाह के लिए तेयार कर सकते हें, ओर अपने पालको को इस धन की बरबादी से बचा कर कर्ज के खड्डे में, गिरने से बचा सकते हें। यही बात दूसरी ओर भी लागू होती हे की क्या कोई जमाई यह चाहेगा की उसके ससुराल पक्ष को एसी कठिन परिस्थिति का सामना करना पड़े। यदि कोई जमाई एसा चाहे तो वह जमाई बनाने लायक हो ही नहीं सकता, लालची जमाई ओर परिवार में कोई बेटी सुखी हो ही नहीं सकती।

सामूहिक विवाह जेसी सामाजिक गतिविधि को आगे बड़ाने, ओर उसके लिए किसी को भी तैयार करने की कोशिश करने वाले महानुभवों को अक्सर यह ताना मिलता हे की स्वयं ने तो सामूहिक विवाह नहीं अपनाया पर हमको शिक्षा दे रहें हें। पर भाई यदि उनसे भूल हो गई हे, ओर वे इसी बात को समझ कर आपसे अनुरोध कर रहे हें, तो क्या आप बात को समझ कर भी सबक नहीं लेंगे? क्या जब तक आप स्वयं की हानी न हो जाए अनुभव से सबक नहीं लेंगे ? 

अनुभव में आया हे, की सामर्थवानों के द्वारा अपनाए किसी भी कार्यक्रम को अन्य सभी शीघ्र स्वीकार कर लेते हें, क्या अब वक्त नहीं हे की सभी सक्षम भी अपने पुत्र- पुत्रियों के सामूहिक विवाह में उनका विवाह कर समाज का नेत्रत्व करें। वे सम्पन्न होने के साथ साथ हर तरह से सक्षम भी हें। “महाजनौ येन गता सुपन्था” अर्थात बड़े व्यक्ति जिस राह पर चलते हें वही सच्चा मार्ग हे, के इस शास्त्र वचन को सार्थक कर हम ब्राह्मण अर्थात सर्व श्रेष्ठ होने की बात सार्थक करें।

सामूहिक विवाह के आयोजन से केवल स्वयं का धन ही नहीं बचता, देश की संपदा, के साथ व्यर्थ श्रम ओर बहुत सारी परेशानियों से भी छुटकारा मिल जाता हे। यह सब श्रम पूरा समाज मिलकर कर लेता हे।

मोटे-मोटे तौर पर सामाजिक प्रभावो में हम इस पहल से शादियो की दिन ब दिन बढती फिजूल खर्ची को आइना दिखा रहे हैं वहीँ समाज के आर्थिक रूप से कमजोर तबके की सहायता भी कर रहे हैं। हालाँकि सामाजिक स्तर पर सब समान हैं। फिर भी यह एक जमीनी सच्चाई हैं की सामूहिक विवाह की अवधारणा के विकास में एक आधारभूत तत्व यह भी था की समाज के आर्थिक रूप से कमजोर परिवारो से शादी रूपी खर्चे के पहाड़ का बोझ कम किया जाये। हालाँकि अब समाज में यह भी पहल हो रही हैं की आर्थिक रूप से सम्पन्न उच्च व मध्यम तबके को भी इसमें अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवानी चाहिए। पर यह सब स्वेच्छा से हो तो सोने पर सुहागा होगा क्योंकि वर्तमान में मैं समाज पर किसी तरह के प्रतिबंध की असार्थक कल्पना नहीं कर सकता। और मेरे स्वविचारो में शादी पूर्णतः निजी समारोह हैं और निजी रूप से ही प्रत्येक को इसके आयोजन का अधिकार भी हैं।

दूरगामी परिणाम देखे तो सामूहिक विवाह की पहल से हम कन्या भूर्ण हत्या पर भी एक हद तक सोच बदलने में कामयाब होंगे और दहेज़ रूपी दानव का भी निवारण कर रहे हैं। कन्या भूर्ण हत्या में एक अहम् किरदार माँ बाप के मन उसकी शादी के खर्चे का भी होता हैं जिसका हम इस पहल से निदान कर रहे हैं।

पर यह सब होते हुए भी मेरे मन में एक शंका या उलझन अब भी बरक़रार हैं। समाज के बुद्धिजीवी और न्यायप्रिय तो अवगत ही हैं की दहेज़ प्रथा समाज के लिए सबसे अनैतिक, असामाजिक और जहरीली समस्या हैं। हालाँकि सच्चाई यह भी हैं की इस कुप्रथा का हमारे समाज में इतना जहर देखने को नहीं मिला। फिर भी ताने देने के रूप मे हो या परिवार में माया का असर दिखाने के लिए अब भी ये समाज में विद्यमान हैं। पर इसे निर्मूलन करने के लिए बढ़ते कदम और समाज की चेतना का इसके प्रति कड़े रुख से में अभिभूत हूँ। लेकिन समाज के एक कदम से में स्तब्ध हूँ की दहेज़ प्रथा की शैशव अवस्था को हम अनोपचारिक रूप से सामूहिक विवाह में बढ़ावा दे रहे हैं। 

निमंत्रण पत्रिका, निर्देश पत्रिका में इसका प्रसार-प्रचार हो रहा हैं। समाज के भामाशाहो से विनती व आह्वान होता हैं की वे अपनी इच्छानुसार वस्तुए व आभूषण भेट दे सकते हैं।

क्या हम दहेज़ को पिछले दरवाजे से वैधानिक बना रहे हैं। अगर हम ये माने की ये सब भेट दहेज़ नहीं हैं और दहेज़ को हम कदापि बढ़ावा नहीं दे रहे हैं तो इन उपहारों और भेटो का फिर स्वरूप् क्या हैं। प्राचीन काल में दहेज़ प्रथा भी मात्र उपहारों और भेंटों का एक मिश्रण भर थी जिसे परिवार वाले अपनी बेटी को सहायतार्थ स्वरूप् विदाई के अवसर पर देते थे। कालान्तर में इसने अनिवार्यता का चोला ओढ़ लिया और गंभीर समस्या बन गयी। मुझे डर हैं क्या हम सामाजिक स्तर पर भी इस और बढ़ रहे हैं? 

अगर हाँ तो फिर इसके परिणाम गंभीर होंगे। हालाँकि एक तर्क यह भी हैं की यह तो समाज की और से उपहार स्वरुप भेट हैं पर तब मेरा प्रश्न यह होगा की माँ बाप के उपहारों और भेट को भी जायज ठहराना होगा। अगर यह सर्वउचित हैं तो वह भी परमउचित होना चाहिए। हम बुराई का आकलन इस तरह नहीं कर सकते की यह मात्र 10% घातक हैं और दूसरी 100% हैं। और अगर फिर हमारा मानक यह ही हैं तो हमें आत्मनिरीक्षण की जरुरत होगी की हम कहा खड़े हैं और चलने की दिशा क्या हैं।

उनकी बातो में एक मुद्दा यह भी था की इस सामूहिक विवाह में जो भेंटे और उपहार आये हैं उससे अधिक तो फलाणे सामूहिक विवाह में आये थे। हालाँकि मात्र यह एक चर्चा की बात हो सकती हैं और इसे आयी गयी भी कर सकते हैं पर क्या हम ऐसा माहोल भविष्य के लिए बना रहे जहा समाज में कुछ ऐसे बोल भी प्रचलन में आने लगेंगे जहाँ एक बेटी के घरवालो को ये सुनने के लिए भी विवश किया जायेगा की आप से तो बेहतर सामूहिक विवाह में दिया जा रहा हैं।

एक और यक्ष प्रश्न मेरे जेहन में हैं की अगर….अगर भविष्य में खुदा न खास्ता शादी किसी कारणवस टूट जाये तो इन भेंटों और उपहारों पर किसका अधिकार होगा….वरपक्ष या वधूपक्ष का? और किसी एक का होगा तो आधार क्या होगा।

सच्चाई यह भी हैं की सामूहिक विवाह में समारोह स्थल पर पहुचने के लिए किये गए वाहन का खर्च आज भी प्रमुख खर्च के रूप में दोनों पक्षो का होता हैं और ऐसेमें इन उपहारों और भेट के कारण एक और वाहन की भी व्यवस्था करनी होती हैं।

सामूहिक विवाह न्यूनतम में अधिकतम के सिद्धान्त पर हो तो और भी बेहतर परिणाम होंगे।

आयोजन समितिया भी अपनी संरचना और संगठन में बदलाव करके और भी बेहतर कर सकते हैं। वर्तमान में मौजूद सभी सामूहिक विवाह आयोजक समितिया अगर अपने पदों में एक पद दूसरी आयोजक समितियों के प्रमुख या अध्यक्ष को एक आमंत्रित पदाधिकारी के रूप में लेकर उनसे भी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा और उनके अनुभवो का लाभ ले तो परिणाम उम्मीदों से भी आगे होंगे। एक दूसरे का अनुभव बेहतर के लिए प्रभावी होगा।

हम सामूहिक विवाह भी बड़े जतन के बाद करवा पाते है। वर-वधू के परिजन सरकारी अनुदान को लेने में आनाकानी करते हैं। इसलिए संस्था स्तर पर ही पंजीयन शुल्क व भामाशाहों की ओर से दी जाने वाली पुरस्कार राशि से ही आयोजन करना पड़ता है।

इस प्रकार के सामूहिक विवाह अनुदान योजना के प्रति लोगों का रुझान बहुत कम है ।कम खर्चे की शादियों को प्रोत्साहन और दहेज प्रथा के उन्मूलन के लिए यह अच्छी योजना है।

क्या है योजना??

बाल विवाह की रोकथाम व दहेज प्रथा उन्मूलन के उद्देश्य से सामूहिक विवाह सम्मेलन में विवाह करने पर, महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से छह हजार रुपए का अनुदान दिया जाता है। इसमें चार हजार पांच सौ रुपए लड़की के नाम डाकघर व राष्ट्रीयकृत बैंक में तीन वर्ष के लिए सावधि खाते में जमा करवाए जाते हैं। शेष पंद्रह सौ रुपए सामूहिक विवाह करवाने वाली आयोजक संस्था को विवाह अनुदान के तौर पर दिए जाते हैं। आयोजक पंजीकृत संस्था जिला कलक्टर के मार्फत सामूहिक विवाह आयोजन के 15 दिन पूर्व सभी जोड़ों के जन्म तिथि प्रमाण-पत्रों के साथ आवेदन करती है। इस पर आई सीडीएस परियोजना निदेशक की ओर से प्रस्ताव का सत्यापन कर अनुदान के लिए अनुशंसा की जाती है।

अब जनमत लड़की पक्ष के पास—

जानते है, इस लैंगिक असंतुलन ने किस तरह सारे वैवाहिक संतुलन भी बिगाड़ कर रख दिए है? आज से करीब बीस साल पहले तक निर्णय का जो अधिकार वर पक्ष के पास था, वह अब पूरी तरह वधु पक्ष के पास चला गया। उसे एक तरह से चयन और चुनाव का वीटो पाॅवर सा मिल गया। इससे एक फायदा जरूर हुआ, दहेज समस्या का तो इससे अपने आप ही लगभग समापन समापन ही हो गया। 

लेकिन दूसरी समस्या पैदा हो गई। अब उल्टा वर पक्ष की ओर से वधु पक्ष को विवाह के लिए हामी भर देने पर ये-वो शादी-भोज की व्यवस्था करवा देने की कुछेक मात्रा में शुरूआत हो गई। 

समस्या यही नहीं रुकी। जो अविवाहित उपलब्ध है, वे भी औसत सामान्य वैवाहिक उम्र को पार कर गए। विवाह की आदर्श उम्र 21 से 24 वर्ष को लांघ गए। जब आप परिचय सम्मेलन में लड़के पक्ष की उम्र पर गौर करेंगे तो उनमें से ज्यादातर आम औसत विवाह उम्र से ज्यादा के दिखाई दे जाएंगे। इस स्थिति से उपजी वैवाहिक मजबूरी ने हमारे समाज में विजातीय विवाह का भी प्रवेश करा दिया। 

वधु पक्ष पर भी इस लैंगिक असंतुलन का असर आए बिना नहीं रह सका है। जो चीज उसके लिए फायदेमंद है, वही उसके लिए कुछ मात्रा में नुकसानदेह भी बन गई है। उसके पास लड़कों के अनेक विकल्प। वर पक्ष के पास विकल्प का इंतजार। जब विकल्प ज्यादा होते है तो चुनाव और चयन करने में समय लग जाता है। देरी उम्र बढ़ा देती है। आप परिचय सम्मेलन की लड़की पक्ष की सूची पर गौर करेंगे तो इसमें भी ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे, जिनमें कि लड़की की उम्र आम विवाह उम्र से कुछ ज्यादा दिखाई देगी। लेकिन यह तादाद लड़कोें की तादाद से कम है। 

चिंतन करे और समाधान खोजे—-

ऐसे कई और दुष्परिणाम गिनाए जा सकते है, जिन्होंने हमारे समाज की सामाजिक संरचना पर गहरी चोंट की है। इस चोंट की गूंज हम सब महसूस कर रहे हैं। हम सब भुगत रहे हैं। क्या हम इसी तरह चुप होकर इस चोंट को सहते रहेंगे? क्या इसके लिए हम कोई कदम नहीं उठाएंगे। क्या हमारे हाथ में कोई प्रयास है भी या नहीं…। 

प्रयास क्यों नहीं है। जरूर है। वे प्रयास क्या हो, हमे बस, इसी के लिए तो चिंतन करना है कि हम हमारे समाज के बिगड़ते लैंगिक संतुलन को कैसे सुधारे? विवाह उम्र को कैसे थामे। विवाह उम्र में विवाह कर देने का सबसे अच्छा फार्मूला तो यही है कि इसमें लड़की पक्ष चयन करते वक्त थोड़ा समझौतावादी रवैया अपनाए। जरूरी नहीं कि लड़का एकदम उसकी पसंद का नौकरी पेशा या व्यापारी ही हो। अगर वह दूसरे पेशें में और योग्य है तो उसे भी स्वीकार करें। इससे अधिक उम्र के मामले कुछ हद तक रुक सकेंगे। 

लेकिन लैंगिक संतुलन इसका सबसे पहला कार्य तो सामाजिक जागरण से शुरू होगा। जब कहीं सामाजिक समारोह हो तो वहां हमे इस विषय पर चर्चाए चलानी होगी। कहीं कोई मंचीय कार्यक्रम हो तो वहां पर हमें इस विषय पर संभाषण कराने हांेगे। विवाह सम्मेलन हो या परिचय सम्मेलन सबमें इस लैंगिक असंतुलन के विषय को जोर-शोर से उठाना होगा। इसी से समाधान निकलेगा। इसी से यह तय हो सकेगा कि पुत्र जन्म के साथ लड़की की भी चाहत हो। इसके लिए इस नारे कि  हम दो, हमारे दो, लेकिन लड़की जरूर हो…को साकार करने की अलख जगानी होगी। 

लेकिन इन मुद्दों का समाधान हर हाल में होना चाहिए। जल्द होना चाहिए। इसमें हुई देरी दूरी बढ़ाएगी। जल्दी से समाधान समरसता बढ़ाएगी। इस हल के लिए जरूरी है कि दोनों तरफ के अग्रजों बंधुओं को एक बार फिर से सक्रिय होकर, दोनों को लचीला रुख अपनाने की सीख देना चाहिए। चाहे कुछ भी हो समाज के अग्रजों को कुछ रचनात्मक, सकारात्मक और सर्वमान्य पहल कर समस्या का समाधान ढूंढना ही पड़ेगा। उन्हें इसके लिए सबको समाधान के लिए तैयार करना ही होगा।  

सामूहिक विवाह के आयोजन से केवल स्वयं का धन ही नहीं बचता, देश की संपदा, के साथ व्यर्थ श्रम ओर बहुत सारी परेशानियों से भी छुटकारा मिल जाता हे। यह सब श्रम पूरा समाज मिलकर कर लेता हे।

कुछ विशेषकर नवजवानों का यह सोच होता हे की हम परिवार सहित विवाह में बहुत मजा [सेलिब्रेट] करेंगे, पर मित्रो क्या एसा हो पाता हे, परिवार के सारे सदस्य तो व्यवस्था स्वागत सत्कार में जुटें होते हें, ओर थक कर चूर हो जाते हें, आने वाले अपना स्वागत करवाने/ ओपचारिक उपस्थिती/आशीर्वाद दे कर ओर अच्छा केवल भोजन कर जाने की इच्छा रखते हें। इनमें से किसी भी प्रकार की कमी उनकी असंतुष्टि बनकर “कटाक्ष” जो सबको कष्टकारी होती हे का कारण बन वैमनस्य का बीजारोपण भी करती हें।

हमारे प्राचीन शास्त्रो में भी सोलह संस्कारों में से कुछ संस्कार जिनमें यज्ञोपवीत जो शिक्षा का प्रारम्भ, विवाह जो ग्रहस्थ जीवन का प्रारम्भ, से लेकर अंतिम संस्कार तक के सभी संस्कारों को पूरे समाज के कार्यों से जोड़ा गया हे। इन्हे सारे समाज को मिलकर करना होता हे। विवाह के अवसर पर सारे समाज द्वारा दी जाने वाली भेंट का मूल उद्देश्य भी यही हे। 

ओर सामर्थ्य अनुसार पित्र संपत्ति से पुत्री को मिलने वाला स्त्रीधन जिसे कालांतर में विक़ृत ‘दहेज’ के नाम से जाना जाने लगा, इसी व्यर्थ प्रदर्शन ओर अमर्यादित अहम के झूठे प्रदर्शन से उत्पन्न हुआ हे, ने ही विवाह रूपी पुनीत कार्य जिस पर संतानों का भविष्य टिका होता हे को दूषित कर दिया हे। क्या यह समाज के सभी सक्षम जिम्मेदार बड़े कहाने वाले अग्रणी महानुभवों का कर्तव्य नहीं की वे समाज का सच्चा नेत्रत्व करें, ओर नई चेतना उत्पन्न करें। उन्हे आगे आकर आज अपने पुत्र ओर पुत्रियों का विवाह सामूहिक विवाह सम्मेलन में करना ही होगा, अन्यथा करनी कथनी का फर्क समाज को नष्ट कर देगा।

आज शादी-विवाह समाराहों में खर्च होने वाला अनाप-शनाप पैसा बिल्कुल पानी की तरह बहाया जाता है, जो कहीं-कहीं पर अप्रासंगिक सा लगता है। यह अनावश्यक खर्च फिजूलखर्च की श्रेणी में ही गिना जाता है। आज योग्य वर को पाने के लिए भी दान-दहेज के रास्ते पर चलने से भी नहीं बचा जा सकता है। दहेज के सामान की मांग व मोटी रकम दिये बगैर अच्छा जीवन साथी मिलनाआसान नहीं होता। सबसे पहले अच्छे दूल्हे की बड़ी कीमत होती है, कीमत को चुकाने की स्थिति में ही शादी की बात आगे बढ़ती है। नहीं तो, बात खत्म। अपनी जेब के हिसाब से दूल्हा ढूंढऩा पड़ता है क्योंकि आज दूल्हे खरीदे जाते हैं। 

कई जगह बड़े या सक्षम लोग अपनी मर्जी से लड़के पक्ष को दान-दहेज से लाद देते हैं। ऐसे लोग समाज में अपनी हैसियत का उच्च प्रदर्शन करते हैं, जिसमें अपना स्टेटस व रुतबा दिखाना भी खास मकसद होता है। अक्सर ऐसा दिखावटी प्रदर्शन विभिन्न वर्गों के बीच प्रतियोगिता का रूप भी ले लेता है। फिर किसी की बराबरी करने के लिए शादी समारोह में अपना भी रुतबा दिखाने के लिए आम आदमी कर्जदार भी बन जाता है। क्योंकि कई लड़कियों की शादी करने में तो पिता की कमर ही टूट जाती है, इस प्रकार विवाह के लिए लिया गया कर्ज बाकी की जिंदगी को भी दुश्वार कर देता है। इन सब स्थिति से बचने के लिए जरूरतमंद परिवार की कन्याओं के खर्च बगैर विवाह के लिए ऐसी संस्थाओं की भूमिका सराहनीय हो जाती है। 

कुछ वैवाहिक संस्थाएं योग्य वर-वधू हेतु परफेक्ट पेयर मैचिंग के लिए बायोडाटा एक्सचेंज करने का काम भी सुलभ कराती हैं। अपनी मनपसंद दूल्हा-दुल्हन का चयन होने तथा रिश्ता तय हो जाने से विवाह तक की पूरी जिम्मेदारी वैवाहिक संस्था की होती है। सामूहिक विवाह कराने वाले संगठन नव विवाहित जोड़ों को गुजर-बसर करने के लिए घर-गृहस्थी का जरूरी सामान विदाई के समय उपहार स्वरूप भी देते हैं। इतना सब होने पर भी सामूहिक विवाह कराने वाली संस्थाएं प्रचार व प्रसार के जरिये ऐसे परिवारों की खोजबीन में लगी रहती हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंद परिवारों की कन्याओं का विवाह कराया जा सके। परंतु, देखने में यह भी आता है कि अपनी लड़की की शादी आदि के लिए व्यवस्था-इंतजाम आदि न कर पाने पर भी कुछ परिवार सामूहिक विवाह में आने से कतराते है। 

इसका एक दूसरा पहलू भी हमारा समाज है, क्योंकि इन्हें समाज का डर भी सताता है कि अपने लोगों के बीच कहीं हंसी की बात न हो जाये। हमारे समाज की विडम्बना भरी विचारधारा यह भी है कि सामूहिक विवाह केवल निम्न वर्गों के लिए ही उपयुक्त है। क्योंकि जिनके पास शादी आदि के लिए खर्च की व्यवस्था नहीं है, वही लोग इसका लाभ लेने के योग्य हैं। जबकि सच यह है कि किसी समाज का निर्माण सभी वर्गों के एकसाथ समाहित होने पर ही होता है। दिखता यह है कि ऐसे सामूहिक सामाजिक विवाह समारोहों में बड़े वर्ग की हिस्सेदारी व सहभागिता नगण्य सी है। मध्यम वर्ग के लोगों के आयोजनों में आने से निश्चित तौर पर जरूरतमंद परिवारों की संख्या में और भी इजाफा होगा। सजातीय वैवाहिक संस्था से जहां पर जाति-विशेष को बल मिलता है, वहीं पर सर्वजातीय विवाह कराने से समाज की ताकत भी मजबूत होती है। 

सामूहिक विवाह का फायदा यह भी है कि इससे अनावश्यक खर्च की बचत के साथ दबावग्रस्त दान-दहेज देने की मजबूरी से भी छुटकारा मिल सकता है। जहां पर शादियों में दहेज एक अभिशाप है वहीं पर विवाह आदि पर किया गया अनाप-शनाप खर्च समाज के विभिन्न वर्गों के बीच हीन भावना भी पैदा करता है। सामूहिक विवाह को बढ़ावा देने तथा अन्य वर्गों को जागरूक करने की हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी भी बनती है। सामूहिक विवाह समाज में सामाजिक एकता व जागरुकता लाता है।

हम दो, हमारे दो, लेकिन लडक़ी जरूर हो!!

क्या अब हमे जाग नहीं जाना चाहिए। अफसोस कि सामाजिक स्तर पर अन्य कार्यों की चेतना तो खूब जगाई गई लेकिन लैगिंक संतुलन को संभालने की ओर कोई भी जागृति भरे कदम नहीं उठाए गए।  समाज के साथ ही अब यह हम सब सदस्योंं की भी जिम्मेदारी है कि वे इस चिंतन को समझे। पुत्र प्राप्ति की ही नहीं पुत्री प्राप्ति की भी दुआएं करें। जहां कहीं भी आगे परिचय सम्मेलन हो वहां पर इस संतुलन जागृति सूचक प्रचार के होर्डिंग बैनर आवश्यक रूप से लगाए जाए। पुत्री जन्म पर समाज स्तर पर सामूहिक बधाई देने का क्रम चलाया जए। 

और हम तो यहां तक कह देते है कि सरकार के जनसंख्या नियंत्रण के इस नारे कि -हम दो, हमारे दो को हमे बदलकर कहना होगा हम दो, हमारे दो, लेकिन लडक़ी जरूर हो!!

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राजस्थान सरकार द्वारा सामूहिक विवाहों हेतु अनुदान–

समाज में विवाहों पर अनावश्यकक व्येय की प्रवृति बढती जा रही है। सामूहिक विवाहों के आयोजन से इस पर नियंत्रण प्राप्ता करने का प्रयास किया जा रहा है। राज्यह सरकार द्वारा इनका महत्वय स्वीसकार करते हुए ऐसे कार्यक्रमों के प्रोत्सािहन हेतु वर्ष 1996 में सामूहिक विवाह अनुदान नियम बनाये गये। इन नियमों को और प्रभावी बनाये जाने हेतु राजस्थाजन सामूहिक विवाह नियमन एवं अनुदान नियम, 2009 दिनांक 20.01.10 से लागू किये गये है। इन नवीन नियम के मुख्यव बिन्दुम निम्ना नुसार है –

इन नियमों के अन्त0र्गत संस्थाे को सामूहिक विवाह आयोजन के लिए जिला कलेक्टमर/सक्षम अधिकारी की अनुमति प्राप्त0 करनी आवश्येक होगी।

इन नियमों के अन्त0र्गत राशि रूपये 6000/- प्रति जोडा अनुदान देय है जिसकी अधिकतम सीमा 10 लाख रूपये रखी गई है।

अनुदान प्राप्ति के लिए सामूहिक विवाह आयोजन में जोडों की न्यू/नतम संख्याड 10 होनी अपेक्षित है और इस तरह एक सामूहिक विवाह में अधिकतम 166 जोडों को अनुदान दिया जा सकता है।

प्रति जोडा अनुदानित राशि में से 25 प्रतिशत राशि (वर्तमान में रूपये 1500/- संस्था को विवाह के आयोजन के रूप में देय होगी जबकि 78 प्रतिशत राशि (वर्तमान आधार पर रूपये 4500/-) नवविवाहित (वधु) के नाम से डाकघर या अधिसूचित राष्ट्री यकृत बैंक में न्यूहनतम तीन वर्ष की अवधि के लिए सावधि, जमा कराई जावेंगी।

इन नियमों में आयोजित किये जाने वाले सामूहिक विवाहों का पंजीकरण राजस्थागन विवाहों का अनिवार्य रजिस्ट्री करण अधिनियम, 2009 (2009 का राजस्थावन अधिनियम 16) के अन्तनर्गत अनिवार्य किया गया है।

उद्देश्य–

इस योजना का मुख्य उद्देश्य दहेज प्रथा एवं बाल विवाह को रोकना है। समूहिक विवाह आयोजनों को प्रोत्साहित करने तथा विवाहो पर होने वाले अनावश्यक व्यय को कम करने के उद्देश्य से सामूहिक विवाह अनुदान नियम, 1996 बनाये गये है। बाल विवाह रोकना तथा कमजोर आय वर्ग के दम्पिायो को आर्थिक मदद/सम्बल प्रदान करने की दृष्टि से समय–समय पर नियमों में संशोधन किया गया है जिससे कि अधिक से अधिक संस्थायें तथा युवक/युवतियां प्रोत्साहित हों।

पात्रता–

यह अनुदान सामूहिक विवाह आयोजित करने वाले ऐसे संगठन, संस्थाओ को उपलब्ध है जो एक बार में एक साथ कम से कम 10 जोड़ो का सामूहिक विवाह आयोजित करते है। यह अनुदान केवल राजस्थान में आयोजित आयोजनों हेतु ही उपलब्ध है। विवाहित जोड़ो में लडकी की उम्र कम से कम 18 वर्ष एवं लडके की उम्र कम से कम 21 वर्ष होनी अनिवार्य है।

योजना की कार्य प्रणाली एवं देय अनुदान –

1. सामूहिक विवाह कराने वाली संस्था राजस्थान संस्था रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1998 (राजस्थान अधिनियम संख्या 28, 1958) के अन्तर्गत पंजीकृत होनी चाहिए। 

2. सामूहिक विवाह में कम से कम 10 जोडे होने चाहिए। 

3. सामूहिक विवाह आयोजन में सम्मिलित जोडो की संख्या के अनुसार प्रति जोड़ा 6000/– रूपये धनराशि देय है। प्रति जोड़ा अनुदान राशि में से 75 प्रतिशत राशि अर्थात रूपये 4500/– की राशि दुल्हन के नाम से पोस्ट आॅफिस या राष्ट्रीयकृत बैंक में 3 वर्ष के लिए सावधि जमा करायी जावेगी। शेष 25 प्रतिशत राशि अर्थात रूपये 1500/– आयोजनकर्ता संस्था को विवाह आयोजन अनुदान के रूप में देय हाेंगे। 

4. इन नियमों के अन्तर्गत किसी संस्था को अनुदान की सीमा दस लाख रूपये है जिसमें अधिकतम 166 जोड़ें सम्मिलित किये जा सकते है। 

5. अनुदान राशि की स्वीकृति जिला कलेक्टर द्वारा दी जाती है। 

6. राशि का चैक जिला महिला विकास अभिकरण के माध्यम से देय है। 

7. यह अनुदान राशि ड्राफट/चैक के माध्यम से आयेाजनकर्ता को आयोजन के उपरान्त देय होगी।

आवेदन –

1. पात्र संस्था सामूहिक विवाह नियम के प्रपत्र–‘अ’ में आवेदन तीन प्रतियों में जिला कलेक्टर को देगी। अनुदान चाहने वाली संस्था को आयोजन से कम से कम 15 दिवस पूर्व जिला कलेक्टर को आवेदन करना होगा। आवेदन के साथ निम्न प्रपत्र/दस्तावेज संलग्न होना आवश्यक है। 

2. प्रस्तावित जोड़ो की सूची सहित प्रस्ताव प्रस्तुत करना आवश्यक होता है। 

3. संबंधित जिला कलेक्टर द्वारा प्रस्ताव उपनिदेशक, महिला एवं बाल विकास को सत्यापन एवं अनुशंषा हेतु प्रेषित किये जाते है। 

4. विवाह आयोजन के पश्चात् उपनिदेशक के द्वारा प्रस्तावों को सत्यापित कर अनुशंषा सहित जिला कलेक्टर को प्रस्तुत करना होगा। 

5. विवाह हेतु प्रस्तावित जोड़ों में सम्मिलित लड़के/लड़की की उम्र की पुष्टि हेतु उनके जन्म प्रमाण पत्र के रूप में शैक्षणिक प्रमाण पत्र यथा बोर्ड प्रमाण पत्र/टी.सी. आदि जिसमे जन्म की तिथि का उल्लेख होना अपेक्षित है। 

6. जिन लड़के/लड़कियों ने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नही की हो तो उनके संबंध में रजिस्ट्रार, जन्म मृत्यु रजिस्ट्रीकरण से प्राप्त जन्म प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया जा सकता है। 

7. उक्त कोई दस्तावेज उपलब्ध नही हो तो फोटो पहचान पत्र/राशन कार्ड उम्र के साक्ष्य के रूप में आवेदन पत्र के साथ संलग्न किये जा सकते है।

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