मंगलदोष का हव्वा (घबराएं नहीं मंगल दोष/मां‍गलिक दोष से)—

मंगलदोष का हव्वा (घबराएं नहीं मंगल दोष/मां‍गलिक दोष से)—

प्रिय पाठकों, जब किसी कुण्डली में जब प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में मंगल होता है तब मंगलिक दोष लगता है। इस दोष को विवाह के लिए अशुभ माना जाता है। यह दोष जिनकी कुण्डली में हो उन्हें मंगली जीवनसाथी ही तलाश करना चाहिए ऐसी मान्यता है। जिनकी कुण्डली में मांगलिक दोष है वे अगर 28 वर्ष के पश्चात विवाह करते हैं, तब मंगल वैवाहिक जीवन में अपना दुष्प्रभाव नहीं डालता है।शादी से पहले अक्सर लोग होने वाले वर-वधू की कुंडली मिलवाते हैं। यदि किसी की कुंडली में मंगल दोष निकल आता है तो घबराने की जरुरत नहीं क्योंकि ज्यतिषी उपाय से सभी प्रकार के मंगल दोष को दूर किया जा सकता है।किसी अनुभवी ज्योतिषी से चर्चा करके ही मंगल दोष निवारण पूजन करना चाहिए। मंगल की पूजा का अंगारेश्वर महादेव, उज्जैन (मध्यप्रदेश) का विशेष महत्व  है। अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की गई पूजा प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है।  

चंद्र लग्न से मंगल की यही स्थिति चंद्र मांगलिक कहलाती है। यदि दोनों ही स्थितियों से मांगलिक हो तो बोलचाल की भाषा में इसे डबल मांगलिक और केवल चंद्र मांगलिक हो तो उसे आंशिक मांगलिक भी कहते हैं।मांगलिक पुरुष जातक की कुंडली में मंगल की यह स्थिति हो तो वह पगड़ी मंगल (पाग मंगली) और स्त्री जातक की चुनरी मंगल वाली कुंडली कहलाती है। 

मंगल की स्थिति से रोजी रोजगार एवं कारोबार मे उन्नति एवं प्रगति होती है तो दूसरी ओर इसकी उपस्थिति वैवाहिक जीवन के सुख बाधा डालती है.कुण्डली में जब प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में मंगल होता है तब मंगलिक दोष (manglik dosha)लगता है.इस दोष को विवाह के लिए अशुभ माना जाता है|यह दोष जिनकी कुण्डली में हो उन्हें मंगली जीवनसाथी ही तलाश करनी चाहिए ऐसी मान्यता है| सातवाँ भाव जीवन साथी एवम गृहस्थ सुख का है |इन भावों में स्थित मंगल अपनी दृष्टि या स्थिति से सप्तम भाव अर्थात गृहस्थ सुख को हानि पहुँचाता है | सामान्‍य तौर का अर्थ है कि विशेष परिस्थितियों में इन स्‍थानों पर बैठा मंगल भी अच्‍छे परिणाम दे सकता है। तो लग्‍न का मंगल व्‍यक्ति की पर्सनेलिटी को बहुत अधिक तीक्ष्‍ण बना देता है, चौथे का मंगल जातक को कड़ी पारिवारिक पृष्‍ठभूमि देता है। सातवें स्‍थान का मंगल जातक को साथी या सहयोगी के प्रति कठोर बनाता है। आठवें और बारहवें स्‍थान का मंगल आयु और शारीरिक क्षमताओं को प्रभावित करता है। इन स्‍थानों पर बैठा मंगल यदि अच्‍छे प्रभाव में है तो जातक के व्‍यवहार में मंगल के अच्‍छे गुण आएंगे और खराब प्रभाव होने पर खराब गुण आएंगे। मांगलिक व्‍यक्ति देखने में ललासी वाले मुख का, कठोर निर्णय लेने वाला, कठोर वचन बोलने वाला, लगातार काम करने वाला, विपरीत लिंग के प्रति कम आकर्षित होने वाला, प्‍लान बनाकर काम करने वाला, कठोर अनुशासन बनाने और उसे फॉलो करने वाला, एक बार जिस काम में जुटे उसे अंत तक करने वाला, नए अनजाने कामों को शीघ्रता से हाथ में लेने वाला और लड़ाई से नहीं घबराने वाला होता है। इन्‍हीं विशेषताओं के कारण गैर मांगलिक व्‍यक्ति अधिक देर तक मांगलिक के सानिध्‍य में नहीं रह पाता।किसी अनुभवी ज्योतिषी से चर्चा करके ही मंगल दोष निवारण पूजन करना चाहिए। मंगल की पूजा का अंगारेश्वर महादेव, उज्जैन (मध्यप्रदेश) का विशेष महत्व  है। अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की गई पूजा प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है।  

मंगली व्यक्ति इन उपायों पर गौर करें तो मांगलिक दोष को लेकर मन में बैठा भय दूर हो सकता है और वैवाहिक जीवन में मंगल का भय भी नहीं रहता है|| जीवन साथी के चयन के लिऐ ग्रह मेलापक (गुण-मिलान) की चर्चा होती है,तो मांगलिक विचार पर खासतौर पर विचार करते है,समाज मे मांगलिक दो  का हव्वा इतनी फैल गया है ।कि मांगलिक के नाम पर महत्वपूर्ण निर्णय अटक जाते है।कई बार अमंगली कुंडली को मांगलिक और मांगलिक कुंडली को अमांगलिक घोषि‍त कर दिया जाता है,जिससे परिजन असमंजस मे पड जाते है,॥ 

मांगलिक कुंडली का निर्णय बारिकी से किया जाना चाहिऐ क्योकि शास्त्रोँ मै मांगलिक दोष निवारण के तरीके उपलब्ध है.शास्त्रवचनो के जिस श्लोक के आधार पर जहा कोई कुंडली मांगलिक बनती है .वही उस श्लोक के परिहार (काट) कई प्रमाण है,ज्योतिष और व्याकरण का सिध्दांत है,कि पूर्ववर्ती कारिका से परवर्ती कारिका (बाद वाली) बलवान होती है .दोष के सम्बन्ध मै परवर्ती कारिका ही परिहार है ,इसलिये मांगलिक दोष का परिहार मिलता हो तो जरूर विवाह का फैसला किया जाना चाहिये॥ परिहार नही मिलने पर भी यदि मांगलिक कन्या का विवाह गैर मांगलिक वर से करना हो तो शास्त्रो मे विवाह से पूर्व “घट विवाह” का  प्रावधन है ,मांगलिक प्रभाव वाली कुंडलीसे भयभीत होने कि जरूरत नही है ॥यह दोष नही है वल्कि इसी मंगल के प्रभाव से जातक कर्मठ, प्रभावशाली, धैर्यवान तथा सम्मानीय बनता है ॥ जहां तक हो मांगलिक से मांगलिक का संबंध करें।ऐसे में अन्य कई कुयोग हैं। जैसे वैधव्य विषागना आदि दोषों को दूर रखें। यदि ऐसी स्थिति हो तो ‘पीपल’ विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके कन्या का संबंध अच्छे अच्छे ग्रह योग वाले वर के साथ करें। मंगल यंत्र विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग करें। देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या‍दि में ही इसे प्रयोग करें। छोटे कार्य के लिए नहीं।किसी अनुभवी ज्योतिषी से चर्चा करके ही मंगल दोष निवारण पूजन करना चाहिए। मंगल की पूजा का अंगारेश्वर महादेव, उज्जैन (मध्यप्रदेश) का विशेष महत्व  है। अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की गई पूजा प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है।  

मांगलिक शब्द का अर्थ कुछ अलग है लेकिन अपने निजी स्वार्थ हेतु कुछ ज्योतिष मित्र इसे राइ का पहाड़ बन देते हैं। भोले-भाले लोग इस पर तुरंत भरोसा करके बड़े भयभीत होते हैं। 

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार ‘मंगल” शब्द  सुनने में इतना मीठा और सुन्दर हैं, क्या वह किसी का बुरा/अमंगल कर सकता हैं ?

सामान्यतया “मंगल” शुभ कार्यों में,आशीर्वाद देने में प्रयुक्त होता हैं || मंगलमय हो, आदि…

 

इतना ही नहीं ऐसे जातकों की जब शादी की बात आती है, तो मानों इन्होंने जन्म लेकर कोई बड़ा पाप कर दिया हो।  ऐसे में कई बार मांगलिक जातकों को अपमान भी महसूस होता है। हम यह बात नहीं भूल सकते की बड़े-बड़े वीर भी मांगलिक थे। 

     

 

 

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार ज्योतिशास्त्र में कुछ नियम बताए गये हैं जिससे वैवाहिक जीवन में मांगलिक दोष नहीं लगता है, आइये इसे समझें —

मंगल दोष के परिहार स्वयं की कुंडली में (मंगल भी निम्न लिखित परिस्तिथियों में दोष कारक नहीं होगा)—

—जैसे शुभ ग्रहों का केंद्र में होना, शुक्र द्वितीय भाव में हो, गुरु मंगल साथ हों या मंगल पर गुरु की दृष्टि हो तो मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है।

—-वर-कन्या की कुंडली में आपस में मांगलिक दोष की काट- जैसे एक के मांगलिक स्थान में मंगल हो और दूसरे के इन्हीं स्थानों में सूर्य, शनि, राहू, केतु में से कोई एक ग्रह हो तो दोष नष्ट हो जाता है।

—-मेष का मंगल लग्न में, धनु का द्वादश भाव में, वृश्चिक का चौथे भाव में, वृष का सप्तम में, कुंभ का आठवें भाव में हो तो भौम दोष नहीं रहता।

—-कुंडली में मंगल यदि स्व-राशि (मेष, वृश्चिक), मूलत्रिकोण, उच्चराशि (मकर), मित्र राशि (सिंह, धनु, मीन) में हो तो भौम दोष नहीं रहता है।

—-सिंह लग्न और कर्क लग्न में भी लग्नस्थ मंगल का दोष नहीं होता है। शनि, मंगल या कोई भी पाप ग्रह जैसे राहु, सूर्य, केतु अगर मांगलिक भावों (1,4,7,8,12) में कन्या जातक के हों और उन्हीं भावों में वर के भी हों तो भौम दोष नष्ट होता है। यानी यदि एक कुंडली में मांगलिक स्थान में मंगल हो तथा दूसरे की में इन्हीं स्थानों में शनि, सूर्य, मंगल, राहु, केतु में से कोई एक ग्रह हो तो उस दोष को काटता है।

—-कन्या की कुंडली में गुरु यदि केंद्र या त्रिकोण में हो तो मंगलिक दोष नहीं लगता अपितु उसके सुख-सौभाग्य को बढ़ाने वाला होता है।

—यदि एक कुंडली मांगलिक हो और दूसरे की कुंडली के 3, 6 या 11वें भाव में से किसी भाव में राहु, मंगल या शनि में से कोई ग्रह हो तो मांगलिक दोष नष्ट हो जाता है।

—कुंडली के 1,4,7,8,12वें भाव में मंगल यदि चर राशि मेष, कर्क, तुला और मकर में हो तो भी मांगलिक दोष नहीं लगता है।

—-वर की कुण्डली में मंगल जिस भाव में बैठकर मंगली दोष बनाता हो कन्या की कुण्डली में उसी भाव में सूर्य, शनि अथवा राहु हो तो मंगल दोष का शमन हो जाता है.

—-जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12,वें भाव में स्थित मंगल यदि स्व ,उच्च मित्र आदि राशि -नवांश का ,वर्गोत्तम ,षड्बली हो तो मांगलिक दोष नहीं होगा

—-यदि 1,4,7,8,12 भावों में स्थित मंगल पर बलवान शुभ ग्रहों कि पूर्ण दृष्टि हो

—-किसी अनुभवी ज्योतिषी से चर्चा करके ही मंगल दोष निवारण पूजन करना चाहिए। मंगल की पूजा का अंगारेश्वर महादेव, उज्जैन (मध्यप्रदेश) का विशेष महत्व  है। अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की गई पूजा प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है।  

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मांगलिक को शादी में परेशानी क्‍यों आती है?

ऐसा इसलिये क्‍योंकि मंगल ग्रह को अकेले रहना पसंद है और इस प्रकार अगर कोई अन्‍य ग्रह उसके समीप आता है तो वह उससे झगड़ा कर लेता है। इसी प्रकार मांगलिक व्‍यक्‍ति लंबे समय के लिए अपने साथी को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं।

हर मांगलिक का पति नहीं मरता है—-

कई कोटि के मंगल दोष होते हैं। अगर पूर्ण मांगलिक हैं तो मंगल ग्रह का प्रभाव आप पर बहुत ज्यादा होगा। अगर आप का मंगल वक्रि है तो मंगल ग्रह आपके जीवन पर एक तिरछा प्रभाव डालेगा। ज्यादातर मामलों में, इस दोष के प्रभाव मामूली है और आपके पति/पत्नी की मौत नहीं होगी।

आयु एक कारण है—-

कुछ लोगों के लिए मंगल ग्रह का प्रभाव केवल एक निश्चित उम्र तक वैध है। वे एक उम्र के बाद शादी कर सकते है, क्योंकी ज्यादा उम्र के बाद शादी करने से उनके वैवाहिक जीवन में समस्या की उम्मीद नहीं होती है।

कुंभ विवाह—-

अगर आप पूर्ण मांगलिक हैं तब भी आप के दोष का उपचार किया जा सकता है, कुंभ विवाह के जरिये। इस अनुष्ठान में मंगल दोष से पीड़ित व्यक्ति को पहले एक केला या बरगद के पेड़ से शादी की जाती है। अगर आप लड़की है तो भगवान कृष्ण की एक चांदी या सोने की मूर्ति से शादी कर सकते हैं इस तरह व्यक्ति की कुंडली से दोष ख़तम हो जाता है।

एकाधिक मांगलिक दोष—

कुछ लोगों में डबल या ट्रिपल मांगलिक दोष होता है। मंगल ग्रह का प्रभाव उनके जीवन पर इतना मजबूत होता है की दो से तीन बार पुनर्विवाह करने के बाद भी उन के पति के मरने के प्रभाव कम नहीं होते है। ऐसे मामलों में कुंभ विवाह का उपाय करने से यह दोष कम होता है। यह फिर डबल या ट्रिपल मांगलिक व्यक्ति से ही उनकी शादी करनी चाहिए..

अच्छे कर्म—

हिंदू धर्म के अच्छे कामों पर काफी जोर दिया जाता है। आपकी अच्छाई और दयालुता से आप आपनी कुंडली में हजारो दोषों को कम कर सकते है। अगर आप एक ईमानदार और अच्छे व्यक्ति है तो आप आपने दोषों के लिए कभी भी ज्‍यादा कष्‍ट नहीं भोगेगें।

मांगलिक दोष के बुरे प्रभावों को पूजा, रत्नों तथा ज्योतिष के अन्य उपायों के माध्यम से बहुत हद तक कम किया जा सकता है इसलिये इससे घबराएं बिल्‍कुल नहीं।

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मंगल दोष के परिहार— 

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार ज्योतिशास्त्र में मांगलिक कुंडलियो हेतु दो तरह के परिहार मिलते है।

 (1) स्वय की कुंडली मे-जैसे शुभ ग्रहो का केन्द्र मे होना,शुक्र द्वितीय भाव मे हो,गुरू मंगल साथ हो या मंगल पर गुरू की दृष्टिे हो तो मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है।

 (2) वर-कन्या की कुन्डली मे आपस मांगलिक दोष का काट –जैसे एक के मांगलिक स्थान मे मंगल हो और दूसरे के इन्ही स्थानो मे सूर्य,शनि,राहु,केतु मे से कोई एक ग्रह हो तो दोष नष्ट हो जाता है।पापक्रांत शुक्र और सप्तम भाव के स्वामी की नेष्ट स्थिति को भी मंगल तुल्य ही समझे।मंगल दोष परिहार के कुछ शास्त्र वचन निम्न प्रकार है।इनके आधार पर यदि मांगलिक दोष भंग हो जाता है तो विवाह के बाद उनका दाम्पत्य जीवन सुख और प्रसन्नता पूर्वक व्यतीत होगा॥

 अंजे लग्ने व्यये चापे पाताले वृश्चिके कुजे।                                                                                                    वृषे जाए घटे रन्ध्रे भौमदोषो न विद्यते॥  

मेष का मंगल लग्न मे, धनु का द्वादश भाव मे वृश्चिक का चौथे भाव मे,वृष का सप्तम मे कुम्भ का आठवे भाव मे हो तो भौम दोष नही रहता ॥

अर्केन्दु क्षेत्रजातां कुज दोषो न विद्यते ।                                                                                                         स्वोच्चमित्रभ जातानां तद् दोषो न विद्यते ॥

सिंह लग्न और कर्क लग्न मे भी लग्नस्थ मंगल का दोष नही होता है\

नीचस्थो रिपुराशिस्थः खेटो भाव विनाशकः ।                                                                                                 मूलस्वतुंगा मित्रस्था भावबृद्धि करोत्यलमः ॥

कुंडली मे मंगल यदि स्व-राशि (मेष,बृश्चिक )मूलत्रिकोण,उच्चराशि (मकर)मित्र राशि (सिंह,धनु,मीन )मे हो तो भौम दोष नही रहता है                                                                                                                                               शनि भौमोथवा कश्चित्पापो वा तादृशो भवेत् ।                                                                                               तेष्वेव भवनेष्वेव भौम दोष विनाशकृत ॥

 

शनि मंगल या कोई भी पाप ग्रह जैसे राहु,सूर्य,केतु अगर मंगलिक भावो(1,4,7,8,12)मे कन्या कि कुंडली हो और उन्ही भावो मे वर के भी हो तो भौम दोषनष्ट होता है ।यानि यदि एक कुंडली मे मांगलिक स्थान मे मंगल हो तथा दूसरे की मे इन्ही स्थानो मे शनि,सूर्य,मंगल,राहु,केतु मे से कोई एक ग्रह हो तो अस दोष को काटता है।

केन्द्रे कोणे शुभाढ्याश्चते् च त्रिषडा़येप्य सद्ग्रहाः ।                                                                                         तदा भौमस्य दोषो न मदने मदपस्तथा ॥ 

                  

 यानी 3,6,11वे भावो मे अशुभ ग्रह हो और केन्द्र (1,4,7,10)व त्रिकोण (5,9) मे शुभ ग्रह हो,सप्तमेष सातवे भाव मे हो तो मंगल दोष नही रहता है ।

 वाचस्पतौ नवपंच केन्द्र संस्थे जातांगना भवति पूर्णविभूतियुक्ता ।                                                                  साध्वी सुपुत्रजननी सुखिनीगुढ्यां सप्ताष्टके यदि भवेदशुभ ग्रहोपि ॥

 

 कन्या की कुंडली मे गुरू यदि केन्द्र या त्रिकोण मे हो तो मांगलिक दोष नही लगता अपितु उसके सुख-सौभाग्य को बढाने वाला होता है ।    त्रिषट्‍ एकादशे राहु त्रिषड़कादशे शनिः। त्रिषड़कादशे भौमः सर्वदोष विनाशकृतः॥

यदि एक कुंडली मे मांगलिक योग हो और दूसरे कि कुंडली के (3,6,11)वे भाव मे से किसी भाव मे राहु ,मंगल या शनि मे से कोई ग्रह हो तो मांगलिक दोष नष्ट हो जाता है । 

द्वितीय भौमदोषस्तु कन्यामिथुन योर्विना,                                                                                                    चतुर्थ कुजदोषःस्याद्‍ तुलाबृषभयोर्विना।                                                                                                       अष्टमो भौमदोषस्तु धनु मीनद्व योर्विना,                                                                                                     व्यये तु कुजदोषःस्याद् कन्यामिथुन योर्विना॥ 

द्वितीय भाव मे यदि बुध राशि (मिथुन,कन्या) का मंगल हो तो मांगलिक दोष नही लगेगा ऐसा बृष व सिंह लग्न की कुंडली मे ही होगा ।चतुर्थ भाव मे शुक्र राशि (बृष,तुला) का मंगल दोषकृत नही है, ऐसा कर्क व कुम्भ लग्न मे होगा।अष्टम भाव मे गुरू राशि (धनु,मीन) का मंगल दोष पैदा नही करेगा ।ऐस बृष और सिंह लग्न मे ही सम्भव है और बारहवे भाव मे मंगल का दोष बुध कि राशि (मिथुन,कन्या) मे नही होगा ।ऐसा कर्क और तुला लग्नो मे ही होगा तथा 1,4,7,8,12 वे भाव मे मंगल यदि चर राशि मेष कर्क ,तुला और मकर मे हो तो भी मांगलिक दोष नही लगता है ॥

भौमेन सदृषो भौमः पापोवा तादृशो भवेत।                                                                                                      विवाह शुभदः प्रोक्ततिश्चरायुः पुत्र पौत्रदः ॥

मंगल के समान ही कोई पापग्रह (सूर्य,शनि,राहु,केतु) दूसरे कि कुंडली  के मांगलिक स्थान मे हो तो दोनो का विवाह करना चाहिए ,ऐसे दाम्पत्ति आयु,पुत्र,पौत्रादि से सम्पन्न होकर सुखी जीवन व्यतीत करेगे ।       

                                     

यामित्रे च यदा सौरि लग्ने वा हिबूकेथवा ।                                                                                                     अष्टमे द्वादशे चैव- भौम दोषो न विद्यते ॥

जिस वर –कन्या के (1,4,7,8,12) इन स्थनो मे शनि हो तो मंगली दोष मिट जाता है|

गुरु भौम समायुक्तश्च भौमश्च निशाकरः                                                                                                       केन्द्रे वा वर्तते चन्द्र एतद्योग न मंगली ।                                                                                                        गुरु लग्ने त्रिकोणेवा लाभ स्थाने यदा शनिः,                                                                                                   दशमे च यदा राहु मंगली दोष नाश कृत॥

गुरु भौम के साथ पडने से अथवा चन्द्रमा भौम एक साथ और केन्द्र मे (1,4,7,10) इन स्थानो मे चन्द्रमा होवे तो भी मंगली दोष मिट जाता है , जिसके लग्न मे गुरु बैठा हो अथवा त्रिकोण स्थान (5,9) मे गुरु बैठा और 11 भाव शनि हो 10 वे स्थान राहु बैठा हो तो भी मंगली दोष मिट जाता है ॥ 

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क्या मांगलिक और गैरमांगलिक वर-वधु का विवाह विनाशकारी होता है ??

यदि वर कन्या में से केवल किसी एक की जन्म कुन्डली में ही उक्त प्रकार का मंगल विराजमान हो, दूसरे की कुन्डली में नहीं हो तो इसका सर्वथा विपरीत प्रभाव ही समझना चाहिये. अथवा वह स्थिति दोषपूर्ण ही होती है. यदि मंगल अशुभ भावों में हो तो भी विवाह नही करना चाहिये. परन्तु यदि गुण अधिक मिलते हो तथा वर कन्या दोनो ही मंगली हो तो विवाह करना शुभ होता है. लगन दूसरे भाव चतुर्थ भाव सप्तम भाव और बारहवें भाव के मंगल के लिये वैदिक उपाय बताये गये हैं.

सबसे पहला उपाय तो मांगलिक जातक के साथ मांगलिक जातक की ही शादी करनी चाहिये. लेकिन एक जातक मांगलिक और उपरोक्त कारण अगर मिलते है तो दूसरे मे देखना चाहिये कि मंगल को शनि के द्वारा कहीं द्रिष्टि तो नहीं दी गयी है. कारण शनि ठंडा ग्रह है और जातक के मंगल को शांत रखने के लिये काफी हद तक अपना कार्य करता है. दूसरे पति की कुंडली में मंगल असरकारक है और पत्नी की कुंडली में मंगल असरकारक नहीं है तो शादी नही करनी चाहिये.

वैसे मांगलिक पति और पत्नी को शादी के बाद लालवस्त्र पहिन कर तांबे के लोटे में चावल भरने के बाद लोटे पर सफेद चन्दन को पोत कर एक लाल फूल और एक रुपया लोटे पर रखकर पास के किसी हनुमान मन्दिर में रख कर आना चाहिये. चांदी की चौकोर डिब्बी में शहद भरकर रखने से भी मंगल का असर कम हो जाता है. घर में आने वाले मेहमानों को मिठाई खिलाने से भी मंगल का असर कम रहता है. मंगल शनि और चंद्र को मिलाकर दान करने से भी फायदा मिलता है. मंगल से मीठी शनि से चाय और चंद्र से दूध से बनी पिलानी चाहिये.

शास्त्रकारों का मत ही इसका निर्णय करता है कि जहां तक हो मांगलिक से मांगलिक का संबंध करें. फिर भी मांगलिक एवं अमांगलिक पत्रिका हो, दोनों परिवार अपने पारिवारिक संबंध के कारण पूर्ण संतुष्ट हो, तब भी यह संबंध श्रेष्ठ नहीं है. ऐसा नहीं करना चाहिए. ऐसे में अन्य कई कुयोग हैं. जैसे वैधव्य विषागना आदि दोषों को दूर रखें. यदि ऐसी स्थिति हो तो ‘पीपल’ विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके कन्या का संबंध अच्छे ग्रह योग वाले वर के साथ करें. मंगल यंत्र विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग करें. देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या‍दि में ही इसे प्रयोग करें. छोटे कार्य के लिए नहीं. 

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मंगल दोष के लिए व्रत और अनुष्ठान —

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार अगर कुण्डली में मंगल दोष का निवारण ग्रहों के मेल से नहीं होता है तो व्रत और अनुष्ठान द्वारा इसका उपचार करना चाहिए. मंगला गौरी और वट सावित्री का व्रत सौभाग्य प्रदान करने वाला है. अगर जाने अनजाने मंगली कन्या का विवाह इस दोष से रहित वर से होता है तो दोष निवारण हेतु इस व्रत का अनुष्ठान करना लाभदायी होता है.जिस कन्या की कुण्डली में मंगल दोष होता है वह अगर विवाह से पूर्व गुप्त रूप से घट से अथवा पीपल के वृक्ष से विवाह करले फिर मंगल दोष से रहित वर से शादी करे तो दोष नहीं लगता है.प्राण प्रतिष्ठित विष्णु प्रतिमा से विवाह के पश्चात अगर कन्या विवाह करती है तब भी इस दोष का परिहार हो जाता है.मंगलवार के दिन व्रत रखकर सिन्दूर से हनुमान जी की पूजा करने एवं हनुमान चालीसा का पाठ करने से मंगली दोष शांत होता है.कार्तिकेय जी की पूजा से भी इस दोष में लाभ मिलता है.महामृत्युजय मंत्र का जप सर्व बाधा का नाश करने वाला है. इस मंत्र से मंगल ग्रह की शांति करने से भी वैवाहिक जीवन में मंगल दोष का प्रभाव कम होता है.

—-लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल अमंगल दूर होता है|

—मंगल दोष के मामले में सबसे ज्यादा ध्यान अपने स्वभाव का रखना चाहिए।

 —अपने खान-पान की आदतों में बदलाव लाएं। क्योंकि गर्म व ताजा भोजन करने से मंगल मजबूत होता है। इससे पाचन क्रिया और मनोदशा भी ठीक रहती है। 

 —- इससे निबटने का सबसे सरल उपाय है हनुमान जी की नियमित उपासना। यह मंगल के हर तरह के दोष तो खत्म करने सहायक है।

 —– हर मंगलवार को शिवलिंग पर कुमकुम चढ़ाएं। इसके साथ ही शिवलिंग पर लाल मसूर की दाल और लाल गुलाब अर्पित करें।

 —- मंगल दोष के निवारण के लिए मूंगा रत्न भी धारण किया जाता है। रत्न जातक की कुंडली में मंगल के क्षीण अथवा प्रबल होने या अंश के अनुसार उसकी डिग्री के हिसाब से पहना जाता है।

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घट विवाह (कुंभ विवाह) भी है उपाय—

पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार ज्योतिशास्त्र में यदि  कन्या की कुंडली मै मांगलिक दोष का परिहार नही हो रहा हो तो उपाय के रूप मे कन्या का प्रथम विवाह \सात फेरे किसी घट (घडे) या पीपल के वृक्ष साथ कराए जाने का विधान है ।इस प्रकार के उपाय के पीछे तर्क यह है कि मंगली दोष का मारक प्रभाव उस घट या वृक्ष पर होता हे ,जिससे कन्या का प्रथम विवाह किया जाता है । वर दूसरा पति होने के कारण उस प्रभाव से सुरक्षित रह जाता है ॥घट विवाह शुभ विवाह मुहूर्त और शुभ लग्न मे पुरोहित द्वारा सम्पन्न कराया जाना चाहिये । कन्या का पिता पूर्वाभिमुख बैठकर अपने दाहिने तरफ कन्या को बिठाऐ॥ कन्या का पिता घट विवाह का सकल्प ले ।नवग्रह,गौरी गणेशादि का पूजन ,शांति पाठ इत्यादि करे ।घट कि षोडषोचार से पूजा करे ।शाखोचार,हवन,सात फेरे और विवाह कि अन्य रश्म निभाये ।बाद मे कन्या घट को उठाकर ह्र्दय से सटाकर भुमि पर छोड दे जिससे घट फूट जाये ।इसके बाद देवताओ का विसर्जन करे और ब्राह्मणो को दक्षिणा दे बाद मे चिरंजीवी वर से कन्या का विवाह करे॥

                             

मंगल का विचार करना—

 लग्ने व्यये च पाताले यामित्रे चाष्टमे कुजे .                                                                                                     कन्या भर्तु विनाशाय भर्तु कन्या विनाशकृत ॥

जन्म लग्न मे (1,4,7,8,12)स्थानो मंगल होने से वर – कन्या मंगली होते है॥

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21 नामों से मंगल की पूजा कर काटें मांगलिक दोष —

विशेषकर जो मांगलिक हैं उन्हें इसकी पूजा अवश्य करना चाहिए. चाहे मांगलिक दोष भंग आपकी कुंडली में क्यों न हो गया हो फिर भी मंगल यंत्र मांगलिकों को सर्वत्र जय, सुख, विजय और आनंद देता है. 

निम्न 21 नामों से मंगल की पूजा करें 

1. ऊँ मंगलाय नम:

2. ऊँ भूमि पुत्राय नम:

3. ऊँ ऋण हर्वे नम:

4. ऊँ धनदाय नम:

5. ऊँ सिद्ध मंगलाय नम:

6. ऊँ महाकाय नम:

7. ऊँ सर्वकर्म विरोधकाय नम:

8. ऊँ लोहिताय नम:

9. ऊँ लोहितगाय नम:

10. ऊँ सुहागानां कृपा कराय नम:

11. ऊँ धरात्मजाय नम:

12. ऊँ कुजाय नम:

13. ऊँ रक्ताय नम:

14. ऊँ भूमि पुत्राय नम:

15. ऊँ भूमिदाय नम:

16. ऊँ अंगारकाय नम:

17. ऊँ यमाय नम:

18. ऊँ सर्वरोग्य प्रहारिण नम:

19. ऊँ सृष्टिकर्त्रे नम:

20. ऊँ प्रहर्त्रे नम:

21. ऊँ सर्वकाम फलदाय नम:

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विशेष:– किसी अनुभवी ज्योतिषी से चर्चा करके ही मंगल दोष निवारण पूजन करना चाहिए। मंगल की पूजा का अंगारेश्वर महादेव, उज्जैन (मध्यप्रदेश) का विशेष महत्व  है। अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की गई पूजा प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है।  

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