उज्जैन के प्रमुख दर्शनीय स्थल—

उज्जैन के प्रमुख दर्शनीय स्थल—

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उज्जैन आने वाले देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए उज्जैन के प्रमुख मन्दिर एवं पर्यटन स्थल आकर्षण का केन्द्र रहेंगे। यहां आने वाले श्रद्धालु इन मन्दिरों एवं स्थलों पर जाकर मन की शान्ति एवं आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। उज्जैन दर्शन के लिए पर्यटन विभाग की बस सुविधा भी उपलब्ध है जो की प्रति व्यक्ति 37 रु. के शुल्क पर उज्जैन के प्रमुख स्थलों की सैर कराती है. उज्जैन दर्शन के लिए बस, देवास गेट से प्रातः 7 बजे एवं दोपहर में 2 बजे चलती है. इसके अतिरिक्त टेम्पो, ऑटो रिक्शा, टाटा मेजिक आदि वाहनों से भी उज्जैन भ्रमण किया जा सकता है |

आपको बताना जरुरी समझता हु की यदि आप भस्म आरती के दर्शन करना चाहते है तो आपको जल्दी ही मंदिर पहुचना होगा क्योकि वहा टोकन के लिए फॉर्म लेने वालो की लाइन जल्दी ही लग जाती है जैसा की हमें ऑटो वाले ने बताया भस्म आरती के टोकन पहले आओ और पहले पाओ वाले तर्ज पर होते है और सिमित भी, तो हम में से ३ ने स्नान के लिए जाने का फैसला किया और एक लग गया लाइन में फॉर्म लेने के लिए सबकी आईडी की फोटो कॉपी के साथ || 

आजकल आप आन लाइन भी भी पंजीयन करवा सकते हैं ,इंटरनेट के माध्यम से |भस्म आरती आनलाईन बुकिंग से कहीं से भी एक माह पूर्व भी भस्म आरती के लिये आनलाईन बुकिंग की जा सकेगी। 

महाकालेश्वर मंदिर की वेबसाइट 

http://dic.mp.nic.in/Ujjain/mahakal/default.aspx  

पर जाकर क्लिक कर महाकालेश्वर मंदिर के वेब पेज पर लाईव दर्शन के साथ भस्म आरती की बुकिंग की जा सकेगी। यह सुविधा नि:शुल्क है।

फॉर्म करीबन १० बजे से बटना स्टार्ट होते है और दोपहर १२:३० तक जमा भी करवाने होते है उसके बाद शाम ७ बजे एक शोर्ट लिस्ट भक्तो की लिस्ट निकलती है और शाम 7 से 10 बजे तक उनको टोकन मिलते है, एक टोकन मिलता है जिसमे सभी टोटल सदस्यों की जानकारी होती है आरती में जाने से पूर्व हमें उसी टोकन से आरती में जाने की इजाजत मिलती है !

भस्मआरती महाकाल की एक दुर्लभ आरती है जो केवल किस्मत वालो को ही देखने को मिलती है और जिसने उज्जैन जाकर भी इसके दर्शन नही किये समझो उसकी यात्रा अधूरी ही रही!

उज्जैन के प्रमुख दर्शनीय स्थल निम्नानुसार हैं –

१.बड़े गणेश २.शनि नवग्रह मंदिर ३. इस्कोन्न टेम्पल ४. चिंतामणि गणेश ५. भरथरी गुफा ६. गढ़कालिका देवी ७. पीर मतेस्यन्द्र्नाथ ८. कालभैरव मंदिर ९. कलिदेह प्लेस १०. सिध्ध्वत ११.मंगलनाथ मंदिर १२. संदीपनी आश्रम , गोमती कुण्ड ,सर्वेश्वर महादेव १३ हर्सिध्धि माता १५. २४ खम्बा मंदिर १६ शनि संकट हरण मंदिर १७. गोपाल मंदिर १८ पटल बहिरव १९ राम घाट और मंदिर २० श्री चार धाम मंदिर २१. अंगारेश्वर महादेव etc..

यह धरती है महाकाल की !! उज्जैन अपने मंदिरो के लिए सुप्रसिद्ध है। यह शहर मध्य प्रदेश राज्य में स्थित है। भोपाल से १७३ कि. मी. दूर है तथा देश के सभी मुख्य शहरों से रेल और बस द्वारा जुड़ा हुआ है। उज्जैन को उज्जैनी, अवन्ति, अवंतिका तथा अवंतिकापुरी भी कहा जाता है।

आज की यात्रा शुरू होती है उज्जैन जंक्शन के रेलवे स्टेशन से, महाकाल के दर्शनों के लिए यात्री रेल द्वारा उज्जैन पहुँचते है। जैसे ही यात्री रेल गाडी से उतरते है, चारों ओर महाकाल की जय जयकार सुनाई देती है। रेल यात्रा से थके हुए यात्रियों के लिए, रेलवे स्टेशन से निकलते ही कई अच्छे होटल तथा धर्मशालायें है जहाँ यात्री रुक सकते है। उज्जैन में कई प्रसिद्ध मंदिर है जिनकी बड़ी मान्यता है।कहते है यदि बैलगाड़ी भर के अनाज लाया जाये और एक-एक मुठी हर मंदिर में चढ़ाई जाये तो अनाज खत्म हो जायेगा पर उज्जैन में मंदिरों की गिनती खत्म नहीं होगी। उज्जैन घूमने के लिए कम से कम यात्रियों को 2-3 दिन का समय चाहिए। 

पुराणों में उल्लेख है कि भारत की पवित्रतम सप्तपुरियों में अवन्तिका अर्थात उज्जैन भी एक है। इसी आधार पर उज्जैन का धार्मिक महत्व अतिविशिष्ट है। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर का यहां स्‍थित होना। उपरोक्त दोनों तथ्‍य उज्जैन की प्रतिष्ठा एवं महत्व को और भी अधिक बढ़ाने में सहायक होते हैं। यहां पर श्मशान, ऊषर, क्षेत्र, पीठ एवं वन- ये 5 विशेष संयोग एक ही स्थल पर उपलब्ध हैं। यह संयोग उज्जैन की महिमा को और भी अधिक गरिमामय बनाता है। उक्त दृष्टिकोण से मोक्षदायिनी शिप्रा के तट पर‍ स्‍थित उज्जैन प्राचीनकाल से ही धर्म, दर्शन, संस्कृति, विद्या एवं आस्था का केंद्र रहा है। इसी आधार पर यहां कई धार्मिक स्थलों का निर्माण स्वाभाविक रूप से हुआ। हिन्दू धर्म और संस्कृति के पोषक अनेक राजाओं, धर्मगुरुओं एवं महंतों ने जनसहयोग से इस महातीर्थ को सुंदर एवं आकर्षक मंदिरों, आराधना स्थलों आदि से श्रृंगारित किया। उज्जैन के प्राचीन मंदिर एवं पूजा स्थल जहां एक ओर पुरातत्व शास्त्र की बहुमूल्य धरोहर हैं, वहीं दूसरी ओर ये हमारी आस्‍था एवं विश्वास के आदर्श केंद भी हैं। 

mahakaleshwar jyotirling

इन दर्शनीय स्थलों एवं पर्यटन स्थलों में श्री महाकालेश्वर मन्दिर सर्वोपरि है। महाकालेश्वर मन्दिर भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में स्वयंभू दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर का प्रमुख स्थान है। यह मन्दिर अनादिकाल से उज्जैन में स्थित है। 18वी शताब्दी में राणौजीराव शिन्दे के दीवान श्री रामचन्द्र बाबा ने मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया था।अर्थात् ब्रह्मांड में सर्वपूज्य माने गए तीनों लिंगों में भूलोक में स्‍थित भगवान महाकाल प्रधान हैं। 12 ज्योतिर्लिंगों में इनकी गणना होती है। उज्जैन के प्रथम और शाश्वत शासक भी महाराजाधिराज श्री महाकाल ही हैं, तभी तो उज्जैन को महाकाल की नगरी कहा जाता है। दक्षिणमुखी होने से इनका विशेष तांत्रिक महत्व भी है। ये कालचक्र के प्रवर्तक हैं तथा भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले बाबा महाकालेश्वर के दर्शन मात्र से ही प्राणिमात्र की काल मृत्यु से रक्षा होती है, ऐसी शास्त्रों की मान्यता है। 

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भारत के नाभिस्थल में, कर्क रेखा पर स्थित श्री महाकाल का वर्णन रामायण, महाभारत आदि पुराणों एवं संस्कृत साहित्य के अनेक काव्य ग्रंथों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। कहा जाता है कि इस अतिप्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार राजा भोज के पु‍त्र उदयादित्य ने करवाया था। उसके पश्चात पुन: जीर्ण होने पर 1734 में तत्कालीन दीवान रामचन्द्रराव शेणवी ने इसका फिर से जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के तल मंजिल पर महाकाल का विशाल लिंग स्थित है जिसकी जलाधारी का मुख पूर्व की ओर है। साथ ही पहली मंजिल पर ओंकारेश्वर तथा दूसरी मंजिल पर नागचन्द्रेश्वर की प्रतिमाएं स्थित हैं। 

 

स्मरण रहे कि भगवान नागचन्द्रेश्वर के दर्शन वर्ष में केवल 1 ही बार, अर्थात नागपंचमी पर होते हैं। महाकाल के दक्षिण में वृद्धकालेश्वर, अनादि कल्पेश्वर तथा सप्तऋषियों के मंदिर स्‍थित हैं, जबकि इसके उत्तर में चन्द्रादित्येश्वर, देवी अवन्तिका, बृहस्पतेश्वर, स्वप्नेश्वर तथा समर्थ रामदास द्वारा स्था‍पित श्री हनुमानजी का मंदिर है। इसके पश्चिम में कौटितीर्थ नामक कुंड है एवं समीप ही रुद्र-सरोवर भी स्थित है।

 

पूरे भारतवर्ष में यह एकमात्र ज्योतिर्लिंग है, जहां ताजी चिताभस्म से प्रात: 4 बजे भस्म आरती होती है। उस समय पूरा वातावरण अत्यंत मनोहारी एवं शिवमय हो जाता है। 

बाबा के दर्शन करने के लिए सिर्फ २-३ मिनिट का समय मिलता है ! बाबा के दर्शन के बाद आप मंदिर के अन्दर ही बने कई और मंदिरों के दर्शन अवस्य करे ! और जिस प्रकार वैष्णु माता के लंगर में प्रसाद मिलता है उसी प्रकार महाकाल के मंदिर में भी प्रसाद के लिए एक टोकन मंदिर के अन्दर ही मिलता है एक सदस्य को सिर्फ एक टोकन ,बाबा का प्रसाद इतना स्वादिस्ट और लाजवाब होता है की बस पूछिए ही मत ! और वयवस्था तो इतनी शानदार है की तारीफे काबिल है टोकन ११ बजे से रात ८ बजे तक ही मिलता है प्रसाद में कभी रोटी ,कढी,चावल,सब्जी, मीठे चावल आदि !

मैं आप लोगो से स्पेसल आग्रह करना चाहूँगा की एक बार बाबा का प्रसाद अवस्य ग्रहण करे !

चौरासी महादेव मन्दिर उज्जैन के पंचक्रोशी मार्ग में कुल 84 महादेव मन्दिर हैं। इनमें से उज्जैन शहर से बाहर चार द्वारपाल महादेव माने जाते हैं। इसके अलावा उज्जैन में अवन्ति पार्श्वनाथ मन्दिर, वेधशाला, कालियादेह महल, इस्कॉन मन्दिर, चारधाम मन्दिर, प्रशान्तिधाम, मणिभद्रवीर मन्दिर भी दर्शनीय हैं। 

नागचंद्रेश्वर महादेव— महाकालेश्वर मन्दिर के शिखर पर नागचंद्रेश्वर महादेव की मूर्ति स्थापित है, जो वर्ष में एक बार नागपंचमी के त्योहार पर दर्शनार्थियों के लिए खोला जाता है। 

बड़ा गणेश मन्दिर— श्री महाकालेश्वर मंदिर के पीछे तथा प्रवचन हॉल के सामने श्री गणेशजी की विशालकाल एवं अत्यंत आकर्षक मूर्ति प्रतिस्थापित है। इस मंदिर का निर्माण 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में महर्षि सांदीपनि के वंशज एवं विख्यात ज्योतिषविद् स्व. पं. नारायणजी व्यास द्वारा करवाया गया था। यह स्थान स्व. व्यासजी का उपासना स्थल भी रह चुका है। इस मंदिर में पंचमुखी हनुमानजी की अत्यंत आकर्षक मूर्ति प्रतिष्ठित है। इसके अतिरिक्त भीतरी भाग में, पश्चिम दिशा की ओर नवग्रहों की मूर्तियां हैं।ज्योतिष एवं संस्कृत के विख्यात केंद्र के रूप में विकस‍ित यह स्थान हजारों छात्रों को अब तक शिक्षा प्रदान कर चुका है। श्री नारायण विजय पंचांग का प्रकाशन भी यहां से होता है। स्व. पं. नारायणजी व्यास के पुत्र प्रकांड विद्वान स्व. पं. सूर्यनारायण जी व्यास ने ज्योतिष, साहित्य और इतिहास के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान दिया है। 

रामघाट–भारत एक ऐसा देश है जहा नदियों को माँ का दर्जा दिया गया है। शिप्रा नदी भी उन्ही पवित्र नदियों में से एक है जिसका जल अमृत के सामान माना जाता है। ऐसा कहा जाता है की शिप्रा नदी भगवान विष्णु के शरीर से निकली है तथा इसमें स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। शिप्रा नदी में भगवान श्री राम ने अपने पिता माहराज दशरथ का पिंड दान किया था। शिप्रा नदी में सायं की आरती का दृश्य अत्यंत शांति प्रदान करने वाला होता है। पुराणों में शिप्रा नदी का महत्व बताया गया है। राम घाट यहाँ का एक प्रसिद्ध घाट है। जनम-जनम के पापों से मुक्त होने की लालसा मन में लिए श्रद्धालु इस घाट पर शिप्रा नदी में स्नान करते है तथा अपने श्रद्धा सुमन यही अर्पण करते है।

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हरसिद्धि मन्दिर— भगवान शंकर ने देवी चंडी को हरसिद्धि का नाम दिया था। ऐसा माना जाता है की दक्ष प्रजापति के यज्ञ कुण्ड से जब भगवान शिव माता सती को ले जा रहे थे तब उज्जैन में स्थित माता हरसिद्धि का मंदिर के इसी पावन स्थान पर सटी देवी की कोहनी गिरी थी। इसलिए इस मंदिर को 51 शक्ति पीठों में गिना जाता है।यह मंदिर अत्यंत जागृत माना जाता है। इस मंदिर में श्री यन्त्र स्थापित है जिस से तांत्रिक परम्परा में इस मंदिर का  बहुत महत्व है। माता हरसिद्धि राजा विक्रमादित्य की कुल देवी थी। ऐसा माना जाता है की यहाँ से पहले माता समुद्र के बीच एक टापू पर सुशोबित थी।  राजा विक्रमादित्य माता हरसिद्धि को अपने साथ उज्जैन लाना चाहते थे।  इसलिए वह भेंट स्वरुप अपना सिर माता को चढ़ा देते थे तथा माता की कृपा से उनका सिर वापिस आ जाता। विक्रमादित्य ने 11 बार अपना सिर माता के चरणों में भेंट किया। माता उनकी भक्ति से प्रसन्न हुई तथा राजा के साथ उज्जैन जाना स्वीकार किया। देवी हरसिद्धि के मंदिर में स्थित प्रतिमा अत्यंत मनमोहक तथा प्रसन्न मुद्रा में है। यह मंदिर महाकालेश्वर मंदिर से 700 मीटर की दुरी पर स्थित है।

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गोपाल मन्दिर— महाराजा दौलतराव की महारानी बायजाबाई ने मन्दिर बनवाकर इसमें गोपालकृष्ण की मूर्ति स्थापित की। काले पाषाण, संगमरमर एवं रजत दरवाजों का यह मन्दिर ऐतिहासिक महत्व का है। मन्दिर में गोपालकृष्ण एवं राधाजी की आकर्षक प्रतिमाएं हैं। 

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चौबीस खंबा माता मन्दिर— यह मन्दिर अतिप्राचीन है। यहां 12वी शताब्दी का शीलालेख लगा है, जिसमें अनहीलपट्टन के राजा ने व्यापारियों को लाकर यहां बसाया था1 यहां महालया एवं महामाया दो देवियों की मूर्तियां हैं। 

गढ़कालिका मन्दिर — यह मन्दिर भर्तृहरि गुफा के समीप है। स्कन्द पुराण के अनुसार उज्जैन शक्ति के चौबीस स्थानों में से एक माना गया है। शक्ति संगम में जिसका उल्लेख है, वह गढ़कालिका है। महाकवि कालिदास के तप से प्रसन्न होकर गढ़कालिका ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और देवी के आशीर्वाद से ही कालिदास को विद्वतता एवं कवित्व की प्रतिभा प्राप्त हुई। 

कालभैरव —पुराणों में उल्लेखित अष्टभैरवों में कालभैरव प्रमुख हैं। भगवान शिव के तृतीय नेत्र से उत्पन्न कालभैरव शैव धर्म के कापालिक एवं अघोर सम्प्रदाय से प्रमुख रूप से पूजे जाते हैं। कालभैरव प्रतिमा चमत्कारिक है। मूर्ति के मुख में छिद्र नहीं है, फिर भी मूर्ति को मद्यपान कराते समय मद्यपात्र खाली हो जाता है। महाकाल की नगरी उज्जैन में शिव के तीसरे नेत्र से प्रकट हुए काल भैरव भी स्थापित है। आठ भैरवो में से एक काल भैरव के रूप में शिव इस प्राचीन मंदिर में शोभायमान है।  काल भैरव शिव का क्रोधित स्वरुप है जो सभी तारक के पापों को नष्ट करने वाला तथा अनिष्ट कारक भयों से अपने भक्त की रक्षा करने वाला है। उज्जैन के भैरव गढ़ नामक क्षेत्र में बना भगवान काल भैरव का ये मंदिर अत्यंत आश्चर्यचकित करने वाला है। इस मंदिर में स्थापित काल भैरव की प्रतिमा को मदिरा का प्रसाद चढ़ाया जाता है और जैसे ही मदिरा का भरा प्याला भगवान काल भैरव के होंठों से लगाया जाता है, देखते ही देखते वह प्याला खाली हो जाता है। यह मंदिर अत्यंत जागृत है। यहाँ श्रद्धालु दूर-दूर से भगवान के दर्शनों के लिए आते है। ऐसा मन जाता है की यहाँ सच्चे दिल से मांगी हुई मन्नत अवश्य पूरी होती है। अनेक राजाओं महाराजाओं ने यहाँ विजयश्री का आशीर्वाद माँगा और भगवान काल भैरव ने उन्हें विजयी होने आशीर्वाद दिया।ऐसा कहा जाता है की महाकाल के दर्शन कर के यदि कोई काल भैरव के दर्शन न करे तो उसकी उज्जैन की यात्रा अधूरी रह जाती है।  काल भैरव के इस मंदिर के स्थापना की कहानी बड़ी दिलचस्प है। एक बार जब ब्रह्मा जी चार पुराणों की रचना के बाद पांचवे पुराण की रचना करने लगे तो भगवान शिव ने उन्हें रोकने का प्रयास किया क्योंकि पांचवे पुराण की रचना उपयुक्त नहीं थी। परन्तु ब्रह्मा जी ने भगवान शिव की बात नहीं मानी जिस से क्रोधित हो कर उनके तीसरे नेत्र से काल भैरव प्रकट हुए और ब्रह्मा जी का पांचवा सिर काट दिया जिस से उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप लग गया। भगवान शिव की आराधना करने पर भगवान ने काल भैरव से कहा की ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए शिप्रा नदी में स्नान करने को कहा।  काल भैरव शिप्रा नदी में स्नान कर के सदा सदा के लिए उज्जैन में बस गए।

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सिद्धवट मन्दिर— भारतवर्ष के प्रसिद्ध पंचवट-गया में बोधिवट इलाहाबाद में, अक्षयवट वृंदावन में बंशीवट, नाशिक में पंचवट तथा उज्जैन में सिद्धवट विशेष पवित्र माने गए हैं। हिन्दू समाज में इस स्थल पर मृत्यु उपरान्त क्रियाकर्म का गया-तीर्थ के समान महत्व है। 

अंगारेश्वर महादेव मंदिर और मंगलनाथ मन्दिर अंकपात के निकट शिप्रा नदी के तट पर स्थित है। पौराणिक परम्परा अनुसार उज्जैन मंगल ग्रह की जन्मभूमि है। ऐसा माना जाता है कि मंगलनाथ के ठीक ऊपर आकाश में मंगल ग्रह स्थित है।यहां चौरासी महादेव में 43वें महादेव अंगारेश्वर मन्दिर हैं- यहां अतिप्राचीन शिवलिंग स्थापित है, जिसके बारे में जानकारों का कहना है कि यह मंगल ग्रह का उल्का पिण्ड है। मंगल दोष निवारण हेतु यहां भातपूजा का विशेष महत्व है। देश-विदेश के अनेक पर्यटक विशेष पूजन हेतु यहां आते हैं। भगवान शंकर के अंश से मंगल गृह का जनम इसी स्थान पर हुआ था।  कर्क रेखा इसी मंदिर से हो कर जाती है। मंगल गृह का मनुष्य जीवन पर बहुत असर होता है। मंगल गृह की शांति के लिए यहाँ विशेष पूजा होती है। यहाँ चावल से मंगल गृह के पिंड का विशेष अभिषेक व पूजन किया जाता है।  यह मंदिर अति प्राचीन है। यहाँ दर्शन कर श्रद्धालु अपने कष्टों से मुक्ति पाते है तथा मंगलमय भविष्य की कामना करते है। यह मंदिर महाकालेश्वर मंदिर से लगभग 5 कि. मी. की दुरी पर स्थित है।

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राम जनार्दन मन्दिर- प्राचीन विष्णु सागर के तट पर विशाल परकोटे से घिरा यह मन्दिरों का समूह है। इनमें एक राम मन्दिर एवं दूसरा विष्णु मन्दिर है। इसे सवाई राजा एवं मालवा के सूबेदार जयसिंह ने बनवाया था। 

चित्रगुप्त धर्मराज मन्दिर— राम जनार्दन मन्दिर के निकट कायस्थ समाज का महत्वपूर्ण तीर्थ है। पद्मपुराण के पातालखण्ड के अनुसार चित्रगुप्त ने ब्रह्मा के आदेश से उज्जैन के शिप्रा तट पर नगर कोट में तपस्या की थी। 

चौंसठ योगिनी मन्दिर— उज्जैन की नयापुरा बस्ती में चौंसठ योगिनी का मन्दिर है। तंत्र परम्परा में चौंसठ योगिनियों का विशेष महत्व है। यहां अतिप्राचीन प्रतिमाएं हैं। 

नगरकोट की महारानी —मन्दिर में प्रतिमा के स्थूल रूप से प्रतीत होता है कि यह नगर के परकोटे की रक्षिका देवी है। अवंतीखण्ड में वर्णित नौ मातृकाओं में से सातवी कोटरी देवी है। दोनों नवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष उत्सव मनाया जाता है। 

चिन्तामन गणेश मन्दिर— उज्जैन से पांच किलो मीटर दूरी पर ये मन्दिर स्थित है। मूर्ति एवं मन्दिर परमारकालीन हैं। मन्दिर में इच्छामन, चिन्तामन एवं चिन्ताहरण गणेश के नाम से तीन प्रतिमाएं हैं। प्रथम पूजनीय श्री गणपति जी का यह मंदिर सब चिंताओं को दूर करने वाला है। भगवान भोले शंकर ने गणेश जी को वरदान दिया की किसी भी शुभ कार्य का आरम्भ इनके पूजन के बिना नहीं होगा। हर शुभ कार्य से पहले इनका आशीर्वाद लेना जरुरी है। उज्जैन के लोग सब मांगलिक कार्यों का शुभारम्भ चिंतामन गणेश के मंदिर से ही करते है। शादी – विवाह का प्रथम निमंत्रण भी चिंतामन गणेश के चरणो में शादी का कार्ड रख कर किया जाता है। श्रद्धालु यहाँ सुखी वैवाहिक जीवन की कामनाएं मांगते है तथा आशीर्वाद प्राप्त करते है। लोग यहाँ मन्नत के धागे बांधते है तथा मनोकामना पूर्ण होने पर फिर से यहाँ दर्शन करने आते है और पूजा करते है।

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भर्तृहरि गुफा —उज्जैन की सांस्कृतिक परम्परा में भर्तृहरि नरेश, दार्शनिक, तपस्वी एवं लेखक रहे हैं। भर्तृहरि राजा विक्रमादित्य के ज्येष्ठ भ्राता थे। पीर मत्स्येंद्रनाथ भर्तृहरि गुफा के चारों ओर का क्षेत्र प्राचीन उज्जैन क्षेत्र था। पुरातत्वीय उत्खनन से प्राप्त अवशेष इसकी प्राचीनता सिद्ध करते हैं। यहीं पर पीर मत्स्येंद्रनाथ की समाधि है। नौ नाथों के प्रमुख मत्स्येंद्रनाथ थे। नाथ सम्प्रदाय के सन्तों को पीर कहा जाता है। 

भूखीमाता मन्दिर— शिप्रा के तट पर कर्कराजेश्वर मंदिर के सामने नदी तट पर भूखी माता का प्राचीन मंदिर स्थित है। पूर्ववर्ती काल में भूखीमाता का नगर में वास था। इस मन्दिर में माता के दो रूप हैं, जिन्हें भूखी (भुवनेश्वरी) माता एवं देवी धूमावती कहते हैं। राजा विक्रमादित्य के काल से चली आ रही नगर देवियों की पूजा में भूखीमाता का प्रमुख स्थान है। 

सान्दीपनि आश्रम — अंकपात सान्दीपनि ऋषि का आश्रम मंगलनाथ रोड पर स्थित है। यहां पर भगवान श्रीकृष्ण, बलराम एवं सुदामा ने अध्ययन किया। कुण्ड के पास खड़े नन्दी की प्रतिमा शुंगकालीन है। श्री वल्लभाचार्य ने इस स्थल पर प्रवचन दिया था। श्री अवन्ति पार्श्वनाथ मन्दिर श्वेताम्बर जैनों का यह मन्दिर शिप्रा तट पर स्थित है। 

महर्षि सांदीपनी व्यास के इस आश्रम में भगवान् श्री कृष्ण, सुदामा तथा श्री बलराम ने गुरुकुल परंपरा के अनुसार विद्याध्ययन कर चौसठ कलाएं सीखीं थीं. उस समय तक्षशिला तथा नालंदा की तरह अवन्ती भी ज्ञान विज्ञान और संस्कृति का केंद्र थी. भगवान् श्री कृष्ण यहाँ स्लेट पर लिखे अंक धो कर मिटाते थे इसीलिए इसे अंकपात भी कहा जाता है. श्री मद्भागवत, महाभारत तथा अन्य कई पुरानों में यहाँ का वर्णन है. यहाँ स्थित कुंड में भगवान् श्री कृष्ण ने गुरूजी को स्नानार्थ गोमती नदी का जल सुगम कराया था इसलिए यह सरोवर गोमती कुंड कहलाया. यहाँ मंदिर में श्री कृष्ण, बलराम और सुदामा की मूर्तियाँ हैं. महर्षि सांदीपनी के वंशज आज भी उज्जैन में हैं तथा देश के प्रख्यात ज्योतिर्विदों के रूप में जाने जाते हैं. उत्खनन में इस क्षेत्र से चार हज़ार वर्ष से ज्यादा पुराने पाषाण अवशेष मिले हैं.

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त्रिवेणी नवग्रह शनि मन्दिर— उज्जैन-इन्दौर मार्ग पर आठ किलो मीटर दूरी पर शिप्रा, खान एवं सरस्वती नदी के संगम पर नवग्रह मन्दिर स्थित है। इसे त्रिवेणी भी कहा गया है। यहां नवग्रहों की शिवलिंग के रूप में पूजा की जाती है। 

 

 

 

 

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