जानिए क्या होता है मारकेश ?? मारकेश के प्रभाव ?? मारकेश का कारण ?? कैसे करें कुण्डली में मारकेश का अध्ययन ??

जानिए क्या होता है मारकेश ?? मारकेश के प्रभाव ?? 

मारकेश का कारण ?? 

कैसे करें कुण्डली में मारकेश का अध्ययन ??

प्रिय पाठकों/मित्रों, भारतीय ज्योतिष में ऐसे अनेक तरीके हैं जिनके द्वारा मृत्यु का पता लगाया जा सकता है | फिर भी मृत्यु के बारे में जानते हुए भी नहीं बताना चाहिए क्योंकि शास्त्रों में यह वर्जित है | किसी व्यक्ति को इस बारे में जानने का प्रयास भी नहीं करना चाहिए परन्तु फिर भी कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो उत्सुकतावश जानने के लिए अक्सर पूछते हैं की मेरी मृत्यु कब होगी, मेरी मृत्यु कैसे होगी, मेरी मृत्यु कहाँ होगी अस्तु |

मारकेश अर्थात-मरणतुल्य कष्ट या मृत्यु देने वाला वह ग्रह जिसे आपकी जन्मकुंडली में ‘मारक’ होने का अधिकार प्राप्त हैं। अलग-अलग लग्न के ‘मारक’ अधिपति भी अलग-अलग होते हैं। मारकेश की दशा जातक को अनेक प्रकार की बीमारी, मानसिक परेशानी, वाहन दुर्घटना, दिल का दौरा, नई बीमारी का जन्म लेना, व्यापार में हानि, मित्रों और संबंध‌ियों से धोखा तथा अपयश जैसी परेशानियां आती हैं।

जन्मकुण्डली का सामयिक विशलेषण करने के पश्चात ही यह ज्ञात हो सकता है कि व्यक्ति विशेष की जीवन अवधि अल्प, मध्यम अथवा दीर्घ है। जन्मांग में अष्टम भाव, जीवन-अवधि के साथ-साथ जीवन के अन्त के कारण को भी प्रदर्शित करता है। अष्टम भाव एंव लग्न का बली होना अथवा लग्न या अष्टम भाव में प्रबल ग्रहों की स्थिति अथवा शुभ या योगकारक ग्रहों की दृष्टि अथवा लग्नेश का लग्नगत होना या अष्टमेश का अष्टम भावगत होना दीर्घायु का द्योतक है।

मारकेश की दशा में व्यक्ति को सावधान रहना जरूरी होता है क्योंकि इस समय जातक को अनेक प्रकार की मानसिक, शारीरिक परेशनियां हो सकती हैं. इस दशा समय में दुर्घटना, बीमारी, तनाव, अपयश जैसी दिक्कतें परेशान कर सकती हैं. जातक के जीवन में मारक ग्रहों की दशा, अंतर्दशा या प्रत्यत्तर दशा आती ही हैं. लेकिन इससे डरने की आवश्यकता नहीं बल्कि स्वयं पर नियंत्रण व सहनशक्ति तथा ध्यान से कार्य को करने की ओर उन्मुख रहना चाहिए||

मारकेश-निर्णय के प्रसंग में यह सदैव ध्यान रखना चाहिए कि पापी शनि का मारक ग्रहों के साथ संबंध हो तो वह सभी मारक ग्रहों का अतिक्रमण कर स्वयं मारक हो जाता है। इसमें संदेह नहीं है। (1) पापी या पापकृत का अर्थ है पापफलदायक। कोई भी ग्रह तृतीय, षष्ठ, एकादश या अष्टम का स्वामी हो तो वह पापफलदायक होता है। ऐसे ग्रह को लघुपाराशरी में पापी कहा जाता है। मिथुन एवं कर्क लग्न में शनि अष्टमेश, मीन एवं मेष लग्न में वह एकादशेश, सिंह एवं कन्या लग्न में वह षष्ठेश तथा वृश्चिक एवं धनु लग्न में शनि तृतीयेश होता है। इस प्रकार मेष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, वृश्चिक, धनु एवं मीन इन आठ लग्नों में उत्पन्न व्यक्ति की कुंडली में शनि पापी होता है। इस पापी शनि का अनुच्छेद 45 में बतलाये गये मारक ग्रहों से संबंध हो तो वह मुख्य मारक बन जाता है। तात्पर्य यह है कि शनि मुख्य मारक बन कर अन्य मारक ग्रहों को अमारक बना देता है और अपनी दशा में मृत्यु देता है।

मारकेश ग्रह का निर्णय करने से पूर्व योगों के द्वारा अल्पायु, मध्यायु या दीर्घायु है, यह निश्चित कर लेना चाहिए क्योंकि योगों द्वारा निर्णीत आयु का समय ही मृत्यु का संभावना-काल है और इसी संभावना काल में पूर्ववर्णित मारक ग्रहों की दशा में मनुष्य की मृत्यु होती है। इसलिए संभावना-काल में जिस मारक ग्रह की दशा आती है वह मारकेश कहलाता है। इस ग्रंथ में आयु निर्णय के लिए ग्रहों को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया है-

1. मारक लक्षण 2. मारक एवं 3. मारकेश।

जो ग्रह कभी-कभी मृत्युदायक होता है उसे मारक लक्षण कहते हैं। जिन ग्रहों में से कोई एक परिस्थितिवश मारकेश बन जाता है वह मारक ग्रह कहलाता है और योगों के द्वारा निर्णीत आयु के सम्भावना काल में जिस मारक ग्रह की दशा-अंतर्दशा में जातक की मृत्यु हो सकती है वह मारकेश कहलाता है। 

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किस ग्रह को आपकी जन्मकुंडली में ‘मारक’ होने का अधिकार प्राप्त हैं  ??

मेष लग्न के लिए मारकेश शुक्र, वृषभ लग्न के लिये मंगल, मिथुन लगन वाले जातकों के लिए गुरु, कर्क और सिंह राशि वाले जातकों के लिए शनि मारकेश हैं कन्या लग्न के लिए गुरु, तुला के लिए मंगल, और वृश्चिक लग्न के लिए शुक्र मारकेश होते हैं, जबकि धनु लग्न के लिए बुध, मकर के लिए चंद्र, कुंभ के लिए सूर्य, और मीन लग्न के लिए बुध मारकेश नियुक्त किये गये हैं।सूर्य जगत की आत्मा तथा चंद्रमा अमृत और मन हैं इसलिए इन्हें मारकेश होने का दोष नहीं लगता इसलिए ये दोनों अपनी दशा-अंतर्दशा में अशुभता में कमी लाते हैं। मारकेश का विचार करते समय कुण्डली के सातवें भाव के अतिरिक्त, दूसरे, आठवें, और बारहवें भाव के स्वामियों और उनकी शुभता-अशुभता का भी विचार करना आवश्यक रहता है, सातवें भाव से आठवां द्वितीय भाव होता है जो धन-कुटुंब का भी होता हैं, इसलिए सूक्ष्म विवेचन करके ही फलादेश क‌िया जाता है।

शास्त्र में शनि को मृत्यु एवं यम का सूचक माना गया है। उसके त्रिषडायाधीय या अष्टमेश होने से उसमें पापत्व तथा मारक ग्रहों से संबंध होने से उसकी मारक शक्ति चरम बिंदु पर पहुंच जाती है। तात्पर्य यह है कि शनि स्वभावतः मृत्यु का सूचक है। फिर उसका पापी होना और मारक ग्रहों से संबंध होना- वह परिस्थिति है जो उसके मारक प्रभाव को अधिकतम कर देती है।

 इसीलिए मारक ग्रहों के संबंध से पापी शनि अन्य मारक ग्रहों को हटाकर स्वयं मुख्य मारक हो जाता है। इस स्थिति में उसकी दशा-अंतर्दशा मारक ग्रहों से पहले आती हो तो पहले और बाद में आती हो तो बाद में मृत्यु होती है। इस प्रकार पापी शनि अन्य मारक ग्रहों से संबंध होने पर उन मारक ग्रहों को अपना मारकफल देने का अवसर नहीं देता और जब भी उन मारक ग्रहों से आगे या पहले उसकी दशा आती है उस समय में जातक को काल के गाल में पहुंचा देता है।

बृहद्पाराशर होराशास्त्र के अनुसार आयु के तीन प्रमुख योग होते हैं-

1. अल्पायु, 2. मध्यमायु एवं 3. दीर्घायु। 13 वर्ष से 32 वर्ष तक अल्पायु, 33 से 64 वर्ष तक मध्यमायु तथा 65 से 100 वर्ष तक दीर्घायु मानी जाती है। सौ वर्ष से अधिक की आयु को उत्तमायु भी कह सकते हैं।

2 महर्षि पराशर का मत है कि बीस वर्ष तक आयु विचार नहीं करना चाहिए

3 क्योंकि इस समय में कुछ बालक पिता के, कुछ बालक माता के और कुछ अपने अनुचित कर्मों के प्रभाववश मर जाते हैं।

4 अपने अनुचित कर्मों का विचार करने के लिए अरिष्ट योगों का प्रतिपादन किया गया है। यद्यपि माता-पिता के अनुचित कर्मों का विचार भी अरिष्ट योगों द्वारा किया जा सकता है किंतु यह विचार बहुधा आनुमानिक होता है, पूर्ण प्रामाणिक नहीं। अतः बीस वर्ष की उम्र तक आयु का विचार नहीं करना चाहिए। बीस वर्ष की आयु हो जाने के बाद आयु का विचार किया जाता है जो इस प्रकार है- सर्वप्रथम अल्पायु, मध्यायु या दीर्घायु योगों के द्वारा जातक की आयु अल्प, मध्य या दीर्घ होगी, यह निर्धारित कर लेना चाहिए।

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बृहस्पति, शुक्र, पक्षबली चंद्रमा और शुभ प्रभावी बुध शुभ ग्रह माने गये हैं और शनि, मंगल, राहु व केतु अशुभ माने गये हैं। सूर्य ग्रहों का राजा है और उसे क्रूर ग्रह की संज्ञा दी गई है। बुध, चंद्रमा, शुक्र और बृहस्पति क्रमशः उत्तरोत्तर शुभकारी हैं, जबकि सूर्य, मंगल, शनि और राहु अधिकाधिक अशुभ फलदायी हैं। कुंडली के द्वादश भावों में षष्ठ, अष्टम और द्वादश भाव अशुभ (त्रिक) भाव हैं, जिनमें अष्टम भाव सबसे अशुभ है। षष्ठ से षष्ठ – एकादश भाव, तथा अष्टम से अष्टम तृतीय भाव, कुछ कम अशुभ माने गये हैं। 

अष्टम से द्वादश सप्तम भाव और तृतीय से द्वादश – द्वितीय भाव को मारक भाव और भावेशों को मारकेश कहे हैं। केंद्र के स्वामी निष्फल होते हैं परंतु त्रिकोणेश सदैव शुभ होते हैं। नैसर्गिक शुभ ग्रह केंद्र के साथ ही 3, 6 या 11 भाव का स्वामी होकर अशुभ फलदायी होते हैं। ऐसी स्थिति में अशुभ ग्रह सामान्य फल देते हैं। अधिकांश शुभ बलवान ग्रहों की 1, 2, 4, 5, 7, 9 और 10 भाव में स्थिति जातक को भाग्यशाली बनाते हैं। 2 और 12 भाव में स्थित ग्रह अपनी दूसरी राशि का फल देते हैं। 

शुभ ग्रह वक्री होकर अधिक शुभ और अशुभ ग्रह अधिक बुरा फल देते हैं राहु व केतु यदि किसी भाव में अकेले हों तो उस भावेश का फल देते हैं। परंतु वह केंद्र या त्रिकोण भाव में स्थित होकर त्रिकोण या केंद्र के स्वामी से युति करें तो योगकारक जैसा शुभ फल देते हैं। लग्न कुंडली में उच्च ग्रह शुभ फल देते हैं, और नवांश कुंडली में भी उसी राशि में होने पर ‘वर्गोत्तम’ होकर उत्तम फल देते हैं। बली ग्रह शुभ भाव में स्थित होकर अधिक शुभ फल देते हैं। पक्षबलहीन चंद्रमा मंगल की राशियों, विशेषकर वृश्चिक राशि में (नीच होकर) अधिक पापी हो जाता है। चंद्रमा के पक्षबली होने पर उसकी अशुभता में कमी आती है। स्थानबल हीन ग्रह और पक्षबल हीन चंद्रमा अच्छा फल नहीं देते।

विभिन्न लग्नों के भिन्न भिन्न मारकेश होते हैं यहां एक बात और समझने की है कि सूर्य व चंद्रमा को मारकेश का दोष नहीं लगता है. मेष लग्न के लिये शुक्र मारकेश होकर भी मारकेश का कार्य नहीं करता किंतु शनि और शुक्र मिलकर उसके साथ घातक हो जाते हैं. वृष लगन के लिये गुरु , मिथुन लगन वाले जातकों के लिये मंगल और गुरु अशुभ है, कर्क लगन के लिये शुक्र, सिंह लगन के लिये शनि और बुध, कन्या लगन के लिये मंगल, तुला लगन के लिए मंगल, गुरु और सूर्य, वृश्चिक लगन के लिए बुध, धनु लग्न का मारक शनि, शुक्र, मकर लगन के लिये मंगल, कुंभ लगन के लिये गुरु, मंगल, मीन लगन के लिये मंगल, शनि मारकेश का काम करता है. छठे आठवें बारहवें भाव मे स्थित राहु केतु भी मारक ग्रह का काम करते है.

यह आवश्यक नहीं की मारकेश ही मृत्यु का कारण बनेगा अपितु वह मृत्यु तुल्य कष्ट देने वाला हो सकता है अन्यथ और इसके साथ स्थित ग्रह जातक की मृत्यु का कारण बन सकता है. मारकेश ग्रह के बलाबल का भी विचार कर लेना चाहिए. कभी-कभी मारकेश न होने पर भी अन्य ग्रहों की दशाएं भी मारक हो जाती हैं. इसी प्रकार से मारकेश के संदर्भ चंद्र लग्न से भी विचार करना आवश्यक होता है. यह विचार राशि अर्थात जहां चंद्रमा स्थित हो उस भाव को भी लग्न मानकर किया जाता है. उपर्युक्त मारक स्थानों के स्वामी अर्थात उन स्थानों में पड़े हुए क्रमांक वाली राशियों के अधिपति ग्रह मारकेश कहे जाते हैं ||

सामान्य मान्यता के विपरीत यहां आपने देखा कि नैसर्गिक शुभ ग्रह तो प्रबल मारकेश की स्थिति पैदा करने में सक्षम हैं, जबकि वहीं क्रूर व पापी ग्रहों में मारकेशत्व की क्षमता कम होती है। 

जबकि कथित ज्योतिर्विदों ने राहु, केतु, मंगल तथा शनि को प्रबल मारकेश बताते हुए जनता को हमेशा ही ठगने का काम किया है।

उपरोक्त सिद्धांत अनुसार मारक की स्थिति :—

१)२,७,१२ मारक स्थान हे (बहुत से ज्योतिषी 12वें भाव को मारक नहीं मानते, पर कई अन्य मानते हैं)

२)मारक स्थान के अधिपति मारक बनते हे ||

३)मारक स्थान स्थित ग्रह मारक बनते हे ||

४)द्वितीयेश ,सप्तमेश युक्त ग्रह मारक बनते हे ||

५)पाप ग्रह मारक ग्रह से द्रष्ट या युक्त हो तो मारक बनते हे ||

६)द्वितीयेश /सप्तमेश चन्द्र या सूर्य हो तो मारक नही बनते..||

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स्‍त्री पुरूष मारकेश की दशा में क्‍या करें :=

इसके अशुभ प्रभाव से बचने के लिए सरल और आसान तरीका है कि कुंडली के सप्तम भाव में यदि पुरुष राशि हो तो शिव की तथा स्त्री हों तो शक्ति की आराधना करें। संबंधित ग्रह का चार गुना मंत्र, महामृत्युंजय जाप, एवं रुद्राभिषेक करना इस दशा शांति के सरल उपाय हैं।

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आयु निर्णय का एक महत्वपूर्ण सूत्र—-

महर्षि पाराशन ने प्रत्येक ग्रह को निश्चित आयु पिंड दिये है,सूर्य को १८ चन्द्रमा को २५ मंगल को १५ बुध को १२ गुरु को १५ शुक्र को २१ शनि को २० पिंड दिये गये है उन्होने राहु केतु को स्थान नही दिया है। जन्म कुंडली मे जो ग्रह उच्च व स्वग्रही हो तो उनके उपरोक्त वर्ष सीमा से गणना की जाती है। जो ग्रह नीच के होते है तो उन्हे आधी संख्या दी जाती है,सूर्य के पास जो भी ग्रह जाता है अस्त हो जाता है उस ग्रह की जो आयु होती है वह आधी रह जाती है,परन्तु शुक्र शनि की पिंडायु का ह्रास नही होता है,शत्रु राशि में ग्रह हो तो उसके तृतीयांश का ह्रास हो जाता है।

इस प्रकार आयु ग्रहों को आयु संख्या देनी चाहिये। पिंडायु वारायु एवं अल्पायु आदि योगों के मिश्रण से आनुपातिक आयु वर्ष का निर्णय करके दशा क्रम को भी देखना चाहिये। मारकेश ग्रह की दशा अन्तर्दशा प्रत्यंतर दशा में जातक का निश्चित मरण होता है। उस समय यदि मारकेश ग्रह की दशा न हो तो मारकेश ग्रह के साथ जो पापी ग्रह उसकी दशा में जातक की मृत्यु होगी। ध्यान रहे अष्टमेश की दशा स्वत: उसकी ही अन्तर्द्शा मारक होती है। व्ययेश की दशा में धनेश मारक होता है,तथा धनेश की दशा में व्ययेश मारक होता है। इसी प्रकार छठे भाव के मालिक की दशा में अष्टम भाव के ग्रह की अन्तर्दशा मारक होती है। मारकेश के बारे अलग अलग लगनो के सर्वमान्य मानक इस प्रकार से है।

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ज्योतिष शास्त्र में आयु के विभिन्न मानदंड—-

आयुष्य निर्णय पर ज्योतिष शास्त्र के सर्वमान्य सूत्रों के संकलन उदाहरण जैमिनी सूत्र की तत्वादर्शन नामक टीका में मिलता है। 

महर्षि मैत्रेय ने ऋषि पाराशर से जिज्ञासा वश प्रश्न किया कि हे मुन्हे आयुर्दाय के बहुत भेद शास्त्र में बतलाये गये है कृपाकर यह बतलायें कि आयु कितने प्रकार की होती है और उसे कैसे जाना जाता है,इस ज्योतिष के मूर्तिमंत स्वरूप ऋषि पराशन बोले –

बालारिष्ट योगारिष्ट्मल्पमध्यंच दीर्घकम।

दिव्यं चैवामितं चैवं सत्पाधायु: प्रकीर्तितम॥

हे विप्र आयुर्दाय का वस्तुत: ज्ञान होना तो देवों के लिये भी दुर्लभ है फ़िर भी बालारिष्ट योगारिष्ट अल्प मध्य दीर्घ दिव्य और अस्मित ये सात प्रकार की आयु संसार में प्रसिद्ध है।

बालारिष्ट—-

ज्योतिष शास्त्र में जन्म से आठ वर्ष की आयुपर्यंत होने वाली मृत्यु को बालारिष्ट कहा गया है। यथा लग्न से ६ ८ १२ में स्थान में चन्द्रमा यदि पाप ग्रहों से द्र्ष्ट हो तो जातक का शीघ्र मरण होता है। सूर्य ग्रहण या चन्द्र ग्रहण का समय हो सूर्य चन्द्रमा राहु एक ही राशि में हों तथा लग्न पर शनि मंगल की द्रिष्टि हो तो जातक पन्द्रह दिन से अधिक जीवित नही रहता है,यदि दसवें स्थान में शनि चन्द्रमा छठे एवं सातवें स्थान में मंगल हो तो जातक माता सहित मर जाता है। उच्च का का या नीच का सूर्य सातवें स्थान में हो चन्द्रमा पापपीडित हो तो उस जातक को माता का दूध नही मिलता है वह बकरी के दूध से जीता है या कृत्रिम दूध पर ही जिन्दा रहत है। इसी प्रकार लग्न से छठे भाव में चन्द्रमा लग्न में शनि और सप्तम में मंगल हो तो सद्य जात बालक के पिता की मृत्यु हो जाती है।

इस प्रकार अनेक बालारिष्ट योगिं का वर्णन शास्त्र में मिलता है। गुणीजन बालारिष्ट से बचने का उपाय चांदी का चन्द्रमा मोती डालकर प्राण प्रतिष्ठा करके बालक के गले में पहनाते है क्योंकि चन्द्रमा सभी चराचर जीव की माता माना गया है। जिस प्रकार मां सभी अरिष्टों से अपनी संतान की रक्षा करती है उसी प्रकार से चन्द्रमा बालारिष्ट के कुयोगों से जातक की रक्षा करता है।

पित्रोर्दोषैर्मृता: केचित्केचिद बालग्रहैरपि।

अपरे रिष्ट योगाच्च त्रिविधा बालमृत्यव:॥

शास्त्रकारों ने यह स्पष्ट घोषणा की है कि जन्म से चार वर्षों के भीतर जो बालक मरता है उसकी मृत्यु माता के कुकर्मों व पापों के कारण होती है। चार से आठ वर्ष के भीतर की मौत पिता के कुकर्मों व पाप के कारण होती है,नौ से बारह वर्ष के भीतर की मृत्यु जातक के स्वंय के पूर्वजन्म कृत पाप के कारण होती है,और आठ वर्ष बाद जातक का स्वतंत्र भाग्योदय माना जाता है। इसलिये कई सज्जन बालक की सांगोपांग जन्म पत्रिका आठ वर्ष बाद ही बनाते है।

योगारिष्ट—–

आठ के बाद बीस वर्ष के पहले की मृत्यु को योगारिष्ट कहा जाता है चूंकि विशेष योग के कारण अरिष्ट होती है अत: इसे योगारिष्ट कहा जाता है।

अल्पायु योग—

बीस से बत्तिस साल की आयु को अल्पायु कहा है। मोटे तौर पर वृष तुला मकर व कुंभ लगन वाले जातक यदि अन्य शुभ योग न हो तो अल्पायु होते है। यदि लग्नेश चर मेष कर्क तुला मकर राशि में हो तो अष्टमेश द्विस्वभाव मिथुन कन्या धनु मीन राशि में हो तो अल्पायु समझना चाहिये। लगनेश पापग्रह के साथ यदि ६ ८ १२ भाव में हो तो जातक अल्पायु होता है। यदि लगनेश व अष्टमेश दोनो नीच राशिगत अस्त निर्बल यो तो अल्पायु योग होता है। दूसरे और बारहवे भाव में पापग्रह हो केन्द्र में पापग्रह हो लगनेश निर्बल हो उन पर शुभ ग्रहों की द्रिष्टि नही हो तो जातक को अल्पायु समझना चाहिये। इसी प्रकार यदि जन्म लगनेश सूर्य का शत्रु हो जातक अल्पायु माना जाता है।

यदि लग्नेश तथा अष्टमेश दोनो ही स्थिर राशि में हो तो जातक अल्पायु होता है। इसी प्रकार शनि और चन्द्रमा दोनो स्थिर राशि में हो अथवा एक चर और दूसरा द्विस्वभाव राशि में हो तो जातक अल्पायु होता है। यदि जन्म लगन तथा होरा लगन दोनो ही स्थिर राशि की हों अथवा एक चर व दूसरे द्विस्वभाव राशि की हो तो जातक अल्पायु होता है। यदि चन्द्रमा लग्न द्रिष्काण दोनो ही स्थिर राशि हो तो जातक अल्पायु होता है। यदि चन्द्रमा लगन द्रिषकाण में एक की चर और दूसरे की द्विस्वभाव राशि तो भी जातक अल्पायु होता है। शुभ ग्रह तथा लग्नेश यदि आपोक्लिम ३ ६ ८ १२ में हो तो जातक अल्पायु होता है। जिस जातक की अल्पायु हो वह विपत तारा में मृत्यु को पाता है।

मध्यायु योग—

बत्तिस वर्ष के बाद एवं ६४ वर्ष की आयु सीमा को मध्यायु के भीतर लिया गया है। यदि लग्नेश सूर्य का सम ग्रह बुध हो अर्थात मिथुन व कन्या लग्न वालों की प्राय: मध्यम आयु होती है। यदि लग्नेश तथा अष्टमेश में से एक चर मेष कर्क तुला मकर तथा दोसोअरा स्थिर यानी वृष सिंह वृश्चिक कुंभ राशि में हो तो जातक मध्यायु होता है। यदि लगनेश व अष्टमेश दोनो ही द्विस्वभाव राशि में हो तो जातक की मध्यम आयु होती है। यदि चन्द्रमा तथा द्रेषकाण में एक की चर राशि तथा दूसरे की स्थिर राशि हो तो जातक मध्यामायु होता है। यदि शुभ ग्रह पणफ़र यानी २ ५ ८ ११ में हो तो जातक की मध्यमायु होती है। मध्यायु प्रमाण वाले जातक की मृत्यु प्रत्यरि तारा में होती है।

दीर्घायु योग—-

६४ से १२० साल के मध्य को दीर्घायु कहा जाता है। यदि जन्म लगनेश सूर्य का मित्र होता है तो जातक की दीर्घायु मानी जाती है। लगनेश और अष्टमेश दोनो ही चर राशि में हो तो दीर्घायु योग माआ जाता है।यदि लगनेश और अष्टमेश दोनो में एक स्थिर और एक द्विस्वभाव राशि में हो तो भी दीर्घायु योग का होना माना जाता है। यदि शनि और चन्द्रमा दोनो ही चर राशि में हो अथवा एक चर राशि में और दूसरा द्विस्वभाव राशि में हो तो दीर्घायु होग होता है। यदि जन्म लगन तथा होरा लग्न दोनो ही चर राशि की हो अथवा एक स्थिर व दूसरी द्वस्वभाव राशि की हो तो जातक दीर्घायु होता है। यदि चन्द्रमा तथा द्रेषकाण दोनो की चर राशि हो तो जातक दीर्घायु होता है यदि शुभ ग्रह तथा लगनेश केंद्र में हो तो जातक दीर्घायु होता है। लगनेश केन्द्र में गुरु शुक्र से युत या द्र्ष्ट हो तो भी पूर्णायु कारक योग होता है,लगनेश अष्टमेश सहित तीन ग्रह उच्च स्थान में हो तथा आठवां भाव पापग्रह रहित हो तो जातक का पूर्णायु का योग होता है। लगनेश पूर्ण बली हो तथा कोई भी तीन ग्रह उच्च स्वग्रही तथा मित्र राशिस्थ होकर आठवें में हो तो जातक की पूर्णायु होती है।

दिव्यायु—

सब शुभ ग्रह केन्द्र और त्रिकोण में हो और पाप ग्रह ३ ६ ११ में हो तथा अष्टम भाव में शुभ ग्रह की राशि हो तो दिव्य आयु का योग होता है। ऐसा जातक यज्ञ अनुष्ठान योग और कायाकल्प क्रिया से हजार वर्ष तक जी सकता है।

अमित आयु योग—

यदि गुरु गोपुरांश यानी अपने चतुर्वर्ग में होकर केन्द्र में हो शुक्र पारावतांश यानी अपने षडवर्ग में एवं कर्क लगन हो तो ऐसा जातक मानव नही होकर देवता होता है,उसकी आयु की कोई सीमा नही होती है वह इच्छा मृत्यु का कवच पहिने होता है।

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वार से आयु की गणना करना—

मानसागरी व अन्य प्राचीन जातक ग्रंथो मे वारायु की गणना दी गयी है। उनके अनुसार रविवार का जन्म हो तो जातक ६० साल जियेगा परन्तु जन्म से पहला छठा और बाइसवां महिने में घात होगा,सोमवार का जन्म हो तो जातक ८४ साल जिन्दा रहेगा लेकिन ग्यारहवे सोलहवे और सत्ताइसवे साल में पीडा होगी मंगलवार को जन्म लेने वाला जातक चौहत्तर साल जियेगा,लेकिन जन्म से दूसरे व बाइसवें वर्ष में पीडा होगी,बुधवार को जन्म लेने वाला जातक चौसठ साल जियेगा,लेकिन आठवें महिने और साल में घात होगी,गुरुवार को जन्म लेने वाले जातक की उम्र चौरासी साल होती है लेकिन सात तेरह और सोलह साल में कष्ट होता है,शुक्रवार को जन्म लेकर जातक ६० साल जिन्दा रहता है,शनिवार का जन्म हो तो तेरहवे साल में कष्ट पाकर सौ साल के लिये उसकी उम्र मानी जाती है

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जन्मकुंडली में जन्म लग्न आपके शरीर का परिचायक है और अष्टम भाव से मृत्यु के बारे में जाना जा सकता है | अष्टम से अष्टम भाव यानी तीसरा भाव मारकेश का होता है | यदि व्यक्ति की मृत्यु अस्वाभाविक होती है तो मारकेश का योगदान निश्चित है | मारकेश का पता दुसरे भाव से भी लगाया जा सकता है क्योंकि दूसरा घर भी मारकेश का होता है और साथ ही सातवां भाव भी मारकेश की स्थिति दर्शाता है |

सूर्य और चन्द्र लग्न से भी देखना चाहिए कि अष्टम भाव कैसा है | उसकी क्या दशा है | दूसरा, तीसरा, सातवाँ और ग्यारहवां भाव भी ध्यान से देखना चाहिए | केवल जन्म लग्न से की गई गणना गलत साबित हो सकती है | जन्म लग्न, चन्द्र लग्न और सूर्य लग्न तीनों कमजोर हों तो व्यक्ति अल्पायु होता है | इसके अतिरिक्त यदि अष्टमेश भी कमजोर हो तो निस्संदेह व्यक्ति अल्पायु होता है | यदि किसी शुभ ग्रह की दृष्टि लग्न और लग्नेश पर हो तो आयु में कुछ इजाफा तो होता है परन्तु व्यक्ति अल्पायु ही रहता है | अब यह सब व्यक्ति के ग्रहों के बलाबल पर निर्भर करता है कि व्यक्ति की आयु क्या होगी |

हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार भी आयुनिर्णय किया जा सकता है | मेरे विचार में मणिबंध इसमें विशेष भूमिका निभाता है | यदि जीवनरेखा कमजोर हो छोटी हो तो भी व्यक्ति ७० वर्ष की उम्र को पार कर सकता है यदि मंगल रेखा बलवान हो | मेरे विचार में जीवन रेखा से अधिक महत्वपूर्ण मंगल रेखा होती है जो आपको जीवन में कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है | स्वास्थ्य में गिरावट नहीं आने देती और व्यक्ति बीमार कम पढता है | यदि बीमार होता भी है तो कुछ समय के बाद ठीक हो जाता है | मंगल रेखा बलवान हो तो व्यक्ति जीवनपर्यंत निरोगी रहता है और जब मरता है तब मृत्यु स्वाभाविक होती है | सब मणिबंध और मंगल रेखा पर निर्भर है | हाँ यदि हार्ट अटैक की बात करें तो हृदय रेखा का आंकलन अनिवार्य है |

मृत्यु तो एक सच्चाई है जो एक शाश्वत सत्य है | मरने से डरने वाले लोग अक्सर मरने की तारीख जानकार जल्दी न मर जाएँ इसलिए इस तरह के सवालों के जवाब नहीं दिए जाते | कम से कम पाठक मुझसे यह अपेक्षा मत करें कि पूछने पर मैं आयु बता दूंगा | इस सन्दर्भ में और अधिक जानकारी के लिए यदि पाठकों के पत्र या ईमेल आयेंगे तो और संक्षेप में बताने की चेष्टा करूंगा | फिलहाल इस लेख के द्वारा मेरा पाठकों से निवेदन है कि यदि किसी बंधू को लगता हो की वह अल्पायु है तो उपायों द्वारा समाधान करके एक प्रयास किया जा सकता है | मृत्यु को नहीं हराया जा सकता परन्तु अकाल मृत्यु से बचा अवश्य जा सकता है |

मारक ग्रहों की दशा, अंतर्दशा या प्रत्यत्तर दशा  में उपाय :—

—शिव आराधना से लाभ मिलना है.

—मारक ग्रहों की दशा मे उनके उपाय करना चाहिए.

—महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए। महामृत्युंजय मंत्र इस प्रकार है:–

ॐ हौं ॐ जूं ॐ स: भूर्भुव: स्वःत्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्।

उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतातॐ भूर्भुव: स्वः ॐ जूं स: हौं ॐ।।

—-इस विषय में राम रक्षा स्त्रोत, महामृत्युंजय मन्त्र, लग्नेश और राशीश के मन्त्रों का अनुष्ठान और गायत्री मन्त्रों द्वारा आयु में कुछ वृद्धि की जा सकती है  ऐसा मेरा मानना है |

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किसी किसी की पत्रिका में षष्ठ भाव व अष्टमेश का स्वामी भी अशुभ ग्रहों के साथ हो तो ऐसे योग बनते हैं। 

वाहन से दुर्घटना के योग के लिए शुक्र जिम्मेदार होगा। लोहा या मशीनरी से दुर्घटना के योग का जिम्मेदार शनि होगा। आग या विस्फोटक सामग्री से दुर्घटना के योग के लिए मंगल जिम्मेदार होगा। चौपायों से दुर्घटनाग्रस्त होने पर शनि प्रभावी होगा। वहीं अकस्मात दुर्घटना के लिए राहु जिम्मेदार होगा। अब दुर्घटना कहाँ होगी? इसके लिए ग्रहों के तत्व व उनका संबंध देखना होगा।

· षष्ठ भाव में शनि शत्रु राशि या नीच का होकर केतु के साथ हो तो पशु द्वारा चोट लगती है।

· षष्ठ भाव में मंगल हो व शनि की दृष्टि पड़े तो मशीनरी से चोट लग सकती है।

· अष्टम भाव में मंगल शनि के साथ हो या शत्रु राशि का होकर सूर्य के साथ हो तो आग से खतरा हो सकता है।

· चंद्रमा नीच का हो व मंगल भी साथ हो तो जल से सावधानी बरतना चाहिए।

· केतु नीच का हो या शत्रु राशि का होकर गुरु मंगल के साथ हो तो हार्ट से संबंधित ऑपरेशन हो सकता है।

· ‍शनि-मंगल-केतु अष्टम भाव में हों तो वाहनादि से दुर्घटना के कारण चोट लगती है।

· वायु तत्व की राशि में चंद्र राहु हो व मंगल देखता हो तो हवा में जलने से मृत्यु भय रहता है।

· अष्टमेश के साथ द्वादश भाव में राहु होकर लग्नेश के साथ हो तो हवाई दुर्घटना की आशंका रहती है।

· द्वादशेश चंद्र लग्न के साथ हो व द्वादश में कर्क का राहु हो तो अकस्मात मृत्यु योग देता है।

· मंगल-शनि-केतु सप्तम भाव में हों तो उस जातक का जीवनसाथी ऑपरेशन के कारण या आत्महत्या के कारण या किसी घातक हथियार से मृत्यु हो सकती है।

· अष्टम में मंगल-शनि वायु तत्व में हों तो जलने से मृत्यु संभव है।

· सप्तमेश के साथ मंगल-शनि हों तो दुर्घटना के योग बनते हैं।

इस प्रकार हम अपनी पत्रिका देखकर दुर्घटना के योग को जान सकते हैं। यह घटना द्वितीयेश मारकेश की महादशा में सप्तमेश की अंतरदशा में अष्टमेश या षष्ठेश के प्रत्यंतर में घट सकती है। 

उसी प्रकार सप्तमेश की दशा में द्वितीयेश के अंतर में अष्टमेश या षष्ठेश के प्रत्यंतर में हो सकती है। जिस ग्रह की मारक दशा में प्रत्यंतर हो उससे संबंधित वस्तुओं को अपने ऊपर से नौ बार विधिपूर्वक उतारकर जमीन में गाड़ दें यानी पानी में बहा दें तो दुर्घटना योग टल सकता है।

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लग्नों के  मारकेश :—

मेष लग्न मारकेश :शनि और शुक्र। 

वृष लग्न :गुरु। 

मिथुन लग्न :मंगल और गुरु।  

कर्क लग्न : शुक्र। 

सिंह लग्न : शनि और बुध.

कन्या लग्न :मंगल।

तुला लग्न : मंगल। 

वृश्चिक लग्न : बुध.

धनु लग्न: शनि, शुक्र।

मकर लगन :मंगल।

कुंभ लग्न :गुरु, मंगल।

मीन लगन : मंगल, शनि। 

मारक ग्रहों की दशा, अंतर्दशा या प्रत्यत्तर दशा  में : मानसिक, शारीरिक , दुर्घटना, बीमारी, तनाव, अपयश जैसी परेशानी  आ सकती हैं. मृत्यु तुल्य कष्ट  हो सकता है 

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मारकेश विचार—-

मनुष्य का जन्मांग चक्र बारह खानों में विभाजित है, जिन्हें स्थान कहते हैं। जन्मांग चक्र के अष्टम स्थान से आयु का विचार किया जाता है और उस अष्टम स्थान से जो अष्टम स्थान अर्थात लग्न से तृतीय स्थान भी आयु स्थान होता है। इस प्रकार प्रत्येक कुंडली में लग्न से अष्टम स्थान और तृतीय स्थान आयु के स्थान होते हैं। इन स्थानों के व्यय स्थान अर्थात सप्तम और द्वितीय स्थान मृत्यु स्थान या मारक स्थान कहलाता है। यह विचार राशि अर्थात जहां चंद्रमा स्थित हो उस भाव को भी लग्न मानकर किया जाना चाहिए। उपर्युक्त मारक स्थानों के स्वामी अर्थात उन स्थानों में पड़े हुए क्रमांक वाली राशियों के अधिपति ग्रह मारकेश कहे जाते हैं। लग्न स्थान शरीर का विचार करता है।

इस दृष्टि से लग्न के भी व्यय स्थान अर्थात बारहवें भाव को भी मारक कहा गया है। जातक के जन्म समय में पूर्वी क्षितिज में स्थित राशि के आधार पर लग्न का तथा उस समय उपस्थित नक्षत्र के आधार पर जन्म राशि का निर्धारण किया जाता है। मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ, मीन राशियों के स्वामी क्रमश: मंगल, शुक्र, बुध, चंद्र, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, शनि, गुरु होते हैं, जिनमें सूर्य, मंगल, शनि पाप ग्रह और गुरु तथा शुक्र शुभ माने जाते हैं, जबकि बुध पाप ग्रहों का सहचारी होने से या पापयुक्त होने से पापग्रह और बिना पापग्रहों के साथ-साथ के शुभ ग्रह होता है। इसी प्रकार चंद्रमा भी क्षीण होने पर पाप ग्रह और बलवान या पूर्व होने पर शुभ ग्रह है।

दशा विचार की दृष्टि से बिना पापयुक्त शुभ ग्रह और पूर्ण चंद्र केंद्राधिपति (कुंडली के प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और दशम स्थानों के स्वामी) होने पर पापप्रद हो जाते हैं। इसी प्रकार पापग्रह केंद्राधिपति होने पर शुभ हो जाते हैं। त्रिकोण स्थानों पंचम, नवम स्थानों के स्वामी सदैव शुभ ग्रह तीन, छह, ग्यारह स्थानों के स्वामी पाप ग्रह होते हैं। सूर्य और चंद्रमा को छोड़कर अष्टमेश पाप ग्रह होता है, किंतु यदि वह लग्नेश भी हो तो पाप ग्रह नहीं होता है। त्रिकोणेशों में पंचमेश विशेष बलवान होता है और केंद्रेशों में लग्न, चतुर्थ, सप्तम और दशम के स्वामी क्रमश: बलवान होते हैं। इस प्रकार मंगल और शुक्र अष्टमेश होने पर भी पाप ग्रह नहीं होते, सप्तम स्थान मारक, केंद्र स्थान है। अत: गुरु या शुक्र आदि सप्तम स्थान के स्वामी हों तो वह प्रबल मारक हो जाते हैं। इनसे कम बुध और चंद्र सबसे कम मारक होता है। शनि के मारक से संबद्ध मात्र होने से ही मारकत्व में प्रबलता आ जाती है।

तीनों मारक स्थानों में द्वितीयेश के साथ वाला पाप ग्रह सप्तमेशके साथ वाले पाप ग्रह से अधिक द्वितीय भाव में स्थित पाप ग्रह सप्तम भाव में स्थित पाप ग्रह से अधिक, किंतु सप्तमेश के साथ रहने वाले पाप ग्रह से कम इसी प्रकार द्वितीयेश सप्तमेश से अधिक किंतु सप्तमस्थ पाप ग्रह से कम होता है। इसके अतिरिक्त द्वादशेश और उसके साथ वाले पापग्रह षष्ठेश एवं एकादशेश भी कभी-कभी मारकेश होते हैं। इस प्रकार पाप ग्रह का मारकत्व सबसे कम तदनंतर षष्ठेश एवं एकदाशेश, तृतीयेश, अष्टमेश द्वादशस्य पाप ग्रह द्वादशेश, सप्तमेश द्वितीयेश सप्तमस्थ पाप ग्रह और द्वितीयस्थ पाप ग्रह फिर सप्तमेश के साथी पाप ग्रह तथा अंत में द्वितीयेश के साथ वाले पाप ग्रह क्रमश: बलवान होते हैं।

मारकेश के द्वितीय भाव सप्तम भाव की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली हैं और इसके स्वामी से भी ज्यादा उसके साथ रहने वाला पापग्रह। स्वामी तो महत्वपूर्ण है ही, किंतु उसके साथी पाप ग्रहों का भी निर्णय विचार पूर्वक करना चाहिए। सामान्यतया यह समझा जाता है कि मारकेश जातक की मृत्यु के कारण होते हैं, किंतु मारकेश द्वारा सूचित मृत्यु यदि जातक की आयु हो तो मृत्यु तुल्य कष्ट के भी परिचायक होते हैं। चाहें तो शारीरिक या भयानक अपमान आदि के द्वारा मानसिक ही क्यों न हों। इसलिए मारकेश विचार के साथ-साथ जातक की आयु के संबंध में भी विचार कर लेना चाहिए। जैमिनीय मतानुसार चक्र का प्रयोग किया जा सकता है। यदि आयु विचार से आयु है तो मारकेश मारक नहीं होगा साथ ही जातक से संबद्ध पुत्र- पत्नी पिता आदि के जन्मांगों से भी जातक के संबंधानुसार उसकी आयु का विचार कर लेना चाहिए। इतना ही नहीं मारकेश ग्रह के बलाबल का भी विचार कर लेना चाहिए कि कौन सा ग्रह मारकेश के दोष का शमन कर सकता है जैसा कि कहा गया है कि राहु के दोष को बुध इन दोनों के दोष को शनि तथा राहु, बुध, शनि तीनों के दोषों का मंगल, मंगल समेत चारों के दोष को शुक्र, पांचों के दोष को गुरू, गुरू समेत छहों के दोष को चंद्रमा और सभी के दोष को उत्तरायण का सूर्य दूर करने में सहायक होता है। इस संदर्भ में ग्रहों की विफलता भी विचारणीय है। सूर्य के सहित चंद्र चतुर्थ भाव में बुध, पंचम में बृहस्पति, षष्ठ में शुक्र और द्वितीय में मंगल, सप्तम भाव में स्थित चंद्रमा विफल होता है।

कभी-कभी मारकेश न रहने पर भी अन्य ग्रहों की दशाएं भी मारक हो जाती हैं जैसे – केतु, शुक्र, मंगल, बुध की महादशा में जन्म लेने वालों के लिए क्रमश: मंगल,वृहस्पति और राहु की दशाएं मृत्यु कारक होती हैं। मारकेश के निवारण हेतु मारक ग्रह का दान, जप एवं आयुष्य कारक ग्रह के रत्न धारण महामृत्युंजय एवं चंडी के प्रयोग बताए गए हैं। ज्योतिष शास्त्र में कथितु आयु औसत आयु होती है जो सत्कर्म से बढ़ती है और दुष्कर्म से ह्रास को प्राप्त होती है। कृपा चाहे वह गुरु की हो या इष्ट की, ज्योतिषी और जातक दोनों को ही प्रभावित करने वाली होती है, इसलिए वह शास्त्रीय विचार से भी सर्वोपरि है।

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मारकेश की दशा आने से पहले बरतें सावधानी—-

फलित ज्योतिष के अनुसार किसी भी जातक के जीवन में ‘मारकेश’ ग्रह की दशा के मध्य घटने वाली घटनाओं की सर्वाधिक सटीक एवं सत्य भविष्यवाणी की जा सकती है, क्योंकि मारकेश वह ग्रह होता है जिसका प्रभाव मनुष्य के जीवन में शत-प्रतिशत घटित होता है | यह दशा जीवन में कभी भी आये चाहे जीतनी बार आये, व्यक्ति के जीवन में अपनी घटनाओं से अमिट छाप छोड़ ही जाती हैं | 

मैंने ऐसे हज़ारों जातकों की जन्मकुंडलिओं का विवेचन किया है, और पाया कि जिन-जिन लोंगों को मारकेश की दशा लगी वै कहीं न कहीं अधिक परेशानी में दिखें | मारकेश अर्थात- मरणतुल्य कष्ट देने वाला वह ग्रह जिसे आपकी जन्मकुंडली में ‘मारक’ होने का अधिकार प्राप्त है, आपको सन्मार्ग से भटकने से रोकने के लिए सत्य एवं निष्पक्ष कार्य करवाने और न करने पर प्रताड़ित करने का अधिकार प्राप्त है |

कुंडली में अलग-अलग लग्न में जन्म लेने वाले जातकों के ‘मारक’ अधिपति भी अलग-अलग होते हैं ! इनमे मेष लग्न के लिये मारकेश शुक्र, वृषभ लग्न के लिये मंगल, मिथुन लगन वाले जातकों के लिए गुरु, कर्क और सिंह राशि वाले जातकों के लिए शनि मारकेश हैं, कन्या लग्न के लिए गुरु, तुला के लिए मंगल, और बृश्चिक लग्न के लिए शुक्र मारकेश होते हैं, जबकि धनु लग्न के लिए बुध, मकर के लिए चंद्र, कुंभ के लिए सूर्य, और मीन लग्न के लिए बुध मारकेश नियुक्त किये गये हैं | 

सूर्य जगत की आत्मा तथा चंद्रमा अमृत और मन हैं इसलिए इन्हें मारकेश होने का दोष लगता इसलिए ये दोनों अपनी दशा-अंतर्दशा में अशुभता में कमी लाते हैं | मारकेश का विचार करते समय कुण्डली के सातवें भाव के अतिरिक्त, दूसरे, आठवें, और बारहवें भाव के स्वामियों और उनकी शुभता-अशुभता का भी विचार करना आवश्यक रहता है, सातवें भाव से आठवाँ द्वितीय भाव होता है जो धन-कुटुंब का भी होता है इसलिए सूक्ष्म विवेचन करके ही फलादेश कहना चाहिए | 

मारकेश की दशा जातक को अनेक प्रकार की बीमारी, मानसिक परेशानी, वाहन दुर्घटना, दिल का दौरा, नई बीमारी का जन्म लेना, व्यापार में हानि, मित्रों और सम्बन्धियों से धोखा तथा अपयश जैसी परेशानियाँ आती हैं | 

इसके के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए सरल और आसान तरीका है, कि कुंडली के सप्तम भाव में यदि पुरुष राशि हो तो शिव की तथा स्त्री हों तो शक्ति की आराधना करें | सम्बंधित ग्रह का चौगुना मंत्र, महामृत्युंजय जाप, एवं रुद्राभिषेक करना इस दशा शांति के सरल उपाय हैं ! इसके अतिरिक्त जो भी ग्रह मारकेश हो उसी का ‘कवच’ पाठ करें, ध्यान रहे दशा आने से एक माह पहले ही आचरण में सुधार लायें और अपनी सुबिधा अनुसार स्वयं उपाय करें | 

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अपनी राशियों के हिसाब से जानें आप अपना मारकेश–

मेष लग्न- मेष लग्न के लिए शुक्र दूसरे एंव सातवें भाव का मालिक है, किन्तु फिर भी जातक के जीवन को समाप्त नहीं करेगा। यह गम्भीर व्याधियों को जन्म दे सकता है। मेष लग्न में शनि दशवें और ग्यारहवें भाव का अधिपति होकर भी अपनी दशा में मृत्यु तुल्य कष्ट देगा।

वृष-वृष लग्न के लिए मंगल सातवें एंव बारहवें भाव का मालिक होता है जबकि बुध दूसरे एंव पांचवें भाव का अधिपति होता है। वृष लग्न में शुक्र, गुरू व चन्द्र मारक ग्रह माने जाते है।

मिथुन-इस लग्न में चन्द्र व गुरू दूसरे एंव सातवें भाव के अधिपति है। चन्द्रमा प्रतिकूल स्थिति में होने पर भी जातक का जीवन नष्ट नहीं करता है। मिथुन लग्न में बृहस्पति और सूर्य मारक बन जाते है।

कर्क-शनि सातवें भाव का मालिक होकर भी कर्क के लिए कष्टकारी नहीं होता है। सूर्य भी दूसरे भाव का होकर जीवन समाप्त नहीं करता है। लेकिन कर्क लग्न में शुक्र ग्रह मारकेश होता है।

सिंह-इस लग्न में शनि सप्तमाधिपति होकर भी मारकेश नहीं होता है जबकि बुध दूसरे एंव ग्यारहवें भाव अधिपति होकर जीवन समाप्त करने की क्षमता रखता है।

कन्या-कन्या लग्न के लिए सूर्य बारहवें भाव का मालिक होकर भी मृत्यु नहीं देता है। यदि द्वितीयेश शुक्र , सप्तमाधिपति गुरू तथा एकादश भाव का स्वामी पापक्रान्त हो तो मारक बनते है किन्तु इन तीनों में कौन सा ग्रह मृत्यु दे सकता है। इसका स्क्षूम विश्लेषण करना होगा।

तुला-दूसरे और सातवें भाव का मालिक मंगल मारकेश नहीं होता है, परन्तु कष्टकारी पीड़ा जरूर देता है। इस लग्न में शुक्र और गुरू यदि पीडि़त हो तो मारकेश बन जाते है।

वृश्चिक-गुरू दूसरे भाव का मालिक होकर भी मारकेश नहीं होता है। यदि बुध निर्बल, पापक्रान्त हो अथवा अष्टम, द्वादश, या तृतीय भावगत होकर पापग्रहों से युक्त हो जाये तो मारकेश का रूप ले लेगा।

धनु-शनि द्वितीयेश होने के उपरान्त भी मारकेश नहीं होता है। बुध भी सप्तमेश होकर भी मारकेश नहीं होता है। शुक्र निर्बल, पापक्रान्त एंव क्रूर ग्रहों के साथ स्थिति हो तो वह मारकेश अवश्य बन जायेगा।

मकर-मकर लग्न में शनि द्वितीयेश होकर भी मारकेश नहीं होता है क्योंकि शनि लग्नेश भी है। सप्तमेश चन्द्रमा भी मारकेश नहीं होता है। मंगल एंव गुरू यदि पापी या अशुभ स्थिति में है तो मारकेश का फल देंगे।

कुम्भ-बृहस्पति द्वितीयेश होकर मारकेश है किन्तु शनि द्वादशेश होकर भी मारकेश नहीं है। मंगल और चन्द्रमा भी यदि पीडि़त है तो मृत्यु तुल्य कष्ट दे सकते है।

मीन-मंगल द्वितीयेश होकर भी मारकेश नहीं होता है। मीन लग्न में शनि और बुध दोनों मारकेश सिद्ध होंगे। अष्टमेश सूर्य एंव षष्ठेश शुक्र यदि पापी है और अशुभ है तो मृत्यु तुल्य कष्ट दे सकते है।

शुभम भवतु ..

कल्याण हो ..

(उपरोक्त लेख संग्रह में कुछ सामग्री गूगल से साभार ली गई हैं, किसी को आपत्ति/परेशानी होने पर सूचित करें,वह सामग्री हटा दी जाएगी)

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