जानिए मंगलदोष निवारण और श्री अंगारेश्वर महादेव(उज्जैन, मध्यप्रदेश) का सम्बन्ध

जानिए मंगलदोष निवारण और श्री अंगारेश्वर महादेव(उज्जैन, मध्यप्रदेश) का सम्बन्ध ..???

ज्योतिष के अनुसार कुंडली में कई प्रकार के दोष बताए गए हैं जैसे कालसर्प योग, पितृदोष, नाड़ीदोष, गणदोष, चाण्डालदोष, ग्रहणयोग, मंगलदोष या मांगलिक दोष आदि। इनमें मंगल दोष एक ऐसा दोष है जिसकी वजह से व्यक्ति को विवाह संबंधी परेशानियों, रक्त संबंधी बीमारियों और भूमि-भवन के सुख में कमियां रहती हैं।

विवाह सम्बंधों में आजकल मंगलीक शब्द एक प्रकार से भय तथा अमंगल का सूचक बन गया है. परन्तू यहाँ यह जानना आवश्यक है की प्रत्येक मंगली जातक, विवाह के लिए अयोग्य होता है यह कहना बिल्कुल भी ठीक नहीं होगा . मंगली दोष का नाम सुनते ही वर और कन्या के अभिभावक सतर्क हो जाते है,विवाह सम्बन्धो के लिये मंगलिक शब्द एक प्रकार से भय अथा अमंगल का सूचक बन गया है,परन्तु प्रत्येक मंगली जातक विवाह के अयोग्य नही होता है,सामान्यत: मंगलीक दिखाई पडने वाली जन्म पत्रियां भी ग्रहों की स्थिति तथा द्रिष्टि के कारण दोष रहित हो जाती हैसामान्यतः जो कुण्डली प्रथम द्रष्टी में मंगलीक प्रतीत होती है वे जन्म कुण्डलिया भी ग्रहों की स्थिति तथा दृष्टि के कारण दोष रहित होंती है. इसलिए जन्म कुण्डली का बारीकी से अध्यन अति आवश्यक है .शुभ ग्रह एक भी यदि केंद्र में हो तो सर्वारिष्ट भंग योग बना देता है।

शास्त्रकारों का मत ही इसका निर्णय करता है कि जहां तक हो मांगलिक से मांगलिक का संबंध करें। ‍फिर भी मांगलिक एवं अमांगलिक पत्रिका हो, दोनों परिवार पूर्ण संतुष्ट हों अपने पारिवारिक संबंध के कारण तो भी यह संबंध श्रेष्ठ नहीं है, ऐसा नहीं करना चाहिए।

ऐसे में अन्य कई कुयोग हैं। जैसे वैधव्य विषागना आदि दोषों को दूर रखें। यदि ऐसी स्थिति हो तो ‘पीपल’ विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके कन्या का संबंध अच्छे ग्रह योग वाले वर के साथ करें।

गोलिया मंगल ‘पगड़ी मंगल’ तथा चुनड़ी मंगल : जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं पर भी मंगल स्थित हो उसके साथ शनि, सूर्य, राहु पाप ग्रह बैठे हों तो व पुरुष गोलिया मंगल, स्त्री जातक चुनड़ी मंगल हो जाती है अर्थात द्विगुणी मंगली इसी को माना जाता है।
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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नवग्रहों में विशेष स्थान रखने वाले मंगल ग्रह का जन्म स्थान उज्जैन यानि प्राचीन नगरी अवन्तिका को माना गया है। देश के सभी स्थानों से मंगल पीड़ा निवारण और अनुग्रह प्राप्त करने के लिए लोग यहां आते हैं। जनमान्यताओं के अनुसार मंगल की जन्म स्थली पर भात पूजा कराने से मंगलजन्य कष्ट से व्यक्ति को शांति मिलती है। मंगल को नवग्रहों में सेनापति के पद से शुशोभित किया गया है। जन्म कुंडली में मंगल की प्रधानता जहां मंगल दोष उत्पन्न करती है, वहीं व्यक्ति को सेना, पुलिस या पराक्रमी पदो पर शुशोभित कर यश और कीर्ति भी दिलती है।

जब अंगारका का जन्म हुआ , तभी से वह वक्री कार्य करने लगा। इसकी उत्पत्ति के बाद भूकंप और ज्वालामुखी जैसे उत्पाद होने लगे और पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मच गई। यह देख ऋषियों ने भगवान शिव से प्रार्थना की। भगवान शिव ने अंगारक को अपने पास बुलाया और कहा तुम्हें पृथ्वी पर मंगल करने के लिए उत्पन्न किया गया है न कि अमंगल करने के लिए। इस पर मंगल ने कहा कि यदि पृथ्वी का अमंगल रोककर मंगल करना है तो आप मुझे शक्ति और सामथ्र्य दीजिए।

इस पर भगवान शिव ने अंगारक को तपस्या करने का आदेश दिया। अंकारक ने पूछा कि मैं किस स्थान पर तपस्या करूं? इस पर भगवान शिव ने कहा महाकाल के वन क्षेत्र में खरगता के संगम पर तपस्या करो। भगवान शिव के आदेश पर मंगल ने 16,000 वर्ष तक घोर तपस्या की। मंगल की तपस्या से भगवान शंकर प्रसन्न हुए और मंगल को ग्रहों का सेनापति बना दिया। नवग्रहों में इसे तीसरा स्थान प्रदान किया। अंगारक के पूछने पर कि मेरा पूजन कहां होगा तथा मेरा प्रभाव क्या होगा? इस पर शिव ने कहा कि मेरे लिंग पर आकर तुमने तप किया है। इसलिए यह लिंग तुम्हारे नाम से प्रसिद्ध होगा। तुम मनुष्य मात्र की कुंडलियों में योग कारक रहोगे। योग की अनुकूलता के लिए जो व्यक्ति यहां (अवंन्तिका) आकर तुम्हारी पूजा करेगा, उसका मंगल होगा। तभी से लोग मंगल की पूजा के लिए उज्जैन में आते हैं और अपनी श्रद्धा अनुसार अंगारेश्वर महादेव मंदिर में पूजा करके मंगल की अनुकूलता प्राप्त करते हैं।
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कैसे बनता है मांगलिक दोष.???

यदि किसी व्यक्ति की कुंडली के प्रथम या चतुर्थ या सप्तम या अष्टम या द्वादश भाव में मंगल स्थित हो तो ऐसी कुंडली मांगलिक मानी जाती है। हांलाकि मांगलिक योग हर स्थिति में अशुभ नहीं होता है। कुछ लोगों के लिए यह योग शुभ फल देने वाला भी होता है।
जिन लोगों की कुंडली मांगलिक होती है उन्हें प्रति मंगलवार मंगलदेव के निमित्त विशेष पूजन करना चाहिए। मंगलदेव को प्रसन्न करने के लिए उनकी प्रिय वस्तुओं जैसे लाल मसूर की दाल, लाल कपड़े का दान करना चाहिए।
आजकल भारत ही नही विश्व मे भी मंगली दोष के परिहार के उपाय पूंछे जाने लगे हैं। जो लोग भली भांति मंगली दोष से पीडित है और उन्होने अगर मंगली व्यक्ति को ही अपना सहचर नही बनाया है तो उनकी जिन्दगियां नर्क के समान बन गयीं है,यह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। जन्म कुन्डली के अनुसार अगर मंगल लगन में है,मंगल दूसरे भाव में है,मंगल अगर चौथे भाव में है,मंगल अगर अष्टम भाव में है,मंगल अगर बारहवें भाव में है तो मंगली दोष लग जाता है। मंगली दोष हमेशा प्रभावी नही रहता है,मंगल अगर किसी खराब ग्रह जैसे राहु केतु या शनि से पीडित हो रहा हो तो मंगली दोष अधिक परेशान करता है,अगर वही मंगल अगर किसी प्रकार से गुरु या चन्द्र से प्रभावित हो जाता है तो मंगल साफ़ और शुद्ध होकर पूजा पाठ और सामाजिक मान्यता में अपना नाम और धन कमाने में सफ़ल रहता है,इसलिये मंगल को समझने के लिये मंगल का रूप समझना बहुत जरूरी है। मंगल पति की कुन्डली में उसके खून का कारक होता है,उसकी शक्ति जो पौरुषता के रूप में जानी जाती है के रूप में होता है,मंगल भाइयों के रूप में भी जाना जाता है,और मंगल अगर कैरियर का बखान करता है तो वह शनि के साथ मिलकर डाक्टरी,इन्जीनियरिंग,रक्षा सेवा और जमीनी मिट्टी को पकाने के काम,जमीनी धातुओं को गलाने और उनसे व्यवसाय करने वाले काम,भवन निर्माता और रत्नों आदि की कटाई के लिये लगाये जाने वाले उद्योगों के रूप में भी जाना जाता है।

जानिए लगन का मंगल काप्रभाव–

जन्म समय के अनुसार लगन में मंगल के विद्यमान होने पर जातक का दिमाग गर्म रहने वाली बात पायी जाती है,लगन शरीर में मस्तिष्क का कारक है,मस्तिष्क के अन्दर गर्मी रहने जातक को जो भी करना होता है वह तामसी रूप से करता है,शादी के बाद शरीर का शुक्र (रज और वीर्य) जो बाल्यकाल से जमा रहता है वह खत्म होने लगता है शरीर की ताकत रज या वीर्य के द्वारा ही सम्भव है,और शुक्र ही मंगल को (खून की गर्मी) को साधे रहने में सहायक माना जाता है,लेकिन रज या वीर्य के कम होने से शरीर के अन्दर का खून मस्तिष्क में जल्दी जल्दी चढने उतरने लगता है,जातक को जरा सी बात पर चिढचिढापन आने लगता है,इन कारणों से पत्नी से मारपीट या पति की बातों को कुछ भी महत्व नही देने के कारण परिवाव में विघटन शुरु हो जाता है,यह मंगल सीधे तरीके से अपनी द्रिष्टियों से चौथे भाव यानी सुखों में (लगन से चौथा भाव) सहचर के कार्यों में सप्तम से दसवां भाव),सहचर के शरीर को (लगन से सप्तम),सहचर के धन और कुटुम्ब ( सहचर के दूसरे भाव) को अपने कन्ट्रोल में रखना चाहता है,ज्योतिष में मंगल की भूमिका एक सेनापति के रूप में दी गयी है,और जातक उपरोक्त कारकों को अपने बस में रखने की कोशिश करता है,जातक सहचर के कुटुम्ब और सहचर के भौतिक धन को अपना अपमान समझता है (लगन से अष्टम सहचर का कुटुम्ब और भौतिक धन तथा जातक का अपमान मृत्यु जान जोखिम और गुप्त रूप से प्रयोग करने वाला स्थान).इन कारणों के अलावा जिन जातकों के मंगल पर राहु के द्वारा असर दिया जाता है तो जातक के खून के अन्दर और प्रेसर बढ जाता है,और उसके अन्दर इस मंगल के कारण दिमाग को और अधिक सुन्न करने के लिये जातक तामसी कारकों को लेना शुरु कर देता है,दवाइयों की मात्रा बढ जाती है,राहु के असर से जातक के खून के अन्दर कैमिकल मिल जाते है जिनके द्वारा उसे कुछ करना होता है और वह कुछ करने लगता है.मंगल के अन्दर शनि की द्रिष्टि होने से जातक का खून जमने लगता है,और खून के सिर में जमने के कारण जातक को ब्रेन हेमरेज या दिमागी नसों का फ़टना आम बात मानी जाती है,जातक किसी भी पारिवारिक व्यवस्था को केवल कसाई वृत्ति से देखने लगता है,अक्सर इन कारणों के कारण ही जातक की बुद्धि समय पर काम नही कर पाती है और आजकल के भौतिक युग में एक्सीडेंट और सिर की चोटों का रूप मिलता है,जातक के सिर के अन्दर शनि की ठंडक और मंगल की गर्मी के धीरे धीरे ठंडे होने के कारण जातक शादी के बाद से ही कार्यों से दूर होता जाता है,मंगल पर अगर केतु का असर होता है तो जातक का खून निगेटिव विचारों की तरफ़ भागता है उसे लाख समझाया जाये कि यह काम हो जायेगा,तो वह अजीब अजीब से उदाहरण देना शुरु कर देता है अमुक का काम नही हुआ था,अमुक के काम में फ़ला बाधा आ गयी थी,उसे अधिक से अधिक सहारे की जरूरत पडती है,शादी सम्बन्ध का जो फ़ल जातक के सहचर को मिलना चाहिये उनसे वह दूर होता रहता है,और कारणों के अन्दर सहचर के अन्दर जातक के प्रति बिलकुल नकारात्मक प्रभाव शुरु हो जाते है,या तो जातक का सहचर किसी व्यभिचार के अन्दर अपना मन लगा लेता है अथवा वह अपने को अपमान की जिन्दगी नही जीने के कारण आत्महत्या की तरफ़ अग्रसर होता चला जाता है,इसी प्रकार से मंगल पर अगर सूर्य की द्रिष्टि होती है तो जातक के अन्दर दोहरी अहम की मात्रा बढ जाती है और जातक किसी को कुछ नही समझता है इसके चलते सहचर के अन्दर धीरे धीरे नकारात्मक स्थिति पैदा हो जाती है जातक या तो जीवन भर उस अहम को हजम करता रहता है अथवा किसी भी तरह से जातक से कोर्ट केश या समाज के द्वारा तलाक ले लेता है,इसी प्रकार से अन्य कारण भी माने जाते है।

जानिए चतुर्थ भाव में मंगल का प्रभाव—

कुन्डली से चौथा भाव सुखों का भाव है,इसी भाव से मानसिक विचारों को देखा जाता है,माता के लिये और रहने वाले मकान के लिये भी इसी भाव से जाना जाता है,यही भाव वाहनों के लिये और यही भाव पानी तथा पानी वाले साधनों के लिये माना जाता है,घर के अन्दर नींद निकालने का भाव भी चौथा है.सहचर के भाव से यह भाव कर्म का भाव होता है,जब जातक एक चौथे भाव में मंगल होता है तो जातक का स्वभाव चिढचिढा होता है वह जानपहिचान वाले लोगों से ही लडता रहता है,जातक के निवास स्थान में इसी मंगल के कारण लोग कुत्ते बिल्ली की तरह झगडा करने वाले होते है,हर व्यक्ति उस जातक के घर का अपने अपने तर्क को ताकत से देना चाहता है,अक्सर वाहन चलाते वक्त साथ में चलने वाले वाहनों के प्रति आगे जाने की होड भी इसी मंगल वाले लोग करते है,और जरा सी चूक होने के साथ ही या तो सीधे अस्पताल जाते है या फ़िर वाहन को क्षतिग्रस्त करते हैं। सहचर के कार्य भी तमतमाहट से भरे होते है,जातक की माता सहचर के कार्यों से हमेशा रुष्ट रहती है,जातक के शरीर में पानी की कमी होती है,वह अपने सहचर को कन्ट्रोल में रखना चाहता है,अपने पिता के कार्यों में दखल देने वाला और बडे भाई तथा दोस्तों के साथ सीधे रूप में प्रतिद्वंदी के रूप में सामने आता है,सहचर के परिवार वालों से भी वह उसी प्रकार से व्यवहार करता है जैसे कोई सेनापति अपने जवानों को हमेशा सेल्यूट मारने के लिये विवश करता है,जातक को घर वालों से अधिक बाहर वालों से अधिक मोह होता है और जातक का स्वभाव सहचर के लिये,शरीर,मन,और शिक्षा के प्रति भी रुष्ट रहता है। मंगल के चौथे भाव में होने का एक मतलब और होता है कि जातक का दिल शरबत की तरह मीठा होता है,और वह जातक को जरा जरा सी बातों के अन्दर चिपकन पैदा कर देता है,उसे हर कोई पी जाना चाहता है।

जानिए मंगल का सप्तम में प्रभाव—-

मंगल का सप्तम में होना पति या पत्नी के लिये हानिकारक माना जाता है,उसका कारण होता है कि पति या पत्नी के बीच की दूरिया केवल इसलिये हो जाती है क्योंकि पति या पत्नी के परिवार वाले जिसके अन्दर माता या पिता को यह मंगल जलन या गुस्सा देता है,जब भी कोई बात बनती है तो पति या पत्नी के लिये सोचने लायक हो जाती है,और अक्सर पारिवारिक मामलों के कारण रिस्ते खराब हो जाते है। पति की कुंडली में सप्तम भाव मे मंगल होने से पति का झुकाव अक्सर सेक्स के मामलों में कई महिलाओं के साथ हो जाता है,और पति के कामों के अन्दर काम भी उसी प्रकार के होते है जिनसे पति को महिलाओं के सानिध्य मे आना पडता है। पति के अन्दर अधिक गर्मी के कारण किसी भी प्रकार की जाने वाली बात को धधकते हुये अंगारे की तरफ़ मारा जाता है,जिससे पत्नी का ह्रदय बातों को सुनकर विदीर्ण हो जाता है,अक्सर वह मानसिक बीमारी की शिकार हो जाती है,उससे न तो पति को छोडा जा सकता है और ना ही ग्रहण किया जा सकता है,पति की माता और पिता को अधिक परेशानी हो जाती है,माता के अन्दर कितनी ही बुराइयां पत्नी के अन्दर दिखाई देने लगती है,वह बात बात में पत्नी को ताने मारने लगती है,और घर के अन्दर इतना क्लेश बढ जाता है कि पिता के लिये असहनीय हो जाता है,या तो पिता ही घर छोड कर चला जाता है,अथवा वह कोर्ट केश आदि में चला जाता है,इस प्रकार की बातों के कारण पत्नी के परिवार वाले सम्पूर्ण जिन्दगी के लिये पत्नी को अपने साथ ले जाते है। पति की दूसरी शादी होती है,और दूसरी शादी का सम्बन्ध अक्सर कुंडली के दूसरे भाव से सातवें और ग्यारहवें भाव से होने के कारण दूसरी पत्नी का परिवार पति के लिये चुनौती भरा हो जाता है,और पति के लिये दूसरी पत्नी के द्वारा उसके द्वारा किये जाने वाले व्यवहार के कारण वह धीरे धीरे अपने कार्यों से अपने व्यवहार से पत्नी से दूरियां बनाना शुरु कर देता है,और एक दिन ऐसा आता है कि दूसरी पत्नी पति पर उसी तरह से शासन करने लगती है जिस प्रकार से एक नौकर से मालिक व्यवहार करता है,जब भी कोई बात होती है तो पत्नी अपने बच्चों के द्वारा पति को प्रताणित करवाती है,पति को मजबूरी से मंगल की उम्र निकल जाने के कारण सब कुछ सुनना पडता है।

जानिए अष्टम भाव के मंगल का प्रभाव—-

लगन से आठवा मंगल अक्सर पति या पत्नी के लिये सबसे छोटी संतान होने के लिये इशारा करता है,अगर वह छोटी संतान नही होती है तो उससे छोटे भाई या बहिन के लिये कम से कम ढाई साल का अन्तर जरूर होता है। आठवां मंगल अक्सर केवल सेक्स के लिये स्त्री सम्बन्धों की चाहत रखता है,वह बडे भाई तथा छोटे भाई बहिनों के लिये मारक होता है,उसका प्रेम केवल धन और कुटुम्ब की सम्पत्ति से होता है,वह अपनी चाहत के लिये परिवार का नाश भी कर सकता है,अष्टम मंगल वाला पति या पत्नी अपने परिवार के लिये और ससुराल खान्दान की सामाजिक स्थिति को बरबाद करने के लिये अपना महत्वपूर्ण कार्य करता है। तामसिक खानपान और खून के गाढे होने के कारण तथा लो ब्लड प्रेसर होने के कारण नकारात्मक भाव हमेशा सामने होते है,पति या पत्नी शादी के बाद कडक भाषा का प्रयोग करने लगते है,अथवा अस्पताली कारणों के घेरे मे आजाते है,अधिकतर मामलों में दवाइयों के लिये अथवा पुलिस या अन्य प्रकार के चक्करों में व्यक्ति का जीवन लगा रहता है,धन के मामले में अक्सर इस मंगल वाला अपहरण चालाकी या कूटनीति का सहारा लेकर कोई भी काम करता है।
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शास्त्रों के अनुसार मंगल दोष का निवारण मध्यप्रदेश के उज्जैन में ही हो सकता है। अन्य किसी स्थान पर नहीं। उज्जैन ही मंगल देव का जन्म स्थान है और मंगल के सभी दोषों का निवारण यहीं किए जाने की मान्यता है। मंगलदेव के निमित्त भात पूजा की जाती है। जिससे मंगल दोषों की शांति होती है।यह पूजा अंगारेश्वर महादेव नमक स्थान पर संपन्न होती हैं जो की उज्जैन (मध्यप्रदेश) रेलवे स्टेशन से लगभग 06 किलोमीटर दूर हैं…
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मंगल दोष : कारण और निवारण(क्या करें जब कुंडली में हो मंगल दोष)—-

जिस जातक की जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली आदि में मंगल ग्रह, लग्न से लग्न में (प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भावों में से कहीं भी स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहते हैं।
गोलिया मंगल ‘पगड़ी मंगल’ तथा चुनड़ी मंगल : जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं पर भी मंगल स्थित हो उसके साथ शनि, सूर्य, राहु पाप ग्रह बैठे हों तो व पुरुष गोलिया मंगल, स्त्री जातक चुनड़ी मंगल हो जाती है अर्थात द्विगुणी मंगली इसी को माना जाता है।

मांगलिक कुंडली का मिलान :—-

वर, कन्या दोनों की कुंडली ही मांगलिक हों तो विवाह शुभ और दाम्पत्य जीवन आनंदमय रहता है। एक सादी एवं एक कुंडली मांगलिक नहीं होना चाहिए।

मंगल-दोष निवारण :—— मांगलिक कुंडली के सामने मंगल वाले स्थान को छोड़कर दूसरे स्थानों में पाप ग्रह हों तो दोष भंग हो जाता है। उसे फिर मंगली दोष रहित माना जाता है तथा केंद्र में चंद्रमा 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगली दोष दूर हो जाता है। शुभ ग्रह एक भी यदि केंद्र में हो तो सर्वारिष्ट भंग योग बना देता है।

शास्त्रकारों का मत ही इसका निर्णय करता है कि जहां तक हो मांगलिक से मांगलिक का संबंध करें। ‍फिर भी मांगलिक एवं अमांगलिक पत्रिका हो, दोनों परिवार पूर्ण संतुष्ट हों अपने पारिवारिक संबंध के कारण तो भी यह संबंध श्रेष्ठ नहीं है, ऐसा नहीं करना चाहिए।
ऐसे में अन्य कई कुयोग हैं। जैसे वैधव्य विषागना आदि दोषों को दूर रखें। यदि ऐसी स्थिति हो तो ‘पीपल’ विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके कन्या का संबंध अच्छे ग्रह योग वाले वर के साथ करें।
मंगल यंत्र विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग करें। देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या‍दि में ही इसे प्रयोग करें। छोटे कार्य के लिए नहीं।

विशेष :—- विशेषकर जो मांगलिक हैं उन्हें इसकी पूजा अवश्य करना चाहिए। चाहे मांगलिक दोष भंग आपकी कुंडली में क्यों न हो गया हो फिर भी मंगल यंत्र मांगलिकों को सर्वत्र जय, सुख, विजय और आनंद देता है।

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ऐसे हो जाता हैं म्ंगलीदोष का परिहारः—

1 . जन्मकुण्डली के प्रथम , द्वितीय , चतुर्थ , सप्तम, अष्टम , एकादश् तथा द्वादश् इनमें से किसी भी भाव में मंगल बैठा हो तो वह वर वधू का विघटन कराता है परन्तु इन भावों में बैठा हुआ मंगल यदि स्वक्षेत्री हो तो दोषकारक नहीं होता.
2 .यदि जन्मकुण्डली के प्रथम भाव (लग्न) में मंगल मेष राषि का हो , द्वादश भाव में धनु राषि का हो चतुर्थ भाव में वृच्श्रिक राशि का हो सप्तम भाव में मीन राशि का हो तथा अष्टम भाव में कुम्भ को हो तो मंगली दोष नहीं लगता.
3 .यदि जन्मकुण्डली के सप्तम , लग्न (प्रथम ) , चतुर्थ , अष्टम अथवा द्वादश भाव में शनि बैठा हो तो मंगली दोष नहीं रहता अर्थात पहले वर्णन किए गये मंगली दोष वाले भावों – 1/2/4/7/8/11/12 में मंगल के साथ ही यदि बृहस्पति अथवा चन्द्रमा भी बैठा हो अथवा इन भावों में मंगल बैठा हो परन्तु केन्द्र अर्थात 1/4/7/10 भावों में चन्द्रमा बैठा हो तो मंगली – दोष दूर हो जाता है.
4 .केन्द्र और त्रिकोण भावों में यदि शुभग्रह हो तथा तृतीय , षष्ठ एवं एकादष भावों में पापग्रह हो तथा सप्तमभाव का स्वामी सप्तम भाव में बैठा हो तो मंगली दोष नहीं लगता .वर तथा कन्या दोनों की जन्मकुण्डली में यदि मंगल शनि अथवा कोई अन्य पापग्रह एक जैसी स्थिति में बैठे हों तो मंगली दोष नष्ट हो जाता है.
5 .यदि वर कन्या दोनो की जन्मकुण्डली के समान भावों में मंगल अथवा वैसे ही कोई पापग्रह बैठे हो तो मंगली दोष नहीं लगता. ऐसा विवाह शुभप्रद ,दीर्घायुष्य देने वाला तथा पुत्र पौत्रदायक होता है.
6 .यदि अनिष्ठ भावस्थ मंगल वक्री , नीच राशिस्थ (कर्क का) अथवा शुत्रक्षेत्री (मिथुन अथवा कन्या राषि का ) अथवा अस्तंगत हो तो वह अनिष्ट कारक नहीं होता.
7 .जन्मकुण्डली में मंगल यदि द्वितीय भाव में मिथुन अथवा कन्या राशि का हो द्वादष भाव में वृष अथवा कर्क राशि का हो चतुर्थभाव में में मेष अथवा वृच्श्रिक राशि का हो सप्तम भाव में मकर अथवा कर्क राशि का हो एवं अष्टम भाव में धनु अथवा मीन राशि का हो , इनके अतिरिक्त किसी भी अनिष्ट स्थान में कुम्भ अथवा सिंह राशि का हो तो ऐसे में मंगल का दोष नहीं लगता.
8 .जिसकी जन्मकुण्डली के पंचम, चतुर्थ ,सप्तम , अष्टम अथवा द्वादश स्थान में मंगल बैठा हो उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिए , परन्तु यदि वह मंगल , बुध और गुरू से युक्त हो अथवा इन ग्रहों के द्वारा दृष्ट हो तो दोष का परिहार हो जाता है.
9 .शुभ ग्रहों से संबंधित मंगल अशुभकारक नहीं होता . कर्क लग्न में स्थित मंगल कभी भी दोषी नहीं होता. यदि मंगल अपनी नीच राशि अथवा राशि शुत्र राशि (3/6) का हो अथवा अस्तंगत हो तो वह शुभ अशुभ कोई फल नहीं देता.
11 .मंगली दोष वाली कन्या मंगली दोष वाले वर को देने से मंगली दोष नहीं लगता तथा कोई अनिष्ट भी नहीं होता. ऐसा संबंध दाम्पत्य सुख की वृध्दि भी करता है.
12 .यदि वर कन्या दोनों की जन्मकुण्डली में लग्र, चंद्रमा अथवा शुक्र से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ ,सप्तम , अष्टम एवं द्वादष इन छः स्थानों में से किसी भी एक भाव में मंगल एक जैसी स्थिति में बैठा हो (अर्थात वर की कुण्डली में जहां बैठा हो , वधू की कुण्डली में भी उसी जगह पर बैठा हो) तो मंगल दोष नहीं रहता तथा ऐसे स्त्री पुरूष का दाम्पत्य- जीवन चिरस्थायी होता है , साथ ही धन धान्य पुत्र पौत्रादि की अभिवृध्दि भी होती है. परन्तु वर कन्या में से केवल किसी एक की जन्मकुण्डली में ही उक्त प्रकार का मंगल बैठा हो (दूसरे की न हो ) तो उसका सर्वथा विपरीत -फल समझाना चाहिए अर्थात वह स्थिति दोषपूर्ण होगी . यदि मंगल अशुभ भावों में स्थित हो तो विवाह नहीं करना चाहिए , पंरतु यदि बहुत गुण मिलते हो तो तथा वर – कन्या दोनों ही मंगली हो तो विवाह करना शुभ रहता है.
13 .कन्या की कुण्डली में मंगल दोष है और वर की कुण्डली में उसी स्थान पर शनि हो तो मंगल दोष का परिहार स्वयंमेव हो जाता है.
14 . यदि जन्मांग में मंगल दोष हो किन्तु शनि मंगल पर दृष्टिपात करे तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है.
15. मकर लग्न में मकर राशि का मंगल व सप्तम स्थान में कर्क राशि का चंद्र हो तो मंगल दोष नहीं रहता है.
16 . कर्क व सिंह लग्न में भी लग्नस्थ मंगल केन्द्र व त्रिकोण का अधिपति होने से राजयोग देता है, जिससे मंगल दोष निरस्त होता है.
17 . लग्न में बुध व शुक्र हो तो मंगल दोष निरस्त होता है.
18 . मंगल अनिष्ट स्थान में है और उसका अधिपति केद्र व त्रिकोण में हो तो मंगल दोष समाप्त होता है.
19 . आयु के 28वें वर्ष के पश्चात मंगल दोष क्षीण हो जाता है. ऐसा कहा जाता है किन्तु अनुभव में आया है कि मंगल अपना कुप्रभाव प्रकट करता ही है.
20 . आचार्यों ने मंगल-राहु की युति को भी मंगल दोष का परिहार बताया है.
21 . कुछ ज्योतिर्विद कहते हैं कि मंगल गुरु से युत या दृष्ट हो तो मंगल दोष समाप्त हो जाता है किन्तु आधुनिक शोध के आधार पर यह कहा जा सकता है कि गुरु की राशि में संस्थित मंगल अत्यंत कष्टकारक है, मंगल दोष से दूषित जन्मांगों का जन्मपत्री मिलान करके मंगल दोष परिहार जहां तक संभव हो करके विवाह करें तो दाम्पत्य जीवन सुखद होता है. वृश्चिक राशि में न्यून किन्तु मेष राशि का मंगल प्रबल घातक होता है. कन्या के माता-पिता को घबराना नहीं चाहिए. हमारे धर्मशास्त्रों ने व्रतानुष्ठान, मंत्र प्रयोग द्वारा मंगल दोष को शांत करने का उपाय बताये गए है
22. यदि मंगल चतुर्थ अथवा सप्तम भावस्थ हो तथा क्रूर ग्रह से युक्त या दृष्ट न हो एवं इन भावों में मेष, कर्क, वृश्चिक अथवा मकर राशि हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है. किन्तु भगवान रामजी की जन्मकुण्डली में सप्तम भाव में उच्च के मंगल ने राजयोग तो दिया किन्तु सीताजी से वियोग भी हुआ,जबकि मंगल पर गुरु की दृष्टि थी.
23. कुण्डली मिलान में यदि मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, द्वादश भाव में हो व द्वितीय जन्मांग में इन्हीं भावों में से किसी में शनि स्थित हो तो मंगल दोष निरस्त हो जाता है.
24. चतुर्थ भाव का मंगल वृष या तुला का हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है.
25. द्वादश भावस्थ मंगल कन्या, मिथुन, वृष व तुला का हो तो मंगल दोष निरस्त हो जाता है.
26. वर की कुण्डली में मंगल दोष है व कन्या की जन्मकुण्डली में मंगल के स्थानों पर सूर्य, शनि या राहु हो तो मंगल दोष का स्वयमेव परिहार हो जाता है.
27.ऐसा कहा जाता है कि आयु के 28वें वर्ष के पश्चात मंगल दोष क्षीण हो जाता है। आचार्यों ने मंगल-राहु की युति को भी मंगल दोष का परिहार बताया है। यदि मंगल मेष, कर्क, वृश्चिक अथवा मकर राशि हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।
28.कुण्डली मिलान में यदि मंगल चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, द्वादश भाव में हो व द्वितीय जन्मकुंडली में इन्हीं भावों में से किसी में शनि स्थित हो तो मंगल दोष निरस्त हो जाता है। चतुर्थ भाव का मंगल वृष या तुला का हो तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है।
29.द्वादश भावस्थ मंगल कन्या, मिथुन, वृष व तुला का हो तो मंगल दोष निरस्त हो जाता है। वर की कुण्डली में मंगल दोष है व कन्या की जन्मकुण्डली में मंगल के स्थानों पर सूर्य, शनि या राहु हो तो मंगल दोष का स्वयमेव परिहार हो जाता है।
30.ऐसी मान्यता अमूमन प्रचलन में है की जिस कन्या की जन्मकुंडली में मंगल दोष होता है, उसका विवाह मंगल दोष से ग्रसित वर से किया जाय तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है। कन्या की कुण्डली में मंगल दोष हो और वर की कुण्डली में उसी स्थान पर शनि हो तो मंगल दोष का परिहार स्वयंमेव हो जाता है।
31.यदि जन्मकुंडली में मंगल दोष हो किन्तु शनि मंगल पर दृष्टिपात करे तो मंगल दोष का परिहार हो जाता है। मकर लग्न में मकर राशि का मंगल व सप्तम स्थान में कर्क राशि का चंद्र हो तो मंगल दोष नहीं रहता है।
32.कर्क व सिंह लग्न में भी लग्नस्थ मंगल केन्द्र व त्रिकोण का अधिपति होने से राजयोग देता है, जिससे मंगल दोष निरस्त होता है। लग्न में बुध व शुक्र हो तो मंगल दोष निरस्त होता है। मंगल अनिष्ट स्थान में है और उसका अधिपति केद्र व त्रिकोण में हो तो मंगल दोष समाप्त हो जाता है।
33.यदि वर -कन्या दोनों की जन्मकुण्डली में लग्र, चंद्रमा अथवा शुक्र से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ ,सप्तम , अष्टम एवं द्वादष – इन छः स्थानों में से किसी भी एक भाव में मंगल एक जैसी स्थिति में बैठा हो (अर्थात वर की कुण्डली में जहां बैठा हो , वधू की कुण्डली में भी उसी जगह पर बैठा हो) तो मंगल दोष नहीं रहता तथा ऐसे स्त्री – पुरूष का दाम्पत्य- जीवन चिरस्थायी होता है , साथ ही धन धान्य पुत्र – पौत्रादि की अभिवृध्दि भी होती है। परन्तु वर कन्या में से केवल किसी एक की जन्मकुण्डली में ही उक्त प्रकार का मंगल बैठा हो (दूसरे की न हो ) तो उसका सर्वथा विपरीत -फल समझाना चाहिए अर्थात वह स्थिति दोषपूर्ण होगी । यदि मंगल अशुभ भावों में स्थित हो तो विवाह नहीं करना चाहिए , पंरतु यदि बहुत गुण मिलते हो तो तथा वर – कन्या दोनों ही मंगली हो तो विवाह करना शुभ रहता है।
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मंगल दोष ज्योतिष के अनुसार वह स्थिति है जब मंगल ग्रह वैदिक लग्न कुंडली के अनुसार 1, 4, 7, 8 या 12 वें घर में होता है। इस स्थिति में पैदा हुआ व्यक्ति मांगलिक होता है। कुछ अंधविश्वासी लोगों द्वारा माना जाता है कि यह स्थिति शादी के लिए विनाशकारी हो सकती है, इससे असुविधा,रिश्तों में तनाव हो सकता है, अलगाव और तलाक के लिए अग्रणी है। और कुछ मामलों में यह पति या पत्नी की असामयिक मौत का कारण मानी जाती है। इस परिस्थिति के लिए मंगल ग्रह की प्रकृति को जिम्मेदार ठहराया गया है। यदि दो मांगलिक शादी कर रहे हैं, तब एक दूसरे की ग्रहदशा का नकारात्मक प्रभाव रद्द किया जा सकता हैं। हालांकि वैदिक ज्योतिष में मंगल ग्रह अकेला ऐसा ग्रह नहीं है, जो संबंधों को प्रभावित करता है। इन प्रभावों को समग्र ज्योतिष संगतता के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।

एक धारणा यह है कि एक एकल मांगलिक शादी के नकारात्मक परिणामों को रद्द किया जा सकता है। अगर मांगलिक पहले एक कुंभ विवाह करे जिसमें मांगलिक पहले एक केले के पेड़, एक पीपल के पेड़, या विष्णु की एक मूर्ति के साथ विवाह करे। कुछ का मानना है कि केवल एक मांगलिक का अन्य मांगलिक के साथ विवाह होना चाहिये।क्योंकि दो नकारात्मक एक दूसरे को रद्द करके एक सकारात्मक प्रभाव बनाते है। यद्यपि ऐसी पूजा है जो कि मांगलिक और गैर-मांगलिक के एक दूसरे से शादी करने के लिए अनुमति का निर्माण करती है। व्यक्तियों की एक बढ़ती हुई संख्या जीवन साथी के चयन के दौरान वैज्ञानिक अवधारणाओं पर जोर दे रही हैं इसके साक्ष्य आपको आनलाइन विवाह ब्लाग से मिल सकते है।
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किन परिस्थितियों के तहत मंगल दोष दोष नहीं माना जाता हैं?

यदि मंगल कर्क राशि में नीच घर में हो।
यदि मंगल मिथुन या कन्या राशि के दुश्मन घर में हो।
यदि मंगल सूर्य के पास अस्तंगत।
यदि मंगल मेष राशि के पहले घर में हो।
यदि मंगल वृश्चिक के चौथे घर में हो।
यदि मंगल मकर राशि के सातवें घर में हो।
यदि मंगल सिंह राशि के आठवें घर में हो।
यदि मंगल धनु राशि के बारहवें घर में हो।

विशेष:— किसी अनुभवी और विद्वान ज्योतिषी से चर्चा करके ही मंगलदोष निवारण के उपाय -पूजन करना चाहिए। मंगल की पूजा का विशेष महत्व होता है। अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की गई पूजा प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है।

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