जानिए की क्या हैं कालसर्प योग / कालसर्प दोष निवारण पूजा ..???

जानिए की क्या हैं कालसर्प योग / कालसर्प दोष निवारण पूजा ..???

क्या हैं कालसर्प योग / कालसर्प दोष..???

कालसर्प एक ऐसा योग है जो जातक के पूर्व जन्म के किसी जघन्य अपराध के दंड या शाप के फलस्वरूप उसकी जन्मकुंडली में परिलक्षित होता है। व्यावहारिक रूप से पीड़ित व्यक्ति आर्थिक व शारीरिक रूप से परेशान तो होता ही है, मुख्य रूप से उसे संतान संबंधी कष्ट होता है। या तो उसे संतान होती ही नहीं, या होती है तो वह बहुत ही दुर्बल व रोगी होती है। उसकी रोजी-रोटी का जुगाड़ भी बड़ी मुश्किल से हो पाता है। धनाढय घर में पैदा होने के बावजूद किसी न किसी वजह से उसे अप्रत्याशित रूप से आर्थिक क्षति होती रहती है। तरह तरह के रोग भी उसे परेशान किये रहते हैं।

जब जन्म कुंडली में सारे ग्रह राहु और केतु के बीच अवस्थित रहते हैं तो उससे ज्योतिष विद्या मर्मज्ञ व्यक्ति यह फलादेश आसानी से निकाल लेते हैं कि संबंधित जातक पर आने वाली उक्त प्रकार की परेशानियाँ कालसर्प योग की वजह से हो रही हैं। परंतु याद रहे, कालसर्प योग वाले सभी जातकों पर इस योग का समान प्रभाव नहीं पड़ता। किस भाव में कौन सी राशि अवस्थित है और उसमें कौन-कौन ग्रह कहां बैठे हैं और उनका बलाबल कितना है – इन सब बातों का भी संबंधित जातक पर भरपूर असर पड़ता है। इसलिए मात्र कालसर्प योग सुनकर भयभीत हो जाने की जरूरत नहीं बल्कि उसका ज्योतिषीय विश्लेषण करवाकर उसके प्रभावों की विस्तृत जानकारी हासिल कर लेना ही बुद्धिमत्ता कही जायेगी। जब असली कारण ज्योतिषीय विश्लेषण से स्पष्ट हो जाये तो तत्काल उसका उपाय करना चाहिए। नीचे कुछ ज्योतिषीय स्थितियां दी गय़ीं हैं जिनमें कालसर्प योग बड़ी तीव्रता से संबंधित जातक को परेशान किया करता है।

किसी कुंडली में उपस्थित भिन्न भिन्न प्रकार के दोषों के निवारण के लिए की जाने वाली पूजाओं को लेकर बहुत सी भ्रांतियां तथा अनिश्चितताएं बनीं हुईं हैं तथा एक आम जातक के लिए यह निर्णय लेना बहुत कठिन हो जाता है कि किसी दोष विशेष के लिए की जाने वाली पूजा की विधि क्या होनी चाहिए। कालसर्प दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा को लेकर भी विभिन्न ज्योतिषियों के मत भिन्न भिन्न होने के कारण बहुत अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है जिसके कारण आम जातक को बहुत दुविधा का सामना करना पड़ता है। कुछ ज्योतिषियों का यह मानना है कि कालसर्प योग के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा के लिए नासिक स्थित भगवान शिव का त्रंयबकेश्वर नामक मंदिर उत्तम स्थान है, जबकि कुछ ज्योतिषि यह मानते हैं कि काल सर्प दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा के लिए उज्जैन सबसे उत्तम स्थान है तथा इसी प्रकार विभिन्न ज्योतिषि भिन्न भिन्न प्रकार के स्थानों को इस पूजा के लिए उत्तम मानते हैं।

आपके जन्म कुंडली में कालसर्प योग है या नहीं? घबरायें नहीं, आप समय लेकर हमसे मिलें अथवा संपर्क करें—
==पंडित “विशाल” दयानंद शास्त्री..
मोब.–09024390067
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जानिए की इन अवस्था में बनता हैं कालसर्प योग / कालसर्प दोष आपकी जन्म कुंडली में…

जब राहु के साथ चंद्रमा लग्न में हो और जातक को बात-बात में भ्रम की बीमारी सताती रहती हो, या उसे हमेशा लगता है कि कोई उसे नुकसान पहुँचा सकता है या वह व्यक्ति मानसिक तौर पर पीड़ित रहता है।
जब लग्न में मेष, वृश्चिक, कर्क या धनु राशि हो और उसमें बृहस्पति व मंगल स्थित हों, राहु की स्थिति पंचम भाव में हो तथा वह मंगल या बुध से युक्त या दृष्ट हो, अथवा राहु पंचम भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक की संतान पर कभी न कभी भारी मुसीबत आती ही है, अथवा जातक किसी बड़े संकट या आपराधिक मामले में फंस जाता है।
जब कालसर्प योग में राहु के साथ शुक्र की युति हो तो जातक को संतान संबंधी ग्रह बाधा होती है।
जब लग्न व लग्नेश पीड़ित हो, तब भी जातक शारीरिक व मानसिक रूप से परेशान रहता है।
चंद्रमा से द्वितीय व द्वादश भाव में कोई ग्रह न हो। यानी केंद्रुम योग हो और चंद्रमा या लग्न से केंद्र में कोई ग्रह न हो तो जातक को मुख्य रूप से आर्थिक परेशानी होती है।
जब राहु के साथ बृहस्पति की युति हो तब जातक को तरह-तरह के अनिष्टों का सामना करना पड़ता है।
जब राहु की मंगल से युति यानी अंगारक योग हो तब संबंधित जातक को भारी कष्ट का सामना करना पड़ता है।
जब राहु के साथ सूर्य या चंद्रमा की युति हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, शारीरिक व आर्थिक परेशानियाँ बढ़ती हैं।
जब राहु के साथ शनि की युति यानी नंद योग हो तब भी जातक के स्वास्थ्य व संतान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी कारोबारी परेशानियाँ बढ़ती हैं।
जब राहु की बुध से युति अर्थात जड़त्व योग हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी आर्थिक व सामाजिक परेशानियाँ बढ़ती हैं।
जब अष्टम भाव में राहु पर मंगल, शनि या सूर्य की दृष्टि हो तब जातक के विवाह में विघ्न, या देरी होती है।
यदि जन्म कुंडली में शनि चतुर्थ भाव में और राहु बारहवें भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक बहुत बड़ा धूर्त व कपटी होता है। इसकी वजह से उसे बहुत बड़ी विपत्ति में भी फंसना पड़ जाता है।
जब लग्न में राहु-चंद्र हों तथा पंचम, नवम या द्वादश भाव में मंगल या शनि अवस्थित हों तब जातक की दिमागी हालत ठीक नहीं रहती। उसे प्रेत-पिशाच बाधा से भी पीड़ित होना पड़ सकता है।
जब दशम भाव का नवांशेश मंगल/राहु या शनि से युति करे तब संबंधित जातक को हमेशा अग्नि से भय रहता है और अग्नि से सावधान भी रहना चाहिए।
जब दशम भाव का नवांश स्वामी राहु या केतु से युक्त हो तब संबंधित जातक मरणांतक कष्ट पाने की प्रबल आशंका बनी रहती है।
जब राहु व मंगल के बीच षडाष्टक संबंध हो तब संबंधित जातक को बहुत कष्ट होता है। वैसी स्थिति में तो कष्ट और भी बढ़ जाते हैं जब राहु मंगल से दृष्ट हो।
जब लग्न मेष, वृष या कर्क हो तथा राहु की स्थिति 1ले 3रे 4थे 5वें 6ठे 7वें 8वें 11वें या 12वें भाव में हो। तब उस स्थिति में जातक स्त्री, पुत्र, धन-धान्य व अच्छे स्वास्थ्य का सुख प्राप्त करता है।
जब राहु छठे भाव में अवस्थित हो तथा बृहस्पति केंद्र में हो तब जातक का जीवन खुशहाल व्यतीत होता है।
जब राहु व चंद्रमा की युति केंद्र (1ले 4थे 7वें 10वें भाव) या त्रिकोण में हो तब जातक के जीवन में सुख-समृद्धि की सारी सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
जब शुक्र दूसरे या 12वें भाव में अवस्थित हो तब जातक को अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।
जब बुधादित्य योग हो और बुध अस्त न हो तब जातक को अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।
जब लग्न व लग्नेश सूर्य व चंद्र कुंडली में बलवान हों साथ ही किसी शुभ भाव में अवस्थित हों और शुभ ग्रहों द्वारा देखे जा रहे हों। तब कालसर्प योग की प्रतिकूलता कम हो जाती है।
जब दशम भाव में मंगल बली हो तथा किसी अशुभ भाव से युक्त या दृष्ट न हो। तब संबंधित जातक पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
जब शुक्र से मालव्य योग बनता हो, यानी शुक्र अपनी राशि में या उच्च राशि में केंद्र में अवस्थित हो और किसी अशुभ ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट न हो रहा हो। तब कालसर्प योग का विपरत असर काफी कम हो जाता है।
जब शनि अपनी राशि या अपनी उच्च राशि में केंद्र में अवस्थित हो तथा किसी अशुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट न हों। तब काल सर्प योग का असर काफी कम हो जाता है।
जब मंगल की युति चंद्रमा से केंद्र में अपनी राशि या उच्च राशि में हो, अथवा अशुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट न हों। तब कालसर्प योग की सारी परेशानियां कम हो जाती हैं।
जब राहु अदृश्य भावों में स्थित हो तथा दूसरे ग्रह दृश्य भावों में स्थित हों तब संबंधित जातक का कालसर्प योग समृध्दिदायक होता है।
जब राहु छठे भाव में तथा बृहस्पति केंद्र या दशम भाव में अवस्थित हो तब जातक के जीवन में धन-धान्य की जरा भी कमी महसूस नहीं होती।

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हमेशा बुरा नहीं होता हैं कालसर्प योग/ कालसर्प दोष—-

कालसर्प योग सभी जातकों के लिए हमेशा ही बुरा या ख़राब नहीं होता है। विविध लग्नों व राशियों में अवस्थित ग्रह जन्म-कुंडली के किस भाव में हैं, इसके आधार पर ही कोई अंतिम निर्णय किया जा सकता है। कालसर्प योग वाले बहुत से ऐसे व्यक्ति हो चुके हैं, जो अनेक कठिनाइयों को झेलते हुए भी ऊंचे पदों पर पहुंचे। जिनमें भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्व॰ पं॰ जवाहर लाल नेहरू का नाम लिया जा सकता है। स्व॰ मोरारजी भाई देसाई व श्री चंद्रशेखर सिंह भी कालसर्प आदि योग से ग्रसित थे। किंतु वे भी भारत के प्रधानमंत्री पद को सुशोभित कर चुके हैं। अत: किसी भी स्थिति में व्यक्ति को मायूस नहीं होना चाहिए और उसे अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए हमेशा अपने चहुंमुखी प्रगति के लिए सतत सचेष्ट रहना चाहिए। यदि कालसर्प योग का प्रभाव किसी जातक के लिए अनिष्टकारी हो तो उसे दूर करने के उपाय भी किये जा सकते हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों में ऐसे कई उपायों का उल्लेख है, जिनके माध्यम से हर प्रकार की ग्रह-बाधाएं व पूर्वकृत अशुभ कर्मों का प्रायश्चित किया जा सकता है।

यह एक ज्योतिषिय विश्लेषण था पुन: आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि हमें अपने जीवन में मिलने वाले सारे अच्छे या बुरे फल अपने निजकृत कर्मो के आधार पर है, इसलिए ग्रहों को दोष न दें और कर्म सुधारें और त्रिसूत्रिय नुस्खे को अपने जीवन में अपनायें और मेरे बताये गए उपायों को अपने जीवन में प्रयोग में लायें, आपके कष्ट जरुर समाप्त होंगे। त्रिसूत्रिय नुस्खा: नि:स्वार्थ भाव से माता-पिता की सेवा, पति-पत्नी का धर्मानुकूल आचरण, देश के प्रति समर्पण और वफादारी। यह उपाय अपनाते हुए मात्र इक्कीस शनिवार और इक्कीस मंगलवार किसी शनि मंदिर में आकर नियमित श्री शनि पूजन, श्री शनि तैलाभिषेक व श्री शनिदेव के दर्शन करेंगे तो आपके कष्ट अवश्य ही समाप्त होंगे।

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आज के इस लेख में हम कालसर्प योग के निवारण के लिए इन धार्मिक स्थानों पर की जाने वाली पूजा के महत्व के बारे में चर्चा करेंगे परन्तु इससे पूर्व आइए यह देख लें कि काल सर्प दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा वास्तव में है क्या।
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किसी भी प्रकार के दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा को विधिवत करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है उस दोष के निवारण के लिए निश्चित किये गए मंत्र का एक निश्चित संख्या में जाप करना तथा यह संख्या अधिकतर दोषों के लिए की जाने वाली पूजाओं के लिए 125,000 मंत्र होती है। उदाहरण के लिए कालसर्प योग के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा में भी कालसर्प दोष के निवारण मंत्र का 125,000 बार जाप करना अनिवार्य होता है। पूजा के आरंभ वाले दिन पांच या सात पंडित पूजा करवाने वाले यजमान अर्थात जातक के साथ भगवान शिव के शिवलिंग के समक्ष बैठते हैं तथा शिव परिवार की विधिवत पूजा करने के पश्चात मुख्य पंडित यह संकल्प लेता है कि वह और उसके सहायक पंडित उपस्थित यजमान के लिए कालसर्प योग के निवारण मंत्र का 125,000 बार जाप एक निश्चित अवधि में करेंगे तथा इस जाप के पूरा हो जाने पर पूजन, हवन तथा कुछ विशेष प्रकार के दान आदि करेंगे। जाप के लिए निश्चित की गई अवधि सामान्यतया 7 से 11 दिन होती है। संकल्प के समय मंत्र का जाप करने वाली सभी पंडितों का नाम तथा उनका गोत्र बोला जाता है तथा इसी के साथ पूजा करवाने वाले यजमान का नाम, उसके पिता का नाम तथा उसका गोत्र भी बोला जाता है तथा इसके अतिरिक्त जातक द्वारा करवाये जाने वाले काल सर्प योग के निवारण मंत्र के इस जाप के फलस्वरूप मांगा जाने वाला फल भी बोला जाता है जो साधारणतया जातक की कुंडली में कालसर्प दोष का निवारण होता है।

इस संकल्प के पश्चात सभी पंडित अपने यजमान अर्थात जातक के लिए काल सर्प योग निवारण मंत्र का जाप करना शुरू कर देते हैं तथा प्रत्येक पंडित इस मंत्र के जाप को प्रतिदिन 8 से 10 घंटे तक करता है जिससे वे इस मंत्र की 125,000 संख्या के जाप को संकल्प के दिन निश्चित की गई अवधि में पूर्ण कर सकें। निश्चित किए गए दिन पर जाप पूरा हो जाने पर इस जाप तथा पूजा के समापन का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है जो लगभग 2 से 3 घंटे तक चलता है। सबसे पूर्व भगवान शिव, मां पार्वती, भगवान गणेश तथा शिव परिवार के अन्य सदस्यों की पूजा फल, फूल, दूध, दहीं, घी, शहद, शक्कर, धूप, दीप, मिठाई, हलवे के प्रसाद तथा अन्य कई वस्तुओं के साथ की जाती है तथा इसके पश्चात मुख्य पंडित के द्वारा काल सर्प योग के निवारण मंत्र का जाप पूरा हो जाने का संकल्प किया जाता है जिसमे यह कहा जाता है कि मुख्य पंडित ने अपने सहायक अमुक अमुक पंडितों की सहायता से इस मंत्र की 125,000 संख्या का जाप निर्धारित विधि तथा निर्धारित समय सीमा में सभी नियमों का पालन करते हुए किया है तथा यह सब उन्होंने अपने यजमान अर्थात जातक के लिए किया है जिसने जाप के शुरू होने से लेकर अब तक पूर्ण निष्ठा से पूजा के प्रत्येक नियम की पालना की है तथा इसलिए अब इस पूजा से विधिवत प्राप्त होने वाला सारा शुभ फल उनके यजमान को भगवान शिव द्वारा तथा नाग देवताओं द्वारा प्रदान किया जाना चाहिए।

इस समापन पूजा के चलते नवग्रहों से संबंधित अथवा नवग्रहों में से कुछ विशेष ग्रहों से संबंधित कुछ विशेष वस्तुओं का दान किया जाता है जो विभिन्न जातकों के लिए भिन्न भिन्न हो सकता है तथा इन वस्तुओं में सामान्यतया चावल, गुड़, चीनी, नमक, गेहूं, दाल, खाद्य तेल, सफेद तिल, काले तिल, जौं तथा कंबल इत्यादि का दाने किया जाता है। इस पूजा के समापन के पश्चात उपस्थित सभी देवी देवताओं का आशिर्वाद लिया जाता है तथा तत्पश्चात हवन की प्रक्रिया शुरू की जाती है जो जातक तथा पूजा का फल प्रदान करने वाले देवी देवताओं अथवा ग्रहों के मध्य एक सीधा तथा शक्तिशाली संबंध स्थापित करती है। औपचारिक विधियों के साथ हवन अग्नि प्रज्जवल्लित करने के पश्चात तथा हवन शुरू करने के पश्चात कालसर्प योग के निवारण मंत्र का जाप पुन: प्रारंभ किया जाता है तथा प्रत्येक बार इस मंत्र का जाप पूरा होने पर स्वाहा: का स्वर उच्चारण किया जाता है जिसके साथ ही हवन कुंड की अग्नि में एक विशेष विधि से हवन सामग्री डाली जाती है तथा यह हवन सामग्री विभिन्न पूजाओं तथा विभिन्न जातकों के लिए भिन्न भिन्न हो सकती है। काल सर्प योग निवारण मंत्र की हवन के लिए निश्चित की गई जाप संख्या के पूरे होने पर कुछ अन्य महत्वपूर्ण मंत्रों का उच्चारण किया जाता है तथा प्रत्येक बार मंत्र का उच्चारण पूरा होने पर स्वाहा की ध्वनि के साथ पुन: हवन कुंड की अग्नि में हवन सामग्री डाली जाती है।

अंत में एक सूखे नारियल को उपर से काटकर उसके अंदर कुछ विशेष सामग्री भरी जाती है तथा इस नारियल को विशेष मंत्रों के उच्चारण के साथ हवन कुंड की अग्नि में पूर्ण आहुति के रूप में अर्पित किया जाता है तथा इसके साथ ही इस पूजा के इच्छित फल एक बार फिर मांगे जाते हैं। तत्पश्चात यजमान अर्थात जातक को हवन कुंड की 3, 5 या 7 परिक्रमाएं करने के लिए कहा जाता है तथा यजमान के इन परिक्रमाओं को पूरा करने के पश्चात तथा पूजा करने वाले पंडितों का आशिर्वाद प्राप्त करने के पश्चात यह पूजा संपूर्ण मानी जाती है। हालांकि किसी भी अन्य पूजा की भांति काल सर्प योग निवारण पूजा में भी उपरोक्त विधियों तथा औपचारिकताओं के अतिरिक्त अन्य बहुत सी विधियां तथा औपचारिकताएं पूरी की जातीं हैं किन्तु उपर बताईं गईं विधियां तथा औपचारिकताएं इस पूजा के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं तथा इसीलिए इन विधियों का पालन उचित प्रकार से तथा अपने कार्य में निपुण पंडितों के द्वारा ही किया जाना चाहिए। इन विधियों तथा औपचारिकताओं में से किसी विधि अथवा औपचारिकता को पूरा न करने पर अथवा इन्हें ठीक प्रकार से न करने पर जातक को इस पूजा से प्राप्त होने वाले फल में कमी आ सकती है तथा जितनी कम विधियों का पूर्णतया पालन किया गया होगा, उतना ही इस पूजा का फल कम होता जाएगा।

काल सर्प दोष निवारण के लिए की जाने वाली पूजा के आरंभ होने से लेकर समाप्त होने तक पूजा करवाने वाले जातक को भी कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है। इस अवधि के भीतर जातक के लिए प्रत्येक प्रकार के मांस, अंडे, मदिरा, धूम्रपान तथा अन्य किसी भी प्रकार के नशे का सेवन निषेध होता है अर्थात जातक को इन सभी वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जातक को इस अवधि में अपनी पत्नि अथवा किसी भी अन्य स्त्री के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिएं तथा अविवाहित जातकों को किसी भी कन्या अथवा स्त्री के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिएं। इसके अतिरिक्त जातक को इस अवधि में किसी भी प्रकार का अनैतिक, अवैध, हिंसात्मक तथा घृणात्मक कार्य आदि भी नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जातक को प्रतिदिन मानसिक संकल्प के माध्यम से काल सर्प दोष निवारण पूजा के साथ अपने आप को जोड़ना चाहिए तथा प्रतिदिन स्नान करने के पश्चात जातक को इस पूजा का समरण करके यह संकल्प करना चाहिए कि काल सर्प दोष निवारण पूजा उसके लिए अमुक स्थान पर अमुक संख्या के पंडितों द्वारा काल सर्प दोष निवारण मंत्र ( इस उदाहरण के लिए राहु वेद मंत्र ) के 125,000 संख्या के जाप से की जा रही है तथा इस पूजा का विधिवत और अधिकाधिक शुभ फल उसे प्राप्त होना चाहिए। ऐसा करने से जातक मानसिक रूप से काल सर्प दोष निवारण पूजा के साथ जुड़ जाता है तथा जिससे इस पूजा से प्राप्त होने वाले फल और भी अधिक शुभ हो जाते हैं।

यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि काल सर्प दोष निवारण के लिए की जाने वाली पूजा जातक की अनुपस्थिति में भी की जा सकती है तथा जातक के व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की स्थिति में इस पूजा में जातक की तस्वीर अर्थात फोटो का प्रयोग किया जाता है जिसके साथ साथ जातक के नाम, उसके पिता के नाम तथा उसके गोत्र आदि का प्रयोग करके जातक के लिए इस पूजा का संकल्प किया जाता है। इस संकल्प में यह कहा जाता है कि जातक किसी कारणवश इस पूजा के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने में सक्षम नहीं है जिसके चलते पूजा करने वाले पंडितों में से ही एक पंड़ित जातक के लिए जातक के द्वारा की जाने वाली सभी प्रक्रियाओं पूरा करने का संकल्प लेता है तथा उसके पश्चात पूजा के समाप्त होने तक वह पंडित ही जातक की ओर से की जाने वाली सारी क्रियाएं करता है जिसका पूरा फल संकल्प के माध्यम से जातक को प्रदान किया जाता है। प्रत्येक प्रकार की क्रिया को करते समय जातक की तस्वीर अर्थात फोटो को उपस्थित रखा जाता है तथा उसे सांकेतिक रूप से जातक ही मान कर क्रियाएं की जातीं हैं। उदाहरण के लिए यदि जातक के स्थान पर पूजा करने वाले पंडित को भगवान शिव को पुष्प अर्थात फूल अर्पित करने हैं तो वह पंडित पहले पुष्प धारण करने वाले अपने हाथ को जातक के चित्र से स्पर्श करता है तथा तत्पश्चात उस हाथ से पुष्पों को भगवान शिव को अर्पित करता है तथा इसी प्रकार सभी क्रियाएं पूरी की जातीं हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि व्यक्तिगत रूप से अनुपस्थित रहने की स्थिति में भी जातक को पूजा के आरंभ से लेकर समाप्त होने की अवधि तक पूजा के लिए निश्चित किये गए नियमों का पालन करना होता है भले ही जातक संसार के किसी भी भाग में उपस्थित हो। इसके अतिरिक्त जातक को उपर बताई गई विधि के अनुसार अपने आप को इस पूजा के साथ मानसिक रूप से संकल्प के माध्यम से जोड़ना भी होता है जिससे इस पूजा के अधिक से अधिक शुभ फल जातक को प्राप्त हो सकें।

कालसर्प दोष के निवारण के लिए की जानी वाली पूजा की विधि को जान लेने के पश्चात आइए अब यह देखते हैं कि इस पूजा के लिए चुने जाने वाले स्थान की इस सारी विधि में क्या महत्ता है। इसमें कोई शक नहीं है कि भगवान शिव के त्रयंबकेश्वर मंदिर(महाराष्ट्र) में या उज्जैन के सिद्धवट (मध्यप्रदेश) पर की जाने वाली काल सर्प योग निवारण पूजा का फल किसी साधारण मंदिर में की गई पूजा के फल से अधिक होगा तथा किसी साधारण मंदिर में की गई पूजा का फल मंदिर के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान पर की गई पूजा के फल से अधिक होगा किन्तु यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य तथा स्मरण रखने योग्य है कि किसी भी अन्य पूजा की भांति ही काल सर्प योग निवारण पूजा के लिए चुना गया स्थान भी इस पूजा की फल प्राप्ति में केवल अतिरिक्त वृद्धि कर सकता है तथा इस पूजा का वास्तविक फल मुख्य तथा मूल रूप से इस पूजा के लिए किये जाने वाले कालसर्प दोष निवारण मंत्र के 125,000 जाप में होता है तथा यह जाप ही इस पूजा के फलदायी होने के लिए सबसे महत्वपूर्ण औपचारिकता है तथा बाकी की सभी विधियां तथा औपचारिकताएं केवल इस मंत्र के जाप से प्राप्त होने वाले पुण्य को सही दिशा में निर्देशित करने में तथा कुछ सीमा तक बढा देने में सहायक होतीं हैं तथा इनमें से किसी भी विधि अथवा औपचारिकता में इस पूजा का मुख्य फल नहीं होता।

इस लिए कालसर्प दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा में मंत्र की जाप संख्या को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहिए तथा त्रयंबकेश्वर अथवा उज्जैन जैसे स्थानों पर इस पूजा का आयोजन केवल तभी करवाना चाहिए यदि इन स्थानों पर इस पूजा के लिए उपस्थित रहने वाले पंडित इस जाप की संख्या को पूरा करने में सक्षम तथा संकल्पित हों जिससे इस पूजा के शुरू होने से लेकर समाप्त होने तक लगभग 7 दिन का समय लग जाता है। किन्तु यदि इन स्थानों पर उपस्थित पंडित आपको काल सर्प दोष निवारण की यह पूजा 2 से 3 घंटों में पूर्ण करवा देने का आश्वासन देते हैं तो ध्यान रखें कि इन पंडितों के द्वारा की जाने वाली प्रक्रिया कालसर्प योग की निवारण पूजा नहीं है अपितु इस पूजा के अंतिम दिन की जाने वाली समापन प्रक्रिया जैसी प्रक्रिया है जिसमे काल सर्प योग निवारण मंत्र का जाप सम्मिलित न होने के कारण इसका फल कालसर्प दोष निवारण के लिए की जाने वाली संपूर्ण पूजा के फल की तुलना में 5% से 10% तक ही होगा तथा इस प्रक्रिया को पूर्ण करवाने से कालसर्प योग निवारण पूजा का मुख्य फल जो कालसर्प दोष के निवारण मंत्र के जाप में है, आपको प्राप्त नहीं होगा।

इस बात का सदैव ध्यान रखें कि किसी भी अन्य पूजा की भांति ही कालसर्प दोष के निवारण के लिए की जाने वाली पूजा में भी पूरी विधि से संपूर्ण प्रक्रिया का पूर्ण होना पूजा के लिए चुने जाने वाले स्थान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है तथा पूजा के लिए चयनित स्थान केवल विधिवत की जाने वाली पूजा के फल को बढ़ाने के लिए होता है। यदि त्रयंबकेश्वर जैसे धार्मिक स्थानों पर बैठे पंडित इस पूजा को पूरी विधि के साथ तथा कालसर्प दोष निवारण मंत्र की पूरी जाप संख्या के साथ करने में सक्षम हों तो निश्चिय ही इस पूजा को अपने शहर के किसी मंदिर की तुलना में त्रयंबकेश्वर जैसे धार्मिक स्थानों पर करवाना अधिक लाभकारी है।

किन्तु यदि इन स्थानों पर उपस्थित पंडित इस पूजा को विधिवत नहीं करते तथा काल सर्प योग के निवारण मंत्र का निश्चित संख्या में जाप भी नहीं करते तो फिर इस पूजा को अपने शहर के अथवा किसी अन्य स्थान के ऐसे मंदिर में करवा लेना ही उचित है जहां पर इस पूजा को पूरी विधि तथा मंत्रों के पूरे जाप के साथ किया जा सके। ध्यान रखें कि यदि आप त्रयंबकेश्वर तथा उज्जैन जैसे स्थानों पर परम शक्तियों का आशिर्वाद लेने के लक्ष्य से जाना चाहते हैं तो वह आशिर्वाद आप इन स्थानों पर पूर्ण श्रद्धा के साथ जाकर तथा यहां उपस्थित परम शक्तियों को पूर्ण श्रद्धा के साथ नमन करके भी प्राप्त कर सकते हैं। वहीं पर दूसरी ओर यदि आप इन स्थानों पर कालसर्प दोष के निवारण के लिए की जाने वाली कोई पूजा करवाने जा रहे हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि आपकी पूजा पूरी विधि तथा मंत्रों के जाप के साथ हो रही है। त्रयंबकेश्वर तथा उज्जैन जैसे धार्मिक स्थानों पर जाना तथा इन स्थानों पर उपस्थित परम शक्तियों का आशिर्वाद लेना बहुत शुभ कार्य है तथा प्रत्येक व्यक्ति को यह कार्य यथासंभव करते रहना चाहिए, किन्तु इन धार्मिक स्थानों पर उपस्थित पंडितों के द्वारा दिशाभ्रमित हो जाना अथवा ठगे जाना एक बिल्कुल ही भिन्न विषय है तथा इसलिए धार्मिक स्थानों पर किसी भी प्रकार की पूजा का आयोजन करवाते समय बहुत सतर्क तथा सचेत रहने की आवश्यकता है जिससे आपके दवारा करवाई जाने वाली पूजा का शुभ फल आपको पूर्णरूप से प्राप्त हो सके।

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====कालसर्प योग के प्रकार——-

—अनंत कालसर्प योग
—-कुलिक कालसर्प योग
—-वासुकि कालसर्प योग
—-शंखपाल कालसर्प योग
—-पद्म कालसर्प योग
—महापद्म कालसर्प योग
—–तक्षक कालसर्प योग
—-कर्काेटक कालसर्प योग
—-शंखनाद कालसर्प योग
—-पातक कालसर्प योग
—–विषाक्त कालसर्प योग
—–शेषनाग कालसर्प योग

जानिए की क्या होती हैं कालसर्प दोष से हानियां—-

कालसर्प योग से पीडित जातक का भाग्य प्रवाह राहु-केतु अवरूद्ध करते है जिसके परिणाम स्वरूप जातक को अनेक प्रकार कि समस्याओं का सामना करना पडता है। जिस जातक की जन्मकुंडली में कालसर्प दोष होता है उसे विभिन्न दुख, कष्ट एवं परेशानीयों का सामना करना पडता है।

1. जातक के भाग्योदय में अनेक प्रकार की रूकावटें आती है।
2. जातक की प्रगति नहीं होती।
3. जातक को प्रत्येक कार्य में असफलता मिलती है।
4. जातक को जीविका चलाने का साधन नहीं मिलता यदि मिलता है तो उसे अनेक समस्याओं का सामना करना पडता है।
5. जातक को पैतृक धन-संपप्ति से लाभ नहीं होता।
6. जातक को शिक्षा में बाधा, स्मरण शक्ति का ह्नास होता है। उसकी शिक्षा प्रायः अधूरी रहती है।
7. जातक का विवाह नहीं हो पाता। वैवाहिक संबंध टूट जाते है।
8. जातक के घर संतान पैदा नहीं होती, यदि होती भी है तोे जीवित नहीं रहती।
9. जातक के घर पुत्र संतान उत्पन्न नहीं होती या अनेक पुत्रियां होती है।
10.जातक की संतान भी कुबुद्धि और उद्दंडी होती है।
11. जातक की संतान वृद्धावस्था में अलग हो जाती है अथवा दूर चली जाती है।
12. जातक का वैवाहिक जीवन कलहपूर्ण होता है।
13.जातक की पत्नि अज्ञानी, मूर्ख, कामुक, अल्पज्ञ तथा अविश्वासी होती है।
14.जातक अपने मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा के लिए निरंतर संघर्ष करता रहता है, फिर भी अपयश, आलोचना, उपेक्षा आदि से घिरा रहता है।
15.जातक को प्रेम संबंधों में निराशा ही हाथ लगती है।
16.जातक को भौतिक सूखों की कमी रहती है।
17. जातक के मन में सदैव निराशा बनी रहती है।
18. जातक अधिक परिश्रम करने के बाद भी धन का संचय नहीं कर पाता।
19. जातक धनवान होते हुए भी कंगाल बन जाता है। प्राप्ति से अधिक व्यय रहता है।
20. जातक के घर में कलह-क्लेश का वातावरण बना रहता है।
21. जातक सदैव किसी न किसी रोग से ग्रस्त रहता है।
22. जातक भयंकर गुप्त रोगों से आजीवन पीडित रहता है।
23. जातक मानसीक रूप से सदैव तनावग्रस्त रहता है। दिमाग में गुस्सा भरा रहता है। निरंतर परेशानीयों के कारण जातक चिडचिडे स्वभाव का हो जाता है।
24.जातक एक के बाद एक मुसीबतों का सामना करता है। भयंकर कठिनाई में जीवन व्यतीत करता है। जातक का जीवन संघर्षमय होता है।
25.जातक को भाई-बहनों, नातें-रिश्तेदारों एवं मित्रों से धोखा मिलता है।
26.जातक को गुप्त शत्रुओं से हानी उठानी पडती है।
27.जातक सदैव आर्थिक संकट से परेशान रहता है।
28.जातक के द्वारा दूसरों को दिया गया धन वापस नहीं मिलता।
29.जातक को व्यापार-व्यवसाय में हानि उठानी पडती है।
30.जातक को व्यापार में साझेदारों से धोखा मिलता है। बने-बनाए कार्यों में रूकावटें आती है।
31.जातक के घर में धन को लेकर झगडे की स्थिति बनी रहती है।
32. जातक को विदेश प्रवास में अत्यधिक कष्ट झेलने पडते है।
33 ..जातक को नौकरी में पदोन्नति नहीं होती है।
34. जातक के मकान में वास्तुदोष रहता है।
35. जातक हमेशा कर्ज के बोझ सेें दबा रहता है।
36. जातक को कोर्ट-कचहरी में हानी उठानी पडती है।
37. जातक को राज्य, सरकारी अधिकारीयों से असंतोष व अज्ञात भय बना रहता है।
38. जातक को अकस्मात शस्त्राघात अथवा जहर से अकाल मृत्यु होने का भय रहता है।
39. जातक को अनेक प्रकार की पीडाएं एवं कष्ट सहन करना पडता है।
40. जातक में धर्म और ईश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास में कमी होती जाती है और वह नास्तिक बन जाता है।

आपके जन्म कुंडली में कालसर्प योग है या नहीं? घबरायें नहीं, आप समय लेकर हमसे मिलें अथवा संपर्क करें—
==पंडित “विशाल” दयानंद शास्त्री..
मोब.–09024390067
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कालसर्प दोष की शांति के हेतु पूजन—-

कालसर्प दोष की शांति का पूजन विधि-विधान से होता है। यह एक कष्टकारक योग है इसलिए इसके पूजन में अनेक प्रकार की सावधानियां, नियम-संयम का ध्यान रखा जाता है। अगर उन बातों का ध्यान नहीं रखा जाए एवं पूजा-पाठ करा दि जाए तो उसके पूजन का संपूर्ण लाभ जातक को प्राप्त नहीं होता एवं उसकी समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रहती है इसलिए इसका पूजन पंडित सुनीलजी उपाध्याय से संपर्क कर ही करवाना चाहिए। इसका पूजन किसी नदी के किनारे या शंकरजी के स्थान पर ही किया जाना चाहिए। इसका पूजन कभी भी किसी जातक के घर में नहीं कराया जा सकता यह शास्त्र विरूद्ध है। इसके पूजन की विधि तीन घंटों की होती है। यानि की यह विधि एक ही दिन में पूर्ण हो जाती है।

पूजन-विधि:—–

कालसर्प एवं राहु की प्रतिमाओं को कलश पर स्थापित कर पूजा प्रारंभ की जाती है। स्वर्ण के नौ नाग, कालसर्प एवं राहु की प्रतिमा, उन्हे भाने वाले अनाज, दशधान्य, हवन सामग्री, पिंड आदि तैयार करने के पश्चात् पूजा संपन्न होती है। इस पूजन में संकल्प, गणपति पूजन, पुण्याहवाचन, मातृपूजन, नांदीश्राद्ध, नवग्रह पूजन, होम-हवन आदी किये जाते है। इस पूजन हेतु स्वयं के लिए नए वस्त्र, ब्राहमण के लिए नए वस्त्र, एवं ब्राहमण को दक्षिणा दी जाती है। कालसर्प दोष की शांति के लिए राहु, काल और सर्प तीनों की पूजा, मंत्रजाप, दशांश होम, ब्राहमण भोजन, दान आदि अनवार्य रूप से करना होता है।

कालसर्प दोष पूजन के प्रकार—-

पूजन
गणेश गौरी पूजन
वरूण पूजन
नवग्रह पूजन
षोडश मात्रिका पूजन
कालसर्प दोष पूजन ;
9 नाग-नागिन
हवन

==विशेष पूजन
गणेश गौरी पूजन
वरूण पूजन
पुण्याहवाचन
षोडश मात्रिका पूजन
सप्तघृत मात्रिका पूजन
ब्राहमण पूजन
नवग्रह पूजन
कालसर्प दोष पूजन ;
9 नाग-नागिन का joda
राहू-केतू के जाप
हवन

आपके जन्म कुंडली में कालसर्प योग है या नहीं? घबरायें नहीं, आप समय लेकर हमसे मिलें अथवा संपर्क करें—
==पंडित “विशाल” दयानंद शास्त्री..
मोब.–09024390067

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