अनेक रूप हें प्यार के

=== अनेक रूप हें प्यार के…!!!!
==पाठकों से एक विनम्र निवेदन –प्यार केवल शारीरिक सुख/तन कि प्यास बुझाना ही नहीं होता हें..इसके अनेक रूप होते हें..)
—(पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, मोब.–09669290067)

प्यार के रूप अनेक है,माँ का प्यार उसमे एक
ये प्यार सबसे सर्वोत्तम है,जरा माँ बन के “विशाल” तू देख
प्यार को जो बदनाम करते है,उनकी अच्छी नही है सोच
प्यार तो एक पवित्र रिश्ता है,ये अपनी अपनी “विशाल” सोच
प्यार करना कोई गुनाह नही,ना कोई ये पाप
प्यार तो एक पवित्र बंधन है,इसको करके देखे “विशाल” आप
प्यार एक चुम्बक है,सबको लेता है खीच
इसमें एक आकर्षण है,दो प्रेमियो के “विशाल” बीच
प्यार की एक अपनी भाषा है,जो भाषाओ की भाषा है,
भाषा तो एक कहने का माध्यम है,प्यार तो दिल की “विशाल” अभिलाषा है
प्यार से सारे झगड़े निपट जाते,प्यार से सारे काम बन जाते
प्यार से गैर अपने हो जाते,प्यार से दो दिल “विशाल” एक हो जाते
प्यार से हार जीत मे बदल जाती,प्यार से शत्रु मित्र बन जाते
प्यार से भगवान झूठे फल खाते,प्यार से “विशाल” भगवान दोड कर आते…

===( पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री, मोब.–09669290067)
==पाठकों से एक विनम्र निवेदन –प्यार केवल शारीरिक सुख/तन कि प्यास बुझाना ही नहीं होता हें..इसके अनेक रूप होते हें..)

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