वास्तु निर्माण से सम्बंधित शास्त्रीय नियम

केसे जाने की वास्तु दोष हें ग्रंथों/शास्त्रों के अनुसार—-

(वास्तु निर्माण से सम्बंधित शास्त्रीय नियम)—-

सामान्यतया मनुष्य अपने रहने के लिए ऐसा घर बनते हैं जो उनकी हर आवासीय जरूरत पूरी करता है जबकि अन्य प्राणी घर या तो बनाते ही नहीं या उसमें केवल रात गुजारते हैं। मनुष्य अपने जीवन का अधिकांश समय इमारतों में ही व्यतीत करते हैं।

भारतीय भवन निर्माण कला की अद्वितीय परंपरा को सारे विश्व में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है. भारतीय भवन निर्माण कला स्वयं में कला, विज्ञान तथा आध्यात्म का एक ऐसा अभूतपूर्व तथा विलक्षण संगम है जिसके समकक्ष शिल्प कला विश्व के किसी भी भाग में नही पायी जाती. हमारे भवनों में जहां एक ओर रहने की सुविधाजनक व्यवस्थाओं का चिंतन किया गया है वहीं दूसरी ओर गृहस्थ जीवन पर ज्योतिष, तंत्र तथा दैवीय शक्तियों के प्रतीकात्मक तथा व्यावहारिक प्रभाव का लाभदायक प्रभाव प्राप्त करने के निमित्त वास्तु शास्त्र नामक एक पूरा विधान भी गढा गया तथा उसके अनुसार भवनों को ज्यादा उपयोगी तथा गृहस्थ जीवन को पूर्णता प्रदान करने में सहयोगी बनाने का भी प्रयास किया गया.

प्राचीन एवम सर्वमान्य संहिता व वास्तु ग्रंथो में प्रतिपादित कुछ शास्त्रीय वास्तु नियमों का उल्लेख किया जाता है | वास्तु निर्माण में इनका प्रयोग करने पर वास्तु व्यक्ति के लिए सब प्रकार से शुभ ,समृद्धि कारक एवम मंगलदायक होता है |आजकल के तथाकथित वास्तु शास्त्रियों द्वारा जनसाधारण को व्यर्थ के बहम में डालने वाले तथा अपने ही गढे हुए नियमों पचडे में न पड़ कर केवल इन्हीं शास्त्रीय नियमों का पालन करने पर वास्तु सब प्रकार से शुभ होता है।

आज हम पुनः भवन निर्माण के प्राचीन नियमों अर्थात वास्तु को मान्यता दे रहे हैं. कई भव्य भवन जो वास्तु के सिद्धांतों के अनुसार नही थे बल्कि विख्यात आर्किटेक्टों के निर्देशन में बने थे उनको तोडकर वास्तुशास्त्र के अनुसार बनाने पर वहां रहने वालों को अत्यंत ही सुखद परिणाम प्राप्त हुए. जिसने आज वास्तु को भवन निर्माण के लिए एक अनिवार्यता के रूप में प्रस्तुत कर दिया है. एक ऐसा शास्त्र जो हमारी अन्य पारंपरिक विधाओं की ही तरह अपने महत्व को प्रमाणित करने में समर्थ हो रहा है.
एक अच्छे भवन का परिरूपण कई तत्वों पर निर्भर करता है।
यथा :– भूखंड का आकार, स्थिति, ढाल, सड़क से सम्बन्ध, दिशा, सामने व आस-पास का परिवेश, मृदा का प्रकार, जल स्तर, भवन में प्रवेश कि दिशा, लम्बाई, चौडाई, ऊँचाई, दरवाजों-खिड़कियों की स्थिति, जल के स्रोत प्रवेश भंडारण प्रवाह व् निकासी की दिशा, अग्नि का स्थान आदि। हर भवन के लिए अलग-अलग वास्तु अध्ययन कर निष्कर्ष पर पहुचना अनिवार्य होते हुए भी कुछ सामान्य सूत्र प्रतिपादित किए जा सकते हैं जिन्हें ध्यान में रखने पर अप्रत्याशित हानि से बचकर सुखपूर्वक रहा जा सकता है।

हमारे ग्रंथों में लिखा भी हें की—-
वास्तुमूर्तिः परमज्योतिः वास्तु देवो पराशिवः
वास्तुदेवेषु सर्वेषाम वास्तुदेव्यम — “समरांगण सूत्रधार, भवन निवेश”

वास्तु मूर्ति (इमारत) परम ज्योति की तरह सबको सदा प्रकाशित करती है। वास्तुदेव चराचर का कल्याण करनेवाले सदाशिव हैं। वास्तुदेव ही सर्वस्व हैं वास्तुदेव को प्रणाम। सनातन भारतीय शिल्प विज्ञानं के अनुसार अपने मन में विविध कलात्मक रूपों की कल्पना कर उनका निर्माण इस प्रकार करना कि मानव तन और प्रकृति में उपस्थित पञ्च तत्वों का समुचित समन्वय व संतुलन इस प्रकार हो कि संरचना का उपयोग करनेवालों को सुख मिले, ही वास्तु विज्ञानं का उद्देश्य है।
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ज्योतिष विद्या एक विशाल समुन्द्र है संस्कृत में ज्योतिष का अभिप्राय उस प्रकाश से है। जो हमें ज्ञान देता है। अंग्रेजी भाषा में उसे आस्ट्रोलोजि कहते है। ”आस्ट्रो” का अर्थ ”तारे” और ”लोगोस” का अर्थ ”तर्क” होता है। अत: ज्योतिष विद्या का अर्थ है एक विशिष्ट समय तक राशि चक्र में ग्रहों और नक्षत्रों की गति का तर्क संगत प्रभाव ज्ञात करना (बारह भावों का फल)।
यह उचित कहा गया है कि वास्तु शास्त्रा कला एवं विज्ञान का सम्मिश्रण है। जिसमें रहस्यमयी या अलौकिक विज्ञान के अतिरिक्त शिल्प विद्या अभियान्त्रिकी अन्त: एवं वाह्य सञ्जाए पर्यावरण व अरगोंनोमिक्स, खगोलविद्या व ज्योतिष-शास्त्रा भी सम्मलित है। इसका मुख्य प्रयत्न मानव प्रकृति व भवनों में मानव जाति के उद्दार हेतु सन्तुलन व सामन्जस्य स्थापित करना है।

कहा गया हें की—–
अभिगर्हितो संक्रमितो त्याज्यमावासम खल्वशुभेक्षितो यत.
वृषम यातः उत्खलितो एकदा न पुनरागमनो भवति.
यदि आदमी अपना तथा अपने परिवार का सुख एवं अभ्युदय चाहता हो तों उस आवास में रहना ठीक उसी प्रकार त्याग दे जैसे एक बार वृषोत्सर्ग हो जाने के बाद फिर उस वृष को वापस घर नहीं लाया जाता. यह कथन देवर्षि नारद का है जिन्होंने देवल ऋषि को वास्तु के सिद्धांतो क़ी शिक्षा दे ते हुए बताया था.
ज्योतिष के दो अंग है :- सिळान्त तथा फलित।
सिळान्त के अन्तर्गत विभिन्न दार्शनिक विचार या ज्योतिषशास्त्र के नियम आते है जबकि फलित के निम्नलिखित पाँच मुख्य भाग है। (1) जातक (2) ताजिक (3) मुहूत्र्त (4) प्रशान (5) संहिता।

मुहूत्र्त ज्योतिष के ही एक पक्ष के ”वास्तु के प्रकरण” के नाम से जानते है।

घर बनाना हो तो पहले गन्ध वर्ण रस तथा आकृति के द्वारा क्षेत्र यानी भूमि की परीक्षा कर लेनी चाहिये। यदि उस स्थान में मिट्टी मधु शहद के समान गन्ध हो तो ब्राहमणों के लिये फ़ूल जैसी गन्ध हो तो क्षत्रियों के लिये खटाई जैसी गन्ध हो तो वैश्यों के लिये और मांस जैसी गन्ध हो तो वह स्थान शूद्र जाति के लिये मान्य होता है। वहां की मिट्टी का रंग सफ़ेद हो तो ब्राहमणों के लिये,लाल हो तो क्षत्रियों के लिये और पीली हो तो वैश्य के लिये और काली हो तो शूद्र के निवास के लिये उपयुक्त मानी जाती है,यदि वहां की मिट्टी का स्वाद मीठा हो तो ब्राहमणो के लिये और कडुआ यानी मिर्च की भांति चरपरी लगे तो क्षत्रियों के लिये,खटीली हो तो वैश्यों के लिये और कसैला स्वाद हो तो शूद्रों के लिये ठीक मानी गयी है। ईशान पूर्व और उत्तर दिशा सबके लिये अत्यन्त वृद्धि देने वाली मानी गयी है। अन्य दिशाओं में नीची भूमि सबके लिये हानिकारक होती है।

सर्व प्रथम यह ज्ञान करने हेतु कि व्यक्ति विशेष के भाग्य में जमीन, मकान, भवन इत्यादि सम्पतियाँ हैं और यदि ऐसा है तो कब कहाँ और कैसे वह उनको प्राप्त करेगा। और वे कितने बड़े या छोटे होगें।
दूसरी बात यह ज्ञात करने हेतु कि प्लाट या भूमि खरीदने के लिये निर्माण प्रारम्भ करने के लिये मुख्य नीवं का पाया ज्ञात करना प्रवेश द्वार व दरवाजा निश्चित करने हेतु और अन्त में ”गृह-प्रवेश” हेतु कार्यालय, कारखाना, छविग्रह, होटल, पाठशाला या महाविद्यालय इत्यादि के उद्घाटन हेतु कौन सा समय अत्यधिक शुभ है। ताकि मालिकों और निवासियों चाहे वे वहाँ रहे या कर्मचारियों के रुप में काम करें या यहाँ तक कि यात्रा, दृष्टा, विद्यार्थी या ग्राहक ही हो, हेतु सभी प्रकार की उन्नति, खुशहाली व शान्ति सुनिश्चित की जा सके।

हम किसी भी जातक की जन्मपत्राी से ज्ञात कर सकते है कि जातक के भू-सम्पदा का योग है तथा भवन-निमार्ण कर ”भवन-सुख” है तो उस समय यह भी विचार करना चाहिये कि भवन हेतु भूमि कौन से नगर तथा नगर का कौन सा भाग अनुकूल है। क्यों कि प्रत्येक व्यक्ति के लिये नगर या मौहल्ला भवन-निर्माण हेतु उपयुक्त नहीं होता है तथा उपयुक्त दिशा का भी चयन कर लेना चाहिये। क्यों कि अनुकूल दिशा वाले भाग मे निर्मित भवन सभी प्रकार से शुभ सूचक होता है।

अब प्रश्न आता है कि भवन क्रय या निर्माण का कार्य किस नाम राशि से करना चाहिये। देश, ग्राम, गृह, युळ, नौकरी, व्यापार वमुकदमे में बोलते नाम राशि का प्रयोग करना चाहिये। जन्मराशि का प्रयोग यात्रा, ग्रह-गोचर एवं शुभ कार्यो मे करना चाहिये। किसी व्यक्ति के कई नाम हो तो पुकारने पर वह जिस नाम से सोता हुआ जाग जाय उसको प्रयोग मे लाना चाहिये।

व्यक्ति की नाम राशि से नगर या मौहल्ला की नाम राशि 2, 5, 9, 10 व 11 वीं हो तो शुभ। 1, 7 हो तो शत्रु। 4, 8 व 12 हो तो रोग। 3, 6 हो तो रोग कारक समझना चाहिये नगर शुभ न होतो जिस मौहल्ले में गृह निमार्ण करना हो वह शुभ होना चाहिये। यदि नगर व मौहल्ला शुभ होतो सर्वोत्तम है।
यदि व्यक्ति की नाम राशि से नगर या हमौहल्ले की नाम राशि 1, 3, 4, 6, 7, 8 व 12 वीं हो तो पहली राशि में होने पर इसका फल शत्रु, तीसरी राशि में होने पर हानि, चौथी राशि में होने पर रोग, छठी राशि में होने पर हानि, सातवीं राशि में होने पर शत्राु, आंठवी राशि में होने पर रोग और बारहवीं राशि में होने पर भी रोग होता है।
उक्त विचार करने पर यदि नगर व मौहल्ला शुभ एवं सर्वोत्तम है। तो यदि प्लाट पूर्व मुखी है तो श्रेष्ठ और यदि प्लाट के पूर्व व उत्तर में सड़क है तो सर्वश्रेष्ठ यदि उत्तरी मुखी है तो भी श्रेष्ठ, यदि पश्चिम मुखी है तो सामान्य और यदि दक्षिण मुखी है तो नेष्ठ होता है। जो अनेक समस्याओं और कष्ठ देने वाला होता है। प्लाट को क्रय करते समय शूल अथवा सड़क बीथी नहीं होनी चाहिये। क्यों कि सड़क-शूल दुर्घटना तथा अन्य बाधाओं का कारक होता है।

नगर व मौहल्ला शुभ व अशुभ देखने के लिये निम्न सारिणि है। जिससे आशानी पूर्वक देखा जा सकता है।
उक्त सारिणी से आसानी पूर्वक शहर या नगर या मौहल्ला का शुभ अशुभ का विचार करके यदि शुभ होतो भवन निर्माण करना चाहिये यदि अशुभ हो तो विचार नहीं करना चाहिये। यदि भाग्य से व्यक्ति को शुभ शहर, शुभ कालौनी (मौहल्ला) शुभ मुख का प्लाट मिलता हो तो व्यक्ति के अवश्य भवन बना कर रहना चाहिये, इससे व्यक्ति का चहुमुखी विकास होता है। और अपने जीवन का सभी प्रकार का आनन्द लेकर सुखमय जीवन व्यतीत करता है। व्यक्ति के इसके विपरीत तथ्यों की ओर अग्रसर नहीं होना चाहिये। क्यों कि जीवन केा कष्टमय और संघर्ष पूर्ण बनाना औचित्य पूर्ण नहीं है।
नगर या मौहल्ला (कालौनी) चयन कर लेने के बाद यह निर्णय करना चाहिये कि उसका (नगर या मौहल्ला) किस दिशा का भाग अनुकूल है। यह भी नाम राशि से ज्ञात कर सकते है।

शुभाशुभ-दिशा ज्ञान चक्र—–
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उक्त सारिणी के आधार पर अभिप्राय: यह है कि मेष राशि वाले उत्तर दिशा में, मिथुन, सिंह, व मकर राशि वाले मध्य भाग में कर्क राशि वाले नैऋत्य भाग में कन्या राशि वाले पूर्व भाग में, धनु राशि वाले पश्चिम भाग, कुम्भ राशि वाले ईशान भाग में और मीन राशि वाले केा अग्नि भाग में नहीं रहना चाहिये। इनके अतिरिक्त अन्य दिशाओं में रहना चाहिये। क्यों कि वे दिशायें उनके लिये सुख-आराम के लिये शुभ एवं लाभप्रद रहेगी।

किसी भी जातक की जन्म पत्रिाका से उसके भवन के शुभ व अशुभ का ज्ञान हम कर सकते हे। लग्न पूर्व दिशा है जिसमें शुभ ग्रह का होना लाभप्रद होता है। द्वितीय भाव और तृतीय भाव ईशान कोण है जिनमें गुरु व चन्द्रमा का होना बहुत शुभ होता है। चतुर्थ भाव उत्तर दिशा है जिसमें शुभ ग्रहों का होना लाभ प्रद होता है। पं’चम व षष्ढ भाव वायव्य कोण है जिसमें योग कारक ग्रह अथवा केन्द्राधिपति का होना शुभ एवं लाभप्रद हैं सप्तम भाव पश्चिम दिशा है जिसमें पाप ग्रह व पाप राशि का होना अशुभ है। क्यों कि सप्तम भाव या सप्तमेश मारकेश होता है। अष्टम व नवम भाव नैऋत्य कोण है। जिसमें शनि होना शुभ है। क्यों कि अष्टम दुर्घटना व आयु तथा रहस्यमयी विद्याओं का स्थान है। अष्टमस्य शनि दीर्घ आयु प्रदान करता है। दशम भाव दक्षिण – दिशा है जिसमें योग कारक ग्रह अथवा केन्द्रपति व त्रिाकोणपति का बैढना शुभ होता है। एकादश भाव और द्वादश भाव अग्निकोण है। जिसमें ग्रहों का न होना अच्छा होता है। यदि उक्त दिशाओं में पाप ग्रह, नीच ग्रह या पाप ग्रहों की दृष्टियाँ होती है तो उस जातक के मकान मे उस भाग में कोई न कोई दोष अज्ञानवश या परिस्थितिवश बन जाता है जिसके फलस्वरुप वह जीवन भर कष्ट पाता है। यदि किसी सुयोग्य वास्तुकार को मकान का अवलोकन करा दिया जाय तो उस दोष का निवारण हो सकता है। निवारण का योग उस जातक की शुभ ग्रह की दशा व अन्तर दशा तथा प्रत्यान्तर दशा में बनता है। इसलिये जातक को उस योग का लाभ, प्रयास करके प्राप्त कर लेना चाहिये अन्यथा पश्चाताप बना रहता है।
वराह मिहिर के अनुसार वास्तु का उद्देश्य ‘इहलोक व परलोक दोनों की प्राप्ति है।
नारद संहिता, अध्याय ३१, पृष्ठ २२० के अनुसार-

अनेन विधिनन समग्वास्तुपूजाम करोति यः
आरोग्यं पुत्रलाभं च धनं धन्यं लाभेन्नारह।
अर्थात इस तरह से जो व्यक्ति वास्तुदेव का सम्मान करता है वह आरोग्य, पुत्र धन – धन्यादी का लाभ प्राप्त करता है।
प्रायः आज कल लोग बिल्डरों द्वारा बनायी कालोनियों में बने बनाए घरो में निवास प्रारम्भ कर देते है. जिसके पीछे वास्तु के सूक्ष्म नियमो क़ी अनदेखी कर अपनी आर्थिक एवं समय क़ी बचत के बारे में ही बिल्डर ज्यादा सोचते है.
परिणाम यह निकलता है कि कुछ ही दिनों बाद वहां रहने वाला व्यक्ति विविध कठिनाईयों एवं उपद्रवो का शिकार होने लगता है.पहले तों अपनी अति आधुनिक बुद्धि का सहारा लेता है. तथा “पोंगा पंथी” एवं “पौराणिक मान्यताओं” को धता बताने का भरसक प्रयास करता है. और अंत में जब चारो तरफ से थक जाता है तों अंत में वास्तु के नियमो क़ी खोज करने लगता है. अस्तु, जो भी हो, यहाँ कुछ प्रमुख दोषों एवं उनका परिहार को जानने का प्रयास करते हें—–
उपार्तिक दोष.—–
यदि भवन में आपाती किरणों का क्षेत्र समूचे घर के आयतन के अनुपात में 3:1 से कम है. तों उपार्तिक दोष लगता है. इसके परिणाम स्वरुप घर में से लक्ष्मी का निवास समाप्त होता चला जाता है. धीरे धीरे आदमी क़र्ज़ में डूब जाता है. न चाहते हुए भी पैसा हाथ से निकलता चला जाता है. और आदमी बिल्कुल ही थक जाता है. उपार्तिक दोष में आपाती किरणें मंगल क़ी अभिजात किरणों से परावर्तित होकर घर में प्रवेश करती है. किन्तु इसका उपद्रव तब और विशेष रूप से बढ़ जाता है जब शुक्र के साथ मंगल क़ी किरणों का किसी भी तरह से सम्बन्ध बन जाय. इसके निवारण का एक ही उपाय है कि यदि घर के उसी कोण पर फर्श से ढाई हाथ ऊपर दीपरखा का निर्माण कर आधानीकरण स्थापित कर दें. किन्तु इस उपाय का भी प्रभाव तब नहीं हो पायेगा यदि गृह प्रवेश किसी क्षिप्र या अंधनक्षत्र में हुआ होगा. या गृह स्वामी का जन्म नक्षत्र क्षिप्र या अंध नक्षत्र हो.
विभ्राण दोष- —-
यदि भवन में सजातीय दीवारें परस्पर चौडाई में संलग्न वामावर्ती द्वार से पश्चिम या दक्षिण हो तों विभ्राण दोष होता है. ऐसी अवस्था में संबंधियों से बिलगाव, बेटे बेटी क़ी शादी में दिक्कतें, तथा जगह जगह अपमान प्राप्त होता है. यह इसलिये होता है क्योंकि उपादेयी एवं प्राक्षिक किरणों के संचलन का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है. अर्थात गुरु एवं बुध षडाष्टक दोष बनाते है. इसके लिये पूर्वाषाढा, मूल, रेवती या धनिष्ठा नक्षत्रो में जब बुधवार पड़े तब गृह स्वामी अपने हाथ से एक हाथ लंबा चौड़ा सफ़ेद पत्थर का कितनी भी मोटाई का टुकड़ा लेकर उस पर मूल मन्त्र उद्धृत करवा ले. फिर उसे जागृत कर सुन्दर तरीके से उस वामावर्ती दीवार में चिनवा दे जिसके कारण यह दोष उत्पन्न हुआ हो. इसे अच्छी तरह से सजा कर रखे. इस प्रकार इस दोष का तों निवारण होता ही है, इसके अलावा इससे सुख समृद्धि भी बढ़ती है. यह एक अनुभूत प्रयोग है.
अनुलोम दोष—–
यदि भवन में मुख्य द्वार से अन्दर ठीक सामने कोई द्वार हो. सामने का तात्पर्य यह है कि अन्दर क़ी तरफ वाली दीवार का पहला दरवाज़ा हो तथा दरवाजे से समकोण बनाते हुए कोई भी घुमाव किसी अन्य द्वार में जाने का न बनता हो तों अनुलोम दोष बनता है. इसके अशुभ प्रभाव से पैत्रिक संपदा का नाश एवं पुत्रियों का या लड़कियों का जीवन वैधव्य में गुजरता है. इसका सबसे बड़ा दोष यह होता है कि घर से मान मर्यादा एवं आचार विचार सब धीरे धीरे समाप्त हो जाता है. धन संपदा रहने के बावजूद भी दुःख या विक्षोभ के कारण आत्म ह्त्या जैसे जघन्य कुकृत्य भी होते है. इसके निवारण का जो उपाय बताया गया है वह थोड़ा टेढा एवं कठिन है. नदी से स्वयं निकाले पांच सेर रेत, एक छटाक कच्चा कपूर एवं आधा सेर शहद को एक में गूंथ लें. या बाज़ार से बना बनाया शार्निक शिव लिंग खरीद ले. किन्तु स्वयं बनाया शिव लिंग भरोसे मंद होता है. घर के उस क्रान्ति विन्दु पर उसे रखे जो दोष पूर्ण है. उसके नीचे सात अन्न को पीस कर बनाया हुआ आता एक सेर बिछा दे. उस शिवलिंग क़ी रेती से जो पानी टपके उसे किसी धातु क़ी थाली में गिरना चाहिए. रेती का निकास अग्नी कोण या उससे सटे दिशाओं में नहीं होना चाहिए. किसी धीरे पाठ करने वाले पण्डित से रुद्राष्टाध्यायी के पांचवें अध्याय के पाठ से उसका अभिषेक करे. उस समय पण्डित एवं एक यजमान के सिवाय कोई न रहे. शेष पंचोपचार क़ी पूजा स्वाभाविक ही है. सब कुछ पुरा हो जाने के बाद शिवलिंग आदि का विसर्जन कर दे. किन्तु जो जल धातु क़ी थाली में एकत्र हुआ है उसे लगातार एक महीने तक नित्य प्रति प्रत्येक कक्ष में थोड़ा थोड़ा छिड़के. जब पुनः वही नक्षत्र आ जाय तों विसौन्जी हवन कर देवे. इससे इस दोष क़ी शान्ति हो जाती है.
विदाकांत दोष—–
यह दोष तब उत्पन्न होता है जब घर में नित्य प्रति शरीर के किसी अँग से किसी व्यभिचारित धातु का संपर्क दो व्यंगुल में हो रहा हो. ऐसी स्थिति आज कल ज्यादा आ रही है. छट या फर्श का आरसीसी करते वक्त इतना ध्यान लोग नहीं दे पाते कि चारो तरफ छत में लगी हुई सरिया या छड सीमेंट में समान रूप से ढकी हुई है. कही न कही तों ऐसी परत रह ही जाती है जहां यह परत बिल्कुल नाम मात्र क़ी रह जाती है. और यह दोष भयंकर रूप धारण कर लेता है. इसके कारण मुक़द्दमा, पराजय, व्यापार या व्यवसाय का नाश, नौकरी में पदावनति या नौकरी से निकाला जाना आदि उत्पात सामने आते है. इसके निवारण के लिये चारो कोनो पर खूब बढ़िया सुसज्जित वैखानस यंत्र जो किसी सफ़ेद पत्थर पर स्पष्ट रूप से उकेरा गया हो दीवार में चिनवा दे. उसे ऐसा सजा कर रखे जिससे देखने में वह सुन्दर लगे. चिनावाने से पहले उस यंत्र को जागृत (एक्टिवेट) अवश्य करवा ले. दोष दूर हो जाता है.
अभिमूलक दोष——
यह दोष भी आज कल सामान्य हो गया है. प्रायः लोग सुन्दरीकरण में इसकी उपेक्षा कर देते है. यह कई प्रकार से होता है. या तों कोई ऐसा चित्र दीवार में गलत कोण या दिशा में उकेरवा देते है जो उस चित्र के लिये अशुभ हो या फिर घर के अन्दर ही ऐसी मूर्ती स्थापित करवा देते है जिनकी पूजा स्थापना कर के घर में नहीं करनी चाहिए. इसके परिणाम बड़े भयंकर होते है. जवान बेटे या परिवार के किन्ही जवान सदस्यों क़ी मृत्यु, घिनौने चर्म रोग एवं अन्य असाध्य रोगों क़ी उत्पत्ति होती है. कभी कभी तों पूर्ण सामाजिक बहिष्कार का सामना तक करना पड़ जाता है. इसका निवारान करने के लिये घर के सबसे बुज़ुर्ग सदस्य के जन्म के नक्षत्र या फिर घर के सबसे छोटे जीवित सदस्य के जन्म नक्षत्र में यौदिक पिंड भर कर उसके ऊपर शहद एवं कपूर के मिश्रण से बनी पांच बत्ती वाला दीपक जला कर पञ्च देवो का आवाहन करे. तथा गूलर, गुम, गुलेथी, गुलाब एवं गुड़हल क़ी डाली से उस पिंड के ऊपर शंकु का निर्माण कर स्वयं के बनाए धुप को प्रज्वलित करते हुए नवार्नव मन्त्र के एक माला पाठ सहित पञ्च देवो क़ी आरती करे. और उसे वही पर यथावत छोड़ दे. अगले दिन भी उसी तरह करते हुए यह काम सत्ताईसवें दिन तक जारी रखे. सत्ताईसवें दिन पूर्णाहुति कर दे. यह दोष शांत हो जाता है.

ये पांच दोष प्रमुख है. इसके अलावा भी छोटे मोटे शास्त्रीय दोष बताये गये है. किन्तु उनका निवारण नित्य घर में सामान्य पूजा करते रहने से समाप्त हो जाता है. यहाँ यह जानना जरुरी हें की शान्ति विधान अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, अनुराधा, शतभिषा एवं रेवती नक्षत्र में जन्म प्राप्त व्यक्तियों के लिये नहीं है. उन्हें इससे कोई लाभ नहीं होने वाला है. वैसे तों पूजा पाठ का फल महान, अतिविचित्र एवं सर्वसमर्थ होता है. उससे कुछ भी निवृत्त हो जाना असंभव नहीं है. किन्तु विधान में इन्हें निषेध किया गया है.
(सहायक ग्रन्थ- भाव विभूति, वास्तु रहस्य संग्रह, नारद संहिता, चंडिका विधान एवं श्रीमद्भागवत पुराण आदि)
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शायद ही कोई ऐसा घर हो जो वास्तु दोष से मुक्त हो। वास्तु दोष का असर कई बार देर से होता है तो कई बार इसका प्रभाव जल्दी दिखने लगता है। इसका कारण यह है कि सभी दिशाएं किसी न किसी ग्रह और देवताओं के प्रभाव में होते हैं। जब ग्रह विशेष की दशा चलती है तब जिस दिशा में वास्तु दोष होता है उस दिशा का अशुभ प्रभाव घर में रहने वाले व्यक्तियों पर दिखने लगता है।
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दिशाओं के दोष को दूर करने का सबसे आसान तरीका है मंत्र जप।

आइये जाने की किस दिशा के लिए कोनसा मन्त्र हें लाभकारी—-
ईशान दिशा—–
इस दिशा के स्वामी बृहस्पति हैं। और देवता हैं भगवान शिव। इस दिशा के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए नियमित गुरू मंत्र ‘ओम बृं बृहस्पतये नमः’ मंत्र का जप करें। शिव पंचाक्षरी मंत्र ओम नमः शिवाय का 108 बार जप करना भी लाभप्रद होता है।धन लाभ, संतान व शुभ फल देने वाला होता है घर का ये हिस्सा ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा के स्वामी भगवान रुद्र (शिव) तथा प्रतिनिधि ग्रह बृहस्पति हैं। भूखण्ड के ईशान दिशा में मार्ग हो तो भवन ईशानमुखी अर्थात ईशान्यभिमुख होता है। इस प्रकार के भूखण्ड बुद्धिमान संतान तथा शुभ फल देने वाला होता है।
ईशान मुखी भूखण्ड पर निर्माण करते समय निम्न वास्तु सिद्धांतों का पालन करना चाहिए-
1- ईशानमुखी भूखण्ड ऐश्वर्य, लाभ, वंश वृद्धि, बुद्धिमान संतान व शुभ फल देने वाला है। ऐसे भूखण्ड पर निर्माण करते समय ध्यान रखें कि ईशान कोण कटा व ढका हुआ न हो। प्रयास करें कि प्रत्येक कक्ष में ईशान कोण न घटे।
2- ईशानमुखी भवन में ईशान कोण सदैव नीचा रहना चाहिए। ऐसा करने से सुख-सम्पन्नता व ऐश्वर्य लाभ होगा।
3- ईशान कोण बंद न करें न कोई भारी वस्तु रखें। ईशान मुखी भूखण्ड में आगे का भाग खाली रखें तो शुभ रहेगा।
4- भवन के चारों ओर की दीवार बनाएं तो ईशान दिशा या पूर्व, उत्तर की ओर ऊंची न रखें।
5- ईशान के हिस्से को साफ रखें, यहां कूड़ा-कचरा, गंदगी आदि न डालें। झाड़ू भी न रखें।
6- ईशान मुखी भूखण्ड के सम्मुख नदी, नाला, तालाब, नहर तथा कुआं होना सुख, सम्पत्ति का प्रतीक है।
7- ईशान कोण में रसोई घर न रखें वरना घर में अशांति, कलह व धन हानि होने की संभावना रहती है। 8- घर का जल ईशान दिशा से बाहर निकालें। फर्श का ढलाव भी ईशान कोण की ओर रखें।
पूर्व दिशा—–
घर का पूर्व दिशा वास्तु दोष से पीड़ित है तो इसे दोष मुक्त करने के लिए प्रतिदिन सूर्य मंत्र ‘ओम ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः’ का जप करें। सूर्य इस दिशा के स्वामी हैं। इस मंत्र के जप से सूर्य के शुभ प्रभावों में वृद्घि होती है। व्यक्ति मान-सम्मान एवं यश प्राप्त करता है। इन्द्र पूर्व दिशा के देवता हैं। प्रतिदिन 108 बार इंद्र मंत्र ‘ओम इन्द्राय नमः’ का जप करना भी इस दिशा के दोष को दूर कर देता है।
आग्नेय दिशा—–
इस दिशा के स्वामी ग्रह शुक्र और देवता अग्नि हैं। इस दिशा में वास्तु दोष होने पर शुक्र अथवा अग्नि के मंत्र का जप लाभप्रद होता है। शुक्र का मंत्र है ‘ओम शुं शुक्राय नमः’। अग्नि का मंत्र है ‘ओम अग्नेय नमः’। इस दिशा को दोष से मुक्त रखने के लिए इस दिशा में पानी का टैंक, नल, शौचालय अथवा अध्ययन कक्ष नहीं होना चाहिए।
दक्षिण दिशा——
इस दिशा के स्वामी ग्रह मंगल और देवता यम हैं। दक्षिण दिशा से वास्तु दोष दूर करने के लिए नियमित ‘ओम अं अंगारकाय नमः’ मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए। यह मंत्र मंगल के कुप्रभाव को भी दूर कर देता है। ‘ओम यमाय नमः’ मंत्र से भी इस दिशा का दोष समाप्त हो जाता है।
नैऋत्य दिशा—–
इस दिशा के स्वामी राहु ग्रह हैं। घर में यह दिशा दोषपूर्ण हो और कुण्डली में राहु अशुभ बैठा हो तो राहु की दशा व्यक्ति के लिए काफी कष्टकारी हो जाती है। इस दोष को दूर करने के लिए राहु मंत्र ‘ओम रां राहवे नमः’ मंत्र का जप करें। इससे वास्तु दोष एवं राहु का उपचार भी उपचार हो जाता है।
पश्चिम दिशा——
यह शनि की दिशा है। इस दिशा के देवता वरूण देव हैं। इस दिशा में किचन कभी भी नहीं बनाना चाहिए। इस दिशा में वास्तु दोष होने पर शनि मंत्र ‘ओम शं शनैश्चराय नमः’ का नियमित जप करें। यह मंत्र शनि के कुप्रभाव को भी दूर कर देता है।
वायव्य दिशा—–
चन्द्रा इस दिशा के स्वामी ग्रह हैं। यह दिशा दोषपूर्ण होने पर मन चंचल रहता है। घर में रहने वाले लोग सर्दी जुकाम एवं छाती से संबंधित रोग से परेशान होते हैं। इस दिशा के दोष को दूर करने के लिए चन्द्र मंत्र ‘ओम चन्द्रमसे नमः’ का जप लाभकारी होता है।
उत्तर दिशा——-
यह दिशा के देवता धन के स्वामी कुबेर हैं। यह दिशा बुध ग्रह के प्रभाव में आता है। इस दिशा के दूषित होने पर माता एवं घर में रहने वाले स्त्रियों को कष्ट होता है। आर्थिक कठिनाईयों का भी सामना करना होता है। इस दिशा को वास्तु दोष से मुक्त करने के लिए ‘ओम बुधाय नमः या ‘ओम कुबेराय नमः’ मंत्र का जप करें। आर्थिक समस्याओं में कुबेर मंत्र का जप अधिक लाभकारी होता है।
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घर के भेद—–
घर के छ: भेद होते है,इनमें एक शाला,द्विशाला,त्रिशाला,चतुष्शाला,सप्तशाला,और दसशाला,इन दसों शालाओं में प्रत्येक के १६ भेद होते है,ध्रुव,धान्य,जय,नन्द,खर,कान्त,मनोरम,सुमुख,दिर्मुख,क्रूर,शत्रुद,स्वर्णद,क्षय,आक्रन्द,विपुल और विजय, नाम के गृहो होते है,चार अक्षरों के प्रस्तार भेद से क्रमश: इन गृहों की गणना करनी चाहिये।
गृह प्रमाण—
घर के खम्भे घर के पैर होते है,इसलिये वे संख्या में सम होने उत्तम होते है जैस २,४,६,८, आदि,विषम संख्या में हानिकारक माने जाते है,घर को न तो बहुत ऊंचा ही करना चाहिये और न ही अधिक नीचा,इसीलिये अपनी इच्छा निर्वह के अनुसार भित्ति यानी दीवाल की ऊंचाई करनी चाहिये,घर के ऊपर जो घर दूसरा मंजिल बनाया जाता है,उसमें भी इसी प्रकार का विचार करना चाहिये। घरों की ऊंचाई के आठ प्रमाण कहे गये है,पान्चाल,वैदेह,कौरव,कान्यकुब्ज,मागध,शूरसेन,गान्धार,और आवन्तिक । जहां घर की ऊंचाई उसकी चौडाई से सवागुनी अधिक होती है,वह घर पान्चाल घर कहलाता है,फ़िर उसी ऊंचाई को लगातार सवागुनी बढाने से वैदेह आदि प्रकार के मकान होते है,इसके अन्दर पान्चाल सर्वसाधारण जनो के लिये शुभ है। ब्राह्मणों के लिये आवन्तिक मान,क्षत्रियों के लिये गान्धारमान,और वैश्यों के लिये कान्यकुब्जमान,इस प्रकार से ब्राह्मणादि वर्णों के लिये यथोत्तर गृहमान समझना चाहिये,तथा दूसरे मंजिल और तीसरे मंजिल के मकान में भी पानी का बहाव पहले बताये अनुसार ही बनाना चाहिये।
ध्वज और गज आय में सवारी के साधनों का घर बनाना चाहिये,शय्या आसन छाता और द्वजा इन सब के निर्माण के लिये वृष अथवा द्वज आय होने चाहिये।
वराह मिहिर के अनुसार जिस दिशा में मुख्य द्वार रखना है भूखंड की उस भुजा के बराबर आठ भाग करें ,पूर्वीदिशा में बांयें से तीसरा व चौथा भाग ,दक्षिण दिशा में केवल चौथा भाग ,पश्चिमी दिशा व उत्तरी दिशा में तीसराचौथा -पांचवां भाग मुख्य द्वार के निर्माण के लिए शुभ होता है |घर के सभी द्वार एक सूत्र में होने चाहियें ,ऊपर की मंजिल के द्वारों किउंचाई नीचे के द्वारों से द्वादशांश छोटी होनी चाहिये | गृह के द्वार अपने आप ही खुलते या बंद होते हो तो अशुभ है । गृह क द्वार प्रमाण से अधिक लम्बे हो तोरोग कारक तथा छोटे हो तो धन नाशक होते है । गृह द्वार पर मधु का छत्ता लगे या चौखट, दरवाजा गिर जाये तोगृह पति को कष्ट होता है । घर में चौरस स्तम्भ बनवाना शुभ होता है तथा गोल स्तम्भ बनवाना अशुभ ।
15 हाथ ऊँचा ,आठ हाथ चौडा उत्तम एवम 13 हाथ ऊँचा सैट हाथ चौडा मध्यम कहा गया है |मुख्य द्वार के सामने कोई वृक्ष ,स्तंभ ,मन्दिर ,दिवार का कोना ,पानी का नल ,नाली ,दूसरे घर का द्वार तथा कीच हो तो वेध करता है |गृह की ऊंचाई से दुगनी दूरी पर वेध हो या गृह राजमार्ग पर स्थित हो तो वेध नहीं होता |

निवास करने योग्य स्थान की भलीभांति परीक्षा करके उक्त लक्षण युक्त भूमि में दिक्साधन यानी दिशाओं का ज्ञान करना चाहिये,उसके लिये समतल भूमि में एक वृत यानी गोल घेरा बनावे और उसके बीच में द्वादसांगुल शंकु यानी बारह विभाग या पर्व से युक्त बारह अंगुल की लकडी को नाप कर सीधी खडी हुई उस घेरे के बीच में स्थापित करे,और दिक्साधन विधि से दिशाओं का ज्ञान करे,फ़िर कर्ता के नाम यानी जिसके नाम प्लाट या भूमि हो,वह खुद षडवर्ग शुद्ध क्षेत्रफ़ल (वास्तु भूमि की लम्बाई-चौडाई का गुणनफ़ल करे),अभीष्ट लम्बाई चौडाई के बराबर दिशा साधित रेखा के अनुसार चतुर्भुज बनावे,उस चतुर्भुज रेखामार्ग पर सुन्दर प्राकार यानी चारदीवारी बनावे,लम्बाई चौडाई में पूर्व आदि चारों दिशाओं में आठ आठ द्वार के भाग होते है,प्रदक्षिण क्रम से उसे इस प्रकार से लिखे,जैसे पूर्व वाली दीवाल के उत्तर से दक्षिण तक-पहला-हानि,दूसरा-निर्धनता,तीसरा-धन लाभ,चौथा- राजसम्मान,पांचवां बहुत धन,छठा अति चोरी,सातवां अति क्रोध,और आठवां-भय इस प्रकार से लिखे,इसके बाद दक्षिण वाली दीवाल के पूर्व से पश्चिम तक के आठ भाग भी लिखे।
पूर्व दिशा की दीवाल (उत्तर से दक्षिण)—-
ईशान हानि निर्धनता धनलाभ राजसम्मान बहुतधनलाभ अतिचोरी अतिक्रोध भय अग्नि
दक्षिण दिशा की दीवाल (पूर्व से पश्चिम)—–
अग्नि मरण बन्धन भय धनलाभ धनवृद्धि निर्भयता व्याधिभय निर्बलता नैऋत्य
पश्चिम दिशा की दीवाल (दक्षिण से उत्तर)—–
नैऋत्य पुत्रहानि शत्रुवृद्धि लक्ष्मीप्राप्ति धनलाभ सौभाग्य अतिदुर्भाग्य दुख शोक वायव्य
उत्तर दिशा की दीवाल (पश्चिम से पूर्व )—-
वायव्य स्त्रीहानि निर्बलता हानि धान्यलाभ धनागम सम्पत्तिवृद्धि भय रोग ईशान

इसी प्रकार से पूर्व आदि दिशाओं के गृहादि में भी द्वार और उसके फ़ल समझने चाहिये,द्वार का जितना विस्तार यानी चौडाई हो,उससी दुगुनी ऊंचाई की किवाडॆं बनाकर घर के दरवाजे पर उपरोक्त फ़लानुसार लगानी चाहिये,दिवाल बनाने के बाद चाहरदीवारी के भीतरी भाग में जितनी भूमि बचती है,उसके इक्यासी खन्ड बनाकर बनावे। उनके बीच के नौ खन्डों में ब्रहमा का स्थान समझे,चाहरदीवारी के साथ सटे हुये जो बत्तीस भाग है,वे पिशाचांश कहलाते है,उनके साथ मिलाकर घर बनाने से दुख शोक और भय देने वाला होता है,शेष बचे अंशों के अन्दर घर बनाया जाये तो पुत्र और पौत्र और धन की वृद्धि देने वाला होता है। (नारद-पुराण श्लोक ५४० से ५५५.१/२,त्रिस्कंध ज्योतिष संहिताप्रकरण)

वास्तुराज वल्लभ के अनुसार—–

सिंह-वृश्चिक -मीन राशि वालों के लिए पूर्व दिशा में ,
कर्क -कन्या -मकर राशि वालों के लिए दक्षिण ,
मिथुन -तुला -धनु राशि वालों के लिए पश्चिम एवम
मेष -वृष – कुम्भ राशि वालों के लिएउत्तर दिशा में मुख्य द्वार बनवाना शुभ होता है |

घर के उद्यान में अशोक, निम्बू ,अनार ,चम्पक , अंगूर , पाटल , नारियल ,केतकी ,शमी आदि वृक्षो का लगाना शुभहै।
घर के उद्यान में हल्दी , केला , नीम , बेहडा ,अरंड तथा सभी कांटे दार एवं दूध वाले वृक्ष लगाने का निषेध है ।
मुख्य द्वार पर स्वास्तिक , गणेश , कलश, नारियल ,शंख ,कमल आदि मंगलकारी चिह्नों को अंकित करने से गृह के दोषों का निवारण होता है ।
नवीन गृह में प्रवेश से पूर्व वास्तु पूजा तथा श्री रामचरितमानस का पाठ करने से समस्त वास्तुजनित दोष दूर हो जाते है ।
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नूतन गृह प्रवेश के लिये वास्तु पूजा का विधान—–
घर के मध्यभाग में तन्दुल यानी चावल पर पूर्व से पश्चिम की तरफ़ एक एक हाथ लम्बी दस रेखायें खींचे,फ़िर उत्तर से दक्षिण की भी उतनी ही लम्बी चौडी रेखायें खींचे,इस प्रकार उसमे बराबर के ८१ पद बन जायेंगे,उनके अन्दर आगे बताये जाने वाले ४५ देवताओं का यथोक्त स्थान में नामोल्लेख करें,बत्तीस देवता बाहर वाली प्राचीर और तेरह देवता भीतर पूजनीय होते हैं। उनके लिये सारणी को इस प्रकार से बना लेवें:

शिखी पर्जन्य जयन्त इन्द्र सूर्य सत्य भृश आकाश वायु
दिति आप जयन्त इन्द्र सूर्य सत्य भृश सावित्र पूषा
अदिति अदिति आपवत्स अर्यमा अर्यमा अर्यमा सविता वितथ वितथ
सर्प सर्प पृथ्वीधर विवस्वान गृहक्षत गृहक्षत
सोम सोम पृथ्वीधर ब्रह्मा विवस्वान यम यम
भल्लाटक भल्लाटक पृथ्वीधर विवस्वान गन्धर्व गन्धर्व
मुख्य मुख्य राज्यक्षमा मित्र मित्र मित्र विवुधिप भृंग भृंग
अहि रुद्र शेष असुर वरुण पुष्पदन्त सुग्रीव जय मृग
रोग राज्यक्षमा शेष असुर वरुण पुष्पदन्त सुग्रीव दौवारिक पितर

इस प्रकार से ४५ देवताओं को स्थापित कर लेना चाहिये,और यही ४५ देवता पूजनीय होते है,आप,आपवर्स पर्जन्य अग्नि और दिति यह पांच देवता एक पद होते है,और यह ईशान में पूजनीय होते है,उसी प्रकार से अन्य कोणों में भी पांच पांच देवता भी एक पद के भागी है,अन्य झो बाह्य पंक्ति के बीस देवता है,वे सब द्विपद के भागी है,तथा ब्रह्मा सी पूर्व दक्षिण पश्चिम और उत्तर दिशामें जो अर्यमा विवस्वान मित्र और पृथ्वीधर ये चार देवता है,वे त्रिपद के भागी है,अत: वास्तु की जानकारी रखने वाले लोग ब्रह्माजी सहित इन एक पद,द्विपद और त्रिपद देवताओं का वास्तु मन्त्रों से दूर्वा,दही,अक्षत,फ़ूल,चन्दन धूप दीप और नैवैद्य आदि से विधिवत पूजन करें,अथवा ब्राह्ममंत्र से आवहनादि षोडस या पन्च उपचारों द्वारा उन्हे दो सफ़ेद वस्त्र समर्पित करें,नैवैद्य में तीन प्रकार के भक्ष्य,भोज्य,और लेह्य अन्न मांगलिक गीत और वाद्य के साथ अर्पण करे,अन्त में ताम्बूल अर्पण करके वास्तु पुरुष की इस प्रकार से प्रार्थना करे- “वास्तुपुरुष नमस्तेऽस्तु भूशय्या निरत प्रभो,मदगृहं धनधान्यादिसमृद्धं कुरु सर्वदा”, भूमि शय्या पर शयन करने वाले वास्तुपुरुष ! आपको मेरा नमस्कार है। प्रभो ! आप मेरे घरको धन धान्य आदि से सम्पन्न कीजिये।

इस प्रकार प्रार्थना करके देवताओं के समक्ष पूजा कराने वाले पुरोहित को यथाशक्ति दक्षिणा दे तथा अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हे भी दक्षिणा दे,जो मनुष्य सावधान होकर गृहारम्भ में या गृहप्रवेश के समय इस विधि से वास्तुपूजा करता है,वह आरोग्य पुत्र धन और धान्य प्राप्त करके सुखी होता है,जो मनुष्य वास्तु पूजा न करके नये घर में प्रवेश करता है,वह नाना प्रकार के रोगों,क्लेश,और संकटों से जूझता रहता है।

जिन मकानों में किवाड नही लगाये गये हो,जिनके ऊपर छाया नही की गयी हो,जिस मकान के अन्दर अपनी परम्परा के अनुसार पूजा और वास्तुकर्म नही किये गये हो,उस घर में प्रवेश करने का अर्थ नरक मे प्रवेश करना होता है॥ नारद पुराण ज्योति.स्कन्ध श्लोक -५९६ से ६१९॥
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गृहारम्भ में प्रशस्त मास——
मार्गशीर्ष,फ़ाल्गुन,बैशाख,माघ,श्रावण और कार्तिक यह मास गृहारम्भ में पुत्र आरोग्य और धन देने वाले होते है।
दिशाओं में वर्ग और वर्गेश——
पूर्व आदि आठों दिशाओं में क्रमश: अकारादि आठ वर्ग होते है,इन दिशावर्गों के क्रमश: गरुण मार्जार सिंह श्वान सर्प मूषक गज और शशक ये योनियां होती है,अपने से पांचवे वर्ग वाले परस्पर शत्रु होते है,जिस ग्राम में या जिस दिशा में घर बनाना हो,वह साध्य ततहा घर बनानेवाला साधक,कर्ता और भर्ता आदि कहलाता है,इसको ध्यान में रखना चाहिये,साध्य ग्राम की वर्ग संख्या को लिखकर उसके पीछे बायें भाग में साधक की वर्ग संख्या रखकर आठ का भाग देकर जो शेष बचे वह साधक का धन होता है,इसके विपरीत विधि से अर्थात साधक की वर्ग संख्या के बायें भाग में साध्य की वर्ग संख्या रखकर जो संख्या बने उसमें आठ से भाग देकर शेष साधक का ऋण होता है,इस प्रकार से ऋण की संख्या अल्प और धन की संख्या अधिक हो,तो अधिक शुभ माने,अर्थात उस दिशा और ग्राम में घर बनाकर रहना शुभ होता है। उदाहरण इस प्रकार से है:-
उदाहरण:- विचार करना है कि जयनारायण नामक व्यक्ति को गोरखपुर में बसने या व्यापार करने में किस प्रकार का लाभ होगा,तो साध्य गोरखपुर की वर्ग संख्या २ के बायें भाग में साधक जयनारायण की वर्ग संख्या ३ रखने से ३२ हुआ,इसमें ८ का भाग देने से शून्य अर्थात आठ ही बचा,वह जयनाराण का धन हुआ,तथा इसके विपरीत वर्ग संख्या २३ रखकर इसमें आठ का भाग दिया,तो शेष ७ बचा,यह साधक जयनारायण का हुआ,यहां ७ से ८ धन अधिक है,अत; जयनारायण के लिये गोरखपुर रहने के योग्य है,यह सिद्ध हुआ,तात्पर्य है कि जयनारायण का गोरखपुर में ८ लाभ और ७ खर्च मिलता है।

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