जानिए ज्योतिष और गुप्त रोग का सम्बन्ध –

जानिए ज्योतिष और गुप्त रोग का सम्बन्ध —-

यह किसी आश्चर्य से कम नहीं कि कामसूत्र, खजुराहो और शिवलिंग-पूजा के लिए पहचाने जाने वाले देश भारत में ‘सेक्स‘ एक टैबू के रूप में स्थापित हो गया है। यही कारण है कि हमारे समाज में सेक्स सम्बंधी चुटकुले (Sexist Jokes) खूब सुनाए जाते हैं, सेक्स से जुड़ी गालियों का खुलेआम प्रयोग होता है, सेक्स के तड़के वाली फिल्में टिकट खिड़की पर रिकार्ड तोड़ देती हैं, पर बावजूद इसके यौन शिक्षा (Sexual Literacy) की बात करना भी पाप की दृष्टि से देखा जाता है।

यही कारण है कि हमारे समाज में यौन अशिक्षा अपने चरम पर है। इसके दुष्परिणाम स्वरूप जहां एक ओर हमें गली-गली में कुकुरमुत्तों की तरह खुले सेक्स क्लीनिक यौन शिक्षा के अभाव में देश के युवाओं की गर्दनें नाप रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अनेक बिन ब्याही मांएं अपने ‘पाप‘ से मुक्ति पाने के नाम पर झोला छाप डॉक्टरों की भेंट चढ़कर अपनी जान से हाथ धो रही हैं। जाहिर सी बात है कि इन स्थितियों से निजात पाने का एकमात्र तरीका यौन शिक्षा है। लेकिन दुर्भाग्य का विषय यह है कि न तो इसकी चिन्ता हमारे नेताओं को है और न ही शिक्षा शास्त्रियों को।
शरीर में नए नए रोग होना, बहुत इलाज के बाद रोग ठीक न होना, एक के बाद एक का घर में रोगी होना, कुछ समझ न आना कि ऐसे में क्या उपाय करें? इसका क्या कारण है?ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसका उपचार किया जा सकता है।

शरीर के समस्त अव्यवों,क्रियाकलापों का संचालन करने वाले सूर्यादि यही नवग्रह हैं तो जब भी शरीर में किसी ग्रह प्रदत तत्व की कमी या अधिकता हो, तो व्यक्ति को किसी रोग-व्याधि का सामना करना पडता है. यूँ तो स्वस्थता,अस्वस्थता एक स्वाभाविक विषय है. परन्तु यदि किसी प्रकार का कोई भयानक रोग उत्पन हो जाए तो वह उस रोगग्रस्त प्राणी के लिए ही नहीं, बल्कि समस्त कुटुम्बीजनों के लिए दु:खदायी हो जाता है.

विधाता की विचित्र लीला में ,यूँ तो सभी जीव उलझते ही रहते हैं ,किन्तु -विवेकवान लोग -निकलने की कोशिश भी करते हैं -इसके लिये भी रास्ते अलग -अलग होते हैं |-ज्योतिष जहाँ घटित घटना की हमें जानकारी देती है ,वहीँ आयुर्वेद हमारी रक्षा भी करते हैं |
यदि जन्म कुंडली के षष्ठ भाव मे राहु हो तो नाना प्रकार के रोग होते हैं। केतु हो तो चर्म रोग होते हैं। चंद्र हो तो सर्दीजनित रोग होते हैं। सूर्य के कारण पित्त रोग तथा शनि हो तो बवासीर तथा अन्य गुप्त रोग होते हैं। इसी भाव में यह ग्रह अगर नीच के या शत्रु भाव राशि या अशुभ स्थिति में हो तो यह रोग ज्यादा तकलीफदेह हो जाते हैं। राहु की महादशा में भी गुप्त रोगों की संभावना अधिक होती है।अगर षष्ठ भाव पर अशुभ ग्रह की दृष्टि भी हो तो रोगों का होना जारी रहता है। इसी भाव में यदि शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो रोग शीघ्र अच्छा हो जाता है।

शुभ कर्मों के कारण ही मानव जीवन मिलता है। जीव योनियों में मानव जीवन ही सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन क्या मानव जीवन को प्राप्त करना ही पर्याप्त है या जीवन में पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त कर अंतिम अवस्था को प्राप्त करना? निःसंदेह पहला सुख निरोगी काया ही है। यदि स्वास्थ्य अच्छा नहीं हो तो मानव जीवन पिंजरे मंे बंद पक्षी की तरह ही कहा जाएगा। गुप्त रोग अर्थात् ऐसे रोग जो दिखते नहीं हो लेकिन वर्तमान में इसका तात्पर्य यौन रोगों से लिया जाता है। यदि समय रहते इनका चिकित्सकीय एवं ज्योतिषीय उपचार दोनों कर लिए जाएं तो इन्हें घातक होने से रोका जा सकता है।

ज्योतिष के अनुसार किसी रोग विशेष की उत्पत्ति जातक के जन्म समय में किसी राशि एवं नक्षत्र विशेष में पाप ग्रहों की उपस्थिति, उन पर पाप प्रभाव, पाप ग्रहों के नक्षत्र में उपस्थिति एवं पाप ग्रह अधिष्ठित राशि के स्वामी द्वारा युति या दृष्टि रोग की संभावना को बताती है।

इन रोग कारक ग्रहों की दशा एवं दशाकाल में प्रतिकूल गोचर रहने पर रोग की उत्पत्ति होती है। ग्रह, नक्षत्र, राशि एवं भाव मानव शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

वृश्चिक राशि व शुक्र को यौन अंगों का, पंचम भाव को गर्भाशय, आंत व शुक्राणु का षष्ठ भाव को गर्भ मूत्र की बिमारियों, गुर्दे, आंत रोग, गठिया और मूत्रकृच्छ का सप्तम भाव को शुक्राशय, अंडाशय, गर्भाशय, वस्ति, मूत्र व मूत्राशय, प्रोस्टेट ग्रंथि, मूत्रद्वार, शुक्र एवं अष्टम भाव को गुदा, लिंग, योनि और मासिक चक्र का तथा नक्षत्रों में पूर्वाफाल्गुनी को गुप्तांग एवं कब्जियत, उत्तरा फाल्गुनी को गुदा लिंग व गर्भाशय और हस्त को प्रमेह कारक माना गया है।

सभी राशियों में कन्या राशि संक्रामक गुप्त रोगों वसामेह व शोथ विकार और तुला राशि दाम्पत्य कालीन रोगों की कारक कही गई है। ग्रहों में मंगल को गर्भपात, ऋतुस्राव व मूत्रकृच्छ, बृहस्पति को वसा की अधिकता से उत्पन्न रोग व पेट रोग और शुक्र को प्रमेह, वीर्य की कमी, प्रजनन तंत्र के रोग, मूत्र रोग गुप्तांग शोथ, शीघ्र पतन व धातु रोग का कारक माना गया है।

इन कारकों पर अशुभ प्रभाव का आना या कारक ग्रहों का रोग स्थान या षष्ठेश से संबंधित होना या नीच नवांश अथवा नीच राशि में उपस्थित होना यौन रोगों का कारण बनता है।

इसके अतिरिक्त निम्नलिखित ज्योतिषीय ग्रह योगों के कारण भी यौन रोग हो सकते हैं—–

—–जब शनि, मंगल व चंद्र यदि अष्टम, षष्ठ द्वितीय या द्वादश में हों तो काम संबंधी रोग होता है। इनका किसी भी प्रकार से संबंध स्थापित करना भी यौन रोगों को जन्म देता है।
—–जब कर्क या वृश्चिक नवांश में यदि चंद्र किसी पाप ग्रह से युत हो तो गुप्त रोग होता है।
—–यदि अष्टम भाव में कई पाप ग्रह हो या बृहस्पति द्वादश स्थान में हो या षष्ठेश व बुध यदि मंगल के साथ हो तो जननेंद्रिय रोग होता है।
—-जब शनि, सूर्य व शुक्र यदि पंचम स्थान में हो, या दशम स्थान में स्थित मंगल से शनि का युति, दृष्टि संबंध हो या लगन में सूर्य व सप्तम में मंगल हो तो प्रमेह, मधुमेह या वसामेह होता है।
——जब चतुर्थ में चंद्र व शनि हों या विषम राशि लग्न में शुक्र हो या शुक्र सप्तम में लग्नेश से दृष्ट हो या शुक्र की राशि में चंद्र स्थित हो तो जातक अल्प वीर्य वाला होता है।
—–जब शनि व शुक्र दशम या अष्टम में शुभ दृष्टि से रहित हों, षष्ठ या द्वादश भाव में जल राशिगत शनि पर शुभ ग्रहों का प्रभाव न हो या विषम राशिगत लग्न को समराशिगत मंगल देखे या शुक्र, चंद्र व लग्न पुरुष राशि नवांश में हों या शनि व शुक्र दशम स्थान में हों या शनि शुक्र से षष्ठ या अष्टम स्थान में हो तो जातक नपुंसक होता है।
—जब चंद्र सम राशि या बुध विषम राशि में मंगल से दृष्ट हो या षष्ठ या द्वादश भाव में नीचगत शनि हो या शनि व शुक्र पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो जातक नपुंसक होता है।
—–जब राहु, शुक्र व शनि में से कोई एक या सब उच्च राशि में हों, कर्क में सूर्य तथा मेष में चंद्र हो तो वीर्यस्राव या धातु रोग होता है। लग्न में चंद्र व पंचम स्थान में बृहस्पति व शनि हों तो धातु रोग होता है।
——-जब कन्या लग्न में शुक्र मकर या कुंभ राशि में स्थित हो व लग्न को बुध और शनि देखते हांे तो धातु रोग होता है।
——-यदि अष्टम स्थान में मंगल व शुक्र हो तो वायु प्रकोप व शुक्र मंगल की राशि में मंगल से युत हो तो भूमि संसर्ग से अंडवृद्धि होती है।
——जब लग्नेश छठे भाव में हो तो षष्ठेश जिस भाव में होगा उस भाव से संबंधित अंग रोगग्रस्त होता है।
—–यदि यह संबंध शुक्र/पंचम/सप्तम/अष्टम से हो जाए तो निश्चित रूप से यौन रोग होगा।
—–यदि जन्मांग में शुक्र किसी वक्री ग्रह की राशि में हो या लग्न में लग्नेश व सप्तम में शुक्र हो तो यौन सुख अपूर्ण रहता है।
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गुर्दे और गुप्त रोग में लाभदायक गरुड़ासन——-

गरुड़ को अंग्रेजी में ईगल कहते हैं। इस आसन को करने से व्यक्ति की आकृति गरुड़ पक्षी के समान दिखाई देती है इसीलिए इस आसन को गरुड़ासन कहते हैं।

अवधि/दोहराव : गुरुड़ासन की स्थिति में 20 से 30 सेकंड रहा जा सकता है फिर इसकी अवधि बड़ाई जा सकती है। इसे एक पैर से दो-तीन बार दोहरा सकते हैं।

आसन विधि : सबसे पहले सावधान मुद्रा में खड़े हो जाएं। फिर बाएं पैर को ऊपर उठाते हुए दाहिने पैर में लपेटकर इस तरह भूमि पर रखें कि बाएं घुटने पर दाहिने घुटने का निचला भाग टिका रहे। अब दोनों हाथों को सिर के ऊपर उठाते हुए कोहिनों को क्रास कर लपेट लें और दोनों हथेलियों को मिलाकर चेहरे के सामने नमस्कार मुद्रा बना लें। सांसों को सामान्य रखते हुए कुछ देर इसी अवस्था में रहें।

कुछ देर बाद श्वास छोड़ते हुए हाथों को उपर ले जाएं, पैरों के बंधन को खोल कर दें और फिर ताड़ासन करते हुए पुन: सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाए।

इसी क्रिया को एक ओर से करने के पश्चात दूसरी ओर से करें। अर्थात पहले बाएं पैर को ऊपर उठाकर किया था अब दाहिने पैर को उठाकर करें।
सावधानी : हाथ, पैर और गुप्तांगों में कोई गंभीर रोग हो तो यह योगासन न करें।

इसका लाभ : यह आसन हाथ-पैर में दर्द या अन्य कोई विकृति हो तो उसको दूर करता है। गुप्त रोग, मुत्र विकार एवं गुर्दे के सामान्य रोग में यह लाभदायक है।
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स्त्रियों के गुप्त रोगों की चिकित्सा :—-

सफेद कपड़ा, लाल कपड़ा प्रतिमास दो-चार बार होना, पेट में तकलीफ होना तथा कमर में दर्द बढ़ जाना आदि के उपचार में कच्चा पुदीना एक कट्टा लेकर दो गिलास पानी में उबालकर एक कप जूस में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सुबह (निराहार) एक बार और रात में सोते समय दूसरी बार पी लेना चाहिए। इस प्रकार 40 दिनों तक करते रहें। पथ्य में अचार, बैंगन, मुर्गी, अंडे तथा मछली आदि का प्रयोग न करें।

मासिक धर्म का रुक जाना ——
:तीन-तीन महीने तक मासिक धर्म का न होना तथा पेट में पीड़ा होना आदि के लिए एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल और दो चम्मच शहद मिलाकर सुबह निराहार पेट रात में भोजनोपरांत सोते समय पी लेना चाहिए। इस प्रकार सेवन एक महीने तक करते रहें। आलू तथा बैंगन वर्जित हैं।
पेशाब में जलन :——
मूत्र नलियों में रक्त संचार सुचारू रूप से न होना और पेशाब से रक्त का जाना आदि में एक कप मौसम्मी का जूस लेकर उसमें आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर उसका सेवन करें। सुबह एक बार और दूसरी बार रात में सोने से पूर्व। दस दिन तक इस इलाज को जारी रखिए। खाने में गर्मी पैदा करने वाली वस्तुएं, मिर्च और खट्टी वस्तुओं का उपयोग कम करना चाहिए।
बवासीर का मस्सा :——-
एक चम्मच सिरके में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में दो बार मस्से की जगह पर लगाएं।

——तेल चुपड़ी रोटी शनिवार को कुत्ते को खिलाएं।
—–एक कटोरी केसर पानी में घोलकर मरीज के कमरे में रख दें।
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अधिकांश महिला व पुरुष ऐसे होते हैं, जो संक्रमण के कारण इन रोगों की चपेट में आते हैं। सर्दियों की शुरुआत से ही ऐसे मरीजों की संख्या अचानक से बढ़ जाती है। सर्दियों में लोग शरीर की सफाई ठीक से नहीं रखते। कपड़े कई दिनों तक नहीं बदले जाते हैं। लोग नहाने से परहेज करते हैं। नहाने से परहेज करने और कपड़ों के लगातार न बदलने के कारण संक्रमण से फैलने वाले गुप्त रोगों की संभावना बढ़ जाती है।सर्दियों में शरीर की सफाई न रखने और नहाने से परहेज करने के कारण लोगों में गुप्त रोग की संभावना बढ़ जाती हैं।

क्या सावधानी रखें गुप्त रोग होने पर…????

—– नहाने से परहेज न करें।
—– प्रतिदिन अंत: वस्त्र व अन्य कपड़ों को बदलें।
– —शौच के बाद शरीर के अंदरुनी अंगों को ठीक से साफ करें।
—– पूर्व में संक्रमण से पीड़ित या एलर्जी वाले लोगों को अधिक सतर्क होने की है जरूरत।
——- किसी भी प्रकार की समस्या होने पर उसे छुपाने की बजाय चिकित्सक से संपर्क करें।
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खुजली के लिए आयुर्वेदिक उपचार———

जब त्वचा की सतह पर जलन का एहसास होता है और त्वचा को खरोंचने का मन करता है तो उस बोध को खुजली कहते हैं। खुजली के कई कारण होते हैं जैसे कि तनाव और चिंता, शुष्क त्वचा, अधिक समय तक धूप में रहना, औषधि की विपरीत प्रतिक्रिया, मच्छर या किसी और जंतु का दंश, फंफुदीय संक्रमण, अवैध यौन संबंध के कारण, संक्रमित रोग की वजह से, या त्वचा पर फुंसियाँ, सिर या शरीर के अन्य हिस्सों में जुओं की मौजूदगी इत्यादि से।

खुजली के लिए आयुर्वेदिक उपचार—–
——खुजली वाली जगह पर चन्दन का तेल लगाने से काफी राहत मिलती है।
—-दशांग लेप, जो आयुर्वेद की 10 जड़ी बूटियों से तैयार किया गया है, खुजली से काफी हद तक आराम दिलाता है।
—-नीम का तेल, या नीम के पत्तों की लेई से भी खुजली से छुटकारा मिलता है।
——गंधक खुजली को ठीक करने के लिए बहुत ही बढ़िया उपचार माना जाता है।
——नीम के पाउडर का सेवन करने से त्वचा के संक्रमण और खुजली से आराम मिलता है।
—–सुबह खाली पेट एलोवेरा जूस का सेवन करने से भी खुजली से छुटकारा मिलता है।
——नींबू का रस बराबर मात्रा में अलसी के तेल के साथ मिलाकर खुजली वाली जगह पर मलने से हर तरह की खुजली से छुटकारा मिलता है।
——नारियल के ताज़े रस और टमाटर का मिश्रण खुजली वाली जगह पर लगाने से भी खुजली दूर हो जाती है।
——-शुष्क त्वचा के कारण होनेवाली खुजली को दूध की क्रीम लगाने से कम किया जा सकता है।
——-25 ग्राम आम के पेड़ की छाल, और 25 ग्राम बबूल के पेड़ की छाल को एक लीटर पानी में उबाल लें, और इस पानी से ग्रसित जगह पर भाप लें। जब यह प्रक्रिया हो जाए तो ग्रसित जगह पर घी थपथपाकर लगायें। खुजली गायब हो जाएगी।
———मौसमी घमौरियां और चुभने वाली गरमी पित्त व्यवस्था के कारण होती है। इनका इलाज छोटे डोज़ में प्रवाल पिश्ती के सेवन से किया जा सकता है।
———-चन्दन और काली मिर्च को पीसकर एक महीन लेई बना लें, और उसे घी के साथ मिश्रित कर लें। एक खुरदुरे कपडे से इस मिश्रण को खुजली वाली जगह पर लगा लें, और उसके बाद उस खुजली वाली जगह को सूर्य की रोशनी लगने दें। खुजली से राहत दिलाने के लिए यह बहुत ही तेज़ तरीका है, पर यह अस्थायी तौर से ही राहत दिलाता है।
———-पलाश के बीज रिंगवर्म, स्कैबिस, और एक्ज़िमा से होनेवाली खुजली को नियंत्रण में रखते हैं।इन बीजों को पीसकर, नींबू के रस के साथ मिश्रित करके खुजली वाली जगह पर लगाने से लाभ मिलता है।
——-दालचीनी के पत्ते त्वचा के हर रोग के उपचार के लिए उपयोगी माने जाते हैं। रिंग वर्म से हो रही खुजली की चिकित्सा के लिए इसका रस या लेई ग्रसित जगह पर लगाने से लाभ मिलता है।
——–खुजली वाली त्वचा पर नारियल तेल अथवा अरंडी का तेल लगाने से बहुत फायदा मिलता है।

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