वास्तु द्वारा केसे करें मधुर सम्बन्ध, पड़ोसियों से..???..

वास्तु द्वारा केसे करें मधुर सम्बन्ध, पड़ोसियों से..???..

कहतें है कि अच्छा पड़ोसी बड़े भाग्य से मिलता है.सुख-दुःख के समय सगे सम्बन्धी तथा रिश्तेदार तो बाद में पहुँचते है या एन वक्त पर अपनी हाजिरी देते है लेकिन पड़ोसी ही समय पर काम आता है.किसी अज्ञात महापुरूषों का कहना है कि यदि पड़ोसी अच्छा व आपसे उसके मधुर सम्बन्ध है तो समझ लें कि आप सोभाग्यशाली है.
क्या आपका पड़ोसी अच्छा है? क्या आपके सम्बन्ध उससे अच्छें है? क्या वह आपके सुख-दुःख में शामिल होता है? क्या आप भी पड़ोसी धर्म में कुशल है? यदि हां तो आप सचमुच बड़े भाग्यशाली है यदि नहीं तो आईए वास्तु शास्त्र का सहारा लें और अपने पड़ोसी से सम्बन्ध सुधार कर समाज में अपनी प्रतिष्ठा बनाएँ.

आज के भौतिक संसार में मनुष्य अध्यात्म को छोड़कर भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है। समय के अभाव ने उसे रिश्तों के प्रति उदासीन बना दिया है। किंतु आज भी मनुष्य अपने घर में संसार के सारे सुखों को भोगना चाहता है। इसके लिए हमें वैवाहिक जीवन को वास्तु से जोड़ना होगा।

नये मकान के निर्माण की जानकारी देने के लिए, प्लॉट की दिशाओं का सही निर्धारण करने के साथ, प्लॉट के आस-पास की भौगोलिक वास्तु स्थिति, निर्माण करवाते समय आप जिस मकान में रह रहे हैं, उस मकान की वास्तु स्थिति तथा आपकी आर्थिक सामर्थ्य एवं आवश्यक्ताओं का भी ध्यान रखना पड़ता है।
मकान का निर्माण अगर वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत हो गया तो, उस नव-निर्मित मकान में पैदा होने वाले वास्तु-दोषों के दुष्परिणाम, उस मकान में निवास करने वालों के जीवन को समस्याग्रस्त स्थिति में परिवर्तित कर देंगे, क्योंकि आपका वर्तमान और भविष्य, आपके मकान की वास्तु के आधार पर ही प्रभावित होगा।
मकान जीवन में बार-बार नहीं बनाए जाते हैं, अत: इतना चिंतन अवश्य करें कि मकान के निर्माण में एक कुशल व अनुभवी वास्तु विशेषज्ञ का मार्गदर्शन आपके जीवन में सुख-समृद्धि लाने में सक्षम होगा।

—-वास्तु शास्त्र में आठ दिशाओं का अत्यंत महत्व है इन्हीं आठ दिशाओं को यदि हम ठीक या इनके स्वामी को प्रसन्न कर ले तो हमें जीवन में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं होगा तथा हमारें जीवन के प्रत्येक कार्य समय अनुसार व प्रसन्नतापूर्वक संपन्न होते जायंगे यही हमारे जीवन की उपलब्धि होगी.

—–वास्तु शास्त्र के नियम अनुसार पड़ोसी का स्थान हमारे घर में वायव्य अर्थात उत्तर-पश्चिम में होता है और वायव्य दिशा के कोण का स्वामी चन्द्रमा है. हमारे परिवार में चन्द्र से सम्बंधित वस्तुएं भली प्रकार से व्यवस्थित होनी चाहिए. घर में अपनी माता को पूर्ण आदर सम्मान दें. प्रतिदिन भगवान शिव कि पूजा तथा शिव लिंग की अर्चना करें.

——प्रत्येक उत्सव तथा त्यौहार आदि में पड़ोसियों को मिष्ठान आदि देकर आमंत्रित करें तथा सुबह उठ कर अपनें घर के मुख्य द्वार पर पानी का छिड़काव लगानें से भी पड़ोसी के साथ सम्बन्ध मधुर बनतें है…..

अगर आपका पूजा घर सीढियों के निचे बना हुआ है तो बहुत गलत है,इसके क्या दुष प्रभाव है जानिये ????
—-बहु और सास में झगडे होते हैं
—-आपके पड़ोसियों से सम्बन्ध अच्छे नहीं रहेंगे
—आपके घर में शादी विवाह में रुकावट आएगी
—-आपके घर में अशांति रहेगी,इस लिए सीढियों के निचे अपने घर में पूजा घर ना बनाइये
——आपस में शांति/सुलह हेतु उपाय——
गाय के गोबर का दीपक बनाकर उसमें गुड़ तथा मीठा तेल डालकर जलाएं। फिर इसे घर के मुख्य द्वार के मध्य में रखें। इस उपाय से भी घर में शांति बनी रहेगी तथा समृद्धि में वृद्धि होगी।
—— एक नारियल लेकर उस पर काला धागा लपेट दें फिर इसे पूजा स्थान पर रख दें। शाम को उस नारियल को धागे सहित जला दें। यह टोटका 9 दिनों तक करें।
—- घर में तुलसी का पौधा लगाएं तथा प्रतिदिन इसका पूजन करें। सुबह-शाम दीपक लगाएं। इस उपाय को करने से घर में सदैव शांति का वातावरण बना रहेगा।
—– अगर घर में सदैव अशांति रहती हो तो घर के मुख्य द्वार पर बाहर की ओर श्वेतार्क (सफेद आक के गणेश) लगाने से घर में सुख-शांति बनी रहेगी।
—- यदि किसी बुरी शक्ति के कारण घर में झगड़े होते हों तो प्रतिदिन सुबह घर में गोमूत्र अथवा गाय के दूध में गंगाजल मिलाकर छिड़कने से घर की शुद्धि होती है तथा बुरी शक्ति का प्रभाव कम होता है।
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वास्तुदेवता सभी देवशक्तियों का स्वरूप होने से ही नियमित देव पूजा में विशेष मंत्र से वास्तुदेव का ध्यान वास्तु दोष को दूर करने के लिए आसान उपाय माना गया है, जो घर में बिना किसी तोड़-फोड़ किए भी कारगर हो सकता है। जिसे इस तरह अपनाएं –

हर रोज इष्ट देव की पूजा के दौरान हाथों में सफेद चन्दन लगे सफेद फूल व अक्षत लेकर वास्तुदेव का नीचे लिखे वेद मंत्र से ध्यान कर घर-परिवार से सारे कलह, संकट व दोष दूर करने की कामना करें व फूल, अक्षत इष्टदेव को चढ़ाकर धूप, दीप आरती करें –

वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान् त्स्वावेशो अनमीवो: भवान्।
यत् त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे।।

ऋग्वेद के इस मंत्र का सरल शब्दों में अर्थ है – हे वास्तु देवता, हम आपकी सच्चे हृदय से उपासना करते हैं। हमारी प्रार्थना को सुन आप हमें रोग-पीड़ा और दरिद्रता से मुक्त करें। हमारी धन-वैभव की इच्छा भी पूरी करें। वास्तु क्षेत्र या घर में रहने वाले सभी परिजनों, पशुओं व वाहनादि का भी शुभ व मंगल करें।
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यदि आप अपने जीवन को सुखद एवं समृद्ध बनाना चाहते हैं और अपेक्षा करते हैं कि जीवन के सुंदर स्वप्न को साकार कर सकें। इसके लिए पूर्ण निष्ठा एवं श्रद्धा से वास्तु के उपायों को अपनाकर अपने जीवन में खुशहाली लाएं

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