जानिए भवन/घर/ मकान में नवग्रहों का स्थान एवं उनका प्रभाव :

जानिए भवन/घर/ मकान में नवग्रहों का स्थान एवं उनका प्रभाव :—–

वास्तु का ज्योतिष से गहरा रिश्ता है. ज्योतिष शास्त्र का मानना है कि मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का पूरा प्रभाव होता है. वास्तु शास्त्र में इन ग्रहों की स्थितियों का पूरा ध्यान रखा जाता है. वास्तु के सिद्धांतों के अनुसार भवन का निर्माण कराकर आप उत्तरी ध्रुव से चलने वाली चुम्बकीय ऊर्जा, सूर्य के प्रकाश में मोजूद अल्ट्रा वायलेट रेज और इन्फ्रारेड रेज, गुरुत्वाकर्षण – शक्ति तथा अनेक अदृश्य ब्रह्मांडीय तत्व जो मनुष्य को प्रभावित करते है के शुभ परिणाम प्राप्त कर सकते है. और अनिष्टकारी प्रभावों से अपनी रक्षा भी कर सकते है. वास्तु शास्त्र में दिशाओं का सबसे अधिक महत्व है. सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र दिशाओं पर ही निर्भर होता है. क्योंकि वास्तु की दृष्टि में हर दिशा का अपना एक अलग ही महत्व है.

आज किसी भी भवन निर्माण में वास्तुशास्त्री की पहली भूमिका होती है, क्योंकि लोगों में अपने घर या कार्यालय को वास्तु के अनुसार बनाने की सोच बढ़ रही है। यही वजह है कि पिछले करीब एक दशक से वास्तुशास्त्री की मांग में तेजी से इजाफा हुआ है।आज के जमाने में वास्तु शास्त्र के आधार पर स्वयं भवन का निर्माण करना बेशक आसान व सरल लगता हो, लेकिन पूर्व निर्मित भवन में बिना किसी तोड फोड किए वास्तु सिद्धान्तों को लागू करना जहाँ बेहद मुश्किल हैं, वहाँ वह प्रयोगात्मक भी नहीं लगता. अब व्यक्ति सोचता है कि अगर भवन में किसी प्रकार का वास्तु दोष है, लेकिन उस निर्माण को तोडना आर्थिक अथवा अन्य किसी दृ्ष्टिकोण से संभव भी नहीं है, तो उस समय कौन से ऎसे उपाय किए जाएं कि उसे वास्तुदोष जनित कष्टों से मुक्ति मिल सके.

भारत भूमी के प्राचीन ऋषि तत्वज्ञानी थे और उनके द्वारा इस कला को तत्व ज्ञान से ही प्रतिपादित किया गया था. आज के युग में विज्ञान नें भी स्वीकार किया है कि सूर्य की महता का विशेष प्रतिपादन सत्य है, क्योंकि ये सिद्ध हो चुका है कि सूर्य महाप्राण जब शरीर क्षेत्र में अवतीर्ण होता है तो आरोग्य, आयुष्य, तेज, ओज, बल, उत्साह, स्फूर्ति, पुरूषार्थ और विभिन्न महानता मानव में परिणत होने लगती है. आज भी वैज्ञानिक मानते हैं कि सूर्य की अल्ट्रावायलेट रश्मियों में विटामिन डी प्रचूर मात्रा में पाया जाता है, जिनके प्रभाव से मानव जीवों तथा पेड-पौधों में उर्जा का विकास होता है. इस प्रभाव का मानव के शारीरिक एवं मानसिक दृ्ष्टि से अनेक लाभ हैं. मध्यांह एवं सूर्यास्त के समय उसकी किरणों में रेडियोधर्मिता अधिक होती है, जो मानव शरीर, उसके स्वास्थय पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं. अत: आज भी वास्तु विज्ञान में भवन निर्माण के तहत, पूर्व दिशा को सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है. जिससे सूर्य की प्रात:कालीन किरणें भवन के अन्दर अधिक से अधिक मात्रा में प्रवेश कर सकें और उसमें रहने वाला मानव स्वास्थय तथा मानसिक दृष्टिकोण से उन्नत रहे.

इसको आधुनिक मस्तिष्क वैज्ञानिकों नें भी माना है कि मस्तिष्कीय क्रिया क्षमता का मूलभूत स्त्रोत अल्फा तरंगों का पृ्थ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन का संबंध आकाशीय पिंडों से है और यही वजह है कि वास्तु कला शास्त्र हो या ज्योतिष शास्त्र, सभी अपने अपने ढंग से सूर्य से मानवीय सूत्र सम्बंधों की व्याख्या प्रतिपादित करते हैं. अत: वास्तु के नियमों को, भारतीय भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रख कर, भूपंचात्मक तत्वों के ज्ञान से प्रतिपादित किया गया है. इसके नियमों में विज्ञान के समस्त पहलुओं का ध्यान रखा गया है, जिनसे सूर्य उर्जा, वायु, चन्द्रमा एवं अन्य ग्रहों का पृ्थ्वी पर प्रभाव प्रमुख है तथा उर्जा का सदुपयोग, वायु मंडल में व्याप्त सूक्ष्म से सूक्ष्म शक्तियों का आंकलन कर, उन्हे इस वास्तु शास्त्र के नियमों में निहित किया गया है.

वास्तु दोषों के निराकरण हेतु तोड़-फोड़ से भवन के स्वामी को आर्थिक हानि तो होती ही है, साथ ही कीमती समय भी जाया होता है। इस तरह का निराकरण गृह स्वामी को कष्ट देने वाला होता है तथा व्यक्ति मानसिक रूप से टूट जाता है।

वास्तु और ज्योतिष में अत्यंत घनिष्ठ संबंध है। एक तरह से दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों के बीच के इस संबंध को समझने के लिए वास्तु चक्र और ज्योतिष को जानना आवश्यक है। किसी जातक की जन्मकुंडली के विश्लेषण में उसके भवन या घर का वास्तु सहायक हो सकता है। उसी प्रकार किसी व्यक्ति के घर के वास्तु के विश्लेषण में उसकी जन्मकुंडली सहायक हो सकती है। वास्तु शास्त्र एक विलक्षण शास्त्र है। इसके 81 पदों में 45 देवताओं का समावेश है और विदिशा समेत आठ दिशाओं को जोड़कर 53 देवता होते हैं। इसी प्रकार, जन्मकुंडली में 12 भाव और 9 ग्रह होते हैं।

बिना ज्योतिष ज्ञान के वास्तु का प्रयोग अधूरा होता है. इसलिए वास्तु शास्त्र का उपयोग करने से पूर्व ज्योतिष को भी ध्यान में रखना अत्यंत आवश्यक होता है.वास्तु में ज्योतिष का विशेष स्थान इसलिए है क्योंकि ज्योतिष के अभाव में ग्रहों के प्रकोप से हम बच नहीं सकते है, एक तरह से वास्तु और ज्योतिष का चोली-दामन का साथ है. हमारें ग्रहों की स्थिति क्या है, हमें उनके प्रकोप से बचने के लिए क्या उपाय करने चाहिए, हमारा पहनावा, आभूषण, घर की दीवारों, वाहन, दरवाजे आदि का आकार और रंग कैसा होना चाहिए इसका ज्ञान हमें ज्योतिष तथा वास्तु के द्वारा ही हो सकता है. वास्तु से मतलब सिर्फ घर या ब्य्हावन से ही नहीं बल्कि मनुष्य की सम्पूर्ण जीवन शैली से भी होता है, हमें कैसे रहना चाहिए, किस दिशा में सिर करके सोना चाहिए, किस दिशा में बैठ कर खाना खाना चाहिए आदि आदि बहुत से प्रश्नों का ज्ञान होता है. यदि कोई परेशानी है तो उससमस्या का समाधान भी हम वास्तु और ज्योतिष के संयोग से जान सकते है.

भवन में प्रकाश कि स्थिति प्रथम भाव अर्थात लग्न से समझना चाहिए यदि आपके घर में प्रकाश की स्थिति खराब है तो समझे कि मंगल की स्थिति शुभ नहीं है इसके लिए आप मंगल का उपाय करें प्रत्येक मंगलवार श्री हनुमान जी की प्रतिमा को भोग लगा कर सभी को प्रसाद दें. और श्री हनुमान चालीसा का पाठ करने से भी प्रथम भाव के समत दोष समाप्त हो जाते है. आपके घर या भवन में हवा की स्थिति संतोषजनक नहीं है या आपका घर यदि हवादार नहीं है तो समझना चाहिए कि हमारा शुक्र ग्रह पीड़ित है और इसका विचार दूसरे भाव से होता है उपाय के लिए आप चावल और कपूर किसी योग्य ब्राह्मण को दान दें. और शुक्र ग्रह की शान्ति विद्वान ज्योतिषी की सलाह अनुसार करें तो आपको लाभ होगा और आपका बैंक के कोष की भी वृद्धि होने लगेगी.

वास्तुशास्त्र के अनुसार गृहनिर्माण किया जाता है तब उसके साथ – साथ घर में नवग्रह भी विराजमान होते हैं | तथा वहां पर रहने वाले लोगों पर अपना प्रभाव डालते हैं |

सूर्यदेव का स्थान उत्तर —– पूर्व (ईशान कोण ) में पूजा या प्रार्थना कक्ष में होता है एवं ये घर में रहने वाले व्यक्तियों के स्वास्थ्य एवं नौकरी पर प्रभाव डालते हैं |

चंद्रदेव का स्थान —–पूर्व दिशा में स्नानागार या स्नान कक्ष (बाथरूम) में होता है तथा ये ग्रह स्वामी के यश व् कीर्ति पर प्रभाव डालते हैं |

मंगल देव अथवा कुज देव का स्थान दक्षिण —— पूर्व (आग्नेय कोण ) में रसोई (किचिन) में होता है एवं ये व्यक्ति के चरित्र , बुद्धि, धन व् समृद्धि पर प्रभाव डालते हैं |

बुध देव का स्थान—घर के सामने के बरामदे या स्वागत कक्ष या मध्य के हाल में जहाँ अध्ययन एवं व्यापार के कार्य होते हैं वहां पर बुध देव का निवास होता है ये व्यक्ति के व्यापार एवं धंधे व् कार्य पर प्रभाव डालते हैं |

बृहस्पति देव या गुरु का स्थान—–उत्तर दिशा में स्थित कोष या उत्तर -पूर्व दिशा (ईशान कोण) जहाँ पर अध्यात्मक व् अन्य तरह का अध्ययन होता है वहां पर बृहस्पति देव या गुरु का निवास होता है.. गुरु व्यक्ति के मान सम्मान पर प्रभाव डालते हैं |

शुक्र देव का स्थान —-दक्षिण से लेकर पश्चिम तक के क्षेत्र में जहाँ पर भोजन कक्ष , प्रसाधन कक्ष या विश्राम कक्ष आदि में होता है शुक्र व्यक्ति की वाकपटुता एवं पति,पत्नी के सम्बन्धों व् व्यवहार पर प्रभाव डालते हैं |

शनि देव का निवास स्थान—— पश्चिम या पश्चिम-उत्तर के किनारे पर गौशाला में होता है शनि देव व्यक्ति की प्रशन्नता व् अचल संपत्ति व् धार्मिक बुद्धि पर प्रभाव डालता है |

रहू एवं केतु के स्थान—–घर के प्रवेश द्वार के दाहिनी तरफ राहु का स्थान एवं बांयी तरफ केतु का स्थान होता है तथा भवन के चरों ओर रह कर उसकी रक्षा करते हैं राहु व्यक्ति की अजेय प्रतिष्ठा एवं मानसिक स्तिथि व् पेट के विकारों पर असर डालता है तथा केतु सम्पूर्ण पीढ़ी की वृद्धि व् सम्पन्नता पर प्रभाव डालता है
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वास्तु चक्र में ठीक ऊपर उत्तर दिशा होती है जबकि जन्मकुंडली में पूर्व दिशा पड़ने वाले विकर्ण वास्तु पुरुष के अंगों को कष्ट पहंचाते हैं। वास्तु पुरुष के अनुसार पूर्व एवं उत्तर दिशा अगम सदृश्य और दक्षिण और पश्चिम दिशा अंत सदृश्य है। ज्योतिष के अनुसार पूर्व दिशा में सूर्य एवं उत्तर दिशा में बृहस्पति कारक है। पश्चिम में शनि और दक्षिण में मंगल की प्रबलता है। जयोतिष के अनुसार भाव 6, 8 और 12 अशुभ हैं। इन भावों का संबंध शुभ भावों होने पर दोष उत्पन्न हो जाता है। जैसे यदि सप्तमेश षष्ठ भाव में हो, तो पश्चिम दिशा में, अष्टमेश पंचम में हो, तो नैरित्य (दक्षिण-पश्चिम) में, दशमेश षष्ठ में हो, तो दोष देगा। ग्रहण योग (राहु-केतु) की स्थिति उस दिशा से संबंधित दोष पैदा करेगी।
इसी प्रकार लग्नेश व लग्न में नीच राशि का पीड़ित होना पूर्व दिशा में दोष का सूचक है। आग्नेय (एकादश-द्वादश) में पापग्रह, षष्ठेश या अष्टमेश के होने से ईशान कोण में दोष होता है। लग्नेश का पंचम में होना वायव्य में दोष का द्योतक है। यदि कोई भावेश पंचम या षष्ठ (वायव्य) में हो, तो उस भाव संबंधी स्थान में महादोष उत्पन्न होता है। ग्रह की प्रकृति, उसकी मित्र एवं शत्रु राशि तथा उसकी अंशात्मक शुद्धि के विश्लेषण से जातक के जीवन में घटने वाली खास घटनाओं का अनुमान लगाया जा सकता है।

घर में अग्नि का सम्बन्ध तो छठे भाव से जाना जाता है और रसोई इसका कारक है घर में यदि सदस्यों का स्वास्थ्य ठीक नहीं है तो इसकी स्थिति सुधारें. इस दोष को दूर करने के लिए आप धनिया (साबुत) लेकर किसी भी कपड़े में बाँध कर रसोई के किसी भी भाग में टांग देंगे तो लाभ होना आरम्भ हो जाएगा.

आपके घर में जल का संकट है या पानी की तंगी रहती है, या माता से सम्बन्ध अच्छे नहीं है अथवा आपका वाहन प्रतिदिन खराब रहने लगता है, या आप अपनी पारिवारिक संपत्ति के लिए परेशान है, तो आप समझ लीजिए कि चतुर्थ भाव दूषित है. इस दोष से मुक्ति पाने के लिए आप चावल की खीर सोमवार के दिन प्रातः अवश्य बनाएँ और अपने परिवार सहित इसका सेवन करें यदि इसी समय कोई अतिथि आ जाए तो बहुत अच्छा शगुन है उसे भी यह खीर खिलायंगे तो अति शुभ फल शीघ्र आपको प्राप्त होगा.

आपकी संतान आज्ञाकारी नहीं है या संतान सुख आपको प्राप्त नहीं हो पा रहा है तो आपका पंचम भाव दूषित हो राह है जो कि आपके घर या भवन का प्रवेश द्वार है, प्रवेश द्वार में टॉयलेट या सीवर अवश्य होगा और उत्तर दिशा दूषित है इसके इसको सुधारें और सूर्य यंत्र या ताम्बा प्रवेश द्वार पर स्थापित करने से आपको लाभ प्राप्त होगा.
घर में तुलसी के पौधे फलते फूलते नहीं है या घर में लगे पौधे फल या फूल नहीं दे रहें है और पति – पत्नी के मध्य बिना बात के कलह होती है तो छठा भाव दूषित है इसके लिए आप गमलों में सफेद चावल और कपूर रख कर उसके ऊपर मिटटी छिड़क दे तो आप भी प्रसन्न और पौधे भी फलने फूलने लगेंगे.तथा परिवार में सद्भावना का वातावरण बन जाएगा.
यदि परिवार में कोई अति गंभीर रोग का आगमन हो चुका है तो समझो कि कुंडली का आठवाँ भाव खराब हो रहा है इसके लिए आप घर में पुराने गुड का प्रयोग आरम्भ कर दें तो रोग नियंत्रित होने लगेगा.
जब से आपने नया मकान या भवन लिया है या बनवाया है तब से भाग्य साथ नहीं दे रहा है तो समझो कि नवम भाव में दोष आ गया है इसकी शान्ति के लिए आप पीले रंग को पर्दों में प्रयोग करे. सारे घर में हल्दी के छींटे मारे और साथ ही अपने गुरु को पीले वस्त्र दान करे. तथा घर के बुजुर्गो को मां सम्मान प्रदान करे इससे भाग्य सम्बन्धी बाधा दूर होती जायेगी.

व्यवसाय में गिरावट, पारिवारिक सदस्यों में गुस्सा बढ़ना, या चिडचिडा स्वभाव बन जाना, रोज़गार छूट जाना एवं आर्थिक तंगी हो जाए तो समझो कि दशम भाव दूषित हो गया है, इस दोष को दूर करने के लिए आप तेल का दान करें, पीपल के नीचे तेल का दीपक जलाएं, काले उडद की डाल का प्रयोग करें तो आशातीत लाभ होने लगेगा.
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गोचरीय ग्रहों के प्रभाव के विश्लेषण से भी वास्तु दोषों का आकलन किया जा सकता है। जैसे मेष लग्न वालों के लिए दशमेश तथा षष्ठेश भाव गोचरीय हैं। शनि अपनी मित्र राशि में गोचरीय है, इसलिए जातक के दशम भाव से संबंधित दिशा में दोष होगा। इस योग के कारण पिता को कष्ट अथवा जातक के पितृ सुख में कमी संभव है, क्योंकि दशम भाव पिता का भाव होता है। उक्त परिणाम तब अधिक आएंगे जब गोचरीय व जन्मकालिक महादशाएं भी प्रतिकूल हों। जन्मकुंडली सबसे बलवान ग्रह शुभ भाव केंद्र व त्रिकोण में शुभ स्थिति में हो, तो वह दिशा जातक को श्रेष्ठ परिणाम देने वाली होगी। वास्तु सिद्धांत के अनुसार संपूर्ण भूखंड को 82 पदों में विभाजित होता है, जिनमें होती है।

वास्तु चक्र में स्थापित देवता अलग-अलग प्रवत्ति और अपने प्रभाव के अनुसार शुभाशुभ फलप्रदान करते हैं। वास्तु देवता वास्तु चक्र में उलटे लेटे मनुष्य के समान हैं, जिनका मुख ईशान में, दोनों टांगें व हाथ पेट में धंसे हुए और पूंछ निकलकर मुंह में घुसी हुई है। किसी बीम, खंभा, द्वार, दीवार आदि से जो अंग पीड़ित होगा वही दसरी ओर उसी अंग में गृह स्वामी को पीड़ा होगी। इसी भांति षष्टम हानि-महामर्म स्थान-सिर, मुख, हृदय, दोनों वक्ष, नीच को वेध रहित रखा जाता है।

भूखंड पर वास्तु शास्त्र बाहरी 32 पदों में 32 देवता विराजमान होते हैं जहां पर मुख्य द्वार का निर्माण किया जाता है। अन्य 13 देवता 32 पदों के अंदर की ओर होते हैं, जिनमें 4 देवता 6 पदीय तथा एक देवता ब्रह्मा 9 पदीय देवता हैं। प्रत्येक देवता अपनी प्रकृति के अनुसार शुभाशुभ परिणाम देते हैं। शुभ देवता के समीप आसुरी शक्ति संबंधी कार्य किए जाएं तो वह पीड़ित होकर अशुभ परिणाम देते हैं।

पुत्री के विवाह में कठिनाइयां आ रही है, या रिश्तेदारों से मनमुटाव, आमदनी में गिरावट, नौकरी का बार बार छूटना, उन्नति का ना होना, घर की बरकत समाप्त होना अथवा दामाद से कलह यह सब एकादश भाव के दूषित होने का परिणाम होता है. इसको दूर करने के लिए आप तांबे का पैसा दान करें तथा एक लोहे का सिक्का शमशान में फेंके तो पर्याप्त लाभ होगा. पुत्री से छाया दान करवाए तो शीघ्र विवाह का योग बन जाएगा.
पहले आप जहां रहते थे वहां के पडौसी अच्छे हो अब पडौसी झगडा करते है मिलनसार नहीं है, ऐसे दोष बारहवें भाव के खराब होने से होते है मित्र धन लेकर मुकर जाए या धन डूब रहा हो तो अपना बारहवां भाव को दोष से मुक्त करें इस दोष की शान्ति के लिए आप गंगा स्नान करें और वहां से कोई धार्मिक ग्रन्थ खरीदकर घर लाएं उसे सम्मानपूर्वक घर में रखे तो परिवर्तन स्पष्ट नजर आएगा. महाभारत का ग्रन्थ भूल कर भी घर में ना ले कर आना चाहिए.

आजकल भवन केवल प्राकृतिक आपदाओं से बचने का साधन मात्र नहीं, बल्कि वे आनंद, शांति, सुख-सुविधाओं और शारीरिक तथा मानसिक कष्ट से मुक्ति का साधन भी माने जाते हैं। पर यह तभी संभव होता है, जब हमारा घर या व्यवसाय का स्थान प्रकृति के अनुकूल हो। भवन निर्माण की इस अनुकूलता के लिए ही हम वास्तुशास्त्र का प्रयोग करते हैं और इसके जानकारों को वास्तुशास्त्री कहते हैं।

इमारत, फार्म हाउस, मंदिर, मल्टीप्लेक्स मॉल, छोटा-बड़ा घर, भवन, दुकान कुछ भी हो, उसका वास्तु के अनुसार बना होना जरूरी है, क्योंकि आजकल सभी सुख-शांति और शारीरिक कष्टों से छुटकारा चाहते हैं। इस सबके लिए किस दिशा या कौन से कोण में क्या होना चाहिए, इस तरह के विचार की जरूरत पड़ती है और यह विचार ही वास्तु विचार कहलाता है। किसी भी भवन निर्माण में वास्तुशास्त्री की पहली भूमिका होती है।

वास्तु दोष व्यक्ति को गलत मार्ग की ओर अग्रसर भी करते है. आपके घर का वास्तु ठीक नहीं है, तो आपकी संतान बेटा हो या बेटी हो वह अपना रास्ता भटक सकती है और गलत फैसले लेकर अपना जीवन तबाह भी कर सकती है यहां तक कि घर से भाग जाने का साहस भी कर सकती है.वास्तु दोष सबसे पहले मन और दिल को प्रभावित कर बुद्धि को भ्रष्ट कर देते है.सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र दिशाओं पर ही निर्भर होता है. क्योंकि वास्तु की दृष्टि में हर दिशा का अपना एक अलग ही महत्व है.

पूर्व-दिशा:- पूर्व की दिशा सूर्य प्रधान होती है.सूर्य का महत्व सभी देशो में है. पूर्व सूर्य के उगने की दिशा है. सूर्य पूर्व दिशा के स्वामी है. यही वजह है कि पूर्व दिशा ज्ञान, प्रकाश, आध्यात्म की प्राप्ति में व्यक्ति की मदद करती है. पूर्व दिशा पिता का स्थान भी होता है. पूर्व दिशा बंद, दबी, ढकी होने पर गृहस्वामी कष्टों से घिर जाता है. वास्तु शास्त्र में इन्ही बातो को दृष्टि में रख कर पूर्व दिशा को खुला छोड़ने की सलाह दी गयी है.

दक्षिण-दिशा:- दक्षिण-दिशा यम की दिशा मानी गयी है. यम बुराइयों का नाश करने वाला देव है और पापों से छुटकारा दिलाता है. पितर इसी दिशा में वास करते है. यह दिशा सुख समृद्धि और अन्न का स्रोत है. यह दिशा दूषित होने पर गृहस्वामी का विकास रुक जाता है. दक्षिण दिशा का ग्रह मंगल है.और मंगल एक बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रह है.

उत्तर-दिशा:- यह दिशा मातृ स्थान और कुबेर की दिशा है. इस दिशा का स्वामी बुध ग्रह है. उत्तर में खाली स्थान ना होने पर माता को कष्ट आने की संभावना बढ़ जाती है.

दक्षिण-पूर्व की दिशा:- इस दिशा के अधिपति अग्नि देवता है. अग्निदेव व्यक्ति के व्यक्तित्व को तेजस्वी, सुंदर और आकर्षक बनाते है. जीवन में सभी सुख प्रदान करते है.जीवन में खुशी और स्वास्थ्य के लिए इस दिशा में ही आग, भोजन पकाने तथा भोजन से सम्बंधित कार्य करना चाहिए. इस दिशा के अधिष्ठाता शुक्र ग्रह है.

उत्तर-पूर्व दिशा:- यह सोम और शिव का स्थान होता है. यह दिशा धन, स्वास्थ्य औए एश्वर्य देने वाली है. यह दिशा वंश में वृद्धि कर उसे स्थायित्व प्रदान करती है. यह दिशा पुरुष व पुत्र संतान को भी उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करती है. और धन प्राप्ति का स्रोत है. इसकी पवित्रता का हमेशा ध्यान रखना चाहिए.

दक्षिण-पश्चिम दिशा:- यह दिशा मृत्यु की है. यहां पिशाच का वास होता है. इस दिशा का ग्रह राहू है. इस दिशा में दोष होने पर परिवार में असमय मौत की आशंका बनी रहती है.

उत्तर-पश्चिम दिशा:- यह वायुदेव की दिशा है. वायुदेव शक्ति, प्राण, स्वास्थ्य प्रदान करते है. यह दिशा मित्रता और शत्रुता का आधार है. इस दिशा का स्वामी ग्रह चंद्रमा है.

पश्चिम-दिशा:- यह वरुण का स्थान है. सफलता, यश और भव्यता का आधार यह दिशा है. इस दिशा के ग्रह शनि है. लक्ष्मी से सम्बंधित पूजा पश्चिम की तरफ मुंह करके भी की जाती है.

इस प्रकार सभी दिशाओं के स्वामी अलग अलग ग्रह होते है और उनका जीवन में अलग अलग प्रभाव उनकी स्थिति के अनुसार मनुष्य के जीवन में पडता रहता है.

केसे करें इन दोष का निवारण—–

वास्तु पुरुष की प्रार्थना पर ब्रह्माजी ने वास्तुशास्त्र के नियमों की रचना की थी। इनकी अनदेखी करने पर उपयोगकर्ता की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक हानि होना निश्चित रहता है। वास्तुदेवता की संतुष्टि गणेशजी की आराधना के बिना अकल्पनीय है। गणपतिजी का वंदन कर वास्तुदोषों को शांत किए जाने में किसी प्रकार का संदेह नहीं है। नियमित गणेशजी की आराधना से वास्तु दोष उत्पन्न होने की संभावना बहुत कम होती है।

आशा है इस जानकारी को पढ़कर आप इससे अपने वास्तु दोषों का निवारण कर सकेंगे और अपने जीवन को सुखमय एवं शांतिमय से गुजार सकेंगे।

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