क्या घर के आंगन में किसी मंदिर की छाया/ पडोसी के मकान की छाया पड़ना शुभ नहीं होता है..???

क्या घर के आंगन में किसी मंदिर की छाया/ पडोसी के मकान की छाया पड़ना शुभ नहीं होता है..???

वास्तुशास्त्र से सदंर्भित अनेक पुस्तकों में वर्णित है कि किसी धार्मिक स्थल से लगे या आसपास के मकान में रहने वालों का जीवन बड़ा कष्टकारी होता है। जैसे शिवजी के मंदिर से लगभग 750 मीटर की दूरी में निवास हो तो कष्ट होता है विष्णु मंदिर के 30 फीट के घेरे में मकान हो तो अमंगल होता है, देवी मंदिर के 180 मीटर में घर हो तो रोगों से पीड़ा होती है और हनुमानजी के मंदिर से 120 मीटर में निवास होने पर तो दोष होता है।

यह सिर्फ अंधविष्वास है। मंदिर से लगे या मंदिर के अंदर बने जिन घरों का निर्माण वास्तु के अनुसार हुआ, वहां रहने वाले लोग सुख-समृद्धि भरा जीवन व्यतीत कर रहे है। यदि वहां रहने वाले गृहस्थ है तो उनके परिवार तरक्की कर रहे हैं। भारत के कई शहरों में व्यस्त बाजार में छोटे-बड़े धार्मिक स्थल होते हैं, जिनके आसपास घनी आबादी या दुकानें होती है। ऐसी जगहों पर खूब व्यवसाय होता है और वहां रहने वाले लोग खूब तरक्की करते है।

महत्वपूर्ण यह है कि धार्मिक स्थल के आसपास बना भवन वास्तु के अनुकूल हो। ऐसे घर में तरक्की होगी। लेकिन यदि घर वास्तु के अनूकूल नहीं है तो तो उसमें रहने वालों को परेषानियों का सामना करना पड़ेगा।

जनमानस में यह भ्रान्ति है कि मंदिर के आसपास व मंदिर के सामने मकान का होना अशुभ होता है। उनके अनुसार मंदिर में रखी मूर्ति की दृष्टि घर पर पड़ना शुभ नहीं होता। इसी के साथ इस दोष को दूर करने के लिए घर के सामने तुलसी लगाना, गाय बांधना, घंटी लगाना आदि उपाय भी बताते है।

वास्तुशास्त्र, पृथ्वी पर रहने वाली चुम्बकीय प्रभाव की धाराओं एवं सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग कर अधिकतम लाभ प्राप्त करने का विज्ञान है, इस हेतु यह शास्त्र हमारा मार्गदर्शन करता है। जिससे सूर्य से मिलने वाली सकारात्मक व ऋणात्मक ऊर्जा का सही अनुपात में उपयोग कर हम सुख, शांति, समृद्धि और वैभव प्राप्त कर सकें। जनसामान्य में यह भ्रांति है कि मंदिर की छाया आंगन पर पड़ना शुभ नहीं होता है। जिन घरों में मंदिर की छाया पड़ती है वह भवन देवताओं कृपा से वंचित रह जाता है। इसके पीछे वैज्ञानिक आधार है जिसे धर्म के साथ जोड़ दिया गया है।

वास्तुशास्त्र, पृथ्वी पर रहने वाली चुंबकीय प्रभाव की धाराओं एवं सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग कर अधिकतम लाभ प्राप्त करने का विज्ञान है। वास्तुशास्त्र में कहा जाता है कि घर में मंदिर की छाया षुभ नहीं होती। जनसामान्य में यह भ्रांति है कि मंदिर की छाया का आंगन में पड़ना अशुभ होता है। जिन घरों में मंदिर की छाया पड़ती है, वह भवन देवताओं की कृपा से वंचित रह जाता है। इसके पीछे वैज्ञानिक आधार है, जिसे धर्म के साथ जोड़ दिया गया है। वास्तूशास्त्र के अनूसार प्रातःकाल मंदिर की छाया या किसी दूसरे भवन की छाया भी भवन के पूर्व या उत्तर दिशा स्थित आंगन में पड़ती है तो सूर्य की सुबह की सकारात्मक ऊर्जायुक्त किरणें आने में बाधा पैदा होती है और यदि दोपहर या उसके बाद की छाया आपके आंगन में पड़ती है तो इसका मतलब आपने अपना आंगन दक्षिण या पश्चिम दिशा में बना रखा है। ऐसी बनावट वाला भवन भी वास्तुदोषपूर्ण है क्योंकि आंगन केवल भवन के उत्तर एवं पूर्व दिशा में ही बनाना चाहिए और दक्षिण तथा पष्चिम दिषा में भारी निर्माण कार्य से निकलने वाली नकारात्मक ऊर्जायुक्त किरणें प्रवेष न कर सकें। अतः यह धारणा कि किसी भी दूसरे भवन की छाया घर के आगन में पड़ना षुभ नहीं होता। वास्तु के दृष्टिकोण से एकदम सही है।

एक बात जरूर ध्यान देने योग्य है कि धार्मिक स्थानों के आसपास रहने वाले वहां बजने वाली घंटी, शंख, ध्वनि विस्तारक यंत्र, शोरगुल, भीड़ इत्यादि के कारण परेशान रहते है। इन्हीं कारणों से मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर, गुरूद्वारा आदि धार्मिक स्थलों के निकट घर नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि वहां अस्वस्थ व्यक्ति आराम से सो नहीं पाता है और विद्यार्थी ठीक ढंग से पढ़ाई नहीं कर पाते हैं।आपस में वार्तालाप में विघ्न होता है अतः इन कारणों से कह सकते है कि धार्मिक स्थलों से लगे मकानों में निवास करना अच्छा नहीं होता। यदि इन बातों से हटकर सोचा जाए तो मकान के निकट या घेरे में धार्मिक स्थल होना शुभ ही शुभ होता है। अगर ऐसा नहीं है तो हर घर में धार्मिक चित्रों और फोटो के माध्यम स ईष्वर की वंदना करना भी अशुभता की श्रेणी में आता।

भगवान विश्वकर्मा द्वारा प्रतिपादित वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों को राजा भोज ने अपने श्रेष्ठ विद्वानों की सहायता से प्रजा की सुख-समृद्धि की कामना से ‘समरांगन वास्तु शास्त्र’ के रूप में संगृहीत किया। समरांगन वास्तु शास्त्र में एक सफल व्यक्ति, परिवार, कुटुंब, समाज, नगर तथा राज्य के समग्र विकास के सूक्ष्मतम वास्तु सिद्धांतों का उल्लेख है।

वास्तु शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार किसी भवन के आस-पास किसी देवी या देवता का मंदिर शुभ नहीं होता। यहां भवन की किस दिशा में किस देवी या देवता के मंदिर का प्रभाव अशुभ होता है, इसका संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है। भवन की किसी भी दिशा में तीन सौ कदम की दूरी पर स्थित शिव मंदिर के प्रभाव अशुभ होते हैं। भवन के बायीं ओर स्थित दुर्गा, गायत्री, लक्ष्मी या किसी अन्य देवी का मंदिर अशुभ होता है। यदि उसमें स्थापित प्रतिमा की दृष्टि भी उक्त भवन पर हो, तो यह एक अत्यंत ही गंभीर वास्तु दोष है।

भवन के पृष्ठ भाग में भगवान विष्णु या उनके किसी अवतार का मंदिर होना भी गंभीर वास्तु दोष होता है। रुद्रावतार भगवान हनुमान जी का मंदिर भी शिव मंदिर की तरह वास्तु दोष कारक होता है। भगवान भैरव, नाग देवता, सती माता, शीतला माता आदि के मंदिर यदि भूमि से और गृह स्वामी के कद से कुछ छोटे हों, तो उनका वास्तु दोष नहीं होता।

मंदिर के परिसर में स्थित किसी वृक्ष की छाया का भवन पर पड़ना भी एक वास्तु दोष माना जाता है। दुष्प्रभावों से मुक्ति के उपाय घर की जिस दिशा में शिव मंदिर हो, उस दिशा की ओर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए। यह प्रतिमा गृहस्वामी के दायें हाथ के अंगूठे के आकार की होनी चाहिए। गणेश की आंखें प्रतिमा पर स्पष्ट रूप से उत्कीर्ण की जानी चाहिए। इस तरह स्थापित गणेश प्रतिमा पर सिंदूर और घी अवश्य लगाना चाहिए।

शिव मंदिर यदि सामने हो और उसका मुख्य द्वार घर के ठीक सामने हो, तो घर की मुख्य दहलीज में तांबे का सर्प गाड़ देना चाहिए। यह सर्प सामने मंदिर में स्थित शिवलिंग पर स्थापित सर्प की आकृति जैसा होना चाहिए। भगवान भैरवनाथ का मंदिर यदि ठीक सामने हो तो कुत्ते को अपने मुख्य द्वार पर रोज रोटी खिलानी चाहिए। किसी देवी मंदिर के कारण उत्पन्न वास्तु दोष के शमन के लिए उस देवी के अस्त्र के प्रतीक की स्थापना प्रमुख द्वार पर करनी चाहिए। यह प्रतीक बांस, लकड़ी, मिट्टी या चांदी, तांबे अथवा मिश्र धातु का होना चाहिए। इसके अभाव में रंगों से प्रतीक की आकृति बनाई जा सकती है अथवा उसका चित्र लगाया जा सकता है। पत्थर तथा लोहे का बना प्रतीक कदापि नहीं लगाना चाहिए।

यदि देवी प्रतिमा अस्त्रहीन हो, तो देवी के वाहन का प्रतीक द्वार पर लगाएं। प्रायः माता सीता, राधा, रुक्मिणी, लक्ष्मी आदि की प्रतिमाएं अस्त्रहीन होती हैं। ऐसी देवियों के साथ उनके स्वामी की प्रतिमा भी अस्त्र विहीन होनी चाहिए। अतः उन्हीं का मुख्य मंदिर मान कर ही उपाय करना चाहिए। भगवती लक्ष्मी का मंदिर हो, तो द्वार पर कमल का चित्र बनाएं या भगवान विष्णु का चित्र लगाकर उन्हें नित्य कमलगट्टे की माला पहनाएं या घर के आंगन में नित्य रंगोली बनाएं।

भगवान विष्णु और उनके अवतारों के कारण उत्पन्न वास्तु दोषों के शमन के उपाय इस प्रकार हैं—–

यदि मंदिर भगवान विष्णु का हो और वास्तु दोष उत्पन्न करने वाला हो, तो भवन के ईशान कोण में चांदी या तांबे के आधार पर दक्षिणावर्ती शंख की स्थापना कर उसमें नियमित जल भरना व उसका पूजन करना चाहिए। प्रातःकाल शंख में भरे जल के घर में सर्वत्र छींटे करने चाहिए। इस शंख को सदैव जल से भर कर रखना चाहिए। यदि प्रतिमा चतुर्भुज की हो, तो मुख्य द्वार पर गृहस्वामी के अंगूठे के बराबर पीतल की गदा भी लगानी चाहिए। भगवान विष्णु के अवतार राम के मंदिर के कारण उत्पन्न वास्तु दोष के शमन के लिए घर के मुख्य द्वार पर तीर विहीन धनुष का दिव्य चित्र बनाना चाहिए। भगवान कृष्ण का मंदिर हो, तो ऐसी स्थिति में एक गोलाकार चुंबक को सुदर्शन चक्र के रूप में प्रतिष्ठित करके स्थापित करना चाहिए।

यदि किसी अन्य अवतार का मंदिर हो, तो मुख्य द्वार पर पंचमुखी हनुमान का चित्र लगाना चाहिए। भवन पर मंदिर के परिसर में स्थित वृक्ष की छाया पड़ने के कारण उत्पन्न वास्तु दोष के निवारण के लिए भवन के दक्षिण-पश्चिम के मध्य स्थित र्नैत्य कोण को सबसे ऊंचा करके उस पर त्रिशूल, लाल झंडा या एकाक्षी श्रीफल स्थापित करना चाहिए।

घर के समीप स्थित मंदिर में दर्शन हेतु नियमित रूप से जाना चाहिए। इस हेतु पूजन सामग्री दूध, फल, मिठाई, प्रसाद, फूल आदि घर से ही लेकर जाना चाहिए। ध्यान रहे, चरणामृत, प्रसाद, तुलसी पत्र आदि लिए बगैर मंदिर से वापस नहीं आना चाहिए। मंदिर में देवताओं के दायें हाथ की तरफ ही खड़े होकर दर्शन करें तथा बैठकर ही प्रणाम करें।

वास्तूशास्त्र के अनूसार प्रातःकाल मंदिर की छाया या किसी दूसरे भवन की छाया भी भवन के पूर्व या उत्तर दिशा स्थित आंगन में पड़ती है तो सूर्य की सुबह की सकारात्मक ऊर्जायुक्त किरणें आने में बाधा पैदा होती है और यदि दोपहर या उसके बाद की छाया आपके आंगन में पड़ती है तो इसका मतलब आपने अपना आंगन दक्षिण या पश्चिम दिशा में बना रखा है। ऐसी बनावट वाला भवन भी वास्तुदोषपूर्ण है क्योंकि आंगन केवल भवन के उत्तर एवं पूर्व दिशा में ही बनाना चाहिए और दक्षिण तथा पश्चिम दिशा में भारी निर्माण कार्य से निकलने वाली नकारात्मक ऊर्जायुक्त किरणें प्रवेश नहीं कर सकें। अतः यह धारणा कि किसी भी दूसरे भवन की छाया घर के आगन में पड़ना शुभ नहीं होता। वास्तु के दृष्टिकोण से एकदम सही है।

आपका भवन/मकान जब तक ही वास्तु सम्मत माना जायेगा जब तक की उसके आसपास के किसी भी भवन/मकान/मंदिर की लम्बाई या ऊँचाई अधिक नहीं हो जाएँ । जब तक उसकी परछाई/ छाया आपके आवास /मकान पर नहीं गिरती हो…

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