शनि जयंती मनेगी..08 जून,2013 (शनिवार) को…

SHANI JAYANTI (शनि जयंती) IN 2013
8 JUNE 2013, SATURDAY…..

शनि जयंती मनेगी..08 जून,2013 (शनिवार) को…

शनि जयंती हिंदू धर्म के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को शनि जयंती का पर्व मनाया जाता है।
सिद्धियों के दाता,सभी विघ्नों को नष्ट करने वाले शनिदेव की जयन्ती 08 जून,2013 (शनिवार) को मनाई जाएगी । शनि जयंती के दिन शनि देव की विशेष पूजा की जाती है।

इस दिन शनि देव की विशेष पूजा का विधान है. शनि देव को प्रसन्न करने के लिए अनेक मंत्रों व स्तोत्रों का गुणगान किया जाता है. शनि हिन्दू ज्योतिष में नौ मुख्य ग्रहों में से एक हैं. शनि अन्य ग्रहों की तुलना मे धीमे चलते हैं इसलिए इन्हें शनैश्चर भी कहा जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार शनि के जन्म के विषय में काफी कुछ बताया गया है और ज्योतिष में शनि के प्रभाव का साफ़ संकेत मिलता है. शनि ग्रह वायु तत्व और पश्चिम दिशा के स्वामी हैं. शास्त्रों के अनुसार शनि जयंती पर उनकी पूजा-आराधना और अनुष्ठान करने से शनिदेव विशिष्ट फल प्रदान करते हैं.

इस दिन प्रमुख शनि मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. भारत में स्थित प्रमुख शनि मंदिरों में भक्त शनि देव से संबंधित पूजा पाठ करते हैं तथा शनि पीड़ा से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं. शनि देव को काला या कृष्ण वर्ण का बताया जाता है इसलिए इन्हें काला रंग अधिक प्रिय है. शनि देव काले वस्त्रों में सुशोभित हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनिदेव का जन्म ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि के दिन हुआ है. जन्म के समय से ही शनि देव श्याम वर्ण, लंबे शरीर, बड़ी आंखों वाले और बड़े केशों वाले थे. यह न्याय के देवता हैं, योगी, तपस्या में लीन और हमेशा दूसरों की सहायता करने वाले होते हैं. शनि ग्रह को न्याय का देवता कहा जाता है यह जीवों को सभी कर्मों का फल प्रदान करते हैं.

ज्यॆष्ठ कृष्ण पक्ष अमावस्या को सूर्यास्त के समय शिंगणापुर नगर में शनिदेव की उत्पप्ति हुई थी। पौराणिक कथा के अनुसार शनि, सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं. सूर्य देव का विवाह प्रजापति दक्ष की पुत्री संज्ञा से हुआ कुछ समय पश्चात उन्हें तीन संतानो के रूप में मनु, यम और यमुना की प्राप्ति हुई. इस प्रकार कुछ समय तो संज्ञा ने सूर्य के साथ निर्वाह किया परंतु संज्ञा सूर्य के तेज को अधिक समय तक सहन नहीं कर पाईं उनके लिए सूर्य का तेज सहन कर पाना मुश्किल होता जा रहा था . इसी वजह से संज्ञा ने अपनी छाया को पति सूर्य की सेवा में छोड़ कर वहां से चली चली गईं. कुछ समय बाद छाया के गर्भ से शनि देव का जन्म हुआ.

पंडितों के अनुसार शनि जयंती पर उनकी साधना-अराधना और अनुष्ठान करने से शनिदेव विशिष्ठ फल प्रदान करते हैं।
शनि देव को समस्त ग्रहों में सबसे शक्तिशाली ग्रह माना गया है, शनि देव के शीश पर अमूल्य मणियों से बना मुकुट सुशोभित है। शनि देव के हाथ में चमत्कारिक यन्त्र है, शनिदेव न्यायप्रिय और भक्तों को अभय दान देने वाले देव माने जाते है. शनिदेव प्रसन्न हो जाएं तो रंक को राजा और क्रोधित हो जाएं तो राजा को रंक भी बनाने मे देरी नही लगाते है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि का फल व्यक्ति की जन्म कुंडली के बलवान और निर्बल होने पर तय करते हैं कि जातक को शनि प्रभाव से बचने के लिये क्या क्या उपाय करने चाहिये।

शनि पक्षरहित होकर अगर पाप कर्म की सजा देते हैं तो उत्तम कर्म करने वाले मनुष्य को हर प्रकार की सुख सुविधा एवं वैभव भी प्रदान करते हैं। शनि देव की जो भक्ति पूर्वक व्रतोपासना करते हैं वह पाप की ओर जाने से बच जाते हैं जिससे शनि की दशा आने पर उन्हें कष्ट नहीं भोगना पड़ता। शनिदेव की पूजा के पश्चात उनसे अपने अपराधों एवं जाने अनजाने जो भी आपसे पाप कर्म हुआ हो उसके लिए क्षमा याचना करनी चाहिए। शनि महाराज की पूजा के पश्चात राहु और केतु की पूजा भी करनी चाहिए। इस दिन शनि भक्तों को पीपल में जल देना चाहिए और पीपल में सूत्र बांधकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए। शनिवार के दिन भक्तों को शनि महाराज के नाम से व्रत रखना चाहिए।

शनिदेव नीतीगत न्याय करते हैं। क्हते हैं ‘शनि वक्री जनैः पीड़ा’ अर्थात शनि के वक्री होने से लोगों को पीड़ा होती है। इसीलिए शनि की दशा से पीड़ित लोगों को शनि जयंति के दिन उनकी पूजा अराधना करनी चाहिए। इससे उन्हें सुख प्राप्त होगा। और पूरे साल हर शनिवार के दिन पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाने और सरसों के तेल का दिया जलाने से प्रसन्न किया जा सकता हैं।

शनिवार को सुंदरकांड या हनुमान चालिसा का पाठ करेके इसके साथ ही इस दिन शनि.चालिसा का पाठ विशेष फल प्रदान कराता हैं।

शनिदेव का नाम या स्वरूप ध्यान में आते ही मनुष्य भयभीत अवश्य होता है लेकिन, कष्टतम समय में जब शनिदेव से प्रार्थना कर उनका स्मरण करते हैं तो वे ही शनिदेव कष्टों से मुक्ति का मार्ग भी प्रश्स्त भी करते हैं.
अक्सर कर के हमारे समाज में लोगों से सुनने को मिलता है कि शनिवार के दिन कोई भी शुभकार्य शुरु नहीं करना चाहिए, क्योंकि इस दिन को शुभ नहीं मानते। और अगर इस दिन इत्फाकन कोइ घटना या कुछ पारिवारिक समस्या आ जाए तब तो लोग कहते है कि मुझ पर शनि की दषा है, मेरे शनि ग्रह में दिश में दोष हैं, या मुझ पर साढ़ेसाती चल रही है या शनिवार का दिन मेरे लिए अच्छा नहीं होता।

वैदूर्य कांति रमल:,प्रजानां वाणातसी कुसुम वर्ण विभश्च शरत: .
अन्यापि वर्ण भुव गच्छति तत्सवर्णाभि सूर्यात्मज: अव्यतीति मुनि प्रवाद: .

शनि ग्रह वैदूर्यरत्न अथवा बाणफ़ूल या अलसी के फ़ूल जैसे निर्मल रंग से जब प्रकाशित होता है,तो उस समय प्रजा के लिये शुभ फ़ल देता है यह अन्य वर्णों को प्रकाश देता है,तो उच्च वर्णों को समाप्त करता है,ऐसा ऋषि महात्मा कहते हैं. शनि ग्रह के प्रति अनेक कथाऐ हमारे बुजुर्गो से किदवन्ती के रूप मे सुन्ने को मिलती है साथ ही पुराणों में भी स्पष्ट उल्लेख हैं.शनि को सूर्य पुत्र माना जाता है.लेकिन साथ ही पितृ शत्रु भी.शनि ग्रह के सम्बन्ध मे अनेक भ्रान्तियां और इसलिये उसे मारक, अशुभ और दुख कारक माना जाता है.पाश्चात्य ज्योतिषी भी उसे दुख देने वाला मानते हैं. लेकिन शनि उतना अशुभ और मारक नही है, जितना उसे माना जाता है. इसलिये वह शत्रु नही मित्र है. मोक्ष को देने वाला शनि ग्रह एक मात्र है. सत्य तो यह है कि शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करता है और प्रत्येक प्राणी के साथ न्याय करता है. जो लोग अनुचित विषमता और अस्वाभाविक समता को आश्रय देते हैं, शनि केवल उन्ही को प्रताडित करता है

अगर आप अपने उपर चल रहे शनि के विभिन्न दोषों से मुक्त होना चाहते हैं तो आने वाले शनि जयंती के दिन शनि देव को प्रसन्न करने के लिए विधि समेत पूजा कर एंव अनेक मंत्रों का उच्चारण कर के आप अपने कष्टों एंव शनि के प्रकोप से मुक्ति पा सकते हैं।

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यह हें शनि चालिसा पाठ…!!!

जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥
परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिय माल मुक्तन मणि दमके॥
कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥
पिंगल, कृष्ो, छाया नन्दन। यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन॥
सौरी, मन्द, शनी, दश नामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥
जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं। रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥
पर्वतहू तृण होई निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥
राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो। कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥
बनहूँ में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई॥
लखनहिं शक्ति विकल करिडारा। मचिगा दल में हाहाकारा॥
रावण की गतिमति बौराई। रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥
दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥
हार नौलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवाय तोरी॥
भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥
विनय राग दीपक महं कीन्हयों। तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥
हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी। आपहुं भरे डोम घर पानी॥
तैसे नल पर दशा सिरानी। भूंजीमीन कूद गई पानी॥
श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई। पारवती को सती कराई॥
तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उघारी॥
कौरव के भी गति मति मारयो। युद्ध महाभारत करि डारयो॥
रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला। लेकर कूदि परयो पाताला॥
शेष देवलखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥
वाहन प्रभु के सात सजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥
जम्बुक सिंह आदि नख धारी।सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पति उपजावैं॥
गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥
तैसहि चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥
समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी॥
जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला। करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥
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शनि की साढे़साती के अशुभ फलों को दूर करने के उपाय—

शास्त्रों में वर्णित है कि शनि मनुष्य के कर्म की प्रकृति के आधार पर जीवन के एक निश्चित काल, जिसे शनि की ‘साढेÞसाती’ के रूप में सम्बोधित किया जाता है, में मनुष्य को दंड या प्रतिसाद देते हैं. एक ग्रह के रूप में शनिदेव की गति का यदि आंकलन करें तो पता लगता है कि अत्यंत धीमी गति से प्रतिक्रमण करने वाले शनिदेव सूर्य के चारों ओर एक चक्कर 30 वर्षों में लगाते हैं. स्पष्ट है कि किसी मनुष्य के पूर्ण जीवन काल में औसतन दो या तीन बार साढे साती आ सकती है और यही काल शनि द्वारा कर्मों के आधार पर मनुष्य को परिणाम देने का समय होता है.

1. राजा दशरथ विरचित शनि स्तोत्र के सवा लक्ष जप।
2. शनि मंदिर या चित्र पूजन कर प्रतिदिन इस मंत्र का पाठ करें:-

नमस्ते कोण संस्थाय, पिंगलाय नमोस्तुते।
नमस्ते वभु्ररूपाय, कृष्णाय च नमोस्तुते ।।
नमस्ते रौद्रदेहाय, नमस्ते चांतकाय च।
नमस्ते यमसंज्ञाय, नमस्ते सौरये विभौ।।
नमस्ते मंदसंज्ञाय, शनैश्चर नमोस्तुते।
प्रसादं कुरू में देवेश, दीनस्य प्रणतस्य च।।

3. घर में पारद और स्फटिक शिवलिंग (अन्य नहीं) एक चौकी पर, शुचि बर्तन में स्थापित कर, विधानपूर्वक पूजा अर्चना कर, रूद्राक्ष की माला से महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए।
4. सुंदरकाण्ड का पाठ एवं हनुमान उपासना, संकटमोचन का पाठ करें।
5. हनुमान चालीसा, शनि चालीसा और शनैश्चर देव के मंत्रों का पाठ करें। ऊँ शं शनिश्चराय नम:।।
6. शनि जयंती पर, शनि मंदिर जाकर, शनिदेव का अभिषेक कर दर्शन करें।
7. ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनिश्चराय नम: के 23,000 जप करें फिर 27 दिन तक शनि स्तोत्र के चार पाठ रोज करें।

कुछ अन्य उपाय —–

1. शनिवार को सायंकाल पीपल के पेड के नीचे मीठे तेल का दीपक जलाएं।
2. घर के मुख्य द्वार पर, काले घोडे की नाल, शनिवार के दिन लगावें।
3. काले तिल, ऊनी वस्त्र, कंबल, चमडे के जूते, तिल का तेल, उडद, लोहा, काली गाय, भैंस, कस्तूरी, स्वर्ण, तांबा आदि का दान करें।
4. शनिदेव के मंदिर जाकर, उन्हें काले वस्त्रों से सुसज्जित कराकर यथाविध काले गुलाब जामुन का प्रसाद चढाएं।
5. घोडे की नाल अथवा नाव की कील का छल्ला बनवाकर मघ्यमा अंगुली में पहनें।
6. अपने घर के मंदिर में एक डिबिया में सवा तीन रत्ती का नीलम सोमवार को रख दें और हाथ में 12 रूपये लेकर प्रार्थना करें शनिदेव ये आपके नाम के हैं फिर शनिवार को इन रूपयों में से 10 रूपये के सप्तधान्य (सतनाज) खरीदकर शेष 2 रूपये सहित झाडियों या चींटी के बिल पर बिखेर दें और शनिदेव से कष्ट निवारण की प्रार्थना करें।
7. कडवे तेल में परछाई देखकर, उसे अपने ऊपर सात बार उसारकर दान करें, पहना हुआ वस्त्र भी दान दे दें, पैसा या आभूषण आदि नहीं।
8. शनि विग्रह के चरणों का दर्शन करें, मुख के दर्शन से बचें।
9. शनिव्रत : श्रावण मास के शुक्ल पक्ष से, शनिव्रत आरंभ करें, 33 व्रत करने चाहिएँ, तत्पश्चात् उद्यापन करके, दान करें।
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शनि की साढ़े साती के शुभ-अशुभ प्रभाव—-

वैसे तो लगभग सभी इस शनि की साढ़े साती से भयभीत होते हैं, लेकिन वे लोग जो किसी भी दुष्कर्म में लिप्त नहीं हैं, जो किसी के विरुद्ध षड्यंत्र नही करते,जिनका आचरण नैतिकता से परिपूर्ण है तथा जिनका सामाजिक चरित्र अच्छा है, उन्हें किसी भी तरह से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें इस अवधि की प्रतीक्षा कर शनिदेव की आराधना कर प्रतिसाद हेतु प्रार्थना करनी चाहिये.

जानिए साढ़े साती के तीन चरण के बारे में….

वैसे शनि देव निष्पक्ष हें तथा सभी को कर्मों की प्रकृति के आधार पर फल देते हैं लेकिन शनि की साढ़ेसाती में ढाई साल के तीन विभिन्न चरणों में विभिन्न परिणाम देते हैं. आईये जानते हैं कि शनिदेव ढाई साल के तीन चरणों में किन राशि के जातकों से कैसा व्यवहार करते हैं:
प्रथम चरण: इस चरण में वैसे तो प्रत्येक राशि के जातकों को किसी न किसी तरह से आय सम्बंधी समस्या से होकर गुजरना पड़ता है.धन हानि की भी सम्भावना होती है. कर्म की अधिकता और लाभ कम की स्थिति बनती है. सत्कर्मी लोगों को निकट्स्थ लोगों से सहयोग मिल जाता है और कष्ट का पता भी नहीं लगता लेकिन राशि के अनुसार इस चरण में, वृषभ सिंह और धनु राशि के जातकों को कष्ट कुछ ज्यादा परेशान कर सकते हैं.
द्वितीय चरण: द्वितीय चरण में पारिवारिक समस्याएं बढ़ सकती हैं. सम्बंधियों से अनायास ही परेशानियां आ सकती लेकिन वे जातक जो सामजिक सामंजस्य को महत्व देते हैं. उन्हें शनिदेव इस तरह के कष्टों से शीघ्र मुक्ति दे देते हैं लेकिन मेष, कर्क, तुला,वृश्चिक और मकर राशि के जातकों इस अवधि में सावधानी बरतनी चाहिये.
तीसरा चरण: तीसरे चरण में अचानक सुख-सुविधाओं में कमी आ सकती है,तथा अर्जित ऐश्वर्य से हाथ धोना पड़ सकता है लेकिन नैतिकता और सद्चरित्र का अनुसरण करने वाले जातकों को किसी तरह की क्षति नही होती इस चरण में मिथुन, कर्क , तुला, कुम्भ,कन्या और मीन राशि के जातकों को सावधानी बरतनी चाहिये.

क्या लाभदायक होती है साढ़ेसाती…???

शनि जब कुंडली में चंद्रमा की स्थिति से बारहवें पहले और दूसरे स्थान पर होते हैं तो शनि की साढ़े साती होती है.चंद्र के स्थान से चौथे और आठवें स्थान पर शनि की अढ़ैया प्रारम्भ होती है. यानी कर्क और मीन राशि पर अढ़ैया प्रारम्भ होगा. किसी भी जातक की लग्न कुंडली में शनि की स्थिति सकारात्मक होने से अर्थात् शनि के कारक भाव में होने या उच्च के होने से और जातक जीवन में कर्म के सम्पादन का स्तर अच्छा होने से शनि की साढ़े साती और अढ़ैया के अच्छे प्रभाव भी देखे गये हैं.

शनि की साढ़ेसाती को ऐसे पहचानें…

शनि जब भी दैनिक गोचर में आपकी राशि में, उससे बाद वाली राशि में या उसके पहले वाली राशि में हो तो जान लेना चाहिये कि साढ़े साती चल रही है.
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अपनी राशि के अनुसार ये उपाय करें,साढ़े साती में…

यदि शनि की साढ़े साती चल रही हो या शनि नीच का होकर आपकी कुंडली में मेष राशि में हो या चंद्र युक्त हो तो राशि के अनुसार यह उपाय करेें कार्य में आ रही अड़चनें दूर होंगी. स्वास्थ्य लाभ होगी और कर्ज से भी मुक्ति मिलेगी.
मेष : श्रद्धानुसार शनि मंत्र प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम: का जाप करें.
वृषभ : शनिदेव को तेल अर्पित करें. कष्टों से छुटकारा मिलेगा.
मिथुन : शनि जयंती के दिन घोड़े की नाल या नाव के पेंदी की कील का छल्ला मध्यमा अंगुली में धारण करें.
कर्क : एक बार पहना हुआ वस्त्र गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति को दान में दें.
सिंह : शनिवार के दिन जरूरतमंद या गरीब लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करें.
कन्या : पांच लोहे की वस्तु, अन्न और तेल निर्धन व्यक्ति को दान में अवश्य दें.
तुला : बच्चों को दूध का दान देना अनुकूल रहता है.
वृश्चिक : श्रद्धानुसार जौ किसी भी गौशाला या कुष्ठ रोगियों को दान में दें.
धनु : गले में ठोस लोहे की गोली नीले रंग के धागे में धारण करना अनुकूल रहेगा.
मकर : शनिवार तिल के लड्डू, उड़द की दाल, मीठी पूड़ी बनाकर श्री शनिदेव को भोग लगाएं.
कुम्भ : शनि जयंती के दिन 21 मुट्ठी उड़द नीले कपड़े में बांधकर अपने ऊपर से उसार कर बहते पानी में प्रवाह कर दें.
मीन : सरसों की खली गौशाला में दान दें.

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