केमद्रुम योग के प्रभाव(लाभ-हानि) एवं परिहार(उपाय)—-

केमद्रुम योग के प्रभाव(लाभ-हानि) एवं परिहार(उपाय)—-

जन्मकुंडली में यदि चंद्रमा से द्वादश तथा द्वितीय भाव में सूर्य, राहु-केतु के अतिरिक्त कोई अन्य ग्रह स्थित न हो तो ‘क्रेमद्रुम’ नामक अशुभ योग निर्मित होता है। इसे ज्योतिष ग्रंथों में सर्वाधिक अशुभ माने जाने वाले योगों में शामिल किया गया है।
वेद में कहा गया है क़ि
“चन्द्रमा मनसो जाताश्चक्षो सूर्यो अजायत.”
इस प्रकार हम देखते है क़ि चन्द्रमा का मन से घनिष्ठ सम्बन्ध है. इसीलिए समस्त प्राणियों के लिए मानसिक सुख शान्ति का प्रभाव कारक ग्रह चन्द्रमा माना गया है. चन्द्रमा एक जलीय ग्रह है. पौराणिक मतानुसार इसकी उत्पत्ति समुद्र से मानी गयी है. यह एक अत्यंत ही शीतल ग्रह है. संभवतः इसीलिए आशुतोष भगवान शिव इसे अपने सिर पर धारण किये रहते है.
केमद्रुम योग के बारे में ऐसी मान्यता है कि यह योग जिस जातक की कुंडली में निर्मित होता है उसे आजीवन संघर्ष और अभाव में ही जीवन यापन करना पड़ता है। इसीलिए ज्योतिष के अनेक विद्वन इसे ‘दुर्भाग्य का प्रतीक’ कहकर परिभाषित करते हैं। लेकिन यह अवधारणा पूर्णतः सत्य नहीं है। व्यवहार में ऐसा पाया गया है कि कुंडली में गजकेसरी, पंचमहापुरुष जैसे शुभ योगों की अनुपस्थिति होने पर भी केमद्रुम योग से युक्त कुंडली के जातक कार्यक्षेत्र में सफलता के साथ-साथ यश और प्रतिष्ठा भी प्राप्त करते हैं। ऐसे में क्या कहा जाये। क्या शास्त्रों में लिखी बातों को असत्य या निर्मूल कहकर केमद्रुम योग की परिभाषा पर प्रश्न चिह्न लगा दिया जाये।
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.–09024390067) के अनुसार जातक को इससे भयभीत नहीं होना चाहिए क्योंकि यह योग व्यक्ति को सदैव बुरे प्रभाव नहीं देता अपितु वह व्यक्ति को जीवन में संघर्ष से जूझने की क्षमता एवं ताकत देता है, जिसे अपनाकर जातक अपना भाग्य निर्माण कर पाने में सक्षम हो सकता है और अपनी बाधाओं से उबर कर आने वाले समय का अभिनंदन कर सकता है |
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.–09024390067) के अनुसार चन्द्र को मन का कारक माना गया है | सामान्यत: यह देखने में आता है कि मन जब अकेला हो तो वह इधर-उधर की बातें अधिक सोचता है और ऎसे में व्यक्ति में चिन्ता करने की प्रवृति अधिक होती है | इसी प्रकार के फल केमद्रुम योग देता है |इसके विषय में कहा गया है क़ि-
“केमद्रुमे भवति पुत्र कलत्र हीनो देशान्तरे ब्रजती दुःखसमाभितप्तः. ज्ञाति प्रमोद निरतो मुखरो कुचैलो नीचः भवति सदा भीतियुतश्चिरायु”
अर्थात…. जिसकी कुंडली में केमद्रुम योग होता है वह पुत्र कलत्र से हीन इधर उधर भटकने वाला, दुःख से अति पीड़ित, बुद्धि एवं खुशी से हीन, मलिन वस्त्र धारण करने वाला, नीच एवं कम उम्र वाला होता है.”
किन्तु चन्द्रमा बहुत शुभ फल भी देने वाला होता है. सारे ग्रह छठे या आठवें भाव में अशुभ फल देते है. किन्तु यह ऐसी अवस्था में भी शुभ ही फल देता है.
“कृष्ण पक्षे दिवा जातो शुक्ल पक्षे यदा निशि. षष्टाष्टमें चन्द्रः मातरेव परिपालयेत.”
अर्थात……कृष्ण पक्ष में यदि दिन का जन्म हो या शुक्ल पक्ष में रात का जन्म हो तो ऐसी स्थिति में छठे या आठवें भाव में गया चन्द्रमा भी माता की तरह पालन एवं रक्षा करता है.
जातक परिजात में उल्लिखित केमद्रुम योग निर्माण की कुछ प्रमुख स्थितियां इस प्रकार हैं—–
चंद्र लग्न या सप्तम भाव में स्थित हो एवं उस पर बृहस्पति की दृष्टि न हो।
चंद्र सहित अन्य ग्रह अष्टक वर्ग में शुभ रेखाओं से रहित हां एवं षडवर्ग में भी बलहीन हां।
चंद्र यदि पापी ग्रहों के साथ पापी ग्रहों की राशियों या पापी ग्रहों की राशि नवांश में हो।
किसी पापी ग्रहों से युत चंद्र वृश्चिक राशि में हो एवं भाग्येश की उस पर दृष्टि हो।
रात्रि में जन्म हो एवं दशमेश से दृष्ट हो या अमावस्या के निकट का चंद्र हो।
जैमिनी के अनुसार लग्न से द्वितीय या अष्टम भाव में कोई पापी ग्रह स्थित हो या इन दोनों भावों में समान संख्या में पापी व शुभ ग्रह स्थित हों।
उक्त दोनों भावों में से किसी में चंद्र के स्थित होने पर भी फल अति निकृष्ट होता है।
केमद्रुम योग के बारे में प्राचीन ग्रंथों में अलग अलग मत हैं, लेकिन सभी का फल समान बताया गया है। अर्थात यह योग जातक के लिए साधारणतया अत्यंत अशुभ होता है। किंतु कई बार ऐसा भी होता है कि कुंडली में इस योग के होने पर भी जातक को बहुत अधिक पीड़ा नहीं झेलनी पड़ती है।
यहां उन ग्रह स्थितियों का विवरण प्रस्तुत है जिनसे यह योग कमजोर होता है।
चंद्र पक्ष बली हो और जन्म रात्रि में चंद्र होरा में हुआ हो। शुक्ल पक्ष की षष्ठी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक चंद्र पक्ष बली होता है।
चंद्र वृष राशि में स्थित हो और उस पर बृहस्पति की पूर्ण दृष्टि हो।
चंद्र से केंद्र भाव में बृहस्पति स्थित हो। यहां युति के मानने पर केमद्रुम योग नहीं बनेगा अर्थात बृहस्पति भाव 4, 7 या 10 में हो। चंद्र पर धनेश व लाभेश की पूर्ण दृष्टि हो।
चंद्र षडवर्ग बली हो एवं लग्नेश की इस पर दृष्टि हो। पूर्णिमा के आस-पास वाला चंद्र लग्न में हो एवं उस पर बृहस्पति की दृष्टि हो।
चंद्र वर्गोत्तमी हो या अपने उच्च नवांश में स्थित हो और उस पर बृहस्पति की दृष्टि हो। चंद्र पर शुभ भावेश बृहस्पति की दृष्टि हो तो उसका फल भी उत्तम होगा।
कुंडली में विद्यमान अषुभ योग जातक के जीवन की दषा और दिषा बदलने की सामथ्र्य रखते हैं। इन योगों का सही समय पर सही उपाय न हो, तो ये शुभ ग्रहों के शुभ प्रभाव को भी क्षीण कर सकते हैं।
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.–09024390067) के अनुसार चंद्र से प्रथम, द्वितीय या द्वादश भाव में या लग्न से केंद्र में सूर्य के अतिरिक्त कोई अन्य ग्रह न हो तो केमद्रुम योग होता है। इस योग में उत्पन्न जातक विद्या-बुद्धि से हीन और निर्धन होता है और हमेशा कठिनाइयों से घिरा रहता है। गर्ग के अनुसार केमद्रुम योग में उत्पन्न जातक निंदनीय आचरण करने वाला होता है और हमेशा परेशान तथा गरीबी से ग्रस्त रहता है। कोई राजकुमार भी यदि इस योग में जन्म ले तो एक नौकर या सेवक की तरह जीवन यापन करता है। जातक परिजात के अनुसार यदि किसी जन्मपत्रिका में केमद्रुम योग बनता है तो यह योग राजयोगों का नाश उसी प्रकार करता है जिस तरह एक सिंह हाथियों का नाश करता है। तात्पर्य यह कि यह एक परम अशुभ योग है।
इस योग में उत्पन्न हुआ व्यक्ति जीवन में कभी न कभी दरिद्रता एवं संघर्ष से ग्रस्त होता है | इसके साथ ही साथ व्यक्ति अशिक्षित या कम पढा लिखा, निर्धन एवं मूर्ख भी हो सकता है | यह भी कहा जाता है कि केमदुम योग वाला व्यक्ति वैवाहिक जीवन और संतान पक्ष का उचित सुख नहीं प्राप्त कर पाता है | वह सामान्यत: घर से दूर ही रहता है | परिजनों को सुख देने में प्रयासरत रहता है | व्यर्थ बात करने वाला होता है | कभी कभी उसके स्वभाव में नीचता का भाव भी देखा जा सकता है |ऐसा व्‍यक्ति हमेशा दूसरों पर ही निर्भर रहता है। पारिवारिक सुख की दृष्टि से भी यह सामान्‍य होता है और संतान द्वारा कष्‍ट प्राप्‍त करता है , उसे स्‍त्री भी चिडचिडे स्‍वभाव की मिली है , पर ऐसे व्‍यक्ति दीर्घायु होते हैं। चाहे धनाढ्य कुल में जातक का जन्‍म हुआ हो या सामान्‍य कुल में , मूर्खतापूर्ण कार्यों के कारण दरिद्र जीवन बिताने को मजबूर होता है।
केमद्रुम योग बडा घातक माना जाता है …….
योगे केमद्रुमे प्राप्‍ते यस्मिन् कस्मिश्‍च जातके।
राजयोगा विनश्‍यंति हरि दृष्‍टवा यथा द्विया:।।
अर्थात् …….किसी के जन्‍म समय में यदि केमद्रुम योग हो तथा उसकी जन्‍मकुंडली में राजयोग भी हो तो वह विफल हो जाता है। लेकिन समय के साथ साथ इस योग में किसी अनिष्‍ट के न होते देख ज्‍योतिषी इसमें अपवाद जोडते चले गए हैं, जिससे केमद्रुम भंग योग माना जाता है……
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.–09024390067) के अनुसार जिन जातकों की जन्म कुंडली में चन्द्रमा के साथ, चन्द्रमा से पहले अथवा पिछले अथवा कुंडली के केन्द्र के घरों में स्थित होने वाले राहु और केतु शुभ होते हैं, उन कुंडलियों में केमद्रुम योग की उपर बताईं गईं सभी शर्तें पूरीं होने के बाद भी केमद्रुम योग या तो बनता ही नहीं अथवा इसके अशुभ फल बहुत कम होते हैं। तर्क की दृष्टि से देखें तो चन्द्रमा अथवा कुंडली के केन्द्रिय घरों पर किसी भी शुभ ग्रह का प्रभाव केमद्रुम योग को समाप्त अथवा बहुत कम कर देगा तथा इसीलिए राहु अथवा केतु के कुंडली में शुभ होकर इन स्थानों पर स्थित होने से भी केमद्रुम योग नहीं बनता। इस प्रकार किसी कुंडली में केमद्रुम योग के बनने का निर्णय लेने से पहले इस योग के निर्माण के साथ जुड़े सभी विषयों पर गंभीरता से विचार कर लेना चाहिए।
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.–09024390067) के अनुसार वस्तुतः सत्यता यह है कि केमद्रुम योग के बारे में बताने वाले अधिकांश विद्वान इसके नकारात्मक पक्ष पर ही अधिक प्रकाश डालते हैं। जो पूर्णतः असैद्धांतिक एवं अवैज्ञानिक है। यदि हम इसके सकारात्मक पक्ष का गंभीरतापूर्वक विवेचन करें तो हम पाएंगे कि कुछ विशेष योगों की उपस्थिति से केमद्रुम योग भंग होकर राजयोग में परिवर्तित हो जाता है।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली में चन्द्रमा को सबसे अधिक महत्वपूर्ण ग्रह माना जाता है जिसका निश्चय इन तथ्यों से किया जा सकता है कि आज भी बहुत से वैदिक ज्योतिषी चन्द्रमा की स्थिति वाले घर को ही कुंडली में लग्न मानते हैं, चन्द्र राशि को ही जातक की जन्म राशि कहा जाता है, चन्द्र नक्षत्र को ही जातक का जन्म नक्षत्र कहा जाता है, विंशोत्तरी जैसी महादशाओं की गणना भी चन्द्रमा के आधार पर ही की जाती है तथा विवाह कार्यों के लिए कुंडली मिलान में प्रयोग होने वाली गुण मिलान की प्रक्रिया भी केवल चन्दमा की स्थिति के आधार पर ही की जाती है जिससे यह सपष्ट हो जाता है कि वैदिक ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा ही प्रत्येक कुंडली में सबसे महत्वपूर्ण ग्रह हैं।
किसी कुंडली में जब चन्द्रमा जैसा सबसे अधिक महत्वपूर्ण ग्रह किसी भी प्रकार के प्रभाव से रहित होकर अकेला पड़ जाता है तथा कुंडली के सबसे अधिक महत्वपूर्ण माने जाने वाले केन्द्र के घरों में भी कोई ग्रह स्थित न होने के कारण अकेलेपन की स्थिति ही बनती हो तो इसका अर्थ यह निकलता है कि ऐसी कुंडली में किसी भी प्रकार के महत्वपूर्ण तथा शुभ फलदायी परिणामों को जन्म देने की क्षमता बहुत कम है जिसके चलते जातक अपने जीवन में कुछ भी विशेष नहीं कर पाता।
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.–09024390067) के अनुसार इस प्रकार कुंडली के सबसे महत्वपूर्ण ग्रह तथा कुंडली के सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र के घरों के प्रभावहीन होने से कुंडली में केमद्रुम योग बन जाता है जिसके प्रभाव में आने वाला जातक कुछ विशेष उपलब्धियां प्राप्त नहीं कर पाता। शास्त्रों में कतिपय ऐसे योगों का उल्लेख भी मिलता है जिनके प्रभाव से केमद्रुम योग भंग होकर राजयोग में बदल जाता है। केमद्रुम योग को भंग करने वाले प्रमुख योग निम्नलिखित हैं।
1. चंद्रमा पर बुध या गुरु की पूर्ण दृष्टि हो अथवा लग्न में बुध या गुरु की स्थिति या दृष्टि हो।
2. चंद्रमा और गुरु के मध्य भाव-परिवर्तन का संबंध बन रहा हो।
3. चंद्रमा-अधिष्ठित राशि का स्वामी चंद्रमा पर दृष्टि डाल रहा हो।
4. चंद्रमा-अधिष्ठित राशि का स्वामी लग्न में स्थित हो।
5. चंद्रमा-अधिष्ठित राशि का स्वामी गुरु से दृष्ट हो।
6. चंद्रमा-अधिष्ठित राशि का स्वामी चंद्रमा से भाव परिवर्तन का संबंध बना रहा हो।
7. चंद्रमा-अधिष्ठित राशि का स्वामी लग्नेश, पंचमेश, सप्तमेश या नवमेश के साथ युति या दृष्टि संबंध बना रहा हो।
8. लग्नेश, पंचमेश, सप्तमेश और नवमेश में से कम से कम किन्ही दो भावेशों का आपस में युति या दृष्टि संबंध बन रहा हो।
9. लग्नेश बुध या गुरु से दृष्ट होकर शुभ स्थिति में हो।
10. चंद्रमा केंद्र में स्वराशिस्थ या उच्च राशिस्थ होकर शुभ स्थिति में हो।
जानिए केमद्रुम योग के शुभ और अशुभ फल—–
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.–09024390067) के अनुसार केमद्रुम योग में जन्‍म लेनेवाला व्‍यक्ति निर्धनता एवं दुख को भोगता है | आर्थिक दृष्टि से वह गरीब होता है | आजिविका संबंधी कार्यों के लिए परेशान रह सकता है | मन में भटकाव एवं असंतुष्टी की स्थिति बनी रहती है | व्‍यक्ति हमेशा दूसरों पर निर्भर रह सकता है | पारिवारिक सुख में कमी और संतान द्वारा कष्‍ट प्राप्‍त कर सकता है | ऐसे व्‍यक्ति दीर्घायु होते हैं |
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.–09024390067) के अनुसार केमद्रुम योग के बारे में ऐसी मान्यता है कि यह योग संघर्ष और अभाव ग्रस्त जीवन देता है | इसीलिए ज्योतिष के अनेक विद्वान इसे दुर्भाग्य का सूचक कहते हें, परंतु यह अवधारणा पूर्णतः सत्य नहीं है | केमद्रुम योग से युक्त कुंडली के जातक कार्यक्षेत्र में सफलता के साथ-साथ यश और प्रतिष्ठा भी प्राप्त करते हैं | वस्तुतः अधिकांश विद्वान इसके नकारात्मक पक्ष पर ही अधिक प्रकाश डालते हैं | यदि इसके सकारात्मक पक्ष का विस्तार पूर्वक विवेचन करें तो हम पाएंगे कि कुछ विशेष योगों की उपस्थिति से केमद्रुम योग भंग होकर राजयोग में परिवर्तित हो जाता है | इसलिए किसी जातक की कुंडली देखते समय केमद्रुम योग की उपस्थिति होने पर उसको भंग करने वाले योगों पर ध्यान देना आवश्यक है तत्पश्चात ही फलकथन करना चाहिए |
यहां केमद्रुम योग प्रभावित कुछ उदाहरण कुंडलियों का विश्लेषण प्रस्तुत है——
उपर्युक्त ग्रह योगों को निम्नलिखित उदाहरणों में देखना होगा।
प्रस्तुत कुंडली प्रथम महिला आईपी. एस किरण बेदी की है। इनकी कुंडली का केमद्रुम योग निम्नलिखित योगों के कारण भंग हो कर राजयोग में परिवर्तित हुआ है।
किरण बेदी जन्म दिनांक : 9 जून 1949 जन्म समय : 14 :10 बजे 1- जन्म स्थान : अमृतसर चंद्रमा, अधिष्ठित राशि अपने स्वामी मंगल एवं लग्नेश बुध से दृष्ट है। 2. लग्नेश बुध, चंद्र-लग्नेश मंगल तथा लग्न पर गुरु की पंचम व नवम शुभ दृष्टि है।
प्रस्तुत कुंडली हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता राजेश खन्ना की है। इनकी जन्म कुंडली का केमद्रुम योग भी निम्नलिखित योगों से भंग हो रहा है- अभिनेता राजेश खन्ना जन्म दिनांक : 29 दिसंबर 1942 जन्म समय : 17 :45 बजे जन्म स्थान : अमृतसर 1. चंद्रमा अधिष्ठित राशि का स्वामी सूर्य गुरु से दृष्ट है। 2. लग्नेश बुध, पंचमेश शुक्र की युति चंद्रमा अधिष्ठित राशि के स्वामी सूर्य से है जिसका गुरु से पूर्ण सप्तम दृष्टि संबंध है।
यह कुंडली प्रसिद्ध ज्योतिषी एच. एन. काटवे की है। इनकी कुंडली में भी केमद्रुम योग भंग होकर राजयोग में बदल गया है। केमद्रुम योग भंग करने वाले योग निम्नलिखित है।
1. चंद्रमा अधिष्ठित राशि का स्वामी शुक्र, लग्नेश गुरु से युति कर रहा है।
2. सप्तमेश बुध, नवमेश सूर्य से युति कर रहा है।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि केमद्रुम योग जिसे एक अशुभ योग माना जाता है, यदि किसी प्रकार भंग हो जाता है तो यह पूर्ण रूप से राजयोग में बदल जाता है। इसलिए किसी जातक की कुंडली देखते समय केमद्रुम योग की उपस्थिति होने पर उसको भंग करने वाले उपर्युक्त योगों पर निश्चय ही ध्यान देना चाहिए। उसके बाद ही फलकथन करना चाहिए।
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.–09024390067) के अनुसार सुधी पाठक केमद्रुम योग को भंग कर राजयोग में परिवर्तित करने वाले उपर्युक्त योगों की सत्यता की पुष्टि महात्मा गांधी, नेल्सन मंडेला, जुल्फिकार अली भुट्टो, भैरों सिंह शेखावत, बिल गेट्स, देवानंद, राजकपूर, ऋषि कपूर, शत्रुध्न सिन्हा, अमीषा पटेल, अजय देवगन, राहुल गांधी, शंकर दयाल शर्मा, ईजमाम उल हक, जवागल श्री नाथ, पीचिदंबरम, मेनका गांधी, वसुंधरा राजे, अर्जुन सिंह तथा अनुपम खेर आदि सुप्रसिद्ध जातकों की कुंडलियों में स्वतः कर सकते हैं।
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.–09024390067) के अनुसार यहां पर यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि विभिन्न कुंडलियों में बनने वाला केमद्रुम योग विभिन्न तथ्यों तथा स्थितियों के चलते कम अथवा अधिक अशुभ फल प्रदान करेगा। उदाहरण के लिए चन्द्रमा के वृश्चिक राशि में स्थित होने पर बनने वाला केमद्रुम योग चन्द्रमा के वृष अथवा कर्क राशि में स्थित होने पर बनने वाले केमद्रुम योग से अधिक अशुभ फल देने वाला होगा। इसी प्रकार चन्द्रमा के किसी कुंडली में 5वें अथवा 9वें घर में स्थित होने से बनने वाला केमद्रुम योग चन्द्रमा के किसी कुंडली में 8वें घर में स्थित होने से बनने वाले केमद्रुम योग की तुलना में कम अशुभ होगा।
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.–09024390067) के अनुसार इसके अतिरिक्त कुंडली में बनने वाले अन्य शुभ अशुभ योगों का भी भली भांति निरीक्षण कर लेना चाहिए क्योंकि कुंडली में उपस्थित एक अथवा एक से अधिक शुभ योग केमद्रुम योग के प्रभाव को कम कर सकते हैं जबकि कुंडली में उपस्थित अशुभ योग अथवा दोष केमद्रुम योग के अशुभ प्रभाव को और बढ़ा सकते हैं। किसी कुंडली में केमद्रुम योग के साथ साथ कालसर्प दोष का भी बन जाना जातक के लिए भीषण विपत्तियों तथा समस्याओं का सूचक होता है। इसलिए केमद्रुम योग के निर्माण तथा फलादेश से पहले इनसे जुड़े सभी तथ्यों का भली भांति निरीक्षण कर लेना चाहिए।
राजयोग को समाप्‍त करने में समर्थ केमद्रुम योग के इतने सामान्‍य ढंग के अपवाद हों , यह मेरे बुद्धि को संतुष्ट नहीं करता। सच तो यह है कि केमद्रुम योग कोई योग ही नहीं , जिससे कोई अनिष्‍ट होता है। ज्‍योतिष के इन्‍हीं कपोल कल्पित सिद्धांतों या हमारे पूर्वजों द्वारा ग्रंथों की सही व्‍याख्‍या न किए जाने से से ज्‍योतिष के अध्‍येताओं को ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो पाती है और वे ज्‍योतिष को मानने तक से इंकार करते हैं। आज भी सभी ज्‍योतिषियों को परंपरागत सिद्धांतों को गंभीर प्रयोग और परीक्षण के दौर से गुजारकर सटीक ढंग से व्‍याख्‍या किए जाने हेतु एकजुट होने की आवश्‍यकता है , ताकि ज्‍योतिष की विवादास्‍पदता समाप्‍त की जा सके और हम सटीक भविष्‍यवाणियां करने में सफल हो पाएं !!

क्या उपाय करें केमद्रुम योग के अशुभ प्रभाव को कम करने हेतु ???
(केमद्रुम योग की शांति के उपाय )——-
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.–09024390067) के अनुसार केमद्रुम योग के अशुभ प्रभावों को दूर करने हेतु कुछ उपायों को करके इस योग के अशुभ प्रभावों को कम करके शुभता को प्राप्त किया जा सकता है |
——सोमवार को पूर्णिमा के दिन अथवा सोमवार को चित्रा नक्षत्र के समय से लगातार चार वर्ष तक पूर्णिमा का व्रत रखें |
—–सोमवार के दिन भगवान शिव के मंदिर जाकर शिवलिंग पर गाय का कच्चा दूध चढ़ाएं व पूजा करें | भगवान शिव ओर माता पार्वती का पूजन करें | रूद्राक्ष की माला से शिवपंचाक्षरी मंत्र ” ऊँ नम: शिवाय” का जप करें ऎसा करने से केमद्रुम योग के अशुभ फलों में कमी आएगी |
—–शास्त्रीय उपाय चंद्र के बीज मंत्र या तांत्रिक मंत्र का दस माला जप नियमित रूप से करें।
—–वर्ष में एक बार जप का दशांश हवन करें।
—–दो मुखी, चार मुखी व पांच मुखी रुद्राक्षों को रुद्राक्ष मंत्रों से अभिमंत्रित कर लाॅकेट बनाकर धारण करें।
—–बीसा यंत्र में मोती के साथ मूंगा या मोती के साथ पुखराज धारण करें। इस हेतु कुंडली में चंद्र पर ष्टिकारक शुभ भावेश का चयन कर मूंगा व पुखराज में से किसी एक का चयन करें।
—–घर में दक्षिणावर्ती शंख स्थापित करके नियमित रुप से श्रीसूक्त का पाठ करें | दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर उस जल से देवी लक्ष्मी की मूर्ति को स्नान कराएं तथा चांदी के श्रीयंत्र में मोती धारण करके उसे सदैव अपने पास रखें या धारण करें |
—–सोमवार को व्रत रखें।
——केमद्रुम योग वाले लोग यदि माघ पूर्णिमा के दिन सुबह किसी नदी, सरोवर अथवा कुंए पर स्नान कर सफेद वस्त्र, भोजन, घी, कपास एवं चाँदी का दान करें तो इस योग से शांति मिलती है।इस दिन पूर्ण सफेद वस्त्र धारण करने से भी लाभ होता है। इस दिन यदि सक्षमता हो तो अनामिका अंगुली में चांदी, सोने एवं तांबे के तार से बना हुआ छल्ला धारण किया जाए तो केमद्रुम योग से मुक्ति मिलती है।
——रुद्राभिषेक करें। शिवलिंग का नित्य दर्शन व पूजन करें।
—–घर में पूर्ण चंद्रमा का फोटो पूर्व दिशा में ऐसा लगाये जिसमे चंद्रमा के चारों ओर अन्य ग्रह नक्षत्र ओर तारे चमक रहे हों |
—–अपने जन्म दिवस पर महामृत्युंजय मंत्र का सवा लाख बार जप करें या कराएं।
—–वर्षा के समय में जों बर्फ के ओले गिरते है उसको किसी कांच की बोतल में जमा करके रखना चाहिए, गर्मी के समय में बच्चो ओर बडो में भी बर्फ से बनी कुल्फी या बर्फ देनी चाहिए |
—-त्रिशक्ति लाकेट धारण करें। लग्नेश, पंचमेश व भाग्येश के रत्नों से निर्मित लाकेट त्रिशक्ति लाकेट होता है।
################################
मेरा अनुरोध/निवेदन हें उन सभी विद्वान् एवं अनुभवी ज्योतिषाचार्यों से की अब समय आ गया हें की हम सभी मिलकर इस प्रकार के योगों के बारें में नयी सोच-खोजबीन करें..ताकि हम समय/ज़माने के साथ चल सकें…
इन योगों को विज्ञानं/समय की कसोटी पर खरा/सच्चा उतरने/ठहराने के लिए हम सभी को सामूहिक प्रयास /प्रयत्न करने होंगे ..पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.–09024390067)

One thought on “केमद्रुम योग के प्रभाव(लाभ-हानि) एवं परिहार(उपाय)—-

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s