विश्व /मदर्स दिवस एक समर्पण../ कविता रूपी मेरे भाव ….मेरी माँ..स्वर्गीय श्रीमती कमला देवी शर्मा को….

विश्व /मदर्स दिवस एक समर्पण../ कविता रूपी मेरे भाव ….मेरी माँ..स्वर्गीय श्रीमती कमला देवी शर्मा को….

 

मां, कितना मीठा, कितना अपना, कितना गहरा और कितना खूबसूरत शब्द है। 

समूची पृथ्वी पर बस यही एक पावन रिश्ता है जिसमें कोई कपट नहीं होता। कोई प्रदूषण नहीं होता। 

इस एक रिश्ते में निहित है छलछलाता ममता का सागर। 

 

शीतल और सुगंधित बयार का कोमल अहसास। 

इस रिश्‍ते की गुदगुदाती गोद में ऐसी अव्यक्त अनुभूति छुपी है 

जैसे हरी, ठंडी व कोमल दूब की बगिया में सोए हों।

 

ओ माँ…मेरी प्यारी माँ…

मैं तेरे कितने कर्ज़ उतारूँ ?

तूने जीने के जो लिये साँसें दीं

उसका कर्ज़ उतारूँ या फिर

तूने जो जीने का सलीका सिखाया

उसका क़र्ज़ उतारूँ !

तूने ताउम्र मेरे तन पर   

ना जाने कितने परिधान सजाये

कभी रंग कर, कभी सिल कर   

उसका क़र्ज़ उतारूँ

या फिर शर्म ओ हया की

धवल चूनर में

मर्यादा का गोटा टाँक  

जिस तरह से मेरी

अंतरात्मा को उसमें लपेट दिया   

उसका क़र्ज़ उतारूँ !

माँ तूने अपने हाथों से नित नये

जाने कितने सुस्वादिष्ट पकवान

बना-बना कर खिलाये कि

जिह्वा उसी स्वाद में गुम

आज तक अतृप्त ही है

उसका क़र्ज़ उतारूँ या फिर

जो मिला जितना मिला उसीमें

संतुष्ट रहने का जो पाठ  

तूने मुझे पढ़ाया

उसका क़र्ज़ उतारूँ !   

मासूम बचपन में जो तूने स्लेट

और तख्ती पर का ख ग घ और

एक दो तीन लिखना सिखाया

उसका क़र्ज़ उतारूँ या मेरे अंतरपट

पर अनुशासन की पैनी नोक से

जो सीख और संस्कार की

एक स्थायी इबारत तूने उकेर दी

उसका क़र्ज़ उतारूँ !

तूने माँ बन कर मुझे जिस

प्यार, सुरक्षा, और निर्भीकता के

वातावरण में जीने का अवसर दिया

उसका क़र्ज़ उतारूँ या फिर

जिस तरह से मेरे व्यक्तित्व में

माँ होने के सारे तत्वों को ही

समाहित कर मुझे एक अच्छी माँ

बनने के लिये तैयार कर दिया

उसका क़र्ज़ उतारूँ !

माँ… यह एक ध्रुव सत्य है कि

तेरे क़र्ज़ मुझ पर अपरम्पार हैं

जितना उन्हें उतारने का

प्रयास मैं करूँगी

मेरे पास बची अब थोड़ी सी

समय सीमा में

तेरे ऋण से उऋण होने का

मेरा यह उपक्रम

अधूरा ही रह जायेगा !

उस परम पिता परमेश्वर से

बस इतनी ही प्रार्थना है कि

अपने बच्चों की माँ होने के लिये

यदि वह मुझमें तेरे व्यक्तित्व का

हज़ारवाँ अंश भी डाल देगा

तो मेरा माँ होना सफल हो जायेगा

और शायद तुझे भी

वहाँ स्वर्ग में मुझ पर

अभिमान करने की कोई तो

वजह मिल ही जायेगी !

है ना माँ … !

मेरी प्यारी-प्यारी माँ…

—-अब तो केवल यादों में रची-बसी हें मेरी माँ..सचमुच मेरी माँ..माँ थी …उसने अपने सभी कर्म पूरी निष्ठां और समर्पण भाव से निभाए ..

–किन्तु  विधाता  के लेख..लगभग पाँच वर्ष पूर्व (21 -05 -2008  को) वे मुझे इस नश्वर संसार में अकेला छोड़कर अनंत लोक में प्रस्थान कर गयी….

—–माँ.मेरी प्यारी माँ…बस आब तो आपकी यादों के सहारे ही या जीवन कट रहा हें..

—-आपके दिए संस्कारों एवं दिशानिर्देशों के अनुसार ही जीवन यापन कर रहा हूँ माँ..!!!

 

—पंडित दयानंद शास्त्री””अंजाना “”

मोब. नंबर—09024390067 …

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