आइये जाने भविष्य कथन की विभिन्न पद्धतियां के बारें में—–

आइये जाने भविष्य कथन की विभिन्न पद्धतियां के बारें में—–

 

आप सभी जानते हें की वर्तमान में भविष्य कथन की अनेक पद्धतियां हैं। भविष्य जानने की उत्सुकता हम सभी के मन में रहती है.अपनी इस उत्सुकता को शांत करने के लिए हम ज्योतिष की विभिन्न पद्धतियों का सहारा लेते हैं.भारत सहित विश्व के अन्य देशों में भविष्य कथन के लिये पद्धतियां हैं….जिनमें से मुख्य रूप से निम्न है——-
 1. ज्योतिष विज्ञान (शास्त्र) अर्थात् जन्मकुंडली या पत्री द्वारा भविष्य कथन: इस जगत की उत्पत्ति का आधार ‘‘वेद’ हैं। वस्तुतः ज्योतिष सबसे अलग एवं अद्वितीय ज्ञान पद्ध ति है। जिसमें संबंधित जातक/ जातिका के जन्म दिनांक, जन्म समय एवं जन्म स्थान के अनुरूप तत्कालिक ग्रह स्थिति तथा ग्रहों की दशा अंतर्दशा व गोचर के आधार पर फल कथन किया जाता है। 
 
ज्योतिष शास्त्र के मुख्यतः 2 अंग हैं। (1) गणित, (2) फलित/होरा 
 
2. सामुद्रिक शास्त्र अर्थात् हस्त रेखा शास्त्र द्वारा भविष्य कथन- हस्त रेखा द्वारा व्यक्ति के भविष्य कथन की यह पद्धति अत्यंत प्रमाणिक एवं वैज्ञानिक है। मनुष्य (बालक) जब जन्म लेता है तो उसके हाथ में केवल कुछ ही रेखा अर्थात तीन रेखायें, मुख्यतः जीवन (आयु) रेखा, मस्तिष्क रेखा तथा हृदय रेखा होती है। किसी-किसी के हाथ में चैथी रेखा भाग्य रेखा के रूप में होती है। ये तीनों या चारों रेखायें हल्की, बारीक एव महीन होती हैं तथा पूर्ण या अपूर्ण दोनों ही तरह की होती है। व्यक्ति (बालक) जैसे-जैसे कर्म करता है, उम्र के हिसाब से ये रेखायें गहरी व मोटी होती जाती हैं। कुछ रेखायें समय बीतने पर अर्थात् बच्चे के बड़े होने पर कार्यों के अनुसार परिवर्तित होती है अर्थात बनती भी है और बिगड़ती भी हैं। मनुष्य के जन्म के समय उसकी जन्मकुंडली (पत्री) में जैसे ग्रह (शुभ या अशुभ) स्थित होते हैं, व्यक्ति के विचार व मानसिकता भी ठीक वैसी ही होती हैं तथा व्यक्ति के विचार जैसे होंगे, ठीक वैसे ही कर्म भी होंगे तथा कर्मों के अनुसार ही हस्त रेखाओं में परिवर्तन अर्थात् रेखाओं का बनना एवं बिगड़ना चलता रहता है। ज्योतिष (कुंडली) एवं सामुद्रिक (हस्तरेखा) शास्त्र एक दूसरे के पूरक हैं। परंतु हस्त रेखा शास्त्र, ज्योतिष पर आधारित विज्ञान है। 
हस्त रेखा व्यक्ति के अतीत, वर्तमान और भविष्य जानने की एक प्राचीन विज्ञान है। नारद, वाल्मीकि, गर्ग, भृगु, पराशर, कश्यप, अत्री, बृहस्पति, प्रहलाद, कात्यायन,वराहमिहिरआदि ऋषि मुनियों ने इस पर बहुत काम किया है। इसके बारे में स्कंध पुराण, भविष्य पुराण, बाल्मीकि रामायण, महाभारत, हस्तसंजीवनी आदि ग्रंथो में वर्णन है। ऐसा कहा जाता है कि सबसे पहले समुद्र नामक ऋषि ने इसका व्यापक प्रचार प्रसार किया इसीलिए इसे सामुद्रिक शास्त्र के नाम से भी जाना जाने लगा। हजारों वर्ष पूर्व हस्तरेखा विज्ञान भारत से ग्रीस, यूनान,मिस्र,फ्रांस, सीरिया आदि देशों में पंहुचा ।
हस्त रेखा किसी भी व्यक्ति के चरित्र को समझने के लिए सर्वोतम विधि है। हाथ या हस्तरेखा व्यक्ति की मानसिकता का दर्पण है। विभिन्न प्रकार के हाथ, हाथों कीआकृतियाँ,हथेलीयां हाथ के रंग,ग्रहों की स्थिति, नख , विशेषचिन्ह, विभिन्न लकीरे मिलकर भिन्न-भिन्न योग बनाती है,जिनका अलग-अलग फल होताहै, इन्ही सब को देख परख कर व्यक्ति का चरित्र चित्रण और भविष्य कथन किया जाता है। हस्तरेखा द्वारा किसी व्यक्ति विशेष का व्यक्तित्व एवं रोगों का फल कथन करना बहुत ही आसान हो जाता है।

हस्तरेखा विश्लेषण : हाथ का आकार/आकृति—
बहुत छोटा हाथ – विद्वान्
छोटा हाथ – भावुक
सामान्य हाथ – सदगुणी
बड़ा हाथ – व्यवहार कुशल
बहुत बड़ा हाथ – परिश्रमी

त्वचा का रंग:—-
बहुत पीला – रक्ताल्पता
पीला – रुग्ण स्वभाव
गुलाबी – हंसमुख स्वभाव
लाल – रक्त की अधिकता
बहुत लाल – हिंसक
अतिरिक्त चिकनी त्वचा – गठिया
शुष्क त्वचा – बुखार
नरम त्वचा – कमजोर जिगर

मुद्रिका:—

प्रत्येक हथेली में नौ क्षेत्र महत्वपूर्ण है:—
बृहस्पति का पर्वत – आध्यात्मिकता
शनि का पर्वत – गंभीरता
सूर्य का पर्वत – प्रतिष्ठा
बुध का पर्वत – वाणिज्य
मंगल ग्रह उंचा पर्वत – जीवन शक्ति
चंद्रमा का पर्वत – कल्पना
शुक्र का पर्वत – प्रेम
मंगल ग्रह निम्न पर्वत – क्रोध

अन्य छोटी बड़ी लकीरों के साथ मुख्यतः सात मुख्य लकीरे हथेली में पाई जाती हैं। 
जीवनरेखा – व्यक्ति की आयु, स्वास्थ्य, बीमारी इस रेखासे जाना जाता है।
मस्तिष्क रेखा – व्यक्ति की बौद्धिकता का अध्ययन इससे किया जाता है।
हृदयरेखा – भावनात्मक पक्ष इससे देखा जाता है।
भाग्यरेखा – व्यक्ति के भाग्य, लाभ, हानि के बारे में इस रेखा से जाना जाता है।
सूर्यरेखा – सफलता, पद, प्रतिष्ठा के बारे में इस रेखा से जाना जाता है।
स्वास्थ्यरेखा – इससे स्वास्थ्य एवं व्यापार दोनों के बारे में जाना जाता है।
विवाहरेखा- वैवाहिक जीवन के बारे में इस रेखा से जाना जाता है।

 
3. अंक ज्योतिष द्वारा भविष्य कथन: अंक ज्योतिष में अंकों का विशेष महत्व होता है। ये अंक मूल रूप में 1 से 9 तक होते हैं जो सौरमंडल के 9 ग्रहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। 
जैसे-1-सूर्य, 2-चंद्र, 3-गुरु, 4- राहु, 5 बुध, 6-शुक्र, 7, केतु, 8 शनि, 9 – मंगल। प्रत्येक अंक, ग्रह से संबंधित होने से अपना विशेष प्रभाव देता हैं। इस तरह से यह विज्ञान भी ज्योतिष आधारित ही है। अंक ज्योतिष द्वारा भविष्य-कथन में 3 तरह के अंक का विशेष महत्व है- (1) मूलांक (2) नामांक (3) भाग्यांक। 
(1) जातक की जन्मतारीख ही उसका मूलांक होती है। मूलांक सदैव एक अंक में ही होता है। यदि किसी की जन्मतारीख 30 है तो इसे मूलांक में बदलने के लिये एक अंक = 3$0 =3 में बदलते हैं। तब इस जन्मतारीख का मूलांक 3 होता है। अतः संसार के सभी जातकों का मूलांक इन्हीं 9 अंकों में से कोई एक होता है। 
 
(2) भाग्यांक: किसी भी जातक का भाग्यांक ज्ञात करने के लिये जातक की जन्मतारीख के सभी अंकों का योग कर, योगफल (एक अंक) में ज्ञात करते हैं। वही भाग्यांक कहलाता है। मूलांक एवं भाग्यांक सदैव जन्मतिथि के आधार पर निकाले जाते हैं। 
(3) नामांक: जातक का नामांक ज्ञात करने के लिये नाम के अंगे्रजी अक्षरों को आधार माना जाता है। प्रत्येक अंग्रेजी अक्षर के लिए एक अंक निश्चित होता है और नाम के इन्हीं अंकों का योगकर जातक के नामांक का निर्धारण किया जाता है। चूंकि अंकों में भी शत्रुता एवं मित्रता होती है अतः किसी जातक का मूलांक, भाग्यांक एवं नामांक, उसके नाम से मेल न खाता हो तो वह नाम उस जातक के लिये भाग्यशाली नहीं होता है। अतः भाग्योदय या भाग्यवृद्धि के लिये व्यक्ति को अपना नाम, नामांक, मूलांक व भाग्यांक के आधार पर ही रखना चाहिये। नाम पहले से ही रखा हो तो उसमंे कुछ परिवर्तन कर अर्थात् अक्षरो को जोड़कर या तोड़कर नाम को भाग्यशाली बना सकते हैं। इस पद्धति की सहायता से व्यक्तिगत नाम के अलावा जातक व्यवसायिक क्षेत्रों में भी मनपसंद नाम रखकर जीवन में तरक्की कर सकता है। भविष्य-कथन की इस पद्धति द्वारा हम कम श्रम, कम समय एवं कम खर्च में ही अधिक उपयोगी एवं सटीक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 
4. हिंदू वास्तुशास्त्र एवं चीनी ज्योतिष (वास्तु शास्त्र) अर्थात् फेंगशुई द्वारा भविष्य कथन: कहते हैं कि चीनी ज्योतिष फेंग शुई भी हिंदू वास्तु शास्त्र की देन है। जो प्रकृति के पांचों तत्व अर्थात अग्नि, पृथ्वी, जल, वायु, आकाश के संतुलन पर आधारित है। ये ही पांचों तत्व चीनी ज्योतिष का भी आधार है। इसके अलावा चीनी ज्योतिष में 12 वर्षों का एक चक्र होता है। इस मतानुसार जातक का एक सांकेतिक चिन्ह होता है। इसी चिन्ह को आधार मानकर घर के उन हिस्सों का पता लगाया जाता है जिनका प्रभाव जातक सहित परिवार के किसी भी सदस्य पर रहता है। उनके संतुलन का उपाय करके हम लाभ प्राप्त कर सकते हैं। 
5. टैरो कार्ड पद्धति द्वारा भविष्य कथन: टैरो पद्धति में 78 कार्डों का डेक होता है। ये कार्ड व्यक्ति के भविष्य कथन के रहस्य को उजागर कर सकते हैं। यह पद्धति भी ज्योतिष (ग्रहों, राशियां आदि) पर आधारित है। कार्डों को खोलने पर यदि मेजर/ प्रधान कार्ड अधिक आते हैं तो यह स्थिति बहुत ही शुभ, अच्छी मानी जाती है। इस पद्धति द्वारा एक समय में केवल एक ही प्रश्न का उत्तर सही मिल सकता है। अतः एक समय में एक ही प्रश्न करना ज्यादा शुभ रहता है। 
6. ताश के पत्तों द्वारा भविष्य कथन: यह एक रहस्यमयी पद्ध ति है। इसमें ताश के 52 पत्तों की एक गड्डी होती है तथा इनमें चारों रंग- 1. हुकुम (काला), 2. पान लाल, 3. ईंट (लाल), 4. चिड़ी के पत्ते (काले होते हैं। इसमें प्रत्येक वर्ग में 13-13 पत्ते होते हैं। इन चारो रंगों के अर्थ अलग-अलग होते हैं। 13 पत्तों के प्रत्येक समूह में इक्का, बादशाह, बेगम, गुलाम तथा 2 से 10 तक 9 पत्ते अर्थात 13 पत्ते होते हैं। ये सभी पत्ते कुछ रहस्यात्मक संदेश देते हैं। इस गड्डी को तीन बार फेंटकर उन्हें तीन बराबर समूहों में बांटकर तीन पत्तों के समूह द्व ारा भविष्य-कथन किया जाता है जो किसी भी प्रश्न से संबंधित हो सकता है। 
7. लाल किताब द्वारा भविष्य कथन ः यह माना जाता है कि यह पद्धति इस्लाम की देन है। इस पद्धति का महत्व या उपयोगिता, इसके उपायों के सरल होने के कारण है। इसके उपाय बड़े कारगर एवं प्रभावशाली भी हैं। इस पद्धति में भावों को ‘खानों’ का नाम दिया जाता है तथा 1 से 12 तक के खाना नंबर लिखे जाते हैं। इनमे राशियों का कोई महत्व नहीं होता है। लग्न चक्र बनाकर राशि के अंकों को मिटाकर उनकी जगह लग्न से प्रारंभ करते हुये एक से बारह तक के खाना नंबर लिखे जाते हैं। जिससे यह पता चलता है कि कौन सा-ग्रह कौन से खाने में हैं। फिर खानों के हिसाब से ग्रहों की स्थिति के अनुसार फलादेश किया जाता है। इस पद्धति में अशुभ ग्रहों की भांति एवं शुभ ग्रहों के शुभत्व में वृद्धि के लिये जो भी ‘‘उपाय’’ करते हैं उन्हें ‘‘टोटके’’ कहा जाता है। ये उपाय लगातार 43 दिनों तक करने होते हैं। सरल एवं सस्ते होने के कारण इन टोटको (उपायो) का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। लाल किताब की इस पद्धति में ‘‘वर्षकुंडली’’ बनाने का विशेष महत्व होता है। परंतु इसकी बनाने की प्रक्रिया अलग है। इसमें पिछले वर्ष के अनुसार ग्रहों को एक खाने से दूसरे खाने में दर्शाया जाता है। वर्ष कुंडली के शुभाशुभ ग्रह, वर्ष विशेष में असर डालते हैं। इस पद्धति में टोटकों के साथ उत्तम चरित्र, सत्यता, सात्विक आहार तथा शुद्धता पर अधिक बल दिया जाता है। 
ज्योतिष को वेद (ज्ञान) की तीसरी आंख कहते हैं, उसका महत्व आज भी बरकरार है। वर्तमान समय में भी उसके कमोवेश अवशेष विद्यमान हैं। इस सदी के महान वैज्ञानिक न्यूटन ने अपनी स्वयं की कुण्डली लाल किताब के आधार पर स्वयं निर्मित की थी। न्यूटन को अहसास हो गया था कि हस्तरेखा से निर्मित कुण्डली मनुष्य के कारनामों की पोल पलक झपकते ही खोलने में सक्षम है। जगत की सारी प्राचीन सभ्यताओं में ज्योतिष एवं खगोल शास्त्र की परम्परा रही है। एवं इस ज्ञान का आदान-प्रदान भी होता रहा है। मानव सभ्यता के इतिहास में दो समानान्तर धारायें अविरल चलती रही हैं। प्रथम धारा थी विशुद्ध ग्रहों की गति पर आधारित घटनाओं की जो गणित ज्योतिष की तुलना में फलित ज्योतिष कहलाती है। कालान्तर में गणित ज्योतिष की तुलना में फलित ज्योतिष अर्थात लाल किताब खूब फैली व 12वीं सदी के बाद ज्योतिष के सिद्धांत की मात्र टीकायें लिखी जाने लगीं जबकि गणित ज्योतिष किताबों में सिमट कर रह गयी। फलित ज्योतिष के कई रुप हो गये हैं। जैसे- हस्त रेखा शास्त्र, मुखाकृति विज्ञान, हस्ताक्षर विज्ञान, प्रश्न कुंडली विज्ञान, अंक शास्त्र, होरा शास्त्र आदि न जाने कितनी विधायें पनपी व लोकप्रिय रहीं। कालक्रम में ध्यान देने वाली बात यह है कि आजकल लाल किताब भी प्रचलन में आ गयी है। पुरातन काल में दुर्लभ साहित्यों एवं ज्योतिषियों की भविष्य कथन की प्रक्रिया उलझी हुई व पहेलीनुमा भाषाओं में होती थीं, जैसा कि लाल किताब पर दृष्टि डालने पर प्रतीत होता है। उलझी हुई भविष्यवाणियां होने पर भी वक्त आने पर उनके अर्थ स्वतः स्पष्ट हो जाते थे। जगत की पुरातन सभ्यताओं में कालक्रम के अनुसार मंदिरों में पुजारी एवं पुजारिनें, भविष्य अध्ययन व कथन लाल किताब के ही अनुसार किया करते थे। सन् 1942 में हिटलर ने अपने निजी ज्योतिषी एवं आध्यात्मिक सलाहकार (श्री क्राफ्ट ) से पूछा था जर्मनी की किस्मत में युद्ध का धुआं कब-तक बदा है। क्राफ्ट ने कहा था कि मई 1945 तक’ ‘एवं मेरा भविष्य?’, क्राफ्ट ने उत्तर दिया- ‘सूरज की अग्नि जैसा प्रखर व बंकर जैसा सुरक्षित।’ इतिहास साक्षी है कि 29 अप्रैल 1945 को बर्लिन के एक बंकर में हिटलर ने अपनी प्रेमिका (ईवाव्रान) से विवाह किया एवं अगले ही दिन आत्महत्या करने के पूर्व अपने अनुचरों को आदेश दिया कि ईवा व उसकी लाश को पेट्रोल से जला दें। इसका यह अभिप्राय है कि मनुष्य वर्तमान में जो अच्छे कर्म करता है या बुरे कर्म करता है, उसका प्रभाव उसके पूर्वार्जित अदृष्ट पर अवश्य पड़ता है। ज्योतिष के हिसाब से लौकिक पक्ष में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्रह फलाफल में नियामक नहीं हैं, अपितु सूचक हैं। अर्थात ग्रह किसी को सुख -दुःख नहीं देते बल्कि आने वाले सुख-दुःख की सूचना देते हैं। लाल किताब के अनुसार बनी जन्म पत्री में तलाशें कि कौन सा ग्रह कष्ट दे रहा है। उसके अनुसार आप उस ग्रह की शांति का उपाय कर लें। यदि आपको अपनी जन्म-पत्री का ठीक-ठीक पता नहीं है तो भी आप निम्न प्रयोग एक सप्ताह अवश्य करें, करके देखें। यदि आपको आभास होता है कि अमुक दिन आपके लिये विशेष रुप से कष्टकारी सिद्ध होता है तो उस दिन से सम्बंधित ग्रह का टोटका 40 से 43 दिनों तक नित्य करें। यह प्रयोग आपका आर्थिक पक्ष सबल करेगा। लाल किताब के टोटकों में (चलते पानी में बहाना) प्रायः प्रयोग कराया जाता है। इसके पीछे भाव यह है कि आपके सारे कष्ट कोई अज्ञात शक्ति पानी में बहाकर आपसे दूर लिये जा रही है। यूनान में पूर्व सागर तटीय क्षेत्र में एथेंस के पास डेल्फी नामक पर्वतीय अंचल में अपोलो का मन्दिर था जिसके भग्नावशेष आज भी विद्यमान हैं। ईसा पूर्व की चौथी सदी में डेल्फी की पुजारिने विशेष दिनों में लाल किताब के अनुसार भविष्य कथन किया करती थीं, जिन्हें पायथिया कहा जाता है। वे हाथ की रेखाओं के आधार पर निर्मित जन्म कुण्डली से भविष्यवाणी करतीं थीं। उन्हीं दिनों रोम के सम्राट नीरो ने डेल्फी के पायथिया से अपना भविष्य पूछने की कामना की। वह काफी प्रयास के बाद लम्बी यात्रा करके डेल्फी पहुंचा। अपोलो के पवित्र मन्दिर में उसे घुसते ही वहां उपस्थित पायथिया ने चीखते हुये कहा ‘जा, भाग जा, माता के हत्यारे, डेल्फी और बचकर रहे। इस अपमान से नीरों आपे से बाहर हो गया। उसने डेल्फी की सारी पुजारिनों को एवं उस पुजारिन का हाथ-पैर काट कर उन्हें जिन्दा ही जमीन में दफनाने का हुक्म दिया एवं उनके अंगरक्षकों ने मन्दिरों को तहस -नहस कर दिया। नीरो ने सोचा कि पुजारिन ने उसकी आयु 73 वर्ष बतायी है परन्तु पुजारिन का आशय कुछ और था। जिसने नीरो की हत्या की थी उसका नाम गलबा था एवं उसका राज्य भी हथिया लिया था। तब उसकी आयु 73 वर्ष की थी उस गलबा ने 73 वर्ष पूर्ण होने के पूर्व ही नीरो की हत्या कर दी। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह सत्य प्रतीत होता है कि दिव्य-दृष्टि से लिखी लाल किताब के पन्ने गूढ़ एवं गहन विधाओं एवं अतीन्द्रिय शक्तियों के स्वामी हैं जो मानव की आत्माओं म झांककर विभिन्न गोपनीय रहस्यों को उजागर करते हैं। लाल किताब के टोटकों में (चलते पानी में बहाना) प्रायः प्रयोग कराया जाता है। इसके पीछे भाव यह है कि आपके सारे कष्ट कोई अज्ञात शक्ति पानी में बहाकर आपसे दूर लिये जा रही है। किंवदंती है कि लंकाधिपति रावण ने सूर्य के सारथी अरुण से इस इल्म का सामुद्रिक ज्ञान संस्कृत में ग्रन्थ के रुप में ग्रहण किया था। रावण की तिलस्मी दुनिया समाप्त होने के पश्चात् यह ग्रन्थ किसी प्रकार ‘आद’ नामक स्थान पर पहुंच गया जहां इसका अनुवाद अरबी-फारसी में किया गया। कुछ लोग आज भी यह मानते हैं कि पुस्तक फारसी में उपलब्ध है जबकि सच्चाई कुछ और है यह ग्रन्थ उर्दू में अनुवादित होने के पश्चात पाकिस्तान के पुस्तकालय में सुरक्षित है। परन्तु कालवश इस ग्रन्थ अरुण संहिता बनाम लाल किताब का कुछ हिस्सा लुप्त हो चुका है। लाल किताब में कहा गया है ‘बीमारी का इलाज दवा है, मगर मौत का इलाज नहीं, दुनियावी हिसाब -किताब है कोई दवा खुदायी नहीं।’ इसका तात्पर्य यह है कि लाल किताब कोई जादू नहीं अपितु बचाव एवं रुह (आत्मा )की शान्ति के लिये है मगर दूसरों पर हमला करने के लिये नहीं। अगर भाग्य के राह में कोई ईंट या पत्थर गिरा दे एवं मार्ग का अवरोध करे तो इस विषय की मदद से पत्थर हटाकर उसे प्रवाहमान करने की कोशिश की जा सकती है। लाल किताब के अनुसार सूर्य के देवता विष्णु जी, चन्द्र के देवता शिव जी, बुध के देवता दुर्गा जी, बृहस्पति के देवता ब्रह्मा जी, शुक्र के देवता लक्ष्मी जी, शनि के देवता शिव जी, राहु के देवता सर्प, केतु के देवता गणेश जी हैं। आपको लगता है कि किसी ग्रह के कारण आप भौतिक कष्ट भोग रहे हैं तो आप उस ग्रह से संबंधित देवता की पूजा-अर्चना करें,प्रभु अवश्य सुख-समृद्धि तथा शांति प्रदान करेंगे।
8. प्रश्न शास्त्र द्वारा भविष्य कथन— इसका महत्व उन लोगों के लिए अधिक होता है जिनके पास या तो जन्मपत्री नहीं है अथवा जन्मतारीख एवं समय का पता नहीं होता है। ऐसे लोगों के प्रश्नों का उत्तर ‘प्रश्न शास्त्र’ पद्धति द्वारा सटीकता से दिया जा सकता है। इसमें प्रश्न पूछने के लिये ‘‘समय’’ का विशेष महत्व है। इसके आधार पर ‘प्रश्न लग्न’ बनाया जाता है तथा विभिन्न विषयों से संबंधित प्रश्नों के उत्तर के रूप में भविष्य कथन किया जा सकता है। इसके लिए मात्र थोड़े समय की ही आवश्यकता होती हैं। इस पद्धति के अंतर्गत ‘‘केरलीय विधि’’ की प्रश्नोत्तरी शामिल है। केपी. प्रश्नोत्तरी पद्धति द्वारा भी भविष्य कथन किया जा सकता है। इसके अलावा श्रीसांई, श्रीहनुमान आदि प्रश्नोत्तरी द्वारा भी भविष्य-कथन किया जा सकता है। 
9. रमल शास्त्र द्वारा भविष्य कथन: यह विद्या मूलरूप से भारत की ही देन है क्योंकि ‘‘रमल रहस्य’’ पुस्तक, जिसके रचनाकार- श्री भव्य भंजन शर्मा के अनुसार, माता पार्वती के द्वारा प्रश्न शास्त्र के ज्ञान के बारे में प्रश्न पूछे जाने पर भगवान शिव के मस्तक पर स्थित चंद्र से अमृत की चार बूंदे गिरी, जो क्रमशः प्रकृति के चारो तत्वों- अग्नि, वायु, जल एवं पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन्हीं बिंदुओं के आधार पर रस ‘‘रमल शास्त्र’’ में 16 ‘‘शक्लों’’ के रूपक बने। प्राचीन ज्योतिष शास्त्र की भांति ही इसमें भी 16 शक्लों में प्रथम 12 शक्लें 12 ज्योतिषीय भावों का प्रतिनिधित्व करती है। इसके अलावा 13 से 16 तक शक्लें ‘‘साक्षी’’ भावों को दर्शाती हैं। इस प्रकार ‘‘16 शक्लें’’ रमल शास्त्र का आधार हैं। इस पद्धति द्वारा भी जीवन से संबंधित सभी प्रश्नों का उत्तर दिया जा सकता है। 
10. लोशू चक्र द्वारा भविष्य कथन– इस विद्या का संबंध चीन देश तथा कछुए से हैं। इस विद्या का संबंध भी कहीं न कही भारत देश से ही है। अर्थात् लोशु चक्र की विद्या का मूल तत्व या जनक भगवान श्री हरि का कूर्म रूप है। हिंदुओं की ही भांति चीन मंे भी कछुएं एवं उससे जुड़ी चीजों को शुभ माना जाता है। वे लोग भी यह मानते हैं कि कछुए के कवच में परमात्मा का वास होता है। अतः इसका मिलना शुभ शकुन समझा जाता है। लगभग 4000 वर्ष पूर्व इसिवार वू नामक चीनी राजा एवं उसके मंत्रियों ने कछुए के कवच के ऊपर अंकित बिंदुओं का ध्यानपूर्वक विश्लेषण किया तथा 33 अंक का एक पूर्ण वर्ग बनाकर उसे ‘‘लोशू चक्र’’ नाम दिया। यह लोशू चक्र इस विशेषता पर टिका था कि इसकी कोई भी रेखा चाहे वह क्षैतिज हो या ऊध्र्वाकार हो, अथवा विकर्णीय हो, उसके तीनों अंकों का योग 15 ही होता था तथा मध्य में अंक 5 था, जिसे चीनी लोग बहुत ही शुभ मानते थे। इस लोशु चक्र में 1 से 9 तक के प्रत्येक अंक के लिये एक स्थान निश्चित होता है। लोशु चक्र द्वारा भविष्य कथन करने के लिये प्रश्नकर्ता की जन्मतिथि महत्वपूर्ण होती है। प्रश्नकर्ता की जन्मतिथि के अंकों को लोशू चक्र्र में उसी स्थान पर रखना होता है। चाहे किसी अंक की पुनरावृत्ति क्यों न हो। 1 से 9 अंक, ज्योतिष के ग्रहों से जुड़े हैं। डाउजिंग से भविष्य कथन: इस पद्धति द्वारा भविष्य का नहीं बल्कि निकट भविष्य का फल कथन किया जा सकता है। इसके लिये विशेष प्रकार से रचित प्रश्नों और कार्डों का उपयोग किया जाता हैं । 
12. नंदी नाड़ी ज्योतिष द्वारा भविष्य कथन: इस शास्त्र की उत्पत्ति के संबंध में यह कहा जा सकता है कि जब माता पार्वती जी मनुष्य के भविष्य कथन को जानने के हठ में आ गयी तो भगवान शिव रात्रिकालीन सुनसान वेला में इसका वृतांत सुना रहे थे तब इनके प्रहरी नंदी ने इसे सुनकर महर्षियों को बता दिया तथा इन्होंने इसे ताड़पत्र पर लिपिबद्ध कर लिया। इसलिये इसे नंदी नाड़ी ज्योतिष कहते हैं। 
13. श्री राम शलाका एवं अन्य प्रश्नोत्तरी पद्धतियों द्वारा भविष्य कथन: भारत के ऋषियों, मुनियों द्वारा अपनी दिव्य शक्तियों के बल पर विभिन्न प्रश्नोत्तरी पद्धतियों जैसे – श्री रामशलाका, श्री बत्तीसा यंत्र, नक्षत्र प्रश्नावली, श्री भैरव, श्री गर्भिणी प्रश्नावलियों, श्री साई, श्री हनुमान एवं केरलीय मूक प्रश्नोत्तरियों की खोज की गयी जिनके आधार पर किसी भी व्यक्ति का भविष्य-कथन किया जा सकता है। ये सारी प्रश्नोत्तरी पद्धतियां प्रश्न शास्त्र विद्या के अंतर्गत ही आती हैं।
 14. गुप्त विद्या पद्धति (भावी ज्ञान) द्वारा भविष्य कथन: इस पद्धति द्वारा भविष्य कथन करने के लिये नीचे बताया गया ‘‘तीसा यंत्र’’ होता है। इसके द्वारा कुल 38 प्रश्नों का भविष्य कथन किया जाता है। इसके द्वारा प्रश्न करने की विधि यह है कि प्रश्न करने वाला एकाग्रचित मन से अपने इष्ट का स्मरण कर उच्चारण कर सकता है। फिर ऊँ कोष्ठक को छोड़कर अपनी अंगुली चित्रानुसार किसी भी कोष्ठक में रख सकता है। यही कोष्ठक वाली अंगुली के अंकों में अपना भाग्यांक जोड़कर प्राप्त संख्या उस जुड़े प्रश्न का उत्तर होगी।
 15. स्वप्न ज्योतिष पद्धति द्वारा भविष्य कथन: हमारे प्राचीन ग्रंथों में इस पद्धति का काफी महत्व है क्योंकि स्वप्न, परमात्मा द्व ारा भविष्य में होने वाली घटनाओं के पूर्व संकेत हैं। स्वप्न का संबंध भी हमारी जन्मपत्री में मौजूद शुभ या अशुभ ग्रहों से होता है। मनुष्य का वर्तमान में जैसा समय चल रहा है, स्वप्न भी ठीक वैसे ही आते हैं। खराब समय अर्थात् नीच, शत्रु राशि के ग्रहों की दशादि में स्वप्न भी डरावने, बुरे, स्वास्थ्य खराब करने वाले तथा अति अशुभ आते हैं तथा अच्छे समय में यानि उच्च, स्वगृही या मित्र ग्रहों की दशा में स्वप्न शुभ और अच्छे आते हैं । 
16. क्रिस्टल बाल द्वारा भविष्य कथन: हिंदी भाषा में इसे ‘‘स्फटिक कहते हैं। यह विधि प्राचीन काल की देन है। क्रिस्टल एक प्राकृतिक ठोस धातु है जिसके चारो ओर एक गोल समतल सतह होती है। इसमें लौह तत्व पाये जाते हैं जिसमें चुंबकीय शक्ति होती है। क्रिस्टल बाल पर एकाग्रचित होकर ध्यान ‘‘केन्द्रित’’ करने से मस्तिष्क में सभी प्रकार की घटनाओं के चित्र स्पष्ट होने लगते हैं। इस आधार पर भूत, वर्तमान व भविष्य के फल-कथन किये जा सकते हैं। 
17. शुभाशुभ पद्धति द्वारा भविष्य कथन: लोक जीवन में शुभ एवं अशुभ अनेक मान्यताये जैसे- शकुन, अपशकुन, अंग-स्फुरण, स्वप्न, शंका, अंधविश्वास व वहम आदि होते हैं। इसके अलावा शरीर के विभिन्न स्थानों पर स्थित तिल, मस्से या अन्य संकेत चिन्ह होते हैं। शरीर के विभिन्न अंगों पर छिपकली आदि के गिरने के अलावा यात्रा, परीक्षा या अन्य महत्वपूर्ण कार्य करते समय भी शुभ-अशुभ शकुन आदि का विचार किया जाता है। ये सारी स्थितियां भविष्य में होने वाली सही घटनाओं की सूचना देती है। 
18. स्वर-ज्योतिष द्वारा भविष्य कथन: यह भविष्य कथन की अति महत्वपूर्ण प्राकृतिक विद्या है जो प्रश्न के समय प्रश्नकर्ता तथा प्रश्न के उत्तरदाता व्यक्ति के दावें, बायें तथा मिश्रित स्वर पर आधारित है। इसमें किसी भी बाह्य स्रोत एवं मदद की आवश्यकता नहीं होती। इसमें बस स्वरों के आधार पर मासिक भविष्य-कथन किया जाता हैं। इसमें जन्मकुंडली या जन्म के डाटा जैसे-तारीख, समय, स्थान न भी हो तो भी भविष्य कथन कर सकते हैं। इस पद्धति द्वारा भविष्य कथन से प्रायः सभी प्रश्नों के उत्तर नासिका में जो भी स्वर चल रहा है, उसके आधार पर किया जाता है। साहसिक कार्य सदैव दाये स्वर में तथा विनम्रता के कार्य सदैव बायें स्वर में करने पर लाभ प्राप्त होता है। इस भविष्य कथन में कई प्रश्न जैसे पुत्र संतान, चोरी वस्तु मिलेगी या नही, विवाह होगा या नहीं, परीक्षा परिणाम कैसा होगा, आदि मनुष्य-जीवन के सारे प्रश्नों के बारे में भविष्यकथन सटीकता से किया जा सकता है।
 19. जैमिनी पद्धति द्वारा भविष्य कथन: जैमिनी पद्धति के जनक महर्षि जैमिनी थे, जिनके नाम पर यह पद्धति पड़ी। महर्षि जैमिनी, महर्षि पराशर के समय के ही ऋषि हैं क्योंकि पराशर ने अपने ग्रंथ में जैमिनी विद्या का भी विवचेन किया है। दोनों पद्धतियों में अंतर है। दक्षिणी भारत में इस पद्धति द्वारा भविष्य कथन किया जाता है। इनके नियमों का उपयोग फलित ज्योतिष में भी किया जा सकता है। 
20 भृगु संहिता द्वारा भविष्य कथन: इस संहिता की उत्पत्ति श्रीविष्णु के कारण हुई। यह एक ‘‘ आर्ष ग्रंथ’’ है तथा इसमें संसार के सभी व्यक्तियों की जन्मपत्री मौजूद है। अतः इसके आधार पर भविष्य कथन करना बहुत ही आसान है। 
21. मेदिनीय विद्या द्वारा भविष्य कथन: वर्तमान में इसका उपयोग सरकार की आयु की गणना आदि कार्यों में किया जाता है। यह नक्षत्र आधारित ज्योतिष विद्या है जिससे भविष्य-कथन किया जाता हैं। इसमें सभी 27 नक्षत्रों को तीन चक्रों से निम्न प्रकार से विभाजित किया गया है। 1. अश्वपति चक्र 2. नरपतिचक्र, 3. गजपति चक्र। इस विद्या द्वारा प्राचीन काल में वर्तमान समय की भांति राजाओं के राज्य, शासन की आयु आदि की गणना आदि की जाती थी। 22. मृत आत्मा के आह्वान द्वारा भविष्य कथन: यह विद्या प्राचीन काल में राजा-महाराजाओं को युद्ध में विजयी करने के लिये गयी थी, जो आजकल जनकल्याण के उद्देश्य से प्रत्येक मनुष्य के दैनिक जीवन के कार्यों हेतु भी उपयोग में लायी जाती है। इससे प्रश्न ज्योतिष तथा मुहूर्त ज्योतिष का कार्य भी किया जा सकता है। 
23. हस्त लिपि, भाषा एवं लेखन शैली द्वारा भविष्य कथन: इसका विवेचन करने के लिये तृतीय, एकादश भाव तथा इनके स्वामियों पर विचार किया जाता है। इसके साथ ही पंचम भाव भी महत्वपूर्ण है तथा पंचमेश पर भी विचार करना आवश्यक है क्योंकि तृतीय भाव, दायां हाथ तथा एकादश भाव, बायां हाथ का प्रतिनिधित्व करता है जिससे हस्तलिपि एवं लेखन शैली का पता चलता है। पंचम भाव विद्या का भाव होने से भाषा का विचार किया जाता है। इनके स्वामियों के बलवान होने पर हस्तलिपि, लेखन एवं भाषा शैली सुंदर व आकर्षक होती है तथा भविष्य कथन अच्छा शुभ होता है। इसके विपरीत, निर्बल होने पर परिणाम, नकारात्मक आते हैं। अतः विभिन्न लग्नों, राशियों के ग्रहों के कारण उपरोक्त में अलग-अलग अच्छे बुरे परिणाम आते हैंे जिसके आधार पर भविष्य कथन किया जाता है। इसके अलावा जातक जिस स्याही का प्रयोग करता है, भविष्य कथन में उसका भी प्रभाव रहता है। इसके अंतर्गत व्यक्ति के हस्ताक्षर भी आ जाते हैं जिसके आधार पर भी भविष्य कथन किये जा सकते हैं। 
 
25. कुंडली के ‘सर्वाष्टक वर्ग’ द्वारा भविष्य कथन: यह पद्धति भी जन्मपत्री पर आधारित है। इसमें राहु, केतु दो छायाग्रहों को छोड़कर बाकी सभी 7 ग्रहों का अष्टक वर्ग बनाकर, इन्हीं सभी का योगकर इसका परिणाम ‘सर्वाष्टक वर्ग’ कहलाता है जो 12 भावों से संबंधित हैं जिसके आधार पर व्यक्ति का भविष्य-कथन किया जाता है। इसमें 12 भावों का ठीक वैसा ही फलादेश होता है, जैसा जन्मपत्री मं फलित ज्योतिष का है। इसमें प्रत्येक भाव में कुछ 50 या अधिकतम शुभ/अशुभ बिंदु होते हैं जिसमें से कुछ शुभ बिंदु (या रेखायें) तथा कुछ अशुभ बिंदु (या रेखायें) होती हैं। सर्वाष्टक वर्ग में जो भी बिंदु प्राप्त होते हैं वे शुभ बिंदु कहलाते हैं। 25 बिंदु होने पर फलादेश 50 प्रतिशत उत्तम अच्छा कहा जाता है। 50 प्रतिशत अर्थात 25 बिंदु से जितने कम बिंदु सर्वाष्टक वर्ग के संबंधित भाव में होते हैं, वह भाव उतना ही बुरा परिणाम देता है तथा उनका भविष्य कथन जातक के लिये अशुभ रहता है।
 
26.–बालों से करें भविष्यकथन——विज्ञान ने आज इतनी उन्नति कर ली है कि वह शरीर के बाल से ही डी. एन. ए. प्राप्त करके व्यक्ति की शारीरिक संरचना का पता लगा सकता है। शरीर के विभिन्न अंगों से भविष्य का पता लगाने की कला के पीछे भी वैज्ञानिक कारण रहे होंगे। बाल से प्राप्त डी. एन. ए. परीक्षण से जब शारीरिक संरचना को पता किया जा सकता है तो बाल के बाहरी आवरण से व्यक्ति के स्वभाव और क्षमता को भी समझा जा सकता है। बालों की बनावट के आधार पर किसी व्यक्ति से संबंधित कुछ मौलिक महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त की जा सकती हैं। यह शरीर की बनावट के आधार पर भविष्य कथन का ही आधुनिक रूप है। लंदन के वैज्ञानिकों ने अपने शोध से हाल ही में यह सिद्ध किया है कि बालों की सूक्ष्मता व्यक्ति की बुद्धि से सीधा संबंध रखती है। अपने शोध के प्रथम चरण में शोधकर्मियों ने कुछ सौ महिलाओं के बालों के नमूनों से उनके स्वभाव, चरित्र, और क्षमताओं का पता लगाया। उन्होंने निष्कर्ष निकाले कि जिन महिलाओं के बाल अपेक्षाकृत सूक्ष्म अर्थात पतले होते हैं, वे अधिक महत्वपूर्ण या अधिक वेतन के पदों पर कार्यरत होती हैं। जो स्त्रियां गृहिणियां होती हंै वे सामाजिक और दूसरे सृजनात्मक कार्यों में सक्रिय होती हैं। इसके विपरीत मोटे बालों वाली स्त्रियां अवसरवादी और अस्थिर चित्त की होती हैं। भारतीय मनीषियों ने हजारों वर्ष पहले ही उक्त तथ्य का पता लगा लिया था। सामुद्रिक शास्त्र में लिखा है कि सूक्ष्म (पतले) बालों की स्त्री रानी सदृश्य होती है। उसी प्रकार वराहमिहिर ने वृहत्संहिता में लिखा है कि मोटे और घने बालों वाले लोग निर्धन होते हैं। ग्रहों की दो श्रेणियां हैं। एक श्रेणी में वे ग्रह हैं, जो मस्तिष्क को निरंतर ऊर्जावान रखते हैं। सूर्य, चंद्र, गुरु, शुक्र और राहु इसी श्रेणी के ग्रह हैं, जो मस्तिष्क की उर्वरता को बढ़ाते हैं। इसके विपरीत मंगल, बुध, शनि और केतु हमेशा यथास्थिति बनाए रखने में विश्वास रखते हैं। स्थूल और रूखे बाल हों तो जातक मंगल, बुध, शनि और केतु जैसे विघटनकारी और विलंबकारी ग्रहों से प्रभावित होता है। सूक्ष्म, स्निग्ध और कोमल बाल सूर्य, चंद्र, गुरु, शुक्र और राहु का प्रतिनिधित्व करता है। सूर्य यश, चंद्र मानसिक शक्ति, बृहस्पति विवेकशीलता एवं बुद्धि, शुक्र सौंदर्य और राहु अच्छे अवसरों का प्रतीक है। बृहस्पति श्रेष्ठ ग्रह है क्योंकि यह विवेकशीलता और मस्तिष्क की क्षमताओं का प्रतिनिधित्व करता है। मस्तिष्क की क्षमताओं का सही दिशा में उपयोग करने की कला भी बृहस्पति ही सिखाता है। नेतृत्व क्षमता भी बृहस्पति के कारण ही आ पाती है। इन सब गुणों या विशेषताओं के बावजूद बृहस्पति का एक नकारात्मक पक्ष है कि वह सिर पर बालों की कमी करता है। एक दृष्टि से यह हमारे लिए सकारात्मक स्थिति भी है कि हम बृहस्पतिप्रधान व्यक्ति की पहचान तुरत कर सकते हैं। जिस परिवार में गंजापन वंशानुगत नहीं हो किंतु उसका कोई सदस्य बिना किसी स्वास्थ्य समस्या के गंजा हो तो यह गुरु के प्रभाव का ही द्योतक है। ऐसा जातक नेतृत्व क्षमता से संपन्न और विवेकशील होता है। जन्मांग में यदि लग्नगत गुरु हो, तो सिर में गंजेपन की शिकायत हो सकती है। अंक ज्योतिष के अनुसार बृहस्पति का अंक 3 है। प्रायः देखा जाता है कि अंग्रेजी के तीसरे, छठे, नौवें और 12वें मास की 3, 12, 21 और 30 तारीख को जन्म लेने वाले शिशुओं के बाल आरंभ में बहुत कम होते हैं। इनके सिर के बालों की वृद्धि अपेक्षाकृत विलंब से होती है। इसका कारण गुरु के अंक तीन का जातक पर अत्यधिक प्रभाव होना है। विवेकशीलता के गुणों के कारण बृहस्पति प्रधान जातकों का कोई भी कार्य लापरवाहीपूर्ण नहीं होता है। इन विशेषताओं के कारण जातक की कार्य के प्रति सोचने-समझने की क्षमता में वृद्धि होती है। मस्तिष्क की शक्ति पुष्ट होती है, लेकिन सिर के बाल गिरने लगते हैं। हमेशा ऐसा नहीं होता है कि ऐसे सभी लोगों के सिर के बाल एक ही स्थान से झड़ें। भिन्न मामलों में सिर के बालों के झड़ने के स्थान अलग-अलग होते हंै। मस्तिष्क के अगले भाग में दोनों तरफ गंजापन होना उत्तम माना गया है। ऐसे लोग विचारशील और व्यावहारिक होते हैं। वे प्रायः प्रौढ़ावस्था के आते-आते अपने लक्ष्य के करीब तक पहुंच चुके होते हैं। इनमें बौद्धिक क्षमता पर्याप्त होती है, जो इन्हें लगातार सक्रिय रखती है। ये सृजनात्मक कार्यों में ज्यादा रुचि लेते देखे गए हैं। मस्तक के ठीक पीछे शिखा के पास बाल न होना संघर्ष करवाता है। प्रायः ऐसे लोगों को उनका भाग्य साथ नहीं देता है। वे लगातार संघर्ष करते हैं और अपने कल्पनालोक में विचरण करते रहते हैं। उनमें कार्य की शुरूआत करने की क्षमता का अभाव पाया जाता है। यद्यपि वे श्रेष्ठ नेतृत्वकर्ता सिद्ध हो सकते हैं, लेकिन ऐसा तभी संभव है जब उन्हें व्यवसाय के आरंभ में आर्थिक के साथ-साथ मानसिक सहयोग भी प्राप्त हो। बहुत से लोगों के सिर पर बाल होते ही नहीं। ऐसा किसी रोग विशेष के कारण भी हो सकता है। यदि इस गंजेपन का संबंध व्यक्ति के क्रियाकलापों से हो तो वह हमेशा नकारात्मक फलों को देने वाला होना चाहिए। ऐसे जातक की सफलता संदिग्ध होती है। वह चाहे बड़ी से बड़ी सफलता प्राप्त कर भी ले, लेकिन कार्य दूसरों के अधीन रह कर ही करता है। उसमें आत्मविश्वास का अभाव होता है। मस्तक के सामने के भाग का गंजा होना सामान्य फल देता है। भौतिक दृष्टि से यह अच्छा संकेत नहीं है। लेकिन ऐसे लोगों को प्राप्तियां बेहतर होती हैं। वे स्वयं अपनी उपलब्धियों को भोग नहीं पाते हैं, लेकिन आने वाली पीढ़ियां उनकी ऋणी रहती हैं। सामान्य मेहनत से ही उन्हें अच्छी सफलता प्राप्त हो जाती है। लेकिन वे भविष्य के प्रति इतने चिंतित रहते हैं कि उस सफलता का उपयोग अपने लिए नहीं कर पाते हैं। जिन लोगों के बाल घुंघराले होते हैं। वे अत्यधिक सक्रिय और अपने काम के महारथी होते हैं। प्रायः देखने में आता है कि घुंघराले बालों के जातक समाज में अपनी उपस्थिति को दिखाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। बालों का लंबे समय तक काला बना रहना व्यक्ति के कार्यों या उपलब्धि से संतुष्ट रहने का सूचक है। ऐसे लोग साधारण बुद्धि के स्वामी होते हैं। बालों का सुनहरा होना पारिवारिक पृष्ठभूमि पर निर्भर करता है। यदि किसी जातक के परिवार के सदस्यों के विपरीत सुनहरे बाल हों तो वह अपने परिवार से सामंजस्य बैठा पाने में विफल रहता है। उसका स्वभाव परिवार के अन्य सदस्यों के स्वभाव से नहीं मिलता। जिसके कानों के ऊपर बाल होते हैं। किंतु सिर का मध्य गंजा होता है, वह अवसरवादी और वाचाल होता है। वह अपनी स्थिति को हमेशा बढ़ा चढ़ा कर दिखाता है। उसे सफलता कुछ विलंब से मिलती है, लेकिन स्थायी होती है। यदि बाल समय से पूर्व ही सफेद हो रहे हों, तो यह अत्यधिक परिश्रम का सूचक है। आवश्यकता से अधिक चिंतित रहने वाले लोगों के बाल भी समय से पूर्व ही सफेद हो जाते हैं। सफेद बालों के साथ यदि आंखों के चारों तरफ कालापन भी दिखाई दे, तो यह पारिवारिक कलह का लक्षण है। ऐसे जातकों की स्मरण शक्ति प्रायः नष्ट हो जाती है। जो पुरुष लंबे बाल रखता है वह बहिर्मुखी स्वभाव का होता है। यह भी संभव है कि ये लोग एक से अधिक कार्य जानते हांे। बालों का घना होना बौद्धिक क्षमता पर अंकुश लगाता है। ऐसे जातक अल्प बुद्धि के होते हैं। हमेशा छोटे से स्वार्थ के लिए अपना बड़ा नुकसान कर लेते हैं। निर्णय क्षमता का उनमें प्रायः अभाव होता है। जिनके सिर पर बालों की कमी है उनकी सोच हमेशा सकारात्मक और महत्वाकांक्षी होती है। संभव है कि उन्हें जीवन में प्राप्तियां कम हों लेकिन उनके फैसले हमेशा बुद्धिमत्तापूर्ण होते हैं।
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