आइये जाने थैलेसीमिया रोग के कारण ( चिकित्सा एवं ज्योतिष की नजर से)—

आइये जाने थैलेसीमिया रोग के कारण ( चिकित्सा एवं ज्योतिष की नजर से)—

थैलेसीमिया एक आनुवशिक रक्त विकार है। इस रोग में रोगी के शरीर में हीमोग्लोबिन सामान्य स्तर से कम हो जाता है। गौरतलब है कि शरीर में ऑक्सीजन का सुचारु रूप से सचार करने के लिए हीमोग्लोबिन की जरूरत होती है।

लाल रक्त कोशिकाओं की विकृति रक्त की लाल कोशिकाओं में विकृति आने के कारण थैलेसीमिया होता है। यह रोग प्रायः आनुवांशिक होता है और अधिकतर बच्चों को ग्रसित करता है, उचित समय पर उपचार न होने पर बच्चे की मृत्यु तक हो सकती है। रक्त के लाल कणों की आयु लगभग 120 दिनों की होती है। लेकिन जब थैलेसीमिया होता है, तब इन कणों की आयु कम हो कर सिर्फ 20 दिन और इस से भी कम हो जाती है। इससे शरीर में स्थित हीमोग्लोबिन पर सीधा असर पड़ता है। यदि हीमोग्लोबिन की मात्रा शरीर में कम होती है, तो शरीर कमजोर हो जाता है, जिससे शरीर को कई रोग ग्रस्त कर लेते हैं।

एक स्वस्थ जातक के शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की संखया 45 से 50 लाख प्रति घन मिलीमीटर होती है। लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण लाल अस्थि मज्जा में होता है। हीमोग्लोबिन की उपस्थिति के कारण ही इन रक्त कोशिकाओं का रंग लाल दिखाई देता है। लाल रक्त कोशिकाएं शरीर में, ऑक्सीजन और कार्बनडाईऑक्साइड को परिवर्तित करती हैं। हीमोग्लोबिन में ऑक्सीजन से शीघ्रता से संयोजन कर अस्थायी यौगिक ऑक्सी हीमोग्लोबिन बनाने की क्षमता होती है। यह लगातार ऑक्सीजन को श्वसन संस्थान तक पहुंचा कर जातक को जीवन दान देता रहता है। गर्भ में बच्चा ठहर जाने पर अगर बच्चे के अंदर उचित मात्रा में हीमोग्लोबिन का अंश नहीं पहुंचता, तो बच्चा थैलेसीमिया का शिकार हो जाता है। बच्चे के जन्म से लगभग 6 माह में ही थैलेसीमिया के लक्षण नजर आ जाते हैं। बच्चे की त्वचा, नाखून, आंखें और जीभ पीली पड़ने लगती हैं। मुंह में जबड़े में भी दोष आ जाता है, जिससे दांत उगने में परेशानियां आने लगती हैं तथा दांतों में विषमता आने लगती है। यकृत और प्लीहा की लंबाई बढ़ने लगती है। बच्चे का विकास रुक जाता है। उपर्युक्त लक्षण पीलिया के भी होते हैं। यदि डॉक्टर इन्हें पीलिया समझ कर उपचार करते रहें, तो रोग बिगड़ने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इसलिए रोग के लक्षणों की ठीक जांच कर के सही उपचार से लाभ प्राप्त हो सकता है। 

थैलेसीमिया दो प्रकार का होता है- ‘माइनर’ और ‘मेजर’। माइनर थैलेसीमिया का रोगी सामान्य जीवन जीता है, जओतिश की नजर से)बकि मेजर थैलेसीमिया का रोगी असामान्य जीवन जीता है। मेजर थैलेसीमिया के रोगी को लगभग हर तीन सप्ताह में एक बोतल खून देना अनिवार्य हो जाता है। यदि समय पर रोगी को खून न मिले, तो जीवन का अंत हो जाता है। समय पर खून मिलता रहे, तो रोगी लंबा जीवन जी सकता है। जैसा कि ऊपर बताया गया है यह रोग आनुवंशिक होता है। यदि माता-पिता दोनों माइनर थैलेसीमिया के शिकार हैं, तब बच्चे को इस रोग की संभावना अधिक होती है। यदि माता-पिता दोनों में से कोई एक माइनर थैलेसीमिया का रोगी है, तो बच्चे को मेजर थैलेसीमिया की कोई संभावना नहीं होती। माइनर थैलेसीमिया के शिकार व्यक्ति को कभी भी इस बात का आभास नहीं होता कि उसके खून में दोष है। शादी से पहले पति-पत्नी के खून की जांच हो जाए, तो होने वाले बच्चे शायद इस आनुवंशिक रोग से बच जाएं। लाल रक्त कोशिकाओं की विकृति के उपचार में अभी वैज्ञानिकों को सफलता प्राप्त नहीं हुई है। लेकिन अनुसंधान लगातार जारी है। 
थैलेसीमिया से बचने के उपाय : शादी से पूर्व वर-वधू दोनों के रक्त की जांच अवश्य करवा लेनी चाहिए, ताकि होने वाली संतान को ऐसा रोग न हो। करीबी रिश्ते में शादी करने से परहेज करें। गर्भधारण के चार माह के अंदर बच्चे के भ्रूण का परीक्षण कराना चाहिए। भ्रूण में थैलेसीमिया के लक्षण पाते ही गर्भपात करवा लेना चाहिए। माइनर थैलेसीमिया से बचने के लिए नीम और पीपल के पत्तों का रस नियमित रूप से एक-एक चम्मच प्रातः काल पीएं। लाभ होगा। फल तथा हरी पत्ती वाली सब्जियों का नियमित इस्तेमाल करते रहना चाहिए। रक्त परीक्षण करवा कर इस रोग की उपस्थिति की पहचान कर लेनी चाहिए। 

इस रोग का फिलहाल कोई ईलाज नहीं है। हीमोग्लोबीन दो तरह के प्रोटीन से बनता है अल्फा ग्लोबिन और बीटा ग्लोबिन। थैलीसीमिया इन प्रोटीन में ग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में खराबी होने से होता है। जिसके कारण लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से नष्ट होती है। रक्त की भारी कमी होने के कारण रोगी के शरीर में बार-बार रक्त चढ़ाना पड़ता है। रक्त की कमी से हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता है एवं बार-बार रक्त चढ़ाने के कारण रोगी के शरीर में अतिरिक्त लौह तत्व जमा होने लगता है, जो हृदय, यकृत और फेफड़ों में पहुँचकर प्राणघातक होता है। मुख्यतः यह रोग दो वर्गों में बांटा गया है:

  • मेजर थैलेसेमिया:—

यह बीमारी उन बच्चों में होने की संभावना अधिक होती है, जिनके माता-पिता दोनों के जींस में थैलीसीमिया होता है। जिसे थैलीसीमिया मेजर कहा जाता है।

  • माइनर थैलेसेमिया:—-

थैलीसीमिया माइनर उन बच्चों को होता है, जिन्हें प्रभावित जीन माता-पिता दोनों में से किसी एक से प्राप्त होता है।[जहां तक बीमारी की जांच की बात है तो सूक्ष्मदर्शी यंत्र पर रक्त जांच के समय लाल रक्त कणों की संख्या में कमी और उनके आकार में बदलाव की जांच से इस बीमारी को पकड़ा जा सकता है।

लक्षण—सूखता चेहरा, लगातार बीमार रहना, वजन ना ब़ढ़ना और इसी तरह के कई लक्षण बच्चों में थेलेसीमिया रोग होने पर दिखाई देते हैं।


पूर्ण रक्तकण गणना (कंपलीट ब्लड काउंट) यानि सीबीसी से रक्ताल्पता या एनीमिया का पता लगाया जाता है। एक अन्य परीक्षण जिसे हीमोग्लोबिन इलैक्ट्रोफोरेसिस कहा जाता है से असामान्य हीमोग्लोबिन का पता लगता है। इसके अलावा म्यूटेशन एनालिसिस टेस्ट (एमएटी) के द्वारा एल्फा थैलीसिमिया की जांच के बारे में जाना जा सकता है। मेरूरज्जा ट्रांसप्लांट से भी इस बीमारी के उपचार में मदद मिलती है।

सावधानी एवं बचाव-–थेलेसीमिया पी‍डि़त के इलाज में काफी बाहरी रक्त चढ़ाने और दवाइयों की आवश्यकता होती है। इस कारण सभी इसका इलाज नहीं करवा पाते, जिससे १२ से १५ वर्ष की आयु में बच्चों की मृत्य हो जाती है। सही इलाज करने पर २५ वर्ष व इससे अधिक जीने की आशा होती है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, रक्त की जरूरत भी बढ़ती जाती है।

  • विवाह से पहले महिला-पुरुष की रक्त की जाँच कराएँ। 
  • गर्भावस्था के दौरान इसकी जाँच कराएँ 
  • रोगी की हीमोग्लोबिन ११ या १२ बनाए रखने की कोशिश करें
  • समय पर दवाइयाँ लें और इलाज पूरा लें।

विवाह पूर्व जांच को प्रेरित करने हेतु एक स्वास्थ्य कुण्डली का निर्माण किया गया है, जिसे विवाह पूर्व वर-वधु को अपनी जन्म कुण्डली के साथ साथ मिलवाना चाहिये। स्वास्थ्य कुंडली में कुछ जांच की जाती है, जिससे शादी के बंधन में बंधने वाले जोड़े यह जान सकें कि उनका स्वास्थ्य एक दूसरे के अनुकूल है या नहीं। स्वास्थ्य कुंडली के तहत सबसे पहली जांच थैलीसीमिया की होगी। एचआईवी, हेपाटाइटिस बी और सी। इसके अलावा उनके रक्त की तुलना भी की जाएगी और रक्त में RH फैक्टर की भी जांच की जाएगी।

इस प्रकार के रोगियों के लिए कितनी ही संस्थायें रक्त प्रबंध कराती हैं। इसके अलावा बहुत से रक्तदान आतुर सज्जन तत्पर रहते हैं

कम हीमोग्लोबिन के अन्य आम कारणों में,रक्त का ह्रास,पोषण की कमी,रक्त मज्जा समस्याएं,कीमोथेरेपी,गुर्दों का काम न करना,या असामान्य हीमोग्लोबिन(जैसे सिकल सेल रोग में)आदि शामिल हैं.

ऊंचे स्थानों पर जाने,धूम्रपान,निर्जलीकरण,या ट्यूमरों के कारण उच्च हीमोग्लोबिन स्तर हो सकते हैं.

प्रत्येक हीमोग्लोबिन अणु की आक्सीजन के वहन की क्षमता सामान्यतः परिवर्तित रक्त पीएच या कार्बन डाई आक्साइड द्वारा संशोधित होती है,जिससे एक परिर्वर्तित आक्सीजन-हीमोग्लोबिन विघटन वक्र बनता है. यह भी रोगों द्वारा बदला जा सकता है,उदा.कार्बन मोनोक्साइड विषाक्तता.

लाल रक्त कोशिकाओं की कमी के साथ या उसके बिना हीमोग्लोबिन की मात्रा में कमी से रक्ताल्पता ते लक्षण उत्पन्न होते हैं. रक्ताल्पता के कई कारण होते हैं,हालांकि पाश्चात्य विश्व में लौह की कमी और उससे उत्पन्न लौह की कमी वाली रक्ताल्पता इसके मुख्य कारण हैं. चूंकि लौह की अनुपस्थिति के कारण हीम संश्लेषण में कमी आती है,इसलिये लौह की कमी वाली रक्ताल्पता में लाल रक्त कोशिकाएं हल्के लाल रंग(हाइपोक्रोमिक-लाल हीमोग्लोबिन वर्णक का अभाव) की और आकार में छोटी(माइक्रोसाइटिक) दिखती हैं. अन्य रक्ताल्पताएं विरल होती हैं. हीमोलाइसिस (लाल रक्त कोशिकाओं का अधिक तेजी से नष्ट होना) में हीमोग्लोबिन चयापचयक बिलिरूबिन के कारण पीलिया हो जाता है,और रक्त में प्रवाहित हो रहे हीमोग्लोबिन के कारण गुर्दे नाकाम हो सकते हैं.

ग्लोबिन श्रृंखला के कुछ विकारों का संबंध हीमोग्लोबिनोपैथियों से होता है,जैसे सिकल सैल रोग और थैलेसीमिया. अन्य विकार,जैसा कि इस लेख के प्रारंभ में कहा गया है, मृदु होते हैं और केवल हीमोग्लोबिन प्रकारों के रूप में वर्णित किये जाते हैं.

पॉरफाइरिया नामक आनुवंशिक रोगों के एक समूह में हीम संश्लेषण के चयापचयी मार्गों की त्रुटियां पाई जाती हैं. युनाइटेड किंगडम का किंग जार्ज III संभवतः इस रोग का सबसे प्रसिद्ध रोगी था.

कुछ कम हद तक,हीमोग्लोबिन ए प्रत्येक बीटा श्रृंखला के वैलाइन टर्मिनल(एक अल्फा अमाइनो एसिड) पर ग्लुकोज से धीरे-धीरे संयुक्त होता है.इससे प्राप्त अणु को अकसर एचबीए1सी कहते हैं. जैसे-जैसे रक्त में ग्लुकोज की मात्रा बढ़ती है,एचबीए1सी में बदल रहे एचबीए का प्रतिशत भी बढ़ता है. जिन मधुमेह के रोगियों में ग्लुकोज अधिक होता है,उनका एचबीए1सी भी अधिक होता है. ग्लुकोज से एचबीए के संयुक्त होने की दर के धीमे होने के कारण एचबीए1सी का प्रतिशत लंबे समय में(लाल रक्त कोशिकाओं का अर्धजीवन,जो 50-55 दिन होता है) रक्त में ग्लुकोज के स्तर के औसत का प्रतिनिधित्व करता है.

उपाय—योग निद्रा नामक योगाभ्यास रोज आधे घंटे तक करने के एक अध्ययन में हीमोग्लोबिन के स्तरों में वृद्धि देखी गई.

Thalassemias हीमोग्लोबिन अणु की श्रृंखला है जो प्रभावित है अनुसार वर्गीकृत कर रहे हैं . Α thalassemias में, α ग्लोबिन श्रृंखला के उत्पादन पर असर पड़ा है, जबकि β ग्लोबिन श्रृंखला के β थैलेसीमिया उत्पादन में प्रभावित है.

थैलेसीमिया सिकल सेल रोग है जो β ग्लोबिन की एक विशिष्ट उत्परिवर्ती फार्म का उत्पादन विपरीत α या β ग्लोबिन””की कमी पैदा करता है.

β ग्लोबिन श्रृंखला 11 गुणसूत्र पर एक जीन द्वारा इनकोडिंग हैं, α ग्लोबिन श्रृंखला 16 गुणसूत्र पर दो बारीकी से जुड़े जीन की इनकोड किया गया है. प्रत्येक गुणसूत्र की दो प्रतियां के साथ एक सामान्य व्यक्ति में इस प्रकार, वहाँ दो β श्रृंखला एन्कोडिंग loci, और चार loci α श्रृंखला एन्कोडिंग हैं. Α loci के विलोपन अफ्रीकी या एशियाई मूल के लोगों में एक उच्च व्याप्ति है, उन्हें और अधिक α thalassemias विकसित होने की संभावना बना रही है. β thalassemias अफ्रीका में आम हैं, लेकिन यह भी यूनानी और इटालियंस में.

अल्फा (α) थलस्सेमिअस—-

α thalassemias HBA1 और HBA2 जीन, एक Mendelian पीछे हटने का फैशन में विरासत शामिल हैं. यह भी 16p गुणसूत्र का विलोपन करने के लिए जुड़ा हुआ है. α thalassemias परिणाम कम उत्पादन अल्फा ग्लोबिन में, इसलिए कम अल्फा ग्लोबिन चेन का उत्पादन किया, और नवजात शिशुओं में वयस्कों के अतिरिक्त γ जंजीरों में β श्रृंखला के एक अतिरिक्त में जिसके परिणामस्वरूप. अतिरिक्त β चेन फार्म अस्थिर tetramers (हीमोग्लोबिन एच या 4 बीटा श्रृंखला के HBH बुलाया) जो असामान्य ऑक्सीजन हदबंदी घटता है.

बीटा thalassemias (β)—-

बीटा thalassemias 11 गुणसूत्र पर HBB जीन में परिवर्तन, यह भी एक फैशन autosomal पीछे – पीछे हटने में विरासत की वजह से कर रहे हैं. रोग की गंभीरता के उत्परिवर्तन की प्रकृति पर निर्भर करता है. उत्परिवर्तनों (β ओ) के रूप में विशेषता रहे हैं अगर वे (जो बीटा थैलेसीमिया का सबसे गंभीर रूप है) β श्रृंखला के किसी भी गठन को रोकने, और वे के रूप में विशेषता है (β +) अगर वे कुछ β श्रृंखला गठन होने के लिए अनुमति देते हैं. या तो मामले में α श्रृंखला के एक रिश्तेदार अतिरिक्त है, लेकिन इन tetramers फार्म नहीं है, बल्कि वे लाल रक्त कोशिका झिल्ली के लिए बाध्य झिल्ली क्षति उत्पादन, और उच्च सांद्रता में वे जहरीले समुच्चय के रूप में.

डेल्टा थैलेसीमिया (δ)—-

के रूप में अच्छी तरह के रूप में अल्फा और बीटा वयस्क हीमोग्लोबिन की 3% के बारे में हीमोग्लोबिन में उपस्थित होने चेन अल्फा और डेल्टा जंजीरों से बना है. बीटा थैलेसीमिया के साथ बस के रूप में, परिवर्तन होते है जो इस जीन की क्षमता डेल्टा जंजीरों उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं.

अन्य hemoglobinopathies के साथ संयोजन में—

थैलेसीमिया अन्य hemoglobinopathies के साथ सह अस्तित्व कर सकते हैं. इनमें से सबसे आम हैं:

  • हीमोग्लोबिन ई / थैलेसीमिया: कंबोडिया, थाईलैंड में आम है, और भारत के कुछ हिस्सों, चिकित्सकीय β थैलेसीमिया प्रमुख या थैलेसीमिया intermedia के समान.
  • एस / थैलेसीमिया हीमोग्लोबिन, अफ्रीकी और भूमध्य आबादी में आम, प्लीहाबृद्धि के अतिरिक्त सुविधा के साथ चिकित्सकीय सिकल सेल एनीमिया के समान है,
  • हीमोग्लोबिन / सी थैलेसीमिया: भूमध्य और अफ्रीकी आबादी, हीमोग्लोबिन  / सी β थैलेसीमिया प्लीहाबृद्धि के साथ एक मामूली गंभीर रक्तलायी एनीमिया का कारण बनता है आम, हीमोग्लोबिन थैलेसीमिया / सी β + एक मामूली बीमारी का उत्पादन
हीमोग्लोबिन के बढ़े हुए स्तर का संबंध लाल रक्त कोशिकाओं की अधिक संख्या या आकार से होता है,जिसे पॉलिसाइथीमिया कहते हैं. यह वृद्धि जन्मजात हृदय रोग,कॉर पल्मोनेल,फुफ्फुसीय फाइब्रोसिस,बहुत अधिक एरिथ्रोपाइटिन,या पॉलिसाइथीमिया वेरा के कारण होती है.

कुछ जरूरी जानकारिया/सावधानिया—–

जो माता-पिता थैलेसीमिया माइनर से पीड़ित हैं, उनके बच्चे को लगभग 25 प्रतिशत तक थैलेसीमिया रोग होने की आशका रहती है। इसलिए विवाह से पहले अगर रक्त की आसान जाचें जैसे ‘सीबीसी’ और हीमोग्लोबिन ए 2 करा ली जाएं, तो यह पता चल जाता है कि भावी वैवाहिक युगल में से कोई भी थैलेसीमिया जीन का वाहक है या नहीं। इसके अलावा अगर शादी के बाद किसी महिला को थैलेसीमिया माइनर का पता चले, तो इस स्थिति में अमुक महिला के पति की भी जाच होनी चाहिए कि वह थैलेसीमिया माइनर से ग्रस्त है, या नहीं।यदि दोनों ही थैलेसीमिया माइनर से ग्रस्त पाये जाते हैं, तो गर्भावस्था के 10 से 12 हफ्तों के मध्य भ्रूण का परीक्षण कराया जाता है। यदि भ्रूण थैलेसीमिया मेजर से ग्रस्त होता है है, तो उस स्थिति में गर्भपात की सलाह दी जाती है। वहीं यदि भ्रूण थैलेसीमिया माइनर से ग्रस्त है या फिर सामान्य या नॉर्मल हो, तो फिर विशेषज्ञ डॉक्टर द्वारा गर्भवती महिला को गर्भावस्था को जारी रखने की सलाह दी जाती है।

यह सच है कि थैलेसीमिया एक गभीर रोग है, लेकिन समय रहते जाच कराने और फिर विशेषज्ञ डॉक्टर के परामर्श पर अमल करने से इस रोग की रोकथाम की जा सकती है।

किस उम्र में कौन-सा टीका..????

छोटी माता या बड़ी माता जैसी संक्रामक बीमारियों का कोई इलाज नहीं है, लेकिन एक बार हो जाए तो फिर व्यक्ति को दोबारा नहीं होती। कारण एक बार इससे संक्रमित होने के बाद शरीर में एंटीबॉडीज़ का निर्माण हो जाता है। लेकिन इस तरह से मरीज़ को एक बार बीमारी के सभी कष्ट झेलने पड़ते हैं। 

टीकाकरण का उद्देश्य है बीमारियों से बचाव करना। इससे शरीर पहले ही संक्रमण से लड़ने के लिए तैयार रहता है और व्यक्ति कष्ट से बच जाता है। बच्चों में टीकाकरण का मकसद विभिन्न बीमारियों से बचाव है। सभी सरकारी अस्पतालों में सामान्य टीके मुफ्त में लगाए जाते हैं। इन टीकों के अतिरिक्त भी कई टीके बाज़ार में उपलब्ध हैं जो यहाँ होने वाली बीमारियों से बच्चों को बचाते है। ये टीके थोड़े महंगे होते हैं इसलिए जो पालक इनका खर्च वहन कर सकें, उन्हें ये टीके लगवाना चाहिए। 

पोलियो उन्मूलन के समय पोलियो का टीका इंजेक्शन द्वारा दिया जाता है जिससे पोलियो वायरस से होने वाले लकवे से बचा जा सकता है। यह टीका डेढ़ माह, ढाई माह और साढ़े तीन माह की उम्र में तीन बार दिया जाता है। बच्चों में रोटावायरस से होने वाले दस्त रोग से बचने के लिए रोटावायरस वैक्सीन भी तीन बार डेढ़, ढाई और साढ़े तीन माह की उम्र में लगवाना चाहिए। 

ट्रिपल के टीके के बजाय अगर पाँच का टीका (पेंटावेलेंट वैक्सिन) दिया जाए तो निमोनिया और हिपेटाइटिस से भी बचा जा सकता है। न्यूमोकोकल वैक्सीन विशेष परिस्थिति में जैसे थैलेसीमिया, सिकल सेल, स्प्लीन का ऑपरेशन होने के बाद या नेफरोटिक सिंड्रोम इत्यादि में दिया जाता है। हिपेटाइटिस -ए का टीका एक साल की उम्र के बाद दोबारा छः माह के अंतराल पर दिया जाना चाहिए। छोटी माता का टीका (वेरिसेला) १५ माह की उम्र व उसके बाद ५ वर्ष की उम्र पा दिया जाता है। 

टायफायड का टीका २ वर्ष की उम्र के बाद हर तीन साल में दिया जाना चाहिए। ५ वर्ष की उम्र में ईज़ी-४ का बूस्टर दिया जाता है। सरवाइकल कैंसर का टीका (एच.पी.वी.) १०-१२ वर्ष की उम्र में तीन बार दिया जाना चाहिए। इसका एक टीका लगने के बाद दूसरा १ माह और तीसरा छः माह बाद दिया जाता है। टीकाकरण के ज़रिए बीमारी होने के पहले ही उसकी रोकथाम कर लेना ज़्यादा अच्छा है क्योंकि कई बीमारियों के लिए तो कारगर इलाज भी उपलब्ध नहीं है। मलेरिया डेंगू का बुखार, एड्स, कोलेरा आदि के टीकों पर भी खोज जारी है व आने वाले समय में इन बीमारियों के लिए भी टीके उपलब्ध होने की संभावना है

गर्भाधान (प्रसव पूर्व) कौन से परीक्षण जरुरी  हें..????

रक्त जांच—-आपकी डॉक्टर आपको रक्त के कुछ परीक्षण कराने की सलाह देगी। आप इन्हें किसी प्रतिश्ठित लैब से करा सकती हैं। इन जांचों से रूबेला अथवा जर्मन खसरे के संबंध में आपकी स्थिति (क्या आप प्रतिरक्षित हैं या नहीं), आपके शरीर में आयरन का स्तर (क्या आपमें रक्त की कमी है और आयरन की गोलियां लेने की जरूरत है), आपके रक्त का वर्ग और आपकी रिसस संबंधी स्थिति का पता चलेगा।आपकी डॉक्टर आपसे पूछ सकती है कि क्या आप आपके शिशु के डाउन्स सिंड्रोम तथा स्पाइना बिफिडा संबंधी जोखिम जानने के लिए नमूने की स्क्रीनिंग कराना चाहती हैं। आपके रक्त कीएच.आई.वी., सिफिलिस एवं हैपटाइटिस बी के लिए भी जांच की जाएगी, जब तक कि आप विशेष तौर पर यह परीक्षण करवाने से मना न कर दें।

लैब का टेक्नीशियन इन सभी परीक्षणों के लिए आपके रक्त का एक बड़ा नमूना लेगा। यदि आपको इस बारे में कुछ परेशानी हो तो आपके ध्यान को बंटाने तथा सहायता के लिए अपने साथ अपने पति या एक मित्र को ले जायें।

मूत्र की जांच—–यदि आपसे पहले ही अपने मूत्र का नमूना लाने के लिए नहीं कहा गया तो लैब टेक्नीशियन आपको एक संक्रमण रहित कंटेनर देगा जिसमें आप अपने मूत्र का नमूना ला देंगी। इसके बाद वह इसमें एक रासायनिक स्ट्रिप डालेगी जो इसका रंग बदल देती है। इससे पता चलेगा कि आपके मूत्र में प्रोटीन की कुछ मात्रा है या नहीं।

इस परीक्षण से टेक्नीशियन यह बता पायेगा कि क्या आपमें प्री-एक्लेम्पसिया, गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप रोग के लक्षण हैं या नहीं। वह टेक्नीशियन आपके मूत्र में शुगर का परीक्षण भी ले सकता है जिससे आपमें गर्भवधीय मधुमेह के लक्षणों का पता चलता है। वह इसमें बैक्टीरिया की मौजूदगी का भी पता लगायेगा।

रक्तचाप परीक्षण —–
आपकी डॉक्टर अब आपका रक्तचाप रिकॉर्ड करेगी और इसका इस्तेमाल भावी जांचों के लिए एक ‘आधारभूत औसत’ के रूप में किया जाएगा। इसके बाद के भावी परामर्शो के दौरान आपके रक्तचाप और नाड़ी की जांच की जाएगी। बढ़ा हुआ रक्तचाप गर्भावस्था के अंतिम दौर में बताता है कि प्री-एक्लेम्पसिया का जोखिम हो सकता है।

अल्ट्रासाउंड स्कैन- —आपके पहले प्रसव-पूर्व परामर्ष के दौरान आपका डेटिंग-स्कैन भी किया जा सकता है। इस स्कैन से आपके शिशु के आकार का पता चलेगा जिससे यह पुश्टि होगी कि गर्भावस्था कितने हफ्तों की है और इससे आपकी डिलीवरी की तारीख का अंदाजा लगेगा। आपकी डॉक्टर आपको बाह्य गर्भावस्था की जांच अथवा एक से अधिक शिशुओं का पता लगाने के लिए भी एक स्कैन कराने की सलाह दे सकती है। गर्भावस्था के दौरान प्राय: सभी स्त्रियां अपने खानपान का ध्यान रखती हैं लेकिन उन्हें इस बात की जानकारी नहीं होती कि स्वस्थ शिशु के जन्म के लिए यह बहुत जरूरी है कि गर्भधारण के पहले से ही अपनी सेहत का पूरा ध्यान रखा जाए। अगर आप भी अपना परिवार बढाने की योजना बना रही हैं तो इन बातों का ध्यान जरूर रखें :

1. आप जिस माह में कंसीव करना चाहती हैं, कम से कम उसके तीन माह पहले से आपको अपने खानपान के प्रति सतर्क हो जाना चाहिए। अपने रोजाना के भोजन में कैल्शियम, आयरन और प्रोटीन की मात्रा बढाएं। इसके लिए हरी पत्तेदार सब्जियां, मिल्क प्रोडक्ट्स और फलों का पर्याप्त मात्रा में सेवन करें।

2. प्री प्रग्नेंसी काउंसलिंग के लिए पति-पत्नी दोनों को स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह जरूर लेनी चाहिए। वहां डॉक्टर द्वारा इस बात की पूरी जानकारी हासिल की जाती है कि पति-पत्नी को बचपन में लगाए जाने वाले सारे टीके लग चुके हैं या नहीं? अगर किसी स्त्री को रूबेला का वैक्सीन नहीं लगा हो तो कंसीव करने से पहले उसे यह टीका लगवाना बहुत जरूरी होता है। लेकिन यह वैक्सीन लगवाने के बाद कम से कम तीन महीने तक कंसीव नहीं करना चाहिए।

3. गर्भधारण से पहले स्त्री के लिए डायबिटीज की जांच बहुत जरूरी है क्योंकि अगर मां को यह समस्या हो तो बच्चे को भी डायबिटीज होने की आशंका रहती है। यही नहीं बच्चे की आंखों पर भी इसका साइड इफेक्ट हो सकता है।

4. अगर कोई स्त्री गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन करती है तो उसे कंसीव करने से कम से कम तीन महीने पहले से इन गोलियों का सेवन बंद कर देना चाहिए।

5. कंसीव करने के कम से तीन महीने पहले से डॉक्टर की सलाह के अनुसार फॉलिक एसिड का सेवन शुरू कर देना चाहिए। क्योंकि सबसे पहले बच्चे का मस्तिष्क और उसकी रीढ की हड्डी का निर्माण शुरू हो होता है और इसे बनाने में फॉलिक एसिड की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह बच्चे के विकास के लिए ऐसा आवश्यक तत्व है कि इसकी कमी से बच्चे को नर्वस सिस्टम से संबंधित समस्याएं हो सकती हैं।

6. ज्यादातर भारतीय स्त्रियों को एनीमिया की समस्या होती है और हीमोग्लोबिन की कमी के कारण मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा हो सकता है। इसलिए गर्भधारण से पहले स्त्री के लिए फुल ब्लड काउंट टेस्ट बहुत जरूरी होता है।

7. गर्भधारण से पहले पति-पत्नी दोनों को थैलेसीमिया की जांच जरूर करवानी चाहिए। यह आनुवंशिक बीमारी है। अगर पति-पत्नी दोनों को थैलेसीमिया माइनर हो तो इससे बच्चे को मेजर थैलेसीमिया होने का खतरा होता है, जो कि एक गंभीर बीमारी है और रोगी को हर तीन महीने के अंतराल पर ब्लड टांसफ्यूजन की आवश्यकता होती है।

8. पति-पत्नी दोनों के लिए एचआईवी टेस्ट करवाना बहुत जरूरी होता है। क्योंकि अगर मां एचआईवी पॉजिटिव हो तो बच्चा भी इसका शिकार हो सकता है।

9. हेपेटाइटिस बी यौन संक्रमण से फैलने वाला रोग है। इसलिए पति-पत्नी दोनों को इसकी जांच करवानी चाहिए और इसके टीके भी जरूर लगवा लेने चाहिए।

10. कंसीव करने से पहले स्त्री के लिए सिफलिस की जांच भी जरूरी है। क्योंकि इससे डिलिवरी के समय कई तरह की समस्याएं आ सकती हैं।

11. बच्चे के लिए प्लानिंग करते समय पति-पत्नी दोनों ही एल्कोहॉल और सिगरेट से दूर रहें। स्त्री को इस मामले में विशेष रूप से सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि इससे शारीरिक और मानसिक रूप से विकृत शिशु के जन्म या मिसकैरेज की आशंका रहती है।

12. अगर आपके या पति के परिवार में किसी खास बीमारी की फेमिली हिस्ट्री रही है तो उसके बारे में डॉक्टर को जरूर बताएं।

13. अगर आप अपनी किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए नियमित रूप से किसी दवा का सेवन करती हैं तो उसके बारे में भी अपनी डॉक्टर को जरूर बताएं।

14. मां बनने से पहले हर स्त्री को अपने वजन पर ध्यान देना चाहिए। वजन बीएमएस (बॉडी मॉस इंडेक्स) के अनुसार पूरी तरह संतुलित होना चाहिए। ओवरवेट या अत्यधिक दुबलापन ये दोनों ही स्थितियां गर्भाधारण के लिए नुकसानदेह मानी जाती हैं। अगर स्त्री का वजन बहुत ज्यादा हो तो इससे प्रीमेच्योर डिलिवरी की आशंका बनी रहती है, वहीं कम वजन के कारण भी गर्भावस्था के दौरान उसे कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड सकता है।

15. अगर पति-पत्नी दोनों में से किसी को भी डिप्रेशन, हाइपरटेंशन या किसी भी तरह की कोई मनोवैज्ञानिक समस्या हो तो आप उसके बारे में भी डॉक्टर को जरूर बताएं। क्योंकि ऐसी समस्याओं के कारण बच्चे के जन्म के बाद उसकी सही परवरिश में दिक्कतें आ सकती हैं। इसलिए जब आप प्री प्रेग्नेंसी काउंसलिंग से पूरी तरह संतुष्ट हो जाएं तभी अपने पारिवारिक जीवन की शुरुआत करें।

थैलेसीमिया के ज्योतिषीय कारण : थैलेसीमिया लाल रक्त कोशिकाओं की विकृति के कारण होता है। काल पुरुष की कुंडली में पंचम भाव यकृत का होता है। यकृत से रक्त की वृद्धि होती है। रक्त में लाल कोशिकाओं का निर्माण अस्थि मज्जा से होता है, जिसका कारक मंगल होता है। अस्थियों का कारक सूर्य होता है। रक्त की तरलता का कारक चंद्र है। यदि किसी कुंडली में पंचम भाव, पंचमेश, मंगल, सूर्य, लग्न और लग्नेश दुष्प्रभावों में हो जाएं, तो रक्त की लाल कोशिकाओं में विकृति पैदा होती है। इनमें विशेष कर मंगल प्रधान ग्रह है; अर्थात मंगल का दूषित होना रक्त से संबंधित व्याधियां देता है। 
विभिन्न लग्नों में थैलेसीमिया :—
मेष लग्न : लग्नेश मंगल षष्ठ भाव में हो, बुध द्वादश भाव में सूर्य से युक्त हो, लेकिन बुध अस्त न हो, चंद्र राहु से युक्त, या दृष्ट हो, तो थैलेसीमिया हो सकता है। 
वृष लग्न : पंचमेश बुध गुरु से युक्त हो, मंगल पर गुरु की दृष्टि हो, लग्नेश त्रिक भावों में सूर्य से अस्त हो, चंद्र से द्वितीय, द्वादश भावों में कोई ग्रह न हो तो थैलेसीमिया रोग होता है। 
मिथुन लग्न : पंचमेश मंगल से युक्त या दृष्ट हो, लेकिन पंचमेश स्वगृही न हो, लग्नेश त्रिक भावों में गुरु से दृष्ट हो, चंद्र शनि से युक्त हो, तो थैलेसीमिया होता है। 
कर्क लग्न : पंचमेश मंगल, शनि से युक्त हो और बुध से दृष्ट हो, लग्नेश चंद्र, शनि, या राहु, केतु से दृष्ट हो, तो थैलेसीमिया होने की संभावना बढ़ जाती है। 
सिंह लग्न : लग्नेश पंचमेश से पंचम-नवम भाव में हो और शनि इन दोनों को पूर्ण दृष्टि से देख रहा हो, शनि पंचम भाव में हो और मंगल को देखता हो, मंगल चंद्र से युक्त और राहु-केतु से दृष्ट हो, तो थैलेसीमिया होता है। 
कन्या लग्न : पंचमेश मंगल से दृष्ट, या युक्त हो, लग्नेश सूर्य से अस्त हो और त्रिक भावों में हो, गुरु पंचम भाव में हो और चंद्र से युक्त हो तथा केतु से दृष्ट हो, तो थैलेसीमिया होता है। 
तुला लग्न : पंचमेश गुरु से युक्त हो, लग्नेश और मंगल पर गुरु की दृष्टि हो, सूर्य भी गुरु से दृष्ट हो, चंद्र राहु -केतु से युक्त, या दृष्ट हो, तो थैलेसीमिया हो सकता है। 
वृश्चिक लग्न : लग्नेश मंगल अष्टम भाव में हो और बुध से दृष्ट हो, बुध अस्त न हो और पंचमेश चंद्र से युक्त हो कर षष्ठ भाव में राहु-केतु से दृष्ट हो, तो थैलेसीमिया होता है। 
धनु लग्न : पंचमेश मंगल शुक्र से दृष्ट, अथवा युक्त हो, लग्नेश गुरु सूर्य से अस्त हो और बुध के अंश गुरु के अंशों से कुछ कम हों, लेकिन गुरु के अंशों के निकट हों; अर्थात् 10 के अंदर हों, चंद्र पंचम भाव में शनि, या राहु-केतु से दृष्ट हो, तो थैलेसीमिया होता है। 
मकर लग्न : गुरु पंचम भाव में, पंचमेश शुक्र एकादश भाव में सूर्य से अस्त हो, लग्नेश शनि त्रिक भावों में, मंगल-चंद्र नवम भाव में राहु-केतु से दृष्ट हों, तो थैलेसीमिया होता है। 
कुंभ लग्न : पंचमेश गुरु से युक्त, या दृष्ट हो और त्रिक भावों में हो, लग्नेश अस्त हो, मंगल चंद्र से युक्त, या दृष्ट हो और केतु से दृष्ट हो, तो थैलेसीमिया होता है। 
मीन लग्न : लग्नेश त्रिक भावो में अस्त हो, शुक्र पंचम भाव में शनि से युक्त हो, मंगल और पंचमेश राहु-केतु से युक्त हों और शुक्र से दृष्ट हों, तो थैलेसीमिया होता है। 

उपर्युक्त योग चलित पर आधारित हैं। दशा और गोचर में संबंधित ग्रह जब दुष्प्रभावों में रहेंगे, तो रोग में तीव्रता होगी। थैलेसीमिया अनुवांशिक है। इसलिए रोग मुक्ति की संभावनाएं बहुत कम होती हैं। उदाहरण कुंडली : यह जन्मकुंडली एक तीन वर्षीय बालक की है, जो थैलेसीमिया रोग से ग्रस्त है। बालक के जन्म समय तुला लग्न उदित हो रहा था। लग्न में सूर्य-बुध, तृतीय भाव में मंगल, चतुर्थ भाव में चंद्र केतु, सप्तम भाव में, गुरु- शनि, दशम में राहु, एकादश में शुक्र स्थित थे। जातक का जन्म सूर्य की दशा में, बुध के अंतर में हुआ। तुला लग्न की कुंडली में गुरु अकारक ग्रह है। पंचम भाव का स्वामी शनि गुरु से युक्त है। मंगल रक्त के लाल कणों के कारक पर गुरु की दृष्टि है। सूर्य पर गुरु की अकारक दृष्टि है। चंद्र केतु युक्त हो कर पीड़ित है। लग्नेश शुक्र पर भी गुरु की दृष्टि है। इसी कारण यह बालक मेजर थैलेसीमिया रोग से ग्रस्त है, क्योंकि पंचम भाव, लग्नेश, मंगल, चंद्र और सूर्य, जो क्रमशः यकृत, तन, रक्त मज्जा, रक्त और ऊर्जा के कारक हैं, सभी अकारक गुरु से पीड़ित है। इसी लिए जातक को मेजर थैलेसीमिया रोग है।
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