महावीर जयन्ती (MAHAVEER JAYANTIE)—-

महावीर जयन्ती (MAHAVEER JAYANTIE)—-

आज सभी स्थानों पर भगवान वर्धमान महावीर का जन्मदिन ..आज महावीर जयन्ती (05 अप्रेल,2012 को )के रुप मे मनाया जा रहा हें .

मानव समाज को अन्धकार से प्रकाश की ओर लाने वाले महापुरुष भगवान महावीर का जन्म ईसा से 599 वर्ष पूर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में त्रयोदशी तिथि को बिहार में लिच्छिवी वंश के महाराज श्री सिद्धार्थ और माता त्रिशिला देवी के यहां हुआ था. जिस कारण इस दिन जैन श्रद्धालु इस पावन दिवस को महावीर जयन्ती के रूप में परंपरागत तरीके से हर्षोल्लास और श्रद्धाभक्ति पूर्वक मनाते हैं. बचपन में भगवान महावीर का नाम वर्धमान था. जैन धर्मियों का मानना है कि वर्धमान ने कठोर तप द्वारा अपनी समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर जिन अर्थात विजेता कहलाए. उनका यह कठिन तप पराक्रम के सामान माना गया, जिस कारण उनको महावीर कहा गया और उनके अनुयायी जैन कहलाए.

तीस वर्ष की उम्र में इन्होंने घर-बार छोड़ दिया और कठोर तपस्या द्वारा कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया. महावीर ने पार्श्वनाथ के आरंभ किए तत्वज्ञान को परिभाषित करके जैन दर्शन को स्थायी आधार दिया. महावीर स्वामी जी ने श्रद्धा एवं विश्वास द्वारा जैन धर्म की पुन: प्रतिष्ठा स्थापित की तथा आधुनिक काल में जैन धर्म की व्यापकता और उसके दर्शन का श्रेय महावीर स्वामी जी को जाता है इन्हें अनेक नामों से पुकारा जाता हैं- अर्हत, जिन, निर्ग्रथ, महावीर, अतिवीर इत्यादि .सभी जेन धर्मव्लाबी इस पवन पार्क को बड़े हर्षोल्लास के साथ मन रहे हें..
महावीर ने कहा था–

जियो और जीने दो–

-स्वस्ति श्री क्षुल्लक अतुल्य सागर—

महावीर ने केवल अहिंसा की बात नहीं की, बल्कि उसे अपने आचरण में भी उतारा। उनका कहना था, आत्म कल्याण के लिए राग-द्वेष, ईर्ष्या, आकांक्षा की भावनाओं का परित्याग करना होगा, तभी हिंसा की आग से हम बच सकते हैं।

जब इस धरती पर चारों ओर हिंसा का तांडव मचा हुआ था। चारों ओर राग-द्वेष की भावना बढ रही थी। क्रोध, माया, लोभ हर तरफ पसरा हुआ था। शिष्टाचार समाप्त होता जा रहा था, तब भारत के वैशाली राज्य में अहिंसा के अग्रदूत भगवान महावीर का जन्म हुआ। बचपन से ही उन्होंने अपने आचरण में अहिंसा को अपनाया था। जियो और जीने दो तथा अहिंसा परमो धर्म, इन दो मुख्य उपदेश के आधार पर उन्होंने मनुष्य के आत्म कल्याण की राह बताई।
भगवान महावीर ने अहिंसा को ही सबसे बडा धर्म बताते हुए संदेश दिया था कि समस्त आत्माएं एक समान हैं। कोई बडा-छोटा नहीं हैं। सब अपने कर्म से बडे-छोटे बनते हैं। सब अपनी-अपनी क्षमता और मर्यादाओं में रह कर अहिंसा और धर्म की परिपालन कर सकते हैं। उन्होंने जोर दिया था कि हमें मन में दूसरों के प्रति क्षमा भाव, वात्सल्य व करूणा का भाव धारण करना होगा। तभी हमें आत्मिक शांति मिल सकती हैं। एक बार कुमार वर्धमान की मां त्रिशला दर्पण के सामने अपना श्रृंगार कर रही थी। इतने में कुमार वहां आ गए। मां त्रिशला ने पूछा कि उनके बालों में गजरा कैसा लग रहा हैं। कुमार वर्धमान बोले, मां, से फूल भी किसी वृक्ष से उत्पन्न हुए हैं। उस वृक्ष की आत्मा कितनी दुखी हुई होगी। आपने अपनी सुंदरता के लिए इस कली को तुडवा लिया। राजा श्रेणिक ने बेटे से भगवान महावीर ने एक बार कहा था कि चिंता उसे होती हैं, जो पिछली बात को याद करता हैं। जो वर्तमान में संतोषी हैं, वह हमेशा चिंता मुक्त रहता हैं। उसके चेहरे पर सदैव शांति और मुस्कान रहती हैं। ये शांति और प्रसन्नता वापस तभी आ सकती हैं, जब हम प्रत्येक प्राणी में अपने आफा देखेंगे।
मैत्री भाव जगत में मेरा, सब जीवों से नित्य रहे, दिन-दुखी जीवों पर मेरे उस से करूणा स्त्रोत बहे। यही भगवान महावीर का संदेश और सिद्धांत था। इसके द्वारा उन्होंने अपने आपको तीर्थंकर बना दिया।

महावीर जयंती पर्व —–
तप से जीवन पर विजय प्राप्त करने का पर्व महावीर जयंती के रूप में मनया जाता है. श्रद्धालु मंदिरों में भगवान महावीर की मूर्ति को विशेष स्नान कराते हैं, जो कि अभिषेक कहलाता है. तदुपरांत भगवान की मूर्ति को सिंहासन या रथ पर बिठा कर उत्साह और हर्षोउल्लास पूर्वक जुलूस निकालते हैं, जिसमें बड़ी संख्यां में जैन धर्मावलम्बी शामिल होते हैं. इस सुअवसर पर जैन श्रद्धालु भगवान को फल, चावल, जल, सुगन्धित द्रव्य आदि वस्तुएं अर्पित करते.

चौबीस ‍तीर्थंकरों के अंतिम तीर्थंकर महावीर के जन्मदिवस प्रति वर्ष चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को मनाया जाता है. महावीर जयंती के अवसर पर जैन धर्मावलंबी प्रात: काल प्रभातफेरी निकालते हैं तथा भव्य जुलूस के साथ पालकी यात्रा का आयोजन किया जाता है. इसके पश्चात महावीर स्वामी का अभिषेक किया जाता है तथा शिखरों पर ध्वजा चढ़ाई जाती है. जैन समाज द्वारा दिन भर अनेक धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है महावीर का जन्मोत्सव संपूर्ण भारत में धूमधाम से मनाया जाता है.

वर्धमान महावीर जी को 42 वर्ष की अवस्था में जूभिका नामक गांव में ऋजूकूला नदी के किनारे घोर त्पस्या करते हुए जब बहुत समय व्यतीत हुआ तब उन्हें मनोहर वन में साल वृक्ष के नीचे वैशाख शुक्ल दशमी की पावन तिथि के दिन उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई जिसके पश्चात वह महावीर स्वामी बने.

महावीर जी के समय समाज व धर्म की स्थिति में अनेक विषमताएं मौजूद थी धर्म अनेक आडंबरों से घिरा हुआ था और समाज में अत्याचारों का बोलबाल था अत: ऐसी स्थिति में भगवान महावीर जी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया उन्होंने देश भर में भर्मण करके लोगों के मध्य व्याप्त कुरूतियों एवं अंधविश्वासों को दूर करने का प्रयास किया उन्होंने धर्म की वास्तविकता को स्थापित किया सत्य एवं अहिंसा पर बल दिया.

महावीर जीवन परिचय —-
भगवान महवीर का जन्म वैशाली के एक क्षत्रिय परिवार में राजकुमार के रुप में चैत्र शुक्लपक्ष त्रयोदशी को बसोकुंड में हुआ था. इनके बचपन का नाम वर्धमान था यह लिच्छवी कुल के राजा सिद्दार्थ और रानी त्रिशला के पुत्र थे. संसार को ज्ञान का संदेश देने वाले भगवान महावीर जी ने अपने कार्यों सभी का कल्याण करते रहे.

जैन श्रद्धालु इस पावन दिवस को महावीर जयन्ती के रूप में परंपरागत तरीके से हर्षोल्लास और श्रद्धाभक्ति पूर्वक मनाते आ रहे हैं. जैन धर्म के धर्मियों का मानना है कि वर्धमान जी ने घोर तपस्या द्वारा अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली थी जिस कारण वह विजेता और उनको महावीर कहा गया और उनके अनुयायी जैन कहलाए.

महावीर के दर्शन का सार—-

भगवान महावीर द्वारा वस्तु के स्वरूप की विराटता का साक्षात्कार उनके लिखे आलेखों से हो जाता है। इन अनेक गुण, अनंत धर्म (पहलू), उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य युक्त, स्वतंत्र, स्वावलंबी, विराट जड़ चेतन वस्तुओं के साथ हमारा सलूक क्या हो, यह महावीर की बुनियादी चिंता और उनके दर्शन का सार है।

महावीर ने वस्तु मात्र को उपादान और निमित्त की भूमिका देकर इस सलूक का निरूपण किया है। वे कहते हैं, वस्तु स्वयं अपने विकास या ह्रास का मूल कारण या आधार सामग्री या उपादान है। उपादान कारण खुद कार्य में बदलता है। घड़ा बनने में मिट्टी उपादान है। वह मिट्टी ही है जो घड़े में परिणत होती है।

उपादान स्वद्रव्य है। अंतरंग है। खुद की ताकत है। वह वस्तु की सहज शक्ति है। निमित्त परद्रव्य है। बहिरंग है। पर- संयोग और दूसरे की ताकत है। निमित्त कुम्हार की तरह सहकारी कारण है। निमित्त के बिना काम नहीं होता। लेकिन अकेले उसकी बरजोरी से भी काम नहीं होता। हर वस्तु खुद अपना उपादान है। सबको अपने पाँवों से चलना है। कोई किसी दूसरे के लिए नहीं चल सकता।

बेटे के लिए पिता या नौकर या कोई ठेकेदार पढ़ाई नहीं कर सकता। पढ़ना तो बेटे को ही पड़ेगा। यानी हमारा मददगार कितना ही अपना, छोटा या बड़ा क्यों न हो वह हमारे लिए उपादान नहीं बन सकता। सूत्रकृतांग (1/4/13) में भगवान महावीर ने कहा है।

‘सूरोदये पासति चक्खुणेव।’
अर्थात सूर्य के उदय होने पर भी देखना तो आँखों को ही पड़ता है।

सवाल यह है कि अगर हम एक-दूसरे के लिए उपादान नहीं बन सकते तो क्या हम सब केवल मूकदर्शक हैं? अगर एक वस्तु का दूसरी से कोई सरोकार नहीं है तो यह तो सबका अलग खिचड़ी पकाना हुआ।

महावीर क्या इस अलग खिचड़ी पकाने का ही उपदेश देते हैं? दरअसल महावीर के चिंतन की यह दिशा नहीं है। वे हमारे अलगाव को स्वीकार करते हुए भी संसार के पदार्थों के साथ हमारे गहरे सरोकारों को भी रेखांकित करते हैं। उनका कहना है, दूसरों के लिए हम उपादान नहीं बन सकते लेकिन निमित्त बन सकते हैं। बेटे को पढ़ाई का माहौल तो दे सकते हैं।

हमारी भूमिका अपने लिए उपादान और दूसरों के लिए निमित्त की है। महावीर द्वारा दिया गया यह सूक्ष्म जीवन सूत्र ही नहीं जीवन जीने का स्थूल व्यवहार सूत्र भी है।

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