आइये जाने (Mahashivratri ) महाशिवरात्रि क्या हें..??क्यों प्रिय हें श्रावण मास शिव को..???—-

आइये जाने (Mahashivratri ) महाशिवरात्रि क्या हें..??क्यों प्रिय हें श्रावण मास शिव को..???—-

भारत शिव-पूजकों का देश माना जाता है। देश में शायद ही कोई ऐसा गांव हो, जहां आपको शिवमंदिर न मिले। शिव जिन्हें सदाशिव, सांब, महेश, मंगेश, गिरिजापति, पार्वतीपति, भूतनाथ, कर्पूरगौर, नीलकंठ, चंद्रमौली, आशुतोष और महादेव न जाने कितने ही नामों से पुकारा जाता है, का देशभर में पूजन होता है। महाशिवरात्रि इन्हीं भगवान शिव की आराधना का पर्व है। हिंदू पांचांग के अनुसार शिवरात्रि तो हर महीने में आती है, लेकिन महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी-चतुर्दशी को धूमधाम से मनाई जाती है। मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्य रात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था, इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया। अपार सुंदरी गौरा को अर्द्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं। शरीर पर भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं।

महाशिवरात्रि का महत्व:—-
महाशिवरात्रि मात्र हिन्दू त्योहार ही नहीं, यह एक अति पावन महान उपहार है, जो पारब्रह्म परमेश्वर के तीन रूपों में से एक की पूर्ण उपासना से वरदान के रूप में जीव को प्राप्त है। यह पर्व परम पावन उपलब्धि है जो जीव मात्र को प्राप्त होकर उसके परम भाग्यशाली होने का संकेत देता है। यह पावन व्रत सुबह से ही शुरू हो जाता है। इस दिन शिव मंदिरों में जाकर मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर, ऊपर से बेलपत्र, आक-धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है। अगर पास में शिवालय न हो, तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर उसे पूजने का विधान है। शिवलिंग पर बेल-पत्र आदि चढ़ाकर पूजन करते हैं। इस पर्व पर रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान शिव की शादी भी हुई थी, इसलिए रात्रि में शिवजी की बारात निकाली जाती है। रात में पूजन कर फलाहार किया जाता है। अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।

महाशिवरात्रि की व्रत-कथा—

मां पार्वती ने एक बार भगवान शंकर से पूछा, ‘ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?’उत्तर में शिवजी ने पार्वती को ‘शिवरात्रि’ के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- ‘एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।शिकारी ध्यान मग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया।अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची।

शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, ‘मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना।’ शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई। कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा।

समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, ‘हे पारधी ! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।’ शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था।

तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, ‘हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मार।’ शिकारी हँसा और बोला, ‘सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।’

उत्तर में मृगी ने फिर कहा, ‘जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।’ मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्व करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,’ हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।’

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, ‘मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।’ उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।’

———————————————————————————————–

श्री शिव चालीसा/SHIV CHALISA —-

।।दोहा।।

श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥
मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥
मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥
ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥
कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥दोहा॥

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

——————————————————————————————-

श्रावण मास में शिव पूजा – शिव उपासना ——

श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन श्रवण नक्षत्र होने से मास का नाम श्रावण हुआ और वैसे तो प्रतिदिन ही भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए।
लेकिन श्रावण मास में भगवान शिव के कैलाश में आगमन के कारण व श्रावण मास भगवान शिव को प्रिय होने से की गई समस्त आराधना शीघ्र फलदाई होती है।
पद्म पुराण के पाताल खंड के अष्टम अध्याय में ज्योतिर्लिंगों के बारे में कहा गया है कि जो मनुष्य इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करता है, उनकी समस्त कामनाओं की इच्छा पूर्ति होती है। स्वर्ग और मोक्ष का वैभव जिनकी कृपा से प्राप्त होता है।
शिव के त्रिशूल की एक नोक पर काशी विश्वनाथ की नगरी का भार है। पुराणों में ऐसा वर्णित है कि प्रलय आने पर भी काशी को किसी प्रकार की क्षति नहीं होगी।
भारत में शिव संबंधी अनेक पर्व तथा उत्सव मनाए जाते हैं। उनमें श्रावण मास भी अपना विशेष महत्व रखता है। संपूर्ण महीने में चार सोमवार, एक प्रदोष तथा एक शिवरात्रि, ये योग एकसाथ श्रावण महीने में मिलते हैं। इसलिए श्रावण का महीना अधिक फल देने वाला होता है। इस मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर शिवामूठ च़ढ़ाई जाती है। वह क्रमशः इस प्रकार है :
प्रथम सोमवार को- कच्चे चावल एक मुट्ठी, दूसरे सोमवार को- सफेद तिल्ली एक मुट्ठी, तीसरे सोमवार को- ख़ड़े मूँग एक मुट्ठी, चौथे सोमवार को- जौ एक मुट्ठी और यदि पाँचवाँ सोमवार आए तो एक मुट्ठी सत्तू च़ढ़ाया जाता है।
महिलाएँ श्रावण मास में विशेष पूजा-अर्चना एवं व्रत अपने पति की लंबी आयु के लिए करती हैं। सभी व्रतों में सोलह सोमवार का व्रत श्रेष्ठ है। इस व्रत को वैशाख, श्रावण, कार्तिक और माघ मास में किसी भी सोमवार को प्रारंभ किया जा सकता है। इस व्रत की समाप्ति सत्रहवें सोमवार को सोलह दम्पति (जो़ड़ों) को भोजन एवं किसी वस्तु का दान देकर उद्यापन किया जाता है।
शिव की पूजा में बिल्वपत्र अधिक महत्व रखता है। शिव द्वारा विषपान करने के कारण शिव के मस्तक पर जल की धारा से जलाभिषेक शिव भक्तों द्वारा किया जाता है। शिव भोलेनाथ ने गंगा को शिरोशार्य किया है।
श्रावण मासमें आशुतोष भगवान्‌ शंकरकी पूजाका विशेष महत्व है। जो प्रतिदिन पूजन न कर सकें उन्हें सोमवारको शिवपूजा अवश्य करनी चाहिये और व्रत रखना चाहिये। सोमवार भगवान्‌ शंकरका प्रिय दिन है, अत: सोमवारको शिवाराधन करना चाहिये।
श्रावणमें पार्थिव शिवपूजाका विशेष महत्व है। अत: प्रतिदिन अथवा प्रति सोमवार तथा प्रदोषको शिवपूजा या पार्थिव शिवपूजा अवश्य करनी चाहिये।
सोमवार (Shravan Somvar) के व्रत के दिन प्रातःकाल ही स्नान ध्यान के उपरांत मंदिर देवालय या घर पर श्री गणेश जी की पूजा के साथ शिव-पार्वती और नंदी की पूजा की जाती है। इस दिन प्रसाद के रूप में जल , दूध , दही , शहद , घी , चीनी , जने‌ऊ , चंदन , रोली , बेल पत्र , भांग , धतूरा , धूप , दीप और दक्षिणा के साथ ही नंदी के लि‌ए चारा या आटे की पिन्नी बनाकर भगवान पशुपतिनाथ का पूजन किया जाता है। रात्रिकाल में घी और कपूर सहित गुगल, धूप की आरती करके शिव महिमा का गुणगान किया जाता है। लगभग श्रावण मास के सभी सोमवारों को यही प्रक्रिया अपना‌ई जाती है।
इस मासमें लघुरुद्र, महारुद्र अथवा अतिरुद्र पाठ करानेका भी विधान है।
इस मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर शिवामूठ च़ढ़ा‌ई जाती है। वह क्रमशः इस प्रकार है :—-
प्रथम सोमवार को- कच्चे चावल एक मुट्ठी, दूसरे सोमवार को- सफेद तिल्ली एक मुट्ठी, तीसरे सोमवार को- ख़ड़े मूँग एक मुट्ठी, चौथे सोमवार को- जौ एक मुट्ठी और यदि पाँचवाँ सोमवार आ‌ए तो एक मुट्ठी सत्तू च़ढ़ाया जाता है।
शिव की पूजा में बिल्वपत्र (Belpatra) अधिक महत्व रखता है। शिव द्वारा विषपान करने के कारण शिव के मस्तक पर जल की धारा से जलाभिषेक शिव भक्तों द्वारा किया जाता है। शिव भोलेनाथ ने गंगा को शिरोधार्य किया है।
शिव का ग्यारहवाँ अवतार हनुमान के रूप में हुआ है। संपूर्ण श्रावणमास में शिव भक्तों द्वारा शिवपुराण, शिवलीलामृत, शिव कवच, शिव चालीसा, शिव पंचाक्षर मंत्र, शिव पंचाक्षर स्तोत्र, महामृत्युंजय मंत्र का पाठ एवं जाप किया जाता है। श्रावण मास में इसके करने से अधिक फल प्राप्त होता है।
जो भक्त पूरे महीने उपवास नहीं कर सकते वे श्रावण मास के सोमवार का व्रत कर सकते हैं। सोमवार के समान ही प्रदोष का महत्व है। इसलिए श्रावण में सोमवार व प्रदोष में भगवान शिव की विशेष आराधना की जाती है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार श्रावण में ही समुद्र मंथन से निकला विष भगवान शंकर ने पीकर सृष्टि की रक्षा की थी। इसलिए इस माह में शिव आराधना करने से भोलेनाथ की कृपा प्राप्त होती है।
अमोघ फलदाई सोमवार व्रत—-
शास्त्रों और पुराणों में श्रावण सोमवार व्रत को अमोघ फलदाई कहा गया है। विवाहित महिलाओं को श्रावण सोमवार का व्रत करने से परिवार में खुशियां, समृद्घि और सम्मान प्राप्त होता है, जबकि पुरूषों को इस व्रत से कार्य-व्यवसाय में उन्नति, शैक्षणिक गतिविधियों में सफलता और आर्थिक रूप से मजबूती मिलती है। अविवाहित लड़कियां यदि श्रावण के प्रत्येक सोमवार को शिव परिवार का विधि-विधान से पूजन करती हैं तो उन्हें अच्छा घर और वर मिलता है।

शिव गायत्री मंत्र से होंगे दोष निवारण —
जातक को यदि जन्म पत्रिका में कालसर्प, पितृदोष एवं राहु-केतु तथा शनि से पीड़ा है या ग्रहण योग है या फिर मानसिक रूप से विचलित रहते हैं, उन्हें भगवान शिव की गायत्री मंत्र से आराधना करना चाहिए। क्योंकि कालसर्प, पितृदोष के कारण राहु-केतु को पाप-पुण्य संचित करने और शनिदेव द्वारा दंड दिलाने की व्यवस्था भगवान शिव के आदेश पर ही होती है। इससे सीधा अर्थ निकलता है कि इन ग्रहों के कष्टों से पीडित व्यक्ति भगवान शिव की आराधना करे तो महादेवजी उस जातक की पीड़ा दूर कर सुख पहुंचाते हैं। भगवान शिव की शास्त्रों में कई प्रकार की आराधना वर्णित है लेकिन शिव गायत्री मंत्र का पाठ सरल एवं अत्यंत प्रभावशील है।

मंत्र निम्न है- —
ॐ तत्पुरूषाय विदमहे, महादेवाय धीमहि तन्नो रूद्र प्रचोदयात।

इस मंत्र को किसी भी सोमवार से प्रारंभ कर सकते हैं। इसी के साथ सोमवार का व्रत करें तो श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त होंगे। शिवजी के सामने घी का दीपक लगाएं। जब भी यह मंत्र करें एकाग्रचित्त होकर करें, पितृदोष एवं कालसर्प दोष वाले व्यक्ति को यह मंत्र प्रतिदिन करना चाहिए। सामान्य व्यक्ति भी करे तो भविष्य में कष्ट नहीं आएगा। इस जाप से मानसिक शांति, यश, समृद्धि, कीर्ति प्राप्त होती है। शिव की कृपा का प्रसाद मिलता है।

भोलेनाथ को यूं रिझाएं—–

1 बिल्वपत्रं शिवार्पणम्—–
भगवान शिव को जो पत्र-पुष्प प्रिय हैं उनमें बिल्वपत्र प्रमुख है। श्रावण मास में बिल्वपत्र को शिव पर अर्पित करने से धन-संपदा, ऎश्वर्य प्राप्त होता है। लिंग पुराणानुसार “बिल्व पत्रे स्थिता लक्ष्मी देवी लक्षण संयुक्ता” अर्थात बिल्व पत्र में लक्ष्मी का वास माना जाता है। बिल्व वृक्ष को श्री वृक्ष भी माना जाता है। ऋग्वेदोक्त श्री सूक्त के अनुसार मां लक्ष्मी के तपोबल से बिल्वपत्र उत्पन्न हुआ, जो दरिद्रता को दूर करने वाला है। यह न केवल बाहरी बल्कि भीतरी दरिद्रता को भी दूर करने में समर्थ है। भगवान शिव की पूजा में पुष्पों का अभाव होने पर बिल्वपत्र चढ़ाने से भी शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं। बिल्वपत्र को हमेशा शिवलिंग पर उल्टा चढ़ाना चाहिए। श्रावण मास में सहस्त्र बिल्वपत्र शिवलिंग पर चढ़ाने से शीघ्र ही समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।

2 रूद्राक्ष धारण करें—–
पौराणिक मान्यतानुसार भगवान शंकर के नेत्रों से आंसू की बूंदे टपकी, जो पृथ्वी पर गिरकर रूद्राक्ष के रूप में परिवर्तित हो गई। शंकर (रूद्र) की आंखों (अश्रु) से उत्पन्न होने के कारण ही इस वृक्ष के फल को रूद्राक्ष कहा गया। रूद्राक्ष भगवान शंकर को अत्यधिक प्रिय हैं। इसीलिए मान्यता है कि रूद्राक्ष में स्वयं भगवान शंकर का निवास है। रूद्राक्ष को धारण करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है। आयुर्वेद के अनुसार रूद्राक्ष कफ निवारक व वायुविकार नाशक भी है। रूद्राक्ष का उपयोग ग्रहों के कुप्रभावों को दूर करने के लिए भी किया जाता है। जिस प्रकार रत्न व उपरत्न से ग्रहों के दोष दूर होते हैं उसी प्रकार रूद्राक्षों से भी ग्रहों के दोषों का निवारण संभव होता है।

3 पारद शिवलिंग की करें आराधना—
पारे को विशेष प्रक्रियाओं द्वारा शोधित करके उसे ठोस बनाकर शिवलिंग बनाया जाता है। करोड़ों शिवलिंगों की पूजा से जो फल प्राप्त होता है उससे भी अधिक गुनाफल पारद शिवलिंग की पूजा करने से प्राप्त होता है। गरूड़ पुराण में पारद शिवलिंग को ऎश्वर्यदायक कहा है। इसकी पूजा करने से धन, असीम ज्ञान व ऎश्वर्य प्राप्त होता है। पौराणिक मान्यतानुसार रावण ने भी पारद शिवलिंग के निर्माण एवं उसकी पूजा उपासना कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था। पारद शिवलिंग का निर्माण विशेष मुहूर्त में किया जाता है। श्रावण मास में पारद शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा करके घर पर नित्य पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

4 कावड़ यात्रा पर जाएं—-
श्रावण मास में भगवान शिव को रिझाने के लिए भक्त कावड़ यात्रा करते हैं। मान्यतानुसार पवित्र सरोवर या प्राचीन नदी के जल को लेकर पैदल चलकर शिव को रिझाने के लिए जल से अभिषेक एवं संपूर्ण श्रावण मास का व्रत करें। कावड़ लाकर भोले नाथ का जलाभिषेक करने की शुरूआत कब और कहां से हुई कुछ ठीक तरह से कहना मुश्किल है। पर यह जरूर है कि भगवान परशुराम पहले कावडिए थे, जिन्होंने गंगा जल से भगवान शिव का जलाभिषेक किया।

अरिष्ट नाश के लिए—-
जन्म कुंडली में अष्टम भाव आयु का है। इससे भी अष्टम भाव तृतीय भाव भी आयु का स्थान है। इनसे बारहवें भाव, द्वितीय एवं सप्तम भाव दोनों मारक भाव हैं। इस भाव में स्थित ग्रह एवं भाव के स्वामी मारकेश होते हैं। इन स्थानों में स्थित कू्रर ग्रह के कारण उत्पन्न होने वाले अरिष्ट आयु में कमी, रोग आदि प्रदान करते हैं। भगवान शिव स्वयं काल हैं, जिन्होंने काल पर विजय प्राप्त की है। मृत्यु को अपने अधीन किया। इसलिए उन्हे मृत्युंजय भी कहते हैं। जिन्हें अरिष्ट व मारकेश की दशा चल रहीं हो वे भगवान शिव की आराधना करें।
———————————————————————-
नव ग्रहों की शांति के लिए शिवाभिषेक—-
सूर्य- भगवान शिव पर जल से अभिषेक
चंद्र- कच्चे दूध में काले तिल डालकर अभिषेक
मंगल- गिलोए की बूटी के रस से अभिषेक
बुध- विधारा की बूटी के रस से अभिषेक
बृहस्पति- कच्चे दूध में हल्दी मिलाकर अभिषेक
शुक्र- पंचामृत से अभिषेक
शनि- गन्ने के रस से अभिषेक
राहु-केतु- भांग से अभिषेक करें।
———————————————
शिव सहस्रनाम—-इस लिंक पर सुने/सुमिरन करें–
http://www.ganesh.us/videos/shiva-sahasranama-mantra.html …..
—————————————————————————————
http://www.khapre.org/portal/url/mr/stotre/sahasranamavali/z70622211010(%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80.%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5.%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%83).aspx
—————————————————————————-
किससे बने शिवलिंग की पूजा करने से क्या लाभ होगा—–

1. कानूनी समस्याओं के निवारण के लिए लहसुनिया पत्थर का शिवलिंग बनाकर पूजा करना लाभकारी होता है।

2. अनावश्यक विघ्, परेशानी, भय और भ्रम के निवारण के लिए दूर्वा को पीसकर उसको शिवलिंग का आकार देकर पूजन करें। संपूर्ण कष्टों से छुटकारा मिलेगा।

3. संतान प्राप्ति के लिए बांस के अंकुर से शिवलिंग का निर्माण करें और पूजन करें।

4. कारोबार में वृद्धि, धन प्राप्ति, बचत आदि के लिए दही को कपड़े में बांधकर पानी निकालने के बाद जब दही कठोर होता है तो उससे शिवलिंग बनाकर पूजन करें। संपूर्ण धन संबंधी परेशानियों का निवारण होगा।

5. पारिवारिक सुख, वैवाहिक समस्याओं के निवारण, चीनी का शिवलिंग बनाकर पूजन करें।

6. आरोग्य रोगों से मुक्ति पाने के लिए चंदन से बने शिवलिंग की पूजा करें।

7. जीवन की संपूर्ण सफलताओं के लिए चांदी, स्वर्ण, पारद, स्फटिक व नरदेश्वर शिवलिंग की पूजा करना अति कल्याणकारी माना गया है।

श्रावण मास : कैसे चढ़ाएं पुष्पों को—–

1. फूल, फल और पत्ते जैसे ही उगते वैसे ही अर्पित करने चाहिए। चढ़ाते समय इनका मुंह ऊपर की ओर होना चाहिए।

2. दूर्वा और तुलसी दल को अपनी ओर और बेलपत्र को नीचे मुख कर चढ़ाना चाहिए।

3. दाहिने हाथ की हथेली को सीधा करके मध्यमा, अनामिका और अंगूठे की सहायता से फूल और बेलपत्र चढ़ाना चाहिए।

4. भगवान शिव पर चढ़े हुए पुष्प और पत्तों को अंगूठे और तर्जनी अंगुली की सहायता से उतारना चाहिए।
——————————————————————————-
रूद्राक्ष है शिव को प्रिय—
प्रकृति का अनमोल रत्न “रूद्राक्ष” भगवान शिव को बेहद प्रिय है। रूद्राक्ष को धारण करने से जहां मानसिक शांति, आध्यात्मिक विकास होता है वहीं स्वास्थ्य लाभ तथा भाग्योन्नति भी होती है।

एक मुखी रूद्राक्ष— को शिव स्वरूप माना जाता है। यह अत्यंत दुर्लभ है। इसका संचालक सूर्य है। सूर्य की अनुकूलता के लिए इसे पहना जाता है। इसे किसी शुभ तिथि में सफेद धागे में पिरोकर “ॐ नम: शिवाय:” मंत्र से अभिमंत्रित कर, गले में पहनना चाहिए।

दो मुखी रूद्राक्ष— अर्धनारीश्वर स्वरूप है। इसे लाल धागे में पिरोकर, सोमवार के दिन दाहिने हाथ में “ॐ अध्र्यनारीश्वर देवाय नम:” मंत्र का जप करते हुए बांधना चाहिए। इसको धारण करने से चंद्रमा की अनुकूलता से मानसिक शांति मिलती है।

तीन मुखी रूद्राक्ष— का स्वामी अग्निदेवता हैं। मंगल की अनुकूलता के लिए इसे धारण करने से हीन भावना, आत्मग्लानि, भय और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है। इसको लाल धागे में पिरोकर मंगलवार को “ॐ नमो नारायणाय नम:” मंत्र का जप करके पहनना चाहिए।

चार मुखी रूद्राक्ष— का स्वामी ब्रह्मा तथा संचालक ग्रह बुध है। यह सृजनशील व्यक्तियों के लिए विशेष लाभकारी है। इसे लाल धागे में पिरोकर, बुधवार के दिन प्रात: “ॐ ब्रह्म देवाय नम:” मंत्र से अभिमंत्रित कर पहनना चाहिए।

पांच मुखी रूद्राक्ष— शिव पुरूष रूद्र द्वारा नियंत्रित तथा बृहस्पति द्वारा संचालित है। इसके एक से तीन दाने तक लाल धागे में पिरोकर “ॐ नम: शिवाय:” मंत्र का जप करते हुए धारण करना चाहिए। यह रूद्राक्ष मानसिक तनाव से मुक्ति देता है।

छह मुखी रूद्राक्ष—- का स्वामी कार्तिकेय तथा संचालक ग्रह शुक्र है। यह रक्तचाप, दिमागी परेशानी, ह्वदयरोग आदि बीमारियों में लाभकारी है। इसके तीन दानों को लाल धागे में पिरोकर “ॐ नम: शिवाय कार्तिकेय नम:” मंत्र का जप करते हुए गले में पहनना चाहिए।

सात मुखी रूद्राक्ष— महालक्ष्मी द्वारा नियंत्रित तथा शनि द्वारा संचालित होता है। आर्थिक, शारीरिक और मानसिक विपत्तियों से ग्रस्त लोगों द्वारा इसे धारण करना चाहिए। इसे लाल धागे में पिरोकर “ॐ श्रीं श्रीयै नम:” मंत्र का जप करते हुए गले या दाएं बाजू में पहनना चाहिए।

आठ मुखी रूद्राक्ष— के स्वामी गणेश तथा संचालक ग्रह राहू है। इसके धारण करने से आपस में द्वेष रखने वालों का मन बदलता है और मित्रता बढ़ाता है। इसे लाल धागे में पिरोकर “ॐ गं गणपतये नम:” मंत्र का जप करते हुए धारण करें।

नौ मुखी रूद्राक्ष— की मां दुर्गा स्वामिनी है। भैरव स्वरूप इस रूद्राक्ष का संचालक ग्रह केतु है। इसे लाल धागे में पिरोकर, सोमवार के दिन “ॐ दंु दुुर्गाय नम:” मंत्र का जप करते हुए गले में पहनना चाहिए। इसको पहनने से सहनशीलता, कर्मठता व साहस में वृद्धि होती है।

दस मुखी रूद्राक्ष— के स्वामी दशावतारी विष्णु भगवान हैं। वास्तु दोष निवारक इस रूद्राक्ष की पूजा करने से गृह शांति होती है। इसे लाल धागे में पिरोकर रविवार को “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करते हुए गले या दाएं बाजू में धारण करना चाहिए।

ग्यारह मुखी रूद्राक्ष— के अधिपति हनुमान जी हैं। यह निर्णय क्षमता बढ़ाता है। व्यापार और विदेश यात्रा में सहायक होता है। इसे एक दाने को लाल या पीले धागे में पिरोकर सोमवार को सूर्योदय से पूर्व इष्टदेव के मंत्र का जप करते हुए गले में पहनें।

बारह मुखी रूद्राक्ष—- भगवान सूर्य का प्रतिरूप है। इसके एक दाने को पीले धागे में पिरोकर सूर्योदय के समय “ॐ घृणि सूर्याय नम:” मंत्र के साथ गले में धारण करना चाहिए। इसे राजनीतिज्ञ, व्यापारी व यश चाहने वालों को पहनना चाहिए।

तेरह मुखी रूद्राक्ष—- कामदेव का प्रतिरूप है। इसे लाल या पीले धागे में पिरोकर “ॐ वज्रहस्ताय नम:” मंत्र का जप करते हुए गले में धारण करना चाहिए।

चौदह मुखी रूद्राक्ष— का अधिपति श्री नीलकंठ है। अति दुर्लभ और परम प्रभावशाली यह रूद्राक्ष साक्षात देव मणि है। इसे लाल धागे में पिरोकर सोमवार के दिन शिवलिंग से स्पर्श करके “ॐ नम: शिवाय:” मंत्र का जप करते हुए शिव के समक्ष गले में धारण करें।

!! ॐ नमः शिवाय !! बोलो हर हर महादेव !!
——————————————————————————————————————————————————-
राशि अनुसार ऐसे करें श्रावण में भगवान भोले नाथ की आराधना

मेष राशि:- अगर आपके पारिवारिक जीवन में समस्या है, दांपत्य सुख नहीं हैं, आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है तो श्रावण मास में हर रोज बेलपत्र पर लाल चंदन से नम: शिवाय लिखें। इसी मंत्र का जाप करते हुए जलाभिषेक करें। तत्पश्चात यह बेलपत्र शिवलिंग पर अर्पित कर दें। संपूर्ण कष्टों से छुटकारा मिलेगा।

वृषभ राशि:- वृषभ राशि वाले कार्य सिद्धि व लाभ प्राप्ति के लिए नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत सर्वप्रथम शिवलिंग गंगाजल और दही से अभिषेक करें। उसके बाद कच्चा दूध चढ़ाएं। तत्पश्चात जल की धारा के साथ द्वादश ज्योर्तिलिंगों के मंत्रों का उच्चारण करें। शिवलिंग पर श्वेत चंदन से तिलक करें और हारसिंगार के पुष्प अर्पित करें।

मिथुन राशि:- मिथुन राशि का स्वामी बुध और चंद्रमा के हमेशा आपस बैर रहा है। यदि आपकी जन्मकुंडली में चंद्रमा कमजोर है। आपकी मानसिक अवस्था अस्थिर रहती है। कारोबारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, कारोबार में बचत नहीं हो रही है तो श्रावण महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत हो स्नानोपरांत ऊँ नम: शिवाय का जाप करते हुए गंगाजल में श्रद्धानुसार शहद मिलाकर अभिषेक करें।

कर्क राशि:- कर्क राशि का स्वामी चंद्रमा जो भगवान शिव का प्रिय श्रृंगार हैं। जीवन में कोई भी समस्या हो उन समस्याओं के निवारण के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत हो स्नानोपरांत गंगाजल, दूध व मिश्री मिलाकर ऊँ चंद्र मोलेश्वराय नम: इस मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

सिंह राशि:- सिंह राशि वाले लोग शत्रु संबंधी समस्या का निवारण, वर्चस्व प्राप्ति, कारोबार में लाभ प्राप्ति एवं पारिवारिक सुख के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत श्रद्धानुसार शुद्ध देसी घी से ऊँ अनंनताय नम: मंत्र का जाप करते हुए भगवान शिव के शिवलिंग पर अभिषेक करें।

कन्या राशि:- कन्या राशि वाले लोग व्यवसाय में हानि से बचने, नौकार में सफलता पाने व पारिवारिक सुख के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत ऊँ त्रिमूर्तितेय नम: मंत्र का जाप करते हुए दूध, घी और शहद से अभिषेक करें।

तुला राशि:- तुला राशि वाले लोग दांपत्य सुख, व्यवसाय वृद्धि एवं संतान सुख के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत दही और गन्ने के रस से शिवलिंग पर ऊँ श्री कंठाय नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

वृश्चिक राशि:- वृश्चिक राशि वाले अपनी जीवन की संपूर्ण सफलता के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत तीर्थ स्थान के जल में दूध और शक्कर मिलाकर ऊँ नम: शिवाय कालं महाकाल कालं कृपालं ऊं नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

धनु राशि:- धनु राशि वाले मनोवांछित सफलता प्राप्त करने के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत गंगा जल, कच्चे दूध व केसर मिलाकर ऊँ महेश्वराय नम: इस मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

मकर राशि:- मकर राशि वाले व्यवसाय में सफलता, पारिवारिक जीवन सुख व मनोनुकूल कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत बादाम के तेल से ऊँ सर्वभूतहराय नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

कुंभ राशि:- कुंभ राशि वाले लोग परिवार में कष्ट हो, कारोबार में हानि हो, शारिरिक परेशानियों के निवारण हेतु श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत घी, शहद और शक्कर से ऊँ अव्यक्ताय नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

मीन राशि:- मीन राशि वाले संपूर्ण विघ् और परेशानियों के निवारण के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत कच्चे दूध, केसर और तीर्थ जल मिलाकर ऊँ सर्वलोक प्रजापतये नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

2 thoughts on “आइये जाने (Mahashivratri ) महाशिवरात्रि क्या हें..??क्यों प्रिय हें श्रावण मास शिव को..???—-

  1. महाशिवरात्रि उस पावन पर्व का नाम है जब भगवान शिव शंकर ने माता पार्वती से पाणिग्रहण संस्कार करा था ! हिंदू मान्यता बताती है कि त्रिमूर्ति में ब्रह्मा श्रृष्टि की रचना करते हैं, विष्णु उसका पालन, तथा शिव उसका संघार ! मानव स्वभाव कि चर्चा न करते हूए यह बताना ही पर्याप्त होगा कि भगवान शिव के विवाह को श्रृष्टि की प्रगति और विकास के लीये लाभकारी मानते हूए श्रधालु बड़ी धूमधाम, और जोश से इस पर्व को मनाते हैं !

    इस पर्व का महत्त्व इसलिए भी है कि इसमें पूजा करना अत्यंत लाभकारी माना गया है ! अविवाहित कन्या मंगलमय विवाह के लीये, विवाहित दंपत्ति संगतता समस्याओं के समाधान के लीये, तथा अन्य ईश्वर की अनुकंपा के लीये पूजा करते हैं !

    अब मुख्य विषय पर आते हैं ; शिवरात्रि, या महाशिवरात्रि कब मनाई जाती है, अर्थात क्या खगोलिक बिंदु हैं इस पर्व कि तिथि सुनिश्चित करने के लीये !

    Please Click & Read Full Post…>>>
    महाशिवरात्रि
    http://awara32.blogspot.com/2012/01/blog-post_11.html

    1. ..जे शिवशक्ति….
      बाबा महांकाल आप सभी का कल्याण करें , इसी कामना के साथ

      आपका अपना …
      डाक्टर पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री
      मोब.–09669290067
      (ज्योतिष,वास्तु एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ),
      मोनिधाम (मोनतीर्थ), गंगा घाट,
      संदीपनी आश्रम के निकट, मंगलनाथ मार्ग,
      उज्जैन (मध्यप्रदेश) -465006

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s