गणतंत्र दिवस पर कविता संग्रह—

गणतंत्र दिवस पर कविता संग्रह—

भारत माता अब गणतंत्र दान दो
सोए देश को एक नई पहचान दो

नंगों को कपड़ा, भूखों को अन्न दो
कुटिल,कामियों को बुद्धि दान दो

भ्रष्ट मति को सद्भावना ज्ञान दो
हमारा खोया सम्मान पुनर्दान दो

मरती स्वतंत्रता को जीवनदान दो
इस नवयुग को स्वाभिमान दान दो

सच्चे इतिहास को स्थान-दान दो
भारतवासी को गौरव-मणि दान दो

भूल चुके जो अस्तित्व संस्कृति का
उनको गणतंत्र का नया विधान दो

दुर्मति का मिटा नामोनिशान दो
भारत माता फिर-से तिरंगा तान दो

इस बार हमें सत्य-अहिंसा, शान दो
याद करे विश्व, ऐसा हमको ज्ञान दो

धनलोलुपों को करनी का इनाम दो
भारत माता अब गणतंत्र दान दो….।।
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फ़िर आया गणतंत्र दिवस
इस वर्ष नवल आह्वान करें,
आओ जन जन के मन में
अब राष्ट्र प्रेम का भाव भरें |

आज अहम् को करें किनारे
और स्वयं से बात करे ,
करे देशहित में कुछ चिंतन
करना होगा मन का मंथन |

उनसठ साल अब बीत गए
भारत जबसे गणतंत्र बना,
आओ सोच विचार करे अब
कितना तंत्र, स्वतंत्र बना ?

उन्नति पथ पर हुआ अग्रसर
भारत ने जब आजादी पाई,
कुछ तो अब भी शेष रह गया
आज़ादी पूरी ना मिल पाई |

आओ ख़ुद को देश से जोड़े
देश नही तो हम क्या हैं ?
राष्ट्र प्रेम में जो न समर्पित
फ़िर हम भारतवासी क्या हैं ?

दुःख दरिद्र मिटाए इससे
आतंक के साये का नाश करे,
भ्रष्ट , तंत्र के रखवालों से
अब सत्ता को आजाद करे |

जन जन से ही मिलकर बनता
प्रजातंत्र का ये नारा है ,
तो फ़िर हमने ही क्यों इसको
भूल, देश को दुत्कारा है ?

नए जोश से ओत-प्रोत हो
छब्बीस जनवरी खूब मनाई,
अब खेनी है देश की नौका
जाग युवा, अब बारी आई |

अब पुनः विचार जरूरी है
कुछ नव निर्माण जरूरी है,
जन मानस को आज जगा कर
फूंकना प्राण जरूरी है |

उठो!आज फ़िर इस अवसर पर
पुनः एक संकल्प करें ,
जब तक देश खुशहाल न होवे
तब तक ना विश्राम करें |

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें
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GANO KA TANTRA HO, EKTA KA MANTRA HO
HIMALAYA SAA VISHAAL HO, SAAGAR SAA UCHHAAL HO
PRATA KAN UDAYA HO, SAYAM KA VILAY HO
SHAKTI KI KENDRATA HO, DRADTATHA KI PRABALTA HO
PRATYEK BHARTIYA KA RASHTRIYA HRADAY HO
IS DIWAS PAR DESHBHAKTI KA SANKALP HO
INDRIYON KA VIJAYENDRA HO, TAPP KI DIGVIJAY HO
SAHAJATA KA ABHISHEK HO BALSHAALI VIVEK HO
TEJ ANUPAM HO LAHARATA PARCHAM हो
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तुम हो हिन्दू तो मुझे मुसलमां जान लो

तुम हो गीता तो मुझे कुरान मान लो

कब तक रहेगें अलग अलग और सहेगें ज़ुदा ज़ुदा

मैं तुम्हें पूंजू , तुम मुझे अज़ान दो

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गणतंत्र दिवस कविता (Republic Day India)

छुट्टी का एक और दिन !
एक और दिन
कोसने का ,
समाज़ को
रिवाज़ को
व्यवस्था और व्यवस्थापकों को
गंदगी को , नालियों को
अमीरी – गरीबी की खाई को
भ्रष्ट नेताओं की कमाई को

एक और दिन
जब निकाल सको अपनी भड़ास
इतिहास पर
अन्धविश्वास पर
उसूलों की ज़ंजीर पर
सड़क के फ़कीर पर
बिगड़ते युवाओं पर
बेरहम हत्याओं पर

एक और दिन
जब यह हिसाब हो
कि देश ने क्या क्या न किया
जब यह तय हो
कि कितने बरस बीत गये
और हम कितने आज़ाद हैं
जब एक और भाषण हो
एक प्रतीक का ध्वज लहराये
और सब को याद दिलाना पड़े
कि हम कितने महान हैं,
हम एक राष्ट्र हैं ।

एक और दिन
जब मुझे यह सोचना पड़े
कि क्या इस जगह पर मैं सुरक्षित हूँ ?
जब मैं भाग लूँ फ़िर से एक
‘सुरक्षित ‘ देश में
जहाँ पैसा और चैन मिले ।

एक और दिन
जब एक विस्फ़ोट हो
और उसकी धमक महीनों गूँज़े
और पुलिस , प्रशासन
जो कि नकारा है, इस सब के लिये
ज़िम्मेदार हो

एक दिन जब
हमें सब समझ में आ जाये
कि इस देश में क्या गलत हो रहा है
और कौन गलत कर रहा है
फ़िर हम चौपाल पर
यह निर्णय लें
कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता ।

एक और दिन
जब हम सोचें कि काश कोई नायक आये
और इन जुर्मों के सारे गुनहगारों को
एक लाइन में खड़ा करके खत्म कर दे ।
फ़िर बिजली के खंभे से
चोरी के कनेक्शन पर टीवी देखने
बैठ जायें
अपने घर में , जहाँ
वह सब कुछ है
जिससे चैन से जी सकें
सब कुछ है ,
बस,
एक आईना नहीं है ।
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गणतंत्र दिवस के अवसर पर एक ग़ज़ल
देश के कण कण से औ’ जन जन से मुझको प्यार है
जिसके दिल से ये सदा आए न वो गद्दार है ।१।

अंग अपना ही कभी था रंजिशें जिससे हुईं
लड़ रहे हम युद्ध जिसकी जीत में भी हार है ।२।

इश्क ने तेरे मुझे ये क्या बनाकर रख दिया
लौट कर आता उसी चौखट जहाँ दुत्कार है ।३।

है अगर हीरा तुम्हारे पास तो कोशिश करो
पत्थरों से काँच को यूँ छाँटना बेकार है ।४।

हों हवाओं में मनोहर खुशबुएँ कितनी भी पर
नीर से ही मीन की है जिंदगी, संसार है ।५।

तैरना तू सीख ले पानी ने लाशों से कहा
अब भँवर की ओर जाती हर नदी की धार है ।६।

देश की मिट्टी थी खाई मैंने बचपन में कभी
इसलिए अब चाहतों की खून से तकरार है ।७।

मारने वाला पकड़ में आ न पाया तो कहा
इन गरीबों पर पड़ी भगवान की ये मार है ।८।

हम हुए इतने विषैले हों अमर इस चाह में
कल तलक था कोबरा जो अब हमारा यार है ।९।

न्याय कैसे देख पाए आँख पर पट्टी बँधी
एक पलड़े की तली में अब जियादा भार है ।१०।
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गणतंत्र दिवस के अवसर पर एक ओजस्वी कविता
श्रम करके संध्या को घर में, अपने बिस्तर पर आया था!
उस दिन ना जाने क्यों मैंने, मन में भारीपन पाया था!!
जब आँख लगी तो सपने में लहराता तिरंगा देखा था!
राष्ट्र ध्वजा की गोद लिए, भारत माँ का बेटा था!!
जयहिंद का नारा बोल बोल के आकर वह चिल्लाये थे!
उस रात स्वंय बाबू सुभाष, मेरे सपने में आये थे!!
बोले भारत भूमि में जन्मा है, तू कलंक क्यों लजाता है!
राग द्वेष की बातो पर, क्यों अपनी कलम चलाता है!!
इन बातो पर तू कविता लिख, मै विषय तुम्हे बतलाता हूँ!
वर्तमान के भारत की मै,झांकी तुझे दिखाता हूँ!!
हमने पूनम के चंदा को राहू को निगलते देखा है !
हमने शीतल सरिता के पानी को उबलते देखा है!!
गद्दारों की लाशों को चन्दन से जलते देखा है!
भारत माता के लालों को शोलो पर चलते देखा है!!
देश भक्त की बाहों में सर्पों को पलते देखा है!
हमने गिरगिट सा इंसानों को रंग बदलते देखा है!!
जो कई महीनो से नही जला हमने वो चूल्हा देखा है!
हमने गरीब की बेटी को फाँसी पर झूला देखा है!!
हमने दहेज़ बिन ब्याही बहुओ को रोते देखा है!
मजबूर पिता को गर्दन बल पटरी पर सोते देखा है!!
देश द्रोही गद्दारों के चहरे पर लाली देखी है!
हमने रक्षा के सौदों में होती हुई दलाली देखी है!!
खादी के कपड़ो के भीतर हमने दिल काला देखा है!
इन सब नमक हरामो का,शेयर घोटाला देखा है!!
हमने तंदूर में नारी को रोटी सा सिकते देखा है!
लाल किले के पिछवाड़े, अवला को बिकते देखा है!!
राष्ट्रता की प्रतिमाओ पर,लगा मकड़ी का जाला देखा है!
जनपद वाली बस्ती में हमने कांड हवाला देखा है!!
आतंकवाद के कदमों को इस हद तक बड़ते देखा है!
अमरनाथ में शिव भक्तों को हमने मरते देखा है!!
होटल ताज के द्वारे, उस घटना को घटते देखा है!
माँ गंगा की महाआरती में, बम फटते देखा है!!
हमने अफजल की फाँसी में संसद को सोते देखा है!
जो संसद पर बलिदान हुए, उनका घर रोते देखा है!!
उन सात पदों के सूरज को भारत में ढलते देखा है!
नक्शलवाद की ज्वाला में, मैंने देश को जलते देखा है!!
आजादी के दिन दिल्ली,बन गई दुल्हनिया देखी है!
१५ अगस्त के दिन भोलू की भूखी मुनिया देखी है!!
हमने संसद के अन्दर राष्ट्र की भ्रस्टाचारी देखी है!
हमने देश के साथ स्वयं, होती गद्दारी देखी है!!
ये सारी बाते सपने में नेता जी कहते जाते थे!
उनकी आँखों से झर झर आंसू भी बहते जाते थे!!
बोले जा बेटे भारत माता के,अब तू सोते लाल जगा!
अभी वतन आजाद नही, आजाद हिंद तू फ़ौज बना!!
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बंगला मूल

जन गण मन

शब्दार्थ

जन गण मन अधिनायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
पंजाब सिन्ध गुजरात मराठा
द्राविड़ उत्कल बंग
विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा
उच्छल जलधि तरंग
तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशिष मागे
गाहे तव जय गाथा
जन गण मंगल दायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
जय हे जय हे जय हे
जय जय जय जय हे

अहरह तव आह्वान प्रचारित
शुनि तव उदार वाणी
हिन्दु बौद्ध शिख जैन
पारसिक मुसलमान खृष्टानी
पूरब पश्चिम आशे
तव सिंहासन पाशे
प्रेमहार हय गाँथा
जन गण ऐक्य विधायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
जय हे जय हे जय हे
जय जय जय जय हे

अहरह: निरन्तर; तव: तुम्हारा
शुनि: सुनकर

आशे: आते हैं
पाशे: पास में
हय गाँथा: गुँथता है
ऐक्य: एकता

पतन-अभ्युदय-बन्धुर-पंथा
युगयुग धावित यात्री,
हे चिर-सारथी,
तव रथचक्रे मुखरित पथ दिन-रात्रि
दारुण विप्लव-माझे
तव शंखध्वनि बाजे,
संकट-दुख-त्राता,
जन-गण-पथ-परिचायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे

अभ्युदय: उत्थान; बन्धुर: मित्र का
धावित: दौड़ते हैं

माझे: बीच में

त्राता: जो मुक्ति दिलाए
परिचायक: जो परिचय कराता है

घोर-तिमिर-घन-निविड़-निशीथे
पीड़ित मुर्च्छित-देशे
जाग्रत छिल तव अविचल मंगल
नत-नयने अनिमेष
दुःस्वप्ने आतंके
रक्षा करिले अंके
स्नेहमयी तुमि माता,
जन-गण-दुखत्रायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे

निविड़: घोंसला

छिल: था
अनिमेष: अपलक

करिले: किया; अंके: गोद में

रात्रि प्रभातिल उदिल रविछवि
पूर्व-उदय-गिरि-भाले,
गाहे विहन्गम, पुण्य समीरण
नव-जीवन-रस ढाले,
तव करुणारुण-रागे
निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा,
जय जय जय हे, जय राजेश्वर,
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे

– रवीन्द्रनाथ ठाकुर

प्रभातिल: प्रभात में बदला; उदिल: उदय हुआ

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11 thoughts on “गणतंत्र दिवस पर कविता संग्रह—

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    मला कविता फारच आवडल्या व मी त्या लिहुन घेतल्या
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  3. Manish Saini

    बहुत ही औजस्वी पूर्ण वर्तमान को दर्शाती हुई कविताएं हैं।

    आज सभी हिन्दुओ को मिलकर तिरंगे की रक्षा करनी होगी।

    हिन्दू धर्म और मातृभूमि की रक्षा करनी होगी।

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