सूर्य-नामाष्ट-शत-स्तोत्र—–

सूर्य-नामाष्ट-शत-स्तोत्र—–

।।पूर्व-पीठिकाःजनमेजय उवाच।।
कथं कुरुणामृषभः, स तु राजा युधिष्ठिरः। विप्रार्थमाराधीतवान्, सूर्यमद्भुत-दर्शनम्।।१

।।वैशम्पायन उवाच।।
श्रृणुष्वावहितो राजन्! शूचिर्भूत्वा समाहितः। क्षणं च कुरु राजेन्द्र! सम्प्रक्ष्याम्यशेषतः।।२
धौम्येन तु यथा पूर्वे, पार्थाय सु-महात्मने। नामाष्ट-शतमाख्यातं, तच्छ्रणुष्व महा-मते।।३
।।धौम्य उवाच।।
सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा, पूर्षाकः सविता रविः। गभस्तिमानजः कालो, मृत्युर्धाता प्रभाकरः।।१
पृथिव्यापश्च तेजश्च, खं वायुश्च परायणम्। सोमो बृहस्पतिः शुक्रो, बुधोऽङ्गारक एव च।।२
इन्द्रो विवस्वान् दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चर। ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च, स्कन्दो वै वरुणौ यमः।।३
वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः। धर्म-ध्वजो वेद-कर्त्ता, वेदांगो वेद-वाहनः।।४
कृतं त्रेता द्वापरश्च, कलिः सर्व-मलाश्रयः। कला काष्ठा मुहूर्ताश्च, क्षपा यामस्तथा क्षणः।।५
सम्वत्सर-करोऽश्वत्थः, काल-चक्रो विभावसुः। पुरुषः शाश्वतो योगी, व्यक्ताव्यक्तः सनातनः।।६
कालाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो, विश्व-कर्मा तमोनुदः। वरुणः सागरोंऽशुश्च, जीमूतो जीवनोऽरिहा।।७
भूताश्रयो भूत-पतिः, सर्व-लोक-नमस्कृतः। स्त्रष्टा संवर्तको वह्निः, सर्वस्यादिरलोलुपः।।८
अनन्तः कपिलो भानुः, कामदः सर्वतोमुखः। जयो विशालो वरदः, सर्व-धातु-निषेचिता।।९
मनः-सुपर्णो भूतादिः, शीघ्रगः प्राण-धारकः। धन्वन्तरिर्धूम-केतुरादि-देवोऽदितेः सुतः।।१०
द्वादशात्माऽरबिन्दाक्षः, पिता माता पितामहः। स्वर्ग-द्वारं प्रजा-द्वारं, मोक्ष-द्वारं त्रिविष्टपम्।।११
देह-कर्त्ता प्रशान्तात्मा, विश्वात्मा विश्वतोमुखः। चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा, नैत्रेयः करुणान्वितः।।१२

।।फल-श्रुति।।
एतद् वै कीर्तनीयस्य, सूर्यस्यामित-तेजसः। नामाष्ट-शतकं चेदं, प्रोक्तमेतत् स्वयम्भुवा।।१
सुर-गण-पितृ-यक्ष-सेवितं, ह्यसुर-निशाचर-सिद्ध-वन्तिम्। वर-कनक-हुताशन-प्रभं, प्रणिपतितोऽस्मि हिताय भास्करम्।।२
सूर्योदये यः सु-समाहितः पठेत्, स पुत्र-दारान् धन-रत्न-सञ्चयान्।
लभेत जाति-स्मरतां नरः सदा, धृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान्।।३
इमं स्तवं देव-वरस्य यो नरः, परकीर्तयेच्छुचि-सुमनाः समाहितः।
विमुच्यते शोक-दवाग्नि-सागराल्लभेत कामान् मनसा यथेप्सितान्।।४

उक्त स्तोत्र का पाठ करने के बाद नीचे लिखे मन्त्र को तीन बार ‘जप’ कर नमस्कार करे और भगवान् सूर्य को रक्त-पुष्प चढ़ाए।
“नमस्ते पद्म-हस्ताय, नमस्ते विश्व-धारिणे।
दिवाकर! नमस्तुभ्यं, प्रभाकर! नमोऽस्तु ते।।”
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इस रविवार को सूर्योदय से रात्रि तक लगातार बिना रुके, बिना कुछ खाए, बिना कुछ पिए, (कोशिश करना ऐसा कर सको नहीं तो फिर अपनी सुविधा से कर लेना )बिना जमीं को स्पर्श करे, बिना किसी और को स्पर्श करे, चलते फिरते उठते बैठते सभी गुरु भाई अपने इष्ट के बिज मंत्र का जाप करे …. ये अजपाजप आप संकल्प के साथ आरम्भ करे …. और फिर देखिये क्या होता है ? महाकाली जी के साधक KREEM वल्गा जी के HLREEM आदि का जाप करे ……… केवल एक ही मंत्र पकड़ ले २० घंटे के समय में आप सवा लाख मंत्र से ज्यादा का जाप कर लेंगे ….
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मकर संक्रांति 2012 ——————–
2012 में नए साल का पहला दुर्लभ योग बन रहा है। मकर संक्रांति पर्व पर 20 घंटे के लिए महासंयोग बनेगा।
सालों बाद संक्रांति पर सर्वार्थ सिद्धि, अमृत सिद्धि एवं रवि योग का महासंयोग बनेगा। ये तीनों योग सूर्योदय से रात 12.35 बजे तक करीब 20 घंटे रहेंगे। एक साथ ये तीनों शुभ योग होने से श्रद्धालुओं को लाभ मिलेगा।
इस शुभ पर्व पर उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र रहेगा जो कि सूर्य का ही नक्षत्र है। इस मकर संक्रांति पर सूर्य अपने नक्षत्र में रहकर ही राशि बदलेगा और मकर राशि में आ जाएगा। इस पर्व पर तीन शुभ योग और सूर्य के अपने ही नक्षत्र में होने के साथ ही रविवार भी रहेगा जो कि सूर्य देव का ही दिन रहेगा।
कब और कितनी बजे बदलेगा सूर्य——
14 जनवरी की रात को सूर्य 12:58 बजे मकर राशि में प्रवेश करेगा और 15 जनवरी की सुबह 7:14 बजे सूर्योदय से स्नान-दान के लिए पुण्यकाल शुरू होगा, जो शाम 4:58 बजे तक रहेगा।
क्या फल देते हैं ये तीन शुभ योग
अमृत सिद्धि योग: इस शुभ योग में किए गए किसी भी काम काम का पूरा फल मिलता है। इस शुभ योग में शुरू किए गए काम का फल लंबे समय तक बना रहता है।
सर्वार्थ सिद्धि योग: ज्योतिष के अनुसार इस योग में कोई भी काम करने से हर काम पूरा होता है। समस्त कार्य सिद्धि के लिए और शुभ फल प्राप्त करने के लिए यह योग शुभ माना जाता है। इस योग में खरीददारी करने का भी विधान है। ऐसा माना जाता है कि सर्वार्थ सिद्धि योग में खरीददारी करने से लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।
रवि योग: यह योग हर काम का पूरा फल देने वाला है। इस योग को अशुभ फल नष्ट कर के शुभ फल देने वाला माना जाता है। इस योग मे दान कर्म करना उचित माना जाता है। ये योग शासकीय और राजकीय कार्य के लिए भी महत्वपूर्ण है।
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According to the Puranas, on this day Surya(Sun) visits the house of his son Shani(Saturn), who is the lord of the Makar rashi(Zodiac Capricorn). Though the father and son duo did not get along well, the Surya made it a point to meet his son on this day. He, in fact, comes to his son’s house, for a month. This day thus symbolizes the importance of the special relationship between father and son.
Sakranti means to go from one place to another place (to change direction). It also means one meets another. The time when the sun changes direction from one constellation (of the zodiac) to another is known as Sankranti.

Transition of the Sun from Sagittarius to Capricorn during the winter solstice in the northern hemisphere (Uttarayana) is known as Makar sakranti.
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सभी मित्रों को परिवर्तन के महापर्व मकर संक्रांति व पोंगल की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ ।
ॐ लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः ।
वन्दे मातरम्
जय जयमाँ भारती ।
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इस बार क्यों खास है मकर संक्रांति?

जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तो मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण देवताओं का दिन माना गया है। इस दिन विशेष रूप से सूर्य की पूजा की जाती है। इस बार मकर संक्रांति के पर्व पर सर्वार्थ सिद्धि, अमृत सिद्धि के योग के साथ भानु सप्तमी होने से सूर्य की उपासना कर स्नान-दान पुण्य करने से सौगुना अधिक फल मिलेगा।
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शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कंबल दान मोक्ष की प्राप्त करवाता है। यथा-
माघे मासि महादेव यो दाद घृतकंबलम।
स भुक्त्वा सकलान भोगान अंते मोक्षं च विंदति॥
मकर संक्रांति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यंत शुभकारक माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गई है। सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किंतु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायक है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अंतराल पर होती है। भारत देश उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है। मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात भारत से दूर होता है। इसी कारण यहां रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है, किंतु मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अत: इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अंधकार कम होगा। अत: मकर संक्रांति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्यशक्ति में वृद्धि होगी। ऐसा जानकर संपूर्ण भारतवर्ष में लोगों द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना, आराधना एवं पूजन कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है। सामान्यत: भारतीय पंचांग की समस्त तिथियां चंद्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती हैं, किंतु मकर संक्रांति को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है। इसी कारण यह पर्व प्रतिवर्ष 14 जनवरी को ही पड़ता है।
मकर संक्रान्ति का ऐतिहासिक महत्व
माना जाता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं।
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सूर्य प्राण शक्ति देने वाले देवता है। हिन्दू धर्म के पांच प्रमुख देवताओं में शिव, शक्ति, श्री गणेश, विष्णु के साथ सूर्य भी शामिल है। सूर्य ही ऐसे देवता माने जाते हैं जो हर प्राणी और प्रकृति जगत की क्रियाओं और कार्य के साक्षी हैं।

इस कारण शक्ति और स्वास्थ्य के लिए नित्य सूर्य उपाना का महत्व बताया गया है। शास्त्रों में सूर्य की आराधना की अलग-अलग तरह से विधि बताई गई है।

सूर्य आराधना की ऐसी ही विधियों में सूर्य नमस्कार बहुत प्रभावी माना जाता है। सूर्य नमस्कार वास्तव में 13 चरणों का यौगिक व्यायाम है। सरल शब्दों में योग में बताए गए सांस पर नियंत्रण के साथ इसमें शारीरिक व्यायाम भी हो जाता है। इन क्रियाओं के साथ ही सूर्य नमस्कार के हर चरण में सूर्यदेव के मंत्रों को बोला जाता है।

इस तरह सूर्य नमस्कार योग, व्यायाम के साथ 13 मंत्रों के उच्चारण से मन की शांति और संतुलन, शारीरिक बल पाने की अद्भुत सूर्य साधना है। निरोगी तन, मन ही आत्मविश्वास बढ़ाकर ही कामयाबी सुनिश्चित करता है। यहां जानते हैं उन 13 असरदार सूर्य मंत्रों को, जो सूर्य नमस्कार के 13 चरणों में बोले जाते हैं –

1. स्थित प्रार्थनासन – ऊँ मित्राय नम:,
2. अर्द्धचन्द्रासन – ऊँ रवये नम:,
3. पादहस्तासन – ऊँ सूर्याय नम:,
4. एकपादप्रसारणासन – ऊँ भानवे नम:,
5. दण्डासन – ऊँ खगाय नम:
6. साष्टांग प्रणिपात – ऊँ पूष्णे नम:,
7. सर्पासन- ऊँ हिरण्यगर्भाय नम:,
8. पर्वतासन – ऊँ मरीचये नम:,
9. कपादप्रसारणासन – ऊँ आदित्याय नम:,
10. हस्तपादासन – ऊँ सवित्रे नम:
11. अर्द्धचन्द्रासन – ऊँ अर्काय नम:,
12. स्थित प्रार्थनासन – ऊँ भास्कराय नम:,
13. ऊँ सवितृ सूर्यनारायणाय नम:

यह सूर्य मंत्र भी बोलें –

आदित्यस्य नमस्कारान् ये कुर्वन्ति दिने दिने।

आयुप्र्रज्ञाबलं वीर्यं तेजस्तेषां च जायते।।

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