सिद्धि प्राप्ति के लिए गणेश उपासना अनिवार्य—-

सिद्धि प्राप्ति के लिए गणेश उपासना अनिवार्य—-

सर्वप्रथम पूजे जाने वाले मंगलमूर्ति भगवान श्री गणेश के पूजन-अर्चन से ही सभी प्रकार की गतिविधियों की शुरूआत आदिकाल से होती रही है। किसी भी प्रकार की साधना हो, गणेशजी का स्मरण करने के बाद ही इनकी सारी प्रक्रिया आरंभ होती है।
साधना के जरिए ईश्वर की कृपा प्राप्ति और साक्षात्कार के मुमुक्षुओं के लिए गणेश उपासना नितान्त अनिवार्य है। इसके बगैर न तो जीवन में और न ही साधना में कोई सफल हो सकता है। समस्त मांगलिक कार्यों के उद्घाटक एवं ऋद्धि-सिद्धि के अधिष्ठाता भगवान गणेश का महत्व वैदिक एवं पौराणिक काल से सर्वोपरि रहा है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात की लोक संस्कृतियों के संगम स्थल वाग्वर प्रदेश में भगवान श्रीगणेश के पूजन-अर्चन की अपनी खा़स परंपरा रही है। समूचे इलाके में गणेश प्रतिमाओं के चमत्कारिक स्वरूप, ऐतिहासिक संदर्भ तथा सांस्कृतिक परिवेश का वैविध्य गणेश उपासना को विशिष्टता प्रदान करता है।
चाहे श्वेतार्क गणेश हों अथवा चमत्कारिक गणेश प्रतिमाओं के साथ जुड़ी लोक किम्वदन्तियां, वागड़ क्षेत्रा के गणेश मन्दिरों एवं प्रतिमाओं के शिल्प-स्थापत्य का दर्शन समस्त मांगलिक प्रवृत्तियों के लिए आशातीत सफलताओं का शुभ संकेत है।
श्री गुरु चरणों की अनुकंपा प्राप्त कर साधना पथ की ओर अग्रसर होने वाले साधकों के लिए महागणपति की साधना नितान्त आवश्यक है क्योंकि जिस मार्ग पर चल कर हमें अपने लक्ष्य तक पहुंचना है उसमें आने वाले विघ्नों, अपसारण तथा कण्टाकीर्ण पथ को कुसुम-कोमल बनाने के लिए भगवान गणपति का मंगलमय आशीर्वाद प्राप्त कर लेना साधक का सर्वप्रथम कर्त्तव्य बन जाता है।
गणपति केवल विघ्न दूर करने वाले देव ही नहीं हैं वरन् ऋद्धि-सिद्धि के दाता, विद्याप्रदाता, मांगलिक कार्यों के पूरक, संग्राम-संकट के निवारक तथा सर्व विध मंगलकारी हैं। यौगिक साधना की पूर्ति में भी महागणपति की कृपा प्राप्ति अत्यावश्यक है।
गणेश उपासना पुरातन काल से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण रही है और इसीलिये सभी प्रकार की उपासना पद्धतियों में गणेशजी पर विस्तार से जानकारी का समावेश है। गणेश उपासना के अनेक प्रकार हैं। स्वतंत्र देव के अतिरिक्त इन्हें षट्कुमार, पंच बालक, सप्तबालक आदि गणों में भी सम्मिलित माना गया है।
गणपति की साधना के अनेक प्रकार हैं। पार्थिव गणेश प्रयोग 42 दिन तक किया जाता है। गणपति तर्पण प्रयोग भी अपने आप में अनेक कामनाओं की पूर्ति करने वाला है।
गणेश उपासना के अन्य प्रयोगों में एकाक्षर गणेश, हरिद्रा गणेश, विरिन्चि विघ्नेश, शक्ति गणेश, चतुरक्षर सिद्धि गणेश, लक्ष्मी गणेश, क्षिप्रप्रसादन गणेश, हेरम्ब गणेश, सुब्रह मण्याम गणेश, वक्रतुण्ड गणेश, उच्छिष्ट गणेश आदि के प्रयोग अति महत्त्वपूर्ण हैं।
इन मंत्रों के जाप, हवन और तर्पण के प्रयोगों के माध्यम से षट् कर्म सिद्धि, तिलक सिद्धि, अणिमादि अष्ट सिद्धि एवं स्वर्ण, यश, लक्ष्मी आदि की प्राप्ति के उपाय भी बताए गए हैं। इन्हीं में चूर्ण साधन, धूप साधन, यंत्र धारण एवं निर्माण आदि विद्याएं भी सम्मिलित हैं। पृथक-पृथक कार्य साधन के लिए गणेश जी की विविध पदार्थों की मूर्तियों के निर्माण का विधान है।
पौराणिक उक्ति ’’कलौ चण्डी विनायकों’’ के अनुसार कलियुग में गणेश साधना का ख़ास महत्त्व है। कलियुग में गणेशजी एवं चण्डी की साधना तत्काल कार्य सिद्ध करने वाली है।
गणपति की साधना गुरु या विद्वान ब्राह्मण से पूर्ण समझकर करने से सभी कार्यों की शीघ्र सिद्धि होती है। इसी प्रकार साधक को साधना काल में भी किसी भी प्रकार के आकस्मिक विघ्नों के उपस्थित हो जाने पर भगवान गणपति की मामूली साधना और स्मरण कर लिया जाना चाहिए।
गणेशजी की कृपा प्राप्ति के लिए इच्छुक व्यक्ति को चाहिए कि वह गणेशजी के किसी भी छोटे से मंत्र या स्तोत्र का अधिक से अधिक जप करे तथा मूलाधार चक्र में गणेशजी के विराजमान होने का स्मरण हमेशा बनाए रखे। इससे कुछ ही दिन में गणेशजी की कृपा का स्वतः अनुभव होने लगेगा।
गणेश प्रतिमाओं का दर्शन विभिन्न मुद्राओं में होता है लेकिन प्रमुख तौर पर वाम एवं दक्षिण सूण्ड वाले गणेश से आमजन परिचित हैं। इनमें सात्विक और सामान्य उपासना की दृष्टि से वाम सूण्ड वाले गणेश और तामसिक एवं असाधारण साधनाओं के लिए दांयी सूण्ड वाले गणेश की पूजा का विधान रहा है। तत्काल सिद्धि प्राप्ति के लिए श्वेतार्क गणपति की साधना भी लाभप्रद है। ऐसी मान्यता है कि रवि पुष्य नक्षत्रा में सफेद आक की जड़ से बनी गणेश प्रतिमा सद्य फलदायी है।
देश में गणेश उपासना के कई-कई रंग देखे जा सकते हैं। यहां की प्राचीन एवं चमत्कारिक गणेश प्रतिमाएं व मन्दिर दूर-दूर तक गणेश उपासना की प्राचीन धाराओं का बोध कराते रहे हैं।
सिद्धि विनायक जीवन के हर संग्राम में विजयश्री वरण कराने वाले देव रहे हैं। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार यह गणेश प्रतिमा सोलंकी वंश के राजा कर्ण के पुत्रा जयसिंह (सिद्धराज) ने मालवा के परमार राजा नरवर्मा को जीत कर इसकी प्रसन्नता में स्थापित की और मन्दिर बनवाया। इसी को अभिव्यक्त करता एक शिलालेख यहां अंकित है।
सिद्धि विनायक हर किसी की मनोकामना पूरी करते हैं। किसी भी प्रकार के संकट से मुक्ति पाने, मनोकामना पूर्ति आदि के लिए भक्तगण सिद्धि विनायक का स्मरण कर बाधा ले लेते हैं और फिर मनौतियां पूर्ण हो जाने पर मन्दिर आकर शुद्ध घृत का दीपक जलाते, अनुष्ठान करते एवं लड्डू चढ़ाते हैं।

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