मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष मोक्षदा एकादशी—

मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष मोक्षदा एकादशी—

मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहते हैं। इस दिन श्रद्धालु व्रत के साथ भगवान दामोदर की पूजा करते हैं। इस बार यह एकादशी 6 दिसंबर, 2011 ..मंगलवार को है।पुराणों के अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी मोक्षदा है। इसी दिन ‘गीता जयन्ती’ भी मनाई जाती है तथा इसी दिन दत्त जयन्ती भी होती है। इसी दिन भगवान कृष्ण ने मोहित हुए अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इस दिन गीता, श्रीकृष्ण, व्यास जी आदि का विधिपूर्वक पूजन करके गीता जयन्ती का उत्सव मनाया जाता है। मोक्षदा एकादशी एक मात्र ऐसा पर्व है, जो विष्णु के परम धाम का मार्ग प्रशस्त करता है। गीता जयंती साथ ही होने से इस पर्व का महत्व और अधिक बढ़ गया है। चूंकि एकादशी के दिन गंगा स्नान करने से सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है, अत: अनेक श्रद्धालु इस दिन गंगा जल में डुबकी लगाकर मोक्ष की कामना करेंगे। भागवत गीता पर प्रवचनों के कार्यक्रम कई जगह किए जाएंगे।भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश देते हुए स्वयं को महीनों में मार्गशीर्ष बताया है। इसका कारण केवल मोक्षदा एकादशी है। मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी वर्ष की ऐसी एक मात्र एकादशी है, जिस दिन गंगा स्नान से सीधे मोक्ष मिलता है। भगवान दामोदर की धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मण को भोजन कराकर दानादि देने से विशेष फल प्राप्त होता है। इस दिन व्रत करने से दुर्लभ मोक्ष पद की प्राप्ति होती है।धर्म ग्रंथों के अनुसार महाभारत के युद्ध के समय जब अर्जुन मोहग्रस्त हो गया था तब भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश देकर अर्जुन के मोह का निवारण किया था। उस दिन मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी थी तभी से इस एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान दामोदर की विधि-विधान से पूजा करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्षदा एकादशी पर श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए गीता के उपदेश से जिस प्रकार अर्जुन का मोहभंग हुआ था, वैसे ही इस एकादशी के प्रभाव से व्रती को लोभ, मोह, द्वेष और समस्त पापों से छुटकारा मिल जाता है। पद्म पुराण में ऐसा उल्लेख आया है कि इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से जाने-अनजाने में किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती है और पितरों को सद्गति मिलती है। माना जाता है कि इस व्रत की केवल कथा सुनने से ही हजारों यज्ञ का फल मिलता है।

व्रत कथा:—

01 .–पद्मपुराणमें भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं-इस दिन तुलसी की मंजरी, धूप-दीप आदि से भगवान दामोदर का पूजन करना चाहिए। मोक्षदाएकादशी बडे-बडे पातकों का नाश करने वाली है। इस दिन उपवास रखकर श्रीहरिके नाम का संकीर्तन,भक्तिगीत,नृत्य करते हुए रात्रि में जागरण करें।

मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन ही कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीताका उपदेश दिया था। अत:यह तिथि गीता जयंती के नाम से विख्यात हो गई। इस दिन से गीता-पाठ का अनुष्ठान प्रारंभ करें तथा प्रतिदिन थोडी देर गीता अवश्य पढें। गीतारूपीसूर्य के प्रकाश से अज्ञानरूपीअंधकार नष्ट हो जाएगा।

भगवान कहते हैं इस एकादशी का एक दिन का पुण्य प्राणी को नरक से मुक्ति प्रदान करने वाला है। इस संदर्भ में लीलाधारी श्रीकृष्ण ने जो कथा धर्मराज युधिष्ठिर को सुनायी वह यहां उल्लेख करने योग्य है। भगवान कहते हैं एक थे राजा वैखानस उनके राज्य में सभी सुख शांति से रहते थे। योगी, मुनी, सिद्ध संत सहित सभी जीव जन्तु बिना किसी भय के अपने अपने कर्म किया करते थे। इस प्रजापालक राजा ने एक रात स्वप्न में देखा कि पिता नर्क की यातनाएं भोग रहे हैं। राजा अपने पिता की यह दशा देखकर बेचैन हो उठा और सारी रात फिर सो नहीं सक। सुबह क्षितिज पर सूर्य की लालिमा दिखते ही वह ज्ञानी पंडितों के पास पहुचा और जो कुछ स्वप्न में देखा था कह सुनाया।राजा की बातें सुनकर पंडितों ने उन्हें त्रिकालदर्शी ऋषि पर्वत के पास जाने की सलाह दी। राजा पर्वत की कुटिया में जा पहुंचा और विनम्रता पूर्वक उनसे अपनी समस्या कह डाली। राजा की अधीरता और बेचैनी को देखकर महाज्ञानी पर्वत ने उन्हें बताया कि आपके पिता अपनी एक ग़लती की सजा भोग रहे हैं। उन्हें नर्क से मुक्त कराने के लिए आपको मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी मोक्षदा एकदशी करनी चाहिए। इस एकादशी का पुण्य आप अपने पिता को देवें तो आपके पिता नर्क से छूट सकते हैं। राजा ने विधि पूर्वक एकादशी का व्रत किया और प्राप्त पुण्य को पिता को अर्पित कर दिया। राजा वैखानस के पिता इस पुण्य से नर्क से मुक्त हो गये और स्वर्ग में उन्हें स्थान प्राप्त हुआ।

02 .–व्रत-कथा —
काफी समय पुरानी बात है, चम्पक नामक नगर में एक ब्राह्मण वास करता था। वहाँ का राजा वैखानस काफी दयालु था, वह अपनी प्रजा को संतान की तरह प्यार करता था। एक दिन राजा ने स्वप्न में देखा कि उनके पिता नरक में घोर यातनाएँ भुगत कर विलाप कर रहे हैं।राजा की नींद खुल गई। अब वह बेचैन हो गया। प्रातः उसने अपने दरबार में सभी ब्राह्मणों को बुलाया और स्वप्न की सारी बात बता दी। फिर सभी ब्राह्मणों से प्रार्थना की कि कृपा कर कोई ऐसा उपाय बताओ, जिससे मेरे पिता का उद्धार हो सके।ब्राह्मणों ने राजा को सलाह दी कि यहाँ से थोड़ी दूरी पर महा विद्वान, भूत-भविष्य की घटनाओं को देखने वाले पर्वत ऋषि रहते हैं, वे ही आपको उचित मार्गदर्शन दे सकेंगे।तत्काल राजा पर्वत ऋषि के आश्रम में गया और ऋषिवर को प्रार्थना की कि हे मुनि! कृपाकर मुझे ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरे पिता को मुक्ति मिल जाए। राजा की बात सुन ऋषि बोले, तुम्हारे पिता ने अपने जीवन काल में बहुत अनाचार किए थे, जिसकी सजा वे नरक में रहकर भुगत रहे हैं।यदि आप चाहते हैं कि आपके पिता की मुक्ति हो जाए तो आप मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष को आने वाली मोक्षदा एकादशी का उपवास करें। राजा वैखानस ने वैसा ही किया, फलस्वरूप उनके पिता को मोक्ष की प्राप्ति हुई। अतः जो भी व्यक्ति इस त्योहार को धारण करता है, उसे स्वयं को तो मोक्ष मिलता ही है, उसके माता-पिता को भी मोक्ष प्राप्ति होती है।

मोक्षदा एकादशी व्रत-विधान—मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष को आने वाली यह एकादशी जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त कराती है। इस व्रत को धारण करने वाला मनुष्य जीवन भर सुख भोगता है और अपने समय में निश्चित ही मोक्ष को प्राप्त होता है। मोक्ष दिलाने वाले इस दिन को मोक्षदा एकादशी भी कहते हैं।
इस दिन प्रातः स्नानादि कार्यों से निवृत्त होकर प्रभु श्रीकृष्ण का स्मरण कर पूरे घर में पवित्र जल छिड़ककर अपने आवास तथा आसपास के वातावरण को शुद्ध बनाएँ। पश्चात पूजा सामग्री तैयार करें।
तुलसी की मंजरी (तुलसी के पौधे पर पत्तियों के साथ लगने वाला), सुगंधित पदार्थ विशेष रूप से पूजन सामग्री में रखें। गणेशजी, श्रीकृष्ण और वेदव्यासजी की मूर्ति या तस्वीर सामने रखें। गीता की एक प्रति भी रखें। इस दिन पूजा में तुलसी की मंजरियाँ भगवान श्रीगणेश को चढ़ाने का विशेष महत्व है।
चूँकि इसी दिन श्रीकृष्ण ने अर्जुन को रणभूमि में उपदेश दिया था अतः आज के दिन उपवास रखकर रात्रि में गीता-पाठ करते हुए या गीता प्रवचन सुनते हुए जागरण करने का भी काफी महत्व है। पूजा-पाठ कर व्रत कथा को सुनें, पश्चात आरती कर प्रसाद बाँटें।

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