आज मोहर्रम पर निकालेंगे ताजिये— दिलों में बसे हुसैन–

आज मोहर्रम पर निकालेंगे ताजिये—

दिलों में बसे हुसैन–

हर वर्ष की भांति इस बार भी पैगम्बर ए इस्लाम हजरत मोहम्मद (स.अ.व.) साहेब के प्यारे नवासे हजरत इमाम हुसैन साहब की यादगार मोहर्रम यौम ए आशूरा पर विशाल जुलूस आज 6 दिसंबर,2011 को निकाला जाएगा. जुलूस में आगे-आगे परचम ए इस्लाम, अलम ए मुबारक तथा मातमी जत्थे होंगे. आशिकान ए हुसैन खुनी मातम भी करेंगे. जुलूस में चौराहों पर जगह जगह उलेमाओं की तकरीरे भी होंगी.
नम आंखों में किसी खास को खोने का गम और ढोल-ताशों से लगातार निकलती मातमी धुनें। इस गमगीन नजारे का सोमवार रात को जो भी गवाह बना, वो इमाम हुसैन को अपने दिल में बसाकर लौटा। सोमवार रात को मोहर्रम के तहत कत्ल की रात का कुछ इसी तरह का नजारा दिखाई दिया।इंसानियत के अलम बरदार, शेर करबला, शहीदे आजम हजरत इमाम हुसैन की यादगार मोहर्रम श्रद्घापूर्वक मनाया जा रहा है.आज योम ए आशूरा (दस मोहर्रम) को हर साल की तरह इस साल भी मोहर्रम का पारम्परिक जुलूस निकाला जाएगा. जिसमें अलम, ताजिए, सवारियों आदि शामिल होंगे. 5 दिसंबर की रात ताजिये निर्माण स्थल से निकलकर बाहर दर्शनार्थ रखे गए हे..
गिन्दोर गेट पर सबसे पहले मस्जिद पर ताजिया पहुंचा। इसी समय इमाम बाड़ों से ताजिये निकलने शुरू हुए। रात को सारे ताजिये अपनी-अपनी मस्जिदों पर पहुंचे तो संयुक्त मातम हुआ। शहर में मंगलवार को दोपहर दो बजे से ताजियों का जुलूस निकलेगा।मोहर्रम में सभी धर्म के लोगों को श्रद्धा है। ताजिये के नीचे से निकलकर जितनी संख्या में मुस्लिम महिलाएं अपने बच्चों को लेकर जाती हैं, उतनी ही संख्या में अन्य धर्म के लोग भी।
इस मुबारक मोके पर मोलवी साहब ने कहा की यह माह हमें सच्चाई, इंसाफ और नेक राह पर चलने वाले हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद दिलाता है। यह महीना हमें सच्चाई और इंसानियत की यादें ताजा कराता है।
हजारों में बनते हें ताजिये—ताजिये बनाने वाले लोग पहले बांस का बंदोबस्त करते हैं। फिर बांस को काटकर फंटियां बनाई जाती हैं और उनकी पतली-पतली तीलियों से तरह-तरह के आकार व साइज के ठाठ तैयार किए जाते हैं। इन कलात्मक ठाठों पर कागज की मढ़ाई की जाती है। खूबसूरत रेशों व डिजाइन के कागज, पन्नी, चमक, अवरक आदि से मढ़ाई कर ताजिये तैयार किए जाते हैं। कच्ची सामग्री काफी महंगी होने के बावजूद ताजिया बनाने वाले कारीगर अपने पुश्तैनी पेशे को जिंदा किए हुए हैं।
शहर में लगभग 5 लाख रूपए तक के ताजिये निकलेंगे। जुलूस में लगभग २५ बड़े ताजिये होंगे, जिसमें चांदी और अभ्रक का इस्तेमाल किया गया है। प्रत्येक में चार-पांच लाख रूपए का खर्च होने का अनुमान है। इसके अलावा 25 छोटे ताजिये में 50 हजार से एक लाख रूपए तक खर्च आया हैं। उधर, शिया समाज की ओर से मंगलवार को दोपहर दो बजे कर्बला में जंजीरी मातम किया जाएगा।
कानून व्यवस्था चक चोबंद—
पुलिस ने मोहर्रम पर मंगलवार को प्रदेश भर में कड़े सुरक्षा इंतजाम किए हैं। छह दिसम्बर को मोहर्रम व अयोध्या प्रकरण की तिथि एकसाथ आने पर प्रदेश में हाई अलर्ट किया गया है। झालावार-झालरापाटन में सोमवार को कत्ल की रात और मंगलवार को मोहर्रम पर कानून व्यवस्था व सुरक्षा इंतजाम को लेकर दो आरएएसी कम्पनियों तैनात की गई हैं। पुलिस लाइन, स्थानीय पुलिस कार्यालय के अफसर व स्टाफ को भी तैनात किया है।
आइये जाने क्या हे ताजिते और मुहर्रम—जब नए साल का चांद मुबारक नजर आया। इसके साथ ही इस्लामिक नववर्ष 1433 हिजरी की शुरुआत हो गई। समाजबंधुओं के लिए वर्ष का पहला माह मोहर्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी माह की 10 तारीख (6 दिसंबर) को यौमे आशुरा मनाया जाएगा। पैगंबर मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन की याद में यौमे आशुरा की रात ताजिये निकलें जाते हें ।
हिजरी सन् के नए साल के पहले चांद से मोहर्रम माह शुरू होता है। इसमें सातवें चांद पर मेहंदी की रस्म अदा की जाती है। आठवें दिन ताजिए के निर्माण का अंतिम कार्य किया जाता है। नवमी की रात को ताजियों का जुलूस निकाला जाता है। दसवें दिन ताजियों को ठंडा किया जाता है। लोग मन्नतें पूरी होने पर ताजिए बनवाते हैं। इनके द्वारा कई कई दिनों में ताजिए का निर्माण किया जाता है।
ऐसे बनते हैं: –मोहर्रम के पहले चांद से ताजिए का निर्माण शुरू हो जाता है। ताजिए के निर्माण में मुख्यत:: बांस, रंगीन कागज तथा गोद का उपयोग होता है। इन्हें बनाने में लगभग दो महीने लग जाते हें..इसका निर्माण मेहंदी की रस्म तक पूर्ण हो जाता है। मोहर्रम के दसवें चांद के दिन इन्हें जलाशयों में ठंडा किया जाता है।
बच्चों द्वारा सबीलों का निर्माण: ताजिए के जुलूस के दौरान जगह- जगह सबीलों का निर्माण किया जाता है। इसका निर्माण बच्चों तथा युवा द्वारा किया जाता है। सबीलों पर शरबत वितरण जाता है। जो जुलूस में लोगों को वितरित किया जाता है।
मेहंदी की रस्म आज: शहर में कल मेंहदी का जुलूस शनिवार को निकला । जो पुराने शहर के विभिन्न मार्ग से गुजरता हुआ गेपसागर झील पहुंचेगा। जहां मेहंदी की रस्म अदा की जाएगी। वहीं घाटी क्षेत्र में मन्नतों की मेहंदी का जुलूस निकलेगा। जो घाटी स्थित मदीना मस्जिद के पास इमाम बाड़े में पहुंचेगा, जहां मेहंदी की रस्म अदा होगी।
विसर्जन के पुख्ता इंतेजामात—- मोहर्रम के परम्रापगत विशाल जुलूस में सैकड़ों आकर्षक ताजियों के दर्शनार्थ हजारों लोगों के आने की उम्मीद का दृष्टिïगत रखते हुए इस बार कदीमी प्राचीन करबला मैदान,पुराणी तहसील चोक,च्प्दिया बाज़ार, सेठों का चोराहा एवं गोपाल घाट पर झालरापाटन प्रशासन के सहयोग से कमेटी की जानिब से बड़े पैमाने पर व्यवस्थाएं की गई है. सभी ताजिये , सवारियों अखाड़े, अलम मुबारक पहले प्राचीन करबला मैदान ही पहुँचेंगे और अपनी-अपनी मजहबी रसूमात पूरी करेंगे और इसके बाद ही सभी अपनी-अपनी अकीदत के अनुसार विसर्जन करेंगे. मोहर्रम का चांद नजर आते ही शहर में सभी ठिकानो पर जेसे – सभी अजाखानों इमामबाड़ो और प्राचीन करबला मैदान परम्परागत मजलिसों का सिलसिला चल रहा है. लखनऊ, दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, जयपुर, हैदराबाद, कलकत्ता, जावरा इत्यादि अनेक शहरों के प्रमुख उलेमा मजलिसों को संबोधित कर करबला की लोमहर्षक घटना का वर्णन कर रहे है. 8 दिसंबर को प्राचीन करबला मैदान में परम्परागत मजलिस ए सोयम होगी जिसमें हजारों श्रद्घालु इकट्ठे होकर नियाज ए हुसैन करेंगे और लंगर खिचड़ा (भंडार), तकसीम किया जाएगा..आज रात्रि को सभी ताजिये गोपाल घाट पहुंचेंगे जहा उन्हें परंपरा अनुसार ठंडा किया जायेगा…

मातमी जुलूस में गूंजीं या हुसैन की सदायें—अब से लगभग चौदह सौ वर्ष पहले नवासा-ए-रसूल इमाम हुसैन ने करबला के मैदान में अपनी और अपने जांनशीनों की कुर्बानियां दी थी। इसके तहत इस्लामिक साल के पहले माह मोहर्रम की दस तारीख तक मजलिस और मातम का दौर जारी रहता है।चांद दिखने के साथ ही नए इस्लामिक साल के मोहर्रम माह का आगाज हो जाता हें । मोहर्रम माह की पहली तारीख से ही शिया मुस्लिम समाज पैगंबर मौहम्मद साहब के नवासे और उनके जांनशीनों द्वारा करबला के मैदान में दी गई शहादत का गम मनाने में जुट जाते हें..।
चेहल्लुम पर नवासा-ए-रसूल इमाम हुसैन के मातमी जुलूस में या हुसैन.. या हुसैन की सदायें गूंजीं। शिया मातमदारों ने छुरियों से मातम कर खुद को लहूलुहान कर देते हें ।

करबला के शहीदों को करोड़ों सलाम—– डॉ. औसाफ शाहमीरी खुर्रम—-

करबला का वाकेआ (घटना) दुनिया की तारीख का एक ऐसा लोमहर्षक वाकेआ है, जो तेरह सौ साल का लंबा समय बीत जाने के बावजूद दुनिया वालों के दिलों से दूर न हो सका। हर साल मोहर्रम में इस वाकेआ की याद की जाती है और कयामत तक यह याद ताजा की जाती रहेगी। हजरत इमाम हुसैन अलेयहिस्लाम उच्च विचार, सादा जिंदगी और सच्चई का नमूना थे। वे इस्लाम के जनक पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्लाहो अलेहेवसल्लम के प्यारे नवासे, शेरेखुदा हजरत अली (रदि.) और हजरत फातिमा (रदि.) के बेटे थे। उन्होंने अपने नाना पैगंबर इस्लाम की गोद में नेकी और हक की तालीम हासिल कर परवरिश पाई। फिर यह कैसे मुमकिन हो सकता था कि हजरत इमाम हुसैन यजीद की नाइंसाफियों, गुरूर व बदकिरदारी देखकर चुप्पी साध लेते और अपना पाक हाथ यजीद के नापाक हाथों में देकर बेअत (अधीनता) कबूल करते।
हजरत इमाम हुसैन ने सच्चई और हक के लिए मैदाने करबला में न सिर्फ खुद जाम-ए-शहादत पीया, बल्कि इस्लाम की हिफाजत के लिए नन्हें-मुन्ने नौनिहालों, जिनके चेहरों से मासूमियत टपकती थी और अपने परिवार के 72 सदस्यों को कुरबान कर दिया। तारीख गवाह है कि ज्यों-ज्यों जुल्म-सितम बढ़ रहे थे, उनका चेहरा गुलाब के फूल की तरह खिलता जाता था और जुबान शुक्र इलाही अदा करती थी। इत्मीनाने कल्ब में इजाफा हो रहा था। यही वह दो चीजें हैं, जहां मोमिन-ए-कामिल की अजमत का अंदाजा होता है। देखा गया कि जिनके काम बड़े, उनका नाम बड़ा और जिनके नाम बड़े, उनकी अजमत बड़ी, मगर यह श्बात भी है कि दुनिया और दुनिया की सारी बातें इधर हुईं और उधर मिटीं, लेकिन दुनिया के काम अगर खुदा के लिए हों, तो यह काम ऐसे हैं, जिनका नाम किसी के मिटाए नहीं मिटता। जो खुदा का हो गया, खुदा उसका हो गया। यह उसी वक्त हो सकता है, जब इंसान अपनी जिंदगी और मौत, सब कुछ खुदा के हवाले कर दे। वैसे भी, न सिर्फ इस्लाम, बल्कि दुनिया के हर मजहब का बड़ा उसूल कुरबानी है और फितरत का भी बड़ा उसूल यही है। खेत में गेहूं का एक दाना अपने आपको मिटा देता है, तो खुदा उस दाने में से सैकड़ों बालियां पैदा कर देता है।

हजरत इमाम हुसैन ने भी अपनी पूरी जिंदगी खुदा के हुक्मों को पूरा करने में गुजारी, वह खुदा के हो गए थे और खुदा उनका हो गया और आखिरी वक्त में भी इमाम हुसैन ने अपनी, अपने परिजनों व साथियों की खुदा की राह में कुरबानी देकर यह बता दिया कि हक पर जान देना जिंदा जावेद (अमर) हो जाना है। जिस समय करबला के मैदान में यजीद की असंख्य फौज हथियारों से लैस इस्लाम को मिटाने के लिए सामने खड़ी थी, इमाम हुसैन ने निडरता से सच्चई की पताका फहराई, क्योंकि जो हक के लिए लड़ता है, उसे सिर्फ खुदा का खौफ होता है। उसे दुनिया की कोई ताकत क्या डरा सकती है और क्या लालच दे सकती है। प्यारे नबी (सल्ल.) के लख्ते जिगर इमाम हुसैन ने अपनी कुरबानी पेश करके हक की राह में इंसान को जान देने का तरीका सिखा दिया।

तारीख-ए-इस्लाम के वह सुनहरे पन्ने, जिनमें इमाम हुसैन के बहादुराना कारनामे दर्ज हैं, कभी भी हमारे दिमागों से नहीं उतर सकते। करबला की घटना के दौरान जितनी मुसीबतें, परेशानियां, जुल्म, ज्यादती इमाम हुसैन और उनके परिजनों ने बर्दाश्त की हैं, यहां तक कि करबला के तपते हुए रेगिस्तान में इमाम हुसैन के प्यासे बच्चों को एक-एक बूंद पानी से भी मेहरूम कर दिया गया और नन्हें-मुन्ने बच्चों के जिस्मों को तीरों से छलनी कर दिया गया। सिर्फ इसलिए कि इमाम हुसैन हक परस्त थे। वह उन उसूलों को जिंदा रखना चाहते थे, जिन्हें लेकर प्यारे नबी (सल्ल.) दुनिया में आए थे। यजीद ने इंसानियत के चेहरे को जिस तरह दागदार किया है, उसका वर्णन सुनकर ही इंसानों के सिर शर्म से झुक जाते हैं। ऐ-इमाम हुसैन, आप पर दुनिया के सभी इंसानों के लाखों-करोड़ों सलाम कि आपने करबला के तपते हुए मैदान में अपना पाक खून बहाकर इस्लाम के तनावर दरख्त को हमेशा-हमेशा के लिए हरा-भरा कर दिया। आपने दुनिया को यह दिखा दिया कि बहादुरी, ईमानदारी, सच्चई और हक परस्ती की जिंदगी का एक पल बेईमानी की जिंदगी के लाखों सालों से बेहतर है।

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