जानिए अंक ज्योतिष का इतिहास—

जानिए अंक ज्योतिष का इतिहास—
अंक ज्योतिष का सर्वप्रथम उल्लेख वैदिक शास्त्रों में मिलता है। वराहमिहिर द्वारा रचित वराहमिहिर संहिता में इस पर काफी प्रकाश डाला गया है। हालांकि आधुनिक अंकशास्त्र का जनक ग्रीक गणितज्ञ पाइथागोरस को माना जाता है। पाइथागोरस ने अंक ज्योतिष को पवित्र व गुप्त ज्ञान मानते हुए लिपिब° करने से मना कर दिया था। वह अपने शिष्यों मौखिक रूप से इस विद्या का ज्ञान देते थे। उनके बहुत बाद जर्मन विद्वान कीरो ने सबसे पहले अंक ज्योतिष को लिपि बध्द किया। अंक ज्योतिष व ज्योतिष शास्त्र साथ-साथ विकसित हुए, लेकिन दोनों की गणना में फर्क है। अंक ज्योतिष में काफी तीव्र गति से गणना हो जाती है जबकि ज्योतिष शास्त्र में अधिक समय लगता है।

अधिकतर सभ्यताओं में लिपि के अक्षरों को ही अंक माना गया। रोमन लिपि के अक्षर I को एक अंक माना गया क्योंकि यह शक्ल से एक उंगली जैसा है। इसी तरह II को दो अंक माना गया क्योंकि यह दो उंगलियों की तरह है। रोमन लिपि के अक्षर V को 5 का अंक माना गया। यदि आप हंथेली को देखे जिसकी सारी उंगलियां चिपकी हो और अंगूंठा हटा हो तो वह इस तरह दिखेगा। रोमन X को उन्होंने दस का अंक माना क्योंकि यह दो हंथेलियों की तरह हैं। L को पच्चास, C को सौ, D को पांच सौ और N को हजार का अंक माना गया। इन्हीं अक्षरों का प्रयोग कर उन्होंने अंक लिखना शुरू किया। इन अक्षरों को किसी भी जगह रखा जा सकता था। इनकी कोई भी निश्चित जगह नहीं थी। ग्रीक और हरब्यू (Hebrew) में भी वर्णमाला के अक्षरों को अंक माना गया उन्हीं की सहायता से नम्बरों का लिखना शुरू हुआ।

नम्बरों को अक्षरों के द्वारा लिखने के कारण न केवल नम्बर लिखे जाने में मुश्किल होती थी पर गुणा, भाग, जोड़ या घटाने में तो नानी याद आती थी। अंक प्रणाली में क्रान्ति तब आयी जब भारतवर्ष ने लिपि के अक्षरों को अंक न मानकर, नयी अंक प्रणाली निकाली और शून्य को अपनाया। इसके लिये पहले नौ अंको के लिये नौ तरह के चिन्ह अपनाये जिन्हें 1,2,3 आदि कहा गया और एक चिन्ह 0 भी निकाला। इसमें यह भी महत्वपूर्ण था कि वह अंक किस जगह पर है। इस कारण सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि सारे अंक इन्हीं की सहायता से लिखे जाने लगे और गुणा, भाग, जोड़ने, और घटाने में भी सुविधा होने लगी। यह अपने देश से अरब देशों में गया। फिर वहां से 16वीं शताब्दी के लगभग पाश्चात्य देशों में गया, इसलिये इसे अरेबिक अंक कहा गया। वास्तव में इसका नाम हिन्दू अंक होना चाहिये था। यह नयी अंक प्रणाली जब तक आयी तब तक वर्णमाला के अक्षरों और अंकों के बीच में सम्बन्ध जुड़ चुका था। जिसमें काफी कुछ गड़बड़ी और उलझनें (Confusion) पैदा हो गयीं।

इस कारण सबसे बड़ी गड़बड़ यह हुई कि किसी भी शब्द के अक्षरों से उसका अंक निकाला जाने लगा और उस शब्द को उस अंक से जोड़ा जाने लगा। कुछ समय बाद गड़बड़ी और बढ़ी। उस अंक को वही गुण दिये जाने लगे जोकि उस शब्द के थे। यदि वह शब्द देवी या देवता का नाम था तो उस अंक को अच्छा माना जाने लगा। यदि वह शब्द किसी असुर या खराब व्यक्ति का था तो उस अंक को खराब माना जाने लगा। यहीं से शुरू हुई अंक विद्या:इसका न तो कोई सर है न तो पैर, न ही इसका तर्क से सम्बन्ध है न ही सत्यता से। यह केवल महज अन्धविश्वास है।

हर अंक एक ग्रह से है सम्बंधित—

यह जीवन अंकों से संचालित है। जब कोई बच्चा जन्म लेता है तो उसका नामकरण कुछ दिनों बाद होता है, लेकिन जन्मतिथि के रूप में अंक उसके जन्म लेते ही जुड़ जाते हैं। इससे भी पहले जब वह गर्भ में पल रहा होता है तब भी अंकों (महीना) के आधार पर उसके जन्म लेने की उल्टी गिनती शुरू हो जाती है। कहने का तात्पर्य यह कि गर्भ में आने से लेकर मृत्यु पयøत मानव जीवन अंकों द्वारा ही संचालित होता है। अंकशास्त्री इसे अंकज्योतिष या न्यूमरोलॉजी कहते हैं। आपकी जन्म तिथि न केवल आपके स्वभाव को दर्शाती है, बल्कि आपकी सेहत से लेकर भविष्य तक का संकेत देती है।
अंकशास्त्र में हर अंक किसी न किसी ग्रह से संबंद्ध है। अंक ज्योतिष में 1 से लेकर 9 तक की संख्या ग्रहों, उनकी दशा और उनके लक्षण को दर्शाता है। आपकी जन्मतिथि यदि 1 से 9 तक है जो वह अंक आपका मूलांक है, लेकिन यदि अंक 9 से अधिक है तो दोनों अंकों के जोड़ से जो अंक प्राप्त होगा उसे मूलांक माना जाएगा। उदाहरण के लिए यदि आपकी जन्म तिथि 14 (1+4) है तो मूलांक पांच होगा। इसी तरह पूरी जन्म तिथि को जोड़ने से जो अंक प्राप्त होगा, उसे अंक शास्त्र में भाग्यांक कहते है। उदाहरण के लिए यदि आपकी जन्म तिथि 14 नवंबर 1977 है तो आपका भाग्यांक(1+4+1+1+1+9+7+7) 4 होगा। मूलांक जहां व्यक्ति के चरित्र को दर्शाता है, वहीं भाग्यांक भविष्य की घटनाओं का संकेत देता है।

मूलांक बनाम भाग्यांक—
अंकशास्त्र में मूलांक व भाग्यांक दोनों की गणना का प्रभाव है। यदि किसी व्यक्ति का भाग्यांक उसके मूलांक से अधिक प्रबल है तो मूलांक अपना चरित्र करीब-करीब खो देता है, लेकिन यदि मूलांक भाग्यांक से अधिक प्रबल है तो भाग्यांक उस पर अधिक हावी नहीं हो पाता है।

अंकों की बहुतायत से स्वभाव में परिवर्तन—
किसी के जन्म तिथि में एक अंक दो से अधिक बार आता है तो वह अंक व उसका मालिक ग्रह अपने मूल चरित्र को छोड़कर विपरीत अंक व उसके मालिक ग्रह के चरित्र को अपना लेता है। स्वभावत: 8 अंक वाले अंतरमुखी होते हैं, क्योंकि उनका मालिक शनि ग्रह है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति 8 अगस्त 2008 को पैदा हुआ हो तो वह बहिमुखी होगा। क्योंकि उसके जन्मतिथि में 8 की बहुतायत के चलते वह विपरीत अंक 4 व उसके मालिक ग्रह राहु की चारित्रिक विशेषता को अपना लेगा, जिस कारण उसका स्वभाग बहिर्मुखी हो जाएगा।

दो व्यक्तियों के स्वभाव का मिलान—-
शादी के वक्त अक्सर दो लोगों की ज्योतिषीय कुण्डली मिलाई जाती है। अंक शास्त्र में यह और भी आसान है। अंक शास्त्र में जन्मतिथि के आधार पर दो लोगों के स्वभाग व भविष्य की तुलना आसानी से की जाती है। मान लीजिए यदि दो व्यक्तियों की जन्मतिथि, माह व वर्ष में कोई एक अंक दो से अधिक बार आ रहा है तो दोनों में किसी भी सूरत में नहीं निभ सकती है। ऐसे व्यक्तियों की आपस में शादी न हो तो ही बेहतर है।

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अगर आप एक्सीडेंट और अनहोनी से बचना चाहते हैं तो आपको अपने व्हीकल के नंबर पर ध्यान जरूर देना चाहिए। ऐसा देखने में आता है कि कई लोग जो सावधानी से ड्राइव करते हैं फिर भी दूसरे की गलती और असावधानी के कारण एक्सीडेंट हो जाता है। ऐसा भी होता है कि आप अपने व्हीकल पर बहुत खर्चा कर देते हैं फिर भी आपका वाहन साथ नही देता, उसमें कुछ न कुछ खराबी जरूर आ जाती है।

अगर आप अपनी गाड़ी का नंबर अंक ज्योतिष के अनुसार रखें तो ऐसी परेशानियों से बच जाएंगे और भविष्य में होने वाली दुर्घटनाएं भी टल जाएगी। जानिए अंकज्यातिष के अनुसार कैसा होना चाहिए आपका गाड़ी नंबर..

अंक- 1 अगर आपकी जन्म दिनांक 1,10,19,और 28 है तो इस अंक वालों को अपने व्हिकल के नंबर ऐसे रखना चाहिए जिनका का कुल योग 1, 2, 4 या 7 आता हो।

अंक- 2 2,11,20, और 29 तारीख को जन्म लेने वाले लोगों के लिए वो वाहन अनुकूल है जिनके नंबर का कुल योग 1, 2, 4 या 7 हो।

अंक-3 जिन नंबर का कुल योग 3,6, या 9 होता है ऐसे नंबर 3,12,21 और 30 तारीख को जन्में लोगों के लिए भाग्यशाली होते हैं।

अंक-4 4,13,22, 31 तारीख वाले जातकों इस अंक वालों की गाड़ी नंबर का कुल योग 1, 2, 4 या 7 होना चाहिए।

अंक-5 5,14,और 23 तारीख वाले जातकों को अपना गाड़ी नंबर ऐसा रखना चाहिए जिसका कुल योग 5 हो।

अंक-6 जिनका जन्म 6,15,24, तारीख को हुआ है उन्हे अपने मूलांक 6 के अनुसार ऐसा गाड़ी नंबर रखना चाहिए जिसका का कुल योग 3, 6, या 9 आता हो।

अंक -7 7,16,25, तारीख को जन्में लोग अपनी गाड़ी नंबर ऐसा रखें जिसका कुल योग 1, 2, 4 या 7 हो।

अंक-8 8,17,26, तारिख को जन्म लेने वाले लोग अपना गाड़ी नंबर का कुल योग 8 रखें ।

अंक-9 ऐसे लोग जिनका जन्म किसी भी महीने की 9,18 या 27 तारिख को हुआ है वो लोग मूलांक 9 के अनुसार अपनी गाड़ी के नंबर का कुल योग 9, 3, या 6 रखें तो उन्हे अच्छा लाभ मिलता है।

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आइये जाने अंक/नम्बर “5″ की महिमा !—-

पंच तत्व: धरती, आकाश, जल, अग्नि और वायु…5 एक prime नंबर है; 5 वक्त नमाज़ पढ़ी जाती है, Jesus Christ के 5 घावों का ज़िक्र है.. पंचमुखी शिव: अघोड़, ईशान, तत्पुरुष, वामदेव(वर्ण देव), रुद्र !!

सिख धर्म में पाँच चिन्ह – केश कड़ा कंघा कच्छा और कृपाण..पंज प्यारे (सिख धर्म से संबंधित है)..पंचरंगा अचार !!..पांच परमेष्ठी होते है: अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधू..पंचशील के सिद्धांत …..मन्त्र पंचाछर ….नम: शिवाय

पञ्च महाभूत.. .आकाश वायु अग्नि जल पर्थिवी
पांच ग्यानेंदियाँ ..श्रवन त्वचा नेत्र जिव्हा नासिका
पञ्च वायु …प्राण अपान व्यान उदान समान..
पांच इन्द्रियाँ हाथ पैर मुख गुदा मुतेंद्रिय ..
पांच उपप्राण ..नाग कूर्म करकल देवदत्त धनञ्जय
धनवान के पांच शत्रु ..राजा चोर उत्तराधिकारी सेवक और क्षय रोग
पांच नियम .सत्य अहिंसा अस्तेय चोरी न करना, ब्रमचर्य.

पंचामृत: दूध, दही, घी, शक्कर, शहद का मिश्रण…

पाँच महासागर (प्रशान्त महासागर, अन्ध महासागर, उत्तरध्रुवीय महासागर, हिन्द महासागर, दक्षिणध्रुवीय महासागर)…

पांच अशुभ नक्षत्र ,पांच शील ,पांच महाशब्द ,पांच द्रविड़ ,पांच जकार पांच आदरणीय राजा ऋत्विक स्नातक गुरु श्वसुर..

पञ्च मुखी रुद्राक्ष पञ्च देवो(विष्णु,शिव,गणेश,सूर्य और देवी)का स्वरुप है…. पंचतंत्र – मित्रभेद, मित्रलाभ, ककोलुकियम, लब्ध्प्रनासम, अपन्क्सितकारकम

पञ्च मकार: मॉस, मतस्य, मुद्रा, मदिरा और मैथुन तांत्रिक क्रिया के पञ्च मकार हैं….

पञ्च प्रयाग ..पञ्च स्थान कर्म ..पांच जित नीति ,पञ्च गव्य , छत्रिय के पांच कर्तव्य ..वैश्य के धन के पांच विभाजन ब्रामण के पांच करने कर्तव्य .शरीर के पांच स्थान कर्म ,पांच कालायें ,पांच वर्ग अक्छर के,मनुष्य के पांच गुरु ,कामदेव के पांच बाण….

पंच पक्षी विचार (Panch Pakshi Vichar) = पंक्षी वर्गकूट के अन्तर्गत बताया गया है कि पंक्षी पांच प्रकार के होते हैं जो क्रमश: इस प्रकार है: 1. गरूड़(Garud) 2.पिंगल(Pingal) 3.काक(Kak) 4.कुक्कुट(Kukut) 5.मोर(Moor)। इन पॉचो पंक्षी वर्ग में नक्षत्रों को बॉटा गया है,:
1.गरूड़- अश्विनी, आर्द्रा, पू.फा., विशाखा, उ.षा.
2.पिंगल- भरणी, पुनर्वसु, उ.फा., अनुराधा, श्रवण
3.काक- कृतिका, पुष्य, हस्त, ज्येष्ठा, घनिष्ठा
4.कुक्कुट- रोहिणी, आश्लेषा, चित्रा, मूल, शतभिषा
5.मयूर- मृगशिरा, मघा, स्वाती, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद, उ.भा. और रेवती

पांच को लेकर कुछ भ्रांतियां :—-
जैसे लोगों का समझना की पांच पतियों की पत्नी होने से द्रोपदी का नाम पांचाली पडा जबकि वो इसलिए था क्योंकि वो पांचाल नरेश की पुत्री थी….ऐसे ही मात्र पांच शब्द से जुड़े नाम जिनका 05 संख्या से कोई लेना देना नहीं है
पंचजन्य(कृष्ण के शंख का नाम ),पंचांग ,पञ्चतंत्र,पंचनामा|…..

साम, दाम, दंड, भेद, भय (कार्य करने या काम निकलवाने के पाँच रास्ते)…

संयुक्त राष्ट्र में वीटो पॉवर वाले पाँच देश: अमरीका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ़्रांस….

पांच उँगलियाँ, पांच हैं सागर अति विशाल,
पांच सितारा होटल में, पञ्च मेल की दाल,
पञ्च मेल की दाल खा गए पांडव न्यारे,
पांच चिन्ह दे गए हैं हमको पंज पियारे,
पञ्च तत्व, पंजाब और पंचामृत को जांच,
ओलम्पिक के खेल में भी हैं छल्ले पांच.

काम क्रोध मद मोह और लोभ हैं पञ्च विकार,

साम दाम दंड भेद भय ये हैं पञ्च उपचार,
ये हैं पञ्च उपचार, पांचवा साल चुनावी,
व्यास, चिनाब, झेलम अपनी सतलुज रावी,
पञ्च प्रचारक पोस्ट की भली करें श्री राम,
तीन पांच काफी हुआ करते हैं अब काम.

किसी शायर की नजर में: पतझर सावन बसंत बहार एक बरस के मौसम चार मौसम चार ; पांचवा मौसम प्यार का….

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