शुभ -अशुभ प्रभाव, शनि देव के गोचर के( saturn ‘s transit )—

शुभ -अशुभ प्रभाव, शनि देव के गोचर के( saturn ‘s transit )—
आगामी 15 नवम्बर,2011 ( मंगलवार) से शनि देव मिथुन केचंद्रमा कालीन प्रातः 10 बजकर 11 मिनट पर तुला राशी में प्रवेश(गोचर) करेंगे…
तत्पश्चात 22 मार्च,2012 तक (संवत 2068 के अंत तक) तुला राशी में ही शनि देव का संचार होगा…अभी वे मार्गी हें 13 जून,2011 से 06 फरवरी,2012 तक मार्गी ही रहेंगे..फिर 07 फरवरी,2012 से संम्वात्सर के अंत तक वक्री अवस्था में हितुला राशी में ही भ्रमण(संचार/गोचर) करेंगे…
ध्यान रहे की जब भी शनि देव किसी राशी में अशुभ होकर वक्री हो तो जातक को मानसिक एवं शारीरिक कष्ट,बीमारी/रोग,आर्थिक परेशानी जेसे लक्षण/प्रभाव दिखाई देते हें…समाज में भी कही राजनितिक टकराव,अव्यवस्था,अत्यधिक महंगाई,हिंसक घटनाएँ,असंतोष,अस्थिरता,भूकम्प,अकाल,कठोर /गंभीर रोग का भय ,उपद्रव जेसी प्राकृतिक आपदाओ का डर एवं असुरक्षा का वातावरण बनता हें..
शनि की साढ़े सटी एवं शनि की ध्या के प्रभावस्वरूप जातक को पारिवारिक और व्यवसाय सम्बन्धी परेशानियाँ,शारीरिक और मानसिक कष्ट,आय कम और खर्चा अधिक ( आर्थिक परेशानियाँ),बनाते कार्यों में विघ्न-बाधाएं आदि/जेसे अशुभ फल/प्रभाव नजर आने लगते हें…

नवग्रहों में शनि की महत्ता से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है. बड़े से बड़ा सूरमा हो या राजे-महाराजे सभी शनिदेव की दृष्टि मात्र से भयभीत रहते हैं. यही कारण है कि हम सभी शनिदेव की प्रसन्नता की कामना करते हैं और इसके लिए उनकी पूजा, उपवास, दान एवं अन्य ज्योतिषीय उपाय करते हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि शनि भयकारी ग्रह नहीं हैं बल्कि यह कर्म के देवता हैं. वैदिक साहित्य की मानें तो शनि देव को नवग्रहों में दंडाधिकारी का पद प्राप्त है और व्यक्ति के कर्मों के अनुरूप यह कुण्डली में विराजमान होकर व्यक्ति को उनके कर्मों का फल देते है. नवग्रहों में शनि को सर्वाधिक शक्तिशाली ग्रह के रूप में जाना जाता है.शनि भाग्य का निर्माता है तो भाग्य को अभाग्य में बदलने की क्षमता भी रखता है.शनि को ज्योतिषशास्त्र में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है.आइये देखें कि शनि देव गोचर (Transit of Shani) में किस प्रकार से फल प्रदान करते हैं.

ज्योतिष विधा के अनुसार शनिदेव जब गोचर में चन्द्र राशि से द्वादश भाव में आते हैं एवं द्वितीय भाव की राशि में रहते हैं तो साढ़े साती की अवधि कहलाती है (Shani’s sade sati starts when Saturn enters the 12th sign from the Moonsign). साढ़े साती की भांति ढैय्या भी काफी महत्वपूर्ण होती है.ढैय्या की अवधि वह होती है जब चन्द्र राशि से शनि चतुर्थ एवं अष्टम में होता है.गोचर मे शनि जब साढ़े साती अथवा ढैय्या के रूप में किसी व्यक्ति के जीवन में प्रवेश करता है तो लोग भयानक अनिष्ट की शंका से भयभीत हो उठते हैं.जबकि इस संदर्भ में ज्योतिषशास्त्र की कुछ अलग ही मान्यताएं हैं.
ज्योतिषशास्त्र के नियमानुसार जिस व्यक्ति की जन्मकुण्डली में शनि कारक ग्रह होता है उन्हें साढ़े साती और ढैय्या के समय शनि किसी प्रकार नुकसान नहीं पहुंचाते (If Saturn is a significator planet, then it will not harm the native even during the Sade-sati) बल्कि इस समय शनिदेव की कृपा से इन्हें सुख, समृद्धि, मान-सम्मान एवं सफलताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है.जिनकी कुण्डली में शनि मित्र ग्रह शुक्र की राशि वृषभ अथवा तुला में वास करते हैं उन्हें अनिष्ट फल नहीं देते हैं.बुध की राशि मिथुन एवं कन्या में होने पर भी शनि व्यक्ति को पीड़ित नहीं करते हैं.
गुरू बृहस्पति की राशि धनु एवं मीन व स्वराशि मकर एवं कुम्भ में विराजमान होने पर शनिदेव अनिष्ट फल नहीं देते हैं.सूर्य एवं चन्द्र की राशि सिंह एवं कर्क में होने पर शनिदेव मिला जुला फल देते हैं.इस राशि में जिनके शनिदेव होते हैं उन्हें शनि की साढ़े साती एवं ढैय्या में सुख एवं दु:ख दोनों ही बारी बारी से मिलते हैं.शनि अपने शत्रु ग्रह मंगल की राशि मेष और वृश्चिक में होने पर उग्र होता है.इस राशि में शनि की साढ़े साती होने पर व्यक्ति को शनि की पीड़ा का सामना करना होता है.इनके लिए शनि कष्टमय स्थिति पैदा करते है.
जन्म राशि और शनि का गोचर (Moonsign and Saturn’s transit)ज्योतिष विधा के अनुसार जन्म राशि वृषभ, मकर अथवा कुम्भ होने पर शनि का गोचर बहुत अधिक शुभफलदायी नहीं होता है.जिनका जन्म लग्न वृषभ, तुला, मकर या कुम्भ है उनके लिए शनि का गोचर अत्यंत लाभप्रद होता है.इसी प्रकार शनि जिस राशि में गोचर कर रहा है और कुण्डली में उसी राशि में गुरू है तो शनिदेव शुभ फल प्रदान करते हैं.शनिदेव जिस राशि में विचरण कर रहें हैं जन्मपत्री में उस राशि में राहु स्थित है तो शनि अपना फल तीव्र गति से प्रदान करते हैं.गोचर में शनिदेव उस समय भी शुभ फल प्रदान करते हैं जब कुण्डली में जिस राशि में शनि होते है उस राशि से शनि गोचर कर रहे होते हैं…
जन्म पत्रिका के 12 भावो में आकाशीय ग्रहों को जन्म लग्न के अनुसार स्थान दिया जाता है। व्यक्ति के जन्म के पश्चात ग्रह जिस प्रकार से जन्म पत्रिका के चक्र में घूमते हैं उसे ग्रहो का गोचर कहा जाता है।

सभी ग्रह समय समय पर अपने भाव के अनुसार प्रभाव देते हैं इसमें शनि का गोचर क्या कहता है देखें (Saturn’s transit refers to the journey of Saturn through the 12 signs)।

गोचर शनि की विशेषता (Importance of Saturn’s Transit)—-
शनि देव के नाम से बड़े से बड़ा सूरमा भी घबराता है। शनि का गोचर राजा को रंक और शक्तिशाली को शक्तिहीन बना देता है। लेकिन जरूरी नहीं कि गोचर में शनि देव सभी के लिए अशुभ कारक होते हैं। गोचर में शनि के कुछ सामान्य फल होते हैं तो कुछ विशेष प्रभाव भी होता है। साढ़े साती और कण्टक शनि ये दो शनिदेव के विशेष गोचर माने गये हैं। गोचर में साढ़े साती के दौरान शनि देव ढ़ाई ढ़ाई वर्ष के अन्तराल पर राशि परिवर्तन कर व्यक्ति की अलग अलग प्रकार से परीक्षा लेते हैं।

गोचर में शनि की साढ़े साती (Saturn’s Sade-sati transit)—–
जब शनि का गोचर जन्म राशि से 12 वीं राशि में होता है तब साढ़े साती की शुरूआत होती है। ढाई वर्ष बाद जब शनि गोचर में जन्म राशि में पहुंचता है तब सिर पर साढ़ेसाती होती है जो ढ़ाई वर्ष तक रहती है अंतिम ढ़ाई वर्ष में शनि का गोचर जन्मराशि से एक राशि आगे होता है इस समय उतरती साढ़ेसाती होती है। गोचर में यह शनि काफी अनिष्टकारी माना जाता है। चढ़ती साढ़ेसाती के दौरान शनि धन की हानि करते हैं और जीवन को इस प्रकार अस्त व्यस्त कर देते हैं कि चैन से जीना मुश्किल हो जाता है। मानसिक और शारीरिक तौर पर भी व्यक्ति परेशान और पीड़ित होता है।

नाम राशी/जन्म राशी या लग्न राशी पर शनि की साढ़े सटी का प्रभाव हमेशा ही नकारात्मक/अनिष्टकारी ही हो, ऐसा आवश्यक नहीं हें…
यदि जातक की कुंडली/जन्म पत्रिका में शनि देव…लग्नेश,पंचमेश,त्रिकोणेश,या भाग्येश होकर 03 ,06 या फिर 11 वें भाव में स्थित हो तो शनि देव व्यवसाय में लाभकारी होते हें…
इसके आलावा यदि कुंडली में शनि शुभ भावेश होकर उच्चस्थ,मित्र के घर में या वर्गोत्तम स्थिति में हो तोभी शनि देव अपनी महादशा , अन्तर्दशा अथवा गोचरवश अरिष्ट/बुरे फल की अपेक्षा शुभ परिणाम ही देते हें…प्रत्येक लग्नानुसार शनि देव का गोचर फल भी अलग-अलग होगा…
जन्मराशि में जब शनि का गोचर होता है उस दौरान शनि का गोचर विशेष पीड़ादायक होता है। इस समय हर तरफ से बाधा और रूकावट आकर आपके कार्य में व्यवधान डालते हैं। मन अशांत और चिन्ताओं से भरा होता है। स्वास्थ्य पर भी यह शनि अपनी कुदृष्टि डालता है जिससे रोग और बीमारियां आकर आपको घेरती हैं और आर्थिक क्षति एवं धन का अपव्यय होता रहता है। साढ़ेसाती जाते-जाते भी अपना तेवर दिखा जाती है। उतरती साढ़ेसाती के दौरान जब शनि जन्म राशि से एक राशि आगे बढ़ता है तब यह पारिवारिक शांति में विघ्न डालता है। इस समय भाई बंधुओं से मतभेद और मनमुटाव होता है। घर के लोग बीमार रहते हैं, इस समय किसी कुटुम्बी के लिए यह विशेष कष्टकारी हो सकता है।

शनि का गोचर भयकारी नहीं—–
शनि की गति मंद होने के कारण यह एक राशि में ढ़ाई वर्ष तक रहते हैं. जब जन्म राशि से चौथे अथवा आठवीं राशि में शनि होते हैं तो व्यक्ति की ढ़ैय्या चल रही होती है. इसी प्रकार जब जन्म राशि से पीछे की राशि में शनि पहुंचते हैं तो साढ़ेसाती की शुरूआत होती है. साढ़ेसाती का प्रभाव तब तक बना रहता है जब-तक शनि जन्म राशि से अगली राशि में गोचर करता है. साढ़ेसाती के सात साल की अवधि के दौरान व्यक्ति को कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. इन चुनौतियों से जो व्यक्ति सबक लेता है और धैर्य पूर्वक इनका सामना करने की कोशिश करता है शनि उनकी मेहनत और लगनशीलता का पुरस्कार सफलता के रूप में देता है. अत: शनि के गोचर से घबराने की बजाय अपने गुणों और शक्तियों को विकसीत करने का प्रयास करना चाहिए. वास्तव में साढ़ेसाती का अशुभ प्रभाव उन्हें ही भुगतना पड़ता है जो मेहनत से जी चुराते हैं और परिस्थितियों से घबराते हैं. अत: दैनिक जीवन में अपने कार्यों में सफलता और कामयाबी हेतु मेहनत और लगन से कार्य करना चाहिए. मेहनती व्यक्ति की शनि अवश्य सुनते हैं और उनको अपने कार्यों का उचित फल देते हैं.
गोचर में कण्टक शनि: (Kantak Shani Transit of Saturn)—-
गोचरवश शनि देव जब जन्म राशि से चतुर्थ राशि में पहुंचते हैं तो कण्टक शनि कहे जाते हैं। नामानुसार शनि इस समय बाधक और कष्टकारी हो जाते हैं। इस स्थिति में स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस समय व्यक्ति अधिकतर बीमार रहता है। परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि व्यक्ति को अपना घर छोड़कर अन्यत्र रहना होता है। चन्द्र राशि से सप्तम राशि में शनि का गोचर होने पर परदेश में निवास होता है। दशम राशि में शनि जीवन में उथल-पुथल मचा देता है। गोचर में इस भाव में शनि के आने पर रोजी रोजगार, व्यापार एवं कारोबार में परेशानी और असफलताओं का सामना करना होता है।

शनि के गोचर का अशुभ प्रभाव:—-
शनि का गोचर हमेशा कष्टकारी नहीं होता है. गौरतलब बात यह है कि साढ़ेसाती और ढै़य्या के दौरान सभी व्यक्तियों को समान रूप से कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता है. राशि और शनि के पाये के अनुरूप इसका प्रभाव भी अलग-अलग होता है. दूसरी बात यह भी है कि शनि जब जन्म राशि से पांचवें, छठे अथवा ग्यारहवें घर में गोचर करते हैं तो शुभ फल प्रदान करते हैं. इनका शुभ फल जब प्राप्त होता है तो व्यक्ति में मेहनत और लगनशीलता से कार्य करने की प्रेरणा जागृत होती है जिससे सफलता की राहें आसान होती है और धन ऐश्वर्य में वृद्धि होती है. जन्म राशि से पंचम में शनि का गोचर होने पर बौद्धिक क्षमता एवं ज्ञान में वृद्धि होती है. ज्ञान, बुद्धि और मेहनत ही ऐसे तत्व हैं जिनकी बदौलत व्यक्ति किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम होता है.
अब से शनि से भयभीत होने की बजाय शनि ग्रह के उद्देश्य को समझिये और मेहनत को अपना संबल बनाकर धैर्य पूर्वक जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना कीजिए. आप स्वयं दैनिक जीवन में शनि के शुभ प्रभाव को महसूस करेंगे.
श्री शनिदेव दुखदायक नहीं, सुखदायक हैं। वे न्यायप्रिय ग्रह हैं, जीवों को उनके कर्मो के आधार पर फल देते हैं। यदि उनकी अनुकंपा पानी हो तो अपना कर्म सुधारें। आपका जीवन अपने आप सुधर जाएगा।
कालसर्प योग, ढैय्या तथा साढ़ेसाती सहित शनि संबंधी सभी बाधाओं से मुक्ति का यह दुर्लभ अवसर है। यदि निश्चल भाव से शनिदेव का नाम ही ले लिया जाये तो व्यक्ति के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। श्री शनिदेव तो इस चराचर जगत में कर्मफल दाता हैं, जो व्यक्ति के कर्म के आधार पर उसके भाग्य का फैसला सुनाते हैं।
याद रहे, शनि एक न्यायप्रिय ग्रह हैं। उनकी अनुकंपा पानी हो तो अपना कर्म सुधारें, आपका जीवन अपने आप सुधर जायेगा। शनिदेव दुखदायक नहीं, सुखदायक हैं। वे हमारे कर्मो के आधार पर फल देते हैं। वे जीवों को उनके कर्मफलों का भुगतान करवाते हैं। इतना ही नहीं, श्री शनिदेव मनुष्य को उसके कर्म बंधनों से मुक्त कर उसका जीवन सार्थक करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। शनिदेव- सौरमंडल के प्रमुख ग्रह हैं। गोचर में इनके प्रभावों को देखते हुए इन्हें भाग्य विधाता भी कहा जाता है। जन्म कुंडली के बारह भावों में श्रीशनिदेव की स्थिति संबंधित व्यक्ति द्वारा किए गए शुभाशुभ कर्मो के अनुरूप ही होती है। यदि व्यक्ति के कर्म खोटे होते हैं तो उनके फल श्रीशनिदेव उनके अनुरूप ही प्रदान करते हैं। इसके लिए उन्हें लांक्षित करना उचित नहीं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार शनिदेव कश्यप वंश की परंपरा में भगवान सूर्य की भार्या छाया के पुत्र हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार शनि को काश्यपेय नाम से इसलिए संबोधित किया जाता है कि श्री शनिदेव की उत्पत्ति महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में संपन्न काश्यपेय यज्ञ से हुई थी। किंतु अधिकाधिक विद्वानों के अनुसार श्रीशनिदेव की काश्यपेय संज्ञा कश्यप पुत्र सूर्य का पुत्र होने की वजह से दी गई है।
मरीचितनय कश्यप ने दाक्षायणी के गर्भ से सूर्यदेव को उत्पन्न किया और त्वष्टा प्रजापति की कन्या संज्ञा सूर्य की पत्नी हुई। वह सूर्य मंडल का तेज और आदित्य का उष्णरूप शरीर से ग्रहण तो करती थी, परंतु उसका शरीर धीरे-धीरे तेजहीन व कान्ति हीन होने लगा। संज्ञा की ऐसी हालत देखकर उसके ससुर महर्षि कश्यप को डर लगने लगा कि कहीं संज्ञा गर्भ में स्थित शिशु की मृत्यु न हो जाए। तीक्ष्ण किरणधारी वह मार्तण्ड, जिनकी किरणों द्वारा त्रैलोक्य अति तापित किया जाता है, सूर्य का यह तेज उनकी पत्नी संज्ञा के लिए असह्य हो गया। सूर्यदेव ने संज्ञा के गर्भ से तीन संतानें पैदा की, दो पुत्र और एक कन्या। सबसे बड़े पुत्र वैवस्वत मुनि तथा छोटे पुत्र यमराज थे। कन्या का नाम यमुना था। इसके बाद जब संज्ञा सूर्य के तेजोमय रूप को सहने में असमर्थ हो गई, तब उसने अपने से ही मायामयी सवर्णा छाया का निर्माण किया।

इन उपायों से करें शनिदेव को प्रसन्न—–

– श्री शनिदेव का व्रत रखें। श्रद्धानुसार शनि मंत्रों का जाप करें।
– शनिदेव को तेल अर्पित करें। कष्टों से छुटकारा मिलेगा।
– शनि जयंती के दिन घोड़े की नाल या नाव के पेंदी की कील का छल्ला मध्यमा अंगुली में धारण करें।
– एक बार पहनकर अपना पहना हुआ वस्त्र गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति को दान में दें।
– शनिवार के दिन जरूरतमंद या गरीब लोगों के लिए भंडारे की व्यवस्था करें।
– पांच लोहे की वस्तु, अन्न और तेल शनि जयंती के दिन निर्धन व जरूरतमंद व्यक्ति को दान में अवश्य दें।
– कंजकों को दूध का दान देना अनुकूल रहता है।
– श्रद्धानुसार जौ किसी भी गौशाला या कुष्ठ रोगियों को दान में दें।
– सरसों की खली गौशाला में दान दें।
– अपने गले में ठोस लोहे की गोली नीले रंग के धागे में डालकर धारण करना अनुकूल रहेगा।
– शनिवार के दिन भोजन में तिल के लड्डू, उड़द की दाल, मीठी पूड़ी बनाकर श्री शनिदेव को भोग लगाएं। गाय, कुत्ते, कौओं को खिलाएं और प्रसाद के रूप में खुद भी ग्रहण करें।
– शनि जयंती के दिन 21 मुट्ठी उड़द नीले कपड़े में बांधकर अपने ऊपर से उसार कर बहते पानी में प्रवाह कर दें।
– लकड़ी के कच्चे कोयले शनि जयंती के दिन श्मशान में दान में दें।

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