******पञ्च मुखि हनुमत्कवचम*******

************जय श्री हनुमान********

————-दीपावली के शुभ अवसर पर!——-

********पञ्च मुखि हनुमत्कवचम*******

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ॐ अस्य श्री पञ्चमुखि हनुमत्कवच स्तोत्रोत्र मंत्रस्य ब्रह्या ऋषि गायित्री छंद!! श्री हनुमान देवता !! रां बीजम !! म शक्ति !! चन्द्रं इति कीलकम ! ॐ रौं कवचाय हूँ हौं अस्त्रत फट ! इति पञ्च मुखि हनुमत्कवचस्य पाठे विनियोग! [ऐसा कह कर ताम्र पात्र मे है जल छौंड दे!

* ईश्वर उचाव *——-

अथ ध्यान प्रवक्ष्यामि श्रृणु सर्वाग सुन्दरम !
यत्कृतं देविदेवेशि, ध्यान हनुमत: प्रियम !!१!!
भगवान शंकर जी ने एक दिन श्री पार्वती जी से कहा कि पंचमुखी हनुमत्कवचक स्तोत्र मन्त्र का ब्रह्माऋषि, गायत्री छंद, श्री हनुमान देवता देवता, रां बीज, मं शक्ति, चन्द्र कीलक रौं कवच और हौं अस्त्र है! अब हे देवि-देविशी ! हनुमान जी का ध्यान कहा गया है उस परमप्रिय सर्वाग सुन्दर ध्यान कोमें तुमसे कहता हूँ! तुम उसे सुनो!!१!!
पच्चवक्त्रं महाभीमं कपियूथसमन्वितम!
बाहुभिर्दशभिर्युक्त, सर्वकामार्थ सिद्धिदम !!२!!
श्री हनुमान जी का समस्त कामानाओं का देने वाला पांच मुखों का एवं दश भुजाओं से युक्त कपियूथ समन्वित भीमकात स्वरूप है!!२!!
पूर्व बानर सदवक्त्रं कोटि सूर्य समप्रभम!
दष्ट्राकरालवदनं भ्रकुटिलेक्षणम!!३!!
करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश करने वाले, बड़ी विकट दंष्ट्राओं से विकराल भृकुटी से कुटिल दृष्टि वाले, बानर के से मुख का पूर्व मैं ध्यान करे!!३!!
अस्येव दक्षिण वक्त्रं नारसिंह महाद्तभुतम!
अत्यु ग्राते जोवपुष भीषण भयनाशनम !!४!!
इसी के समान दक्षिण की ओर वाला मुख अतौत अद्भुत एवं नारसिंह के समान है! वह मुख श्री हनुमान जी का विकराल भीषण एवं उग्र तेज वाला शरीर होते हुए भी भय नाशक है!!४!!पश्चिमे गारूडं. वक्त्रं वक्रतुंड महाबलम!
सर्वनागप्रशमन सर्वभूतादि कृन्तनम !!५!!
श्री हनुमान जी का पश्चिम से गरुड़ स्वरूपी मुख ही जी कि महानबल शाली एव वक्र है तथा समस्त नागों एव समस्त भूत प्रेतों का नाशक है!!५!!
उत्तरे शूकर वक्त्रं कृष्ण दीप्तनभोमयम!
पाताले सिद्धवेतालज्वररोगादिकृन्तनम!!६!!
उत्तर में शूकर [वाराह] के समान कृष्ण मुख है जोकि आकाश के समान भासमान है, तथा पाताल में वेताल सिद्धि ओर समेंस्त ज्वरादी रोगों का नाशक है!!६!!
ऊर्ध्व हयानन्न घोरं दान वान्तकर परम!
येन वक्त्रेण बिप्रेन्द्र ताटकाया महाहवे !!७!!
हे विप्रेन्द्र ! ऊर्ध्व दिशा में घोर हाय [घोड़ा] के समान मुख है दानवों का अत्यंत नाश करने वाला है जिसने कि ताड़क के महानयुद्ध में उपस्थित रह कर दानवों को नष्ट किया गया था!!७!!
दुर्गते: शरण तस्य सर्वशत्रुहर परम!
ध्यात्वा पञ्चमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम !!८!!
दुर्गतिमें शरण देने वाले सर्व शत्रु हर पञ्च मुख रूद्र दयानिधि हनुमान जी का ध्यान करें!!८!!
खंग त्रिशूलं खटवांगं, पाशमंकुशपर्वतम !
मुष्टौ तु मोदकौ वृक्षं, धारयन्त कमंडलम!!९!!
खंग, त्रिशूल, खट्वांग, पाश, अंकुश पर्वत एवं मुठीडयों में मोदक, वृक्ष, कमण्डलु आदि को धारण करने वाले हनुमान जी को ध्यावे!!९!!
भिन्दिपाल ज्ञानमुदां दशमं मुनि पुंगव !
एतान्यायु धजालानि धारयन्तं भयापहम !!१०!!
हे मुनि श्रेष्ट ! भिन्दिपाल, ज्ञान मुद्रा दश आयुधों को धारण करने वाले और भय नाश करने वाले श्री हनुमान जी का ध्यान करें!!१०!!
दिव्यमालाम्बरधर दिव्यगंधानुलेपनम!
सवैश्वर्यमयं देव, मद्विश्वलो मुखम!!११!!
दिव्य माला एवं दिव्य वस्त्रधारी तथा दिव्यचन्दननानुलेपी, समस्त एश्वार्यों वाले विश्वतोमुख श्री हनुमान जी का ध्यान करे!!११!!
पन्चास्यमच्युतमनेकविचित्र वर्णवक्त्र सशंखविभरितं [शब्द भेद] कपिराजवर्यम !पिताम्बवरादिकुटेरपि शोभमानं, पिंगाक्षमंजनिसुतंहयनिशंस्मरामि !!१२!!
पञ्च मुखौ, नच्युत [ अनश्वर] अनेक विचित्र गुणों के मुख वाले सशंख, अनेक बधा युक्त कपिराजों में श्रेष्ट पीताम्बर तथा मुकुटादि कों से सुशोभित पिंगाक्ष [ पीली पीली आँखों वाले] अंजनि सुत को मे दिन-रात स्मरण करता हूँ!!१२!!
मर्कटस्य महीत्साहं, सर्वशोकविनाशनम!
शत्रु र्सहारकं चैतत कवचं हृयापदं हरेत!!१३!!
उत्साह का वर्धक, समस्त शोकों क विनाशक, शतर संहारक, हनुमान जी का कवच निश्चित ही आपत्वियों को हरता है!!१३!!
ॐ हरिममर्कटर्कटाय स्वाहा!!१४!!
हनुमान जी इस कवच को जो नित्य पढ़ता है, उसे धन-धान्य, सुख-समृधि और सभी सुखों की प्राप्ति होती है! सभी प्रकार के संकट, गृह-दोष और ग्रह-दोष समाप्त हो जाते हैं! —

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