आइये जाने दीपावली क्यों मनाई जाती हें???शुभ मुहूर्त और शुभ योग…दीपावली(2011 ) केसे और कब मनाएं…???.

आइये जाने दीपावली क्यों मनाई जाती हें???शुभ मुहूर्त और शुभ योग…दीपावली(2011 ) केसे और कब मनाएं…???.

दीपावली—-दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति। दीपावली शब्द ‘दीप’ एवं ‘आवली’ की संधिसे बना है। आवली अर्थात पंक्ति, इस प्रकार दीपावली शब्दका अर्थ है, दीपोंकी पंक्ति । भारतवर्षमें मनाए जानेवाले सभी त्यौहारों में दीपावलीका सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदोंकी आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं।[1] माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे।[2] अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लसित था।

श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए । कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। यह पर्व अधिकतर ग्रिगेरियन कैलन्डर के अनुसार अक्तूबर या नवंबर महीने में पड़ता है। दीपावली दीपों का त्योहार है। इसे दीवाली या दीपावली भी कहते हैं।

दीवाली अँधेरे से रोशनी में जाने का प्रतीक है। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीवाली यही चरितार्थ करती है- असतो माऽ सद्गमय , तमसो माऽ ज्योतिर्गमय। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन,सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता हैं। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा का सजाते हैं। बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं।

दीवाली दुनिया में सबसे प्रसिद्ध भारत का त्योहार है। त्योहार का असली नाम संस्कृत भाषा में दीपावली था और इसका अर्थ दीपों की पंक्ति है। दीपावली शब्द में दो शब्द संयुक्त है : दीप व अवली। अवली शब्द आधुनिक हिन्दी में पंक्ति को कहा जाता है। उपनिषदों में भी दीपावली की चर्चा खोज सकते हैं – ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ (अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर ले जाओ)। इसीलिए हम आसानी से समझ पाते हैं कि दीवाली बहुत पुराना त्योहार है – हिंदुओं के लिए ही नहीं पर सिख लोगों और जैन लोगों के लिए भी। हिंदुस्तान के बाहर थाईलैण्ड और दक्षिण-पूर्व एशिया में भी दीवाली उत्सव मनाया जाता है। हिन्दू धर्म में दीवाली का अर्थ दुष्टता पर विजय है – मतलब जब रामायण में राम ने रावण पर जीत हासिल की थी।
भारत में दीवाली के पाँच दिन हैं। पहले दिन का नाम धनतेरस है जब अर्थ-व्यवस्था का नया साल शुरू होता है। दूसरा दिन नरक चतुर्दशी है जब श्री कृष्ण और उनकी पत्नी सत्यभामा ने नरक राक्षस को परास्त कर दिया। तीसरे दिन, अमावस्या में लक्ष्मी का दर्शन किया जाता है तथा इस दिन में भी विष्णु की बली पर विजय उत्सव मनाया जाता है। चौथे दिन बली पाताल गया और वहाँ उसने नया राज्य किया।लगभग पूरे भारत में दीपावली फसल के काटने का इशारा करता है। इसलिए इसी समय में लक्ष्मी का दर्शन किया जाता है कि वे नये साल की फसल भी अच्छी करें।

भारत के लोग दीवाली के समय में रंगोली भी बनाते हैं।दीपावाली का अर्थ है दीपों की आवली या पवित्र पुराणों में इस त्यौहार को मनाने के संबंध में अनेक कहानियाँ है कही गयी है l
१. कहा जाता है की भगवान् राम चोवदाह (१४) वर्ष के वनवास के बाद पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या लोव्टते है तब सारे अयोध्या वासी राज्य को दीपों से सजाकर हर्षोल्लास से दीपावली मनाते है l
२. वामनावतार के समय भगवान् विष्णु ने असुर राजा बली से जीन फुट जमीन माँग कर उन्हें पाताल लोक भेज दिया l इस से देवताओं ने हर्षोल्लास के साथ दीपावली मनाया l
३. द्वापर युग में भगवान् श्री कृष्ण ने पत्नी सत्यभामा के साथ मिलकर नरकासुर नामक राक्षस का वध किया l इस से सारी प्रजा खुशी से घरों को दीपों से सजाकर दीपावली मनाने है l दीपावली मनाते है l दीपावली के दिन घर के बच्चे और बडे सर से स्नान कर घर की साफ़ -सफाई कर उसे चुने से लेपकर रंगों से अलंकृत कर रंगोली सजा कर ,नए नए कपडे वजे वर पहन कर सर घर को दीपों से सजाते है l कुछ लोग लक्ष्मी पूजा करने है l इस त्यौहार को दीपोत्सव भी कहते है l पश्चिम बंगाल में इस दिन विशेष रूप से काले पूजा की जाती है l अमावास के अंधेरे को दूर करने के लिये अनार फूल जडी,भूचक्र जैसे पटाखें जलाते है l
हिन्दी में दीवाली का मानक अभिवादन ‘दीवाली की शुभकामनाएँ’ हैं और भारत के लोग लगभग ऐसे ही पर अपनी-अपनी भाषाओं में उसे कहते हैं।

धार्मिक संदर्भ

दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियाँ हैं। राम भक्तों के अनुसार दीवाली वाले दिन अयोध्या के राजा राम लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे। उनके लौटने कि खुशी मे आज भी लोग यह पर्व मनाते है। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था।[3][4][5] इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए। एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था[5] तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए। जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी दीपावली को ही है।[5] सिक्खों के लिए भी दीवाली महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन ही अमृतसर में १५७७ में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था।[5] और इसके अलावा १६१९ में दीवाली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था। नेपालियों के लिए यह त्योहार इसलिए महान है क्योंकि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष शुरू होता है।
पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय ‘ओम’ कहते हुए समाधि ले ली। महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया। इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने ४० गज ऊँचे बाँस पर एक बड़ा आकाशदीप दीपावली के दिन लटकाया जाता था। बादशाह जहाँगीर भी दीपावली धूमधाम से मनाते थे। मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दीपावली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में वे भाग लेते थे। शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था एवं लालकिले में आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे।

पर्वों का समूह दीपावली—-
दीपावली के दिन भारत में विभिन्न स्थानों पर मेले लगते हैं।[6] दीपावली एक दिन का पर्व नहीं अपितु पर्वों का समूह है। दशहरे के पश्चात ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग नए-नए वस्त्र सिलवाते हैं। दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार आता है। इस दिन बाज़ारों में चारों तरफ़ जनसमूह उमड़ पड़ता है। बरतनों की दुकानों पर विशेष साज-सज्जा व भीड़ दिखाई देती है। धनतेरस के दिन बरतन खरीदना शुभ माना जाता है अतैव प्रत्येक परिवार अपनी-अपनी आवश्यकता अनुसार कुछ न कुछ खरीदारी करता है। इस दिन तुलसी या घर के द्वार पर एक दीपक जलाया जाता है। इससे अगले दिन नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली होती है। इस दिन यम पूजा हेतु दीपक जलाए जाते हैं। अगले दिन दीपावली आती है। इस दिन घरों में सुबह से ही तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। बाज़ारों में खील-बताशे , मिठाइयाँ ,खांड़ के खिलौने, लक्ष्मी-गणेश आदि की मूर्तियाँ बिकने लगती हैं । स्थान-स्थान पर आतिशबाजी और पटाखों की दूकानें सजी होती हैं। सुबह से ही लोग रिश्तेदारों, मित्रों, सगे-संबंधियों के घर मिठाइयाँ व उपहार बाँटने लगते हैं। दीपावली की शाम लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। पूजा के बाद लोग अपने-अपने घरों के बाहर दीपक व मोमबत्तियाँ जलाकर रखते हैं। चारों ओर चमकते दीपक अत्यंत सुंदर दिखाई देते हैं। रंग-बिरंगे बिजली के बल्बों से बाज़ार व गलियाँ जगमगा उठते हैं। बच्चे तरह-तरह के पटाखों व आतिशबाज़ियों का आनंद लेते हैं। रंग-बिरंगी फुलझड़ियाँ, आतिशबाज़ियाँ व अनारों के जलने का आनंद प्रत्येक आयु के लोग लेते हैं। देर रात तक कार्तिक की अँधेरी रात पूर्णिमा से भी से भी अधिक प्रकाशयुक्त दिखाई पड़ती है। दीपावली से अगले दिन गोवर्धन पर्वत अपनी अँगुली पर उठाकर इंद्र के कोप से डूबते ब्रजवासियों को बनाया था। इसी दिन लोग अपने गाय-बैलों को सजाते हैं तथा गोबर का पर्वत बनाकर पूजा करते हैं। अगले दिन भाई दूज का पर्व होता है। दीपावली के दूसरे दिन व्यापारी अपने पुराने बहीखाते बदल देते हैं। वे दूकानों पर लक्ष्मी पूजन करते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से धन की देवी लक्ष्मी की उन पर विशेष अनुकंपा रहेगी। कृषक वर्ग के लिये इस पर्व का विशेष महत्त्व है। खरीफ़ की फसल पक कर तैयार हो जाने से कृषकों के खलिहान समृद्ध हो जाते हैं। कृषक समाज अपनी समृद्धि का यह पर्व उल्लासपूर्वक मनाता हैं।
कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली का पर्व हर वर्ष मनाया जाता है. इस वर्ष दीवाली का यह त्यौहार 26 अक्तूबर 2011, दिन बुधवार को मनाया जाएगा. भारतवर्ष में हिन्दुओं का यह प्रमुख त्यौहार है. इस दिन हर घर रोशनी से सजा होता है. प्राचीन समय में दिवाली को वैश्यों का प्रमुख त्यौहार माना जाता था. इस दिन से वह व्यापार संबंधी नए बहीखाते आरम्भ करते हैं. बिना धन के व्यापार का कोई अर्थ नहीं होता है. इसलिए व्यापारी वर्ग इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा आराधना करते हैं.

इस दिन सभी लोग सुबह से ही घर को सजने का कार्य आरम्भ कर देते हैं. संध्या समय में दीये जलाते हैं. लक्ष्मी तथा गणेश पूजन करते हैं. आस-पडौ़स में एक-दूसरे को मिठाइयों का आदान-प्रदान किया जाता है. रिश्तेदारों तथा मित्रों को मिठाइयों का आदान-प्रदान कई दिन पहले से ही आरम्भ हो जाता है. रात में बच्चे तथा बडे़ मिलकर पटाखे तथा आतिशबाजी जलाते हैं.

धन तेरस;धन त्रयोदशी | Dhanteras | Dhantrayodashi—-24 अक्टूबर,2011 ( सोमवार)— कार्तिक कृष्ण 12, —-
दिवाली का त्यौहार पांच दिन तक मनाया जाता है. इस त्यौहार की तैयारी कई दिन पहले ही आरम्भ हो जाती है. घर की लिपाई-पुताई होती है. रंग-रोगन होता है. घर की पूरी सफाई की जाती है. दिवाली से दो दिन पहले धन-तेरस अथवा धन त्रयोदशी का त्यौहार मनाया जाता है. इस दिन नए बर्तन खरीदने की परंपरा है. इस दिन स्वर्ण अथवा रजत आभूषण खरीदने का भी रिवाज है. अपनी – अपनी परम्परानुसार लोग सामान खरीदते है. संध्या समय में घर के मुख्य द्वार पर एक बडा़ दीया जलाया जाता है.

छोटी दिवाली ।25 अक्टूबर,2011 ( मंगलवार)— कार्तिक कृष्ण 13-14, (रूप चौदस; नरक चतुर्दशी | Choti Diwali | Narak Chaturthi)—–
बडी़ दिवाली से एक दिन पहले छोटी दिवाली का त्यौहार मनाया जाता है. इस दिन को नरक चतुर्दशी अथवा नरका चौदस भी कहते हैं. इस दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था. इसलिए इसे नरका चौदस कहा जाता है. इस दिन संध्या समय में पूजा की जाती है और अपनी – अपनी परंपरा के अनुसार दीये जलाए जाते हैं.नरकासुर नामक राक्षस देवलोक एवं भूलोक में आंतक फैलाकर भगवान् कृष्णा का भी विरोध कर रहा था l उस ने १६,००० महिलाओं को बंदी बनाकर रखा था l इस से क्रोधित होकर श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा से इसका वध कराया था l भूदेवी और भगवान् विष्णु को जन्मे पुत्र नरकासुर को अपनी माता के शिवाय किसी अन्य के हाथों न मर ने का वर प्राप्त था l इसलिए श्री कृष्ण ने सत्यभामा के हाथों से नरकासुर का वध करवा कर मात्रु भूमी की रक्षा की l कहा जाता है नरकासुर वध से खुश होकर लोगों से हरोशोल्लास के साथ दीपावली मनाया नरकासुर की राज धानी को ही आज प्रग्यानो तिषपुर के नाम से ज्ञाना जाता है l यह आसाम में है l श्री कृष्ण की द्वारा का आज के गुजरात में स्थित द्वारका ही है l इस पर्व का संबन्ध स्वच्छता से अधिक है l इसी लिये इस त्यौहार को घर का कूडा कचरा साफ़ करने वाला त्यौहार कहते है l वर्षा रुतु में मकानों पर जो कई आदी साग जाती है उसे इसी दिन हटाया जाता है l यह काम सामूहिक रूप में करना चाहिए l इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठाकर तेल -उबठन लगा कर भली -भाँति स्नान करना चाहिए l इस दिन के स्नान का विशेष माहात्म्य है l जो लोग इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान नहीं करते वर्षभर उनके शुभ कार्यों का नाश होता है l वर्ष भर दुःख में बीतता है l वे मलिन तथा दरिद्री रहते है ल

इस दिन स्नानादि से निपटकर यमराज का तर्पण कर के तीन अंजिल जल अर्पित करने का विधान है l
इस दिन सन्ध्या के समय दीपक भी जलाये जाते है l इसे छोटी दीपावली भी कहते है l दीपक जलाने की विधी त्रयोदशी से अमावस्य तक है l त्रयोदशी के दिन यमराज के लिये एक दीपक जलाया जाता है l अमावास्य को बड़ी दीपावली का पूजन होता है लिस तीनों दिनों में दीपक जलाने का कारण यह बताया जाता है इन दिनों भगवान् वामन ने राजा बलि की पृथ्वी को नापा था l भगवान् वासन ने तिन पगों में सम्पूर्ण पृथ्वी तथा बली के शरीर को नाप लिया था l त्रयोधासी ,तथा अमावास्य को इसीलिये लोग यम के लिये दीपक जलाकर लक्ष्मी पूजन सहित दीपावली मनाते है जी से उन्हें यम -यमतना न सहनी पडे l लक्ष्मी जी सदा उनके साथ रहें l
कहते है इस दिन भारत -सम्राट विष्णु ने वे विलो निया में एक नरकासुर नामक राक्षस सी ह्त्या कर के विजय प्राप्त कर के जनता को उस की क्रूरता तथा अत्याचारों से बचाया था l पुराणों में यह भी मिलता हे कि इस दिन श्री कृष्ण की धर्म पत्नी सत्यभामा ने नरकासुर को मारा था l

बडी़ दिवाली | Badi Diwali;26 अक्टूबर, 2011 (बुधवार)— (दीपावली, लक्ष्मी पूजन)—-
पांच दिन के इस पर्व का यह मुख्य दिन होता है. इस दिन सुबह से ही घरों में चहल-पहल आरम्भ हो जाती है. एक-दूसरे को बधाई संदेश दिए जाते हैं. घर को सजाने का काम आरम्भ हो जाता है. संध्या समय में गणेश जी तथा लक्ष्मी जी का पूजन पूरे विधि-विधान से किया जाता है. पूजन विधि में धूप-दीप, खील-बताशे, रोली-मौली, पुष्प आदि का उपयोग किया जाता है. पूजन के बाद मिठाई खाने का रिवाज है. बच्चे और बडे़ मिलकर खूब आतिशबाजी चलाते हैं. बम-पटाखे फोड़ते हैं.इस दिन घरों में सुबह से ही तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। बाज़ारों में खील-बताशे , मिठाइयाँ ,खांड़ के खिलौने, लक्ष्मी-गणेश आदि की मूर्तियाँ बिकने लगती हैं । स्थान-स्थान पर आतिशबाजी और पटाखों की दूकानें सजी होती हैं। सुबह से ही लोग रिश्तेदारों, मित्रों, सगे-संबंधियों के घर मिठाइयाँ व उपहार बाँटने लगते हैं। दीपावली की शाम लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। पूजा के बाद लोग अपने-अपने घरों के बाहर दीपक व मोमबत्तियाँ जलाकर रखते हैं। चारों ओर चमकते दीपक अत्यंत सुंदर दिखाई देते हैं। रंग-बिरंगे बिजली के बल्बों से बाज़ार व गलियाँ जगमगा उठते हैं। बच्चे तरह-तरह के पटाखों व आतिशबाज़ियों का आनंद लेते हैं। रंग-बिरंगी फुलझड़ियाँ, आतिशबाज़ियाँ व अनारों के जलने का आनंद प्रत्येक आयु के लोग लेते हैं। देर रात तक कार्तिक की अँधेरी रात पूर्णिमा से भी से भी अधिक प्रकाशयुक्त दिखाई पड़ती है।

अन्नकूट —( गोवर्धन पूजा )27 अक्टूबर,2011 (गुरुवार )– कार्तिक शुक्ल 1,विश्वकर्मा दिवस | Annakut | Govardhan Puja | Vishwakarma Divas—
दिवाली से अगले दिन अन्नकूट का पर्व मनाया जाता है. इस दिन मंदिरों में सभी सब्जियों को मिलाकर एक सब्जी बनाते हैं, जिसे अन्नकूट कहा जाता है. मंदिरों में इस अन्नकूट को खाने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी होती है. अन्नकूट के साथ पूरी बनाई जाती है. कहीं-कहीं साथ में कढी़-चावल भी बनाए जाते हैं.इसी दिन गोवर्धन पूजा भी की जाती है. गोवर्धन पूजा में गोबर से गोवर्धन बनाया जाता है और उसे भोग लगाया जाता है. उसके बाद धूप-दीप से पूजन किया जाता है. फिर घर के सभी सदस्य इस गोवर्धन की परिक्रमा करते हैं.इसी दिन विश्वकर्मा दिवस भी मनाया जाता है. इस दिन मजदूर वर्ग अपने औजारों की पूजा करते हैं. फैक्टरी तथा सभी कारखाने इस दिन बन्द रहते हैं.

भैया दूज —-चित्रगुप्त पूजा Bhai Dooj28 अक्टूबर,2011 (शुक्रवार)- कार्तिक शुक्ल 2, —-
दिवाली का पर्व भैया दूज या यम द्वित्तीया के दिन समाप्त होता है. यह त्यौहार कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वित्तीया को मनाया जाता है. इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक करती हैं और मिठाई खिलाती हैं. भाई बदले में बहन को उपहार देते हैं.

परंपरा—-
अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। यह पर्व सामूहिक व व्यक्तिगत दोनों तरह से मनाए जाने वाला ऐसा विशिष्ट पर्व है जो धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक विशिष्टता रखता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है। लोग अपने घरों का कोना-कोना साफ़ करते हैं, नये कपड़े पहनते हैं। मिठाइयों के उपहार एक दूसरे को बाँटते हैं, एक दूसरे से मिलते हैं। घर-घर में सुन्दर रंगोली बनायी जाती है, दिये जलाए जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है। बड़े छोटे सभी इस त्योहार में भाग लेते हैं। अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है।

विशिष्ट फलदायक हैं लक्ष्मी-इंद्र-कुबेर योग—
दीपावली में प्रत्येक व्यक्ति श्रीगणेश-लक्ष्मी की स्थापना एवं पूजन का सर्वाधिक शुभ मुहूर्त जानने के लिए अत्यन्त उत्सुक होता है। ऋद्धि-सिद्धि के अधिपति गणपति और धन-सम्पत्ति की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी की अनुकम्पा प्राप्त हो जाने पर संसार का सारा सुख मिल जाता है।
लक्ष्मीजीचंचल स्वभाव की होने के कारण चंचला कहलाती हैं। ये एक स्थान पर अधिक समय तक नहीं टिकती हैं। इसलिए हर गृहस्थ दीपावली के दिन इनकी स्थापना ऐसे मुहूर्त में करना चाहता है जिसके प्रभाव से भगवती लक्ष्मी उसके यहां स्थिर होकर रहें। ज्योतिषशास्त्र में प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य को उसके लिए निर्दिष्ट शुभ मुहूर्त में करने का निर्देश है क्योंकि कालचक्र में हर काम के लिए एक विशेष समय ही सर्वाधिक उपयुक्त होता है। अनुकूल समय के चयन की इस प्रक्रिया को मुहूर्त-निर्णय कहते हैं। दीपावली-पूजन के मुहूर्त का घर की आर्थिक स्थिति तथा व्यापारिक प्रतिष्ठान के कारोबार पर बहुत प्रभाव पडता है। इसी कारण प्रत्येक परिवार दीपावली में श्रीगणेश-लक्ष्मी की स्थापना और पूजा सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त में करने की आकांक्षा रखता है।
लक्ष्मी योग: देवगुरु बृहस्पति के मतानुसार कार्तिक मास में अमावस्या को सूर्यास्त हो जाने के बाद ही दीपावली का पर्वकाल प्रारंभ होता है। सायंकालीन प्रदोषकालमें सर्वप्रथम लक्ष्मी योग आता है। लक्ष्मी योग गृहस्थजनोंके लिए अत्यन्त शुभ फलदायक होता है। इस मुहूर्त में दीपावली की पूजा से घर का आर्थिक संकट दूर होता है। लक्ष्मी योग का समय रात्रि के प्रथम प्रहर में होने के कारण यह मुहूर्त सबके लिए अत्यन्त सुविधाजनक होता है। यह मुहूर्त समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए शुभ है।
इंद्र योग: दीपावली की रात्रि के द्वितीय प्रहर में इंद्र योग उपलब्ध होता है। इंद्र योग सरकारी अधिकारियों तथा राजनेताओं के लिए विशेष अनुकूल रहता है। सत्ता,पदोन्नति एवं वेतन-वृद्धि के इच्छुक व्यक्तियों को इंद्र योग उनके कार्यक्षेत्रमें आगे बढाता है। कुबेर योग: दीपावली की रात्रि के तृतीय प्रहर में कुबेर योग आता है। कुबेर योग उद्योगपतियों एवं व्यापारियों का अभीष्ट पूर्ण करता है। इस मुहूर्त में फैक्टरी-कारखाना अथवा दुकान की गद्दी पर दीपावली-पूजन प्रचुर लाभदायक सिद्ध होता है। देवगुरु बृहस्पति द्वारा बताए गए ये लक्ष्मी योग, इंद्र योग और कुबेर योग अपने नाम के अनुरूप फल प्रदान करते हैं। लक्ष्मी योग में वृष लग्न तथा कुबेर योग में सिंह लग्न के गुणों का पूर्ण समावेश रहता है। इंद्र योग में लाभ चौघडिया की शक्ति सन्निहित होती है। इस वर्ष शुक्रवार के दिन दीपावली पडने से इस पर्व का आध्यात्मिक एवं तांत्रिक महत्व बहुत बढ गया है। ज्योतिषशास्त्र की बहुचर्चित पुस्तक लाल किताब के अनुसार सांसारिक सुखोंके कारक ग्रह शुक्र की अधिष्ठातृशक्ति लक्ष्मी जी हैं। अतएव शुक्रवार के दिन लक्ष्मी की स्थापना व पूजा मनोवांछित फल प्रदान करती है। ऋषि-मुनियों ने प्रत्येक वार की दीपावली-पूजा हेतु भगवती लक्ष्मी के विशिष्ट ध्यान का विशेष फल बताया है। शुक्रवार के दीपावली-पूजन में लक्ष्मीजीके इस स्वरूप को ध्यान करें-
सिन्दूरारुण-कान्तिमब्ज-वसतिं
सौंदर्यवारांनिधिम्,
कोटीराङ्गद-हार-कुण्डल-
कटीसूत्रादिभिर्भूषिताम्।
हस्ताब्जैर्वसुपत्रमब्ज-युगलादशरवहन्तींपरामावीतांपरिचारिकाभिरनिशंध्यायेत्प्रियांशा‌िर्ङ्गण:॥
जिनके शरीर की कान्ति सिंदूर के समान अरुण वर्ण की है, जो सौंदर्य की सागर होने से अनुपम सुंदर है जो इन्द्रनीलमणि,मुकुट, हार, कुण्डल, करधनी आदि आभूषणों से सुसज्जित हैं, जिन्होंने अपने हाथों में कमल, रत्नों से भरा पात्र एवं दर्पण धारण किया हुआ है, कमल के आसन पर विराजमान तथा परिचारिकाओं (सेविकाओं) द्वारा सेवित ऐसी विष्णुप्रियालक्ष्मी का मैं ध्यान करता हूँ। लक्ष्मी की पूजा करने से पूर्व पूजक का अलक्ष्मीके प्रभाव से मुक्त होना आवश्यक है। नारदसंहितामें देवर्षिनारद ने अलक्ष्मीका यह परिहार बताया है-
तैलेलक्ष्मीर्जलेगंगा दीपावल्यां
तिथौभवेत्।
अलक्ष्मी-परिहारार्थम्अभ्यंग-स्नानमाचरेत्॥
दीपावली के दिन जल में गंगाजीतथा तेल में लक्ष्मी का वास होता है अत:अलक्ष्मी(दरिद्रता) से मुक्ति पाने के लिए इस दिन शरीर में तेल की मालिश करके स्नान करना चाहिए। भगवती लक्ष्मी की पूजा के समय विश्वसारतंत्र में भगवान शंकर द्वारा कहे गए निम्न स्तोत्र का पाठ करने से वे अपने चंचल स्वभाव को छोडकर आराधकके घर में स्थिर होकर वास करती हैं- ईश्वर उवाच
त्रैलोक्यपूजितेदेवि कमलेविष्णुवल्लभे।
यथा त्वम्सुस्थिराकृष्णेतथा भव
मयिस्थिरा॥
ईश्वरीकमला लक्ष्मीश्चलाभूतिर्हरिप्रिया।
पद्मा पद्मालयासम्पदुच्चै:
श्री: पद्मधारिणी॥
द्वादशैतानिनामानिलक्ष्मींसंपूज्य
य:पठेत्।
स्थिरालक्ष्मीर्भवेत्तस्यपुत्रदारादिभि:सह॥
जो श्रद्धालु नित्य लक्ष्मी जी की पूजा करके उनके बारह नामों वाले इस स्तोत्र का भक्ति-भाव से पाठ करता है, देवी उसके यहां अचल रहती हैं और उसके पुत्र-पौत्र उत्तरोत्तर वृद्धि प्राप्त करते हैं। दीपावली की रात में श्रीगणेश-लक्ष्मी के समक्ष अखण्ड दीपक जलाकर जागरण करते हुए इस मंत्र का निरन्तर जप करें-
ॐश्रींह्रींक्लींश्रींलक्ष्मीरागच्छागच्छमम मंदिरेतिष्ठतिष्ठस्वाहा।
दीपावली से प्रारंभ करके कमलगट्टेकी माला पर उपर्युक्त मंत्र का नित्य कम से कम 108बार जप अवश्य करें। इससे घर में लक्ष्मी का आगमन होगा। तंत्रशास्त्रमें दीपावली को कालरात्रि भी कहा गया है। अत:इसकी अर्धरात्रिमें उपलब्ध होने वाला महानिशीथकाल काली-पूजा (श्यामा पूजा) में प्रयुक्त होता है। इसको कालरात्रि योग भी कहते हैं। दीपावली की रात्रि में विधिवत साधना करने से सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है।

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