स्वप्न का मानव-जीवन से सम्बन्ध—-

स्वप्न का मानव-जीवन से सम्बन्ध—-

प्रायः हम सभी लोग प्रगाढ निद्रा में अथवा अर्ध सुषुप्तावस्था में कुछ चित्रात्मक अनुभूति-सी प्राप्त करते हैं; जिसका कुछ अंश तो जाग्रत अवस्थाम ें आते ही विस्मृत हो जाता है और कभी-कभी सम्पूर्ण चित्रात्मक अनुभूति का ही विामरण हो जाता है और कुछ उसका सार रुप अथवामिश्रितरुप ही स्मृतिपटल में चित्रित रहता है। इस प्रकार की अनुभूति को भारतीय आचार्यों के अनुसार ‘‘भावित स्मरणीय अनुभूति की कोटि में आने वाली अनुभूति को स्वप्न कहते हैं।’’ इन स्वप्नों का मानव-जीवन से क्या सम्बन्ध है यही विचारणीय है।
फ्रायड के मतानुसार स्वप्न की जाग्रतावस्था अतृप्त अभिलाषाओं की पूर्ति करना है। युंग तथा एडलर स्वप्न को तात्कालिक समस्या के प्रति अचेतन दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति करने वाला बतलाते हैं अथवा भविष्य में होने वाले कार्य का नाटकीय पूर्वरुप स्वप्न में होता है। पुराने लोगों की प्रकृति स्वप्न को भविष्यसूचक मानती हैं, कुछ मानसिक रोग-शास्त्रियों ने स्वप्नों का कारण शारीरिक अवस्था विशेष मानकर इनको रेागों को परिचायक माना है।

स्वप्न और मानव-जीवन के सम्बन्ध पर विचार करने से पूर्व स्वप्न को सम्यक् प्रकार से समझ लेनाआवश्यक है। पाश्चात्य देशें में अरस्तू सू पूर्व स्वप्न को ईश्चा का संकेत समझा जाता था और अरस्तू स्वप्न को निद्रायुक्त व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक प्रक्रिया मानता था। आयुर्वेद के मत से स्वप्न को रजोयुक्त मन द्वारा शुभाशुभ विषयों का ग्रहण करना माना गया है। यथा-

पूर्व देहानुभूतांस्तु भूतात्मका स्वपतः प्रभुः।
रजो युक्तेन मनसा गृह्नात्यर्थान् शुभशुभान्।। सु.शा.

इसी अनुभूति का भाववाचक शब्द स्वप्न है। शंकर ने स्वप्न को इन्द्रियें की सुषुप्त्यवस्था में जागृत मन द्वारा विषय सेवन करना बतालाया है।

इन्द्रियाणमुपरमे मनोऽनुपरतं यदि।
सेवते विषयानेव तिद्वद्यात् स्वप्न दर्शनम्।।

फ्रायड का स्वप्न सम्बन्धी मत-इनके मत में स्वप्न हमारी अतृप्त आकांक्षाओं के पूरक है।
प्राचीन काल में प्रकृति के भिन्न-भिन्न साधनों को ठीक तरह न समझसकने के कारण प्रत्येक वस्तु का कारण और पे्ररक एक अज्ञात शक्ति को मानते थे। ऐसी ही धारणा मानसिक गतिविधियों के विषय में प्रचलित थी। अरस्तु के पूर्ववर्ती विचारक स्वप्न को भी उसी अज्ञात शक्ति को मानते थे। ऐसी ही धारणा मानिकस गतिविधियों के विषय में प्रचलित थी। अरस्तू के पूर्ववर्ती विचाकर स्वप्न को भी उसी अज्ञात शक्ति द्वारा पे्ररित समझते थे। उनके मत में स्वप्न दो प्रकार के होते हैं-प्रथम सत् जो भविष्य के विषय में सुखद सूचनायें देते हैं, द्वितीय असत् जिनका पे्ररक दुर्भाग्य होता है और जिनका उद्देश्य हमको मार्ग से विचलित करना होता है।
चरक-संहिता में मे सात प्रकार के, दृष्ट, श्रतु, कल्पित आदि में भाविक स्वप्नों का भी स्थान है, भाविक स्वप्न भविष्य में होने वाली शुभाशुभ घटनों की ओर संकेत करते हैं इनकी पे्ररक कोई अज्ञात शक्ति ही हैं मनुष्य के शरीर के अन्दर एक सूक्ष्म तत्व मन च्ेलबीम है जो ईश्वर का ही अंश-सा और और जिसका कार्य शारीरिक इन्द्रियों के कार्यों को नियन्त्रित करना है।

स्वप्न भी सोते हुए मनुष्य की शारीरिक या मानसिक गतिविधि है। अतः उसी परम शक्ति की पे्ररणा से हम भविष्य सम्बन्धी स्वप्न देखते हैं। स्वप्नों की गवेषणात्मक व्याख्या ने स्वप्न के भविष्यसूचक तत्व का खण्डन किया है। कुछ लोगों ने ऐसे स्वप्नों का उल्लेख किया है जिनमें उन्हें भविष्य सम्बन्धी सूचनायें मिली है। इनमें से कुछ के मूल में बलवती अभिलाषा का पता चलता है जो स्वप्न में पूर्ण होती है और बाद में अकस्मात् उसकी पूर्ति हो जाती हैं कुछ विचारकों के अनुसार उन व्यक्तियों की आत्मा जो साधारण स्तर से कुछ उच्च अथवा पवित्रतर होती है, भविष्य की सूचनओं से सम्बद्ध रहती है। कुछ हमारे ग्रामीण पूर्वज ऐसे विषयों पर बातचीत करते मिलते हैं जो शुभाशुभ फल के द्योतक होते हैं और ज्योतिषिशास्त्र में तो स्वप्न को उसमें दिखाई देने वाली वस्तुओं के आधार पर भविष्यसूचक कहकर उसका वर्णप किया गया है।

अरस्तू ने स्वप्न सम्बन्धी जिन सत्यों का उल्लेख किया है, उनमें से एक सत्य है किसी अनुभूति को प्रकर्ष रुप दे देना, क्योंकि स्वप्न साधारण अनुीावएंस संवेदना को तीव्र बना देता है-जैसे एक व्यध्क्ति साधारण ज्वर से पीडि़त है किन्तु उसके शरीर का ताप उसे स्वप्न में यह दिखा सकता है किन्तु उसके शरीर का ताप उसे स्वप्न में यह दिखा सकता है कि वह श्रृंगारों पर चल रहा है फिर भी वह अग्नि से प्रभावशून्य रहता हैं प्रायः यह देखा गया है कि स्वप्नों पर शारीरिक कारणों की अन्विति से उत्पन्न प्रभाव पड़ते हैं। ग्रीक औषधि-श्शास्त्र के जन्मदाता हिपाकेट्सने इसी प्रकार केमत के कारण स्वप्नों का रोगों से सम्बन्ध बतलाया है।
चरक-संहिता में इन्द्रिय स्थान के पंचम अध्याय के सातवें से लेकर चैबीसवें श्लोक तक ऐसे नौ स्वप्नों का उल्लेख है। जिनको देखने वाला रोग-विशेष से पीडि़त होकर परलोक-गामी होता है। इसी अध्याय के बारहवें श्लोक में बतलाया है कि स्वप्न को देखने वाला घोर गुल्म रोग पीडि़त होकर मरता है।

लता कझटकिनी यस्य दारुणं हृदि जायते स्वप्न गुल्मस्तमन्ताय कूरो विशति मानवम्

इसके अतिरिक्त रायक्ष्मा के रोगी को पूर्व या रोग की प्रथमावस्था में निम्न वस्तुओं के देखने से रोग के होने का ज्ञान होता है।

स्वप्नेषु काक शुक शल्लकि नीलकण्ठः। गुध्रास्तथैव कपयः कृकला शकाश्च।।
तं वाहयन्ति सनदीं वितलांश्च पश्येत्। शुष्कांस्तरुन् पवनधूमतवार्दितांश्च।।

शार्गधर-संहिता में तीन ऐसे स्वप्न उल्लिखित है जिनसे दृश्य की वातादिक प्रकृतियों का परिचय प्राप्त होता है। वात प्रकृति व्यक्ति अपने को आकाश में उड़ता देखता है। जो स्वप्न में नक्षत्र अथवा अग्नि आदि को देखना कफ प्रकृति का परिचायक है।

इस प्रकार स्वप्नों से हम शारीरिक स्थिति का ज्ञान करते हैं। शरीर की किसी विशेष प्रकार की प्रकृति के कारण हम विशेष प्रकार के स्वप्न देखते हैं, इस बात को आज के मनोवैज्ञानिक नहीं मानते। कफ का आधिक्य होने पर भी ऐसे व्यक्तियों का अभाव नहीं है जो जलाशय आदि नहीं देखते और कभी-कभी हमें जलाशय और आकाश दोनों उड़ते-दिखाई देते हैं-इससे हम मिश्रित अथवा वात-कफज प्रकृति का होना निश्चित करते हैं।

दारुण समय में अति बलवान वात-पित-कफ इन तीनों दोषों से मनोवह स्त्रोतों के अवरुद्ध होने के कारण मनुष्य को होने वाले दारुझा स्वप्नों केा आधार पर आयुर्वेदीय चिकित्सक रोग की साध्यासाध्यावस्था का ज्ञान करते हैं और मृत्यु की निकटता के विषय में अनुमान लगाते हैं। चरक में ऐसे बारह स्वप्नों का मुख्यतः उल्लेख है। यह मत आज कुछ कसौटी पर कसने पर पूर्ण सत्य नहीं घटता, हम इनमें से कुछ ऐसे स्वप्नों को देखते हैं फिर भी कोई अनिष्ट नहीं होता। हमें यह ज्ञात हो गया है स्वप्न किसी ईश्वरीय संकेत परिणाम ने होकर सुषुप्तावस्था में घटित मानसिक प्रक्रिया मात्र है जिसमें कल्पना तत्व का भी पर्याप्त पुट रहता है। दुःस्वप्न के उदाहरणक े रुप में निम्न श्लोक प्रस्तुत है–

वंश वेत्र लता पाश तृण कण्टक संकटे।
प्रमुह्यति हि यः स्वप्ने योगच्छन् प्रपतत्यपि।।

फ्रायड के अनुसार नियन्त्रक शक्ति एवं मानस पटल की सुषुप्तावस्था में हमारी अतृप्त आकांक्षाएँ सामाजिक तथा नैतिक बन्धनों के कारण दमित होकर निम्न स्तर पर पहुंच जाती हैं वह स्वप्न के रुप में पूर्ण होती है किन्तु उनका रुप कुछ परिवर्तित-सा हो जाता है। इस प्रकार स्वप्नों का हमारे मानसिक जीवन में जहत्वपूर्ण स्थान ह।हम प्रायः नित्य देखते हैं कि हमारी अधिकतर अतृप्त आकांक्षायें, जिनमें से कुछ की तो स्कृति भी नहीं र जाती, दिन की घटना से किसीन किसी प्रकार संबद्ध होकर स्वप्न में प्रच्छन्न रुप में प्रकट होकर निर्वाध तुष्टि प्राप्त करती हैं चरक संहिता में स्वप्नों के निम्न सात प्रकार बताये गए हैं 1. दृष्ट, 2. श्रुत, 3. अनुभूत, 4.प्रार्थित, 5. कल्पित, 6. भाविक और 7. दोषज। इनमें से प्रार्थित स्वप्न को हम उन सभी स्वप्नों में गिन सकते है जिनमें दृष्ट वस्तुओं की हम पहिल से ही प्रार्थना या कामना करते हैं। इस विवेचन से हमं यह ज्ञज्ञत होता है कि प्राचीन काल में भी आकांक्षापूरक स्वप्नों की कल्पना थी।

जब अतृप्त आकांक्षाओं की वेदना चरम सीमा पर पहुंच कर कष्ट देने लगती है तो कल्पनायें उसकी पूर्ति कर कष्ट का निकराकरण करने में सहयोगी बनती है।

मनोराज्य अथवा ष्क्ंल क्तमंउष् में नित्य ही हम ऐसा देखते हैं कि स्वप्नों में कल्पनाओं का भी पर्याप्त योग रहता है। इस प्रकार वास्तविक जीवन की असन्तुष्टि से कुछ समय के लिए मुक्ति प्रदान करने के हेतु रजोयुक्तमन ‘‘भावित स्मर्तव्य’’ अनुभूति को, जो तृप्ति से मुक्त है, उपस्थित करता है और हमारी दुर्लभ वस्तुओं की प्राप्ति की इच्छा भी पूर्ण हो जाती है और कुछ समय के लिये हम अपनी दुनिया के सम्राट हो जाते हैं।
इस प्रकार के आकांक्षापूरक स्वप्नों से हमें निद्रा में आनन्द प्राप्त होता है और हम यह चाहते हैं कि हमारा कल्पनापूर्ण जीवन सदैव अमर रहे और हम जागृतावस्था में न आवें। इसी से फ्रायड ने स्वप्नों को निद्रा का पोषक बतलाया है। हमारा मन बाह्य जगत और अन्तरात्मका की शक्तियों के पारस्परिक संघर्षों को सुलझाने का प्रयास करता रहता है और दमित अभिलाषाएँ नैतिक चेतना के प्रभाव के अभाव में सचेत होकरअपनी तुष्टि का मार्ग खो बैठती है और इस समय उसी पूर्व स्थिति की पुनरावृत्ति होती है, जिस अवस्था में वे अभिलाषायें पूर्णतः प्रत्यक्ष रुप में प्रकट हो तो हमारी नैतिक चेतना पुनःजागृत हो सकती है और हमारी अपूर्ण अभिलाषाओं के दमन की आवश्यकतों के कारण निद्रा भंग हो जाने की संभावना रहती है साथ ही हमें कुछ भयभीत स्थिति का प्रत्यक्ष अनुभव होता है जैसा उन इच्छाओं के दमन के समय हुआ था। यदि यह अभिलाषायें सदा ही अपूर्ण रहें तो उन्माद, अनिद्रा आदि मानसिक रोगों की उत्पत्ति हो सकती है। स्वप्न में हमारी वासनाओं की प्रतीकात्मक तुष्टि मानसिक असाधारणता की अवस्था नहीं आने देती है। इस दृष्टि से स्वप्न का मानव जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान है।

चिर अपूर्ण अभिलाषाओं की पूर्ति स्वप्न का सर्वाधिक मुख्य तत्व है, ऐसा बहुत-से विचारकों का मन्तव्य है। शंकर ने भी स्वप्न को इन्द्रियों की सुषुप्तावस्था में मनका विषय सेवन कहा है। मन उन्हीं विषयों का सेवन करेगा जिनकी वह कामना करता है और जागृतावस्था में नैतिक सामाजिक बन्धनों के कारण पूर्ण नहीं हो पाते।

संक्षेप में हम यह कहते हं कि कर्मेन्द्रियों की सुषुप्तावस्था और मन की जागृतावस्था में उस रजोयुक्त मन का विषय-सेवन भावी घटनाओं अथवा अपूर्ण अभिलाषाओं से सम्बद्ध जो चित्रात्मक अनुभूति-सी प्रतीत होती है स्वप्न कहा जा सकता है। यह अनुभूति सामाजिक और नैतिक बन्धनों से विमुक्त रहती है चाहे इसे हम नियन्त्रण शक्ति के अभाव का परिणाम कहें अथवा इसकी कोई अनय संज्ञा रखें। आकांक्षाओं की स्वप्न में पूर्ति हो जाने से हम मानसिक रोगो से ग्रस्त होने से बच जाते हैं। अतः इन स्वप्नों का व्यक्ति के जीवन में पर्याप्त महत्व है।एडलर के मतानुसार आत्मलघुता (Inferiority Complex) की भावना को दूर रखने के निमित्त हम आत्म गौरव पूर्ण कृत्य स्वप्न में देखते हैं। प्राचीन मत के अनुसार स्वप्न हमको भविष्य की सूचनायें भी देते हैं। इनसे हमें भविष्य में होने वाले रोग का पता तो चलता ही है, इसके अतिरिक्त यह वात आदि प्रकृतियों के परिचायक भी होते हैं। यह स्वप्न का संसार प्रत्येक व्यक्ति की निराली प्रकृति के अनुरुप ही होता है।
(साभार)

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