मंत्र जप और हवन (यज्ञ)करते समय ध्यान रखें…(सावधानियां)

मंत्र जप और हवन (यज्ञ)करते समय ध्यान रखें…(सावधानियां)

यदि जप के समय काम-क्रोधादि सताए तो काम सताएँ तो भगवान नृसिंह का चिन्तन करो। लोभ के समय दान-पुण्य करो। मोह के समय कौरवों को याद करो। सोचो कि “ कौरवो का कितना लम्बा-चैड़ा परिवार था किन्तु आखिर क्या “ अहं सताए तो जो अपने से धन, सत्ता एवं रूप में बड़े हों, उनका चिन्तन करो। इस प्रकार इन विकारों का निवारण करके, अपना विवेक जाग्रत रखकर जो अपनी साधना करता है, उसका इष्ट मन्त्र जल्दी फलीभूत होता है। विधिपूर्वक किया गया गुरूमन्त्र का अनुष्ठान साधक के तन को स्वस्थ, मन को प्रसन्न एवं बुद्धि को सूक्ष्म लीन करके मोक्ष प्राप्ति में सहायक होता है।

 अपनी रूचि के अनुसार जप करते समय भगवान् के सगुण अथवा निर्गुण स्वरूप में मन को एकाग्र किया जा सकता है। सगुण का विचार करोगे, फिर भी अन्तिम प्राप्ति तो निर्गुण की ही होगी।

 जप में साधन और साध्य एक ही हैं जबकि अन्य साधना में अलग हैं। योग में अष्टांग योग का अभ्यास साधना है और निर्विकल्प समाधि साध्य है। वेदांत में आत्मविचार साधन है और तुरीयावस्था साध्य है। किन्तु जप-साधना में जप के द्वारा ही अजपा स्थित को सिद्ध करना है अर्थात् सतर्कतापूर्वक किए गए जप के द्वारा सहज जप को पाना है। मन्त्र के अर्थ में तदाकार होना ही सच्ची साधना है।  कई साधक कहते हैं क्या दो या तीन मन्त्रों का जप किया जा सकता है? लेकिन ऐसा नहीं। एक समय में एक ही मन्त्र और वह भी सद्गुरू-प्रदत्त मन्त्र का ही जप करना श्रेष्ठ है। यदि आप श्रीकृष्ण भगवान् के भक्त हैं तो श्रीराम, षिवजी, दुर्गा माता, गायत्री इत्यादि में भी श्रीकृष्ण के ही दर्षन करो। सब एक ही ईष्वर के रूप हैं। श्रीकृष्ण की उपासना ही श्रीराम की या देवी की उपासना है। सभी को अपने इष्टदेव के लिए इसी प्रकार समझना चाहिए। षिव की उपासना करते हैं तो सबमें षिव का ही स्वरूप देखें।  सामान्यतया गृहस्थ के लिए केवल प्रणव यानि “ऊँ“ का जप करना उचित नहीं है। किन्तु यदि वह साधन-चतुष्ट्य से सम्पन्न है, मन विक्षेप से मुक्त है और उसमें ज्ञानयोग साधना के लिए प्रबल मुमुक्षुत्व है तो वह “ऊँ“ का जप कर सकता है।  केवल “नमः षिवाय“ पंचाक्षरी मन्त्र है एवं “ऊँ नमः षिवाय“ पडाक्षरी मऩ्त्र। अतः इसका अनुष्ठान तद्नुसार ही करें।  जब जप करते-करते मन एकदम षान्त हो जाता है एवं जप छूट जाता है तो क्या करें? तो इस समय ऐसा समझें कि जप का फल ही है षान्ति और ध्यान। यदि जप करते-करते जप छूट जाए एवं मन षान्त हो जाए तो जप की चिन्ता न करो।

ध्यान में से उठने के पष्चात् पुनः अपनी नियत संख्या पूरी कर लो।  कई बार साधक को ऐसा अनुभव होता है कि पहले इतना काम-क्रोध नहीं सताता था जितना मन्त्रदीक्षा के बाद सताने लगा है। इसका कारण हमारे पूर्वजन्म के संसकार हो सकते हैं। जैसे घर की सफाई करने से कचरा निकलता है, ऐसे ही मन्त्र का जाप करने से कुसंस्कार निकलते हैं। अतः घबराओ नहीं, न ही मन्त्र जाप करना छोड़ दो वरन् ऐसे समय में दो-तीन घूँट पानी पीकर थोड़ा कूद लो, प्रणव का दीर्घ उच्चारण करो एवं प्र्रभु से प्रार्थना करो। तुरन्त इन विकारों पर विजय पाने में सहायता मिलेगी। जप तो किसी भी अवस्था में त्याज्य नहीं है।  जब स्वप्न में मन्त्रदीक्षा मिली हो किसी साधक को पुनः प्रत्यक्ष रूप् से मन्त्रदीक्षा लेना भी अनिवार्य है।  जब आप पहले किसी मन्त्र का जप करते थे तो वही मन्त्र यदि मन्त्रदीक्षा के समय मिले, तो आदर से उसका जप करना चाहिए। इससे उसकी महानता और बढ़ जाती है। जप का अर्थ होता है मन्त्राक्षरों की मानसिक आवृत्ति के साथ मन्त्रक्षरों के अर्थ की भावना और स्वयं का उसके प्रति समर्पण। तथ्यातः जप, मन पर अधिकार करने का अभ्यास है जिसका मुख्य उद्देष्य है मन को केन्द्रित करना क्योंकि म नही तो हमारे व्यक्तित्व के विकास को संयम के द्वारा केन्द्रित करता है। ज पके लक्ष्य में मनोनिग्रह की ही महत्ता है। ज पके द्वारा मनोनिग्रह करके मानवता के मंगल में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की जा सकती है।

जप करने की विधियाँ वैदिक मन्त्र का जप करने की चार विधियाँ- 1. वैखरी 2. मध्यमा 3. पष्चरी 4. परा षुरू-षुरू में उच्च स्वर से जो जप किया जाता है, उसे वैखरी मन्त्र जप कहते हैं। दूसरी है, मध्यमा। इसमें होंठ भी नहीं हिलते एवं दूसरा कोई व्यक्ति मन्त्र को सुन भी नहीं सकता। तीसरी, पष्यन्ती। जिस जप में जिव्हा भी नहीं हिलती, हृदयपूर्वक जप होता एवं जप के अर्थ में हमारा चित्त तल्लीन होता जाता है उसे पष्यन्ती मन्त्र जप कहते हैं। चैथी है परा। मन्त्र के अर्थ में हमारी वृत्ति स्थिर होने की तैयारी हो, मन्त्र जप करते-करते आनन्द आने लगे एवं बुद्धि परमात्मा में स्थिर होने लगे, उसे परा मन्त्र जप कहते हैं। वैखरी जप है तो अच्छा लेकिन वैखरी से भी दसगुना ज्यादा प्रभाव मध्यमा में होता है।

मध्यमा से दसगुना प्रभाव पष्यन्ती में एवं पष्यन्ती से भी दसगुना ज्यादा प्रभाव परा में होता है। इस प्रकार परा में स्थिर होकर जप करें तो वैखरी का हजारगुना प्रभाव ज्यादा हो जाएगा। जप-पूजन-साधना-उपासना में सफलता के लिये ध्यान रखें………. मन्त्र-जप, देव-पूजन तथा उपासना के संबंध में प्रयुक्त होने वाले कतिपय विषिष्ट षब्दों का अर्थ नीचे लिखे अनेसार समझना चाहिए। 1. पंचोपचार- गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, तथा नैवेद्य द्वारा पूजन करने को “पंचोपचार“ कहते हैं। 2. पंचामृत- दूध, दही, घृत, मधु(षहद) तथा षक्कर इनके मिश्रण को “पंचामृत“ कहते हैं। 3. पंचगव्य- गाय के दूध, घृत, मूत्र तथा गोबर इन्हें सम्मिलित रूप में “पंचगव्य“ कहते है। 4. षोडषोपचार- आव्हान, आसन, पाद्य, अध्र्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, अलंकार, सुगन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, ताम्बुल, तथा दक्षिणा इन सबके द्वारा पूजन करने की विधि को “षोडषोपचार“ कहते है। 5. दषोपचार- पाद्य, अध्र्य, आचमनीय, मधुपक्र, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, तथा, नैवेद्य द्वारा पूजन करने की विधि को “दषोपचार“ कहते है। 6. त्रिधातु- सोना, चाँदी, लोहा। कुछ आचार्य सोना, चांदी और तांबे के मिश्रण को भी त्रिधातु कहते हैं। 7. पंचधातु- सोना, चाँदी, लोहा, तांबा, और जस्ता। 8. अष्टधातु- सोना, चांदी, लोहा, तांबा, जस्ता, रांगा, कांसा और पारा। 9. नैवेद्य- खीर, मिष्ठान आदि मीठी वस्तुएँ। 10. नवग्रह- सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरू, षुक्र, षनि, राहु और केतु। 11. नवरत्न- माणिक्य, मोती, मूंगा, पन्ना, पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद, और वैदूर्य। 12. अष्टगन्ध- 1. अगर, तगर, गोरोचन, केसर, कस्तूरी, ष्वेत चन्दन लाल चन्दन और सिन्दूर (देव पूजन हेतु)। 2. अगर लालचन्दन, हल्दी, कुंकुम, गोरोचन, जटामांसी, षिलाजीत और कपूर (देवी पूजन हेतु)। 13. गन्धत्रय- सिन्दूर, हल्दी, कुंकुम। 14. पड्चांग- किसी वनस्पति के पुष्प, पत्र, फल, छाल, और जड़। 15. दषांष- दसवा भाग। 16. सम्पुट- मिट्टी के दो षकोरों को एक- दूसरे के मुँह से मिला कर बन्द करना। 17. भोजपत्र- एक वृक्ष की छाल (यह पंसारियो के यहाँ मिलती है) मन्त्र प्रयोग के लिए भोजपत्र का ऐसा टुकड़ा लेना चाहिए, जो कटा-फटा न हो (इसके बड़े-बड़े टुकड़े भी आते हैं) 18. मन्त्र धारण- किसी भी मन्त्र को स्त्री पुरूष दोनों ही कण्ठ में धारण कर सकते हैं, परन्तु यदि भुजा में धारण करना चाहे तो पुरूष को अपनी दायीं भुजा में और स्त्री को बायीं भुजा में धारण करना चाहिए। 19. ताबीज- यह तांबे के बने हुए बाजार में बहुतायत से मिलते हैं। ये गोल तथा चपटे दो आकारों में मिलते हैं। सोना, चांदी, त्रिधातु तथा अष्टधातु आदि के ताबीज सुनारों से कहकर बनवाये जा सकते हैं। 20. मुद्राएँ- हाथों की अंगुलियों को किसी विषेष स्थिति में लाने की क्रिया को “मुद्रा“ कहा जाता है। मुद्राएं अनेक प्रकार की होती हैं। 21. स्नान-यह दो प्रकार का होता है। बाह्य तथा आन्तरिक, बाह्य स्नान जल से तथा आन्तरिक स्नान मन्त्र जप द्वारा किया जाता है। 22. तर्पण- नदी, सरोवर आदि के जल में घुटनों तक पानी में खड़े होकर, हाथ की अड्जलि द्वारा जल गिराने की क्रिया को “तर्पण“ कहा जाता है। जहाँ नदी, सरोवर आदि न हो, वहाँ किसी पात्र में पानी भरकर भी “तर्पण“ की क्रिया सम्पन्न कर ली जाती है। 23. आचमन- हाथ में जल लेकर उसे अपने मुँह में डालने की क्रिया को “आचमन“ कहते है। 24. करन्यास- अंगूठा, अंगुली, करतल तथा करपृष्ठ पर मन्त्र जपने को “करन्यास“ कहा जाता है। 25. हृदययविन्यास- हृदय आदि अंगों को स्पर्ष करते हुए मन्त्रोच्चारण को “हृदयाविन्यास“ कहते हैं। 26. अंगन्यास- हृंदय, षिर, षिखा, कवच, नेत्र, एवं करतल- इन छः अंगो से मन्त्र का न्यास करने की क्रिया को “अंगन्यास“ कहते है। 27. अध्र्य- षंख, अंजलि आदि द्वारा जल छोड़ने को अध्र्य देना कहा जाता है। घड़ा या कलष में पानी भरकर रखने को अध्र्य-स्थापन कहते है। अध्र्यपात्र में दूध, तिल, कुषा के टुकड़े, सरसौं, जौ, पुष्प, चावल एवं कुंकुम इन सबको डाला जाता है। 28. पंचायतन पूजा- पंचायतन पूजा में पाँच देवताओं-विष्णु, गणेष, सूर्य, षक्ति तथा षिव का पूजन किया जाता है। 29. काण्डानुसमय- एक देवता के पूजाकाण्ड को समाप्त कर, अन्य देवता की पूजा करने का “कण्डानुसमय“ कहते हैं। 30. उद्वर्तन- उबटन। 31. अभिषेक- मन्त्रोच्चारण करते हुए षंख से सुगन्धित जल छोड़ने को अभिषेक कहते हैं। 32. उत्तरीय- वस्त्र। 33. उपवीत- यज्ञोपवीत (जनेऊ)। 34. समिधा- जिन लकडि़यों में अग्नि प्रज्ज्वलित कर होम किया जाता है, उन्हें समिधा कहते हैं। समिधा के लिए आक, पलाष, खदिर, अपामार्ग, पीपल, उदुम्बर, षमी, कुषा तथा आम की लकडि़यों को ग्राह्य माना गया है। 35. प्रणव- ऊँ।
36. मन्त्र ऋषि- जिस व्यक्ति ने सर्वप्रथम षिवजी के मुख से मन्त्र सुनकर उसे विधिवत् सिद्ध किया था, वह उस मन्त्र का ऋषि कहलाता है। उस ऋषि को मन्त्र का आदि गुरू मानकर श्रद्धपूर्वक उसका मस्तक में न्यास किया जाता है। 37. छन्द- मन्त्र को सर्वतोभावेन आच्छादित करने की विधि को “छन्द“ कहते है। यह अक्षरों अथवा पदों से बनता है। मन्त्र का उच्चारण चूंकि मुख से होता है अतः छनद का मुख से न्यास किया जाता है। 38. देवता- जीवमात्र के समस्त क्रिया-कलापों को प्रेरित, संचालित एवं नियंत्रित करने वाली प्राणषक्ति को देवता कहते हैं। यह षक्ति व्यक्ति के हृदय में स्थित होती है, अतः देवता का न्यास हृदय में किया जाता है। 39. बीज- मन्त्र षक्ति को उद्भावित करने वाले तत्व को बीज कहते हैं। इसका न्यास गुह्यागं में किया जाता है। 40. षक्ति- जिसकी सहायता से बीज मन्त्र बन जाता है, वह तत्व षक्ति कहलाता है। उसका न्यास पाद स्थान में करते है।
41. विनियोग- मन्त्र को फल की दिषा का निर्देष देना विनियोग कहलाता है। 42. उपांषु जप- जिह्ना एवं होठ को हिलाते हुए केवल स्वयं को सुनायी पड़ने योग्य मन्त्रोच्चारण को उपांषु जप कहते हैं। 43. मानस जप- मन्त्र, मन्त्रार्थ एवं देवता में मन लगाकर म नही मन मन्त्र का उच्चारण करने को मानस जप कहते हैं। 44.

अग्नि की जिह्नाएँ- अग्नि की 7 जिह्नएँ मानी गयी हैं। उसके नाम है- 1. हिरण्या, 2. गगना, 3. रक्ता, 4. कृष्णा, 5. सुप्रभा, 6. बहुरूपा एवं 7. अतिरिक्ता। कतिपय आचार्याें ने अग्नि की सप्त जिह्नाओं के नाम इस प्रकार बताये हैं- 1. काली, 2. कराली, 3. मनोभवा, 4. सुलोहिता, 5. धूम्रवर्णा, 6. स्फुलिंगिनी तथा 7. विष्वरूचि। 45. प्रदिक्षणा- देवता को साष्टांग दण्डवत् करने के पष्चात इष्टदेव की परिक्रमा करने को प्रदक्षिणा कहते हैं। विष्णु, षिव, षक्ति, गणेष और सूर्य आदि देवताओं की 4, 1, 2, 1, 3 अथवा 7 परिक्रमाएँ करनी चाहिए। 46. साधना- साधना 5 प्रकार की होती है- 1. अभाविनी, 2. त्रासी 3. दोर्वोधी 4. सौतकी तथा 5. आतुरो।

(1) अभाविनी- पूजा के साधना तथा उपकरणों के अभाव से, मन से अथवा जलमात्र से जो पूजा साधना की जाती है, उसे अभाविनी कहते हैं। (2) जो त्रस्त व्यक्ति तत्काल अथवा उपलब्ध उपचारों से या मानसापचारों से पूजन करता है, उसे त्रासी कहते हैं, यह साधना समस्त सिद्धियाँ देती है। (3) बालक, वृद्ध, स्त्री, मूर्ख अथवा ज्ञानी व्यक्ति द्वारा बिना जानकारी के की जानी वाली पूजा दाबांधी कही जाती है। (4) सूत की व्यक्ति मानसिक सन्ध्या करा कामना होने पर मानसिक पूजन तथा निष्काम होने पर सब कार्य करें। ऐसी साधना को भौतिकी कहा जाता है। (5) रोगी व्यक्ति स्नान एवं पूजन न करें। देव मूर्ति अथवा सूर्यमण्डल की ओर देखकर, एक बार मूल मन्त्र का जप कर उस पर पुष्प चढ़ायें। फिर रोग की समाप्ति पर स्नान करके गुरू तथा ब्राम्हणों की पूजा करके पूजा विच्छेद का दोष मुझे न लगें- ऐसी प्रार्थना करके विधि पूर्वक इष्ट देव का पूजन करे तो इस साधना को आतुर कहा जाएगा। अपने श्रम का महत्व- पूजा की वस्तुएं स्वयं लाकर तन्मय भाव से पूजन करने से पूर्ण फल प्राप्त होता है तथा अन्य व्यक्ति द्वारा दिए गए साधनों से पूजा करने पर आधा फल मिलता है

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