भारतीय संस्कृति में श्राद्व कर्म की गरिमा

भारतीय संस्कृति में श्राद्व कर्म की गरिमा

भारतीय हिन्दु संस्कृति मे तीन प्रकार के ऋणों का उल्लेख है- पितृ ऋण, ऋशि ऋण व देव ऋण। षास्त्र विहित कर्मो की पुजा, वत्र,उपवासादि से देव ऋण से मुक्त होते है। पितृ ऋण मे मनुश्य श्राद्व, पितृ पूजन करने से मुक्त होता है। तिलयुक्त जल के तर्पण,ब्राह्यण भोजन, अग्नि करण, पिण्दान ये श्राद्व के अंग है। श्राद्व करने से पितरो से सर्व सुखो के आषीर्वाद की प्राप्ति होती है।
भारतीय जन जीवन और संस्कृति मे पिता-पुत्र का रिष्ता मात्र इस संसार मे जीवित रहने तक ही सीमित नही है पर यह अटूट है और मृत्यु परान्त भी बना रहे इसके लिए श्राद्व कर्म का प्रावधान है। पुत्र न केवल पितृ पक्ष अपितु मातृपक्ष के भी तीन-तीन पुर्व पूरूशो के निमित श्राद्व करता है। मार्कण्डेय पुराण मे ऐसा कहा गया है कि “श्राद्व मे जो कुछ दिया जाता है वह पितरों द्वारा प्रयुक्त होने वाले उस भोजन मे परिवर्तित हो जाता है जिसे वे कर्म एवं पुनर्जन्म के सिद्वान्त के अनुसार नए षरीर के रूप् मे पाते है।”
पितृ श्राद्व दो प्रकार के है (1) प्रत्याब्घिक श्राद्व और (2)महालय श्राद्व। प्रत्याब्धिक श्राद्व मृत्यू तिथी पर प्रति वर्श किया जाना व महालय श्राद्व आशाढ़ पूर्णिमा के पांचवा पक्ष याने आष्विन माह का कृश्ण पक्ष के पन्द्रह दिन मे उसी तिथि (मृत्यू तिथि) को किया जाता है। यह माना जाता है कि इस पक्ष मे पितर लोग उत्सव मनाते है और आकाष से आकाष गंगा मार्ग द्वारा आगमन करते है। इस पक्ष मे केवल माता-पिता के पक्ष के लिए नही अपितु अन्य रिष्तेदारो के लिए भी श्राद्व करने का विघान षास्त्रो मे मिलता है। प्रष्न उठता है कि पुनर्जन्म की स्थिति मे किस प्रकार ब्राह्यण भोजन कराने से पितरों की तृप्ति होती है ? इसके उत्तर मे श्री नन्द पएिडत का कथन है “जिस प्रकार के बछड़ा अपनी माता को फैली हुई अन्य गायों मे से चुन लेता है उसी प्रकार से श्राद्व में कहे गये मंत्र प्रदत्त भोजन को पितरों तक ले जाते है”।
ब्रह्य पुराण में उल्लेख है कि “जो उचित काल,पात्र एवं स्थान के अनुसार षास्त्रानु मोदित विधि द्वारा पितरो का लक्ष्य करके ब्राह्यणों को दिया जाता है वह श्राद्व निर्मित होता है। पितरों को उददेष्य करके (उनके कल्याण के लिए श्रद्वापूर्वक किसी वस्तु, द्रव्य, वस्त्र का त्याग किया जाता है वह उस प्राणी (पितृ) के लिए माना जाता हैं।
श्राद्व कर्ता को श्राद्व कर्म मे आवष्यक रूप से जिनका श्राद्व किया जा रहा है उनके नाम व गोत्र का उच्चारण करना चाहिए। श्राद्व कर्म के लिए तर्पण इत्यादि दक्षिणामुख होकर ढालू भूमि पर श्राद्वकर्म करने का विघान है इसलिए नदी किनारा, तालाब किनारा, व अन्य ऐसा स्थान उचित होता है। तर्पण के जल मे काले तीलो का होना आवष्यक है। अप्रसंग्य जनेउ करते हुए पात्र में काले तिल जौ पानी मै डालकर हथेली के अंगुठे एवं तर्जनी के पास कुषा रखते हुए अंगूठे व तर्जनी मे मघ्य भाग से तीन अंजली दी जाती है। पुत्र के द्वारा श्राद्व दक्षिणांमुख होकर अपरान्त में सूर्यास्त के पहले श्राद्व कर्म किया जाना चाहिये। महर्शि मनु का मत है कि “पुत्र के उत्पन्न होने से व्यक्ति को लोको की प्राप्ति, पौत्र उत्पन्न होने से अमरता व प्रपौत्र से सूर्यलोक की प्राप्ति करता है। इसके पीछे निर्बाघ गति से वंष परंपरा चलते रहना है।
श्राद्व मे जहां तक भोजन कराने का प्रष्न है – श्राद्व के पूर्व के दिन भोजन जिमित उच्च कोटी के विद्वान ब्राह्यणों को निमंत्रण देना चाहिये जो कि एक,तीन,पांच,सात आदि विशम संख्या मे हो। ब्राह्यण मौन रह कर भोजन करे व कर्ता क्रोघ न करे, प्रसन्नचित होकर भोजन परूसे। श्राद्व में स्वच्छता रखना अनिवार्य है, भोजन मे तिल मिश्रित व्यन्जन हो व स्वच्छ आसन पर भोजन करें। भोजन कर कुछ भाग आकाष में उड़ने वाले पक्षियों हेतु,धरातल पर विचरने वाले पषुओं हेतु, सम्मुच मे रहले वाले जलचरों व पाताल लोक जाने वाले कीड़े-मकोड़ों हेतु भी निकाल कर रखना चाहिए। माना जाता है कि इन दिनो काग (कौआ) को भोजन देना भी उपयुक्त है।
श्राद्व पक्ष में पितृ पूजन से पितरांे द्वारा कर्ता की आयु, पुत्रयष स्वर्ग, कीर्ति पुश्टिवाला, श्री सौख्य तथा घन-घान्य होने का आषीर्वाद मिलता है। यह अपने पूर्वजों के पुण्य स्मरएा का दिन होता है। अतः हर व्यक्जि को अपने माता-पिता व अन्य धनिश्ठ सम्बन्धियों का श्राद्व करना चाहिये। पूर्वजो के प्रति श्रद्वा अर्पण का अवसर और उनके ऋण से मुक्ति का उपाय है। अज्ञानवष कोई पूर्वजो की मृत्यु तिथि याद न रख पाए तो आष्चिन कृश्ण पक्ष अमावस्या को ऐसा श्राद्व किया जाना षास्त्र युक्त है। इस प्रकार पितरों को मोक्ष दिखाया जा सकता

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