आइये जाने की क्या हें नवरात्री,गुप्त नवरात्री,इसके प्रभाव,कारण एवं उपाय/टोटके(उपयोगी मन्त्र संग्रह)—–

आइये जाने की क्या हें नवरात्री,गुप्त नवरात्री,इसके प्रभाव,कारण एवं उपाय/टोटके(उपयोगी मन्त्र संग्रह)—–

कथा एवं सार——
एक समय ऋषि श्रृंग प्रजाजनों को दर्शन दे रहे थे अचानक भीड़ से एक स्त्री निकाल कर आई,और करबद्ध ऋषि श्रृंग से बोली कि मेरे पति दुर्वयास्नो से सदा घिरे रहते हैं,जिस कारण में कोई पूजा पाठ नहीं कर पाती,न ही ऋषि दरसन एवं सेवा कर पाती हूँ,यहाँ तक कि ऋषियों को भेजे जाने वाला अन्न का भाग भी में नहीं दे पाती,मेरा पति मांसाहारी हैं,जुआरी है,लेकिन में माँ शक्ति दुर्गा कि सेवा करना चाहती हूँ,उनकी भक्ति साधना से जीवन को पति सहित सफल बनाना चाहती हूँ,तो ऋषि श्रृंग बोले कि माता जिस प्रकार दो नवरात्र ग्रीष्म और शारदीय प्रतिवर्ष मनाये जाते हैं,ठीक वैसे ही दो नवरात्र और भी एक वर्ष में होते हैं जिन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है,जिस प्रकार नवरात्र नौ देवियों के होते हैं उसी प्रकार गुप्त नवरात्र दस महाविद्याओं के होते हैं,यदि कोई दस महाविद्याओं के रूप में शक्ति की उपासना कर ले तो जीवन धन धान्य राज्यसत्त ऐश्वर्य से भर जाता है,इन नवरात्रों की प्रमुख देवी स्वरुप का नाम सर्वैश्वर्यकारिणी देवी है, यदि इन गुप्त नवरात्रों में कोई भी भक्त माता दुर्गा की पूजा साधना करता है तो माँ उसके जीवन को सफल कर देती हैं,लोभी,कामी,व्यसनी,सहित यदि मांसाहारी अथवा पूजा पाठ न कर सकने वाला भी यदि इन दिनों माता की पूजा कर ले तो जीवन में कुछ और करने की आवश्यकता ही नहीं रहती….इस प्रकार उस स्त्री ने ऋषि श्रृंग के वचनों पर श्रद्धा कर गुप्त नवरात्र की पूजा की और जीवन में परिवर्तन आने लगा,घर में सुख शान्ति आ गयी,पति सद्मार्ग पर आ गया,और जीवन माता की कृपा से खिल उठा.यदि आप भी कभी कभी शराब पी लेते हैं,मांसाहार कर लेते हैं और चाहते हैं की माता की कृपा से जीवन में सुख समृद्धि आये, तो इस अवसर को नहीं चूकिएगा,ये भी बता दें की तंत्र और शाक्त मत का तो ये सबसे अहम् पर्व माना जाता है,वैशनो,पराम्बा देवी और कामाख्या देवी का ये अहम् पर्व माना जाता है,पाकिस्तान स्थित हिन्गुलाज देवी की सिद्धि का भी यही अहम् समय होता है,शास्त्रों के अनुसार दस महाविद्याओं को सिद्ध करने के लिए ऋषि विश्वामित्र और ऋषि वशिष्ठ ने बहुत प्रयास किया लेकिन सिद्धि नहीं मिली तो उनहोंने काल ज्ञान द्वारा ये पता किया कि गुप्त नवरात्र ही वो समय है जब शक्ति के इन स्वरूपों को सिद्ध किया जा सकता है, ऋषि विश्वामित्र ने तो शक्तिया प्राप्त कर नयी सार्ष्टि तक रच डाली……लंकापति रावन का पुत्र मेघनाद अतुलनीय शक्तियां प्राप्त करना चाहता था ताकि कोई उसे जीत ना सके….तो मेघनाद ने अपने गुरु शुक्राचार्य से परामश किया तो शुक्राचार्य ने गुप्त नवरात्रों में अपनी कुल देवी निकुम्बाला कि साधना करने को कहा,मेघनाद ने ऐसा ही किया और शक्तियां हासिल की,राम राबण युद्ध के समय केवल मेघनाद ने ही राम भगवान् सहित लक्षण जी को नागपाश मेमन बाँध कर मृत्यु के द्वार तक प[अहुंचा दिया था,ये भी कहा जाता है की यदि नास्तिक की परिहास्वश इन समय मंत्र साधना कर ले तो भी उसे फल मिल ही जाता है,यही इस गुप्त नवरात्र की महिमा है,यदि आप चाहते हैं मंत्र साधना करना,लेकिन काम-काज की उलझनों के कारण नहीं कर पाते नियमों का पालन तो ये समय आपके लिए ही माता की कृपा ले कर आया है,बिना किसी नियम को पाले बस कीजिये माँ शक्ति की मंत्र साधना और पाइए मनचाही मुराद,इस साधना के बारे में कहा जाता है की साधना से मनोकामना पूरी होने की 100 % गारंटी है,बस केवल बात ही ध्यान रखना होगा की आपके मंत्र,देवी का स्वरुप और पूजा रखनी होगी गुप्त,बिना किसी को बताये,घर पर ही करें माँ को प्रसन्न,और इसका आसान सा तरीका हम आपको आज बताने जा रहे हैं,तो कीजिये गुप्त नवरात्रों में दस महाविद्याओं की महासिद्ध पूर्णमनोरथी साधना..
हिंदू धर्म के अनुसार एक वर्ष में चार नवरात्रि होती है। वर्ष के प्रथम मास अर्थात चैत्र में प्रथम नवरात्रि होती है। चौथे माह आषाढ़ में दूसरी नवरात्रि होती है। इसके बाद अश्विन मास में प्रमुख नवरात्रि होती है। इसी प्रकार वर्ष के ग्यारहवें महीने अर्थात माघ में चार नवरात्रि का महोत्सव मनाने का उल्लेख एवं विधान देवी भागवत तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है।इनमें अश्विन मास की नवरात्रि सबसे प्रमुख मानी जाती है। इस दौरान पूरे देश में गरबों के माध्यम से माता की आराधना की जाती है। दूसरी प्रमुख नवरात्रि चैत्र मास की होती है। इन दोनों नवरात्रियों को शारदीय व वासंती नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। इसके अतिरिक्त आषाढ़ तथा माघ मास की नवरात्रि गुप्त रहती है। इसके बारे में अधिक लोगों को जानकारी नहीं होती, इसलिए इन्हें गुप्त नवरात्रि कहते हैं। गुप्त व चमत्कारीक शक्तियां प्राप्त करने का यह श्रेष्ठ अवसर होता है।

धार्मिक दृष्टि से हम सभी जानते हैं कि नवरात्रि देवी स्मरण से शक्ति साधना की शुभ घड़ी है। दरअसल, इस शक्ति साधना के पीछे छुपा व्यावहारिक पक्ष यह है कि नवरात्रि का समय मौसम के बदलाव का होता है। आयुर्वेद के मुताबिक इस बदलाव से जहां शरीर में वात, पित्त, कफ में दोष पैदा होते हैं, वहीं बाहरी वातावरण में रोगाणु। जो अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं। सुखी-स्वस्थ जीवन के लिये इनसे बचाव बहुत जरूरी है। नवरात्रि के विशेष काल में देवी उपासना के माध्यम से खान-पान, रहन-सहन और देव स्मरण में अपनाने गए संयम और अनुशासन तन व मन को शक्ति और ऊर्जा देते हैं। जिससे इंसान निरोगी होकर लंबी आयु और सुख प्राप्त करता है।धर्म ग्रंथों के अनुसार गुप्त नवरात्रि में प्रमुख रूप से भगवान शंकर व देवी शक्ति की आराधना की जाती है। देवी दुर्गा शक्ति का साक्षात स्वरूप है। दुर्गा शक्ति में दमन का भाव भी जुड़ा है। यह दमन या अंत होता है शत्रु रूपी दुर्गुण, दुर्जनता, दोष, रोग या विकारों का। ये सभी जीवन में अड़चनें पैदा कर सुख-चैन छीन लेते हैं। यही कारण है कि देवी दुर्गा के कुछ खास और शक्तिशाली मंत्रों का देवी उपासना के विशेष काल में ध्यान शत्रु, रोग, दरिद्रता रूपी भय बाधा का नाश करने वाला माना गया है।’नवरात्रि’ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर महानवमी तक किए जाने वाले पूजन, जाप, उपवास का प्रतीक हैं। ‘नव शक्ति समायुक्तां नवरात्रं तदुच्यते’। नौ शक्तियों से युक्त नवरात्रि कहलाते हैं। देवी पुराण के अनुसार एक वर्ष में चार माह नवरात्र के लिए निश्चित हैं-
उक्तं च – ‘आश्विने वा ऽथवा माघे चैत्रें वा श्रावणेऽति वा।’
अर्थात आश्विन मास में शारदीय नवरात्रि तथा चैत्र में वासंतिक नवरात्रि होते हैं। माघ व श्रावण के गुप्त नवरात्रि कहलाते हैं वहीं शारदीय नवरात्रि में देवी शक्ति की पूजा व बासंतिक नवरात्रि में विष्णु पूजा की प्रधानता रहती है…। मार्कण्डेय पुराण में शारदीय नवरात्रि का अत्यंत महत्व बतलाया गया है।
नवरात्रि में घट स्थापना, पूजन व विसर्जन के लिए प्रातःकाल समय शुभ माना जाता है। देवी शक्ति पूजन के लिए प्रातः स्नान कर पवित्र स्थल पर मिट्टी की वेदी बनाकर उसमें धान्य बोए जाते हैं। फिर कलश स्थापना कर श्री गणेश, नवग्रह, लोकपाल, मातृका, वरुणदेव का पूजन किया जाता है। षष्ठी तक सभी पूजाएँ कलश पर होती हैं।

इसके बाद गणेशादि पूजन के पश्चात पुष्याह वाचन करके पूजन निमित्त संकल्प लिया जाता है। कलश पर चित्रमय दुर्गा की स्थापना करके फिर देवी का आह्वान, आसव, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र गंध, अक्षत, पुष्प, धूप दीप, नेवैद्य, आचमन, ताम्बूल, नीरांजन, पुष्पों आदि से नमस्कार विधि द्वारा कर पूजन पूर्ण होती है। प्रतिदिन नौ दिनों तक यम, नियम, संयम व श्रद्धा से मार्कण्डेय पुराण अंतर्गत दुर्गा सप्तशती का पाठ भक्तगण करते हैं।

‘नमो दैव्ये महादैव्ये, शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै, नियता: प्रणताः स्मताम्‌’॥

अष्टमी व नवमीं को कन्याओं को चरण धोकर आदर सहित पूजन कर यत्रारुचि भोजन करवाया जाता है। नवरात्रि में कन्या पूजन का विशेष महत्व है।दो वर्ष की कन्या कुमारी, तीन- त्रिमूर्तिनी, चार- कल्याणी, पाँच-रोहिणी, छः- काली, सात वर्ष की कन्या चंडिका, आठ- शांभवी, नौ वर्ष की कन्या दुर्गा, दस वर्ष की शुभद्रा स्वरूपा मानी जाती हैं।नवरात्रि में पूजन के नौ दिन विशेष महत्व के हैं। प्रतिपदा को देवी को आँवला, सुगंधित द्रव्य, द्वितीया को रेशम चोटी, तृतीया को सिंदूर-दर्पण, चतुर्थी को मधुपर्क, तिलक, काजल, पंचमी को चंदन पदार्थ, आभूषण, षष्ठी को माला, पुष्पादि अर्पित किया जाता है। सप्तमी को ग्रहमध्य पूजन, अष्टमी को उपवासपूर्वक पूजन, नवमीं को महापूजा व कुमारी पूजा का महत्व है। दशमी को पूजन के बाद दशमांश हवन, तर्पण, भार्गव व ब्राह्मण भोजन कराकर व्रत पारण किया जाता है। हवन से पूर्व महानवमी को हनुभद् ध्वजारोहण भी किया जाता है, क्योंकि हनुमानजी की विजयपताका के अर्पण बिना श्रीराम का प्रस्थान संभव नहीं। दसवें दिन विसर्जन के बाद ही नवरात्रि महापर्व पूर्ण होता है। नवरात्रि पूजन सीमातीत फलदायक कहा गया है। देवी पूजन से यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों फलों को देने वाला महापर्व है।नवरात्रि के नौ दिनों तक समूचा परिवेश श्रद्धा व भक्ति, संगीत के रंग से सराबोर हो उठता है। देवी के भजनों के सुरों के संग गरबा नृत्य की धूम भक्तों में नव ऊर्जा, उत्साह व श्रद्धा जगाती है। धार्मिक आस्था के साथ नवरात्रि महापर्व भक्तों को एकता, सौहार्द, भाईचारे के सूत्र में बाँधकर उनमें सद्भावना पैदा करता है।
इनकी आराधना करने से गुप्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं। इन दिनों किए जाने वाले टोने-टोटके भी बहुत प्रभावशाली होते हैं, जिनके माध्यम से कोई भी मनोकामना पूर्ति कर सकता है। गुप्त नवरात्रि में किए जाने वाले कुछ टोटके इस प्रकार हैं-

1- यदि लड़की के विवाह में बाधा आ रही है तो गुप्त नवरात्रि में पडऩे वाले गुरुवार (इस बार 7 जुलाई) के दिन केले की जड़ थोड़ी काटकर ले आएँ और इसे पीले कपड़े में बांधकर लड़की के गले में बांध दें। शीघ्र ही विवाह हो जाएगा।

2- यदि आपके बच्चे को अक्सर नजर लगती है तो नवरात्रि में हनुमानजी के मंदिर में जाकर हनुमानचालीसा का पाठ करें और दाहिने पैर का सिंदूर बच्चे के मस्तक पर लगाएं। बच्चे को नजर नहीं लगेगी।

3- यदि नौकरी नहीं मिल रही है तो भैरवजी के मंदिर जाकर प्रार्थना करें व नैवेद्य चढ़ाएं। इससे नौकरी से संबंधित आपकी सभी समस्याएं हल हो जाएंगी।

4- शत्रुओं की संख्या बढ़ गई है और उनसे भय लगने लगा है तो नवरात्रि में प्रतिदिन भगवान नृसिंह के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करें व पूजन करें।

5- धन प्राप्ति के लिए लक्ष्मी-नारायण के मंदिर में जाकर खीर व मिश्री का प्रसाद चढ़ाएं व शुक्रवार के दिन 9 वर्ष तक की कन्याओं को उनकी पसंद का भोजन कराएं। हो सके तो उन्हें कुछ उपहार भी दें।

6- पीपल के पत्ते पर राम लिखकर तथा कुछ मीठा रखकर हनुमान मंदिर में चढ़ाएं। इससे भी धन लाभ होने लगेगा।

7- भगवान शंकर आरोग्य के देवता है। नवरात्रि में उन्हें प्रतिदिन सुबह एक लोटा जल चढ़ाएं और रोग निवारण के लिए प्रार्थना करें। शीघ्र ही आपके स्वास्थ्य में लाभ होगा।

——गुप्त नवरात्रि जगतजननी दुर्गा की उपासना से शक्ति और मनोरथ सिद्धि का विशेष काल माना गया है। शास्त्रों के मुताबिक संसार में प्राणी, वनस्पति, ग्रह-नक्षत्र सभी में दिखाई देने वाली या अनुभव होने वाली हर तरह की शक्तियां आदिशक्ति का ही स्वरूप है। यह आदिशक्ति ही ब्रह्मरूप है।

—-वेदों में जगतजननी जगदंबा द्वारा स्वयं कहा गया है कि वह ही पूरे ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री है। इसलिए सभी कर्मफल और सुख-समृद्धि मेरे द्वारा ही प्रदान किए जाते हैं।

—-अगर आप भी जीवन से जुड़ी इच्छाओं जैसे धन, पद, संतान या सम्मान को पूरा करना चाहते हैं तो यहां बताए जा रहे देवी दुर्गा के एक मंत्र का जप गुप्त नवरात्रि, शुक्रवार, नवमी तिथि पर जरूर करें। यह मंत्र सरल है और पारंपरिक धार्मिक कार्यों में भी स्मरण किया जाता है।

जानते हैं यह मंत्र और देवी उपासना की सरल विधि —-

—– गुप्त नवरात्रि में सुबह या विशेष रूप से रात्रि में दिन के मुताबिक देवी के अलग-अलग स्वरूपों का ध्यान कर सामान्य पूजा सामग्री अर्पित करें।

——पूजा में लाल गंध, लाल फूल, लाल वस्त्र, आभूषण, लाल चुनरी चढ़ाकर फल या चना-गुड़ का भोग लगाएं। धूप व दीप जलाकर माता के नीचे लिखे मंत्र का नौ ही दिन कम से कम एक माला यानी 108 बार जप करना बहुत ही मंगलकारी होता है –

सर्व मंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।

शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोस्तुते।।

- —–मंत्र जप के बाद देवी की आरती करें और मंगल कामना करते हुए अपनी समस्याओं को दूर करने के लिये मन ही मन देवी से प्रार्थना करें।
यही कारण है कि व्यावहारिक उपाय के साथ धार्मिक उपायों को जोड़कर शास्त्रों में देवी उपासना के कुछ विशेष मंत्रों का स्मरण सामान्य ही नहीं गंभीर रोगों की पीड़ा को दूर करने वाला माना गया है।

——-इन रोगनाशक मंत्रों का नवरात्रि के विशेष काल में ध्यान अच्छी सेहत के लिये बहुत ही असरदार माना गया है। जानते हैं यह रोगनाशक विशेष देवी मंत्र –

ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।

—– धार्मिक मान्यता है कि नवरात्रि के अलावा हर रोज भी इस मंत्र का यथसंभव 108 बार जप तन, मन व स्थान की पवित्रता के साथ करने से संक्रामक रोग सहित सभी गंभीर बीमारियों का भी अंत होता है। घर-परिवार रोगमुक्त होता है।

इस मंत्र जप के पहले देवी की पूजा पारंपरिक पूजा सामग्रियों से जरूर करें। जिनमें गंध, फूल, वस्त्र, फल, नैवेद्य शामिल हो। इतना भी न कर पाएं तो धूप व दीप जलाकर भी इस मंत्र का ध्यान कर आरती करना भी बहुत शुभ माना गया है।
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गुप्त नवरात्री के (मनचाहा दूल्हा चाहिए तो करें यह उपाय) दौरान विशेष साधना तथा पूजन से आप अपनी सभी मनोकामना पूरी कर सकते हैं। यदि आपकी पुत्री के विवाह में अड़चनें आ रही हैं तो निम्न उपाय करने पर आपकी यह समस्या शीघ्र ही दूर हो जाएगी। ॥ ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः ॥

1- नवरात्रि में पडऩे वाले सोमवार(4 जुलाई) को अपने आस-पास स्थित किसी शिव मंदिर में जाएं। वहां भगवान शिव एवं मां पार्वती पर जल एवं दूध चढ़ाएं और पंचोपचार (चंदन, पुष्प, धूप, दीप एवं नैवेद्य) से उनका पूजन करें। अब मौली से उन दोनों के मध्य गठबंधन करें। अब वहां बैठकर लाल चंदन की माला से निम्नलिखित मंत्र का जाप 108 बार करें-

हे गौरी शंकरार्धांगी। यथा त्वं शंकर प्रिया।

तथा मां कुरु कल्याणी, कान्त कान्तां सुदुर्लभाम्।।

इसके बाद तीन माह तक नित्य इसी मंत्र का जप शिव मंदिर में अथवा अपने घर के पूजाकक्ष में मां पार्वती के सामने 108 बार जाप करें। घर पर भी आपको पंचोपचार पूजा करनी है। शीघ्र ही पार्वतीजी की कृपा से आपको सुयोग्य वर की प्राप्ति होगी।

2- शीघ्र विवाह एवं विवाह में आ रही बाधाओं के निवारण के लिए प्रतिदिन माता के कात्यायनी स्वरूप की पूजा करें। इसके बाद नित्य निम्नलिखित मंत्र का 3, 5 अथवा 10 माला का जप करें-

कात्यायनि महामाये, महा योगिन्यधीश्वरि।

नन्दगोपस्तुतं देवि, पतिं मे कुरु ते नम:।।

3- गुप्त नवरात्रि में शिव-पार्वती का एक चित्र अपने पूजास्थल में रखें और उनकी पूजा-अर्चना करने के पश्चात निम्नलिखित मंत्र का 3, 5 अथवा 10 माला जप करें। जप के पश्चात भगवान शिव से विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करें-

ऊँ शं शंकराय सकल-जन्मार्जित-पाप-विध्वंसनाय,

पुरुषार्थ-चतुष्टय-लाभाय च पतिं मे देहि कुरु कुरु स्वाहा।।

इस प्रयोग के साथ ही प्रतिदिन सुबह केले के पत्ते में जल चढ़ाने के बाद उसकी 11 परिक्रमा भी करें।
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गुप्त नवरात्रि: सुखी दाम्पत्य जीवन के अचूक उपाय —

पति-पत्नी एक गाड़ी के दो पहिए होते हैं। यानी एक-दूसरे के बिना वे अधूरे हैं। इसके बाद भी पति-पत्नी में विवाद होते रहते हैं। कई बार विवाद काफी बड़ भी जाते हैं। गुप्त नवरात्रि में कुछ साधारण उपाय करने से दाम्पत्य जीवन में आ रही परेशानियों को दूर किया जा सकता है। ये उपाय इस प्रकार हैं-

उपाय—

1- यदि जीवनसाथी से अनबन होती रहती है तो गुप्त नवरात्रि में नीचे लिखे मंत्र को पढ़ते हुए 108 बार अग्नि में घी से आहुतियां दें। इससे यह मंत्र सिद्ध हो जाएगा। अब नित्य सुबह उठकर पूजा के समय इस मंत्र को 21 बार पढ़ें। यदि संभव हो तो अपने जीवनसाथी से भी इस मंत्र का जप करने के लिए कहें-

सब नर करहिं परस्पर प्रीति।

चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।।

2- नवरात्रि में रोज शाम को भगवान लक्ष्मीनारायण के मंदिर में दर्शन के लिए जाएँ और वहां उन्हें बेसन के लड्डुओं को प्रसाद चढ़ाएं। इससे शीघ्र ही आप दोनों के मध्य वैचारिक सामंजस्य अच्छा रहने लगेगा।

3- रोज सुबह-शाम यदि घर में शंख बजाया जाए जाए अथवा गायत्री मंत्र का जप करें गृहक्लेश समाप्त हो जाता है।

4- कुंडली में स्थित राहु के कारण यदि दाम्पत्य जीवन में मतभेद हो रहे हो तो मां सरस्वती की पूजा करें। उन्हें नीले रंग का पुष्प अर्पित करें और सरस्वती चालीसा का पाठ करें।

5- यदि परिजनों के मध्य अशांति हो रही हो तो नवरात्रि में प्रतिदिन इस मंत्र को स्फटिक की माला से भगवान राम और माता सीता के सम्मुख 324(तीन माला) बार जपें। इसके बाद अंतिम नवरात्र को इस मंत्र का उच्चारण करते हुए 11 बार घी से अग्नि में आहुति प्रदान करें। भगवान को खीर का भोग लगाएं

मंत्र- जब ते राम ब्याहि घर आए।

नित नव मंगल मोद बधाए।।
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गुप्त नवरात्री के दौरान की गई पूजा विशेष फलदाई रहती है। यदि आपके विवाह में अड़चनें आ रही हैं तो नीचे लिखे उपाय करने पर शीघ्र ही आपको मनचाही दुल्हन मिलेगी तथा सभी कार्य सफल होंगे।
उपाय——
1- नवरात्रि में प्रतिदिन सुबह किसी शिव मंदिर में जाएं। वहां शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद और शक्कर चढ़ाते हुए उसे अच्छी तरह से साफ करें। फिर शुद्ध जल चढ़ाएं और पूरे मंदिर में झाड़ू लगाकर उसे साफ करें। अब भगवान शिव की चंदन, पुष्प एवं धूप, दीप आदि से पूजा-अर्चना करें।

रात्रि 10 बजे के पश्चात अग्नि प्रज्वलित कर ऊँ नम: शिवाय मंत्र का उच्चारण करते हुए घी से 108 आहुति दें। अब 40 दिनों तक नित्य इसी मंत्र का पांच माला जप भगवान शिव के सम्मुख करें। इससे शीघ्र ही आपकी मनोकामना पूर्ण होगी और अच्छे स्थान पर विवाह संबंध तय होगा।

2- यदि विवाह में अड़चने अधिक आ रही हों तो मां जगदंबा का एक चित्र लाल कपड़े पर रखें और उसके सामने चावल से दो स्वस्तिक बनाएं। एक स्वस्तिक पर गणेशजी को विराजमान करें और दूसरे पर गौरी-शंकर रुद्राक्ष को स्थापित करें। यह रुद्राक्ष साक्षात मां पार्वती और भगवान शिव का प्रतीक है। अब इसके सम्मुख निम्नलिखित मंत्र का 108 बार जाप करें और विवाह में आ रही बाधाओं के निवारण और शीघ्र विवाह की प्रार्थना भगवान से करें-

ऊँ कात्यायन्यै नम:

अंत में इस रुद्राक्ष को मां गौरी और भगवान शिव का प्रसाद समझकर गले में धारण कर लें। शीघ्र ही आपका विवाह अच्छे स्थान पर तय हो जाएगा।

3- गुप्त नवरात्रि में रोज नीचे लिखे मंत्र का जप तीन माला करें। जप से पूर्व मां दुर्गा की पंचोपचार पूजा करें और उन्हें लाल रंग का सुगंधित पुष्प अवश्य चढ़ाएं। इसके प्रभाव से शीघ्र ही आपका विवाह अच्छे स्थान पर तय हो जाएगा-

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीं तारिणीं दुर्ग संसारसागरस्य कुलोद्भवाम्।।

4- गुप्त नवरात्र के गुरुवार(7 जुलाई) को पीले रंग का एक रुमाल मां दुर्गा को चढ़ाएं और पूजन के पश्चात यह रूमाल अपने साथ रखें। यह मां दुर्गा के प्रसादस्वरूप है। अब इसे आपको सदैव अपने साथ रखना है। शीघ्र आप देंखेंगे कि आपकी मनोकामना पूर्ण हो गई है।
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गुप्त नवरात्रि टोने-टोटकों के लिए बहुत ही उत्तम समय रहता है। गुप्त नवरात्रि में तंत्र शास्त्र के अनुसार इस दौरान किए गए सभी तंत्र प्रयोग शीघ्र ही फल देते हैं। यदि आप गरीब हैं और धनवान होना चाहते हैं गुप्त नवरात्रि इसके लिए बहुत ही श्रेष्ठ समय है। नीचे लिखे टोटके को विधि-विधान से करने से आपकी मनोकामना शीघ्र ही पूरी होगी।
टोटका——–
गुप्त नवरात्रि में पडऩे वालेशुक्रवार को रात 10 बजे के बाद सभी कार्यों से निवृत्त होकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके पीले आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने तेल के 9 दीपक जला लें। ये दीपक साधनाकाल तक जलते रहने चाहिए। दीपक के सामने लाल चावल की एक ढेरी बनाएं फिर उस पर एक श्रीयंत्र रखकर उसका कुंकुम, फूल, धूप, तथा दीप से पूजन करें। उसके बाद एक प्लेट पर स्वस्तिक बनाकर उसे अपने सामने रखकर उसका पूजन करें। श्रीयंत्र को अपने पूजा स्थल पर स्थापित कर लें और शेष सामग्री को नदी में प्रवाहित कर दें। इस प्रयोग से धनागमन होने लगेगा।
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——–माँ शक्ति को प्रसन्न करने का प्रमुख मंत्र——-
धूप दीप प्रसाद माता को अर्पित करें
रुद्राक्ष की माला से ग्यारह माला का मंत्र जप करें
दुर्गा सप्तशती का पाठ करें
मंत्र-ॐ ह्रीं सर्वैश्वर्याकारिणी देव्यै नमो नम:
पेठे का भोग लगाएं

दस महाविद्याओं से पाइए मनचाही कामना—–

———————काली———————-
लम्बी आयु,बुरे ग्रहों के प्रभाव,कालसर्प,मंगलीक बाधा,अकाल मृत्यु नाश आदि के लिए देवी काली की साधना करें
हकीक की माला से मंत्र जप करें
नौ माला का जप कम से कम करें
मंत्र-क्रीं ह्रीं ह्रुं दक्षिणे कालिके स्वाहा:
———————तारा———————–
तीब्र बुद्धि रचनात्मकता उच्च शिक्षा के लिए करें माँ तारा की साधना
नीले कांच की माला से मंत्र जप करें
बारह माला का जप करें
मंत्र-ॐ ह्रीं स्त्रीं हुम फट
——————-त्रिपुर सुंदरी——————–
व्यक्तित्व विकास पूर्ण स्वास्थ्य और सुन्दर काया के लिए त्रिपुर सुंदरी देवी की साधना करें
रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें
दस माला मंत्र जप अवश्य करें
मंत्र-ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः
——————भुवनेश्वरी————————
भूमि भवन बाहन सुख के लिए भुबनेश्वरी देवी की साधना करें
स्फटिक की माला का प्रयोग करें
ग्यारह माला मंत्र जप करें
मन्त्र-ॐ ह्रीं भुबनेश्वरीयै ह्रीं नमः
——————छिन्नमस्ता———————-
रोजगार में सफलता,नौकरी पद्दोंन्ति के लिए छिन्नमस्ता देवी की साधना करें
रुद्राक्ष की माला से मंत्र जप करें
दस माला मंत्र जप करना चाहिए
मंत्र-ॐ श्रीं ह्रीं ऐं वज्र वैरोचानियै ह्रीं फट स्वाहा:
—————–त्रिपुर भैरवी———————–
सुन्दर पति या पत्नी प्राप्ति,प्रेम विवाह,शीघ्र विवाह,प्रेम में सफलता के लिए त्रिपुर भैरवी देवी की साधना करें
मूंगे की माला से मंत्र जप करें
पंद्रह माला मंत्र जप करें
मंत्र-ॐ ह्रीं भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा:
——————धूमावती————————
तंत्र मंत्र जादू टोना बुरी नजर और भूत प्रेत आदि समस्त भयों से मुक्ति के लिए धूमावती देवी की साधना करें
मोती की माला का प्रयोग मंत्र जप में करें
नौ माला मंत्र जप करें
मंत्र-ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:
—————–बगलामुखी———————–
शत्रुनाश,कोर्ट कचहरी में विजय,प्रतियोगिता में सफलता के लिए माँ बगलामुखी की साधना करें
हल्दी की माला या पीले कांच की माला का प्रयोग करें
आठ माला मंत्र जप को उत्तम माना गया है
मन्त्र-ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम:
——————-मातंगी————————-
संतान प्राप्ति,पुत्र प्राप्ति आदि के लिए मातंगी देवी की साधना करें
स्फटिक की माला से मंत्र जप करें
बारह माला मंत्र जप करें
ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा:
——————-कमला————————-
अखंड धन धान्य प्राप्ति,ऋण नाश और लक्ष्मी जी की कृपा के लिए देवी कमला की साधना करें
कमलगट्टे की माला से मंत्र जप करें
दस माला मंत्र जप करना चाहिए
मंत्र-हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा:
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नवरात्रि व्रत का महत्व, पूजन—–
नवरात्रि का अर्थ होता है, नौ रातें। हिन्दू धर्मानुसार यह पर्व वर्ष में दो बार आता है। एक शरद माह की नवरात्रि और दूसरी बसंत माह की| इस पर्व के दौरान तीन प्रमुख हिंदू देवियों- पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ स्वरुपों श्री शैलपुत्री, श्री ब्रह्मचारिणी, श्री चंद्रघंटा, श्री कुष्मांडा, श्री स्कंदमाता, श्री कात्यायनी, श्री कालरात्रि, श्री महागौरी, श्री सिद्धिदात्री का पूजन विधि विधान से किया जाता है | जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी।
तृतीय चंद्रघण्टेति कुष्माण्डेति चतुर्थकम्।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रि महागौरीति चाऽष्टम्।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिताः।

नव दुर्गा——

प्रथम दुर्गा : श्री शैलपुत्री

श्री दुर्गा का प्रथम रूप श्री शैलपुत्री हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री कहलाती हैं। नवरात्र के प्रथम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है।

द्वितीय दुर्गा : श्री ब्रह्मचारिणी

श्री दुर्गा का द्वितीय रूप श्री ब्रह्मचारिणी हैं। यहां ब्रह्मचारिणी का तात्पर्य तपश्चारिणी है। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप से प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। अतः ये तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी के नाम से विख्यात हैं। नवरात्रि के द्वितीय दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है।

तृतीय दुर्गा : श्री चंद्रघंटा

श्री दुर्गा का तृतीय रूप श्री चंद्रघंटा है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। नवरात्रि के तृतीय दिन इनका पूजन और अर्चना किया जाता है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।

चतुर्थ दुर्गा : श्री कूष्मांडा

श्री दुर्गा का चतुर्थ रूप श्री कूष्मांडा हैं। अपने उदर से अंड अर्थात् ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी के नाम से पुकारा जाता है। नवरात्रि के चतुर्थ दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। श्री कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं।

पंचम दुर्गा : श्री स्कंदमाता

श्री दुर्गा का पंचम रूप श्री स्कंदमाता हैं। श्री स्कंद (कुमार कार्तिकेय) की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। नवरात्रि के पंचम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। इनकी आराधना से विशुद्ध चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं।

षष्ठम दुर्गा : श्री कात्यायनी

श्री दुर्गा का षष्ठम् रूप श्री कात्यायनी। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसलिए वे कात्यायनी कहलाती हैं। नवरात्रि के षष्ठम दिन इनकी पूजा और आराधना होती है।

सप्तम दुर्गा : श्री कालरात्रि

श्रीदुर्गा का सप्तम रूप श्री कालरात्रि हैं। ये काल का नाश करने वाली हैं, इसलिए कालरात्रि कहलाती हैं। नवरात्रि के सप्तम दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। इस दिन साधक को अपना चित्त भानु चक्र (मध्य ललाट) में स्थिर कर साधना करनी चाहिए।

अष्टम दुर्गा : श्री महागौरी

श्री दुर्गा का अष्टम रूप श्री महागौरी हैं। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है, इसलिए ये महागौरी कहलाती हैं। नवरात्रि के अष्टम दिन इनका पूजन किया जाता है। इनकी उपासना से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

नवम् दुर्गा : श्री सिद्धिदात्री

श्री दुर्गा का नवम् रूप श्री सिद्धिदात्री हैं। ये सब प्रकार की सिद्धियों की दाता हैं, इसीलिए ये सिद्धिदात्री कहलाती हैं। नवरात्रि के नवम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है।

इस दिन को रामनवमी भी कहा जाता है और शारदीय नवरात्रि के अगले दिन अर्थात दसवें दिन को रावण पर राम की विजय के रूप में मनाया जाता है। दशम् तिथि को बुराई पर अच्छाकई की विजय का प्रतीक माना जाने वाला त्योतहार विजया दशमी यानि दशहरा मनाया जाता है। इस दिन रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के पुतले जलाये जाते हैं।
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नवरात्रि का महत्व एवं मनाने का कारण —————

नवरात्रि काल में रात्रि का विशेष महत्‍व होता है|देवियों के शक्ति स्वरुप की उपासना का पर्व नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक, निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की । तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा। नवरात्रि के नौ दिनों में आदिशक्ति माता दुर्गा के उन नौ रूपों का भी पूजन किया जाता है जिन्होंने सृष्टि के आरम्भ से लेकर अभी तक इस पृथ्वी लोक पर विभिन्न लीलाएँ की थीं। माता के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है।
नवरात्रि के समय रात्रि जागरण अवश्‍य करना चाहिये और यथा संभव रात्रिकाल में ही पूजा हवन आदि करना चाहिए। नवदुर्गा में कुमारिका यानि कुमारी पूजन का विशेष अर्थ एवं महत्‍व होता है। गॉंवों में इन्‍हें कन्‍या पूजन कहते हैं। जिसमें कन्‍या पूजन कर उन्‍हें भोज प्रसाद दान उपहार आदि से कुमारी कन्याओं की सेवा की जाती है।
नवरात्रि व्रत विधि———–
आश्विन मास के शुक्लपक्ष कि प्रतिपद्रा से लेकर नौं दिन तक विधि पूर्वक व्रत करें। प्रातः काल उठकर स्नान करके, मन्दिर में जाकर या घर पर ही नवरात्रों में दुर्गाजी का ध्यान करके कथा पढ़नी चहिए। यदि दिन भर का व्रत न कर सकें तो एक समय का भोजन करें । इस व्रत में उपवास या फलाहार आदि का कोई विशेष नियम नहीं है। कन्याओं के लिये यह व्रत विशेष फलदायक है। कथा के अन्त में बारम्बार ‘दुर्गा माता तेरी सदा जय हो’ का उच्चारण करें ।
गुप्त नवरात्री :——–
हिंदू धर्म के अनुसार एक वर्ष में चार नवरात्रि होती है। वर्ष के प्रथम मास अर्थात चैत्र में प्रथम नवरात्रि होती है। चौथे माह आषाढ़ में दूसरी नवरात्रि होती है। इसके बाद अश्विन मास में प्रमुख नवरात्रि होती है। इसी प्रकार वर्ष के ग्यारहवें महीने अर्थात माघ में भी गुप्त नवरात्रि मनाने का उल्लेख एवं विधान देवी भागवत तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है।
इनमें अश्विन मास की नवरात्रि सबसे प्रमुख मानी जाती है। इस दौरान पूरे देश में गरबों के माध्यम से माता की आराधना की जाती है। दूसरी प्रमुख नवरात्रि चैत्र मास की होती है। इन दोनों नवरात्रियों को क्रमश: शारदीय व वासंती नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। इसके अतिरिक्त आषाढ़ तथा माघ मास की नवरात्रि गुप्त रहती है। इसके बारे में अधिक लोगों को जानकारी नहीं होती, इसलिए इन्हें गुप्त नवरात्रि कहते हैं। गुप्त नवरात्रि विशेष तौर पर गुप्त सिद्धियां पाने का समय है। साधक इन दोनों गुप्त नवरात्रि में विशेष साधना करते हैं तथा चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त करते हैं।

कलश स्थापना———
नवरात्र के दिनों में कहीं-कहीं पर कलश की स्थापना की जाती है एक चौकी पर मिट्टी का कलश पानी भरकर मंत्रोच्चार सहित रखा जाता है। मिट्टी के दो बड़े कटोरों में मिट्टी भरकर उसमे गेहूं/जौ के दाने बो कर ज्वारे उगाए जाते हैं और उसको प्रतिदिन जल से सींचा जाता है। दशमी के दिन देवी-प्रतिमा व ज्वारों का विसर्जन कर दिया जाता है।महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती मुर्तियाँ बनाकर उनकी नित्य विधि सहित पूजा करें और पुष्पो को अर्ध्य देवें । इन नौ दिनो में जो कुछ दान आदि दिया जाता है उसका करोड़ों गुना मिलता है इस नवरात्र के व्रत करने से ही अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है।

कन्या पूजन——-नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। अष्टमी के दिन कन्या-पूजन का महत्व है जिसमें 5, 7,9 या 11 कन्याओं को पूज कर भोजन कराया जाता है।

नवरात्रि व्रत की कथा——

नवरात्रि व्रत की कथा के बारे प्रचलित है कि पीठत नाम के मनोहर नगर में एक अनाथ नाम का ब्राह्यण रहता था। वह भगवती दुर्गा का भक्त था। उसके सुमति नाम की एक अत्यन्त सुन्दर कन्या थी। अनाथ, प्रतिदिन दुर्गा की पूजा और होम किया करता था, उस समय सुमति भी नियम से वहाँ उपस्थित होती थी। एक दिन सुमति अपनी साखियों के साथ खेलने लग गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई। उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर क्रोध आया और पुत्री से कहने लगा कि हे दुष्ट पुत्री! आज प्रभात से तुमने भगवती का पूजन नहीं किया, इस कारण मै किसी कुष्ठी और दरिद्र मनुष्य के साथ तेरा विवाह करूँगा। पिता के इस प्रकार के वचन सुनकर सुमति को बड़ा दुःख हुआ और पिता से कहने लगी कि ‘मैं आपकी कन्या हूँ। मै सब तरह से आधीन हूँ जैसी आप की इच्छा हो मैं वैसा ही करूंगी। रोगी, कुष्ठी अथवा और किसी के साथ जैसी तुम्हारी इच्छा हो मेरा विवाह कर सकते हो। होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है। मनुष्य न जाने कितने मनोरथों का चिन्तन करता है, पर होता है वही है जो भाग्य विधाता ने लिखा है। अपनी कन्या के ऐसे कहे हुए वचन सुनकर उस ब्राम्हण को अधिक क्रोध आया। तब उसने अपनी कन्या का एक कुष्ठी के साथ विवाह कर दिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर पुत्री से कहने लगा कि जाओ-जाओ जल्दी जाओ अपने कर्म का फल भोगो। सुमति अपने पति के साथ वन चली गई और भयानक वन में कुशायुक्त उस स्थान पर उन्होंने वह रात बड़े कष्ट से व्यतीत की।उस गरीब बालिका कि ऐसी दशा देखकर भगवती पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रकट होकर सुमति से कहने लगी की, हे दीन ब्रम्हणी! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, तुम जो चाहो वरदान माँग सकती हो। मैं प्रसन्न होने पर मनवांछित फल देने वाली हूँ। इस प्रकार भगवती दुर्गा का वचन सुनकर ब्रह्याणी कहने लगी कि आप कौन हैं जो मुझ पर प्रसन्न हुईं। ऐसा ब्रम्हणी का वचन सुनकर देवी कहने लगी कि मैं तुझ पर तेरे पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूँ। तू पूर्व जन्म में निषाद (भील) की स्त्री थी और पतिव्रता थी। एक दिन तेरे पति निषाद द्वारा चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ कर जेलखाने में कैद कर दिया था। उन लोगों ने तेरे और तेरे पति को भोजन भी नहीं दिया था। इस प्रकार नवरात्र के दिनों में तुमने न तो कुछ खाया और न ही जल पिया इसलिए नौ दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया।हे ब्रम्हाणी ! उन दिनों में जो व्रत हुआ उस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर तुम्हे मनोवांछित वस्तु दे रही हूँ। ब्राह्यणी बोली की अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो कृपा करके मेरे पति के कोढ़ को दूर करो। उसके पति का शरीर भगवती की कृपा से कुष्ठहीन होकर अति कान्तियुक्त हो गया।
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नवरात्र में जीवनी शक्ति का संचरण होता है। यह समय ऋतु परिवर्तन का होता है। इन ऋतुओं के परिवर्तन के समय महामारी, ज्वर, कफ-खांसी आदि विभिन्न रोगों के प्रभाव में वृद्धि होती है। आयुर्वेद के अनुसार इस समय शरीर की शुद्धि होती है। बढ़े हुए वात् पित एवं कफ का शमन करना चाहिए। नवरात्र में आद्याशक्ति की उपासना एवं आराधना करने से विभिन्न रोगों एवं उपद्रवों का शमन होता है।

चैत्र नवरात्र प्राय: मीन-मेष की संक्रांति पर आती है। नवग्रह में कोई भी ग्रह अनिष्ट फल देने जा रहा हो जो शक्ति उपासना करने से विशेष लाभ मिलती है। सूर्य ग्रह के कमजोर रहने पर स्वास्थ्य लाभ के लिए शैलपुत्री की उपासना से लाभ मिलती है। चंद्रमा के दुष्प्रभाव को दूर करने के कुष्मांडा देवी की विधि विधान से नवरात्रि में साधना करें। मंगल ग्रह के दुष्प्रभाव से बचने के लिए स्कंदमाता, बुध ग्रह की शांति तथा अर्थव्यवस्था में वृद्धि के लिए कात्यायनी देवी, गुरु ग्रह के अनुकूलता के लिए महागौरी, शुक्र के शुभत्व के लिए सिद्धिदात्रि तथा शनि के दुष्प्रभाव को दूर कर शुभता पाने के लिए कालरात्रि के उपासना सार्थक रहती है। राहु की शुभता प्राप्त करने के लिए ब्रह्माचारिणी की उपासना करनी चाहिए। केतु के विपरीत प्रभाव को दूर करने के लिए चंद्रघंटा की साधना अनुकूलता देती है।

संक्रामक रोग, महामारी नाश के लिए निम्न मंत्रों का जाप विशेष लाभप्रद रहता है——

‘ऊँ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते’।
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सुखी दाम्पत्य जीवन के अचूक उपाय—-
पति-पत्नी एक गाड़ी के दो पहिए होते हैं। यानी एक-दूसरे के बिना वे अधूरे हैं। इसके बाद भी पति-पत्नी में विवाद होते रहते हैं। कई बार विवाद काफी बड़ भी जाते हैं। आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि (2 से 9 जुलाई तक) में कुछ साधारण उपाय करने से दाम्पत्य जीवन में आ रही परेशानियों को दूर किया जा सकता है। ये उपाय इस प्रकार हैं-

उपाय—-

1- यदि जीवनसाथी से अनबन होती रहती है तो गुप्त नवरात्रि में नीचे लिखे मंत्र को पढ़ते हुए 108 बार अग्नि में घी से आहुतियां दें। इससे यह मंत्र सिद्ध हो जाएगा। अब नित्य सुबह उठकर पूजा के समय इस मंत्र को 21 बार पढ़ें। यदि संभव हो तो अपने जीवनसाथी से भी इस मंत्र का जप करने के लिए कहें-

सब नर करहिं परस्पर प्रीति।

चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।।

2- नवरात्रि में रोज शाम को भगवान लक्ष्मीनारायण के मंदिर में दर्शन के लिए जाएँ और वहां उन्हें बेसन के लड्डुओं को प्रसाद चढ़ाएं। इससे शीघ्र ही आप दोनों के मध्य वैचारिक सामंजस्य अच्छा रहने लगेगा।

3- रोज सुबह-शाम यदि घर में शंख बजाया जाए जाए अथवा गायत्री मंत्र का जप करें गृहक्लेश समाप्त हो जाता है।

4- कुंडली में स्थित राहु के कारण यदि दाम्पत्य जीवन में मतभेद हो रहे हो तो मां सरस्वती की पूजा करें। उन्हें नीले रंग का पुष्प अर्पित करें और सरस्वती चालीसा का पाठ करें।

5- यदि परिजनों के मध्य अशांति हो रही हो तो नवरात्रि में प्रतिदिन इस मंत्र को स्फटिक की माला से भगवान राम और माता सीता के सम्मुख 324(तीन माला) बार जपें। इसके बाद अंतिम नवरात्र को इस मंत्र का उच्चारण करते हुए 11 बार घी से अग्नि में आहुति प्रदान करें। भगवान को खीर का भोग लगाएं

मंत्र- जब ते राम ब्याहि घर आए।

नित नव मंगल मोद बधाए।।

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