>नए भवन में कहाँ..क्या ..रखे ..वास्तु अनुसार…???

>पूर्व-दक्षिण में बनी सीढ़ियाँ अत्यंत शुभ–सदैव उत्तर दिशा में रखें तिजोरी ::—-

सीढ़ी :—
वास्तु के अनुसार मकान में सीढ़ी या सोपान पूर्व या दक्षिण दिशा में होना चाहिए। यह अत्यंत शुभ होता है। अगर सीढ़ियाँ मकान के पार्श्व में दक्षिणी व पश्चिमी भाग की दाईं ओर हो, तो उत्तम हैं। अगर आप मकान में घुमावदार सीढ़ियाँ बनाने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो आपके लिए यह जान लेना आवश्यक है कि सीढ़ियों का घुमाव सदैव पूर्व से दक्षिण, दक्षिण से पश्चिम, पश्चिम से उत्तर और उत्तर से पूर्व की ओर रखें। चढ़ते समय सीढ़ियाँ हमेशा बाएँ से दाईं ओर मुड़नी चाहिए।

एक और बात, सीढ़ियों की संख्या हमेशा विषम होनी चाहिए। एक सामान्य फार्मूला है- सीढ़ियों की संख्या को 3 से विभाजित करें तथा शेष 2 रखें- अर्थात्‌ 5, 11, 17, 23, 29 आदि की संख्या में हों।
वास्तु शास्त्र में भवन में सीढ़ियाँ वास्तु के अनुसार सही नहीं हो, तो उन्हें तोड़ने की जरूरत नहीं है। बस आपको वास्तु दोष दूर करने के लिए दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक कमरा बनवाना चाहिए। यदि सीढ़ियाँ उत्तर-पूर्व दिशा में बनी हों, तो।

तिजोरी (गल्ला) :—
मकान में गल्ला कहाँ रखना चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार मकान में तिजोरी-गल्ला, नकदी, कीमती आभूषण आदि सदैव उत्तर दिशा में रखना शुभ होता है। क्योंकि कुबेर का वास उत्तर दिशा में होता है इसलिए उत्तर दिशा की ओर मुख रखने पर धन वृद्धि होती है।

जब घर में बनाएँ अलमारी या लॉकर–सम चौड़ाई वाली अलमारी रखना उत्तम :::—-

घर में अलमारी या लॉकर बनाने के लिए भी मुहूर्त देखना चाहिए। स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, घनिष्ठा, उत्तरा व शुक्रवार इस हेतु शुभ हैं और प्रथमा, द्वितीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी व पूर्णिमा तिथियाँ इस हेतु श्रेष्ठ हैं।

अलमारी (विशेषत: लकड़ी वाली) यदि कहीं बहुत पतली या बहुत चौड़ी हो तो घर में अन्न-धन की कमी बनी रहती है। अत: सम चौड़ाई वाली अलमारी हो। तिरछी कटी अलमारी भी धन का नाश करती है।

जोड़ लगाया हुआ लॉकर या अलमारी घर में रखने पर कलह व शोक होता है। अलमारी या लॉकर आगे की तरफ झुकते हों तो गृहस्वामी घर से बाहर ही रहता है।

अलमारी व लॉकर का मुख सदैव पूर्व या उत्तर की ओर खुले। विधिवत पूजन के बाद ही उसमें वस्तुएँ रखें व हर शुभ अवसर पर इष्ट देव के साथ लॉकर का भी पूजन करें (कुबेर पूजन) ताकि घर में बरकत बनी रहे।

खिड़कियाँ- वास्तु के अनुसार मकान में खिड़कियों की संख्या बराबर होनी चाहिए। पश्चिमी, पूर्वी और उत्तरी दीवारों पर खिड़कियों का निर्माण शुभ माना गया है। यह भी ध्यान रखें कि मकान में खिड़कियाँ द्वार के सामने अधिकाधिक होनी चाहिए, ताकि चुम्बकीय चक्र पूर्ण होता रहे। खिड़कियाँ कभी भी सन्धि भाग में न लगवाएँ।

सदर द्वार- मकान में मुख्य द्वार किस दिशा में हो, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। वास्तु शास्त्र के अनुसार आपके घर का मुख्य द्वार उत्तर या पूर्व में होना चाहिए। भूलकर भी दक्षिण या पश्चिम दिशा में द्वार न बनवाएँ। लेकिन अगर आपका भूखण्ड ही इस योग्य न हो कि घर का मुख्य द्वार जैसा आप चाहते हैं, निकल न पाए तो क्या करना चाहिए।

जी हाँ, यह सब भूखण्ड की स्थिति पर निर्भर करता है। यदि भूखण्ड पूर्वोन्मुख हो, तो सदर द्वार ईशान और पूर्व दिशा के मध्य,
दक्षिणोन्मुख होने पर सदर द्वार आग्नेय व दक्षिण दिशा के मध्य, पश्चिमोन्मुख हो, तो नैऋत्य और पश्चिम दिशा के मध्य तथा यदि भूखण्ड उत्तरोन्मुख हो, तो मुख्य द्वार वायव्य व उत्तर दिशा के मध्य रखना शुभ माना जाता है। मुख्य द्वार की स्थापना शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से करवानी चाहिए।

कृपया ध्यान दें- प्रवेश द्वार अन्दर की ओर खुले, पल्ले दो हों, तो अति उत्तम। दरवाजे पर स्वतः खुलने या बंद होने की मशीन न लगवाएँ। घर के सदर द्वार पर मंगल चिन्ह का प्रतीक लगवाएँ।

सहायक दरवाजे- मकान में मुख्य द्वार के अलावा अन्य सहायक दरवाजे होते हैं। उन्हें एक शीर्ष में रखने चाहिए। दरवाजों की संख्या बराबर होनी चाहिए। एक के ऊपर दूसरा दरवाजा कदापि न रखें। दरवाजे और खिड़कियाँ उत्तर व पूर्व दिशा में अधिक रखें। द्वार के सामने भूल कर भी सीढ़ी या खम्भा आदि बाधा उत्पन्न करने वाली वस्तुएँ कदापि न रखें।

तहखाना : आजकल शहरों में स्थानाभाव के कारण लोग मकान में अंडर ग्राउण्ड तहखाने का निर्माण कर रहे हैं। तलधर अथवा तहखाना कहाँ होना चाहिए। यह ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

वास्तु शास्त्र के अनुसार तलधर का निर्माण भूमि के पूर्व में या उत्तर दिशा में करें, तो शुभ है। लेकिन यह भी सुनिश्चित करें कि तलधर आवासीय कदापि न हो अर्थात्‌ उसमें आप तथा आपका परिवार निवास नहीं करता हो। अन्यथा आप हमेशा कष्ट में रहेंगे।

तहखाने का निर्माण इस प्रकार करें कि उसके चारों ओर बराबर खाली भूमि छोड़ें। मध्य भाग में निर्माण कार्य करवाएँ। यदि तहखाने का आकार विशाल वस्तु आकार का हो अथवा चूल्हे के आकार का हुआ, तो यकीन मानें आपके तथा आपके परिवार के लिए कतई शुभ नहीं है। भवन का विनाश निश्चित है।

पार्किंग : भवन में पार्किंग वास्तु के अनुसार दक्षिण-पूर्व या उत्तर-पश्चिम दिशा में ही बनवाएँ।

पशुशाला : यदि आप अपने मकान का निर्माण वृहद उद्देश्यों की प्राप्ति को ध्यान में रखकर करने जा रहे हैं, तो पशुशाला का निर्माण मकान में उत्तर-पश्चिम दिशा अर्थात्‌ वायव्य कोण में निर्धारित कर लें। वास्तु शास्त्र के अनुसार यह अत्यंत शुभ होता है।

गायों-दुधारु पशुओं का स्थान वायव्य कोण में ही निर्धारित किया गया है।

ब्रह्म स्थान—-आँगन मकान का केन्द्रीय स्थल होता है। यह ब्रह्म स्थान भी कहलाता है। ब्रह्म स्थान सदैव खुला व साफ रखना चाहिए। पुराने जमाने में ब्रह्म स्थान में चौक, आँगन होता था। गाँवों की बात छोड़ दें, तो शहरों में मकान में आँगन रखने का रिवाज लगभग उठ-सा गया है।

वास्तु शास्त्र में मकान आँगन रखने पर जोर दिया जाता है। वास्तु के अनुसार, मकान का प्रारूप इस प्रकार रखना चाहिए कि आँगन मध्य में अवश्य हो। अगर स्थानाभाव है, तो मकान में खुला क्षेत्र इस प्रकार उत्तर या पूर्व की ओर रखें, जिससे सूर्य का प्रकाश व ताप मकान में अधिकाधिक प्रवेश कर सके।

इस तरह की व्यवस्था होने पर घर में रहने वाले प्राणी बहुत कम बीमार होते हैं। वे हमेशा सुखी रहते हैं, स्वस्थ व प्रसन्न रहते हैं। आँगन किस प्रकार होना चाहिए- यह मध्य में ऊँचा और चारों ओर से नीचा हो। अगर यह मध्य में नीचा व चारों ओर से ऊँचा है, तो यह आपके लिए नुकसान देह है। आपकी सम्पत्ति नष्ट हो सकती है। परिवार में विपदा बढ़ेगी।

आँगन के फला फल को दूसरे तरीके से भी जाना जा सकता है। वास्तु के अनुसार आँगन की लंबाई और चौड़ाई के योग को 8 से गुणा करके 9 से भाग देने पर शेष का नाम व फल इस प्रकार जानें:-

शेष का नाम फल
,, 1 ,, तस्कर ,, चोट भय
,, 2 ,, भोगी ,, ऐश्वर्य
,, 3 ,, विलक्षण ,, बौद्धिक विकास
,, 4 ,, दाता ,, धर्म-कर्म में वृद्धि
,, 5 ,, नृपति ,, राज-सम्मान
,, 6 ,, नपुंसक ,, स्त्री-पुत्रादि की हानि
,, 7 ,, धनद ,, धन का आगमन
,, 8 ,, दरिद्र ,, धन नाश
,, 9 ,, भयदाता ,, चोरी, शत्रुभय।

देवघर—-
वह पवित्रता जो मंदिर में रखी जाती है, उसके नियमों का पालन वहाँ किया जाता है, वह लाख कोशिशों के बाद भी हम हमारे घरों में नहीं रख सकते। घर को सुंदर घर रहने दीजिए, उसे इतना पवित्र करने की कोशिश न करें कि हम सरलता से जीना भूल जाएँ।

पूजा का एक निश्चित समय होना चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त सवेरे 3 बजे से, दोपहर 12 बजे तक के पूर्व का समय निश्चित करें। ईशान कोण में मंदिर सर्वश्रेष्ठ होता है। हमारा मुँह पूजा के समय ईशान, पूर्व या उत्तर में होना चाहिए, जिससे हमें सूर्य की ऊर्जा एवं चुंबकीय ऊर्जा मिल सके। इससे हमारा दिन भर शुभ रहे। कम से कम देवी-देवता पूजा स्थान में स्थापित करें। एकल रूप में स्थापित करें।

मन को पवित्र रखें। दूसरों के प्रति सद्भावना रखें तो आपकी पूजा सात्विक होगी एवं ईश्वर आपको हजार गुना देगा। आपके दुःख ईश्वर पर पूर्ण भरोसा करके ही दूर हो सकते हैं।

जानकार गुरु आपको सही मार्ग दिखाता है, पर उन्हें भी कसौटी पर कसकर, लोगों से पूछकर, राय जानकर उनके पास 100 प्रतिशत भरोसे से जाएँ तभी आपका कार्य सफल होगा। थोड़ी देर की पूजा स्थान की शांति हमारे मन के लिए काफी है। ध्यान केंद्र व अगरबत्ती लगाने का स्थान घर में होगा तो आप सुखी रहेंगे। जब भी ईश्वर के प्रति भावना जागे। घर में सिर्फ असाधना लगेगी? घर से नहीं, प्राण प्रतिष्ठित मंदिर में पूजा-पाठ से चमत्कार होगा।

कम से कम प्रतिमाएँ, कम से कम तस्वीर (लघु आकार की), पाठ, मंत्रोच्चार, कम से कम समय एकांत में रहिए तो सही अर्थों में पूजा-प्रार्थना सार्थक होगी। एक ‘सद्गृहस्थ’ को यह नियम अपनाने से घर-परिवार में सुख-शांति आएगी। ईश्वर की सेवा में कुछ दान-पुण्य, गौ-सेवा, मानव सेवा कीजिए।

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