Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

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वास्तु से खोले समृद्धि के द्वार

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प्रत्येक मनुष्य अपना जीवन आनन्दमय, सुखी व समृद्ध बनाने में हमेशा लगा रहता हैं । कभी-कभी बहुत अधिक प्रयास करने पर भी वह सफल नहीं हो पाता हैं । ऐसे में वह ग्रह शांति, अपने ईष्ट देवी-देवताओं की पूजा अर्चना करता हैं । परन्तु उससे भी उसे आशाअनुरूप फल प्राप्त नहीं होने पर वह अपने भाग्य को कोसता हैं और कहता हैं मैरे भाग्य में कुछ ऐसा ही लिखा हुआ हैं ।
    जैसा की सर्वविदित हैं कि भाग्य और वास्तु का गहरा सम्बन्ध हैं यदि आपका भाग्य (कुण्डली) उत्तम हैं और यदि वास्तु (निवास) में कुछ त्रुटियां हैं तो मनुष्य उतनी प्रगति नहीं कर पाता जितनी करनी चाहिए अर्थात मनुष्य की समृद्धि में भाग्य एवं वास्तु का बराबर-बराबर सम्बन्ध होता हैं । ग्रह शांति देवी-देवताओं की पूजा अर्चना और प्रयत्नों के अतिरिक्त भी मनुष्य को एक विषय पर और ध्यान देना चाहिए और वह हैं उसके घर एवं दूकान की वास्तु । वास्तु दोष निवारण करने से मुनष्य के जीवन की पूर्ण काया पलट हो सकती हैं वह सभी सुख व साधनों को प्राप्त कर सकता हैं । मकान का निर्माण इस प्रकार करें जो प्राकृतिक व्यवस्था के अनुरूप हो तो वह मनुष्य प्राकृतिक ऊर्जा स्त्रोतों को भवन के माध्यम से अपने कल्याण हेतु उपयोग कर सकता हैं ।
    वास्तु निर्माण कार्य वर्तमान समय में अत्यावश्यक हो गया हैं क्योंकि निर्माण के पश्चात् यदि वास्तु दोष निकले और तक मकान में तोड़-फोड करनी पड़े तो वह अत्यंत कष्टकारक होता हैं । आर्थिक बोझ भी बढ जाता हैं। अतः उसका ध्यान रखकर वास्तु निर्माण के पूर्व वास्तुकार से सलाह लेकर यदि भवन या मकान निर्माण करें तो वास्तु दोष से बच सकते हैं ।
    जन्मकुंडली के ग्रहों की प्रकृति व स्वभाव अनुसार सृजन प्रक्रिया बिना लाग लपेट के प्रभावी होती हैं और ऐसे में अगर कोई जातक जागरूकता को अपनाकर किसी विद्वान जातक से परामर्श कर अपना वास्तु ठीक कर लेता हैं तो वह समृद्धि प्राप्त करने लगता हैं। बने हुए भवनों एवं नवनिर्माण होने वाले भवनों में वास्तुदोष निवारण का प्रयास करना चाहिए बिना तोड़-फोड़ के प्रथम प्रयास में दिशा परिवर्तन कर अपनी दशा को बदलने का प्रयास करें । यदि इसमें सफलता नहीं मिले तो पिरामिड एवं फेंगशुई सामग्री का उपयोग कर गृह क्लेश से मुक्ति पाई जा सकती हैं । संक्षेप में कहाँ क्या होना चाहिए -
1 -दक्षिण दिशा में रोशनदान खिड़की व शाट भी नहीं होना चाहिए। दक्षिण व पश्चिम में पड़ोस में भारी निर्माण से तरक्की अपने आप होगी व उत्तर पूर्व में सड़क पार्क होने पर भी तरक्की खुशहाली के योग अपने आप बनते रहेगें।
2   – मुख्य द्वार उत्तर पूर्व में हो तो सबसे बढ़िया हैं। दक्षिण , दक्षिण – पश्चिम में हो तो अगर उसके सामने ऊँचे व भारी निर्माण होगा तो भी भारी तरक्की के आसार बनेगें , पर शर्त यह हैं कि उत्तर पूर्व में कम ऊँचे व हल्के निर्माण तरक्की देगें।
3   – यदि सम्भव हो तो घर के बीच में चौक (बरामदा ) अवश्य छोड़े एवं उसे बिल्कूल साफ-स्वच्छ रखें । इससे घर में धन-धान्य की वृद्धि होती हैं ।
4   – घर का प्रवेश द्वार यथासम्भव पूर्व या उत्तर दिशा में होना चाहिए। प्रवेश द्वार के समक्ष सीढियॉ व रसोई नहीं होनी चाहिए । प्रवेश द्वार भवन के ठीक बीच में नहीं होना चाहिए। भवन में तीन दरवाजे एक सीध में न हो ।
5    -भवन में कांटेदार वृक्ष व पेड़ नहीं होने चाहिए ना ही दूध वाले पोधे – कनेर, ऑकड़ा केक्टस, बाैंसाई आदि । इनके स्थान पर सुगन्धित एवं खूबसूरत फूलों के पौधे लगाये ।
6  -  घर में युद्ध के चित्र, बन्द घड़ी, टूटे हुए कॉच, तथा शयन कक्ष में पलंग के सामने दर्पण या ड्रेसिंग टेबल नहीं होनी चाहिए ।
7    -भवन में खिड़कियों की संख्या सम तथा सीढ़ियों की संख्या विषम होनी चाहिए ।
8    -भवन के मुख्य द्वार में दोनों तरफ हरियाली वाले पौधे जैसे तुलसी और मनीप्लान्ट आदि रखने चाहिए । फूलों वाले पोधे घर के सामने वाले आंगन में ही लगाए । घर के पीछे लेगे होने से मानसिक कमजोरी को बढावा मिलता हैं ।
9    -मुख्य द्वार पर मांगलिक चिन्ह जैसे स्वास्तिक, ऊँ आदि अंकित करने के साथ साथ गणपति लक्ष्मी या कुबेर की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए ।
10    -मुख्य द्वार के सामने मन्दिर नहीं होना चाहिए । मुख्य द्वार की चौड़ाई हमेशा ऊँचाई की आधी होनी चाहिए ।
11    -मुख्य द्वार के समक्ष वृक्ष, स्तम्भ, कुआं तथा जल भण्डारण नहीं होना चाहिए । द्वार के सामने कूड़ा कर्कट और गंदगी एकत्र न होने दे यह अशुभ और दरिद्रता का प्रतिक हैं ।
12    -रसोई घर आग्नेय कोण अर्थात दक्षिण पूर्व दिशा में होना चाहिए । गैस सिलेण्डर व अन्य अग्नि के स्त्रोतों तथा भोजन बनाते समय गृहणी की पीठ रसोई के दरवाजे की तरफ नहीं होनी चाहिए । रसोईघर हवादार एवं रोशनीयुक्त होना चाहिए । रेफ्रिजरेटर के ऊपर टोस्टर या माइक्रोवेव ओवन ना रखे । रसोई में चाकू स्टैण्ड पर खड़ा नहीं होना चाहिए । झूठें बर्तन रसोई में न रखे ।
13    -ड्राइंग रूम के लिए उत्तर दिशा उत्तम होती हैं । टी.वी., टेलिफोन व अन्य इलेक्ट्रोनिक उपकरण दक्षिण दिशा में रखें । दीवारों पर कम से कम कीलें प्रयुक्त करें । भवन में प्रयुक्त फर्नीचर पीपल, बड़ अथवा बेहडे के वृक्ष की लकड़ी का नहीं होना चाहिए ।
14    -किसी कौने में अधिक पेड़-पौधें ना लगाए इसका दुष्प्रभाव माता-पिता पर भी होता हैं वैसे भी वृक्ष मिट्टी को क्षति पहुॅचाते हैं ।
15    -घर का मुख्य द्वार छोटा हो तथा पीछे का दरवाजा बड़ा हो तो वहॉ के निवासी गंभीर आर्थिक संकट से गुजर सकते हैं ।
16    -घर का प्लास्टर उखड़ा हुआ नहीं होना चाहिए चाहे वह आंगन का हो, दीवारों का या रसोई अथवा शयनकक्ष का । दरवाजे एवं खिड़किया भी क्षतिग्रस्त नहीं होनी चाहिए। मुख्य द्वार का रंग काला नहीं होना चाहिए । अन्य दरवाजों एवं खिडकी पर भी काले रंग के इस्तेमाल से बचे ।
17    -मुख्य द्वार पर कभी दर्पण न लगायें । सूर्य के प्रकाश की और कभी भी कॉच ना रखे। इस कॉच का परिवर्तित प्रकाश आपका वैभव एवं ऐश्वर्य नष्ट कर सकता हैं ।
18    -घर एवं कमरे की छत सफेद होनी चाहिए, इससे वातावरण ऊर्जावान बना रहता हैं ।
19    -भवन में सीढियॉ पूर्व से पश्चिम या दक्षिण अथवा दक्षिण पश्चिम दिशा में उत्तर रहती हैं । सीढिया कभी भी घूमावदार नहीं होनी चाहिए । सीढियों के नीचे पूजा घर और शौचालय अशुभ होता हैं । सीढियों के नीचे का स्थान हमेशा खुला रखें तथा वहॉ बैठकर कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं करना चाहिए।
20    -पानी का टेंक पश्चिम में उपयुक्त रहता हैं । भूमिगत टंकी, हैण्डपम्प या बोरिंग ईशान (उत्तर पूर्व) दिशा में होने चाहिए । ओवर हेड टेंक के लिए उत्तर और वायण्य कोण (दिशा) के बीच का स्थान ठीक रहता हैं। टेंक का ऊपरी हिस्सा गोल होना चाहिए ।
21    -शौचालय की दिशा उत्तर दक्षिण में होनी चाहिए अर्थात इसे प्रयुक्त करने वाले का मुँह दक्षिण में व पीठ उत्तर दिशा में होनी चाहिए । मुख्य द्वार के बिल्कुल समीप शौचालय न बनावें । सीढियों के नीचे शौचालय का निर्माण कभी नहीं करवायें यह लक्ष्मी का मार्ग अवरूद्ध करती हैं । शौचालय का द्वार हमेशा बंद रखे । उत्तर दिशा, ईशान, पूर्व दिशा एवं आग्नेय कोण में शौचालय या टेंक निर्माण कदापि न करें ।
22    -भवन की दीवारों पर आई सीलन व दरारें आदि जल्दी ठीक करवा लेनी चाहिए क्योकि यह घर के सदस्यों के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं रहती ।
23    -घर के सभी उपकरण जैसे टीवी, फ्रिज, घड़ियां, म्यूजिक सिस्टम, कम्प्यूटर आदि चलते रहने चाहिए। खराब होने पर इन्हें तुरन्त ठीक करवां लें क्योकि बन्द (खराब) उपकरण घर में होना अशुभ होता हैं ।
24    -भवन का ब्रह्म स्थान रिक्त होना चाहिए अर्थात भवन के मध्य कोई निर्माण कार्य नहीं करें ।
25    -बीम के नीचे न तो बैठंे और न ही शयन करें । शयन कक्ष, रसोई एवं भोजन कक्ष बीम रहित होने चाहिए ।
26    -वाहनों हेतु पार्किंग स्थल आग्नेय दिशा में उत्तम रहता हैं क्योंकि ये सभी उष्मीय ऊर्जा (ईधन) द्वारा चलते हैं ।
27    -भवन के दरवाजें व खिड़कियां न तो आवाज करें और न ही स्वतः खुले तथा बन्द हो ।
28    -व्यर्थ की सामग्री (कबाड़) को एकत्र न होने दें । घर में समान को अस्त व्यस्त न रखें । अनुपयोगी वस्तुओं को घर से निकालते रहें ।
29    -भवन के प्रत्येक कोने में प्रकाश व वायु का सुगमता से प्रवेश होना चाहिए । शुद्ध वायु आने व अशुद्ध वायु बाहर निकलने की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए । ऐसा होने से छोटे मोटे वास्तु दोष स्वतः समाप्त हो जाते हैं ।
30    -दूकान में वायव्य दिशा का विशेष ध्यान रखना चाहिए । अपना सेल काउंटर वायव्य दिशा में रखें, किन्तु तिजौरी एवं स्वयं के बैठने का स्थान नैऋत्य दिशा में रखें, मुख उत्तर या ईशान की ओर होना चाहिए ।
31    -भवन के वायव्य कोण में कुलर या ए.सी. को रखना चाहिए जबकि नैऋत्य कोण में भारी अलमारी को रखना चाहिए । वायव्य दिशा में स्थायी महत्व की वस्तुओं को कभी भी नहीं रखना चाहिए ।
    इस प्रकार हम पाते हैं कि वास्तु के नियमों का पालन कर हम सुख एवं समृद्धि में वृद्धि कर खुशहाल रह सकते हैं । यदि दिशाओं का ध्यान रखकर भवन का निर्माण एवं भूखण्ड की व्यवस्था की जाए तो समाज में मान सम्मान बढ़ता हैं । इस प्रकार भारतीय वास्तु शास्त्र के सिद्धान्तों का पालन कर हम सुख एवं वैभव की प्राप्ति कर सकते हैं । 
 
Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>बेडरूम में झगड़ा होने के कारण

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बेडरूम में झगड़ा होने के कारण

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आज के भौतिकवादी एवं जागरूक समाज में पति-पत्नी दोनों पढ़े लिखे होते हैं और सभी अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति सजग होते हैं। परन्तु सामान्य सी समझ की कमी या वैचारिक मतभेद होने पर मनमुटाव होने लगता हैं। शिक्षित होने के कारण सार्वजनिक रूप से लड़ाई न होकर पति-पत्नी बेडरूम में ही झगड़ा करते हैं। कभी-कभी यह झगड़ा कुछ समय विशेष तक रहता हैं और कभी-कभी इसकी अवधि पूरे जीवन भर सामान्य अनबन के साथ बीतती हैं। जिससे विवाह के बाद भी वैवाहिक जीवन का आनन्द लगभग समाप्त प्रायः होता हैं।
आइए जानें बेड-रूम में झगड़ा होने के प्रमुख ज्योतिषिय कारण: -
नाम गुण मिलान: -
विवाह पूर्व कन्या व वर के नामों से गुण मिलान किया जाता हैं। जिसमें 18 से अधिक निर्दोष गुणों का होना आवश्यक हैं। किन्तु यदि मिलान में यदि दोष हो तो बेडरूम में झगड़े होते हैं। यह दोष निम्न हैं। जैसे गण दोष, भकुट दोष, नाड़ी दोष, द्विद्वादश दोष को मिलान में श्रेष्ठ नहीं माना जाता। प्रायः देखा जाता है कि उपरोक्त दोषों के होने पर इनके प्रभाव यदि सामान्य भी होते हैं तब भी पति-पत्नी में बेडरूम में झगड़े की सम्भावना बढ़ जाती हैं।
मंगल दोष: -
प्रायः ज्यातिषीय अनुभव में देखा गया हैं कि जिस दम्पति के मंगल दोष हैं व उनका मंगल दोष निवारण अन्य ग्रह से किया गया हैं उनमें मुख्यतः द्वादशः लग्न, चतुर्थ में स्थित मंगल वाले दम्पति में लड़ाई होती हैं क्योंकि इसका मुख्य कारण सप्तम स्थान को शयन सुख हेतु भी देखा जाता हैं। मंगले के द्वादश एवं चतुर्थ में स्थित होने पर मंगल अपनी विशेष दृष्टि से सप्तम स्थान को प्रभावित करता हैं और यही स्थिति लग्नस्थ मंगल में भी देखने को मिलती हैं, क्योंकि लग्नस्थ मंगल जातक को अभिमानी, अड़ियल रवैया अपनाने का गुण देता हैं।
शुक्र की स्थिति: -
ज्योतिष में शुक्र को स्त्री सुख प्रदाता माना हैं और शुक्र कि स्थिति अनुसार ही पती-पत्नी से सुख मिलने का निर्धारण विज्ञ ज्योतिषियों द्वारा किया जाता हैं। अगर शुक्र नीच का हो अथवा षष्ठ, अष्ठम में हो तो बेडरूम में झगड़ा होने की सम्भावना रहती हैं। शुक्र के द्वादश में होने पर धर्मपत्नि को सुख प्राप्ति में कमी रहती हैं। यह योग मेष लग्न के जातक में विशेष होता हैं और बेडरूम में झगड़ा होता हैं।
सप्तमेश और सप्तम स्थान पर ग्रहों का प्रभाव: – (बेडरूम में झगड़े के कारण)
1. सप्तम स्थान पर सूर्य, शनि, राहू, केतु, और मंगल में से किसी एक अथवा दो ग्रहों का सामान्य प्रभाव।
2. गुरू का दोष पूर्ण होकर सप्तमेश या सप्तम पर प्रभाव।
3. सप्तमेश का छठे, आठवें अथवा बारवें भाव में होना।
4. पाप ग्रह से सप्तम स्थान घिरा होना।
5. सप्तमेश पर पाप ग्रहों का प्रभाव।
गोचर ग्रहों का प्रभाव
दाम्पत्य सुख में गोचर ग्रह का अपना महत्व हैं। सभी ग्रह गतिमान हैं और राशि परिवर्तन करते हैं एवं प्रत्येक राशि को अपना प्रभाव देकर सुखी अथवा दुखी होने का कारण होते हैं। सर्वाधिक गतिमान चन्द्र प्रत्यें ढाई दिन में राशि परिवर्तन करता हैं और चन्द्रमा मनसो जातः के अनुसार मन का कारक होने, जलीय ग्रह होने से प्रेम का भी कारक होता हैं। अतः प्रत्येक राशि में वह अन्य ग्रहों की भांति सकारात्मक अथवा नकारात्मक प्रभाव प्रदान करता हैं। इसकी छठी, आंठवीं व बारहवीं स्थिति प्रेम को कम करती हैं व शयन सुख में बाधा देती हैं।
प्रत्येक ग्रह का प्रभाव दाम्पत्य जीवन पर सकारात्मक जहाँ आनन्द भर देता हैं वहीं नकारात्मक रति सुख नष्ट कर देता हैं।
(पं0 दयानंद शास्त्री) 
Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>वास्तु दोष कैसे पहचाने ?

>भवन निर्माण एवं वास्तु विज्ञान दो अलग अलग विषय हैं। एक व्यक्ति अपने मनोनुकूल गृह का निमार्ण तो करवा सकता है अपने आर्किटेक्ट या डिज़ाइनर से कहकर उसे अच्छी प्रकार से सजा भी सकता है परन्तु वह उसमें रहने पर सुखी जीवन व्यतीत करेगा यह आवश्यक नहीं। एक आर्किटेक्ट भी जिसे केवल भवन निर्माण तकनीक का ज्ञान है उस व्यक्ति के सुखी व मंगलमय जीवन की गारंटी कैसे ले सकता है परन्तु वास्तु विज्ञान एवं वास्तु के अनुरूप मकान का निर्माण करने से वास्तु विशेषज्ञ द्वारा गारंटी ली जा सकती है। आज के युग में अपने लिए घर बनाना एक बहुत ही बड़ी उपलब्धि है जो की उसके परिवार के लिए एक बड़े अनुष्ठान की तरह होती है। गृह प्रवेष सही मुहूर्त में सभी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान करने के पष्चात् भी किया जाता है परन्तु सभी प्रकार की पूजा अनुष्ठान आदि करने के पष्चात् भी अनेकों बार यह देखने को मिलता है कि एक मकान छोड़कर जाने से तथा दूसरे मकान में रहने से एक ही परिवार की सुख शांति का हनन हो जाता है। मनुष्य यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि पहले मकान में ऐसा क्या था। मैं उसमें सुखी व सन्तुष्ट था तथा धन संग्रह कर अपना स्वयं का घर बनाया तो- मैं संकटों से घिर गया ! यहाँ उस मकान की वास्तु का बहुत अधिक प्रभाव उस के पारिवारिक जीवन पर होता है परन्तु अब प्रष्न यह उठता है कि कैसे जाने की जिस भवन में हम रह रहें हैं उसकी वास्तु हमारे अनुरूप है घ् यदि अनुरूप है तो वह हमारे तथा हमारे परिवार के लिये लाभकारी होगा क्या! यह लाभकारी निम्नलिखित में से किसी भी रूप में हो सकता है:- (1) भवन में रहने से धर्मलाभ होना चाहिए तथा उस भवन में रहने वाले प्राणी को अध्यात्मिक एवं आत्मिक सुख की अनुभूति होनी चाहिए। (2) दैविक एवं भौतिक उपसर्गों से मुक्ति मिलनी चाहिए। (3) समाज में मान-सम्मान बढ़ना चाहिए। (4) परिवार के दूसरे सदस्य भी सुखषांति का अनुभव करें तो समझना चाहिए की उस भवन की वास्तु गृहस्वामी केे अनुरूप है। (5) गृहस्वामी के व्यवसाय में उन्नति हो, उसके धन धान्य में वृद्धि हो। (6) यदि गृह स्वामी कर्जदार है और उसका कर्ज धीरे धीरे कम होना आरम्भ हो गया है तो इसे भी शुभ संकेत माना जाता है। (7) गृहस्वामी की आय के साधनों में वृद्धि हो। (8) यदि परिवार के सदस्य गृहस्वामी की आज्ञा में रहने लगें तो यह भी यही दर्षाता है कि भवन की वास्तु गृहस्वामी के अनुकूल है। (9) परिवार के सदस्य यदि अध्यात्मिक एंव आत्मिक उन्नति करने लगें और मोक्षमार्ग का रास्ता प्रषस्त हो तो इसमें ही वास्तुषास्त्र की सार्थकता है। अब देखते हैं कि घर की वास्तु अनुरूप न होने के कारण कुटुम्बजनों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है। (1) परिवार में झगड़ा व कलह आरंम्भ हो जाता है। (2) व्यय व्यर्थ ही बढ़ जाता है। (3) आमदनी में कमी हो जाती है। (4) गृह स्वामी आर्थिक रूप से निर्बल हो जाए तो समझें उस घर की वास्तु अनुकूल नहीं है। (5) कोर्ट केस हो जाए व्यक्ति को मानसिक तनाव रहे तो समझें की घर में वास्तु दोष है। (6) गृहस्वामी का सम्मान समाज में कम होने लगें। (7) सन्तति का नाष हो या फिर उसके बच्चे व कुटुम्बजन उसकी आज्ञा का पालन न करें तो समझें की घर में वास्तुदोष है। (8) परिवार में अकाल मृत्यु भी वास्तुदोष की सूचक है। (9) अक्समात् परिवार के सदस्यों को कोई रोग घेर ले तो समझें की भवन की वास्तु अनुकूल नहीं। यदि लगे की घर में कुछ भी उपरोक्त में से घट रहा है तो समझ लेना चाहिए की भवन में वास्तुदोष है और उसके निवारण हेतु यथा सम्भव वास्तुदोष निवारण के उपाय करने चाहिएँ।
(पं0 दयानन्द शास्त्री)

>श्री महाशिवरात्रि –2 मार्च 2011, फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को श्रवण नक्षत्र बुधवार के दिन है अद्ïभुत संयोग……….
………….क्या है शिव?
शेते तिष्ठïति सर्वं जगत्ï यस्मिन्ï स: शिव: शम्भु: विकाररहित: …।
अर्थात ‘जिसमें सारा जगत्ï शयन करता है, जो विकार रहित हैं वह ‘शिव’ हैं, अथवा जो अमंगल का ह्रïास करते हैं, वे ही सुखमय, मंगलरूप भगवान्ï शिव हैं। जो सारे जगत्ï को अपने अंदर लीन कर लेते हैं वे ही करुणा सागर भगवान्ï शिव हैं। जो भगवान्ï नित्य, सत्य, जगदाधार, विकार रहित, साक्षीस्वरूप हैं, वे ही शिव हैं।’
……………………….क्या है शिवरात्रि?
शिव और शक्ति के पूर्ण समरस होने की रात्रि है।
शिवरात्रि का अर्थ होता है ‘वह रात्रि जो आनन्द देने वाली है और जिसका शिव के नाम के साथ विशेष संबंध है।’ ऐसी रात्रि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की है, जिसमें शिवपूजा, उपवास और जागरण होता है। उक्त फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को शिवपूजा करना एक महाव्रत है। अत: उसका नाम महाशिवरात्रि-व्रत पड़ा।
शिव पुराण के अनुसार ब्रह्मïा ने इसी दिन रुद्र रूपी शिव को उत्पन्न किया था।
इसी दिन शिव व हिमाचल पुत्री पार्वती का विवाह हुआ था।
शिव-शक्ति का प्रतीक ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव भी इसी दिन हुआ था।
शिव रात्रि व्रत-उपवास का तात्विक अर्थ क्या है?
शास्त्रों के अनुसार जिस कर्म द्वारा भगवान का सान्निध्य होता है वही व्रत है। उपवास क्या है? जीवात्मा का शिव के समीप वास ही ‘उपवास’ कहा जाता है। महाशिव रात्रि के दिन श्रद्घा भाव से जो इस व्रत को संपन्न करता है संपूर्ण का पापों का क्षय होता है। और इस व्रत को लगातार 14 वर्ष करने से शिव लोक की प्राप्ति होती है।
भगवान शिव को सर्वाधिक प्रिय क्या और क्या है व्रत की सामग्री?
अखण्ड बिल्वपत्र भगवान शिव को अत्यन्त प्रिय है। जो श्रद्धापूर्वक नम: शिवाय मंत्र जाप करते हुए शिव लिंग पर बेलपत्र अर्पित करता है वह सभी पापों से मुक्त हो शिव के परमधाम में स्थान पाता है। यहाँ तक कि बिल्वपत्र के दर्शन, स्पर्श व वंदना से ही दिन-रात के किये पापों से छुटकारा मिल जाता है।
इसके अलावा भगवन्ï भोलेनाथ को आक-धतूरा विजया भांग आदि भी अति प्रिय हैं।
पत्र, पुष्प, फल अथवा स्वच्छ जल तथा कनेर से भी भगवान्ï शिव की पूजा करके मनुष्य उन्हीं के समान हो जाता है। आक (मदार) का फूल कनेर से दसगुना श्रेष्ठï माना गया है।
आक के फूल से भी दस गुना श्रेष्ठï है धतूरे आदि का फल। नील कमल एक हजार कह्ïलार (कचनार) से भी श्रेष्ठï माना गया है।
महाशिव रात्रि के व्रत की सामग्री है पंचामृत (गंगा जल, दूध, दही, शहद, घी) सुगंधित फूल, शुद्घ वस्त्र, बिल्वपत्र, धूप, दीप, नैवेद्य, चंदन का लेप और ऋतु फल।
शिवरात्रि व्रत करते हुए शिवोपासना से मनुष्य के त्रिविध तापों का शमन हो जाता है, संकटव कष्टï के बादल छंट जाते हैं, कर्मज व्याधियों व ग्रह बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है। इससे अकाल मृत्यु को टाला जा सकता है, मोक्ष प्राप्ति होती है। इस पर्व पर मनुष्य जिस मनोकामना से जिस रूप में शिव की आराधना करता है वह पूरी होती है और भोले शंकर उसी रूप में प्रसन्न होकर फल भी प्रदान करते हैं।
आप यदि इस महान पर्व पर अपनी राशि के अनुसार शिव उपासना करें तो आपकी जीवन की सारी समस्याओं का निवारण हो जाएगा। आप पर भगवान शिव की अनुकम्पा बरसेगी। भगवान शिव आप पर प्रसन्न हो, कृपा करेंगे। आपके कार्य सिद्ध होंगे। यदि आप पूरे विधि-विधान से पूजा नहीं कर सकते तो मात्र ú नम: शिवाय का जाप करते हुए शिवलिंग पर अभिषेक करते हैं तो मनोकामना पूरी होगी। और यदि आप दूध, दही घी, शक्कर, शहद पंचामृत से अभिषेक करें तो बात ही कुछ और है। अभिषेक के उपरांत पर शिवलिंग पर बेलपत्र, मदार के पुष्प, भांग, धतूरे का फल अर्पित करें तो आपके लिए बहुत ही अच्छा रहेगा।
यदि आपके जीवन में आपको कारोबारी, पारिवारिक या स्वास्थ्य सम्बंधी समस्या है या आपको किसी प्रकार की मानसिक समस्या है अथवा कोई तनाव है या किसी भी कार्यक्षेत्र में बाधा या रुकावट है तो द्वादश राशियों के लोग किस तरह भगवान भोलेनाथ की पूजा करें कि धन की बरसात हो।
मेष राशि:-मेष राशि वाले लोग शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर पूजा करते समय लाल चंदन से शं लिखें और फिर उसी लाल चंदन से 108 बेलपत्र पर ú शं लिखें ú शंकराय नम: का जाप करते हुए इन बेलपत्रों को शिवलिंग पर अर्पित करें और जल में कच्चा दूध और लाल चंदन मिला कर शिव का अभिषेक करें।
अभिषेक के बाद इस मंत्र ú शम्भवे नम: मंत्र की तीन माला का जाप करें।
वृष राशि:- वृषभ राशि के जातक-जातिकाओं को अपने कार्य में सफलता के लिए शिवलिंग पर सफेद चंदन से ú तत्पश्चात बेलपत्र के ऊपर सफेद चंदन से ú लिखें। जल से हर-हर महादेव का जाप करते हुए जलाभिषेक करें। पुन: सफेद चंदन से भगवान शिव के त्रिपुण्ड बनाएं और हरसिंगार का इत्र लगायें। इस प्रकार का अभिषेक करने से आपकी जीवन की सारी समस्याओं का निवारण होगा। व्यापार वृद्धि होगी। स्वास्थ्य अनुकूल रहेगा और परिवार में सुख-शांति रहेगी।
अभिषेक के बाद इस ú शशिशेखराय नम:। मंत्र की दो माला का जाप करें।
मिथुन राशि:-मिथुन राशि वाले महाशिवरात्रि में शिवलिंग पर शहद में केसर घोल कर शिवलिंग पर तिलक करें और ú शूलपाणये नम: मंत्र का जाप करते हुए शहद से अभिषेक करें। आर्थिक समस्याओं का निवारण हो जाएगा। शहद से स्नान कराते समय ú नम: शिवाय करालं महाकाल कालं कृपालं ú नम: इस मंत्र का भी जाप करें तो और अधिक अनुकूलता प्राप्त होगी। परिवार, व्यापार और स्वास्थ्य में लाभ होगा।अभिषेक के बाद इस ú विष्णु वल्लभाय नम: मंत्र की पांच माला का जाप करें।
कर्क राशि:-कर्क राशि का स्वामी चंद्र है। चंद्रमा भगवान शिवजी के मस्तिष्क पर शोभित है और उनका प्रिय अलंकार भी है। कर्क राशि वालों को जीवन में किसी भी प्रकार की समस्या में आयें तो उन्हें समस्या से मुक्ति पाने के लिये महाशिवरात्रि में शिवलिंग को जल में दूध, दही, गंगाजल व मिश्री मिलाकर ú चंद्रमौलीश्वर नम: इस मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करना चाहिए। ऐसा करने से उनके पास कभी भी समस्या नहीं आएगी।अभिषेक के बाद इस ú विरूपाक्षाय नम:। मंत्र की तीन माला का जाप करें।
सिंह राशि:- सिंह राशि का राशि अधिपति सूर्य है। जो कि अपूर्व तेज प्रभाव का मालिक है। यही कारण है कि सिंह राशि वाले लोग हमेशा नेतृत्व में आगे रहते हैं। यदि सिंह राशि के लोग कारोबार, परिवार, राजनीति या स्वास्थ्य को लेकर परेशान हैं तो उन्हें महाशिवरात्रि में शिवलिंग को शुद्ध घी से ú महेश्वराय नम:मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करना चाहिए। अभिषेक के बाद इस ú जटाधराय नम:। मंत्र की पांच माला का जाप करें।
कन्या राशि:- कन्या राशि राशि वाले लोग महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर दूध, घी और शहद से पाशुपत स्तोत्र या ú कालकालाय नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें तो उत्तम फलों की प्राप्ति होगी। यदि यह पूजा प्रत्येक सोमवार को जारी रखें तो जीवन में कभी भी समस्या नहीं आएगी। अभिषेक के उपरांत इस मंत्र की पांच माला जाप करें।अभिषेक के बाद इस ú गंगाधराय नम:। मंत्र की दो माला का जाप करें।
तुला राशि:- तुला राशि वाले लोगों को पंचाक्षरी मंत्र या ú भीमाय नम: मंत्र का जाप करते हुए दही और गन्ने के रस से भगवान शिव का अभिषेक करना चाहिए। इससे उनके जीवन की संपूर्ण कारोबारी समस्याओं का निवारण होगा।अभिषेक के उपरांत इस ú विश्वेश्वराय नम: मंत्र की दो माला जाप करें।
वृश्चिक राशि:- वृश्चिक राशि वाले लोग महाशिवरात्रि के दिन जल में दूध एवं शहद मिलाकर शिव गायत्री का जाप करते हुए अभिषेक करना चाहिए। अभिषेक के बाद लाल चंदन से तिलक करें और लाल चंदन से 108 बेलपत्र पर ú नम: शिवाय लिख कर बेलपत्र भगवान शिव को अर्पित करें।अभिषेक के बाद इस ú वीरभद्राय नम: मंत्र की एक माला का जाप करें।
धनु राशि:- धनु राशि वाले लोगों को महा शिव रात्रि के दिन शिवलिंग पर कच्चे दूध में केशर, गुड़ व हल्दी मिलाकर ú नम: शिवाय ú ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरुवे नम: ú नम: शिवाय। मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करना चाहिए। अभिषेक के बाद केशर व हल्दी से तिलक करें और पीले पुष्प अर्पित करें। इस पूजन से कभी आर्थिक समस्या आड़े नहीं आती। जातक को सदैव संकटों से मुक्ति प्राप्त होती हैं।
अभिषेक के बाद इस ú प्रज्ञापतये नम:। मंत्र की एक माला का जाप करें।
मकर राशि:- मकर राशि वाले लोगों को महाशिवरात्रि के दिन नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजं, छाया मार्तण्ड सम्भूतं तम नमामी शनैश्चरं। मंत्र का जाप करते हुए सरसों के तेल से शिवलिंग पर तैलाभिषेक करना चाहिए। ऐसा करने से जीवन में सारी समस्यों का निवारण होगा।अभिषेक के बाद इस ú शितिकण्ठाय नम:। मंत्र की तीन माला का जाप करें।
कुंभ राशि:- कुंभ राशि वाले लोगों को महाशिवरात्रि में घी, शहद, शक्कर और बादाम के तेल से महामृत्युञ्जय मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।उसके बाद पुन: जल स्नान कराने के बाद केसर से तिलक करें और 108 बार ú शं शनैश्चराय नम: मंत्र का जाप करते हुए तेल सरसों के ते से पुन: अभिषेक करना चाहिए।अभिषेक के बाद इस ú नीललोहिताय नम:। मंत्र की एक माला का जाप करें।
मीन राशि:- मीन राशि वालों को शिवरात्रि पर शिवलिंग को कच्चे दूध में केशर व तीर्थजल मिलाकर स्नान कराना चाहिये। स्नान के बाद केशर व हल्दी से तिलक करें। पीले पुष्प व नागकेशर के साथ केशर के रेशे अर्पित करें। स्नान कराते समय ú नमो शिवाय गुरु देवाय नम: ú का जाप करना चाहिये।अभिषेक के बाद इस ú मृत्युंजाय नम:। मंत्र की दो माला का जाप करें।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>दाम्पत्य सुख और मंगल ग्रह—

>ज्योतिष शास्त्रों में मंगलग्रह को पराक्रम का कारक माना गया है। सौर परिवार में इसे सेनापति का पद प्राप्त है।
सामान्यतः लोग मंगल के नाम से भयभीत रहते हैं। विशेषकर जब कुण्डली को मंगली या मंगलीक कह दिया जाता है। जबकी
मेरे अनुभव में मंगल जैसा मंगलकारी ग्रह कोई नहीं हो सकता। तभी तो कहा गया है-

धरणी गर्भ संभूतं पिद्युत्कान्तिसमप्रभम्। कुमारं शक्ति हस्तं मंगलं प्रणाम्यहम।।

अर्थात्- जो धरती के गर्भ से उत्पन्न हुये हैं, जिनकी प्रभा बिजली के समान लाल है। जो कुमार हैं तथा अपने कर में शक्ति
लिये हुये हैं उन मंगल को मैं नमस्कार करता हूँ।
मानव को सफलता हेतु जितना आवष्यक परिश्रम हैं उतनाही आवष्यक हमारा घरेलु योगदान हैं ,हमे हमारे घर का वातावरण कब शांत तथा सोहार्दपूर्ण मिल सकता है, जब हमारी अघोगिनी सुलक्षणा हो, गृहस्थ धर्म जानती हो, पति को उसके हर सुख-दुख में साथ देने वाली हो, त्याग, सेवा, धैर्य, क्षमा तथा सहिष्णुता जानती हो और इनके द्वारा पती को हरदम उन्नती कि और अग्रेसर करने का प्रयास करती हों।
सौरमण्डल की प्रथम राषि मेष का स्वामी मंगल है। मेष राषि अग्नि तत्व राषि है। अतएव इसका स्वामी मंगल भी अग्नि ग्रह है। यह शौर्य का कारक है। यह सेनापति का भी कारक है। इसका रंग सिंदूरी है। यह भूमि का भी कारक है। ‘मंगल’ का नाम सुनते ही मनुष्यो में हलचल मच जाती है क्योंकि इसके द्वादष, प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम भाव में होने पर जातक या जातिका मंगली कहलाते हैं। मंगली प्रभाव के संबध में प्रथक से विवेचना की जायेगी। प्रस्तुत आलेख में मंगल का दाम्पत्यसुख पर क्या अनुकूल तथा प्रतिकूल प्रभाव पडे़गा उसका ही विवेचन किया जा रहा है।विवाह एवं दाम्पत्य सुख हेतु सप्तम भाव,सप्तमेश,कारक ग्रह इन के साथ साथ सम्पम भाव में उपस्थित ग्रह भी सत्य को उजागर करते है, महर्षि पाराशर के अनुसार सप्तम भाव विवाह, यौन संबंध और पति-पत्नी के आपसी विचारों को प्रस्तुत करता हैं, कुछ ग्रह सप्तमेश होकर परम सुख प्रदान करते तो कुछ निस्टता प्रदान करता हैं। सुखमय दापत्य जीवन व्यतीत करने के लिये वर-वधु चुनाव, उनके गुण-दोषों का ज्यिोतीष शास्त्र के सभी विद्वानों का मानना है कि सप्तम भाव का मंगल अशुभ फलदाई होता है, ऐसे जातक को स्त्री झगडालु, रोगी,कुरूप,पराजित कराने वाली, कुलक्षणी निर्धन तथा दुराचरणी मिलती हैं। जिस कारण जातक का दाम्पत्य जीवन दुख भरा होता हैं, मिथुन,कन्या,वृच्छिक,मकर,सिंह तथा धनु राशि वाले जातकों के जन्म कंुडली में सप्तम भाव में मंगल हो तो ऐसे जातकों की स्त्री संताप प्राप्ती हेतु व्याभिचार करती हैं, मंगल यदि कर्क या मिन का हो तो ऐसे जातक की स्त्री का स्वभाव बहुत ही कठोर होता हैं। जिस कारण जातक का दांपत्य जीवन दुःखदाई हो जाता हैं, ऐसे जातकोकी रूचि अपके से कम उम्र की कन्याओं में होती है, जातक के जन्म कुंडली में मंगल पर यदि शनि की दृष्टि हो तो ऐसे जातक रति क्रिया में उटपंताग हरकते करते हैं जिस कारण जातक के पत्नी की अपने पति में रूची खत्म हो जाती हैं तथा ऐसे जातक का दांपत्य जीवन बदतर बन जाता हैं। सप्तम भाव का मंगल जातक को प्रबल मंगली बनाता तथा ऐसे जातक को मंगली लडकी से ही विवाह करना चाहिए जिससे उनका दांपत्य जीवन सुखि रहता हैं।

लग्ने व्यये च पाताले-जामित्रे-चाष्टमे,
कुजे कन्या मर्तृ विनाशाय भर्ता कन्या निवाशकः।।
मंगल के मारकत्व हेत यह श्लोक प्रचलित हैं अर्थात जिस जातक के जन्म कुंडली में लग्न, चतुर्थ, सप्तमया द्वादश भाव में मंगल विराजमान हो तो ऐसे में कन्या के पति की मृत्यु निश्चित हैं इस योग के अनेकों अपवाद भी हैं, जातक के जन्म कुंडली में लग्न में मेष, चतुर्थ में वृश्चिक सप्तम में मकर, अष्टम में कर्क तथा द्वादश भाव में धनु राशि हो तब वैधन्य योग नहीं बनता तात्पर्य सप्तम भाव य मंगल जातक का वैवाहिक जीवन सामान्य नहीं रखता हैं। सुखमय दापत्य जीवन व्यतीत करने के लिये वर-वधु चुनाव, उनके गुण-दोषों का विचार उनकी रूची, प्रकृति समानता आदि का विस्तार पूर्वक विवेचन कर सुखमय दाम्पत्य जीवन हेतु कुछ नियम बना रखे हैं।
1. यदि किसी जातक/जातिका की अन्य कुण्डली में मंगल सप्तम भाव में हो तो जातक किसी रजस्वला स्त्री से
संभोग करता है। कतिपय विद्वान ज्योतिषियों ने महिला की कुण्डली में मंगल सप्तम भाव में होने पर बांझ होना कहा है। हमारे
अनुभाव में आया है कि पुरुष की कुण्डली में मंगल द्वितीयेष षष्टेष या अष्टमेष होकर सप्तम भाव में हो तो पत्नी बांझ या
गर्भ को गिराने की इच्छुक रहती है। महिला के सप्तम् भाव में मंगल उसे बांझ बनाता है। यह शोध का विषय है। मंगल रज
का कारण हैं षिषु पर मांस, मंगल ग्रह से ही चढ़ता है।
2. यदि जातक/जातिका की कुण्डली में मंगल एवं बुध सम-विषम राषियों में बैठकर एक दूसरे को देखे तो पुरुष
जातक नपुंसक तथा जातिका षण्डत्व दोष से पीड़ित होंगे। यहां सम विषम राषियों से तात्पर्य यथा मंगल मेष का हो तथा
बुध कर्क राषि का हो। यह योग जन्म कुण्डली में किसी भी भाव में घटित हो सकता है। स्त्रियों में आयुर्वेद के अनुसार षण्डत्व
दोष होता है। इस दोष से पीड़ित स्त्री में ठण्डापन होता है। वह पुरूष संग के लिये उत्तेजित नहीं होती हैं। पुरुष उसके इस
दोष को जान नहीं पाता है, वह यौन क्रिया के लिये उत्कृष्ठित नहंीं रहती।
3. इसी प्रकार का फलित मंगल और सूर्य एक दूसरे को देखे अर्थात मंगल और सूर्य समसप्तक हो तो भी पुरुष से
नपंुसकता के लक्षण रहते हैं। इस योग में मंगल और सूर्य दोनों ही अग्नि ग्रह होते हैं। जो पुरुषत्व की ऊर्जा को कम करते
हैं। संभव है कि जातक शरीर से हृष्ठ-पुष्ठ हो परन्तु उसकी जननेंद्रिय में उत्तेजना कम रहती है।
4. यदि किसी महिला की जन्म कुण्डली मे सप्तम भाव में मंगल की राषि या मंगल का नवांष हो तो जातिका का
पति पर स्त्री गामी हो सकता है। क्योंकि पति पूर्ण पौरुष वाला होता है। जातिका को इस प्रकार का अनुभव मंगल की महादषा
में देखने को मिल सकता है? यदि यह दषा विवाह से पूर्व या जन्म से पूर्व ही निकल गयी हो तो अंतरदषा। प्रत्यंतर दषा
में संभव है। जातिका का लग्नेष कमजोर होगा तो पति उसको दबाकर रखेगा तथा उसकी यौन लिप्तता में वृद्धि रहेगी।
5. मंगल सप्तम भाव में हो तो जीवन साथी की मृत्यु 30 वर्ष की आयु में हो सकती है। यदि मंगल 10 से 20 अंष
के मध्य हो कथित योग घटित हो सकता है। मंगल विच्छेदात्यक ग्रह है अतएव विवाह विच्छेद की परिस्थितियाँ बन सकती
है। पति-पत्नी अलग-अलग रह सकते हैं। मंगल के साथ सूर्य या बुध या दोनों हों तो विवाह में एक साल के अंदर ही उक्त
फलित में से कोई एक फल अवष्य अनुभव में आयेगा।
6. यदि किसी जातिका की जन्म कुण्डली में चंन्द्रमा, मंगल या शनि की राषि में हो तथा जातिका के
लग्न भाव में स्थित होकर, किसी पाप ग्रह से दृृष्ट हो तो जातिका की माता भी दुष्चरित्र होती है। फलतः माता के संग के कारण जातिका का भी चरित्र गिर जाता है। वृष्चिक राषि में चंद्रमा नीच का होकर विकृति विचारों की ओर प्रेरित कर सकता हैं। मेष राषि तथा कुंभ राषि में भी यौन सम्पर्क अन्य पुरूषों से बढ़ सकते हैं। किन्तु मैं मकर राषि में चंद्र के ऐसे फल से सहमत नहीं हँू। इसी राषि में मंगल उच्च का तथा शनि स्वक्षेत्री होता है। जो चरित्र नहंी गिरने देता है।पाठक शोध करें।
7. यदि किसी जातिका की जन्म कुण्डली में मंगल सप्तमेष होकर 6, 8 या 12 वें भाव में हो तथा शनि सूर्य एक साथ कहीं भी हो एवं लग्न भाव में राहू हो तो जातिका शीध्र ही निष्चित रूप से विघवा हो जाती है। सप्तमेष का जिस भाव में बैठना सप्तम भाव के फल को नष्ट
करता हैं वैधव्य कारक राहू का लग्न में होना भी सप्तम भाव के फल को बिगाड़ता है। सौर मंडल की प्राकृतिक कुण्डली में सूर्य तुला राषि में नीच का होता है उसका शनि के साथ बैठना भी उत्तम फल नहीं देता है। क्योंकि दोनों परस्पर शत्रु ग्रह है।
8. किसी जातिका की द्विस्वभाव लग्न हो तथा मंगल और चन्द्र दोनों सम सप्तम होकर लग्न सप्तमभाव में स्थित होकर परस्पर देख रहे हो तो जातिका शीध्र ही विधवा हो जाती है। मंगल चंद्र का सम सप्तक होना दाम्पत्य सुख में बाधक होता है।
9. यदि किसी पुरूष जातक की जन्मकुण्डली में मंगल तथा सूर्य कर्क राषि के होकर सप्तम भाव में हो तो जातक की पत्नी उसके निर्देष पर पर पुरूष से यौन संम्बंध स्थापित करती हैं। कर्क राषि में सूर्य अष्टमेष होकर मंगल से पुष्टि करता है। अष्टमेष जहां भी बैठता है उस
भाव की शुचिता को शंकास्पद बना देता है। सुखेष का सप्तम भाव में स्थित होना भी अधिक सुखद स्थिति नहीं है। दोनों में संबध विच्छेद की जिम्मेदारी भी मंगल सूर्य पर रहती है। जातक धन या पुत्र प्राप्ति के उद्देष्य से अपनी पत्नी से इस प्रकार का अवैध कृत्य कराता है।
10. किसी जातिका की जन्म कुण्डली में मंगल तथा शनि एक दूसरे के नवांष मे हो तो जातिका बहुत अधिक कामुक रहती है। यहां तक की एक महिला दूसरी महिला के साथ समलैंगिक संबन्ध रखती हैं पर पुरुष गामिनी होना तो उसके लिये सहज है। (मंगल और षनि एक दूसरे की राषि में हो तब भी कथित फल अवष्य घटित होता है। यदि मंगल और शनि एक दूसरे के नक्षत्र में हो तब भी समलैंंिगकता पुर्व
पर पुरूष गामिनी होते देखा गया है।
11. यदि किसी जातक की जन्म कुण्डली में मंगल सप्तम या अष्टम भाव में दो पापग्रहों के साथ स्थित हो परन्तु इस योग में सप्तमेष सप्तम भाव में न हो तो जातक की पत्नी की मृत्यु विवाह के पष्चात दो से पांच वर्ष के अन्दर हो जाती हैं यही योग किसी महिला की कुण्डली में भी हो तो उसके साथ भी यही फलित होगा। ग्रहों की बलवत्ता भी फल कथन के लिये विचार में रखना अत्यंत आवष्यक हैं यदि कोई कुयोग जिस प्रकार लिखा गया है। उसी प्रकार हो तब तो जीवन कथित फल अवष्य घटित होते हैं परन्तु किसी कुयोग पर शुभ ग्रह के फल के अवसर जुटाकर पूर्णतः घटित नहीं होने देगा। उसी प्रकार कोई सुयोग कुण्डली में हो तथा पाप ग्रह उसे प्रभावित कर रहे हो तो पष्चात् हताष हो जाने पर मिलेगा। यह सर्वत्र विचारणीय है।
12. इसी प्रकार मंगल तथा शुक्र किसी जातिका की जन्म कुण्डली में समसप्तक हो तो भी इस प्रकार के योग वाली दो महिलाओं के मध्य समलैंगिक संबध रहते हैं। मंगल और शुक्र दोनों ही समसप्तक होने पर महिला जातकों को यौन क्रीड़ा के लिये उत्तेजित करते हैं। दुष्चरिचत्र होना अंसभव नहंी है। पर पुरुष से अतिषय कामुकता की पूर्ति हेतु संबंध रखती है। पुरुष के षिषन का भी चुंबन तक कर लेती हैं।
13. यदि किसी जाति का मंगल, वृष राषि को हो तो भी जातिका में अतिषय कामुकता रहती है। यह योग किसी भाव में हो जातिका को यौन संतुष्टि के लिये उकसाता हैं कोई भी पुरूष जातक समान्य स्तर तक अपनी पत्नी की यौन संतुष्टि कर सकता है। फलतः स्त्री अपनी तृप्ति के
लिये पर पुरुष का या अन्य स्त्री के साथ कृत्रिम साधनों से काम तृप्ति करती है।
14. मंगल, सूर्य तथा राहू लग्न में स्थित हों तो जीवन साथी की मृत्यु शीध्र हो जाती है। या लम्बें समय के लिये दोनों के यौन सम्पर्क टूट जाते हैं साथ ही यदि द्वितीय भाव में शुक्र स्थित हो तो जातक के किसी अन्य स्त्री/पुरूष से अनैतिक यौन सम्बन्ध रहे।
15. यदि किसी जातिका की जन्म कुण्डली में चंन्द्रमा, मंगल या शनि की राषि में हो तथा जातिका के लग्न भाव में स्थित होकर, किसी पाप ग्रह से दृृष्ट हो तो जातिका की माता भी दुष्चरित्र होती है। फलतः माता के संग के कारण जातिका का भी चरित्र गिर जाता है। वृष्चिक
राषि में चंद्रमा नीच का होकर विकृति विचारों की ओर प्रेरित कर सकता हैं। मेष राषि तथा कुंभ राषि में भी यौन सम्पर्क अन्य पुरूषों से बढ़ सकते हैं।
दाम्पत्य जीवन में मन व प्रेम की विशेष भूमिका रहती हैं। यदि मंगल दोष विद्यमान हो लेकिन अपने मन को नियंत्रित कर जीवन साथी से प्रेम भाव बढ़ा दिया जावे तो दाम्पत्य जीवन अच्छा रहता हैं। लेकिन प्रतिरोध की स्थित अशुभ ही करती हैं। अतः मन के कारक चंद्र व शुक्र जो प्रेम कारक हैं से भी मंगल दोष बन रहा हो तो जातक अपने अंह स्वभाव, जिद्दिपन एव जीवनसाथी से प्रेम की कमी,
घृणा के कारण मंगल दोष अपना प्रभाव अवश्य दिखाता हैं।
पं0 दयानन्द शास्त्री

>मंगल दोष के विभिन्न प्रकार–क्यों जरूरी है मंगली का मंगली से ‍विवाह :-
जिस जातक की जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली आदि में मंगल ग्रह, लग्न से लग्न में (प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भावों में से कहीं भी स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहते हैं।
गोलिया मंगल ‘पगड़ी मंगल’ तथा चुनड़ी मंगल : जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं पर भी मंगल स्थित हो उसके साथ शनि, सूर्य, राहु पाप ग्रह बैठे हो तो व पुरुष गोलिया मंगल, स्त्री जातक चुनड़ी मंगल हो जाती है अर्थात द्विगुणी मंगली इसी को माना जाता है।
मांगलिक कुंडली का मिलान : वर, कन्या दोनों की कुंडली ही मांगलिक हो तो विवाह शुभ और दाम्पत्य जीवन आनंदमय रहता है। एक सादी एवं एक कुंडली मांगलिक नहीं होना चाहिए।
मंगल-दोष निवारण : मांगलिक कुंडली के सामने मंगल वाले स्थान को छोड़कर दूसरे स्थानों में पाप ग्रह हो तो दोष भंग हो जाता है। उसे फिर मंगली दोषरहित माना जाता है तथा केंद्र में चंद्रमा 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगली दोष दूर हो जाता है। शुभ ग्रह एक भी यदि केंद्र में हो तो सर्वारिष्ट भंग योग बना देता है।
शास्त्रकारों का मत ही इसका निर्णय करता है कि जहाँ तक हो मांगलिक से मांगलिक का संबंध करें। ‍िफर भी मांगलिक एवं अमांगलिक पत्रिका हो, दोनों परिवार अपने पारिवारिक संबंध के कारण पूर्ण संतुष्ट हो, तब भी यह संबंध श्रेष्ठ नहीं है। ऐसा नहीं करना चाहिए।ऐसे में अन्य कई कुयोग हैं। जैसे वैधव्य विषागना आदि दोषों को दूर रखें। यदि ऐसी स्थिति हो तो ‘पीपल’ विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके कन्या का संबंध अच्छे ग्रह योग वाले वर के साथ करें। मंगल यंत्र विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग करें। देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या‍दि में ही इसे प्रयोग करें। छोटे कार्य के लिए नहीं। विशेष : विशेषकर जो मांगलिक हैं उन्हें इसकी पूजा अवश्य करना चाहिए। चाहे मांगलिक दोष भंग आपकी कुंडली में क्यों न हो गया हो फिर भी मंगल यंत्र मांगलिकों को सर्वत्र जय, सुख, विजय और आनंद देता है। निम्न 21 नामों से मंगल की पूजा करें :-
1. ऊँ मंगलाय नम:
2. ऊँ भूमि पुत्राय नम:
3. ऊँ ऋण हर्वे नम:
4. ऊँ धनदाय नम:
5. ऊँ सिद्ध मंगलाय नम:
6. ऊँ महाकाय नम:
7. ऊँ सर्वकर्म विरोधकाय नम:
8. ऊँ लोहिताय नम:
9. ऊँ लोहितगाय नम:
10. ऊँ सुहागानां कृपा कराय नम:
11. ऊँ धरात्मजाय नम:
12. ऊँ कुजाय नम:
13. ऊँ रक्ताय नम:
14. ऊँ भूमि पुत्राय नम:
15. ऊँ भूमिदाय नम:
16. ऊँ अंगारकाय नम:
17. ऊँ यमाय नम:
18. ऊँ सर्वरोग्य प्रहारिण नम:
19. ऊँ सृष्टिकर्त्रे नम:
20. ऊँ प्रहर्त्रे नम:
21. ऊँ सर्वकाम फलदाय नम:
विशेष : किसी ज्योतिषी से चर्चा करके ही पूजन करना चाहिए। मंगल की पूजा का विशेष महत्व होता है। अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की गई पूजा प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है..
मंगल दोष/ योग निवारणार्थ…..कृपया मंगलनाथ मंदिर , जो उज्जैन ( मध्य प्रदेश ) में स्थित हे ..वहा जाकर विशेष रूप से “भात पूजा” अवश्य करवाएं…इस पूजा से शादी में विलम्ब/ कर्जमुक्ति..आदि में लाभ मिलता हे..अतः ऐसे जातक शीघ्र लाभ हेतु मंगलनाथ मंदिर आकर भात पूजा जरुर करवाएं..संपर्क—पंडित दयानंद शास्त्री-09024390067

>1-मेष: – पुलिस अथवा सेना की नौकरी, इंजीनियंिरंग, फौजदारी का वकील, सर्जन, ड्राइविंग, घड़ी का कार्य, रेडियो व टी.वी. का निर्माण या मरम्मत, विद्युत का सामान, कम्प्यूटर, जौहरी, अग्नि सम्बन्धी कार्य, मेकेनिक, ईंटों का भट्टा, किसी फैक्ट्री में कार्य, भवन निर्माण सामग्री, धातु व खनिज सम्बन्धी कार्य, नाई, दर्जी, बेकरी का कार्य, फायरमेन, कारपेन्टर।
2-वृषभ: – सौन्दर्य प्रसाधन, हीरा उद्योग, शेयर ब्रोकर, बैंक कर्मचारी, नर्सरी, खेती, संगीत, नाटक, फिल्म या टी.वी. कलाकार, पेन्टर, केमिस्ट, ड्रेस डिजाइनर, कृषि अथवा राजस्व विभाग की नौकरी, महिला विभाग, सेलटेक्स या आयकर विभाग की नौकरी, ब्याज से धन कमाने का कार्य, सजावट तथा विलासिता की वस्तुओं का निर्माण अथवा व्यापार, चित्रकारी, कशीदाकारी, कलात्मक वस्तुओं सम्बन्धी कार्य, फैशन, कीमती पत्थरों या धातु का व्यापार, होटल व बर्फ सम्बन्धी कारोबार।
3-मिथुन: – पुस्तकालय अध्यक्ष, लेखाकार, इंजीनियर, टेलिफोन आपरेटर, सेल्समेन, आढ़तिया, शेयर ब्रोकर, दलाल, सम्पादक, संवाददाता, अध्यापक, दुकानदार, रोडवेज की नौकरी, ट्यूशन से जीविका कमाने वाला, उद्योगपति, सचिव, साईकिल की दुकान, अनुवादक, स्टेशनरी की दुकान, ज्योतिष, गणितज्ञ, लिपिक का कार्य, चार्टड एकाउन्टेंट, भाषा विशेषज्ञ, लेखक, पत्रकार, प्रतिलिपिक, विज्ञापन प्रबन्धन, प्रबन्धन (मेनेजमेन्ट) सम्बन्धी कार्य, दुभाषिया, बिक्री एजेन्ट।

4-कर्क: – जड़ी-बूटिंयों का व्यापार, किराने का सामान, फलों के जड़ पौध सम्बन्धी कार्य, रेस्टोरेन्ट, चाय या काफी की दुकान, जल व कांच से सम्बन्धित कार्य, मधुशाला, लांड्री, नाविक, डेयरी फार्म, जीव विज्ञान, वनस्सपति विज्ञान, प्राणी विज्ञान आदि से सम्बन्धित कार्य, मधु के व्यवसाय, सुगन्धित पदार्थ व कलात्मक वस्तुओं से सम्बन्धित कार्य, सजावट की वस्तुएं, अगरबत्ती, फोटोग्राफी, अभिनय, पुरातत्व इतिहास, संग्रहालय, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता या सामाजिक संस्थाओं के कर्मचारी, अस्पताल की नौकरी, जहाज की नौकरी, मौसम विभाग, जल विभाग या जल सेना की नौकरी, जनरल मर्चेन्ट।
5-सिंह: – पेट्रोलियम, भवन निर्माण, चिकित्सक, राजनेता, औषधि निर्माण एवं व्यापार, कृषि से उत्पादित वस्तुएं, स्टाक एक्सचेंज, कपड़ा, रूई, कागज, स्टेशनरी आदि से सम्बन्धित व्यवसाय, जमीन से प्राप्त पदार्थ, शासक, प्रसाशक, अधिकारी, वन अधिकारी, राजदूत, सेल्स मैनेजर, ऊन के गरम कपड़ों का व्यापार, फर्नीचर व लकड़ी का व्यापार, फल व मेवों का व्यापार, पायलेट, पेतृक व्यवसाय।
6-कन्या: – अध्यापक, दुकान, सचिव, रेडियो या टी.वी. का उद्घोषक, ज्योतिष, डाक सेवा, लिपिक, बैकिंग, लेखा सम्बन्धी कार्य, स्वागतकर्ता, मैनेजर, बस ड्रायवर और संवाहक, जिल्दसाज, आशुलिपिक, अनुवादक, पुस्तकालय अध्यक्ष, कागज के व्यापारी, हस्तलेख और अंगुली के विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक, अन्वेषक, सम्पादक, परीक्षक, कर अधिकारी, सैल्स मेन, शोध कार्य पत्रकारिता आदि।
7-तुला: – न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट, परामर्शदाता, फिल्म या टी.वी. से सम्बन्ध, फोटोग्राफर, फर्नीचर की दुकान, मूल्यवान वस्तुओं का विनिमय, धन का लेन-देन, नृत्य-संगीत या चित्रकला से सम्बन्धित कार्य, साज-सज्जा, अध्यापक, बैंक क्लर्क, एजेन्सी, दलाली, विलासिता की वस्तुएं, राजनेता, जन सम्पर्क अधिकारी, फैशन मॉडल, सामाजिक कार्यकर्ता, रेस्तरां का मालिक, चाय या काफी की दुकान, मूर्तिकार, कार्टूनिस्ट, पौशाक का डिजाइनर, मेकअप सहायक, केबरे प्रदर्शन।
8-वृश्चिक: – केमिस्ट, चिकित्सक, वकील, इंजीनियर, भवन निर्माण, टेलीफोन व बिजली का सामान, रंग, सीमेन्ट, ज्योतिषी और तांत्रिक, जासूसी का काम करने वाला, दन्त चिकित्सक, मेकेनिक, ठेकेदार, जीवन बीमा एजेन्ट, रेल या ट्रक कर्मचारी, पुलिस और सेना के कर्मचारी, टेलिफोन आपरेटर, समुद्री खाद्यान्नों के व्यापारी, गोता लगाकर मोती निकालने का काम, होटय या रेस्टोरेन्ट, चोरी या डकैती, शराब की फैक्ट्री, वर्कशाप का कार्य, कल-पुर्जो की दुकान या फैैक्ट्री, लोहे या स्टील का कार्य, तम्बाकू या सिगरेट का कार्य, नाई, मिष्ठान की दुकान, फायर बिग्रेड की नौकरी।
9-धनु: – बैंक की नौकरी, अध्यापन, किसी धार्मिक स्थान से सम्बन्ध, ऑडिट का कार्य, कम्पनी सेकेट्री, ठेकेदार, सट्टा व्यापार, प्रकाशक, विज्ञापन से सम्बन्धित कार्य, सेल्समेन, सम्पादक, शिक्षा विभाग में कार्य, लेखन, वकालात या कानून सम्बन्धी कार्य, उपदेशक, न्यायाधीश, धर्म-सुधारक, कमीशन ऐजेन्ट, आयात-निर्यात सम्बन्धी कार्य, प्रशासनाधिकारी, पशुओं से उत्पन्न वस्तुओं का व्यापार, चमड़े या जूते के व्यापारी, घोड़ों के प्रशिक्षक, ब्याज सम्बन्धी कार्य, स्टेशनरी विक्रेता।
10-मकर: – नेवी की नौकरी, कस्टम विभाग का कार्य, बड़ा व्यापार या उच्च पदाधिकारी, समाजसेवी, चिकित्सक, नर्स, जेलर या जेल से सम्बन्धित कार्य, संगीतकार, ट्रेवल एजेन्ट, पेट्रोल पम्प, मछली का व्यापार, मेनेजमेन्ट, बीमा विभाग, ठेकेदारी, रेडिमेड वस्त्र, प्लास्टिक, खिलौना, बागवानी, खान सम्बन्धी कार्य, सचिव, कृषक, वन अधिकारी, शिल्पकार, फैक्ट्री या मिल कारीगर, सभी प्रकार के मजदूर।
11 -कुम्भ: – शोध कार्य, शिक्षण कार्य, ज्योतिष, तांत्रिक, प्राकृतिक चिकित्सक, इंजीनियर या वैज्ञानिक, दार्शनिक, एक्स-रे कर्मचारी, चिकित्सकीय उपकरणों के विक्रेता, बिजली अथवा परमाणु शक्ति से सम्बन्धित कार्य, कम्प्यूटर, वायुयान, वैज्ञानिक, दूरदर्शन टैक्नोलोजी, कानूनी सलाहकार, मशीनरी सम्बन्धी कार्य, बीमा विभाग, ठेकेदार, लोहा, तांबा, कोयला व ईधन के विक्रेता, चौकीदार, शव पेटिका और मकबरा बनाने वाले, चमड़े की वस्तुओं का व्यापार।
12 -मीन: – लेखन, सम्पादन, अध्यापन कार्य, लिपिक, दलाली, मछली का व्यापार, कमीशन एजेन्ट, आयात-निर्यात सम्बन्धी कार्य, खाद्य पदार्थ या मिष्ठान सम्बन्धी कार्य, पशुओं से उत्पन्न वस्तुओं का व्यापार, फिल्म निर्माण, सामाजिक कार्य, संग्रहालय या पुस्तकालय का कार्य, संगीतज्ञ, यात्रा एजेन्ट, पेट्रोल और तेल के व्यापारी, समुद्री उत्पादों के व्यापारी, मनोरंजन केन्द्रों के मालिक, चित्रकार या अभिनेता, चिकित्सक, सर्जन, नर्स, जेलर और जेल के कर्मचारी, ज्योतिषी, पार्षद, वकील, प्रकाशक, रोकड़िया, तम्बाकू और किराना का व्यापारी, साहित्यकार।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>आज पूर्णिमा हे—

>आज पूर्णिमा हे आज सत्य नारायण व्रत हे, आज वे सभी जातक जिनकी कुंडली में केमद्रुम योग/ दोष हे , जिनका चंद्रमा दूषित हे या किसी पापी गृह के साथ हे या किसी पापी गृह की द्रष्टि चन्द्रमा पर हे या चंद्रमा की महादशा / अन्तेर्दशा / प्रत्यंतर चल रहा हो –वे सभी जातक किसी योग्य देवज्ञ/ ज्योतिषी से सलाह/ परामर्श/ मार्गदर्शन लेकर…मोती धारण करे चांदी में banvakar ( अंगूठी में या अर्धचन्द्राकार लाकेट बनवाकर गले मे धारण करें)..आज चंद्रमा का अभिषेक भी किया जा सकता हे रात्रि में.– किसी बड़े पात्र/ बर्तन. टब..adi / अन्य वस्तु में पानी/ जल भरकर उसे chhat पे/ खुले स्थान/ बालकनी- अर्थात इसे जगह पर रखे जहा पर उस पात्र/ बर्तन में चंद्रमा की छाया / प्रतिबिम्ब नजर आ सके..फिर दूध को “singi” (अभिषेक हेतु विशेष patr) में le कर अभिषेक करें–मंत्र हे–ॐ सोम somay नमः / ॐ चन्द्र चन्द्रमसे नमः / ॐ ऍम हीं सोमाय नमः / ॐ shraam श्रीं shroom सः chandaray नमः / कोई भी उपयुक्त मंत्र (मानसिक जप करते huye) का जप करते हुए chandrma का abhishek करें.. उस दूध में thoda सा दही, शहद, इत्र,घी भी मिला ले— ///अन्य उपाय इस प्रकार हे –चन्द्र यंद्र का निर्माण चांदी में करवाकर धारण करें..chandra गृह की शांति हेतु- दान करें–मोती,चीनी, चांवल, चांदी, घी, श्वेत वस्त्र, श्वेत गे, दूध से बनी मिठाई, खीर, ..आदि../ चद्र कवच का पाठ भी लाभदायक हे…कृपया उक्त सभी उपाय किसी योग्य ज्योतिषी / देवज्ञ /कर्मकांडी ब्राह्मन की देखरेख में ही संपन्न करवाएं..धन्यवाद

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>हमारे बारे में–

>आर्थिक सम्पन्नता प्राप्ति हेतु की जाने वाली (फाल्गुन मास में की जाने वाली) गणेश उपासना/ साधना की जानकारी निशुल्क प्राप्त करने हेतु कृपया आप मुझे अपना पता लिखा लिफाफा( जवाबी ) मेरे पते पर भिजवाने का कष्ट करें. कृपया कोई इमेल या समस न करें.धन्यवाद/आभार ..
मेरा पता हे-
पंडित दयानंद शास्त्री,
पुराने पॉवर हाउस के पास,
कसेरा बाज़ार, झालरापाटन सिटी (राज.)
पिन-३२६०२३…
यदि संभव हो तो डाक द्वारा / by पोस्ट भिजवाने का /संपर्क करने का प्रयास करें..
.PLZ. DON’T USE ANY SMS/ EMAILS FOR THIS..THENX TO ALL OF YOU IN ADCANCE..
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क्या खोया क्या पाया मैंने,मिलते और बिछुड़ते जग में.मुझे किसी से नहीं शिकायत,यद्यपि छला गया पग पग में …कइयो ने बनाया/ समझा मुझे बेवकूफ…लेकिन मेने भी नहीं हरी हे हिम्मत..चलता जा रहा हु अकेला ही अपनी मंजिल/लक्ष्य की तरफ..बिना किसी साथी/ हमसफ़र/ चिंता या सहयोग के….ईश्वर की कृपा..अपनों का प्यार…बड़ो का मार्गदर्शन और आशीर्वाद मेरे साथ हे….अभी तो तो mujhe सभी मांगने वाले ..”levta ” (लेने vale)ही मिले हे ..देने वाले “देवता ” का इंतजार/ प्रतीक्षा में hu …कब होगा मेरा इंतजार पूरा…???????
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कृपया वैदिक ज्योतिष / हस्तरेखा / वास्तु/ कर्मकांड/ आध्यात्म / तंत्र-MANTRA -यन्त्र आदि/ जेसे विषयों पर आप सभी विद्वान् हमारी पत्रिका और अख़बार के लिए अपने आलेख/ अनुभव/ शोध पत्र हमें भिजवाने की कृपा/ कस्ट करे..आपके लेख आपके फोटो-NAM-पते सहित प्रकाशत किये JAYENGE..ISKE BADLE/ FALSWARUO AAPKO KISI PRAHAR KA INAM/ PURUSKAR/ DHAN PRADAN NAHI KIYA JAYEGA…YAH SEVA PURNTAYA —NISHULK HOGI…..
विषय—-
(A)-SHIKSHA एवं रोजगार,
(B)- विवाहिक समस्याएं,
(C)- KUNDALI OR वास्तु,
(D)- संतान प्रकरण,…
(E)–वास्तु और SVASTHYA …
(F)–मंगल दोष / योग और परिहार/ उपाय
(G)– हस्तरेखा द्वारा उक्त VISHAYON पर लेख;;
कृपया आप अपने लेख/ शोध पत्र निम्न पते पर SHIGHR भिजवाएं–
Contact No. : 09024390067
Postal / Communication Address :-
Pt. Dayananda Shastri’
(Editor- Vinayak Vastu Times / Sub Editor – DHARM JYOTISH),
(R.N.I. No.:- RAJHIN/2008/25671)
Vinayak vastu Astro Shodha Sansthan,
Near Old Power House, Kasera Bazar,
JHALRAPATAN CITY (RAJ.) 326023 INDIA
E-Maii:- dayanandashastri@yahoo.com;
-vastushastri08@rediffmail.com;
- vastushastri08@hotmail.com;
## कृपया अपने लेख के साथ अपना विवरण, फोटो, अनुभव आदि की जानकारी भी अवश्य भिजवाएं..
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mahngayi ने महंगा jamana कर दिया,
मुश्किल अब बहुत जीना कर दिया,………………
हर चीज के दाम अब आसमानी हो गए,
jine के hosle pani pani हो गए ,…………..
thali से roti अब उड़ने लगी,
ख्वाबों में vo अब आने लगी,
तरकारी jeb से अब दूर होने लगी हे………….
अब केसे कोई मकान बनाये,
अब केसे करेगा कोई शादी,
बढ़ते दामो ने सभी के ,……………………
सपनो को लगा दी हे लगाम,
गेस लोगो को ठेस
अब लगाने लगी हे………….
कार ..बाइक में रहा अब तेल नहीं,
इनको चलाना ..अब कोई हंसी खेल नहीं………..
ab आम आदमी और ,
आजकल आम हो गया,
और अपनी जिंदगी से ,
निराशमंद हो गया………….
अब इलाज..और इंसाफ भी हो गए हे महंगे……
केसे चलेगी जिंदगी अब……..
एक बड़ा सवाल हो गया हे ….
mahngayi ने महंगा jamana कर दिया,
मुश्किल अब बहुत जीना कर दिया,…………..
### दयानंद “bandhu”###################
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जब भी अपनों को आजमाया हे….
हमने खुद से फरेब खाया हे…..
जेसा चाहा उसे बनाया हे…
जितना फ़ोलाद को तपाया हे…..
चंद रोजा इस जिंदगानी का ………
कोई मकसद समझ नहीं पाया हे……….
जितने वाले खुद समझाते हे…….
किस तरह से मुझे हराया हे……..
सारे बेज़ा उसूल लगते हे…….
भूखे बच्चो को जब रुलाया हे………
हंसते हंसते निकल पड़े आँसू………..
बीता लम्हा अब याद आया हे……….
सारी duniya बुरी नहीं “bandhu”……..
कोई to हे जो काम आया हे……………….
### dayanand “bandhu”##################
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Shiv ki shakti,
Shiv ki bhakti,
khushi ki bahar mile,
Shivratri k pavan avsar
par apko zindgi ki ek
nayi achchi shuruwat mile…aapko….
“””” HAPPY-MAHA SHIV-RATRI”"”"”"
ॐ नम: शिवाय——
आप सभी को महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभ कामनाएँ मंगलकामनाएं
ईश्वर की कृपा आप सभी पर सदा बनी रहे ! ….ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय———ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: ——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ नम: शिवाय——ॐ
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ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।।……….
सभी परम स्नेहिल मित्रो को महाशिवरात्रि की हार्दिक बधाई ।……..
आशुतोष शशांक शेखर चंद्रमौली चिदंबरा
कोटि कोटि प्रणाम शंभो कोटि नमन दिगम्बरा
निर्विकार ओंकार अविनाशी तुम्ही देवाधिदेव
जगत सर्जक प्रलयकर्ता शिवम सत्यम सुंदरा
निरंकार स्वरुप कालेश्वर महाजोगिश्वरा
दयानिधि दानिश्वरा जय जटाधारी अभ्यंकरा
शूलपाणी त्रिशूल धारी औघडी बाघम्बरी
जय महेश त्रिलोचनाय विश्वनाथ विश्वम्भरा
नाथ नागेश्वर हरो हर पाप शाप अभिशाप तम
महादेव महान भोले सदाशिव शिव शंकरा
जगतपति अनुरक्ति भक्ति सदैव तेरे चरण हो
छमा हो अपराध सब जय जयति जय जगदिश्वरा
जन्म जीवन जगत का संताप सब मिटे सभी
ओम नम: शिवाय मन जपता रहे पंचाकछरा …………………………….
अथ शिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम्…….
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नम:शिवाय ॥ 1 ॥
मंदाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथ महेश्वराय ।
मण्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नम:शिवाय ॥ 2 ॥
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय बृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नम:शिवाय ॥ 3 ॥
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नम:शिवाय ॥ 4 ॥
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नम:शिवाय ॥ 5 ॥
पञ्चाक्षरिमदं पुण्यं य: पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥ 6 ॥…………………………..
ॐ नमः पार्वती पतये…..हर….हर….महादेव………….
काटा लाग सके न कंकर……..बोलो जय जय शिव शंकर
नमो पार्वतीपतये हर हर हर महादेऽऽऽऽऽऽऽऽऽव …………………………..
अलख निरंजन नाम तुम्हारा संग मेँ भूतो का टोला…………
शिव बम बम बम बम भोला……..”ॐ”
नमः शिवाये …………..सज्जनों एवं स्वजनों “शिव जी ” आप सबका एवं समस्त विश्व को अपने आशीर्वाद से समस्त दुखो को दूर कर चारो दिशाओं में खुशियों को भर दे …..

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>शीघ्र विवाह के सामान्य उपाय —

>1. कन्या के विवाह में हो रहे विलम्ब को दूर करने के लिए पिता को चाहिए कि विवाह वार्ता के समय कन्या को कोई नया वस्त्र अवश्य पहनाना चाहिए।
2. यदि विवाह प्रस्ताव नहीं प्राप्त हो रहे तो पिता को चाहिए कि कन्या को गुरूवार को पीला वस्त्र एवं शुक्रवार को सफेद वस्त्र पहनावें। ये वस्त्र नये हो शीघ्र फल मिलेगा। यदि 4 सप्ताह तक यह प्रयोग किया जावे तो अच्छे विवाह प्रस्ताव प्राप्त होने लग जावेगें। अतः किसी वस्त्र को दोबारा नहीं पहनाना चाहिए।
3. यदि कन्या के विवाह प्रस्ताव सगाई तय होने के अन्तिम चरण में पहुँचकर टूट जाते हैं तो माता-पिता को यह प्रयास करना चाहिए कि जिस कक्ष में बैठकर सगाई/शादी के सम्बन्ध में वार्ता की जावे उसमें वह अपने जूते चप्पल उतार कर प्रवेश करें। जूते चप्पल कक्ष से बाहर द्वार के बायीं ओर और उतारे।
4. जिस समय भी कन्या के परिजन वर पक्ष के घर प्रवेश करते समय कन्या के माता पिता अथवा अन्य व्यक्ति वह पैर सबसे पहले घर में रखना चाहिए जिस नासिका में (दायीं अथवा बायीं ओर का) स्वर प्रवाहित हो रहा हो।
5. जिस समय भी कन्या के परिजन वर पक्ष से विवाह वार्ता के लिए जावे उस समय कन्या अपने बालों को खोले रखे तथा उनके लौटकर आ जाने के समय तक खोले रखें, न तो जूड़ा और न ही चोटीं बनायें। कन्या को चाहिए कि अपने परिजनों को विवाह वार्ता के लिए प्रस्थान करते समय प्रसन्नता पूर्वक उन्हें मिष्ठान खिलाकर विदा करें।
6. विवाह योग्य युवक-युवतियों को जब भी किसी विवाह उत्सव में भाग लेने का अवसर मिले तो लड़के या कन्या को लगाई जाने वाली मेंहदी में कुछ मेंहदीं लेकर अपने हाथों पर लगाना चाहिए।
7. शाीघ्र विवाह के लिए कन्या को 16 सोमवार का व्रत करना चाहिए तथा प्रत्येक सोमवार को शिव मन्दिर में जाकर जलाभिषेक करें, माँ पार्वती का श्रृंगार करें, शिव पार्वती के मध्य गठजोड़ बाँधे तथा शीघ्र विवाह के लिए प्रार्थना करें। विवाह प्रस्ताव आने प्रारम्भ हो जावेगें।
8. वर की कामना पूर्ति हेतु कन्या को निम्न मंत्र का शिव-गौरी पूजनकर एक माला का जप करना चाहिए।
’’ ऊँ नमः मनोभिलाषितं वरं देहि वरं ही ऊँ गोरा पार्वती देव्यै नमः ’’
9. रामचरित मानस के बालकाण्ड में शिव पार्वती विवाह प्रकरण का नित्य पाठ करने से कन्या का विवाह शीघ्र होता देखा गया हैं।
10. विवाह अभिलाषी लड़का या लड़की शुक्रवार के दिन भगवान शंकर पर जलाभिषेक करें तथा शिव लिंग पर ’’ ऊँ नमः शिवाय ’’ बोलते हुए 108 पुष्प चढ़ावें शीघ्र विवाह की प्रार्थना करें साथ ही शंकर जी पर 21 बीलपत्र चढ़ावें ऐसा कम से कम 7 शुक्रवार करें, शीघ्र विवाह/शादी के प्रस्ताव आने प्रारम्भ हो जायेगें।
11. गुरूवार के दिन विष्णु लक्ष्मी मन्दिर में कंलगी जो सेहरे के ऊपर लगी रहती हैं चढ़ावें, साथ ही बेसन के 5 लड्डू चढावें, भगवान से शीघ्र विवाह की प्रार्थना करें विवाह का वातावरण बनना प्रारम्भ हो जावेगा ।
यह उपरोक्त बड़े सरल टोटके हैं इन्हें कोई भी विवाहकांक्षी श्रद्धा एवं विश्वास के साथ करता हैं तो सफलता मिलती हैं । लड़की की शादी शीघ्र होती हैं ।
यदि उपरोक्त टोटके करने के पश्चात भी यदि विवाह सम्पन्न नहीं हो पाता हैं । कुण्डली में विवाह बाधा योग हो तो निम्न तांत्रिक प्रयोग करना चाहिए ।
कामदेव रति यंत्र:-
विवाहकांक्षी लड़का या लड़की कामदेव रति यंत्र प्राप्त करें । नित्य प्रातःकाल उठकर स्नानकर सूर्य को 7 बार अर्ध्य देवे और फिर आसन बिछा कर बैठे । सामने किसी बाजोंट पर स्वच्छ नया वस्त्र बिछाकर कामदेव रति यत्र को स्थापित करें । यंत्र का पंचामोउपचार से पूजन करें । हकीक माल से निम्न मंत्र का सवालाख जप करें । यदि श्रद्धा और विश्वास के साथ जप किया जावे तो जप समाप्ति पर अच्छे प्रस्ताव आने प्रारम्भ हो जाते हैं ।
‘‘ ऊँ कामदेवाय विदमहे रति प्रियायै धीमहि तन्नो अॅनंग प्रयोदयात ‘‘।
विवाह बाधानिवारण यंत्र:-
जिनके पुत्र-पुत्रियों की उम्र विवाह योग्य हो, विवाह में अनावश्यक विलम्ब हो रहा हो । सगाई टूट जाती हो अथवा कुण्डली में विवाह बाधा योग हो तो उन्हे निम्न तांन्त्रिक प्रयोग सम्पन्न करना चाहिए, शीघ्र विवाह होता हैं । यह प्रयोग किसी मंगलवार को आरम्भ किया जा सकता हैं । इस प्रयोग को लड़का या लड़की स्वयं करें या माता-पिता या किसी पण्डित से संकल्प लेकर करवाया जा सकता हैं ।
इस प्रयोग के निम्न उपकरण जो प्राण प्रतिष्ठित हो वांछनीय हैं ।
1. सौभाग्य माला 2. विवाह बाधा निवारण यंत्र
प्रातः स्नान करने के पश्चात यंत्र को बाजोट पर वस्त्र बिछाकर स्थापित करें । यंत्र को प्रथम दुध से फिर जल से स्नान करावे तथा स्वच्छ वस्त्र से यंत्र को पोछकर, केसर से यंत्र को तिलक करें, अक्षत, पुष्प यंत्र को साथ में अर्पित करें ।
गुरू पूजन करें तथा गुरू से अनुष्ठान सफल के सम्बन्ध में प्रार्थना अवश्य करें । दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लेकर संकल्प बोले (यह साधना विवाह बाधा निवारणार्थ शीघ्र विवाह हेतु सम्पन्न कर रहा हूॅ ) निम्न मंत्र की सौभाग्य माला से 11 मालाएं 21 दिन तक जन करें, क्रम टूटना नहीं चाहिए । 21 दिन के पश्चात यंत्र और माला को बहते जल में या नदी में प्रवाहित कर दें । विवाह बाधाएं समाप्त होगी ।
‘‘ ऊँ हो कामदेवाय रत्यै सर्व दोष निवारणाय फटं् ‘‘
दर्गासप्तशती का पाठ:- पुत्र की शादी नहीं हो रही हो, शादी में रूकावटें आ रही हो तो दुर्गासप्तशती का पाठ निम्न मंत्र का सम्पुट लगाकर करें ।
‘‘ पत्नि मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीय ।
तारिणिं दुर्गासंसार सागरस्य कुलोद्भणामं ।।
यह पाठ स्वयं विवाहकांशी ही करें तो श्रेष्ठ रहेगा, विवाह प्रस्ताव आने प्रारम्भ हो जावेगें । विवाह योग्य कन्या को भवन के वायव्य कोण वाले कक्ष में सोना चाहिए इससे कन्या के विवाह में आने वाली रूकावटें स्वतः दूर होती हैं तथा कन्या का विवाह जल्दी होने की सम्भावना बनती हैं ।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>मोबाईल से मोहब्बत :::—–

>मोबाईल से मोहब्बत :::——-
मोबाईल से मोहब्बत अब
कितनी आसन हो गयी…
आशिकों के लिए आसमानी बातें…
अब वरदान हो गयी….
कभी भी दिलबर से कर लो बात……
जब दिल की धड़कन सुनसान हो गयी……
अपने-अपने कमरों से रात- रात भर बातें…
..देखा वक्त तो अजान हो गयी…..
अब हर कहीं बुला लो अपने महबूब ko ………
जब हसरतें तुम्हारी जवान ho गयी……
चुपचाप भेज दो एस. एम् .एस………….
जहाँ खामोश जुबान हो गयी…….
रोज अखबार में होते लेला मजनू…………
जब मुहब्बत उनकी परवान चढ़ गयी…….
इसलिए मत दो मोबाईल उनके हाथों में…….
जहाँ बेटी तुम्हारी जवान हो गयी……….
वरना pachhataoge फिर कहोगे…….
दुनिया हमारी वीरान हो गयी………..
मोबाईल से मोहब्बत अब ……..
कितनी आसन हो गयी……………
##### दयानंद “bandhu”#######

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>ज्योतिष एवं शिक्षा—

>प्रायः हम देखते हैं कि जिन व्यवसाय/पदों को प्राप्त करके भी हम छोड़ देते हैं या किसी अन्य व्यवसाय से जुड़ जाते हैं अथवा अनेक व्यवसाय एक साथ करने लग जाते हैं। इसका मुख्य कारण जातक की कुण्डली में ग्रहों की स्थिती होती हैं।
एक सभ्य, सुसंस्कृत एवं जिम्मेदार नागरिक बनाने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका हैं आर्थिक एवं प्रतिस्पर्धा के इस युग मंे उचित एवं सही माध्यम या विषय चयन कर अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं । कोई व्यक्ति कितनी शिक्षा प्राप्त करेगा या उसका पढाई के प्रति क्या रूझान हैं यह जन्म पत्रिका के माध्यम से जाना जा सकता हैं । अधिकांश अभिभावकों एवं विद्यार्थियों की चिंता यह रहती हें कि क्या पढा जाएं ताकि अच्छा केरियर निर्मित हो आज के युग को देखते हुए ज्योतिष के माध्यम से शिक्षा का चयन उपयोगी हो सकता हैं ।
इस युग में शिक्षा का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत हो गया हैं और बदलते हुए जीवन-मूल्यों के साथ-साथ शिक्षा के उद्धेश्य भी बदल गये हैं। शिक्षा व्यवसाय से जुड़ गई हैं और छात्र-छात्राएं व्यवसाय की तैयारी के रूप में ही इसे ग्रहण करते है। उनके लिए व्यवसायिक भविष्य को उज्ज्वल बनाने की दृष्टि से विषय का चयन करना अत्यन्त समस्यापूर्ण हो गया हैं। इसके अलावा शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश अथवा अच्छा व्यवसाय प्राप्त करने के लिए उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता हैं। अतः इस संदर्भ में अन्य तथ्यों को ध्यान में रखने के साथा-साथ असफलता एवं समय की बर्बादी से बचने के लिए ज्योतिष सिद्धान्तों के आधार पर लिया गया निष्कर्ष ही विषय एवं व्यवसाय के चयन में उपयोगी या लाभकारी सिद्ध हो सकता हैं।
प्राचीन काल में शिक्षा का मुख्य उद्धेश्य ज्ञान प्राप्ति होता था । विद्यार्थी किसी योग्य विद्वान के निर्देशन में विभिन्न प्रकार की शिक्षा ग्रहण करते थे । इसके अतिरिक्त उसे शस्त्र संचालन एवं विभिन्न कलाओं का प्रशिक्षण भी दिया जाता था । किन्तु वर्तमान समय मंे यह सभी प्रशिक्षण लगभग गौण हो गये । शिक्षा की महत्ता बढ़ने व प्रतिस्पर्धात्मक युग में सजग रहते हुए बालक के बोलने व समझने लगते ही माता-पिता शिक्षा के बारे में चिंतित हो जाते हैं । कुछ वर्षो बाद सबसे बड़ी समस्या यही होती हैं कि कौनसा विषय पढ़ंे जिससे भविष्य सुखमय हो। कैरियर निर्माण हेतु –
1 – सर्वप्रथम जातक के बचपन से ही उसकी कुण्डली विषय की पढाई व केरियर चयन में सहायक होती हैं ।
2 – जातक की कुण्डली से तय करना चाहिए कि वह नौकरी करेगा या व्यवसाय ।
3 – जातक की 20 से 40 वर्ष की उम्र के बीच की ग्रह दशा का सुक्ष्म अध्ययन कर यह देखना चाहिए की दशा किस प्रकार के कार्यक्षेत्र का संकेत दे रही हैं ।
4 – आगामी गोचर या दशा कार्यक्षेत्र में तरक्की का संकेत दे रहा हैं या नहीं ? इसका भी परिक्षण कर लेना चाहिए ।

शिक्षा में महत्वाकांक्षा -
जन्म कुण्डली का नवम भाव धर्म त्रिकोण स्थान हैं जिसके स्वामी देव गुरू बृहस्पति हैं यह भाव शिक्षा में महत्वाकांक्षा व उच्च शिक्षा तथा उच्च शिक्षा किस स्तर की होगी को दर्शाते हैं यदि इसका सम्बन्ध पंचम भाव से हो जाए तो अच्छी शिक्षा तय करते हैं ।

शिक्षा का स्तर –
जन्म कुण्डली का पंचम भाव बुद्धि, ज्ञान, कल्पना, अतिन्द्रिय ज्ञान, रचनात्मक कार्य, याददाश्त व पूर्व जन्म के संचित कर्म को दर्शाता हैं । यह शिक्षा के संकाय का स्तर तय करता हैं।

शिक्षा किस प्रकार होगी –
जन्म कुण्डली का चतुर्थ भाव मन का भाव हैं । यह इस बात का निर्धारण करता हैं कि आपकी मानसिक योग्यता किस प्रकार की शिक्षा में होगी । जब भी चतुर्थ भाव का स्वामी छठे, आठवें या बारहवें भाव में गया हो या नीच राशि, अस्त राशि, शत्रुराशि में बैठा हो व कारक ग्रह (चन्द्रमा) पीड़ित हो तो शिक्षा में मन नहीं लगता हैं ।

शिक्षा का उपयोग –
जनम कुण्डली का द्वितीय भाव वाणी, धन संचय, व्यक्ति की मानसिक स्थिति को व्यक्त करता हैं तथा यह दर्शाता हैं कि शिक्षा आपने ग्रहण की हैं वह आपके लिए उपयोगी हैं या नहीं हैं। यदि इस भाव पर पाप ग्रह का प्रभाव हो तो व्यक्ति शिक्षा का उपयोग नहीं करता हैं ।

जातक को बचपन से किस विषय की पढाई करवानी चाहिए इस हेतु हम मुलतः निम्न चार पाठ्यक्रम (विषय) ले सकते हैं – गणित , जीव विज्ञान, कला और वाणिज्य –

गणित –
गणित के कारक ग्रह बुध का संबंध यदि जातक के लग्न, लग्नेश या लग्न नक्षत्र से होता हैं तो वह गणित में सफल होता हैं । यदि लग्न, लग्नेश या बुध बली एवं शुभ दृष्ट हो, तो उसके गणित में पारंगत होने की संभावना बढ़ जाती हैं । शनि एवं मंगल किसी भी प्रकार से संबंध बनाएं तो जातक मशीनरी कार्य में दक्ष होता हैं । इसके अतिरिक्त मंगल और राहु की युति, दशमस्थ बुध एवं सूर्य पर बली मंगली की दृष्टि, बली शनि एवं राहु का संबन्ध, चन्द्र व बुध का संबंध, दशमस्थ राहु एवं षष्ठस्थ यूरेनस आदि योग तकनीकी शिक्षा के कारक होते हैं ।

जीवविज्ञान –
सूर्य का जल राशिस्थ होना, छठे एवं दशम भाव/भावेश के बीच संबंध, सूर्य एवं मंगल का संबंध आदि चिकित्सा क्षेत्र में पढ़ाई के कारक होते हैं । लग्न/लग्नेश एवं दशम/दशमेश का संबंध अश्विनी, मघा या मूल नक्षत्र से हो तो चिकित्सा क्षेत्र में सफलता मिलती हैं।
कला –
पंचम/पंचमेश एवं कारक गुरू का पीड़ित होना कला के क्षेत्र में पढाई का कारक होता हैं। इन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि पढाई पूरी करवाने में सक्षम होती हें । पापी ग्रहों की दृष्टि-युति संबंध कला के क्षेत्र में पढाई में अवरोध उत्पन्न करता हैं । लग्न व दशम का शनि व राहु से संबंध राजनीतिक क्षेत्र में सफलता दिवलाता हें। 10 वें भाव का संबंध सूर्य, मंगल, गुरू या शुक्र से हो तो जातक जज बनता हैं ।

वाणिज्य –
लग्न/लग्नेश का संबंध बुध के साथ-साथ गुरू से भी हो तो जातक वाणिज्य की पढाई सफलतापूर्वक करता हैं ।
अच्छी शैक्षणिक योग्यता के महत्वपूर्ण योग:-
1. द्वितीयेश या बृहस्पति केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो।
2. पंचम भाव में बुध की स्थिति अथवा दृष्टि या बृहस्पति और शुक्र की युति हो।
3. पंचमेश की पंचम भाव में बृहस्पति या शुक्र के साथ युति हो।
4. बृहस्पति , शुक्र और बुध में से कोई केन्द्र या त्रिकोण में हो।

शैक्षणिक योग्यता का अभाव या न्यूनता: –
1. पंचम भाव में शनि की स्थिति और उसकी लग्नेश पर दृष्टि हो।
2. पंचम भाव पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि या अशुभ ग्रहों की स्थिति हो।
3. पंचमेश नीच राशि में हो और अशुभ ग्रहों से दृष्ट हो।
विभिन्न ग्रहों के शिक्षा सम्बन्धी प्रतिनिधित्व का विवरण अंकित किया जा रहा हैं जिसके आधार पर ग्रहों की उपरोक्त भावों में स्थिति को देखकर जातक के लिए उपयुक्त विषय का चयन किया जा सकता हैं।
सूर्य: – चिकित्सा, शरीर विज्ञान, प्राणीशास्त्र, नेत्र-चिकित्सा, राजभाषा, प्रशासन, राजनीति, जीव विज्ञान।
चन्द्र: – नर्सिंग, नाविक शिक्षा, वनस्पति विज्ञान, जंतु विज्ञान (जूलोजी), होटल प्रबन्धन, काव्य, पत्रकारिता, पर्यटन, डेयरी विज्ञान, जलदाय
मंगल: – भूमिति, फौजदारी, कानून, इतिहासस, पुलिस सम्बन्धी प्रशिक्षण, ओवर-सियर प्रशिक्षण, सर्वे अभियांत्रिकी, वायुयान शिक्षा, शल्य चिकित्सा, विज्ञान, ड्राइविंग, टेलरिंग या अन्य तकनीकी शिक्षा, खेल कूद सम्बन्धी प्रशिक्षण , सैनिक शिक्षा, दंत चिकित्सा
गुरू: – बीजगणित, द्वितीय भाषा, आरोग्यशास्त्र, विविध, अर्थशास्त्र, दर्शन, मनोविज्ञान, धार्मिक या आध्यात्मिक शिक्षा।
बुध: – गणित, ज्योतिष, व्याकरण, शासन की विभागीय परीक्षाएं, पर्दाथ विज्ञान, मानसशास्त्र, हस्तरेखा ज्ञान, शब्दशास्त्र (भाषा विज्ञान), टाइपिंग, तत्व ज्ञान, पुस्तकालय विज्ञान, लेखा, वाणिज्य, शिक्षक प्रशिक्षण।
शुक्र: – ललितकला (संगीत, नृत्य, अभिनय, चित्रकला आदि), फिल्म, टी0वी0, वेशभूषा, फैशन डिजायनिंग, काव्य साहित्य एवं अन्य विविध कलाएं।
शनि: – भूगर्भशास्त्र, सर्वेक्षण, अभियांत्रिकी, औद्योगिकी, यांत्रिकी, भवन निर्माण, मुद्रण कला (प्रिन्टिंग)।
राहु: – तर्कशास्त्र, हिप्नोटिजम, मेस्मेरिजम, करतब के खेल (जादू, सर्कस आदि), भूत-प्रेत सम्बन्धी ज्ञान, विष चिकित्सा, एन्टी बायोटिक्स, इलेक्ट्रोनिक्स।
केतु: – गुप्त विद्याएं, मंत्र-तंत्र सम्बन्धी ज्ञान।
वैज्ञानिक और औद्योगिक प्रगति के कारण व्यवसायों एवं शैक्षणिक विषयों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जा रही हैं। अतः ज्योतिष सिद्धान्तों के आधार पर ग्रहों के पारस्परिक सम्बन्धों को ध्यान में रखते हुए विचार किया जा सकता हैं।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>EVENT INFORMATION../ कार्यक्रम की सूचना….

>EVENT INFORMATION../ कार्यक्रम की सूचना……..
प्रिय मित्रो……. आप सभी का स्वागत हे…इस ग्रुप में आप सभी ..आपके आसपास../ आपके ख्सेत्र ../ जानकारी में होने वाली….धार्मिक गतिविधि…जेसे..राम कथा../ शिव पुराण../ भगवत कथा… / भजन संध्या…खाटू श्याम जी का जागरण…/ रानी सती..का जागरण../..शनि जी ../ गणेश जी के बारे में../..आदि के कार्यक्रमों की पूर्व जानकारी देने के साथ साथ ….आप ज्योतिषीय जानकारी…जेसे..ज्योतिष सम्मलेन../ संगोष्ठी…./ किसी विषय विशेष पर अपने विचार../ लेख भी भिजवा सकते हे…. किसी पूजा विशेष की जानकारी भी दे सकते हे ..पूर्व में..जेसे…कालसर्प पूजा…कोई यज्ञ …अनुष्ठान …आदि की…आप भी आपने सुझाव दीजियेगा…!!!!!!—-
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>हमारे ग्रंथ पुराणों आदि में वास्तु एवं ज्योतिष से संबंधित गूढ़ रहस्यों तथा उसके सदुपयोग सम्बंधी ज्ञान का अथाह समुद्र व्याप्त है जिसके सिद्धान्तोंपर चलकर मनुष्य अपने जीवन को सुखी, समृद्ध, शक्तिशाली और निरोगी बना सकता है। प्रभु की भक्ति में लीन रहते हुए उसके बताये मार्ग पर चलकर वास्तुसम्मत निर्माण में रहकर और वास्तुविषयक जरूरी बातों को जीवन में अपनाकर मनुष्य अपने जीवन को सुखी व सम्पन्न बना सकता है। सुखी परिवार अभियान में वास्तु एक स्वतंत्र इकाई के रूप में गठित की गयी है और उस पर गहन अनुसंधान जारी है। असल में वास्तु से वस्तु विशेष की क्या स्थित होनी चाहिए। उसका विवरण प्राप्त होता है। श्रेष्ठ वातावरण और श्रेष्ठ परिणाम के लिए श्रेष्ठ वास्तु के अनुसार जीवनशैली और ग्रह का निर्माण अतिआवश्यक है। इस विद्या में विविधताओं के बावजूद वास्तु सम्यक उस भवन को बना सकते हैं। जिसमें कि कोई व्यक्ति पहले से निवास करता चला आ रहा है। वास्तु ज्ञान वस्तुतः भूमि व दिशाओं का ज्ञान है। यहाँ वास्तुशास्त्र की प्रमुख सैद्धांतिक बातें आपको बता रहे हैं, आप मकान में बिना तोड-फोडकिये ही वास्तु दोषों से छुटकारा पाकर चमत्कारिक रूप से जीवन में सुख-समृद्धि ला सकते हैं। घर का मुख्य द्वार किसी अन्य के मुख्य द्वार के सामने नहीं बनाना चाहिए। घर के आंगन में तुलसी का पौधा लगाना अति शुभ रहता है। तथा घर के आंगन का कुछ भाग मिट्टी वाला होना चाहिए अथवा 12 से 15 गमले पौधे वाले होने चाहिए। ईशान कोण किसी भी घर का मुख स्थान कहा जाता है। इसलिए इस कोण को सदा स्वच्छ एवं पवित्र रखना चाहिए। रसोईघर मुख्यद्वार के ठीक सामने नहीं बनाना चाहिए। पूजाघर, रसोई एवं शौचालय को पास-पास नहीं बनाना चाहिए। विद्युत उपकरणों को आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) में ही रखें। घर में टूटे-फुटे बरतन, टूटा दर्पण, टूटी चारपाई नही रखनी चाहिए, इससे घर में दरिद्रता का वास होता है। रात्रि में झूठे बरतनों को नहीं रखना चाहिए। दर्पण व नल ईशान कोण में रखें। सैप्टिक टैंक वायव्य कोण या आग्नेय कोण में न रखें। किसी भी मकान में दरवाजे व खिडकियाँ ग्राउण्ड लोर में ही अधिक रखने चाहिए, उसके बाद ऊपर के लोरों में कम करते जाना चाहिए। बच्चों के अध्ययन की दिशा उत्तर या पूर्व होती है। यदि बच्चे इन दिशाओं की ओर मुँह करके अध्ययन करते हैं तो स्मृति बनी रहती है। घर में पौंछा लगाते समय उसमें सांभर नमक अथवा सैधा नमक डाल दें इससे कीटाणु पैदा नहीं होते हैं। कभी भी बीम या शहतीर के नीचे न बैठें। इससे शारीरिक पीड़ा (अधिकांश सिर दर्द) होती है। जल निकास सदा उत्तर या पूर्व में रखें। अगर घर में कई घड़ियां हैं और वे ठीक से नहीं चल रही हैं तो उन्हें तुरन्त ठीक करायें, क्योकि घड़ियाँ गृहस्वामी के भाग्य को तेज या मंदा करती हैं।शौचालय सीड़ियों के नीचे नहीं बनाना चाहिए। पति-पत्नी में माधुर्य सम्बंधों के लिए शयन कक्ष के नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में प्रेम-व्यवहार करते पक्षियों का जोडा रखना चाहिए। सोते समय सिरहाना पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर रखें। उत्तर या पश्चिम में रहने से रोग उत्पन्न होते हैं। पूर्व की ओर सिर करके सोने से विद्या, दक्षिण की ओर रखने से धन व आयु की बढ़ोतरी होती है। उत्तर की ओर सिर करके सोने से आयु की हाँनि होती है। विद्यार्थियों को सदैव पूर्व की ओर सिर करके ही सोना चाहिए। घर अन्य सदस्यों को दक्षिण की ओर सिर करके सोना चाहिए। अन्नभंडार, गौशाला, रसोईघर, गुरूस्थल व पूजागृह जहाँ हो उसके ऊपर शयनकक्ष न बनायें। यदि वहाँ शयनकक्ष होगा तो धन-सम्पदा का नाश हो जायेगा।सवेरे पूर्व दिशा में व रात्रि के समय पश्चिम दिशा में मलमूत्र विसर्जन करने से आधा सीसी (सर दर्द ) का रोग होता है।घर में बड़ी मूर्ति नहीं रखनी चाहिए। मूर्ति की अधिकतम लम्बाई गृहस्वामी के बारह अंगुल ही होनी चाहिए। घर में पूजास्थल में किसी देवता की एक से अधिक मूर्ति नहीं रखनी चाहिए। पूर्व की ओर मुँह करके भोजन करने से आयु, दक्षिण की ओर मुँह करके भोजन करने से प्रेम, पश्चिम की ओर मुँह करके भोजन करने से रोग एवं उत्तर की ओर मुँह करके भोजन करने से धन व आयु की प्राप्ति होती है। घर में सात्विक प्रवृति के पक्षियों के जोड़े वाला चित्र रखें। इससे परिवार में वातावरण माधुर्यपूर्ण रहेगा। घर के मुख्यद्वार पर नींबू या संतरे क पौधा लगाने से घर में सम्पदा की वृद्धि होती है। घर के अग्नेय कोण ( दक्षिण-पूर्व ) में धातु का कटोरा रखें और उसमें जो मार्ग में पडेहुए सिक्के मिलें उन्हें डालते रहना चाहिए, ऐसाकरने से घर में आकस्मिक रूप से धनागमनहोने लगता है।घर के मुख्य द्वार पर बाहर की ओरपौधे लगायें।घर के ड्राईंगरूम में परिवार के सभीसदस्यों का हंसमुख चित्र लगाने से परिजनों में माधुर्यभाव बना रहता है। घर में पौछा व झाडू खुले स्थान में ही रखें। खासकर भोजनकक्ष में कभी नहीं रखना चाहिए, इससे अन्न व धन की हानि होती है। रात को झाडू को बिस्तर के नीचे नहीं रखना चाहिए, ऐसा करना बीमारी को निमंत्रण देने जैसा है। शौच से निवृत होने के बाद शौचालय का द्वार बन्द कर दें। यह नकारत्मक ऊर्जा का प्रतीक है। घर के ड्राईंगरूम में परिवार के सदस्यों का सामूहिक हसमुख चित्र लगायें तथा दिन मेंएक समय परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ भोजन करना चाहिए। इससे परस्पर संबंधों में प्रगाढ़ता आती है।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>कविता संग्रह —

>####बेटा-बेटी#####
बेटा वारिस हे….
बेटी परस हे…
बेटा वंश हे..
बेटी अंश हे….
बेटा आन हे..
बेटी शान हे….
बेटा तन हे……
बेटी मन हे…..
बेटा मान हे…..
बेटी गुमान हे…..
बेटा संस्कार हे…..
बेटी संस्कृति हे….
बेटा आग हे…
बेटी बाग़ हे….
बेटा दावा हे…
बेटी दुआ हे..
बेटा भाग्य हे….
बेटी विधाता हे…
बेटा शब्द हे…
बेटी अर्थ हे….
बेटा गीत हे…
बेटी संगीत हे….
बेटा प्रेम हे….
बेटी पूजा हे…….
#### दयानंद ” bandhu”###
==================================================
Zindagi ki taraf mera nazariya ye hai ki….
#####Zindagi#####
….Zindagi ek kitaab hai….
Isme khushiyan aur gumm behishab hai….
Zindagi me hamesh khush rehna…..
Ye har kisi ka khwab hai…..
Kya hansil hogi har khushi? Ye sirf ek raaz hai….
Hum hai raahi aur ye apna mukaam hai…..
Koi nahi jaanta yaha kya aagaaz kya anjaam hai….
Zindagi ek safar hai jo ghumti har dagar hai…..
Kisi ko nahi khabar ki kaun kiska humsafar hai…..
Koi kehta hai zindagi se naraaz hoke ke….
Ye zindagi bhi koi zundagi hai……
To zindagi kahe muskura ke….
Ha yehi to zindagi hai…..
==================================================
#### माँ #####
जिसे
कोई उपमा न दी जा सके उस का नाम है -माँ
जिस की कोई सीमा नही है उस का नाम है—- माँ
ऐसी तीन माँ है,परमात्मा;महात्मा,और——– माँ
हे प्राणी प्रभु को पाने की पहली सीढ़ी है——- माँ
पूरण शब्द है, ग्रन्थ है,महाविदाल्या है——— माँ
यह मंत्र बीज है हर सर्जनता का आधार है—– माँ
यन्त्र मंत्र व तंत्र की सफलता की नीव है——- माँ
माँ का आँचल प्रेम का पनघट है
माँ की आखें राहों की रौशनी है
माँ की बातो में जीवन की गीता है
माँ के चरणों में संसार का स्वर्ग है
माँ ,माँ ह
दो जिस्म,
मगर एक जाँ होती है,
माँ ,माँ होती है !
जहाँ सब कुछ देकर
भी हाँ होती है
माँ ,माँ होती है !
जी ..

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>चाल से जानिए–चाल-चलन:::-

>चाल से जानिए–चाल-चलन:::—
प्राचीन शास्त्रों में भी व्यक्ति के ‘चाल-चलन’ पर कई रोचक टिप्पणियाँ की गई हैं। इस‍ीलिए हमारे बुजुर्ग अपनी पारखी नजरों से किसी भी अनजान व्यक्ति को देखकर उसका चाल-चलन भाँप लेते हैं। आधुनिक मनोवैज्ञानिकों में भी ‘चाल’ शोध का रुचिकर क्षेत्र बनता जा रहा है। कारण आपकी चाल, आपकी मन:स्थिति के बारे में अनजाने में ही दूसरों को बहुत कुछ कह देती है।
वैसे आवश्यक नहीं है कि हर बात बोलकर या शब्दों में ही अभिव्यक्त की जाए और यह भी जरूरी नहीं है कि किसी के मूड के बारे में हम उससे बात करके ही जानें। व्यक्ति की भाव-भंगिमा, चेहरे की आकृति द्वारा ही हम काफी कुछ अंदाज लगा सकते हैं। आप भी अगर किसी से कुछ बोले बिना उसके दिल का हाल जानना चाहते हैं तो आइए हम आपको अवगत कराते हैं : –
* अगर कोई व्यक्ति आराम से प्रसन्नचित्त बाँहें झुलाते हुए अपने आसपास चौकन्नी नजरें घुमाते हुए चुस्ती से कदम नापते हुए चल रहा हो तो समझ लीजिए कि वह आत्मविश्वास से परिपूर्ण सामान्य मन:स्थिति में है।
* झुके हुए कंधे, झुका हुआ सिर, डगमग चाल बताती है कि व्यक्ति परेशान है, किसी समस्या में उलझा, भीतरी उधेड़बुन से जूझता हुआ व असमंजस में है। इस तरह की चाल व्यक्ति की अवसादग्रस्त और अनिश्चयात्मक मन:स्थिति की सूचक है।
* दोनों हाथ कोट-पतलून अथवा जीन्स की जेबों में डाले कुछ सिर झुकाए मंद-मंद गति या कछुए की चाल से अपने आपमें खोया हुआ कोई व्यक्ति चल रहा हो तो समझें कि फिलहाल वह अकेला रहना चाहता है। वह आत्मचिंतन में लीन है और उस वक्त किसी तरह का व्यवधान नहीं चाहता।
* दृढ़ मुद्रा, स्थिर कंधे और तेज चाल से पता चलता है कि व्यक्ति तनावग्रस्त है। साथ ही वह जिद्दी तथा अपने लक्ष्य से आसानी से डिगने वाला नहीं है जिस वजह से तनाव हुआ है उस पर वह अपनी बात से हटने को तैयार नहीं। वह अपनी जगह सख्ती से खड़ा होना चाहता है।
* हिरनी- सी बलखाती, मटकती, सजगता भरी चाल बताती है कि आप अपने सौंदर्य को दिल से महसूस करते हैं और साथ ही अन्य लोगों का ध्यान आकृष्ट करने को लालायित हैं।
* हर कदम सहमा, चौकन्ना हो, कभी खुद की चाल पर नजर हो और कभी अपने लिबास पर, बार-बार आसपास के लोगों को देखते बाल ठीक करते नाप-तौल कर कदम रखते सधी-सँवरी सावधान चाल कोई चले तो इसका अर्थ है कि वह अपनी छवि के प्रति बेहद सतर्क है।
* चप्पलों से घिसने की आवाज करते हुए चलने वाले की चाल कहती है कि व्यक्ति अपनी जिंदगी या नौकरी को बोझ समझता है। जीवन में नीरसता को महसूस करता है और उसे लगता है कि दुनिया में उसके लिए कोई आकर्षण नहीं। वह हीनता के बोझ तले दबता रहता है।
ये तो बात हुई चाल से मन:स्थिति पहचानने की, किंतु शरीर के सही नाप-तौल व सुंदर नयन-नक्श के बावजूद बेढंगी चाल से पूरी सुंदरता नष्ट हो जाती है। सिर को हमेशा झुकाकर चलने से ठोड़ी दोहरी हो जाती है। कूबड़ निकली-सी लगती है। इसलिए अच्छी चाल बनाने के लिए सिर पर मटकी रखकर चलने से आवश्यक सुधार होता है। सिर उठाकर तथा ठोड़ी जमीन से समानांतर रखकर चलें।चलते समय कंधों को आराम से रखें, लेकिन झुकाए नहीं। पेट की मांसपेशियों को तानें और भीतर की ओर खींचें। घुटनों को आराम की स्थिति में रखें और लचीला बनाएँ। चलते समय ऐसा महसूस करें कि मानों आप ऊँचे हैं।
उठना, बैठना, बोलना जैसे मानव- व्यवहार हमेशा से ही कवि, शायर, गीतकारों के लिए मनपसंद विषय रहे हैं और इन पर आधारित कई दिलकश रचनाएँ भी रची गई हैं। गीतकारों ने तो ‘चाल’ जैसे उपेक्षित विषय को भी अपने गीतों के माध्यम से बेहद आकर्षक बनाया है।
—–कान में झुमका, चाल में ठुमका……………….
——तौबा ये मतवाली चाल, झुक जाए फूलों की डाल……

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>सप्तम भाव और ग्रहों का फल:::–

>सप्तम भाव और ग्रहों का फल:::—
###सप्तम भाव विवाह और गृहस्थी के सुख की दृष्टि से बड़ा ही महत्वपूर्ण भाव है। जितना महत्व इसमें उपस्थित राशि और इसमें बैठे ग्रह का है, उतना ही महत्व इस पर दृष्टि रखने वाले ग्रहों के प्रभाव का भी होता है।
##सप्तम भाव पर सूर्य की दृष्टि शुभ नहीं मानी जाती। विवाह में स्वाभाविक देरी होती ही है। जातक के वैवाहिक जीवन में हमेशा खटपट बनी रहती है। जातक और उसके पत्नी या पति के स्तर में अंतर होने से भी ये मतभेद हो सकते हैं। क्योंकि सप्तम का सूर्य होने पर जीवन साथी अपने से अच्छे स्तर वाला मिलता है और प्रभावशाली भी होता है। सप्तम का सूर्य प्रायः धनाभाव भी देता है अतः कर्ज आदि लेने की समस्या हमेशा बनी रहती है। इस कारण से भी विवाह के बाद दोनों में मतभेद बना रहता है।
##सप्तम सूर्य होने पर नौकरी का ही प्रयास करें। व्यापार करने पर घाटे की आशंका बनी ही रहती है। सप्तम का सूर्य यदि शुभ प्रभाव में हो तो जातक को पक्की नौकरी जरूर दिलवाता है।
##सप्तम पर चन्द्र की दृष्टि हो तो जीवन साथी बड़ा आकर्षक होता है। नरम दिल वाला, भावुक और सौम्यता से बातचीत करने वाला होता है। ऐसे जातकों को जीवन साथी से पूर्ण सहयोग मिलता है। यदि स्त्री जातक की कुंडली में सप्तम चन्द्र हो (दोष रहित) तो पति घर के कामों में भी पूरा सहयोग कराता है। इन जातकों को स्वतन्त्र व्यवसाय में रूचि लेनी चाहिए। ये धन को संग्रह करने में रूचि रखते है और कभी-कभी कंजूस भी कहे जा सकते हैं।
##सप्तम भाव पर यदि मंगल की नजर हो तो ये शुभ नहीं होती। मकर या स्वराशि के मंगल के फल अधिक तीव्र मिलते हैं। लग्न के मंगल की दृष्टि पति या पत्नी को अभिमानी बनती है और विवाह सुख में कमी कराती है। दोनों ही गुस्से के तेज होते हैं अतः मतभेद बने ही रहते हैं। चतुर्थ भाव के मंगल की दृष्टि भी अशुभ फल देती है। साथी को उदर रोग होते है।
##बारहवें भाव के मंगल की दृष्टि शैय्या सुख में कमी लाती है। दूसरे विवाह का भी योग बनता है। कुल मिलाकर मंगल की इन स्थितियों में कुण्डली मांगलिक ही कही जाती है अतः विवाह करते समय इस मंगल को मिला कर ही विवाह करना अच्छा रहता है अन्यथा विवाह सुख नहीं मिलना तय होता है। मंगल की दृष्टि पत्नी की कुण्डली में हो तो पति को नशे व मांसाहार की शौकीन भी बनाती है।

>############कालसर्प योग : कितना सच, कितना झूठ #######

आजकल कालसर्प योग की शांति के नाम पर जनता को मूर्ख बनाया जा रहा है। कालसर्प योग नाम किसी भी ग्रन्थों में लिखित में नहीं है यह तो सिर्फ राहु-केतु मध्य ग्रह के आने से कालसर्प योग नाम दिया गया है।

##राहु-केतु की संज्ञा हमने दी है शास्त्रों में सात ग्रहों को ही माना गया है। यह जिस राशि में हो उस राशि ग्रह के अनुसार ही इसका फल कथन है। अगर इसे वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो राहु उत्तरी ध्रुव को माना जाता है व केतु दक्षिणी ध्रुव को। राहु मध्य केतु कालसर्प योग इतना प्रभावी ही होता जितना केतु मध्य राहु सारे ग्रहों का आना परेशानियों का कारण बनता है।जन्मकुंडली में कालसर्प योग जिसे भी रहता है वह व्यक्ति आर्थिक, शारीरिक और मानसिक रूप से पीड़ित रहता है। यह सभी जानते हैं कि कालसर्प योग या दोष का कारण राहु और केतु होते हैं। कालसर्प योग ग्रहों की उस स्थिति को कहते हैं जब जन्म कुंडली में सारे ग्रह, राहु और केतु के मध्य फँस जाते हैं।

माना जाता है कि पूर्ण कालसर्प योग में सभी ग्रह एक अर्धवृत्त के अंदर होने चाहिए अगर कोई ग्रह एक डिग्री भी बाहर है तो यह योग नहीं बनेगा। जहाँ अन्य ग्रह घड़ी की विपरीत दिशा में चलते हैं वहीं राहु-केतु घड़ी की दिशा में भ्रमण करते हैं। दोनों ग्रहों के बीच 180 डिग्री की दूरी बनी रहती है। राहु-केतु दो सम्पात बिन्दू हैं जो इस दीर्घवृत्त को दो भागों में बाँटते हैं। इन दो बिन्दुओं के बीच ग्रहों की उपस्थिति होने से कालसर्प योग बनता है।

ज्योतिषाचार्य मानते हैं कि कालसर्प योग व्यक्ति को आसमान पर पहुँचाकर पुन: जमीन पर गिराने की ताकत रखता है। बहुत से लोग कालसर्प योग से डरे हुए हैं, लेकिन जंगल के खतरनाक जानवरों के बारे में जो जानते हैं वे निश्चित ही बच निकलने का रास्ता भी ढूँढ ही लेते हैं।

##छाया ग्रह : धरती पर हम धूप में खड़े हैं तो हमारी छाया भी बन रही है। इसी तरह प्रत्येक ग्रह और नक्षत्रों की छाया भी इस धरती पर पड़ती रहती है। हमारी छाया तो बहुत छोटी होती है लेकिन इन महाकाय छाया का धरती पर असर गहरा होता है।

जैसे पीपल या बरगद के वृक्ष की छाया हमें शीतलता प्रदान करती है और नीम की छाया रोग का निदान करती है तथा बबूल की छाया में सोने से स्किन प्रॉब्लम हो सकती है उसी तरह राहु और केतु यह दो तरह की विशालकाय छायाएँ हैं। किसी का इन पर बुरा प्रभाव पड़ता है तो किसी पर अच्‍छा। लेकिन इस तर्क के अलावा कुछ शास्त्रीय तर्क भी दिए जाते हैं।

##कालसर्प योग का कारण :
शास्त्रों अनुसार पितृ दोष या प्रारब्ध के कारण कुंडली में कालसर्प योग बनता है। माना जाता है कि किसी व्यक्ति ने अपने पूर्वजन्म में किसी साँप या जीव को मारा या सताया हो, तो इस जन्म में उसकी कुंडली में यह योग रहता है। पूर्वजन्मों में किए गए पाप इस जन्म में व्याधियों के रूप में प्रकट होते हैं।अधिकतम कुण्डलियों में केतु मध्य राहु के ग्रहों का होना ही परेशानियों का कारण बनता है। उनको अनेक बार बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

###कालसर्प योग का प्रभाव :
नकारात्मक प्रभाव- काला जादू, तंत्र, टोना, निशाचरी-राक्षसी कर्म आदि में लिप्त रहने वाला व्यक्ति राहु के फेर में रहता है। अचानक घटनाओं के घटने के योग राहु के कारण ही होते हैं। राहु हमारे उस ज्ञान का कारक है, जो बुद्धि के बावजूद पैदा होता है, जैसे अचानक कोई घटना देखकर कोई आयडिया आ जाना या अचानक उत्तेजित हो जाता। स्वप्न का कारक भी राहु है। भयभीत करने वाले स्वप्न आना या चमककर उठ जाना कालसर्प योग के लक्षण है। सपने में साँप, पानी, समुद्र, तालाब, आत्मा आदि देखना भी कालसर्प योग के लक्षण है।बनते कार्य का न बनना, नौकरी में बाधा, राजनीति में हो तो रूकावटों का सामना करना पड़ता है। व्यापार में हो तो रूकावटे, विवाह में परेशानी, शिक्षा के क्षेत्र में बाधा, प्रमोशन में अवरोध जैसी अनेक समस्याओं का कारण करना पड़ता है।
यदि अचानक शरीर अकड़ने लगे या दिमाग अनावश्यक तनाव से घिर जाए और चारों तरफ अशांति ही नजर आने लगे, घबराहट जैसा होने लगे तो इन सभी का कारण भी राहु है। वैराग्य भाव या मानसिक विक्षिप्तता भी राहु के कारण ही जन्म लेते हैं। बेकार के दुश्मन पैदा होना, बेईमान या धोखेबाज बन जाना, मद्यपान करना, अति संभोग करना या सिर में चोट लग जाना यह सभी राहु के अशुभ होने की निशानी है।

##लाल किताब अनुसार अब केतु का प्रभाव जानें- संसार में दो तरह के केतु होते हैं। पहला कुछ रिश्तेदार और दूसरा कुछ जीव। रिश्तेदारों में पहला लेने वाले और दूसरा देने वाले। लेने वालों में दामाद और भाँजा तथा देने वालों में मामा और साला। दूसरे तरह के केतु जानवरों में होते हैं पहला कुत्ता जो घर की रखवाली करता है और दूसरा चूहा जो घर को कुतर कर खोखला कर देता है।

केतु रात की ‍नींद हराम कर देता है। धन, समृद्धि और शांति को धीरे-धीरे कुतर देता है।। पेशाब की बीमारी, जोड़ों का दर्द, सन्तान उत्पति में रूकावट और गृह कलह का कारण भी केतु है। बच्चों से संबंधित परेशानी, बुरी हवा या अचानक धोखा होने का खतरा भी केतु के अशुम होने के कारण बना रहता है।

सकारात्मक प्रभाव- राहु अच्छा है तो व्यक्ति दौलतमंद होगा। कल्पना शक्ति तेज होगी। राहु के अच्छा होने से व्यक्ति में श्रेष्ठ साहित्यकार, दार्शनिक, वैज्ञानिक या फिर रहस्यमय विद्याओं के गुणों का विकास होता है। इसका दूसरा पक्ष यह कि इसके अच्छा होने से राजयोग भी फलित हो सकता है। आमतौर पर पुलिस या प्रशासन में इसके लोग ज्यादा होते हैं।

केतु का शुभ होना अर्थात् पद, प्रतिष्ठा और संतानों का सुख। यह मकान, दुकान या वाहन पर ध्वज के समान है। शुभ केतु से व्यक्ति का रूतबा कायम रहकर बढ़ता जाता है।
###बस इसी बात का कई लोग फायदा उठाकर हर जगह इसकी शांति के उपाय करते या करवाते हैं। जब कभी रवि पुष्य-नक्षत्र आए उस दिन सुबह नौ बजे से ग्यारह बजे के मध्य सोना आठ रत्ती, चाँदी बारह रत्ती, ताँबा सोलह रत्ती लेकर तारों से बनी गुँथी हुई अनामिका के नाप की अगूँठी बनवाकर नौ से ग्यारह के बीच शुद्ध कर धारण करें। इसके पहनने से आप खुद लाभ अनुभव करेंगे। बनी बनाई अगूँठी ना लें, स्वयं ही अपने सामने उपरोक्त नक्षत्र व समय में बनवाएँ तभी लाभ होगा अन्यथा नहीं।

####कालसर्प के उपाय : ——
राहु का उपाय- राहु ससुराल पक्ष का कारक है, ससुराल से बिगाड़कर नहीं चलना चाहिए। सिर पर चोटी रखना। भोजन कक्ष में ही भोजन करना राहु का उपाय है। घर में ठोस चाँदी का हाथी रख सकते हैं। सरस्वती की आराधना करें। गुरु का उपाय करें।

केतु का उपाय- संतानें केतु हैं। इसलिए संतानों से संबंध अच्छे रखें। भगवान गणेश की आराधना करें। दोरंगी कुत्ते को रोटी खिलाएँ। कान छिदवाएँ।

महत्वपूर्ण उपाय- श्राद्ध पक्ष में पितरों की तृप्ति के लिए कार्य करें। पितृ दोष के निदान के लिए त्र्यंबकेश्वर में इसकी शांति कराई जाती है। शास्त्र अनुसार महामृत्युंजय मंत्र, गायत्री मंत्र, राहु बीज मंत्र या ओम नम: शिवाय का जाप करते रहने से भी इस योग के अनिष्टकारी प्रभाव से बचा जा सकता है। नागबलि एवं नारायण बलि कर्म कराएँ।

माथे पर चंदन का तिलक लगाएँ। कम से कम पाँच किलो अनाज को, पाँच किलो की किसी भारी वस्तु से दबाकर कम से कम 43 दिन रखें फिर उक्त अनाज को मंदिर में दान कर सकते हैं। 11 नारियल बहते पानी में बहाएँ। रसोई की पहली रोटी काले-सफेद कुत्ते, गाय और कौवों को रोटी खिलाकर ही भोजन ग्रहण करें। कान छिदवाएँ। प्रतिदिन माता, पिता तथा गुरुजनों के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करें। किसी भी प्रकार के व्यसन से दूर रहें। पीपल में जल चढ़ाते रहें। घर में समय-समय पर गुड़-घी की धूप देते रहें।

नोट : उपरोक्त उपाय किसी लाल किताब के विशेषज्ञ की सलाह अनुसार ही करें।

>अंक ज्योतिष के अनुसार जानिए कौन-सा रत्न है आपके लिए शुभ :::::—–
अंक ज्योतिष के अनुसार आपके लिए शुभ रत्न इस प्रकार है-

1, 10, 19, 28 का मूलांक 1 का स्वामी सूर्य है- माणिक्य रत्न शुभ रहेगा।

2, 11, 20, 29 का मूलांक- 2, स्वामी चंद्रमा- रत्न मोती

3, 12, 21, 30 मूलांक- 3, स्वामी गुरू, रत्न पुखराज

4, 13, 22, 31 मूलांक 4, स्वामी राहु, रत्न गोमेद

5, 14, 23 मूलांक 5, स्वामी बुध, रत्न पन्ना।

6, 15, 24 मूलांक 6, स्वामी शुक्र, रत्न हीरा।

7, 16, 25 मूलांक 7, स्वामी केतु, रत्न लहसुनिया।

8, 17, 26 मूलांक 8, स्वामी- शनि, रत्न नीलम।

9, 18, 27 मूलांक 9, स्वामी मंगल, रत्न मूंगा।

>दसवाँ घर और आपका करियर – (दशम स्थान में बारह राशियों का फल)::—

किसी भी जातक की कुंडली में चार केंद्र स्थान प्रथम, चतुर्थ, सप्तम व दशम भाव होता है। दशम भाव कर्म भाव भी कहलाता है। अतः जातक के जीवन में इसका विशेष प्रभाव होता है। कुंडली में दशम घर से कर्म, आत्मविश्वास, आजीविका, करियर, राज्य प्राप्ति, कीर्ति, व्यापार, पिता का सुख, गोद लिए पुत्र का विचार, विदेश यात्रा आदि का विचार किया जाता है। कहा जा सकता है कि दशम भाव किसी के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।परंतु आजीविका की अच्छी स्थिति जानने के लिए मुख्यतः चंद्रमा, गुरु-सूर्य व शनि की स्थिति का अवलोकन भी करना चाहिए। यदि दशम भाव व भाग्य भाव मजबूत है तो निश्चित रूप से अच्छा करियर होता है। साथ ही आपका भविष्य सुनहरा होता है।

मेषः यदि दसवें स्थान में मेष राशि हो तो जातक घूमने-फिरने का शौकीन, दौड़ने का शौक रखने वाला, चाल कुछ टेढ़ी हुआ करती है। यदि विवाह योग कुंडली में न हो तो भी वह सुख भोगता है। नम्रता से हीन, चुगलखोर, क्रोधी होता है और शीघ्र ही लोगों का अप्रिय बन जाता है। ऐसा जातक कई कार्यों को एक साथ शुरू कर देता है। यदि कुंडली में मंगल शुभ हो तो निश्चित ही करियर बहुत अच्छा, धन, पद व अधिकार प्राप्ति होती है। माता-पिता, गुरुजनों, मित्रों व पत्नी से सत्य व सौम्य व आदर का व्यवहार करना चाहिए।
वृषभ: कुंडली में दशम घर में वृषभ राशि होने से जातक पिता का प्यार पाने वाला, वाली, स्नेही, विनम्र, धनी, व्यापार में कुशल, बड़े लोगों से मित्रता करने वाला, आत्मविश्वासी और राजपुरुषों से कार्य लेने वाला होता है। यदि शुक्र शुभ अंशों में बलवान हो तो जातक अच्छा व्यापारी व मैनेजर बन सकता है।
मिथुनः ऐसा जातक कर्म को ही प्रधान मानता है। समाज का हितैषी, मन्दिर निर्माण करने वाला, दुर्गा जी का भक्त, देवी दर्शन करने वाला, भगवान को मानने वाला, व्यापार या कृषि कर्म से आजीविका चलाने वाला, बैंक, बीमा कपंनी, कोषाध्यक्ष, अध्यापक की नौकरी करने वाला होता है।
कर्कः यदि कुंडली के दसवें घर में कर्क राशि हो तो जातक कई सगुणों से युक्त, यदि चतुर्थ चन्द्रमा हो तो राजनीति में रूचि रखने वाला व राज्य सत्ता प्राप्त करके समाज की भलाई करने वाला, पापों से डरने वाला, स्नेहवान, अन्याय के विरुद्ध लड़ने वाला होता है। वह आत्मविश्वासी भी होता है।
सिंहः ऐसा जातक अहंकार से घिरा होता है। यदि अहंकार को त्याग दे तो जीवन को जगमगा सकते हैं। संर्कीण विचारधारा के कारण कभी-कभी अपयश के पात्र होते हैं। यदि गुरु, शनि, सूर्य, मगंल, चंद्रमा अति शुभ हो तो जातक पद, प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। पिता धनी होता है, बहुत बड़े उद्योग स्थापित करता है।
कन्याः वाकपटुता के कारण लोकप्रिय प्रोफेसर, दुखी व्यक्तियों की सहायता करने वाला, अपने प्राणों को संकट में डालकर दूसरों की रक्षा में तत्पर, स्वाभिमानी होता है। बुध बलवान होने से राज्य में सम्मान होता है। यदि गुरु भी शुभ हो तो जातक अच्छा पद, प्रतिष्ठा प्राप्त जरूर प्राप्त करता है।
तुलाः दशम भाव में तुला राशि हो तो जातक मानव-भाग की भलाई में लगा रहता है। धर्म प्रचारक, धर्म के गूढ़ मर्म को समझने वाला आदर्श व्यक्ति होता है। नौकरी की बजाय व्यापार हितकारी व पसंदीदा होता है। युवावस्था में ही ऐसा जातक अपनी कार्यक्षमता कौशल के बल पर पूर्णतया स्थापित हो जाता है।
वृश्चिकः सौम्य व्यवहार व बुद्धि कौशल के बल पर परिस्थितियों को अनुकूल बनाना इन्हें अच्छी तरह आता है। धार्मिक व सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। यदि मंगल बलवान हो या लग्नेश शनि स्वयं दसवे घर में हो तो जातक धनी होता है। खेलकूद, राजनीति, पुलिस अधिकारी होता है। इसकी सूर्य, गुरु की स्थिति भी अच्छी रहती है।
धनुः यदि बृहस्पति उच्च का हो या नवांश, दशमांश कुण्डली में शुभ हो तो जातक धनी भी हो सकता है। पिता की सेवा करने वाला, सुंदर वस्तुओं को एकत्र करने वाला, उपकारी होता है। व्यापार में विशेष उन्नति प्राप्त करता है।
मकरः कर्म हो ही धर्म समझने वाला, स्वार्थी, मानसिक शक्ति वाला, समयानुकूल कार्य करने वाला, दया से हीन होता है। जीवन के मध्यकाल में सुखी होता है। ऐसा जातक खोजी, आविष्कारक होता है और अपनी खोज से लोगों को आश्चर्यचकित कर देता है। इसका काम हटकर होता है।
कुंभः यदि दसवे घर में कुंभ राशि हो तो जातक कूटनीतिज्ञ, राजनीतिज्ञ विरोधियों से भी काम निकालने वाला, आस्तिक होता है। आर्थिक स्थिति अच्छी होती है। शनि की स्थिति अच्छी होने पर खूब धन, पद प्रतिष्ठा मिलती है। पिता से संबंध अच्छे नहीं रहते। नौकरी करते हैं यदि कुण्डली में शुभ योग हो तो शानदार प्रगति करते हैं।
मीनः मीन राशि दशम में होने से जातक गुरु आशा पालन करने वाला, गौ, ब्राह्मण व देव उपासक होता है। जल से संबंधित कार्यों से जीविका चलाने वाला, सम्मानित होता है। यदि गुरु बलवान हो तो राज्य पद, धन, आयु का दाता होता है।

>सप्तम भाव पर ग्रहों की दृष्टि- (सप्तम पर सूर्य, मंगल और चन्द्र)
##सप्तम भाव पर ग्रहों की दृष्टि कई मामलों में महत्वपूर्ण ही नहीं होती वरन् कई बार यह भाव फल को ही बदल देती है। पिछले अंक में हमने सप्तम पर सूर्य, मंगल और चन्द्र की दृष्टि की चर्चा की थी। आज हम बात करेंगे सप्तम पर गुरु, बुध और शुक्र की दृष्टि की।
##बुध की सप्तम पर दृष्टि जातक को व्यवहार कुशल, वाक् पटु और विवेकी बनाती है। ऐसे जातक प्रायः लेखन-प्रकाशन के कार्यों से जुड़े नजर आते है। यदि यह बुध पुरुष राशि में हो तो यह संभावना और प्रबल हो जाती है और जातक इसी को अपनी जीविका बनाता है।
##बुध की इस भाव पर दृष्टि जातक को भोजन भट्ट यानि अधिक भोजन करने वाला बनाती है और इससे जातक का वजन बढ़ता है। बुध की दृष्टि जीवन साथी का सेन्स ऑफ ह्यूमर अच्छा रखती है। साथी वाचाल होता है, उसे बहुत बोलने की आदत होती है और यदि बुध अशुभ हो तो यह बोलना कटु, व्यंग्य या ताने मारने वाला भी हो सकता है।
##अग्नि तत्व की राशि का बुध, जातक को मिमिक्री करने वाला और विनोदी भी बनाता है। बुध की दृष्टि मन को अस्थिर बना देती है अतः साथी के बारे में भी विचार बदलते नजर आते है। विवाह में बहुत नाप-तौल करने की आदत हो जाती है।
##लग्न में रहकर यदि गुरु सप्तम को देखे तो जातक सुन्दर, बुद्धिमान और विवेकी होता है। उसकी आयु पूर्ण होती है और वह दूसरों की मदद को तत्पर रहता है। हाँ, इनमें अपने ज्ञान का अहंकार भी रहता है। जीवन साथी सुशिक्षित, अच्छे स्वभाव का और समझदार होता है।
##यदि गुरु तीसरे भाव में रहकर सप्तम को देखता हो तो शिक्षा में कमी को दिखाता है। बड़ी बहन का सुख नहीं मिलता, धन या कीर्ति में से एक ही प्राप्त होता है। जीवन साथी से मतान्तर रहने से खटपट बनी रहती है। यदि गुरु आय (11वें) भाव में हो तो जातक और उसके साथी के लिए ठीक होता है मगर पुत्र सुख में कमी करता है। सिंह का गुरु इस अशुभ फलों में वृद्धि करता है। ये जातक व्यवसाय में हानि ही पाते है।
#शुक्र की सप्तम पर दृष्टि जातक और उसके साथी को आकर्षक बनाती है। भिन्न लिंगी लोगों की तरफ झुकाव ज्यादा रहता है। बोलने में मिठास रहती है। ऐसा शुक्र होने पर जातक शादी के समय खूब नखरे करता है और अंत में साधारण से व्यक्ति से विवाह कर लेता है। विचार अस्थिर होने से धन का अपव्यय भी करता है।
##मंगल का प्रभाव होने पर अति भोग-विलास और नशे आदि का शौक हो जाता है जिससे स्वास्थ्य बिगड़ने की पूरी आशंका रहती है। ऐसे लोगों को चरित्र का विशेष ध्यान रखना चाहिए और गुरु की शरण में रहना चाहिए।

>सप्तम पर ग्रहों की दृष्टि-(शनि, राहु-केतु का दृष्टि फल)::–

##शनि यदि पंचम में रहकर सप्तम को देखता हो तो जातक विवेकी, गंभीर और शांत होता है। इनकी अध्यात्म, रिसर्च और तंत्र-मंत्र में रूचि रहती है। यह शनि भाइयों के लिए शुभ नहीं है, जीवनसाथी से भी मतभेद बनाए रखता है। साथी या तो कम पढ़ा-लिखा या कम स्तर का होता है।
##यदि शनि से बुध का अशुभ योग हो रहा हो तो जातक काम में बेईमानी करता है। यदि शनि दशम से सप्तम को देखता हो तो जातक को अधिकारी पद दिलवाता ही है। हालाँकि खूब मेहनत और संघर्ष देता है, मगर अंत में सफलता छप्पर फाड़कर मिलती है (यदि बाकी योग मजबूत हो तो)। ऐसे जातकों का भाग्योदय जन्मभूमि से दूर या विदेश में होता है। साथी समझदार होता है और तालमेल बना रहता है। यह शनि विवाह में देर करा सकता है। शनि की अशुभता बहुत अशुभ फल देती है।
##यदि शनि लग्न से सप्तम को देखता हो तो भाग्योदय होता ही है। साधारण से घर में जन्म होता है, विवाह के बाद एकदम दिन फिर जाते है। विशेष कर यदि तुला लग्न में शनि हो तो ऐसा होता ही है। साथी का रंग दबा हुआ होता है, दिखने में साधारण ही होता है मगर जातक को भरपूर सुख-साधन देता है। नीच का शनि कई समस्याओं को देता है। हर काम में विघ्न आते है। विवाह भी सफल नहीं हो पाता।
##सप्तम पर लग्न के राहु की दृष्टि साथी के जीवन को धोखा होना बताती है। ऐसे जातक व्यर्थ घमंड करते हैं और यदि अधिकारी बन जाए तो सभी को दुखी करके छोड़ते हैं। येनकेन प्रकारेण अपना काम बनवा लेते है। साथी की और ध्यान नहीं देते। अतः विवाह सफल नहीं होता। अक्सर दूसरा विवाह या अन्य संबंध भी होते देखा गया है।
##तीसरे भाव के राहु की दृष्टि जातक को पराक्रमी बनाती है, शत्रु उसके सामने टिक नहीं पाते। ये जातक साथी को काबू में रखते है मगर उनका ध्यान भी रखते है। आय भाव के राहु की दृष्टि व्यक्ति को रिश्वत लेने को उकसाती है। वह रिस्क लेने का शौकीन होता है और इससे धन का नुकसान करता है और साथी को भी दुःख देता है। कन्या संतान अधिक होती है। अन्धविश्वासी भी होते है।
##केतु की दृष्टि जातक को विचित्र स्वभाव का बनाती है। उसे वात विकार भी रहते है। वृश्चिक या धनु का केतु शुभ होता है और धन, स्त्री, संतान सभी सुख देता है। साथी से प्रेम रहता है। अशुभ या नीच का केतु चोट, नुकसान या मतभेद का कारण बनता है।

>निरोगी, धनवान और यश प्रदान करने वाला कल्याणकारी सूर्य स्तोत्र ::::—-

विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः।

लोक प्रकाशकः श्री माँल्लोक चक्षुर्मुहेश्वरः॥

लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा।

तपनस्तापनश्चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः॥

गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः।

एकविंशतिरित्येष स्तव इष्टः सदा रवेः॥…………………………….

‘विकर्तन, विवस्वान, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, श्रीमान, लोकचक्षु, महेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोके…श, कर्ता, हर्त्ता, तमिस्राहा, तपन, तापन, शुचि, सप्ताश्ववाहन, गभस्तिहस्त, ब्रह्मा और सर्वदेव नमस्कृत- इस प्रकार इक्कीस नामों का यह स्तोत्र भगवान सूर्य को सदा प्रिय है।’ (ब्रह्म पुराण : 31.31-33)
यह शरीर को निरोग बनाने वाला, धन की वृद्धि करने वाला और यश फैलाने वाला स्तोत्रराज है। इसकी तीनों लोकों में प्रसिद्धि है। जो सूर्य के उदय और अस्तकाल में दोनों संध्याओं के समय इस स्तोत्र के द्वारा भगवान सूर्य की स्तुति करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।

भगवान सूर्य के सान्निध्य में एक बार भी इसका जप करने से मानसिक, वाचिक, शारीरिक तथा कर्मजनित सब पाप नष्ट हो जाते हैं। अतः यत्नपूर्वक संपूर्ण अभिलक्षित फलों को देने वाले भगवान सूर्य का इस स्तोत्र के द्वारा स्तवन करना चाहिए।

>जब कुंडली में हो मंगल दोष–मंगली दोष कैसे करें दूर?
यदि प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्ठम व द्वादश भावों में कहीं भी मंगल हो तो उसे मंगल दोष कहा जाता है लेकिन उन दोषों के बावजूद अगर अन्य ग्रहों की स्थिति, दृष्टि या युति निम्नलिखित प्रकार से हो, तो मंगल दोष खुद ही प्रभावहीन हो जाता है :-
* यदि मंगल ग्रह वाले भाव का स्वामी बली हो, उसी भाव में बैठा हो या दृष्टि रखता हो, साथ ही सप्तमेश या शुक्र अशुभ भावों (6/8/12) में न हो।
* यदि मंगल शुक्र की राशि में स्थित हो तथा सप्तमेश बलवान होकर केंद्र त्रिकोण में हो।
* यदि गुरु या शुक्र बलवान, उच्च के होकर सप्तम में हो तथा मंगल निर्बल या नीच राशिगत हो।
* मेष या वृश्चिक का मंगल चतुर्थ में, कर्क या मकर का मंगल सप्तम में, मीन का मंगल अष्टम में तथा मेष या कर्क का मंगल द्वादश भाव में हो।
* यदि मंगल स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि में स्थित हो।
* यदि वर-कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में मंगल दोष हो तथा कुंडली में उन्हीं पाँच में से किसी भाव में कोई पाप ग्रह स्थित हो। कहा गया है -
“”"शनि भौमोअथवा कश्चित्‌ पापो वा तादृशो भवेत्‌।
“”"”तेष्वेव भवनेष्वेव भौम-दोषः विनाशकृत्‌॥ ………………

इनके अतिरिक्त भी कई योग ऐसे होते हैं, जो मंगली दोष का परिहार करते हैं। अतः मंगल के नाम पर मांगलिक अवसरों को नहीं खोना चाहिए। मंगली कन्या सौभाग्य की सूचिका भी होती है। यदि कन्या की जन्मकुंडली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादशभाव में मंगल होने के बाद भी प्रथम (लग्न, त्रिकोण), चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम तथा दशमभाव में बलवान गुरु की स्थिति कन्या को मंगली होते हुए भी सौभाग्यशालिनी व सुयोग्य पत्नी तथा गुणवान व संतानवान बनाती है।

>मंगल क्रूर नहीं कल्याणकारी है–मंगल को कैसे अनुकूल बनाएँ

कोई भी व्यक्ति चाहे वह लड़की हो या लड़का, सबसे पहले आँखों के माध्यम से फीजिकल ब्यूटी की ओर एट्रैक्ट होता है। उसके बाद म्युचअल अंडरस्टैंडिंग यानी कि वैचारिक समानता और फिर सहन-सहन की समानता। परंतु क्या शादी के बंधन के लिए मात्र सुंदर शरीर और वैचारिक या रहन-सहन की समानता पर्याप्त है। नहीं….। मात्र केवल क्षणिक सौंदर्य का आकर्षण पूरे जीवन को नरक बना सकता है। आजकल बहुत कम लव मैरिज सफल होते देखी गई है।
जिस प्रकार चंद्रमा के कारण ज्वार-भाटा समुद्र में आता है, वनस्पतियों में रस चंद्रमा के कारण ही आता। ठीक उसी प्रकार सौर-मंडल के ग्रह हमें अलग-अलग रूप से प्रभावित करते हैं। अतः सावधानीपूर्वक कुंडली मिलान करके ही विवाह करना चाहिए। कहने को मंगल बड़ा क्रूर ग्रह माना गया है जबकि मंगल क्रूर नहीं, वह तो मंगलकर्ता, दुखहर्ता, ऋणहर्ता व कल्याणकारी है। मंगल दोषपूर्ण होने पर मनुष्य को अलग-अलग तरह के कष्ट होते हैं। मंगल को अनुकूल बनाने के उपाय भी अलग-अलग हैं।

मंगल की अनुकूलता के उपायः::::—-

– कर्ज बढ़ जाने पर ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ स्वयं करे या किसी युवा ब्राह्मण सन्यासी से कराएँ।
- जीवन में जमीन-जायदाद प्राप्त करने हेतु किसी की जमीन न दबाए और बड़े भाई की सेवा करें।
- रोग होने पर गुड़, आटा दान करें।
- क्लेश शांति हेतु लाल मसूर जल प्रवाह करें।
- विद्या प्राप्ति हेतु रेवड़ी मीठे जल में प्रवाह करें।
- मूँगा रत्न किसी श्रेष्ठ ज्योतिषाचार्य से विचार-विमर्श के बाद ही धारण करें…..

>जब हो दो ग्रह एक साथ -दो ग्रहों का साथ और बीमारियाँ—-
प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में ग्रहों की स्थितियाँ अलग-अलग होती है। यदि कुंडली के किसी खाने में दो ग्रह एक साथ हैं तो उनसे कई बीमारियाँ हो सकती है। प्रस्तुत है उनकी सामान्य जानकारी।

कुंडली के किसी भी खाने में दो ग्रह साथ होने पर उनसे होने वाली बीमारियाँ :

1. बृहस्पति-राहु : दमा, तपेदिक या श्वास की तकलीफ।
2. बृहस्पति-बुध : दमा या श्वास की तकलीफ।
3. चंद्र-राहु : पागलपन या निमोनिया (बुखार)।
4. सूर्य-शुक्र : दमा और तपेदिक।
5. मंगल-शनि : शरीर का फटना, कोढ़, रक्त संबंधी बीमारी।
6. शुक्र-राहु : नपुंसकता, स्वप्न दोष आदि गुप्तांग संबंधी रोग।
7. शुक्र-केतु : पेशाब, धातु रोग, शुगर।
8. बृहस्पति-मंगल : पीलिया।

कुछ खास अन्य उपाय ::::—–
यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय से बीमारी हो तो उसके लिए कुछ सामान्य उपायों की जानकारी भी दी गई है, लेकिन उपरोक्त और निम्न उपाय लाल किताब के जानकार से पूछकर ही करें।
1. बुखार न उतरें तो तीन दिन लगातार गुड़ और जौ सूर्यास्त से पूर्व मंदिर में रख आएँ।
2. प्रति माह गाय, कौए और कुत्तों को मीठी रोटियाँ खिलाएँ।
3. पका हुआ सीता फल कभी-कभी मंदिर में रख आएँ।
4. रक्त चाप के लिए रात को सोते समय अपने सिरहाने पानी रख कर प्रात: पौधों को दें।
5. कान की बीमारी के लिए काले-सफेद तिल सफेद और काले कपड़े में बाँधकर जंगल या किसी सुनसान जगह पर गाड़कर आ जाएँ।
6. जब भी श्मशान या कब्रिस्तान से गुजरना तो ताँबे के सिक्के उक्त स्थान पर डालने से दैवीय सहायता प्राप्त होगी।
7. यदि आँखों में पीड़ा हो तो शनिवार को चार सूखे नारियल या खोटे सिक्के नदी में प्रवाहित करें।
8. शुगर, जोड़ों का दर्द, मूत्र रोग, रीढ़ की हड्डी में दर्द के लिए काले कुत्ते की सेवा करें।
9. सिरहाने कुछ रुपए-पैसे रख कर प्रात: सफाईकर्मी को दे दें।

नोट : उपरोक्त प्रत्येक उपाय लाल किताब के विशेषज्ञ की सलाह अनुसार ही करें।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>किस ग्रह से कौन-सी बीमारी::::-

>किस ग्रह से कौन-सी बीमारी::::—
मनुष्य के मन, मस्तिष्क और शरीर पर मौसम, ग्रह और नक्षत्रों का प्रभाव लगातार रहता है। कुछ लोग इन प्रभाव से बच जाते हैं तो कुछ इनकी चपेट में आ जाते हैं। बचने वाले लोगों की सुदृढ़ मानसिक स्थिति और प्रतिरोधक क्षमता का योगदान रहता है। लाल किताब अनुसार हम जानते हैं कि किस ग्रह से कौन-सा रोग उत्पन्न होता है।
कुंडली का खाना नं. छह और आठ का विश्लेषण करने के साथ की ग्रहों की स्थिति और मिलान अनुसार ही रोग की स्थिति और निवारण को तय किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में यह स्थितियाँ अलग-अलग होती है। यहाँ प्रस्तुत है सामान्य जानकारी, जिसका किसी की कुंडली से कोई संबंध है या नहीं यह किसी लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर ही तय किया जा सकता है।
ग्रहों से उत्पन्न बीमारी :-
1. बृहस्पति : पेट की गैस और फेफड़े की बीमारियाँ।
2. सूर्य : मुँह में बार-बार थूक इकट्ठा होना, झाग निकलना, धड़कन का अनियंत्रित होना, शारीरिक कमजोरी और रक्त चाप।
3. चंद्र : दिल और आँख की कमजोरी।
4. शुक्र : त्वचा, दाद, खुजली का रोग।
5. मंगल : रक्त और पेट संबंधी बीमारी, नासूर, जिगर, पित्त आमाशय, भगंदर और फोड़े होना।
6. बुध : चेचक, नाड़ियों की कमजोरी, जीभ और दाँत का रोग।
7. शनि : नेत्र रोग और खाँसी की बीमारी।
8. राहु : बुखार, दिमागी की खराबियाँ, अचानक चोट, दुर्घटना आदि।
9. केतु : रीढ़, जोड़ों का दर्द, शुगर, कान, स्वप्न दोष, हार्निया, गुप्तांग संबंधी रोग आदि।
रोग का निवारण :
1. बृहस्पति : केसर का तिलक रोजाना लगाएँ या कुछ मात्रा में केसर खाएँ।
2. सूर्य : बहते पानी में गुड़ बहाएँ।
3. चंद्र : किसी मंदिर में कुछ दिन कच्चा दूध और चावल रखें या खीर-बर्फी का दान करें।
4. शुक्र : गाय की सेवा करें और घर तथा शरीर को साफ-सुथरा रखें।
5. मंगल : बरगद के वृक्ष की जड़ में मीठा कच्चा दूध 43 दिन लगातार डालें। उस दूध से भिगी मिट्टी का तिलक लगाएँ।
6. बुध : 96 घंटे के लिए नाक छिदवाकर उसमें चाँदी का तार या सफेद धागा डाल कर रखें। ताँबे के पैसे में सूराख करके बहते पानी में बहाएँ।
7. शनि : बहते पानी में रोजाना नारियल बहाएँ।
8. राहु : जौ, सरसों या मूली का दान करें।
9. केतु : मिट्टी के बने तंदूर में मीठी रोटी बनाकर 43 दिन कुत्तों को खिलाएँ।

नोट : उपरोक्त प्रत्येक उपाय लाल किताब के विशेषज्ञ की सलाह अनुसार ही करें।

>वास्तु दिलाएगा एक्जाम में सफलता—
कभी आपने सोचा है बच्चे की पढ़ाई का संबंध घर की संरचना से भी हो सकता है। विद्यार्थी किस दिशा में और कैसे बैठकर पढ़ रहा है इसका भी प्रभाव उसकी पढ़ाई पर पड़ सकता है। आप समझ ही गए होंगे कि हम बात कर रहे हैं वास्तुशास्त्र की। वास्तु विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि वास्तु का ध्यान रखा जाए तो निश्चित ही पढ़ाई पर असर पड़ेगा।
कई बार ऐसा होता है कि कई घंटे पढ़ने के बाद भी विषय न तो याद होता है और न ही समझ में आता है। कुछ विद्यार्थियों का तो पढ़ने में मन ही नहीं लगता। माता-पिता परेशान रहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ता नहीं है। कई बार तो डॉक्टर्स के पास भी ले जाया जाता है कि उसकी याददाश्त बढ़ाने की कोई दवा दे दी जाए जिससे बच्चे को याद हो सके।
जिस प्रकार मानने वाले ज्योतिष को मानते हैं और न मानने वाले नहीं मानते। ठीक उसी प्रकार वास्तु पर भी विश्वास और अविश्वास करने वाले लोग मिलते हैं। लेकिन परीक्षा के दिनों को देखते हुए अच्छा होगा कि पढ़ाई करने के लिए वास्तु के अनुसार ही व्यवस्था की जाए। इससे कुछ हानि तो होगी नहीं बल्कि जल्द ही अच्छे परिणाम सामने आएँगे।
थोड़ी-सी सावधानी जरूरी :- बोर्ड परीक्षाओं के साथ-साथ बाकी क्लासेस के एग्जाम भी शुरू हो गए हैं। इस समय हर घर में पढ़ाई का ही माहौल है। इतनी जल्दी घर की संरचना बदलना संभव तो नहीं है लेकिन बच्चे के पढ़ने के कमरे की दिशा बदली जा सकती है। पढ़ने के लिए पूर्व-पश्चिम दिशा से बना कोण ईशान कोण ही महत्वपूर्ण होता है। यदि बच्चा इस दिशा में बैठकर पढ़ता है तो उसकी एकाग्रता भी बढ़ेगी और उसे सब आसानी से याद हो जाएगा।
आग्नेय और वायु कोण से बचें :- वास्तु विशेषज्ञ के अनुसार जिस कमरे में बच्चा पढ़ता है उसे आग्नेय यानी पूर्व और दक्षिण एवं वायु अर्थात् उत्तर व पश्चिम दिशा में बिलकुल भी नहीं होना चाहिए। आग्नेय कोण में होने से बच्चा चिड़चिड़ा होता है और वायु कोण में पढ़ने से
सामने न हो दीवार :- बच्चा जहाँ पढ़ता है उससे पाँच-छः फीट की दूरी तक कोई दीवार नहीं होना चाहिए। दीवार की जगह खिड़की या खुला हुआ भाग हो तो अच्छा है। इसके साथ ही पढ़ने के कमरे के साथ बैग, कम्पास या हरे रंग का पेन हो तो बच्चे में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और बच्चे का पढ़ाई में मन लगता है। बुद्धि के विकास के लिए हरा रंग बहुत शुभ माना गया है।
बंद न हो घर की पूर्व दिशा :- वास्तु के मुताबिक पूर्व दिशा का घर की सुख-समृद्धि और अध्ययन-अध्यापन से विशेष संबंध है। अतः प्रयास करना चाहिए कि घर का दरवाजा पूर्व दिशा की ओर ही हो। जहाँ तक हो पूर्व दिशा की तरफ कोई वजनदार वस्तु न रखें और पूर्व दिशा खुली ही रहे। ऐसा होने से घर में समृद्धि तो आती ही है साथ ही बच्चों का पढ़ाई में मन लगता है।

>लग्न से जानिए शरीर के रोग-रखें सावधानी और परहेज—–

जन्मकुंडली का छठा (6) और ग्यारहवाँ (11) भाव रोग के भाव माने जाते है यानि इन भावों से हमें होने वाले रोगों की संभावित जानकारी मिल सकती है। यदि इन भाव के स्वामी अच्छी स्थिति में हो तो रोग का निदान हो जाता है या रोग होने की संभावना घट जाती है मगर यदि इन भावों के स्वामी खराब स्थिति में हो तो रोग भयंकर रूप लेते हैं और उनका निदान होना कठिन हो जाता है।

ऐसे में यदि बचपन से ही इस बारे में सावधानी और परहेज रखा जाए तो इनसे बचा जा सकता है। मेष लग्न के लिए एलर्जी, त्वचा रोग, सफेद दाग, स्पीच डिसऑर्डर, नर्वस सिस्टम की तकलीफ आदि रोग संभावित हो सकते हैं।

वृषभ लग्न के लिए हार्मोनल प्रॉब्लम, मूत्र विकार, कफ की अधिकता, पेट व लीवर की तकलीफ और कानों की तकलीफ सामान्य रोग है।

मिथुन लग्न के लिए रक्तचाप (लो या हाई), चोट-चपेट का भय, फोड़े-फुँसी, ह्रदय की तकलीफ संभावित होती है।

कर्क लग्न के लिए पेट के रोग, लीवर की खराबी, मति भ्रष्ट होना, कफजन्य रोग होने की संभावना होती है।

सिंह लग्न के लिए मानसिक तनाव से उत्पन्न परेशानियाँ, चोट-चपेट का भय, ब्रेन में तकलीफ, एलर्जी, वाणी के दोष आदि परेशानी देते हैं।

कन्या लग्न के लिए सिरदर्द, कफ की तकलीफ, ज्वर, इन्फेक्शन, शरीर के दर्द और वजन बढ़ाने की समस्या रहती है।

तुला लग्न के लिए कान की तकलीफ, कफजन्य रोग, सिर दर्द, पेट की तकलीफ, पैरों में दर्द आदि बने रहते हैं।

वृश्चिक लग्न के लिए रक्तचाप, थॉयराइड, एलर्जी, फोड़े-फुँसी, सिर दर्द आदि की समस्या हो सकती हैं।

धनु लग्न के लिए मूत्र विकार, हार्मोनल प्रॉब्लम, मधुमेह, कफजन्य रोग व एलर्जी की संभावना होती है।

मकर लग्न के लिए पेट की तकलीफ, वोकल-कॉड की तकलीफ, दुर्घटना भय, पैरों में तकलीफ, रक्तचाप, नर्वस सिस्टम से संबंधित परेशानियाँ हो सकती हैं।

कुंभ लग्न के लिए कफजन्य रोग, दाँत और कानों की समस्या, पेट के विकार, वजन बढ़ना, ज्वर आदि की संभावना हो सकती है।

मीन लग्न के लिए आँखों की समस्या, सिर दर्द, मानसिक समस्या, कमर दर्द, आलस्य आदि की समस्या बनी रह सकती है।

विशेष : यदि 6 या 11 के स्वामी हानि देने वाली स्थिति में हो तो शुरू से ही उनके मन्त्रों का जाप करना चाहिए। खान-पान की सावधानी रखना चाहिए और संबंधित वस्तुओं का दान करना चाहिए। इन ग्रहों के रत्न भूल कर भी न पहनें।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>निम्न उपाय करें होली के दिन—-

>निम्न उपाय करें होली के दिन—–

यदि पुत्री की इच्छा हो तो ॠतुकाल की 5, 7, 9 या 15वीं रात्रि में से किसी एक रात्रि का शुभ मुहूर्त पसंद करना चाहिए कृष्णपक्ष के दिनों में गर्भ रहे तो पुत्र व शुक्लपक्ष में गर्भ रहे तो पुत्री पैदा होती है
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मुकदमा जीतने के लिये – होली की आग लाकर उसके कोयले से स्याही बनाकर लोहे की सलाई से मुकदमा नम्बर और शत्रु पक्ष का नाम सात कागजों पर लिख कर पुन: होली की अग्नि के पास जायें और सात परिक्रमा करें, हर परिक्रमा पर एक कागज़ होली की आग में डाल दें
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होली दहन का मुहूर्त 19 मार्च 2011 को होलीका दहन का मुहूर्त शाम 6 बजकर 43 मिनट से 9 बजकर 30 मिनट तक है और 9 बजकर 44 मिनट से लेकर रात्री 12 बजकर 44 मिनट तक का श्रेष्ठ मुहूर्त है
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राहू शांति के लिए होली के दिन क्या करें===१.- एक नारियल का गोला लेकर उसमे अलसी का तेल भरकर..उसी में थोडा सा गुड डाले..फिर उस नारियल के गोले को राहू से ग्रस्त व्यक्ति अपने शारीर के अंगो से sparsh करवाकर जलती हुई होलिका में डाल देवे.aagami पुरे वर्ष भर राहू से परेशानी की संभावना नहीं अहेगी…२.–अलसी के तेल में सेबफल को भिगोकर …उसमे राहू ग्रस्त व्यक्ति ..अपनी उम्र/ आयु अनुसार उतने ही लॉन्ग लगायें..फिर उस सेबफल को हाथ में लेकर जलती हिई होली की चार परिक्रमा लगायें..और इष्ट देवता का नाम स्मरण करते हुए.राहू मुक्ति की प्रार्थना करते हरे उसी जलती हुई होली में डाल देवे…
===================================================== यदि आप किसी से पैसा मांग rahe हे और वह देने में aana कानी करता हे तो होली के दिन निम्न उपाय करें—-
## आप ग्यारह गोमती चक्र हाथ में लेकर जलती हुई होलिका की ग्यारह बार परिक्रमा करते हुए धन प्राप्ति की प्रार्थना करे..फिर एक सफ़ेद कागज पर उस व्यक्ति का नाम लाल चन्दन से लिखें जिससे पैसा लेना हे ..लाल चन्दन से नाम लिखाकर उस सफ़ेद कागज को ग्यारह गोमती चक्र के साथ में कही गड्डा खोदकर सारी सामग्री सारी गड्डे me दबा देवे…इस प्रयोग से धन प्राप्ति की संभावना बढ़ जाएगी…
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यदि आपको koyi अज्ञात / अंजान भय रहता हो..बिना किसी कारण के तो निम्न उपाय करें होली के दिन–
एक सुखा जटा वाला नारियल लेवें..दो लॉन्ग..और काले तिल एवं पिली सरसों ..उपरोक्त सारी सामग्री एक साथ लेकर..उसे सात बार/ दफा अपने सर के ऊपर उतार कर जलती होलिका में डाल देने से अज्ञात भय/ दर समाप्त हो जटा हे..
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यदि आप का दाम्पत्य जीवन किसी कारणवश thik / अच्छा नहीं हे तो —–होली के दिन सात गोमती चक्र लेकर अपने दाम्पत्य सुख की कामना करते हुए एक -एक गोमती चक्र जलती हुई होलिका दे डालते जाये ….apne इष्ट देवता से प्रार्थना भी करते रहें ..मन ही मन में… आपकी समस्या दूर होने की संभावना बढ़ जाएगी …

>आप भी कर सकते हैं असंभव को संभव – चाहिए बड़ी कामयाबी तो जोखिम उठाइए=====

इस बात को कोई नकार नहीं सकता कि ‘असंभव’ शब्द केवल शब्दकोश में पाया जाता है, वास्तविक जीवन में इसका कोई मतलब नहीं होता। कभी-कभी किसी व्यक्ति को ऐसा महसूस होता है कि यह दिया गया कार्य उसके बूते से बाहर की बात है, लेकिन वही कार्य वह किसी दूसरे समय में जाकर आसानी से पूरा कर लेता है। यह इस बात की ओर इंगित करता है कि हमारी जरूरत और ईमानदारी से की गई कोशिश ने असंभव को संभव में बदल दिया। जिंदगी में इच्छा का होना ऐसा बल है जो हमें किसी भी चीज को हासिल करने में मदद करता है। केवल उस चीज की इच्छा का होना ही काफी नहीं, उसे पाने का जुनून हमारे भीतर होना चाहिए। हम जब कुछ पाना चाहते हैं, लेकिन उसमें सफल नहीं होते तो असफलता के लिए कई सारे बहाने ढूंढ निकालते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि हम अपनी असफलता का विश्लेषण करने में अक्षम हैं और विजेता की कोशिशों का सम्मान करते हैं। केवल यही नहीं, हम इसके लिए अपने भाग्य को भी कोसने से नहीं चूकते, परंतु हम यह भूल जाते हैं कि भाग्य और नियति उन्हीं की मदद करते हैं जिनमें कुछ करने की इच्छा है। ‘मेट्रो मैन’ के तौर पर पहचाने जाने वाले ई. श्रीधरन महज एक दिन, महीना या साल में इतनी बड़ी शख्सियत नहीं बने हैं। बल्कि ‘कोंकण रेल परियोजना’ के मास्टर माइंड यही हैं और इसके पूरा होने तक वह इसके साथ निष्ठा से जुड़े रहे थे। इसे उन्होंने एक चुनौती के रूप में लिया। उन्हें खुद को साबित करने का एक अवसर मिला था, जिसका उन्होंने बेहतर सदुपयोग किया। आपको यह याद होना चाहिए कि रेलवे के पास लाखों इंजीनियर हैं, लेकिन श्रीधरन ने खुद को औरों से अलग साबित किया। मौका मिलने पर आपको कुछ कर दिखाना होगा। श्रीधरन ने कोंकण रेलवे प्रोजेक्ट पर ही अपनी दक्षता नहीं साबित की, बल्कि इससे पहले भी वह जिस पद पर थे, उसे उन्होंने निष्ठा से निभाया था। आपको किसी चमत्कार का इंतजार करने की बजाय परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाना होगा। ज्यादातर लोगों की सोच होती है कि वर्तमान में जो करने के लिए उनके सामने है, वह उनकी इच्छा और योग्यताओं के मुताबिक नहीं है और वह कुछ विशेष होने का इंतजार करते हैं, लेकिन वह दिन कभी नहीं आता। हमें बचपन से ही यह बताया गया है कि जीवन गुलाब के फूलों की सेज नहीं है। मुझे आज तक इस मुहावरे का मतलब समझ में नहीं आया, क्योंकि मैंने एक प्राइमरी स्कूल के शिक्षक से अपने कॅरियर की शुरुआत की और आज मैं एक नहीं, तकरीबन 15-16 बड़े संगठनों को एक साथ संचालित कर रहा हूं। जब मैं प्राइमरी शिक्षक था, तब भी लोग मुझे जानते थे और आज भी। बस फर्क पड़ा है तो महज इतना कि मुझे जानने वाले लोगों की संख्या बढ़ गई है। मैं जहां भी होता हूं, सर्वोत्तम करने की चाहत रखता हूं। दूसरों के संदर्भ में आपको अपनी परिस्थिति में फर्क पैदा करना होगा, तब चीजें बेहतर होंगी। इसके लिए आप समय का इंतजार नहीं कर सकते, क्योंकि जिंदगी आपको ज्यादा समय नहीं देगी।
जब आप कुछ पाना शुरू कर देंगे तो आपको महसूस होगा कि आपने जिंदगी का बहुत सारा कीमती वक्त गंवा दिया, लेकिन तब पछताने के सिवा कुछ नहीं किया जा सकता। एक सफल व्यक्ति और सामान्य व्यक्ति के बीच जो फर्क है वह शक्ति और ज्ञान का नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति का होता है। अगर आप विजेता बनना चाहते हैं तो कहीं से भी बस शुरुआत भर करने की जरूरत है। आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि जो लोग कुछ करते रहते हैं, वे स्वयं क्रियाशीलता से जिंदगी को पूर्ण आनंद के साथ जीते हैं। जहां से भी आपको उचित लगता हो, शुरू कर दीजिए और किसी इंतजार में मत रहिए कि अवसर मिलेगा, तब काम शुरू करेंगे। एक बार आपने सर्वोत्तम देना शुरू किया तो, सच मानिए कि आपकी चाहत आप से दूर नहीं। जिंदगी में उन्हीं को इनाम मिलता है जो अपना कार्य खुद करते हुए स्वयं पर यकीन करते हैं। कई बार ऐसा होता है कि आपसे कमतर लोग आपसे आगे बढ़ जाते हैं, इससे दु:खी होने की जरूरत नहीं। बिना योग्यता और पूर्ण दक्षता के वे बहुत आगे तक नहीं जा सकते और अगर वे जाते हैं तो इसका मतलब है कि उनमें योग्यता है। आपको इन सब में नहीं उलझना चाहिए और बेहतर तरीके से अपना काम निबटाना चाहिए, जो आपको सफलता की ओर ले जाएगा। न्यूटन की गति के द्वितीय नियम को याद कीजिए, बिना किसी बाहरी बल के कोई वस्तु इधर-उधर नहीं हो सकती है। बाहरी बल लगाने पर कोई वस्तु क्रियाशील होती है, पर वह बल लगाना खत्म होने पर फिर से अपनी जगह वापस हो जाता है। ऐसा जड़त्व की वजह से होता है। हमारी जिंदगी में भी जड़त्व समा चुका है जो हमें आगे बढ़ने से रोकता है। अपने मूल्य को आप पहचानें, केवल खुद को जानिए और बाकी सब चीजों को भुला दीजिए। जिंदगी वास्तव में फूलों की सेज है, लेकिन इसके लिए गुलाब आपको खुद ही चुनने होंगे। संभवत: गुलाब के फूल को तोड़ते वक्त आपको उसका कांटा चुभ सकता है और खून भी निकल सकता है, लेकिन वह अस्थायी होगा और फूलों की सेज पर सोना उससे ज्यादा आनंददायक होगा। जिस तरह फूल चुनने में आप कांटों का सामना करते हैं, उसी तरह से जिंदगी में आने वाली मुश्किलों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। भौतिक सुख देने वाले साधन अस्थायी होते हैं, इसलिए हमेशा ऐसे साधनों की तलाश कीजिए जो आपको विजेता बना सकें। मेरा विश्वास है कि अगर आप जिंदगी में आने वाली मुश्किलों से निबटते जाएंगे तो आप मजबूत बनेंगे और विजय की ओर अग्रसर होंगे। ये मुश्किलें आपके जीवन का स्वाद भी बदलेंगी।
हमेशा सफलता पाने की योजना बनाइए और इन गुरुमंत्रों को दिल की गहराइयों में उतारिए :
* समाज आपको बताता है कि आप क्या हैं? लेकिन ज्ञान आपको बताता है कि आपको कैसा होना चाहिए?
* दुनिया में अब तक जितने भी बड़े लोग हुए हैं, वे सब भाग्य से नहीं, अपनी कोशिश, संघर्ष और योजनाओं से बड़े बने हैं।
* असफलताओं से निराश होने वाले व्यक्ति कायर होते हैं, क्योंकि असफलताएं ही सफलता प्राप्त करने का रास्ता बताती हैं।
* योग्यता, आत्मविश्वास, साहस, सार्थक संवाद, कठिन परिश्रम और काम के प्रति समर्पण, सफलता का सबसे प्रचलित फार्मूला है, जिसके द्वारा दुनिया के करोड़ों लोग सफलता प्राप्त कर चुके हैं।
* अपने अंदर आत्मविश्वास रखें कि आप दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण इंसान हैं। फिर पीछे मुड़कर मत देखें, हंसते हुए जीवन गुजारें, क्योंकि हृदय की विशालता से ही सफलता की नींव पड़ती है।
* सफल लोग खतरों की परवाह किए बिना भीड़ को चीरकर आगे निकल जाते हैं, क्योंकि उन्हें वह भीड़ दिखाई नहीं देती, सिर्फ लक्ष्य ही नजर आता है।
* एक आइडिया किसी को अमीर बना देता है, तो किसी को खाक में मिला देता है, जबकि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कितना पुराना है? बस आपको उस आइडिए को पेश करने का तरीका आना चाहिए।
* समस्या के अंदर ही समाधान छिपा होता है। इसलिए समस्या के बारे में रचनात्मक तरीके से सोचिए, फिर समाधान आपको खुद ही नजर आ जाएगा।
* पैसा आपका चोरी हो सकता है। सेहत और ताकत आपका साथ छोड़ सकती है, लेकिन जो आप पुस्तकों के अध्ययन से सीखते हैं वह हमेशा आपके साथ रहता है।
* साधारण लोग छोटी-छोटी परेशानियों में उलझ कर पूरा जीवन बर्बाद कर लेते हैं, जबकि अमीर लोग उन परेशानियों को एक मुस्कान में ही हल कर देते हैं।
* ईश्वर ने जब ब्रह्मांड की रचना की थी, तब समस्याएं जानबूझ कर छोड़ी गई थीं, ताकि मनुष्य शारीरिक रूप से मजबूत रहे और जीवन में आने वाले हर मुश्किल का मुकाबला डट कर करे।
हमेशा प्रगति के बारे में सोचिए और इन गुरुमंत्रों को बार-बार दोहराइए :
* यह मत सोचिए कि देश की अर्थव्यवस्था कब समृद्ध होगी, बल्कि यह सोचिए कि आप की अपनी अर्थव्यवस्था कैसे समृद्ध होगी?
* सफलता हमेशा असफलताओं के बाद ही मिलती है, क्योंकि सफलता का रास्ता असफलताओं के बीच से ही होकर गुजरता है।
* यदि आपके पास एक पेन और एक सपना है, तब आप पूरी दुनिया को जीत सकते हैं, क्योंकि बड़ा आदमी बनने के लिए सिर्फ इन दो ही चीजों की जरूरत होती है-लक्ष्य और जुनून।
* जब आपका मन प्रसन्न होता है, तब आपके अंदर ऊर्जा का उत्पादन कई गुना बढ़ जाता है, जिसे आप सही दिशा में प्रयोग करके अधिक सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
* जिन्हें लगता है कि वह सफल हो सकते हैं और जो ये सोचते हैं कि वे सफल नहीं होंगे, वे दोनों ही सही हैं। क्योंकि मन में जो विचार ज्यादा प्रभावशाली होंगे, वही आपकी सोच को निर्धारित करेंगे।
* आपको सफलता नहीं मिलती, क्योंकि आप सफलता नहीं मांगते। आप मांगते हो, फिर भी नहीं मिलता, क्योंकि तुम श्रद्धा से नहीं मांगते। लेकिन यदि आपके भीतर राई के दाने के बराबर भी विश्वास है, तो आप किसी पर्वत से कहिए कि यहां से खिसक जाओ, तब वह अवश्य खिसक जाएगा।
* जीवन की तमाम विफलताएं आपको आपकी वास्तविक योग्यता और क्षमता का आभास कराती है और फिर वही विफलताएं आपको सफलता का रास्ता दिखाती हैं।
*जोखिम उठाए बिना आप जीवन में कभी कोई बड़ी कामयाबी हासिल नहीं कर सकते, क्योंकि अंग्रेजी में एक कहावत है, नो रिस्क नो रिवार्ड।
* फूलों की महक सिर्फ उसी दिशा में फैलती है, जिधर हवा का रुख होता है, लेकिन व्यक्ति की उन्नति के चर्चे पूरे विश्व में फैलते हैं।
* जागने के बाद कचरा, कूड़ा-करकट चित्त से गिरना शुरू हो जाता है। फिर चित्त निर्मल होता चला जाता है और जब चित्त निर्मल हो जाता है, तब चित्त दर्पण बन जाता है

>अंक के अनुसार जानिए किस COLOR की DRESS है आपके लिए LUCKY!———-

ज्योतिष के अनुसार अंको और रंगो का गहरा संबंध है। अगर आप अपने लकी नंबर के अनुसार कपड़े पहनेंगे तो बिजनेस, नौकरी, पढ़ाई में सफलता तो मिलेगी साथ ही प्रेम संबंध लंबे समय तक बने रहेंगे।

अंक- 1 एक अंक सूर्य का अंक माना गया है इसलिए आप सूर्य से संबंधित गहरे भूरे, पीले और सुनहरे रंगों के कपड़े पहनें आप हल्का रंग भी इस्तेमाल कर सकते है।

अंक- 2 अंक 2 वाले व्यक्ति गहरे हरे, क्रीम रंग, पीले, लाल और सफेद रंग के कपड़े पहनें।

अंक- 3 पीले, केसरिया, चमकीले और गुलाबी रंग 3 अंक वाले लोगो के लिए शुभ फलदायक होते है।

अंक- 4 नीला या स्लेटी रंग अंक 4 वालों के लिए भाग्यशाली अंक होता है।

अंक- 5 इस अंक का स्वामी बुध है। अंक 5 वालों को हरा, हल्का स्लेटी, सफेद, हल्का खाकी, चमकीला रंग पहनना चाहिए।

अंक- 6 यह शुक्र का अंक है। आपको शुक्र के अनुसार हल्का नीला, सफेद और आखों को अच्छे लगने वाले रंगों के कपड़े पहनने चाहिए।

अंक- 7 आपके अंक के अनुसार आपके लिए सफेद रंग के कपड़े विशेष अनुकूल रहेंगे। हल्के लाल और हल्के पीले रंग भी फायदेमंद हो सकते है।

अंक- 8 इस अंक का स्वामी शनि है इसलिए अंक आठ वालों को अपने कपड़ों में नीला, भूरा, बैंगनी, पीला और काला रंग उपयोग करना चाहिए।

अंक- 9 अंक 9 वाले व्यक्तियों पर मंगल का विशेष प्रभाव होता है इन्हे लाल और गुलाबी रंग के कपड़े पहनने से असाधारण लाभ प्राप्त होगा।

>दिऩांक प्रमुख त्योहार अन्य त्योहार हिंदी माह पक्ष तिथि
1 मार्च फाल्गुन कृष्ण द्वादशी (12)
2 मार्च महाशिवरात्री व्रत प्रदोष व्रत फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी (13)
3 मार्च महाशिवरात्री व्रत (मतांतर से) पंचक प्रारंभ ( दिन 10.7 से), बैद्यनाथ ज. फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी (14)
4 मार्च अमावस्या फाल्गुन कृष्ण अमावस्या (15
5 मार्च फाल्गुन शुक्ल एकम (1)
6 मार्च फुलोरा दोज, चंद्रदर्शन परमहंस ज. फाल्गुन शुक्ल द्वितीया (2)
7 मार्च गोविंद वल्लभपंत दि. पं. लेखाराम ज., रवि उस्सानी मास प्रा. फाल्गुन शुक्ल तृतीया (3)
8 मार्च विनायकी चतुर्थी (चंद्र अ.रा. 9.10) पंचक समाप्त ( दिन 9.7) , अंतरराष्ट्रीय महिला दि फाल्गुन शुक्ल तृतीया (3)
9 मार्च फाल्गुन शुक्ल चतुर्थी (4)
10 मार्च फाल्गुन शुक्ल पंचमी (5)
11 मार्च फाल्गुन शुक्ल षष्ठी (6)
12 मार्च होलाष्टक प्रारंभ फाल्गुन शुक्ल सप्तमी (7)
13 मार्च दादूलाल ज. फाल्गुन शुक्ल अष्टमी (8)
14 मार्च फाल्गुन्र शुक्ल नवमी (9)
15 मार्च सौर मास चैत्र प्रा., खरमास प्रारंभ. विश्व उपभोक्ता दि., पुष्य नक्षत्र (दिन 3.28) फाल्गुन्र शुक्ल दशमी (10)
16 मार्च आमलकी एकादशी पुष्य नक्षत्र (दिन 2.32 स.) फाल्गुन शुक्ल एकादशी (11)
17 मार्च प्रदोष व्रत फाल्गुन शुक्ल द्वादशी-त्रयोदशी (12-13)
18 मार्च फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी (14)
19 मार्च होलिका दहन, पूर्णिमा व्रत चैतन्य महाप्रभु ज. फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा (15)
20 मार्च होली, धुलेंडी बसंतोत्सव, अवंतिबाई बलि. दि. चैत्र कृष्ण एकम (1)
21 मार्च भाई दौज संत तुकाराम ज., विश्व वानिकी दि. चैत्र कृष्ण द्वितीया (2)
22 मार्च संकष्टी गणेश चतुर्थी (चंद्रो.रा. 9.18) विश्व जल संरक्षण दि. चैत्र कृष्ण तृतीया (3)
23 मार्च भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव दि. चैत्र कृष्ण चतुर्थी (4)
24 मार्च रंग पंचमी विश्व क्षयरोग दि. चैत्र कृष्ण पंचमी (5)
25 मार्च सैयदना साहब जन्म. गणेश शंकर विद्या‍र्थी दि. चैत्र कृष्ण षष्ठी (6)
26 मार्च शीतलाष्टमी, बसोरा चैत्र कृष्ण सप्तमी (7)
27 मार्च चैत्र कृष्ण अष्टमी (8)
28 मार्च भ. ऋषभनाथ ज. चैत्र कृष्ण नवमी (9)
29 मार्च पापमोचनी एकादशी चैत्र कृष्ण दशमी (10)
30 मार्च महावारुणी पर्व, प्रदोष व्रत पंचक प्रारंभ (शाम 5.24) चैत्र कृष्ण एकादशी (11)
31 मार्च आशा द्वितीया माँ कर्मा जयंती, वित्तीय वर्ष समाप्त चैत्र कृष्ण द्वादशी (12)

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>अप्रैल माह,,,2011 के त्योहार—–

>अप्रैल माह,,,2011 के त्योहार—–
दिऩांक प्रमुख त्योहार अन्य त्योहार हिंदी माह पक्ष तिथि —
1 अप्रैल शिव चतुर्दशी, महावारुणी पर्व मूर्ख दि. चैत्र कृष्ण त्रयोदशी (13)
2 अप्रैल चैत्र कृष्ण चतुर्दशी (14)
3 अप्रैल अमावस्या विक्रम.सं. 2067 समाप्त चैत्र कृष्ण अमावस्या (15)
4 अप्रैल चैत्र नवरात्रारंभ, गुड़ीपड़वा, बैठकी पंचक समाप्त (दिन 4.15), विक्रम.सं.2068 प्रारंभ चैत्र शुक्ल एकम (1)
5 अप्रैल चेटीचंड, सिंधारा दौज चंद्रदर्शन, झूलेलाल जन्म. चैत्र शुक्ल द्वितीया (2)
6 अप्रैल गणगौर तीज व्रत सौभाग्य सुंदरी व्रत, जमिदि उलावल चैत्र शुक्ल तृतीया (3)
7 अप्रैल विनायकी चतुर्थी (चं.अ.रा.9.50) विश्‍व स्वास्थ्य दि. चैत्र शुक्ल चतुर्थी (4)
8 अप्रैल आर्य समाज स्थापना. दि. चैत्र शुक्ल पंचमी (5)
9 अप्रैल चैत्र शुक्ल षष्ठी (6)
10 अप्रैल चैत्र शुक्ल सप्तमी (7)
11 अप्रैल दुर्गाष्टमी व्रत, अशोकाष्टमी महाष्टमी पुष्‍य नक्षत्र (रात्रि 11.19 से) चैत्र शुक्ल अष्टमी (8)
12 अप्रैल राम नवमी, श्रीराम जन्मोत्सव पुष्य नक्षत्र (10.34 तक) चैत्र शुक्ल नवमी (9)
13 अप्रैल जलियाँवाला बाग दि. चैत्र शुक्ल दशमी (10)
14 अप्रैल कामदा एकादशी, वैशाखी, खरमास समाप्त आम्बेडकर ज., अग्नि शामक दि. चैत्र शुक्ल एकादशी (11)
15 अप्रैल सौर मास वैशाख प्रा. . . चैत्र शुक्ल द्वादशी (12)
16 अप्रैल भगवान महावीर ज. चैत्र शुक्ल त्रयोदशी (13)
17 अप्रैल पूर्णिमा व्रत, पाम संडे हाटकेश्वर ज., डॉ. राधाकृष्णन दि.. चैत्र शुक्ल चतुर्दशी (14)
18 अप्रैल स्नानदान पूर्णिमा, हनुमान जन्मो. तात्या टोपे दि., वैशाख स्ना.दा.व्र.नि.प्रा. चैत्र शुक्ल पूर्णिमा (15)
19 अप्रैल आशा द्वितीया श्री महावीरजी मेला वैशाख कृष्ण एकम-द्वितीया (1-2)
20 अप्रैल वैशाख कृष्ण तृतीया (3)
21 अप्रैल संकष्टी गणेश चतुर्थी (चं.उ.रा.10.3) वैशाख कृष्ण चतुर्थी (4)
22 अप्रैल गुड फ्रायडे वैशाख कृष्ण पंचमी (5)
23 अप्रैल वीर कुँवर ज. वैशाख कृष्ण षष्ठी (6)
24 अप्रैल ईस्टर संडे वैशाख कृष्ण सप्तमी (7))
25 अप्रैल वैशाख कृष्ण अष्टमी (8)
26 अप्रैल पंचक प्रारंभ (12.46 रात्रि) वैशाख कृष्ण नवमी (9)
27 अप्रैल वैशाख कृष्ण दशमी (10)
28 अप्रैल वरुथिनी एकादशी वल्लभाचार्य ज. वैशाख कृष्ण एकादशी (11)
29 अप्रैल वरुथिनी एकादशी (वैष्णव) संत सेन ज. वैशाख कृष्ण द्वादशी (12)
30 अप्रैल प्रदोष व्रत वैशाख कृष्ण द्वादशी (12)

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>About Holi :———–

>About Holi :———–
The festival of Holi begins on Duwadashi – on the twelfth day of the waxing moon in the month of Phalgun. Spirits run high as the preparations for the festivities begin, as a custom, mothers make new clothes for their married daughters. Coloured powder (Gulal) is bought and prepared, long syringes called ‘pichkaris’ are made ready and water balloons are bought and filled. Preparations are made to cook the special food items that are exclusively meant for this festival.

Three days before the full moon, ‘Rang Pashi’ brings Holi into all households. The families get together in the evenings when people visit each other to perform the formal sprinkling of colour. In the past ‘the household purohit’ or priest was invited to begin the celebrations. Today, however this task has been taken over by the eldest male member of the family. A ‘thali’ or plate is arranged with coloured powders and coloured water is placed in a small brass container called a ‘lota’. The eldest male member of the family begins the festivities by sprinkling coloured water and powders on each member of the assembled family. It is then the turn of the younger ones to do the same. In this unique way, affection and blessings are shared by all in the family. The celebrations on this day end with the partaking of food specially cooked for this occasion – gujjia, papri and kanji ke vade. Sometimes, meat dish like kofta curry is also served. It is customary to serve drinks before the meal.

The next day is known as ‘Puno’. On this day, Holika is burnt in keeping with the legend of Prahlad and his devotion to lord Vishnu. In the evening, huge bonfires are lit on street corners at the crossroads. Usually this is a community celebration and people gather near the fire to fill the air with folk strains and dances. Sheaves of green gram and wheat are roasted in the bonfire and eaten.

The actual festival of Holi takes place the day after this. This day is called ‘Parva’. Children, friends and neighbours gather on the streets and a riot of colour takes over. Coloured powders called ‘abeer’ or ‘gulal’ are thrown into the air and smeared on faces and bodies. ‘Pichkaris’ are filled with coloured water and this is spurted onto people. Water balloons are thrown at friends and neighbours in the spirit of fun. Sometimes, mud baths are prepared and people are ‘dunked’ into this amidst much laughter and teasing. The visitors carry ‘abeer’ or ‘gulal’ to pay their respects to elders by sprinkling some on their feet. The younger crowd is drenched with buckets of coloured water and pummeled with water balloons. ‘Dholaks’ or Indian drums are heard everywhere and the songs of Holi are carried by the voices of these merry-makers.

There is no ‘puja’ or worship associated with this festival of colours. Some ‘gulal’ or ‘abeer’ is smeared on the faces of the Gods, especially Krishna and Radha, at the commencement of the festivities.

There are some quaint customs attached to this festival. Inviting sons-in-law and their families for a meal on this day is a must. When the meal is over, it is customary to give the sons-in-law, what is known as a ‘pyala’ – a crisp note of any denomination from rupees five to rupees five hundred is offered along with a glass of drink. Married daughters are given what is called ‘kothli’ or travel money by their mother-in-law, or the eldest lady in the family. Another custom entails a bit of fun, and is usually performed by a new bride with the help of the children in the family. The new bride is supposed to play a prank on the older couples of the family, usually her parents-in-law, and somehow lure them into a room to lock them in. The bride then demands a present for setting them free. The gift is usually a saree or a piece of jewelry. The bride is supposed to sing a song specially composed for the occasion, in which she will demand her ransom.

Holi is celebrated in the country with great zest and verve. It is a time to remember the brightness and splendor of living, a time to spread joy, colour and love into the lives of our near and dear ones.

Colour:
Phalgun arrives with the promise of warm days and new life – Spring is the season of rejuvenation and rebirth. The earth discards its winter gloom and begins to blossom again. As if to mark this change, Holi flings colour into Indian landscape and invites the celebration of life.

The spirit of Holi is colour – rich and vibrant, flung into the air and smeared with laughter on friends and loved ones. It recalls, very simply, the secret of life: a shifting panorama of sights, movement and feelings. Colours denotes energy – the vivid, passionate pulse of life. Colour signifies the vitality that makes the human race unique in the universal scheme. Holi, the festival of colour, is also the enactment of spring. It is, in a metaphorical sense, changing earth’s dull garb of winter for the fresh blue of the March skies, the bright colours of new blossoms, the brilliance of the summer sun washing everything with its red-gold hues.

Holi comes alive with the colours of ‘gulal’. These are dry colours that are sold days before the festival actually begins. Markets are flooded with heaps of gulal – they are arranged in pyramids and sold loose. Vendors sit on street corners selling gulal to passers-by. Gulal is made up of many rich colours like pink, magenta, red, yellow and green. ‘Abeer’ is made of small crystals or paper like chips of mica. This is usually mixed with the gulal to give it a rich shine. These colours can be used dry, or mixed with water. New brides make a silver or gold colour from powders specially available in the market. This colour is mixed with a little coconut oil and stored in a bottle. It is applied in tiny quantities on the foreheads of near and dear ones, like a ’tilak’ or a blaze-like mark.

In the old days, colour for Holi was made at home, from the flowers of the ‘tesu’ tree. This tree is also called ‘the flame of the forest’ or ‘palash’. The flowers of the latter are bright red in colour and they used to be collected from the trees and spread out on mats, to dry in the sun. Once dried, they were then ground to a fine powder. This powder was then mixed with water to give a beautiful saffron-red colour. The mixture was considered good for health, probably because of the reddish glow it left behind on the skin.

Holi is, therefore, aptly called the festival of colour. Its spirit is uniquely Indian, colourful, exotic, and full of the energy of life.

Clothes:
Like all other festivals in India, Holi has its share of traditional clothing. Mothers usually gift new clothes to their married daughters and their young children. According to tradition, once the daughter’s children get married, they automatically forfeit the right to this gift. A special saree known as a ‘dandia’ is gifted to the married daughter. The dandia is a white cotton saree, preferably of voile or ‘mulmul’. Its borders are dyed with a non-fast colour called Indian Pink. The dandia is made by gathering all four sides of the saree and dipping each side, in turn, into the Indian Pink, allowing the colour to catch two to three inches of the cloth on each side. The colour spreads in uneven splendor towards the middle of the saree but to a limited extent. The effect is that of a slowly spreading blush. When the colour dries, the saree can be further decorated with paisley designs on the entire body. Other Indian motifs can also be used. When the colour and designs are ready, a border of gold or silver, about two to three inches in width, is stitched on to the edges of the dandia. This border is called a ‘gota’. The portion of the saree that covers the head (‘pallu’), has a ‘kiran’ or a fine fringe of gold or silver, attached to it. This adds shimmer to the dandia. According to the custom dandia is gifted, along with another saree, and blouses and petticoats to match. This traditional attire is a must for a newly wed bride.

On the day of Holi, mothers send their children out on the streets to indulge in all the drenching and smearing of colour. Many like to wear white sarees or salwar kameez, and the men often wear white pajamas and kurtas and these act as wonderful contrasts to the bright colours everywhere.

>सभी मित्रों को होली की बधाई व शुभकामनायें …….########################

आज फिर रंगों हमें अनंग की तरह,
मनमयूर हो रहा विहंग की तरह |
…रंग की फुहार आज रंग डालती,
बालपन में छा गयी उमंग की तरह |
नैन तक झुके है नेह स्वप्न देखकर,
काश वो हों सामने तरंग की तरह |
रसायनों से रंग आज खेलना नहीं,
साथ छोड़ दो सदा कुसंग की तरह |
प्यार से हमें यहाँ लगा लिया गले,
गा रहा है आज मन मलंग की तरह |
मुस्कुराहटें सभी हैं प्रीति से खिलीं
साज बज रहे सभी मृदंग की तरह |
दन्त पंक्ति खिल उठी ज्यों श्वेत हो लड़ी,
मेघ मध्य दामिनी प्रसंग की तरह |
रंग से चुरा लिए हैं रंग आज ही,
बिन पिए ही चढ़ गये है भंग की तरह |
रंग की रंगीली नेह डोर थाम के,
उड़ चला है आज मन पतंग की तरह |
अपने-अपने साजना का साथ ही मिले,
अब नहीं दिखे कोई भुजंग की तरह |..
आज फिर रंगों हमें अनंग की तरह,
मनमयूर हो रहा विहंग की तरह |
…रंग की फुहार आज रंग डालती,
बालपन में छा गयी उमंग की तरह |
नैन तक झुके है नेह स्वप्न देखकर,
काश वो हों सामने तरंग की तरह |
रसायनों से रंग आज खेलना नहीं,
साथ छोड़ दो सदा कुसंग की तरह |
प्यार से हमें यहाँ लगा लिया गले,
गा रहा है आज मन मलंग की तरह |
मुस्कुराहटें सभी हैं प्रीति से खिलीं
साज बज रहे सभी मृदंग की तरह |
दन्त पंक्ति खिल उठी ज्यों श्वेत हो लड़ी,
मेघ मध्य दामिनी प्रसंग की तरह |
रंग से चुरा लिए हैं रंग आज ही,
बिन पिए ही चढ़ गये है भंग की तरह |
रंग की रंगीली नेह डोर थाम के,
उड़ चला है आज मन पतंग की तरह |
अपने-अपने साजना का साथ ही मिले,
अब नहीं दिखे कोई भुजंग की तरह |

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>चौघिड़या ::::—-

>चौघिड़या ::::—–
किसी भी कार्य को शुभ मुहूर्त या समय पर प्रारंभ किया जाए तो परिणाम अपेक्षित आने की संभावना ज्यादा प्रबल होती है। यह शुभ समय चौघड़िया में देखकर प्राप्त किया जाता है। यहां हमने चौघिड़या देखने की सुविधा उपलब्ध कराई है।

से तक रवि सोम मंगल बुध गुरु शुक्र शनि
6:00 AM 7:30 AM उद्बेग अमृत रोग लाभ शुभ चर काल
7:30 AM 9:00 AM चर काल उद्बेग अमृत रोग लाभ शुभ
9:00 AM 10:30 AM लाभ शुभ चर काल उद्बेग अमृत रोग
10:30 AM 12:00 PM अमृत रोग लाभ शुभ चर काल उद्बेग
12:00 PM 1:30 PM काल उद्बेग अमृत रोग लाभ शुभ चर
1:30 PM 3:00 PM शुभ चर काल उद्बेग अमृत रोग लाभ
3:00 PM 4:30 PM रोग लाभ शुभ चर काल उद्बेग अमृत
4:30 PM 6:00 PM उद्बेग अमृत रोग लाभ शुभ चर काल
- शुभ – अमृत – लाभ

से तक रवि सोम मंगल बुध गुरु शुक्र शनि
6:00 PM 7:30 PM शुभ चर काल उद्बेग अमृत रोग लाभ
7:30 PM 9:00 PM अमृत रोग लाभ शुभ चर काल उद्बेग
9:00 PM 10:30 PM चर काल उद्बेग अमृत रोग लाभ शुभ
10:30 PM 12:00 AM रोग लाभ शुभ चर काल उद्बेग अमृत
12:00 AM 1:30 AM काल उद्बेग अमृत रोग लाभ शुभ चर
1:30 AM 3:00 AM लाभ शुभ चर काल उद्बेग अमृत रोग
3:00 AM 4:30 AM उद्बेग अमृत रोग लाभ शुभ चर काल
4:30 AM 6:00 AM शुभ चर काल उद्बेग अमृत रोग लाभ

विशेष-दिन और रात्रि के चौघड़िया का आरंभ क्रमशः सूर्योदय और सूर्यास्त से होता है। प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है। समयानुसार चौघड़िया को तीन भागों में बांटा जाता है शुभ, मध्यम और अशुभ चौघड़िया। इसमें अशुभ चौघड़िया पर कोई नया कार्य शुरु करने से बचना चाहिए।

शुभ चौघडिया शुभ (स्वामी गुरु), अमृत (स्वामी चंद्रमा), लाभ (स्वामी बुध)
मध्यम चौघडिया चर (स्वामी शुक्र)
अशुभ चौघड़िया उद्बेग (स्वामी सूर्य), काल (स्वामी शनि), रोग (स्वामी मंगल)

>आइये जाने नक्षत्रो का स्वभाव ,नक्षत्र भोजन ( क्या खाएं-क्या न खाएं ),क्या दान करें,नए वस्त्र धारण का प्रभाव ,क्या कार्य करें….
नक्षत्र संख्‍या में 27 हैं और एक राशि ढाई नक्षत्र से बनती है। नक्षत्र भी जातक का स्वभाव निर्धारित करते हैं———–

1. अश्विनी : बौद्धिक प्रगल्भता, संचालन शक्ति, चंचलता व चपलता इस जातक की विशेषता होती है।
इस नक्षत्र में वाहन खरीदना,यात्रा,शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से सुख की प्राप्ति और शुभता में वृद्धि होती हे…
इस नक्षत्र में ध्यान रखें- अग्नि, सजावट, श्रंगार, लकड़ी, द्वार, छत ,व्यापार,
दान करें- गुड और बिल्वफल/ बिल्वपत्र ;
इसमें स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्य और स्थिरता वाले कार्यो को प्राथमिकता देवे;
नक्षत्र भोजन- आलू,सीताफल, उड़द ,जो, गुड का मालपुआ,…..
इस नक्षत्र में केसर का सेवन लाभकारी होता हे…….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए-मुली,मोगरी,इलायची,घी,हरे मुंग,कंदमूल,शक्करकंद,
—————————————————————————–
2. भरणी : स्वार्थी वृत्ति, स्वकेंद्रित होना व स्वतंत्र निर्णय लेने में समर्थ न होना इस नक्षत्र के जातकों में दिखाई देता है।
इस नक्षत्र में कुंवा, तालाब खुदवाना, गणित-ज्योतिष कार्य शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से परेशानी में वृद्धि होती हे…
इस नक्षत्र में ध्यान रखें- अग्नि, सजावट, श्रंगार, लकड़ी, द्वार, छत ,व्यापार,
दान करें- नमक का
इसमें स्त्री और मित्र से सम्बंधित कार्यो को प्राथमिकता देवे;
नक्षत्र भोजन- तिल, तिल का तेल, चांवल …..
इस नक्षत्र में इलायची का सेवन लाभकारी होता हे…….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – दही, घी,आंवला, केसर,
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3. कृतिका : अति साहस, आक्रामकता, स्वकेंद्रित, व अहंकारी होना इस नक्षत्र के जातकों का स्वभाव है। इन्हें शस्त्र, अग्नि और वाहन से भय होता है।
इस नक्षत्र में कुंवा, तालाब खुदवाना, गणित-ज्योतिष कार्य,वस्त्र सिलवाना, शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से उस वस्त्र के फटने या दाग लगने की संभावना होती हे…
इस नक्षत्र में ध्यान रखें- पानी, सजावट, श्रंगार, लकड़ी, द्वार, छत ,व्यापार,
दान करें- नमक का,
इसमें खुदाई, बिज रोपण (धान्य बुवाई ),जमीन,मकान(गृह) कार्यो को प्राथमिकता देवे;
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में लहसुन का सेवन लाभकारी होता हे……. दही, खीर, घी,उड़द,मिश्री,
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – निम्बू, खीर, चांवल,तिल, हरी सब्जी,
————————————————————————–
4. रोहिणी : प्रसन्न भाव, कलाप्रियता, मन की स्वच्छता व उच्च अभिरुचि इस नक्षत्र की विशेषता है।
इस नक्षत्र में राज्याभिषेक,मकान बनवाना,प्रथम व्यापार, शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से आर्थिक लाभ की संभावना होती हे…
इस नक्षत्र में ध्यान रखें- पानी, सजावट, श्रंगार, लकड़ी, छत ,अग्नि,
दान करें- तिल का,
इसमें व्यापार और हमेशा स्थिर रहने वाले ( कंट्रोल ) कार्यो को प्राथमिकता देवे;
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में घी, हरे मुंग का सेवन लाभकारी होता हे……सिंघाड़ा,
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – खीर, आलू, आम, सीताफल,
——————————————————————–
5. मृगराशि : बु्द्धिवादी व भोगवादी का समन्वय, तीव्र बुद्धि होने पर भी उसका उपयोग सही स्थान पर न होना इस नक्षत्र की विशेषता है।
इस नक्षत्र में यात्रा, वाहन,वस्त्र और गहने खरीदना,शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से वस्त्र फटने की संभावना होती हे…
इस नक्षत्र में ध्यान रखें- पानी, गृह, सजावट, श्रंगार,
दान करें- तिल का,
इसमें हमेशा स्थिर रहने वाले ( कंट्रोल ) और कल्याणकारी कार्यो को प्राथमिकता देवे;
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में इलायची और कस्तूरी का सेवन लाभकारी होता हे……
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए -करेला, कंदमूल, मुंग की दाल ,शकरकंद,निम्बू, सुगन्धित जल,
——————————————————————————-
6. आर्द्रा : ये जातक गुस्सैल होते हैं। निर्णय लेते समय द्विधा मन:स्थिति होती है, संशयी स्वभाव भी होता है
इस नक्षत्र में मकान बनवाना और राज्याभिषेक शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से स्वास्थ्य कमजोर संभावना होती हे…
इस नक्षत्र में ध्यान रखें- व्यापार, पानी, गृह,गृह,
दान करें- तिल का,गुड का
इसमें हमेशा मित्र और स्त्री सम्बन्धी कार्यो को प्राथमिकता देवे;
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में मक्खन और आम का सेवन लाभकारी होता हे……
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – आंवला,तुरई, सिंघाड़ा, स्वादिष्ट और भरपेट भोजन
—————————————————————————-
7. पुनर्वसु : आदर्शवादी, सहयोग करने वाले व शांत स्वभाव के व्यक्ति होते हैं। आध्‍यात्म में गहरी रुचि होती है।
इस नक्षत्र में मकान बनवाना,यात्रा, वाहन खरीदना,वस्त्र, सम्रद्धि के कार्य शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से धन-धान्य और कार्य में सफलता की संभावना होती हे…
इस नक्षत्र में ध्यान रखें- व्यापार, पानी, गृह,छत ,
दान करें- तिल का,गुड का
इसमें जमीन खरीदना और बिज(धन्य) सम्बन्धी कार्यो को प्राथमिकता देवे;
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में मीठी खीर, घी और कस्तूरी का सेवन लाभकारी होता हे……हरी सब्जी भी,
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – मोगरी, लहसुन, मुली, करेला
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8. अश्लेषा : जिद्‍दी व एक हद तक‍ अविचारी भी होते हैं। सहज विश्वास नहीं करते व ‘आ बैल मुझे मार’ की तर्ज पर स्वयं संकट बुला लेते हैं।
इस नक्षत्र में गणित,ज्योतिष,खुदाई के कार्य-कुंवा-तालाब-बावड़ी जेसे कार्य शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से अचानक बीमारी ( स्वास्थ्य हानी )की संभावना होती हे…
इस नक्षत्र में ध्यान रखें- व्यापार, पानी, गृह,छत ,सजावट, अग्नि, लकड़ी,श्रंगार,
दान करें- नमक और गुड का….
इसमें पूजा,दान,ब्राह्मन,भोजन सम्बन्धी और मित्र सम्बन्धी कार्यो को प्राथमिकता देवे;

नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में केसर,गुड,कमलगट्टा, शक्कर का सेवन लाभकारी होता हे….कंदमूल-शक्करकंद….,
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – सीताफल,मिश्री,आम,सुगन्धित जल
———————————————————————–
9. मघा : स्वाभिमानी, स्वावलंबी, उच्च महत्वाकांक्षी व सहज नेतृत्व के गुण इन जातकों का स्वभाव होता है।
इस नक्षत्र में गणित,ज्योतिष,खुदाई के कार्य-कुंवा-तालाब-बावड़ी जेसे कार्य शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से अचानक बीमारी ( स्वास्थ्य हानी )की संभावना होती हे…
इस नक्षत्र में ध्यान रखें- व्यापार, पानी, द्वार,गृह,छत ,सजावट, अग्नि, लकड़ी,श्रंगार,
दान करें- तिल और गुड का….
इसमें स्त्री और मित्र सम्बन्धी कार्यो को प्राथमिकता देवे;
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में केसर का सेवन लाभकारी होता हे….मुली, मोगरी,
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – आलू, कमलगट्टा,सीताफल,खीर,चांवल,तिल
————————————————————————————–
10. पूर्वा फाल्गुनी : श्रद्धालु, कलाप्रिय, रसिक वृत्ति व शौकीन होते हैं। ।
इस नक्षत्र में गणित,ज्योतिष,खुदाई के कार्य-कुंवा-तालाब-बावड़ी जेसे कार्य शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से अचानक बीमारी ( स्वास्थ्य हानी )की संभावना होती हे…
इस नक्षत्र में ध्यान रखें- व्यापार, पानी, द्वार,गृह,छत ,सजावट, अग्नि, लकड़ी,श्रंगार,
दान करें- तिल,नमक और गुड का….
इसमें स्थिर( कंट्रोल), कल्याणकारक सम्बन्धी कार्यो को प्राथमिकता देवे;
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में आलू,उड़द, इलायची का सेवन लाभकारी होता हे….आंवला
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – सीताफल,आलू,खीर,तिल,खीर..
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11. उत्तरा फल्गुमी :—- ये संतुलित स्वभाव वाले होते हैं। व्यवहारशील व अत्यंत परिश्रमी होते हैं।
इस नक्षत्र में मकान बनवाना,मंदिर निर्माण,राज्याभिषेक जेसे कार्य शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से धन लाभ की संभावना होती हे…
इस नक्षत्र में ध्यान रखें- व्यापार, द्वार,गृह,छत,अग्नि, लकड़ी,श्रंगार,सजावट……
दान करें- नमक का….
इसमें दान, भोजन, पूजा, ब्रह्मण कार्यो को प्राथमिकता देवे; स्त्री और मित्र सम्बन्धी कार्य…….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में आलू,उड़द,लहसुन का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए -खीर, निम्बू, दही, घी, सुगन्धित जल……..
—————————————————————————————
12. चित्रा : लिखने-पढ़ने में रुचि, शौकीन मिजाजी, भिन्न लिंगी व्यक्तियों का आकर्षण इन जातकों में झलकता है।
इस नक्षत्र में यात्रा, खरीददारी–जेसे—मकान, गहने,वाहन,वस्त्र खरीदना जेसे कार्य शुभ हे….
नए वस्त्र धारण शुभ रहता हे……….
ध्यान रखें- द्वार,गृह,छत,लकड़ी,श्रंगार,सजावट……
दान करें- तिल का….
इसमें व्यापर, हमेशा स्थिर कार्यो को प्राथमिकता देवे; व्यापार, जमीं खोदना, बीजारोपण सम्बन्धी कार्य…….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में मिंग की दल, कंदमूल, शक्करकंद…का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – करेला, कस्तूरी, मुली, मोगरी, इलायची………
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.13. स्वा‍ति : समतोल प्रकृति, मन पर नियंत्रण, समाधानी वृत्ति व दुख सहने व पचाने की क्षमता इनका स्वभाव है।
इस नक्षत्र में यात्रा, खरीददारी–जेसे—वाहन,वस्त्र खरीदना जेसे कार्य शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से अर्थ लाभ, और मीठा भोजन प्राप्ति की संभावना हे………….
ध्यान रखें- द्वार,गृह,छत,लकड़ी,श्रंगार,सजावट……
दान करें- तिल का…गुड का…..
इसमें व्यापर, हमेशा स्थिर कार्यो को प्राथमिकता देवे; हेल्दी,कल्याणकारक… सम्बन्धी कार्य…….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में आम,केला, तुरई …का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – हरे मुंग, मक्खन , कंदमूल ,घी,शक्करकंद……………
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14. विशाखा : स्वार्थी, जिद्‍दी, हेकड़ीखोर व्यक्ति होते हैं। हर तरह से अपना काम निकलवाने में माहिर होते हैं।।
इस नक्षत्र में गणित, ज्योतिष, खुदाई कार्य-( कुवां, तालाब, ), हवन ,संग्रह, वस्त्र सम्बन्धी कार्य शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से मन-सम्मान और दबदबा बढ़ने की संभावना हे………….
ध्यान रखें- द्वार,गृह,श्रंगार,सजावट……
दान करें- ..गुड का…..
इस नक्षत्र में दान,पूजा, ब्राह्मन कर्म भोजन जेसे कार्यो को प्राथमिकता देवे; मित्र और स्त्री …सम्बन्धी कार्य…….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में हरी सब्जी , आंवले की सब्जी , करेला …का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – घी,शक्करकंद, दही, मिश्री, कंदमूल, मीठी खीर मिश्रित धान्य ………
—————————————————————————————-
15. अनुराधा : कुटुंबवत्सल, श्रृंगार प्रिय, मधुरवाणी, सन्मार्गी, शौकीन होना इन जातकों का स्वभाव है।
इस नक्षत्र में यात्रा, खरीद दरी सम्बन्धी कार्य जेसे- वाहन,वस्त्र, गहने की …शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से मित्र से मुलाकात की संभावना हे………….
ध्यान रखें- — द्वार,श्रंगार,सजावट…अग्नि……
दान करें- ..नमक का ….
इस नक्षत्र में मित्र और स्त्री …सम्बन्धी कार्यो को प्राथमिकता देवे; ….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में दाख( किशमिश )मिश्रित धान्य, भरपेट स्वादिष्ट भोजन ..का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – मीठी खीर,तिल, चांवल, कमलगट्टा की और हरी सब्जी …………
————————————————————————————————
16. ज्येष्ठा : स्वभाव निर्मल, खुशमिजाज मगर शत्रुता को न भूलने वाले, छिपकर वार करने वाले होते हैं।
इस नक्षत्र में यात्रा, खरीद दरी जेसे- वाहन की …शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से मन विचलित रहने की संभावना हे………….
ध्यान रखें- — द्वार,श्रंगार,सजावट…अग्नि……
दान करें- ..नमक का …गुड का……
इस नक्षत्र में स्थिरता .सम्बन्धी कार्यो को प्राथमिकता देवे; ….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में कंदमूल, शक्करकंद, कद्दू, मिश्री ..का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – मीठी खीर,आम, आलू,सीताफल, कमलगट्टा ………
—————————————————————————————-
17. मूल : प्रारंभिक जीवन कष्टकर, परिवार से दुखी, राजकारण में यश, कलाप्रेमी-कलाकार होते हैं।
इस नक्षत्र में …गणित, ज्योतिष, खुदाई कार्य-कुंवा,तालाब….शुभ हे….
नए वस्त्र धारण से कलह रहने या पानी में डूबने की आशंका हे………….
ध्यान रखें- — द्वार,.अग्नि……
दान करें- ..नमक का …गुड का……तिल का…
इस नक्षत्र में दान,पूजा, भोजन, ब्राहम्ण सम्बन्धी और मित्र व् स्त्री सम्बन्धी कार्यो को प्राथमिकता देवे; ….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में मुली, मोगरी, आलू, सीताफल, .का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – मुंग की दाल, केसर, घी, मीठी खीर, सुगन्धित जल……….
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18. पूर्वाषाढ़ा : शांत, धीमी गति वाले, समाधानी व ऐश्वर्य प्रिय व्यक्ति इस नक्षत्र में जन्म लेते हैं।
इस नक्षत्र में …गणित, ज्योतिष, खुदाई कार्य-कुंवा,तालाब….शुभ हे….शीघ्र लाभ
नए वस्त्र धारण से अचानक बीमारी/ रोग की आशंका हे………….
ध्यान रखें- —अग्नि……
दान करें- ..नमक का …गुड का……तिल का…
इस नक्षत्र में जमीं खुदाई, गृह, कल्याण करक.. कार्यो को प्राथमिकता देवे; ….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में निम्बू, आंवला, मिश्री….तिल, चांवल…का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – सिंघाड़ा, इलायची, मक्खन, भरपेट स्वादिष्ट भोजन ………
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19 -. उत्तराषाढ़ा : विनयशील, बुद्धिमान, आध्यात्म में रूचि वाले होते हैं। सबको साथ लेकर चलते हैं।
इस नक्षत्र में …मंदिर, मकान, बनाना ..शुभ हे…राज्याभिषेक और सर्प कार्य से .शीघ्र लाभ
नए वस्त्र धारण से मीठा भोजन प्राप्ति की संभावना हे……………
ध्यान रखें- —पानी, राजपाट, श्रंगार का……
दान करें- ……तिल का…
इस नक्षत्र में स्थिर ( कंट्रोल), जमीन खुदाई और व्यापारिक कार्यो को प्राथमिकता देवे; ….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में निम्बू, मिश्री..बिल्वपत्र ..घी, दहीं, खीर …का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – करेला, इलायची, कस्तूरी, लहसुन ……
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20. श्रवण : सन्मार्गी, श्रद्धालु, परोपकारी, कतृत्ववान होना इन जातकों का स्वभाव है।
इस नक्षत्र में …मकान बनाना ..शुभ हे…विजय, राज्याभिषेक और शत्रु नाशक कार्य से .शीघ्र लाभ
नए वस्त्र धारण से नेत्र रोग की संभावना हे……………
ध्यान रखें- —पानी,श्रंगार, सजावट, लकड़ी का……
दान करें- ……तिल का…नमक का…
इस नक्षत्र में स्थिर ( कंट्रोल), कल्याण कारक कार्यो को प्राथमिकता देवे; ….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में दूध, खीर, खांड, घी, हरे मुंग .का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – सिंघाड़ा, शक्करकंद, कंदमूल,दहीं …….
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21. धनिष्ठा : गुस्सैल, कटुभाषी व असंयमी होते हैं। हर वक्त अहंकार आड़े आता है।
इस नक्षत्र में …मकान बनाना ..शुभ हे..राज्याभिषेक से .शीघ्र लाभ
नए वस्त्र धारण से आर्थिक लाभ की संभावना हे……………
ध्यान रखें- —पानी,श्रंगार, सजावट, लकड़ी , द्वार,का……
दान करें- ……नमक का…
इस नक्षत्र मेंदान, भोजन, पूजा ब्रह्मण कार्य और मित्र तथ स्त्री सम्बन्धी कार्यो को प्राथमिकता देवे; ….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में कस्तूरी, इलायची, मुंग, चांवल. करेला, कंदमूल, शक्करकंद का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – हरी सब्जी, मुंग की दल, खीर ….
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22. शतभिषा :- रसिक मिजाज, व्यसनाधीनता व कामवासना की ओर अधिक झुकाव होता है। समयानुसार आचरण नहीं करते।
इस नक्षत्र में …मकान बनाना ..शुभ हे..राज्याभिषेक से .शीघ्र लाभ
नए वस्त्र धारण से अशुभ सूचना की आशंका/संभावना हे……………
ध्यान रखें- —पानी,श्रंगार, सजावट, लकड़ी , द्वार,का……
दान करें- ……नमक का..तिल का…..
इस नक्षत्र में जमीं खरीदना, गृह/ कल्याण करक कार्य और धान्य( बीजारोपण ) सम्बन्धी कार्यो को प्राथमिकता देवे; ….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में मक्खन और तुरई , तुम्बे के बीज का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – आम, खीर …
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23. पूर्व भाद्रपद : बुद्धिमान, जोड़-तोड़ में निपुण, संशोधक वृत्ति, समय के साथ चलने में कुशल होते हैं।
इस नक्षत्र में …ज्योतिष, गणित, खुदाई कार्य- तालाब, कुंवा से शीघ्र लाभ
नए वस्त्र धारण से अशुभ सूचना की आशंका/संभावना हे…जल स्रोत से खतरा— तालाब, कुंवा, नदी, …………
ध्यान रखें- —व्यापर, द्वार, लकड़ी, ……
दान करें- ……नमक का….
इस नक्षत्र में पूजा पाठ, गृह निर्माण / विकास, स्थिर और कल्याणकारी कार्य को प्राथमिकता देवे; ….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में दही, करेला, का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – हरी सब्जी, मुंग की दाल, नींबू, ..घी, मीठी खीर ,
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24. उत्तरा भाद्रपद : मोहक चेहरा, बातचीत में कुशल, चंचल व दूसरों को प्रभावित करने की शक्ति रखते हैं।
इस नक्षत्र में …मकान, मंदिर निर्माण, राज्याभिषेक, स्थिर और सर्वकार्य से लाभ
नए वस्त्र धारण से पुत्र लाभ …..
ध्यान रखें- —व्यापर, द्वार, लकड़ी, ……
दान करें- ……नमक का….
इस नक्षत्र में पूजा पाठ, दान, भोजन ,ब्रह्मण कर्म. स्त्री और मित्र सम्बन्धी कार्य को प्राथमिकता देवे; ….कपूर का प्रयोग करें….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में खीर, उड़द का बड़ा, स्वादिष्ट भरपेट भोजन का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – आंवला, सिंघाड़ा, मक्खन, मिश्रित धान्य , ..
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25. रेवती : सत्यवादी, निरपेक्ष, विवेकवान होते हैं। सतत जन कल्याण करने का ध्यास इनमें होता है
इस नक्षत्र में …यात्रा, वाहन खरीद दरी से लाभ
नए वस्त्र धारण से अचानक धन / अर्थ लाभ …
ध्यान रखें- —व्यापार, द्वार, लकड़ी, ……
दान करें- ……गुड का….
इस नक्षत्र में व्यापर, स्थिर कार्य , जमीन खुदाई और बीज रोपण सम्बन्धी कार्य को प्राथमिकता देवे; ….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में दही, कमलगट्टा और सुगन्धित जल का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – मुली, मोगरी, इलायची, लहसुन, कंदमूल, शक्करकंद, कस्तूरी…
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26 –. हस्त : कल्पनाशील, संवेदनशील, सुखी, समाधानी व सन्मार्गी व्यक्ति इस नक्षत्र में जन्म लेते हैं।
इस नक्षत्र में …यात्रा, वाहन खरीद दरी से लाभ , मकान बनवाना, वस्त्र और सम्रद्धि के कार्य
नए वस्त्र धारण से …कार्य में सफलता प्राप्त होती हे….
ध्यान रखें- —अग्नि. द्वार., सजावट,..श्रंगार……..
दान करें- ……गुड का….नमक का….
इस नक्षत्र में ——व्यापर, स्थिर कार्य , जमीन खुदाई और बीज रोपण सम्बन्धी कार्य को प्राथमिकता देवे; ….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में घी , हरे मुंग का, सिंघाड़ा का सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – आंवला, मक्खन, खीर, भरपेट स्वादिष्ट भोजन…..
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27. पुष्य : सन्मर्गी, दानप्रिय, बुद्धिमान व दानी होते हैं। समाज में पहचान बनाते हैं।
इस नक्षत्र में …मकान बनवाना, वस्त्र और गहने बनवाना, राज्याभिषेक करवाना..जेसे कार्य करवाना और सम्रद्धि के कार्य करवाना चाहिए…
नए वस्त्र धारण से …इच्छाओ की पूर्ति और ..अर्थ लाभ की प्राप्ति होती हे…..
ध्यान रखें- —जल, द्वार., व्यापर, लकड़ी, चोखट, छत …
दान करें- ……..नमक का….
इस नक्षत्र में ——व्यापर, स्थिर कार्य , कल्याण कारक कार्यो को प्राथमिकता देवे; ….
नक्षत्र भोजन- इस नक्षत्र में खीर, दूध ,मिश्र धन्य का भोजन / सेवन लाभकारी होता हे….
इस नक्षत्र में निम्न वस्तु नहीं खानी चाहिए – भरपेट स्वादिष्ट भोजन.., इलायची, कंदमूल, शक्करकंद, तुरई, …

>सम्माननीय,आदरणीय,विद्वतजन,सुधीजन,ज्ञानी,बहुपठ,बहुश्रुत मेरे समस्त मित्रो एवं सखियो-आप सब से मेरा करबद्ध,विनम्र निवेदन है कि मेरे अनुरोध- आग्रह- विनती को गंभीरता से लेते हुए/ समझकर भविष्य में मुझे निशुल्क ज्योतिष/हस्तरेख/वास्तु-परामर्श/ मार्गदर्शन हेतु बाध्य नहीं करेंगे…आप सभी मेरे लिए बेश कीमती हे..हमारी दोस्ती/मित्रता हमेशा बनी रहे यही विनती हे
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आप मेरे अनुरोध को स्वीकारेंगे.
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विषय—-
(A)-SHIKSHA एवं रोजगार,
(B)- विवाहिक समस्याएं,
(C)- KUNDALI OR वास्तु,
(D)- संतान प्रकरण,…
(E)–वास्तु और SVASTHYA …
(F)–मंगल दोष / योग और परिहार/ उपाय
(G)– हस्तरेखा द्वारा उक्त VISHAYON पर लेख;;
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>लाल किताब का प्रभाव यानि सिद्धांतों में घालमेल—रत्न/स्टोन/जेम्स के बारे/सम्बन्ध में —–

लाल किताब प्राचीन नहीं है, जैसा कि लाल किताब के बहुत से विज्ञापनों में लिखा गया होता है’असली प्राचीन लाल किताब।’ बल्कि यह मध्‍ययुगीन है। मेरी जानकारी के अनुसार यवनों के भारत में प्रवेश के बाद भारत और पाकिस्‍तान के पंजाब वाले क्षेत्रों में इस ज्‍योतिष का तेजी से विकास हुआ। अनुमान लगा सकता हूं कि कोई छोटा ग्रुप रहा होगा, जिन्‍होंने मिलकर परम्‍परागत भारतीय ज्‍योतिष में शाबरी मंत्रों जैसे प्रयोग किए और ऐसे लोकरंजन के उपाय निकाल लिए जो अपनाने में आसान और कारगर हों।
लाल किताब के प्राचीन नहीं होने से इसकी महत्‍ता कम नहीं हो जाती। वर्तमान दौर में उपायों के लिए अगर कोई पुस्‍तक मदद करती है तो वह है लाल किताब, इसके अलावा पटियाला और चंडीगढ़ के कुछ लोगों ने, अगर सही कहूं तो एक युवा ज्‍योतिषी ने सुनहरी किताब भी प्रकाशित की। वह युवा बहुत कम उम्र में ही दुनिया छोड़ गया लेकिन जो सुनहरी किताब लिखकर गया है, वह लाल किताब को भी पीछे छोड़ती है,
लेकिन अभी बात उपचारों की
आप किसी भी पुराने ग्रंथ को उठाकर देख लीजिए। उसमें ग्रहों की गड़बड़ पर शांति के उपचार बताए गए हैं। दान, भेंट, पूजा, यज्ञ अथवा मंत्रोच्‍चार से समस्‍याओं का समाधान पाया जा सकता है। फौरी तौर पर चंद्र राशियों के आधार पर ग्रहों के रत्‍नों की जानकारी भी कहीं-कहीं मिल जाती है, लेकिन वह भी ग्रह शांति उपचारों से ही संबंधित है।
उपचारों का बिंदू आने के साथ ही मेरे दिमाग में सबसे पहले लाल किताब आती है। इसके दो कारण हैं। पहला कि इस किताब में उपचारों की इतनी लम्‍बी रेंज दी गई है कि एक उपचार नहीं कर सको तो दूसरा कर लो, दूसरा नहीं तो तीसरा, इसी तर्ज पर लिखी गई सुनहरी किताब तो उपचारों की पूरी लिस्‍ट ही थमा देती है। अपनी इच्‍छा के अनुसार उपचार चुनो और कर लो। दूसरा कारण है कि मेरे गुरूजी ने मुझे बताया कि लाल किताब के उपचार तांत्रिक विधियों पर आधारित है। जातक जैनुइन है तो उसे लाल किताब का ही उपचार बताओ, जातक की जितनी अधिक आस्‍था होगी, उपचार उतनी ही तेजी से काम करेगा।
वर्तमान दौर में लोगों को प्रसव पीड़ा भोगने की बजाय लोगों को सिजेरियन ऑपरेशन अधिक सहज लगता है। इसलिए उन्‍हें वही दो, जो वे मांगते हैं। यह बात मुझे शुरूआती दौर में ही महसूस होने लगी थी। किसी को कोई उपचार बताओ और कहो कि पांच साल बाद सब‍कुछ दुरुस्‍त हो जाएगा तो, या तो वह ज्‍योतिषी को दिमागी रूप से दिवालिया समझेगा, वरना अपनी समस्‍याओं की लिस्‍ट बताकर तात्‍कालिक स्थितियों से तत्‍काल छुटकारा दिलाने की गुहार लगाएगा।
रत्‍नों की सीरीज में यह लाल किताब कहां घुस गई
हां, अभी तो रत्‍नों पर लगातार लिख रहा हूं, इस बीच यह लाल किताब कहां से घुस आई। जैसा कि मैंने अपने पुराने लेखों में लिखा है ज्‍योतिष की एक विधा में दूसरी विधा का घालमेल इतनी आसानी से होता है कि दोनों विधाओं के लिंक मिले जुले नजर आने लगते हैं। रत्‍नों से उपचार में एक ओर जहां हस्‍तरेखा शास्‍त्र घुसा हुआ है वहीं दूसरी ओर लाल किताब भी घुस चुकी है।लाल किताब का सूत्र है कि जो ग्रह किसी स्‍थान पर बैठकर खराब फल दे रहा हो उसे वहां से हटाकर दूसरी जगह पहुंचा दो। यह इतना आसान है, गुरू जैसे बड़े ग्रह को बिना उसके बारह चंद्रमा को छेड़े उठाकर एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर पहुंचा दिया जाता है। यह ऐसे ही नहीं हो जाता है। इसके लिए कुछ नियम हैं। उसकी बात बाद में…

लाल किताब के अनुसार जिस ग्रह से संबंधित वस्‍तुओं को
- प्रथम भाव में पहुंचाना हो उसे गले में पहनिए
- दूसरे भाव में पहुंचाने के लिए मंदिर में रखिए
- तीसरे भाव में पहुंचाने के लिए संबंधित वस्‍तु को हाथ में धारण करें
- चौथे भाव में पहुंचाने के लिए पानी में बहाएं
- पांचवे भाव के लिए स्‍कूल में पहुंचाएं,
- छठे भाव में पहुंचाने के लिए कुएं में डालें
- सातवें भाव के लिए धरती में दबाएं
- आठवें भाव के लिए श्‍मशान में दबाएं
- नौंवे भाव के लिए मंदिर में दें
- दसवें भाव के लिए पिता या सरकारी भवन को दें
- ग्‍यारहवें भाव का उपाय नहीं
और बारहवें भाव के लिए ग्रह से संबंधित चीजें छत पर रखें।
हां, तो यह हुआ लाल किताब का हिसाब किताब।
अब बात मेरे एक अनुभव की। मैं एक जातक को परम्‍परागत पंडितजी के पास लेकर गया। उन्‍हें कुण्‍डली दिखाई। जातक कन्‍या लग्‍न का था। पंडितजी ने कहा चंद्रमा खराब है, इसे मोती पहनाना पड़ेगा। मैंने कहा ठीक है मैं अंगूठी बनवाने के लिए बोल देता हूं, तो पंडितजी ने मना कर दिया। कहां कि कन्‍या लग्‍न के जातक को लॉकेट में ही चंद्रमा बनवाकर पहनना होगा। क्‍यों… पंडितजी से पूछा नहीं…
मैं बताता हूं इसका कारण
लाल किताब के अनुसार चंद्रमा की अंगूठी बनाकर पहनने से चंद्रमा चला जाएगा तीसरे घर में, यानि वृश्चिक राशि में, इससे चंद्रमा नीच का हो जाएगा। अब एक तरफ लाल किताब राशियों को मानती ही नहीं है। वह हर कुण्‍डली को मेष लग्‍न की कुण्‍डली मानती है और हर घर को तयशुदा राशियां दे रखी हैं। ऐसे में परम्‍परागत ज्‍योतिष और लाल किताब का घालमेल रत्‍न को पहनने में एक और बाधा बन गया। परम्‍परागत ज्‍योतिष ने तो बस इतना कहा कि चंद्रमा के उपचार के लिए मोती पहनाना चाहिए, लेकिन लाल किताब बता रही है कि हाथ में नहीं गले में पहनो…
अब जिन लोगों ने मेरे पिछले लेख पढ़े हैं वे समझ रहे होंगे कि रत्‍न केवल टच करने या किरणों से ही उपचार नहीं करते बल्कि कैसे पहने हैं इससे भी फर्क पड़ता है। तो इस तरह किसी एक रत्‍न को पहनने के लिए मेरे पास तीन अलग-अलग आधार हो गए, जो कभी भी किसी भी स्थिति में एक-दूसरे का निषेध कर सकते हैं। कब और कैसे करेंगे यह तय नहीं है।

>मैं तो किसी को भी अंगूठी पहना सकता हूं..?????
यह मेरा ख्‍याल नहीं है, बल्कि रत्‍न का व्‍यवसाय करने वाले एक व्‍यवसायी का अनुमान है। कुछ दिन पहले जयपुर के एक रत्‍न व्‍यवसायी का फोन आया। उसने मेरी पोस्ट पढ़ा, गंजे सर और साफे/ पगड़ी वाली फोटू देखी और मुझे ऊंचे स्‍तर का बाबाजी समझकर फोन ठोंक दिया। मेरी जिस फोटो ने पूरे जगत में सनसनी फैला रखी है, उसी फोटू के चक्‍कर में ये व्‍यवसायी महोदय भी आ गए।
काश, उन्‍हें पता होता कि मेरे मुंडाए हुए सिर के पीछे चोटी नहीं है।
खैर, मामला यह है कि रत्‍न व्‍यवसायी ने फोन किया और मेरा हालचाल पूछने के बाद मुझसे कहा कि मैं अपने क्‍लाइंट्स को जैम स्‍टोन कहां से दिलाता हूं। प्रश्‍न मेरे लिए नया था। अब तक तो मैंने इस बारे में कोई पंचायती नहीं की है, मेरा यह जवाब था। इस पर व्‍यवसायी ? महोदय ने मुझे अवगत कराया कि कुण्‍डली देखने से अधिक कमाई नहीं हो सकती जितनी कि जैम स्‍टोन के बिजनेस से हो सकती है। मुझे बताया गया कि मैं अपने तकरीबन हर ग्राहक को कोई न कोई जैम स्‍टोन पहना सकता हूं। चाहे उसे उसकी तात्‍कालिक जरूरत हो या न हो। यह सामान्‍य बात है लेकिन एक बिजनेसमैन मुझे ज्‍योतिष का धंधा सिखा रहा था। कुछ साल पहले मिला होता तो मैं निश्‍चय ही बड़ा हर्षित होता….
मेने उन महाशय को साफ मना कर दिया..में किसी भी जातक को रत्न/स्टोन/ जेम्स अनावश्यक / जबरजस्ती नहीं पहना सकता हु जी. मेरा फायदा मेरे पास/ यहाँ आने वाले के लाभ/फायदे में हे न की खुद के फायदे/ लाभ में..मेने ठीक किया था न..????? आप क्या कहते हे..??? मेरा मार्गदर्शन करे…..
मेरे इस जवाब से व्‍यवसायी महोदय निराश हो गए। कहां रत्‍नों वाले बाबाजी को टटोल रहे थे, बाकी की बात बेमन से खत्‍म कर उन्‍होंने फोन रख दिया, हां जल्‍द ही झालरापाटन आकर मिलने का वादा भी किया, लेकिन दो महीने से अधिक समय हो गया, न वे आए न उनका वापस फोन आया।

>रत्‍न : कब, कौनसा और कैसे पहनें—मोती और पुखराज तो किसी को भी पहना दो… चलेगा…सबल ग्रह का रत्‍न धारण करें या निर्बल ग्रह का?
रत्‍न : कब, कौनसा और कैसे पहनें—–
आमतौर पर ज्‍योतिष और ज्‍योतिष से जुड़ी किसी भी विधा को विज्ञान का दर्जा दे दिया जाता है। लेकिन रत्‍न विज्ञान को इस तर्ज पर विज्ञान का दर्जा नहीं मिला है। जैमोलॉजी वास्‍तव में एक विज्ञान है और इस पर अच्‍छा खासा काम हो रहा है। यह बात अलग है कि कीमती पत्‍थरों ने अपना यह स्‍थान खुद बनाया है। ठीक सोने, चांदी और प्‍लेटिनम की तरह। इसमें ज्‍योतिष का कोई रोल नहीं है।
पर यकीन मानिए भाग्‍य के साथ रत्‍नों का जुड़ाव मोहनजोदड़ो सभ्‍यता के दौरान भी रहा है। उस जमाने में भी भारी संख्‍या में गोमेद रत्‍न प्राप्‍त हुए हैं। यह सामान्‍य अवस्‍था में पाया जाने वाला रत्‍न नहीं है, इसके बावजूद इसकी उत्‍तरी पश्चिमी भारत में उपस्थिति पुरातत्‍ववेत्‍ताओं के लिए भी आश्‍चर्य का विषय रही। पता नहीं उस दौर में इतने अधिक लोगों ने गोमेद धारण करने में रुचि क्‍यों दिखाई, या गोमेद का रत्‍न के रूप में धारण करने के अतिरिक्‍त भी कोई उपयोग होता था, यह स्‍पष्‍ट नहीं है, लेकिन वर्तमान में राहू की दशा भोग रहे जातक को राहत दिलाने के लिए गोमेद पहनाया जाता है।
इंटरनेट और किताबों में रत्‍नों के बारे में विशद जानकारी देने वालों की कमी नहीं है। इसके इतर मेरी पोस्‍ट इसकी वास्‍तविक आवश्‍यकता के बारे में है। मैं एक ज्‍योतिष विद्यार्थी होने के नाते रत्‍नों को पहनने का महत्‍व बताने नहीं बल्कि इनकी वास्‍तविक आवश्‍यकता बताने का प्रयास करूंगा।
दो विधाओं में उलझा रत्‍न विज्ञान
वर्तमान दौर में हस्‍तरेखा और परम्‍परागत ज्‍योतिष एक-दूसरे में इस तरह घुलमिल गए हैं कि कई बार एक विषय दूसरे में घुसपैठ करता नजर आता है। रत्‍नों के बारे में तो यह बात और भी अधिक शिद्दत से महसूस होती है। हस्‍तरेखा पद्धति ने हाथ की सभी अंगुलियों के हथेली से जुड़े भागों पर ग्रहों का स्‍वामित्‍व दर्शाया है। ऐसे में कुण्‍डली देखकर रत्‍न पहनने की सलाह देने वाले लोग भी हस्‍तरेखा की इन बातों को फॉलो करते दिखाई देते हैं। जैसे बुध के लिए बताया गया पन्‍ना हाथ की सबसे छोटी अंगुली में पहनने, गुरु के लिए पुखराज तर्जनी में पहनने और शनि मुद्रिका सबसे बड़ी अंगुली में पहनने की सलाहें दी जाती हैं। बाकी ग्रहों के लिए अनामिका तो है ही, क्‍योंकि यह सबसे शुद्ध है। मुझे इस शुद्धि का स्‍पष्‍ट आधार नहीं पता लेकिन शुक्र का हीरा, मंगल का मूंगा, चंद्रमा का मोती जैसे रत्‍न इसी अंगुली में पहनने की सलाह दी जाती है।
शरीर से टच तो हुआ ही नहीं
शुरूआती दौर में जब मुझे ज्‍योतिष की टांग-पूछ भी पता नहीं थी, तब मैं एक पंडितजी के पास जाया करता था। वहां एक जातक को लेकर गया, उन्‍होंने मोती पहनने की सलाह दी। मैंने जातक के साथ गया और मोती की अंगूठी बनवाकर पहना दी। कई सप्‍ताह गुजर गए। कोई फर्क महसूस नहीं हुआ तो जातक महोदय मेरे पास आए और मुझे लेकर फिर से पंडितजी के पास पहुंचे। पंडितजी ने कहा दिखाओ कहां है अंगूठी। दिखाई तो वे खिलखिलाकर हंस दिए। बोले यह तो शरीर के टच ही नहीं हो रही है तो इसका असर कैसे पड़ेगा। मैंने पूछा तो टच कैसे होगी। तो उन्‍होंने बताया कि बैठकी मोती खरीदो और फलां दुकान से बनवा लो। हम दौड़े-दौड़े गए और बैठकी मोती लेकर बताई गई दुकान पर पहुंच गए। हमने बताया कि टच होने वाली अंगूठी बनानी है। दुकानदार समझ गया कि पंडित जी ने भेजा है। उसने कहा कल ले जाना। और अगले दिन अंगूठी बना दी। वह इस तरह थी कि नीचे का हिस्‍सा खाली था। इससे मोती अंगुली को छूता था। कुछ ही दिनों में मोती पहनाने का असर भी हो गया। मेरे मन में भक्ति भाव जाग गया, और एक बात हमेशा के लिए सीख गया कि जो भी रत्‍न पहनाओ उसे शरीर के टच कराना जरूरी है।
टच से क्‍या होता है किरणें महत्‍वपूर्ण हैं
अंग्रेजी में इसे पैराडाइम शिफ्ट कहते हैं और हिन्‍दी में मैं कहूंगा दृष्टिकोणीय झटका। एक दूसरे हस्‍तरेखाविज्ञ कई साल बाद मुझसे मिले। मैं किसी को उपचार बता रहा था और साथ में शरीर से टच होने वाली नसीहत भी पेल रहा था, कि हस्‍तरेखाविज्ञ ने टोका कि टच होने से क्‍या होता है, यह कोई आयुर्वेदिक दवा थोड़े ही है। रत्‍नों के जरिए तो किरणों से उपचार होता है। मैंने स्‍पष्‍ट कह दिया समझा नहीं तो उन्‍होंने समझाया कि हम जो रत्‍न पहनते हैं वे ब्रह्माण्‍ड की निश्‍चित किरणों को खींचकर हमारे शरीर की कमी की पूर्ति करते हैं। इससे हमारे कष्‍ट दूर हो जाते हैं। विज्ञान का ठोठा स्‍टूडेंट होने के बावजूद मुझे पता था कि हम जो रंग देखते हैं वास्‍तव में वह उस पदार्थ द्वारा रिफलेक्‍ट किया गया रंग होता है। यानि स्‍पेक्‍ट्रम के एक रंग को छोड़कर बाकी सभी रंग वह पदार्थ निगल लेता है, जो रंग बचता है वही हमें दिखाई देता है। ऐसा ही कुछ रत्‍नों के साथ भी होता होगा। यह सोचकर मुझे उनकी बात में दम लगा।
अब मैं तो कंफ्यूजन में हूं कि वास्‍तव में टच करने से असर होगा या किरणों से असर होगा। वास्‍तव में रत्‍नों की जरूरत है भी कि नहीं, रत्‍नों का विकल्‍प क्‍या हो सकता है, रत्‍न किसे पहनाना आवश्‍यक है, इन सब बातों को लेकर कालान्‍तर में मैंने कुछ तय नियम बना लिए… अब ये कितने सही है कितने गलत यह तो नहीं बता सकता, लेकिन इससे जातक को धोखे में रखने की स्थिति से बच जाता हूं।
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मोती और पुखराज तो किसी को भी पहना दो चलेगा, दोनों ही निर्मल और शुद्ध ग्रह हैं। नुकसान तो करेंगे नहीं। यह ज्ञान दिया मेरे एक साथी ज्‍योतिषी ने। वह मोती तो हर किसी को पहना देता है। कहता है मन का कारक है, मोती पहनेगा तो मानसिकता मजबूत होगी। नहीं भी होगी तो नुकसान नहीं करेगा। सामान्‍य बात है, समझ में भी आ गई।
वास्‍तव में जैम स्‍टोन से किस ग्रह का उपचार कैसे किया जाए इस बारे में कई तरह के मत हैं। कोई ग्रह के कमजोर होने पर रत्‍न पहनाने की सलाह देता है तो कोई केवल कारक ग्रह अथवा लग्‍नेश संबंधी ग्रह का रत्‍न पहनने की सलाह देता है। ऐसे में किसे क्‍या पहनाया जाए, यह बताना टेढ़ी खीर है। यहां के.एस. कृष्‍णामूर्ति को कोट करूं तो स्‍पष्‍ट है कि लग्‍नेश या नवमेश अथवा इनसे जुड़े ग्रहों का ही उपचार किया जा सकता है। ऐसे में कई दूसरे ग्रह जो फौरी तौर पर कुण्‍डली में बहुत स्‍ट्रांग पोजिशन में दिखाई भी दें तो उनसे संबंधित उपचार नहीं कराए जा सकते।
मैं उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूं। तुला लग्‍न के जातक की कुण्‍डली में लग्‍न का अधिपति हुआ शुक्र, कारक ग्रह हुआ शनि और नवमेश हुआ बुध। अब कृष्‍णामूर्ति के अनुसार जब तक शनि का संबंध शुक्र या बुध से न हो तो उससे संबंधित उपचार नहीं किए जा सकते, यानि उपचार प्रभावी नहीं होगा, लेकिन परम्‍परागत ज्‍योतिष के अनुसार तुला लग्‍न के जातक को शनि संबंधी रत्‍न प्रमुखता से पहनाया जा सकता है। यहां गाड़ी अटक जाती है।
बिना ठोस वजह के मूंगा और नीलम पहनाने से हुए नुकसानों के हजारों उदाहरण हैं। नीलम के संबंध में कई कहानियां आपने भी सुनी होगी, लेकिन मूंगे और हीरे को लेकर मेरे पास भी दो कहानियां हैं। दोनों ही मेरे अपने अनुभव हैं। हमारे एक जानकार का तबादला बीकानेर से बाहर हो गया। उन्‍होंने सालभर तक कोशिश की और तकरीबन हर ज्‍योतिषी को दिखा दिया। कई ज्‍योतिषियों ने लग्‍नेश होने के कारण उन सज्‍जन को मूंगा पहनने की सलाह दे डाली। जातक ने सोने की अंगूठी में सवा छह रत्‍ती का मूंगा बनवाकर पहन भी लिया। कुछ ही दिनों में उनका गुस्‍सा परवान चढ़ने लगा। जब वे मेरे पास आए तब उनकी कुण्‍डली में राहू में मंगल का ही अंतर चल रहा था। चंद्रमा इतना कमजोर था कि मैंने कार्ड खेल दिया, मैंने पूछा आप आत्‍महत्‍या का प्रयास तो नहीं कर चुके हैं। जातक ढेर हो गया, उसने कहा दो बार पंखे में रस्‍सी डाल चुका हूं लेकिन परिवार का चेहरा सामने आ गया सो, इरादा टाल दिया। मैंने कहा यह मूंगे के कारण हो रहा है। आप इसे अभी खोल दीजिए। उन्‍होंने मेरी बात मान ली और मूंगा तुरंत उतार दिया। फिर मैंने उन्‍हें राहू के उपचार बताए और तबादला वापस बीकानेर होने की तिथि बता दी। करीब तीन महीने बाद उनका तबादला वापस बीकानेर हो गया। रास्‍ते में मुझे मिले तो बड़े खुश नजर आ रहे थे। उनकी पत्‍नी साथ थीं, उनकी पत्‍नी ने मुझे देखते ही धन्‍यवाद दिया और बताया कि जिन दिनों में मूंगा पहन रखा था, उन दिनों छोटी-छोटी बात पर जोरदार तैश में आ जाते। अपने बच्‍चों को टीन एजर होने से पहले तक भी हाथ नहीं लगाया उनकी भी पिटाई कर देते थे। अब सहज हो गए हैं।
एक दूसरी घटना शुक्र से जुड़ी है। लाल किताब बताती है कि हम किसी ग्रह से संबंधित वस्‍तु हाथ में धारण करते हैं तो वह ग्रह कुण्‍डली के तीसरे भाव का फल देने लगता है। इसे मैंने चैक किया मेरे एक मित्र पर। मैंने उसे बता दिया था कि यह एक प्रयोग ही है, क्‍योंकि इस बारे में मैं अधिक नहीं जानता। उसे शुक्र के हीरे के रूप में अमरीकन डायमंड की अंगूठी पहनाई। उसका गुरु पहले से ही नौंवे भाव में था। अब अंगूठी पहनाने के बाद लाल किताब के अनुसार शुक्र और गुरू आमने-सामने हो गए थे। यानि एक दूसरे पर पूर्ण दृष्टि देने वाले। मेरा कुंवारा दोस्‍त पड़ोसन के चक्‍कर में पड़ गया। जो लड़का कभी लड़कियों की तरफ आंख उठाकर नहीं देखता था, वह इतनी लंपटता करने लगा कि एक दिन जब मैं उसके घर गया तो उसने पड़ोसन को दिखाकर उससे अपने संबंध बताए। मैंने उसे हीरा खोल देने की सलाह दी, लेकिन वह अपनी नई स्थिति से खुश था, सो हीरा नहीं खोला। मेरा ख्‍याल है बाद में उसी रत्‍न के चलते उसने सरकारी नौकरी की आस छोड़कर प्राइवेट कंपनी में एप्‍लाई किया और नौकरी लग गया। बाद में कुछ साल बाहर भी रहा। इन दिनों निजी कंपनी में मैनेजर के पद पर पहुंच चुका है। मैला-कुचैला रहने वाला मेरा दोस्‍त अब टिप-टॉप रहता है और शुक्र के जातक की तरह व्‍यवहार करता है। अब उसे देखता हूं तो लगता है कि उसकी स्थिति तो ठीक हो गई लेकिन वह अपने मूल स्‍वरूप में नहीं रहा।
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एक उदाहरण की कुण्‍डली लेते हैं। मान लीजिए एक तुला लग्‍न की कुण्‍डली है। उसमें शुक्र लग्‍न का अधिपति हुआ। एक केन्‍द्र और एक त्रिकोण का अधिपति होने के कारण शनि इस कुण्‍डली में कारक ग्रह है। नवम भाव का अधिपति होने के कारण बुध का उपचार भी किया जा सकता है। अब कृष्‍णामूर्ति की माने तो इस कुण्‍डली के शुक्र, शनि और बुध ग्रह का ही इलाज किया जा सकता है। अब इस कुण्‍डली में अगर गुरू, सूर्य या मंगल खराब स्थिति में है तो उनके इलाज की जरूरत ही नहीं है। एक व्‍यक्ति राजमहल में रह रहा हो तो उसे ज्ञान, आधिपत्‍य, और ताकत स्‍वत: मिलती है, और अगर न भी मिले तो उसके लिए प्रयास करने की जरूरत भी नहीं है। ऐसा जातक अगर ज्‍योतिषी से यह मांग करे कि उसे अपने आधिपत्‍य, ताकत और ज्ञान में बढ़ोतरी की जरूरत है तो मान लीजिए कि वह केवल किसी लालसा की वजह से कुछ समय के लिए भटककर यह सवाल कर रहा है। वास्‍तव में उसे जो चाहिए वह ऐश्‍वर्य, विरासत, कंफर्ट, कम्‍युनिकेशन स्किल और अपनी चाही गई चीजों के लिए ईज ऑफ एक्‍सस की जरूरत है। यानि वह अपनी जरूरतों के लिए लम्‍बी लड़ाई लड़ने के लिए भी तैयार नहीं है। अगर वह जातक किसी साधन या व्‍यवस्‍था को पाने का प्रयास कर रहा है या रही है तो यह कुछ समय की बात हो सकती है दीर्घकालीन जरूरत नहीं। ऐसे में तुला लग्‍न में बैठे नीच के सूर्य को ताकतवर बनाने के लिए माणिक्‍य भी पहना दिया तो फायदा करने के बजाय नुकसान अधिक करेगा।
यही बात अन्‍य लग्‍नों के लिए भी लागू होती है। तो जातक का इलाज करते समय यह ध्‍यान रखने वाली बात है कि वास्‍तव में जातक का मूल स्‍वभाव क्‍या है। उसे अपनी मूल स्थिति में लौटाने से अधिक सुविधाजनक कुछ भी नहीं है। भाग्‍य को धोखा नहीं दिया जा सकता, लेकिन मानसिक स्थिति में सुधार कर खराब समय की पीड़ा को दूर किया जा सकता है। ऐसे में किसी एक जातक की लालसा का पोषण करने के बजाय उसे सही रास्‍ते की ओर भेजना मेरी समझ में सबसे सही उपाय है। ऐसे में मेष से लेकर मीन राशि और लग्‍न वाले जातकों के लिए अलग-अलग उपचार होंगे। आप गौर करेंगे कि कुछ ग्रहों को कारक तो कुछ को अकारक भी बताया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी कुण्‍डली में कारक ग्रहों का प्रभाव होता है और अकारक का नहीं होता। प्रभाव तो सभी ग्रहों का होगा, लेकिन मूल स्‍वभाव कारक ग्रह के अनुसार ही होगा। ऐसे में उपचार के समय भी कारक ग्रहों का ही ध्‍यान रखा जाए।
रही बात उच्‍च और नीच की… यह तो रश्मियों का प्रभाव है। नीच ग्रह की कम रश्मियां जातक तक पहुंचती है और उच्‍च ग्रह की अधिक रश्मियां। ऐसे में अगर कारक ग्रह अच्‍छी स्थिति यानि अच्‍छे भाव में बैठकर कम रश्मियां दे रहा है तो उसके लिए उपचार करना चाहिए। और अकारक ग्रह खराब स्थिति में या नीच का भी है तो उसे छेड़ने की जरूरत नहीं है।
यह मेरा अब तक के अध्‍ययन से उपजा विश्‍लेषण है.. जरूरी नहीं है कि सही ही हो, लेकिन अब तक जितने जातकों का इलाज इन तथ्‍यों को ध्‍यान में रखकर किया है, मुझे बेहतर परिणाम मिले हैं। एक उदाहरण भी देना चाहूंगा। एक जातक तुला लग्‍न का ही था और अपने संगठन में टॉप लेवल पर पहुंचने के लिए प्रयासरत था, मुझे लगा कि वह अपनी ताकत और प्रबंधन गुण की वजह से तो टॉप लेवल पर नहीं पहुंच पाएगा, लेकिन शनि का नेगेटिव प्रभाव बढ़ाने से बात बन सकती है। पांचवे भाव में स्‍व राशि का होने के बावजूद मैंने जातक को लोहे की अंगूठी गले में पहना दी, और गले में पहना रक्‍त चंदन का सूर्य उतरवा दिया। शनि का असर तेजी से बढ़ा, लग्‍न में बैठे सूर्य और गुरू भी इतना असर नहीं कर पाए जितना शनि ने किया। अब वह अपने संगठन के बहुत महत्‍वपूर्ण ऊंचे पद पर आसीन है।

>क्यों जरूरी है मंगली का मंगली से ‍विवाह :-

जिस जातक की जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली आदि में मंगल ग्रह, लग्न से लग्न में (प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भावों में से कहीं भी स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहते हैं। गोलिया मंगल ‘पगड़ी मंगल’ तथा चुनड़ी मंगल : जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं पर भी मंगल स्थित हो उसके साथ शनि, सूर्य, राहु पाप ग्रह बैठे हो तो व पुरुष गोलिया मंगल, स्त्री जातक चुनड़ी मंगल हो जाती है अर्थात द्विगुणी मंगली इसी को माना जाता है। मांगलिक कुंडली का मिलान : वर, कन्या दोनों की कुंडली ही मांगलिक हो तो विवाह शुभ और दाम्पत्य जीवन आनंदमय रहता है। एक सादी एवं एक कुंडली मांगलिक नहीं होना चाहिए। मंगल-दोष निवारण : मांगलिक कुंडली के सामने मंगल वाले स्थान को छोड़कर दूसरे स्थानों में पाप ग्रह हो तो दोष भंग हो जाता है। उसे फिर मंगली दोषरहित माना जाता है तथा केंद्र में चंद्रमा 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगली दोष दूर हो जाता है। शुभ ग्रह एक भी यदि केंद्र में हो तो सर्वारिष्ट भंग योग बना देता है। शास्त्रकारों का मत ही इसका निर्णय करता है कि जहाँ तक हो मांगलिक से मांगलिक का संबंध करें। ‍िफर भी मांगलिक एवं अमांगलिक पत्रिका हो, दोनों परिवार अपने पारिवारिक संबंध के कारण पूर्ण संतुष्ट हो, तब भी यह संबंध श्रेष्ठ नहीं है। ऐसा नहीं करना चाहिए।ऐसे में अन्य कई कुयोग हैं। जैसे वैधव्य विषागना आदि दोषों को दूर रखें। यदि ऐसी स्थिति हो तो ‘पीपल’ विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके कन्या का संबंध अच्छे ग्रह योग वाले वर के साथ करें। मंगल यंत्र विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग करें। देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या‍दि में ही इसे प्रयोग करें। छोटे कार्य के लिए नहीं। विशेष : विशेषकर जो मांगलिक हैं उन्हें इसकी पूजा अवश्य करना चाहिए। चाहे मांगलिक दोष भंग आपकी कुंडली में क्यों न हो गया हो फिर भी मंगल यंत्र मांगलिकों को सर्वत्र जय, सुख, विजय और आनंद देता है। निम्न 21 नामों से मंगल की पूजा करें :- 1. ऊँ मंगलाय नम: 2. ऊँ भूमि पुत्राय नम: 3. ऊँ ऋण हर्वे नम: 4. ऊँ धनदाय नम: 5. ऊँ सिद्ध मंगलाय नम: 6. ऊँ महाकाय नम: 7. ऊँ सर्वकर्म विरोधकाय नम: 8. ऊँ लोहिताय नम: 9. ऊँ लोहितगाय नम: 10. ऊँ सुहागानां कृपा कराय नम: 11. ऊँ धरात्मजाय नम: 12. ऊँ कुजाय नम: 13. ऊँ रक्ताय नम: 14. ऊँ भूमि पुत्राय नम: 15. ऊँ भूमिदाय नम: 16. ऊँ अंगारकाय नम: 17. ऊँ यमाय नम: 18. ऊँ सर्वरोग्य प्रहारिण नम: 19. ऊँ सृष्टिकर्त्रे नम: 20. ऊँ प्रहर्त्रे नम: 21. ऊँ सर्वकाम फलदाय नम: विशेष : किसी ज्योतिषी से चर्चा करके ही पूजन करना चाहिए। मंगल की पूजा का विशेष महत्व होता है।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>लाल किताब के सिद्ध टोटके –

>लाल किताब के सिद्ध टोटके –
मेरा पहला लेख लाल किताब के सिद्ध टोटके भागएक प्रकाशित हुआ था ! जिसमें बहुत से सदस्यों ने रूचि ली थी ! इसको हज़ारों सदस्यों ने देखा व पढा और उन उपायों को अपनाकर लाभ उठाया ! बहुत से लोगों ने अपनी समस्यायों के समाधान के लिए और उपायों की मांग की थी ! इस बाबत मुझे बहुत सी मेल व फोन भी आए ! अतः लाल किताब के टोटके भाग दो आपकी सेवा में प्रस्तुत है !
1. आर्थिक समस्या के छुटकारे के लिए :
यदि आप हमेशा आर्थिक समस्या से परेशान हैं तो इसके लिए आप 21 शुक्रवार 9 वर्ष से कम आयु की 5 कन्यायों को खीर व मिश्री का प्रसाद बांटें !
2. घर और कार्यस्थल में धन वर्षा के लिए :
इसके लिए आप अपने घर, दुकान या शोरूम में एक अलंकारिक फव्वारा रखें ! या
एक मछलीघर जिसमें 8 सुनहरी व एक काली मछ्ली हो रखें ! इसको उत्तर या उत्तरपूर्व की ओर रखें ! यदि कोई मछ्ली मर जाय तो उसको निकाल कर नई मछ्ली लाकर उसमें डाल दें !
3. परेशानी से मुक्ति के लिए :
आज कल हर आदमी किसी न किसी कारण से परेशान है ! कारण कोई भी हो आप एक तांबे के पात्र में जल भर कर उसमें थोडा सा लाल चंदन मिला दें ! उस पात्र को सिरहाने रख कर रात को सो जांय ! प्रातः उस जल को तुलसी के पौधे पर चढा दें ! धीरे-धीरे परेशानी दूर होगी !
4. कुंवारी कन्या के विवाह हेतु :
१. यदि कन्या की शादी में कोई रूकावट आ रही हो तो पूजा वाले 5 नारियल लें ! भगवान शिव की मूर्ती या फोटो के आगे रख कर “ऊं श्रीं वर प्रदाय श्री नामः” मंत्र का पांच माला जाप करें फिर वो पांचों नारियल शिव जी के मंदिर में चढा दें ! विवाह की बाधायें अपने आप दूर होती जांयगी !
२. प्रत्येक सोमवार को कन्या सुबह नहा-धोकर शिवलिंग पर “ऊं सोमेश्वराय नमः” का जाप करते हुए दूध मिले जल को चढाये और वहीं मंदिर में बैठ कर रूद्राक्ष की माला से इसी मंत्र का एक माला जप करे ! विवाह की सम्भावना शीघ्र बनती नज़र आयेगी
5. व्यापार बढाने के लिए :
१. शुक्ल पक्ष में किसी भी दिन अपनी फैक्ट्री या दुकान के दरवाजे के दोनों तरफ बाहर की ओर थोडा सा गेहूं का आटा रख दें ! ध्यान रहे ऐसा करते हुए आपको कोई देखे नही !
२. पूजा घर में अभिमंत्रित श्र्री यंत्र रखें !
३. शुक्र्वार की रात को सवा किलो काले चने भिगो दें ! दूसरे दिन शनिवार को उन्हें सरसों के तेल में बना लें ! उसके तीन हिस्से कर लें ! उसमें से एक हिस्सा घोडे या भैंसे को खिला दें ! दूसरा हिस्सा कुष्ठ रोगी को दे दें और तीसरा हिस्सा अपने सिर से घडी की सूई से उल्टे तरफ तीन बार वार कर किसी चौराहे पर रख दें ! यह प्रयोग 40 दिन तक करें ! कारोबार में लाभ होगा !
6. लगातार बुखार आने पर :
१. यदि किसी को लगातार बुखार आ रहा हो और कोई भी दवा असर न कर रही हो तो आक की जड लेकर उसे किसी कपडे में कस कर बांध लें ! फिर उस कपडे को रोगी के कान से बांध दें ! बुखार उतर जायगा !
२. इतवार या गुरूवार को चीनी, दूध, चावल और पेठा (कद्दू-पेठा, सब्जी बनाने वाला) अपनी इच्छा अनुसार लें और उसको रोगी के सिर पर से वार कर किसी भी धार्मिक स्थान पर, जहां पर लंगर बनता हो, दान कर दें !
३. यदि किसी को टायफाईड हो गया हो तो उसे प्रतिदिन एक नारियल पानी पिलायें ! कुछ ही दिनों में आराम हो जायगा !
7. नौकरी जाने का खतरा हो या ट्रांसफर रूकवाने के लिए :
पांच ग्राम डली वाला सुरमा लें ! उसे किसी वीरान जगह पर गाड दें ! ख्याल रहे कि जिस औजार से आपने जमीन खोदी है उस औजार को वापिस न लायें ! उसे वहीं फेंक दें दूसरी बात जो ध्यान रखने वाली है वो यह है कि सुरमा डली वाला हो और एक ही डली लगभग 5 ग्राम की हो ! एक से ज्यादा डलियां नहीं होनी चाहिए !
8. कारोबार में नुकसान हो रहा हो या कार्यक्षेत्र में झगडा हो रहा हो तो :
यदि उपरोक्त स्थिति का सामना हो तो आप अपने वज़न के बराबर कच्चा कोयला लेकर जल प्रवाह कर दें ! अवश्य लाभ होगा !
9. मुकदमें में विजय पाने के लिए :
यदि आपका किसी के साथ मुकदमा चल रहा हो और आप उसमें विजय पाना चाहते हैं तो थोडे से चावल लेकर कोर्ट/कचहरी में जांय और उन चावलों को कचहरी में कहीं पर फेंक दें ! जिस कमरे में आपका मुकदमा चल रहा हो उसके बाहर फेंकें तो ज्यादा अच्छा है ! परंतु याद रहे आपको चावल ले जाते या कोर्ट में फेंकते समय कोई देखे नहीं वरना लाभ नहीं होगा ! यह उपाय आपको बिना किसी को पता लगे करना होगा !
10. धन के ठहराव के लिए :
आप जो भी धन मेहनत से कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च हो रहा हो अर्थात घर में धन का ठहराव न हो तो ध्यान रखें को आपके घर में कोई नल लीक न करता हो ! अर्थात पानी टप–टप टपकता न हो ! और आग पर रखा दूध या चाय उबलनी नहीं चाहिये ! वरना आमदनी से ज्यादा खर्च होने की सम्भावना रह्ती है !
11. मानसिक परेशानी दूर करने के लिए :
रोज़ हनुमान जी का पूजन करे व हनुमान चालीसा का पाठ करें ! प्रत्येक शनिवार को शनि को तेल चढायें ! अपनी पहनी हुई एक जोडी चप्पल किसी गरीब को एक बार दान करें !
12. बच्चे के उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घायु के लिए :
१. एक काला रेशमी डोरा लें ! “ऊं नमोः भगवते वासुदेवाय नमः” का जाप करते हुए उस डोरे में थोडी थोडी दूरी पर सात गांठें लगायें ! उस डोरे को बच्चे के गले या कमर में बांध दें !
२. प्रत्येक मंगलवार को बच्चे के सिर पर से कच्चा दूध 11 बार वार कर किसी जंगली कुत्ते को शाम के समय पिला दें ! बच्चा दीर्घायु होगा !
13. किसी रोग से ग्रसित होने पर :
सोते समय अपना सिरहाना पूर्व की ओर रखें ! अपने सोने के कमरे में एक कटोरी में सेंधा नमक के कुछ टुकडे रखें ! सेहत ठीक रहेगी !
14. प्रेम विवाह में सफल होने के लिए :
यदि आपको प्रेम विवाह में अडचने आ रही हैं तो :
शुक्ल पक्ष के गुरूवार से शुरू करके विष्णु और लक्ष्मी मां की मूर्ती या फोटो के आगे “ऊं लक्ष्मी नारायणाय नमः” मंत्र का रोज़ तीन माला जाप स्फटिक माला पर करें ! इसे शुक्ल पक्ष के गुरूवार से ही शुरू करें ! तीन महीने तक हर गुरूवार को मंदिर में प्रशाद चढांए और विवाह की सफलता के लिए प्रार्थना करें !
15. नौकर न टिके या परेशान करे तो :
हर मंगलवार को बदाना (मीठी बूंदी) का प्रशाद लेकर मंदिर में चढा कर लडकियों में बांट दें ! ऐसा आप चार मंगलवार करें !
16. बनता काम बिगडता हो, लाभ न हो रहा हो या कोई भी परेशानी हो तो :
हर मंगलवार को हनुमान जी के चरणों में बदाना (मीठी बूंदी) चढा कर उसी प्रशाद को मंदिर के बाहर गरीबों में बांट दें !
17. यदि आपको सही नौकरी मिलने में दिक्कत आ रही हो तो :
१. कुएं में दूध डालें! उस कुएं में पानी होना चहिए !
२. काला कम्बल किसी गरीब को दान दें !
३. 6 मुखी रूद्राक्ष की माला 108 मनकों वाली माला धारण करें जिसमें हर मनके के बाद चांदी के टुकडे पिरोये हों !
18. अगर आपका प्रमोशन नहीं हो रहा तो :
१. गुरूवार को किसी मंदिर में पीली वस्तुये जैसे खाद्य पदार्थ, फल, कपडे इत्यादि का दान करें !
२. हर सुबह नंगे पैर घास पर चलें !
19. पति को वश में करने के लिए :
यह प्रयोग शुक्ल पक्ष में करना चाहिए ! एक पान का पत्ता लें ! उस पर चंदन और केसर का पाऊडर मिला कर रखें ! फिर दुर्गा माता जी की फोटो के सामने बैठ कर दुर्गा स्तुति में से चँडी स्त्रोत का पाठ 43 दिन तक करें ! पाठ करने के बाद चंदन और केसर जो पान के पत्ते पर रखा था, का तिलक अपने माथे पर लगायें ! और फिर तिलक लगा कर पति के सामने जांय ! यदि पति वहां पर न हों तो उनकी फोटो के सामने जांय ! पान का पता रोज़ नया लें जो कि साबुत हो कहीं से कटा फटा न हो ! रोज़ प्रयोग किए गए पान के पत्ते को अलग किसी स्थान पर रखें ! 43 दिन के बाद उन पान के पत्तों को जल प्रवाह कर दें ! शीघ्र समस्या का समाधान होगा !
नोट :
1. लाल किताब के सभी उपाय दिन में ही करने चाहिए ! अर्थात सूरज उगने के बाद व सूरज डूबने से पहले !
2. सच्चाई व शुद्ध भोजन पर विशेष ध्यान देना चाहिए !
3. किसी भी उपाय के बीच मांस, मदिरा, झूठे वचन, परस्त्री गमन की विशेष मनाही है !
4. सभी उपाय पूरे विश्वास व श्रद्धा से करें, लाभ अवश्य होगा !
5. एक दिन में एक ही उपाय करना चाहिए ! यदि एक से ज्यादा उपाय करने हों तो छोटा उपाय पहले करें ! एक उपाय के दौरान दूसरे उपाय का कोई सामान भी घर में न रखें !
6. जो भी उपाय शुरू करें तो उसे पूरा अवश्य करें ! अधूरा न छोडें !

>…जब आप बनाएँ नया मकान – नया मकान बनाने से पहले..

नए भवन के निर्माण कराते समय आप अपने शहर के किसी अच्छे वास्तु के जानकार से सलाह अवश्य लें। वास्तु का प्रभाव भवन के रहने वाले व्यक्तियों पर अवश्य पढ़ता है। परंतु इसके साथ-साथ व्यक्ति विशेष के ग्रह योग भी वास्तु के प्रभाव को घटाते-बढ़ाते हैं। हो सकता है कि एक व्यक्ति को कोई विशेष स्थान तकलीफ न दे पर वही स्थान दूसरे व्यक्ति को अत्यंत तकलीफदायक हो।

नए भवन निर्माण के समय कुछ मुख्य बातों पर ध्यान अवश्य दें..

- भवन के लिए चयन किए जाने वाले प्लॉट की चारों भुजा राइट एगिंल (90 डिग्री अंश कोण) में हों। कम ज्यादा भुजा वाले प्लॉट अच्छे नहीं होते।

- प्लाट जहाँ तक संभव हो उत्तरमुखी या पूर्वमुखी ही लें। ये दिशाएँ शुभ होती हैं और यदि किसी प्लॉट पर ये दोनों दिशा (उत्तर और पूर्व) खुली हुई हों तो वह प्लॉट दिशा के हिसाब से सर्वोत्तम होता है।
- प्लॉट के पूर्व व उत्तर की ओर नीचा और पश्चिम तथा दक्षिण की ओर ऊँचा होना शुभ होता है।

- प्लाट के एकदम लगे हुए, नजदीक मंदिर, मस्जिद, चौराह, पीपल, वटवृक्ष, सचिव और धूर्त का निवास कष्टप्रद होता है।

- पूर्व से पश्चिम की ओर लंबा प्लॉट सूर्यवेधी होता है जो कि शुभ होता है। उत्तर से दक्षिण की ओर लंबा प्लॉट चंद्र भेदी होता है जो ज्यादा शुभ होता है ओर धन वृद्धि करने वाला होता है।

- प्लॉट के दक्षिण दिशा की ओर जल स्रोत हो तो अशुभ माना गया है। इसी के विपरीत जिस प्लॉट के उत्तर दिशा की ओर जल स्रोत (नदी, तालाब, कुआँ, जलकुंड) हो तो शुभ होता है।

- जो प्लॉट त्रिकोण आकार का हो, उस पर निर्माण कराना हानिकारक होता है।

- भवन निर्माण कार्य शुरू करने के पहले अपने आदरणीय विद्वान पंडित से शुभ मुहूर्त निकलवा लेना चाहिए।

- भवन निर्माण में शिलान्यास के समय ध्रुव तारे का स्मरण करके नींव रखें। संध्या काल और मध्य रात्रि में नींव न रखें।

- नए भवन निर्माण में ईंट, पत्थर, मिट्टी ओर लकड़ी नई ही उपयोग करना। एक मकान की निकली सामग्री नए मकान में लगाना हानिकारक होता है।

- भवन का मुख्य द्वार सिर्फ एक होना चाहिए तो उत्तर मुखी सर्वश्रेष्ठ एवं पूर्व मुखी भी अच्छा होता है। मुख्य द्वार की चौखट चार लकड़ी की एवं दरवाजा दो पल्लों का होना चाहिए।

- भवन के दरवाजे अपने आप खुलने या अपने आप बंद न होते हों यह भी ध्यान रखना चाहिए। दरवाजों को खोलने या बंद करते समय आवाज होना अशुभ माना गया है।

- भवन में सीढ़ियाँ वास्तु नियम के अनुरूप बनानी चाहिए, सीढ़ियाँ विषम संख्या (5,7, 9) में होनी चाहिए।

>कुंडली में छुपा है मृत्यु का रहस्य – पत्रिका से जानिए, क्या होगा रोग ::::———-
प्रत्येक कुंडली का विश्लेषण करके उसके रोग व उसकी मृत्यु को जान सकते हैं। रोग की परिभाषा के अनुसार तत्संबंधी भावों, उनके स्वामियों, लग्न व लग्नेश स्थिति और उस पर पापी ग्रहों की युति व उनकी दृष्टियों से उस रोग व उससे जातक की मृत्यु को जाना जा सकता है।
किसी भी व्यक्ति की जन्म कुंडली को देखकर उस व्यक्ति के रोग एवं उसकी मृत्यु के बारे में जाना जा सकता है। यह भी बताया जा सकता है कि उसकी मृत्यु किस रोग से होगी। ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक जन्मकुंडली में छठवाँ भाव रोग, आठवाँ भाव मृत्यु तथा बारहवाँ भाव शारीरिक व्यय व पीड़ा का माना जाता है।
इन भावों के साथ ही इन भावों के स्वामी-ग्रहों की स्थितियों व उन पर पाप-ग्रहों की दृष्टियों व उनसे उनकी पुत्रियों आदि को भी देखना समीचीन होता है। यही नहीं, स्वयं लग्न और लग्नेश भी संपूर्ण शरीर तथा मस्तिष्क का प्रतिनिधित्व करता है। लग्न में बैठे ग्रह भी व्याधि के कारक होते हैं।
लग्नेश की अनिष्ट भाव में स्थिति भी रोग को दर्शाती है। इस पर पाप-ग्रहों की दृष्टि भी इसी तथ्य को प्रकट करती है। विभिन्न ग्रह विभिन्न अंग-प्रत्यंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसे बुध त्वचा, मंगल रक्त, शनि स्नायु, सूर्य अस्थि, चंद्र मन आदि का। लग्न में इन ग्रहों की स्थिति उनसे संबंधित तत्व का रोग बताएगी और लग्नेश की स्थिति भी।
प्रत्येक कुंडली, लग्न, चंद्र राशि और नवमांश लग्न से देखी जाती है। इसका मिलान सूर्य की अवस्थिति को लग्न मान कर, काल पुरुष की कुंडली आदि से भी किया जाता है। छठवाँ भाव रोग का होने के कारण उसमें बैठे ग्रहों, उस पर व षष्टेश पर पाप ग्रहों की दृष्टियों व षष्टेश की स्थिति से प्रमुखतया रोग का निदान किया जाता है। इनके अतिरिक्त एकांतिक ग्रह भी विभिन्न रोगों का द्योतक है।
जन्मकुंडली में छठवाँ, आठवाँ और बारहवाँ भाव अनिष्टकारक भाव माने जाते हैं। इनमें बैठा हुआ ग्रह एकांतिक ग्रह कहा जाता है। यह ग्रह जिन भावों का प्रतिनिधित्व करता है, उससे संबंधित अंग रोग से पीड़ित होता है। यही नहीं, वह जिस तत्व यथा बुध त्वचा, मंगल रक्त आदि जैसा कि ऊपर बताया गया उससे संबंधित रोग वह बताएगा।
ज्योतिष शास्त्र में ‘भावात्‌ भावम्‌’ का सिद्धांत भी लागू होता है। इसका आशय यह है कि छठवें से छठवाँ अर्थात एकादश भाव भी रोग का ही कहलाएगा। इसी भाँति आठवें से आठवाँ अर्थात तृतीय भाव भी मृत्यु का माना जाएगा और बारहवें से बारहवाँ अर्थात पुनः एकादश भाव शारीरिक व्यय अथवा पीड़ा का होगा। इस दृष्टि से भी ऊपर निर्दिष्ट कुंडलियों का मिलान करना चाहिए। इसके अतिरिक्त सुदर्शन से रोग देखा जाता है। यदि कोई ग्रह दो केंद्र भावों का स्वामी होता है तो वह अपनी शुभता खो देता है और स्वास्थ्य को हानि पहुँचाता है।आठवाँ व बारहवाँ भाव मृत्यु और शारीरिक क्षय को प्रकट करता है, जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया गया है। लग्न व लग्नेश आयु को दर्शाता है, इसकी नेष्ट स्थिति भी आयु के लिए घातक होती है। यहाँ पर एक और बात का ध्यान रखना उपयुक्त होगा। राहु व शनि जिस भाव व राशि में बैठा होता है, उसका स्वामी भी उनका प्रभाव लिए होता है। वह जिस भाव में बैठा होगा या जिस भाव पर वह अपनी दृष्टि डालेगा, उस पर राहु व शनि प्रभाव भी अवश्य आएगा। राहु मृत्युकारक ग्रह है तो शनि पृथकताकारक।
यह स्थिति भी मृत्युकारक होगी या उस अंग को पृथक करेगा। कभी-कभी यह बात ध्यान में नहीं रखने के कारण फलादेश गलत हो जाता है। गोचर ग्रहों के साथ-साथ महादशा व अंतर्दशा से भी फलादेश का मेल खाना अत्यंत आवश्यक होता है। जातक की जन्म कुंडली से उसके किसी भी रिश्तेदार के रोग व उसकी मृत्यु का पता लगाया जा सकता है।
मान लीजिए कि कर्क लग्न है, जिसका स्वामी चंद्र है जो जल व मन का प्रतिनिधित्व करता है। यह पाँचवें भाव में अवस्थित है। एकादश भाव बड़े भाई या बड़ी बहन का है। इसका स्वामी निश्चित तौर पर बड़ी बहन को दर्शाएगा स्त्री ग्रह होने के कारण। शनि भाग्य भाव में बैठकर तीसरी दृष्टि से इस भाव को देख रहा है। वह स्नायु का प्रतिनिधित्व करता है। स्पष्ट है कि जातक की बड़ी बहन स्नायु से संबंधित रोग से ग्रस्त होगी।
अब यदि ग्यारहवें भाव को लग्न मानें तो इससे छठवाँ भाव आठवाँ होगा जो बहन की मृत्यु का भाव है। इसे भी शनि दसवीं दृष्टि से देख रहा है। यही नहीं यहाँ पर केतु भी बैठा हुआ है, जो इस रोग को बढ़ा रहा है। बहन का लग्नेश शुक्र उसी के लग्न से बारहवाँ होकर राहु के साथ बैठा हुआ है। राहु भी शनिवत होता है और स्नायु का प्रतिनिधित्व करता है।
स्पष्ट है कि ग्रहों की सारी स्थितियाँ इस जन्म कुंडली में उसकी बहन का स्नायविक रोग और उससे उसकी मृत्यु को दर्शाता है। इसी भाँति प्रत्येक कुंडली का विश्लेषण करके उसके रोग व उसकी मृत्यु को जान सकते हैं। रोग की परिभाषा केअनुसार तत्संबंधी भावों, उनके स्वामियों, लग्न व लग्नेश स्थिति और उस पर पापी ग्रहों की युति व उनकी दृष्टियों से उस रोग व उससे जातक की मृत्यु को जाना जा सकता है।

>प्यार और हस्तरेखा का संबंध–प्रेमी-प्रेमिका के बारे में बताती है हस्तरेखा—

अधिकतर लोगों के मुँह से यह सुनने में आता है कि हमारे तो गुण मिल गए थे परन्तु हमारे (पति-पत्नि) विचार नहीं मिल रहे हैं या हम लोगों ने एक-दूसरे को देखकर समझ-बूझकर शादी की थी। परन्तु बाद में दोनों में झगड़े बहुत होने लगे हैं। आप हस्तरेखा के द्वारा होने वाले धोखे, मंगेतर के बारे में या प्रेमी-प्रेमिका के बारे में जान सकते हैं।

किसी भी स्त्री या पुरुष के प्रेम के बारे में पता लगाने के लिए उस जातक के मुख्य रूप से शुक्र पर्वत, हृदय रेखा, विवाह रेखा को विशेष रूप से देखा जाता है। इन्हें देखकर किसी भी व्यक्ति या स्त्री का चरित्र या स्वभाव जाना जा सकता है।

शुक्र क्षेत्र की स्थिति अँगूठे के निचले भाग में होती है। जिन व्यक्तियों के हाथ में शुक्र पर्वत अधिक उठा हुआ होता है। उन व्यक्तियों का स्वभाव विपरीत सेक्स के प्रति तीव्र आकर्षण रखने वाला तथा वासनात्मक प्रेम की ओर झुकाव वाला होता है। यदि किसी स्त्री या पुरुष के हाथ में पहला पोरू बहुत छोटा हो और मस्तिष्क रेखा न हो तो वह जातक बहुत वासनात्मक होता है। वह विपरीत सेक्स के देखते ही अपने मन पर काबू नहीं रख पाता है।

अच्छे शुक्र क्षेत्र वाले व्यक्ति के अँगूठे का पहला पोरू बलिष्ठ हो और मस्तक रेखा लम्बी हो तो ऐसा व्यक्ति संयमी होता है। यदि किसी स्त्री के हाथ में शुक्र का क्षेत्र अधिक उन्नत हो तथा मस्तक रेखा कमजोर और छोटी हो तथा अँगूठे का पहला पर्व छोटा, पतला और कमजोर हो, हृदय रेखा पर द्वीप के चिह्न हों तथा सूर्य और बृहस्पति का क्षेत्र दबा हुआ हो तो वह शीघ्र ही व्याकियारीणी हो जाती है।
यदि किसी पुरुष के दाएँ हाथ में हृदय रेखा गुरू पर्वत तक सीधी जा रही है तथा शुक्र पर्वत अच्छा उठा हुआ है तो वह पुरुष अच्छा व उदार प्रेमी साबित होता है। परन्तु यदि यही दशा स्त्री के हाथ में होती है तथा उसकी तर्जनी अँगुली अनामिका से बड़ी होती है तो वह प्रेम के मामले में वफादार नहीं होती है।

यदि हथेली में विवाह रेखा एवं कनिष्ठा अँगुली के मध्य में दो-तीन स्पष्ट रेखाएँ हो तो उस स्त्री या पुरुष के उतने ही प्रेम संबंध होते हैं।

यदि किसी पुरुष की केवल एक ही रेखा हो और वह स्पष्ट तथा अन्त तक गहरी हो तो ऐसा जातक एक पत्निव्रता होता है और वह अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम भी करता है। जैसा कि बताया गया है कि विवाह रेखा अपने उद्गम स्थान पर गहरी तथा चौड़ी हो, परन्तु आगे चलकर पतली हो गई हो तो यह समझना चाहिए कि जातक या जातिका प्रारम्भ में अपनी पत्नि या पति से अधिक प्रेम करती है, परन्तु बाद में चल कर उस प्रेम में कमी आ गई है।

>आज के मुहूर्त और राशिफल- 24 मार्च, 2011—-
26 मार्च, 2011: शनिवार, 5:50 * तक कृष्ण अष्टमी,
21:06 तक Moola, जब तक 6:49 योग Vyatipata, 5:55 * तक Variyan योग,
जब तक 17:37 करण Balava, 5:50 * तक Kaulava करण,
RahuK: 7:53 GulikaK: YamaG, 6:23: 9:23-10:53 – 13:52-15:22,
18:32 पर सूर्योदय पर 6:22 सूर्यास्त, *,
* 01:42 Moonrise पर, 11:22 पर Moonset,) दिन में चंद्रमा धनु (पूरी
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March 26, 2011:
Saturday, Krishna Ashtami till 5:50*,
Moola till 21:06, Vyatipata yoga till 6:49, Variyan yoga till 5:55*,
Balava karana till 17:37, Kaulava karana till 5:50*,
RahuK: 9:23 – 10:53, GulikaK: 6:23 – 7:53, YamaG: 13:52 – 15:22,
Sunrise at 6:22*, Sunset at 18:32,
Moonrise at 1:42*, Moonset at 11:22, Moon in Dhanu (whole day)
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26 मार्च ,2011 ;;;;;;;;;;;;;दैनिक राशिफल————————-

राशि फलादेश— मेष—कार्यसिद्धि होगी। नवीन व्यापार के प्रस्ताव मिलेंगे। योजनाएँ क्रियान्वित हो सकेंगी। संतान के कार्यों से चिंता में वृद्धि हो सकती है।
राशि फलादेश —वृष—-अर्थक्षेत्र में आशाजनक परिणाम आएँगे। अधीनस्थों से उपयोगी सलाह मिलेगी। व्यावसायिक संतोष, प्रसन्नता रहेगी। संतान पर विशेष ध्यान देना होगा।
राशि फलादेश— मिथुन—रुका पैसा प्राप्त होगा। रचनात्मक कार्यों का प्रतिफल मिलेगा। अधिकारी असंतोष दर्शाएँगे। विशेष कार्य स्थगित रखें। विरोध और तनाव से बचें। कार्यक्षेत्र में नुकसान होने की आशंका है।
राशि फलादेश—- कर्क—दूरस्थ क्षेत्र की यात्रा न करें। दांपत्य जीवन सुखद। कार्य की प्रगति होगी। आर्थिक स्थिति अच्छी रहेगी। कानूनी विवादों का निपटारा हो सकेगा। व्यापार लाभदायी रहेगा।
राशि फलादेश— सिंह—आवास की समस्या रह सकती है। प्रवास शुभ। मानसिक सुख-शांति रहेगी। विरोधी समझौता करेंगे। स्थायी संपत्ति क्रय करने में जल्दबाजी न करें।
राशि फलादेश –कन्या—अपनी वस्तुओं को संभालकर रखें। बुद्धिचातुर्य से कठिनाइयाँ दूर होंगी। परिवार का सहयोग मिलेगा। आर्थिक लाभ बढ़ेगा। संत समागम होगा।
राशि फलादेश— तुला—व्यापार मध्यम रहेगा। अधिक परिश्रम का फल कम मिलेगा। समाज में आपकी आलोचना होगी। संतान की ओर ध्यान दें। कार्य में सफलता मिलेगी।
राशि फलादेश— वृश्चिक—-कार्य में सुअवसर मिलेगा। स्थायी संपत्ति की आकांक्षा पूर्ण होगी। व्यापार अच्छा चलेगा। जीवनसाथी के साथ विवाद न करें। धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होंगे।
राशि फलादेश— धनु—-आपके प्रयास से स्थिति अनुकूल होगी। पिछले दिनों से अधूरे पड़े काम पूरे होंगे। वाहन सावधानी से चलाएँ। कार्यक्षेत्र में इच्छित लाभ होगा।
राशि फलादेश— मकर—-नई योजनाएँ बनेंगी। लाभ को ध्यान में रखकर कार्य करें। परिवार में सामंजस्य रहेगा। कार्यक्षेत्र का विस्तार हो सकेगा। दूसरों की देखादेखी न करें।
राशि फलादेश— कुंभ—-समाज में आपकी सराहना होगी। संतान की तरक्की होगी। दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करें। बुद्धिमानी और दूरदर्शिता से कार्य करने होंगे।
राशि फलादेश— मीन—व्यापार में इच्छित सफलता मिलेगी। कार्यक्षेत्र का विस्तार होगा। अपनी वस्तुएँ संभालकर रखें। भूमि, जायदाद के सौदों में लाभ होगा।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

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>।।दोहा।। श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार |

बरनौ रघुवर बिमल जसु , जो दायक फल चारि |
बुद्धिहीन तनु जानि के , सुमिरौ पवन कुमार |

बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश विकार ||
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिंहु लोक उजागर |

रामदूत अतुलित बल धामा अंजनि पुत्र पवन सुत नामा ||
महाबीर बिक्रम बजरंगी कुमति निवार सुमति के संगी |

कंचन बरन बिराज सुबेसा, कान्हन कुण्डल कुंचित केसा ||
हाथ ब्रज औ ध्वजा विराजे कान्धे मूंज जनेऊ साजे |

शंकर सुवन केसरी नन्दन तेज प्रताप महा जग बन्दन ||
विद्यावान गुनी अति चातुर राम काज करिबे को आतुर |

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया रामलखन सीता मन बसिया ||
सूक्ष्म रूप धरि सियंहि दिखावा बिकट रूप धरि लंक जरावा |

भीम रूप धरि असुर संहारे रामचन्द्र के काज सवारे ||
लाये सजीवन लखन जियाये श्री रघुबीर हरषि उर लाये |

रघुपति कीन्हि बहुत बड़ाई तुम मम प्रिय भरत सम भाई ||
सहस बदन तुम्हरो जस गावें अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावें |

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा नारद सारद सहित अहीसा ||
जम कुबेर दिगपाल कहाँ ते कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते |

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा राम मिलाय राज पद दीन्हा ||
तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना लंकेश्वर भये सब जग जाना |

जुग सहस्र जोजन पर भानु लील्यो ताहि मधुर फल जानु ||
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख मांहि जलधि लाँघ गये अचरज नाहिं |

दुर्गम काज जगत के जेते सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ||
राम दुवारे तुम रखवारे होत न आज्ञा बिनु पैसारे |

सब सुख लहे तुम्हारी सरना तुम रक्षक काहें को डरना ||
आपन तेज सम्हारो आपे तीनों लोक हाँक ते काँपे |

भूत पिशाच निकट नहीं आवें महाबीर जब नाम सुनावें ||
नासे रोग हरे सब पीरा जपत निरंतर हनुमत बीरा |

संकट ते हनुमान छुड़ावें मन क्रम बचन ध्यान जो लावें ||
सब पर राम तपस्वी राजा तिनके काज सकल तुम साजा |

और मनोरथ जो कोई लावे सोई अमित जीवन फल पावे ||
चारों जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा |

राम रसायन तुम्हरे पासा सदा रहो रघुपति के दासा ||
तुम्हरे भजन राम को पावें जनम जनम के दुख बिसरावें |

अन्त काल रघुबर पुर जाई जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ||
और देवता चित्त न धरई हनुमत सेई सर्व सुख करई |

संकट कटे मिटे सब पीरा जपत निरन्तर हनुमत बलबीरा ||
जय जय जय हनुमान गोसाईं कृपा करो गुरुदेव की नाईं |

जो सत बार पाठ कर कोई छूटई बन्दि महासुख होई ||
जो यह पाठ पढे हनुमान चालीसा होय सिद्धि साखी गौरीसा |

तुलसीदास सदा हरि चेरा कीजै नाथ हृदय मँह डेरा ||
।।दोहा।। पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप |

राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ||

>ऑफिस बनाते समय वास्तु का ध्यान रखें!-पं. दयानन्द शास्त्री
वास्तु सम्मत ऑफिस हो तो उसमें कार्य करने में मन लगता है और कार्य भी भली-भांति होता है। अपने ऑफिस को बनाते समय वास्तु नियमों का पालन करना चाहिए क्योंकि वास्तु सम्मत ऑफिस में कार्य करने से सम्यक कार्य और सम्यक निर्णय लेने की शक्ति मिलती है जिससे उन्नति पथ प्रशस्त होता है। वास्तु सम्मत ऑफिस मे अधोलिखित नियमों का ध्यान रखना चाहिए- एक अच्छे आफिस में बैठते हुए यह ध्यान रखना आवश्यक हैं कि स्वामी की कुर्सी आफिस के दरवाजे के ठीक सामने ना हो। पीठ के पीछे ठोस दीवार होनी चाहिए। यह भी ध्यान रखे कि आफिस की कुर्सी पर बैठते समय आपका मुंह पूर्व या उत्तर दिशा में रहे। आपका टेलिफोन आपके सीधे हाथ की तरफ, दक्षिण या पूर्व दिशा में रहें तथा कम्प्यूटर भी आग्नेय कोण में (सीधे हाथ की तरफ) होना चाहिए। इसी प्रकार स्वागत कक्ष आग्नेय कोण मे होना चाहिए लेकिन स्वागतकर्ता (रिसेप्सनिष्ट) का मुंह उत्तर की ओर होना चाहिए जिससे गलतियां कम होगी। ऑफिस में पूजा स्थल ईशान कोण में होना चाहिए परन्तु इस स्थान पर एक गमला अवश्‍य रखें जिससे ऑफिस की शोभा बढ़ेगी। फॉईल या किताबों की रेक वायव्य या पश्चिम में रखना हितकारी होगा। परन्तु पूरब की तरफ मुंह करके बैठते समय अपने उल्टे हाथ की तरफ कैश बॉक्स(धन रखने की जगह) बनाए इससे धनवृद्धि होगी। उत्तर दिशा में पानी का स्थान बनाए। पश्चिम दिशा में प्रमाण पत्र, शील्ड व मेडल तथा अन्य प्राप्त पुरस्कार को सजा कर रखें। ऐसा करने से आपका आफिस निश्चित रूप से वास्तु संम्मत कहलाएगा व आपको शांति व संमृद्धि देने के साथ साथ आपकी उन्नति में भी सहायक होगा। विभिन्न कार्यालयों हेतु शुभ रंग ऑफिस में इंटीरीयर कराते समय रंगों का भी ध्यान रखना चाहिए। रंग भी तन व मन पर विशेष प्रभाव डालते हैं। किसी डॉक्टर के क्लिनिक में स्वयं का चैम्बर सफेद या हल्के हरे रंग का होना चाहिए। किसी वकील का सलाह कक्ष काला, सफेद अथवा नीले रंग का होना चाहिए। किसी चार्टर्ड एकाउन्टेंट का चैम्बर सफेद एवं हल्के पीले रंग का हो सकता हैं। किसी ऐजन्ट का कार्यालय गहरे हरे रंग का हो सकता हैं। जीवन को समृद्धशाली बनाने के लिए व्यवसाय की सफलता महत्वपूर्ण हैं इसके लिए कार्यालय को वास्तु सम्मत बनाने के साथ साथ विभिन्न रंगों का उपयोग लाभदायक सिद्ध हो सकता हैं। वास्तु सम्मत ऑफिस उन्नतिकारी होता है। आप भी अपना ऑफिस वास्तु द्वारा निर्मित करके लाभ उठा सकते हैं।

>शयन कक्ष का निर्माण वास्तु आधार पर करना चाहिए। शयन कक्ष का निर्माण एवं उसको व्यवस्थित करते समय वास्तु शास्त्र के नियमों का पालन करना चाहिए, जिससे भवन स्वामी और उसका परिवार सुखी रहे और गहन नींद का आनन्द ले सके जिससे अच्छे स्वास्थ्य के रहने पर कर्मक्षेत्र में पूर्ण क्षमता को प्रयोग कर सके। किस दिशा में शयन कक्ष को बनाने से निम्न प्रभाव पड़ता है- पूर्व दिशा में शयन कक्ष शुभ नहीं माना जाता है। इस दिशा में शयन कक्ष बना हुआ हैं तो उसे अविवाहित बच्चों के लिए प्रयोग में ला सकते हैं। नवविवाहित/विवाहित दम्पत्ति के लिए यह दिशा वर्जित हैं। पूर्व दिशा देवराज इन्द्र की होती हैं तथा ग्रहों मेæ
6; सूर्य-ग्रह की दिशा होती हैं। बुजुर्गो एवं अविवाहित बच्चों के लिए शयन कक्ष के लिए प्रयोग में लाया जा सकता हैं। उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशा में शयन कक्ष का निर्माण न करें तो श्रेष्ठ रहेगा। यह दिशा ग्रहों में बृहस्पति की दिशा मानी जाती है जोकि पूजा कक्ष या बच्चों के अध्ययन/शयन हेतु प्रयोग में ले सकते हैं। विवाहित इस कक्ष में शयन करेंगे तो कन्या संतान अधिक होने की सम्भावना बनी रहती हैं। उत्तर दिशा में शयन कक्ष का निर्माण गृहस्वामी के लिए उपयुक्त हैं। अन्य सदस्यों के लिए भी शयनकक्ष श्रेष्ठ रहेगा। उत्तर पश्चिम दिशा में शयन कक्ष का निर्माण किया जा सकता हैं, यदि गृहस्वामी का व्यवसाय/सर्विस ऐसी होती हैं जिसमें अधिकतर टूर पर रहना होता हैं, उनके लिए वायव्य कोण में शयन कक्ष बनाना श्रेष्ठ रहेगा। यह कक्ष मेहमानों के ठहरने के लिए सर्वश्रेष्ठ है। जिन कन्याओं के विवाह में विलम्ब हो रहा हो, उन्हें इस दिशा के कक्ष में शयन करने से विवाह की सम्भावना प्रबल हो जाती हैं। पश्चिम दिशा में शयन कक्ष का निर्माण किया जा सकता हैं । दक्षिण-पश्चिम दिशा का कक्ष शयन के लिए सर्वोत्तम माना जाता हैं। गृहस्वामी के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। नैऋत्य कोण पृथ्वी तत्व हैं अर्थात स्थिरता का प्रतीक हैं। अतः इस कक्ष में गृहस्वामी का शयन कक्ष होने पर वह निरोगी एवं भवन में दीर्घकाल तक निवास करता हैं। दक्षिण दिशा में शयन कक्ष गृहस्वामी के लिए उपयुक्त माना गया हैं। गृहस्वामी के अतिरिक्त विवाहित दम्पत्तियों के लिए भी उपयुक्त कक्ष माना जाता हैं । दक्षिण पूर्व दिशा में शयन कक्ष को बनाना उचित नहीं माना गया हैं। यदि गृहस्वामी ऐसे कक्ष में शयन करता हैं तो वह अनिद्रा से ग्रस्त अथवा क्रोध आना, पूर्ण असन्तुष्टि मस्तिष्क में बनी रहना, जल्दबाजी में निर्णय लेकर, नुकसान उठाने पर पछतावा बना रहता है

>कैसा हो आपका किचन-किचन संबंधित खास वास्तु टिप्स—-

महिलाओं का अधिकतम समय किचन में ही बीतता है। वास्तुशास्त्रियों के मुताबिक यदि वास्तु सही न हो तो उसका विपरीत प्रभाव महिला पर, घर पर भी पड़ता है। किचन बनवाते समय इन बातों पर गौर करें।

किचन की ऊँचाई 10 से 11 फीट होनी चाहिए और गर्म हवा निकलने के लिए वेंटीलेटर होना चाहिए। यदि 4-5 फीट में किचन की ऊँचाई हो तो महिलाओं के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कभी भी किचन से लगा हुआ कोई जल स्त्रोत नहीं होना चाहिए। किचन के बाजू में बोर, कुआँ, बाथरूम बनवाना अवाइड करें, सिर्फ वाशिंग स्पेस दे सकते हैं।

किचन में सूर्य की रोशनी सबसे ज्यादा आए। इस बात का हमेशा ध्यान रखें। किचन की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें, क्योंकि इससे सकारात्मक व पॉजिटिव एनर्जी आती है।

- किचन हमेशा दक्षिण-पूर्व कोना जिसे अग्निकोण (आग्नेय) कहते है, में ही बनवाना चाहिए। यदि इस कोण में किचन बनाना संभव न हो तो उत्तर-पश्चिम कोण जिसे वायव्य कोण भी कहते हैं पर बनवा सकते हैं।

ND
- किचन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्लेटफार्म हमेशा पूर्व में होना चाहिए और ईशान कोण में सिंक व अग्नि कोण चूल्हा लगाना चाहिए।

- किचन के दक्षिण में कभी भी कोई दरवाजा या खिड़की नहीं होने चाहिए। खिड़की पूर्व की ओर में ही रखें।

- रंग का चयन करते समय भी विशेष ध्यान रखें। महिलाओं की कुंडली के आधार पर रंग का चयन करना चाहिए।

- किचन में कभी भी ग्रेनाइट का फ्लोर या प्लेटफार्म नहीं बनवाना चाहिए और न ही मीरर जैसी कोई चीज होनी चाहिए, क्योंकि इससे विपरित प्रभाव पड़ता है और घर में कलह की स्थिति बढ़ती है।

- किचन में लॉफ्ट, अलमारी दक्षिण या पश्चिम दीवार में ही होना चाहिए।

- पानी फिल्टर ईशान कोण में लगाएँ।

- किचन में कोई भी पावर प्वाइंट जैसे मिक्सर, ग्रांडर, माइक्रोवेव, ओवन को प्लेटफार्म में दक्षिण की तरफ लगाना चाहिए। फ्रिज हमेशा वायव्य कोण में रखें।

>क्या वास्तु सम्मत निमार्ण से भाग्य बदल जाता है? -डॉ.उमेश पुरी ‘ज्ञानेश्वर’

क्या वास्तु सम्मत निमार्ण से भाग्य बदल जाता है? यह प्रश्न वास्तु के प्रचलन को देखकर सभी के मन में आता होगा। आजकल सभी यह सोचकर वास्तु सम्मत निर्माण करने लगे हैं कि शायद ऐसा करने से भाग्य बदल जाए। प्रत्येक व्यक्ति इस प्रश्न का उत्तर जानना चाहता है। कार्य कोई भी करें यदि वो सही ढंग लक्ष्य को ध्यान में रखकर किया गया है तो अपना फल पूर्ण और शुभ देता है और कार्य यदि अनुचित ढंग से शीघ्रता सहित बिना-सोचे समझें लक्ष्य को ध्यान में रखे बिना किया है तो फल अपूर्ण और अशुभता लिए हुए होता है। वास्तु शास्त्र रहने या कार्य करने के लिए ऐसे भवन का निर्माण करना चाहता है, जिसमें पंच महाभूतों पृथ्वी, जल, अग्, वायु और आकाश का सही अनुपात हो अर्थात् एक सन्तुलन हो, इसके अतिरिक्त गुरुत्व शक्ति, चुम्बकीय शक्ति एवं सौर ऊर्जा का समुचित प्रबन्ध हो। जब ऐसा होगा तो उस भवन में रहने वाला व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक क्षमता उन्नत कर सकेगा। यह जान लें कि वास्तु का सम्बन्ध वस्तु या ऐसे निर्माण से है जिसमें पंचमहाभूत का सही अनुपात हो, जबकि भाग्य का सम्बन्ध कर्म से है। कर्म संचित होते हैं जोकि भाग्य में परिवर्तित हो जाते हैं। वर्तमान हमारे भूतकाल के कर्मों पर आधारित होता है। हमारा भविष्य उन कर्मों पर आधारित होगा जो हम वर्तमान में कर रहे हैं। कर्म गति टारे नहीं टरे, जैसा बोए वैसा ही पाए। कर्मों का फल शुभाशुभ जैसा भी हो हमें भोगना अवश्य पड़ेगा। इतना है कि सुकर्म कष्ट को कम कर देते हैं। प्रकृति में जब भी पंच तत्त्चों का असन्तुलन होता है तो प्रकृति में विकृति आ जाती है जिस कारण भूकम्प, ज्वालामुखी का फटना, तूफान, बाढ़, दैवीय आपदा आदि आती है। सभी जानते हैं कि शरीर पंच तत्त्वों से निर्मित है। जब हमारे शरीर में भोज्य पदार्थों का या बाह्य प्रभावों से पंच महाभूतों का शरीर में असन्तुलन होता है तो शरीर में भी परिवर्तन होते हैं जिसके फलस्वरूप अस्वस्थता रहती है और शारीरिक असुविधा महसूस होती है। आप स्वयं सोचें कि यदि शरीर के साथ-साथ भवन में भी पंच महाभूतों का असन्तुलन है तो व्यक्ति के स्वस्थ होने के अवसर न के बराबर हैं और हैं भी तो उसके स्वस्थ होने में अधिक विलम्ब होगा। कुल मिलाकर प्रकृति और शरीर में पंचमहाभूतों का समुचित मिश्रण है जिस कारण दोनों ही सन्तुलित एवं स्वस्थ रहते हैं। पंच महाभूतों के असन्तुलन से प्रकृति और व्यक्ति का शरीर दोनों ही अस्वस्थ हो जाते हैं जिससे प्राकृतिक प्रकोप जगत् में आते हैं और जन व धन की हानि होती है। इसी प्रकार शरीर भी अस्वस्थ हो जाए तो उसके समस्त कार्य जहां के तहां रुक जाते हैं और उसे चहुं ओर से जो लाभ हो रहा होता है वह बन्द हो जाता है, मूलतः उसके सम्बन्ध अपने आसपास की प्रकृति से टूट जाते हैं और वह अपने को असन्तुलित, अस्वस्थ, अस्थिर और निराश सा होकर ऋणात्मक प्रभाव को पूर्णतः ओढ़ लेता है। फलस्वरूप उसे ऐसा लगता है कि वह भाग्यहीन हो गया है। अभी तक तो सबकुछ ठीक चल रहा था और यह अचानक ही सब कुछ अव्यवस्थित हो गया है। भाग्य और वास्तु अलग-अलग हैं! वास्तु का सम्बन्ध वस्तु की उचित व्यवस्था और प्रकृति के पंच महाभूतों के सन्तुलन से है। वास्तुशास्त्र प्रकृति से पूर्ण लाभ प्राप्त करने की व्यवस्था करता है न कि भाग्य को बदलने की। वास्तु व्यक्ति की शक्ति और ऊर्जा को उन्नत कर सकता है। वास्तु भाग्य के फल को प्राप्त करने में उचित वातावरण की व्यवस्था कर सकता है। भाग्य यदि आपको फल में 100 में से 70 प्रतिशत परिणाम पाने की क्षमता देता है तो आप उचित वातावरण में वास्तु सम्मत भवन में रह रहे हैं तो भाग्य द्वारा प्राप्त 70प्रतिशत को अधिक मात्रा में पा सकते हैं क्योंकि आप वास्तु सम्मत भवन में रहकर मानसिक एवं शारीरिक रूप से उन्नत जो हो चुके हैं और अवसर को पकड़ने की सामर्थ्य भी बढ़ चुकी है। भाग्य का सम्बन्ध कर्मों से है। जैसे कर्म होंगे वैसा फल होगा। कर्म अनुचित तो फल भी अशुभ और कार्य उचित तो फल भी शुभ। कर्मफल तीन प्रकार के होते हैं-संचित, प्रारब्ध एवं क्रियमाण। इस जन्म या पूर्वजन्म में किए जा चुके कर्म संचित कहे जाते हैं। संचित कर्म का जो भाग भुक्त अवस्था में रहता है उसे प्रारब्ध(भाग्य/दैव) कहते हैं और जो कर्म वर्तमान में कर रहे हैं या भविष्य में करने हैं उन्हें क्रियमाण कहते हैं। क्या भाग्य को बदला जा सकता है? जो कर्म अपरिवर्तनीय हैं और उनका फल दैवीय शक्ति या भाग्यानुरूप मिलना आवश्यक है वे कदापि परिवर्तित नहीं किए जा सकते हैं। ऐसे कर्मों का फल अशुभ होता है और भोगना ही पड़ता है। जो कर्म परिवर्तनीय हैं वे अशुभ होते हैं और उपायों द्वारा टाले जा सकते हैं। वे कर्म जो शुभाशुभ अर्थात् मिश्रित हैं और यह बता पाना कठिन होता है कि किसका प्रभाव अधिक है दैवीय शक्ति का या पुरुषार्थ का। ये उचित आराधना द्वारा शान्त किए जा सकते हैं। अन्ततः यह कहा जा सकता है कि वास्तु सम्मत निर्माण से भाग्य बदला नहीं जा सकता है। वास्तु तो आपकी सामर्थ्य या ऊर्जा को बढ़ा सकता है। समुचित स्वास्थ्य मानसिक सबलता और भरपूर आत्मविश्वास देता है। जब यह है और भाग्य भी अवसर दे रहा है तो ऐसे में वास्तु का सहयोग फल को अधिक अनुपात में पकड़ने में सहायक है। फल अधिक मात्रा में मिलेगा तो उन्नति भी अधिक होगी। अधिक उन्नति और अधिक फल जीवन के स्तर को उठाने में सहायक है। भाग्य भी पूर्णतः नहीं बदला जा सकता है और वास्तु भी भाग्य को बदल नहीं सकता है। वास्तु भाग्य से अधिक अनुपात में पाने का सहायक है। भाग्य जो भी फल दे यदि वह शुभ है और वास्तु सम्मत भवन में रह रहे हैं तो उसे अधिक अनुपात में पा सकेंगे। यदि भाग्य अशुभ फल दे रहा है और भवन भी वास्तु सम्मत नहीं है तो अधिक दुःख व तनाव मिलेगा।

>वास्तु भाग्य-वृद्धि कारक है! -पं.जटाशंकर चतुर्वेदी
वास्तु क्या भाग्य बदल सकता है, अक्सर लोग ये बात पूछते हैं। इसके उत्तर में यही कहेंगे कि वास्तु भाग्य नहीं बदल सकता है। किन्तु भाग्य वृद्धि कर सकता है। भाग्य वृद्धि कर सकता है तो कैसे? भाग्य वृद्धि करने में वास्तु की भूमिका मात्रा इतनी है कि सबकुछ वास्तु सम्मत ढंग से निर्माण करें और बाद में उसमें रखी गई वस्तुएं भी वास्तु सम्मत ढंग से रखेंगे तो भाग्य वृद्धि अवश्य होगी। तब कहते हैं कि इसके कुछ नियम हैं जिनको अपनाना आवश्यक है। आवश्यक वास्तु नियम वास्तु सलाह वास्तु विद से लें तो बेहतर है। यदि आप वास्तुविद के पास नहीं जाना चाहते हैं तो वास्तु नियमों का पालन अवश्य करें। वास्तु के मूल नियम इस प्रकार है। १. भूखण्ड के आकार में आयताकार या वर्गाकार को ही महत्त्व देना चाहिए। २. भूखण्ड क्रय करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आमने-सामने की भुजाएं बराबर हों। ३. भूखण्ड की चौड़ाई के दूगने से अधिक उसकी गहराई नहीं होनी चाहिए। ४. दिशाएं दस हैं- पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, पूर्व-उत्तर, उत्तर-पश्चिम, दक्षिण-पश्चिम, दक्षिण-पूर्व। आकाश व पाताल। अब ध्यान रखने की बात यह है कि पूर्व, उत्तर, पूर्व-उत्तर दिशा नीची, खुली व हल्की होनी चाहिएं। इसकी अतिरिक्त अन्य दिशाओं की अपेक्षा ये दिशाएं आकाश मार्ग से भी खुली होनी चाहिएं। इसके विपरीत दक्षिण, पश्चिम, दक्षिण-पश्चिम, उत्तर-पश्चिम दिशाएं उंची, भारी व आकाश मार्ग से बन्द होनी चाहिएं। ५. दक्षिण, दक्षिण-पूर्व अग्नि का स्थान है। इसमें अग्नि की स्थापना होनी चाहिए। ६. पूर्व, उत्तर दिशा जल का स्थान होने के कारण इस दिशा में जल की स्थापना होनी चाहिए। ७. देवता के लिए पूर्व-उत्तर दिशा सर्वोत्तम है, उत्तर एवं पूर्व भी शुभ होती है। ईशान में भवन का देवता वास करता है, इसलिए इस स्थान पर पूजा या देवस्थल अवश्य बनाना चाहिए। इसे खुला और हल्का बनाना चाहिए। इसमें स्टोर या वजन रखने का स्थान कदापि नहीं बनाना चाहिए। इस स्थान को साफ रखना चाहिए। इस स्थान को प्रतिदिन साफ रखने से जीवन उन्नतिशील एवं सुख-समृद्धि से परिपूर्ण होता है। ८. पीने योग्य जल का भंडारण भी ईशान कोण में होना चाहिए। यह ध्यान रखें कि कभी भी आग्नेय कोण में जल का भंडारण न करें। गैस के स्लैब पर पानी का भंडारण तो कदापि न करें, वरना गृहक्लेश अधिक होगा। पारिवारिक सदस्यों में वैचारिक मतभेद होने लगेंगे। गृहक्लेश अधिक होता है तो किचन में चैक करें अवश्य जल और अग्नि एक साथ होंगे। अथवा ईशान कोण में वजन अधिक होगा या वह अधिक गंदा रहता होगा। ९. किचन दक्षिण या दक्षिण पूर्व में बनानी चाहिए। किचन में सिंक या हाथ धोने का स्थान ईशान कोण में होना चाहिए। रात्रिा में किचन में झूठे बर्तन नहीं होने चाहिएं। यदि शेष रहते हैं तो एक टोकरे में भरकर किचन से बाहर आग्नेय कोण में रखने चाहिएं। १०. गीजर या माइक्रोवेव ओवन आग्नेय कोण के निकट ही होने चाहिएं। इसी प्रकार मिक्सी, आटा चक्की, जूसर आदि भी आग्नेय कोण में दक्षिण दिशा की ओर रखने चाहिएं। यदि किचन में रेफ्रीजिरेटर भी रख रहे हैं तो उसे सदैव आग्नेय, दक्षिण या पश्चिम की ओर रखें। ईशान या नैर्ऋत्य कोण में कदापि नहीं रखना चाहिए। यदि रखेंगे तो परिवार में वैचारिक मतभेद अधिक रहेंगे और कोई किसी की सुनेगा नहीं। ११. जीना एवं टॉयलेट तो कदापि पूर्व या उत्तर या पूर्व-उत्तर में न बनाएं। जब आप उक्त दस मूल सूत्राों या नियमों को अपनाएंगे और इनके अनुरूप अपना भवन बनाएंगे तो आप निश्चित रूप से सुख संग जीवन जिएंगे और जीवन में भाग्य वृद्धि होने से समस्त इच्छाएं पूर्ण होंगी और जीवन बाधा रहित होगा। वास्तु सम्मत भवन सदैव धनहानि, रोग एवं कर्ज से ग्रस्त रखता है। इनसे मुक्त होना चाहते हैं तो वास्तु सम्मत भवन अवश्य बनाएं। यदि निर्मित भवन है तो उसमें देख लें कि वास्तु दोष तो नहीं हैं और यदि हैं तो उन दोषों को दूर कर लेना ही बेहतर है। वास्तु भाग्य नहीं बदलता है। वास्तु जीवन सरल, सहज एवं बाधाविहीन बना देता है। वास्तु आधृत भवन घर को साधन सम्पन्न एवं सुख का आगार बनाता है। जीवन में उन्नति को जीवन संगिनी बनाना चाहते हैं और जीवन को समृद्धि की डगर पर ले जाना चाहते हैं तो आपको चाहिए कि आप अपने भवन के दोषों को ढूंढ लें और यदि आप नहीं ढूंढ पा रहे हैं तो किसी वास्तुविद को बुला लीजिए वह आपको आपके भवन के दोष देखकर बता देगा। बाद में उसकी सलाह के अनुसार उसे ठीक करे लें। वास्तु भाग्य बदले या न बदले पर जीवन में सुख-वृद्धि भाग्य-वृद्धि होने के कारण हो ही जाती है।

>फ्लैट सुविधा व सुरक्षा दोनों में उत्तम–छोटा सा घर है ये मगर—
महानगरों की तर्ज पर अब छोटे शहरों में भी फ्लैट संस्कृति का चलन है। आपको अगर अब कम जगह में सर्वसुविधायुक्त घर चाहिए तो आपके लिए फ्लैट एक बेहतर विकल्प है। आजकल फ्लैट में मिलने वाली बेहतर सुविधाएँ व सुरक्षा केवल मध्यमवर्गीय परिवारों को ही नहीं बल्कि पूँजीपतियों को भी अपनी ओर आकर्षित कर रही है। भला सुविधासंपन्न मकान व बेहतर लाइफस्टाइल की ख्वाहिश कौन नहीं रखता है?
फ्लैट में पानी, बिजली, लिफ्ट, सुरक्षा आदि की बेहतर सुविधाएँ फ्लैट क्लचर की प्रसिद्धि का प्रमुख कारण है। बाहर से दिखने को तो फ्लैट छोटे घर के समान होता है परंतु भीतर से इसका इंटीरियर व बनावट छोटे से कमरे में भी महलों सी सुविधाओं का आभास कराती है।
फ्लैट में पानी, बिजली, लिफ्ट, सुरक्षा आदि की बेहतर सुविधाएँ फ्लैट क्लचर की प्रसिद्धि का प्रमुख कारण है। बाहर से दिखने को तो फ्लैट छोटे घर के समान होता है परंतु भीतर से इसका इंटीरियर व बनावट छोटे से कमरे में भी महलों सी सुविधाओं का आभास कराती है।
बालकनी वाला हो फ्लैट :- —
शाम को दोस्तों के साथ चाय की चुस्कियाँ लेते हुए ढलता सूरज देखना भला किसे अच्छा नहीं लगता। हर कोई चाहता है कि उसके फ्लैट में एक ऐसी बालकनी हो, जिसमें हर सुबह अखबार पढ़ते-पढ़ते ताजी हवा का लुत्फ उठाया जा सके व हरे-भरे पौधों से घर की शोभा बढ़ाई जा सके। यही कारण है कि आजकल बालकनी वाले फ्लैट सबसे ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं।

लोगों की माँग रहती है कि हमारे फ्लैट की बालकनी भी ऐसी हो जहाँ से बाहर का सुंदर नजारा दिखाई देता हो। अब दो बालकनी वाले फ्लैट भी लोगों की पसंद में शुमार हो गए हैं।

वास्तुदोष से मुक्त हो फ्लैट :- —
वास्तु और फेंगशुई का जादू अब लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। जब घर-परिवार में छोटी-छोटी सी बातों पर विवाद होने लगते हैं तब वास्तुविदों व फेंगशुई के जानकारों की मदद ली जा‍ती है। वास्तु और फेंगशुई में लोगों की बढ़ती रूचि को देखते हुए कई बिल्डर्स वास्तु व फेंगशुई के महत्वपूर्ण निर्देशों को ध्यान में रखकर फ्लैट का निर्माण कर रहे हैं। इस प्रकार के वास्तुदोषों से मुक्त फ्लैट्स की डिमांड अभी चरम पर है।

हमारा घर हो तो ऐसा :- —-
कहते हैं ‘आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है।’ हमारी आवश्यकताएँ ही बेहतर घर चुनने में हमारी मददगार सिद्ध होती हैं। वर्तमान में महानगरों में स्थान के अभाव व सुरक्षा की दृष्टि से फ्लैट को सबसे बेहतर आवास माना जा रहा है। आपकी डिमांड के अनुरूप मार्केट में एक से छ: बेडरूम तक के फ्लैट उपलब्ध हैं। अब यह आपको तय करना है कि आपके बजट में कौन सा फ्लैट फिट बैठता है। फ्लैट में मिलने वाली सुविधाओं व लोकेशन को देखते हुए इनकी कीमतें भी 4.00 लाख से शुरू होकर 50 लाख तक होती हैं।

आजकल कई बिल्डर्स आपकी पसंद के मुताबिक फ्लैट बनाकर बेचने का काम करते हैं, जिसकी बुकिंग फ्लैट बनने से पहले ही हो जाती है और जब फ्लैट बनकर तैयार होता है तब आप इसमें रहने का आनंद उठा सकते हैं। पहले बुकिंग कराने से आपको कम कीमत पर बेहतर फ्लैट मिल सकता है।

महानगरों में फ्लैट एक बेहतर विकल्प है रहने का परंतु इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि आप फ्लैट की लोकेशन व कीमत देखकर ही आप उसे बुक करा लें। इसके पहले जरूरी दस्तावेजों की जाँच-पड़ताल अवश्य करना बेहद आवश्यक है क्योंकि आज की थोड़ी जागरुकता व सर्तकता कल को आपके लिए निश्चिन्तता व आराम का शुभ संकेत हो सकती है। अत: फ्लैट खरीदें लेकिन उचित जानकारियाँ जुटाने के बाद।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

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>आप और आपका घर–घर के लि‍ए वास्‍तु टि‍प्‍स—

मकान बनाते समय उपरोक्त पंच तत्वों के लिए जो प्रकृति जन्य दिशाएँ निर्धारित हैं, उन्हीं के अनुरूप दिशाओं में कक्षों का निर्माण किया जाना चाहिए। नए भवन के निर्माण कराते समय आप अपने शहर के किसी अच्छे वास्तु के जानकार से सलाह अवश्य लें। वास्तु का प्रभाव भवन के रहने वाले व्यक्तियों पर अवश्य पढ़ता है। परंतु इसके साथ-साथ व्यक्ति विशेष के ग्रह योग भी वास्तु के प्रभाव को घटाते-बढ़ाते हैं। हो सकता है कि एक व्यक्ति को कोई विशेष स्थान तकलीफ न दे पर वही स्थान दूसरे व्यक्ति को अत्यंत तकलीफदायक हो। भवन के दरवाजे अपने आप खुलने या अपने आप बंद न होते हों यह भी ध्यान रखना चाहिए। दरवाजों को खोलने या बंद करते समय आवाज होना अशुभ माना गया है। भवन में सीढ़ियाँ वास्तु नियम के अनुरूप बनानी चाहिए, सीढ़ियाँ विषम संख्या (5,7, 9) में होनी चाहिए।

ऐसा हो आपका रसोई इंटीरि‍यर—-
हम सभी को कभी-कभी एक जैसी चीजों से बोरियत होने लगती है और महिलाओं का रसोई में सबसे ज्यादा वक्त गुजरता है। इसीलिए जैसे हम बाकी घर की सुंदरता का ध्यान रखते हैं, रसोई भी हमारे लिए उतनी ही अहम है। वे दिन गए जब मसाले बड़े-बड़े डिब्बों में रखे रहते थे जिसे निकालने में मशक्कत करनी पड़ती थी। आजकल डिब्बे ऐसे हों जो रसोई की ड्रॉयर में तो आ ही जाएं बल्कि जरूरत पड़ने पर डाइनिंग टेबल पर रखने में भी बुरे न लगें। इसीलिए अपनी रसोई की ड्रॉयर में मसाले रखने के खाने विभाजित कर दें और उसमें छोटे-छोटे डिब्बे लगाएँ। अपनी रसोई में हल्के चटक रंगों का प्रयोग अच्छी लाइटिंग के साथ करें। जैसे सफेद, क्रीम, हल्के पीले रंगो के साथ रसोई बड़ी लगेगी। अगर रसोई में खिड़की है तो दिन में उसे जरूर खोलें जिससे रसोई में प्राकृतिक रोशनी आ सके। इससे रसोई बड़ी लगेगी। यह जरूरी नहीं कि अच्छी रसोई के लिए हमेशा बहुत बड़े बजट या प्रोफेशनल की जरूरत पड़ती है। आप चाहें तो छोटे बदलावों से भी रसोई की काया पलट सकती हैं।

घर की डीक्लटरिंग भी है जरूरी—-
घर में सभी को ‘डीक्लटरिंग’ की आदत डालना चाहिए। जैसे पुराने अखबार, प्लास्टिक आदि जो अटाले वाले को बेचने हैं, वो जिम्मेदारी पतिदेव ले सकते हैं। पुराने कपड़े, जो बाइयों को देने हों, वो सासू माँ को सौंपें। आश्रम में दान करने की जिम्मेदारी ससुरजी ले सकते हैं। पुराने खिलौने, चादरें बच्चे, चौकीदार के बच्चों को दे सकते हैं। जिम्मेदारी बाँटने से न सिर्फ आप ‘रिलेक्स्ड’ महसूस करेंगी, बल्कि घर को व्यवस्थित करने में और ‘डीक्लटरिंग’ में सभी स्वयं को भी भागीदार मानेंगे। यदि आपको अनावश्यक सामान खरीदने की आदत है तो उसे बदलें। हमेशा ध्यान रखें कि आपका महत्व आपके सामान से नहीं, बल्कि आपके स्वभाव, आपके कार्यों से है। अनावश्यक भंडारण से जीवन पेचीदा हो जाता है। जिस वक्त किसी चीज को दान करने का विचार आए, उसी समय यह नेक काम कर डालें, क्योंकि वक्त गुजरने के साथ आपका मन भी पलट सकता है। तो, ‘डीक्लटरिंग’ की आदत अपनाएँ और देखें कि आपका जीवन कितना सुलझा हुआ और आसान लगता है।

जब बनाएँ अपना घर…
आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, पंच तत्व को अपने भवन के अधीन बनाना ही सच्चे अर्थों में वास्तु शास्त्र का रहस्य होता है। नए भवन निर्माण के समय कुछ मुख्य बातों पर ध्यान अवश्य दें : 1. जो प्लॉट त्रिकोण आकार का हो, उस पर निर्माण कराना हानिकारक होता है। 2. भवन निर्माण कार्य शुरू करने के पहले अपने आदरणीय विद्वान पंडित से शुभ मुहूर्त निकलवा लेना चाहिए। 3. भवन निर्माण में शिलान्यास के समय ध्रुव तारे का स्मरण करके नींव रखें। संध्या काल और मध्य रात्रि में नींव न रखें। 4. नए भवन निर्माण में ईंट, पत्थर, मिट्टी ओर लकड़ी नई ही उपयोग करना। एक मकान की निकली सामग्री नए मकान में लगाना हानिकारक होता है। 5. भवन का मुख्य द्वार सिर्फ एक होना चाहिए तो उत्तर मुखी सर्वश्रेष्ठ एवं पूर्व मुखी भी अच्छा होता है। मुख्य द्वार की चौखट चार लकड़ी की एवं दरवाजा दो पल्लों का होना चाहिए।

क्‍योंकि‍ हर रंग कुछ कहता है…
1. बेडरूम – बेडरूम के लि‍ए सबसे अच्‍छा कलर होता है गुलाबी। हालाँकि‍ आप हल्‍का हरा और हल्‍का नीला रंग भी प्रयोग कर सकते हैं। ये रंग आशा और उत्‍कर्ष के प्रतीक होते हैं। 2. लि‍विंग रूम – लि‍विंग रूम को पीले, भूरे या मटमैले रंग से रंगवाना चाहि‍ए। 3. मेडि‍टेशन रूम – यदि‍ आपके घर में ध्‍यान कक्ष है तो उसमें ऐसा रंग करें जो सादगी का एहसास दें जैसे – पीला या लाल या भगवा रंग। ये रंग आपके चि‍त्त की एकाग्रता में मदद करते हैं और आपके मन को शांति‍ भी प्रदान करते हैं। 4. लायब्रेरी – अगर आपने अपने घर में लायब्रेरी रूम बनाया है तो उसका रंग ब्राउन रखें। 5. डायनिंग रूम – डायनिंग रूम ऐसी जगह होती है जहाँ परि‍वार के सभी सदस्‍य एक साथ बैठते हैं और अपनी दि‍न भर के कार्यकलापों पर चर्चा और हँसी मजाक करते हैं। इसलि‍ए इसका रंग हरा, लाल या नीला रखें। सफेद या काले रंग से बचें।

>मांगलिक चिन्ह स्वास्तिक— पं. दयानन्द शास्त्री

पुरातन वैदिक सनातन संस्कृति का परम मंगलकारी प्रतीक चिन्ह स्वास्तिक अपने आप में विलक्षण है। इसे हमारे सभी व्रत, पर्व, त्यौहार, पूजा एवं हर मांगलिक अवसर पर कुंकुम से अंकित किया जाता है। यह मांगलिक चिन्ह अनादि काल से सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त रहा है। स्वस्तिक का अर्थ इसका सामान्य अर्थ शुभ, मंगल एवं कल्याण करने वाला है। स्वास्तिक शब्द सु और अस धातु से बना है, सु का अर्थ है शुभ, मंगल और कल्याणकारी, अस का अर्थ है अस्तित्व में रहना। यह पूर्णतः कल्याणकारी भावना को दर्शाता है। देवताओं के चहुं ओर घूमने वाले आभामंडल का चिन्ह ही स्वास्तिक होने के कारण वे देवताओं की शक्ति का प्रतीक होने के कारण इसे शास्त्रों में शुभ एवं कल्याणकारी माना गया है। स्वस्तिक की प्राचीनता स्वास्तिक का प्रयोग अनेक धर्म में किया जाता है। जैन व बौद्ध सम्प्रदाय व अन्य धर्मों में प्रायः लाल, पीले एवं श्वेत रंग से अंकित स्वास्तिक का प्रयोग होता रहा है। सिन्धू घाटी सभ्यता की खुदाई में ऐसे चिन्ह व अवशेष प्राप्त हुए हैं जिनसे यह प्रमाणित हो जाता है कि लगभग 2-3 हजार वर्ष पूर्व में भी मानव सम्भ्यता अपने भवनों में इस मंगलकारी चिन्ह का प्रयोग करती थी। द्वितीय विश्व युद्ध के समय एडोल्फी हिटलर ने उल्टे स्वास्तिक का चिन्ह अपनी सेना के प्रतीक रूप में शामिल किया था। सभी सैनिकों की वर्दी एवं टोपी पर यह उल्टा स्वास्तिक चिन्ह अंकित था। उल्टा स्वास्तिक ही उसकी बर्बादी का कारण बना। उसके शासन का नाश हुआ एवं भारी तबाही के साथ युद्ध में उसकी हार हुई। स्वास्तिक का प्रयोग शुद्ध, पवित्र एवं सही ढंग से उचित स्थान पर करना चाहिए। शौचालय एवं गन्दे स्थानों पर इसका प्रयोग वर्जित है। ऐसा करने वाले की बुद्धि एवं विवेक समाप्त हो जाता है। दरिद्रता, तनाव एवं रोग एवं क्लेश में वृद्धि होती है। स्वास्तिक की आकृति श्रीगणेश की प्रतीक है और विष्णु जी एवं सूर्यदेव का आसन मानी जाती है। इसे भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान प्राप्त है। प्रत्येक मंगल व शुभ कार्य में इसे शामिल किया जाता है। इसका प्रयोग रसोईघर, तिजोरी, स्टोर, प्रवेशद्वार, मकान, दुकान, पूजास्थल एवं कार्यालय में किया जाता है। यह तनाव, रोग, क्लेश, निर्धनता एवं शत्रुता से मुक्ति दिलाता है। स्वस्तिक रंग लाल क्यों? भारतीय संस्कृति में लाल रंग का सर्वाधिक महत्व है और मांगलिक कार्यों में इसका प्रयोग सिन्दूर, रोली या कुंकुम के रूप में किया जाता है। सभी देवताओं की प्रतिमा पर रोली का टीका लगाया जाता है। लाल रंग शौर्य एवं विजय का प्रतीक है। लाल टीका तेजस्विता, पराक्रम, गौरव और यश का प्रतीक माना गया है। लाल रंग प्रेम, रोमांच व साहस को दर्शाता है। यह रंग लोगों के शारीरिक व मानसिक स्तर को शीघ्र प्रभावित करता है। यह रंग शक्तिशाली व मौलिक है। यह रंग मंगल ग्रह का है जो स्वयं ही साहस, पराक्रम, बल व शक्ति का प्रतीक है। यह सजीवता का प्रतीक है और हमारे शरीर में व्याप्त होकर प्राण शक्ति का पोषक है। मूलतः यह रंग ऊर्जा, शक्ति, स्फूर्ति एवं महत्वकांक्षा का प्रतीक है। नारी के जीवन में इसका विशेष स्थान है और उसके सुहाग चिन्ह व श्रृंगार में सर्वाधिक प्रयुक्त होता है। स्त्राी के मांग का सिन्दूर, माथे की बिन्दी, हाथों की चूड़ियां, पांव का आलता, महावर, करवाचौथ की साड़ी, शादी का जोड़ा एवं प्रेमिका को दिया लाल गुलाब आदि सभी लाल रंग की महत्ता है। नाभि स्थित मणिपुर चक्र का पर्याय भी लाल रंग है। शरीर में लाल रंग की कमी से अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। लाल रंग से ही केसरिया, गुलाबी, मैहरुन और अन्य रंग बनाए जाते हैं। इन सब तथ्यों से प्रमाणित होता है कि स्वास्तिक लाल रंग से ही अंकित किया जाना चाहिए या बनाना चाहिए। स्वस्तिक का उपयोग स्वास्तिक बनाने के लिए धन चिन्ह बनाकर उसकी चारों भुजाओं के कोने से समकोण बनाने वाली एक रेखा दाहिनी ओर खींचने से स्वास्तिक बन जाता है। रेखा खींचने का कार्य ऊपरी भुजा से प्रारम्भ करना चाहिए। इसमें दक्षिणवर्त्ती गति होती है। सदैव कुंकुम, सिन्दूर व अष्टगंध से ही अंकित करना चाहिए। वैज्ञानिक हार्टमेण्ट अनसर्ट ने आवेएंटिना नामक यन्त्र द्वारा लाल कुंकुम से अंकित स्वास्तिक की सकारात्मक ऊर्जा को 100000 बोविस यूनिट में नापा है। ऊं (70000 बोविस) चिन्ह से भी अधिक सकारात्मक ऊर्जा स्वास्तिक में है। ऊं एवं स्वास्तिक का सामूहिक प्रयोग नकारात्मक ऊर्जा को शीघ्रता से दूर करता है। भवन, कार्यालय, दूकान या फैक्ट्री या कार्य स्थल के मुख्य द्वार के दोनों ओर स्वास्तिक अंकित करने से सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। पूजा स्थल, तिजोरी, कैश बॉक्स, अलमारी में भी स्वास्तिक स्थापित करना चाहिए। स्वास्तिक को धन-देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। इसकी चारों दिशाओं के अधिपति देवताओं, अग्नि, इन्द्र, वरूण एवं सोम की पहूजा हेतु एवं सप्तऋषियों के आशीर्वाद को प्राप्त करने में प्रयोग किया जाता है। इसके अपमान व गलत प्रयोग से बचना चाहिए। स्वास्तिक के प्रयोग से धनवृद्धि, गृहशान्ति, रोग निवारण, वास्तुदोष निवारण, भौतिक कामनाओं की पूर्ति, तनाव, अनिद्रा व चिन्ता से मुक्ति भी दिलाता है। जातक की कुण्डली बनाते समय या कोई शुभ कार्य करते समय सर्वप्रथम स्वास्तिक को ही अंकित किया जाता है। ज्योतिष में इस मांगलिक चिन्ह को प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, सफलता व उन्नति का प्रतीक माना गया है। मुख्य द्वार पर 6.5 इंच का स्वास्तिक बनाकर लगाने से से अनेक प्रकार के वास्तु दोष दूर हो जाते हैं। हल्दी से अंकित स्वास्तिक शत्राु शमन करता है। स्वास्तिक 27नक्षत्रों का सन्तुलित करके सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। यह चिन्ह नकारात्मक ऊर्जा का सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित करता है। इसका भरपूर प्रयोग अमंगल व बाधाओं से मुक्ति दिलाता है।(

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>आप और आपका घर–

>आप और आपका घर–

खुद बदलें अपनी रसोई—

पहले के समय में महिलाओं के गुणों को उसकी रसोई से आँका जाता था क्योंकि ज्यादातर महिलाएँ घर पर रहती थीं। भले ही आज महिलाएँ कामकाजी हैं फिर भी यह विचार आज भी मौजूद है। इसीलिए महिलाओं और रसोई के संबंध से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। हर महिला रसोई अपनी सुविधा अनुसार रखना चाहती है। पहले के मुकाबले आजकल ज्यादातर रसोइयाँ छोटी होती हैं इसलिए हर तरह का सामान लगाना इसमें बहुत मुश्किल है। कई बार ट्रांसफर की वजह से हमें शिफ्टिंग करनी पड़ती है। हर जगह अच्छी व बड़ी रसोई मिले यह जरूरी नहीं इसीलिए अपनी रसोई के लिए कुछ ऐसे कैबिनेट बनवाएँ जो आसानी से फिट हो जाते हैं और शिफ्ट करते समय जिन्हें निकालने में दिक्कत भी नहीं होती। इससे आप कहीं भी रहें रसोई फैली नहीं लगेगी। और सामान रखने की जगह भी रहती है। साथ ही अपने कैबिनेट का लुक बदलने के लिए इसे पेंट वगैरह करवाती रहें। इससे आपको नयापन महसूस होगा। ऐसे ही कुछ छोटी-छोटी चीजों से आप अपनी रसोई को न केवल काम की बल्कि आकर्षक भी बना सकती हैं।

पार्टी के इंतजाम में रखें इन्‍हें याद…

1. अगर आपने पार्टी का समय 7 बजे रखा है तो अपने डेकोरेटर, केटरिंग वाले को कहें कि वे 7 बजे से पहले ही सब रेडी रखें। 2. आपके घर का फंक्शन है। सो, जाहिर है कि आप ज्यादा व्यस्त होंगे। ऐसे में किसी भरोसेमंद करीबी पर यह जिम्मेदारी डाल दें कि वह सारे इंतजाम समय से पहले और सही ढंग से करवाए। 3. पार्टी का समय होने से पहले वेटरों को बुलाकर समझाएँ कि वे स्नैक्स, ड्रिंक्स आदि को हॉल-पंडाल में हर जगह, हर किसी के पास लेकर जाएँ। यह न हो कि आगे की कुर्सियों पर बैठे लोग तो मजे लेकर खाते-पीते रहें और दूर बैठे मेहमान मुंह ताकते रहें। 4. डेकोरेशन वाले या घर के किसी आदमी को कह कर समय से पहले पूरे पंडाल, हॉल में किसी सोंधी खुशबू वाले फ्रेशनर का छिड़काव माहौल को खुशनुमा बनाएगा। 5. अगर पनीर टिक्का, तंदूरी चाट जैसे आइटम रखे गए हैं तो बार-बे-क्यू वाले से कहें कि वह पहले ही तैयारी करके बैठे क्योंकि ऐसे आइटम बनते देर में हैं मगर इनकी माँग ज्यादा रहती है।

ऐसा हो लॉकर रूम—

1. उत्तर दि‍शा लॉकर रूम के लि‍ए सबसे उपयुक्त दि‍शा है। उत्तर में यदि‍ कि‍सी वजह से लॉकर रूम नहीं बनाया जा सकता है तो इसे पूर्व में रखें। 2. कि‍सी वजनदार चीज के नीचे ति‍जोरी नहीं रखनी चाहि‍ए। 3. ति‍जोरी को कमरे के कि‍सी भी कोने में नहीं रखना चाहि‍ए। 4. ति‍जोरी कक्ष में कचरा न होने दें। ति‍जोरी कक्ष को हमेशा साफ-सुथरा होना चाहि‍ए। 5. सोना और चाँदी जैसी चीजें लॉकर के पश्चि‍मी या दक्षि‍णी साइड में रखना चाहि‍ए। 6. ति‍जोरी के सामने एक शीशा रखना चाहि‍ए जि‍समें ति‍जोरी का प्रति‍बिंब दि‍खाई दे। ऐसा कहा जाता है कि‍ इससे पैसा दुगुना होता है। 7. ति‍जोरी कक्ष में बहते हुए पानी के झरने का चि‍त्र या कोई शोपीस होना चाहि‍ए। इससे कक्ष में सकारात्‍मक ऊर्जा फैलती है और लक्ष्मी आती है।

प्रदूषण मुक्त हो आपका घर—

अक्सर हम सोच लेते हैं कि प्रदूषण सिर्फ बाहर होता है और घर के भीतर का वातावरण बिलकुल स्वच्छ होता है तो यह सोचना बिलकुल गलत है। घर को पॉल्यूशन फ्री बनाने के लिए कुछ बातों पर गौर करें तो इससे छुटकारा पाया जा सकता है। घर के भीतर हवा में भी धूलकण, केमिकल्स और विषाणु मौजूद होते हैं, जिनकी वजह से कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएँ होती हैं। अपने लिविंग रूम में ज्यादा पौधे न रखें क्योंकि यहाँ पूरा परिवार सबसे ज्यादा वक्त-बिताता है, इसलिए फर्नीचर और सोफे की नियमित रूप से डस्टिंग करें। अक्सर पेट्स परिवार के सदस्यों के साथ लिविंग रूम में ही रहना पसंद करते हैं। ऐसी स्थिति में पालतू जानवर की सफाई का विशेष रूप से ध्यान रखें, क्योंकि उनसे सबसे ज्यादा एलर्जी फैलती है। लिविंग रूम में ज्यादा पौधे न रखें, क्योंकि रात में जब घर बंद होता है तो इन पौधों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड गैस सेहत के लिए नुकसानदेह साबित होगा।

कहाँ बनाएँ ओवरहैड टैंक—

1. घर में ओवरहैड टैंक का स्‍थान बहुत महत्‍वपूर्ण होता है इसलि‍ए जरूरी है कि‍ इसे वास्‍तु के अनुसार बनाया जाए। पानी की टंकी हमेशा पश्चि‍मी या दक्षि‍ण पश्चि‍म दि‍शा में होनी चाहि‍ए। 2. यदि‍ ओवरहैड टैंक दक्षि‍ण पश्चि‍म दि‍शा में बनाया गया है तो उसे दो फीट ऊँचे स्‍लैब या चबूतरे पर बनाना चाहि‍ए। 3. वैसे उत्तर पूर्व की दि‍शा पानी से संबंधि‍त है लेकि‍न फि‍र भी इस भाग में ओवरहैड टैंक नहीं बनाना चाहि‍ए क्‍योंकि‍ इस दि‍शा को वास्‍तु के अनुसार कि‍सी भी तरह भारी नहीं होना चाहि‍ए। हालाँकि‍ यहाँ एक छोटी पानी की टंकी रखी जा सकती है। 4. दक्षि‍ण पश्चि‍म दि‍शा में बनाया गया ओवरहैड टैंक अशुभ परि‍णाम देता है। इससे लक्ष्मी की हानि‍ और दुर्घटनाओं की संभावना बनती है। ओवरहैड टैंक का लीक करना भी अशुभफल देता है

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>वास्तु की नजर से पूजाघर—–

>वास्तु की नजर से पूजाघर—–

घर में पूजा के कमरे का स्थान सबसे अहम् होता है। यह वह जगह होती है, जहाँ से हम परमात्मा से सीधा संवाद कर सकते हैं। ऐसी जगह जहाँ मन को सर्वाधिक शांति और सुकून मिलता है। प्राचीन समय में अधिकांशतः पूजा का कमरा घर के अंदर नहीं बनाया जाता था।

घर के बाहर एक अलग स्थान देवता के लिए रखा जाता था जिसे परिवार का मंदिर कहते थे। बदलते दौर के साथ एकल परिवार का चलन बढ़ा है, इसलिए पूजा का कमरा घर के भीतर ही बनाया जाने लगा है। अतएव वास्तु अनुसार पूजा घर का स्थान नियोजन और सजावट की जाए तो सकारात्मक ऊर्जा अवश्य प्रवाहित होती है।

स्थान : पूजा का कमरा घर के उत्तर-पूर्व कोने में बनाने से शांति, सुकून, स्वास्थ्य, धन और प्रसन्नता मिलती है। पूर्व या उत्तर दिशा में भी पूजा स्थल बना सकते हैं। पूजाघर के ऊपर या नीचे की मंजिल पर शौचालय या रसोईघर नहीं होना चाहिए, न ही इनसे सटा हुआ। सीढ़ियों के नीचे पूजा का कमरा बिलकुल नहीं बनवाना चाहिए। यह हमेशा ग्राउंड फ्लोर पर होना चाहिए, तहखाने में नहीं। पूजा का कमरा खुला और बड़ा बनवाना चाहिए।
घर में पूजा के कमरे का स्थान सबसे अहम् होता है। यह वह जगह होती है, जहाँ से हम परमात्मा से सीधा संवाद कर सकते हैं। ऐसी जगह जहाँ मन को सर्वाधिक शांति और सुकून मिलता है। प्राचीन समय में अधिकांशतः पूजा का कमरा घर के अंदर नहीं बनाया जाता था।

मूर्तियाँ : कम वजन की तस्वीरें और मूर्तियाँ ही पूजाघर में रखनी चाहिए। इनकी दिशा पूर्व, पश्चिम, उत्तर मुखी हो सकती है, लेकिन दक्षिण मुखी कभी नहीं। भगवान का चेहरा किसी भी वस्तु से ढँका नहीं होना चाहिए, फूल और माला से भी नहीं। इन्हें दीवार से एक इंच दूर रखना चाहिए, एक-दूसरे के सम्मुख नहीं। इनके साथ अपने पूर्वजों की तस्वीर नहीं रखनी चाहिए। खंडित मूर्तियाँ पूजाघर के अंदर कभी नहीं रखना चाहिए। अगर कोई मूर्ति खंडित हो जाए तो उसे तुरंत प्रवाहित करा देना चाहिए।

दीपक : दीया पूजा की थाली में, भगवान के सामने रखा होना चाहिए। यह दरवाजे में रखा होना चाहिए, ऊँची जगह या प्लेटफार्म पर नहीं। दीपक में दो जली हुई बत्तियाँ होनी चाहिए, एक पूर्व और एक पश्चिम मुखी।

दरवाजा : दरवाजा और खिड़की उत्तर या पूर्व में होना चाहिए। यह टीन या लोहे का नहीं बना होना चाहिए। यह दीवार के बीचोंबीच स्थित होना चाहिए। अलमारी, टांड या कैबिनेट की ऊँचाई मूर्तियों के स्थान की ऊँचाई से अधिक नहीं होनी चाहिए।

अन्य : धूप, अगरबत्ती या हवन कुंड पूजाघर के दक्षिण-पूर्व कोण में रखने चाहिए। सौंदर्य प्रसाधन की या कोई भी अन्य वस्तु यहाँ नहीं रखनी चाहिए। पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा करनी चाहिए, दक्षिण दिशा की ओर नहीं। पूजा स्थल के ऊपर भारी सामान नहीं रखना चाहिए। धनया गहने पूजाघर में नहीं रखने, छिपाने चाहिए।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>धन किससे मिलेगा -सत्यज्ञ—–

>धन किससे मिलेगा -सत्यज्ञ—-

धन अर्जन के लाखों साधन हैं। कोई विद्या से धन अर्जित करता है, कोई परिश्रम से धन कमाता है, कोई जुआ, सट्टा या लाटरी से धन अर्जित करता है, कोई चोरी, डकैती, ठगी या राहजनी से धन कमाता है, धन कमाने का कोई न कोई साधन व्यक्ति अपनाता है। कलयुग में तो धन के बिना व्यक्ति को मान-सम्मान व यश भी नहीं मिल पाता है। इस भौतिक युग में हर कोई आगे बढ़ने की होड़ में शामिल है। धन किससे और कैसे मिलेगा? जातक जन्म से धनी है या कर्म से या उसे मातुल कुल से धन मिलेगा या पितृकुल से या लाटरी या सट्टे, शेयर मार्केट या अवैध धन्धों या अनैतिक हथकन्डों या गढ़ा धन मिलेगा। जातक को निजी व्यापार से धनलाभ होगा या शासन से दण्ड स्वरूप धनहानि झेलनी पड़ेगी या किसी सरकारी सेवा से धनलाभ होगा या दूजों के परिश्रम से धनलाभ होगा। इन सभी बातों का ज्ञान ज्योतिष द्वारा कुण्डली के विश्लेषण से ज्ञात होता है। कुण्डली के दूसरे भाव से धन की मात्रा का एवं ग्यारहवें भाव से धनलाभ की रीति का विचार किया जाता है। चन्द्रमा नकदी का स्वामी है और शनि कोषाध्यक्ष है। १. चन्द्र एवं शनि की युति हो तो जातक अवैध रीति से धन एकत्र करता है। २. चन्द्र-गुरु की युति धनकोश है जो धन जोड़ती है। ३. चन्द्र-शनि-गुरु कुण्डली में स्वगृही, मित्रक्षेत्री या उच्च का हो तो जातक को अत्यधिक धनलाभ होता है एवं उसका सम्मान बढ़ता है। ४. प्रायः देखा गया है कि सूर्य-गुरु मित्रक्षेत्री या उच्च के होकर अकेले या एक साथ बैठे हों तो जातक का धन दिनप्रतिदिन बढ़ता जाता है। यदि सूर्य-बुध मित्रक्षेत्री, स्वक्षेत्री या उच्च के होकर अकेले या एक साथ बैठे हों तो जातक का धन दिन दूना रात चौगुना बढ़ता है। इसी प्रकार बुध-शनि स्वक्षेत्री, मित्रक्षेत्री या उच्च का होकर अकेले या एक साथ बैठे हों तो जातक का धन दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है। ५. सूर्य-गुरु की युति कुण्डली में हो तो जातक को धनवान लोगों से धनलाभ होता है। शनि-गुरु की युति हो तो जातक को अधिकतर मजदूर वर्ग से धनलाभ होता है। ६. सूर्य-बुध की युति हो तो जातक को सरकार से धनलाभ होगा। यदि एकादश में पुरुष ग्रह या शुभग्रह स्थित हो तो जातक को प्रत्येक प्रकार से धनलाभ होता है। ७. जातक की जन्मकुण्डली में दूसरे भाव में जो भी ग्रह बैठा हो जातक को उसी ग्रह से सम्बन्धित सम्बन्धी से धनलाभ होगा। ग्रहों से सम्बन्धी इस प्रकार समझें- सूर्य-स्वयं। चन्द्र-माता, बुआ, मौसी, चाची, सास, चाची, बुआ। मंगल शुभ हो तो-बड़ा भाई। मंगल अशुभ हो तो साला, मौसेरा भाई, बुआ का पुत्रा। बुध-बहिन, मौसी, साली, लड़की, भाभी, भतीजी, बुआ। गुरु-पिता, दादा, कुलपुरोहित, साधु, महात्मा, ऋषि। शुक्र-स्त्री, प्रेमिका या पत्नी। शनि-चाचा, ताऊ। राहु-ससुराल, ननिहाल। केतु-पुत्रा, भांजा, दोहता, पोता। ८. लग्न में सूर्य हो तो जातक निज पुरुषार्थ से धन अर्जित करता है या सूर्य संबंधी वस्तुओं से धन पाता है। ९. चतुर्थ भाव में गुरु हो तो गुरु की वस्तुओं एवं गुरु संबंधियों से लाभ होता है। १०. सप्तम भाव में शनि बैठा हो तो शनि की वस्तुओं और चाचा या ताऊ से धनलाभ होता है। ११. दशम भाव में मंगल हो तो जातक को मंगल की वस्तुओं या भाई, साला, मौसेरे या चचेरे भाई से धनलाभ होता है। मंगल-शनि की युति किसी भी भाव में हो तो जातक चिकित्सा या अपराधी प्रवृत्ति से धन अर्जित करता है। १२. सप्तम भाव में अकेला चन्द्र हो तो जातक धनी होता है। १३. तृतीय भाव के ग्रहों से सगे-संबंधियों या साझेदारी से लाभ होता है। पंचम भाव के ग्रहों से सन्तान, भांजा या भतीजे से लाभ होता है। १४. एकादश भाव के ग्रहों से बुजुर्गों द्वारा निज श्रम से धनलाभ करता है। द्वितीय भाव के ग्रहों से ससुराल या मंदिर से धनलाभ करता है। १५. छठे भाव के ग्रहों से ननिहाल, पुत्रियों के रिश्तेदारों से धनलाभ करता है। छठे भाव में केतु के मित्रा ग्रह सूर्य-शुक्र-राहु बैठे हों तो साहूकारी से धन प्राप्त होता है। कुण्डली का विश्लेषण करके आप यह ज्ञात कर सकते हैं कि आपको किस संबंधी से धनलाभ होगा। यह विचार उक्त प्रकार से कर सकते हैं। इसके लिए पारखी दृष्टि चाहिए जोकि ग्रहों का विश्लेषण कर सके।

>भक्तों का संकट दूर करती हैं माँ —सच्चे हृदय से करो माँ का सुमिरन

जब-जब भी भक्तों ने अपने हृदय से मातेश्वरी का स्मरण किया है, तो समय साक्षी है कि माँ जगदम्बा तत्काल किसी भी रूप में अपने भक्तों का संकट दूर कर उसे अपार स्नेह और वात्सल्य प्रदान करती हैं लेकिन कोई छल-कपट या दंभ से माँ को चुनौती देता है तो उस पर अपार कोप ढाती हैं।

माँ तो बस प्रेम की भूखी हैं। अतः पाखण्ड न करके केवल प्रेम से, सच्चे हृदय से माँ का सुमिरन करो। माँ तुम्हारे सब दुख दूर कर तुम्हें मोक्ष प्रदान करेंगी। नवरात्र उपासना के दौरान जहाँ विधि-विधान से अनुष्ठान हो रहे थे। वहीं ज्ञानी पंडितों द्वारा लोगों को आदि शक्ति की उपासना का महत्व भी बताया गया।

कहा जाता है कि माता जानकी जी ने गौरी माँ की उपासना से ही श्रीराम को प्राप्त किया तथा माँ सीता की भक्ति से हनुमान जी आठों सिद्धियों और नौ निधियों को देने वाले बन गए। अतः नवरात्रि उपासना यदि श्री हनुमान की अध्यक्षता में की जाती है तो माता भगवती तुरंत फलदायी हो जाती हैं।

भगवती दुर्गा के आगे-आगे विजय ध्वज लेकर चलने वाले हनुमान जी ही होते हैं। अतः श्री हनुमान सदैव माँ की सेवा में तत्पर रहते हैं।
नवरात्रि में पाँचवाँ दिन स्कंदमाता का होता है। यह भगवान स्कंद कुमार कार्तिकेय के नाम से भी जाने जाते हैं। भगवान स्कंद अर्थात् कार्तिकेय की माता होने के कारण माँ दुर्गा के इस पाँचवें स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में स्थित रहता है, इनकी वाणी शुभ है। कमल के आसन पर ये विराजमान हैं, इसलिए इन्हें पदासना देवी भी कहते हैं। इनका वाहक सिंह है।

दुर्गा शक्तियों में से छठवें दिन कात्यायन देवी का पूजन किया जाता है। माँ कात्यायनी अमोद फलदायिनी हैं। दुर्गा पूजा के छठवें दिन इस स्वरूप की पूजा की जाती है। इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित रहता है। योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान है।

आदि शक्ति दुर्गा का सप्तम स्वरूप कालरात्रि हैं। ये काल का नाश करने वाली हैं, इनके तीन नेत्र, साँसों से अग्नि निकलती है, हाथों में ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा से भगवती कालिका अपने भक्तों को निर्भयता का वरदान देती है। इस दिन साधक को अपना चित्त भानु चक्र, मध्य ललाट में स्थिर कर साधना करनी चाहिए।

माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति महागौरी है। नवरात्र के आठवें दिन इनकी पूजा का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों के सभी कल्मष घुल जाते है। उसके पूर्व संचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। भविष्य में पाप-संताप, दैन्य-दुःख उसके पास कभी नहीं आते। वह सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है।

माँ दुर्गाजी की नवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियाँ होती हैं। ब्रह्मावैवर्त्त पुराण में श्रीकृष्ण जन्मखंड में ये सिद्धियाँ अठारह बताई गई हैं। माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>बाल रूप कन्याएँ साक्षात शक्ति स्वरूपा —

नवरात्रि में कन्या पूजन का विशेष महत्व है। ऐसे श्रद्धालुओं की कमी नहीं है, जो पूरे नौ दिनों तक कन्या पूजन करते हैं। वहीं ज्यादातर लोग अष्टमी के दिन विधि-विधान से कन्या पूजन कर उन्हे भोजन कराते हैं। शक्ति साधना के पर्व में कुँवारी पूजन का महत्वपूर्ण स्थान है।

स्नेह, सरलता और पवित्रता की दृष्टि से कुँवारी कन्याएँ साक्षात शक्ति स्वरूपा हैं। अन्य पूजन और अनुष्ठानों में ब्रम्हभोज की प्रधानता बताई गई है, लेकिन नवरात्रि में शक्ति की उपासना के दौरान अनुष्ठानों की पूर्णता के लिए कन्या पूजन की प्राथमिता बताई गई है।

शक्ति का प्रादुर्भाव कुँवारी रूप में हुआ है जिसे देवताओं ने अंशभूत शक्तियाँ प्रदान की है। वृहन्नली तंत्र के अनुसार पूजित कुँवारियाँ विघ्न, भय और उत्कृष्ठ शत्रु को नष्ट करने में सक्षम हैं। कुँवारिका पूजन में जाति भेद का विचार करना भी अनुचित है।
दुर्गाष्टमी और महानवमीं के दिन जो साधक कुँवारी कन्याओं का पूजन कर कन्याओं को अन्न, वस्त्र और जल अर्पण करते हैं, उसका फल अन्न मेरू के समान और जल समुद्र के समान अक्षुण्य और अनंत होता है।

नवरात्र अनुष्ठान में साधक को दो से दस वर्ष की दस कन्याओं के साथ भैरव पूजन करना चाहिए। उन्होंने बताया कि दो वर्ष की कन्या कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमुति, चार वर्ष की कन्या कल्याणी, पाँच वर्ष की रोहिणी, छः वर्ष की रोहिणी, सात वर्ष की चंद्रिका, आठ वर्ष की शांभवी, नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष की कन्या सुभद्रा मानी गई है।

अत: दस वर्ष तक की कन्याओं को ही पूजन में शामिल किया जाना चाहिए। शास्त्र में 11 वर्ष से अधिक आयु वाली कन्याओं के पूजन को शास्त्र सम्मत नहीं माना गया है।

>नौ रूपों को पूजने का पर्व नवरात्रि–जगदम्बा माता के रूप—

शरणागतदीनार्तपरित्राण परायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि! नारायणि नमोऽस्तु ते।
- शरण में आए हुए प्राणियों एवं दीन-दुःखी जीवों की रक्षा के लिए सर्वदा रत, सबके कष्ट को दूर करने वाली हे देवि! हे देवि! आपको नमस्कार है।

पौराणिक कहावतों के अनुसार जय-विजय नामक दो देवदूत भगवान के द्वारपाल थे। एक बार की बात है। दैत्यों की शक्ति वृद्धि के कारण देवता उन दैत्यों से परास्त होकर शक्ति लोक में जगदम्बा माता शक्ति का आवाहन कर रहे थे। जगदम्बा उनके आवाहन पर उनके पास जा रही थीं। किन्तु द्वारपालों ने उन्हें अन्दर जाने से मना कर दिया। सप्तर्षि आदि ऋषि-मुनि जो आवाहन कर्म में भाग लेने जा रहे थे। उन्होंने बताया कि इन्हें जाने दो। इन्हीं की पूजा अन्दर हो रही है। किन्तु द्वारपाल नहीं माने।

उन्होंने बताया कि हम अपने स्वामी के आज्ञापालक हैं। दूसरे किसी की आज्ञा पालन नहीं कर सकते। हमें आदेश है कि किसी को भी बिना अनुमति के अन्दर न आने दिया जाए। यदि इसी देवी की पूजा अन्दर हो रही है। तो हम भी इन्हें प्रणाम करते हैं। इन्हें अपना शीश झुकाते हैं। किन्तु अन्दर नहीं जाने देंगे।

यह सुनकर माता अत्यंत क्रुद्ध हो गईं। उन्होंने नौ विग्रह साकार रूप धारण कर लिए और शाप दिया कि तुम अभी दैत्य हो जाओ। सभी देवी-देवता भयभीत हो गए। सबने मिलकर देवी की प्रार्थना की। देवी ने प्रसन्न होकर कहा कि तुम्हें मेरे नौ रूपों ने शाप दिया है। अतः तुम वर्तमान शरीर को मिलाकर नौ शरीर धारण करोगे। किन्तु तुम्हारा नौवाँ शरीर दैत्य का नहीं अपितु मूल रूप होगा।

अतः तुम्हें मात्र 7 शरीर ही दैत्य के धारण करने पड़ेंगे। इस शरीर से लेकर नौ शरीर तक तुम्हें मैं अपने प्रत्येक रूप का यंत्र प्रदान कर रही हूँ, जिससे तुम्हें समस्त सांसारिक सुख व यश प्राप्त होगा तथा मेरे अलावा तुम्हारा कोई वध भी नहीं कर सकेगा। यह सुनकर दोनों द्वारपाल बहुत प्रसन्न हुए।

उन्होंने स्तुति करते हुए कहा कि- ‘हे! माता आपका शाप तो हमारे लिए बहुत बड़ा वरदान हो गया। ऐसा शाप तो सम्भवतः किसी महान तपस्वी या देवी-देवता को भी प्राप्त नहीं हो सकता है।’

माता ने पूछा कि- तुम यह कैसे कह रहे हो?

उन्होंने बताया कि इस समय जो यंत्र आपके हाथ की हथेली पर दिखाई दे रहा है। वह यह बता रहा है कि आपसे बड़ा यह आपका यंत्र अब सदा ही हमारे साथ रहेगा तथा आप तो आवाहन-पूजन एवं बहुत बड़े यज्ञ-तपस्या से दर्शन देंगी। किन्तु यंत्र रूप में तो सदा आप हमारे साथ रहेंगी। किंतु हे! माता हमें एक वरदान और चाहिए।

माता ने वर माँगने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि- ‘हे भगवती! हम तो पूजा-पाठ एवं यज्ञ-तप आदि वेद-विधि से कर नहीं पाएँगे। फिर यह यंत्र कैसे सिद्ध होगा?

माता ने वरदान दिया- जाओ! आज से मेरे यह सारे यंत्र स्वयं सिद्ध हुए। मात्र इसे जागृत करना होगा। जो तुम इन्हें मेरे आवाहन मात्र से पूर्ण कर सकते हो। और तब से देवी के नौ यंत्र स्वयं सिद्ध हो गए।

क्रम से यह नौ यंत्र निम्न प्रकार हैं। जिसे स्वयं भगवान शिव ने भी अनुमोदित किया है-

आदौसंवत्सरेऽमायां संक्रमणे चाशुभे रवौ। निशाकरौ तंत्र कार्यार्थमष्टम्यां सर्वोत्तमम्‌।
यंत्र मंत्र तंत्रार्थं देवि विनवाधा निवारणम्‌। अभिप्शितमवाप्त्यर्थं अमोघ नवरात्र वर्तते॥

अर्थात् संवत्सर के प्रारंभ, होली के दिन, अमावस्या अर्थात् दीपावली के दिन, सूर्य-चन्द्र संक्रमण अर्थात् ग्रहण में एवं नवरात्र में विशेषतः अष्टमी के दिन तुम्हारे नौ यंत्र सहज ही जागृत हो जाते हैं।
जिसे धारण करने वाले के लिए कुछ भी पाना दुर्लभ नहीं होता है।

‘सुदीर्घश्चहयग्रीवो कर्कोकुम्भश्चचित्रकं। कात्यायनी संवर्तको जातो कालिका यामिनी तथा॥’

ये ही नौ माता दुर्गा के नौ यंत्र हैं। ये स्वयं सिद्ध यंत्र हैं। इन्हें सिद्ध नहीं करना नहीं पड़ता। इन्हें मात्र धारण ही करना पड़ता है। ये क्रमशः प्रथम रूप या दिन से नववें दिन के यंत्र हैं।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>राशि के अनुरूप मंत्र जाप ——

>राशि के अनुरूप मंत्र जाप ——
नवरात्रि में करें विशेष लक्ष्मी मंत्र—–
व्यक्ति यदि अपनी राशि के अनुकूल मंत्र का जाप करे तो लाभकारी होता है। इन मंत्रों का कोई विशेष विधान नहीं है लेकिन सामान्य सहज भाव से स्नान के पश्चात अपने पूजा घर या घर में शुद्ध स्थान का चयन कर प्रतिदिन धूप-दीप के पश्चात ऊन या कुशासन पर बैठें एवं अपनी शक्ति अनुरूप एक, तीन या पाँच माला का जाप करें। विशेषकर उन लोगों के लिए जो माँ की आराधना में अधिक समय नहीं दे सकते और जो लोग कठिन मंत्रों का जाप नहीं कर सकते।

निश्चित ही इसका प्रभाव होगा, जिससे धन, यश और समृद्धि की वृद्धि होगी।

राशि – लक्ष्मी मंत्र

मेष – ॐ ऐं क्लीं सौं:

वृषभ – ॐ ऐं क्लीं श्रीं

मिथुन – ॐ क्लीं ऐं सौं:

कर्क – ॐ ऐं क्लीं श्रीं

सिंह – ॐ ह्रीं श्रीं सौं:

कन्या – ॐ श्रीं ऐं सौं:

तुला – ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं

वृश्चिक – ॐ ऐं क्लीं सौं:

धनु – ॐ ह्रीं क्लीं सौं:

मकर – ॐ ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं सौं:

कुंभ – ॐ ह्रीं ऐं क्लीं श्रीं

मीन – ॐ ह्रीं क्लीं सौं:

>माँ भगवती ऐसे होगी प्रसन्न—-माँ की कृपा प्राप्ति के सरल उपाय—–नवरात्रि विशेष—2011

नवरात्रि में माँ दुर्गा की पूजा विशेष फलदायी है। नवरात्रि ही एक ऐसा पर्व है जिसमें महाकाली, महालक्ष्मी और माँ सरस्वती की साधना करके जीवन को सार्थक किया जा सकता है। ऐसी माँ दुर्गा की कृपा प्राप्ति के लिए कुछ सरल उपाय नीचे दिए जा रहे हैं।

- माँ दुर्गा को तुलसी दल और दूर्वा चढ़ाना निषिद्ध है।

- अपने घर के पूजा स्थान में भगवती दुर्गा, भगवती लक्ष्मी और माँ सरस्वती के चित्रों की स्थापना करके उनको फूलों से सजाकर पूजन करें।

- नौ दिनों तक माता का व्रत रखें। अगर शक्ति न हो तो पहले, चौथे और आठवें दिन का उपवास अवश्य करें। माँ भगवती की कृपा जरूर प्राप्त होगी।

- नौ दिनों तक घर में माँ दुर्गा के नाम की ज्योत अवश्‍य जलाएँ।

- अधिक से अधिक नवार्ण मंत्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै’ का जाप अवश्‍य करें।

- इन दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ अवश्‍य करें।

- पूजन में हमेशा लाल रंग के आसन का उपयोग करना उत्तम होता है। आसन लाल रंग का और ऊनी होना चाहिए।

- लाल रंग का आसन न होने पर कंबल की आसन इतनी मात्रा में बिछाकर उस पर लाल रंग का दूसरा कपड़ा डालकर उस पर बैठकर पूजन करना चाहिए।

- पूजा पूरी होने के पश्‍चात आसन को प्रणाम करके लपेटकर सुरक्षित जगह पर रख दीजिए।

- पूजा के समय लाल वस्त्र पहनना शुभ होता है। लाल रंग का तिलक भी जरूर लगाएँ। लाल कपड़ों से आपको एक विशेष ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

- माँ को प्रात: काल के समय शहद मिला दूध अर्पित करें। पूजन के पास इसे ग्रहण करने से आत्मा व शरीर को बल प्राप्ति होती है। यह एक उत्तम उपाय है।

- आखिरी दिन घर में रखीं पुस्तकें, वाद्य यंत्रों, कलम आदि की पूजा अवश्य करें।

- अष्‍टमी व नवमी के दिन कन्या पूजन करें।

- उपरोक्त नियमों का पालन कर नौ दुर्गा को प्रसन्न करें।
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माँ दुर्गा के नौ नैवेद्य–नौ दिन का विशेष प्रसाद—

* प्रथम नवरात्रि के दिन माँ के चरणों में गाय का शुद्ध घी अर्पित करने से आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है। तथा शरीर निरोगी रहता है।

* दूसरे नवरात्रि के दिन माँ को शक्कर का भोग लगाएँ व घर में सभी सदस्यों को दें। इससे आयु वृद्धि होती है।

* तृतीय नवरात्रि के दिन दूध या दूध से बनी मिठाई खीर का भोग माँ को लगाकर ब्राह्मण को दान करें। इससे दुखों की मुक्ति होकर परम आनंद की प्राप्ति होती है।

* माँ दुर्गा को चौथी नवरात्रि के दिन मालपुए का भोग लगाएँ। और मंदिर के ब्राह्मण को दान दें। जिससे बुद्धि का विकास होने के साथ-साथ निर्णय शक्ति बढ़ती है।

* नवरात्रि के पाँचवें दिन माँ को केले का नैवैद्य चढ़ाने से शरीर स्वस्थ रहता है।

* छठवीं नवरात्रि के दिन माँ को शहद का भोग लगाएँ। जिससे आपके आकर्षण शक्त्ति में वृद्धि होगी।

* सातवें नवरात्रि पर माँ को गुड़ का नैवेद्य चढ़ाने व उसे ब्राह्मण को दान करने से शोक से मुक्ति मिलती है एवं आकस्मिक आने वाले संकटों से रक्षा भी होती है।

* नवरात्रि के आठवें दिन माता रानी को नारियल का भोग लगाएँ व नारियल का दान कर दें। इससे संतान संबंधी परेशानियों से छुटकारा मिलता है।

* नवरात्रि की नवमी के दिन तिल का भोग लगाकर ब्राह्मण को दान दें। इससे मृत्यु भय से राहत मिलेगी। साथ ही अनहोनी होने की‍ घटनाओं से बचाव भी होगा।
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नवदुर्गा के आसान सिद्ध मंत्र –नवरात्रि विशेष—

दुर्गा सप्तशती में कुछ ऐसे सिद्ध मंत्र हैं, जिनके द्वारा हम अपनी मनोकामना की पूर्ति कर सकते हैं।

कैसे करें जाप :- नवरात्रि के प्रतिपदा के दिन घटस्थापना के बाद संकल्प लेकर प्रातः स्नान करके दुर्गा की मूर्ति या चित्र की पंचोपचार या दक्षोपचार या षोड्षोपचार से गंध, पुष्प, धूप दीपक नैवेद्य निवेदित कर पूजा करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।

शुद्ध-पवित्र आसन ग्रहण कर रुद्राक्ष, तुलसी या चंदन की माला से मंत्र का जाप एक माला से पाँच माला तक पूर्ण कर अपना मनोरथ कहें। पूरी नवरात्रि जाप करने से मनोवांच्छित कामना अवश्य पूरी होती है।

उपरोक्त सारे मंत्र विधिनुसार करने पर मनुष्‍य अपने पापों और कष्‍टों को दूर करके माता के आशीर्वाद का पात्र बन जाता है। नवरात्रि में संयमपूर्वक की गई प्रार्थना और भक्ति माता स्वीकार करती है और साथ ही अपने भक्तों के कष्‍टों का निवारण करते हुए उन्हें मोक्ष प्राप्ति का मार्ग दिखाती है।

* सर्वकल्याण के लिए-
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुऽते॥

* आरोग्य एवं सौभाग्य प्राप्ति के लिए-
देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परमं सुखम्‌।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि॥

* बाधा मुक्ति एवं धन-पुत्रादि प्राप्ति के लिए-
सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यों मत्प्रसादेन भवष्यति न संशय॥

* सुलक्षणा पत्नी प्राप्ति के ‍‍‍लिए-
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसारसागस्य कुलोद्‍भवाम्।।

* दरिद्रता नाश के लिए-
दुर्गेस्मृता हरसि भतिमशेशजन्तो: स्वस्थैं: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दरिद्रयदुखभयहारिणी कात्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।।

* शत्रु नाश के लिए-
ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्‍टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वाम् कीलय बुद्धिम्विनाशाय ह्रीं ॐ स्वाहा।।

* सर्वविघ्ननाशक मंत्र-
सर्वबाधा प्रशमनं त्रेलोक्यस्यखिलेशवरी।
एवमेय त्वया कार्य मस्माद्वैरि विनाशनम्‌॥

* ऐश्वर्य प्राप्ति एवं भय मुक्ति मंत्र-
ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः।
शत्रु हानि परो मोक्षः स्तुयते सान किं जनै॥

* विपत्तिनाशक मंत्र-
शरणागतर्दिनार्त परित्राण पारायणे।
सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽतुते॥

* स्वप्न में कार्य-सिद्धि के लिए-
दुर्गे देवी नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थसाधिके।
मम सिद्धिमसिद्धिं वा स्वप्ने सर्वं प्रदर्शय।।
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भक्ति भाव से नवरात्रि मनाएँ…नवरात्रि के पवित्र दिनों का पूजन-विधान—

वैदिक गंथों में वर्णन हैं कि इस वसुधा को बचाएँ रखने के लिए युगों से देव व दानवों में ठनी रही। देवता जो कि परोपकारी, कल्याणकारी, धर्म व भक्तों के रक्षक है। वहीं दानव अर्थात्‌ राक्षस इसके विपरीत हैं। इसी क्रम में जब रक्तबीज, महिषासुर जैसे दैत्यों ने अपनी ताकत के अभिमान में अत्याचार कर धरती को पीड़ित करने लगे तो देवगणों ने एक अद्भुत शक्ति का सृजन कर उसे विविध प्रकार के अमोघ अस्त्र प्रदान किए।

जो आदिशक्ति माँ दुर्गा के नाम से संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हुईं। भक्तों की रक्षा व देव कार्य अर्थात्‌ कल्याण के लिए भगवती दुर्गा ने नौ दिनों में नौ रूपों जयंती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा, स्वधा को प्रकट किया। जिन्होंने नौ दिनों तक महाभयानक युद्ध कर शुंभ-निशुंभ, रक्तबीज आदि अनेकों दैत्यों का वध कर दिया।

उन्हीं देवियों की आराधना नौ दिनों तक विशेष पवित्रता से की जाती है। नौ देवियों में प्रथम श्री शैलपुत्री, द्वितीय श्री ब्रह्मचारिणी, तृतीय श्री चंद्रघंटा, चतुर्थ श्री कुष्मांडा, पंचम श्री स्कंदमाता, षष्ठम श्री कात्यायनी, सप्तम श्री कालरात्रि, अष्टम श्री महागौरी, नवम श्री सिद्धिदात्री की पूजन व हवनादि यज्ञ क्रियाओं का आयोजन किया जाता है।

नवरात्रों में रंगों का विशेष महत्व है, रंग प्रत्येक व्यक्ति को बड़ी तीव्रता से प्रभावित करते हैं। इसलिए पहले नवरात्रि में सफेद व लाल रंग का प्रयोग व कपड़े शुभ माने गए हैं। दूसरे में केशरिया, पीच व हल्का पीला रंग, तीसरे में लाल, चौथे में नीला-सफेद व केशरिया रंग, पाँचवें में हरा, लाल, सफेद, छठे में लाल-सफेद, सातवें में नीला-लाल-सफेद, आठवें में लाल-केशरिया-पीला-सफेद-गुलाबी, तथा नौवें दिन लाल, सफेद रंग बहुत अच्छे माने जाते हैं।

पूजन के पूर्व जौ बोने का विशेष फल होता है। पाठ करते समय बीच में बोलना या फिर बंद करना अच्छा नहीं है। ऐसा करना ही पड़े तो पाठ का आरम्भ पुनः करें। पाठ मध्यम स्वर व सुस्पष्ट, शुद्ध चित्त होकर करें। पाठ संख्या का दशांश हवनादि करने से इच्छित फल प्राप्त होता है। दूर्वा (हरी घास) माँ को नहीं चढ़ाई जाती है। नवरात्रों में पहले, अंतिम और पूरे नौ दिनों का व्रत अपनी सामर्थ्य व क्षमता के अनुसार रखा जा सकता है।

नवरात्रों के व्रत का पारण (व्रत खोलना) दशमी में करना अच्छा माना गया है। यदि नवमी की वृद्धि हो तो पहली नवमी को उपवास करने के पश्चात्‌ दूसरे दसवें दिन पारण करने का विधान शास्त्रों में मिलता है।

नौ कन्याओं का पूजन कर उन्हें श्रद्धा के साथ भोजन व दक्षिणा देना अत्यंत श्रेष्ठ होता है। इस प्रकार भक्त अपना ऐश्वर्य बढ़ाने हेतु सर्वशक्ति रूपा माँ दुर्गा की अर्चना कर सकते हैं।
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नवग्रहों की पीड़ा दूर करें दुर्गा —

शक्ति एवं भक्ति के साथ सांसारिक सुखों को देने के लिए वर्तमान समय में यदि कोई देवता है। तो वह एक मात्र देवी दुर्गा ही हैं। सामान्यतया समस्त देवी-देवता ही पूजा का अच्छा परिणाम देते हैं। किन्तु कलियुग में दुर्गा एवं गणेश ही पूर्ण एवं तत्काल फल देने वाले हैं। कहा भी है- ‘कलौ चण्डी विनायकौ।’

नवग्रहों की पीड़ा एवं दैवी आपदाओं से मुक्ति का एक मात्र साधन देवी की आराधना ही है। वर्तमान समय में कालसर्प एवं मांगलिक दोष के अलावा कुछ दोष ऐसे भी है। जिनकी शान्ति सम्भवतः अन्य किसी साधना अथवा पूजा से कठिन है। जैसे अवतंष योग।

जब कुंडली में नीच शनि, निर्बल गुरु एवं मंगल से किसी तरह का संयोग बनता है। तब व्यवसाय एवं नौकरी दोनों ही प्रभावित होते हैं। इसी प्रकार जब कुंडली में राहु एवं चन्द्रमा अपोक्लिम अथवा पणफर भाव में लग्नेश अथवा नवमेश के साथ अस्तगत अथवा निर्बल होते हैं। तब वक्रदाय योग होता है। विवाह का न होना अथवा विवाह होकर भी टूट जाना अथवा तलाक आदि की स्थिति उत्पन्न होती है।

बुध अथवा सूर्य के साथ गुरु का छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव में होकर उच्चगत मंगल से दृष्ट होना रुदाग्र योग बनाता है। जिससे बच्चे पैदा न होना, अथवा बच्चा होकर मर जाना आदि पीड़ा होती है। ऐसी स्थिति में दुर्गा तंत्र में आए वर्णन के अनुसार देवी का अनुष्ठान शत-प्रतिशत परिणाम देने वाला होता है। यद्यपि इसका वर्णन शक्ति संगम तंत्र, देवी भागवत, तंत्र रहस्य तथा दक्षिण भारत का प्रधान ग्रंथ ‘वलयक्कम’ में भी बहुत अच्छी तरह से किया गया है।

जैसे वृषभ राशि वालों को यदि कालसर्प की पीड़ा हो तो कंचनलता के पाँच पत्ते लेकर उन पर लाल चंदन का लेप करें। अपने सिर के एक बाल को धीरे से उखाड़ कर एक पत्ते पर रख कर उसे शेष पाँचों पत्तों से उलटा कर ढँक दें।

- पाँच सेर गाय का दूध लेकर उसमें तिन्ने के चावल का खीर बनाएँ। खीर को पाँच भाग में बाँट केले के पत्ते पर रख लें। शेष बचे खीर को अलग बर्तन में रख ले। ध्यान रहे इस कार्य में या तो मात्र पत्तों का प्रयोग करें, अथवा ताँबे का बर्तन प्रयोग में लावें। अन्य कोई धातु प्रयुक्त नहीं हो सकती है। तथा उन पर दुर्गा देवी के नवार्ण मंत्र का 133 बार पाठ करते हुए 133 बार लौंग के फूलयुक्त दूध की हल्की पतली धार के साथ अभिषेक करें। 27वें दिन परिणाम सामने होगा।

तांत्रिक ग्रन्थों में यह बताया गया है कि नवदुर्गा नवग्रहों के लिए ही प्रवर्तित हुईं हैं—
‘नौरत्नचण्डीखेटाश्च जाता निधिनाह्ढवाप्तोह्ढवगुण्ठ देव्या।’

अर्थात् नौ रत्न, नौ ग्रहों की पीड़ा से मुक्ति, नौ निधि की प्राप्ति, नौ दुर्गा के अनुष्ठान से सर्वथा सम्भव है। भगवान राम ने भी इसके प्रभाव से प्रभावित होकर अपनी दश अथवा आठ नहीं बल्कि नवधा भक्ति का ही उपदेश दिया है।

ध्यान रहे आज के वैज्ञानिक भी अपने सम्पूर्ण खोज के बाद इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रौन इन तीन तत्वों के प्रत्येक के अल्फा,बीटा तथा गामा तीन-तीन किरणों के भेद से 3-3 अर्थात 9 किरणों को ही प्राप्त किया हैं। किन्तु ग्रह व्यवस्था, तांत्रिक ग्रन्थों में इसका क्रम निम्न प्रकार बताया गया है।
सूर्यकृत पीड़ा की शान्ति के लिए कात्यायनी, चन्द्रमा के लिए चन्द्रघण्टा, मंगल के लिए शैलपुत्री, बुध के लिए स्कन्दमाता, गुरु के लिए ब्रह्मचारिणी, शुक्र के लिए महागौरी, शनि के लिए कालरात्रि, राहु के लिए कूष्माण्डा तथा केतु के लिए सिद्धिदात्री। अर्थात् जिस ग्रह की पीड़ा, कष्ट हो उससे संबंधित दुर्गा के रूप की पूजा विधि-विधान से करने पर अवश्य ही शान्ति प्राप्त होती है।

विक्रान्ता, आयुष्मा, अतिलोम, घृष्णा, मांदिगोठ, विषेंधरी आदि भयंकर कुयोगों की शान्ति यदि संभव है तो एकमात्र दुर्गा की पूजा ही समर्थ है। वास्तव में आदि काल से ही मनुष्य, देवी-देवता अथवा किसी भी प्राणी पर यदि कोई संकट पड़ा है तो उसके लिए सभी ने दुर्गा माता की ही अराधना की है। और माता दुर्गा ने ही सबका उद्धार किया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जादू टोना, रोग, भय, पिशाच्च, बेताल तथा डाकिनी आदि से मुक्ति प्राप्ति दुर्गा की तांत्रिक पूजा-पद्धति सर्वथा ही सफल है।

दुर्गा के अनुष्ठान की तांत्रिक विधि का विधिवत अनुपालन हमारे भारत में कम किन्तु इटली के सार्सिडिया, आस्ट्रेलिया के वैलिंग्टन, दक्षिणी अमेरिका के चिली एवं वॉशिंगटन डीसी, दक्षिणी अमेरिका के चिली तथा चीन में यांग टीसी क्यांग नदी के तटवर्ती प्रान्तों में ज्यादा देखने को मिल सकती हैं।
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नौ दुर्गा आराधना का महत्व ——

शक्ति उपासना के महत्व के बारे में कहा जाता है कि जगत्‌ की उत्पत्ति, पालन एवं लय तीनों व्यवस्थाएँ जिस शक्ति के आधीन सम्पादित होती है वही पराम्वा भगवती आदि शक्ति हैं, यें कारी बन कर सृष्टि का सृजन करने से इन्हें सृष्टिरूपा बीज कहा जाता है। ‘ह्रीं कारी’ देवी को प्रतिपालि का एवं ‘क्लीं कारी’ काम रूपा शक्ति जगत का लय कर अपने आश्रय में ले लेती हैं। यही तीन शक्तियाँ महाकाली, महालक्ष्मी महासरस्वती कहलाती हैं।

इन्हीं के अनन्त रूप हैं लेकिन प्रधान नौ रूपों में नवदुर्गा बन कर आदि शक्ति सम्पूर्ण पृथ्वी लोक पर अपनी करूणा की वर्षा करती है, अपने भक्त और साधकों में अपनी ही शक्ति का संचार करते हुए, करूणा एवं परोपकार के द्वारा संसार के प्राणियों का हित करती है।

प्रथम नवरात्रि को माँ की शैल पुत्री रूप में आराधना की जाती है। वस्तुतः नौ दुर्गा के रूप माता पार्वती के हैं। दक्ष प्रजापति के अहंकार को समाप्त कर प्रजापति क्रम में परिवर्तन लाने एवं अपने सती स्वरूप का संवरण कर पार्वती अवतार क्रम में नौ दुर्गा की नौ रूपमूर्तियों की उपासना है नवरात्रि उपासना।

यद्यपि शक्ति अवतार को दक्ष यज्ञ में अपने योग बल से सम्पन्न करने से पूर्ण भगवती सती जी ने भगवान शंकर के समक्ष अपनी दस महाविधाओं को प्रकट किया तथा उनके सती जी के दग्ध छाया छाया देह के अंग-प्रत्यंगो से अनेक शक्ति पीठों में आदि शक्ति प्रतिष्ठित हो कर पूजी जाने लगी पार्वती रूपा भगवती के प्रथम स्वरूप शैल पुत्री की आराधना से साधक की योग यात्रा की पहली सीढ़ी बिना बाधाओं के पार हो जाती है। योगीजन प्रथम नवरात्रि की साधना में अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित शक्ति केंद्र की जागृति मे तल्लीन कर देते हैं।

नवरात्रि आराधना, तन मन और इन्द्रिय संयम साधना की उपासना है, उपवास से तन संतुलित होता है। तन के सन्तुलित होने पर योग साधना से इंद्रियाँ संयमित होती है। इन्द्रियों के संयमित होने पर मन अपनी आराध्या माँ के चरणों में स्थिर हो जाता है। वस्तुतः जिसने अपने मन को स्थिर कर लिया वह संसार चक्र से छूट जाता है। संसार में रहते हुए उसके सामने कोई भी सांसारिक विध्न-बाधाएँ टिक नहीं सकती। वह भगवती दुर्गा के सिंह की तरह बन जाता है, ऐसे साधक भक्त एवं योगी महापुरूष का दर्शन मात्र से सिद्धियाँ मिलने लगती हैं। परन्तु सावधान रहना चाहिए की सांसारिक उपलब्धि रूपी सिद्धियाँ संसार में भटका देती हैं। अतः उपासक एवं साधकों को यह भी सावधानी रखनी होती है कि उनका लक्ष केवल माँ दुर्गा के श्री चरणों में समर्पण है और कुछ नहीं।

>वास्तु से लाएँ रिश्‍तों में प्रगाढ़ता–वास्तु बढ़ाएगा पिता-पुत्र में प्रेम—-

ग्रह, उपग्रह, नक्षत्रों की चाल व ब्रह्मांड की क्रियाकलापों को देखते ही मन यह सोचने पर विवश हो जाता है कि यह परस्पर एक-दूसरे के चक्कर क्यों लगाते हैं। कभी तो अपनी परिधि में चलते हुए बिल्कुल पास आ जाते हैं तो कभी बहुत दूर। ब्रह्मांड की गतिशीलता व क्रियाकलाप परस्पर आपसी संबंधों पर निर्भर हैं। जिनको कभी हम प्रतिकूल और कभी अनुकूल स्थितियों में देखते या पाते हैं।

ठीक इसी के अनुरूप विश्व के देव-दानव, गंधर्व, नाग, किन्नर, मानव रिश्तों के डोर में आ बँधे। मानव जीवन के कई पवित्र व अनुपम रिश्ते हैं, जो जीवन के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं इनमें समय के अनुसार उतार-चढ़ाव देखे जाते हैं, जो जीवन पथ पर कई खट्टी-मीठी यादें देते रहते हैं। किन्तु बढ़ती नीरसता, स्वार्थपरता, आपाधापी व अनैतिकता से आज सिर्फ पिता-पुत्र के मध्य ही नहीं बल्कि अनेक रिश्ते मतभेद, कटुता, कलह, नीरसता व कंलक के हत्थे चढ़ते जा रहे हैं।

इन सम्पूर्ण विकारों ने मिलकर रिश्ते की पवित्र नींव को उखाड़ने का मानो ठेका ले रखा हो, शर्म, संकोच, दायित्व, सामाजिक मर्यादाएँ जो यथा समय इनकी रक्षा करती थीं आज वे विवश नजर आ रही हैं। जिन पंच तत्वों के सहारे तन, मन, श्वॉस, रक्त, दृष्टि में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता था आज उनकी वास्तु स्थिति गड़बडा गई है। आज वह लाख प्रयास करने के बावजूद भी चोट पर चोट खाते जा रहे हैं।
वास्तु अध्ययन व अनुभव यह बताता है कि जिस भवन में वास्तु स्थिति गड़बड होती है वहाँ व्यक्ति के पारिवारिक व व्यक्तिगत रिश्तों में अक्सर मतभेद, तनाव उत्पन्न होते रहते हैं। वास्तु में पूर्व व ईशानजनित दोषों के कारण पिता-पुत्र के संबंधों में धीरे-धीरे गहरे मतभेद व दूरियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और साथ ही कई परिवारों को पुत्र हानि का भी सामना करना पड़ता है। सूर्य को पुत्र का कारक ग्रह माना जाता है, जब भवन में ईशान व पूर्व वास्तु दोषयुक्त हो तो यह घाव में नमक का कार्य करता है। जिससे पिता-पुत्र जैसे संबंधों में तालमेल का भाव व पुत्र-पिता के प्रति दुर्भावना रखता है। वास्तु के माध्यम से पिता पुत्र के संबंधों को अति मधुर बनाया जा सकता है।

महत्वपूर्ण व उपयोगी तथ्य जो पिता-पुत्र के संबंधों को प्रभावित करते हैं :—
- ईशान (उत्तर-पूर्व) में भूखण्ड कटा हुआ नहीं होना चाहिए।
- भवन का भाग ईशान (उत्तर-पूर्व) में उठा होना अशुभ हैं। अगर यह उठा हुआ है तो पुत्र संबंधों में मधुरता व नजदीकी का आभाव रहेगा।
- उत्तर-पूर्व (ईशान) में रसोई घर या शौचालय का होना भी पुत्र संबंधों को प्रभावित करता है। दोनों के स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ बनी रहती है।
- दबे हुए ईशान में निर्माण के दौरान अधिक ऊँचाई देना या भारी रखना भी पुत्र और पिता के संबंधों को कलह और परेशानी में डालता रहता है।
- ईशान (उत्तर-पूर्व) में स्टोर रूम, टीले या पर्वतनुमा आकृति के निर्माण से भी पिता-पुत्र के संबंधों में कटुता रहती है तथा दोनों एक-दूसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं।
- इलेक्ट्रॉनिक आइटम या ज्वलनशील पदार्थ तथा गर्मी उत्पन्न करने वाले अन्य उपकरणों को ईशान (उत्तर-पूर्व) में रखने से पुत्र, पिता की बातों की अवज्ञा अर्थात्‌ अवहे‌लना करता रहता है, और समाज में बदनामी की स्थिति पर ला देता है।
- इस दिशा में कूड़ेदान बनाने या कूड़ा रखने से भी पुत्र, पिता के प्रति दूषित भावना रखता हैं। यहाँ तक मारपीट की नौबत आ जाती है।
- ईशान कोण खंडित होने से पिता-पुत्र आपसी मामलों को लेकर सदैव लड़ते-झगड़ते रहते हैं।
- यदि कोई भूखंड उत्तर व दक्षिण में सँकरा तथा पूर्व व पश्चिम में लंबा है तो ऐसे भवन को सूर्यभेदी कहते हैं यहाँ भी पिता-पुत्र के संबंधों में अनबन की स्थिति सदैव रहती है। सेवा तो दूर वह पिता से बात करना तथा उसकी परछाई में भी नहीं आना चाहता है।

इस प्रकार ईशान कोण दोष अर्थात्‌ वास्तुजनित दोषों को सुधार कर पिता-पुत्र के संबंधों में अत्यंत मधुरता लाई जा सकती हैं। सूर्य संपूर्ण विश्व को ऊर्जा शक्ति प्रदान करता है तथा इसी के सहारे पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया संचालित होती है तथा पराग कण खिलते हैं जिसके प्रभाव से वनस्पति ही नहीं बल्कि समूचा प्राणी जगत्‌ प्रभावित होता है। पूर्व व ईशानजनित दोषों से प्राकृतिक तौर पर प्राप्त होने वाली सकारात्मक ऊर्जा नहीं मिल पाती और पिता-पुत्र जैसे संबंधों में गहरे तनाव उत्पन्न हो जाते हैं। अतएव वास्तुजनित दोषों को समझते हुए ईशान की रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिए।

>सुख-समृद्धि हेतु उत्तर-पूर्व शुभ —कैसा हो मकान में खुला स्थान——

खुले स्थान का महत्व : वास्तु शास्त्र के अनुसार भूखण्ड में उत्तर, पूर्व तथा उत्तर-पूर्व (ईशान) में खुला स्थान अधिक रखना चाहिए। दक्षिण और पश्चिम में खुला स्थान कम रखें।

बॉलकनी, बरामदा, पोर्टिको के रूप में उत्तर-पूर्व में खुला स्थान ज्यादा रखें, टैरेस व बरामदा खुले स्थान के अन्तर्गत आता है। सुख-समृद्धि हेतु उत्तर-पूर्व में ही निर्मित करना शुभ होता है।

यदि दो मंजिला मकान बनवाने की योजना है, तो पूर्व एवं उत्तर दिशा की ओर भवन की ऊँचाई कम रखें। उन्हीं दिशाओं में ही छत खुली रखनी चाहिए। उत्तर-पूर्व में ही दरवाजे व खिड़कियाँ सर्वाधिक संख्या में होने चाहिए। यह भी सुनिश्चित करें कि दरवाजे व खिड़कियों की संख्या विषम न होने पाएँ। जैसे उनकी संख्या 2, 4, 6, 8 आदि रखें।

मकान में गार्डेनिंग ः —-आजकल लोग स्वास्थ्य के प्रति ज्यादा जागरूक होते जा रहे हैं। प्रायः शहरों में बन रहे मकानों में गार्डेनिंग की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है। वास्तु के अनुसार मकान में गार्डेनिंग के कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं। ऊँचे व घने वृक्ष दक्षिण-पश्चिम भाग में लगाएँ।

पौधे भवन में इस तरह लगाएँ कि प्रायः तीसरे प्रहर अर्थात्‌ तीन बजे तक मकान पर उनकी छाया न पड़े। वृक्षों में पीपल पश्चिम, बरगद पूर्व, गूलर दक्षिण और कैथ का वृक्ष उत्तर में लगाएँ।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>जानकारी / सूचना/ information ::———

>जानकारी / सूचना/ information ::————–
1.——आप सभी से निवेदन/ अपील/ प्राथना हे की आज विश्व स्तर पर अर्थ आवर ( विश्व के सभी 131 देशो के 4000 शहरों में एक साथ ) मनाया जा रहा हे…..
इसके अंतर्गत……आज धरती के लिए….एक घंटा bijali / विद्युत/ लाइट….रात्रि –आठ बजकर तीस मिनट से रात्रि नो बजकर तीस मिनट तक — ( 8-30 P.M.. से 9-30 P.M. तक)….बिजली बंद रखे….
आशा हे आप सभी इस पुण्य कार्य में सहयोग जरुर करेंगे….धन्यवाद/ आभार…..
2.——–आगामी दिनों में गुरु ( वृहस्पति ) का मेष राशि में भ्रमण रहेगा/ करेगा…अर्थात.. गुरु अस्त रहेगा / हो जायेगा..
.इसके प्रभाव स्वरूप ..आगामी एक माह के दोरान भारत के तटवर्ती प्रदेशो में भारी वर्षा, भूकंप के झटके,समुद्र के किनारे/ निकट के शहरो/ नगरो को खतरा रहने की सम्भावना हे…….
रेतीले/ रेगिस्तानी क्षेत्र में भी नुकसान की संभावना हे…….सतर्क रहे….सावधान रहे…..
३.—– आज के वार्ड कप मेच में इंग्लेंड विजय प्राप्त करेगा…श्रीलंका को हराकर…..
सेमीफाइनल…
A..—भारत और पाकिस्तान के बिच..मोहाली में…भारत विजय प्राप्त करेगा…..
B.—इंग्लेंड और न्यूजीलेंड के बिच में होगा जिसमे इंग्लेंड विजय प्राप्त करेगा……
वर्ड कप का फ़ाइनल मेच मुम्बई में वानखेड़े स्टेडियम मे खेला जायेगा—भारत और इंग्लेंड के बीच में…..
इंग्लेंड के विजेता रहने की संभावना हे….यह ज्योतिषीय / गणितीय आंकलन हे……

>जन्म से लेकर मृत्यु तक के सनातन धर्म संस्कार :::—-
सनातन धर्म के सोलह संस्कारसनातन अथवा हिन्दू धर्म की संस्कृति संस्कारों पर ही आधारित है। प्रत्येक संस्कार हमारे जीवन में बहुत महत्व रखते है. हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन को पवित्र एवं मर्यादित बनाने के लिये संस्कारों का अविष्कार किया। धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी इन संस्कारों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। भारतीय संस्कृति की महानता में इन संस्कारों का महती योगदान है।
‘संस्कार’ संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है– मनुष्य का वह कर्म, जो अलंकृत और सुसज्जित हो। हिंदू धर्म-दर्शन की संस्कृति यज्ञमय है, क्योंकि सृष्टि ही यज्ञ का परिणाम है, उसका अंत (मनुष्य की अंत्येष्टि) भी यज्ञमय है । इस यज्ञमय क्रिया (संस्कार) में गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि क्रिया तक सभी कृत्य (संस्कार) यज्ञमय संस्कार के रूप में जाने और माने जाते हैं।
संस्कृत भाषा में ‘संस्कार’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की सम् पूर्वक ‘कृञ्’ धातु से ‘घञ्’ प्रत्यय करके की गई है। (सम्+कृ+घञ्=संस्कार) और इसका प्रयोग अनेक अर्थों में किया जाता है। मीमांसक इसका आशय यज्ञांगभूत पुरोडाश आदि की विधिवत् शुद्धि से समझते हैं–प्रोक्षणादिजन्यसंस्कारों यज्ञांगपुरोडाशेष्विति द्रव्यधर्मः। (वाचस्पत्य वृहदभिधान, )। अद्वैतवेदांती जीव पर शारीरिक, क्रियाओं के मिध्या आरोप को संस्कार मानते हैं–‘स्नानाचमनादिजन्याः संस्कारा देहे उत्पद्यमानानि तदभिधानानि जीवे कल्प्यन्ते।’ इसका अभिप्राय शुद्धि की धार्मिक क्रियाओं तथा व्यक्ति के दैहिक, मानसिक और बौद्धिक परिष्कार के लिए किए जानेवाले अनुष्ठानों में से है, जिनसे वह समाज का पूर्ण विकसित सदस्य बन सके। किंतु हिंदू संस्कारों में अनेक आरंभिक विचार, धार्मिक विधि-विधान, उनके सहवर्ती नियम तथा अनुष्ठान भी समाविष्ट हैं, जिनका उद्देश्य मात्र औपचारिक दैहिक संस्कार ही न होकर संस्कारित व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का परिष्कार, शुद्धि और पूर्णता भी है।
इससे यह समझा जाता है कि सविधि-संस्कारों के अनुष्ठान से संस्कारित व्यक्ति में विलक्षण तथा अवर्णनीय गुणों का प्रादुर्भाव हो जाता है–आत्मशरीरान्यतरनिष्ठो विहितक्रियाजन्योऽतिशयविशेषः संस्कारः। (वीरमित्रोदय, संस्कारभाष्य ). संस्कार का सामान्य अर्थ है–संस्कृत करना या शुद्ध करना, उपयुक्त बनाना या सम्यक् करना आदि। किसी साधारण या विकृत वस्तु को विशेष क्रियाओं द्वारा उत्तम बना देना ही उसका संस्कार है। इस साधारण मनुष्य जीवत को विशेष प्रकार की धार्मिक क्रियाओं-प्रक्रियाओं द्वारा उत्तम बनाया जा सकता है, जिससे कि वह जीवन में परम उत्कर्ष को प्राप्त कर सके। ये विशिष्ट धार्मिक प्रक्रियाएँ ही ‘संस्कार’ हैं।
शंकराचार्य के अनुसार- “संस्कारों हि नाम संस्कार्यस्य गुणाधानेन वा स्याद्दोषापनयनेन वा”। अर्थात मानव को गुणों से युक्त करने तथा उसके दोषों को दूर करने के लिए जो कर्म किया जाता है, उसे ही संस्कार कहते हैं।
हिंदू दर्शन के अनुसार, मृत्यु के बाद मात्र यह भौतिक शरीर या देह ही नष्ट होती है, जबकि सूक्ष्म शरीर जन्म-जन्मांतरों तक आत्मा के साथ संयुक्त रहता है। यह सूक्ष्म शरीर ही जन्म-जन्मांतरों के शुभ-अशुभ संस्कारों का वाहक होता है। ये संस्कार मनुष्य के पूर्वजन्मों से ही नहीं आते, अपितु माता-पिता के संस्कार भी उसमें (सूक्ष्म शरीर में) प्रविष्ट होते हैं, जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व इन दोनों से ही प्रभावित होता है।
प्राचीन काल में हमारा प्रत्येक कार्य संस्कार से आरम्भ होता था। उस समय संस्कारों की संख्या भी लगभग चालीस थी। जैसे-जैसे समय बदलता गया तथा व्यस्तता बढती गई तो कुछ संस्कार स्वत: विलुप्त हो गये। इस प्रकार समयानुसार संशोधित होकर संस्कारों की संख्या निर्धारित होती गई। गौतम स्मृति में चालीस प्रकार के संस्कारों का उल्लेख है। महर्षि अंगिरा ने इनका अंतर्भाव पच्चीस संस्कारों में किया। व्यास स्मृति में सोलह संस्कारों का वर्णन हुआ है। हमारे धर्मशास्त्रों में मुख्य रूप से सोलह संस्कारों की व्याख्या की गई है। इनमें पहला गर्भाधान संस्कार और मृत्यु के उपरांत अंत्येष्टि अंतिम संस्कार .
ऋग्वेद में संस्कारों का उल्लेख नहीं है, किन्तु इस ग्रंथ के कुछ सूक्तों में विवाह, गर्भाधान और अंत्येष्टि से संबंधित कुछ धार्मिक कृत्यों का वर्णन मिलता है। यजुर्वेद में केवल श्रौत यज्ञों का उल्लेख है, इसलिए इस ग्रंथ के संस्कारों की विशेष जानकारी नहीं मिलती। अथर्ववेद में विवाह, अंत्येष्टि और गर्भाधान संस्कारों का पहले से अधिक विस्तृत वर्णन मिलता है। गोपथ और शतपथ ब्राह्मणों में उपनयन गोदान संस्कारों के धार्मिक कृत्यों का उल्लेख मिलता है। तैत्तिरीय उपनिषद् में शिक्षा समाप्ति पर आचार्य की दीक्षांत शिक्षा मिलती है। इस प्रकार गृह्यसूत्रों से पूर्व हमें संस्कारों के पूरे नियम नहीं मिलते। ऐसा प्रतीत होता है कि गृहसूत्रों से पूर्व पारंपरिक प्रथाओं के आधार पर ही संस्कार होते थे। सबसे पहले गृहसूत्रों में ही संस्कारों की पूरी पद्धति का वर्णन मिलता है। गृह्यसूत्रों में संस्कारों के वर्णन में सबसे पहले विवाह संस्कार का उल्लेख है। इसके बाद गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जात- कर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्न- प्राशन, चूड़ा- कर्म, उपनयन और समावर्तन संस्कारों का वर्णन किया गया है। अधिकतर गृह्यसूत्रों में अंत्येष्टि संस्कार का वर्णन नहीं मिलता, क्योंकि ऐसा करना अशुभ समझा जाता था। स्मृतियों के आचार प्रकरणों में संस्कारों का उल्लेख है और तत्संबंधी नियम दिए गए हैं। इनमें उपनयन और विवाह संस्कारों का वर्णन विस्तार के साथ दिया गया है, क्योंकि उपनयन संस्कार के द्वारा व्यक्ति ब्रह्मचर्य आश्रम में और विवाह संस्कार के द्वारा गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था।
गौतम धर्मसूत्र में संस्कारों की संख्या चालीस लिखी है।

ये चालीस संस्कार निम्नलिखित हैं:-
1. गर्भाधान,2. पुंसवन,3. सीमंतोन्नयन,4. जातकर्म,5. नामकरण,6. अन्न प्राशन,
7 चौल,8. उपनयन,9-12. वेदों के चार व्रत,13. स्नान,14. विवाह,15-19 पंच दैनिक महायज्ञ,
20-26 सात पाकयज्ञ,27-33 सात हविर्यज्ञ,34-40 सात सोमयज्ञ।
मनु ने गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन, केशांत, समावर्तन, विवाह और श्मशान, संस्कारों का उल्लेख किया है. याज्ञवल्क्य ने भी इन्हीं संस्कारों का वर्णन किया है। केवल केशांत का वर्णन उसमें नहीं मिलता है, ।
व्यास स्मृति में सोलह संस्कारों का वर्णन हुआ है।
गर्भाद्या मृत्युपर्य्यन्ताः संस्काराः षोडशैव हि।
वक्ष्यन्ते तं नमस्कृत्यान्तविद्यं परेश्वरम्।।… –स्वामी दयानन्द सरस्वती
विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों के क्रम में थोडा-बहुत अन्तर है, लेकिन प्रचलित संस्कारों के क्रम में गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूडाकर्म, विद्यारंभ, कर्णवेध, यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह तथा अन्त्येष्टि ही मान्य है। सोलह संस्कार निम्न हैं…….

गर्भाधान संस्कारः ….उत्तम सन्तान की प्राप्ति के लिये प्रथम संस्कार।हमारे शास्त्रों में मान्य सोलह संस्कारों में गर्भाधान पहला है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम कर्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। गार्हस्थ्य जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है। उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए। वैदिक काल में यह संस्कार अति महत्वपूर्ण समझा जाता था।

पुंसवन संस्कारः ……….गर्भस्थ शिशु के बौद्धि एवं मानसिक विकास हेतु गर्भाधान के पश्चात् दूसरे या तीसरे महीने किया जाने वाला द्वितीय संस्कार।गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की दृष्टि से यह संस्कार उपयोगी समझा जाता है। गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में इस संस्कार को करने का विधान है। हमारे मनीषियों ने सन्तानोत्कर्ष के उद्देश्य से किये जाने वाले इस संस्कार को अनिवार्य माना है। गर्भस्थ शिशु से सम्बन्धित इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है। पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है।

सीमन्तोन्नयन संस्कारः …………माता को प्रसन्नचित्त रखने के लिये, ताकि गर्भस्थ शिशु सौभाग्य सम्पन्न हो पाये, गर्भाधान के पश्चात् आठवें माह में किया जाने वाला तृतीय संस्कार।सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है।

जातकर्म संस्कारः…….नवजात शिशु के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की कामना हेतु किया जाने वाला चतुर्थ संस्कार।नवजात शिशु के नालच्छेदन से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आनेवाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ चटाया जाता है। यह संस्कार विशेष मन्त्रों एवं विधि से किया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता यज्ञ करता है तथा नौ मन्त्रों का विशेष रूप से उच्चारण के बाद बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।

नामकरण संस्कारः…………. नवजात शिशु को उचित नाम प्रदान करने हेतु जन्म के ग्यारह दिन पश्चात् किया जाने वाला पंचम संस्कार।जन्म के ग्यारहवें दिन यह संस्कार होता है। हमारे धर्माचार्यो ने जन्म के दस दिन तक अशौच (सूतक) माना है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं।नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है। हमारे मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। तभी तो यह कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम हमारे धर्म विज्ञानियों ने बहुत शोध कर नामकरण संस्कार का आविष्कार किया। ज्योतिष विज्ञान तो नाम के आधार पर ही भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है।

निष्क्रमण संस्कारः …………शिशु के दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करने की कामना के लिये जन्म के तीन माह पश्चात् चौथे माह में किया जाने वला षष्ठम संस्कार।दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है।
निष्क्रमण का अभिप्राय है बाहर निकलना। इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान् भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो।

अन्नप्राशन संस्कारः …………..शिशु को माता के दूध के साथ अन्न को भोजन के रूप में प्रदान किया जाने वाला जन्म के पश्चात् छठवें माह में किया जाने वाला सप्तम संस्कार।इस संस्कार का उद्देश्य शिशु के शारीरिक व मानसिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करना है। अन्नप्राशन का स्पष्ट अर्थ है कि शिशु जो अब तक पेय पदार्थो विशेषकर दूध पर आधारित था अब अन्न जिसे शास्त्रों में प्राण कहा गया है उसको ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक रूप से अपने को बलवान व प्रबुद्ध बनाए। तन और मन को सुदृढ़ बनाने में अन्न का सर्वाधिक योगदान है। शुद्ध, सात्विक एवं पौष्टिक आहार से ही तन स्वस्थ रहता है और स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। आहार शुद्ध होने पर ही अन्त:करण शुद्ध होता है तथा मन, बुद्धि, आत्मा सबका पोषण होता है। इसलिये इस संस्कार का हमारे जीवन में विशेष महत्व है।हमारे धर्माचार्यो ने अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। खीर और मिठाई से शिशु के अन्नग्रहण को शुभ माना गया है। अमृत: क्षीरभोजनम् हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान उत्तम माना गया है।

चूड़ाकर्म (मुण्डन) संस्कारः …………..शिशु के बौद्धिक, मानसिक एवं शारीरिक विकास की कामना से जन्म के पश्चात् पहले, तीसरे अथवा पाँचवे वर्ष में किया जाने वाला अष्टम संस्कार। चूड़ाकर्म को मुंडन संस्कार भी कहा जाता है। हमारे आचार्यो ने बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान बताया है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास की परिकल्पना हमारे मनीषियों के मन में होगी। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ माह तक गर्भ में रहने के कारण कई दूषित किटाणु उसके बालों में रहते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का सफाया होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ यह संस्कार सम्पन्न होता है।

विद्यारम्भ संस्कारः………… जातक को उत्तमोत्तम विद्या प्रदान के की कामना से किया जाने वाला नवम संस्कार।विद्यारम्भ संस्कार के क्रम के बारे में हमारे आचार्यो में मतभिन्नता है। कुछ आचार्यो का मत है कि अन्नप्राशन के बाद विद्यारम्भ संस्कार होना चाहिये तो कुछ चूड़ाकर्म के बाद इस संस्कार को उपयुक्त मानते हैं। मेरी राय में अन्नप्राशन के समय शिशु बोलना भी शुरू नहीं कर पाता है और चूड़ाकर्म तक बच्चों में सीखने की प्रवृत्ति जगने लगती है। इसलिये चूड़ाकर्म के बाद ही विद्यारम्भ संस्कार उपयुक्त लगता है। विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। माँ-बाप तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथायें आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। शास्त्र की उक्ति है सा विद्या या विमुक्तये अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति दिला सके। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये।

कर्णवेध संस्कारः जातक की शारीरिक व्याधियों से रक्षा की कामना से किया जाने वाला दशम संस्कार।हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है। कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।
यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है।

यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कारः जातक की दीर्घायु की कामना से किया जाने वाला एकादश संस्कार।यज्ञोपवीत अथवा उपनयन बौद्धिक विकास के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। धार्मिक और आधात्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है। हमारे मनीषियों ने इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक युग में भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध हो चुका है। गायत्री सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्र है।
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं अर्थात् यज्ञोपवीत जिसे जनेऊ भी कहा जाता है अत्यन्त पवित्र है। प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से इसका निर्माण किया है। यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज प्रदान करनेवाला है। इस संस्कार के बारे में हमारे धर्मशास्त्रों में विशेष उल्लेख है। यज्ञोपवीत धारण का वैज्ञानिक महत्व भी है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी उस समय प्राय: आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो जाता था। इसके बाद बालक विशेष अध्ययन के लिये गुरुकुल जाता था। यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है।

वेदारम्भ संस्कारः ………जातक के ज्ञानवर्धन की कामना से किया जाने वाला द्वादश संस्कार।ज्ञानार्जन से सम्बन्धित है यह संस्कार। वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भ के माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इस संस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत कापालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं।

केशान्त संस्कारः ……..गुरुकुल से विदा लेने के पूर्व किया जाने वाला त्रयोदश संस्कार।गुरुकुल में वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था।

समावर्तन संस्कारः ………गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने की कामना से किया जाने वाला चतुर्दश संस्कार।गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधि आचार्य देते थे। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।

पाणिग्रहण संस्कारः ………पति-पत्नी को परिणय-सूत्र में बाँधने वाला पंचदश संस्कार।प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का हमारे शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।
हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। समय के अनुसार इनका स्वरूप बदलता गया। वैदिक काल से पूर्व जब हमारा समाज संगठित नहीं था तो उस समय उच्छृंखल यौनाचार था। हमारे मनीषियों ने इस उच्छृंखलता को समाप्त करने के लिये विवाह संस्कार की स्थापना करके समाज को संगठित एवं नियमबद्ध करने का प्रयास किया। आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है।

अन्त्येष्टि संस्कारः ………मृत्योपरान्त किया जाने वाला षष्ठदश संस्कार।अन्त्येष्टि को अंतिम अथवा अग्नि परिग्रह संस्कार भी कहा जाता है। आत्मा में अग्नि का आधान करना ही अग्नि परिग्रह है। धर्म शास्त्रों की मान्यता है कि मृत शरीर की विधिवत् क्रिया करने से जीव की अतृप्त वासनायें शान्त हो जाती हैं। हमारे शास्त्रों में बहुत ही सहज ढंग से इहलोक और परलोक की परिकल्पना की गयी है। जब तक जीव शरीर धारण कर इहलोक में निवास करता है तो वह विभिन्न कर्मो से बंधा रहता है। प्राण छूटने पर वह इस लोक को छोड़ देता है। उसके बाद की परिकल्पना में विभिन्न लोकों के अलावा मोक्ष या निर्वाण है। मनुष्य अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है। इसी परिकल्पना के तहत मृत देह की विधिवत क्रिया होती है

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

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>***+*…** श्री रुद्राष्टकम ***+***

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेडहं॥१॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोडहं॥२॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥३॥
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥४॥
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेडहं भवानीपतिं भावगम्यं॥५॥
कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। सदासज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥६॥
न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥७॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोडहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।
जराजन्म दु:खौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्न्मामीश शंभो॥८॥
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु: प्रसीदति॥९॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः *जय श्री कृष्णा*
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कर्पुरगौरम करुणावतारम, संसारसारम भुजगेन्द्रहारम !
सदा वसंतम हृदयारविन्दे भवम भवामि सहितम नमामि !
!! ॐ हौं जूं सः !! ॐ त्र्यम्बकम यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम !
उर्वारुकमिव वन्धनात मृत्योर्मुक्षिये मामृतात !! ॐ सः जूं हौं !
हर-हर गंगे, हर-हर महादेव, सिद्धनाथ की जय हो. काशी-विश्वनाथ की जय हो ………

>मंगल दोष के विभिन्न प्रकार–क्यों जरूरी है मंगली का मंगली से ‍विवाह :-
जिस जातक की जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली आदि में मंगल ग्रह, लग्न से लग्न में (प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भावों में से कहीं भी स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहते हैं।
गोलिया मंगल ‘पगड़ी मंगल’ तथा चुनड़ी मंगल : जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं पर भी मंगल स्थित हो उसके साथ शनि, सूर्य, राहु पाप ग्रह बैठे हो तो व पुरुष गोलिया मंगल, स्त्री जातक चुनड़ी मंगल हो जाती है अर्थात द्विगुणी मंगली इसी को माना जाता है।
मांगलिक कुंडली का मिलान : वर, कन्या दोनों की कुंडली ही मांगलिक हो तो विवाह शुभ और दाम्पत्य जीवन आनंदमय रहता है। एक सादी एवं एक कुंडली मांगलिक नहीं होना चाहिए।
मंगल-दोष निवारण : मांगलिक कुंडली के सामने मंगल वाले स्थान को छोड़कर दूसरे स्थानों में पाप ग्रह हो तो दोष भंग हो जाता है। उसे फिर मंगली दोषरहित माना जाता है तथा केंद्र में चंद्रमा 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगली दोष दूर हो जाता है। शुभ ग्रह एक भी यदि केंद्र में हो तो सर्वारिष्ट भंग योग बना देता है।
शास्त्रकारों का मत ही इसका निर्णय करता है कि जहाँ तक हो मांगलिक से मांगलिक का संबंध करें। ‍िफर भी मांगलिक एवं अमांगलिक पत्रिका हो, दोनों परिवार अपने पारिवारिक संबंध के कारण पूर्ण संतुष्ट हो, तब भी यह संबंध श्रेष्ठ नहीं है। ऐसा नहीं करना चाहिए।ऐसे में अन्य कई कुयोग हैं। जैसे वैधव्य विषागना आदि दोषों को दूर रखें। यदि ऐसी स्थिति हो तो ‘पीपल’ विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके कन्या का संबंध अच्छे ग्रह योग वाले वर के साथ करें। मंगल यंत्र विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग करें। देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या‍दि में ही इसे प्रयोग करें। छोटे कार्य के लिए नहीं। विशेष : विशेषकर जो मांगलिक हैं उन्हें इसकी पूजा अवश्य करना चाहिए। चाहे मांगलिक दोष भंग आपकी कुंडली में क्यों न हो गया हो फिर भी मंगल यंत्र मांगलिकों को सर्वत्र जय, सुख, विजय और आनंद देता है। निम्न 21 नामों से मंगल की पूजा करें :-
1. ऊँ मंगलाय नम:
2. ऊँ भूमि पुत्राय नम:
3. ऊँ ऋण हर्वे नम:
4. ऊँ धनदाय नम:
5. ऊँ सिद्ध मंगलाय नम:
6. ऊँ महाकाय नम:
7. ऊँ सर्वकर्म विरोधकाय नम:
8. ऊँ लोहिताय नम:
9. ऊँ लोहितगाय नम:
10. ऊँ सुहागानां कृपा कराय नम:
11. ऊँ धरात्मजाय नम:
12. ऊँ कुजाय नम:
13. ऊँ रक्ताय नम:
14. ऊँ भूमि पुत्राय नम:
15. ऊँ भूमिदाय नम:
16. ऊँ अंगारकाय नम:
17. ऊँ यमाय नम:
18. ऊँ सर्वरोग्य प्रहारिण नम:
19. ऊँ सृष्टिकर्त्रे नम:
20. ऊँ प्रहर्त्रे नम:
21. ऊँ सर्वकाम फलदाय नम:
विशेष : किसी ज्योतिषी से चर्चा करके ही पूजन करना चाहिए। मंगल की पूजा का विशेष महत्व होता है। अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की गई पूजा प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है..
मंगल दोष/ योग निवारणार्थ…..कृपया मंगलनाथ मंदिर , जो उज्जैन ( मध्य प्रदेश ) में स्थित हे ..वहा जाकर विशेष रूप से “भात पूजा” अवश्य करवाएं…इस पूजा से शादी में विलम्ब/ कर्जमुक्ति..आदि में लाभ मिलता हे..अतः ऐसे जातक शीघ्र लाभ हेतु मंगलनाथ मंदिर आकर भात पूजा जरुर करवाएं..संपर्क—पंडित दयानंद शास्त्री-09024390067

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>apna—–

>जब भी अपनों को आजमाया हे….
हमने खुद से फरेब खाया हे…..
जेसा चाहा उसे बनाया हे…
जितना फ़ोलाद को तपाया हे…..
चंद रोजा इस जिंदगानी का ………
कोई मकसद समझ नहीं पाया हे……….
जितने वाले खुद समझाते हे…….
किस तरह से मुझे हराया हे……..
सारे बेज़ा उसूल लगते हे…….
भूखे बच्चो को जब रुलाया हे………
हंसते हंसते निकल पड़े आँसू………..
बीता लम्हा अब याद आया हे……….
सारी duniya बुरी नहीं “bandhu”……..
कोई to हे जो काम आया हे……………….
### dayanand “bandhu”

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>resingul

>मधुराष्टकं – श्री श्री वल्लभाचार्य द्वारा विरचित——

अधरं मधुरं वदनं मधुरं, नयनं मधुरं हसितं मधुरं।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥१॥
अधर, वदन नयना अति मधुरा, स्मित मधुर, हृदय अति मधुरा
चाल मधुर, सब कुछ मधु मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा
वचनं मधुरं चरितं मधुरं, वसनं मधुरं वलितं मधुरं ।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥२॥
चरित मधुर, वचनं अति मधुरा, भेष मधुर, वलितं अति मधुरा
चाल मधुर अति, भ्रमण भी मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा
वेणुर्मधुरो रेनुर्मधुरः, पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥३॥
मधुरं वेणु , चरण रज मधुरा, पाद पाणि दोनों अति मधुरा
मित्र मधुर मधु, नृत्यं मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा
गीतं मधुरं पीतं मधुरं, भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरं ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥४॥
गायन मधुर, पीताम्बर मधुरा, भोजन मधुरम, शयनं मधुरा
रूप मधुरतम, तिलकं मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा
करणं मधुरं तरणं मधुरं, हरणं मधुरं रमणं मधुरं ।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥५॥
करम मधुरतम, तारण मधुरा, हरण, रमण दोनों अति मधुरा
परम शक्तिमय मधुरम मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा
गुंजा मधुरा माला मधुरा, यमुना मधुरा वीचीर्मधुरा ।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥६॥
कुसुम माल, गुंजा अति मधुरा, यमुना मधुरा, लहरें मधुरा
यमुना जल, जल कमल भी मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा
गोपी मधुरा लीला मधुरा, युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरं।
दृष्टं मधुरं सृष्टं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥७॥
मधुर गोपियाँ, लीला मधुरा, मिलन मधुर भोजन अति मधुरा
हर्ष मधुरतम, शिष्टं मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा
गोपा मधुरा गावो मधुरा, यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा ।
दलितं मधुरं फ़लितं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥८॥
ग्वाले मधुरम, गायें मधुरा, अंकुश मधुरम, सृष्टिम मधुरा
दलितं मधुरा, फलितं मधुरा, हे मधुराधिपते! मधु मधुरा

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>एक औरत हूँ/ THE LEADY———–

>एक औरत हूँ/ THE LEADY——–

मैं
एक बहन
एक बेटी
एक औरत हूँ
एक औरत जो न जाने कब से नंगे पाँव
रेगिस्तान की धदकती बालू मैं भागती रही है !
मैं सुदूर उत्तर के गाँव से आई हूँ
एक औरत जो न जाने कब से के धान खेतों मे,
और चाय के बागानों मे, अपनी ताकत से ज़यादा मेहनत करती आई है !
मैं पूरब के अँधेरे खंडहरों से आई हूँ
जंहा मैंने न जाने कब से नंगे पांव सुबह से शाम तक,
अपनी मरियल गाय के साथ, खलियानों मे दर्द का बोझ उठाया है
मैं एक औरत हूँ,
उन बंजारों मे से जो तमाम दुनिया मे भटकते फिरते हैं
एक औरत जो पहाड़ों की गोद मे बच्चे जनती है जिसकी
बकरी मैदानों मे कंही मर जाती है और वो बैन करती रह जाती हे
मैं एक मजदूर औरत हूँ
जो अपने हाथों से फेक्टरी में
देवकाय मशीनों के चक्के घुमती है
वो मशीने जो उसकी ताकत को
ऐन उसकी आँखों के सामने
हर दिन नोचा करती है
एक औरत जिसके खून से खूंखार कंकालों की प्यास बुझती है
एक औरत जिसका खून बहने से सरमायेदार का मुनाफा बढता है
एक औरत जिसके लिए तुम्हारी बेहूदा शब्दावली मे,
एक शब्द भी ऐसा नहीं जो उसके महत्त्व को बयां कर सके
तुम्हारी शब्दावली केवल उस औरत की बात करती है
जिसके हाथ साफ हैं
जिसका शरीर नर्म है
जिसकी त्वचा मुलायम है
और जिसके बाल खुशबूदार हैं
मैं तो वो औरत हूँ
जिसके हाथों को दर्द की पैनी छुरियों ने घायल कर दिया
एक औरत जिसका बदन तुम्हारे अंतहीन
शर्मनाक और कमरतोड़ काम से टूट चुका है
एक औरत जिसकी खाल मे
रेगिस्तानो की झलक दिखाई देती है
जिसके बालों से फेक्टरी के धुंए की बदबू आती है !
मैं एक आज़ाद औरत हूँ
जो अपने कामरेड भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर
मैदान पार करती है
एक औरत जिसने मजदूर के मजबूत हाथों की रचना की है
और किसान की बलवान भुजाओं की
मैं खुद भी एक मजदूर हूँ
मैं खुद भी एक किसान हूँ मेरा पूरा जिस्म दर्द की तस्वीर है
मेरी रग – रग में नफ़रत की आग भरी है
और तुम कितनी बेशर्मी से कहते हो
की मेरी भूक एक भ्रम है
और मेरा नंगापन एक ख्वाब
एक औरत जिसके लिए तुम्हारी बेहूदा शब्दावली में एक शब्द भी ऐसा नहीं
जो उसके महत्त्व को बयान कर सके
एक औरत जिसके सीने में
गुस्से से फफकते नासूरों से भरा एक दिल छिपा है
एक औरत जिसकी आँखों में आज़ादी की आग के लाल साये लहरा रहे हैं
एक औरत जिसके हाथ काम करते करते सीख गये हैं कि
अपने हक के लिए झंडा कैसे उठाया जाता है

>वर्तमान आधुनिम परिवेष खुला वातावरण एवं टी.वी. संस्कुति के कारण हमारी युवा पीढी अपने लक्ष्यों से भटक रही है। विना सोच विचार किये गये प्रेम विवाह शीघ्र ही मन मुटाव के चलते तलाक तक पहुंच जाते हैं। टी.वीत्र धारावाहिकों एवं फिल्मो की देखादेखी युवक युवती एक दूसरे को आकर्षित करने प्रयास करते हैं। रोज डे, वेलेन्टाईन डे जैसे अवसर इस कार्यको बढावा देते है। पयार मोहब्बत करें लेकिन सोच समझकर। अवसाद कार षिकार होने आत्माहत्या से बचने या बदनामी से बचने हेतु दिल लगान से पूर्व अपने साथी से अपने गुण-विचार ठीक प्रकार से मिला लें ताकि भविष्य में पछताना न पडे। सोच-समझ कर ही निर्णय लें।
ग्रहों के कारण व्यत्ति प्रेम करता है और इन्हीं ग्रहों के प्रभाव से दिल भी टूटते हैं। ज्योतिष शास्त्रों में प्रेम विवाह के योगों के बारे में स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता है, परन्तु जीवनसाथी के बारे में अपने से उच्च या निम्र का विस्तृत विवरण है। कोई भी स्त्री-पुरूष अपने उच्च या निम्र कुल मं तभी विवाह करेगा जब वे दोनों प्रेम करते होंगे। आज की पढी-लिखी और घोर भोैतिकवादी युवा पीढी ओधिकतर प्रेम विवाह की ओर आकर्षित हो रही है। कई बार प्रेम एक-दूसरे की देखी या फेषन के तौर पर भी होता है किनतु जीवनपर्यत निभ नहीं पाता। ग्रह अनुकूल नहीं होन के कारण ऐसी स्थिति बनाती है। शास्त्रों मे प्रेम विवाह को गांधर्व विवाह के नाम से जाना जावाहै। किसी युवक-युवती के मध्य प्रेम की जो भावना पैदा होती है, वह सब उनके ग्रहों का प्रभाव ही होता है, जो कमाल दिखाता है। ग्रह हमारी मनोदषा, पसंद नापसंद और रूचियों को वय करते और बदलते है। वर्तमान में प्रेम विवाह बजुत हद तक गंधर्व विवाह का ही परिवर्तित रूप है।
प्रेम विवाह के कुछ मुख्य योग:
1 -लेग्रेष का पंचक से संबंध हो और जन्मपत्रिका में पंचमेष-सम्तमेष का किसी भी रूप मे संबंध हो। शुक्र, मंगल की युति, शुम्र की राषि में स्थिति और लग्र त्रिकोण का संबंधप्रेम संबंधो का सूचक है। पंचम या सप्तक भाव में शुक्र सप्तमेष या पंचमेष के साथ हो।
2 -किसी की जन्मपत्रिका में लग्न , पंचम , सप्तम भाव व इनके स्वामियों और शुक्र तथा चन्द्रमा जातक के वैवाहिक जीवन व प्रेम संबेधों को समान रूप से प्रभावित करते हैं। लग्र या लग्रेष का सप्तम और सप्तमेष का पंचम भाव व पंचमेष से किसी भी रूप में संबंध प्रेम संबंध की सूचना देता है। यह संबंध सफल होगा अथवा नही, इसकी सूचना ग्रह योगों की शुभ-अषुभ स्थिति देती है।
3 -यदि सप्तकेष लग्रेष से कमजोर हो अथवा यदि सप्तमेष अस्त हो अथवा मित्र राषि में हो या नवाष मे नीच राषि हो तो जातक का विवाह अपने से निम्र कुल में होता है। इसमे विपरित लगेष से सप्तवेष बाली हो, शुभ नवांष मे ही तो जीवनसाथी उच्च कुल का होता है।
4 -पंचमेष सप्तम भाव में हो अथवा लग्रंेष और पंचमेष सप्तम भाव के स्वामी के साथ लग में स्थित हो। सप्तमेष पंचम भाव मं हो और लग्र से संसबंध बना रहा हो। पंचमेष सप्तम में हो और सप्तमेष पंचम में हो। सप्तमेष लग्र में और लग्रेष सप्तम मे हो, साथ ही पंचम भाव के स्वामी से दृष्टि संबंधहो तो भी प्रेम संबंध का योग बनता है।
5 -पंचम में मंगल भी प्रेम विवाह करवाता हैं। यदि राहू पंचम या सप्तम में हो तो प्रेम विवाह की संभावना होती हैं। सप्तम भाव में यदि मेष राषि में मंगल हो तो प्रेम विवाह होता हैं सप्तमेष और पंचमेष एक-दूसरे के नक्षत्र पर हों तो भी प्रेम विवाह का योग बनता हैं।
6 -पंचमेष वथा सप्तमेष कहीं भी, किसी भी तरह से द्वादषेष से संबंध बनायें लग्रेष या सप्तमेष का आपस मं स्थान परिवर्तन अथवा आपस में युकत होना अथवा दृष्टि संबंधं।
7 -जैमिनी सूत्रानुसार दाराकारक और पुत्रकारक की युति भी प्रेम विवाह कराती है। पेचमेष और दाराकार का संबंध भी प्रेम विाह करवाताहै।
8-सप्तमेष स्वगृही हो, एकाादष स्थान पापग्रहों के प्रभाव में बिलकुल न हो, शुक्र लग्र मे ं लग्रेष के साथ, मंगल सप्तक भाव में हो, सप्तमेषके साथ, चन्द्रमा लग्र में लग्रेष के साथ हो, तो भी प्रेम विवाह का योग बनताहै।
प्रेम विाह असफल रहने के कारण:
9 शुक्र व मंगल की स्थिति व प्रभाव प्रेम संबेधें को प्रभावित करने की क्षमता रखते है। यदि किसी जातक की कुण्डली में सभीर अनुकूल स्थितियां होते हुई थी , शुक्र की स्थिति अनुकूल हो तो प्रेम संबंध टूटकर दिल टूटने की घटना होती र्है।
10 सपतम भाव या सव्तमेषका पाप पीडित होनापापयोग में होना प्रेम विवाह की सफलता पा प्रश्रचिह् लगाता है। पंचमेष व सप्तमेष देानों की स्थिति इस प्रकार हो कि उनका सपतम-पंचम से कोई संबंध न हो तो प्रेम की असफलता दुष्टिगत होतो है।
11 शुक्र का सुर्य के नक्षत्र में होनाऔर उस पर चन्द्रमा का प्रभाव होने की स्थिति में प्रेम संबेधहोने के उपरांत या परिस्थितिवष विवाह हो जाने पर भी सफलता नहीं मिलती । शुक्र का सूर्य-चन्द्रमा के मध्य में होना असफल प्रेम का कारण हौ।
12 पंचम व सप्तम भाव के स्वामी ग्रह यदि धीमी गति के ग्र्रह हों तो प्रेम संबंधों का योग होने पा चिर स्थाइ्र प्रेम की अनुभूति दर्षाता है। इस प्रकार के जातक जीवन भर प्रेम प्रसंगों को नहीं भूलते चाहे वे सफल हों या असफल।
प्रेम विवाह को बल देने या मजबूत करने के उपाय: 13 शुक्र देव की पूजा करें।
14 पंचमेश व सप्तमेष की पूजा करें।
15 पंचमेश का रत धारण करें ।
16 ब्ल्यू टोपाज सुखद दाम्पत्य एवं वषीकरएा हेतु पहनें।
17 चन्द्रमणी प्रेम प्रसंग में सफलता प्रदान करती है।
प्रेम विवाह के लिये जन्मकुण्डली के पहले, पांचवें सप्तम भाव के साथ-साथ बारहवें भाव को भी देखे क्योंकि विवाह के लिये बारहवां भाव भी देखा जाता हैं यह भाव शया सुख का भी है। इन भावों के साथ-साथ उन भावों के स्वामियों की स्थिति का पता करना होता है। यदि इन भावों के स्वामियों का संबंध किसी भी रूप् में अपने भावों से बन रहा हो तो निश्रित रूप से जातक प्रेम विवाह करता है।
अन्तरजातीय विवाह के मामले में शनि की मुख्य भूमिका होती है। यदि कुण्डली मे शनि का संबंध किसी भी रूप से प्रेम विवाह कराने वाले भावेषो के भाव से हो तो जातक अन्तरजातीय विवाह करेगा। जीवनसाथी का संबंध सातवें भाव से होता है, जबकि पंचम भाव को सन्तान, उदन एवं बुद्धि का भाव माना गया है, लेमिन यह भाव प्रेम को भी दर्षाता है। प्रेम विवाह के मामलों मे यह भाव विषेष भूमिका दर्षाता है।
कबीरदास जी, ने कहा है-
पोथी पढ-पढ जग मुआ पडित भयो ना कोई।
ढाई आखर प्रेम के, पढे सो पण्डित होई।।
प्रेम एक दिव्य, अलौकिक एवं वंदनीय तथा प्रफुलता देने वाली स्थिति है। प्रेम मनुष्य में करूणा , दुलार स्नेह की अनुभूति देताहै। फिर चाहे वह भक्त का भगवान से हो, माता का पुत्र से या प्रेमी का प्रेमिका के लिये हो, सभी का अपना महत्व है। प्रेम और विवाह ,विवाह और प्रेम दोनां के समान अर्थ है लेमिन दोनों के क्रम में परिवर्तन है। विवाह पश्रत पति या पत्नी के बीच समर्पण व भावनात्मकता प्रेम का एक पहलू है। प्रेम संबेध का विवाह में रूपांतरित होना इस बात को दर्षाता है कि प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे से भावनात्मक रूप् से इतनाजुडे हुये है िकवे जीवन भर साथ रहना चाहते है सर्वविदित है कि हिनदू संस्कृति में जिन सोलह संस्कारें का वर्णन कियाहै उनमें से विवाह एक महत्वपूर्ण संस्कर है। जीवन के विकास, उसमें सरलता और सृष्टि को नये आयाम देने के लिये विवाह परम आवष्यक प्रकिगय है, इस सच्चाइ्र को नकारा नहीं जा सकता है। प्रेम और विवाह आदर्ष स्थितियों में वन्दनीय, आनन्ददायक और प्रफुलता देन वाला है।प्रेम संवंध का परिणाम विवाह होगा या नहीं इस प्राकर की स्थिति में ज्योतिष का आश्रय लेकर काफी हद तक भविष्य के संभावित परिणामों के बारे में जाना जा सकता है। दिल लगाने से पूर्व या टूटने की स्थिति न आये, इस हेतु प्रेमी प्रेमिका को अपनी जन्मपत्रिका के ग्रहों की स्थिति किसी योग्य ज्योतिषी से अवष्य पूछ लेनी चाहिये कि उनके जीवन में प्रेम की घटना होगी या नहीं। प्रेम ईश्रृर का वरदान है। प्रेम करे अवष्य लेकिन सोच समझकर।

>आज के भौतिकवादी एवं जागरूक समाज में पति-पत्नी दोनों पढ़े लिखे होते हैं और सभी अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति सजग होते हैं। परन्तु सामान्य सी समझ की कमी या वैचारिक मतभेद होने पर मनमुटाव होने लगता हैं। शिक्षित होने के कारण सार्वजनिक रूप से लड़ाई न होकर पति-पत्नी बेडरूम में ही झगड़ा करते हैं। कभी-कभी यह झगड़ा कुछ समय विशेष तक रहता हैं और कभी-कभी इसकी अवधि पूरे जीवन भर सामान्य अनबन के साथ बीतती हैं। जिससे विवाह के बाद भी वैवाहिक जीवन का आनन्द लगभग समाप्त प्रायः होता हैं।
आइए जानें बेड-रूम में झगड़ा होने के प्रमुख ज्योतिषिय कारण: –
नाम गुण मिलान: –
विवाह पूर्व कन्या व वर के नामों से गुण मिलान किया जाता हैं। जिसमें 18 से अधिक निर्दोष गुणों का होना आवश्यक हैं। किन्तु यदि मिलान में यदि दोष हो तो बेडरूम में झगड़े होते हैं। यह दोष निम्न हैं। जैसे गण दोष, भकुट दोष, नाड़ी दोष, द्विद्वादश दोष को मिलान में श्रेष्ठ नहीं माना जाता। प्रायः देखा जाता है कि उपरोक्त दोषों के होने पर इनके प्रभाव यदि सामान्य भी होते हैं तब भी पति-पत्नी में बेडरूम में झगड़े की सम्भावना बढ़ जाती हैं।
मंगल दोष: -
प्रायः ज्यातिषीय अनुभव में देखा गया हैं कि जिस दम्पति के मंगल दोष हैं व उनका मंगल दोष निवारण अन्य ग्रह से किया गया हैं उनमें मुख्यतः द्वादशः लग्न, चतुर्थ में स्थित मंगल वाले दम्पति में लड़ाई होती हैं क्योंकि इसका मुख्य कारण सप्तम स्थान को शयन सुख हेतु भी देखा जाता हैं। मंगले के द्वादश एवं चतुर्थ में स्थित होने पर मंगल अपनी विशेष दृष्टि से सप्तम स्थान को प्रभावित करता हैं और यही स्थिति लग्नस्थ मंगल में भी देखने को मिलती हैं, क्योंकि लग्नस्थ मंगल जातक को अभिमानी, अड़ियल रवैया अपनाने का गुण देता हैं।
शुक्र की स्थिति: –
ज्योतिष में शुक्र को स्त्री सुख प्रदाता माना हैं और शुक्र कि स्थिति अनुसार ही पती-पत्नी से सुख मिलने का निर्धारण विज्ञ ज्योतिषियों द्वारा किया जाता हैं। अगर शुक्र नीच का हो अथवा षष्ठ, अष्ठम में हो तो बेडरूम में झगड़ा होने की सम्भावना रहती हैं। शुक्र के द्वादश में होने पर धर्मपत्नि को सुख प्राप्ति में कमी रहती हैं। यह योग मेष लग्न के जातक में विशेष होता हैं और बेडरूम में झगड़ा होता हैं।
सप्तमेश और सप्तम स्थान पर ग्रहों का प्रभाव: – (बेडरूम में झगड़े के कारण)
1. सप्तम स्थान पर सूर्य, शनि, राहू, केतु, और मंगल में से किसी एक अथवा दो ग्रहों का सामान्य प्रभाव।
2. गुरू का दोष पूर्ण होकर सप्तमेश या सप्तम पर प्रभाव।
3. सप्तमेश का छठे, आठवें अथवा बारवें भाव में होना।
4. पाप ग्रह से सप्तम स्थान घिरा होना।
5. सप्तमेश पर पाप ग्रहों का प्रभाव।
गोचर ग्रहों का प्रभाव
दाम्पत्य सुख में गोचर ग्रह का अपना महत्व हैं। सभी ग्रह गतिमान हैं और राशि परिवर्तन करते हैं एवं प्रत्येक राशि को अपना प्रभाव देकर सुखी अथवा दुखी होने का कारण होते हैं। सर्वाधिक गतिमान चन्द्र प्रत्यें ढाई दिन में राशि परिवर्तन करता हैं और चन्द्रमा मनसो जातः के अनुसार मन का कारक होने, जलीय ग्रह होने से प्रेम का भी कारक होता हैं। अतः प्रत्येक राशि में वह अन्य ग्रहों की भांति सकारात्मक अथवा नकारात्मक प्रभाव प्रदान करता हैं। इसकी छठी, आंठवीं व बारहवीं स्थिति प्रेम को कम करती हैं व शयन सुख में बाधा देती हैं।
प्रत्येक ग्रह का प्रभाव दाम्पत्य जीवन पर सकारात्मक जहाँ आनन्द भर देता हैं वहीं नकारात्मक रति सुख नष्ट कर देता हैं।
(पं0 दयानंद शास्त्री)

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>एक दोस्त चाहिए—-

>ना ज़मीन, ना सितारे, ना चाँद, ना रात चाहिए,
दिल मे मेरे, बसने वाला किसी दोस्त का प्यार चाहिए,

ना दुआ, ना खुदा, ना हाथों मे कोई तलवार चाहिए,
मुसीबत मे किसी एक प्यारे साथी का हाथों मे हाथ चाहिए,

कहूँ ना मै कुछ, समझ जाए वो सब कुछ,
दिल मे उस के, अपने लिए ऐसे जज़्बात चाहिए,

उस दोस्त के चोट लगने पर हम भी दो आँसू बहाने का हक़ रखें,
और हमारे उन आँसुओं को पोंछने वाला उसी का रूमाल चाहिए,

मैं तो तैयार हूँ हर तूफान को तैर कर पार करने के लिए,
बस साहिल पर इन्तज़ार करता हुआ एक सच्चा दिलदार चाहिए,

उलझ सी जाती है ज़िन्दगी की किश्ती दुनिया की बीच मँझदार मे,
इस भँवर से पार उतारने के लिए किसी के नाम की पतवार चाहिए,

अकेले कोई भी सफर काटना मुश्किल हो जाता है,
मुझे भी इस लम्बे रास्ते पर एक अदद हमसफर चाहिए,

यूँ तो ‘मित्र’ का तमग़ा अपने नाम के साथ लगा कर घूमता हूँ,
पर कोई, जो कहे सच्चे मन से अपना दोस्त, ऐसा एक दोस्त चाहिए

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>OFFER FOR GLOBEL KNOWLEDGE OPPORNITIES :::——

>We , Vinayak Vastu Astro Shodh Sansthan,Jhalrapatan, Rajasthan(India) and Telenet Consultancy Services,Bhopal (MP) India, offer the Accurate Calculation for Astrology and related work like,Panchang making ,Astrology Call centers and Telecommunications and Television company’s, who are interested to get proper, natural and fast result for their Global Network,under International rights,show the Mr.Shyam Singh Thakur,IPR rights under the licence documents will be attached .Contect for further informations are as under:

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1. IPR Case-Shyam Singh Thakur on Maths(0 to infinity)

Due to negligence from the Government of India, a case on Intellectual Property right was lost in our own nation. Still we have time. …
www.drtsolutions.com/new_page_1.htm – Cached – Similar

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Mr Shyam Singh Thakur, obtained International Copy Right order ’99 issued by the Govt. of India Reg. No. L-18402/99 dated 24.6.99 on 00 difference calculation method (0 to infinity) which pertains to electromagnets management, maths for uncertainty principles, coding and decoding in computers, arithmatic geometry encompassing practical applications such as technology of mobile phone identification. The abstract of the said copy right held by Mr. Shyam Singh Thakur is as under:-
ABSTRACT
It is worhwhile to mention here that Mr. Shyam Singh Thakur filed a suit on 11th Sept 2001 for prohibitory injunction against the GSM Association, London (Global Association representing interests of more than 613 mobile phone operators functioning in 205 countries). The High Court of MP Jabalpur, India in its order dated 12th January 2004 asked the District Court, Jabalpur to continue to process the said suit vide citation2004(2) MPLJ 165, Shyam Singh vs GSM Association
The detailed write up on the above mentioned IPR is as under:-
Intellectual Property Rights held by Mr. Shyam Singh Thakur on 0 to infinity
The very name we know India by Bharat, gives us the necessary clue, Bha means Light & knowledge and rata means devoted. Bharat means devoted to Light & Knowledge. Hence the land and its citizen devoted to Light & Knowledge. From the Puranic time, India is continuously managing its Intellectual Property. The model, which Modern Science is searching for, is already available in Sankhya Yoga. The Sankhya Yoga like intellectual property is unparallel in the world. The Government of India issued its International Copyright L/18402/99 on 24.06.1999
Computer Science gives it the name “Digital decade”. Cosmology presents it in the name of Uncertainty Principle. It is being researched in the form of quantum (wave & particle) in the department of Physics. In future, it will be known as Medical Engineering. Nature represents itself through Mathematical “Zero”. The present article on Management of Intellectual Property duly based on experiences will lead the world for Indian Scientists & Industries under the laws governed by the World Trade Organization.
Rights for the intellectual property is a typical decision of an era. Original Scientific Certification Performa (Copyright, Patent, Trademark) are the main documents which are based on Contracts & Conditions as laid down by the World Trade Organization for commercial advantage of the production capacity to the Western countries. This stand is lawfully permissible also but putting the condition for Grant in order to maintain the production capacity is unfair on the part of World trade.
1. Foundation of Intellectual Knowledge.
Now the question comes up that unless otherwise mathematically proved, no scientific achievement can be claimed as scientific. It is India’s greatest contribution in the form of Sankhya Yoga towards Intellectual Property, that made world reach up to such a high stage of knowledge. The Decimal calculation system, the invention & contribution of India, known as computer era, is initial level of science (copyright Digitalization). The Ministry of Human Resource & Development, Government of India released International Copyright order 1999 on 24.06.1999 on Y2K (Sankranti) Natural Counting System with the number L/18402/99, when the whole world of science was caught into the Y2K problem.
This system is of the peculiarity that it counts the difference between two zeros. That means from zero to infinity. This is the counting system which is based on zero, without the use of zero. The knowledge of Sankhya Yoga was prevailing in India only. Very first verse of the Gita is also there. Time has reached to the moment that Indian Intellectual Knowledge can be well understood by the whole world. It is the Zero which represents the nature (Static & Kinetic). It is becoming more clear now. (Figure 1)

(2) The Best Intellectual Knowledge
The very first discourse in the Bhagavad Gita is on Sankhya Yoga. Lord Krishna asked Arjun to follow the Sankhya Yoga after Arjuna’s request for divine guidance while trying to keep himself away from violence. The knowledge given on the occasion is known as Digitalization by the science which is the initial level of knowledge. Maharishi Kapil has given this knowledge first time ever to Rishi Satkam Jabala. Then it took the form of mathematics in its development in succession. Swastik Mathematics from Vedic mathematics which is from Sankhya Yoga is a counting model of 17 and 45 zeros. Now America keeps a sharp-eye on Mathematics Gita which is copyright protected. In this number system, the word is written the same way as it is pronounced generally in Sanskrit which solves the problem of linguistic (language- science).
(3) Intellectual Copying
National Geographic Magazine is published from D.C. Washington. A picture titled “Mapping the universe” is released in its issue of October 1999 on page No. 30 with the artists name on the bottom right. With the fundamental rights, NASA scientists claim that all the similar theories if found are “Theory for everything”. Electric Energy is all around the universe. Mobile Communication proves this also. W.L.L. phone has been converted into satellite (Iridium) phone. This is again a discovery in the field of mathematics. Now 90000 million can be written in three figure.
Thus the scientific research in the space is very challenging one. The whole world witnessed two inestimable accident while traveling through the space of which the calculations were based on the scientific laws which are applicable on earth. The research work, by Kalpana Chawla from 16 January 2003 to 1 February 2003 by NASA, an American Institution, in the space in the area of Unified Field is known as “Terminal Count Down Demonstration Test Activities” or “Simulated Launch Count Down System”. This will be utilized for raising a space station for further traveling in the space.
In the second experiment the Russian Space shuttle fell down 5oo KM away from the prescribed station. American rocket smashed due to error in the calculation on the basis of static. The calculations were based on static for American Rocket and on Kinetic for Russian Rocket. The above turned out due to the Uncertainty Principle given by scientist Heigenberg in 1926. Space traveling is not possible till we do not get the system which calculates simultaneously for the both (Static & Kinetic). The scientist presently can not calculate for the static & kinetic simultaneously. With the accuracy you calculate one, the other gets less accurate results. You can see the point of the system as explained further. Here violation of copyright act of figure 1 is clearly evident in figure 2.

(4) Uncertainty Principle
The earth is a point in the space. The nine major planets are revolving in its own orbits. Keeping itself stationary the earth is revolving also in its orbit . Everything is in static & kinetic movement. The same is called “from zero till infinity” in Science of Veda and “Unified theory” in Modern Science. The above is well analyzed in the chapter 4 in the book titled “A brief history of time” written by Stephen Hawking.
Based on this theory 17 zero counting system is prevalent in India. On the page No. 79 & 103 in a book titled “Swastik Mathematics ” by Shankaracharya Swami Nishchalanand of Jagannath Puri Urissa, which was published in 2000, it is made clear that “counting should start from zero and zero should be divided into nine divisions”. This can be proved from the summary of the Vedas, my copyright and the matter appeared on page no. 30 in the issue of October 1999 of National Geographic. India owns a separate science for Intellectual Property. I have taken the patent for the model of the counting system of 17 zeros in Vedas, 45 zeros & 90 zeros in Budhhism.
Modern science is familiar with single zero counting system. Whereas Veda & Nature recognize double zero counting system. It is law of nature which rules the science. Everything is available in advance in Nature. When a man happened to know some law of nature, he gives the name of invention or discovery to that. However it is not shaping a new law, on the contrary it is simply a finding from nature. The intellectual property right goes favorable toward the person who has identified the law of nature in very beginning, ahead of others. All the above is available in Sankhya Yoga. Modern science is in search of the same mathematics. It is made clear by Stephen Hawking in his book on page no. 136 by writing the million million 14 times for 85 zeros that for further growth, zeros are vital.
(5) The Efforts by America
Shri Bhu Dev Sharma, Professor of Mathematics in Clark Atlanta University, America & Ex founder – Vice Chancellor of Hindu University of America gave the enlightening information that “There are so many original theories & secrets lying hidden in mathematics in Vedas that the discovery of those can play havoc in the field of Information Technology.
He also informed that Japan by translating the Vedas in Japanese language is exploring the new horizon in the field of mathematics. The same applies to Germany also. In America, History of mathematics is taught in a separate department. Vedic mathematics is taught also as a subject. It was regretted that the area of Vedic Mathematics was not well explored in the Indian Universities. It will be appropriate under these circumstances to open Chronology Department in India.
An institution namely “American Forum for Indisciplinary Mathematics” was formed for various functioning in the field of mathematics. A session was called in the University of Southern America on 3 to 5 October in 2003. The same will be convened in India one year after the above. This is the real Intellectual Property. There exists a copyright society as far as India is concerned under the International copyright order 1999 as International Copyright was in effect from 6 April 1999 in India. As per the international system, the nation which have got the Intellectual Property, should claim its rights in World Trade Organization through Copyright Society.
(6) Copyright Society
Copyright Society should be formed under Indian Copyright rule 1958 Indian Copyright Act 1957 so that it should consist of at least 7 memberships of copyright holders having the same nature of copyright. under chapter VII section 33 under Act 1957/ Rule 12 of chapter V of Rule 1958.
As per the special information about the Intellectual property in Agriculture, as given by Shri R. A. Mashelkar, Director General, Scientific & Industrial Research Council in a conference, 36000 formulae were digitized of 17 scriptures from Ayurveda in the last 18 months which was the earliest in the world. Still it is a safeguard only. Why not ourselves be equipped with the sword for trade advantages. A nation affluent with Intellectual Knowledge and unemployed youth is simply saving itself from the attack of copyright, patent etc..World Trade organization has given equal rights to all. Due to negligence from the Government of India, a case on Intellectual Property right was lost in our own nation. Still we have time. Doordarshan India is to produce the evidence in the case no. F.A. 509/2002 in the High Court, Jabalpur on the programme telecast on 09.07.2001against Global Service Mobile organization which serves 171 nation. Hence the biggest Intellectual & financial case ever.
(7) Science in Future
New discovery in Southern College in New York through “Plastic Mechanism” in Optimetry made the blinds see. The scientists clarified that the angles in the robot were taken from senior astrolgers and chinese painters. A new scientific study from Television. German & British scientists has invented that the sectret message can be sent through figures in the light waves on some angles. They made it clear that it was not the science of angles. They will provide the technology in next seven years. Our Government of India is still thinking on it. Deputy Prime Minister making the statement on 4 September 2002 in Bhopal about safeguarding the Intellectual Property finds himself safe Home Minister. How can a nation who could not save its Intellectual Property, can defend itself. India holds an international copyright for counting the difference in two zeros. This is the future of the nation.
(8) Contribution of our ancestors
Now it is clear that the Intellectual Property which India possess is under the copyright act. Because whatsoever be the knowledge, is already written in Vedas. It is not discovered recently. It it were so, we could have the international copyright patent and trademark number assigned to it. We can save ourselves in World Trade Oganization in the name of our ancestors, but not take the advantage of trading. On the contrary we have ample stores of knowledge from the time immortal. No nation possesses the knowledge of Sankhya Yoga which is highest Intellectual Property of science.
(9) Formation of National Policy
The citizens of our nation are unemployed even if they possess the high level knowledge. It is the high time to make the sword by claiming of copyright patent number. Mathematics is the Original Intellectual knowledge. Copyright Society should be formed by the Government of India because the laws pertaining to the world trade permits it. The Government & citizens both are being misled by forming the society under laws pertaing to general society. For the national intellectual leadership it is indispensable. We do not need a shield but the sword. It is national property. It is dedicated to the nation so that national can claim its rights on quantum computer in the world. Hence the cooperation from all unions, institutions and oraganizations is the biggest sense, which are sought for.
Scope of Utilization of above Copy Rights
WTO and International Copyright order 99.Indian Copyrighat act 1957amended 1999.

CENTRAL INFORMATION COMMISSION
Appeal No. CIC/WB/A/2006/00365 dated 5.6.2006
Right to Information Act 2005 – Section 19
Appellant: Shri Shyam Singh Thakur
Respondent: Deptt. of Science & Technology.
Facts:
Shri Shyam Singh Thakur of Shahpura, Bhopal applied to PIO, Deptt.
of Science & Technology on 5.1.06 seeking the following information :
1. How many Projects on “Aapda Anusandhan” have been proposed and
sanctioned, which will be getting financial assistance of the Govt. of
India. Detailed information along with the name and amount be given.
2. On the basis of “Theory of uncertainty” that the simultaneous
calculations of status and dynamics of nature cannot be done has been
proved. No research can be scientific in absence of the mathematical
principle. However, in this case if there is any principle, ‘fair use’
certificate may be given.
3. As per clause 9.2 of the Copyright and Related Rights Act of WTO
within TRIPPS, ‘fair use’ has been defined. How many projects have
been certified with ‘fair use’ as per the clarification of TRIPPS ?
4. If the policies at Sr. No. 2 & 3 have not been followed then all outcome
of research becomes illegal. Keeping this in view why the FIR has not
been registered with the police as the matter is of national security.
From the letter of Shri A.K.Barua, it is clear that by 26.12.2005 the
concerned authority had full knowledge of this, yet why an FIR could
not be registered, should be clarified.
In response to this application vide his letter dated 3.2.06, Shri
A.K.Barua, CPIO Deptt. of Science & Technology sent the following reply :
1. In reference to item No. 2 of your application, it is informed that the
information asked for is not related to any theory. As far as “fair
use” is concerned, it is used as per the Copyright Act of 1957, in
which it has a very specific meaning. If any person uses the work
of others with a copyright for educational and research purposes, it 2
is not a violation of the original work. In all cases related to the
implementation of the Copyright Act MoHRD is the nodal ministry.
You are advised to contact the MoHRD in respect of item Nos. 2 &
3 of your application.
2. In light of the above, therefore, your suggestion at Sr. No. 4 does
not merit any action.
Aggrieved, Shri Thakur moved a first appeal with the Jt. Secretary,
Deptt. of Science & Technology on 12.4.06 stating that the information sought
was in compliance with the policies of the Govt. of India of which the Deptt. of
Science & Technology is a part, impediments had been placed in supply of
information. In his orders of 28.3.06 Shri Sanjiv Nair, Appellate Authority and
Jt. Secretary stated that whereas Shri Shyam Singh Thakur has sought
information on Disaster Research on its fair use and infringement of copyright
and the CPIO has stated in response that in matters concerning disaster
research and copy right etc. the department had no role whatever, so the
answers to the questions of appellant Shri Thakur were given as zero, in
respect of questions 1 & 3, and questions 2 & 4 did not constitute information
as defined in Sec 2(f).
In response to our appeal notice, issued by us on receiving the second
appeal from appellant Shri Thakur on 25.5.06, Appellate Authority Shri Sanjiv
Nair has responded as follows in a letter of 21.11.06:
(i) “No relief could be given to the applicant during the
appeal filed against the order of the CPIO, DST because the
issues raised were so generic and broad that it was difficult to
pinpoint what exact information the applicant desired. For
example, he had sought information on disaster research.
There is no specific project/scheme, as far as information
brought to my notice, about the disaster research being carried
out by DST. Further, disaster research is such a vast area which
encompasses early warning system, mitigation exercises and
communication system. Therefore, the appeal was disallowed.
(ii) The second issue on which he wanted information was
the principle of uncertainty. There is a vast field of literature on
uncertainty both in the fields of science and economics, and
other fields and it was difficult to comprehend what exactly could
be given to him on uncertainty. The ground work in this area will
have to be done by the applicant because of the vast quantity of 3
literature that is available and, as an appellate officer; no
specific direction could be issued for providing information.”
Appellant’s rejoinder to this dated 1.12.06 has been taken on file. He
has stated as follows:
1. In respect of question No. 1, the Appellate Authority in
his orders dated 3.2.06 and 28.3.06 informed that the Govt. of
India has not been supporting any of the projects, hence the
information is zero.
2. The clarification given by the Joint Secretary MoS&T
in respect of the “Theory of uncertainty” violates the proposition
of the “vision on the Science & Technology, Serial No. C & D”
announced by the Hon’ble President of India on 25.1.06.
3. In respect of the “fair use” as defined in TRIPPS the
reply is Zero. This amounts to contempt of TRIPPS by a Joint
Secretary to the Govt. of India.
4. RTI is a Civil Right whereas FIR is used to curb the
criminal activities of the criminals. RTI is essentially applicable
to the officers/officials including the Central Information
Commission.
5. Since I have filed an affidavit, I will request the
Commission to arrange the replies of the respondents in the
affidavit for the right of equality as is applicable to both the
parties.
The appeal was heard by us on 4.12.06. Following are present:
1. Sh. Shyam Singh Thakur, appellant
2. Sh. Rakesh Bhartiya Dy.Secy. M/o Sc. & Tech.
3. Sh. Davinder Nath, Dy.Secy. Deptt. of Sc.& Tech.
4. Sh. N.K.Gupta, U.S., Deptt. of Sc. & Tech.
It was pointed out to respondents that u/s 6(3)(1) of the Act, if they
receive an application requesting information which is held by another public
authority, they are required to transfer the application or such part of it as may
be appropriate to that other public authority and inform the applicant
immediately on such transfer. Moreover, such transfer was to be effective in
no case later than 5 days from the date of receipt of the application. The
Ministry has indeed asked the applicant to approach the HRD Ministry for
information against point 2 & 3 the answer to which is are also related Q. No.
4 but it was required to transfer the case as provided in the Act.4
During the hearing appellant Shri Thakur argued that as we have
pointed out in relation to questions 2 & 3, so in the case at Point 1, the
department is required either to answer and provide the information sought or
to transfer it to the concerned public authority. Neither has been done.
DECISION NOTICE
As agreed by appellant, the information sought against point No.1,
refers to all departments of Govt. of India. If this information was not available
with Dep’t. of Science & Technology Shri Thakur’s application should have
been referred to the concerned authority/authorities that could have
provided him the information he had sought. However, we find on a simple
reading of the application that the information sought seems to have been
directed specifically to the department to which it is addressed. The
department has, therefore, rightly stated “it has no such programme in
operation in its jurisdiction”.
With regard to Points 2 & 3, respondents have admitted that because
this was a new case, they have neglected to transfer it but simply referred the
appellant to the appropriate authority. Although there is no penalty u/s 6(3), in
such matters, the Department is cautioned that on receiving applications of
this nature of which it feels a part pertains to another public authority, this is to
be transferred to the concerned public authority within 5 days of the receipt
of the application. In the instant case the application is now referred to the
CPIO, Ministry of Human Resources Department to provide applicant Shri
Thakur the information sought by him in regard to points 2, 3 & 4 of his
application.
Announced in hearing. Notice of this decision be given free of cost to
the parties.
(Wajahat Habibullah)
Chief Information Commissioner
22.1.20075
Authenticated true copy. Additional copies of orders shall be supplied against
application and payment of the charges prescribed under the Act to the CPIO
of this Commission. The copy file together with the application is transferred
to the Ministry of Human Resource Development for examination and
disposal within the provisions of the Right to Information Act, 2005
(L.C.Singhi)
Addl. Registrar
22.1.2007

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Nothing is impossible—–

>Nothing is impossible, if we have dare.
when you start walking, confusions are there.
don’t let down yourself, continue wallking up stair
don’t get frustrate, if trouble rains your tear.
One thing about life is, it has so many layers,
you can win, if and only you beat your fear.
the one who survive with difficulties, try best
is the only known as, in world, best player .
Nobody can stay forever…….
This is truth of life, we were born & die here
This is the Destiny, which changes rare.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>दोस्ती——

>दोस्ती दुनिया की वो ख़ुशी है,
जिसकी ज़रूरत हर किसी को हुई है,
गुजार के देखो कभी अकेले ज़िन्दगी,
खुद जान जाओगे के
दोस्ती के बिना ज़िन्दगी भी अधूरी है.
कीसी का दिल तोड़ना हमारी आदत नहीं
कीसी का दिल दुखाना हमारी फितरत में नहीं
भरोसा रखना हम पर तुमदोस्त कह
कर कीसी को यूँ ,हम बदलते नहीं
हर ख़ुशी दिल के करीब नहीं होती,
ज़िन्दगी गमो से दूर नहीं होती,
ये दोस्त मेरी दोस्ती को संभल कर रक,
सच्ची दोस्ती हर किसी को नसीब नहीं होती.
तेरी दोस्ती हम इस तरह निभाएंगे तुम रोज़ खफा हो
नाहम रोज़ मनायेंगे पर मान जाना मनाने से
वरना यह भीगी पलकें ले के कहा जायेंगे.
इतना प्यार पाया है आप से..
उस से ज्यादा पाने को जी चाहता है.
नजाने वो कौन सी खूबी है आप में.
की आप से दोस्ती निभाने को जी चाहता है.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>हिसाब—-

>कैसी रची थी खुदा ने ये दुनिया
अब कैसा इसका हिसाब दिख रहा है,
हर दिल को उसने प्यार से सजाया था
अब दिलों का हाल ख़राब दिख रहा है,
जब इमानदारी थी तो फ़कीर दिखता था
अब धोखेबाज़ है तो नवाब दिख रहा है,
दिल की सूरत के लिए इक नज़र भी नहीं
हर नज़र में बस शबाब दिख रहा है,
माँ-बाप को यहाँ दी जाती हैं गालियाँ
और महबूब ही बस माहताब दिख रहा है,
दिया जाता था संतों को खुदा का दर्जा
अब पंडित हाथों में लिए शराब दिख रहा है,
खुदा भी हैरान है की वो प्यार कहाँ हैयहाँ
नफरत और धोखा बेहिसाब दिख रहा है,
कैसी रची थी खुदा ने ये दुनिया
अब कैसा इसका हिसाब दिख रहा है

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>"दीपावली की शुभकामनाएँ"—–

>”दीपावली की शुभकामनाएँ”
***आदरणीय मित्रों ,
स्वीकार हों दीपावली की शुभकामनाएँ,
हैं छिपी इसमें सदभावनाएँ।
गणपति विघ्न मिटाएँ,
मान-बुद्धिधन सदा लुटाएँ।
सरस्वती ज्ञान का भंडार दें,
राशि बढ़े ऐसा वरदान दें।
लक्ष्मी करें धन की कृपा,
दें सभी की दरिद्रता मिटा।प्यार का दीप जलता रहे,
नफरत का धुंआ छटता रहे।सदा मन मे दीवाली रहे,
पृथ्वी हरी-संपदा वाली रहे॥
आपक़ो और आपक़े परिवारज़ऩो क़ो दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाऎ।
आपकी दीपावली मगंलमय हो !
आप सभी का स्नेह एवं आशीष इसी प्रकार बना रहे तो जीवन का प्रवाह भी खूबसूरत बना रहेगा।
सादर,आपका स्नेहाकांक्षी-
प. दयानंद शास्त्री

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>COMPUTER KAVITA——

>अभी अभी तो प्यार का PC किया है चालु
अपने दिल के Hard Disk पे और कितनी Files डालु

अपने चेहरे से रूसवाई की Error तो हटाओ
ऐ जानेमन अपने दिल का Password तो बताओ

वो तो हम है जो आप की चाहत दिल मॆं रखते है
वरना आप जैसे कितने Softwares तो बाज़ार में बिकते है

रोज़ रात आप मेरे सपने में आते हो
मेरे प्यार को Mouse बना के उंगलियों पे नचाते हो

तेरे प्यार का Email मेरे दिल को लुभाता है
पर बीच में आप के पिताश्री का Virus आ जाता है

और करवाओगे हमसे कितना इन्तजार
हमारे दिल की साईट पे कभी Enter तो मारो यार

आपके कई नखरे अपने दिल पे बैंग हो गये
दो PC जुड़ते जुड़ते Hang हो गये

आप जैसो के लिये दिल को Cut किया करते है
वरना बाकी केसेस में तो Copy Paste किया करते हैं

आपका हँसना आपका चलना आप की वो स्टाईल
आपकी अदाओं की हमने Save कर ली है File

जो सदीयों से होता आया है वो रीपीट कर दुंगा
तु ना मिली तो तुझे Ctrl+Alt+Delete कर दुंगा

लड़कीयां सुन्दर हैं और लोनली हैं
प्रोब्लम है कि बस वो Read Only हैं

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>दोस्ती——

>आपसे दोस्ती हम यूं ही नही कर बैठे,

क्या करे हमारी पसंद ही कुछ “ख़ास” है. .

चिरागों से अगर अँधेरा दूर होता,

तोह चाँद की चाहत किसे होती.

कट सकती अगर अकेले जिन्दगी,

तो दोस्ती नाम की चीज़ ही न होती.

कभी किसी से जीकर ऐ जुदाई मत करना,

इस दोस्त से कभी रुसवाई मत करना,

जब दिल उब जाए हमसे तोह बता देना,

न बताकर बेवफाई मत करना.

दोस्ती सची हो तो वक्त रुक जता है

अस्मा लाख ऊँचा हो मगर झुक जता है

दोस्ती मे दुनिया लाख बने रुकावट,

अगर दोस्त सचा हो तो खुदा भी झुक जता है.

दोस्ती वो एहसास है जो मिटती नही.

दोस्ती पर्वत है वोह, जोह झुकता नही,

इसकी कीमत क्या है पूछो हमसे,

यह वो “अनमोल” मोटी है जो बिकता नही . . .

सची है दोस्ती आजमा के देखो..

करके यकीं मुझपर मेरे पास आके देखो,

बदलता नही कभी सोना अपना रंग ,

चाहे जितनी बार आग मे जला के देखो.!!!!!!!!!

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>GHAZAL—–

>”दर्द की शाम ढल नहीं सकती,
‘मेरी ‘किस्मत’ बदल नहीं सकती.’

‘वो जो कहते थे ‘बेवफा’ मुझको,
‘उनकी ‘आदत’ बदल नहीं सकती.’

‘जिनके हिस्से में ‘डूबना’ है लिखा,
‘कश्तियाँ’ उनकी ‘संभल’ नहीं सकती.’

‘मैंने देखा है ‘मोहब्बत’ का चेहरा ऐसा,
‘की फिर से ‘तबियत’ मचल नहीं सकती.’

‘अब तो ‘मुश्किल’ है ‘ठहरना’ ‘यारों,
‘ये ‘मौत’ मेरी अब टल नहीं सकती.’

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>खूबसूरत मुस्कान—–

>खूबसूरत है वो मुस्कान जो दूसरों की खुशी देख कर खिल जाए,

खूबसूरत है वो दिल जो किसी के दुख मे शामिल हो जाए,

खूबसूरत है वो जज़बात जो दूसरो की भावनाओं को समज जाए,

खूबसूरत है वो एहसास जिस मे प्यार की मिठास हो जाए,

खूबसूरत है वो बातें जिनमे शामिल हों दोस्ती और प्यार की किस्से, कहानियाँ,

खूबसूरत है वो आँखे जिनमे किसी के खूबसूरत ख्वाब समा जाए,

खूबसूरत है वो हाथ जो किसी के लिए मुश्किल के वक्त सहारा बन जाए,

खूबसूरत है वो सोच जिस मैं किसी कि सारी ख़ुशी झुप जाए,

खूबसूरत है वो दामन जो दुनिया से किसी के गमो को छुपा जाए,

खूबसूरत है वो किसी के आँखों के आसूँ जो किसी के ग़म मे बह जा

खूबसूरत है वो लब जिन पर दूसरों के लिए कोई दुआ आ जाए,

खूबसूरत है वो मुस्कान जो दूसरों की खुशी देख कर खिल जाए,

खूबसूरत है वो दिल जो किसी के दुख मे शामिल हो जाए,

खूबसूरत है वो जज़बात जो दूसरो की भावनाओं को समज जाए,

खूबसूरत है वो एहसास जिस मे प्यार की मिठास हो जाए,

खूबसूरत है वो बातें जिनमे शामिल हों दोस्ती और प्यार की किस्से, कहानियाँ,

खूबसूरत है वो आँखे जिनमे किसी के खूबसूरत ख्वाब समा जाए,

खूबसूरत है वो हाथ जो किसी के लिए मुश्किल के वक्त सहारा बन जाए,

खूबसूरत है वो सोच जिस मैं किसी कि सारी ख़ुशी झुप जाए,

खूबसूरत है वो दामन जो दुनिया से किसी के गमो को छुपा जाए,

खूबसूरत है वो किसी के आँखों के आसूँ जो किसी के ग़म मे बह जा ..

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>धरती धोरां री !——-

>धरती धोरां री !
आ तो सुरगां नै सरमावै,
ईं पर देव रमण नै आवै,
ईं रो जस नर नारी गावै,
धरती धोरां री !
सूरज कण कण नै चमकावै,
चन्दो इमरत रस बरसावै,
तारा निछरावल कर ज्यावै,
धरती धोरां री !
काळा बादलिया घहरावै,
बिरखा घूघरिया घमकावै,
बिजली डरती ओला खावै
,धरती धोरां री !
लुळ लुळ बाजरियो लैरावै,
मक्की झालो दे’र बुलावै,
कुदरत दोन्यूं हाथ लुटावै,
धरती धोरां री !
पंछी मधरा मधरा बोलै,
मिसरी मीठै सुर स्यूं घोलै,
झीणूं बायरियो पंपोळै,
धरती धोरां री !
नारा नागौरी हिद ताता,
मदुआ ऊंट अणूंता खाथा !
ईं रै घोड़ां री के बातां ?
धरती धोरां री !
ईं रा फल फुलड़ा मन भावण,
ईं रै धीणो आंगण आंगण,
बाजै सगळां स्यूं बड़ भागण,
धरती धोरां री !
ईं रो चित्तौड़ो गढ़ लूंठो,
ओ तो रण वीरां रो खूंटो,
ईं रे जोधाणूं नौ कूंटो,
धरती धोरां री !
आबू आभै रै परवाणै,
लूणी गंगाजी ही जाणै,
ऊभो जयसलमेर सिंवाणै,
धरती धोरां री !
ईं रो बीकाणूं गरबीलो,
ईं रो अलवर जबर हठीलो,
ईं रो अजयमेर भड़कीलो,
धरती धोरां री !
जैपर नगर्यां में पटराणी,
कोटा बूंटी कद अणजाणी ?
चम्बल कैवै आं री का’णी,
धरती धोरां री !
कोनी नांव भरतपुर छोटो,
घूम्यो सुरजमल रो घोटो,
खाई मात फिरंगी मोटो
धरती धोरां री !
ईं स्यूं नहीं माळवो न्यारो,
मोबी हरियाणो है प्यारो,
मिलतो तीन्यां रो उणियारो,
धरती धोरां री !
ईडर पालनपुर है ईं रा,
सागी जामण जाया बीरा,
अै तो टुकड़ा मरू रै जी रा,
धरती धोरां री !
सोरठ बंध्यो सोरठां लारै,
भेळप सिंध आप हंकारै,
मूमल बिसर्यो हेत चितारै,
धरती धोरां री !
ईं पर तनड़ो मनड़ो वारां,
ईं पर जीवण प्राण उवारां,
ईं री धजा उडै गिगनारां,
धरती धोरां री !
ईं नै मोत्यां थाल बधावां,
ईं री धूल लिलाड़ लगावां,
ईं रो मोटो भाग सरावां,
धरती धोरां री !
ईं रै सत री आण निभावां,
ईं रै पत नै नही लजावां,
ईं नै माथो भेंट चढ़ावां,
भायड़ कोड़ां री,
धरती धोरां री !

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>होगी ?????

>दिन हुआ है तो रात भी होगी,
हो मत उदास कभी तो बात भी होगी,
इतने प्यार से दोस्ती की है खुदा की
कसमजिंदगी रही तो मुलाकात भी होगी.

कोशिश कीजिए हमें याद करने की
लम्हे तो अपने आप ही मिल जायेंगे
तमन्ना कीजिए हमें मिलने की बहाने
तो अपने आप ही मिल जायेंगे .

महक दोस्ती की इश्क से कम नहीं होती
इश्क से ज़िन्दगी ख़तम नहीं होती
अगर साथ हो ज़िन्दगी में अच्छे दोस्त का तो
ज़िन्दगी जन्नत से कम नहीं होती

सितारों के बीच से चुराया है आपको
दिल से अपना दोस्त बनाया है आपको
इस दिल का ख्याल रखना क्योंकि
इस दिल के कोने में बसाया है आपको .

अपनी ज़िन्दगी में मुझे शरिख समझना
कोई गम आये तो करीब समझनादे देंगे
मुस्कराहट आंसुओं के बदलेमगर
हजारों दोस्तो में अज़ीज़ समझना ..

हर दुआ काबुल नहीं होती
,हर आरजू पूरी नहीं होती ,
जिन्हें आप जैसे दोस्त का साथ मिले ,
उनके लिए धड़कने भी जरुरी नहीं होती

>कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस का पर्व मनाया जाता है। इस दिन मृत्यु के देवता यमराज व भगवान विष्णु के अंशावतार धन्वन्तरि का पूजन किए जाने का विधान है। धनतेरस पर भगवान यमराज के निमित्त व्रत भी रखा जाता है।
पूजन विधि- इस दिन सायंकाल घर के बाहर मुख्य दरवाजे पर एक पात्र में अन्न रखकर उसके ऊपर यमराज के निर्मित्त दक्षिण की ओर मुंह करके दीपदान करना चाहिए। दीपदान करते समय यह मंत्र बोलना चाहिए-
“मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सह।त्रयोदश्यां दीपदानात्सूर्यज: प्रीतयामिति।।”

रात्रि को घर की स्त्रियां इस दीपक में तेल डालकर चार बत्तियां जलाती हैं और जल, रोली, चावल, फूल, गुड़, नैवेद्य आदि सहित दीपक जलाकर यमराज का पूजन करती हैं। हल जूती मिट्टी को दूध में भिगोकर सेमर वृक्ष की डाली में लगाएं और उसको तीन बार अपने शरीर पर फेर कर कुंकुम का टीका लगाएं और दीप प्रज्जवलित करें।
इस प्रकार यमराज की विधि-विधान पूर्वक पूजा करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है तथा परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।
दीपदान का महत्व :-
धर्मशास्त्रों में भी उल्लेखित है-कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे।यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनश्यति।।
अर्थात- कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को यमराज के निमित्त दीपदान करने से मृत्यु का भय समाप्त होता है।
इस दिन भगवान धन्वंतरि का षोडशउपचार पूजा विधिवत करने का भी विशेष महत्व है जिससे परिवार में सभी स्वस्थ रहते हैं तथा किसी प्रकार की बीमारी नहीं होती।

>धनतेरस के शुभ मुर्हूत में ऐसे होंगी लक्ष्मी प्रसन्न:-
भारतीय संस्कृति और धर्म में शंख का बड़ा महत्व है। विष्णु के चार आयुधो में शंख को भी एक स्थान मिला है। मन्दिरों में आरती के समय शंखध्वनि का विधान है। हर पुजा में शंख का महत्व है। यूं तो शंख की किसी भी शुभ मूहूर्त में पूजा की जा सकती है, लेकिन यदि धनत्रयोदशी के दिन इसकी पूजा की जाए तो दरिद्रता निवारण, आर्थिक उन्नति, व्यापारिक वृद्धि और भौतिक सुख की प्राप्ति के लिए तंत्र के अनुसार यह सबसे सरल प्रयोग है।यह दक्षिणावर्ती शंख जिसके घर में रहता है, वहां लक्ष्मी का स्थाई निवास होता है। यदि आप भी चाहते हैं कि आपके घर में स्थिर लक्ष्मी का निवास हो तो ये प्रयोग जरुर करें
*****
ऊं श्रीं क्लीं ब्लूं सुदक्षिणावर्त शंखाय नम:………..उपरोक्त मंत्र का पाठ कर लाल कपड़े पर चांदी या सोने के आधार पर शंख को रख दें। आधार रखने के पूर्व चावल और गुलाब के फूल रखे। यदि आधार न हो तो चावल और गुलाब पुष्पों (लाल रंग) के ऊपर ही शंख स्थापित कर दें। तत्पश्चात निम्न मंत्र का 108 बार जप करें- “मंत्र – ऊं श्रीं”.

अ- 10 से 12 बजे के बीच उपरोक्त प्रकार से सवा माह पूजन करने से-लक्ष्मी प्राप्ति।ब- 12 बजे से 3 बजे के बीच सवा माह पूजन करने से यश कीर्ति प्राप्ति, वृद्धि।स- 3 से 6 बजे के बीच सवा माह पूजन करने से-संतान प्राप्तिइसके अन्य प्रयोग निम्न हैक. सवा महा पूजन के बाद इसी रंग की गाय के दूध से स्नान कराओ तो बन्ध्या स्त्री भी पुत्रवती हो जाती है।ख. पूजा के पश्चात शंख को लाल रंग के वस्त्र मं लपेटकर तिजोरी में रख दो तो खुशहाली आती है।ग. शंख को लाल वस्त्र से ढककर व्यापारिक संस्थान में रख दो तो दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि और लाभ होता है।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>लिंगाष्टकम (Lingastakam )—–

>Brahma Muraari Suraarchita Lingam
Nirmala Bhashita Shobhita Lingam
Janmaja Dukha Vinaashaka Lingam
Tat Pranamaami Sadaa Shiva Lingam

Devamuni Pravaraarchita Lingam
Kaamadaham Karunaakara Lingam
Raavana Darpa Vinaashaka Lingam
Tat Pranamaami Sada Shiva Lingam

Sarva Sugandha Sulepitha Lingam
Buddhi Vivardhana Kaarana Lingam
Siddha Suraasura Vanditha Lingam
Tat Pranamaami Sadaa Shiva Lingam

Kanaka Mahaamani Bhushitha Lingam
Phanipathi Veshtitha Shobhitha Lingam
Daksha Suyajna Vinaashaka Lingam
Tat Pranamaami Sadaa Shiva Lingam

Kumkuma Chandana Lepitha Lingam
Pankaja Haara Sushobhitha Lingam
Sanchitha Paapa Vinaashaka Lingam
Tat Pranamaami Sadaa Shiva Lingam

Devaganaarchitha Sevitha Lingam
Bhaavair Bhakti Bhirevacha Lingam
Dinakara Koti Prabhakara Lingam
Tat Pranamaami Sadaa Shiva Lingam

Ashta Dalopari Veshtitha Lingam
Sarva Samudbhava Kaarana Lingam
Ashta Daridra Vinaashaka Lingam
Tat Pranamaami Sadaa Shiva Lingam:”

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>तुमको ही चाहेंगे—-

>इस पल से उस पल तक तुमको ही चाहेंगे
कहता है जो कुछ दिल उसको ही मानेंगे
इस
पल से उस पल तक तुमको ही चाहेंगे

चाहे दो कोई भी सज़ा हम तुम्हारेही रहेंगे
चाहे हो कोई ख़फ़ा हम तुम्हें अपना मानेंगे
यह दूरियाँ
अपनेदिलों के दरम्याँ न रखेंगे

सच कहती हैं आँखें जब तुमको देखती हैं
राज़दिल के खोलती हैं, इशारों में बोलती हैं

इस पल से उस पल तक तुमकोही चाहेंगे
कहता है जो कुछ दिल उसको ही मानेंगे
इस पल से
उस पल तकतुमको ही चाहेंगे

थोड़ा क़रीब और मुझे तेरे दिल के आना है
इन दोआँखों में तेरा हर ख़ाब सजाना है
सब कुछ
भूल गया याद कुछ नहीं तेरे सिवा

गुस्ताख़ियाँनादानियाँ
जाने अनजाने होती हैं
जब-जब देखूँ तुम्हें पता नहीं
क्यूँहोती हैं

चाँद-सा चेहरा जब है तेरा
कैसे न हम देखेंगेएक दिन
भीजाने कैसे
बिन तेरे हम काटेंगे

इस पल से उस पल तक
तुमको ही चाहेंगे
कहताहै जो कुछ दिल उसको ही मानेंगे
इस पल से उस पल तक
तुमको ही चाहेंगे

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>"ख्वाब"——–

>”ख्वाब”

ख्वाब ही हैं जो जिंदगी को जीना सिखा देते हैं,
ख्वाब ही हैं जो मौत से भी लड़ना सिखा देते हैं,
आप तो बस टूटे हुए ख्वाबों की बात करते हो
हम टूटे ख्वाब को भी,ख्वाब मे मुकम्मल बना देते हैं.
हम ख्वाब देखते हैं,मगर हकीकत मे जिया करते हैं
. ख्वाब को मंजिल नहीं रास्ता कहा करते हैं
आप तो ख्वाब देखकर ही ख्यालों मे खो जाते हो,
हम ख्यालों को भी ख्वाब मे हकीकत बनाया करते हैं.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>ग़ज़ल संग्रह —–

>हर एक पल बेखबर है इश्क की परछाइयों से,
गैर की गलियां झूम रही मेरे हीं शहनाईयों से,
अब मुड़ कर कभी ना देखना,
कि दामन मेरा कैसे भींज रहा आँसुओ की विदाईयों से,

ना कभी मिलने की एक और कसम खा लें हम,
ये हम नहीं हमारे दिल कह रहे हैं,
देखो तो कितने खुश है सभी,
जहाँ फूटती थी चिंगारियाँ वहाँ फूल खिल रहे है,

रहने भी दो वो प्यार, वो सुहाना सफर,
वो अनछुई मंजिले, तेरे वादे और ईरादे सब बेमाने लग रहे है,
रास्ते बंद ना हुवे हो बेशक मगर,
मेरी तम्नाओं के पग थक गये हें।
==========================================================

आओ इस गुमसुम सफ़र में हँसी का कोई पल ढूंढ लें
इस अंधेरे आज में सुनहरा कल ढूंढ लें,
दो आँसु भी टपके तो मोती बन के,
कोई तो ऐसी जगह ढूंढ लें,
माना कि भरोसा नहीं आपको मेरी वफ़ाओं पर,
पर पास आने की कोई तो वजह ढूंढ लें,
इस गुमसुम सफ़र में हँसी का कोई पल ढूंढ लें
इस अंधेरे आज में सुनहरा कल ढूंढ लें ।
==============================================================

है अगर ईश्क तो आँखो में उतर आने दे ।
चाहे मेरी चाहत को मोहब्बत का नाम ना दे,
पर अपने रुप तूफ़ान में बिखर जाने से ना रोक मुझे,
हर शाम भींगी रहे तेरे शबनम से कसम,
एक बार सही प्यार से देख मुझे ।

थम के रह गई है जो एक झनक तनहा,
अपने चाल की ताल पे फ़िर से थिरक जाने दे,
शर्म की पनाह से निकल कर ईश्क को लेने दो अँगड़ाईयाँ,
अपने जजबात को हालात से टकरा जाने दे ।

रहतीं हैं सलामत जहाँ प्यार की निशानियाँ सभी,
मेरी बेकरारियों को अपने दिल में ठहर जाने दे,
खुद को यूँ ना दो तुम सजा मुझसे नफ़रत करके’ है
अगर ईश्क तो आँखो में उतर आने दे ।
=============================================================

1. गुजारिशें जानीं कितनी की थी,
पर ना हटाती थी झुल्फ़ें ना दिखाती थी चेहरा,
आज जो दिखाई है चेहरा तो कोई और बाँधे बैठा है शेहरा,
है उसके शादी की रात और घना कोहरा ।

2. वह हमेशा कहती थी कि
मैं उसके दिल के पास हूँ,
मैं हमेशा सोंचता था कि दिल के पास क्यों दिल में क्यों नहीं,
जरुर इसमें कुछ ऐब है,
जब सर झुका कर देखा जो दिल को ,
अरे दिल के पास तो जेब है ।

3. दिल नहीं सराय कि आज ठहरे कल चल दिए,
प्यार नहीं फ़ूल कि कभी बालों में लगाया कभी कुचल दिए,
जा बेवफ़ा नहीं करना कोई शिकवा गिले,
पर तू जहाँ भी जाए तुझको तेरा उस्ताद मेले ।
================================================================

हम वो गुलाब है जो टूट कर भी मुस्कान छोड़ जाते हैं,
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं ।

दुनिया के प्रेम प्रसंगो में हम गुलाबों को टूटना हीं पड़ता है,
और हमे देने वाले हर प्रेमी को झुकना हीं पड़ता है,
कभी हमे फरमाइश कभी नुमाइश बना दिया,
जी चाहा ज़ुल्फों में लगाया,जी चाहा सेज़ पे सज़ा दिया,
मेरे तन को छेड़ कर , दीवाने कैसे मचल जाते हैं,
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं ।

बात अभी इतनी होती तो क्या बात थी,
पर अभी और भी काली होने वाली रात थी,
मेरे अरमानों को कुचल कर इत्र बना दिया,
और दिखावटी शिशियों में भर कर सजा दिया,
हम मर कर भी साँसों में महक छोड़ जाते है,
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं ।
======================================================================
एक इशारा तो किया होता ,
कब मैं तुमसे दूर थी
तुमने हाथ तभी माँगा जब हो चुकी मजबूर थी
वर्षों किया इंतजार मैंने पर तू पल भर भी न ठहर सका
पूरा किया वो काम जो न कर कभी जहर सका
सब कुछ भुला दिया इस कदर की ना मेरा नाम याद रखा
मैं बेवफा हूँ ये इल्जाम याद रखा
कभी तो लौट के आओगे जाने क्यों ये भरोसा था
प्यार का तूफ़ान समझा जिसे वो तो बस एक चाहत का झोकां था
प्यार नहीं एहसान सही ,थोड़ी दया दिखाने आ जाते
अभी भी छुपे हैं दिल में अरमान कई ,
एक ठोकर लगाने आ जाते

>जुरि चली हें बधावन नंद महर घर सुंदर ब्रज की बाला।

कंचन थार हार चंचल छबि कही न परत तिहिं काला॥ डरडहे मुख कुमकुम रंग रंजित , राजत रस के एना।

कंचन पर खेलत मानो खंजन अंजन युत बन नैना॥ दमकत कंठ पदक मणि कुंडल, नवल प्रेम रंग बोरी।

आतुर गति मानो चंद उदय भयो, धावत तृषित चकोरी॥ खसि खसि परत सुमन सीसन ते, उपमा कहां बखानो।

चरन चलन पर रिझि चिकुर वर बरखत फूलन मानो॥ गावत गीत पुनीत करत जग, जसुमति मंदिर आई।

बदन विलोकि बलैया ले लें, देत असीस सुहाई॥ मंगल कलश निकट दीपावली, ठांय ठांय देखि मन भूल्यो।

मानो आगम नंद सुवन को, सुवन फूल ब्रज फूल्यो॥ ता पाछे गन गोप ओप सों, आये अतिसे सोहें।

परमानंद कंद रस भीने, निकर पुरंदर कोहे॥
आनंद घर ज्यों गाजत राजत, बाजत दुंदुभी भेरी।
राग रागिनी गावत हरखत, वरखत सुख की ढेरी॥
परमधाम जग धाम श्याम अभिराम श्री गोकुल आये।
मिटि गये द्वंद नंददास के भये मनोरथ भाये॥
====================================================================

” यदा यदा ही धर्मस्य,ग्लानिर्भवति भारत..
अभ्युत्थानम अधर्मस्यतदात्मानम
सृजाम्यहमपरित्राणायाय साधुनाम,
विनाशायच दुष्कृतामधर्म सँस्थापनार्थाय,
सँभावामि, युगे, युगे ! “
====================================================================
कन्हैया तेरी झांकी जो देखि भली |
मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल, अलकें अतर पली ||
वैजन्ती माला उर साजे, हार गुलाब कली |
कटि किन्कनी पग नूपुर बाजे, मोहत बृज सकली ||
नखशिख लूँ श्रृंगार मनोहर, संग ब्रशभानु लली |
=====================================================================

“”श्री क़ृष्ण ,गोविंद हरे मुरारे ,हे नाथ नारायण वासुदेवा ”…….!‎
=====================================================================
गोकुल में जो करे निवास
गोपियों संग जो रचाए रास,
देवकी, यशोदा जिनकी मैया,
ऐसे हमारे कृष्ण कन्हैया!
राधा की भक्ति, मुरली की मिठास
माखन का स्वाद और गोपियों का रास
इन्ही सब से बनता है कृष्ण खास
========================================================================
हरे कृष्ण ! हरे कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हरे हरे ! हरे राम ! हरे राम ! राम ! राम ! हरे हरे !
==========================================================
“ॐ नमो नारायनाय ”

” सिद्धार्थ: सिद्ध संकल्प: सिद्धिद सिद्धि: साधन:”

“ॐ नमों भगवते वासुदेवाय”

“श्री कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।प्रणत: क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नम:”

“श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवाय” ||

|| श्री कृष्ण शरणं मम ||
|| श्री कृष्ण शरणं मम ||
|| श्री कृष्ण शरणं मम ||
|| श्री कृष्ण शरणं मम ||

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>श्री गणेश मन्त्र एवं आराधना ::—-

>श्री गणेश मन्त्र एवं आराधना—–

सुखकर्ता दुखकर्ता वार्ता विघ्नाची ।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची ।
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची ।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळाची ।।1।।
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ।।धृ0।
रत्नखचित फरा तूज गौरीकुमरा ।
चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा ।
हिरे जडित मुकुट शोभतो बरा ।
रुणझुणती नुपुरे चरणी घागरिया ।
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ।।धृ0।।2।।
लंबोदर पीतांबर फणी वरवंदना ।
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना ।
दार रामाचा वाट पाहे सदना ।
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवंदना ।
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ।।धृ0।।
===============================
गजाननं भूतगणधिसेवितं,
कपित्‍थ-जम्‍बूफल-चारूभक्षणम्।
उमासुतं, शोकविनाश-कारकं,
नमामि विघ्‍नेयवर-पाद-पंकजम् ।।
===============================
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभा । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ||
==========================================
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभा ।निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ||
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजंबूफलचारुभक्षणम्‌।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्‌॥ “‘
===========================================
सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णकः। लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः।

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः। द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि।

विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा। संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

मूषिकवाहन् मोदकहस्त चामरकर्ण विलम्बित सूत्र। वामनरूप महेश्वरपुत्र विघ्नविनायक पाद नमस्ते॥
=========================================================

“एक दंतम महाकायं लम्बोदर गजाननं,
विघ्नविनाशकुरम देवं,हे रम्ब्हम प्रनाह्म्यम….
गजाननं भूतगणधिसेवितं,
कपित्‍थ-जम्‍बूफल-चारूभक्षणम्।
उमासुतं, शोकविनाश-कारकं,
नमामि विघ्‍नेयवर-पाद-पंकजम् ।।”
=======================================
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् !
=============================================
‎”ईश्वर-अल्लाह तेरे नाम ,सबको सन्मति दे भगवान “…..

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>ना तुम जानो ना हम !!

>क्यों चलती है पवन
Because of evaporation
क्यों झूमे है गगन
Because of earth’s rotation.
क्यों मचलता है मन
Because of disorder in digestion.
ना तुम जानो ना हम !!!

क्यों गुम है हर दिशा
Because u have poor sense of direction.
क्यों होता है नशा
Because of drug addiction.
क्यों आता है मजा
Because u enjoy the situation.
ना तुम जानो ना हम !!!

क्यों आती है बहार
Because of change in season.
क्यों होता है करार
Because of taking tension.
क्यों होता है प्यार
Because of opposite attraction.
ना तुम जानो ना हम !!!

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>MY FRIEND………

>My Friend when I think of you.
I think of all that we’ve been through.
All the times we argue and fight,
I know deep inside that it isn’t right.
I, then feel bad and alot of pain.
It feels like I’ve fallen from the sky like the rain.
I love you dear friend with all of my heart.
But now that you’re gone I’ve fallen apart.
I’m getting better as the days go by.
wish sometimes this was all a big lie.
I pray to you every night.
It’s like you’re my fire, a burning light.
My dear friend, I miss you alot.
I still wonder why you were put in that spot.
I know you’re in a place much better than here.
Watching and helping me with all of my fear.
Our friendship my dear friend,
we will have to the end.
Friends til the end is what we will be
.Someday we’ll be together,
together you and me.

take care……..

>*****
(A)लक्ष्मी कमल के फूल पर क्यों विराजित हैं?महालक्ष्मी के चित्रों और प्रतिमाओं में उन्हें कमल के पुष्प पर विराजित दर्शाया गया है। इसके पीछे धार्मिक कारण तो है साथ ही कमल के पुष्प पर विराजित लक्ष्मी जीवन प्रबंधन का महत्वपूर्ण संदेश भी देती हैं।महालक्ष्मी धन की देवी हैं। धन के संबंध में कहा जाता है कि इसका नशा सबसे अधिक दुष्प्रभाव देने वाला होता है। धन मोह-माया में डालने वाला है और जब धन किसी व्यक्ति पर हावी हो जाता है तो अधिकांश परिस्थितियों में वह व्यक्ति बुराई के रास्ते पर चल देता है। इसके जाल में फंसने वाले व्यक्ति का पतन होना निश्चित है।वहीं कमल का फूल अपनी सुंदरता, निर्मलता और गुणों के लिए जाना जाता है। कमल कीचड़ में ही खिलता है परंतु वह उस की गंदगी से परे है, उस पर गंदगी हावी नहीं हो पाती।कमल पर विराजित लक्ष्मी यही संदेश देती हैं कि वे उसी व्यक्ति पर कृपा बरसाती हैं जो कीचड़ जैसे बुरे समाज में भी कमल की तरह निष्पाप रहे और खुद पर बुराइयों को हावी ना होने दें। जिस व्यक्ति के पास अधिक धन है उसे कमल के फूल की तरह अधार्मिक कृत्यों से दूरी बनाए रखना चाहिए। साथ ही कमल पर स्वयं लक्ष्मी के विराजित होने के बाद भी उसे घमंड नहीं होता, वह सहज ही रहता है। इसी तरह धनवान व्यक्ति को भी सहज रखना चाहिए। जिससे उस पर लक्ष्मी सदैव प्रसन्न रहे.
******
(B) उल्लू ही क्यों है महालक्ष्मी का वाहन?वैसे तो आज ऐसा कोई नहीं है जिसे लक्ष्मी यानि धन की आवश्यकता ना हो। अधिकांश लोग धन यानि लक्ष्मी के पीछे ही भाग रहे हैं। भगवान विष्णु की अद्र्धांगिनी महालक्ष्मी का वाहन उल्लू है। उल्लू मूर्खता का प्रतिक है। मूर्ख उल्लू ही क्यों है महालक्ष्मी का वाहन?
महालक्ष्मी के वाहन उल्लू से यही स्पष्ट होता है कि बिना सोचे-समझे, अधर्म के कुमार्ग पर चलते हुए जब कोई अनावश्यक धन एकत्र करता है, सबकुछ भुलाकर धन के पीछे भागता है तो उसकी हालत उल्लू के जैसी हो जाती है। अत: धन सदैव धर्म के मार्ग पर चलते हुए ही अर्जित करना चाहिए। जब कोई अधर्म के मार्ग पर चलते हुए धन अर्जित करता है तो उसके पास लक्ष्मी उल्लू पर बैठकर अस्थाई रूप से ही आती है और वैसा धन अनावश्यक कार्यों में खर्च हो जाता है। परंतु सद्ज्ञान और धर्म के मार्ग पर कार्य करते हुए जो धन अर्जन किया जाता है वह धन स्थाई, उन्नति और समृद्धि लेकर आता है। क्योंकि सद्ज्ञान से धार्मिक कार्य करने पर महालक्ष्मी धर्म प्रतिक और अधर्म के शत्रु भगवान विष्णु के साथ गरुड़ पर बैठकर आती है। इस वजह से ऐसा धन सदैव सुख और समृद्धि देने वाला होता है।

पंडित दयानंद शास्त्री ;
M- 07838730179;09024390067
- vastushastri08@gmail.com

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>क्या पता कल हो ना हो- KAVITA====

>क्या पता कल हो ना हो- KAVITA===

आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो

आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बातेऔर ये यादें हो ना हो

आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो

बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो

आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरहकल
बाजुओं मे ताकत हो ना हो

आज एक बार चैन की नीन्द सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैनऔर
आखों मे कोई सपना हो ना हो
क्या पताकल हो ना हो

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>आधुनिक बेटियां – kaviita=====

>आधुनिक बेटियां—-

आज बेटी हुनर मंद हो गयी है

पढ़ लिख कर पैरों पर खड़ी हो गयी है

जो होती थी निर्भर सदा दूसरों प

रआज माँ बाप का सहारा हो गयी है.

साहस से अपने दुनिया बदलकर

हर कदम पर बेटी विजयी हो गयी है.

क्या खोया क्या पाया,

जरा यह विचारेंआज बेटी जहाँ मे बेटा हो गयी है.

वात्सल्य और मातृत्व सुख को भुलाकर

पैसों की दौड़ मे बेटी खो गयी है

.चाहती नहीं वह माँ बनना देखो

आज बेटी बंज़र धरती हो गयी है.

बनाये रखने को अपना शारीरिक सौंदर्य

बेटी ही भ्रूण की हत्यारिन हो गयी है.

चाहती आज़ादी सामाजिक मूल्यों से

आज बेटी खुला बाज़ार हो गयी है.

बिन ब्याह संग रहना और नशा करना

आधुनिक बेटी की शान हो गयी है.

जिस घर मे बेटी ब्याह कर गयी है

उस घर मे खड़ी दीवार हो गयी है.थे

प्यारे जो माँ बाप भाई बहन अब

तकआज निगाहें मिलाना दुशवार हो गयी है

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>LAXMI ( DEEPAWALI ) POOJAN VIDHI===

>Step By Step Diwali Pujan:-
First clean the Puja room and then Bathe each Deity (Lakshmi &Ganesh) first with water, then with panchamitra/or rose water,followed by water once more.
Now put Deepak (Lamp) in front of the Deities – As the tiny diyas ofclay are lighted to drive away the shadows of evil spirits.
Make a Panchamitra with 5 ingredients of milk, curd, ghee (clarifiedbutter), sugar & Honey.
Place Few mithais, snacks & fruits as a prashad.
Make offerings of flowers, Abir (red colour), Sindoor (vermillion)and Haldi (turmeric). Light the Agarbatti (incense sticks) and lampsfilled with Ghee.
Now make offerings of Fruit, Sweet dishes (mithai), Salty snacks(Mathis, Ghathia, Namakpare) and offer Dakshina (token money), whichcould be given to the poor. In the end offer paan (betel leaves),cloves. Now pray to the deities to seek their blessings.
Ganesh Pooja : Ganesh Puja is a must for deepavali Puja. (LordGanesha is to be worshipped in all pujas before any other God orGoddess.) (Ganesh Aarti is sung)
Laxmi Pooja : Place Lotus and other flowers at her feet as anoffering.
A silver coin is placed in front of the Goddess during thepuja. Now perform Aarti with flowers in hand (Lakshmi Aarti is sung).
After Deepawali Pujan have take Prasad and go for wish others.
प. दयानंद शास्त्री
-09024390067(RAJ.),-09413103883(RAJ.),
ईमेल :- vastushastri08@gmail.com; vastushatri08@rediffmail.com;

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>कविता :- कोई खास नहीं===

>कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झूठ है आधा सच्चा सा .
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा .
जीवन का एक ऐसा साथी है ,
जो दूर हो के पास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
हवा का एक सुहाना झोंका है ,
कभी नाज़ुक तो कभी तुफानो सा
.शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले ,
कभी अपना तो कभी बेगानों सा .
जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र ,
जो समंदर है , पर दिल को प्यास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक साथी जो अनकही कुछ बातें कह जाता है ,
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है .
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं ,
पर कभी – कभी आँखों से आंसू बन के बह जाता है .
यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है ,
पर इन आँखों को उसकी तलाश नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
** प. दयानंद शास्त्री,
1/6226, गली न. 4, रोहतास नगर ( पूर्व ),
शाहदरा, दिल्ली -110032 (INDIA)

>आइए इस बार इको फ्रैंडली दीवाली मनाएं :-

दीपावली भारत का एक ऐसा त्योहार है जिसे सभी जातियों, धर्मों और सम्प्रदाय के लोग उल्लास पूर्वक मनाते हैं। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय की विजय के प्रतीक स्वरूप मनाया जाता है। कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाने वाले इस त्योहार के दिन जलाए जाने वाले मिट्टी के छोटे-छोटे दिये इस बात का प्रतीक हैं की इंसान को कभी जीवन में आने वाली परेशानियों से घबड़ाना नहीं चाहिए क्योंकि हर काली रात के पीछे प्रकाश की सुनहरी किरणें छिपी होती हैं।

पहले दीवाली का अर्थ था घर की सफाई-सजावट, पारम्परिक लक्ष्मी पूजन और तत्पश्चात परिवार-जनों और मित्रों को पर्व की बधाई देना। तब मिट्टी के दियों से पूरे घर को सजाया जाता था। हजारों की संख्या में जलने वाले इन दियों को देखकर ऐसा लगता था मानों सम्पूर्ण तारा-मंडल हमारी खुशियों में शामिल होने के लिए धरा पर उतर आया हो। परंतु समय के साथ दीवाली मनाने के तरीकों में भी बदलाव आया है। अब दीपावली का अर्थ है बिजली की रोशनी से जगमगाते घर और शोर और बारूद के धुएं से उत्पन्न दम-घोटू वातावरण। रोशनी और शोर के इस खेल में लोग इतने मस्त हो जाते हैं कि भूल जाते है उनका यह क्षणिक आनंद पर्यावरण को कितना नुकसान पहँचा रहा है।
दीवाली मनाने की हमारी इस आधुनिक शैली में वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण तो होता ही है साथ ही जिस जगह पर पटाखे फोड़े जाते हैं उस जगह की जगह की मिट्टी अपने प्रकृतिक गुण खो बैठती है। साथ ही आज जब हमारा देश देश बिजली के गहरे संकट से गुजर रहा है उस समय बिजली का इतना दुरुपयोग न जाने कितने घरों को दीपावली के दिन भी रोशनी की एक किरण के लिए तरसा देता है…ये भला कहां का न्याय है कि कुछ घर रोशनी से सराबोर हो और कुछ उसकी एक किरण के लिए भी तरस जाएं।
पटाखे जलाना दीपावली का मुख्य आकर्षण होता है। आकाश में छोड़े जाने वासे ये पटाखे अपनी जो सतरंगी छटा बिखेरते हैं, वह निःसंदेह सभी को आकर्षित करते है। पर रोशनी और आवाज पैदा करने वाले ये पटाखे कॉपर, पोटैशियम नाइट्रेट, कार्बन, शीशा, केडमिनम, जिंक और सल्फर जैसे जहरीले रसायनिक सम्मिश्रण से बनाए जाते हैं। जब इन्हें जलाया जाता है तो इनसे कार्बन डाइऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसी विषैली गैसें उत्पन्न होती है जिनसे वायु प्रदूषण तो होता ही है साथ ही सम्पर्क में आने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।
कॉपरः साँस की नली में जलन पैदा करता है जिसके कारण कई तरह के साँस संबंधी रोग हो सकते हैं।
कैडमिनमः इसके कारण रक्त में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। जो आपकी किडनी को नुकसान पहुँचा सकता है।
शीशाः इसका स्नायुतंत्र पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
मैग्नीशियमः मैग्नीशियम के प्रभाव से बुखार आ सकता है। इस बखार को मेटल फ्यूम फीवर कहा जाता है क्योंकि इस अवस्था रोगी के मुह में धातु (मेटालिक) का सा स्वाद रहता है।
जिंकः इसके कारण भी मेटल फ्यूम फीवर होता है, साथ ही रोगी को उल्टियां भी होती हैं।
सोडियमः वातावरण की नमी के सम्पर्क में आते ही यह ज्वलनशील हो जाता है, जिसके कारण जलने की संङावनाएं बढ़ जाती हैं।
ये जहरीले पदार्थ न केवल इंसानों पर प्रकृति में मौजूद प्रत्येक जीवन पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं। वातावरण में इनका प्रभाव काफी समय तक रहता हैं, इसलिए इसके प्रभाव दीपावली के काफी समय बाद तक महसूस किए जा सकते हैं।
पटाखे जलाने से काफी मात्रा में जहरीला धुँआ हवा में मिल जाता है। जिससे साँस संबंधी तकलीफे होना आम बात है। खासकर अस्थमा के रोगियों को तो तो यही सलाह दी जाती है कि दीवाली की रात वे घर से बाहर न निकले। सावधानी न बरतने पर उन्हें अस्थमा का दौरा पड़ सकता है।

पटाखे मतलब आवाज-जितनी तेज आवाज उतना ज्यादा रोमांच। इस रोमांच को पाने के लिए लोग बड़े-बड़े बम खरीदते है जिनकी आवाज से तेज शोर पैदा होता है। सामान्यतः पचास डेसीबेल्स से ज्यादा की ध्वनि शोर की श्रेणी में आती है और ये बम सौ डेसीबल्स या कभी-कभी उससे भी ज्यादा धवनि पैदा करते हैं। बम के फटने से अचानक उत्पन्न होने वाला शोर व्यक्ति को अस्थायी रूप से बहरा हो सकता है। लगातार छुड़ाएं जाने वाले पटाखों के कारण वृद्ध और बीमार छोटे बच्चों की नींद बाधित हो सकती है। इसके अलावा हमारे पालतू पशुओं की हालत उस दिन देखने लायक होती है। उन मूक और मासूमों को कहीं सर छुपाने की जगह नहीं मिलती। होने वाले हर धमाके के साथ वे बेचैनी से एक कमरे से दूसरे कमरे भागते हुए देखे जा सकते है।

पटाखे बनाने वाले ज्यादातर कारखाने अपने यहां मजदूर के रूप में बच्चो को ही काम पर रखते हैं। इन बच्चों के वो सुरक्षा इंतजाम उपलब्ध नहीं कराए जाते जो इस तरह जहरीले पदार्थों के साथ काम करते वक्त उन्हें उपलब्ध कराए जाने चाहिए। फलस्वरूप इन पदार्थों के दुष्प्रभावों के कारण होने वाली बीमारियों से ये बच्चे ग्रसित हो जाते हैं और समुचित चिकित्या व्यवस्था के अभाव में इनमें से बहुत सारे बच्चे अपनी युवावस्था तक भी नहीं पहुँच पाते।

यह सब कहने के पीछे हमारा उद्देश्य यह बिलकुल नहीं है कि हम रोशनी के इस पावन पर्व को ही न मनाएं, पर इस तरह मनाए कि इससे हमारे पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे। अपनी इस दीवाली को सुखद और यादगार बनाने के लिए हम कई चाजें कर सकते है जैसे-
एक साथ कई परिवार मिल कर इस पर्व का आनंद उठाएं, इस तरह पटाखों की संख्या में कमी लाई जा सकती है और प्रदूषण का दायरा भी सीमित हो जाएगा।
त्योहार मनाने से पहले ही यह बात को निश्चित कर लें की पटाखे सीमित मात्रा में पूर्व निश्चित समय पर ही फोड़े जाए।
इस बात का भी ध्यान रखना जरूरी है की जिस जगह पटाखे फोड़े जा रहे हैं वह किसी अस्पताल के नजदीक न हो। पटाखे भीड़-भाड़ स्थानों में भी न चलाए, इससे दुर्घटना हो सकती है।
पारम्परिक रूप से जलाए जाने वाले रसायनिक पटाखों की जगह इको फ्रैंडली पटाखों का प्रयोग करें। ये पटाखे पुर्नचक्रित कागज से बनाएं जाते है तथा इससे उत्पन्न होने वाली ध्वनि प्रदूषण बोर्ड द्वारा पूर्व निर्धारित होती है। इन पटाखों की एक और खासियत होती है कि ये ध्वनि कम पैदा करते है रंग और रोशनी ज्यादा।
इस दीवाली पर बिजली अधाधुंध प्रयोग से बचने के लिए बिजली से जलने वाली लड़ियों के स्थान पारम्परिक रूप से बनने वाले मिट्टी के दियों का प्रयोग करे। इन नन्हें दीपको का प्रयोग कर आप उन कई घरों को भी रोशन कर सकते है जो इन दियों के घटते प्रयोग के कारण अपना व्यवसाय दिन-पर-दिन खोते जा रहे हैं।
इस दीवाली पर जब आप अपने घर की सफाई के दौरान प्रयोग में न आने वाली चीजों को निकाले तो फेंकने से पहले एक बार सोचें की क्या ये अभी किसी के और के द्वारा प्रयोग में लाई जा सकती हैं, यदि हां, तो फेंकने से बेहतर है कि उन वस्तुओं को गरीब और जरूरतमंद लोगों को दे दें।

इको फ्रैंडली दीवाली का यह अर्थ बिलकुल नहीं है की आप वह सब कुछ त्याग जो आपको बहुत पसंद है, जिन्हें करने का आप साल भर इंतजार करते हैं। बस वक्त का तकाज़ा है कि एक बार पीछे मुड़ कर देखिए। देखिए दीवाली बनाने की वह परम्परागत शैली। जिसके अनुशरण से समाज का प्रत्येक व्यक्ति किसी न रूप में लाभान्वित होता है। दीवाली के उस मर्म को समझिए। दीवाली का अर्थ दिखावा नहीं है। दीवाली का अर्थ है प्यार, एकता, सौहार्द और खुशियां, जो इस दीवाली आप पूरी दुनिया को बाँट सकते हैं।
आप सभी को दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएं।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>हिंदी होली sms —-

>प्रिय मित्रो , यदि आप किसी अच्छी पुस्तक को ढूंड रहे हे जो आपकी जिज्ञासा / ज्ञान दोनों बढ़ाये ….साथ ही निशुल्क भी मिले/ प्राप्त हो जाये तो कृपया निम्न पते/ नम्बर पर संपर्क कीजिये…शिग्र…. अपना पता लिखकर भेजे ..पत्रद्वारा / या sms करें—
नाम पुस्तक- विवेकपूर्ण आचरण ;;;
लेखक/ संकलन/ संपादन/–श्री जे.के. संघवी;;;
पता- कल्पतरु प्रकाशन, 305 ,स्टेशन रोड, संघवी भवन, शंकर मंदिर के सामने, ठाणे ( pashchim) =400601 ( maharashtra)
मोबाईल नंबर- 09892007268
————————————————————————————–
आप में से जो भी मित्रवर / बंधू …. ज्योतिष डायरेक्टरी के बारे में अधिक जानकारी चाहते हो वो कृपया शीघ्र संपर्क करें- श्री प्रकाश्चार्य जी- 09926062577 / 09425057277 / …. आप इसे दो सो रूपये का डिमांड ड्राफ्ट भेजकर भी मंगवा सकते हे जी…
—————————————————————————————
Holi Aayi
Satrangi Rango ki bauchar laayi
Dher Saari mithai Or mitha mitha
Pyar laayi
Aap ki zindagi ho mithe
PyarAur khusiyon Se bhari
Happy Holi २०११
—————————————————————————————-
Rangoan Ke Tyohar Main Sabhi Rangoan Ki Ho Bharmaar,
Dher Saari Khushiyoan Se Bhar jaye Aapka Sansaar,
Yahi Dua hai Bhagwan ji Se Hamari Har baar….
Holi Mubarak Ho!
`
Pichkari ki Dhar,
Gulal ki bauchar,
Apno ka pyar,
Yahi hai yaaron holi ka tyohar.
Happy Holi!!!!
`
Rango ke tyohar mein sabhi rango ki ho bharmar,
Dher saari khushiyon se bhara ho aapka sansar,
Yahi dua hai bhagwan se hamari har bar,
Holi Mubarak ho mere yaar!
`
Oh dear, Holi is Here,
Pinch of Red n a pinch of green,
Joyful colors all are seen,
With love n with happiness..
Wishs of Holi all I mean !!
Dear, wishing you a colourful, joyful and loaded with happiness.
Happy Holi..!
`
Rango mein ghuli ladki kya laal gulabi hai
Jo dekhta hai kehta hai kya maal gulabi hai
Pichle baras tune jo bhigoya tha holi mein
Ab tak nishani ka woh rumaal gulabi hai…
`
Holi ki aisi saam, liya prabhu ka naam,
Mhare piya ne pila dayi mohe bhaang
Mhare ko ab koun bachay haye…
Mhare piya holi khelan aye,holi khelan aye!!
==================================================
=
Socha ksi apny sy baat krain,
Apny ksi khaas ko yaad krain,
Kiya jo faisla holi mubarak khny ka,
Dil ny kha kyun na aap sy shruwat karain.
:: HOLI MUBARAK ::
`
Best wishes to you for a
Holi filled with sweet moments
and memories to cherish for long.
Happy Holi!
`
Bright colors, water balloons,
lavish gujiyas and melodious songs
are the ingredients of perfect Holi.
Wish you a very happy and wonderful Holi.
`
Celebrating the colors
of our beautiful relationship,
I wish you and your family
all the bright hues of life.
Have a colourful holi..
`
Just like a red rose that fills the world with beauty & fragrance… u hav made my life so beautiful by being in it. On Holi, the festival of colors & joy I wanna say thank u 4 all the love & smiles u hav brought 2 my life. Happy Holi
`
Some wordz can be left unsaid
Some feelings can b left unexpressed
Bt person like U can nvr b forgotton on this special day
Happy Holi
`
Suraj ki kirnian, taaron ki bahar.
Chand ki chandni, apnon ka pyar.
Hr ghari ho khushaal.
Issi tarha Mubarak ho ap ko yah HOLI ka thwaar!
———————————————————————————-
Rango tum, rangu mein,
Rangde sara ye jahaan,
Bass hassen aur gale lagen,
Aur bhulen dhusmani ka nishaan !
Holi Mubarak Ho !
`
Khuda kare Har Sal chand Ban k aye
Din ka ujala shan Ban k aye
Kabhi dur na ho apke chehre se hansi
Ye Holi Ka teohar aisa mehman ban k aye..
`
Rang Udaye Pichkari,
Rang Se Rang Jaye Duniya Sari,
Holi K Rang Aapke Jeevan Ko Rang De,
Ye Shubha Kamana Hai Hmari.
`
Tum bhi Jhoome masti main,
Hum bhi jhoome masti main,
Shor hua saari basti main..
Jhoome sab holi ki Masti main..
Mast Mast ye Masti rahe sada aapki Kashti main,
Beet Gayi HOLI fir bhi..
Mubarak ho HOLI bheegi masti Main !
`
Phool khilte rahein zindagi ki rah mei,
Hasi chamakti rahi aap ki nigaah mei,
Kadam kadam par mile khusi ki bhaar aapko,
Dil deta hai yehi dua baar baar aaapko….`
`
Pyar se pyari koi majboori nahi hoti,
kami apno ki kabhi puri nahi hoti,
dilon ka juda hona alag baat hai
nazron se door hona koi doori nahi hoti.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>holi ke prayog- —

>============
यदि पुत्री की इच्छा हो तो ॠतुकाल की 5, 7, 9 या 15वीं रात्रि में से किसी एक रात्रि का शुभ मुहूर्त पसंद करना चाहिए कृष्णपक्ष के दिनों में गर्भ रहे तो पुत्र व शुक्लपक्ष में गर्भ रहे तो पुत्री पैदा होती है
=============================================
मुकदमा जीतने के लिये – होली की आग लाकर उसके कोयले से स्याही बनाकर लोहे की सलाई से मुकदमा नम्बर और शत्रु पक्ष का नाम सात कागजों पर लिख कर पुन: होली की अग्नि के पास जायें और सात परिक्रमा करें, हर परिक्रमा पर एक कागज़ होली की आग में डाल दें
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होली दहन का मुहूर्त 19 मार्च 2011 को होलीका दहन का मुहूर्त शाम 6 बजकर 43 मिनट से 9 बजकर 30 मिनट तक है और 9 बजकर 44 मिनट से लेकर रात्री 12 बजकर 44 मिनट तक का श्रेष्ठ मुहूर्त है
=============================================
राहू शांति के लिए होली के दिन क्या करें===१.- एक नारियल का गोला लेकर उसमे अलसी का तेल भरकर..उसी में थोडा सा गुड डाले..फिर उस नारियल के गोले को राहू से ग्रस्त व्यक्ति अपने शारीर के अंगो से sparsh करवाकर जलती हुई होलिका में डाल देवे.aagami पुरे वर्ष भर राहू से परेशानी की संभावना नहीं अहेगी…२.–अलसी के तेल में सेबफल को भिगोकर …उसमे राहू ग्रस्त व्यक्ति ..अपनी उम्र/ आयु अनुसार उतने ही लॉन्ग लगायें..फिर उस सेबफल को हाथ में लेकर जलती हिई होली की चार परिक्रमा लगायें..और इष्ट देवता का नाम स्मरण करते हुए.राहू मुक्ति की प्रार्थना करते हरे उसी जलती हुई होली में डाल देवे…
=====================================================
यदि आप किसी से पैसा मांग rahe हे और वह देने में aana कानी करता हे तो होली के दिन निम्न उपाय करें—-
## आप ग्यारह गोमती चक्र हाथ में लेकर जलती हुई होलिका की ग्यारह बार परिक्रमा करते हुए धन प्राप्ति की प्रार्थना करे..फिर एक सफ़ेद कागज पर उस व्यक्ति का नाम लाल चन्दन से लिखें जिससे पैसा लेना हे ..लाल चन्दन से नाम लिखाकर उस सफ़ेद कागज को ग्यारह गोमती चक्र के साथ में कही गड्डा खोदकर सारी सामग्री सारी गड्डे me दबा देवे…इस प्रयोग से धन प्राप्ति की संभावना बढ़ जाएगी…
=====================================================
यदि आपको koyi अज्ञात / अंजान भय रहता हो..बिना किसी कारण के तो निम्न उपाय करें होली के दिन–
एक सुखा जटा वाला नारियल लेवें..दो लॉन्ग..और काले तिल एवं पिली सरसों ..उपरोक्त सारी सामग्री एक साथ लेकर..उसे सात बार/ दफा अपने सर के ऊपर उतार कर जलती होलिका में डाल देने से अज्ञात भय/ दर समाप्त हो जटा हे..
=====================================================
यदि आप का दाम्पत्य जीवन किसी कारणवश thik / अच्छा नहीं हे तो —–होली के दिन सात गोमती चक्र लेकर अपने दाम्पत्य सुख की कामना करते हुए एक -एक गोमती चक्र जलती हुई होलिका दे डालते जाये ….apne इष्ट देवता से प्रार्थना भी करते रहें ..मन ही मन में… आपकी समस्या दूर होने की संभावना बढ़ जाएगी …

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>MIRACLES OF YOGA BEHIND THE PEACE OF WORLD—-

>MIRACLES OF YOGA BEHIND THE PEACE OF WORLD—
There is one proverb that three W`s spoil a man. Similarly it is true that tree P`s spoil the nation, three P`s are (1) Pollution (2) Population (3) patients. now are the main problems of the world, not merelyto our country, since last two decades all the Governments of the world are planning and searching for its soulation ay their level best yet the soulation is beyound the vision.

Today man is more and more restless. A luxury of today becomes a want of tomorrow and due to that, corrupation and crimes and increasing day by day every whrere. sence greatification has becomes the goal of life. Honestely and candidness have taken to their heels] double dealing, crookendess, cheting and chicanery have taken possession on all goodness of nature, it has brought restlessness and laziness every where, Time is fleeting. you are growing at every second. space and time never intervened.

A contended mind is a continual feast. you are the maker of your own fortunes. you make youreselves suffer, good and evil. it is a you put your hands before your eyes and say it is a dark. take your hands before your eyes and see th light. so long as he the skin & sky surround a man, that as a long as he identifies him self with his body and senses connot sealize truth or God. lgonrance is is the darkest night in human life. As fire is enveloped by smoke, a mirro by dust and as an embryo by securdine so know I edge is covered by fog of ignorance.

Pollution – often we say and cry for pollution seeking its preventive methods at our level best, yet the solution is still lingering behind and behind. if we may seriously think our the matter, hen it will come to know that main problem of the pollution is our the inner matter rather than to be outside matter.our internal pollution is more perilous, posisnous, dangerous and destructive than outside pollution interlly, we we are more polluted rather than to outside. inside we have anger, greed, selfishness harted and ill will, which have badly polluted our mind and body and for that individual is solely responsible to avoid and control it, So, far as the question of outside pollution is concerned, it can be easily minimized and curbed by jel netee Kunjal, bhashrika Pranayam & Surya namaskar Ashans. What ever pollution may be desposited inside of the body, mouth, nose, ears, and eyes in day to day life can be to easily dispelled out by doing jal netee and Pranayam. In our lungs thereare six thousand holes more subtle than pores. And due to bad habits, addicitons, untimely and unnatural way of living like eating, drinking sleeping and worng way of enjoyment, these holes get covered by cough and mucus, so purification of blood system becomes disturbed. Consequently body becomes an abode of unwanted uncounted diseases but by practice of Ujayee Pranayam, kunjal, bharika & jal neti holls get reopened and blood purification re start naturally and one leads a joyful, healtheir and harmonious life.

Population and the patients:-

Increasing of population means increasing of sex enjoyment. Control of excess indulgence in sex mean automatic of population and diseases. Control over excessive sex is the control of population, health, peace and prosperity. Today whole world is under the grip, of passion and fashion. Today utmost and serial number one necessity of the world is women (sex). Today sex is exceeding world wide speedily & tremendously. When women decorate her self with other artificial, attractive fashions then situation becomes horrible and harmful to society and country. More and more people become puppet of her hands. Now governments are also issuing more and more licenses for the alcohol and harlots. Thus situation becomes more critical and perilous. There is no sin in eating meat, in drinking spirituous liquor and in carnal intercourse for this is natural way of created beings. But abstention brings great reward. Passion fashion & modernity must flourish in its own arena, but it must seldom overtake to nobility, austerity, spirituality and morality. He, who does not endeavor to tread the path of righteousness’ in this birth, repents at the last. People who carelessly wastes human life and are in search of material gain an unworthy and unwise person. They are fickle minded and money minded people. Today most of the people of the world are worshiper of money and mammon. They have no discriminating power at all. It has been said that “celibacy is life and sensually is death”. By observing celibacy and austerity, men have conquered to gods and ruled over to heaven. Celibacy is the greatest weapon and reward to human becoming on earth and to be divine man. To the sinful man, sin appears as sweet as honey. Lust, greed doors to such prison to such person. Therefore, one most give up three W’s (wine, women, and wealth).

Passion is the first fire and ignorance is the darkest night. Yoga and meditation lead to the realties of the life and rectification of faults. Therefore by yoga and meditation, population, pollution and curbed. Devote your mind to righteousness, and let this passion be your law of life. Abandon the 3w’s the world will not attract you as shankaracharya said “every thing is produced by ignorance and dissolves in the wake of knowledge. When the mind becomes purified like a mirror and knowledge is revealed in it”.Therefore it is the practice of yoga by which the practitioners doubtlessly become from man to superman doubtlessly. It is practical experience of the sages’ seers not a man like a spoon that serves the variety of soups but does not know its taste itself. Yoga is just like the oil in the lamp of the hearts and you have to light this lamp with the fire of wisdom. Thus yoga helps people to overcome their day to day problems and the darkness of ignorance. Yoga is the royal road of the reality. Yoga is practiced not only in order to keep the body free from disease, but also as a termed for curing disease.

Terrorism, crime and yoga:-

Today terrorism and crime are the headache of the world. From the very child hood people lamp of the hearts and you have to light this lamp with the fire of wisdom. Thus yoga helps people to overcome their day to day problems and the darkness of ignorance. Yoga is the royal road of the reality. Yoga is practiced not only in order to do not care and give good sneakers and habits to their children. Today parents are so busy that they do not give time to reform, modify and personalize to their children. Parent throws them into an unlimited forest of ignorance and brutality without thinking right and wrong good and bad & children use the way life their own liking and thinking. Without thinking its consequence. That is the real time of a child when one may be good or bad. At this age children become more and more notorious, mischievous and nasty. Their habits make them greedy, selfish and they adopt the way of crime & terrorism. Now they have become headache, curse and enemy of the society, family and nation. If at that time children may be given a course of yoga and meditation then children will not adopt wrongful ways and short cuts of life. Yoga will humanize them in the right way and right time.

Celibacy & yoga:-

Celibacy is life and sexuality is death. Celibacy leads to fortification of the nation (recementing to nation) building. Real bramacharies are real son of the soil. The future well being of the country rests entirely on bramacharies alone. We all must sincerely struggle to control passion and fashion the enemy of the peace, prosperity and the nation, by yoga. Concentration and meditation. A true bramacharya is the real mighty emperor of the world. As s king is no king without treasury, subject and army, as a flower is not a flower without fragrance, as a river is not a river without water and flow, as a sun is not sun without heat and as ice without cold, so also a man is not a man without celibacy or bramacharya. By absorbing celibacy man conquered enemies and gods. A healthy mind resides in a healthy body. Yoga does not allow diseases to reside in body. Yoga is sure ways for success, Blissful life, peace, prosperity, and good realization in this very life.

Thus, in this way population, pollution and patients can be easily controlled by the practice of pranayam, netee, sarvangasam, shrishasan, surya namaskar, uttanpadasan; gomukh asan etc. swami sivanad has very appropritiately said about the importance of yoga.” Those who want to success in life, who desire to increase their, working and earning capacities eho long to have a happier and broader life, who are eager to develop their, will concentration and cultivate virtues, eradicate negative qualities and who eventually wants to have god realization, must perform yoga” for the higher practice of yoga devotees observe 5 Ds, essentially (1) devotion dedication, such honest devotees very soon enter in bikalpa and them Nirvikalpa Samadhi where devotee gets or feels the glimpses of omnipresent, omniscient and omnipotent perpetually. Here in this stage because of rigorous penance devotees are awarded by the boons of clairvoyance, clairaudience and clairsentience. Thus yoga is a journey from imperfection to perfection, ignorance to intelligence macrocosm to microcosm, brutality, to humanity devil to divine and annamaya kosh, anadamaya kosh, mooladhar to shahashrar chakra. All most all bad habits, greed, ignorance, passion, lust anger, brutality, barbarity, will be change in good habits and activities. Yoga and mediation are alpha omega on earth for human beings. As arvind said “if there is Eden on earth that waits for the yogis. Yoga is the salt of life. There no proper evolution of human life without yoga. The ways of life are many, but to achieve the goals of humanity is only the yoga way of life. For the evolution of spiritual enlightenment and consciousness yoga is utmost necessity of the time. Yoga is a perennial source of peace and bliss. Ultimately the purpose of yoga is to deliver man from the pains of difficulties. Ignorance. Because yoga is a transforming and liberating system and force also. The yoga & meditation to the philosophers. Acharyas and seekers of truth, not only to few persons but all most all human race.

Yoga alone will transform the head, heart and ultimately lead to perfection. Yoga helps to achieve object of preventive and primitive health and provides better survival of human values. Yoga and meditation are the means by whish one can attain the healthier, glorious life and final emancipation or freedom from birth and death.

1.Money can buy: a bed but not sleep. Books but not brains. Food but not appetite.

2.Bring in the light, the darkness will vanish of itself, let the lion of yoga roar, the foxes will fly to their holes.

3.God judges the devotees not by the amount of spiritual labour that he has undergone, but by the intensity of his struggle.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Astrology and Mental Health—–

>Astrology and Mental Health—-
As you known astorology regards the moon as the karaka for mind. Moon is the first fastest moving planet who is nearest to the Moon is also responsible for fluctuation in human mood.
First familiarize yourself with the planets, hourse and sings that address anxiety depression, and overall mental health states in natal chart, affectiing long term and short term mental states, and the differences between brief versus problems are exposed by the malefic transit influences over significant weak natal plants. Long term mental and emotional instability issues are shown by weakness of and/or affiction significant natal plants, as listed below.
By understanding through case studies, what areas of the natal chart are weak with respect to mental health both in the natal chart and in transit, we can then see more clearly the complex but contributing long term of short term factors leading to the destabilization of mental health. By determining the activations and timing factors through observing the transits, main period, and bhuktis in effect, that may trigger an alert to upcoming tensions, we can repare our clients, our friends and/ or ourselves, for possible trying times with respect to mental and/or emotional instability of difficullty, By studying the Pranchamas (D-V), we can futher assess plantetary strengths weaknesses.
Signification of Psychiatric Problems :
1. Significant Planets : Signification of the mind is the Moon, Mercury rules nerves and communication capabilities controlled by the brain.
2. Significant houses : The fourth and the fifth.
3. Significant Signs : Cancer and Lea Natal afflicctions to the significantion plants, houses, and sign can causes the psychiatric difficulties and emotional problems to be active for long duration. Where transit afflictions can relate to shrot-term disturbanes.
4. Divisional Chart of Depressio : Divisional fifth-Panchamsa.
Emotional Health Significations :
Depression : the fifth house
Emotional Peace : the fifth and Moon
Mental Peace : The fourth and Moon
Nervous Control : The sixth and Mercury
General Karaka (significator) for the fifth : jupiter
General Karaka (significator) for the fourth : Moon and Venus.
Points to remember :
Mercury, ruling the analytical abilities, when badly placed or under the severe affiction of the moat malefic planer equal bhava madhya (midpoint) cause unmanageable anxity leading to depression, nervous breakdowns, hypertension, and insomnia, health, and general dispositon ae ruled by the first house, and are the additionally factored in.
The third house and Mercury rule mental growth, the third house and Mars rule intiatives, the fourth house rule the power of basic comprehension, and the house rules intelligence, emotional peace of mind, and depression. (Although beyond the scope of this discussion, severe natal weakness and/or affliction of the plants connected with the thirt, the fourth and the fifth houses, along with both the Moon and Mercury, and without any contact of benific offsetting influence, can result in severe mental handicaps, such as mental retardation.)
The overall natal weakness and/or affiction of the plants connected with the third, the fourth, adn the fifth houses, and/or both the Moon and Mercury, may in mental dificiencies for the native, inabilities to cope, and consequently bring upon the native anything from anxiety and depression, to full blown manic episode, depending upon the severity of affiction and weakness and the contributing nature of any influential contact. Both this sixth house and Mercury rule nervous control, which also factors into consideration when assessing determinants for anxiety.
For divisional Analysis we study :
1. The strenght fo the lord of the ascendant for the appropiate divisional.
2. The Moon.
3. The significator, (Jupiter for the divisional fifth)
4. And the lord (s) of the partcular significant/relevant houses in the rashi chart.
Note : Diagnosing states of Mental Health can be a lengtht process for professionals in the medical fielg, such as psychiatrists and psychologists.
As many aspect of the behaviour criteria, background, and motivational aspect of the patient must be thoroughly evaluated fo appropriate medical diagnosis. Often times the psychiatric medical diagnosis is followed by lengthy and diversified experimentation in medication, with the physician searching for the appro priate medicinal prescriptive relief for that partcular patient, while minimizing side effects. Often times these prescription intentions are met with unsuccessful result when it comes to finding the magic pill for behaviour modification or relief, because mental and emotional states of mind are based on so many internal and exteranal personal experiences, many of which remain a mystery to all but the patient.
Astrologer’s encounters similar experiences and investigation in their search, only we base our evalaution on the horoscope. Every individual horoscope is a woven pattern of unique energy at play, and this energy must be thoroughly synthesized and integrated before a conclusion can be drawn, especially with respect to something as delicate as states of mental health. The prescriptions we recommend are remedical measures with propitiation of the malefics. Although beyond the scope of this article. I advise all astrologers to become very familiar with remedial neasures, as often times they become the saving grace for those clients experiencing depression anxiety, and mood disorders.
What to do for remadies :- For weak afficated moon is causing disease, the native should strong him by.
1. He should do mantra japa & puja for moon.
2. He should were white clothes.
3. He should seek her mother blessing and in every morning. He should touch his months feet. (Charansparsh)
4. He should danate white items on Monday to a young Brahimn lady. (White sweet dishes, rice, silver, milk, curd, white clothes, white sandal, whith flowers etc.)
5. He should were a good quality peral in silver on the little finger of the right hand.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Use of Gems For Marital Happiness–

>Use of Gems For Marital Happiness–

In modern are many marriage are problematic and troublesome. There are obstacles in the settlement of a few marriages due to adverse planetary influences. It is believed that Venus is the significator of marriage for males where as Mars and Sun signify marriage for females. If there planets are afflicted due to negative aspect, placement of conjunction, the marriages will be delayed, denied or obstructed. Due to adverse planetary vibration marriages are either broken or one faces the tragedy of loss of life partner. Stones do play a benefic role in prevention of obstacles and problems in marriage. The horoscope should be examined carefully before suggesting any remedial gem. It is found that Coral (Moonga) is generally suggested to mangle girls. This is highly objectionable and harmful as well. If Mars occupies the 8th house, wearing of Moonga or Coral will further intensify caused by Mars. It must be very carefully noted gemstones enhance the strength of the concerning planet. It is a wrong impression among many astrologers that gemstone makes the planet. It is believed that by wearing gemstone of even adversely placed planet the negative effect and problems that planet disappear and that planet starts behaving in a favourable direction. In many books on “GEMS” it has been suggested like that and we strongly object such a wrong way of prescribing gemstone. If Rahu is placed in that 5th house, the prescription of gomed (Hassonite) will further intensify the adcerse results of Rahu in the 5th house. This should be understood in the same way for all other planets and their concerning gem. If Sun is placed in the 4th house and is aspected by Saturn or is conjoined with Rahu or Ketu, wearing of stone for Rahu will expedite. If Venus is afflicted in the 7th house due to conjunction of Rahu, Mars, Moon the Sun or Saturn, one will be highly benefited lead a life of conjugal bliss provided he wears the Diamond or its substitute Opal. The auspicious results will further be multiplied in regard to children, wealth, profession, property, comfort, luxury, happiness and fame addition to conjugal bliss, if the ascendant is Aquarius or Capricorn where Venus happens to be a Yogakaarka.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Indian Vedic Astrology—

>Indian Vedic Astrology—

Introduction Of Astrology—–

The first texts to be taught, heard and learnt in India were the Vedas, the sacred books of the Aryan peoples. The four Vedas, which are generally acknowledged to the source texts of what is usually known as Hinduism, are collections of hymns, or sacred songs, whose deep significance lies less in the literal meaning of their words than in their symbolic meaning, their rhythm and melody, and personal power of their reciter.
The Vedas themselves may be considered living beings. Those who open themselves to these entities, by being initiated into their study by a guru who has served as their receptacle for many years, become filled with this deep knowledge. Unfortunately, even though a few Vedic traditions survive in India, there is substantial doubt that anyone living today fully knows the deep knowledge contained within the Vedas, for the keys to understanding their esoteric import started being lost well before the Christian era.
Because even at their birth the Vedas were fully comprehensible only to the Rishis, the Seers who divinely cognized them developed six auxiliary disciplines called Vedangas (Limbs of the Veda). These Six Vedangas must study before one can attempt to comprehend the Vedas themselves; they are Vyakarana (Grammar), Chandas (Meter), Shiksha (Intonation), Nirukta (Etymology), Kalpa (Ritual) and Jyotish (Astronomy / Astrology). When the Veda is personified as a living being, Vyakarana is regarded as the face, Chandas the legs, Shiksha the breath, Nirukta the ears, Kalpa the hands, and Jyotish the eyes. Each Vedanga is a living being who can be obtained only through a guru.
These beings, and others like them, which have sprouted from the Vedic corpus, are often generically termed Vidyas, a word that is derived from the same root as the word Veda. Jyotish is the Jyotir Vidya (the Lore of Light), a Vidya that can be had only from jyotishis, because Jyotish is the study of all facets of the ‘lords of light’: the Sun, Moon, planets and stars.
One way in which deep knowledge is imparted to students of Jyotish is through observations and interpretations like these, which are stored in planetary stories and myths. Part of the sadhana (spiritual path) of Jyotish is to learn these myths and stories help to integrate Jyotish’s tenets into the pupil’s consciousness, which makes the model of reality, which is Jyotish become vividly real and solid. There is no doubt that the best way to learn Jyotish it to hear teaching stories at the doubt that of your guru. But because the tales themselves are also alive, they can speak softly to those who listen to them mindfully, even if they have no guru handy to amplify them.

CLASSIFICATION OF ASTROLOGY—–

There are Six Limbs to Astrology, just as there are Six Vedangas for the Vedas. Prashna Marga, a text on horary astrology, lists them as shown in Table below. Prashna Marga states that one conversant with all six branches of astrology will never err in predictions – a tall order! Such an astrologer is a true daivajna (roughly, ‘a knower of God’s intention’). Jyotishis of this quality still exist but are very rare, even in India.

The Six Limbs of Astrology:
Gola Spherical astronomy and direct observations; observational
Astronomy
Ganita Astronomical and astrological calculations
Jataka Birth or natal astrology
Prashna Answering questions without the use of a natal horoscope; horary
Astrology
Muhurta Choosing astrologically auspicious beginnings for any endeavor;
electional astrology
Nimitta Interpretation of omens

A thorough understanding and interpretation of omens requires one’s intuition to be in full bloom. It is nearly impossible to do this without direct instruction from a skilled omenologist, thus making Nimitta the Jyotish limb most dependent on the oral tradition.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>SCIENTIFIC EVIDENCE FOR VEDIC ASTROLOGY—-

>SCIENTIFIC EVIDENCE FOR VEDIC ASTROLOGY—-

A scientist generally observes what he has been trained to see, and then too he recognizes only that what he is expected to see. It is not strange that the scientific community perceives the dictums of Astrology as disharmonious jumble, but at the same time, every intelligent human being has an instinctive belief that there must be a harmony in the cosmic design, and some day some body will be able to revel it to us. Each thinking person according to his own might tries to bring that date nearer.

For the last six thousand years, different human civilizations flourishing independently in various parts of our globe utilized the ‘motion’ of the Sun and the Moon as an instrument of the mundane and cosmic time-keeping. They noted carefully the sunsets and sunrises, waning and waxing of the Moon, the length of time between one full moon to another etc, each became one of the units for the measurement of time. The Moon’s revolution round the earth, manifested in the form of observed periodic conjunction of the Moon with definite cluster of stars became another unit of time measurement (sidereal month). The apartment north-south solar motion in the sky (declination) which harbingers change of seasons became yet another unit of time.

By 2000 B.C. , most of the advanced civilizations had already formulated their own calendars, laws of cosmic motion over this ever changing Earth and their attributed influence over mundane affairs. The cosmic laws were perceived as the only everlasting, unfailing and dependable rules. It is the nature of the human being that he always wants to be sure about his intrinsically uncertain fortune and future, therefore fortune-telling always thrived in every civilization, and what could be a better guarantor of certainty than the ‘never changing’ rules of motions of celestial bodies? Any aberration of cosmic laws used to cause intellectual shock and universal anxiety till some apparently rational explanation was not forwarded by somebody and brought in relief. This solar eclipse created mind numbing terror in the hearts of Vedic Aryans, till sage Atri explained it to be a natural phenomenon (Rig Veda. V. 40, Sukta 5 to 9).

As the rules of celestial motion became better understood and comprehensively formulated, the uncertain fortune on the earth got hitched to the certainly of the firmament and this synchronization of the heavenly and mundane happenings generated the ‘science’ of Astrology.

The present work is on an infinitesimally small but potentially vital part of the Herculean venture in correlating worldly affairs with the celestial movements. Our endeavor is to demonstrate, hopefully convincingly, that the Vedic sages, astrologers and their intellectual successors knowingly or unknowingly followed the periodicity of intensity of variation of electromagnetic impulses in the Earth’s atmosphere, caused and controlled by different independent and interdependent electromagnetic cycles originating due to interactions between the solar and inter-planetary energy impulses with the Earth’s magnetic field while formulating the astrological tenets applied in the predictive and elective Astrology.

indian vedic astrology—

History of Indian astrology is given briefly. Astrology was originated in India. Rishies and Munis experienced the universe in their body by yoga (Yat Pinde tatt brahamada). A word circle (chakra) has been given in Rigveda which has been used for zodiac. It is estimated by the Rigveda etc., that Indians possessed the knowledge of Astrology and Astronomy from 28,000 years at least. It is a well known fact that 0 (zero) is the Indian contribution which is very essential for mathematics and astronomy. One cannot dream about the progress in Astronomy without it.

Indian Astronomy Surya Siddhanta: Surya Siddhanta is one of the oldest class of revelations. Shlokas (verses) 2 to 9 of Surya Siddhanta reveal that Asur Maya practiced penance of sun god in the end of Satyuga. On being contented this man who is my part will teach you. The teaching of that sun part man is Surya Siddhanta. Some changes have occurred with the passage of time. This book is of great importance for Astrology. The knowledge of longitude of Planets, Eclipses, Healical rising and setting, nodes etc., is available in it.
(2) Pitamaha—Siddhanta: Brahamagupta and Bhaskaracharaya have adopted Pitamah-siddhanta as the base of their calculations. It includes the calculations about the motions of the sun and moon only.
(3) Vashishtha – Siddhantha: It is the improved version of Pitamah Siddantha and includes the motion of moon and sun only.
(4) Romaka-Siddantha: Some learned persons tell on the basis of Lata, Vashitha, Vijayanadi, and Aryabhatta that it was written by Shrisena.
(5) Jyotishkarandaka: It is an original book and appears to have been written in 300-400B.C. It has given information about Ashwini and Swati Nakshatras.
(6) Surya-Pragyapati: It is an original Jain book as old as Vedanga-Jyotish. It is written in Prakrata language. Malyagiri Suri wrote its commentary in Sanskrit. Motion of the sun, its revolution, days, months and fortnight etc., has been narrated in it. Solar system and their orbital circles have been described in it.
(7) Chanda Pragaypati: It is also a Jain treaties and written in Prakrata language. The motions of the Sun and the Moon have been fixed in it. The method of calculating the duration of day by the length of shadow has been given in it.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Benefits of Yantra—-

>Benefits of Yantra—-

Vastu Yantra finds remedy to one’s problems. Kindly go further in the flow of reading and get to know the benefits of yantra.

Often we hear about the term ‘Vastu’ while starting any kind of new projects. What can be studied from the phrase ‘Vastu’? It signifies that vastu is a perfect perceptive of geography, direction, topography, physics, and environment. The world is moving to an advanced stage with modernization and tends to leave back the vedas, which causes us to face many problems in life. Most of the people use dynamic planning and unstructured architectural procedures leading them to face basic problems in the recent days. In short, it can be said that vastu connects human and nature. Basically, solutions can be given for vastu dosh by making alteration in the rooms, by changing the placements, by altering the house’s interiors, by the use of regulators, or by using charged materials. Some way or the other, one can find remedies for vastu dosha and if the steps are taken in the right direction, happiness follows the door and peace is brought back into one’s lives.

The Yantras have many benefits like it combats almost all the ill-effects and bad influences. Vastu Yantra is particularly fashioned for correcting the mistakes of a building, home, office, or site that are wrongly constructed or created. Also, it eradicates the negative power or the ill effects ensuing from unfavorable location or position of rooms, buildings, homes, and even other properties by rendering positive and kind energies. However, the Yantra needs to be either buried beneath the ground earlier or later to construction with due rites or set up in the puja room and later be worshipped.
Still confused with the term ‘Yantra’? It is nothing but an instrument, mystical diagram, or talisman usually made in copper. In fact, it is path or a technique that is considered to be the shortest and simplest by which one can accomplish one’s hopes and satisfy one’s dreams or wishes. It is believed that ‘Deities’ dwell in the Yantras and by doing religious ‘Puja’ or worshipping the Yantras, it can be conciliated by them, get rid of the evil consequences and raise the flow of convinced influences. There are in fact certain guidelines to be followed while placing the energized Yantra on oneself. Let’s take a look at them.

The first step is to purify the body and initiate with a positive and clear mind frame
Face towards east would be the best to be seated
Ignite the lamp or the diya
Fresh fruits and flowers can be laid on altar
Yantra needs to be exposed on the place with the yantra deity’s image and one’s favorable God
Sprinkle water with any leaf on one self and then on the Yantra
Sublimate the soul and deliver oneself completely in dedication to God
Finally close the eyes and focus on the deity to bless with wishes. At this stage, one can ask God with sincerity the desire for life that is to be fulfilled
Vastu Yantras removes out the evil effects and helps in improving the status of money, wealth, health, and success for a happy and peaceful life.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Importance of Compass—-

>Importance of Compass—-

There are many devices which are used in vastu shastra for the benefit of the well beings and their surroundings. Of them, the most important one is the Vastu Compass. Vastu Shastra is highly ranked and is very important from the sensuous point of view within the creation of human beings. In fact, Vastu Shastra is most amorous, pleasant, and charming and is owned by its enduring value and most appealing components of human civilization. Using vastu compass enhances the growth of an individual and brings happiness and prosperity in one’s life. Let’s know in detail regarding it.
Vastu Compass is an advanced self pointing device that helps us in checking the arrangements as per to the vastu and also suggests arrangements accordingly. The compass helps in guiding oneself as well as others in becoming healthy, wealthy, and prosperous. Of course, these are the important basic things which are expected by the human beings. There are simple charts, which are very easy to use that simplifies the process of vastu differences. Vastu Compass comes with many ready to use charts like living room, residence, kitchen, bed room, office, shop, dispensary and factory. One would really feel the comfort and easiness in vastu while using the compass.
Now let’s see some vastu compass tips while using them. They are found to be easy as well as manageable.
As each of the charts signifies a different aspect, one could choose the chart that would suit the situation. Then, place only the chart that is selected on the instrument’s dial in such a way that the centre-pin ejects out from the middle point of the chart. Following to this, the chart is to be placed on the said direction pointing towards the needle on the centre-pin. Also, one should take absolute care in preventing the influence of outside wind, jerk, and air on the needle.
After this, the needle can be allowed to rotate freely on the centre pin and after some time the needle would stop moving further and finally sets to only one direction. To identify the direction one could read out the marks on the needle, as a “Red” mark on the needle signifies the “North” direction. From the north direction the other directions can be calculated in our mind and mark it accordingly. Then the instrument has to be rotated in such a way that RED MARK of the needle or the “N” pole pairs aptly over the chart’s “N” pole. However, this instrument has to be placed on the surface of a ground or a table as a leveled surface would give better results. Now it is time to check the location and situation of the residence or any commercial premises according to the chart that indicates the perfect situation as per “Vastu Shastra”.

Finally, one could make comparisons of the facts and do needed alteration to welcome peace, wealth and prosperity to the home.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Vastu Consultancy—

>Vastu Consultancy—

Love dwells at our homes and all of us expect to experience the fruits of our success, with peace and happiness mostly expected along with health & wealth, faith & spiritual development, progress and prosperity from our home. If we experience a poor surrounding or construction, the minds of people would never be happy or healthy. Hence, it is to be ensured that the buildings are constructed properly with proper guidance. Where could you get the guidance? Absolutely you will get from expert vastu consultants. In the recent days, people take the help from such professionals, who are vastu experts in building good houses with firm foundation, perfect designing of structures with correct weight, strong walls, distribution of pressure, electricity, air, light, and plumbing. This is known as the architecture or civil engineering, a house of modern knowledge.
First of all, why should you apply vastu? It should be so applied because the buildings that are traditionally constructed as per vastu are sensed to promote happiness, the well being and the good future of the inmates by correcting their lives with cosmic energies and nature. The main theme of vastu is to live in harmony with the nature. Applying vastu in a correct way helps in getting the maximum benefits and enhances the energy with the support of nature. Lots of opportunities would come the way and make one’s thinking very clear to respond to them in a right time.
That’s really great to apply vastu at the right time and get all the benefits in the long run. So what would be the perfect period to contact a vastu consultancy company or individual? It is considered best to consult for vastu while buying or renting a house, apartment, or office when renovating or designing an office or home. Also, help could be got from them when any changes or alterations need to be done for the existing structure while incurring problems at office or home. Moreover, they provide vastu consultancy services for interior arrangements, remedies for vastu dosh, astrological services, religious, and spiritual vastu.
Ultimately, it is the people who are going to be benefitted by vastu and one would wish to know the type of services given by the vastu consultancy. In fact, many provide vastu consultation for construction of flat, row houses, hospitals, offices, temples, shopping malls, bungalows, and everything else. Also, they may charge accordingly depending on the locality of a specific place, the expectations of the client, distance to travel, and the time given. Initially, they may meet the client and prepare a layout of the plan bearing in mind all the aspects suggested by them and when the plan is passed, a detailed drawing is presented by them which shows all the designs and details as specified by the client. People can acquire their services personally visiting them or can even write to them through e-mail by sending them hand sketched drawing of the building for a quick service.
Hence, vastu consultancies are growing in large in the recent days with the growth in the modernization of buildings and other structures. Thus, vastu is meant to live with peace and happiness throughout the life with no serious issues.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>FAQ time—-

>FAQ time—-

Vastu Shastra is a wide field and there are lots of vastu questions arising in the minds of readers. For the people who are a novice let’s make them clear what is all about Vastu Shastra with the help of few vastu faqs.

Vastu Shastra is nothing but an architectural science followed from the past. It is the involvement of various principles in the construction of building and the way of living with peace in nature along with the environment, by equalizing the nature’s five elements namely Space, Fire, Earth, Water, and Air. Vastu Shastra can also be referred to as the SCIENCE OF DIRECTIONS that integrates all five nature’s elements and counterweights with man and material. Also, it involves making use of the cosmic energy in the world for the benefit of vastu.
Fine! some of the vastu facts are known! How would one come to know when there is a bad vastu? There are many symptoms affecting an individual when there is a wrong vastu. It creates continual sickness, constant tiredness, unnecessary negative imagination, always being pessimistic, and a tensed feeling withstands all the time in mind. Also, there would be downs in money flow, losses in business, legal or law suit problems, property disputes, lack of motivation, stale, continuous arguments with spouse and partner, and on the whole a feeling of bad luck pesters the mind. When these symptoms are felt, a proper consultation with a vastu shastra expert can be done with immediate effect.
The next vastu question posed by people is the time taken to achieve the results. Though it is not fixed period for all kinds of problems, the results may start showing its effect in 21 days or it may take more days too. However, the time may vary to obtain the results, but it is entirely guaranteed for good results. People have also vastu queries on the remedial vastu shastra. Let’s learn what it actually means. This is nothing but the remedies that are received without demolishing the property of vastu and are similar to vastu shastra remedies. They provide solutions to vastu dosha and improvise the living conditions of the people and bring happiness and prosperity throughout.
Are color, fabric, and type of wood very crucial in order to make better vastu? Though this may look weird, it is necessary to create a better vastu. In fact, this paves the path for energy to carry oneself freely and get settled in the place. Of the most important vastu questions asked frequently, people wish to know how the remedies have started to work for them. The results of the vastu will be really visible for them and they would certainly feel a difference. This can be understood with an example. If a person comes home exhausted from a tiresome job and finds his spouse, children, and family sitting relaxed, he would obviously be cool and comfortable. The same feeling would be felt in vastu with temperament problems, positive, patient attitude, cash flow in a controlled state, booming business, and lots more to be grabbed on. On the whole, it would be a sense of harmony for oneself and the people around him. Hence, the material benefits can be finely viewed obviously.

Now You can post your questions in the comment box and it will be answered soon when you check that back next time.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Vastu Recommendations—

Vastu is an important concept that people consider while constructing their living and working place. It is quite obvious that you could never envision the supreme and heavenly energies with our naked vision. But you could sense the effects and influence of those supreme powers in several aspects. World is the biggest gift that is being created by God and everything stays good under the prominence of truth. Similar to every workout, the human life and living is governed by the supreme power of the dwelling position and construction known as vastu. Vastu principles are really important that has to be taken into the consideration, while you construct your house and living area.

Here are some of the essential vastu tips for home and office that will really help you to make a peaceful living!

Construct your house in such way it admits bright light into the main doorway
It is really advisable to allow 5 doors of a maximum opening
Setting television in the bedroom area is not recommended
Keep the plants and water sport far from your bedroom
Never split bed sheet and bed mattresses
Set your house furniture in the form of circle, square, or as octagon
Keep the corners bright
It is good to fix an image of bright sun in the southern wall of the living area
Construct your bedroom, where wind must blow from south to west
Your house dinning hall must never get exposed to the entrance door of the house
Setting a mirror in the kitchen room is not recommended
Do not place the mops and brooms in the kitchen
It is good to keep the doors of your toilet and bathroom closed most the time
It is good to set your windows opened towards out face
Growing of pricking plants like cactus in your house is not advisable and recommended
It is good to place the fish aquarium in the southeast corner in your living area
It is good to stick a happy family photograph or picture inside your living room
Growing of high trees such as Bangan, Thorny, and Pipal trees is not good and recommended
Ensure that the lift gate is not set in face of the entry main gate of your house
Building your house rooms in shape of oval, circle, or triangle is strictly not advisable
Your house should never be in disturbed by any obstructive buildings
Ensure that your house is good with right air circulation and water source
Your latrine seat must be kept facing towards northern south
It is good to sit facing the doorway, while you sit in your office
It is good to set a mountain wallpaper behind you in your office
Never keep a ladder that faces towards west or north, as it makes waste of money
Never wear torn clothing or withered flowers as these will prevent the Goddess Lakshmi entering into the home….

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Vastu Solution Tips—-

>Vastu Solution Tips—-

Vastu Dosha is a proposed defect or deficiency in the familiar features of the eight directions and these directions have been empowered with characters based on an assortment obtained from the Panch-Maha-Bhutas. However, Vastu Dosha signifies spoiling the characters of the directions under circumstances. Also, such doshas are closely related with Panch-Maha-Bhutas associated qualities of mind, soul, and human body. It is possible to settle down the ill effects through ‘Sadhana’ or meditation.
Looking very closely, these qualities have the ability to provide a shield exhaling from the human soul that could protect the concerned person from ill effects of vastu doshas. However, this idea is especially effective when the human efforts are put forth for wanting obstructions made by the vastu doshas. Thus, meditation practices can serve the purpose as they are gaining popularity with innovative techniques in meditation.

Let’s take into account the vastu remedies for flats and homes that are needed for the constructions that are made against the principles of vastu. At times, it happens that an act done by a man out of inexperience harms him a lot and such remedy seems to be highly impossible. Some of the remedies in getting relief from the problems are discussed below:

If a canal or river flows in any direction other than facing north-east direction of the home and having an anti-clockwise movement, it is better to set the statue of Ganeshji in a dancing state facing towards the west on the north-east area of the house.
If a factory or a house has a wrongly faced boring direction, a Panchmukhi Hanumanji picture can be placed facing the boring’s south-west.
While entering in to the flat, if a bare wall is seen, either a statue or picture of Ganeshji must be placed on it as a bare wall signifies loneliness. Hence, it is advisable not to leave the wall without anything on it.
Swastika Yantras can be used in improving the energy circles in some cases. Moreover, a lot of care is required and should be managed under the guidance of a capable vastu mason.
Now, let’s taken in to consideration the effects when particular rooms are constructed in a wrong direction. Firstly, a kitchen room would aptly be good in a south-east direction and the water tap in the kitchen to face the north east direction. On the contrary, if the kitchen faces the north east direction, it restricts mutual love and peace in the family. Moreover, the cooking direction should remain only towards the east and it would be better if the food to be cooked on the stone is red. Also, if a tube well is not fit at a desirable direction, it causes deficit of women, stomach, and sexual problems among the men. The remedy to this is to fit the tube well or well in the north-east direction and it has to be ensured that the place remains open at the house’s lowest level. In case of toilets, it can be constructed towards the west or south with face facing the north or west during discharging stool.
Vastu Remedies are widespread in every particular area and one can best use of them by consulting with vastu expert before starting the construction of flats and houses.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Vastu for Plot—

>Vastu for Plot—-

Vastu is basically a science of structures and completely deals with the directions. Vastu Shastra is a big field and one can find many remedies for the well-being. There are many things to be taken in to consideration while deciding to construct a building. Of the most important things, plot selection, plot size, and plot shape are extremely crucial. Hence, it is always advisable to take consultation from vastu shastra expert before purchasing a plot, site, flat, house, or any other building rather than taking his advice in the later part of construction.
From whom should a plot not be bought? The answer to this question is provided by vastu shastra and as per it, a plot, land, or site should never be purchased from people who became insolvent, troubled from leprosy, lunatics, or who are not in country, etc. Likewise, sites that are given in donation to temples, assigned to watchman of colony or village, lands possessed by charitable trusts, and sites with no title deed should not be bought. Also, lands holding boulders, worm hills, ant hills, skeleton, and bones should not be acquired.
In which direction should a plot or site face? The direction of the plots plays a very important role in its construction. Different directions are beneficial for various types of persons and organizations. Let’s take a look on them. Plots which face the east direction are considered good for philosophers, professors, scholars, teachers, and priests whereas plots that face the west direction helps the people who truly support the society. Also, plots facing the north are good for people in administration, power, government jobs. The plots facing south are considered best for the business class and people who work in business concerns.
An extremely important factor where light is to be thrown is at the surroundings or environment of the plots. If the environment is not good, the resulting problems come in many ways. Hence, it is crucial to look at the following aspects:

It is best to construct plots where lands are fertile with plants and greeneries.
A big canal or the river located on the north side and its water flowing from west to east is a good sign. The same way if the river is on the east side with water flowing from south to north, is also considered good.
If there are mounds of Earth, big boulders, and hills towards the south west, southern, and western sides of the site or plot, it is good. Otherwise, it would affect the progress.
It should be ensured that no cemetery, tomb, or graveyard lie close to the plot either front or back.
Also, plots near to temples have a chance to affect the inmates. Plots having temple towards its right causes material loss, on the left causes sorrow and grief, and in the front it causes obstruction to develop.
Thus, keeping these things in mind, it is very important to consult an expert in vastu shastra before constructing the building as it renders happiness and prosperity ever through the life relieved from problems.

Posted by: vastushastri08 | जून 5, 2011

>Vastu for Houses—

>Vastu for Houses—

Building a house as per the vastu norms is very much essential because it brings congruent balance amidst assorted atmospheric natural energies including cosmic energy, solar energy, lunar energy, and much more. Vastu for house involves several important traits, which depicts unique style in building every room of your home. Constructing a house by closely sticking with the vastu principles will greatly bring peace, success, and opulence to the dwellers residing in the home. Moreover, a good vastu shastra will drive away the negative powers and brings holiness and supreme powers into the home. Here are some brief descriptions that describe, in which style your house and rooms should be built by closely sticking with the vastu norms.

While constructing a house you need to mainly apply the principles of vastu for kitchen, pooja room, bedroom, and bathroon.

Vastu for Kitchen:
Kitchen is a place, where you cook your everyday food. You must have to consider quite several factors, while constructing your home kitchen. You must be very considerable in placing the sink, location of the gas, refrigerator, gas cylinder, and other things.

Essential Vastu tips for your home kitchen:

The right place to set your kitchen is in the south-east corner. If you never find an apt position, then you can avail the alternative of locating it in the north-west corner
Building kitchen in north-east, mid-west, mid-north, mid-south, south-west or in the centre is strictly not recommended, as they are out of vastu norms
Ensure that the cooking area never touches the sidewall of northern or eastern side
The right location to cook food is by setting it on the direction of east
Vastu for Pooja Room:
While setting the pooja room, you must have to consider all the following vastu principles in order to achieve the holiness to your dwelling.

Place the idols of the God and Goddess in the right direction
Stick close with the door placement
Strictly avoid using the proscribed raw material while constructing the puja room
Stick with the right number of doors and windows that are described in the vastu principles
Vastu for Bedroom:
Bedroom is a place where you wind up all your worries and tensions thereby stay relaxed with pleasant memories. So, it is really essential to design your bedroom with great care sticking very much to the vastu principles. The direction, which you face while sleeping will badly affect your physical workout in your everyday activity. If you have constructed your bedroom with the inappropriate structure that stands out of vastu principles will badly disturb your sleep and make you to turn restless. Moreover, you often get clashes and misunderstandings with your better-half. Along with that, you might experience everlasting health troubles.
Essential Vastu tips for your home bedroom:

The right direction to set your master bedroom is on south-west
Ensure to place your head positioning towards the direction of south corner. Placing head towards north is not recommended, as it will badly disturb your sleep
Keep your bedroom away from setting diving idols
Constructing your bedroom with the shape of rectangle or square is dearly recommended, as it bestows peace and good fortune
Vastu for Bathroom:
Similar to other rooms, you must give close attention while you construct your home bathroom. The best location to construct the bathroom is the eastern part of the home. If you never find the right appropriate place to set your bathroom, then you can avail the vastu remedy by placing geyser in the south-east corner.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Vastu for Offices—-

>Vastu for Offices—-

Vastu for office determines the efficiency of the work inside the office premises. Vastu principles help in the arrangement of office desk and office seating. Office is a place that has to be designed with the right procedural practice, as it gives an unbiased movement in work! If an office space is not designed as per the right vastu principles, then there will never be any balanced workout and progress. An office room that is designed without following the vastu principle will be less effective with effortless employees, disabled workman, owner might lose the power to manage or control his staffs, which leads to failure. Pursuing the vastu standards for office will ensure effective and efficient workout, and thereby proves to be a valuable asset to the company and much more.
Vastu for offices includes several different factors such as right office setup, office exteriors with respect to shape, slope, direction of various departments, location of the reception, placement of electrical gadgets, position of office desk, and many more. Apart from these, there are several other factors that you must take into your consideration about vastu for office. They are as follows:

The direction of the office entrance way
The right direction of the placement beams
The right direction to fix the doors and windows
The right direction and setup of the owner room
The right direction for the employees to work
Set your office as per these vastu tips. It is sure that you will progress in all aspects of your work.

The place of seat arrangement for managers, executives, and directors must be located in south, west, and southwestern direction of the office premises.
As per the vastu principles it is really good to set the accounts department in southeast direction.
The appropriate place to set the reception is in the northeastern direction of the office.
With respect to vastu principles, it is good to seat the employees facing the north or eastern direction.
The central portion of the office must be set empty.
As per the vastu principles, it is good to place rectangular desk for the MD.
Placing bore-well or fixing tank in the direction of south is not really recommended. This will affect the owner with less and insufficient cash flow.
The best and right direction to keep the storeroom is on the northwest and southeast location.
It is recommended to set the marketing department in the direction of northwest.
Fixing of some idols or images of God and Goddess in the right location of mirrors will bring you improved financial gains.
Setting a water fountain in the location of northeast of the office premises is really good and recommended.
Placing an aquarium containing 1 black fish and 9 gold fishes in the location of northeast of the office premises is really good and advisable.
Individuals who have set their office besides vastu norms and principals will find themselves out from the assistance of natural forces. The principle motto of vastu is to excerpt the maximum goodness from the natural forces in order to gain improved energy levels in the every face of liveliness.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Vastu in India–

>Vastu in India–

India is considered the mother of Vastu as the ancient saints have formulated various principles of it. It was written nearly thousand years ago where the sages kept in their minds the results of sunlight and energy and stabilizing all the nature’s five elements in such a way to get the maximum advantage out of it. In India, it evolved around 5000 years ago and is considered a super science whereas the origin of Chinese Feng Shui was 3500-4500 years ago.

The principles of Indian Vastu Shastra apply in the selection of plots and construction of houses, flats, apartments, offices, shops, factories, industries, restaurants, and temples.

Basically, Vastu Shastra deals with the exercise of architecture and building science and in fact it gives a fair touch in every aspects of life on the earth as well as the universe. The basic theme remains a link that is ever-present between the man and cosmos. The word ‘Vastu’ was originated from the term ‘VASTOSHPATI’ which had its usage in the Rig Veda and is said to render happiness, prosperity, and protection in life and after death too. However, Vastu Shastra truly conceives in the presence of Vastu Purush, who is considered the main deity of a building.
Vastu Shastra is a science of directions and is a study that acquires an entire command over the cognition of directions. In fact, there are actually eight directions namely, northeast, north, southeast, east, southwest, south, northwest, and west. It is entirely an Indian science of architecture and space and how environments and spaces are created supporting the spiritual and physical prosperity and health. This had evolved in India during the Vedic times and the concepts of Vastu Shastra were transmitted to South East Asia, Tibet, and ultimately to Japan and China where the developmental base of Feng-shui originated.
One could find the proofs of Vastu Shastra during the periods of Mahabharat and Ramayan and also, its applications can be seen in the cities of Harappa and Mohanjodaro. According to the Vastu Shastra, when one worships, fears, and respects the lords of all the above said directions, it is considered that benefits and blessings would be showered on us. Moreover, saints have searched the Vastu Shastra and we make only researches. The ancient science helped a lot in getting the benefits freely that are offered by five basic elements of the world in which everyone lead their lives. The five elements of the universe are Sky (Akash), Water (Paani), Wind (Vayu), Fire (Agni), and Earth (Prithvi). It is believed that Vastu Shastra is a perfect understanding of geography, direction, environment, physics, and topography and is essentially the art of placing the correct settings in a manner that yields the maximum benefits.
However, the ancient scholars have said that the Vastu are based on both positive and negative powers, which constantly interacts with each other on the land’s surface. It is in fact a good sign and gives good results when the positive energies are found more than the negative energies in the construction. It also gives more benefits to the inmates paving way to achieve a successful, wealthy, healthy, and peaceful life. Hence, Indian Vastu Shastra goes a long way in understanding the effects and benefits. When they are followed with right notion, success follows every person.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Vastu: A Living Place—-

>Vastu: A Living Place—-

Every creature in this world tries to arrange for a place in which to live comfortably, enjoying all the luxuries and happiness of this world getting maximum benefits of heavenly boons. Most every one is aspiring for having sound health, beautiful wife, healthy children, wealth, means of earning through business, profession or state service, high reputation in society and over all mental and spiritual peace. The sea animals and amphibians prepare a dwelling place on the sea shore, the birds build nests in the trees, the insects make a hive, and human beings are ambitious for making a house on the earth where all the liabilities towards this world and towards heaven can be fulfilled without any disturbance and trouble.

Therefore, aware of the need of a house and in order to avoid troubles, man wants to construct a house on such a ground where he can feel all sorts or happiness and can lead a peaceful life free of troubles and enemies, thereby deriving spiritual peace. With this aim in his mind, he sets out in search of the learned wise persons who can guide him in selecting a site (plot) of his choice, and also in construction of the house. He wants to know the proper auspicious time, and principles (laws) of constructing the house. Also he has in mind the colony or city, neighborhood, sources of water, natural environment, means of transport, etc. while selecting a plot for building a house, at the same time he thinks of his own interests and profits. The external features of the plot can be known with the help of persons living around or nearby the flat. But the quality and nature of the land can be judged only by Shastra. The selection of a site and the plan of the building should be constructed only after consultation and seeking advice of expert Vastu specialists.

If there is house in which lives an unfaithful wife, a foolish friend, an outspoken servant and a snake, the owner of such a house may die at any moment. If such things are associated with the house constructed by someone, the life of the inmates become troublesome and unhappy, and there is always a fear of death. Therefore, everyone is curious to know as to what is Vastu Shastra, and what principles and methods regarding the construction of buildings have been given by the ancient saints and seers on the basis of their experience and commands in the divine scriptures. With the help of Vastu Shastra and Shilpashastra, knowledge about the better and auspicious way of construction of a house, the positions and direction of gates, doors and rooms, etc. in it, is gained so that a house may be built which will provide all round prosperity and happiness to the inmates. Thus, Vastu Shastra provides some principles and rules on the guidelines of which suitable and comfortable buildings for residence, temples, etc. are built and towns, colonies are planned.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Vastu Guide—-

>Vastu Guide—-

· More open area in North & East.
· Less open area in South & West
· Level in North & East to be lower
· Levels in South & West to be higher than floor level
· Water body in Northeast
· Kitchen in Southeast
· Bed rooms in West & South
· Master Bed Room in southwest
· Attached toilets in Southeast or Northwest of each room
· Staircase in Southeast or Northwest corner
· A door in Northeast is mandatory
· Another door can come in any other direction but must be in the positive half of that direction.
· Sloped roofs should be towards North or East
· Projected Southeast in a building towards East; Fire accidents,surgery
· Projected Northwest in North; Financial loss/divorce/litigation
· Missing Northeast; No progress,No progeny
· Projected Southwest towards West ;Premature death of husband
· Projected South of Southwest;death of wife
· Toilet in Northeast;never ending financial problems
· Toilet in Southwest; financial drain
· Level of North high ; efforts fail
· Level of East high; education of kids suffer
· Master Bed Room in Southeast with Toilet in Northeast – Breast Problem
· Master Bed Room in Southwest with Toilet in Southwest – Cardiac Problem
· Level of Northeast higher in the floor – Money/Heart Problems
· Master Bed Room in Northeast with toilet in Northeast – Head/Brain Problems
· Master Bed Room in Northwest with toilet in Northeast – Lungs Problems
· Master Bed Room in South with Toilet in Northeast – Stomach Problems

· The main entrance should be in the East or North but it should not be in front of the compound wall.
· The wall of the house in the North-Eastern side should have minimum height.
· If the wall of the house in the East is tall, it stalls the entry of prosperity, the Goddess Laxmi, into the house. Therefore, it should be small in height.
· The southern side of the house should be as tall and heavy as possible.
· In any room of the house the beam or column should not cross in the center.
· Terrace or balcony in the house should be either in the East or the North.
· A well, pole or a temple should not be there in front of the main entrance of the house.
· The slope of the house should be towards East, North or North-East.
· Similarly, the slope of the plinth also should be towards East, North or North-East.
· The height of the plinth should be highest in the direction of South-West.
· The main entrance of the house should not be in front of that of the opposite house.
· The house should be equipped with the protective wall.
· The upper storey of the house should be constructed on the Southern or Western part.
· The cupboard in the wall should be the Southern or Western part direction of the house.
· When viewed the weight of the structure should be uniform everywhere or the West & South portions should be heavy compared to north or east half.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Structural Vastu—

>Structural Vastu—

The magnetic field of the earth plays and important role while formulating Vastu Shastra which can significantly influence human life. According to Vastu Shastra, one should never keep his/her head towards the north while lying as it obstructs the circulatory system causing irregular sleep, tension, paranoia and other mental problems. The magnetic fields of the same poles repel each other while the opposite attracts each other, therefore a person should keep his/her head towards the south or east. Also a plot with soil that has a large salt content is considered to be inauspicious. The ground watertable should be minimum 10-12’ below the existing ground level and maximum 30’. It should not have any sanitary back-filled or reclaimed soil or rubbish, bones, hair and other filthy material. The soil should be fertile and free from any decrepit or dead material. Vastu Shastra holds the conviction that the boundary walls are an effective way of containing the energy level and the magnetic field of the plot. The wall should be thick and high in the western and the southern directions. In the north and the east a smaller, thinner wall is desired.

According to the Vastu Shastra scriptures, the various directions denote the following aspects:

East Pitrustaan (Manes): It should not be blocked, since it is the source of male issues.

Southeast (Fire) is believed a source of health, place of fire, cooking and food.

South is believed a source of wealth, crops and happiness.

Southwest (Earth) is a source of character, behavior, cause of longevity and death.

West is a source of name, fame and prosperity.

Northwest (Air) is a source of change, income from business, enmity and friendship.

North (Maathrusthan) This should not be blocked as it is the source of female issues.

Northeast (Water) is a source of health, wealth, prosperity and of male issues.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Vastu – The Architecture—

>Vastu – The Architecture—

Vastu is a Sanskrit word meaning the science of structures. It is a traditional Indian theory of architecture that guides the design and construction of buildings so that they are in harmony with the laws of nature. When we create a form on earth we are giving birth to a living space. Just as our bodies are living spaces for our consciousness, so a house, a town or a temple all are embodiments of living space. Just imagine the peace of mind knowing that your home or office is supporting you, your family, your health and life just by being built with this knowledge. If you aren’t going to build a house then it’s also possible to correct the defects of your current home. The position in Vastu is also very important, but before considering this, the nature of the land you build your home on must be considered, for the land will reflect upon its inhabitants. With reference to position we consider the positioning of the home itself, the positioning of various rooms and also the positioning of the person in the room to gain maximum harmony with nature at all times.

Nature is the underlying basis of Vedic architecture and all the Vedic sciences. Timing is important as when one builds a home the timing will have an effect on how it grows and nourishes you. If you plant the seed at the right time, you yield a good crop and good food. Direction is a basic factor of Vastu. Nature has certain rules and forms in terms of how the earth is placed in space and the position of the various planets. There is a measurable grid of energy on the surface of the earth and this is the same grid that we build our houses on in Vastu. Thus, the house is aligned with the subtle currents of energy flowing up and across the earth and thus we gain the benefits of being in harmony with such elements. Each direction has a different quality or effect. We all know the sun rises in the East, so East has the quality of the sun and so forth. Direction is very important and also with reference to the placement of the various rooms, even down to the direction one would face while sleeping, cooking or eating. Of course the difference is very subtle but if you multiply a good effect over a lifetime the benefits are highly measurable. When we build a house with Vastu we simply mirror nature and her rhythms and bring them into our created space.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Vastu Directions—

>Vastu Directions—

As everybody knows there are four major directions – east, west, north and south. Besides these, four sub-directions are also considered. These are Southeast (Agney), Southwest (Nairitya), Northwest (Vayavya) and Northeast (Ishaan). Each of these directions and sub-directions has its own merits and demerits and yields results accordingly. In Vastu projects, the eight directions – North, East, West, South, Northeast, Southeast, Southwest and Northwest are primely considered.

If you are planning to build your bungalow or any other building on the basis of VASTU Shastra, first of all you should have knowledge of your plot’s direction. Then you should decide in which direction you ought to keep your main gate. You may if necessary, take the help of a compass to know the directions. As the numerals have their apparent influence of human life, similarly influence of the directions is also apparent. Richness or penury of a person can be known from the location of his house. In which direction is his house located? Which direction does the entrance of his house face? How is the interior decoration? These and other related things reveal the economic condition of a person. Similarly changes that must be made in order to bring prosperity and to prevent imminent danger or crisis can also be known with the help of Vastu Shastra.

Every direction has a deity or lord that rules it.

EAST:—

Indra is the ruling deity of the east. He was born out of Brahma’s mouth and is capable of destroying enemies. He can appear in any form as per his wishes. He is also the lord of rains and has the wind as his assistant. Increment in wealth, cereals and animal stock can be effected through worshipping Indra. Indra is also the king of the heaven. Elephant Airavat is Indra’s vehicle and Vajra (lightning) in his weapon. The east is also the abode of gods like Surya, Agni, Indra, Jayant,Ish, Parjanya, Satya, Bhup and Akash. The east is also known as a direction of lineage. During the construction of the house, some portion must be left open in the east. It leads to long life for the owner.

WEST:—

The west is the opposite of the east. No work can progress in the west. Varun (Neptune) is the lord of this direction, which is under the influence of sage Agastya. The sea is the abode of Varun (Neptune). He therefore has most influence on the water bodies. A proper utilization of westerly portion of plot leads to reputation, fame, prosperity and success for the owner.

NORTH:—

Kuber is the lord of this direction. Literally, Kuber means the one who controls the imminent events and causes increments. He has inaccessible wealth and property. Kuber is the king of Yakshas and Kinnars and is a friend of Rudra (Shiva). Kailash is the abode of Kuber who has three legs, eight hands and a yellow dot in place of eyes. Mercury is the planet that rules the north. It is more influential in the dark phase of every lunar month. North is a also an abode of the gods like Kuber, Diti, Aditi, Shail, Naga and Bhallat, etc. North is also a place of mother. Leaving some portion open in north leads to prosperity of maternal side as well as provides wealth, comforts, peace etc. for the owner.

SOUTH:—

Yama is the lord of this direction. He is the son of Surya and is hostile towards Vishnu. Nakshatra Bharani is the mostimportant for him. During the last eight days of the lunar months of Ashwin and Kartika this nakshatra is more influential. South direction weakens human life, hence all the auspicious tasks are forbidden in the south. South is also an abode of the gods like Yama, Gandharvas, Mriga, Pusha, Vitath and Kshat. In all the south direction yields nothing but mourning, depression and pain.

NORTH-EAST:—

The angle that lies midway between north and the east is known as Ishanya (northeast) direction. Shiva is the lord of this angle. Pashupat is the weapon of Shiva. Nakshatra Ardra is the symbol of Lord Shiva. Semul (silk-cotton) tree is consideredauspicious in this direction. Worshipping of the ruling God of this direction yields many virtues in the life of the worshipper. The portion of the house in this direction must be kept holy for it yields many kinds of divine powers to the owner. Proper utilization of this portion of house provides wealth, reputation, property and every kind of excellencefor the owner. A faulty utilization of this angle, however, may block successful continuation of progeny.

NORTH-WEST:—

It lies mid way between the west and the north. Vayu (wind) is the lord of this direction. Five kinds of Vayu – Prana, Upana, Samana, Vyana and Udana, are necessary for human life. Hanumana and Bheema are the representations of Vayu. Those who worship Vayu in the form of Hanumana get their desired results at once. Northwest angle is the progenitor of friendship or enmity. Hence, a faulty use of this portion of plot may result in a majority of enemies. If you use this angle of your plot wisely and flawlessly, you will have many friends who will undoubtedly benefit you.

SOUTH-EAST:—

Direction that lies midway between the east and the south is known as Agneya (southeast). Agni (fire) is the lord of this direction. He is the preserver and defender of every being. Agni also carries the message of people who worship and offer oblations with devotion to God. Worshippers of Agni are economically strong and long living. Agni himself takes care of the people who make offerings into him. Agni also provides them with comfort, peace, prosperity and progeny. While constructing a house, the first pillar must be erected in the southeast direction. Alternatively, kitchen of the house should occupy a place in this direction. This is the foremost and an important rule of Vastu Shastra. First day of every month also represents the element fire. A warm Agneya direction makes a man healthy, whereas a faulty use makes the owner short tempered.

SOUTH-WEST:—

It lies midway between the south and the west directions. Nairitya is the ruling lady of this direction. Literally, Nairitya means repeated happening – whether be it the birth of a baby or any other event. It also means that anything notdone at proper time can’t have a repetition. If the house is built in this direction, the home suffers continuous decay.The southwest portion of the house should never be left open, nor should a pit be dug in this direction. This direction is an abode of demons and ghosts. To prevent the accumulation of inauspicious and pain causing things, digging of pit in southwest is prohibited. If for some reason, digging is necessary it should be covered as early as possible or a sapling be planted in its place.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Vastu Purusha—

>Vastu Purusha—-

The ‘Vastu Purusha’ is said to be the spirit of the site. It’s in the form of a human male and lies on the site with his head towards the east, his posture fitting exactly in a square. It was easier to get the anthropometrically and aesthetically correct dimensions of rooms, doors windows and even the structural members like plinth and pillars. Even the interior planning was governed by the posture of the ‘Vastu Purusha’ and the norms which specified where and how thestructure must be built, so that it does not injure him. Vastu Shastra believes in the existence of Vastu Purush who is the main deity of a building.
Vishwakarma is regarded as the father of Vastu Shastra. The concept of VASTU Purusha in VASTU Shastra is an ancient one. As per the scriptures, once a fierce battle took place in ancient times between a demon Andhakasur and Lord Shiva. During the battle, a few drops of Lord Shankar’s sweat fell on the ground and gave birth to a formidable monster. The monster at once began to kill the gods. Acting unitedly, then all the gods captured the monster and buried him with his face facing down. The gods also granted a boon to pacify him: “You shall be worshipped in all auspicious tasks. Since the gods made an abode on the monster, he came to be known as Vastu Purusha. And since all the gods have an abode on him, he is worshipped by prudent people.”

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Vastu Elements—

>Vastu Elements—-

The people of the ancient world considered the universe to be constructed from the four elements of Earth, Water, Air, and Fire, or solid, liquid, gas, as we now refer to the basic states of matter, along with pure energy. These elements also had psycho-physiological correlates that were evident as personal temperaments. Thus, a person might be described as melancholic, phlegmatic, sanguine, or choleric. In the Magical Personality system, an individual is considered to demonstrate aspects of all four elements. We all have some degree of sensuality, emotion, intellect, and drive, but for everyone the mix is different, resulting in numerous personality types.

Earth:—-

We are embodied and thus part of the physical world. Inevitably, then, we have a relationship with the physical world and demonstrate “Earthy” traits of sensuousness, caution, practicality, pragmatism, precision, and discipline, as well as stubbornness, dogmatism, inflexibility, intolerance, compulsivity, and depression. Earth types often believe that they are their physical bodies; consequently, they have an underlying fear of physical death.

Water:—

We are composed almost entirely of water and can live only a few days without it. The surface of the planet is two-thirds water. Life began in the primeval ocean and we develop in the watery womb. Inevitably we have a relationship with water and demonstrate “Watery” traits of emotionalism, empathy, kindness, sympathy, love, gentleness, sociability, nurturing, and intuition, as well as moodiness, capriciousness, possessiveness, neediness, sentimentality, and irrationality. Water types often believe that they are their feelings; hence, they exhibit a nebulous sense of self and fear solitude.

Air:—-

Air is a composition of gases like oxygen, nitrogen, carbon-dioxide, helium, neon, crypton and vapor. Oxygen is life saving gas indispensable to living organism. Without air, we would die within minutes. Our relationship with this element is therefore intense and beset by uncertainty. We all exhibit “Airy” traits of rationalism, logic, intellect, analysis, judgement, curiosity, openness, ethics, fairness, and humanitarianism, as well as superiority, coldness, distance, abstraction, emotional illiteracy, naiveté, and prejudice. Air types often believe that they are their minds, and they cling to theories that make sense of both themselves and the world.

Sun:—-

Sun plays a vital role in Vastu Shastra. It is a source of life on earth and this is the reason why Sun is worshipped as an incarnation of god or the potential source of creation on the earth.

Sky:—

Sky is the endless space surrounding the universe. The universal concept of sky is beyond the imagination and reach of human beings as it is never ending and eternal.

Fire:–

Fire refers to the life force, the spiritual energy that animates us, and the motivation without which we would be inactive and die. We all exhibit “Firey” traits of urgency, drive, passion, enthusiasm, ambition, intensity, creativity, optimism, and progressiveness, as well as egocentricity, selfishness, recklessness, impulsiveness, ruthlessness, aggression, and insensitivity. Fire types often believe that they are their achievements, and so they strive desperately to succeed and constantly monitor their progress as evidence of their worth.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>Why Vastu..????hat Is Vastu….????

>Vastu – Why Vastu..????

Why Applying The Concepts of Vastu-Science of India?

( * ) ACHIEVES SUCCESS THROUGH INDIAN ORIGIN VASTU- SCIENCE.
( * ) SUPPORT HARMONIUOS RELATIONSHIP
( * ) CREATES FINANCIALL STEABILITIES.
( * ) ENHANCES CAREEAR ADVANCEMETNT.
( * ) STIMULATE SELF-CONFIDENT AND CREATIVITIES.
( * ) INCREASES PRODUCTIVITIES AND achievement.
( * ) REDUCE STRESS IN YOUR HOME OR OFFICE OR FACTORY.
( * ) IMPROVES HEALTH AND IMMUNITY-ENERGY THROUGH NATURE.
( * ) EXPLORES THE SPIRITUALATIES.
( * ) NEVER INVITES TO FAILURE.

Why Vedic Astrology? Why Our New Concepts? Vedic Astrology is powerfull therapy to know Present-Past and Future.

It offers to Us:

( * ) MAKES STROGEN OUR SITUATION OF LIFE BY ZODIACAL PLANETERIES POWER.
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( * ) KNOWING THE EXACT OUR PERSONALITIES AND GET MORE BENEFITS ABOUT OUR- SELF.
( * ) HELPS TO FINDING OUR HABITATE SKILL FOR BUSINESS AREA AND GETS MORE AND MORE SUCSSESS OR WE CAN SELECT OUR BUSINESS OR CAREER BY VEDIC- ASTROLOGY.
( * ) THUS IT IS MOST IMPORTANT IN INDUSTRIAL FIELD AS WELL AS OUR LIFE BY VEDIC- ASTROLOGY. AND THUS IT IS MOST IMPORTANT IN ANY FIELD OF WORLD TO GROW UP BY VEDIC ASTROLOGY.

Vastu – What Is Vastu….????

India has its own science of construction since the Vedic age i.e. in other norms called vastushashtra or vastu. Now what exactly the vastushashtra, “IT IS AN ANCIENT ARCHITECTURAL SCIENCE BASED ON THE ASTROLOGICAL NORMS”.

In Vedic age all the sciences is written in concise and aphorism or in poetic form in Sanskrit language and vastushashtra is the science not superstition of religiousness, so each and every aphorism has taken time to be interpreted accurately.

It is discovered in 8000 B.C. i.e. the Vedic era till then no single change ever made in this science. This is the finest science.Vastu science is mentioned in all Vedas, Puranas, Ramayana and Mahabharata. “Matsya Puran” has mentioned 18 Maharshi who had the knowledge of astrological architecture.Vastu science is based on PANCH MAHABHUT(5 elements) i.e. Jal(water),Vayu(air),Pruthvi(earth),Agni(fire),Aakash(sky).All these 5 elements need the proper balance among them. Those 18 Maharshi had discovered the balance and the vastu science came in picture.

By astrological point of view the 9 planets influence the human body as well as his home and his atmosphere. Each and every planet has the path to affect the home in a perfect manner. Any false construction or disarrangement or inimical placement in any construction produce the negative energy. This energy along with the horoscopy energy affects the human being in his sub planetary age or for certain period. This can disturb his health, wealth, family relations, matrimonial and marital life, his career, education, progress and etc. it can also produce the political problems. It is not necessary that it only affects the main person of the family; it can affect any person related to that home (mainly sensitive and close or first degree relatives). In vastu science terminology it’s called VASTUDOSH and VASTUVEDH.

Do you have any problem? Or are you suffering from never ending troubles?
Just check your home, office, or any premises for any VASTUDOSH.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>vastu tips –

>”To make a house or business premises according to vastu shastra, using vastu tips can make you and your family rich and healthy. Some of them are listed below for your wellfare. Try it. It works!”——

*The place of Kitchen in your house must be in the south-east direction.

* Water taps should not kept leaking .

* There should not be three or more doorways in a straight line. Having improper position of the entrance/obstruction in front of the gate can reduce the prosperity to a great extent.

* Doors should be made leaving South/Southwest/West direction.

* Rooms like drawing room in North/East direction.

* The directions North, North-East, East, center point should be kept light, clean and open. South, South-West, West should be kept heavy.

* More even numbers of Balcony, Verandahs and Windows should be in North / Northeast / East direction.

* Pillars should be in even numbers and should not come on the sensitive points of center point.
* Main gate should be bigger than the other internal doors. Main entrance gate is allowed on any directions , except South West direction.
* It is very difficult to leave center point open, so lobby/drawing/dining hall should be constructed there.
* To balance the harmonious soul and to avoid tension and illness in the house, do not keep rubber plants, bonsai, cactus or milk producing plants in the house.
* Never sit or sleep under a projected beam to avoid depression, headache and loss of memory.
* Never keep non-working, un-repaired device or damaged watch, telephone, radio, mixer, spoiled ball pens, cassettes etc. in the house. This will create negative energy in the house and would retard progress and harmony.
* Never accept money between two fingers, as this is considered as cutting of further inflow of wealth. Accept the money with five fingers.
* Check the sound of your door bell. If it sounds irritating, family members will be short tempered. If it has a dull sound, energy level of the house will be low. The doorbell should be pleasing and soothing.
* Any exposed floor marble or tile broken in your house could be the cause of a broken relationship among family members. Put a carpet to cover the broken marble/tile or replace it for immediate results.
* A tree or an electric/telephone pole facing your main door or windows could cause the poor health of family members. Place a convex mirror on the outer wall facing that tree for protection from bad soul.
* Have the name & number plate of your house on main entrance to enable the opportunities to trace you easily. It is a good idea to give a Name to the residence also. Lighting the nameplate increases the effect manifold.
* Never sit with your back facing main door. This can cause back-biting, deceit, betrayal in life. Unwanted guest may be given such seat.
* To retain the money in the house, put a 3 leg frog facing its back to the main door for better saving.
* Having a toilet/fire place in North-East corner of the house can ruin it financially besides mental tension & quarrel amongst people. Using Pre-Energized Pyramids, sea salt, Green creepers, blue bulb and yellow towels can largely help in minimizing ill-effects.
* Keep your mirrors clean, dust and dirt reduces the effectiveness of mirrors. Try to keep the paint work fresh, repair any leaking taps, and replace any blown bulbs as quickly as possible. Keep your windows clean and replace any cracked or broken glass.
* Water, particularly moving water, attracts positive energy and money. Consider placing a small ornamental fountain or aquarium in your North direction for wonderful results.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>SOCIAL ASTRO REMEDIES—-

>1. JUPITER :- Respect and take care of Grandfather/Grandmother and old age person. It will make the “JUPITER” strong and positive for you. It helps in your study and to make your career.

2. SUN :- Respect and take care of your Father and Father like person. It will make the “SUN” strong and positive for you. It helps to solve your problems with Govt.

3. MOON :- Respect and take care of your Mother and Mother like lady. It will make the “MOON” strong and positive for you. It helps to less your tensions and you enjoy a peacefull mind.

4.VENUS :- Respect and take care of your wife/husband and other female/male of your age group. It will make the “VENUS” strong and positive for you. It will make you rich and prosperous

5. MARS :- Respect and take care of your elder Brothers and Sisters. It will make the “MARS” strong and positive for you. It helps to solve your Immoveable properties related problems.

6. MERCURY:- Take care of your Sister/Brother,Niece/Nephew,Sister-in-law/Brother-in-law and Paternal Aunt/uncle. Keep good moral Character. It will make the “MERCURY” strong and positive for you. It helps to live a good family life. It will rise your business

7.SATURN :- Do the justify things. do not make people foolish for your intrest. Do not drink liquer. Fullfil your promises with others.It will make the “SATURN” strong and positive for you. It helps to make your social life best.

8.RAHU :- Beware of gambling. Respect your in-laws. Keep your toilet clean.Do not make false commitments. It will make the “RAHU” strong and positive for you. It will save you from unexpected loss and thievies . you will enjoy a good health.

9.KETU :- Respect and take care of your employees. Fullfil their needs.It will make the “KETU” strong and positive for you. It helps to your son and daughter keep rising.

>गृह निर्माण एवं गृह प्रवेश में मुहूर्त विचार—

पिछली पोस्ट मुहूर्त विचार की अनिवार्यता पर हमारे एक समानीय पाठक द्वारा अपने निजी अनुभव को साँझा करते हुए सवाल उठाया गया था कि—-यदाकदा ऎसा भी देखने को मिल जाता है कि अपने लिए किसी भवन आदि के निर्माण समय सभी कुछ विधिपूर्वक एवं शुभ मुहूर्तादि में किया गया, लेकिन उसके बावजूद भी उस भवन में निवास करने पर जीवन में कष्टों,परेशानियों, विघ्न-बाधाओं का सामना करना पड जाता है. इसका क्या कारण है ?
जहाँ तक मेरा विचार है, इसके पीछे प्रथम मूल कारण तो यह हो सकता है कि मुहूर्तादि का शोधन भली प्रकार से न किया गया हो तथा दूसरा कारण उस भवन में किसी बडे वास्तु दोष का होना.

अगर भली प्रकार गणना कर के मुहूर्त निर्धारण किया जाए, वास्तु पूजनादि कर्म करके प्रवेश किया जाए, तो उसमें निवास करने वाले गृहस्वामी एवं उसके कुटुम्बीजनों को किसी प्रकार की कोई हानि-परेशानी का सामना नहीं करना पडता. इसलिए भारतीय दर्शन, एवं हिन्दू संस्कृति में मुहूर्त का विशेष महत्व स्वीकार किया गया है. और यह मुहूर्त भी किसी विद्वान ज्योतिषी(जो वास्तु का भी ज्ञाता हो) से ही निकलवाना चाहिए. ऎसा करने से गृहस्वामी सभी प्रकार से शांती एवं सुख-समृद्धि को प्राप्त करता है. लेकिन यथासंभव अधिक वास्तुदोष वाले मकान-दुकान या भूमी को कभी लें ही नहीं और छोटे-मोटे वास्तु दोष वाली स्थिति में सर्वप्रथम उसका भी सटीक निवारण या निराकरण करवा अवश्य करवा लेना चाहिए. तत्पश्चात उस स्थान को उपयोग में लाया जाए तो ऎसा स्थान निश्चित रूप से कल्याणकारी सिद्ध होता है.
गृहनिर्माण एवं प्रवेश मुहूर्तादि सूत्र——-
मेष, वृष, कर्क, सिँह, तुला, वृश्चिक, मकर एवं कुंभ राशि में सूर्य के होने पर भवन की नींव खोदने-रखने से, या गृह निर्माणारंभ करने से गृहस्वामी सभी प्रकार से धन-समृद्धि, यश-प्रतिष्ठा एवं सुख-शान्ती से लाभान्वित होत है. इसके ठीक विपरीत मिथुन, धनु तथा मीन राशि में सूर्य के होने पर गृहारम्भ करने से न तो वो कार्य समय पर समाप्त हो पाता है, उल्टे विभिन्न प्रकार की आर्थिक एवं मानसिक परेशानियों का सामना भी करना पडता है. इसलिए इन समयावधियों में किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य से सदैव बचना चाहिए.
गृहारम्भ में आश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, उत्तराषाढा, श्रवण, उत्तराभाद्रपद और रेवती——ये समस्त नक्षत्र ग्राह्य हैं. भरणी, कृतिका आदि अन्य नक्षत्रों में कभी भी निर्माणारम्भ नहीं करना चाहिए.
तिथियों में केवल द्वितीया, तृतीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी एवं पूर्णिमा ही इस कार्य के लिए ग्राह्य हैं. ये सभी तिथियाँ एक प्रकार से महाशुभप्रद हैं. इनके अतिरिक्त प्रतिपदा(एकम/पडवा) आदि को गृहारम्भ करना परिवार की स्त्रियों एवं धन हेतु हानिकारक सिद्ध होता है. अमावस्या को यदि आरम्भ किया जाए तो मन में एक प्रकार से भ्रम एवं भय की स्थिति बनी रहती है.
जब नवीन भवन आदि का निर्माण पूर्ण रूप से संपन्न हो जाए, उसमें दरवाजे आदि की भी संपूर्ण व्यवस्था हो जाए—-तो उस भवन में प्रवेश(गृहप्रवेश)हेतु आप मुख्य द्वार की दिशा अनुसार अपने लिए शुभ समय का चुनाव कर सकते हैं.जैसे कि……
मुख्यद्वार यदि पूर्व की दिशा में हो तो रेवती और मृगशिरा नक्षत्रों में गृह प्रवेश शुभ रहता है.
दक्षिण दिशा में द्वार होने पर उत्तराफाल्गुनी और चित्रा नक्षत्र अति शुभफलदायी रहते हैं.
पश्चिम दिशा में मुख्यद्वार होने पर अनुराधा अथवा उत्तराषाढा में से किसी नक्षत्र को गृहप्रवेश करना कल्याणकारी है.
यदि मुख्यद्वार उत्तरदिशा में हो, तो उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्र शुभ हैं.

मुहूर्त विचार की अनिवार्यता…..

ज्योतिष शास्त्र का प्रमुख स्तम्भ है—–मुहूर्त विचार! मुहूर्त का आशय यह जानने से है कि कौन सा कार्य कब किया जाए, जिससे कि व्यक्ति को उस कार्य में निर्विघ्नता प्राप्त हो. उसे कार्य में सफलता प्राप्त हो सके. यदि गहराई से देखें, तो पायेंगें कि हमारे आसपास जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह सब एक अदृश्य शक्ति द्वारा नियन्त्रित है, यहाँ तक कि स्वयं काल(समय) भी. आकाशमंडल में ग्रहों के द्वारा उनके अपनी कक्षा में परिभ्रमण की गति के अनुसार हर क्षण नये-नये संयोग बनते रहते हैं. उनमें जहाँ कुछ अच्छे संयोग होते हैं, तो वहीं कुछ खराब भी होते हैं. अच्छे संयोगों की गणना कर के उनका उचित समय पर जीवन में इस्तेमाल करना ही शुभ मुहूर्त पर कार्य सम्पन्न होना होता है.
यहाँ हो सकता है कि आप में से ही कोई ये सवाल भी कर बैठे कि भला क्या मुहूर्त पर कार्य करने से भाग्य बदल जाता है ? अर्थात यदि भाग्य में कोई उपलब्धि न हो, तो अच्छे मुहूर्त पर कार्य कर के भी क्या हम वस्तु विशेष को प्राप्त कर सकते हैं ?
ये ठीक है कि मुहूर्त हमारे भाग्य को तो नहीं बदल सकता, लेकिन कार्य की सफलता के पथ को तो सुगम बना सकता है. जिस प्रकार, कि यदि हमें किसी कार्य से कहीं जाना हो और बाहर आंधी, तूफान या मूसलाधार बारिश पड रही हो, तो निश्चित है कि गंतव्य पर पहुँचना बहुत कठिन हो जाएगा और यदि मौसम अच्छा हो, तो वही यात्रा हमारे लिए सुगम और आनन्ददायक हो जाएगी. इसी प्रकार से शुभ मुहूर्त में किया गया कोई भी कार्य सुगम हो जाता है. साथ ही यदि किसी प्रकार की अन्य हानि का होना लिखा है, तो वह क्षीण या कम हो जाती है. कहने का तात्पर्य यही है कि भाग्य बदले या न बदले, परन्तु जीवन के महत्वपूर्ण कार्यों को शुभ मुहूर्त में किया जाए तो भी व्यक्ति जीवन में किसी सीमा तक निर्विघ्नता एवं खुशहाली प्राप्त कर सकता है.
वैदिक ज्योतिष में जीवन के समस्त कार्यों के लिए अलग-अलग शुभ मुहूर्तों का विधान है. मुहूर्त काल गणना के अनुसार दिन एवं रात्रि में कुल 30 मुहूर्त होते हैं——15 दिन में और 15 रात्रि में. इस प्रकार एक मुहूर्त काल का समय होता है–48 मिनट और 24 सैकिंड. इसके अतिरिक्त तिथि, वार, नक्षत्र इत्यादि के आधार पर भी विभिन्न प्रकार के शुभाशुभ मुहूर्त निर्मित होते हैं—–जिन्हे योग कहा जाता है. उनका उल्लेख करने का यहाँ कोई औचित्य भी नहीं है, क्योंकि पाठकों की जानकारी हेतु यहाँ हम सिर्फ प्रतिदिन निर्मित होने वाले मुहूर्त के बारे में बात कर रहे हैं.
दिनरात के (रूद्र मुहूर्त से समुद्रम प्रयन्त) कुल 30 विभिन्न प्रकार के मुहूर्तों में एक मुहूर्त आता है—-अभिजीत मुहूर्त जिसे कि “विजय मुहूर्त” भी कहा जाता है. यह दिन का अष्टम मुहूर्त होता है, जो कि अभिजीत नामक नक्षत्र के आधार पर निर्मित होता है. प्रतिदिन मध्याँह काल में लगभग 11:36 से 12:24 तक का समय इस मुहूर्त का रहता है. इस समय अवधि में नवीन व्यवसाय आरम्भ, गृह-प्रवेश अथवा नींव डालना, निर्माण करना आदि किसी भी नये कार्य का आरम्भ व्यक्ति के लिए शुभ फलदायी एवं किए गए कार्य में उसे निर्विघ्नता प्रदान करता है.
बेशक कुछ लोग इन सब पर भले ही विश्वास न करें लेकिन ये बात अनुभवसिद्ध है कि व्यक्ति की सफलता, असफलता और जीवन स्तर में परिवर्तन के संदर्भ में मुहूर्त की महत्ता को किसी भी तरह से अलग नहीं किया जा सकता.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>यत् पिण्डे तत् ब्राह्मण्डे—-

>”यत् पिंडे तत् ब्राह्मंडे”—-

अर्थात जो ब्राह्मण्ड में है, वही इस हमारे शरीर में है. हम साढे तीन हाथ व्यास वाले इस मानव शरीर को अनन्त विस्तार वाले ब्राह्मण्ड का संक्षिप्त संस्करण कह सकते हैं. जैसे विस्तृत भूगोल का समस्त संस्थान छोटे से नक्शे में अंकित रहता है, ठीक उसी प्रकार ब्राह्मण्ड में विद्यमान समस्त वस्तुओं का मूल स्त्रोत हमारा अपना ये शरीर है.
ब्राह्मण्ड यदि पृथ्वी, अप्, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच महाभूतों के मिश्रण का परिणाम है, तो हमारा ये शरीर भी इन्ही के संघात से निर्मित है. ब्राह्मण्ड में सूर्य है तो इस शरीर में सूर्य का प्रतिनिधि आत्मतत्व विद्यमान है, ब्राह्मण्ड में चन्द्रमा है तो शरीर में उसका प्रतीक मन है, ब्राह्मण्ड में मंगल नामक लाल रंग का ग्रह विद्यमान है तो शरीर में विभिन्न रंगों के खाये हुए भोजन के रस से यकृत और पलीहा (जिगर और तिल्ली) द्वारा रंजित, पित्त के रूप में परिणित होने वाला रूधिर(खून)विद्यमान है. ब्राह्मण्ड में बुध,बृहस्पति,शुक्र और शनि नामक ग्रहों की सत्ता है तो हमारे इस शरीर में इन सबके प्रतिनिधि क्रमश:—वाणी, ज्ञान, वीर्य और दु:खानुभूति विद्यमान है. पर्वत, वृक्ष, लता, गुल्मादि के प्रतीक अस्थियाँ, केश रोम, नदी-नालों की भान्ती नसें, नाडियाँ और धमनियों का जाल बिछा हुआ है—–कहने का तात्पर्य यह है कि सृष्टि की समस्त वस्तुएं हूबहू उसी रूप में हमारे इस शरीर में मौजूद हैं. आप इस शरीर को एक प्रकार से ब्राह्मण्ड का नक्शा कह सकते हैं.
हमारी उपर्युक्त स्थापना को सीधे शब्दों में इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि “ब्राह्मण्ड” विराट का शरीर है, जिसे ज्योतिष में हम कालपुरूष के नाम से सम्बोधित करते हैं और “पिण्ड”—उसी के अंशभूत जीव का शरीर अर्थात अंशावतार है. अतैव यह सिद्ध है–इस ब्राह्मण्ड रूपी कालपुरूष में सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहों की विभिन्न गतिविधियों एवं क्रिया-कलापों में जो नियम काम करते है, ठीक वे ही नियम प्राणी मात्र के शरीर में स्थित इस सौरमंडल की ईकाई का संचालन करते हैं.
यदि हम प्राणी या पदार्थ की आन्तरिक संरचना के आधार पर ध्यान दें, तो इस सिद्धान्त को बहुत अच्छे से समझ सकते हैं. इस बात को तो हर व्यक्ति जानता है कि प्रत्येक प्राणी या पदार्थ की सूक्ष्म तथा प्राथमिक संरचना का आधार परमाणु है और इन परमाणुओं की ईंटों को जोडकर प्राणी या पदार्थ का विशालतम भवन बनकर तैयार होता है. यह परमाणु भी आकार-प्रकार में हूबहू सौरजगत के समान ही होता है. इसके मध्य में एक घन विद्युत का बिन्दु होता है, जिसे केन्द्र कहते हैं. जिसका व्यास एक इंच के दस लाखवें भाग का भी दस लाखवां भाग होता है. परमाणु के जीवन का सार इसी केन्द्र में बसता है. इसी केन्द्र के चारों ओर अनेक सूक्ष्मातिसूक्ष्म विद्युतकण(Electrons) चक्कर लगाते रहते हैं और वे इस गतिविधि में हमारे सौरजगत के प्रत्येक क्रिया-कलाप का अनुकरण करते रहते हैं. इस प्रकार के अनन्त परमाणुओं—–जिन्हे शरीर विज्ञान की भाषा में कोशिकायें या Cells कहते हैं, के समाहार का एकत्र स्वरूप हमारा ये शरीर है.
हमारे शरीर के सैल्स “Law of Affinity” के नियम के अनुसार दलबद्ध होकर शरीर के टिश्यूज (Tisues) और उनके द्वारा अंग बनाते हैं. जिनके परस्पर मिलने से हमारा स्थूल शरीर बन जाता है. इस प्रकार जब हमारा शरीर एवं शरीर के अवयव उन कोशिकाओं से बने हैं, जो सौरजगत के क्रियाकलापों का अनुकरण करते हैं, तो यह अनायास ही समझ में आ जाता है कि इन कोशिकाओं द्वारा बना हमारा शरीर भी ब्राह्मण्ड की गतिविधियों का अनुकरण करता है.
अब ये तथ्य तो पूर्णरूपेण सिद्ध हो चुका है कि हमारी इस अनन्त ब्राह्मण्ड से घनिष्ठता है. और इस विषय में मेरा ये मानना है कि यदि विज्ञान अपने अनुसन्धान का क्षेत्र सुदूर ग्रह-नक्षत्रों की अपेक्षा इस शरीर को बनाए तो इसकी संरचना को जान,समझकर सम्पूर्ण ब्राह्मण्ड के अज्ञात रहस्यों से पर्दा उठाया जा सकता है. लेकिन उसके लिए आवश्यकता है पूर्ण अनासक्ति भाव की…….क्योंकि अनासक्ति के बिना न तो पूर्वाग्रह नष्ट होता है और न ही तटस्थरूप से अवलोकन किया जा सकता है. इसलिए ऎसी अनासक्ति के बिना अज्ञात क्षेत्र की खोज करना और फिर यथार्थ परिणाम निकाल लेना कहाँ सम्भव है. यह भाव तो सिर्फ उन भारतीय महर्षियों के ही पास था, जो बिना किसी साधन के ही काल के अभेद रहस्यों को जान लिया करते थे. क्या आज के विज्ञानवेताओं के पास अनासक्ति का यह गुण है ?

>अक्सर अपने दैनिक जीवन में प्राय: हम एक कहावत विभिन्न अर्थों में सुनते हैं कि “नेकी कर दरिया में डाल” या नेकी करो और भूल जाओ. कभी-कभी अच्छे शब्दों में भी सुनते हैं, कि हम किसी के लिए कितना ही अच्छा क्यों न करें लेकिन बदले में हमेशा बुराई ही हाथ लगती है.
एक व्यक्ति किसी गरीब को भोजन कराता है, तो खाने वाला बीमार पड जाता है. किसी नें किसी को धन उधार दिया तो उसकी वसूली के समय देनदार नें कोई गलत कदम उठा लिया और बेचारा लेनदार बिना वजह मुसीबत में फँस गया. किसी की मदद करने चले तो उल्टा स्वयं ही अपने लिए मुसीबत मोल ले बैठे. अमूमन ऎसी सैकडों प्रकार की घटनायें आये दिन किसी न किसी प्रकार से किसी न किसी के साथ घटती ही रहती हैं.
दरअसल यह सब निर्भर करता है हमारी जन्मकुँडली में बैठे ग्रहों पर, जो यह संकेत करते हैं कि किस वस्तु का दान या त्याग करना अथवा कौन से कार्य हमारे लिए लाभदायक होगें और कौन सी चीजों के दान/त्याग अथवा कार्यों से हमें हानि का सामना करना पडेगा. इसकी जानकारी निम्नानुसार है.
जो ग्रह जन्मकुंडली में उच्च राशि या अपनी स्वयं की राशि में स्थित हों, उनसे सम्बन्धित वस्तुओं का दान व्यक्ति को कभी भूलकर भी नहीं करना चाहिए.
सूर्य मेष राशि में होने पर उच्च तथा सिँह राशि में होने पर अपनी स्वराशि का होता है. अत: आपकी जन्मकुंडली में उक्त किसी राशि में हो तो:-
* लाल या गुलाबी रंग के पदार्थों का दान न करें.
* गुड, आटा, गेहूँ, ताँबा आदि किसी को न दें.
* खानपान में नमक का सेवन कम करें. मीठे पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए.
चन्द्र वृष राशि में उच्च तथा कर्क राशि में स्वगृही होता है. यदि आपकी जन्मकुंडली में ऎसी स्थिति में हो तो :-
* दूध, चावल, चाँदी, मोती एवं अन्य जलीय पदार्थों का दान कभी नहीं करें.
* माता अथवा मातातुल्य किसी स्त्री का कभी भूल से भी दिल न दुखायें अन्यथा मानसिक तनाव, अनिद्रा एवं किसी मिथ्या आरोप का भाजन बनना पडेगा.
* किसी नल, टयूबवेल, कुआँ, तालाब अथवा प्याऊ निर्माण में कभी आर्थिक रूप से सहयोग न करें.
मंगल मेष या वृश्चिक राशि में हो तो स्वराशि का तथा मकर राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में:–
* मसूर की दाल, मिष्ठान अथवा अन्य किसी मीठे खाद्य पदार्थ का दान नहीं करना चाहिए.
* घर आये किसी मेहमान को कभी सौंफ खाने को न दें अन्यथा वह व्यक्ति कभी किसी अवसर पर आपके खिलाफ ही कडुवे वचनों का प्रयोग करेगा.
* किसी भी प्रकार का बासी भोजन( अधिक समय पूर्व पकाया हुआ) न तो स्वयं खायें और न ही किसी अन्य को खाने के लिए दें.
बुध मिथुन राशि में तो स्वगृही तथा कन्या राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. यदि आपकी जन्मपत्रिका में बुध उपरोक्त वर्णित किसी स्थिति में है तो :–
* हरे रंग के पदार्थ और वस्तुओं का दान नहीं करना चाहिए.
* साबुत मूँग, पैन-पैन्सिल, पुस्तकें, मिट्टी का घडा, मशरूम आदि का दान न करें अन्यथा सदैव रोजगार और धन सम्बन्धी समस्यायें बनी रहेंगी.
* न तो घर में मछलियाँ पालें और न ही मछलियों को कभी दाना डालें.
बृहस्पति जब धनु या मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा कर्क राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में :–
* पीले रंग के पदार्थों का दान वर्जित है.
* सोना, पीतल, केसर, धार्मिक साहित्य या वस्तुएं आदि का दान नहीं करना चाहिए. अन्यथा “घर का जोगी जोगडा, आन गाँव का सिद्ध” जैसी हालात होने लगेगी अर्थात मान-सम्मान में कमी रहेगी.
* घर में कभी कोई लतादार पौधा न लगायें.
शुक्र जब जन्मपत्रिका में वृष या तुला राशि में हो स्वराशि तथा मीन राशि में हो तो उच्च भाव का होता है. अत ऎसी स्थिति में:–
* ऎसे व्यक्ति को श्वेत रंग के सुगन्धित पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए अन्यथा व्यक्ति के भौतिक सुखों में न्यूनता पैदा होने लगती है.
* नवीन वस्त्र, फैशनेबल वस्तुएं, कास्मेटिक या अन्य सौन्दर्य वर्धक सामग्री, सुगन्धित द्रव्य, दही, मिश्री, मक्खन, शुद्ध घी, इलायची आदि का दान न करें अन्यथा अकस्मात हानि का सामना करना पडता है.
शनि यदि मकर या कुम्भ राशि में हो तो स्वगृही होता है तथा तुलाराशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी दशा में :–
* काले रंग के पदार्थों का दान न करें.
* लोहा, लकडी और फर्नीचर, तेल या तैलीय सामग्री, बिल्डिंग मैटीरियल आदि का दान/त्याग न करें.
* भैंस अथवा काले रंग की गाय, काला कुत्ता आदि न पालें.
राहु यदि कन्या राशि में हो तो स्वराशि का तथा वृष(ब्राह्मण/वैश्य लग्न में) एवं मिथुन(क्षत्रिय/शूद्र लग्न में) राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में:–
* नीले, भूरे रंग के पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए.
* मोरपंख, नीले वस्त्र, कोयला, जौं अथवा जौं से निर्मित पदार्थ आदि का दान किसी को न करें अन्यथा ऋण का भार चढने लगेगा.
* अन्न का कभी भूल से भी अनादर न करें और न ही भोजन करने के पश्चात थाली में झूठन छोडें.
केतु यदि मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा वृश्चिक(ब्राह्मण/वैश्य लग्न में) एवं धनु (क्षत्रिय/शूद्र लग्न में) राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. यदि आपकी जन्मपत्रिका में केतु उपरोक्त स्थिति में है तो :–
* घर में कभी पक्षी न पालें अन्यथा धन व्यर्थ के कामों में बर्बाद होता रहेगा.
* भूरे, चित्र-विचित्र रंग के वस्त्र, कम्बल, तिल या तिल से निर्मित पदार्थ आदि का दान नहीं करना चाहिए.
* नंगी आँखों से कभी सूर्य/चन्द्रग्रहण न देंखें अन्यथा नेत्र ज्योति मंद पड जाएगी अथवा अन्य किसी प्रकार का नेत्र सम्बन्धी विकार उत्पन होने लगेगा

>भारतीय वास्तु शास्त्र तथा इसके विज्ञान आधारित मूल नियम—–

आधुनिक युग में, आज वास्तु शास्त्र वैज्ञानिकता के आधार पर एक नया मोड ले चुका है, क्यों कि पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध नें मानव जाति को कुछ अधिक ही प्रभावित किया है, जिससे कि अपनी मूलभूत धरोहर प्राचीन ज्ञान को आज हम विज्ञान(साईंस) के नाम से संबोधित करने लगे हैं. किन्तु जब प्राचीन वास्तु ज्ञान का आज के विज्ञान नें अनुसंधान किया तो पाया कि कभी प्राचीन वास्तु कला के जो नियम निहित किए गए थे, वें निश्चित ही मानव जीवन की दृ्ष्टि से बेहद उपयोगी थे.

(वास्तु-पुरूष)—-

भारत भूमी के प्राचीन ऋषि तत्वज्ञानी थे और उनके द्वारा इस कला को तत्व ज्ञान से ही प्रतिपादित किया गया था. आज के युग में विज्ञान नें भी स्वीकार किया है कि सूर्य की महता का विशेष प्रतिपादन सत्य है, क्योंकि ये सिद्ध हो चुका है कि सूर्य महाप्राण जब शरीर क्षेत्र में अवतीर्ण होता है तो आरोग्य, आयुष्य, तेज, ओज, बल, उत्साह, स्फूर्ति, पुरूषार्थ और विभिन्न महानता मानव में परिणत होने लगती है. आज भी वैज्ञानिक मानते हैं कि सूर्य की अल्ट्रावायलेट रश्मियों में विटामिन डी प्रचूर मात्रा में पाया जाता है, जिनके प्रभाव से मानव जीवों तथा पेड-पौधों में उर्जा का विकास होता है.
इस प्रभाव का मानव के शारीरिक एवं मानसिक दृ्ष्टि से अनेक लाभ हैं. मध्यांह एवं सूर्यास्त के समय उसकी किरणों में रेडियोधर्मिता अधिक होती है, जो मानव शरीर, उसके स्वास्थय पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं. अत: आज भी वास्तु विज्ञान में भवन निर्माण के तहत, पूर्व दिशा को सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है. जिससे सूर्य की प्रात:कालीन किरणें भवन के अन्दर अधिक से अधिक मात्रा में प्रवेश कर सकें और उसमें रहने वाला मानव स्वास्थय तथा मानसिक दृष्टिकोण से उन्नत रहे.

वास्तु नियम के अनुसार पूर्व एवं उत्तर दिशा में अधिक से अधिक दरवाजें, खिडकियाँ रखी जानी चाहिए. ये भाग अधिक खुले होने से हवा और रोशनी अधिक मात्रा में प्रवेश करती है. प्रवेश करने वाली हवा दक्षिण-पश्चिम के कम दरवाजों-खिडकियों से धीरे धीरे बाहर निकलती है, जिससे कि भवन का वातावरण स्वच्छ, साफ एवं प्रदूषण मुक्त होता है.

वास्तु नियम में यह भी प्रतिपादित किया गया है कि दक्षिण-पश्चिम भाग हमेशा ऊँचा होना चाहिए एवं दीवारें मोटी बनानी चाहिए. साथ ही इस दिशा में सीढी इत्यादि का भार दिया जाना चाहिए. इसका उदेश्य है कि पृ्थ्वी जब सूर्य की परिक्रमा दक्षिण दिशा में करती है, तो सूर्य एक विशेष कोणीय स्थिति में होता है. अत: इस क्षेत्र में अधिक भार से संतुलन बना रहता है तथा ऊँची तथा मोटी दीवारें अधिक उष्मा से रक्षा करती हैं. इससे भवन में गर्मी में शीतलता एवं सर्दियों में उष्णता का अनुभव मिलता है.
इसी प्रकार वास्तु नियम में दक्षिण-पूर्वीय (आग्नेय) कोण में ‘अग्नेय उर्जा’—रसोई बनाने का प्रावधान किया गया, क्यों कि इस क्षेत्र में पूर्व से प्रात:कालीन ताजगी से भरी हवा एवं सूर्य रश्मियों का प्रवेश होता है, जिससे कि रसोई में रखे पदार्थ अधिक समय तक शुद्ध एवं ताजे बने रहें.

उत्तर क्षेत्र में विज्ञान अनुसार, पृ्थ्वी में चुंबकीय उर्जा सघन मात्रा में रहती है. इससे इस क्षेत्र को सबसे पवित्र माना है और इसी कारण पूजा स्थल, साधनास्थली का निर्माण इस स्थान में उचित कहा गया है.
वास्तु नियम में उत्तर-पूर्वी भाग में दैनिक उपभोग में आने वाले जल के स्त्रोत को बनाने का विधान निहित है. विज्ञान की भी इसके पीछे ये मान्यता है कि उससे वह प्रदूषण मुक्त हो जाता है और शुद्ध रहता है. वैज्ञानिक युग में इस सिद्धान्त को इलैक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम सिद्धान्त से प्रतिपादित किया गया.

दक्षिण दिशा में सिरहाना करने का महत्व प्रतिपादित है, जिसका मूल कारण पृ्थ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में पडने वाला प्रभाव है, क्यों कि सर्वविदित है कि चुम्बकीय प्रभाव उत्तर से दक्षिण की ओर रहता है. मानवीय जैव चुम्बकत्व भी सिर से पैर की ओर होता है. अत: सिर को उतरायण एवं पैरों को दक्षिणायण कहा गया है. यदि सिर उत्तर दिशा में रखा जाए तो पृ्थ्वी का उत्तरी ध्रुव मानव सिर के ध्रुव चुम्बकीय प्रभाव को अस्वीकार करेगा. इससे शरीर के रक्त संचार के लिए अनुकूल चुम्बकीय लाभ नहीं होगा.

इसको आधुनिक मस्तिष्क वैज्ञानिकों नें भी माना है कि मस्तिष्कीय क्रिया क्षमता का मूलभूत स्त्रोत अल्फा तरंगों का पृ्थ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन का संबंध आकाशीय पिंडों से है और यही वजह है कि वास्तु कला शास्त्र हो या ज्योतिष शास्त्र, सभी अपने अपने ढंग से सूर्य से मानवीय सूत्र सम्बंधों की व्याख्या प्रतिपादित करते हैं. अत: वास्तु के नियमों को, भारतीय भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रख कर, भूपंचात्मक तत्वों के ज्ञान से प्रतिपादित किया गया है. इसके नियमों में विज्ञान के समस्त पहलुओं का ध्यान रखा गया है, जिनसे सूर्य उर्जा, वायु, चन्द्रमा एवं अन्य ग्रहों का पृ्थ्वी पर प्रभाव प्रमुख है तथा उर्जा का सदुपयोग, वायु मंडल में व्याप्त सूक्ष्म से सूक्ष्म शक्तियों का आंकलन कर, उन्हे इस वास्तु शास्त्र के नियमों में निहित किया गया है.

>विवाह पूर्व जन्मकुंडली मिलान…(चन्द आवश्यक बातें)—

भावी दम्पति का वैवाहिक जीवन वैचारेक्य, सुख समृ्द्धि एवं वंशवृ्द्धि से परिपूर्ण हो. इसके लिए हिन्दु वैवाहिक परम्परा एवं मान्यता के अनुसार वर-कन्या की जन्मकुंडली का सम्यक मिलान किया जाता है. जिसके आधार पर यह निर्धारित तथा सुनिश्चित किया जाता है कि विवाहोपरांत दम्पति के मध्य मैत्री, सामंजस्य तथा सुख-समृ्द्धि की कैसी स्थिति रहेगी. विवाह से पूर्व, जन्मपत्रिका मिलान द्वारा भावी वैवाहिक जीवन का आंकलन करना तो अपने आप में एक दुष्कर ज्योतिषीय प्रक्रिया है. उस प्रक्रिया के बारे में यहाँ लिखने का तो कोई औचित्य ही नहीं…
इस पोस्ट में तो मिलान सम्बंधी एक दो बातों पर प्रकाश डालना ही हमारा उदेश्य है. इस बात को तो ज्योतिष की नाममात्र जानकारी रखने वाला व्यक्ति भी जानता है कि फलित ज्योतिष में प्रमुखत: जन्मलग्न की ही प्रधानता होती है.लेकिन विवाह हेतु संभावित वर-वधू की जन्मकुंडली मिलान करते समय जन्मराशी ही मेलापक का मूल आधार बनती है.जन्मकालीन चन्द्रमा की नक्षत्र स्थिति के आधार पर मेलापक सम्बंधी निर्णय लिए जाते हैं.

लेकिन आजकल ऎसा भी बहुत देखने में आता है कि जहाँ पर वर-कन्या की जन्मकुंडलियाँ सुलभ नहीं होती अथवा कहें कि जन्मविवरण (जन्मतिथि/समय/स्थान) के अभाव में जन्मपत्रिका का निर्माण संभव नहीं है तो वहाँ पर, ज्योतिषी द्वारा प्रचलित नाम के प्रथम अक्षर को आधार मानकर जन्मनक्षत्र का निर्धारण करके मिलान का निर्णय ले लिया जाता है. वास्तव में यह एक पूरी तरह से कामचलाऊ आधार है,जिसके लिए यदि साधारण भाषा मे “जुगाड” शब्द का प्रयोग किया जाए तो शायद ज्यादा सही रहेगा. क्यों कि इसे किसी भी तरीके से न तो शास्त्र सम्मत कहा जा सकता है और न ही तर्कसम्मत. मेरा अपना निजी मत तो ये है कि अगर वर-कन्या की जन्मपत्रिका नहीं है या उनमें से किसी का जन्मविवरण उपलब्ध नहीं है तो फिर इस प्रकार ऊलजलूल अतार्किक तरीके अपनाकर मिलान का स्वांग रचने से तो कहीं बेहतर है कि विवाह बिना मिलान किए ही कर लेना चाहिए……

इस प्रकार के तरीके अपनाकर किसी को भ्रमित कर धन कमाने वाले ज्योतिषियों द्वारा इस विद्या के व्यापारिक दुरूपयोग के चलते ही ज्योतिष की विश्वसीनता पर बारबार प्रश्नचिन्ह खडे किए जाते रहे हैं.

दूसरी बात, वो ये कि आजकल जन्मकुंडली मिलान वगैरह के लिए भी कम्पयूटर का ही सहारा लिया जाने लगा है. खैर इसमें कोई बुराई नहीं बल्कि ये तो अच्छी बात है क्यों कि कम्पयूटर के इस्तेमाल से गलती की कैसी भी कोई संभावना नहीं रहती…… परन्तु अन्तिम निर्णय तो विद्वान ज्योतिषी को ही करना होता है. कम्पयूटर का कार्य है सिर्फ गणित(Calculations) करना. जन्मकुंडली देखना, उसके बारे में अन्तिम रूप से सारांशत: व्यक्तिगत रूचि लेकर किसी निर्णय पर पहुँचने का कार्य ज्योतिष के ज्ञाता का है. कम्पयूटर मानव कार्यों का एक सर्वोतम सहायक जरूर है, मानव नहीं…..इसलिए कम्पयूटर का उपयोग करें तो सिर्फ जन्मकुंडली निर्माण हेतु….न कि कम्पयूटर द्वारा दर्शाई गई गुण मिलान संख्या को आधार मानकर कोई अंतिम निर्णय लिया जाए….

Posted by: vastushastri08 | मार्च 26, 2011

>क्यों हैं गणपति अग्र पूज्य ?

>क्यों हैं गणपति अग्र पूज्य ?

प्राचीन समय का प्रत्येक शास्त्र,प्रत्येक मन्त्र,विश्वास,ग्रन्थ या महावाक्य किसलिए महत्वपूर्ण है ओर किस तत्व को पाकर वह शक्तिशाली बना है? इस प्रश्न का उत्तर यही है कि उस शास्त्र,ग्रन्थ या विश्वास की अन्त:कुक्षी में सत्य का कोई न कोई बीज मन्त्र छिपा है.ये समूचा संसार वृ्क्ष सत्य का ही दूसरा रूप है,जिसके प्रत्येक पत्ते पर आपको सत्य के बीजमन्त्र लिखे मिलेंगें.जिस ग्रन्थ,शास्त्र,कथा-कहानी या किसी परम्परा में उस सत्य की शक्ति विद्यमान है,जो उसकी व्याख्या करने में सक्षम है—वही मानव समाज के लिए उपयोगी है.आज अगर खोज की जाए तो आप पाएंगें कि भारतीय संस्कृ्ति,शास्त्रों,परम्पराओं और विश्वासों के मूल में ऎसे सत्य छुपे हैं—जो काल के क्रूर पंजों से बचे आज भी उतने ही नित्य-नवीन और अमृ्त तुल्य सृ्जन शक्ति से भरपूर हैं.

दरअसल, हमारे शास्त्र पुराण ऎसी असंख्यों कथा-कहानियों से भरे हुए हैं, जो ऊपर से बेहद सरल, साधारण बल्कि यूं कहें कि कपोल कल्पित सी प्रतीत होती हैं; पर जिनका अर्थ बहुत ही गूढ रहता है और जो अमर सत्यों की प्रतीक हैं.वैदिक कथाओं में छिपे रूपकों को समझने के दृ्ष्टिकोण से आज हम गणेश जी के जन्म की कथा पर बात करते हैं .

ॐ गं गणपतये नम:
गणेश जी के जन्म की कथा से तो हर कोई भली भान्ती परिचित ही है, जिसमें कहा गया है कि “देवी पार्वती जी ने स्नान करके स्वच्छ होते समय जो अपने शरीर के मैल से एक पुतला बनाकर खडा कर दिया और उसमें प्राण डाल दिए. उस पुतले नें भगवान शिव को अन्त:पुर में प्रवेश करने से रोका और शिव जी ने उसका सिर काट लिया, फिर दूसरा सिर उसके स्थान पर लगा दिया”

अब जहाँ एक आम साधारण व्यक्ति, जिसने कि मुश्किल से जीवन में महज दो चार ग्रन्थों के नाम भर सुने होते है, वो भला इन कथाओं में निहित रहस्यों को कहाँ से समझेगा. उसके लिए तो गणपति हकीकत में शरीर के मैल से ही उत्पन हुए होंगें. वो बेचारा इन कथाओं को सुनता है, पढता भी है तो सिर्फ श्रद्धावश. उसमें सिर्फ और सिर्फ उसकी आस्था जुडी होती है, बिना किसी अर्थ को जाने——लेकिन कोई अन्य धर्मावलम्बी या फिर ऎसा व्यक्ति जो कि नास्तिक विचारधारा का होने के चलते श्रद्धा से भी पूरी तरह से शून्य है, वो तो झट से कह देगा कि “हिन्दू धर्म में तो यूँ ही फालतू की अगडम-बगडम सी गप्पें हाँकी हुई हैं”. लेकिन इन रूपकों की भाषा समझे बिना उसका मर्म भला कहाँ जाना जा सकता है.

यहाँ इस कथा प्रसंग में जो पार्वती है—-वो उस आत्मा की प्रतीक हैं, जो अगणित जन्मों और युगों के प्रयत्न और अनुभवों के पश्चात ईश्वर तक पहुँचती है. उसका मैल वह तत्व (Matter) है, जिससे सृ्ष्टि का वह अंग बना है, जिसे प्रकृ्ति कहते हैं तथा जिसके प्रभाव में पहले वह आत्मा फं,सी थी, और जिससे जब वह ऊपर उठी तब परमब्रह्म तक पहुँच सकी. जो पुतला केवल उस मैल—स्थूल, वासनामय व मनोमय ( Physical, Astral and Mental Matter) का बना हुआ है, उसमें आगे विकास की कोई सम्भावना नहीं. ईश्वर के ज्ञान के समावेश का वहाँ मार्ग ही नहीं, उसके लिए वहाँ रोक है. मैल का सिर हटता है, बुद्धि का सिर जुडता है, तब बुद्धि के द्वारा उस ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बनता है. वही कहा गया है कि शिव (पूर्ण ब्रह्म) नें प्रवेश होने में रोक पाकर, मैल के मस्तक के स्थान पर बुद्धि का मस्तक लगा दिया, जिससे विकास (evolution) का द्वार खुल गया.

दैवी विकास-योजना ( Law of evalution) का क्रम है कि प्राकृ्तिक तत्वों में होकर आत्मा बुद्धि द्वारा माया से ऊपर उठे और अपने रूप (ब्रह्म) को जाने. इसलिए गणपति जन्म की ये कथा दैवी विकास-योजना के क्रम की, एवं सृ्ष्टि के कारण की कथा है—गूढतम ज्ञान तथा सत्य का दर्पण है. गणपति उस दैवी योजना के प्रतीक हैं—इसलिए अग्र पूज्य हैं,.अन्य देवता उनके पीछे हैं, क्योंकि वे इस विकास-योजना के क्रम में केवल सहायक हैं.

>वास्तु के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य एवं बिना तोडफोड के दोष निवारण—-

आज के जमाने में वास्तु शास्त्र के आधार पर स्वयं भवन का निर्माण करना बेशक आसान व सरल लगता हो, लेकिन पूर्व निर्मित भवन में बिना किसी तोड फोड किए वास्तु सिद्धान्तों को लागू करना जहाँ बेहद मुश्किल हैं, वहाँ वह प्रयोगात्मक भी नहीं लगता. अब व्यक्ति सोचता है कि अगर भवन में किसी प्रकार का वास्तु दोष है, लेकिन उस निर्माण को तोडना आर्थिक अथवा अन्य किसी दृ्ष्टिकोण से संभव भी नहीं है, तो उस समय कौन से ऎसे उपाय किए जाएं कि उसे वास्तुदोष जनित कष्टों से मुक्ति मिल सके. आज की इस पोस्ट में प्रस्तुत हैं कुछ ऎसे उपाय, जिन्हे अपनाकर आप किसी भी प्रकार के वास्तुजनित दोषों से बहुत हद तक बचाव कर सकते हैं.

* 4 X 4 इन्च का ताम्र धातु में निर्मित वास्तु दोष निवारण यन्त्र भवन के मुख्य द्वार पर लगाना चाहिए.
* भवन के मुख्य द्वार के ऊपर की दीवार पर बीच में गणेश जी की प्रतिमा, अन्दर और बाहर की तरफ, एक जगह पर आगे-पीछे लगाएं.
*वास्तु के अनुसार सुबह पूजा-स्थल (ईशान कोण) में श्री सूक्त, पुरूष सूक्त एवं संध्या समय श्री हनुमान चालीसा का नित्यप्रति पठन करने से भी शांति प्राप्त होती है.
*यदि भवन में जल का बहाव गलत दिशा में हो, या पानी की सप्लाई ठीक दिशा में नहीं है, तो उत्तर-पूर्व में कोई फाऊन्टेन (फौव्वारा) इत्यादि लगाएं. इससे भवन में जल संबंधी दोष दूर हो जाएगा.
* टी. वी. एंटीना/ डिश वगैरह ईशान या पूर्व की ओर न लगाकर नैऋत्य कोण में लगाएं, अगर भवन का कोई भाग ईशान से ऊँचा है, तो उसका भी दोष निवारण हो जाएगा.
* भवन या व्यापारिक संस्थान में कभी भी ग्रेनाईट पत्थर का उपयोग न करें. ग्रेनाईट चुम्बकीय प्रभाव में व्यवधान उत्पन कर नकारात्मक उर्जा का संचार करता है.
* भूखंड के ब्रह्म स्थल (केन्द्र स्थान) में ताम्र धातु निर्मित एक पिरामिड दबाएं .
* जब भी जल का सेवन करें, सदैव अपना मुख उत्तर-पूर्व की दिशा की ओर ही रखें.
* भोजन करते समय, थाली दक्षिण-पूर्व की ओर रखें और पूर्व की ओर मुख कर के ही भोजन करें.
* दक्षिण-पश्चिम कोण में दक्षिण की ओर सिराहना कर के सोने से नींद गहरी और अच्छी आती है. यदि दक्षिण की ओर सिर करना संभव न हो तो पूर्व दिशा की ओर भी कर सकते हैं.
* यदि भवन की उत्तर-पूर्व दिशा का फर्श दक्षिण-पश्चिम में बने फर्श से ऊँचा हो तो दक्षिण-पश्चिम में फ़र्श को ऊँचा करें.यदि ऎसा करना संभव न हो तो पश्चिम दिशा के कोणे में एक छोटा सा चबूतरा टाईप का बना सकते हैं.
* दक्षिण-पश्चिम दिशा में अधिक दरवाजे, खिडकियाँ हों तो, उन्हे बन्द कर के, उनकी संख्या को कम कर दें.
* भवन के दक्षिण-पश्चिम कोने में सफेद/क्रीम रंग के फूलदान में पीले रंग के फूल रखने से पारिवारिक सदस्यों के वैचारिक मतभेद दूर होकर आपसी सौहार्द में वृ्द्धि होती है.
* श्यनकक्ष में कभी भी दर्पण न लगाएं. यदि लगाना ही चाहते हैं तो इस प्रकार लगाएं कि आप उसमें प्रतिबिम्बित न हों, अन्यथा प्रत्येक दूसरे वर्ष किसी गंभीर रोग से कष्ट का सामना करने को तैयार रहें.
* भवन की दक्षिण अथवा दक्षिण-पूर्व दिशा(आग्नेय कोण) में किसी प्रकार का वास्तुदोष हो तो उसकी निवृ्ति के लिए उस दिशा में ताम्र धातु का अग्निहोत्र(हवनकुण्ड) अथवा उस दिशा की दीवार पर लाल रंग से अग्निहोत्र का चित्र बनवाएं.
* सीढियाँ सदैव दक्षिणावर्त अर्थात उनका घुमाव बाएं से दाएं की ओर यानि घडी चलने की दिशा में होना चाहिए. वामावर्त यानि बाएं को घुमावदार सीढियाँ जीवन में अवनति की सूचक हैं. इससे बचने के लिए आप सीढियों के सामने की दीवार पर एक बडा सा दर्पण लगा सकते हैं, जिसमें सीढियों की प्रतिच्छाया दर्पण में पडती रहे.
* भवन में प्रवेश करते समय सामने की तरफ शौचालय अथवा रसोईघर नहीं होना चाहिए. यदि शौचालय है तो उसका दरवाजा सदैव बन्द रखें और दरवाजे पर एक दर्पण लगा दें. यदि द्वार के सामने रसोई है तो उसके दरवाजे के बाहर अपने इष्टदेव अथवा ॐ की कोई तस्वीर लगा दें.
* आपके भवन में जो जल के स्त्रोत्र हैं, जैसे नलकूप, हौज इत्यादि, तो उसके पास गमले में एक तुलसी का पौधा अवश्य लगाएं.
* अकस्मात धन हानि, खर्चों की अधिकता, धन का संचय न हो पाना इत्यादि परेशानियों से बचने के लिए घर के अन्दर अल्मारी एवं तिजोरी इस स्थिति में रखनी चाहिए कि उसके कपाट उत्तर अथवा पूर्व दिशा की तरफ खुलें.
* भवन का मुख्यद्वार यथासंभव लाल, गुलाबी अथवा सफेद रंग का रखें.
* दक्षिण-पश्चिम दिशा में अधिक भार, या सामान रखें. इस कोण की भार वहन क्षमता अधिक होती है.
* जिस घर की स्त्रियाँ अधिक बीमार रहती हों, तो उस घर के मुख्य द्वार के पास ऊपर चढती हुई बेल लगानी चाहिए. इससे परिवार के स्त्री वर्ग को शारीरिक-मानसिक व्याधियों से छुटकारा मिलता है.
* रसोई यदि गलत दिशा में बनी है, और उसे आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व दिशा) में बनाना संभव न हो तो, गैस सिलेंडर अवश्य रसोई के दक्षिण पूर्व में रखें. रसोई को कभी भी स्टोर न बनाए, अन्यथा गृ्हस्वामिनी को तनाव, परिवार में किसी न किसी सद्स्य को रक्तचाप,मधुमेह, नेत्र पीडा अथवा पेट में गैस इत्यादि की कोई न कोई समस्या लगी रहेंगीं.
* ध्यान रहे कि कभी भी अध्ययन स्थल के पीछे दरवाजा या खिडकी आदि नहीं होनी चाहिए; यदि है, तो मन अशांत रहता है, क्रोध एवं आक्रोश का सृ्जन होता है,जिससे कि सफलता पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है. जब कि भवन की उत्तर-पूर्व दिशा अथवा संभव न हो तो अध्ययन स्थल के उत्तर-पूर्व में बैठकर पढने से सफलता अनुगामी बन पीछे पीछे चलने लगती है.
* एक बात बताना चाहूँगा, जो कि योग शास्त्र से संबंध रखती है, लेकिन किसी भी अध्ययनकर्ता के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. वो ये कि अध्ययन करते सदैव आपकी इडा नाडी अर्थात बायाँ स्वर चल रहा होना चाहिए. इससे मस्तिष्क की एकाग्रता बनी रहकर किया गया अध्ययन मस्तिष्क में बहुत देर काल तक संचित रहता है. स्मरणशक्ति में वृ्द्धि होती है. अन्यथा यदि कहीं पिंगला नाडी अर्थात दाहिना स्वर चलता हो तो फिर वही होगा कि “आगा दौड पीछा छोड”. इधर आपने याद किया और उधर दिमाग से निकल गया. यानि मन की एकाग्रता और स्मरणशक्ति की हानि……
इन उपरोक्त उपायों को आप अपनी दृ्ड इच्छा शक्ति व सकारात्मक सोच एवं दैव कृ्पा का विलय कर करें, तो यह नितांत सत्य है कि इनसे आप अपने भवन से अधिकांश वास्तुजन्य दोषों को दूर कर कईं प्रकार की समस्याओं से मुक्ति प्राप्त कर सकेंगें…….

>किसी मन्त्र जाप,उपासना अथवा कर्मकांड इत्यादि का हमे सही लाभ क्यों नहीं प्राप्त होता ?

ऎसी स्थिति स्वभावत: किसी के भी मन को असमंजस में डाल देती है कि मन्त्र-तन्त्र, कर्मकांड,भक्ति,पूजा-उपासना इत्यादि की एक जैसी ही प्रक्रिया का अवलम्बन करने पर भी एक व्यक्ति को तो लाभ हो जाता है, जब कि दूसरे किसी अन्य को कोई सफलता नहीं मिलती, ऎसा क्यों?। एक को सिद्धि, दूसरे के हाथ निराशा, ऎसा किसलिए?। वही देवता, वही मन्त्र, वही विधि—एक को सफलता ओर दूसरे को असफलता क्यूं?। यदि पूजा पाठ, उपासना,भक्ति, धर्म-कर्म अन्धविश्वास है तो फिर उससे कितने ही लोग लाभान्वित क्यों होते हैं?। यदि सही है तो फिर कितनों को निराशा ही क्यों हाथ लगती है?। जल हर किसी की प्यास बुझाता है, सूरज हरेक को रौशनी देता है फिर देवी-देवता ओर उनके उपासना कर्म में परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएं क्यों देखने को मिलती हैं? अक्सर ऎसे सवाल बहुत से लोगों के मन में आते हैं।
दरअसल बात ये है कि उपास्य देवता या मन्त्रों में जितनी अलौकिकता दृ्ष्टिगोचर होती है, उससे लाभान्वित हो सकने की पात्रता भी हम में होनी नितांत आवश्यक है। सिर्फ कर्मकांडों की लकीर पीट लेना इस संदर्भ में सर्वदा अप्रयाप्त है। तलवार की धार में सिर काट लेने की क्षमता है,लेकिन वह क्षमता उन्ही के लिए है, जिनकी भुजाओं में बल, ह्रदय में साहस ओर उसे चला सकने का बुद्धि कौशल हो। बिजली में सामर्थय की कमी नहीं लेकिन उससे लाभ लेने के लिए उसी प्रकार के यन्त्रों की भी आवश्यकता होती है। सही उपकरण के अभाव में बिजली का उपयोग व्यर्थ ही नहीं अपितु अनर्थमूलक भी बन जाता है।
स्वाति के जल से मोती सींपें ही लाभान्वित होती हैं। अमृ्त उसी को जीवन दे सकता है, जिसका मुँह खुला हुआ हो। प्रकाश का लाभ आँखों वाले ही उठा सकते हैं—अंधे के लिए प्रकाश होना न होना कोई मायने नहीं रखता। इन पात्रताओं के अभाव में स्वाति का जल, अमृ्त या प्रकाश चाहे कितना भी क्यों न हो, उससे कोई लाभ नहीं उठाया जा सकता। ठीक यही बात पूजा-पाठ, उपासना एवं मन्त्र इत्यादि के संबंध में भी लागू होती है। मंत्र जाप, स्त्रोत्र,चालीसा इत्यादि अथवा अन्य किन्ही विधि विधान का लाभ वे ही उठा सकते हैं, जिन्होने अपने व्यक्तित्व को भीतर ओर बाहर से विचार ओर आचार से परिष्कृ्त करना सीख लिया है। बीमारी में दवा का लाभ उन्हे ही मिलता है जो बताए हुए अनुपात ओर पथ्य का भी ठीक तरह प्रयोग करते हैं। अत: देव उपासना से पहले हमें आत्म उपासना सीखना बहुत आवश्यक है।
सर्वव्यापी ईश्वरीय सत्ता का एक सूक्ष्म प्रतिनिधि(देव अंश) हम सब के भीतर मौजूद है। किसी व्यक्ति की अपनी निष्ठा,श्रद्धा,भावना ओर विश्वास के अनुरूप ही भीतर का वो देव अंश समर्थ बनता है या निर्बल होता है। उपासक की निष्ठा में गहनता और व्यक्तित्व में प्रखरता हो तो उसका इष्टदेवता समुचित पोषण पाकर अत्यन्त समर्थ दृ्ष्टिगोचर होगा ओर तभी उसकी आशाजनक सहायता करेगा। दूसरा उपासक आत्मिक विशेषताओं से रहित हो तो उसके अन्तरंग में अवस्थित देव अंश पोषण के अभाव में भूखा, रोगी, दुर्बल बनकर किसी कोने में पडा कराह रहा होगा। पूजा पाठ भी नकली दवा की भान्ती भावना रहित होने से उस देवता को परिपुष्ट न कर सकेगी ओर वह विधिवत मन्त्र जाप, चालीसा,स्त्रोत्र वगैरह का पाठ करने के पश्चात भी कोई लाभ नहीं ले पाएगा।
इस विराट ब्रह्म में जो कुछ दिव्य, महान, पवित्र, प्रखर है, उसका एक अंश हरेक व्यक्ति के भीतर विद्यमान है। जो चाहे उसे ठीक तरह से सँजोने-संभालनें में लग सकता है और उन मणि मुक्ताओं से अपने जीवन भंडार को भरापूरा रख सकता है।
हर किसी के मस्तिष्क में गणपति विद्यमान है, जो व्यक्ति बुद्धि विकास की साधना करके अपने गणपति को परिपुष्ट बना लेगा, वो विद्वान बनकर अनेक विभूतियों के वरदान प्राप्त करेगा। जो अपने गणेश की जडों मे पानी नहीं देगा, उनके गणपति भगवान सूखे लाचार अवस्था में एक कोने में पडे होंगें। लड्डू, खीर खिलाने या स्त्रोत्र,चालीसा का पाठ करने पर भी कोई सहायता न कर सकेंगें। बुद्धिमान और विद्वान बन सकना सम्भव ही नहीं हो सकेगा।
हर किसी की भुजाओं में हनुमान का निवास है। व्यायाम करने वाले संयमी, ब्रह्मचारी लोग ही बजरंगबली के भक्त प्रमाणित हो सकते हैं। पर जिसने अपने असंयमित और भ्रष्ट आचरण से हनुमान जी को पीडित प्रताडित करने में कोई कोर कसर नहीं छोडी । उसका सुबह शाम हनुमान चालीसा पढना भी कोई कारगर सिद्ध नहीं हो सकता। वो बल और आरोग्यता का वरदान अपने अन्दर के रूग्ण, जीर्ण-शीर्ण हनुमान से कैसे प्राप्त कर सकता हैं।
बहुत दिनों पहले की बात है कि एक परिचित सज्जन मेरे पास आए, जिनके आचरण संबंधी क्रियाकलापों से मै भली भान्ती परिचित था। मैं क्या बल्कि आधा शहर उनके कारनामों से परिचित है। सच कहूँ तो एक नम्बर के लम्पट, रसिक मिजाज आदमी जिनके न जाने कितनी स्त्रियों के संग तो अनैतिक संम्बंध होंगें। मैने उनकी जन्मपत्रिका देखी तो उनके विगत जीवन में घटित हुई दो एक घटनाओं का उल्लेख करके उनकी वर्तमान समस्या के बारें बता दिया तो लगे चरण पकडने। बोले कि “शर्मा जी, मैंने तो आज से आपको अपना गुरू मान लिया। जीवन में आप मुझे पहले ऎसे इन्सान मिले हैं जिसने कि मुझे इतना अधिक प्रभावित किया हो”। मेरे मन में पता नहीं क्या विचार आया कि मैं उनसे पूछ बैठा कि आपके आराध्यदेव कौन हैं यानि की आप किस देवता की उपासना करते हैं। झट से बोल पडे कि मैं तो श्रीरामशरणम को मानने वाला हूँ। भगवान राम मेरे आराध्यदेव हैं, चाहे कुछ भी हो जाए मैं सुबह शाम दोनों समय श्रीराम अमृ्तवाणी का पाठ करना नहीं भूलता। सुनते ही मेरी हँसी छुटी कि क्या बताऊँ—-मैने उसके आगे हाथ जोड दिए कि भाई तूं राम को मानने वाला है। वो राम जिन्हे मर्यादा पुरूषोतम कहा जाता है, जिन्होने जीवनभर एक पत्निव्रत धारण किए रखा। जब वो तेरे जीवन पर अपना कोई प्रभाव नहीं छोड पाए तो मेरी क्या बिसात कि मैं तुझे प्रभावित कर सकूँ। इसलिए तूं घर जा और ऎश कर। कहने का मतलब ये कि दुनिया में कैसे कैसे लोग भरे पडे हैं—जिनका सुधार शायद देवी देवता भी नहीं कर सकते।
दरअसल बात ये है कि बालबुद्धि, उतावले और अदूरदर्शी लोग ही उपासना, मन्त्र-तन्त्र इत्यादि को जादूगरी मानकर चलते हैं। उनकी कल्पना किन्ही ऎसे देवताओं की होती है जो कि स्तुति, जप,पूजा,उपासना,भोग,प्रशाद जैसे प्रलोभनों से बहलाए,फुसलाए जा सकते हैं। अधिकाँश पूजा पाठ, उपासना में संलग्न लोगों की मनोभूमी इसी बच्चों जैसे स्तर की होती है। वे विधि-विधानों, कर्मकांडों, या भोग प्रशाद का ताना बाना बुनते रहते हैं ओर इन्ही टंटेबाजियों से अपना उल्लू सीधा करने की जुगत भिडाने में लगे रहते हैं। तथाकथित भक्तों की मंडली इसी स्तर की होती है। वे तिलक छापे लगाकर अपनी भक्ति का प्रमाण भगवान के सामने प्रस्तुत करते रहते हैं या ऎसा ही कोई ओर खेल खडा करके भगवान की आँखों में धूल झोँककर भक्ति का फल प्राप्त करना चाहते हैं। वस्तुत: न तो भगवान इतना भोला है,न ही कोई देवी-देवता इतना सीधा सरल, मूर्ख है और न ही कोई ऎसा मन्त्र आज तक बन पाया है कि जिसे कुछ बार जप-रटकर मनचाहा लाभ प्राप्त किया जा सके। पूजा-उपासना का भी एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान है। आध्यात्म विद्या को एक समग्र साईंस ही कहना चाहिए, जिसके नियम और प्रयोजनों को समझकर तदनुकूल चलने से ही किसी प्रकार का लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले हमे अपने अन्तरंग में पडे हुए पददलित, मूर्च्छित, मलिन, विभूक्षित उपास्यदेव को संभालने, सहेजने का प्रयास करना होगा। उन्हे समर्थ ओर बलवान बनाना होगा। इस प्रथम सोपान को पूरा करने के पश्चात ही मन्त्र, जप, उपासना,स्त्रोत्र,चालीसा आदि का चमत्कार देखने का दूसरा कदम उठाना चाहिए। इस विधि से ही आप निराशा,अविश्वास ओर असमंजस की स्थिति से बचकर उपासना, मंत्र जाप इत्यादि का मनोवांछित लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>धन समृधि के अचूक टोटके—-

>धन समृधि के अचूक टोटके—-

1 यदि आप व्यवसायी हैं, पुराने उद्योग के चलते नया उद्योग आरम्भ कर रहे हों तो अपने पुराने कारखाने से कोई भी लोहे की वास्तु ला कर अपने नए उद्योग स्थल में रख दें। जिस स्थान पर इस को रखेंगे वहां पर स्वस्तिक बनाएं और वहां पर थोड़े से काले उडद रखें उसके ऊपर उस वस्तु को रख दें। ऐसा करने से नवीन उद्योग भी पुराने उद्योग की तरह सफलता पूर्वक चल पड़ता है।

2 यदि आप के कर्मचारी अक्सर छोड़कर जाते हैं तो इसको रोकने के लिये आपको यदि रास्ते में पडी हुए कोई कील मिले, यदि वह दिन शनिवार हो तो अति उत्तम है। इसे भैंस के मूत्र से धो लें। जिस जगह के कर्मचारी ज्यादा छोड़ कर जाते हैं। वहां पर इस कील को गाद दें इस के फलस्वरूप कर्मचारी स्थिर हो जायेंगे। इस बात का भी ध्यान रखें कि आपके कर्मचारी इस प्रकार अपना काम करें कि काम करते समय उनका मुख पूर्व या उत्तर की ओर रहे।

3 यदि धन की कमी हो या किसी का धन कहीं अटक गया हो तो शुक्ल पक्ष के गुरूवार से अपने माथे पर केसर एवं चन्दन का तिलक लगाना आरम्भ कर दें। प्रत्येक गुरूवार को रामदरबार के सामने दण्डवत प्रणाम कर मनोकामना करें, कार्य सफल हो जाएगा।

4 यदि धन टिकता नहीं है तो प्रत्येक शनिवार को काले कुत्ते को तेल से चुपड़ी रोटी खिलाएं। रोटी खिलाने के पश्चात मनोकामना करें। ऐसा प्रत्येक शनिवार को करने से धन टिकता है।

5 आर्थिक कष्टों से निपटने के लिये किसी भी मन्दिर में सिद्ध मूहर्त में केले के दो पौधे (नर एवं मादा) लगाएं तथा इन्हें नियमित सीचें। जब यह फल देने लग जाए तो समझो आपके आर्थिक कष्ट दूर होने वाले हैं।

6 अचानक धन प्राप्ति के लिये पांच गोमती चक्र ले कर लाल वस्त्र में बाँध कर अपनी दुकान की चौखट पर बाँध दें। यह कार्य शुक्रवार के दिन शुभ मूहर्त में करें।

7 दीपावली की संध्या को अशोक वृक्ष की पूजा करें ओर उस वृक्ष के नीचे दीपक जलाएं। दूज के दिन उसी पूजित वृक्ष की जड़ का एक हिस्सा अपने पास रखें। धनागमन होगा।

8 घर में या कार्यालय में 6 मोर पंख रखें इससे आपके घर व कार्यालय पर किसी की नजर नहीं लगेगी।

9 सूर्यास्त के समय आधा किलो गाय के कच्चे दूध में 9 बूँदें शहद की डाल दें। स्नान करने के पश्चात अपने मकान की छ्त से आरम्भ कर मकान के प्रत्येक कमरे व भाग में इस दूध के छीटें लगाएं। ध्यान रहे कि घर का कुछ भी हिस्सा न बचे। अब इस में बचे हुए दूध को अपने मुख्यद्वार के सामने धार देते हुए गिरा दें। ऐसा 21 दिन तक लगातार करें। छीटें डालते समय जिस देवी देवता को आप मानते हों उससे मन ही मन अपने आर्थिक कष्टों, प्रमोशन आदि की कामना करते रहें।

10 घर या दुकान के दरवाजे पर सफ़ेद सरसों रखने से दुकान में बिक्री करते है।

11 किसी भी शुभ तिथि एवं वार वाले इन दिन यदि ज्येष्ठ नक्षत्र हो तो जामुन की जड़ निकाल कर लायें। इसे आप अपने पास रखें। आपको राज्य सम्मान मिलेगा।

12 यदि आप का धन कहीं फंसा हुआ (रुका हुआ) है तो इसको निकलवाने के लिये रोजाना लाल मिर्च के ग्यारह बीज जलपात्र में डालकर सूर्य को अर्ध्य दें। ॐ सूर्याय नमः कहते हुए अपने रुके धन की प्राप्ति की प्रार्थना करें।

13 यदि आप व्यापार के लिये बाहर जा रहे हैं तथा एक नीबों ले कर उस पर चार लौंग गाड़ दें। तथा ॐ श्री हनुमते नमः का 21 बार जप करके इस नींबू को अपने साथ ले जाएँ, व्यापार में सफलता मिलेगी।

14 गेहूं पिसवाते समय उसमें 11 पत्ते तुलसी और थोड़ा सा केसर डाल कर पिसवा लें। इसको पिसवाने से पूर्व इसमें से एक मुट्ठी मिश्रण को एक रात्रि के लिये किसी मन्दिर में रख दें। उसे अगले दिन वहां से वापस लाकर इस मिश्रण में मिला दें। इसके पश्चात ही सम्पूर्ण मिश्रण को पिसवाएं। ऐसा जब भी आप आटा पिसवाने को जाएं उससे एक दिन पूर्व करें। ऐसा करने से घर में बरकत रहेगी।

15 कारोबार में उन्नति के लिये एक टोटका यह है, किसी भी शुक्ल पक्ष की शुक्रवार को सवा किलो काले चने भिगो दें। इसे अगले दिन सरसों के तेल में बना लें इसके अब तीन हिस्से कर लें। एक हिस्सा शनिवार को ही घोड़े या भैंस को खिला दें, एक हिस्सा किसी कोढी या अंग विहीन भिकारी को दे आये तथा एक हिस्सा अपने सिर से उलटा फेर कर इसे एक दोने में रख कर किसी चौराहे पर रख दें ऐसा प्रयोग 40 शनिवार को करें।

16 एक मिटटी का बना शेर बुधवार को दुर्गा माता के आगे चढाने से सब कार्य पूर्ण हो जाते हैं।

17 व्यापार में वृद्धि के लिये एक और टोटका है। एक पीपल का पत्ता शनिवार को तोड़ कर घर ले आयें। उसे गंगा जल से अच्छी तरह धो लें। इसको 21 बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर इसे अपने कैश बाक्स में रखें। ऐसा हर शनिवार को करें। नया पत्ता रखने पर पुराना पत्ता वहां से हटा लें। इस जल में बहा दें या पीपल पर चढ़ा दें।

18 बिक्री बढाने के लिये 11 गुरूवार को अपने व्यापार स्थल के मुख्य द्वार पर हल्दी से स्वस्तिक बना लें। इस पर थोड़ी चने की दाल एवं गुड रख दें। अगले सप्ताह इस सामग्री को वहां से हटा कर किसी मन्दिर में चढ़ा दें।

19 अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिये शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को हरे हकीम की 54 नागों की एक माला लक्ष्मी जी को चढ़ाएं।

20 बेरोजगार को रोजगार पाने के लिये प्रत्येक बुधवार को गणेश जी को मूंगा के लड्डू चढाने चाहिए। उस दिन व्रत भी रखें। शीघ्र ही रोजगार प्राप्त होगा।

21 नौकरी प्राप्ति के लिये एक बारहमुखी रुद्राक्ष को अभिमंत्रित कर गले में धारण करें।

>सृजन का उत्सव गुड़ी पड़वा -गुड़ी पड़वा विशेष—

फागुन के गुजरते-गुजरते आसमान साफ हो जाता है, दिन का आँचल सुनहरा हो जाता है और शाम लंबी, सुरमई हो जाती है, रात बहुत उदार… बहुत उदात्त होकर उतरती है तो सिर पर तारों का थाल झिलमिलाता है। होली आ धमकती है, चाहे तो इसे धर्म से जोड़े या अर्थ से… सारा मामला तो अंत में मौसम और मन पर आकर टिक जाता है।

इन्हीं दिनों वसंत जैसे आसमान और जमीन के बीच होली के रंगों की दुकान सजाए बैठा रहता है। मन को वसंत का आना भाता है तो पत्तों का गिरना और कोंपलों के फूटने से पुराने के अवसान और नए के आगमन का संदेश अपने गहरे अर्थों में हमें जीवन का दर्शन समझाता है।

एक साथ पतझड़ और बहार के आने से हम इसी वसंत के मौसम में जीवन का उत्सव मनाते हैं, कहीं रंग होता है तो कहीं उमंग होती है। बस, इसी मोड़ पर एक साल और गुजरता है। गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा के साथ एक नया साल वसंत के मौसम में नीम पर आईं भूरी-लाल-हरी कोंपलों की तरह बहुत सारी संभावनाओं की पिटारी लेकर हमारे घरों में आ धमकता है। जब वसंत अपने शबाब पर है तो फिर इतिहास और पुराण कैसे इस मधुमौसम से अलग हो सकते हैं।

श्रीखंड, पूरणपोळी और नीम के अजीबो-गरीब संयोग के साथ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को हम विक्रम संवत के नए साल के रूप में मनाते हैं। इस तिथि से पौराणिक और ऐतिहासिक दोनों ही मान्यताएँ जुड़ी हुई हैं। ब्रह्मपुराण के अनुसार चैत्र प्रतिपदा से ही ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी तरह के उल्लेख अथर्ववेद और शतपथ ब्राह्मण में भी मिलते हैं। तो इस तरह तो हम सृष्टि के गर्भाधान का उत्सव मनाते हैं, गुड़ी पड़वा पर।

इसी दिन से चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती है। लोक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान राम का और फिर युधिष्ठिर का भी राज्यारोहण किया गया था। इतिहास बताता है कि इस दिन मालवा के नरेश विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर विक्रम संवत का प्रवर्तन किया।

इस दिन से प्रारंभ चैत्र नवरात्रि का समापन रामनवमी पर भगवान राम का जन्मदिन मनाकर किया जाता है। मध्यप्रदेश में मालवा और निमाड़ में गुड़ी पड़वा पर गुड़ी बनाकर खिड़कियों में लगाई जाती है। नीम की पत्ती या तो सीधे ही या फिर पीसकर रस बनाकर ली जाती है।

मान्यता है कि इस दिन से वर्षभर नित्य नियम से पाँच नीम की पत्तियाँ खाने से व्यक्ति निरोग रहता है। दक्षिण भारत में इसे इगादि, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में उगादि, कश्मीर में नवरेह और सिन्धी में इसे चेटीचंड के रूप में मनाया जाता है। आखिर वसंत को नवजीवन के आरंभ के अतिरिक्त और किसी तरह से कैसे मनाया जा सकता है? वसंत के संदेश को गुड़ी पड़वा की मान्यता से बेहतर और कोई परिभाषित नहीं कर सकता।

शुभ पर्वों में छुपा सेहत का संकेत–गुड़ी पड़वा : हिन्दू नववर्ष आरंभ :::—-

नए वर्ष के, नए दिवस के,
नए सूर्य तुम्हारी हो जय-जय
तुम-सा हो सौभाग्य सभी का,
नया क्षितिज हो मंगलमय।

गुड़ी पड़वा हिन्दू नववर्ष के रूप में भारत में मनाया जाता है। इस दिन सूर्य, नीम पत्तियाँ,अर्घ्य, पूरनपोली, श्रीखंड और ध्वजा पूजन का विशेष महत्व होता है। माना जाता है कि चैत्र माह से हिन्दूओं का नववर्ष आरंभ होता है। सूर्योपासना के साथ आरोग्य, समृद्धि और पवित्र आचरण की कामना की जाती है। इस दिन घर-घर में विजय के प्रतीक स्वरूप गुड़ी सजाई जाती है।

उसे नवीन वस्त्राभूषण पहना कर शकर से बनी आकृतियों की माला पहनाई जाती है। पूरनपोली और श्रीखंड का नैवेद्य चढ़ा कर नवदुर्गा, श्रीरामचन्द्र जी एवं राम भक्त हनुमान की विशेष आराधना की जाती है। यूँ तो पौराणिक रूप से इसका अलग महत्व है लेकिन प्राकृतिक रूप से इसे समझा जाए तो सूर्य ही सृष्टि के पालनहार हैं। अत: उनके प्रचंड तेज को सहने की क्षमता हम पृ‍‍थ्वीवासियों में उत्पन्न हो ऐसी कामना के साथ सूर्य की अर्चना की जाती है।

इस दिन सुंदरकांड, रामरक्षास्तोत्र और देवी भगवती के मंत्र जाप का खास महत्व है। हमारी भारतीय संस्कृति ने अपने आँचल में त्योहारों के इतने दमकते रत्न सहेजे हुए हैं कि हम उनमें उनमें निहित गुणों का मूल्यांकन करने में भी सक्षम नहीं है।

इन सारे त्योहारों का प्रतीकात्मक अर्थ समझा जाए तो हमें जीवन जीने की कला सीखने के लिए किसी ‘कोचिंग’ की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। जैसे शीतला सप्तमी का अर्थ है कि आज मौसम का अंतिम दिवस है जब आप ठंडा आहार ग्रहण कर सकते हैं। आज के बाद आपके स्वास्थ्य के लिए ठंडा आहार नुकसानदेह होगा। साथ ही ठंड की विधिवत बिदाई हो चुकी है अब आपको गर्म पानी से नहाना भी त्यागना होगा।

कई प्रांतों में रिवाज है कि गर्मियों के रसीले फल, व्यंजन आदि गुड़ी को चढ़ाकर उस दिन से ही उनका सेवन आरंभ किया जाता है। गुड़ी पड़वा पर नीम का सेवन करने से वर्ष भर रोगाणुओं से लड़ने की ताकत मिलती है। सूर्य अर्घ्य से सूर्य किरणों का शरीर में प्रवेश होता है जो सेहत की दृष्टि से लाभकारी है। आजकल जिसे सूर्य चिकित्सा के नाम से भी पहचाना जाता है। सूर्य किरणों में निहित विभिन्न रंग शरीर के अलग-अलग हिस्सों को लाभ पहुँचाते हैं।

वास्तव में इन रीति रिवाजों में भी कई अनूठे संदेश छुपे हैं। यह हमारी अज्ञानता है कि हम कुरीतियों को आँख मूँदकर मान लेते हैं। लेकिन स्वस्थ परंपरा के वाहक त्योहारों को पुरातनपंथी कह कर उपेक्षित कर देते हैं। हमें अपने मूल्यों और संस्कृति को समझने में शर्म नहीं आना चाहिए। आखिर उन्हीं में हमारी सेहत और सौन्दर्य का भी तो राज छुपा है।

नववर्ष में हम सूर्य को जल अर्पित करते हुए कामना करें कि हमारे देश के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक उत्थान का ‘सूर्य’ सदैव प्रखर और तेजस्वी बना रहें। और जुबान पर नीम पत्तियों को रखते हुए कामना करें कड़वाहट को त्याग रिश्तों में मिठास बनाए रखने की।

त्योहार तो बस मनाने के लिए होते है… खुशी, मस्ती, जोश और अपनेपन की भावनाएँ त्योहारों के माध्यम से अभिव्यक्त हो ही जाती हैं। फसलें काटने का त्योहार हो या फिर रामजी से जुड़े तथ्य हों, गुड़ी पड़वा वर्तमान में एक आम व्यक्ति के लिए श्रीखंड खाने और मेल-मिलाप के अलावा ज्यादा कुछ नहीं है।

महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों में इसे अलग-अलग कारणों से मनाया जाता है, पर सबसे बड़ा कारण जो सबसे अच्छा लगता है कि इस दिन ब्रह्मा ने सृष्टि का निर्माण किया और समय ने आज से चलना आरंभ किया था।

कितना मोहक और अच्छा विचार है कि समय का चलना कैसे होगा… एक समान गति से वह दिन-रात बस चलता ही जा रहा है मानो ब्रह्माजी ने तेज चलने से मना किया हो। समय अपनी गति से चला और क्या खूब चल रहा है। दिन और रात के दौरान वह करवट बदल रहा है और अपनी छाप छोड़ते जा रहा है।

मौसम करवट बदलकर ठीक आपके सम्मुख उत्सव मनाता नजर आ जाए तो समझिए गुड़ी पड़वा आ गया है। गुड़ी पड़वा का यह त्योहार आपको अनजाने में ही अपनत्व का आचमन करवा जाता है और भविष्य के लिए ‘बेस्ट लक’ कहकर हौले से अपनी लगाम सूर्य देवता के हाथ में दे देता है

समय को समय का भान नहीं है और होना भी नहीं चाहिए, क्योंकि जिस दिन उसे इसका भान हो जाएगा वह तत्काल रुक जाएगा, जड़ हो जाएगा और चाहकर भी आगे नहीं बढ़ पाएगा। गुड़ी पड़वा इस समय को सलाम कहने का त्योहार है। यह ऐसा त्योहार है, जो समय को जानने-पहचानने और उसमें मिल जाने का है।

श्रीखंड में घुली शकर की तरह प्रेम बाँटने और बढ़ाने का संदेश देने वाले त्योहार गुड़ी पड़वा का वर्तमान के युग में भी उतना ही महत्व है जितना कि आज से कई सौ वर्ष पूर्व था।

गुड़ी पड़वा इस कारण भी महत्वपूर्ण है कि इस दिन ब्रह्माजी ने क्या सोचकर सृष्टि का निर्माण किया और उस पर पृथ्वी जैसे ग्रह पर ‘मनुष्य’ नामक प्राणी का भी निर्माण किया। करोड़ों वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों ने जब पृथ्वी पर पहली बार साँस ली होगी, तब यह नहीं सोचा होगा कि आज गुड़ी पड़वा है बल्कि वे तो अपने वजूद को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे होंगे।

गुड़ी पड़वा सभ्य समाज की सोच है कि जैसे बर्थडे मनाते हैं, वैसे ही ऐसा कुछ मनाया जाए जिसमें मनोरंजन भी हो और फिर खान-पान तो हो ही। सृष्टि के निर्माण के दौरान ब्रह्माजी ने यह नहीं सोचा होगा कि अन्य जीवों की तरह मनुष्य भी शांति से पृथ्वी पर जीवन बिताएगा।

उनकी कल्पना के विपरीत हम ब्रह्माजी को यह बताने में लग गए हैं कि… देखो भाई! भले ही सृष्टि का निर्माण आपने किया हो, पर पृथ्वी पर अधिकार तो हमारा ही बनता है और जब हम अधिकार रखते हैं तो कुछ भी कर सकते हैं। हम प्रदूषण फैला सकते हैं… आपस में युद्ध कर सकते हैं… भेदभाव कर सकते हैं और आपस में बँट भी सकते हैं, क्योंकि यह हमारी पृथ्वी है। आपने तो केवल निर्माण किया है, रहने लायक तो हमने ही बनाया है, फिर प्रतिवर्ष हम आपके सम्मान में गुड़ी पड़वा मनाते तो हैं।

ब्रह्माजी के मन में कभी भी विचार नहीं आया होगा कि ‘मनुष्य’ नामक जीव अपने आपको महान की श्रेणी में ले आएगा और रुपए-पैसों को ईजाद कर वह एक-दूसरे से ही भेदभाव करने लगेगा। ‘गरीब’ शब्द ब्रह्माजी के शब्दकोश में नहीं था। मनुष्य ने अपने आप ही समभाव को गरीबी का चोला ओढ़ा दिया ताकि वह स्वयं को श्रेष्ठ मान सके। कभी-कभी लगता है कि आध्यात्मिक गुरु लोगों को जब ‘अहं ब्रह्मास्मि’ कहना सिखाते हैं तो वह गलत अर्थ ले लेते हैं और अपने आपको ब्रह्मा समझने लगते हैं।

वैसे गुड़ी पड़वा एक ओर आनंद का उत्सव है तो दूसरी ओर विजय और परिवर्तन का प्रतीक भी है। कृषकों के लिए इसका विशेष महत्व है। आंध्रप्रदेश में इसे उगादि (युगादि) तिथि अर्थात युग का आरंभ के रूप में मनाया जाता है।

वहीं सिन्धी समाज में भगवान झूलेलाल के जन्मदिवस चेटीचंड अर्थात चैत्र के चन्द्र के रूप में मनाया जाता है। सप्तऋषि संवत्‌ के अनुसार कश्मीर में ‘नवरेह’ नाम से इसे नववर्ष के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। वैसे ऐतिहासिक दृष्टि से इसी दिन सम्राट चन्द्रगुप्त, विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त की थी, इस कारण विक्रम संवत के नाम से भी प्रसिद्ध है।

आस्था का स्वरूप है गुड़ी : कहने को तो गुड़ी पड़वा के दिन घरों के दरवाजों को तोरण से सजाया जाता है और एक दंड पर साड़ी लपेटकर, सिरों पर लोटा रखकर पुष्पमाला से सुसज्जित कर घरों पर लगाई जाती है। गुड़ी आस्था का प्रतीक है।

यह आस्था रामजी के प्रति है और सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा के प्रति भी। उन्हें धन्यवाद कहने का यह हमारा अनूठा तरीका है। घरों पर ऊँची जगह इन्हें लगाने का भी कारण यह है कि हम घर को मंदिर समझ रहे हैं और कलश को घर के ऊपर सजा रहे है ताकि घर में मंदिर की तरह सुख और शांति रहे।

गुड़ी को श्रीखंड और पूरणपोळी का भोग भी लगाते हैं, इस भावना के साथ कि ‘तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा।’ गुड़ी अनजाने में ही हमें श्रद्धा, विजय, आस्था, पवित्रता जैसे भावों से परिचय करवा देती है। गुड़ी को महिला का स्वरूप दिया जाता है, जो कि महिलाओं के सम्मान का प्रतीक भी है। आज के आधुनिक युग में जहाँ विटामिन और प्रोटीन की अँगरेजी दवाओं से बाजार भरा पड़ा है, कड़वे नीम के पत्ते खाना आउटडेटेड समझा जा सकता है।

इसमें हायजिन की बातें होने लगेंगी। पर सच यह है कि इस दिन नीम की पत्तियों के साथ कालीमिर्च, मिश्री, अजवाइन और सौंठ का सेवन किया जाता है। इनका सेवन करने से आरोग्य, बल, बुद्धि व तेजस्विता में वृद्धि होती है। आज के आधुनिक युग के युवा यह कह सकते हैं कि ऐसा क्यों? तो इसका सीधा-सा जवाब यह हो सकता है कि अब ब्रह्माजी से पूछने से रहे कि ऐसा क्यों?

पर जैसा कि पुराने ग्रंथों में लिखा है, यह परंपरा काफी वर्षों से चली आ रही है और गुड़ी पड़वा के बाद का समय भीषण गर्मियों का होता है, इस कारण मनुष्य में रोगों से लड़ने की शक्ति को बढ़ाने के लिए ऐसा किया होगा।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>लाभकारी वास्तु टोटके——

>लाभकारी वास्तु टोटके——
1 भवन के उत्तर में द्वार व खिड़कियाँ रखना से धनागमन होता है।
2 भूखण्ड के उत्तर पूर्व में अण्डरग्राउण्ड पानी का टैंक रखने से स्थिर व्यवसाय एवं लक्ष्मी का वास होता है।
3 उत्तर पूर्व के अण्डरग्राउण्ड टैंक से रोजाना पानी निकाल कर पेड़ पौधे सीचने से धन वृद्धि होती है।
4 भवन के उत्तर पूर्व का फर्श सबसे नीचा होना चाहिए तथा दक्षिण पश्चिम का फर्श सबसे ऊंचा रखने से आय अधिक, व्यय कम रहता है।
5 भूखण्ड के उत्तर में चमेली के तेल का दीपक जलाने से धन लाभ होता है।
6 भवन के मुख्यद्वार को सबसे बड़ा रखना चाहिए यह सबसे सुंदर भी होना चाहिए। मुख्यद्वार के ऊपर गणेश जी बैठाने से घर में सभी प्रकार की सुख सुविधा रहती है।
7 घर में यदि पांजिटिव ऊर्जा नहीं हो तो रोजाना नमक युक्त पानी का पौंछा लगाना चाहिए। भूखण्ड के उत्तर पूर्व में साबुत नमक की डली रखने से भी घर में पांजिटिव ऊर्जा का संचालन होता है। इसे 4-5 दिन में बदलते रहना चाहिए।
8 घर के तीनों भाग व्याव्य, ईशान और उत्तर खुला रखने से तथा भूखण्ड की ढलान उत्तर पूर्व एवं पूर्व की ओर रखने से लक्ष्मी अपने आप बढती है। धन की कमी नहीं रहती है।
9 भूखण्ड या भवन के उत्तर पूर्व में शीशे की बोतल में जल भरकर रखने से तथा इस जल का सेवन एक दिन पश्चात करने से घर वालों का स्वस्थ सही रहता है।
10 सुबह एवं शाम सम्पूर्ण घर में कपूर का धुंआ लगाने से वास्तु दोषों में कमी आती है।
11 भवन में दक्षिण पश्चिम की दीवार मजबूत रखने से आर्थिक पश्चिम स्थिति मजबूत रहती है।
12 भवन का दक्षिण पश्चिम भाग ऊंचा रखने से यश एवं प्रसिधी मिलती है।
13 भवन का मध्य भाग खुला रखने से परिवार में सभी सदस्य मेल जोल से रहते हैं।
14 आरोग्यता और धन लाभ के लिये चारदीवारी की दक्षिणी एवं पश्चिमी दीवार उत्तर एवं पूर्व से ऊंची एवं मजबूत रखें।
15 अपने ड्राइंग रूम के उत्तरी पूर्व में फिश एक्वेरियम रखें। ऐसा करने से धन लाभ होता है।
16 घर के मुख्यद्वार के दोनों ओर पत्थर या धातु का एक-एक हाथी रखने से सौभाग्य में वृद्धि होती है।
17 भवन में आपके नाम की प्लेट (नेम प्लेट) को बड़ी एवं चमकती हुई रखने से यश की वृद्धि होती है।
18 स्वर्गीय परिजनों के चित्र दक्षिणी दीवार पर लगाने से उनका आशीर्वाद मिलता रहता है।
19 विवाह योग्य कन्या को उत्तर-पश्चिम के कमरे में सुलाने से विवाह शीग्रह होता है।
20 किसी भी दुकान या कार्यालय के सामने वाले द्वार पर एक काले कपडे में फिटकरी बांधकर लटकाने से बरकत होती है। धंधा अच्छा चलता है।
21 दुकान के मुख्य द्वार के बीचों बीच नीबूं व हरी मिर्च लटकाने से नजर नहीं लगती है।
22 घर में स्वस्तिक का निशाँ बनाने से निगेटिव ऊर्जा का क्षय होता है।
23 किसी भी भवन में प्रातः एवं सायंकाल को शंख बजाने से ऋणायनों में कमी होती है।
24 घर के उत्तर पूर्व में गंगा जल रखने से घर में सुख सम्पन्नता आती है।
25 पीपल की पूजा करने से श्री तथा यश की वृद्धि होती है। इसका स्पर्श मात्रा से शरीर में रोग प्रतिरोधक तत्वों की वृद्धि होती है।
26 घर में नित्य गोमूत्र का छिडकाव करने से सभी प्रकार के वास्तु दोषों से छुटकारा मिल जाता है।
27 मुख्य द्वार में आम, पीपल, अशोक के पत्तों का बंदनवार लगाने से वंशवृद्धि होती है।

>नव-संवत्सर की शुरुआत–हिंदू नववर्ष को जानें :::—-

जैसे ईसा (अंग्रेजी), चीन या अरब का कैलेंडर है उसी तरह राजा विक्रमादित्य के काल में भारतीय वैज्ञानिकों ने इन सबसे पहले ही भारतीय कैलेंडर विकसित किया था। इस कैलेंडर की शुरुआत हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से मानी जाती है।

मार्च माह से ही दुनियाभर में पुराने कामकाज को समेटकर नए कामकाज की रूपरेखा तय की जाती है। इस धारणा का प्रचलन विश्व के प्रत्येक देश में आज भी जारी है। 21 मार्च को पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरा कर लेती है, ‍उस वक्त दिन और रात बराबर होते हैं।

12 माह का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से ही शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। विक्रम कैलेंडर की इस धारणा को यूनानियों के माध्यम से अरब और अंग्रेजों ने अपनाया। बाद में भारत के अन्य प्रांतों ने अपने-अपने कैलेंडर इसी के आधार पर विकसित किए।

प्राचीन संवत :—
विक्रम संवत से पूर्व 6676 ईसवी पूर्व से शुरू हुए प्राचीन सप्तर्षि संवत को हिंदुओं का सबसे प्राचीन संवत माना जाता है, जिसकी विधिवत शुरुआत 3076 ईसवी पूर्व हुई मानी जाती है।

सप्तर्षि के बाद नंबर आता है कृष्ण के जन्म की तिथि से कृष्ण कैलेंडर का फिर कलियुग संवत का। कलियुग के प्रारंभ के साथ कलियुग संवत की 3102 ईसवी पूर्व में शुरुआत हुई थी।

विक्रम संवत :—
इसे नव संवत्सर भी कहते हैं। संवत्सर के पाँच प्रकार हैं सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास। विक्रम संवत में सभी का समावेश है। इस विक्रम संवत की शुरुआत 57 ईसवी पूर्व में हुई। इसको शुरू करने वाले सम्राट विक्रमादित्य थे इसीलिए उनके नाम पर ही इस संवत का नाम है। इसके बाद 78 ईसवी में शक संवत का आरम्भ हुआ।

नव संवत्सर :—
जैसा की ऊपर कहा गया कि वर्ष के पाँच प्रकार होते हैं। मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क आदि सौरवर्ष के माह हैं। यह 365 दिनों का है। इसमें वर्ष का प्रारंभ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से माना जाता है। फिर जब मेष राशि का पृथ्वी के आकाश में भ्रमण चक्र चलता है तब चंद्रमास के चैत्र माह की शुरुआत भी हो जाती है। सूर्य का भ्रमण इस वक्त किसी अन्य राशि में हो सकता है।

चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आदि चंद्रवर्ष के माह हैं। चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है, जो चैत्र माह से शुरू होता है। चंद्र वर्ष में चंद्र की कलाओं में वृद्धि हो तो यह 13 माह का होता है। जब चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में होकर शुक्ल प्रतिपदा के दिन से बढ़ना शुरू करता है तभी से हिंदू नववर्ष की शुरुआत मानी गई है।

सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है। इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है। फिर भी ऐसे बढ़े हुए दिनों को मलमास या अधिमास कहते हैं।

लगभग 27 दिनों का एक नक्षत्रमास होता है। इन्हें चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा आदि कहा जाता है। सावन वर्ष 360 दिनों का होता है। इसमें एक माह की अवधि पूरे तीस दिन की होती है।

हिंदू नववर्ष को जानें—-नववर्ष की शुरुआत का महत्व:—-

नववर्ष को भारत के प्रांतों में अलग-अलग तिथियों के अनुसार मनाया जाता है। ये सभी महत्वपूर्ण तिथियाँ मार्च और अप्रैल के महीने में आती हैं। इस नववर्ष को प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। फिर भी पूरा देश चैत्र माह से ही नववर्ष की शुरुआत मानता है और इसे नव संवत्सर के रूप में जाना जाता है। गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है।

इस विक्रम संवत में नववर्ष की शुरुआत चंद्रमास के चैत्र माह के उस दिन से होती है जिस दिन ब्रह्म पुराण अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की शुरुआत की थी। इसी दिन से सतयुग की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन से नवरात्र की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन को भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था और पूरे अयोध्या नगर में विजय पताका फहराई गई थी। इसी दिन से रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है।

ज्योतिषियों के अनुसार इसी दिन से चैत्री पंचांग का आरम्भ माना जाता है, क्योंकि चैत्र मास की पूर्णिमा का अंत चित्रा नक्षत्र में होने से इस चैत्र मास को नववर्ष का प्रथम दिन माना जाता है।

नववर्ष मनाने की परंपरा :—–

रात्रि के अंधकार में नववर्ष का स्वागत नहीं होता। नया वर्ष सूरज की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है। नववर्ष के ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से घर में सुगंधित वातावरण कर दिया जाता है। घर को ध्वज, पताका और तोरण से सजाया जाता है।

ब्राह्मण, कन्या, गाय, कौआ और कुत्ते को भोजन कराया जाता है। फिर सभी एक-दूसरे को नववर्ष की बधाई देते हैं। एक दूसरे को तिलक लगाते हैं। मिठाइयाँ बाँटते हैं। नए संकल्प लिए जाते हैं।

>रामचरितमानस के चमत्कारिक मंत्र—

जन सामान्य की पीड़ा निवारण में रामचरित मानस और हनुमान चालीसा की चौपाइयां और दोहे जातक की कुंडली में व्याप्त ग्रह दोष और पीड़ा निवारण में सहायक हो सकते हैं। इन्हें सुगमता से समझा जा सकता है और श्रद्धापूर्वक पारायण करने से लाभ मिल जाता है। मानस की चौपाइयों में मंत्र तुल्य शक्तियां विद्यमान हैं। इनका पठन,मनन और जप करके लाभ लिया जा सकता है।
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प्रेम प्राप्ति—-
भुवन चारिदस भरा उछाहु।
जनक सुता रघुबीर बिआहू।।
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
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रोजगार के लिए—-
बिस्व भरन पोषन कर जोई।
ताकर नाम भरत अस होई।।
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क्लेश निवारण—
हरन कठिन कलि कलुष कलेसू।
महामोह निसि दलन दिनेसू।।
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विध्न्न -बाधा निवारण—-
प्रणवों पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन। जासु ह्वदय आगार बसहि राम सर चाप धर॥ ।
मनोरथ पूर्ति के लिए—-
भव भेषज रघुनाथ जसु, सुनाही
जे नर अरू नारी। तिन्ह कर सकल मनोरथसिद्ध करहि त्रिसिरारी॥ .

एकल चंद्र (केमेन्द्रुम दोष) निवारण—
बिन सतसंग बिबेक न होई।राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥.

कालसर्प दोष निवारण—-
रावण जुद्ध अजान कियो तब,
नाग कि फांस सबै सिर डारो।
श्री रघुनाथ समेत सबै दल,मोह भयो यह संकट भारो।।
आनि खगेश तबै हनुमान जु,
बंधन काटि सुत्रास निवारो।
को नहि जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो।।
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स्थान/ नगर में प्रवेश करते समय—
प्रबिस नगर कीजे सब काजा।ह्वदय राखि कोसलपुर राजा।।
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राहु प्रभाव से कलंक मुक्ति के लिए—-
मंत्र महामनि विषय ब्याल के ।
मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥हरन मोह तम दिनकर कर से ।सालि पाल जलधर के॥ .
निराशा यानी शनि प्रभाव से मुक्ति
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर। चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥
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आलस्य से मुक्ति—–
हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रणाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहां विश्राम॥
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विजय प्राप्ति के लिए—-
विजय रथ का पाठ लंकाकाण्ड ( दोहा 79-80 मध्य) का नियमित पाठ विजय प्राप्त कराता है। परिकल्पना-प्रोजेक्ट पूर्णता के लिये भागीरथ के गंगा अवतरण प्रयास का नियमित पाठ व्यक्ति की कल्पना को साकार करता है।
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बंधन मुक्ति—
सौ बार हनुमान चालीसा पाठ सभी बंधनों से मुक्त करता है।
श्रद्धापूर्वक मनन,पठन, जप और श्रवण करने से सभी समस्याओं का समाधान हो जाता है। पे्रम और दृढ़ विश्वास फल प्राप्ति के लिए जरूरी है। गुरू मार्गदर्शन लेकर सभी मनोरथ पूरे कर सकते हैं।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>कार्यस्थल की शुभता हेतु :—-

>कार्यस्थल की शुभता हेतु :—-

1. कार्यस्थल का ब्रह्म स्थान (केन्द्र स्थान) हमेशा खाली रखना चाहिए. ब्रह्म स्थान में कोई खंबा, स्तंभ, कील आदि नहीं लगाना चाहिए.
2. कार्यस्थल पर यदि प्रतीक्षा स्थल बनाना हो, तो सदैव वायव्य कोणे में ही बनाना चाहिए.
3. अपनी पीठ के पीछे कोई खुली खिडकी अथवा दरवाजा नहीं होना चाहिए.
4. विद्युत का सामान, मोटर, स्विच, जैनरेटर, ट्रासंफार्मर, धुंए की चिमनी इत्यादि को अग्नि कोण अथवा दक्षिण दिशा में रखना चाहिए.
5. कम्पयूटर हमेशा अग्नि कोण अथवा पूर्व दिशा में रखें.
6. बिक्री का सामान या जो सामान बिक नहीं रहा हो तो उसे वायव्य कोण अर्थात उत्तर-पश्चिम दिशा में रखें तो शीघ्र बिकेगा.
7. सजावट इत्यादि हेतु कभी भी कांटेदार पौधे, जैसे कैक्टस इत्यादि नहीं लगाने चाहिए.
8. यदि किसी को चलते हुए व्यवसाय में अचानक से अनावश्यक विघ्न बाधाएं, हानि, परेशानी का सामना करना पड रहा हो तो उसके लिए कार्यस्थल के मुख्य द्वार की अन्दर की ओर अशोक वृ्क्ष के 9 पत्ते कच्चे सूत में बाँधकर बंदनवार के जैसे बाँध दें. पत्ते सूखने पर उसे बदलते रहें तो नुक्सान थम जाएगा और व्यवसाय पूर्ववत चलने लगेगा.

>बृहस्पति और मंगल का महापरिवर्तन–2011@किस राशि पर क्या होगा प्रभाव!????

बृहस्पति ग्रह का शुक्रवार से अस्त हो जाने के कारण इसका प्रभाव सभी राशियों पर पड़ेगा। मंगल कुंभ से मीन राशि में प्रवेश कर चुका है। 21 अप्रैल 2011 तक सभी शुभ कार्यों पर रोक लगेगी। इस संबंध में ज्योतिषाचार्य पं. जीएम हिंगे के अनुसार सभी राशियों पर इसका विशेष प्रभाव पड़ेगा, जिसका उपाय करने से आम व्यक्ति को निजात भी मिलेगी।

आइए जानते हैं- किस राशि पर कौन-सा प्रभाव होगा?

बारह राशि पर प्रभाव —-

मेष राशि के लिए बनते काम बिगड़ेंगे, यात्रा में बाधा रहेगी।
वृषभ राशि के लिए स्वास्थ्य खराब होगा, धन की प्राप्ति में मुश्किल होगी।
मिथुन राशि के लिए दांपत्य जीवन में मुश्किल व नौकरी में परेशानी आएगी।
कर्क राशि के लिए नौकरी में बाधा शादी होते-होते रुकेगी।
सिंह राशि के जातकों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, संतान में बाधा आएगी। संतान का स्वास्थ्य बिगड़ेगा।
कन्या राशि के लिए मन अशांत रहेगा, सुख-समृद्धि में कमी आएगी।
तुला राशि के लिए साहस, आत्मविश्वास कमजोर होगा, दूसरों से संबंध बिगड़ेंगे।
वृश्चिक राशि वाले संतान को लेकर तनाव व चिंता रहेगी, पारिवारिक कलह होगी।
धनु राशि के लिए जीवन के तमाम रास्ते बंद हो सकते हैं, निर्णय गलत हो सकते हैं।
मकर राशि के लिए मुश्किलें सामने आएँगी और उसका सामना नहीं कर पाएँगे।
कुंभ राशि के लिए घर-परिवार में आर्थिक मुश्किलें होंगी, धन का नुकसान होगा।
मीन राशि वालों का स्वास्थ्य बिगड़ेगा, अपयश आएगा।

इसके लिए सभी राशि पर होने वाले प्रभावों और मुसीबतों से बचने के उपाय निम्नानुसार है :- —

मेष राशि के जातक पीले रंग का रुमाल अपने पास रखें, सोने का कोई आभूषण न पहनें।
वृषभ राशि वाले प्रतिदिन दो केले का दान करें, खाने में पीला पदार्थ सेवन न करें।
मिथुन राशि वाले सूर्य को हल्दी डालकर जल चढ़ाएँ।
कर्क राशि के लिए दाहिने हाथ में सोने या पीतल का छल्ला धारण करें।
सिंह राशि वाले पीले वस्त्र धारण करें।
कन्या राशि वाले प्रतिदिन केसर या हल्दी का टीका लगाएँ।
तुला राशि के जातक चने की दाल गरीबों में बाँटें, पीला पदार्थ न खाएँ।
वृश्चिक राशि वाले दाहिने हाथ की तर्जनी में सोने या पीतल का छल्ला धारण करें।
धनु राशि वाले माँस का सेवन न करें, सूर्य को पीला चंदन डालकर जल चढ़ाएँ।
मकर राशि वाले गरीब को भोजन कराएँ व सोना न पहनें।
कुंभ राशि वाले क्रोध व वाणी पर संयम रखें।
मीन राशि वाले माँस का सेवन न करें, बुजुर्गों का आशीर्वाद प्रतिदिन लें।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>समस्याओं का समाधान—-

>समस्याओं का समाधान—–

1॰ यदि परिश्रम के पश्चात् भी कारोबार ठप्प हो, या धन आकर खर्च हो जाता हो तो यह टोटका काम में लें। किसी गुरू पुष्य योग और शुभ चन्द्रमा के दिन प्रात: हरे रंग के कपड़े की छोटी थैली तैयार करें। श्री गणेश के चित्र अथवा मूर्ति के आगे “संकटनाशन गणेश स्तोत्र´´ के 11 पाठ करें। तत्पश्चात् इस थैली में 7 मूंग, 10 ग्राम साबुत धनिया, एक पंचमुखी रूद्राक्ष, एक चांदी का रूपया या 2 सुपारी, 2 हल्दी की गांठ रख कर दाहिने मुख के गणेश जी को शुद्ध घी के मोदक का भोग लगाएं। फिर यह थैली तिजोरी या कैश बॉक्स में रख दें। गरीबों और ब्राह्मणों को दान करते रहे। आर्थिक स्थिति में शीघ्र सुधार आएगा। 1 साल बाद नयी थैली बना कर बदलते रहें।

2॰ किसी के प्रत्येक शुभ कार्य में बाधा आती हो या विलम्ब होता हो तो रविवार को भैरों जी के मंदिर में सिंदूर का चोला चढ़ा कर “बटुक भैरव स्तोत्र´´ का एक पाठ कर के गौ, कौओं और काले कुत्तों को उनकी रूचि का पदार्थ खिलाना चाहिए। ऐसा वर्ष में 4-5 बार करने से कार्य बाधाएं नष्ट हो जाएंगी।

3॰ रूके हुए कार्यों की सिद्धि के लिए यह प्रयोग बहुत ही लाभदायक है। गणेश चतुर्थी को गणेश जी का ऐसा चित्र घर या दुकान पर लगाएं, जिसमें उनकी सूंड दायीं ओर मुड़ी हुई हो। इसकी आराधना करें। इसके आगे लौंग तथा सुपारी रखें। जब भी कहीं काम पर जाना हो, तो एक लौंग तथा सुपारी को साथ ले कर जाएं, तो काम सिद्ध होगा। लौंग को चूसें तथा सुपारी को वापस ला कर गणेश जी के आगे रख दें तथा जाते हुए कहें `जय गणेश काटो कलेश´।

4॰ सरकारी या निजी रोजगार क्षेत्र में परिश्रम के उपरांत भी सफलता नहीं मिल रही हो, तो नियमपूर्वक किये गये विष्णु यज्ञ की विभूति ले कर, अपने पितरों की `कुशा´ की मूर्ति बना कर, गंगाजल से स्नान करायें तथा यज्ञ विभूति लगा कर, कुछ भोग लगा दें और उनसे कार्य की सफलता हेतु कृपा करने की प्रार्थना करें। किसी धार्मिक ग्रंथ का एक अध्याय पढ़ कर, उस कुशा की मूर्ति को पवित्र नदी या सरोवर में प्रवाहित कर दें। सफलता अवश्य मिलेगी। सफलता के पश्चात् किसी शुभ कार्य में दानादि दें।

5॰ व्यापार, विवाह या किसी भी कार्य के करने में बार-बार असफलता मिल रही हो तो यह टोटका करें- सरसों के तैल में सिके गेहूँ के आटे व पुराने गुड़ से तैयार सात पूये, सात मदार (आक) के पुष्प, सिंदूर, आटे से तैयार सरसों के तैल का रूई की बत्ती से जलता दीपक, पत्तल या अरण्डी के पत्ते पर रखकर शनिवार की रात्रि में किसी चौराहे पर रखें और कहें -“हे मेरे दुर्भाग्य तुझे यहीं छोड़े जा रहा हूँ कृपा करके मेरा पीछा ना करना।´´ सामान रखकर पीछे मुड़कर न देखें।

6॰ सिन्दूर लगे हनुमान जी की मूर्ति का सिन्दूर लेकर सीता जी के चरणों में लगाएँ। फिर माता सीता से एक श्वास में अपनी कामना निवेदित कर भक्ति पूर्वक प्रणाम कर वापस आ जाएँ। इस प्रकार कुछ दिन करने पर सभी प्रकार की बाधाओं का निवारण होता है।

7॰ किसी शनिवार को, यदि उस दिन `सर्वार्थ सिद्धि योग’ हो तो अति उत्तम सांयकाल अपनी लम्बाई के बराबर लाल रेशमी सूत नाप लें। फिर एक पत्ता बरगद का तोड़ें। उसे स्वच्छ जल से धोकर पोंछ लें। तब पत्ते पर अपनी कामना रुपी नापा हुआ लाल रेशमी सूत लपेट दें और पत्ते को बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। इस प्रयोग से सभी प्रकार की बाधाएँ दूर होती हैं और कामनाओं की पूर्ति होती है।

८॰ रविवार पुष्य नक्षत्र में एक कौआ अथवा काला कुत्ता पकड़े। उसके दाएँ पैर का नाखून काटें। इस नाखून को ताबीज में भरकर, धूपदीपादि से पूजन कर धारण करें। इससे आर्थिक बाधा दूर होती है। कौए या काले कुत्ते दोनों में से किसी एक का नाखून लें। दोनों का एक साथ प्रयोग न करें।

9॰ प्रत्येक प्रकार के संकट निवारण के लिये भगवान गणेश की मूर्ति पर कम से कम 21 दिन तक थोड़ी-थोड़ी जावित्री चढ़ावे और रात को सोते समय थोड़ी जावित्री खाकर सोवे। यह प्रयोग 21, 42, 64 या 84 दिनों तक करें।

10॰ अक्सर सुनने में आता है कि घर में कमाई तो बहुत है, किन्तु पैसा नहीं टिकता, तो यह प्रयोग करें। जब आटा पिसवाने जाते हैं तो उससे पहले थोड़े से गेंहू में 11 पत्ते तुलसी तथा 2 दाने केसर के डाल कर मिला लें तथा अब इसको बाकी गेंहू में मिला कर पिसवा लें। यह क्रिया सोमवार और शनिवार को करें। फिर घर में धन की कमी नहीं रहेगी।

11. रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र हो, तब गूलर के वृक्ष की जड़ प्राप्त कर के घर लाएं। इसे धूप, दीप करके धन स्थान पर रख दें। यदि इसे धारण करना चाहें तो स्वर्ण ताबीज में भर कर धारण कर लें। जब तक यह ताबीज आपके पास रहेगी, तब तक कोई कमी नहीं आयेगी। घर में संतान सुख उत्तम रहेगा। यश की प्राप्ति होती रहेगी। धन संपदा भरपूर होंगे। सुख शांति और संतुष्टि की प्राप्ति होगी।

>एस्ट्रो से जानें विवाह के योग–जन्म कुंडली से करें ग्रह-दोष निवारण:::—

आजकल लड़के-लड़कियाँ उच्च शिक्षा या अच्छा करियर बनाने के चक्कर में बड़ी उम्र के हो जाने पर विवाह में काफी विलंब हो जाता है। उनके माता-पिता भी असुरक्षा की भावनावश बच्चों के अच्छे खाने-कमाने और आत्मनिर्भर होने तक विवाह न करने पर सहमत हो जाने से भी विवाह में विलंब निश्चित होता है।

अच्छा होगा किसी विद्वान ज्योतिषी को अपनी जन्म कुंडली दिखाकर विवाह में बाधक ग्रह या दोष को ज्ञात कर उसका निवारण करें।

ज्योतिषीय दृष्टि से जब विवाह योग बनते हैं, तब विवाह टलने से विवाह में बहुत देरी हो जाती है। वे विवाह को लेकर अत्यंत चिंतित हो जाते हैं। वैसे विवाह में देरी होने का एक कारण बच्चों का मांगलिक होना भी होता है।

इनके विवाह के योग 27, 29, 31, 33, 35 व 37वें वर्ष में बनते हैं। जिन युवक-युवतियों के विवाह में विलंब हो जाता है, तो उनके ग्रहों की दशा ज्ञात कर, विवाह के योग कब बनते हैं, जान सकते हैं।

जिस वर्ष शनि और गुरु दोनों सप्तम भाव या लग्न को देखते हों, तब विवाह के योग बनते हैं। सप्तमेश की महादशा-अंतर्दशा या शुक्र-गुरु की महादशा-अंतर्दशा में विवाह का प्रबल योग बनता है। सप्तम भाव में स्थित ग्रह या सप्तमेश के साथ बैठे ग्रह की महादशा-अंतर्दशा में विवाह संभव है।

अन्य योग निम्नानुसार हैं—-
(1) लग्नेश, जब गोचर में सप्तम भाव की राशि में आए।
(2) जब शुक्र और सप्तमेश एक साथ हो, तो सप्तमेश की दशा-अंतर्दशा में।
(3) लग्न, चंद्र लग्न एवं शुक्र लग्न की कुंडली में सप्तमेश की दशा-अंतर्दशा में।
(4) शुक्र एवं चंद्र में जो भी बली हो, चंद्र राशि की संख्या, अष्टमेश की संख्या जोड़ने पर जो राशि आए, उसमें गोचर गुरु आने पर।
(5) लग्नेश-सप्तमेश की स्पष्ट राशि आदि के योग के तुल्य राशि में जब गोचर गुरु आए।
(6) दशमेश की महादशा और अष्टमेश के अंतर में।
(7) सप्तमेश-शुक्र ग्रह में जब गोचर में चंद्र गुरु आए।
(8) द्वितीयेश जिस राशि में हो, उस ग्रह की दशा-अंतर्दशा में।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>लाल किताब के सिद्ध टोटके—-

>लाल किताब के सिद्ध टोटके—-

नानक दुखिया सब संसार ! आज संसार में हर आदमी दुखी है ! चाहे अमीर हो या गरीब, बडा हो या छोटा ! हर इंसान को कोई न कोई परेशानी लगी रहती है ! ज्योतिष में इसके लिए कई उपाय सुझाए गए हैं ! जिनको विधि पूर्वक करके हम लाभ उठा सकते हैं !
लाल किताब उत्तर भारत में खास कर पंजाब में बहुत प्रसिद्ध है ! अब इसका प्रचार धीरे-धीरे पूरे भारत में हो रहा है ! इसकी लोकप्रियता का मुख्य कारण इसके आसान, सस्ते और सटीक उपाय हैं ! इसमें कई उपाय ग्रहों की बजाय लक्षणों से बताये जाते हैं ! आपके लाभ के लिए कुछ सिद्ध उपाय निम्न प्रकार से हैं –
1. यदि आपको धन की परेशानी है, नौकरी मे दिक्कत आ रही है, प्रमोशन नहीं हो रहा है या आप अच्छे करियर की तलाश में है तो यह उपाय कीजिए :
किसी दुकान में जाकर किसी भी शुक्रवार को कोई भी एक स्टील का ताला खरीद लीजिए ! लेकिन ताला खरीदते वक्त न तो उस ताले को आप खुद खोलें और न ही दुकानदार को खोलने दें ताले को जांचने के लिए भी न खोलें ! उसी तरह से डिब्बी में बन्द का बन्द ताला दुकान से खरीद लें ! इस ताले को आप शुक्रवार की रात अपने सोने के कमरे में रख दें ! शनिवार सुबह उठकर नहा-धो कर ताले को बिना खोले किसी मन्दिर, गुरुद्वारे या किसी भी धार्मिक स्थान पर रख दें ! जब भी कोई उस ताले को खोलेगा आपकी किस्मत का ताला खुल जायगा !
2. यदि आप अपना मकान, दुकान या कोई अन्य प्रापर्टी बेचना चाहते हैं और वो बिक न रही हो तो यह उपाय करें :
बाजार से 86 (छियासी) साबुत बादाम (छिलके सहित) ले आईए ! सुबह नहा-धो कर, बिना कुछ खाये, दो बादाम लेकर मन्दिर जाईए ! दोनो बादाम मन्दिर में शिव-लिंग या शिव जी के आगे रख दीजिए ! हाथ जोड कर भगवान से प्रापर्टी को बेचने की प्रार्थना कीजिए और उन दो बादामों में से एक बादाम वापिस ले आईए ! उस बादाम को लाकर घर में कहीं अलग रख दीजिए ! ऐसा आपको 43 दिन तक लगातार करना है ! रोज़ दो बादाम लेजाकर एक वापिस लाना है ! 43 दिन के बाद जो बादाम आपने घर में इकट्ठा किए हैं उन्हें जल-प्रवाह (बहते जल, नदी आदि में) कर दें ! आपका मनोरथ अवश्य पूरा होगा ! यदि 43 दिन से पहले ही आपका सौदा हो जाय तो भी उपाय को अधूरा नही छोडना चाहिए ! पूरा उपाय करके 43 बादाम जल-प्रवाह करने चाहिए ! अन्यथा कार्य में रूकावट आ सकती है !
3. यदि आप ब्लड प्रेशर या डिप्रेशन से परेशान हैं तो : इतवार की रात को सोते समय अपने सिरहाने की तरफ 325 ग्राम दूध रख कर सोंए ! सोमवार को सुबह उठ कर सबसे पहले इस दूध को किसी कीकर या पीपल के पेड को अर्पित कर दें ! यह उपाय 5 इतवार तक लगातार करें ! लाभ होगा !
4. माईग्रेन या आधा सीसी का दर्द का उपाय :
सुबह सूरज उगने के समय एक गुड का डला लेकर किसी चौराहे पर जाकर दक्षिण की ओर मुंह करके खडे हो जांय ! गुड को अपने दांतों से दो हिस्सों में काट दीजिए ! गुड के दोनो हिस्सों को वहीं चौराहे पर फेंक दें और वापिस आ जांय ! यह उपाय किसी भी मंगलवार से शुरू करें तथा 5 मंगलवार लगातार करें ! लेकिन….लेकिन ध्यान रहे यह उपाय करते समय आप किसी से भी बात न करें और न ही कोई आपको पुकारे न ही आप से कोई बात करे ! अवश्य लाभ होगा !
5. फंसा हुआ धन वापिस लेने के लिए :
यदि आपकी रकम कहीं फंस गई है और पैसे वापिस नहीं मिल रहे तो आप रोज़ सुबह नहाने के पश्चात सूरज को जल अर्पण करें ! उस जल में 11 बीज लाल मिर्च के डाल दें तथा सूर्य भगवान से पैसे वापिसी की प्रार्थना करें ! इसके साथ ही “ओम आदित्याय नमः “ का जाप करें ! .
नोट :
1. लाल किताब के सभी उपाय दिन में ही करने चाहिए ! अर्थात सूरज उगने के बाद व सूरज डूबने से पहले !
2. सच्चाई व शुद्ध भोजन पर विशेष ध्यान देना चाहिए !
3. किसी भी उपाय के बीच मांस, मदिरा, झूठे वचन, परस्त्री गमन की विशेष मनाही है !
4. सभी उपाय पूरे विश्वास व श्रद्धा से करें, लाभ अवश्य होगा !

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>ग्रहों के विशिष्ट योग—-

>ग्रहों के विशिष्ट योग—-

कुंडली में ग्रहों की स्थिति के अनुरूप मनीषियों ने इन्हें विशिष्ट योगों के नाम दिए हैं।

1. युति : दो ग्रह एक ही राशि में एक सी डिग्री के हों तो युति कहलाती है। अशुभ ग्रहों की युति अशुभ फल व शुभ ग्रहों की युति शुभ फल देती है। अशुभ व शुभ ग्रह की युति भी अशुभ फल ही देती है।

2. लाभ योग : एक ग्रह दूसरे से 60 डिग्री पर हो या तीसरे स्थान में हो तो लाभ योग होता है। यह शुभ माना जाता है।

3. केंद्र योग : दो ग्रह एक दूसरे से 90 डिग्री पर हो या चौथे व 10वें स्थान पर हो तो केंद्र योग होता है। यह योग शुभ होता है।

4. षडाष्टक योग : दो ग्रह 150 डिग्री के अंतर पर हो या एक दूसरे से 6 या8 वें स्थान में हों तो षडाष्टक दोष या योग होता है। यह कष्‍टकारी होता है।

5. नवपंचम योग : दो ग्रह एक दूसरे से 120 डिग्री पर अर्थात पाँचवें व नवें स्थान पर समान अंश में हो तो यह योग होता है। यह अति शुभ माना जाता है जैसे सिंह राशि का मंगल और धनु राशि का गुरु –

6. प्रतियुति : इसमें दो ग्रह 180 डिग्री पर अर्थात एक दूसरे से सातवें स्थान पर होते हैं। विभिन्न ग्रहों के लिए इसके प्रभाव भिन्न-भिन्न होते हैं।

7. अन्योन्य योग : जब ग्रह एक दूसरे की राशि में हो तो यह योग बनता है। (जैसे वृषभ का मंगल और वृश्चिक का शुक्र) इसके भी शुभ फल होते हैं।

8. पापकर्तरी योग : किसी ग्रह के आजू-बाजू (दूसरे व व्यय में) पापग्रह हो तो यह योग बनता है। यह बेहद अशुभ होता

>गुरु-राहु युति यानि चाण्डाल योग——

जन्म पत्रिका के एक ही भाव में जब गुरु राहु स्थित हो तो चाण्डाल योग निर्मित होता है। ऐसे योग वाला जातक उदण्ड प्र$कृति का होता है। राहु यदि बलिष्ठ हो तो जातक अपने गुरुका अपमान करने वाला होता है। वह गुरु के कार्य को अपना बना कर बताता है। गुरु की संपत्ति हड़पने में भी उसे परहेज नही होता। वहीं यदि गुरु ग्रह राहु सेे ज्यादा बलिष्ठ हो तो वह शिष्य अपने गुरु के सानिध्य में तो रहता परंतु अपने गुरु के ज्ञान को ग्रहण नहीं कर पाता। गुरु भी अपने शिष्य को अच्छे से प्रशिक्षित नहीं कर पाता।चाण्डाल योग वाला जातक अपने से बड़ों का अपमान करने वाला, उनकी बातों को टालने वाला, वाचाल होता है। क्या करें उपाय चाण्डाल योग निर्मुलन के लिए :-

१- गाय को भोजन दें। २- हनुमान चालीसा का पाठ करें। ३- वृद्धों का सम्मान करें ।

४- माता पिता का आदर करें। ५- चन्दन का तिलक लगाएं।
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बुद्धि भ्रष्ट करती है गुरु-राहु की य‍ुति—-

गुरु-राहु की य‍ुति को चांडाल योग के नाम से जाना जाता है। सामान्यत: यह योग अच्छा नहीं माना जाता। जिस भाव में फलीभूत होता है, उस भाव के शुभ फलों की कमी करता है। यदि मूल जन्म कुंडली में गुरु लग्न, पंचम, सप्तम, नवम या दशम भाव का स्वामी होकर चांडाल योग बनाता हो तो ऐसे व्यक्तियों को जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है। जीवन में कई बार गलत निर्णयों से नुकसान उठाना पड़ता है। पद-प्रतिष्ठा को भी धक्का लगने की आशंका रहती है।

वास्तव में गुरु ज्ञान का ग्रह है, बुद्धि का दाता है। जब यह नीच का हो जाता है तो ज्ञान में कमी लाता है। बुद्धि को क्षीण बना देता है। राहु छाया ग्रह है जो भ्रम, संदेह, शक, चालबाजी का कारक है। नीच का गुरु अपनी शुभता को खो देता है। उस पर राहु की युति इसे और भी निर्बल बनाती है। राहु मकर राशि में मित्र का ही माना जाता है (शनिवत राहु) अत: यह बुद्धि भ्रष्ट करता है। निरंतर भ्रम-संदेह की स्थिति बनाए रखता है तथा गलत निर्णयों की ओर अग्रसर करता है।

यदि मूल कुंडली या गोचर कुंडली इस योग के प्रभाव में हो तो निम्न उपाय कारगर सिद्ध हो सकते हैं-
1. योग्य गुरु की शरण में जाएँ, उसकी सेवा करें और आशीर्वाद प्राप्त करें। स्वयं हल्दी और केसर का टीका लगाएँ।
2. निर्धन विद्यार्थियों को अध्ययन में सहायता करें।
3. निर्णय लेते समय बड़ों की राय लें।
4. वाणी पर नियंत्रण रखें। व्यवहार में सामाजिकता लाएँ।
5. खुलकर हँसे, प्रसन्न रहें।
6. गणेशजी और देवी सरस्वती की उपासना और मंत्र जाप करें।
7. बरगद के वृक्ष में कच्चा दूध डालें, केले का पूजन करें, गाय की सेवा करें।
8. राहु का जप-दान करें।
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क्या है दमरुका योग?

जन्म पत्रिका के यह सबसे असहनीय योगों में से एक है। प्राय: इस योग की चर्चा नहीं की जाती। यह एक ऐसा योग है, जिसको जानने के बाद व्यक्ति भयभीत हो जाता है। इसलिए प्राय: इस योग की सार्वजनिक चर्चा नहीं की जाती।इस योग में जन्म पत्रिका का अष्टम भाव कारक होता है। पत्रिका के अष्टम भाव में यदि मंगल नीच का साथ ही शनि की युति हो तो दमरुका योग होता है। द्वितीय भाव मे भी अशुभ ग्रह हो तथा अष्टम में शनि, मंगल, राहु कोई ग्रह हो तो दमरुका योग होता है। इस योग में जातक की मृत्यु बड़ी दर्दनाक होती है। मुख्यत: वह आग में दम घुटने से या पानी में दम घुटने पर या गला घुटने से मरता है। यदि अष्टम मंगल हो तथा उस पर सूर्य की दृष्टि पड़ रही हो तो सड़क दुर्घटना में मृत्यु का योग बनता है।नवांश कुंडली में भी यही स्थिति बनी हो तथा सूर्य की महादशा चल रही हो तो भी सड़क दुर्घटना का भय होता है।बचने का उपाय क्या ?

महामृत्युंजय का जाप।

शिवाभिषेक एवं पूजन।

ऊँ नम: शिवाय का सतत जाप।

महाकाल का अभिषेक।

>पूर्व-दक्षिण में बनी सीढ़ियाँ अत्यंत शुभ–सदैव उत्तर दिशा में रखें तिजोरी ::—-

सीढ़ी :—
वास्तु के अनुसार मकान में सीढ़ी या सोपान पूर्व या दक्षिण दिशा में होना चाहिए। यह अत्यंत शुभ होता है। अगर सीढ़ियाँ मकान के पार्श्व में दक्षिणी व पश्चिमी भाग की दाईं ओर हो, तो उत्तम हैं। अगर आप मकान में घुमावदार सीढ़ियाँ बनाने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो आपके लिए यह जान लेना आवश्यक है कि सीढ़ियों का घुमाव सदैव पूर्व से दक्षिण, दक्षिण से पश्चिम, पश्चिम से उत्तर और उत्तर से पूर्व की ओर रखें। चढ़ते समय सीढ़ियाँ हमेशा बाएँ से दाईं ओर मुड़नी चाहिए।

एक और बात, सीढ़ियों की संख्या हमेशा विषम होनी चाहिए। एक सामान्य फार्मूला है- सीढ़ियों की संख्या को 3 से विभाजित करें तथा शेष 2 रखें- अर्थात्‌ 5, 11, 17, 23, 29 आदि की संख्या में हों।
वास्तु शास्त्र में भवन में सीढ़ियाँ वास्तु के अनुसार सही नहीं हो, तो उन्हें तोड़ने की जरूरत नहीं है। बस आपको वास्तु दोष दूर करने के लिए दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक कमरा बनवाना चाहिए। यदि सीढ़ियाँ उत्तर-पूर्व दिशा में बनी हों, तो।

तिजोरी (गल्ला) :—
मकान में गल्ला कहाँ रखना चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार मकान में तिजोरी-गल्ला, नकदी, कीमती आभूषण आदि सदैव उत्तर दिशा में रखना शुभ होता है। क्योंकि कुबेर का वास उत्तर दिशा में होता है इसलिए उत्तर दिशा की ओर मुख रखने पर धन वृद्धि होती है।

जब घर में बनाएँ अलमारी या लॉकर–सम चौड़ाई वाली अलमारी रखना उत्तम :::—-

घर में अलमारी या लॉकर बनाने के लिए भी मुहूर्त देखना चाहिए। स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, घनिष्ठा, उत्तरा व शुक्रवार इस हेतु शुभ हैं और प्रथमा, द्वितीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी व पूर्णिमा तिथियाँ इस हेतु श्रेष्ठ हैं।

अलमारी (विशेषत: लकड़ी वाली) यदि कहीं बहुत पतली या बहुत चौड़ी हो तो घर में अन्न-धन की कमी बनी रहती है। अत: सम चौड़ाई वाली अलमारी हो। तिरछी कटी अलमारी भी धन का नाश करती है।

जोड़ लगाया हुआ लॉकर या अलमारी घर में रखने पर कलह व शोक होता है। अलमारी या लॉकर आगे की तरफ झुकते हों तो गृहस्वामी घर से बाहर ही रहता है।

अलमारी व लॉकर का मुख सदैव पूर्व या उत्तर की ओर खुले। विधिवत पूजन के बाद ही उसमें वस्तुएँ रखें व हर शुभ अवसर पर इष्ट देव के साथ लॉकर का भी पूजन करें (कुबेर पूजन) ताकि घर में बरकत बनी रहे।

खिड़कियाँ- वास्तु के अनुसार मकान में खिड़कियों की संख्या बराबर होनी चाहिए। पश्चिमी, पूर्वी और उत्तरी दीवारों पर खिड़कियों का निर्माण शुभ माना गया है। यह भी ध्यान रखें कि मकान में खिड़कियाँ द्वार के सामने अधिकाधिक होनी चाहिए, ताकि चुम्बकीय चक्र पूर्ण होता रहे। खिड़कियाँ कभी भी सन्धि भाग में न लगवाएँ।

सदर द्वार- मकान में मुख्य द्वार किस दिशा में हो, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। वास्तु शास्त्र के अनुसार आपके घर का मुख्य द्वार उत्तर या पूर्व में होना चाहिए। भूलकर भी दक्षिण या पश्चिम दिशा में द्वार न बनवाएँ। लेकिन अगर आपका भूखण्ड ही इस योग्य न हो कि घर का मुख्य द्वार जैसा आप चाहते हैं, निकल न पाए तो क्या करना चाहिए।

जी हाँ, यह सब भूखण्ड की स्थिति पर निर्भर करता है। यदि भूखण्ड पूर्वोन्मुख हो, तो सदर द्वार ईशान और पूर्व दिशा के मध्य,
दक्षिणोन्मुख होने पर सदर द्वार आग्नेय व दक्षिण दिशा के मध्य, पश्चिमोन्मुख हो, तो नैऋत्य और पश्चिम दिशा के मध्य तथा यदि भूखण्ड उत्तरोन्मुख हो, तो मुख्य द्वार वायव्य व उत्तर दिशा के मध्य रखना शुभ माना जाता है। मुख्य द्वार की स्थापना शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से करवानी चाहिए।

कृपया ध्यान दें- प्रवेश द्वार अन्दर की ओर खुले, पल्ले दो हों, तो अति उत्तम। दरवाजे पर स्वतः खुलने या बंद होने की मशीन न लगवाएँ। घर के सदर द्वार पर मंगल चिन्ह का प्रतीक लगवाएँ।

सहायक दरवाजे- मकान में मुख्य द्वार के अलावा अन्य सहायक दरवाजे होते हैं। उन्हें एक शीर्ष में रखने चाहिए। दरवाजों की संख्या बराबर होनी चाहिए। एक के ऊपर दूसरा दरवाजा कदापि न रखें। दरवाजे और खिड़कियाँ उत्तर व पूर्व दिशा में अधिक रखें। द्वार के सामने भूल कर भी सीढ़ी या खम्भा आदि बाधा उत्पन्न करने वाली वस्तुएँ कदापि न रखें।

तहखाना : आजकल शहरों में स्थानाभाव के कारण लोग मकान में अंडर ग्राउण्ड तहखाने का निर्माण कर रहे हैं। तलधर अथवा तहखाना कहाँ होना चाहिए। यह ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

वास्तु शास्त्र के अनुसार तलधर का निर्माण भूमि के पूर्व में या उत्तर दिशा में करें, तो शुभ है। लेकिन यह भी सुनिश्चित करें कि तलधर आवासीय कदापि न हो अर्थात्‌ उसमें आप तथा आपका परिवार निवास नहीं करता हो। अन्यथा आप हमेशा कष्ट में रहेंगे।

तहखाने का निर्माण इस प्रकार करें कि उसके चारों ओर बराबर खाली भूमि छोड़ें। मध्य भाग में निर्माण कार्य करवाएँ। यदि तहखाने का आकार विशाल वस्तु आकार का हो अथवा चूल्हे के आकार का हुआ, तो यकीन मानें आपके तथा आपके परिवार के लिए कतई शुभ नहीं है। भवन का विनाश निश्चित है।

पार्किंग : भवन में पार्किंग वास्तु के अनुसार दक्षिण-पूर्व या उत्तर-पश्चिम दिशा में ही बनवाएँ।

पशुशाला : यदि आप अपने मकान का निर्माण वृहद उद्देश्यों की प्राप्ति को ध्यान में रखकर करने जा रहे हैं, तो पशुशाला का निर्माण मकान में उत्तर-पश्चिम दिशा अर्थात्‌ वायव्य कोण में निर्धारित कर लें। वास्तु शास्त्र के अनुसार यह अत्यंत शुभ होता है।

गायों-दुधारु पशुओं का स्थान वायव्य कोण में ही निर्धारित किया गया है।

ब्रह्म स्थान—-आँगन मकान का केन्द्रीय स्थल होता है। यह ब्रह्म स्थान भी कहलाता है। ब्रह्म स्थान सदैव खुला व साफ रखना चाहिए। पुराने जमाने में ब्रह्म स्थान में चौक, आँगन होता था। गाँवों की बात छोड़ दें, तो शहरों में मकान में आँगन रखने का रिवाज लगभग उठ-सा गया है।

वास्तु शास्त्र में मकान आँगन रखने पर जोर दिया जाता है। वास्तु के अनुसार, मकान का प्रारूप इस प्रकार रखना चाहिए कि आँगन मध्य में अवश्य हो। अगर स्थानाभाव है, तो मकान में खुला क्षेत्र इस प्रकार उत्तर या पूर्व की ओर रखें, जिससे सूर्य का प्रकाश व ताप मकान में अधिकाधिक प्रवेश कर सके।

इस तरह की व्यवस्था होने पर घर में रहने वाले प्राणी बहुत कम बीमार होते हैं। वे हमेशा सुखी रहते हैं, स्वस्थ व प्रसन्न रहते हैं। आँगन किस प्रकार होना चाहिए- यह मध्य में ऊँचा और चारों ओर से नीचा हो। अगर यह मध्य में नीचा व चारों ओर से ऊँचा है, तो यह आपके लिए नुकसान देह है। आपकी सम्पत्ति नष्ट हो सकती है। परिवार में विपदा बढ़ेगी।

आँगन के फला फल को दूसरे तरीके से भी जाना जा सकता है। वास्तु के अनुसार आँगन की लंबाई और चौड़ाई के योग को 8 से गुणा करके 9 से भाग देने पर शेष का नाम व फल इस प्रकार जानें:-

शेष का नाम फल
,, 1 ,, तस्कर ,, चोट भय
,, 2 ,, भोगी ,, ऐश्वर्य
,, 3 ,, विलक्षण ,, बौद्धिक विकास
,, 4 ,, दाता ,, धर्म-कर्म में वृद्धि
,, 5 ,, नृपति ,, राज-सम्मान
,, 6 ,, नपुंसक ,, स्त्री-पुत्रादि की हानि
,, 7 ,, धनद ,, धन का आगमन
,, 8 ,, दरिद्र ,, धन नाश
,, 9 ,, भयदाता ,, चोरी, शत्रुभय।

देवघर—-
वह पवित्रता जो मंदिर में रखी जाती है, उसके नियमों का पालन वहाँ किया जाता है, वह लाख कोशिशों के बाद भी हम हमारे घरों में नहीं रख सकते। घर को सुंदर घर रहने दीजिए, उसे इतना पवित्र करने की कोशिश न करें कि हम सरलता से जीना भूल जाएँ।

पूजा का एक निश्चित समय होना चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त सवेरे 3 बजे से, दोपहर 12 बजे तक के पूर्व का समय निश्चित करें। ईशान कोण में मंदिर सर्वश्रेष्ठ होता है। हमारा मुँह पूजा के समय ईशान, पूर्व या उत्तर में होना चाहिए, जिससे हमें सूर्य की ऊर्जा एवं चुंबकीय ऊर्जा मिल सके। इससे हमारा दिन भर शुभ रहे। कम से कम देवी-देवता पूजा स्थान में स्थापित करें। एकल रूप में स्थापित करें।

मन को पवित्र रखें। दूसरों के प्रति सद्भावना रखें तो आपकी पूजा सात्विक होगी एवं ईश्वर आपको हजार गुना देगा। आपके दुःख ईश्वर पर पूर्ण भरोसा करके ही दूर हो सकते हैं।

जानकार गुरु आपको सही मार्ग दिखाता है, पर उन्हें भी कसौटी पर कसकर, लोगों से पूछकर, राय जानकर उनके पास 100 प्रतिशत भरोसे से जाएँ तभी आपका कार्य सफल होगा। थोड़ी देर की पूजा स्थान की शांति हमारे मन के लिए काफी है। ध्यान केंद्र व अगरबत्ती लगाने का स्थान घर में होगा तो आप सुखी रहेंगे। जब भी ईश्वर के प्रति भावना जागे। घर में सिर्फ असाधना लगेगी? घर से नहीं, प्राण प्रतिष्ठित मंदिर में पूजा-पाठ से चमत्कार होगा।

कम से कम प्रतिमाएँ, कम से कम तस्वीर (लघु आकार की), पाठ, मंत्रोच्चार, कम से कम समय एकांत में रहिए तो सही अर्थों में पूजा-प्रार्थना सार्थक होगी। एक ‘सद्गृहस्थ’ को यह नियम अपनाने से घर-परिवार में सुख-शांति आएगी। ईश्वर की सेवा में कुछ दान-पुण्य, गौ-सेवा, मानव सेवा कीजिए।

>कुंडली में होते हैं अल्पायु योग–ज्योतिष बताए कितना जीएँगे आप—-

ज्योतिष मनुष्य के जीवन के हर पहलू की जानकारी देता है। उसकी आयु का निर्धारण भी करता है। मगर जीवन-मरण ईश्वर की ही इच्छानुसार होता है अतः कोई भी भविष्यवक्ता इस बारे में घोषणा न करें ऐसा गुरुओं का निर्देश होता है। हाँ, खतरे की पूर्व सूचना दी जा सकती है। जिससे बचाव के उपाय किए जा सके।

इसके अलावा व्यक्ति के जीवन पर केवल उसकी कुंडली का ही नहीं, वरन उसके संबंधियों की कुंडली के योगों का भी असर पड़ता है। जैसे किसी व्यक्ति की कुंडली में कोई वर्ष विशेष मारक हो मगर उसके पुत्र की कुंडली में पिता का योग बलवान हो, तो उपाय करने पर यह मारक योग केवल स्वास्थ्य कष्ट का योग मात्र बन जाता है। अतः इन सब बातों का ध्यान रखते हुए मनीषियों ने आयु निर्धारण के सामान्य नियम बताते हुए अल्पायु योगों का संकेत दिया है। पेश है उन्हीं की चर्चा :

1. आयु निर्धारण में मुख्य ग्रह यानि लग्न के स्वामी का बड़ा महत्व होता है। यदि मुख्य ग्रह 6, 8,12 में है तो वह स्वास्थ्य की परेशानी देगा ही देगा और उससे जीवन व्यथित होगा अतः इसकी मजबूती के उपाय करना जरूरी होता है।

2. यदि सभी पाप ग्रह शनि, राहू, सूर्य, मंगल, केतु और चंद्रमा (अमावस्या वाला) 3, 6,12 में हो तो आयु योग कमजोर करते हैं। लग्न में लग्नेश सूर्य के साथ हो और उस पर पाप दृष्टि हो तो आयु योग कमजोर पड़ता है।

3. यदि आठवें स्थान का स्वामी यानि अष्टमेश 6 या 12 स्थान में हो और पाप ग्रहों के साथ हो या पाप प्रभाव में हो तो आयु कम करते है। लग्नेश निर्बल हो और केंद्र में सभी पाप ग्रह हो, जिन पर शुभ दृष्टि न हो तो आयु कम होती है।

4. धन और व्यय भाव में (2 व 12 में) पाप ग्रह हो और मुख्य ग्रह कमजोर हो तो आयु कम होती है।

5. लग्न में शुक्र और गुरु हो और पापी मंगल 5वें भाव में हो तो आयु कमजोर करता है।

6. लग्न का स्वामी होकर चन्द्रमा अस्त हो, ग्रहण में हो या नीच का हो तो आयु कम करता है।

विशेष : यदि ये सारे योग या इनमें से कुछ भी योग कुंडली में हो तो विशेष ध्यान रखना चाहिए। सभी तरह के व्यसनों से बचना चाहिए। इष्ट का जप ध्यान-दान करते रहना चाहिए। गुरु की शरण लेना चाहिए और मुख्य ग्रह को मजबूत करने के उपाय करते रहना चाहिए।
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धनहीनता के ज्योतिष योग—

धनहानि किसी को भी अच्छी नहीं लगती है। आज उन ज्योतिष योगों की चर्चा करेंगे जो धनहानि या धनहीनता कराते हैं। कुछ योग इस प्रकार हैं-
१. धनेश छठे, आठवें एवं बारहवें भाव में हो या भाग्येश बारहवें भाव में हो तो जातक करोड़ों कमाकर भी निर्धन रहता है। ऐसे जातक को धन के लिए अत्यन्त संघर्ष करना पड़ता है। उसके पास धन एकत्रा नहीं होता है अर्थात्‌ दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि धन रुकता नहीं है।
२. जातक की कुंडली में धनेश अस्त या नीच राशि में स्थित हो तथा द्वितीय व आठवें भाव में पापग्रह हो तो जातक सदैव कर्जदार रहता है।
३. जातक की कुंडली में धन भाव में पापग्रह स्थित हों। लग्नेश द्वादश भाव में स्थित हो एवं लग्नेश नवमेश एवं लाभेश(एकादश का स्वामी) से युत हो या दृष्ट हो तो जातक के ऊपर कोई न कोई कर्ज अवश्य रहता है।
४. किसी की कुंडली में लाभेश छठे, आठवें एवं बारहवें भाव में हो तो जातक निर्धन होता है। ऐसा जातक कर्जदार, संकीर्ण मन वाला एवं कंजूस होता है। यदि लग्नेश भी निर्बल हो तो जातक अत्यन्त निर्धन होता है।
५. षष्ठेश एवं लाभेश का संबंध दूसरे भाव से हो तो जातक सदैव ऋणी रहता है। उसका पहला ऋण उतरता नहीं कि दूसरा चढ़ जाता है। यह योग वृष, वृश्चिक, मीन लग्न में पूर्णतः सत्य सिद्ध होते देखा गया है।
६. धन भाव में पाप ग्रह हों तथा धनेश भी पापग्रह हो तो ऐसा जातक दूसरों से ऋण लेता है। अब चाहे वह किसी करोड़पति के घर ही क्यों न जन्मा हो।
७. किसी जातक की कुंडली में चन्द्रमा किसी ग्रह से युत न हो तथा शुभग्रह भी चन्द्र को न देखते हों व चन्द्र से द्वितीय एवं बारहवें भाव में कोई ग्रह न हो तो जातक दरिद्र होता है। यदि चन्द्र निर्बल है तो जातक स्वयं धन का नाश करता है। व्यर्थ में देशाटन करता है और पुत्रा एवं स्त्राी संबंधी पीड़ा जातक को होती है।
८. यदि कुंडली में गुरु से चन्द्र छठे, आठवें या बारहवें हो एवं चन्द्र केन्द्र में न हो तो जातक दुर्भाग्यशाली होता है और उसके पास धन का अभाव होता है। ऐसे जातक के अपने ही उसे धोखा देते हैं। संकट के समय उसकी सहायता नहीं करते हैं। अनेक उतार-चढ़ाव जातक के जीवन में आते हैं।
९. यदि लाभेश नीच, अस्त य पापग्रह से पीड़ित होकर छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तथा धनेश व लग्नेश निर्बल हो तो ऐसा जातक महा दरिद्र होता है। उसके पास सदैव धन की कमी रहती है। सिंह एवं कुम्भ लग्न में यह योग घटित होते देखा गया है।
१०. यदि किसी जातक की कुण्डली में दशमेश, तृतीयेश एवं भाग्येश निर्बल, नीच या अस्त हो तो ऐसा जातक भिक्षुक, दूसरों से धन पाने की याचना करने वाला होता है।
११. किसी कुण्डली में मेष में चन्द्र, कुम्भ में शनि, मकर में शुक्र एवं धनु में सूर्य हो तो ऐसे जातक के पिता एवं दादा द्वारा अर्जित धन की प्राप्ति नहीं होती है। ऐसा जातक निज भुजबल से ही धन अर्जित करता है और उन्नति करता है।
१२. यदि कुण्डली का लग्नेश निर्बल हो, धनेश सूर्य से युत होकर द्वादश भाव में हो तथा द्वादश भाव में नीच या पापग्रह से दृष्ट सूर्य हो तो ऐसा जातक राज्य से दण्ड स्वरूप धन का नाश करता है। ऐसा जातक मुकदमें धन हारता है। यदि सरकारी नौकरी में है तो अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित या नौकरी से निकाले जाने का भय रहता है। वृश्चिक लग्न में यह योग अत्यन्त सत्य सिद्ध होता देखा गया है।
१३. यदि धनेश एवं लाभेश छठे, आठवें, बारहवें भाव में हो एवं एकादश में मंगल एवं दूसरे राहु हो तो ऐसा जातक राजदण्ड के कारण धनहानि उठाता है। वह मुकदमे, कोर्ट व कचहरी में मुकदमा हारता है। अधिकारी उससे नाराज रहते हैं। उसे इनकम टैक्स से छापा लगने का भय भी रहता है।
मूलतः धनेश, लाभेश, दशमेश, लग्नेश एवं भाग्येश निर्बल हो तो धनहीनता का योग बनता है।
उक्त धनहीनता के योग योगकारक ग्रहों की दशान्तर्दशा में फल देते हैं। फल कहते समय दशा एवं गोचर का विचार भी कर लेना चाहिए

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>पितृ दोष निवारण के सरल उपाय —-

>जन्म कुंडली के प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम व दशम भावों में से किसी एक भाव पर सूर्य-राहु अथवा सूर्य-शनि का योग हो तो जातक को पितृ दोष होता है। यह योग कुंडली के जिस भाव में होता है उसके ही अशुभ फल घटित होते हैं। जैसे प्रथम भाव में सूर्य-राहु अथवा सूर्य-शनि आदि अशुभ योग हो तो वह व्यक्ति अशांत, गुप्त चिंता, दाम्पत्य एवं स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ होती हैं।

दूसरे भाव में यह योग बने तो परिवार में वैमनस्य व आर्थिक उलझनें हों, चतुर्थ भाव में पितृ योग के कारण भूमि, मकान, माता-पिता एवं गृह सुख में कमी या कष्ट होते हैं। पंचम भाव में उच्च विद्या में विघ्न व संतान सुख में कमी होने के संकेत हैं। सप्तम में यह योग वैवाहिक सुख में नवम में भाग्योन्नति में बाधाएँ तथा दशम भाव में पितृ दोष हो तो सर्विस या कार्य व्यवसाय संबंधी परेशानियाँ होती हैं। प्रत्येक भावानुसार फल का विचार होता है। सूर्य यदि नीच में होकर राहु या शनि के साथ पड़ा हो तो पितृदोष ज्यादा होता है।

किसी कुंडली में लग्नेश ग्रह यदि कोण (6,8 या 12) वें भाव में स्थित हो तथा राहु लग्न भाव में हो तब भी पितृदोष होता है। पितृयोग कारक ग्रह पर यदि त्रिक (6, 8,12) भावेश एवं भावों के स्वामी की दृष्टि अथवा युति का संबंध भी हो जाए, तो अचानक वाहनादि के कारण दुर्घटना का भय, प्रेत बाधा, ज्वर, नेत्र रोग, तरक्की में रुकावट या बनते कार्यों में विघ्न, अपयश, धन हानि आदि अनिष्ट फल होते हैं। ऐसी स्थिति में रविवार की संक्रांति को लाल वस्तुओं का दान कर तथा पितरों का तर्पण करने से पितृ आदि दोषों की शांति होती है।

चंद्र राहु, चंद्र केतु, चंद्र बुध, चंद्र, शनि आदि योग भी पितृ दोष की भाँति मातृ दोष कहलाते हैं। इनमें चंद्र-राहु एवं सूर्य-राहु योगों को ग्रहण योग तथा बुध-राहु को जड़त्व योग कहते हैं।

इन योगों के प्रभावस्वरूप भी भावेश की स्थिति अनुसार ही अशुभ फल प्रकट होते हैं। सामान्यतः चन्द्र-राहु आदि योगों के प्रभाव से माता अथवा पत्नी को कष्ट, मानसिक तनाव,आर्थिक परेशानियाँ, गुप्त रोग, भाई-बंधुओं से विरोध, अपने भी परायों जैसे व्यवहार रखें आदि फल घटित होते हैं।

दशम भाव का स्वामी छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो इसका राहु से दृष्टि या योग आदि का संबंध हो तो भी पितृदोष होता है। यदि आठवें या बारहवें भाव में गुरु-राहु का योग और पंचम भाव में सूर्य-शनि या मंगल आदि कू्र ग्रहों की स्थिति हो तो पितृ दोष के कारण संतान कष्ट या संतान सुख में कमी रहती है।

अष्टमेश पंचम भाव में तथा दशमेष अष्टम भाव में हो तो भी पितृदोष के कारण धन हानि अथवा संतान के कारण कष्ट होते हैं। यदि पंचमेश संतान कारक ग्रह राहु के साथ त्रिक भावों में हो तथा पंचम में शनि आदि कू्र ग्रह हो तो भी संतान सुख में कमी होती है।

इस प्रकार राहु अथवा शनि के साथ मिलकर अनेक अनिष्टकारी योग बनते हैं, जो पितृ दोष की भाँति ही अशुभ फल प्रदान करते हैं। बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में कुंडली में इस प्रकार के शापित योग कहे गए हैं। इनमें पितृ दोष श्राप, भ्रातृ श्राप,मातृ श्राप, प्रेम श्राप आदि योग प्रमुख हैं। अशुभ पितृदोषों योगों के प्रभाव स्वरूप जातक के स्वास्थ्य की हानि, सुख में कमी, आर्थिक संकट, आय में बरकत न होना, संतान कष्ट अथवा वंशवृद्धि में बाधा, विवाह में विलम्ब्, गुप्त रोग, लाभ व उन्नति में बाधाएं तनाव आदि अशुभ फल प्रकट होते हैं।

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली सूर्य-राहू, सूर्य-शनि आदि योगों के कारण पितृ दोष हो, तो उसके लिए नारायण बलि, नाग पूजा अपने दिवंगत पितरों का श्राद्ध, पितृ तर्पण, ब्रह्म भोज, दानादि कर्म करवाने चाहिए। पितृदोष निवारण के लिए अपने घर की दक्षिण दिशा की दीवार पर अपने दिवंगत पूर्वजों के फोटो लगाकर उन पर हार चढ़ाकर सम्मानित करना चाहिए तथा उनकी मृत्यु तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र एवं दक्षिणा सहित दान, पितृ तर्पण एवं श्राद्ध कर्म करने चाहिए।

जीवित माता-पिता एवं भाई-बहनों का भी आदर-सत्कार करना चाहिए। हर अमावस को अपने पितरों का ध्यान करते हुए पीपल पर कच्ची लस्सी, गंगाजल, थोड़े काले तिल, चीनी, चावल, जल, पुष्पादि चढ़ाते हुए ॐ पितृभ्यः नमः मंत्र तथा पितृ सूक्त का पाठ करना शुभ होगा।

हर संक्रांति, अमावस एवं रविवार को सूर्य देव को ताम्र बर्तन में लाल चंदन गंगाजल, शुद्ध जल डालकर बीज मंत्र पढ़ते हुए तीन बार अर्घ्य दें। श्राद्ध के अतिरिक्त इन दिनों गायों को चारा तथा कौए, कुत्तों को दाना एवं असहाय एवं भूखे लोगों को भोजन कराना चाहिए।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>तृतीय स्थान संबंधी योग—

>तृतीय स्थान संबंधी योग—-
स्थिति अनुसार भाव की क्षमता का आकलन—-

तृतीय स्थान से हम भाई-बहनों से संबंधों का विचार करते हैं। तृतीय भाव से कान, व्यक्ति की अभिरुचि, छोटे-मोटे प्रवास, मन की स्थिति, लेखन, साहित्य में रुचि, आर्थिक स्थिति, पराक्रम आदि का अंदाज लगाते हैं।

तृतीय स्थान का स्वामी तृतीयेश कहलाता है। इसकी विभिन्न भाव में स्थिति के अनुसार इस भाव की क्षमता का आकलन किया जाता है।

1. तृतीयेश लग्न में हो तो महत्वाकांक्षा व आत्मविश्वास प्रबल रहता है। भाई-बहनों का सुख श्रेष्ठ होता है।
2. तृतीयेश द्वितीय में हो तो संयुक्त परिवार रहता है, भाई-बहनों में स्नेह बना रहता है।
3. तृतीयेश यदि तृतीय भाव में ही हो तो इस भाव से संबंधित सारे सुख पुष्ट हो जाते हैं। लेखन से यश मिलता है।
4. तृतीयेश चतुर्थ में हो तो मनमाफिक घर-वाहन सुख मिलता है।
5. तृतीयेश पंचम में हो तो संतति कर्तव्यदक्ष होती है, भाई-बहनों से संबंध पुष्ट रहते हैं व कला में प्रगति होती है।
6. तृतीयेश षष्ठ में हो तो शरीर में अस्वस्थता बनी रहती है। परिवार सुख में कमी आती है।
7. तृतीयेश सप्तम में हो तो जमीन-जायदाद के मुकदमों में जीत, जीवनसाथी से सुख व पार्टनरशिप में परिवारजनों से लाभ होता है।
8. तृतीयेश अष्टम में हो तो परिवार से, भाई-बहनों से बैर होता है। वैवाहिक जीवन भी तनावपूर्ण रहता है।
9. तृतीयेश नवम में हो तो आध्यात्मिक प्रवास व प्रगति के योग आते हैं, लेखन के क्षेत्र में नाम चमकता है।
10. तृतीयेश दशम में हो तो दो-तीन मार्गों से आय होती रहती है। उच्च अधिकार के मार्ग प्रशस्त होते हैं।
11. तृतीयेश ग्यारहवें में हो तो स्व परिश्रम से धनार्जन होता है, मित्र परिवार से लाभ सहयोग मिलता है।
12. तृतीयेश व्यय में हो तो आर्थिक स्थिति साधारण रहती है, परिवार से वैमनस्य बना रहता है। वाद-विवाद से नुकसान होता है।

>वास्तुदोष मुक्ति के कुछ सरल उपाय–नकारात्मक ऊर्जा को करें दूर–

आपको मालूम होना चाहिए कि मकान के प्रवेश द्वार के सामने कोई रोड, गली या टी जक्शन हो, तो ये गंभीर वास्तुदोष उत्पन्न करते हैं, खासकर उन भवनों में जो दक्षिण व पश्चिम मुखी होते हैं। ऐसा माना जाता है कि ऐसे मकान में निवास करने वाले लोगों को प्रत्येक काम में असफलता ही हाथ लगती है।

वास्तुदोष से मुक्ति के लिए यह उपाय करें :-

- आप अपने मकान के बाहर उस नकारात्मक टी की तरफ मुँह किए 6 इंच का एक अष्टकोण आकार का मिरर लटका दें। ऐसा करने से दक्षिण एवं पश्चिम दिशाओं की टी का सम्पूर्ण वास्तुदोष ठीक हो जाता है।

- आपके मकान में कमरे की खिड़की, दरवाजा या बॉलकनी ऐसी दिशा में खुले, जिस ओर कोई खंडहरनुमा मकान स्थित हो। या वहाँ कोई उजाड़ जमीन या प्लाट पड़ा हो या फिर बरसों से बंद पड़ा मकान हो, श्मशान या कब्रिस्तान स्थित हो, तो यह अत्यंत अशुभ है। ऐसे मकान में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए किसी शीशे की प्लेट में कुछ छोटे-छोटे फिटकरी के टुकड़े आदि खिड़की या दरवाजे या बालकनी के पास रख दें तथा उन्हें हर महीने नियम से बदलते रहें, तो वास्तुदोष से मुक्ति मिलती है।

- यदि मकान के किसी कमरे में सोने पर तरह-तरह के भयावह सपने आते रहते हों, इसके कारण आपको रात में नींद नहीं आती
हो, बुरे सपने देखने के बाद छोटे बच्चे सो नहीं पाते और रतजगा करने लगते हैं अथवा रोते रहते हैं, इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए कमरे में एक जीरो वॉट का पीले रंग का नाइट लैम्प या बल्ब जलाए रखें। यह उस कमरे में बाहर से आने वाली नकारात्मक ऊर्जा को मार भगाता है।

- कभी-कभी बच्चों को मकान के किसी कमरे में अकेले जाने से डर लगता है, उस कमरे में सोने के नाम से ही उनके रोंगटे खड़े
हो जाते हैं, ऐसे में बेड या पलंग के सिरहाने के पास वाले दोनों किनारों में ताँबे के तार से बने स्प्रिंगनुमा छल्ले डाल दें। ये छल्ले
नकारात्मकता को दूर करते हैं। छल्लों को कोने पर डालने से और तेजी से लाभ प्राप्त होगा।

- यदि किसी मकान की छत पर पूर्व, उत्तर या पूर्वोत्तर दिशाओं में कमरा, स्टोर या सर्वेन्ट रूम आदि बने हों तथा ये तीनों दिशाएँ दक्षिण-पश्चिम के नैऋत्य कोण से ऊँची बन गई हों, तो ऐसा मकान गृह स्वामी को कभी सुख नहीं देता। गृह स्वामी हमेशा परेशान व दुखी रहता है।

ऐसा गृह स्वामी अपने जीवन में नौकरियाँ बदलते रहता है अथवा व्यापार में भाग्य आजमाते रहता है। इस समस्या से मुक्ति व वास्तुदोष से छुटकारा पाने के लिए मकान के दक्षिण-पश्चिम कोने में छत पर एक पतला-सा लोहे का पाइप एवं उस पर पीली या लाल रंग की झंडी लटका दें। इससे दक्षिण-पश्चिम का कोना सबसे ऊँचा हो जाता है।

घर में विविध तस्वीरें लगाना, मूर्तियाँ रखना हमारा शौक होता है। मगर यह करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए अन्यथा घर की सुख-शांति नष्ट होते देर नहीं लगती।

1. स्नेह-शांति व सुख का प्रतीक (प्रदर्शन) करने वाली मूर्तियाँ या तस्वीरें लगाएँ। क्रोध, वैराग्य, भयकारी, वीभत्स, दुख की भावना वाली वस्तुएँ न रखें।

2. युद्ध प्रसंग, रामायण या महाभारत के युद्ध के चित्र, राक्षसों की मूर्तियाँ, तलवार लिए योद्धा आदि घर में न रखें।

3. करुण रस से ओतप्रोत स्त्री, रोता बच्चा, अकाल, सूखे पेड़ आदि की तस्वीरें कतई न लगाएँ।

4. बंदर, सर्प, गिद्ध, कबूतर, बाघ, कौआ, गरुड़, उल्लू, भालू, सियार, सुअर आदि की तस्वीरें या मूर्ति कतई न रखें।

5. ऐतिहासिक-पौरा‍णिक घटनाओं को दिखाने वाली तस्वीरें न लगाएँ।

6. घोड़ा, ऊँट या हिरण घर में लगाया जा सकता है।

7. घर में स्थान-स्थान पर भगवान की मूर्तियाँ या चित्र न लगाएँ। इनसे लाभ की बजाय हानि होती हैं।

8. उन्हीं तस्वीरों या मूर्तियों को चुनें जो देखने पर मन को शांति और सुख प्रदान करें।

9. हंस की तस्वीर से घर में समृद्धि आती है।

>वास्तु अनुसार कहाँ हो बाथरूम… उत्तर-पूर्व में रखें पानी का बहाव

बाथरूम यह मकान के नैऋत्य; पश्चिम-दक्षिण कोण में एवं दिशा के मध्य अथवा नैऋत्य कोण व पश्चिम दिशा के मध्य में होना उत्तम है। वास्तु के अनुसार, पानी का बहाव उत्तर-पूर्व में रखें।

जिन घरों में बाथरूम में गीजर आदि की व्यवस्था है, उनके लिए यह और जरूरी है कि वे अपना बाथरूम आग्नेय कोण में ही रखें, क्योंकि गीजर का संबंध अग्नि से है। चूँकि बाथरूम व शौचालय का परस्पर संबंध है तथा दोनों पास-पास स्थित होते हैं। शौचालय के लिए वायव्य कोण तथा दक्षिण दिशा के मध्य या नैऋत्य कोण व पश्चिम दिशा के मध्य स्थान को सर्वोपरि रखना चाहिए।

शौचालय में सीट इस प्रकार हो कि उस पर बैठते समय आपका मुख दक्षिण या उत्तर की ओर होना चाहिए। अगर शौचालय में एग्जास्ट फैन है, तो उसे उत्तरी या पूर्वी दीवार में रखने का निर्धारण कर लें। पानी का बहाव उत्तर-पूर्व रखें।

वैसे तो वास्तु शास्त्र-स्नान कमरा व शौचालय का अलग-अलग स्थान निर्धारित करता है,पर आजकल जगह की कमी के कारण दोनों को एक साथ रखने का रिवाज-सा चल पड़ा है।

लेकिन ध्यान रखें कि अगर बाथरूम व लैट्रिन, दोनों एक साथ रखने की जरूरत हो तो मकान के दक्षिण-पश्चिम भाग में अथवा वायव्य कोण में ही बनवाएँ या फिर आग्नेय कोण में शौचालय बनवाकर उसके साथ पूर्व की ओर बाथरूम समायोजित कर लें। स्नान गृह व शौचालय नैऋत्य व ईशान कोण में कदापि न रखें।

पश्चिम दिशा में रखें शयनकक्ष—–

बैडरूम कई प्रकार के होते हैं। एक कमरा होता है- गृह स्वामी के सोने का एक कमरा होता है परिवार के दूसरे सदस्यों के सोने का। लेकिन जिस कमरे में गृह स्वामी सोता है, वह मुख्य कक्ष होता है।

अतः यह सुनिश्चित करें कि गृह स्वामी का मुख्य कक्ष; शयन कक्ष, भवन में दक्षिण या पश्चिम दिशा में स्थित हो। सोते समय गृह स्वामी का सिर दक्षिण में और पैर उत्तर दिशा की ओर होने चाहिए।

इसके पीछे एक वैज्ञानिक धारणा भी है। पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव और सिर के रूप में मनुष्य का उत्तरी ध्रुव और मनुष्य के पैरों का दक्षिणी ध्रुव भी ऊर्जा की दूसरी धारा सूर्य करता है। इस तरह चुम्बकीय तरंगों के प्रवेश में बाधा उत्पन्न नहीं होती है। सोने वाले को गहरी नींद आती है। उसका स्वास्थ्य ठीक रहता है। घर के दूसरे लोग भी स्वस्थ रहते हैं। घर में अनावश्यक विवाद नहीं होते हैं।

यदि सिरहाना दक्षिण दिशा में रखना संभव न हो, तो पश्चिम दिशा में रखा जा सकता है। स्टडी; अध्ययन कक्ष वास्तु शास्त्र के अनुसार आपका स्टडी रूम वायव्य, नैऋत्य कोण और पश्चिम दिशा के मध्य होना उत्तम माना गया है।

ईशान कोण में पूर्व दिशा में पूजा स्थल के साथ अध्ययन कक्ष शामिल करें, अत्यंत प्रभावकारी सिद्ध होगा। आपकी बुद्धि का विकास होता है। कोई भी बात जल्दी आपके मस्तिष्क में फिट हो सकती है। मस्तिष्क पर अनावश्यक दबाव नहीं रहता।

>March 27, 2011:Sunday, Krishna Navami (whole day),
Poorvashadha till 22:25, Parigha yoga till 5:35*,
Taitula karana till 18:14,
RahuK: 16:52* – 18:22*, GulikaK: 15:22* – 16:52*, YamaG: 12:22* – 13:52*,
Sunrise at 6:20*, Sunset at 18:32,
Moonrise at 2:29*, Moonset at 12:18, Moonset at 12:18,
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27 मार्च, 2011:रविवार, कृष्णा नवमी (सारा दिन),
22:25 तक Poorvashadha, 5:35 * तक Parigha योग,
जब तक 18:14 करण Taitula,
RahuK: * 16:52-18:22 *, GulikaK: 15:22 * – * 16:52, YamaG: 0:22 * – 13:52 *,
18:32 पर सूर्योदय पर 6:20 सूर्यास्त, *,
—————————————————————–

दैनिक राशिफल–27 march 2011 ::—-
राशि फलादेश– मेष–
नए संबंध बनेंगे। यात्रा लाभप्रद रहेगी। प्रयास तुरंत फलदायी होंगे। नवीन योजनाएँ साकार हो सकेंगी। व्यापार-व्यवसाय अच्छा चलेगा।
राशि फलादेश– वृष—
रुका धन प्राप्त होगा। मितव्ययी बनें अन्यथा परेशानी हो सकती है। कार्य की सफलता के लिए प्रयत्नशील रहें। आपका प्रभाव बढ़ने से शत्रु परास्त होंगे।
राशि फलादेश– मिथुन—
एक्स्ट्रा कर्ज लेने से बचें। बुरी आदतों को अपने ऊपर हावी न होने दें। सुख में कमी आएगी। व्यापार में कर्मचारियों पर अधिक विश्वास न करें।
राशि फलादेश –कर्क–
खर्चों में कमी करें। विद्यार्थियों को पढ़ाई पर ध्यान देना आवश्यक है। आपके कार्यों की समाज में प्रशंसा होगी। व्यक्तिगत कामों में उन्नति होगी। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा में विजय मिलेगी।
राशि फलादेश– सिंह–
जीवनसाथी की भावनाओं का अनादर न करें। पारिवारिक क्लेश होगा। शत्रुओं द्वारा बाधाएँ उत्पन्न की जा सकती हैं। रोजगार में समय पर निर्णय न लेने से हानि होगी।
राशि फलादेश –कन्या—
पठन-पाठन में रुचि जागृत होगी। स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। व्यापार में आशानुकूल लाभ की संभावना है। संतान के भविष्य की चिंता रहेगी।
राशि फलादेश –तुला–
व्यापार में उन्नति होगी। अनायास लाभ होने के योग हैं। पूर्व में किए गए कार्यों के फल मिलेंगे। रिश्तेदारों से संबंध प्रगाढ़ होंगे।
राशि फलादेश –वृश्चिक—
आर्थिक तंगी से मुक्ति मिलेगी। सफल प्रवास होगा। प्रतिकूलता दूर होगी। तनावमुक्त होने से प्रसन्नता होगी। सहयोग व अच्छे संबंधों के कारण लाभ होगा।
राशि फलादेश –धनु—
अनेक रुके काम पूर्ण होंगे। सम्मान व यश बढ़ेगा। व्यापार अच्छा चलेगा। वाणी पर नियंत्रण जरूरी है। धर्म में रुचि रहेगी।
राशि फलादेश– मकर–
उत्तेजना कार्यों को उलझा सकती है। अधिक खर्च से बचें। पराक्रम व सुख-समृद्धि बढ़ेगी। लाभ का मार्ग अवरुद्ध होगा। बोलचाल में संयम रखें।
राशि फलादेश कुंभ–
मकान संबंधी समस्या का समाधान होगा। श्रेष्ठजनों से मेल आपकी उन्नति में सहायक हो सकता है। आजीविका में इच्छित लाभ के योग हैं।
राशि फलादेश –मीन–
आर्थिक स्थिति संतोषजनक रहेगी। संतान की गतिविधियों पर नजर रखें। कार्य में विस्तार होगा। बुद्धिमानी से समस्या का समाधान होगा। व्यापार में सफलता मिलेगी।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>ग्रहण आ रहा है – 2011—

>ग्रहण आ रहा है – 2011—-

प्रकार दिनांक समय (जी.टी.) सूर्य चंद्रमा
आंशिक सौर 2011/01/04 08:50:37 19 ° 37’37? धनु 19 ° 31’46? धनुराशि
आंशिक सौर 2011/06/01 21:16:04 17 ° 01’25? वृषभ 17 ° 07’59? वृषभ
कुल चंद्र 2011/06/15 20:12:34 00 ° 22’25? 21’53 मिथुन 00 °? धनुराशि
आंशिक सौर 2011/07/01 08:38:14 15 ° 10’43? मिथुन 15 ° 02’37? मिथुन राशि
आंशिक सौर 2011/11/25 06:20:19 08 ° 35’52? 42’02 वृश्चिक 08 °? वृश्चिक
कुल चंद्र 2011/12/10 14:31:50 24 ° 09’05? वृश्चिक 24 ° 06’57? वृषभ

>आज के मुहूर्त –(रविवार 27 मार्च 2011) —–
शुभ विक्रम संवत- 2067, शालिवाहन शक संवत- 1932, संवत्सर का नाम- शोभन, अयन- उत्तरायन,
ऋतु- वसंत, मास- चैत्र, पक्ष- कृष्ण, तिथि- नवमी अहोरात्र, हिजरी सन्- 1432, मु. मास- रबिलाखर, तारीख- 21,
नक्षत्र- पूर्वाषाढ़ा रात्रि 10.26 पश्चात उत्तराषाढ़ा, योग- परिध मंगलरात्रि 5.36 पश्चात शिव,
सूर्योदयकालीन करण- तैतिल, चन्द्रमा- धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश मंगलरात्रि 4.52 पर करेंगे।
दिन- सामान्य। दिशाशूल- पश्चिम ‍में। कार्य की अनुकूलता के लिए- सूर्य को रक्तपुष्प मिश्रित जल देकर सात बार घूमें।
उपयोगी ज्ञान- यज्ञ आदि पुण्य कार्य के निमंत्रण पत्र को जलाने से दोष लगता है व हानि होती है।
शुभ समय- प्रात: 6.53 से 8.48 दिन 12.38 से 02.26।
सुझाव- आवश्यक न हो तो प्रात: 05.06 से 6.38 के मध्य शुभ कार्य न करें।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>चौघिड़या देखने की सुविधा—-

>चौघिड़या देखने की सुविधा—

किसी भी कार्य को शुभ मुहूर्त या समय पर प्रारंभ किया जाए तो परिणाम अपेक्षित आने की संभावना ज्यादा प्रबल होती है। यह शुभ समय चौघड़िया में देखकर प्राप्त किया जाता है। यहां हमने चौघिड़या देखने की सुविधा उपलब्ध कराई है।

दिन का चोघडिया –

से तक रवि सोम मंगल बुध गुरु शुक्र शनि
6:00 AM 7:30 AM उद्बेग अमृत रोग लाभ शुभ चर काल
7:30 AM 9:00 AM चर काल उद्बेग अमृत रोग लाभ शुभ
9:00 AM 10:30 AM लाभ शुभ चर काल उद्बेग अमृत रोग
10:30 AM 12:00PM अमृत रोग लाभ शुभ चर काल उद्बेग
12:00 PM 1:30 PM काल उद्बेग अमृत रोग लाभ शुभ चर
1:30 PM 3:00 PM शुभ चर काल उद्बेग अमृत रोग लाभ
3:00 PM 4:30 PM रोग लाभ शुभ चर काल उद्बेग अमृत
4:30 PM 6:00 PM उद्बेग अमृत रोग लाभ शुभ चर काल
– शुभ – अमृत – लाभ
——————————————————————–
रात का चोघडिया —

से तक रवि सोम मंगल बुध गुरु शुक्र शनि
6:00 PM 7:30 PM शुभ चर काल उद्बेग अमृत रोग लाभ
7:30 PM 9:00 PM अमृत रोग लाभ शुभ चर काल उद्बेग
9:00 PM 10:30 PM चर काल उद्बेग अमृत रोग लाभ शुभ
10:30 PM 12:00 AM रोग लाभ शुभ चर काल उद्बेग अमृत
12:00 AM 1:30 AM काल उद्बेग अमृत रोग लाभ शुभ चर
1:30 AM 3:00 AM लाभ शुभ चर काल उद्बेग अमृत रोग
3:00 AM 4:30 AM उद्बेग अमृत रोग लाभ शुभ चर काल
4:30 AM 6:00 AM शुभ चर काल उद्बेग अमृत रोग लाभ

विशेष-दिन और रात्रि के चौघड़िया का आरंभ क्रमशः सूर्योदय और सूर्यास्त से होता है। प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है। समयानुसार चौघड़िया को तीन भागों में बांटा जाता है शुभ, मध्यम और अशुभ चौघड़िया। इसमें अशुभ चौघड़िया पर कोई नया कार्य शुरु करने से बचना चाहिए।

शुभ चौघडिया शुभ (स्वामी गुरु), अमृत (स्वामी चंद्रमा), लाभ (स्वामी बुध)
मध्यम चौघडिया चर (स्वामी शुक्र)
अशुभ चौघड़िया उद्बेग (स्वामी सूर्य), काल (स्वामी शनि), रोग (स्वामी मंगल)

>विविध राशियों में स्थित केतु का प्रभाव–कुंडली में मौजूद केतु से जानें फलादेश:::—-

प्रत्येक ग्रह परिभ्रमण करते हुए द्वादश राशियों पर विराजमान रहते हैं। मेष से मीन तक। केतु किस राशि पर स्थित है तो क्या प्रभाव देगा, जानिए।

मेष : यदि केतु जातक की कुंडली में मेष राशि पर विराजमान है तो भौतिकवादी, धन संग्रह करने वाला, स्वार्थी, लोभी, चंचल बहुभाषी
सुखी के साथ जातक के चेहरे पर चेचक के दाग होंगे।

वृषभ : वृषभ राशि पर यदि केतु स्थित है, तो जातक तीर्थ में धार्मिक पर्वों में रु‍चि लेने वाला, आलसी, उदार, दानी तथा जातक परोपकारी होता है।

मिथुन : मिथुन राशि पर यदि केतु स्थित है, तो वात्-विकारी, अल्पसंतोषी, दम्भी, अल्पायु, प्रभावशाली संगीतज्ञ, व्यवहार कुशल, विद्वान के समान व्यक्तित्व होगा।

कर्क : कर्क राशि पर यदि केतु स्थित है तो धननाशक, अध्यात्मवादी, परिश्रमी, दूसरे का ध्यान केंद्रित करने वाला, कफ से पीड़ित के
साथ, प्रेत बाधा के योग जातक को होते हैं।

सिंह : सिंह राशि पर यदि केतु विराजमान है, तो बहुभाषी डरपोक असहिष्णु और उच्च गुणों वाला होता है। इसी के साथ विविध कला में निपुण, विद्वान होता है।

कन्या : कन्या राशि पर केतु स्थित है, तो जातक बीमार रहने वाला, धन नाशक के साथ मूर्ख, अल्पबुद्धि एवं शरीर से कमजोर रहता
है।

तुला : तुला राशि में केतु स्थित है तो कामी, क्रोधी, दुखी, हणी, असंतोषी एवं जातक को कुष्ठ रोग होने की पूर्ण स्थि‍ति बनती है।

वृश्चिक : वृश्चिक राशि में केतु स्थित हो तो क्रोधी, कुष्ठ रोगी, धूर्त, वाचाल, निर्धन के साथ व्यसन करने वाला होता है।

धनु : धनु राशि में विराजमान है तो जातक मिथ्‍यावादी, आदर्शवादी, चंचल, धनी, यशस्वी आस्तिक के साथ तीर्थ में प्रेम रखने वाला
होता है।

मकर : मकर राशि में हो तो व्यापार करने वाला, चंचल, तेजस्वी के साथ गूढ़ रहस्य को जानने वाला जातक में गुण होता है।

कुंभ : कुंभ राशि में हो तो भौतिकवादी मध्यम, अथवा साधारण धनी, खर्च करने वाला, भ्रमण प्रिय एवं कामी प्रवृत्ति का होता है।

मीन : मीन राशि पर विराजमान है तो जातक सज्जन, कर्ण रोगी के साथ आलोकिक शक्तियों से परिपूर्ण सहयोग पाता है।

विशेष : व्यक्ति मात्र पृथ्वी पर सुख की खोज में लगा रहता है परंतु सिर्फ निराशा हाथ लगती है। परंतु मरने के बाद मोक्ष प्राप्ति देने अथवा कराने का निर्णय केतु ग्रह ही लेता है। केतु का प्रभाव सात वर्ष तक रहता है। भवन एवं भूमि संबंधित कार्य सफल करने के लिए जातक को गणेश जी का पूजन विधिवत तरीके से करना चाहिए। उसके पश्चात केतु का पूजन करना चाहिए।

>सुखी जीवन के लिए वास्तु-अनमोल मंत्र —–

- उत्तर दिशा जल तत्व की प्रतीक है। इसके स्वामी कुबेर हैं। यह दिशा स्त्रियों के लिए अशुभ तथा अनिष्टकारी होती है। इस दिशा में घर की स्त्रियों के लिए रहने की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए।
- उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र अर्थात्‌ ईशान कोण जल का प्रतीक है। इसके अधिपति यम देवता हैं। भवन का यह भाग ब्राह्मणों, बालकों तथा अतिथियों के लिए शुभ होता है।
- पूर्वी दिशा अग्नि तत्व का प्रतीक है। इसके अधिपति इंद्रदेव हैं। यह दिशा पुरुषों के शयन तथा अध्ययन आदि के लिए श्रेष्ठ है।

- दक्षिणी-पूर्वी दिशा यानी आग्नेय कोण अग्नि तत्व की प्रतीक है। इसका अधिपति अग्नि देव को माना गया है। यह दिशा रसोईघर, व्यायामशाला या ईंधन के संग्रह करने के स्थान के लिए अत्यंत शुभ होती है।
- दक्षिणी दिशा पृथ्वी का प्रतीक है। इसके अधिपति यमदेव हैं। यह दिशा स्त्रियों के लिए अत्यंत अशुभ तथा अनिष्टकारी होती है।
- दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र यानी नैऋत्य कोण पृथ्वी तत्व का प्रतीक है। यह क्षेत्र अनंत देव या मेरूत देव के अधीन होता है। यहाँ शस्त्रागार तथा गोपनीय वस्तुओं के संग्रह के लिए व्यवस्था करनी चाहिए।

- पश्चिमी दिशा वायु तत्व की प्रतीक है। इसके अधिपति देव वरुण हैं। यह दिशा पुरुषों के लिए बहुत ही अशुभ तथा अनिष्टकारी होती है। इस दिशा में पुरुषों को वास नहीं करना चाहिए।
- उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र यानी वायव्य कोण वायु तत्व प्रधान है। इसके अधिपति वायुदेव हैं। यह सर्वेंट हाउस के लिए तथा स्थायी तौर पर निवास करने वालों के लिए उपयुक्त स्थान है।
- आग्नेय, दक्षिणी-पूर्वी कोण में नालियों की व्यवस्था करने से भू-स्वामी को अनेक कष्टों को झेलना पड़ता है। गृहस्वामी की धन-सम्पत्ति का नाश होता है तथा उसे मृत्युभय बना रहता है।

नै कोण में जल-प्रवाह की नालियां भू-स्वामी पर अशुभ प्रभाव डालती हैं। इस कोण में जल-प्रवाह, नालियों का निर्माण करने से भू-स्वामी पर अनेक विपत्तियाँ आती हैं।
- दक्षिण दिशा में निकास नालियाँ भूस्वामी के लिए अशुभ तथा अनिष्टकारी होती हैं। गृहस्वामी को निर्धनता, राजभय तथा रोगों आदि समस्याओं से जूझना पड़ता है।
- उत्तर दिशा में निकास नालियाँ हों तो यह स्थिति भूस्वामी के लिए बहुत ही शुभ तथा राज्य लाभ देने वाली होती है।

- ईशान, उत्तर-पूर्व कोण में जल प्रवाह की नालियाँ भूस्वामी के लिए श्रेष्ठ तथा कल्याणकारी होती हैं। गृहस्वामी को धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है तथा आरोग्य लाभ होता है।
- शयनकक्ष में पलंग को दक्षिणी दीवार से लगाकर रखें। सोते समय सिरहाना उत्तर में या पूर्व में कदापि न रखें। सिरहाना उत्तर में या पूर्व में होने पर गृहस्वामी को शांति तथा समृद्धि की प्राप्ति नहीं होती है।

वास्तुशास्त्र घर को व्यवस्थित रखने की कला का नाम है। इसके सिद्धांत, नियम और फार्मूले किसी मंत्र से कम शक्तिशाली नहीं हैं। आप वास्तु के अनमोल मंत्र अपनाइए और सदा सुखी रहिए।

>गणेश पूजन से शांत करें वास्तुदोष —

वास्तु पुरुष की प्रार्थना पर ब्रह्माजी ने वास्तुशास्त्र के नियमों की रचना की थी। इनकी अनदेखी करने पर उपयोगकर्ता की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक हानि होना निश्चित रहता है। वास्तुदेवता की संतुष्टि गणेशजी की आराधना के बिना अकल्पनीय है। गणपतिजी का वंदन कर वास्तुदोषों को शांत किए जाने में किसी प्रकार का संदेह नहीं है।

- नियमित गणेशजी की आराधना से वास्तु दोष उत्पन्न होने की संभावना बहुत कम होती है।

- यदि घर के मुख्य द्वार पर एकदंत की प्रतिमा या चित्र लगाया गया हो तो उसके दूसरी तरफ ठीक उसी जगह पर दोनों गणेशजी की पीठ मिली रहे इस प्रकार से दूसरी प्रतिमा या चित्र लगाने से वास्तु दोषों का शमन होता है।

- भवन के जिस भाग में वास्तु दोष हो उस स्थान पर घी मिश्रित सिन्दूर से स्वस्तिक दीवार पर बनाने से वास्तु दोष का प्रभाव कम होता है।

- घर या कार्यस्थल के किसी भी भाग में वक्रतुण्ड की प्रतिमा अथवा चित्र लगाए जा सकते हैं। किन्तु यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि किसी भी स्थिति में इनका मुँह दक्षिण दिशा या नैऋत्य कोण में नहीं होना चाहिए।

- घर में बैठे हुए गणेशजी तथा कार्यस्थल पर खड़े गणपतिजी का चित्र लगाना चाहिए, किन्तु यह ध्यान रखें कि खड़े गणेशजी के दोनों पैर जमीन का स्पर्श करते हुए हों। इससे कार्य में स्थिरता आने की संभावना रहती है।

- भवन के ब्रह्म स्थान अर्थात केंद्र में, ईशान कोण एवं पूर्व दिशा में सुखकर्ता की मूर्ति अथवा चित्र लगाना शुभ रहता है। किन्तु टॉयलेट अथवा ऐसे स्थान पर गणेशजी का चित्र नहीं लगाना चाहिए जहाँ लोगों को थूकने आदि से रोकना हो। यह गणेशजी के चित्र का अपमान होगा।

- सुख, शांति, समृद्धि की चाह रखने वालों के लिए सफेद रंग के विनायक की मूर्ति, चित्र लगाना चाहिए।

- सर्व मंगल की कामना करने वालों के लिए सिन्दूरी रंग के गणपति की आराधना अनुकूल रहती है।

विघ्नहर्ता की मूर्ति अथवा चित्र में उनके बाएँ हाथ की और सूँड घुमी हुई हो इस बात का ध्यान रखना चाहिए। दाएँ हाथ की ओर घुमी हुई सूँड वाले गणेशजी हठी होते हैं तथा उनकी साधना-आराधना कठिन होती है। वे देर से भक्तों पर प्रसन्न होते हैं।

- मंगल मूर्ति को मोदक एवं उनका वाहन मूषक अतिप्रिय है। अतः चित्र लगाते समय ध्यान रखें कि चित्र में मोदक या लड्डू और चूहा अवश्य होना चाहिए।

>जब मंगल की हो अशुभ दृष्‍टि–साहस में कमी लाता है नीच का मंगल और मंगल ग्रह की औषधियाँ—
जब मंगल की हो अशुभ दृष्‍टि–साहस में कमी लाता है नीच का मंगल–

मंगल ग्रह से साहस, ऊर्जा, शक्ति, गुस्सा, रक्त, पराक्रम, आक्रामक शैली, युद्ध, राजयोग, शत्रु, लाल रंग, हानि, गर्मी, राजसेवा, रोग, प्रसिद्धि, हड्डी, युवावस्था, भाई, वन क्षेत्र, पुलिस-सेना, आई.पी.एस., मूत्र रोग, ठेकेदार, अग्नि, आग से जलना, मकान-भूमी, रक्त व इससे संबंधित रोग, माँस-भक्षण, दण्डाधिकारी, पारा, कृषि-भूमि, सोना, ताँबा, भोजन, गंभीरता, वाहन-सुख आदि देखा जाता है।

मेष लग्न हो तो मंगल लग्नेश व अष्टम भाव का स्वामी होगा। इस लग्न में मंगल चतुर्थ भाव में नीच राशि कर्क में होने उपरोक्त कारक तत्वों में कमी लाएगा। स्वास्थ्य पर भी विपरित असर पड़ेगा, चोट भी लग सकती है। दुर्घटना के योग भी बन सकते हैं।

वृषभ लग्न में मंगल द्वादशेश व सप्तम भाव का स्वामी होगा। द्वादश भाव बाहरी संबंध, विदेश यात्रा, भोग विलास, बाई आँख व सप्तम दाम्पत्य जीवन, सेक्स, विवाह संबंध, दैनिक व्यवसाय, स्त्री से संबंधित भाव को बिगाड़ता है। इसमें मंगल नीच का तृतीय भाव में होगा।

मिथुन लग्न में मंगल एकादशेश व षष्टेश होगा। एकादश आय भाव शेयर बाजार से जुड़े व्यक्ति को क्षति पहुँचाएगा, षष्टेश होने से शत्रुओं में, कर्ज वृद्धि का कारण बनता है।

कर्क लग्न में दशम व पंचम भाव का स्वामी होगा। दशम पिता, राज्य, नौकरी, व्यापार, राजनीति के क्षेत्र में बाधा का कारण बनता है। वही संतान, विद्या, मनोरंजन, प्रेम संबंधों में भी क्षति का कारण बनता है। मंगल लग्न में ही नीच का होगा।

सिंह लग्न में मंगल नवम व चतुर्थ भाव का स्वामी होगा। भाग्येश होने से धर्म-कर्म में कमी, भाग्य में अवरोध, यश में कमी का कारण बनता है। चतुर्थेश होने से सुख में कमी, माता से अनबन, मकान की परेशानी का कारण बनता है। स्थानीय राजनीति में भी नुकसानप्रद होता है। इस लग्न में मंगल द्वादशेश में नीच का होगा।

कन्या लग्न में मंगल अष्टम व तृतीयेश होगा। अष्टम, आयु, गुप्त रोग, गुप्त धन में क्षति का कारण बनता है। वहीं तृतीयेश होने से भाई से विरोध या भाई का न होना, मित्र से गड़बड़, साझेदार से परेशानी, पड़ोसी से अनबन का कारण बनता है। इस लग्न में मंगल एकादश भाव में नीच का होगा।

तुला लग्न में सप्तम व द्वितीय भाव का स्वामी होगा। सप्तम भाव दाम्पत्य जीवन, सेक्स, मारक भाव, दैनिक व्यवसाय इनमें नुकसानदायक रहेगा। द्वितीय होने से धन, कुटुंब, वाणी, दाईं आँख, बचत में कमी की कारण बनता है। इसमें मंगल दशम भाव में नीच का होगा।

वृश्चिक लग्न में लग्नेश व षष्ट भाव का स्वामी होगा। लग्नेश होने से साहस में कमी, काम में मन न लगना, चिड़चिड़ापन रहना यह कारण बनते है। षष्टेश होने से नाना, मामा का घर बिगाड़ता है वही कर्जदार भी बनाता है। शत्रुओं से परेशानी का कारण भी बनता है। इस लग्न में मंगल नवम भाव में नीच का होगा।

धनु लग्न में मंगल पंचम व द्वादश भाव का स्वामी होगा। पंचम होने से विद्या में रूकावट, संतान बाधा का कारण बनता है, वहीं विदेश यात्रा में बाधा, पढा़ई आदि में रूकावट आती है। इस भाव में मंगल अष्टम में नीच का होगा।

मकर लग्न में मंगल चतुर्थ व एकादश भाव का स्वामी होगा। यह आय के क्षेत्र में व माता, भूमि-मकान से संबंधित मामलों में रूकावट डालेगा। इस लग्न में मंगल सप्तम भाव में नीच का होगा।

कुंभ लग्न में मंगल तृतीय व दशम भाव का स्वामी होगा। साझेदारी, शत्रु, भाई से बाधा का कारण बनता है। लाभ के मामलों में भी रूकावट पैदा करेगा। इस लग्न में मंगल षष्ट भाव में नीच का होगा।

मीन लग्न में मंगल द्वितीय व नवम भाव का स्वामी होगा। यह वाणी को कठोर बनाता है व काम बिगाड़ता है। कुटुंब से नहीं बनने देता है। भाग्य में रूकावट का सामना करना पड़ता है। धर्म-कर्म में भी मन नहीं लगता।

मंगल पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि का प्रभाव भी खराब होता है। मंगल के अशुभ प्रभाव मिल रहे हो तो मंगल से संबंधित वस्तुओं का दान करना चाहिए। जैसे- खड़े मसूर, गुड, ताँबा, लाल वस्तु आदि व किसी विद्वान को जन्म पत्रिका दिखाकर शुभ मुहूर्त में मूँगा धारण करें।
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मंगल ग्रह की औषधियाँ—

संपूर्ण सौर मंडल में सूर्य के बाद दूसरा सबसे उग्र ग्रह मंगल ही है। यह धरती का बेटा है। इसीलिए इसका एक नाम भौम भी है। इसे कुज एवं वक्र के नाम से भी जाना जाता है। अन्य ग्रहों की तरह यह भी कुंडली में बारहों भावों में भ्रमण करता रहता है। स्थिति, योग एवं संबंध के अनुरूप जातक को फल देता रहता है।

इससे उत्पन्न दोषों की शान्ति हेतु समृद्ध प्रकृति के पास वनौषधि भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। आयुर्वेद में इसका कई जगहों पर उल्लेख हुआ है। मंगल से संबंधित वनस्पतियों का उल्लेख प्रस्तुत है। आचार्य मणिबंध कृत ‘पाकनिर्झरा’ में बताया गया है कि-

‘मौद्गल्योऽथकुटिलः प्रेतस्‌ त्रिजातेक्षु पिंकरादुधी। जानक्योऽविराभूता पुंकरस्रग्ध दक्षा कुजाः।’

इसका विशेष विवरण निम्न प्रकार है—-
1. मौद्गल्य- इसका वास्तविक नाम उदाल है। किन्तु शास्त्रों में इसे मौद्गल्य के नाम से जाना जाता है। कारण यह है कि सर्वप्रथम मुद्गल ऋषि ने अपनी पालिता पुत्री विभावरी की शादी मात्र इसलिए कर सकने में असमर्थ थे कि विभावरी की जन्मकुंडली में प्रथम भाव में मंगल-कर्क राशि का एवं सातवें भाव में गुरु, सूर्य, मकर राशि का होकर बैठे थे।

मंगल पर पवित्र ग्रह गुरु की दृष्टि होने के बावजूद भी मांगलिक दोष की प्रचंडता के कारण उसकी शादी बाधित हो रही थी। फिर तपोबल से ऋषि ने इस मंगल की औषधि को ढूँढा। इसीलिए इसका नाम मौद्गल्य पड़ गया। मोटे तथा छोटे एवं गोल पत्तों वाला यह पौधा परजीवी होता है।

यह अक्सर बड़े पेड़ों के कोटरों, या कही अगर किसी पेड़ के किसी हिस्से में मिट्टी जमा हो गई तो उस मिट्टी में अपने आप उग जाता है। इसमें फल एवं फूल लगते हैं। किन्तु इसका बीज कहीं बोने से नहीं अंकुरित होता। यह तमिलनाडु, आँध्रप्रदेश, कर्नाटक आदि दक्षिणी प्रदेश में ज्यादा पाया जाता है। जब किसी व्यक्ति की कुंडली में प्रथम भाव में मंगल दोष देने वाला हो गया हो तो इसका प्रयोग किया जाता है।

2. कुटिल- इसे स्थानीय भाषाओं में कटैला कहते हैं। इसके काँटे टेढ़े होते हैं। यदि कपड़े में फँस जाते हैं। तो बहुत ही कठिनाई से निकलते हैं। इसका तना पतला, हरा एवं पत्ते बहुत छोटे होते हैं। यह झाड़ी के आकार का होता है। मध्य भारत के प्रत्येक क्षेत्र में यह पाया जाता है। यह देहात में फोड़े-फुँसी की बहुत ही प्रचलित औषधि है। जब किसी व्यक्ति की कुंडली में दूसरे भाव में मंगल के कारण वाणी दोष, चर्मरोग या वित्तपात दोष हो तो इस वनस्पति का प्रयोग किया जाता है।

3. प्रेतस्‌- इसका स्थानीय नाम पितैला या तिलैया है। इसके पूरे तने पर सफेद रोम भरे पड़े होते हैं। यह पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके कोमल नवोदित पत्तों की बहुत लोग सब्जी भी बनाते हैं। इसका पत्ता चबाने पर खट्टे स्वाद का होता है। भाई बंधु या संबंधियों को पीड़ा हो या कुंडली में मंगल के तीसरे स्थान में बैठने के कारण यदि हमेशा भय बना रहता हो तो इसका प्रयोग किया जाता है।

4. त्रिजात- इसे राजस्थान में लोंठ, मध्यप्रदेश में मलीठा, तथा बंगाल, बिहार एवं उत्तरप्रदेश में तिनपतियाँ के नाम से जाना जाता है। इसकी चटनी बहुत स्वादिष्ट होती है। इसके पत्ते अरहर के पत्ते के समान होते हैं। यह चूहों का परम प्रिय भोजन है। इसका पेड़ जहाँ पर होता है। वहाँ पर अमूमन चूहे अपना बिल बना लेते हैं। कुंडली में चौथे भाव में मंगल के कारण दोषयुक्त हुई कुंडली के दोष निवारण हेतु इसका प्रयोग होता है। इसे वैधव्य दोष निवारण की बहुत सशक्त औषधि मानी जाती है।

5. इक्षु- गन्ने या ईख को इक्षु कहा जाता है। यह किसान की सर्वविदित फसल है। शास्त्रों में मंगल के पाँचवें भाव के दोष निवारण हेतु मंगल की चतुर्भुजी मूर्ति बनाकर ईख के रस से स्नान कराने की विधि बताई गई है। यह वीर्य, ओज एवं रसवर्धक माना गया है। संतान बाधा एवं देवदोष निवारण में इसका प्रयोग किया जाता है।

6. पिंकर- औषधि विज्ञान में इसे सरसों की एक प्रजाति बताई गई है। किन्तु सरसों दो रंगों का होता है। पीले वाले सरसों का प्रयोग निषिद्ध माना गया है। यहाँ लाल रंग वाला सरसों ही गुणकारी है। छठे भाव के मंगल कृत दोष निवारण हेतु यह प्रयोग में लाया जाता है।

7. आदुधी- इसे दुधिया भी कहते हैं। इसका रूप रंग ब्राह्मी घास जैसा होता है। यह जमीन पर फैल कर आगे बढ़ता है। पत्ते बिल्कुल छोटे होते हैं। इसे कहीं से तोड़ने पर दूध बहने लगता है। सातवें भाव में मंगल के कारण उत्पन्न मांगलिक दोष एवं दाम्पत्य जीवन की कटुता के निवारण हेतु इसका प्रयोग किया जाता है।

8. जानकी- इसे देहाती भाषा में दाँतर कहा जाता है। लगातार कभी न अच्छे होने वाले रोग एवं उग्र वैधव्य दोष के अलावा पति अथवा पत्नी की लम्बी उम्र के लिए इसका दातुन करते हैं। लंका निवास के दौरान माता जानकी भगवान राम की लम्बी उम्र के लिए इसी का दातुन करती थी। यह सिंहल द्वीप की औषधि है। अन्यत्र यह उपलब्ध नहीं है।

पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार यह एक खूबसूरत पत्तों वाला टहनीदार किन्तु कसैले स्वाद वाला वृक्ष है। नासूर एवं भगन्दर आदि रोगों की रामबाण औषधि मानी गई है। आठवें भाव में मंगल के कारण उत्पन्न दोष के निवारण हेतु इस वनस्पति का प्रयोग किया जाता है।

9. अविराभ- सम्भवतः यह भटकटैया ही है। इसके पत्ते चिकने, गोल, तना छोटा, फल गोल कोमल छिलके वाले, स्वाद मीठा एवं टहनीदार झाड़ी के आकार का पौधा बताया गया है। इसके फल का रंग सिन्दूरी, लाल अथवा कत्थई होता है। बताया गया है कि इसका फल कवचावृत अर्थात किसी ढक्कनदार आवरण से ढका होता है। मंगल के कारण उत्पन्न भाग्य एवं धर्म दोष का निवारण इससे होता है।

10. पुंकर- इसका एक नाम प्लक्ष भी है। यह एक अतिप्रचलित वृक्ष है। इसके पत्ते तोड़ने पर दूध बहने लगता है। कहीं-कहीं देहातों में इसके नवोदित कोमल कलियों की सब्जी भी बनाई जाती है। बरगद के फल के समान इसके फल होते हैं। मैदानी इलाके में यह ज्यादा पाया जाता है।

इस वृक्ष के साथ पीपल एवं बरगद का पेड़ हो तो यह तीनों मिलकर हरिशंकरी के नाम से जाने जाते हैं। जिसकी पूजा की जाती है। पिता या नौकरी के संबंध में यदि मंगल के कारण कोई बाधा पहुँचती हो। अथवा दशम भाव संबंधी कोई मंगल कृत दोष हो तो इसका प्रयोग किया जाता है।

11. सरगंध- इसे सरपत भी कहते हैं। गाँव देहात में इसका प्रयोग छप्पर डालने के लिए किया जाता है। यह अक्सर नदी तालाब के किनारे पाया जाता है। इसके पत्तों की धार बहुत तेज होती है। इसके तने से बहुत दिनों पहले छोटे बच्चे कलम बनाकर लिखने का काम लेते थे। मंगल के कारण आमदनी में बाधा पहुँचती हो अथवा संतान संबंधी कष्ट हो या मंगल के कारण कुंडली का ग्यारहवाँ भाव दूषित हो तो इसका प्रयोग किया जाता है।

12. दक्ष- इसे दो नामों से जाना जाता है। महाराष्ट्र के सुदूर दक्षिणी प्रान्तों में इसे कहीं-कहीं आलू कहते हैं। गुजरात के खंभात इलाके में इसे कन्द के लिए प्रयुक्त करते हैं। जम्मू में भी इसे शकरकन्द के लिए ही प्रयुक्त किया जाता है। किन्तु केरल में इसे नारियल के अन्दर वाले हिस्से को कहते हैं।

आसाम एवं बंगाल में दाक्षी नाम का एक स्वतंत्र पौधा भी होता है। उड़ीसा में भी दाक्षी ही कहते हैं। दाक्षी एक जहरीला पौधा है। इसके पत्ते निचोड़कर लोग कीट पतंग मारने के काम में लाते हैं। ये दोनों ही वनस्पतियाँ बारहवें भाव के मंगल दोष को शान्त करती हैं।

>आग्नेय में स्थापित करें रसोईघर—
दक्षिण-पूर्व में रखें डाइनिंग टेबल—-

रसोईघरः आग्नेय कोण में अथवा पूर्व व आग्नेय के मध्य या फिर पूर्व में रसोईघर स्थापित करें। आग्नेय कोण सर्वश्रेष्ठ है। अगर आपका खाना पकाना आग्नेय कोण में नहीं हो रहा हो, तो चूल्हा या गैस आग्नेय कोण में जरूर रखें। भोजन बनाने वाली का मुँह पूर्व दिशा में होना चाहिए।

स्टोर अथवा भंडार गृह : पुराने जमाने में भवन में पूरे साल के लिए अनाज संग्रह किया जाता था अथवा जरूरत का सामान हिफाजत से रखा जाता था। उसके लिए अलग कक्ष होता था। किन्तु आज के समय में जगह की कमी के कारण रसोई घर में ही भण्डारण की व्यवस्था कर ली जाती है। रसोई घर में भण्डारण ईशान व आग्नेय कोण के मध्य पूर्वी दीवार के सहारे होना चाहिए। यदि स्थान की सुविधा है, तो भवन के ईशान व आग्नेय कोण के मध्य पूर्व में स्टोर का निर्माण किया जाना चाहिए।

डायनिंग हॉल अथवा भोजन कक्ष : वास्तु के हिसाब से आपकी डाइनिंग टेबल दक्षिण-पूर्व में होनी चाहिए। अगर आपने अपने मकान में अलग डायनिंग हॉल की व्यवस्था की है, तब तो अति उत्तम, अन्यथा ड्राइंग रूम में बैठकर भोजन किया जा सकता है। लेकिन हमेशा ध्यान रखें- आपके खाने की मेज की स्थिति दक्षिण-पूर्व में होनी चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार किसी मकान में डायनिंग हॉल पश्चिम या पूर्व दिशा में होना चाहिए।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>मंगल ही देता है शुभ फल… -

>मंगल ही देता है शुभ फल…

मंगल से मिलती है आर्थिक संपन्नता—-

एक तरफ मंगल जहाँ दाम्पत्य जीवन के लिए सबसे खराब ग्रह कहा गया है। तथा मांगलिक दोष के कारण वैवाहिक जीवन को तहस-नहस करने वाला कहा गया है वहीं पर यह मंगल आर्थिक सम्पन्नता एवं भूमि-भवन, वाहन आदि की समृद्धि को भी दर्शाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मंगल के द्वारा कुंडली मांगलिक होने पर दाम्पत्य जीवन को कठिनाई का सामना करना पड़ता है। किन्तु यहाँ यह बात भी नहीं भूलना है कि इस मंगल का वैवाहिक जीवन पर दुष्प्रभाव तभी पड़ सकता है जब यह मंगल वास्तव में योग, भाव, राशि एवं दृष्टि संबंध के द्वारा अशुभ हो।

यदि मंगल इस प्रकार अशुभ नहीं है तो यही मंगल वैवाहिक जीवन को अत्यंत मधुर, सुखी एवं संपन्न बना देता है। मंगल चौथे अथवा सातवें भाव में बैठा हो तो कुंडली मांगलिक कहलाएगी ही। किन्तु यदि यही मंगल मेष राशि का होकर लग्न में सूर्य के साथ अथवा चौथे भाव में मकर राशि का होकर शनि के साथ हो तो वह व्यक्ति धन-धान्य से संपन्न होकर सबसे सुखी एवं शांत जीवन व्यतीत करेगा इसमें कोई संदेह नहीं है। इसी प्रकार यदि मंगल भले ही आठवें हो किन्तु लग्नेश एवं सप्तमेश की युति किसी भी केंद्र में हो तो उस जातक का वैवाहिक जीवन बहुत ही सुखी एवं यशस्वी होगा।

मंगल भले ही बारहवें भाव में हो, किन्तु यदि गुरु या शुक्र में से कोई भी एक उच्चस्थ होकर एक-दूसरे के साथ किसी भी केंद्र में बैठा हो तो दाम्पत्य जीवन सुखी होगा, इसके विपरीत देखे तो दसवें भाव में मंगल रहने से कुंडली मांगलिक नहीं होती है। तो हम इस भाव में मंगल को उच्च मकर राशि में दसवें भाव में मान लेते हैं। तथा दशमेश को शुभ केंद्र लग्न में शुभ ग्रह बुध के साथ युति मान लेते हैं। इस प्रकार सभी तरह से मंगल के शुभ होने पर भी वैवाहिक जीवन अनर्थकारी हो जाता है।

जातक दर-दर का भिखारी एवं जाति, समाज से बहिष्कृत हो जाता है। इसमें तो कोई संदेह ही नहीं है कि अगर कुंडली में मंगल कमजोर हुआ तो आदमी गरीब हो जाता है।

कहा जाता है की मंगल अगर आठवें अथवा बारहवें भाव में हो तो आदमी मांगलिक हो जाता है। किन्तु अगर मंगल आठवें या बारहवें भाव में अपने घर में हो या आठवें घर में बारहवें घर के स्वामी के साथ अथवा बारहवें घर में आठवें भाव के स्वामी के साथ हो तो आचार्य मीनराज के शब्दों में सरल एवं विमल नामक शुभ योग बनते हैं। कुंडली मांगलिक होने की मात्र कुछ एक शर्तें ही हैं। जिससे कुंडली मांगलिक हो जाती है। अन्यथा कुंडली में मंगल अगर पापपूर्ण अथवा अस्त आदि से कमजोर न हो तो जीवन धन-धान्य पूर्ण शांत एवं सुखी होता है।

नाम के अनुरूप मंगल हमेशा मंगल ही करता है। परन्तु विविध भ्रांतियों ने इस देवग्रह की महिमा ही खंडित कर दी है। जो मंगल भूमि-भवन एवं वाहन का द्योतक है, जिस मंगल के कारण वंश वृद्धि होती है, जो मंगल स्थायी संपदा का द्योतक है, जो मंगल विवाह जैसा पवित्र बंधन प्रदान करता है। उस मंगल को इतना बदनाम कर दिया गया है की आम जनता इससे सदा भयभीत रहती है। यह जान लेना चाहिए की मंगल यदि कमजोर हो तो वंश वृद्धि रुक जाएगी। धन-संपदा नष्ट हो जाएगी। साहस एवं पराक्रम क्षीण हो जाएगा।

आचार्य व्याघ्र पाद के शब्दों में कुंडली मांगलिक प्रायः तभी होती है जब लग्न से पहले वाली राशि जन्म राशि हो अथवा अगली राशि जन्म राशि हो तथा मंगल मांगलिक सूचक भावों अथवा घरों में बैठा हो। अन्यथा मंगल चाहे कहीं भी क्यों न बैठा हो कुंडली मांगलिक नहीं हो सकती है। अपितु इसके विपरीत मंगल ऐश्वर्य एवं स्थायी धन-संपदा को देने वाला हो जाता है।

>कर्ज चुकाने के आसान उपाय–
वास्तु में फेरबदल कर पाएँ कर्ज से मुक्ति—

कर्ज चुकाने की स्थिति आदमी को अत्यंत दुविधा में डाल देती है। आदमी के मन में रात-दिन सिर्फ उसे चुकाने के लिए मानसिक उद्वेग बने रहते हैं। कुछ परिस्थितियों के कारण कर्ज लेने की स्थिति बन जाती है। न चाहते हुए भी कर्ज खत्म होने का नाम नहीं लेता। इसका कारण हमारे घर का वास्तु दोष भी है, जिसके कारण कर्ज का बोझ परेशान करता है। एक कर्ज उतरा नहीं, दूसरा लेने की नौबत आ जाती है तथा इस स्थिति से छुटकारा नहीं मिलता।

एक बार वास्तु से जुड़े तथ्यों पर ध्यान देकर भी कर्ज से छुटकारा पा सकते हैं। इस बारे में आपको कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी देते हैं। कर्ज से बचने के लिए उत्तर व दक्षिण की दीवार बिलकुल सीधी बनवाएँ। उत्तर की दीवार हलकी नीची होनी चाहिए। कोई भी कोना कटा हुआ न हो, न ही कम होना चाहिए। गलत दीवार से धन का अभाव हो जाता है। यदि कर्ज अधिक बना हुआ है और परेशान हैं तो ईशान कोण को 90 डिग्री से कम कर दें।

इसके अलावा उत्तर-पूर्व भाग में भूमिगत टैंक या टंकी बनवा दें। टंकी की लम्बाई, चौड़ाई व गहराई के अनुरूप आय बढ़ेगी। उत्तर-पूर्व का तल कम से कम 2 से 3 फीट तक गहरा करवा दें। दक्षिण-पश्चिम व दक्षिण दिशा में भूमिगत टैंक, कुआँ या नल होने पर घर में दरिद्रता का वास होता है। दो भवनों के बीच घिरा हुआ भवन या भारी भवनों के बीच दबा हुआ भूखण्ड खरीदने से बचें क्योंकि दबा हुआ भूखंड गरीबी एवं कर्ज का सूचक है।

उत्तर दिशा की ओर ढलान जितनी अधिक होगी संपत्ति में उतनी ही वृद्धि होगी। यदि कर्ज से अत्यधिक परेशान हैं तो ढलान ईशान दिशा की ओर करा दें, कर्ज से मुक्ति मिलेगी। पूर्व तथा उत्तर दिशा में भूलकर भी भारी वस्तु न रखें अन्यथा कर्ज, हानि व घाटे का सामना करना पड़ेगा। भवन के मध्य भाग में अंडर ग्राउन्ड टैंक या बेसटैंक न बनवाएँ। मकान का मध्य भाग थोड़ा ऊँचा रखें। इसे नीचा रखने से बिखराव पैदा होगा। यदि उत्तर दिशा में ऊँची दीवार बनी है तो उसे छोटा करके दक्षिण में ऊँची दीवार बना दें।

इसके अलावा दक्षिण-पश्चिम के कोने में पीतल या ताँबे का घड़ा लगा दें। उत्तर या पूर्व की दीवार पर उत्तर-पूर्व की ओर लगे दर्पण लाभदायक होते हैं। दर्पण के फ्रेम पर या दर्पण के पीछे लाल, सिंदूरी या मैरून कलर नहीं होना चाहिए। दर्पण जितना हलका तथा बड़े आकार का होगा, उतना ही लाभदायक होगा, व्यापार तेजी से चल पड़ेगा तथा कर्ज खत्म हो जाएगा। दक्षिण तथा पश्चिम की दीवार के दर्पण हानिकारक होते हैं।

दक्षिणी-पश्चिमी, पश्चिमी-उत्तरी या मध्य भाग का चमकीला फर्श या दर्पण गहराई दर्शाता है, जो धन के विनाश का सूचक होता है। फर्श पर मोटी दरी, कालीन आदि बिछाकर कर्ज व दिवालिएपन से बचा जा सकता है। दरवाजे उत्तर-पूर्व दिशा में होने चाहिए।

पश्चिमी-दक्षिणी भाग में फर्श पर उल्टा दर्पण रखने से फर्श ऊँचा उठ जाता है। फलतः कर्ज से मुक्ति मिलती है। उत्तर या पूर्व की ओर भूलकर भी उल्टा दर्पण न लगाएँ, अन्यथा कर्ज पर कर्ज होते चले जाएँगे। गलत दिशा में लगे दर्पण जबरदस्त वास्तुदोष के कारक होते हैं। सीढ़ियाँ कभी भी पूर्व या उत्तर की दीवार से न बनाएँ। सीढ़ियों का वजन दक्षिणी दीवार पर ही आना चाहिए। ऐसा न होने पर आय के लाभ के साधन खत्म हो जाते हैं। सीढ़ी हमेशा क्लाक वाइज दिशा में ही बढ़ाएँ। कर्ज से बचने के लिए उत्तर दिशा से दक्षिण की ओर बढ़ें। सीढ़ी की पहली पेड़ी मुख्य द्वार से दिखनी नहीं चाहिए, नहीं तो लक्ष्मी घर से बाहर चली जाती है।

जिस घर में उसके बीच कहीं भी तीन या तीन से अधिक दरवाजे हों उसके बीच में कभी भी न बैठें। नहीं तो ज्ञान में कमी आएगी एवं तिजोरी भी खाली हो जाएगी। यदि मुख्य द्वार या भवन पर पेड़, टेलीफोन, बिजली का खम्भा या अन्य किसी चीज की परछाई पड़ रही हो तो उसे तुरन्त दूर कर दें या पाकुआ दर्पण लगा लें। पाकुआ दर्पण का मुख घर से बाहर होना चाहिए।

मुख्य द्वार के पास एक और छोटा-सा द्वार लगाएँ, कर्ज से छुटकारा मिलेगा। कर्ज से छुटकारा पाने के लिए उत्तर या पूर्व दिशा की ओर एक या दो खिड़कियाँ बनवा लें। उन्हें ज्यादा खोलकर रखें। उत्तर-पूर्व भाग में निचले तल पर फर्श पर दर्पण रखकर उत्तरी-पूर्वी भाग की गहराई दिखाई जा सकती है।

इस प्रकार बिना तोड़फोड़ के फर्श में गहराई आ जाती है और लाभप्रद होता है। ईशान कोण में पूजास्थल के नीचे पत्थर का स्लैब न लगाएँ अन्यथा कर्ज के चंगुल में फँस जाएँगे। उत्तर-पूर्व के भाग में दीपक जलाना घातक सिद्ध हो सकता है। इस कोने में हवन करने से व्यापार में घाटा प्राप्त होता है तथा ऐसा करना कर्ज एवं मुसीबत को न्योता देने के समान है क्योंकि यह दिशा पानी की है।

पूजा घर के अग्निकोण में पूजा करें। उत्तर-पूर्व में लकड़ी का मन्दिर रखें जिसके नीचे गोल पाए हों। लकड़ी के मन्दिर को दीवार से सटाकर न रखें। जहाँ तक हो सके पत्थर की मूर्ति न रखें, वजन बढ़ेगा। घर में टूटे बर्तन व टूटी हुई खाट नहीं होनी चाहिए, न ही टूटे-फूटे बर्तनों में खाना खाएँ। इससे दरिद्रता बढ़ती है। घर के द्वार पर जो उत्तर दिशा की ओर हो वहाँ पर अष्टकोणीय आईना लगाएँ। घर विभिन्न प्रकार के विघ्नों से बचेगा।

>ईशान में बना शौचालय हानिकारक–

सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र में न बनाएँ शौचालय—-

शौचालय बनाते वक्त काफी सावधानी रखना चाहिए, नहीं तो ये हमारी सकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर देते हैं और हमारे जीवन में शुभता की कमी आने से मन अशांत महसूस करता है। इसमें आर्थिक बाधा का होना, उन्नति में रुकावट आना, घर में रोग घेरे रहना जैसी घटना घटती रहती है।

शौचालय को ऐसी जगह बनाएँ जहाँ से सकारात्मक ऊर्जा न आती हो व ऐसा स्थान चुनें जो खराब ऊर्जा वाला क्षेत्र हो। घर के दरवाजे के सामने शौचालय का दरवाजा नहीं होना चाहिए, ऐसी स्थिति होने से उस घर में हानिकारक ऊर्जा का संचार होगा।

सोते वक्त शौचालय का द्वार आपके मुख की ओर नहीं होना चाहिए। शौचालय अलग-अलग न बनवाते हुए एक के ऊपर एक होना चाहिए।

ईशान कोण में कभी भी शौचालय नहीं होना चाहिए, नहीं तो ऐसा शौचालय सदैव हानिकारक ही रहता है। शौचालय का सही स्थान दक्षिण-पश्चिम में हो या दक्षिण दिशा में होना चाहिए। वैसे पश्चिम दिशा भी इसके लिए ठीक रहती है।

शौचालय का द्वार मंदिर, किचन आदि के सामने न खुलता हो। इस प्रकार हम छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर सकारात्मक ऊर्जा पा सकते हैं व नकारात्मक ऊर्जा से दूर रह सकते हैं।
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वास्तुदोष बन सकता है अनिष्ट का कारण—-

किसी भवन का वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार निर्माण नहीं किए जाने पर वह निर्माणकर्ता और गृहस्वामी दोनों के लिए अनिष्ट का कारण बन सकता है। मुगल बादशाह शाहजहाँ ने वास्तुदोष के कारण ही ताजमहल का निर्माण करने वाले राजमिस्त्री के दोनों हाथ कटवा दिए थे और मुम्बई में ताज होटल में आतंकवादी वारदात भी उसकी बनावट में वास्तुदोष की वजह से हुई थी।

देश के प्रसिद्ध वास्तुशास्त्री सुखदेवसिंह ने विशेष बातचीत में अपने इन दावों के प्रमाण में कहा कि मकान या कार्यालय के निर्माण के दौरान निर्माण से जुड़ी दिक्कतों का आना मुख्यतः वास्तुदोष के कारण ही होता है। मकान बनाते समय वास्तुशास्त्र के नियमों का ध्यान नहीं रखे जाने पर उसके निर्माण में लगे श्रमिकों और मिस्त्री पर तत्काल किसी न किसी तरह की मुसीबत आ जाती है। इसके बाद गृहस्वामी को भी कोई न कोई हानि उठानी पड़ती है।

यदि कोई व्यक्ति अपने मकान का निर्माण वास्तुशास्त्र के अनुसार नहीं कराता है तो मिस्त्री को चोट लग सकती है या उसका गृहस्वामी से झगड़ा हो सकता है अथवा निर्माण कार्य में विघ्न पड़ सकता है।

वास्तुशास्त्र और ज्योतिषशास्त्र का चोली-दामन का साथ है लेकिन जब व्यक्ति ज्योतिष को ही महत्व देता है तभी वह अपने साथ घटी किसी विपरीत घटना को भगवान् का कोप मानता है जबकि ईश्वर किसी का बुरा नहीं चाहता है। जिस तरह ईश्वर ने आत्मा का घर शरीर बनाया है, उसी तरह घर का शरीर भी यदि सभी अंगों से पूर्ण नहीं होगा तो मनुष्य को उस घर में रहने में परेशानी होगी।

मकान के निर्माण में वास्तुशास्त्र की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि आदर्श घर की बनावट के आधार पर ही उसके गृहस्वामी की दिनचर्या, आय, चरित्र और भविष्य तथा बच्चों की पढ़ाई आदि से जुडी तमाम व्यवस्थाएँ निर्धारित होती हैं। यहाँ तक कि मनुष्य के साथ घटने वाली छोटी-बड़ी तमाम घटनाएँ और दुर्घटनाएँ भी घर की बनावट पर ही निर्भर हैं।

यदि कार्यालय का निर्माण वास्तुशास्त्र के अनुसार किया जाए तो व्यक्ति की आय पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। जिस तरह मनुष्य की जन्मपत्री होती है उसी तरह घर की भी एक कुंडली होती है। वास्तुशास्त्र के अनुसार मकान बनाने के नियमों के बारे में उन्होंने बताया कि वायव्य कोण बच्चों के लिए बेहद शुभ होता है। गृहस्वामी का कमरा नैऋत्य कोण पर होना चाहिए। अग्नि कोण में निर्मित रसोईघर कम खर्चीली होती है लेकिन यदि वह वायव्य कोण में बनी हो तो बेहद खर्चीली साबित होती है।

मकान या कार्यालय के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का खराब रहने की समस्या भी वास्तुशास्त्र से जुड़ी है। यदि कार्यालय में प्रमुख के बैठने स्थान नैऋत्य कोण में है तो उसे आदर्श कार्यालय कहा जाएगा। किसी घर में यदि कोई महिला या पुरुष अथवा बच्चा नहीं है तो निश्चित मानिए कि मकान का निर्माण वास्तुदोष से प्रभावित है।

वास्तुशास्त्र के अनुसार आदर्श मकान की पहचान यह है कि उसके ईशान-नैऋत्य कोण पर ‘कटिंग गेट’ नहीं होना चाहिए लेकिन यदि ऐसा होता है तो मनुष्य के साथ कभी भी कोई बड़ी घटना हो सकती है।

सिंह ने कहा कि वास्तु से शारीरिक, मानसिक और आर्थिक परेशानियों पर नियंत्रण किया जा सकता है। उत्पादन कार्य करने वाली मशीनों को भी यदि वास्तुशास्त्र के अनुसार रखा जाए तो उत्पादन और बिक्री पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

>शुभ फलदायक बुधादित्य योग–फलदायक है बुध-सूर्य युति—–

बुध व्यावहारिकता व ज्ञान को दर्शाता है और सूर्य तेज का कारक है। गोचर में सूर्य-बुध साथ-साथ या आगे पीछे ही होते हैं। यदि यह युति शुभ भावों में हो तो व्यक्ति को व्यावहारिक वृत्ति का बनाती है। ऐसे व्यक्ति अपना काम निकालने में चतुर होते हैं, वाकपटु भी होते हैं। इनकी मनोवृत्ति व्यापारिक होती है।

ऐसे व्यक्ति वाणी के धनी होते हैं, व्यवहारकुशल होने से मित्र-संबंधियों में अच्‍छी साख रखते हैं। कागज-पत्र व्यवस्थित रखने में इनका जवाब नहीं होता। ये व्यक्ति सारे काम व्यवस्थित तरीके से ही करते हैं और विशेषकर कर्जा लेने के कार्य इनके लिए बड़े सरल होते हैं, कागज-पत्र का कोई भी काम अटकता नहीं है।

यह युति लग्न, पंचम, नवम व दशम में विशेष फलदायक होती है व अन्य योग शुभ होने पर व्यक्ति को ऊँचाइयों तक पहुँचाती है।
सूर्य-बुध य‍ुति को बुधादित्य योग भी कहा जाता है। यह युति सिंह लग्न, कन्या लग्न व मिथुन लग्न में अधिक प्रभावकारी होती है क्योंक‍ि ऐसे में सूर्य व बुध दोनों ही लाभकारी भावों के स्वामी होते हैं व यदि यह युति लग्न, पंचम, नवम या दशम में हो तो शुभ प्रभावों का अनुभव होता है।

इसके अतिरिक्त तुला और और वृषभ लग्न के लिए भी यह युति फलदायक होती है यदि पंचम या नवम में हो तो। यह युति जीवन में संघर्ष को कम करती है व प्रयासों के अनुरूप सही समय पर सफलता दिलाती है।

यदि सूर्य व बुध कारक होकर पाप प्रभाव में हो तो इनकी मजबूती के उपाय करने चाहिए। उपायों में गाय को हरा चारा खिलाना व नित्य सूर्य दर्शन करना प्रमुख है।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>दक्षिणमुखी भवन और वास्तु—

>दक्षिणमुखी भवन और वास्तु—

वास्तुशास्त्र के बारे में जानकारी रखने वाले लोगों के दिलोदिमाग में भी यह बात गहराई तक समाई हुई है कि दक्षिणमुखी मकान में निवास करके कभी सुखी नहीं रह सकते हैं। इस भय के कारण भारत में कई दक्षिणमुखी प्लॉट लंबे समय तक खाली पड़े रहते हैं और बेचने वाले को प्लॉट की कीमत कम करके ही बेचना पड़ता है, जबकि सच्चाई बिलकुल इसके विपरीत है।

सच्चाई यह है कि दक्षिणमुखी मकान यदि वास्तुनुकूल बना हो तो आदमी दूसरी दिशाओं की तुलना में बहुत ज्यादा यश व मान-सम्मान पाता है। वहाँ रहने वालों का जीवन वैभवशाली होता है। परिवार चौतरफा तरक्की कर सुखी एवं सरल जीवन व्यतीत करता है।

यम के आधिपत्य एवं मंगल ग्रह के पराक्रम वाली दक्षिण दिशा पृथ्वी तत्व की प्रधानता वाली दिशा है। इसलिए दक्षिणमुखी प्लॉट पर भवन बनाते समय वास्तु के कुछ सिद्धांतों का पालन कर लिया जाए तो निश्चित है कि वहाँ रहने वालों का जीवन उत्तर या पूर्वमुखी घर में निवास करने वालों की तुलना में बहुत बेहतर हो सकता है।

- दक्षिणमुखी प्लॉट पर कंपाउंड वॉल एवं घर का मुख्य द्वार दक्षिण आग्नेय में रखें, किसी भी कीमत पर दक्षिण नैऋत्य में न रखें। दक्षिण नैऋत्य में ही द्वार रखना मजबूरी हो तो ऐसी स्थिति में आप उस प्लॉट पर मकान बिलकुल न बनाएँ और उस प्लॉट को बेच दें, क्योंकि दक्षिण नैऋत्य में द्वार रखकर वास्तुनुकूल घर बन ही नहीं सकता।

- जहाँ दक्षिण आग्नेय का द्वार बहुत शुभ होता है, वहीं दक्षिण नैऋत्य का द्वार अत्यंत अशुभ होता है। दक्षिण नैऋत्य के द्वार का कुप्रभाव विशेष तौर पर परिवार की स्त्रियों पर पड़ता है। उन्हें मानसिक व शारीरिक कष्ट रहता है। यही द्वार परिवार की आर्थिक स्थिति को भी खराब रखता है। द्वार के इस दोष के साथ ही यदि मकान के ईशान कोण में भी कोई वास्तुदोष है तो यह परिवार के किसी सदस्य के साथ अनहोनी का कारण भी बन जाता है।

- किसी भी प्रकार के भूमिगत टैंक जैसे फ्रेश वाटर टैंक, बोरिंग, कुआँ इत्यादि केवल उत्तर दिशा, उत्तर ईशान व पूर्व दिशा के बीच ही कंपाउंड वॉल के साथ बनाएँ और सेप्टिक टैंक उत्तर या पूर्व दिशा में ही बनाएँ। ध्यान रहे सेप्टिक टैंक ईशान कोण में न बनाएँ।

- प्लॉट पर भवन का निर्माण करते समय इस बात का विशेष तौर पर ध्यान रखें कि भवन का ईशान कोण घटा, कटा, गोल, ऊँचा इत्यादि नहीं होना चाहिए और नैऋत्य कोण किसी भी तरह से बढ़ा हुआ या नीचा नहीं होना चाहिए।

- बनने वाले भवन की ऊँचाई प्लॉट से 1 से 2 फुट ऊँची अवश्य रखें और पूरे भवन के फर्श का लेवल एक जैसा रखें। भवन के किसी भी हिस्से का फर्श ऊँचा-नीचा न रखें अर्थात समतल रखें। यदि साफ-सफाई के लिए थोड़ा ढाल देना चाहें तो उत्तर, पूर्व दिशा या ईशान कोण की ओर ढाल दे सकते हैं। इसी प्रकार प्लॉट के खुले भाग का ढाल भी उत्तर, पूर्व दिशा एवं ईशान कोण की ओर ही दें ताकि बरसात का पानी ईशान कोण से होकर ही बाहर निकले।

यदि गंदे पानी की निकासी की व्यवस्था उत्तर या पूर्व दिशा में न हो पा रही हो तो ऐसी स्थिति में कंपाउंड वॉल के साथ प्लॉट के पूर्व ईशान से एक नाली बनाकर पूर्व आग्नेय की ओर बाहर निकालें या उत्तर ईशान से नाली बनाकर उत्तर वायव्य से बाहर निकाल दें।

>गुरु-चन्द्रमा मिलकर बनाते हैं गजकेसरी योग–

शुभ स्थिति में कारक ग्रह देते हैं उत्तम फल–

जब जन्मांग में गुरु एवं चन्द्रमा एक-दूसरे से केन्द्र में होते हैं तो गजकेसरी योग बनता है। यह एक अत्यन्त ही उत्तम योग है। विभिन्न ज्योतिषाचार्यों ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

गजकेसरी योग में उत्पन्न जातक शत्रुहन्ता, वाकपटु, राजसी सुख एवं गुणों से युक्त, दीर्घजीवी, कुशाग्रबुद्धि, तेजस्वी एवं यशस्वी होता है। ज्योतिष पितामह महर्षि पाराशर ने भी गजकेसरी योग का यही फल बताया है किन्तु साथ में उन्होंने यह भी कहा है कि यदि चन्द्रमा से केन्द्र में बुध या शुक्र स्थित हों, चन्द्र दृष्टि रखे या योग करे, यह भी गजकेसरी योग है। पुनः चन्द्रमा एवं योगकारक ग्रह नीचस्थ शत्रुक्षेत्री न हों यह अनिवार्यता दोनों योगों में बताई गई हैं।

यद्यपि बुध, गुरु, शुक्र से चन्द्रमा का योग अवश्य ही उत्तम फल देने वाला होगा किन्तु ऐसी अवस्था में गजकेसरी की जो इतनी प्रशंसा की गई है वह निरर्थक हो जाएगी क्योंकि तब लगभग नब्बे प्रतिशत जातक गजकेसरी योगोत्पन्न हो जाएँगे और शेष योगों की अवहेलना हो जाएगी।

किसी जन्मपत्री में मान लीजिए चन्द्रमा से केन्द्र में शुक्र है। चन्द्रमा उच्चस्थ है। चन्द्रमा की पूर्ण दृष्टि धनभावस्थ शुक्र पर है। चन्द्रमा राज्येश तथा शुक्र लग्नेश हैं किन्तु फिर भी यह व्यक्ति आजीवन वनवासी तथा धनाभाव से त्रस्त रहा। यद्यपि महर्षि पाराशर के मतानुसार इस जन्मांग में गजकेसरी योग है तथापि यह व्यक्ति जीवनभर दुःख ही भोगता रहा। पत्नी एवं संतान सबसे तिरस्कृत होना पड़ा। इस व्यक्ति को गजकेसरी योग का कोई भी परिणाम प्राप्त नहीं हुआ।

वास्तव में देखा जाए तो शुक्र से गजकेसरी योग हो ही नहीं सकता है। कारण यह है कि शुक्र की एक राशि वृष से दूसरी राशि तुला सदा छठे तथा तुला से वृष सदा आठवें पड़ेगी और इस तरह शुक्र सदा ही दुषित स्थान में या दोषपूर्ण भूमिका में रहेगा। ऐसी दशा में गजकेसरी योग भंग हो जाएगा। पुनः एक अनिवार्यता कारक ग्रहों के उदयास्त होने से है। यह निश्चित है कि शुक्र एवं बुध सर्वदा सूर्य से 40 या 48 अंशों के अन्दर ही रहेंगे। और इस प्रकार ये दोनों ग्रह कम समय के अन्तराल पर ही अस्त हो जाया करेंगे। यदि अस्त होने की शर्त पर योग की कल्पना करें तो बुधादित्य योग अस्तित्वहीन हो जाएगा। एक योग की परिकल्पना दूसरे योग को निर्मूल कर रही है।

गुरु एवं बुध पर चन्द्रमा की पूर्ण दृष्टि हो। तो इस प्रकार दृष्टि के परिप्रेक्ष्य में चन्द्रमा को गुरु एवं बुध से सप्तम होना पड़ेगा क्योंकि चन्द्रमा की पूर्ण दृष्टि सप्तम भाव पर ही होती है। तब चन्द्रमा एवं गुरु परस्पर केन्द्र में हो जाएँगे।

हम वृहत्पाराशर की प्रति में उपलब्ध कथन पर प्रकाश डालते हैं। पंडित देवेन्द्रचन्द्र झा संपादित प्रति में यह पाठ इस प्रकार है-’लग्नाद् वेन्दोर्गुरौ केन्द्रे सौम्यैर्युक्तेऽथवेक्षिते। गजकेसरियोगोऽयं न नीचास्तरिपुस्थिते।’

अर्थात्‌ लग्न या चन्द्र से केन्द्र में गुरु, नीच, अस्त या शत्रु ग्रह से रहित शुभयुक्त या दृष्टि हो तो गजकेसरी योग होता है। अब यहाँ पर एक अन्तर प्रत्यक्षतः देखने को मिल रहा है। यहाँ पर गुरु का चन्द्रमा से केन्द्र में होना आवश्यक नहीं है किन्तु यह कथन एकदम ही विरुद्ध है क्योंकि गुरु एवं चन्द्र का षडाष्टक योग शकट योग बनाता है जो एक अनिष्टकारी योग है।

समस्त बुरे परिणाम देने वाले ग्रह कुछ नहीं कर पाएँगे यदि एकमात्र बृहस्पति ही केन्द्र में हो। यद्यपि केन्द्र का बृहस्पति अवश्य ही अच्छा परिणाम देने वाला होता है किन्तु कहीं कहीं पर अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन मिलता है। अन्य समस्त योगों की अवहेलना कर दी जाती है।

गजकेसरी योग के पूर्ण फल प्राप्ति हेतु यह अत्यन्त आवश्यक है कि चन्द्रमा एवं गुरु दोनों ही मित्रक्षेत्री, शुभ भावेश दृष्टि-युक्त एवं शुभ भावस्थ हों। इसके अलावा एक शर्त यह भी है कि चन्द्रमा के आगे या पीछे सूर्य के अलावा शेष मुख्य पाँच ग्रहों में से कोई न कोई ग्रह होना चाहिए। अन्यथा ‘केमद्रुम’ जैसा भयंकर पातकी योग बन जाएगा। ऐसी अवस्था में गुरु एवं चन्द्रमा परस्पर केन्द्र में हों और उच्च के ही क्यों न हों ‘केमद्रुम’ अपना प्रभाव अवश्य ही दिखाएगा।

कहते हैं केमद्रुम में जन्म लेने वाला पुत्र स्त्री से हीन, दूरदराज देशों में भटकने वाला, दुःख से संतप्त, बुद्धि एवं खुशी से दूर, गंदगी से भरा, नीच कर्मरत, सदा भयभीत रहने वाला और अल्पायु होता है। केमद्रुम योग का इतना भीषण परिणाम होता है। अतः गजकेसरी योग के पूर्ण फल प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि चन्द्रमा भी किसी दुर्योग से प्रभावित न हो। एकमात्र चन्द्रमा से केन्द्र में केन्द्र में गुरु के रहने से ही गजकसरी योग का परिणाम प्राप्त नहीं होगा।

प्रायः गुरु एवं चन्द्रमा परस्पर केन्द्र में होने के बजाय यदि एक साथ हों तो उत्कृष्ट परिणाम प्राप्त होगा। पुनः परस्पर केन्द्र में होते हुए भी गुरु और चन्द्रमा में जो विशेष बली होकर जिस भाव में स्थित होगा उसी ग्रह का तथा उसी भाव का फल प्राप्त होगा।

यथा वृष लग्न में उच्चस्थ चन्द्रमा पर यदि गुरु की सप्तम दृष्टि हो तो गजकेसरी योग होते हुए भी एक तरफ जहाँ शरीर अतिकमनीय होगा वहीं पर दाम्पत्य जीवन अति कठिन होगा। क्योंकि जाया (सप्तम) भाव में अष्टमेश की युति हो जाएगी। इस प्रकार गजकेसरी योग का परिणाम शारीरिक सौष्ठव के रूप में प्राप्त होगा किन्तु यदि गुरु और चन्द्रमा दोनों एक साथ लग्न में हों तो शुभ ग्रह की राशि में स्थित होने के कारण गुरु भी फलदायक हो जाएगा।

इसी प्रकार यदि तुला लग्न में गुरु एवं चन्द्रमा दोनों ही लग्नस्थ हों तो देह सौष्ठव एवं समस्त धन-सम्पदा उपलब्ध होने के बावजूद ‘क्षत्यावयव जलेन’ अर्थात्‌ शरीर के अन्दर या बाहर का कोई अवयव क्षतिग्रस्त होगा। यह प्रत्यक्षतः अनुभूत है। तात्पर्य यह कि गजकेसरी योग में भी गुरु एवं चन्द्रमा का शुभ भावेश होना आवश्यक है। तभी पूर्ण फल प्राप्त होगा। गजकेसरी योग का सबसे अच्छा परिणाम मीन लग्न के जातक को तब प्राप्त होता है जब गुरु एवं चन्द्र संयुक्त हों या लग्न से केन्द्र में हों।

यद्यपि मीन लग्न के जातक को किसी भी भाव में चन्द्रमा एवं गुरु का परस्पर केन्द्र में होना गजकेसरी योग का अति उत्तम फल देने वाला देखा गया है। अन्यान्य स्थलों पर गजकेसरी योग के भंग होने की शर्तों में यह भी बताया गया है कि कारक ग्रहों को अस्त नहीं होना चाहिए तथा बुध, गुरु आदि से चन्द्र योग को भी गजकेसरी योग की संज्ञा दी गई है। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि सूर्य के साथ बुध की शक्ति में वृद्धि होती है। बुध एवं शुक्र ऐसे ग्रह हैं जो सर्वदा सूर्य के आसपास रहते हैं।

सूर्य के साथ बुध रहने पर ही बुधादित्य योग होता है तो फिर इसके अस्त होने से गजकेसरी योग भंग कैसे होगा? क्योंकि बुध के अस्त होने से तथा चन्द्र से युक्त-दृष्टि होने पर भी न तो गजकेसरी योग ही बनेगा और न ही बुधादित्य जैसे अतिप्रसिद्ध योग की महत्ता या उपयोगिता रह जाएगी।

अतः बुध एवं शुक्र के संयोग से गजकेसरी योग की सिद्धि उचित प्रतीत नहीं होती है। शुक्र के साथ भी संयोग प्रायः शत्रु क्षेत्री का हो जाएगा। अतः गजकेसरी की सिद्धि गुरु के साथ ही संभव एवं उचित होगी। अन्य किसी के साथ नहीं। किन्तु शुभ स्थिति में कारक ग्रहों (गुरु एवं चन्द्र) के होने पर गजकेसरी योग का बहुत ही अच्छा परिणाम प्राप्त होता है।

>पूजा का स्थान कहाँ हो—

हमारे घर में पूजा का स्थान जरूर ही होता है। लेकिन यदि पूजा का स्थान उचित जगह पर हो तो हमारे मन में भी शांति रहेगी। भगवान की पूजा हम जरूर करते हैं पर घर में पूजास्थल कहाँ होना चाहिए इसकी सही जानकारी नहीं होने की वजह से हमें मनोवांछित फल की प्राप्ति नहीं हो पाती। आइए जानते हैं कि वास्तुशास्त्र के अनुसार घर में पूजास्थल कहाँ होना चाहिए।

आजकल महानगरों में जगह की इतनी कमी है कि पूजा के लिए अलग से एक कमरा बनाना संभव नहीं हो पाता। पर आज भी जिसके मकान बड़े हैं वहाँ एक कमरे में अलग से पूजास्थल बना होता है। कई घरों में तो बाकायदा अलग से मंदिर बना होता है, जो सुंदर देव प्रतिमाओं से सुशोभित होता है। यह बात भी सच है कि पूजा जैसी भी हो वह फलदायक तभी होती है जब पूजा करने वाले के मन में भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा हो।

सही स्थान का चुनाव- कई बार प्रश्न है उठता है कि कहीं पूजा स्थल गलत जगह पर तो नहीं बनाया गया? कहीं मूर्तियों या चित्रों का मुँह गलत या उल्टी दिशा की ओर तो नहीं है? हम ठीक दिशा की तरफ मुँह करके पूजा कर रहे हैं या नहीं? आपकी पूजा में जितनी भक्ति और समर्पण का भाव होगा भगवान आपसे उतना ही प्रसन्न होकर आपका भाग्योदय करेंगे।

नियम यही है कि घर में एक ही पूजास्थल होना चाहिए। घर में पूजास्थल एक शक्तिशाली ऊर्जा का स्त्रोत होता है। इसलिए यह स्त्रोत घर में जगह-जगह बिखरा हुआ नहीं होना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि एक ही घर में अलग-अलग कमरों में दो या तीन पूजास्थल नहीं होने चाहिए। संयुक्त परिवारों में ऐसा देखने को मिलता है कि एक ही परिवार में लोग अपने-अपने बेडरूम के पास ही पूजास्थल बना लेते हैं। पर वास्तुशास्त्र की दृष्टि से यह बिल्कुल गलत है। ऐसा करने से घर के सदस्य हमेशा मानसिक परेशानी से घिरे रहेंगे और उन्हें ठीक से नींद नहीं आएगी। जगह-जगह भगवान के चित्र और प्रतिमाएँ मंदिर में ठीक रहते हैं, घर में नहीं। संयुक्त परिवार में तो यह अत्यंत आवश्यक है कि पूजास्थल एक ही जगह स्थित हो, भले ही परिवार के सभी सदस्य अपनी सुविधानुसार एक साथ या अलग-अलग समय पर पूजा करें।

अगर आप नया मकान बनवाने की सोच रही हैं तो उसके उत्तर-पूर्व के कमरे यानी ईशान कोण में पूजास्थल रखना सर्वोत्तम रहेगा। ईशान कोण में मंदिर रखना और प्रतिमाओं का मुख पश्चिम की ओर करना ही उत्तम रहता है। ईशान कोण देवताओं के गुरु बृहस्पति और मोक्षकारक केतु की दिशा मानी गई है। ईशान कोण में स्वयं भगवान शिव विराजमान रहते हैं और उनका एक नाम ईशान भी है। ईशान कोण आध्यात्मिक कार्यों के लिए सबसे उत्तम और शक्तिशाली दिशा मानी गई है।

सभी की श्रद्धा हर देवी-देवता में हो यह आवश्यक नहीं, हरेक का अपना एक इष्टदेव होता है। वैसे तो भगवान के जिस स्वरूप की पूजा करने से ही आपको सब फल मिल जाएँगे, यह शास्त्रों का कथन है फिर भी अगर आप एक से अधिक देवी-देवताओं का पूजन करना चाहें तो अपने पूजास्थल के बीच में गणेश, ईशान में विष्णु या उनके अवतार राम या कृष्ण, अग्निकोण में शिव, नैऋत्य कोण यानी दक्षिण-पश्चिम में सूर्य तथा वायुकोण यानी उत्तर-पश्चिम में देवी दुर्गा की स्थापना कीजिए। सबसे पहले सूर्य की और फिर क्रम से गणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु की पूजा करनी चाहिए।
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वास्तु की नजर से पूजाघर —

घर में पूजा के कमरे का स्थान सबसे अहम् होता है। यह वह जगह होती है, जहाँ से हम परमात्मा से सीधा संवाद कर सकते हैं। ऐसी जगह जहाँ मन को सर्वाधिक शांति और सुकून मिलता है। प्राचीन समय में अधिकांशतः पूजा का कमरा घर के अंदर नहीं बनाया जाता था।

घर के बाहर एक अलग स्थान देवता के लिए रखा जाता था जिसे परिवार का मंदिर कहते थे। बदलते दौर के साथ एकल परिवार का चलन बढ़ा है, इसलिए पूजा का कमरा घर के भीतर ही बनाया जाने लगा है। अतएव वास्तु अनुसार पूजा घर का स्थान नियोजन और सजावट की जाए तो सकारात्मक ऊर्जा अवश्य प्रवाहित होती है।

स्थान : पूजा का कमरा घर के उत्तर-पूर्व कोने में बनाने से शांति, सुकून, स्वास्थ्य, धन और प्रसन्नता मिलती है। पूर्व या उत्तर दिशा में भी पूजा स्थल बना सकते हैं। पूजाघर के ऊपर या नीचे की मंजिल पर शौचालय या रसोईघर नहीं होना चाहिए, न ही इनसे सटा हुआ। सीढ़ियों के नीचे पूजा का कमरा बिलकुल नहीं बनवाना चाहिए। यह हमेशा ग्राउंड फ्लोर पर होना चाहिए, तहखाने में नहीं। पूजा का कमरा खुला और बड़ा बनवाना चाहिए।
घर में पूजा के कमरे का स्थान सबसे अहम् होता है। यह वह जगह होती है, जहाँ से हम परमात्मा से सीधा संवाद कर सकते हैं। ऐसी जगह जहाँ मन को सर्वाधिक शांति और सुकून मिलता है। प्राचीन समय में अधिकांशतः पूजा का कमरा घर के अंदर नहीं बनाया जाता था।

मूर्तियाँ : कम वजन की तस्वीरें और मूर्तियाँ ही पूजाघर में रखनी चाहिए। इनकी दिशा पूर्व, पश्चिम, उत्तर मुखी हो सकती है, लेकिन दक्षिण मुखी कभी नहीं। भगवान का चेहरा किसी भी वस्तु से ढँका नहीं होना चाहिए, फूल और माला से भी नहीं। इन्हें दीवार से एक इंच दूर रखना चाहिए, एक-दूसरे के सम्मुख नहीं। इनके साथ अपने पूर्वजों की तस्वीर नहीं रखनी चाहिए। खंडित मूर्तियाँ पूजाघर के अंदर कभी नहीं रखना चाहिए। अगर कोई मूर्ति खंडित हो जाए तो उसे तुरंत प्रवाहित करा देना चाहिए।

दीपक : दीया पूजा की थाली में, भगवान के सामने रखा होना चाहिए। यह दरवाजे में रखा होना चाहिए, ऊँची जगह या प्लेटफार्म पर नहीं। दीपक में दो जली हुई बत्तियाँ होनी चाहिए, एक पूर्व और एक पश्चिम मुखी।

दरवाजा : दरवाजा और खिड़की उत्तर या पूर्व में होना चाहिए। यह टीन या लोहे का नहीं बना होना चाहिए। यह दीवार के बीचोंबीच स्थित होना चाहिए। अलमारी, टांड या कैबिनेट की ऊँचाई मूर्तियों के स्थान की ऊँचाई से अधिक नहीं होनी चाहिए।

अन्य : धूप, अगरबत्ती या हवन कुंड पूजाघर के दक्षिण-पूर्व कोण में रखने चाहिए। सौंदर्य प्रसाधन की या कोई भी अन्य वस्तु यहाँ नहीं रखनी चाहिए। पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा करनी चाहिए, दक्षिण दिशा की ओर नहीं। पूजा स्थल के ऊपर भारी सामान नहीं रखना चाहिए। धनया गहने पूजाघर में नहीं रखने, छिपाने चाहिए।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>लग्न में जब हो गुरु और शुक्र—

>लग्न में जब गुरु हो –कई मायनों में महत्वपूर्ण है बृहस्पति—

लग्न का बृहस्पति कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जाता है। लग्न का बृहस्पति जातक को विद्या पि‍पासु बना देता है। हर तरह से ज्ञान अर्जन करने की इच्छा इनमें रहती है। हर बृहस्पति व्यक्ति को अच्छे स्वभाव का मालिक भी बनाता है। लग्न में बृहस्पति होने पर व्यक्ति आसानी से परिस्थिति के अनुसार ढलने की व खुश रहने की क्षमता विकसित करता है।

लोगों में पहचान बनाने व कम साधनों में भी विकास करने की क्षमता रखता है। नई चीजें सीखने की ललक रहती है। यदि अन्य योग दुरुस्त हो तो ये व्यक्ति ज्योतिष में रुचि रखते हैं। लग्न में बृहस्पति होने पर व्यक्ति प्राय: अध्यापन, काउंसिलिंग आदि क्षेत्रों को व्यवसाय रूप में अपनाता है।

बृहस्पति के बारे में यह तथ्य है कि यह जिस भाव में बैठता है उसका नाश करता है, मगर जिन भावों को देखता है उनको लाभ देता है। लग्न का बृहस्पति कमजोर होने पर शरीर यष्टि कमजोर रहती है यानी छोटा कद, दुबला-पतला या अति स्थूल शरीर रहता है मगर इसकी पंचम व नवम-सप्तम पर दृष्टि बच्चों, जीवनसाथी व भाग्य के लिए लाभकारी होती है।

साधारणत: लग्न का बृहस्पति निरोगी, दीर्घायु बनाता है, जीवन में संघर्ष देता है मगर अंत में विजयी भी बनाता है।

स्वराशिस्थ गुरु के परिणाम अच्छे ही होते हैं। तुला व वृषभ का गुरु कष्ट देता है। अन्य राशियों में अग्नि तत्व की राशियों में यह व्यक्ति को धैर्यवान साहसी व ज्ञानी बनाता है। जलतत्व में होने पर व्यक्ति न्यायी, उदार, सहायता करने वाला विद्वान बनाता है। कर्क (उच्च) का गुरु जीवन में कष्ट देता है।

लग्न का गुरु प्राय: अति आदर्शवादी और अहंकारी भी बनाता है अत: गुरु की शरर में रहना, माता-पिता का आदर करना व अहंकार से बचना आवश्यक है।
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जब लग्न में शुक्र हो—-

लग्न का शुक्र जातक को शारीरिक सुंदरता से पूर्ण बनाता है। शुक्र प्रबल हो तो जातक की आँखें बेहद भावपूर्ण होती है व वह बातें करते समय आँखों व हाथों का प्रयोग अधिक करता है। मीठा बोलने व लोगों को लुभाने में ये माहिर होते हैं।

लग्न का शुक्र स्वभाव में कोमलता, भावुकता और विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण भी देता है। यदि शुक्र लग्नस्थ हो या तुला-वृषभ लग्न हो व शुक्र पंचम में हो या शुक्र महादशा 12 से 16 वर्ष के बीच कभी लगने वाली हो तो चरित्र का ध्यान रखना आवश्यक होता है। अन्यथा यह शुक्र गलत रास्ते पर ले जाता है।

शुक्र लग्नस्थ होने पर जातक कलाकार होता है। उसे गायन, वादन, नृत्य या चित्रकला का शौक अवश्य होता है। लग्न में शुक्र हो व उस पर शनि-राहु की दृष्टि न हो तो बाल प्रौढ़ावस्था तक काले रहते हैं, त्वचा की रंगत बनी रहती है।

अग्नि तत्व की राशि का शुक्र (विशेषत: धनु) विवाह में देर कराता है मगर पत्नी बहुत अच्छी मिलती है व जीवन सुखी रहता है। वृषभ का शुक्र चरित्र का ध्यान रखने की सीख देता है। मिथुन, तुला व कुंभ का शुक्र भी विलासी जीवन में रुचि देता है। कन्या का शुक्र पत्नी व घर परिवार में रुचि व झुकाव बनाए रखता है। मीन राशि का शुक्र अस्थिर विचारों वाला बनाता है। कर्क और वृश्चिक राशि का शुक्र अच्‍छा पत्नी सुख व संतान सुख देता है।

शुक्र की कमजोर स्थिति त्वचा रोग, डायबिटीज या मूत्राशय से संबंधित रोगों को जन्म देती है अत: शुक्र को प्रबल रखने के लिए स्त्री का सम्मान करना, कफ को संतुलित रखना, सफेद वस्तुओं का सेवन करना व देवी की उपासना करना फलदायक होता है।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>ईशान कटा होना दुर्भाग्य सूचक–

>ईशान कटा होना दुर्भाग्य सूचक—

आपके घर के वास्तु में ईशान कोण का बहुत महत्व है, ईशान कोण उत्तर कोने को माना गया है। इस स्थान को वास्तु शास्त्र में भगवान की दिशा माना गया है। जैसा कि शब्द से ही स्पष्ट है कि यह स्थान ईश्वर का स्थान है। और यही कारण है कि यदि यह भाग कटा हो तो अशुभ माना जाता है तथा आपकी उन्नति में बाधा आती है। इस भाग पर आने जाने का रास्ता हो तो भी यह भाग उन्नति में बाधक होगा, क्योंकि इस कारण इस भाग पर जूते-चप्पलों का प्रयोग होगा।

यदि घर का यह हिस्सा कटा हुआ हो तो तुरन्त बंद कर देना चाहिए व स्थान शुद्ध करके वहाँ भगवान की मूर्ति स्थापित करना चाहिए। आप अपने धर्मानुसार इष्ट देव की मूर्ति या धर्म से संबंधित पवित्र वस्तुएँ भी रख सकते हैं।
जैसा कि शब्द से ही स्पष्ट है कि यह स्थान ईश्वर का स्थान है। और यही कारण है कि यदि यह भाग कटा हो तो अशुभ माना जाता है तथा आपकी उन्नति में बाधा आती है। इस भाग पर आने जाने का रास्ता हो तो भी यह भाग उन्नति में बाधक होगा।

यदि कुछ और न रख सकने जैसी जगह हो तो उस स्थान पर पानी का मटका या कोई हरे पौधे का गमला भी रख सकते हैं। यदि यह भाग घर के अन्य भागों से बड़ा हो तो अति उत्तम परिणाम देने वाला साबित होता है। जो भी इस स्थान पर बने कमरे में रहेगा उसे जीवन में सदैव उन्नति प्राप्त होगी।

पानी का हौज जमीन में बना हुआ और मकान में अंदर ही निर्मित हो तो उस दरवाजे को बंद कर दूसरे स्थान से दरवाजा बनाना चाहिए। इस स्थान पर शौच आदि का स्थान हो तो उसे तुरन्त बंद कर देना चाहिए व अन्यत्र जहाँ भी सुविधा हो वहाँ बना लेना चाहिए। पश्चिम-दक्षिण में हो तो ठीक रहेगा। शौच स्थान उत्तर पूर्व या ईशान में नहीं होना चाहिए। इस बात के लिए कम से कम ईशान का ध्यान अवश्य रखें।

>सर्वग्रह शांति के लिए करें गणेश आराधना—-

गजाननजी को ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह से संबद्ध किया जाता है। इनकी उपासना नवग्रहों की शांतिकारक व व्यक्ति के सांसारिक-आध्यात्मिक दोनों तरह के लाभ की प्रदायक है। अथर्वशीर्ष में इन्हें सूर्य व चंद्रमा के रूप में संबोधित किया है। सूर्य से अधिक तेजस्वी प्रथम वंदनदेव हैं। इनकी रश्मि चंद्रमा के सदृश्य शीतल होने से एवं इनकी शांतिपूर्ण प्रकृति का गुण शशि द्वारा ग्रहण करके अपनी स्थापना करने से वक्रतुण्ड में चंद्रमा भी समाहित हैं। पृथ्वी पुत्र मंगल में उत्साह का सृजन एकदंत द्वारा ही आया है।

बुद्धि, विवेक के देवता होने के कारण बुध ग्रह के अधिपति तो ये हैं ही, जगत का मंगल करने, साधक को निर्विघ्नता पूर्ण कार्य स्थिति प्रदान करने, विघ्नराज होने से बृहस्पति भी इनसे तुष्ट होते हैं। धन, पुत्र, ऐश्वर्य के स्वामी गणेशजी हैं, जबकि इन क्षेत्रों के ग्रह शुक्र हैं। इस तथ्य से आप भी यह जान सकते हैं कि शुक्र में शक्ति के संचालक आदिदेव हैं। धातुओं व न्याय के देव हमेशा कष्ट व विघ्न से साधक की रक्षा करते हैं, इसलिए शनि ग्रह से इनका सीधा रिश्ता है।

गणेशजी के जन्म में भी दो शरीर का मिलाप (पुरुष व हाथी) हुआ है। इसी प्रकार राहु-केतु की स्थिति में भी यही स्थिति विपरीत अवस्था में है अर्थात गणपति में दो शरीर व राहु-केतु के एक शरीर के दो हिस्से हैं।

इसलिए ये भी गणपतिजी से संतुष्ट होते हैं। गणेशजी की स्तुति, पूजा, जप, पाठ से ग्रहों की शांति स्वमेव हो जाती है। किसी भी ग्रह की पीडा में यदि कोई उपाय नहीं सूझे अथवा कोई भी उपाय बेअसर हो तो आप गणेशजी की शरण में जाकर समस्या का हल पा सकते हैं।

विघ्न, आलस्य, रोग निवृत्ति एवं संतान, अर्थ, विद्या, बुद्धि, विवेक, यश, प्रसिद्धि, सिद्धि की उपलब्धि के लिए चाहे वह आपके भाग्य में ग्रहों की स्थिति से नहीं भी लिखी हो तो भी विनायकजी की अर्चना से सहज ही प्राप्त हो जाती है।

>वस्तुओं में फेरबदल कर वास्तु दोष समाप्त करें—

वास्तु शास्त्र इसके रचयिता विश्वकर्माजी की मानव को अभूतपूर्व देन है। ज्योतिष विज्ञान के अंतर्गत वास्तु का एक महत्वपूर्ण स्थान है। किसी भी भवन का निर्माण करते समय उसे वास्तुनुकूल बनाना आवश्यक है क्योंकि घर में सुख, शांति एवं समृद्धि इसी पर आधारित है। वास्तु दोष होने पर भवन में कई प्रकार की परेशानियाँ, अस्वस्थता, अकारण दुःख, हानि, चिंता एवं भय आदि बना रहता है।

आधुनिक युग में फ्लैट संस्कृति चारों ओर विकसित हो चुकी है। इन फ्लैटों में अगर वास्तु दोष हों तो भी तोड़-फोड़कर अनुकूल बनाना संभव नहीं हो पाता है। कई जगह धनाभाव या अर्थाभाव के कारण भी व्यक्ति वास्तु दोष का निवारण नहीं कर पाता है। लेकिन ऐसे में निराश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि ऐसे में हम घर के सामान या वस्तुओं में फेर-बदलकर वास्तु दोष को एक सीमा तक समाप्त कर सकते हैं।
वास्तु शास्त्र इसके रचयिता विश्वकर्माजी की मानव को अभूतपूर्व देन है। ज्योतिष विज्ञान के अंतर्गत वास्तु का एक महत्वपूर्ण स्थान है। किसी भी भवन का निर्माण करते समय उसे वास्तुनुकूल बनाना आवश्यक है क्योंकि घर में सुख, शांति एवं समृद्धि इसी पर आधारित है।

उदाहरण के तौर पर आग्नेय कोण (पूर्व-दक्षिण का कोना) में रसोईघर होना चाहिए किन्तु ऐसा न होने पर अग्नि की पुष्टि नहीं हो पाती है। इसके निवारण के लिए हम घर की इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं को जैसे फ्रीज, टी.वी. इत्यादि को इस कोने में रखकर इसे पुष्ट बना सकते हैं। इसी प्रकार घर की पूर्व एवं उत्तर दिशा को खाली रखा जाना चाहिए।

अगर ऐसा संभव न हो तो पूर्व या उत्तर दिशा में रखी वस्तुओं के वजन से लगभग डेढ़ गुना वजन नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) या दक्षिण दिशा में रखा जाना चाहिए क्योंकि नैऋत्य कोण भारी एवं ईशान कोण (पूर्व-उत्तर) हलका होना चाहिए। इसी प्रकार घर की घड़ियों को हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा में लगाया जाना जाना चाहिए इससे अच्छे समय के आगमन के व्यवधान समाप्त होते हैं। ईशान कोण पवित्र एवं स्वच्छ रखा जाना चाहिए एवं एक घड़ा जल भरकर इस कोने में रखना चाहिए, इसके सत्परिणाम मिलते हैं।

सभी महत्वपूर्ण कागजों को पूर्व या उत्तर दिशा में रखा जाना चाहिए ऐसा न करने से इनसे संबंधित घटनाएँ अहितकारी रहती हैं। इस प्रकार घर के शयन कक्ष, पूजा-स्थल, तिजोरी, बाथरूम, बैठक-स्थल, भोजन-कक्ष, मुख्य द्वार एवं खिड़की आदि में परिवर्तन कर वास्तु दोष ठीक कर जीवन में सफलता प्राप्त की जा सकती है।
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अविवाहित किस दिशा में सोएँ–जिससे शीघ्र विवाह हो—

आज चीनी ज्योतिष का प्रचलन बढ़ता ही चला जा रहा है। चीन ज्योतिष भारतीय ज्योतिष का मिला-जुला ही रूप है। फर्क इतना है कि हमारी विद्या प्राचीन मनीषियों तक ही सीमित रही और काफी काल तक विलुप्त ही रही लेकिन अब ज्योतिष के प्रति रुझान अधिक बढ़ने लगा है। इस क्षेत्र में काफी अनुसंधान व निरंतर प्रयोग चल रहे हैं। यहाँ पर कुछ अनुभूत जानकारियाँ हमारे पाठकों को दी जा रही हैं, ताकि हमारे पाठक अधिक से अधिक इसका लाभ लें।

अविवाहित युवक हो या युवती जिसका विवाह नहीं हो रहा है और अनेक बाधाएँ आ रही हैं, उन्हें घर के नैऋत्य कोण अर्थात दक्षिण-पश्चिम दिशा वाले कोण में सोना चाहिए, इससे शीघ्र विवाह योग बनेंगे। यदि किसी परिवार में अलग से कमरा न हो तो वह नैऋत्य कोण वाली जगह में सोएँ और लाभ पाएँ।
चीन ज्योतिष भारतीय ज्योतिष का मिला-जुला ही रूप है। फर्क इतना है कि हमारी विद्या प्राचीन मनीषियों तक ही सीमित रही और काफी काल तक विलुप्त ही रही लेकिन अब ज्योतिष के प्रति रुझान अधिक बढ़ने लगा है।

कुँवारे लड़के या लड़कियों के शयन कक्ष में हरे पौधे या फूलों का गुलदस्ता नहीं रखें। फेंगशुई में इसे लकड़ी तत्व को माना है एवं लकड़ी तत्व येंग ऊर्जा को बढ़ाता है, अतः येंग ऊर्जा अधिक होगी तो विवाह में बाधा पैदा करेगी। शयन कक्ष में गहरे व लाल रंग के पुष्प कदापि न हों क्योंकि ये शुभ नहीं माने जाते। सफेद रंग के परदे या सोने के बिस्तर पर सफेद रंग की चादर शुभ रहेगी। टी.वी., टेलीफोन या कम्प्यूटर भी न शयन कक्ष में रखें, न ही किताबों को रखें क्योंकि इनके होने से सोने में बाधा रहेगी और नींद नहीं आएगी।

अविवाहित युवक या युवती को कभी भी दरवाजे के सामने सिर या पाँव नहीं रखना चाहिए। नैऋत्य कोण में क्रिस्टल का झाड़ रखें तो उत्तम रहेगा। नैऋत्य कोण वाले कमरे में प्रेमी युगल के चित्र लगाएँ, मोर-मोरनी या लव बर्ड्स के चित्र भी लगा सकते हैं।

शयन कक्ष में हल्के गुलाबी परदे लगा सकते हैं। इस प्रकार यदि अविवाहितों के लिए उपाय किए जाएँ तो विवाह से बाधा दूर होगी एवं उत्तम रिश्ते आने की संभावनाएँ अधिक बढ़ जाएगी।
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वास्तु से मिलेगा मानसिक संतोष—

इस दुनिया को आखिर कोई तो है, जो चलाता है। कुछ-कुछ तो हम जानते हैं, बहुत कुछ ऐसा भी है, जिसे हम बिलकुल नहीं जानते। जो थोड़ा-बहुत हम जानते हैं, उसी में से एक है वास्तु। इस संबंध में शास्त्र और यांत्रिकी दो भिन्न पहलू हैं। यहाँ जिक्र हो रहा है केवल शास्त्र का।

कोई माने या न माने, यह शास्त्र पूरी तरह प्रामाणिक और वैज्ञानिक है, वरना क्या वजह है कि मध्य युग के बाद से सुप्त पड़े इस विषय को इक्कीसवीं सदी में नई चेतना मिली? इस समय जब कम्प्यूटर, क्लोन, अंतरिक्ष के रहस्य जान लेने की बात हो रही है, यह प्राचीन भारतीय शास्त्र अपनी अहमियत दर्ज करा रहा है।
किसी पुराने टूटे-फूटे से मकान में रहनेवाला महलों का मालिक कैसे बन जाता है? वही व्यक्ति महलनुमा मकान में रहकर दिवालिया क्यों हो जाता है? एक ही बाजार में छोटीसी दुकान पर दिनभर भीड़ रहती है और ठीक सामने स्थित भव्य शोरूम में मक्खियाँ उड़ती रहती हैं, क्यो?

इंदौर का राजबाड़ा बार-बार क्यों जल जाता है? इंदौर का ही दक्षिणी हिस्सा सपना-संगीता रोड नया व्यापारिक क्षेत्र कैसे बन गया? दक्षिण मुंबई में देश-विदेश की तमाम नामी-गिरामी कंपनियों के कार्यालय क्यों हैं? देश के प्राचीन मंदिरों, महलों का शिल्प वास्तु से प्रेरित/प्रभावित क्यों हैं?

किसी पुराने टूटे-फूटे से मकान में रहने वाला महलों का मालिक कैसे बन जाता है? वही व्यक्ति महलनुमा मकान में रहकर भी दिवालिया क्यों हो जाता है? एक ही बाजार में किसी छोटी-सी दुकान पर दिनभर भीड़ उमड़ी रहती है और ठीक सामने स्थित भव्य शोरूम में मक्खियाँ उड़ती रहती हैं, क्यों?

ये कोई अनबूझ पहेली नहीं है। इन तमाम सवालों के जवाब हैं। मेरी स्पष्ट मान्यता है कि यह काफी हद तक वास्तु अनुरूप निर्माण का परिणाम है। यह भी सही है कि हर व्यक्ति के जीवन में उतार-चढ़ाव, सुख-दुःख आते हैं। चूँकि यह भाग्य का खेल है। यदि ब्रह्माण्ड है, नक्षत्र है, ग्रह हैं तो ग्रह योग भी हैं और इसीलिए वास्तु शास्त्र भी है।

आपने गौर किया होगा कि किसी मकान में गृह स्वामी की, तो किसी में गृह स्वामिनी की अकाल मृत्यु हो जाती है। किसी घर में अकसर कोई न कोई बीमार रहता है। किसी मकान में वंश आगे नहीं बढ़ता। कहीं पति-पत्नी में तकरार बहुत होती है, तो कहीं औलाद अवज्ञाकारी होती है। ये सब क्या है? वही वास्तु-दोष। हाल ही में आपने पढ़ा होगा कि ग्वालियर के सिंधिया राजघराने में कोई भी पुरुष 60 वर्ष का नहीं हो पाता।

यह कोई अभिशाप या सिंधिया घराने में पैदा होने वाले पुरुषों की शरीर रचना में किसी कमी की वजह से नहीं है। निश्चित रूप से ग्वालियर राजमहल में ऐसा कोई वास्तुदोष होगा, जो पुरुष सदस्यों की लंबी उम्र में बाधक है। यह मेरा निजी अभिमत नहीं है। शास्त्रों में इसकी स्पष्ट व्याख्या की गई है। वेदों में इसका सविस्तार वर्णन है। संवत्‌ 1480 में उदयपुर के महाराजा कुंभकर्ण के कार्यकाल में श्रीमंडन सूत्रधार ने भी वास्तुशास्त्र पर एक ग्रंथ लिखा था। उसी आधार पर 1891 में एक पुस्तक भी प्रकाशित हुई ‘राजवल्लभ’।

वास्तुशास्त्र आखिर करता क्या है? यह बताता है कि कहाँ, क्या होना चाहिए? मसलन, एक आँख की जगह कान लगा हो या एक आँख गर्दन पर हो अथवा नाक आपके घुटने पर हो, ऐसा संभव है क्या? यदि ऐसा हो जाए तो मानव शरीर कितना विकृत लगेगा।
वास्तुशास्त्र पर उपलब्ध ग्रंथों में इसे काफी प्रामाणिक माना गया है। इसमें बताया गया है कि पृथ्वी के चुंबकीय प्रवाहों, दिशाओं, सूर्य की किरणों, वायु प्रवाह एवं गुरुत्वाकर्षण के नियमों का समन्वय ही वास्तुशास्त्र है। राजवल्लभ के अलावा मयशिल्पम्‌, शिल्प रत्नाकार, समरांगण सूत्रधार आदि कई दुर्लभ ग्रंथ हैं, जो पुरातन वास्तुशास्त्र पर अच्छे से प्रकाश डालते हैं। अथर्ववेद, यजुर्वेद, भविष्य पुराण, मत्स्य पुराण, वायु पुराण, पद्म पुराण, विष्णु धर्मोत्तर पुराण, गर्ग संहिता, नारद संहिता, सारंगधर संहिता, वृहत्त संहिता में वास्तुशास्त्र पर प्रकाश डाला गया है।

वास्तुशास्त्र आखिर करता क्या है? यह बताता है कि कहाँ, क्या होना चाहिए? मसलन, एक आँख की जगह कान लगा हो या एक आँख गर्दन पर हो अथवा नाक आपके घुटने पर हो, ऐसा संभव है क्या? यदि ऐसा हो जाए तो मानव शरीर कितना विकृत लगेगा। वास्तु यही बताता है कि मकान में रसोई घर (दक्षिण-पूर्व कोने में), पूजाघर (उत्तर-पूर्व कोने में), शयनकक्ष (दक्षिण-पश्चिम कोने में), मेहमान कक्ष या बच्चों का कक्ष (उत्तर-पश्चिम कोने में) कहाँ होना चाहिए।

बैठक भी उत्तर-पूर्व में ठीक होती है। सोते वक्त सिर दक्षिण या पूर्व में होना चाहिए। उसकी वजह है। पूर्व में सूर्य होता है, जो स्थिर है। दिनभर थकान के बाद जब विश्राम करते हैं, तो सूर्य से ऊर्जा सीधे हमारे मस्तिष्क को मिल जाती है, जो हमें अगले दिन के लिए ऊर्जावान बना देती है। या फिर दक्षिण में इसलिए कि दक्षिण में चुंबकीय प्रवाह होता है, जो हमारे शरीर के रक्त को पूरे शरीर से मस्तिष्क की ओर खींचता है, जो हमें स्वस्थ, प्रसन्न, ऊर्जावान रखता है। जो अपना सिर उत्तर या पश्चिम में करके सोते हैं, वे अक्सर बीमार, बोझिल या उनींदे ही नजर आएँगे।

वास्तु का सबसे अच्छा पालन नए निर्माण में हो सकता है। इसका यह मतलब नहीं है कि मौजूदा बनावट से छेड़छाड़ करना टेढ़ी खीर है। यदि आप स्वस्थ, प्रसन्नचित्त और सुख-समृद्धि चाहते हैं, तो घर की या दफ्तर, दुकान की कुछ व्यवस्थाएँ बदलने को तत्पर रहना चाहिए। लेकिन एक बात जरूर जान लें। वास्तु कोई लॉटरी का टिकट नहीं है, जो आपको मालामाल कर दे। वैसे लॉटरी भी हर टिकट पर तो खुलती नहीं, वास्तु अनुरूप संरचना कर लेने से आपको हर काम में तृप्ति, मानसिक संतोष मिलेगा। क्या यह कम मूल्यवान है? जब आप प्रसन्नचित्त और स्वस्थ मन शरीर से कोई काम करेंगे तो अपेक्षित सफलता स्वाभाविक है। यही वास्तु का सुखद फल है।

दरअसल, सारी गड़बड़ी तब होती है, जब हम आज सुबह बोकर शाम में फल पा लेने की ख्वाहिश कर बैठते हैं, जबकि जो पौधा बोता है, छाया और फल उसे नहीं, अगली पीढ़ी को मिलता है। वास्तु भी प्रकृति के इस नियम से अछूता नहीं। वास्तु अनुरूप निर्माण कर लेने या बदलाव कर लेने से सुखद परिवर्तन अवश्यंभावी है।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>ग्रहों के अशुभ फल–

>ग्रहों के अशुभ फल—

प्रत्येक जातक की कुंडली में अशुभ ग्रहों की स्थिति अलग-अलग रहती है, परंतु कुछ कर्मों के आधार पर भी ग्रह आपको अशुभ फल देते हैं। व्यक्ति के कर्म-कुकर्म के द्वारा किस प्रकार नवग्रह के अशुभ फल प्राप्त होते हैं, आइए जानते हैं :

चंद्र : सम्मानजनक स्त्रियों को कष्ट देने जैसे, माता, नानी, दादी, सास एवं इनके पद के समान वाली स्त्रियों को कष्ट देने एवं किसी से द्वेषपूर्वक ली वस्तु के कारण चंद्रमा अशुभ फल देता है।

बुध : अपनी बहन अथवा बेटी को कष्ट देने एवं बुआ को कष्ट देने, साली एवं मौसी को कष्ट देने से बुध अशुभ फल देता है। इसी के साथ हिजड़े को कष्ट देने पर भी बुध अशुभ फल देता है।

गुरु : अपने पिता, दादा, नाना को कष्ट देने अथवा इनके समान सम्मानित व्यक्ति को कष्ट देने एवं साधु संतों को कष्ट देने से गुरु अशुभ फल देता है।

सूर्य : किसी का दिल दुखाने (कष्ट देने), किसी भी प्रकार का टैक्स चोरी करने एवं किसी भी जीव की आत्मा को ठेस पहुँचाने पर सूर्य अशुभ फल देता है।

शुक्र : अपने जीवनसाथी को कष्ट देने, किसी भी प्रकार के गंदे वस्त्र पहनने, घर में गंदे एवं फटे पुराने वस्त्र रखने से शुभ-अशुभ फल देता है।

मंगल : भाई से झगड़ा करने, भाई के साथ धोखा करने से मंगल के अशुभ फल शुरू हो जाते हैं। इसी के साथ अपनी पत्नी के भाई (साले) का अपमान करने पर भी मंगल अशुभ फल देता है।

शनि : ताऊ एवं चाचा से झगड़ा करने एवं किसी भी मेहनतम करने वाले व्यक्ति को कष्ट देने, अपशब्द कहने एवं इसी के साथ शराब, माँस खाने पीने से शनि देव अशुभ फल देते हैं। कुछ लोग मकान एवं दुकान किराये से लेने के बाद खाली नहीं करते अथवा उसके बदले पैसा माँगते हैं तो शनि अशुभ फल देने लगता है।

राहु : राहु सर्प का ही रूप है अत: सपेरे का दिल ‍दुखाने से, बड़े भाई को कष्ट देने से अथवा बड़े भाई का अपमान करने से, ननिहाल पक्ष वालों का अपमान करने से राहु अशुभ फल देता है।

केतु : भतीजे एवं भांजे का दिल दुखाने एवं उनका हक ‍छीनने पर केतु अशुभ फल देना है। कुत्ते को मारने एवं किसी के द्वारा मरवाने पर, किसी भी मंदिर को तोड़ने अथवा ध्वजा नष्ट करने पर इसी के साथ ज्यादा कंजूसी करने पर केतु अशुभ फल देता है। किसी से धोखा करने व झूठी गवाही देने पर भी राहु-केतु अशुभ फल देते हैं।

अत: मनुष्य को अपना जीवन व्यवस्‍िथत जीना चाहिए। किसी को कष्ट या छल-कपट द्वारा अपनी रोजी नहीं चलानी चाहिए। किसी भी प्राणी को अपने अधीन नहीं समझना चाहिए जिससे ग्रहों के अशुभ कष्ट सहना पड़े।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>पूर्वमुखी मकान के परिणाम—-

>पूर्वमुखी मकान के परिणाम—-

पूर्वमुखी मकान में अच्छे-बुरे फल भी मिलते हैं। किसी भी क्षेत्र में, किसी भी दिशा में बना मकान शुभ या अशुभ परिणाम देता है। मकान किस प्रकार बना है, इस बात पर अधिक निर्भर करता है। घर के सामने ‘टी’ नुमा रास्ता हो तो पूर्व मुखी मकान भी अशुभ परिणाम देगा, जबकि दक्षिण मुखी मकान सुव्यवस्थित बना हो तो उसके परिणाम भी अच्छे मिलते हैं।

पूर्व मुखी मकान के स्वामी पृथ्वी पर मानस का निर्माण करने वाले ब्रह्मा जी हैं, फिर भी इस दिशा में बना मकान अच्छे या बुरे परिणाम देता है। पूर्व मुखी मकान हो और ईशान में रास्ता हो तो उसके शुभ परिणाम नष्ट हो जाएँगे, क्योंकि हम जूते-चप्पल पहनकर आएँगे या वहीं रखेंगे।

मकान पूर्व मुखी हो व ईशान भी ठीक हो, लेकिन घर के अंदर का हिस्सा लंबाई, चौड़ाई, ऊँचाई में बराबर हो तो धनात्मक ऊर्जा नहीं मिलेगी। ऋणात्मक ऊर्जा मिलने से उस घर में रहने वाले मानसिक तनाव से ग्रस्त रहेंगे। यदि मकान कुछ तिरछा या पतंगनुमा हो तब भी शुभ फल नहीं मिलेंगे व अशुभ परिणाम भुगतने पड़ेंगे। यदि ईशान में शौचालय होगा तो आर्थिक कष्ट झेलने पड़ेंगे। मकान की पूर्वी दिशा की दीवार और चबूतरे ऊँचे हों तो घर का स्वामी धन से रहित हो जाएगा। संतान अस्वस्थ, मंदबुद्धि होगी।
पूर्वमुखी मकान में अच्छे-बुरे फल भी मिलते हैं। किसी भी क्षेत्र में, किसी भी दिशा में बना मकान शुभ या अशुभ परिणाम देता है। मकान किस प्रकार बना है, इस बात पर अधिक निर्भर करता है। घर के सामने ‘टी’ नुमा रास्ता हो तो पूर्व मुखी मकान भी अशुभ परिणाम देगा।

पूर्व दिशा में खाली जगह छोड़े बिना मकान चार दीवारी से सटाकर बना हो तो पुरुष संतान में कमी होती है व संतान विकलांग भी हो सकती है। पूर्व में खाली जगह नहीं छोड़ी हो और पश्चिम में ढलान हो तो वहाँ रहने वालों को आँखों की बीमारी और लकवा हो सकता है। पूर्वी हिस्से में मिट्टी के ढेर, ऊँची चट्टान, टीले, कु्रडा और किसी भी प्रकार की गंदगी हो तो धन व संतान की हानि का सामना करना पड़ता है।

दक्षिण पूर्व दिशा में मुख्य द्वार नहीं होना चाहिए, नहीं तो ग्रह स्वामी धन से रहित कोर्ट-कचहरी के चक्कर में रहने वाला, कर्जदार बन जाता है। मकान के पूर्वी हिस्से में खाली जगह हो तो वंशवृद्धि के साथ-साथ संतान भी लाभ देती है और मकान के पूरे निर्माण कार्य में पूर्वी हिस्सा थोड़ा नीचा रखा गया हो तो वहाँ के रहने वाले धन-संपदा के साथ स्वस्थ भी रहते हैं।

मकान का मुख्य द्वार व अन्य द्वार भी पूर्वाभिमुखी हों तो शुभ परिणाम मिलते हैं। पूर्व दिशा नीची हो व दक्षिण ऊँची हो तो मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है। स्वास्थ्य ठीक रहेगा व शांति के साथ सौभाग्‍य की वृद्धि होती है। घर के सामने नाली हो व दक्षिण से उत्तर की ओर जाती हो या पानी की टंकी हो तो शुभ फल मिलते हैं।

>कुछ खास बातें वास्तु से जुड़ी—

‘वास्तु’ का सहज शाब्दिक अर्थ एक ऐसे आवास से है जहाँ के रहवासी सुखी, स्वस्थ एवं समृद्ध हों। इसीलिए वास्तु विज्ञान में हमारे पूर्वजों ने अपने दिव्य ज्ञान से ऐसे अनेक तथ्यों को शामिल किया है जो कि किसी भी भवन के रहवासियों को शांतिपूर्वक रहने में परम सहायक होते हैं।

इन सभी तथ्यों में ‘क्यों’ और ‘कैसे’ की कोई गुंजाइश नहीं है क्योंकि प्रयोगकर्ता को होने वाले प्रत्यक्ष लाभ ही इसके प्रमाण हैं। ऐसे ही कुछ अत्यंत सरल, प्रभावी एवं सर्वथा निरापद प्रयोगों को जनसाधारण के लाभार्थ नीचे लिखा जा रहा है :-

घर में बनने वाले भोजन में से प्रत्येक प्रकार का थोड़ा-थोड़ा पदार्थ एक अलग प्लेट में भोजन बनाने वाली महिला पहले निकालकर हाथ जोड़कर वास्तुदेव को समर्पित करे और फिर घर के अन्य सदस्यों को भोजन कराए (फिर चाहे कोई भी सदस्य कभी भी भोजन क्यों न करे)। ऐसा करने से वास्तु देवता उस घर पर सदैव प्रसन्न रहते हैं। बाद में प्लेट में निकाला गया पदार्थ गाय को खिला दें।
‘वास्तु’ का सहज शाब्दिक अर्थ ऐसे आवास से है जहाँ के रहवासी सुखी, स्वस्थ एवं समृद्ध हों। वास्तु विज्ञान में हमारे पूर्वजों ने अपने दिव्य ज्ञान से अनेक तथ्यों को शामिल किया है जो कि किसी भी भवन के रहवासियों को शांतिपूर्वक रहने में परम सहायक होते हैं।

घर में टूटी-फूटी मशीनों को न रखें। जितनी जल्दी हो सके कोई भी टूटी हुई अथवा विकृत मशीन को चाहे वह छोटी हो अथवा बड़ी, घर से बाहर कर देना चाहिए। इनके घर में रहने से मानसिक तनाव तथा शारीरिक व्याधियाँ उस घर के रहवासियों को घेरती हैं।

जिस घर में एक पाए का पटिया (पाटा) रहता है वहाँ आर्थिक हानि एवं मानसिक तनाव दृष्टिगोचर होते हैं। अतः घर में ऐसा एक पाए का पाटा न रखें।

घर में कहीं भी झाड़ू को खड़ी करके नहीं रखना चाहिए। इसी प्रकार उसे न तो ऐसी जगह रखनी चाहिए जहाँ उसे पैर लगें या उसे लांघा जाता हो। ऐसा होने पर घर में बरकत नहीं होती है। धनागम के स्रोतों में कमी आती है।

घर के पूजाघर में तीन गणेश की पूजा नहीं होनी चाहिए (तीन होने पर वहाँ एक और रख दें या फिर उसमें से एक को विसर्जित कर दें) अन्यथा उस घर में अशांति का साम्राज्य बना रहता है। इसी प्रकार 3 माताओं तथा 2 शंखों का एक साथ पूजन भी वर्जित है।

घर के ईशान्य क्षेत्र में (उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में) कोई भी पालतू जानवर न बाँधें। कुत्ते, मुर्गे एवं भैंसों के संबंध में तो और भी सावधान रहें, अन्यथा घर में परेशानियों का अंबार लगा रहेगा।

प्रत्येक घर में तुलसी का पौधा, सीता अशोक, आँवला, हरश्रृंगार, अमलतास, निर्गुण्डी इत्यादि में से कम से कम 2 पौधे अवश्य होने चाहिए। ये अमन एवं समृद्धिवर्द्धक हैं। कैक्टस का घर में होना अशांति देता है।

घर में नित्य ईश्वर का भजन-पूजन अवश्य होना चाहिए। पूजन करने वाले सदैव पूर्वाविमुख अथवा उत्तराविमुख होकर पूजन करें। घर में घी का दीपक अवश्य जलाएँ।

घर के प्रत्येक कमरे में एक बार प्रकाश जरूर फैलाना चाहिए अर्थात घर के प्रत्येक कमरे को दिन में भले ही कुछ क्षणों के लिए ही, किन्तु प्रकाशित अवश्य ही करना चाहिए।

प्रत्येक घर में नित्य सुबह-सबेरे और संध्या के समय एक छोटा-सा गाय के गोबर से निर्मित कण्डा जलाकर उस पर मात्र 1 चुटकी भर चावल में घी मिलाकर डालना चाहिए। इस प्रयोग के नित्य करने से घर में आधि-व्याधियों का नाश होता है, घर की उन्नति होती है।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>वास्तु सम्मत अध्ययन कक्ष —-

>वास्तु सम्मत अध्ययन कक्ष —–

* अध्ययन कक्ष भवन के पश्चिम-मध्य क्षेत्र में बनाना अतिलाभप्रद है। इस दिशा में बुध, गुरु, चंद्र एवं शुक्र चार ग्रहों से उत्तम प्रभाव प्राप्त होता है। इस दिशा के कक्ष में अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को बुध ग्रह से बुद्धि वृद्धि, गुरु ग्रह में महत्वाकांक्षा एवं जिज्ञासु वृद्धि, चंद्र ग्रह से नवीन विचारों की वृद्धि और शुक्र ग्रह से प्रतिभा वक्तृत्व एवं लेखन कला में निपुणता और धन वृद्धि होती है।

* अध्ययन कक्ष में विद्यार्थी की टेबल पूर्व-उत्तर ईशान या पश्चिम में रहना चाहिए। दक्षिण आग्नेय व नैऋत्य या उत्तर- वायव्य में नहीं होना चाहिए।

* अध्ययन कक्ष में खिड़की या रोशनदान पूर्व-उत्तर या पश्चिम में होना श्रेष्ठ या दक्षिण में संभवतया नहीं रखें।

* अध्ययन कक्ष में शौचालय कदापि नहीं बनाएँ।

* अध्ययन कक्ष की रंग संयोजना सफेद, बादामी, फीका, आसमानी या हल्का फिरोजी रंग दीवारों पर और टेबल-फर्नीचर पर श्रेष्ठ है। काला, लाल, गहरा नीला रंग कमरे में नहीं होना चाहिए।
अध्ययन कक्ष भवन के पश्चिम-मध्य क्षेत्र में बनाना अतिलाभप्रद है। इस दिशा में बुध, गुरु, चंद्र एवं शुक्र ग्रहों से उत्तम प्रभाव प्राप्त होता है। इस दिशा के कक्ष में अध्ययन करनेवाले विद्यार्थियों को बुध से बुद्धि, गुरु से महत्वाकांक्षा की वृद्धि होती है

* अध्ययन कक्ष का प्रवेश द्वार पूर्व उत्तर- मध्य या पश्चिम में रहना चाहिए। दक्षिण आग्नेय व नैऋत्य या उत्तर- वायव्य में नहीं होना चाहिए।

* अध्ययन कक्ष में अभ्यास पुस्तकें रखने की रेक एवं टेबल उत्तर दिशा की दीवार से लगी होना चाहिए।

* अध्ययन कक्ष में पेयजल, मंदिर, घड़ी उत्तर या पूर्व दिशा में रखना चाहिए।

* अध्ययन कक्ष में टीवी, मैगजीन, अश्लील साहित्य व सीडी प्लेयर एवं वीडियो गेम, रद्दी अखबार, अनुपयोगी सामान एवं भारी वस्तुएँ न रखें।

* अध्ययन कक्ष में आदर्शवादी चित्र, सरस्वती माता एवं गुरुजनों के चित्र लगाना चाहिए।

* युद्ध, लड़ाई-झगड़े, हिंसक पशु-पक्षियों के चित्र व मूर्तियाँ नहीं रखना चाहिए।

* अध्ययन कक्ष में शयन नहीं करें।

* अध्ययन कक्ष को अन्य कक्षों के जमीनी तल से ऊँचा या नीचा नहीं रखें। तल का ढाल पूर्व या उत्तर की ओर रखा जाए।

* अध्ययन कक्ष में केवल ध्यान, अध्यात्म वाचन, चर्चा एवं अध्ययन ही करना चाहिए। गपशप भोग-विलास की चर्चा एवं अश्लील हरकतें नहीं करना चाहिए।

* अध्ययन कक्ष में जूते-चप्पल, मोजे पहनकर प्रवेश नहीं करना चाहिए।

अध्ययन टेबल की संयोजना—

* टेबल हमेशा आयताकार होना चाहिए, गोलाकार या अंडाकार नहीं होना चाहिए।
* टेबल के टॉप का रंग सफेद, दूधिया या क्रीम श्रेष्ठ है या अन्य रंग फीके हल्के कलर हों तो श्रेष्ठ है। प्लेन ग्लास भी रख सकते हैं।
* टेबल पर अध्ययन करते समय विषय से संबंधित पुस्तकें व आवश्यक इंस्ट्रूमेंट ही रखें।
* बंद घड़ी, टूटे-फूटे व बंद पेन, धारदार चाकू, हथियार व औजार कदापि नहीं रखें।
* कम्प्यूटर टेबल पूर्व मध्य या उत्तर मध्य में रखें। ईशान में नहीं रखें।
* अध्ययन टेबल व कुर्सी के ऊपर सीढ़ियाँ, बीम, कॉलम व डक्ट, टांड नहीं हों।
* स्वीच बोर्ड आग्नेय या वावव्य में रखें। ईशान पर नहीं हों।
* अध्ययन कक्ष के मंदिर में सुबह-शाम कपूर या शुद्ध घी का दीपक व हल्की खुशबू की अगरबत्ती अवश्य लगाएँ।
* भवन का ईशान कोण घटा-कटा व बढ़ा हुआ नहीं हो एवं सीढ़ियाँ शौचालय एवं रसोई नहीं हो व मास्टर शयन कक्ष नहीं हो, साथ ही अनुपयोगी सामान, स्टोर, सेप्टिक टैंक व वृक्ष नहीं हों।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>घर सजाएँ राशि अनुसार… …

>घर सजाएँ राशि अनुसार…

मेष : राशि के लोगों के लिए लाल, गुलाबी और ऑरेंज रंग का प्रयोग अच्छा होता है। इसमें वे उसी रंग के बेड कवर, चादर, कपड़े, गहने, पर्दे आदि का इस्तेमाल कर सकते हैं, परंतु अपने कमरे के दक्षिणी-पश्चिमी कोने का ध्यान अवश्य रखें।

वृषभ : राशि के व्यक्ति दीवारों के लिए चमकीले और भड़कीले कोई भी रंग का प्रयोग कर सकते हैं या फिर वैसे ही रंग के सोफा कवर या पिलो कवर लगा सकते हैं। उनके लिए दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य दिशा) में भारी वजन के फर्नीचर रखना अच्छा होता है। इससे उनके घर में शांति और सुरक्षा बनी रहती है।

मिथुन : राशि के लोग कमरों में हल्का हरा, हल्का नीला और लाल रंग का प्रयोग कर सकते हैं। इसमें वे उन रंगों को प्रधानता देकर ही पहनावा पहनें। उनके लिए उत्तर-पश्चिम (वायव्य) दिशा में हल्का सामान या फर्नीचर रखना अच्छा होता है।

कर्क : राशि के जातकों के लिए सफेद, दूधिया और रूपहला रंग ज्यादा अच्छा होता है, क्योंकि ये चन्द्रमा के जैसे सफेद होते हैं। लेकिन इनका तत्व जल होने की वजह से कमरे के उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशा के कोने में पानी का घड़ा या बहता हुआ पानी का चित्र अवश्य होना चाहिए ताकि घर में अचानक कोई पानी की दुर्घटना न हो।

सिंह : राशि के व्यक्ति के लिए सफेद, चमकता रूपहला और सुनहरा पीला रंग ज्यादा उपयुक्त रहता है। इस रंग के वस्त्र या सजावट की वस्तुएँ वे घर में रख सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिए घर का कोना महत्वपूर्ण होता है। दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) दिशा की ओर ही किचन का काम करें जिससे कि उस राशि के व्यक्ति की आग से किसी भी प्रकार की दुर्घटना न हो।

कन्या : हल्का हरा, हल्का नीला और लाल रंग इनके लिए शुभ होता है। ये या तो इस प्रकार के वस्त्र पहनें या फिर घर की सजावट में इन्हीं रंगों का अधिक प्रयोग करें। ऐसे व्यक्ति के कमरे के दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) कोने पर वजनदार फर्नीचर या सामान रख सकते हैं, जो उनके घर में खुशहाली लाते हैं।

तुला : कोई भी चमकदार रंग, जिसमें कंट्रास्ट मैच हो, इनके लिए अच्छा होता है। ऐसे व्यक्ति इस प्रकार के पर्दे, सोफा कवर या पिलो कवर का इस्तेमाल कर सकते हैं। इनके लिए उत्तर-पश्चिम (वायव्य) कोना शुभ है, वहाँ वे हल्के वजन के सामान या सजावट की वस्तुएँ रख सकते हैं ताकि इनके जीवन में किसी प्रकार की चिंता का कोई समावेश न हो।

वृश्चिक : लाल, गुलाबी और ऑरेंज इसके शुभ रंग हैं। इस राशि के व्यक्ति को अधिक से अधिक इन्हीं रंगों के कपड़े, गहने आदि का प्रयोग करना चाहिए। महिलाएँ इन रंगों की बिंदी भी लगा सकती हैं। उत्तर-पश्चिम (ईशान) दिशा में ये जातक पानी की व्यवस्था अवश्य रखें। चाहें तो चाँदी के घड़े में पानी भरकर मोती की माला से सजा सकते हैं। इससे संतान की शिक्षा, कामयाबी और समृद्धि में मदद मिलती है।

धनु : राशि के व्यक्ति के लिए पीला रंग शुभ होता है। अग्नि या अन्य ज्वलनशील पदार्थ को ये हमेशा दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) दिशा की ओर रखें। इसमें वे रोज मिट्टी का दीया (दीपक) भी जला सकते हैं।

मकर : राशि के व्यक्ति गहरा नीला, गहरा हरा, काला और भूरे रंग का प्रयोग कर सकते हैं। इन रंगों के चादर, सोफा-कवर, पर्दे आदि सभी के प्रयोग से अच्छे परिणाम मिलते हैं। ऐसे व्यक्ति भारी फर्नीचर या सामान को दक्षिण कोने की ओर रखें।

कुंभ : गहरा नीला, गहरा हरा, काला और भूरा रंग इनके लिए शुभ है। ऐसे व्यक्ति कमरे की दीवारों व सजावट की वस्तुओं के लिए इन रंगों का प्रयोग कर सकते हैं। इससे उन्हें सफलता मिलेगी। घर के हल्के सामान या वस्तुएँ हमेशा उत्तर-पश्चिम (वायव्य) दिशा की ओर रखें।

मीन : इनका शुभ रंग पीला होता है, इसलिए इन्हें अधिक से अधिक पीले रंग का इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति के कमरे के उत्तर-पूर्व (ईशान) कोने पानी का भंडारण रखना चाहिए या फिर बहते हुए पानी का चित्र टाँग सकते हैं, जो समृद्धि के बहने का द्योतक है।

>क्यों होता है संतान प्राप्ति में विलंब– -

संतति सुख के लिए पंचम स्थान, पंचमेश, पंचम स्थान पर शुभाशुभ प्रभाव व बृहस्पति का विचार मुख्‍यत: किया जाता है। ज्योतिष के अनुसार मेष, मिथुन, सिंह, कन्या ये राशियाँ अल्प प्रसव राशियाँ हैं। वृषभ, कर्क, वृश्चिक, धनु, मीन ये बहुप्रसव राशियाँ हैं।

* पंचम स्थान में पाप ग्रह हो तो संतति सुख में बाधा आती है।

* पंचमेश यदि 6, 8,12 में हो या 6, 8,12 के स्वामी पंचम में हो तो संतान सुख बाधित होता है।

* पंचमेश अशुभ नक्षत्र में हो तो संतान प्राप्ति में विलंब होता है।

* पंचम का राहु पहली संतान के लिए अशुभ होता है।

* लग्न पर पाप प्रभाव हो तो संतति विलंब से होती है।

* लग्न, षष्ठ, सप्तम या अष्टम का मंगल संतान प्राप्ति में विलंब कराता है। (स्त्री-पुरुष दोनों की कुंडली में)

* स्त्री की कुंडली में लग्न पंचम, सप्तम, भाग्य या लाभ में शनि हो तो संतान देर से होती है।

* सूर्य-शनि युति संतान प्राप्ति में विलंब और संतान से मतभेद दिखाती है।

* प्रथम या सप्तम का मंगल (स्त्री के लिए) कष्ट से संतान प्राप्ति का सूचक है।

* पंचम स्थान पर पापग्रहों की दृष्टि संतान प्राप्ति में विलंब कराती है।

* पत्रिका (कुंडली) में गुरु राहु यु‍ति हो व पंचम स्थान पाप प्रभाव में हो तो दत्तक संतान का योग बनता है।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

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>रोकें बच्चे की दुष्ट प्रवृत्तियों को—

बच्चे बड़े होकर कुसंग में फँसें, अपराधी बनें उसके पहले ही इसकी रोकथाम जरूरी है। कुंडली के ग्रह स्पष्ट संकेत देते हैं बच्चे के स्वभाव व उसमें छिपी दुष्ट प्रवृत्तियों का। आइए पहचानें व समय पर उपाय करें।

मंगल : यदि मंगल नीच का है, पाप प्रभाव में है, बृहस्पति भी कमजोर है तो बच्चा उत्पाती, क्रोधी होगा, तोड़फोड़ करेगा, चोरी की भी आदत हो सकती है (विशेषत: जब मंगल लग्न या द्वितीय भाव को प्रभावित करें)। ऐसे बच्चों की सतत काउंसलिंग करें, अच्छे संस्कार दें, मंगल का दान करें।

राहु : राहु का लग्न पर प्रभाव झूठ बोलने व येनकेन प्रकारेण अपना स्वार्थ सिद्ध करने की आदत बताता है। चंद्र-बृहस्पति कमजोर होने पर यह राहु गलत संगत, अपराधों में फँसा सकता है। ऐसे बच्चों को अकेलेपन से बचाएँ। सामाजिक होना, चीजें बाँटना व खुलकर हँसना सिखाएँ। खर्च पर नियंत्रण करें। सरस्वती की आराधना कराएँ।

शनि : शनि का प्रभाव हीन मानसिकता, गालीगलौज, लड़ाई-झगड़ा, नशे को दिखाता है। मंगल के प्रभाव में आया शनि (लग्न में) अपराधी, परपीड़क बना देता है। पुलिस केस भी हो सकते हैं। नियम तोड़ने व रिस्क लेने में रुचि होती है। ऐसे बच्चों को हनुमानजी व शिव की आराधना कराएँ। इन पर नजर रखें। मित्रों का चयन सावधानी से करें। अति विश्वास न करें।

शुक्र : शुक्र की खराब स्थिति बच्चों को शराब, सिगरेट का शौकीन बनाती है। कामुकता भी इससे आती है। ये बच्चे विपरीत लिंग में अधिक रुचि लेते हैं। इन बच्चों की परवरिश बड़ी चतुराई से करना चा‍हिए। इन्हें अच्छे गुरु के पास भेजें, अच्छी पुस्तकें पढ़ने को दें। संगीत, चित्रकला में भेजें और फालतू वक्त न बिताने दें। मित्रों पर भी नजर रखें। टीवी, कम्प्यूटर के साथ ज्यादा समय न बिताने दें।

विशेष : बच्चों में सुसंस्कार डालने के लिए घर के माहौल का संस्कारित होना जरूरी है। अच्छे घर में सभी ग्रहों को बल मिलता है, अत: घर में नियमित पूजा-अर्चना, संवाद, हँसी-मजाक आदि नियमित करें। कलह-क्लेश से बचें।
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राहु-केतु कब होते हैं अशुभ—

राहु-केतु को छाया ग्रह माना जाता है। इसकी कल्पना सर्प से की गई है। राहु उसका धड़ और केतु पूँछ माना जाता है। राहु केतु का अपना प्रभाव नहीं होता। ये जिस राशि में/भाव में होते हैं और जिस ग्रह के साथ बैठते हैं, उसी के अनुरूप फल को घटाते या बढ़ाते हैं।

राहु : राहु की उच्च राशि मिथुन है अत: इस राशि में होने पर यह बुरा फल नहीं देता। इसे शनि के समान माना जाता है अत: शनि की राशि (मकर, कुंभ) में होने पर भी बुरा फल नहीं देता।

राहु क्रमश: तीसरे, छठे व दसवें भाव का कारक है अत: यहाँ यह शुभ फल ही देता है। विशेषकर दसवें भाव पर इसका प्रभाव राजयोग बनाता है और राजनीति में सफलता देता है।

केतु : केतु की उच्च र‍ाशि धनु है अत: इस राशि में होने पर यह शुभ फल ही देता है। इसे मंगल के समान माना जाता है अत: मंगल की राशि (मेष, वृश्चिक) में होने पर बुरा फल नहीं देता।

केतु क्रमश: दूसरे व आठवें भाव को कारक है। व्यय में भी यह मोक्षकारक होता है अत: यहाँ यह शुभ फल ही देता है। अन्य भावों में राहु केतु अशुभ फल देते हैं।

गोचर में भ्रमण : गोचरवश जब राहुल केतु 3, 6, 10, 11 में होते हैं तो शुभ फल देते हैं। अन्य स्थानों से इनका भ्रमण कष्टकारी होता है तथा भाव के फलों की हानि करता है अत: उस समय उचित उपायों का सहारा लेना चाहिए।
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कई बार देखा जाता है कि कुछ लोग ज्ञानी होते हैं, जानकार होते हैं मगर उस ज्ञान को लोगों तक पहुँचा नहीं पाते।

कुछ लोग दूसरों के सामने बातचीत करने में भी हड़बड़ा जाते हैं और सामने वाले पर प्रभाव नहीं डाल पाते। प्राय: इंटरव्यू देते समय ऐसी स्थिति बनती है तो बनती बात बिगड़ सकती है। ऐसा यदि आपके साथ भी बार-बार होता है तो अपनी कुंडली पर नजर डालें।

1. सूर्य : सूर्य ग्रह आत्मविश्वास का प्रबल कारक है। मूलांक 1 वाले व्यक्ति प्रबल आत्मविश्वासी होते हैं। पत्रिका में सूर्य की स्थिति देखें। यदि सूर्य कारक होकर शत्रु क्षेत्री है, राहु-केतु के प्रभाव में है तो उसे मजबूत करना जरूरी है।

उपाय :
* पिता की सेवा करें।
* रविवार का व्रत करें। बिना नमक का भोजन लें।
* रोज प्रात: सूर्य के सामने खड़े होकर गायत्री मंत्र का या ‘ॐ घृणि सूर्याय नम:’ का 21 बार जाप करें। सूर्य यंत्र अपने पास रखने से भी लाभ होता है।

2. मंगल : मंगल ऊर्जा व साहस का स्रोत है। यदि कुंडली में मंगल कारक होकर शत्रु क्षेत्री हो, निर्बल या नीच हो तो ऊर्जा में कमी होगी।
* मंगलवार का व्रत करें।
* लाल मसूर का दान करें।
* रक्त दान करें।
* हनुमान चालीसा या सुंदरकांड पढ़ें।
* बंदरों को गुड़-चने खिलाएँ।

3. बुध : बुध सहज बुद्धि व वाकपटुता देता है जो बोलने में निपुण बनाता है। यदि पत्रिका में यह कारक होकर अशुभ हो तो निम्न उपाय करें।
उपाय : गाय को हरा चारा खिलाएँ।
* हरी सब्जियाँ, सलाद, खट्‍टे फल खाएँ।
* गणपति की आराधना करें।
* हरी वस्तुओं का दान करें।

4. गुरु : गुरु बुद्धि व ज्ञान का कारक है। ज्ञान से आत्मविश्वास बढ़ता है। यदि यह अशुभ स्थानों में हो तो निम्न उपाय करें।
* गुरु के साथ रहें, उनका आदर करें।
* पीला रूमाल अपने पास रखें।
* चने की दाल और गुड़ गाय को खिलाएँ।
* निर्धन विद्यार्थी को शिक्षा सामग्री दान दें।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>भवन-निर्माण का सही समय—

>भवन-निर्माण का सही समय—-

अपना स्वयं का मकान हो, यह हर व्यक्ति की चाह होती है। वास्तु शास्त्र में भवन निर्माण के संबंध में अनेक बातें बताई गई हैं। कहा गया है कि जब शनिवार, स्वाति नक्षत्र, श्रावण मास, शुभ योग, सिंह लग्न, शुक्ल पक्ष एवं सप्तमी तिथि का योग एकसाथ हो तो उस मुहूर्त में कार्य आरंभ करना सर्वोत्तम है। लेकिन ये सातों योग कभी-कभी ही घटित होते हैं। किस माह में निर्माण आरंभ करने से क्या फल प्राप्त होता है, आइए देखते हैं-

माह फल
चैत्र (मार्च-अप्रैल)- तनाव, रोग, पराजय, अवनति।
वैशाख (अप्रैल-मई)- आर्थिक लाभ, शुभ।
ज्येष्ठ (मई-जून)- दारुण कष्ट।
आषाढ़ (जून-जुलाई)- घोर विपत्ति।
श्रावण (जुलाई-अगस्त)- परिजनों के लिए शुभ व वृद्धि।
भाद्रपद (अगस्त-सितंबर)- सामान्य, कोई अर्थ लाभ नहीं।
आश्विन (सितंबर-अक्टूबर)- पारिवारिक कलह, संबंध विच्छेद।
कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) – समस्याजनक।
मार्गशीर्ष (नवंबर-दिसंबर) – उन्नति, संपन्नता और सुख।
पौष (दिसंबर-जनवरी)- संपन्नता लेकिन चोरी का भय।
माघ (जनवरी-फरवरी) – अनेक लाभ, लेकिन अग्नि भय।
फाल्गुन (फरवरी-मार्च)- सर्वोत्तम, सदैव लाभ।

मास सुनिश्चित कर लेने के बाद राशिस्थ सूर्य भी देखना चाहिए। यथा—-
* मेष- शुभ एवं लाभकारी।
* वृषभ- अति आर्थिक लाभ।
* मिथुन- अनहोनी संभव।
* कर्क- शुभ (प्रभाव) परिणाम।
* सिंह- कार्य निर्विघ्न पूर्ण।
* कन्या- स्वास्थ्य की चिंता।
* तुला- शांति एवं निरंतर कार्य।
* वृश्चिक- संपत्ति में वृद्धि।
* धनु- हानि संभव।
* मकर- आर्थिक लाभ।
* कुंभ- मूल्यवान आभूषण संग्रह।
* मीन- स्वास्थ्य चिंता।

तिथि- भवन निर्माण में तिथि का भी महत्व है। कोई भी कार्य प्रतिपदा, चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी एवं अमावस्या को कभी प्रारंभ नहीं करना चाहिए।
लग्न- वृषभ, मिथुन, वृश्चिक और कुंभ का सूर्योदय उत्तम फलदायी रहता है।
वार- सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार मान्य एवं अच्छे माने गए हैं।

>विभिन्न लग्नों के लिए राजयोग ग्रह—लग्न कुंडली की स्थिति अनुसार शुभ योग—

कुछ ग्रह लग्न कुंडली में अपनी स्थिति के अनुसार शुभ योग बनाते हैं जो व्यक्ति को धन, यश, मान, प्रतिष्ठा सारे सुख देते हैं।

विभिन्न लग्नों के लिए राजयोगकारी ग्रह निम्न हैं।

1. मेष लग्न के लिए गुरु राजयोग कारक होता है।

2. वृषभ और तुला लग्न के लिए शनि राजयोग कारक होता है।

3. कर्क लग्न और सिंह लग्न के लिए मंगल राजयोग कारक होता है।

4. मिथुन लग्न के लिए शुक्र अच्छा फल देता है।

5. वृश्चिक लग्न के लिए चंद्रमा अच्छा फल देता है।

6. धनु लग्न के लिए मंगल राजयोग कारक है।

7. मीन लग्न के लिए चंद्रमा व मंगल शुभ फल देते हैं।

8. मकर लग्न के लिए शुक्र योगकारक होता है। तो कुंभ लग्न के लिए शुक्र और बुध अच्छा फल देते हैं। कन्या लग्न के लिए शुक्र नवमेश होकर अच्छा फल देता है।

जो ग्रह एक साथ केंद्र व त्रिकोण के अधिपति होते हैं, वे राजयोगकारी होते हैं। ऐसा न होने पर पंचम व नवम के स्वामित्वों की गणना की जाती है।

यदि कुंडली में ये ग्रह अशुभ स्थानों में हो, नीच के हो, पाप प्रभाव में हो तो उनके लिए उचित उपाय करना चाहिए।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>वास्तु अपनाएँ धन बढ़ाएँ —–

>वास्तु अपनाएँ धन बढ़ाएँ —–

प्रत्येक व्यक्ति अपनी मेहनत से कमाए धन को सुरक्षित रखना तो चाहता ही है, साथ ही यह भी चाहता है कि उसमें दिन-प्रतिदिन बढ़ोतरी होती रहे। सामान्यतः हर व्यक्ति पैसे, आभूषण, मूल्यवान वस्तुएँ, कागजात वगैरह को सुरक्षित रखने के लिए तिजोरी, अलमारी, कैशबॉक्स इत्यादि का उपयोग करता है। इनमें धन सुरक्षित भी रहे और बढ़ता भी रहे। धन रखने के लिए उत्तर दिशा को सबसे शुभ माना गया है क्योंकि उत्तर दिशा का स्वामी धन का देवता कुबेर है।

* उत्तर दिशा : घर की इस दिशा में कैश व आभूषण जिस अलमारी में रखते हैं, वह अलमारी भवन की उत्तर दिशा के कमरे में दक्षिण की दीवार से लगाकर रखना चाहिए। इस प्रकार रखने से अलमारी उत्तर दिशा की ओर खुलेगी, उसमें रखे गए पैसे और आभूषण में हमेशा वृद्धि होती रहेगी।

* ईशान कोण : यहाँ पैसा, धन और आभूषण रखे जाएँ तो यह दर्शाता है कि घर का मुखिया बुद्धिमान है और यदि यह उत्तर ईशान में रखे हों तो घर की एक कन्या संतान और यदि पूर्व ईशान में रखे हों तो एक पुत्र संतान बहुत बुद्धिमान और प्रसिद्ध है।

* पूर्व दिशा : यहाँ घर की संपत्ति और तिजोरी रखना बहुत शुभ होता है और उसमें बढ़ोतरी होती रहती है।

* आग्नेय कोण : यहाँ धन रखने से धन घटता है, क्योंकि घर के मुखिया की आमदनी घर के खर्चे से कम होने के कारण कर्ज की स्थिति बनी रहती है।

* दक्षिण दिशा : इस दिशा में धन, सोना, चाँदी और आभूषण रखने से नुकसान तो नहीं होता परंतु बढ़ोत्तरी भी विशेष नहीं होती है।

* नैऋत्य कोण : यहाँ धन, महँगा सामान और आभूषण रखे जाएँ तो वह टिकते जरूर है, किंतु एक बात अवश्य रहती है कि यह धन और सामान गलत ढंग से कमाया हुआ होता है।

* पश्चिम दिशा : यहाँ धन-संपत्ति और आभूषण रखे जाएँ तो साधारण ही शुभता का लाभ मिलता है। परंतु घर का मुखिया अपने स्त्री-पुरुष मित्रों का सहयोग होने के बाद भी बड़ी कठिनाई के साथ धन कमा पाता है।

* वायव्य कोण : यहाँ धन रखा हो तो खर्च जितनी आमदनी जुटा पाना मुश्किल होता है। ऐसे व्यक्ति का बजट हमेशा गड़बड़ाया रहता है और कर्जदारों से सताया जाता है।

घर की तिजोरी के पल्ले पर बैठी हुई लक्ष्मीजी की तस्वीर जिसमें दो हाथी सूंड उठाए नजर आते हैं, लगाना बड़ा शुभ होता है। तिजोरी वाले कमरे का रंग क्रीम या आफ व्हाइट रखना चाहिए।

सीढ़ियों के नीचे तिजोरी रखना शुभ नहीं होता है। सीढ़ियों या टायलेट के सामने भी तिजोरी नहीं रखना चाहिए। तिजोरी वाले कमरे में कबाड़ या मकड़ी के जाले होने से नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है जो परिवार की खुशहाली में बाधा उत्पन्न करती है।

घर के अंदर से देखने पर घर के आगे के भाग के दाएँ हाथ की खिड़की पर स्थित कमरे में घर के जेवर, गहने, सोने-चाँदी के सामान, लक्जरी आर्टिकल्स रखे जाते हों, उस घर की मालकिन को सुख-सुविधाएँ पसंद होती हैं और उसे बहुत खुशियाँ प्राप्त होती हैं। उसका पैसा बेमतलब की वस्तुओं पर खर्च होता है और स्वास्थ्य हमेशा नरम-गरम चलता रहता है।

यदि ड्राइंग हॉल को पति-पत्नी अपने बेडरूम की तरह उपयोग में लें और उसका कोई भाग घर के पैसे और गहने रखने के काम में आ रहा हो तो ऐसे घर की महिला बुद्धिमान, सुंदर, बातचीत से प्रभावित करने वाली होती है और घर का मुखिया व्यापार में जमीन-जायदाद में बहुत अच्छा पैसा सरलता से कमाता है और लग्जरी के सब सुख-साधनों का उपभोग करता है। पति पत्नी को प्यार करता है और दोस्तों से अच्छे संबंध रखता है, पत्नी भी बहुत बुद्धिमान और संवेदनशील रहती है। यदि हॉल के अंदर इस तरह लोहे की तिजोरी में पैसा रखा जाए तो यह मानिए की यह बहुत शुभ और अच्छा होता है।

घर के खाद्यान्न रखने के कमरे में यदि घर के गहने, पैसे, आभूषण, कपड़े इत्यादि रखे जाएँ या यह सामान रखने का ही एक भाग हो तो ऐसे लोग पैसे उधार देने का काम करते हैं या ऐसे लोग लग्जरी आइटम या बड़े सौदों का काम कर पैसा कमाते हैं।

फेंगशुई के अनुसार शयनकक्ष या तिजोरी वाले कमरे के प्रवेश द्वार के सामने वाली दीवार के बाएँ कोने में संपत्ति एवं भाग्य का क्षेत्र होता है। यह कोना कभी भी कटा हुआ नहीं होना चाहिए और यहाँ पर धातु की कोई चीज रखना या लटकाना धन वृद्धि में सहायक होता है।

>क्या आप बार-बार दुर्घटनाग्रस्त होते हैं?

दुर्घटना का जिक्र आते ही जिन ग्रहों का सबसे पहले विचार करना चाहिए वे हैं शनि, राहु और मंगल यदि जन्मकुंडली में इनकी स्थिति अशुभ है (6, 8, 12 में) या ये नीच के हों या अशुभ नवांश में हों तो दुर्घटनाओं का सामना होना आम बात है।

शनि : शनि का प्रभाव प्राय: नसों व हड्‍डियों पर रहता है। शनि की खराब स्थिति में नसों में ऑक्सीजन की कमी व ‍हड्‍डियों में कैल्शियम की कमी होती जाती है अत: वाहन-मशीनरी से चोट लगना व चोट लगने पर हड्‍डियों में फ्रैक्चर होना आम बात है। यदि पैरों में बार-बार चोट लगे व हड्‍डी टूटे तो यह शनि की खराब स्थिति को दर्शाता है।

क्या करें : शनि की शांति के उपाय करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें। मद्यपान और माँसाहार से पूर्ण परहेज करें। नौकरों-कर्मचारियों से अच्छा व्यवहार करें। शनि न्याय का ग्रह है इसलिए न्याय का रास्ता अपनाएँ, परिवार से विशेषत: स्त्रियों से संबंध मधुर रखें।

राहु : राहु का प्रभाव दिमाग व आँखों पर रहता है। कमर से ऊपरी हिस्से पर ग्रह विशेष प्रभाव रखता है। राहु की प्रतिकूल स्थिति जीवन में आकस्मिकता लाती है। दुर्घटनाएँ, चोट-चपेट अचानक लगती है और इससे मनोविकार, अंधापन, लकवा आदि लगना राहु के लक्षण हैं। पानी, भूत-बाधा, टोना-टोटका आदि राहु के क्षेत्र में हैं।

क्या करें : गणेश जी व सरस्वती की आराधना करें। अवसाद से दूर रहें। सामाजिक संबंध बढ़ाएँ। रिस्क न लें। खुश रहें व बातें न छुपाएँ।

मंगल : मंगल हमारे शरीर में रक्त का प्रतिनिधि है। मंगल की अशुभ स्थिति से बार-बार सिर में चोट लगती है। खेलते-दौड़ते समय गिरना आम बात है और इस‍ स्थि‍ति में छोटी से छोटी चोट से भी रक्त स्राव होता जाता है। रक्त संबंधी बीमारियाँ, मासिक धर्म में अत्यधिक रक्त स्राव भी खराब मंगल के लक्षण हैं। अस्त्र-शस्त्रों से दुर्घटना होना, आक्रमण का शिकार होना इससे होता है।

क्या करें : मंगलवार का व्रत करें, मसूर की दाल का दान करें। उग्रता पर नियंत्रण रखें। मित्रों की संख्‍या बढ़ाएँ। मद्यपान व माँसाहार से परहेज करें। अपनी ऊर्जा को रचनात्मक दिशा दें।

कब-कब होगी परेशानी : जब-जब इन ग्रहों की महादशा, अंतर्दशा या प्रत्यंतर दशा आएगी, तब-तब संबंधित दुर्घटनाओं के योग बनते हैं। इसके अलावा गोचर में इन ग्रहों के अशुभ स्थानों पर जाने पर, स्थान बदलते समय भी ऐसे कुयोग बनते हैं अत: इस समय का ध्यान रखकर संबंधित उपाय करना नितांत आवश्यक है।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>वास्तु शास्त्र में ग‍णपति——

>वास्तु शास्त्र में ग‍णपति—-

जब भी हम कोई शुभ कार्य आरंभ करते हैं, तो कहा जाता है कि कार्य का श्री गणेश हो गया। इसी से भगवान श्री गणेश की महत्ता का अंदाजा लगाया जा सकता है। जीवन के हर क्षेत्र में गणपति विराजमान हैं। पूजा-पाठ, विधि-विधान, हर मांगलिक-वैदिक कार्यों को प्रारंभ करते समय सर्वप्रथम गणपति का ‘सुमरन’ करते हैं।

हिन्दू धर्म में भगवान श्री गणेश का अद्वितीय महत्व है। यह बुद्धि के अधिदेवता विघ्ननाशक है। ‘गणेश’ शब्द का अर्थ है- गणों का स्वामी। हमारे शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा चार अंतःकरण हैं तथा इनके पीछे जो शक्तियाँ हैं, उन्हीं को चौदह देवता कहते हैं।

देवताओं के मूल प्रेरक भगवान गणेश हैं। गणपति सब देवताओं में अग्रणी हैं। भगवान श्री गणेश के अलग-अलग नाम व अलग-अलग स्वरूप हैं, लेकिन वास्तु के हिसाब से गणपति के महत्व को रेखांकित करना आवश्यक है। वास्तु शास्त्र में गणपति की मूर्ति एक, दो, तीन, चार और पाँच सिरोंवाली पाई जाती है। इसी तरह गणपति के तीन दाँत पाए जाते हैं। सामान्यतः दो आँखें पाई जाती हैं। किन्तु तंत्र मार्ग संबंधी मूर्तियों में तीसरा नेत्र भी देखा गया है। भगवान गणेश की मूर्तियाँ दो, चार, आठ और 16 भुजाओं वाली भी पाई जाती हैं। चौदह प्रकार की महाविद्याओं के आधार पर चौदह प्रकार की गणपति प्रतिमाओं के निर्माण से वास्तु जगत में तहलका मच गया है।

यहाँ इन्हीं चौदह गणपति प्रतिमाओं के वास्तु शास्त्र के आलोक में एक नजर डालते हैं तथा उनके महत्व को दर्शाने का प्रयास कर रहे हैं——–

संतान गणपतिः—- भगवान गणपति के 1008 नामों में से संतान गणपति की प्रतिमा उस घर में स्थापित करनी चाहिए, जिनके घर में संतान नहीं हो रही हो। वे लोग संतान गणपति की विशिष्ट मंत्र पूरित प्रतिमा (यथा संतान गणपतये नमः, गर्भ दोष घने नमः, पुत्र पौत्रायाम नमः आदि मंत्र युक्त) द्वार पर लगाएँ, जिसका प्रतिफल सकारात्मक होता है।

पति-पत्नी प्रतिमा के आगे संतान गणपति स्रोत का पाठ नियमित रूप से करें, तो शीघ्र ही उनके घर में संतान प्राप्ति होगी। साथ ही परिवार अन्य व्यवधानों से मुक्ति पाएगा। मात्र इतना कर देने से अन्य दूसरे धार्मिक अनुष्ठान पर किए जाने वाले खर्च से मुक्ति पा लेंगे।

विघ्नहर्ता गणपतिः—- ‘निर्हन्याय नमः’, अविनाय नमः जैसे मंत्रों से युक्त विघ्नहर्ता भगवान गणपति की प्रतिमा उस घर में स्थापित करनी चाहिए, जिस घर में कलह, विघ्न, अशांति, क्लेश, तनाव, मानसिक संताप आदि दुर्गुण होते हैं। पति-पत्नी में मन-मुटाव, बच्चों में अशांति का दोष पाया जाता है। ऐसे घर में प्रवेश द्वार पर मूर्ति स्थापित करनी चाहिए। शीघ्र चमत्कार होगा।

विद्या प्रदायक गणपतिः— ऐसे घरों में, जहाँ बच्चे पढ़ते नहीं है अथवा वे उद्दण्ड होते हैं, पढ़ाई से कोसो दूर भागते हैं, बड़ों की इज्जत नहीं करते, गुरूजनों का आदर नहीं करते, ऐसे बच्चों में पढ़ाई के प्रति दिलचस्पी पैदा करने के लिए गृह स्वामी को विद्या प्रदायक गणपति अपने घर के प्रवेश द्वार पर स्थापित करना चाहिए। इस प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा के साथ ज्ञान रूपाय नमः, विद्या नितार्य नमः, विद्या धनाय नमः तथा ज्ञानमुद्रावते नमः जैसे मंत्रों का सम्पुट बच्चों में कौतूहल पैदा करता है। शुभ मुहूर्त्त में प्रतिमा स्थापित करने का लाभ जल्द देखने को मिलता है।

विवाह विनायकः —गणपति के इस स्वरूप का आह्नान उन घरों में विधि-विधानपूर्वक होता है, जिन घरों में बच्चों के रिश्ते जल्द तय नहीं होते अथवा वे बच्चे शादी से वंचित रहते हैं, ज्यादा उम्र होने पर भी शादी में रूकावट पैदा होती है, कभी मनोवांछित वर नहीं मिलता, आदि समस्याओं का निवारण विवाह विनायक गणपति की मंत्रयुक्त प्रतिमा द्वारा संभव है। प्रतिमा पर ‘कामनी कान्तकांश्रये नमः, सकल कामप्रदायक नमः, कामदाय नमः जैसे मंत्रों का सम्पुट लगा होता है।

धनदायक गणपतिः— आज हर व्यक्ति दौलतमंद होना चाहता है। इसलिए प्रायः सभी घरों में गणपति के इस स्वरूप वाली प्रतिमा को मंत्रों से सम्पुट करके स्थापित किया जाता है, ताकि उन घरों में दरिद्रता का लोप हो, सुख-समृद्धि व शांति का वातावरण कायम हो सके। धनदायक गणपति की प्रतिमा के साथ श्रीपतये नमः, रत्नसिंहासनाय नमः, ममिकुंडलमंडिताय नमः, महालक्ष्मी प्रियतमाय नमः, सिद्ध लक्ष्मी मनोरप्राय नमः लक्षाधीश प्रियाय नमः, कोटिधीश्वराय नमः जैसे मंत्रों का सम्पुट होता है।

चिन्तानाशक गणपतिः —जिन घरों में तनाव व चिंता बनी रहती है, ऐसे घरों में चिन्तानाशक गणपति की प्रतिमा को चिन्तामणि चर्वणलाल साथ नमः जैसे मंत्रों का सम्पुट कराकर स्थापित करना चाहिए।

सिद्धिनायक गणपतिः कार्य में सफलता व साधनों की पूर्ति के लिए सिद्धवेदाय नमः सिद्धविनायकाय नमः, रिद्धि, सिद्धिप्रदायकाय नमः जैसे मंत्रों से युक्त सिद्धिदायक गणपति को घर में लाना चाहिए।

आनंददायक गणपतिः—-परिवार में आनंद, खुशी, उत्साह व सुख के लिए आनन्दाय नमः, सुमंगलम सुमंग लाल नमः जैसे मंत्रों से युक्त आनंददायक गणपति की प्रतिमा को शुभ मुहूर्त्त में घर में स्थापित करना चाहिए।

विजय सिद्धि गणपतिः —मुकदमे में विजय, शत्रु का नाश करने, पड़ोसी को शांत करने के उद्देश्य से लोग अपने घरों में विजय स्थिराय नमः जैसे मंत्र वाले बाबा गणपति की प्रतिमा के इस स्वरूप को स्थापित करते हैं।

ऋण मोचन गणपतिः— कोई पुराना ऋण, जिसे चुकता करने की स्थिति में न हों, घर-परिवार में दरिद्रता, ऋण का तांडव हो, ऐसे व्यक्तियों को ऋण मोचन गणपति, ऋणत्रय विमोचनाय नमः जैसे मंत्र से उत्कीर्ण कराकर घर में लगाना चाहिए तथा उसकी नियमित रूप से विधि-विधानपूर्वक पूजा करनी चाहिए।

रोगनाशक गणपतिः —कोई पुराना रोग हो, जो दवा से ठीक न होता है, उन घरों में लोग रोग नाशक गणपति की आराधना प्रायः इस मंत्र से करते हैं- मृत्युंजयाय नमः।

नेतृत्व शक्ति विकासक गणपतिः— राजनीतिक परिवारों में उच्च पद प्रतिष्ठा हेतु लोग गणपति के इस स्वरूप की आराधना प्रायः इन मंत्रों से करते हैं। गणध्याक्षाय नमः, गणनायकाय नमः, प्रथम पूजिताय नमः।

सोपारी गणपतिः— आध्यात्मिक ज्ञानार्जन हेतु सोपारी गणपति की आराधना करनी चाहिए।

शत्रुहंता गणपतिः— शत्रुओं का नाश करने के लिए शत्रुहंता गणपति की आराधना करनी चाहिए। मूर्तिकार प्रतिमा बनाते समय मूर्ति को क्रोध मुद्रा में दिखाते हैं। कहते हैं कि जो व्यक्ति शत्रुहंता गणपति की प्रतिमा को घर में स्थापित करके इन मंत्रों का जाप करता है- ऊँ गं गणपतये शत्रुहंता नमः, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। शत्रु परास्त होते हैं अथवा मैदान छोड़कर भाग चुके होते हैं या युद्ध में मारे जाते हैं।

>लग्नानुसार करें इष्ट देव की उपासना—-

भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ईश्वरीय शक्ति की उपासना अलग-अलग रूपों में की जाती है। हिन्दू धर्म में तैंतीस करोड़ देवताओं को उपास्य देव माना गया है व विभिन्न शक्तियों के रूप में उनकी पूजा की जाती है।

आजकल परेशानियों, कठिनाइयों के चलते हम ग्रह शांति के उपायों के रूप में कई देवी-देवताओं की आराधना, मंत्र जाप एक साथ करते जाते हैं। परिणाम यह होता है‍ कि किसी भी देवता को प्रसन्न नहीं कर पाते- जैसा कि कहा गया है –

‘एकै साधै सब सधै, सब साधै सब जाय’

जन्मकुंडली के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के इष्ट देवी या देवता निश्चित होते हैं। यदि उन्हें जान लिया जाए तो कितने भी प्रतिकूल ग्रह हो, आसानी से उनके दुष्प्रभावों से रक्षा की जा सकती है। इष्ट देवता का निर्धारण कुंडली में लग्न अर्थात प्रथम भाव को देखकर किया जाता है। जैसे यदि प्रथम भाव में मेष राशि हो तो (1 अंक) तो लग्न मेष माना जाएगा।

लग्नानुसार इष्ट देव——

लग्न स्वामी ग्रह इष्ट देव
मेष, वृश्चिक मंगल हनुमान जी, राम जी
वृषभ, तुला शुक्र दुर्गा जी
मिथुन, कन्या बुध गणेश जी, विष्णु
कर्क चंद्र शिव जी
सिंह सूर्य गायत्री, हनुमान जी
धनु/ मीन गुरु विष्णु जी (सभी रूप), लक्ष्मी जी
मकर, कुंभ शनि हनुमान जी, शिव जी

लग्न के अतिरिक्त पंचम व नवम भाव के स्वामी ग्रहों के अनुसार देवी-देवताओं का ध्यान पूजन भी सुख-सौहार्द्र बढ़ाने वाला होता है। इष्ट देव की पूजा करने के साथ रोज एक या दो माला मंत्र जाप करना चमत्कारिक फल दे सकता है और आपकी संकटों से रक्षा कर सकता है।

देव मंत्र —-
हनुमान—- ऊँ हं हनुमंताय नम:
शिव—- ऊँ रुद्राय नम:
गणेश —ऊँ गंगणपतयै नम:
दुर्गा— ऊँ दुं दुर्गाय नम:
राम —-ऊँ रां रामाय नम:
विष्णु— विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ
लक्ष्मी— लक्ष्मी चालीसा,…ऊँ श्रीं श्रीयै नम:

विशेष : इष्ट का ध्यान-जप का समय निश्चित होना चाहिए अर्थात यदि आप सुबह सात बजे जप ध्यान करते हैं, तो रोज उसी समय ध्यान करें। अपनी सुविधानुसार समय न बदलें।

>सुखी जीवन के लिए वास्तु-अनमोल मंत्र —

- उत्तर दिशा जल तत्व की प्रतीक है। इसके स्वामी कुबेर हैं। यह दिशा स्त्रियों के लिए अशुभ तथा अनिष्टकारी होती है। इस दिशा में घर की स्त्रियों के लिए रहने की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए।
- उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र अर्थात्‌ ईशान कोण जल का प्रतीक है। इसके अधिपति यम देवता हैं। भवन का यह भाग ब्राह्मणों, बालकों तथा अतिथियों के लिए शुभ होता है।
- पूर्वी दिशा अग्नि तत्व का प्रतीक है। इसके अधिपति इंद्रदेव हैं। यह दिशा पुरुषों के शयन तथा अध्ययन आदि के लिए श्रेष्ठ है।
- दक्षिणी-पूर्वी दिशा यानी आग्नेय कोण अग्नि तत्व की प्रतीक है। इसका अधिपति अग्नि देव को माना गया है। यह दिशा रसोईघर, व्यायामशाला या ईंधन के संग्रह करने के स्थान के लिए अत्यंत शुभ होती है।
- दक्षिणी दिशा पृथ्वी का प्रतीक है। इसके अधिपति यमदेव हैं। यह दिशा स्त्रियों के लिए अत्यंत अशुभ तथा अनिष्टकारी होती है।
- दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र यानी नैऋत्य कोण पृथ्वी तत्व का प्रतीक है। यह क्षेत्र अनंत देव या मेरूत देव के अधीन होता है। यहाँ शस्त्रागार तथा गोपनीय वस्तुओं के संग्रह के लिए व्यवस्था करनी चाहिए।
- पश्चिमी दिशा वायु तत्व की प्रतीक है। इसके अधिपति देव वरुण हैं। यह दिशा पुरुषों के लिए बहुत ही अशुभ तथा अनिष्टकारी होती है। इस दिशा में पुरुषों को वास नहीं करना चाहिए।
- उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र यानी वायव्य कोण वायु तत्व प्रधान है। इसके अधिपति वायुदेव हैं। यह सर्वेंट हाउस के लिए तथा स्थायी तौर पर निवास करने वालों के लिए उपयुक्त स्थान है।
- आग्नेय, दक्षिणी-पूर्वी कोण में नालियों की व्यवस्था करने से भू-स्वामी को अनेक कष्टों को झेलना पड़ता है। गृहस्वामी की धन-सम्पत्ति का नाश होता है तथा उसे मृत्युभय बना रहता है।

नै कोण में जल-प्रवाह की नालियां भू-स्वामी पर अशुभ प्रभाव डालती हैं। इस कोण में जल-प्रवाह, नालियों का निर्माण करने से भू-स्वामी पर अनेक विपत्तियाँ आती हैं।
- दक्षिण दिशा में निकास नालियाँ भूस्वामी के लिए अशुभ तथा अनिष्टकारी होती हैं। गृहस्वामी को निर्धनता, राजभय तथा रोगों आदि समस्याओं से जूझना पड़ता है।
- उत्तर दिशा में निकास नालियाँ हों तो यह स्थिति भूस्वामी के लिए बहुत ही शुभ तथा राज्य लाभ देने वाली होती है।

- ईशान, उत्तर-पूर्व कोण में जल प्रवाह की नालियाँ भूस्वामी के लिए श्रेष्ठ तथा कल्याणकारी होती हैं। गृहस्वामी को धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है तथा आरोग्य लाभ होता है।
- शयनकक्ष में पलंग को दक्षिणी दीवार से लगाकर रखें। सोते समय सिरहाना उत्तर में या पूर्व में कदापि न रखें। सिरहाना उत्तर में या पूर्व में होने पर गृहस्वामी को शांति तथा समृद्धि की प्राप्ति नहीं होती है।

वास्तुशास्त्र घर को व्यवस्थित रखने की कला का नाम है। इसके सिद्धांत, नियम और फार्मूले किसी मंत्र से कम शक्तिशाली नहीं हैं। आप वास्तु के अनमोल मंत्र अपनाइए और सदा सुखी रहिए।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>कब होगा भाग्योदय???????

>कब होगा भाग्योदय???????

जन्मकुंडली अर्थात मनुष्य के जीवन का पूर्ण खाका होती है। कुंडली में ग्रहों की स्थिति अच्छी होना तो आवश्यक है ही, भाग्य से संबंधित ग्रहों का शुभ होना तथा उनकी दशा-महादशा का सही समय पर व्यक्ति के जीवन में आना भी उतना ही आवश्यक होता है अन्यथा कुंडली अच्छी होने पर भी यदि कार्य करने की उम्र शत्रु या नीचे ग्रहों की महादशा में ही बीत रही हो तो लाख परिश्रम के बाद भी उसका फल समय बीतने के बाद ही मिलेगा।

प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में नवम भाव को भाग्य भाव माना जाता है। इस भाव में जिस राशि का आधिपत्य होता है, उसके अनुसार भाग्योदय का वर्ष तय किया जाता है।

जैसे : मेष, लग्न हेतु नवें भाव में धनु राशि आती है। धनु राशि का स्वामी गुरु है। गुरु का भाग्योदय वर्ष 16 वर्ष माना जाता है। अर्थात व्यक्ति को पहला अवसर 16वें वर्ष में मिलेगा। इसके बाद क्रमश: 32वें, 48वें, 64वें वर्ष में परिवर्तन अवश्य आएँगे। इसके अलावा हर महादशा में गुरु का प्रत्यंतर उसके लिए शुभ फलों की प्राप्ति कराएगा। यदि गुरु शुभ स्थिति में हो तो शुभता बढ़ेगी, अशुभ होने पर गुरु का उपाय करें।

ग्रहानुसार भाग्योदय के वर्ष :—-

सूर्य 22वें वर्ष में, चंद्र 24वें वर्ष में, मंगल 28वें वर्ष, बुध 32वें वर्ष में, गुरु 16वें वर्ष में, शुक्र 25वें वर्ष या विवाह के बाद, शनि 36वें वर्ष में

* यदि नवें भाव पर राहु-केतु का प्रभाव हो तो क्रमश: 42वें व 44वें वर्ष में भाग्योदय होता है। ग्रहानुसार भाग्योदय के वर्ष जानकर यदि उन वर्षों में विशेष कार्यों की शुरुआत की जाए, तो सफलता जरूर मिलेगी। इसके साथ ही नवम भाव के स्वामी ग्रहों को शुभ व बलि रखने के उपाय करना चाहिए।

इन ग्रहों की दशा-महादशाएँ व प्रत्यंतर भी विशेष फलदायक होते हैं। अत: इन्हीं की समयावधि के अनुरूप अपनी तैयारियों की रूपरेखा बनाएँ।

नवम भाव के स्वामी ग्रह का रत्न पहनना भी अनुकूलता दे सकता है।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>राहु बनाता है चतुर राजनेता—-

>राहु बनाता है चतुर राजनेता—-

राजनीति एक ऐसा क्षेत्र बनता जा रहा है, जहाँ कम परिश्रम में भरपूर पैसा व प्रसिद्ध‍ि दोनों ही प्राप्त होते हैं। ढेरों सुख-सुविधाएँ अलग से मिलती ही है। और मजा ये कि इसमें प्रवेश के लिए किसी विशेष शैक्षणिक योग्यता की भी जरूरत नहीं होती।

राजनीति में जाने के लिए भी कुंडली में कुछ विशेष ग्रहों का प्रबल होना जरूरी है। राहु को राजनीति का ग्रह माना जाता है। यदि इसका दशम भाव से संबंध हो या यह स्वयं दशम में हो तो व्यक्ति धूर्त राजनीति करता है। अनेक तिकड़मों और विवादों में फँसकर भी अपना वर्चस्व कायम रखता है। राहु यदि उच्च का होकर लग्न से संबंध रखता हो तब भी व्यक्ति चालाक होता है।

राजनीति के लिए दूसरा ग्रह है गुरु- गुरु यदि उच्च का होकर दशम से संबंध करें, या दशम को देखें तो व्यक्ति बुद्धि के बल पर अपना स्थान बनाता है। ये व्यक्ति जन साधारण के मन में अपना स्थान बनाते हैं। चालाकी की नहीं वरन् तर्कशील, सत्य प्रधान राजनीति करते हैं।

बुध के प्रबल होने पर दशम से संबंध रखने पर व्यक्ति अच्छा वक्ता होता है। बुध गुरु दोनों प्रबल होने पर वाणी में ओज व विद्वत्ता का समन्वय होता है। ऐसे व्यक्तियों की भाषण कला लोकप्रिय होती है। उसी के बल पर वे जनमानस में अपना स्थान बनाते हैं।

हमेशा की तरह राजनीति में भी चमकने के लिए सूर्य का प्रबल होना जरूरी है। सूर्य लग्न, चतुर्थ, नवम या दशम में हो तो व्यक्ति उच्च पद को आसीन होता है, राजनीतिक पटल पर उभरता है और लोगों के मन पर राज करता है।

यदि कुंडली में कारक ग्रह शनि हो (वृषभ, तुला लग्न में) तो शनि का मजबूत होना जरूरी है। शनि स्थायित्व, स्थिरता देता है। शनि प्रधान ऐसे व्यक्तियों को धर्म व न्याय का साथ देना चाहिए, सत्य की राजनीति करना चाहिए अन्यथा शनि का कोप उन्हें धरातल पर ला फेंक सकता है।

इस प्रकार कुंडली का निरीक्षण कर संबंधित ग्रहों को मजबूत किया जा सकता है और राजनीति में परचम लहराए जा सकते हैं।

>क्या आपका घर भी है राहु-शनि का घर? शनि-राहु की नकारात्मक तरंगों का प्रभाव

आप किसी के घर जाते हैं और चंद मिनट वहाँ बैठने पर आपको घबराहट-सी महसूस होने लगती है। ऐसे समय आपको लगता है कि आपकी तबीयत गड़बड़ा रही है मगर यह आपका नहीं उस घर की तरंगों का दोष होता है। हमारी कुंडली के ग्रहों की तरह प्रत्येक घर में भी अच्छे-बुरे ग्रहों का प्रभाव झलकता है।

यदि किसी घर में छोटी-बड़ी बातों पर ‍विवाद उठ खड़ा होता है, बच्चे बड़ों का अपमान करते हों, मन में भारीपन-सा रहे, छोटी-बड़ी बातें भी बड़े-बड़े विवादों का रूप ले लेती हों, बच्चों व बड़ों का ‘परफार्मेंस’ उनकी क्षमतानुसार न हो पाए तो ऐसे घरों में अकसर शनि व राहु की नकारात्मक तरंगों का प्रभाव होता है।

क्या करें —–

1. घर के माहौल को शांतिमय रखें।
2. घर में हमेशा खुशबू (चंदन-कपूर) का प्रयोग करें।
3. घर के अंदर व बाहर तुलसी तथा मौसमी फूलों के पेड़ लगाएँ।
4. सुबह-शाम सामूहिक पूजा व आरती जरूर करें।
5. घर में लोहे के फर्नीचर, वस्तुओं का उपयोग न करें।
6. पढ़ते समय पानी की कटोरी सामने भरकर रखें।
7. राई-लौंग-राजमा-उड़द का प्रयोग कम करें।
8. रबर का इस्तेमाल कम करें।
9. महीने में एक या दो बार उपवास रखें व दान करें।
10. मछलियों की सेवा करें।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>शुक्र बनाता है कलाकार–

>शुक्र बनाता है कलाकार—

मजबूत करें सूर्य और शुक्र—-

कला के क्षेत्र में प्रसिद्धि और लक्ष्मी दोनों ही भरपूर होती है। कोई व्यक्ति कलाकार (विशेषत: गायक, वादक, नर्तक) बनेगा या नहीं यह उसकी कुंडली में शुक्र की स्थिति पर निर्भर करता है।

वृष और तुला लग्न या राशि चूँकि स्वयं शुक्र के स्वामित्व होते हैं अत: इन व्यक्तियों का कला की तरफ स्वाभाविक झुकाव रहता है। अन्य लग्नों में यदि शुक्र लग्न या पंचम भाव से संबंध रखता हो, केंद्र या पंचम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति की कला में रूचि रहती है। शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति कला को व्यवसाय के रूप में अपनाता है। शुक्र की नवम-दशम स्थिति भी यही फल दर्शाती है।

शुक्र की चंद्रमा से युति-प्रतियुति व्यक्ति को कल्पनाशील बनाती है (लेखन ‍आदि)। गुरु का साथ गीत-संगीत में आध्यात्मिक अनुभूति वाला है, शुक्र-बुध की युति कला क्षेत्र में व्यावसायिक सफलता दिलाती है।

मजबूत सूर्य का होना भी कुंडली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सूर्य और शुक्र प्रबल होने पर ह‍ी व्यक्ति को कला से धन व यश दोनों मिलता है अन्यथा कला केवल जीवनयापन का साधन बनकर रह जाती है।

शुक्र को मजबूत करने के लिए कुछ उपाय :—

* दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा या लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें।
* सफेद वस्तु का दान व सेवन करें।
* शुक्रवार को खीर खाने से भी शुक्र मजबूत होता है।
* हीरा धारण किया जा सकता है।
* स्त्री का आदर-सम्मान करें।

शुक्र के अतिरिक्त सूर्य को मजबूत करने के भी उपाय करें ताकि धन और यश दोनों ही आपके सहभाग‍ी बन सकें।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>बारह भावों में शुक्र के फ़ल——

>ज्योतिषानुसार बारह भावों में शुक्र के द्वारा दिये जाने वाले फ़ल

ज्योतिषानुसार शुक्र के लिये ज्योतिष शास्त्रों में जो फ़ल कहे गये है वे इस प्रकार से है:-

प्रथम भाव में शुक्र—

जातक के जन्म के समय लगन में विराजमान शुक्र को पहले भाव में शुक्र की उपाधि दी गयी है। पहले भाव में शुक्र के होने से जातक सुन्दर होता है,और शुक्र जो कि भौतिक सुखों का दाता है,जातक को सुखी रखता है,शुक्र दैत्यों का राजा है इसलिये जातक को भौतिक वस्तुओं को प्रदान करता है,और जातक को शराब कबाब आदि से कोई परहेज नही होता है,जातक की रुचि कलात्मक अभिव्यक्तियों में अधिक होती है,वह सजाने और संवरने वाले कामों में दक्ष होता है,जातक को राज कार्यों के करने और राजकार्यों के अन्दर किसी न किसी प्रकार से शामिल होने में आनन्द आता है,वह अपना हुकुम चलाने की कला को जानता है,नाटक सिनेमा और टीवी मीडिया के द्वारा अपनी ही बात को रखने के उपाय करता है,अपनी उपभोग की क्षमता के कारण और रोगों पर जल्दी से विजय पाने के कारण अधिक उम्र का होता है,अपनी तरफ़ विरोधी आकर्षण होने के कारण अधिक कामी होता है,और काम सुख के लिये उसे कोई विशेष प्रयत्न नही करने पडते हैं।
द्वितीय भाव में शुक्र—

दूसरा भाव कालपुरुष का मुख कहा गया है,मुख से जातक कलात्मक बात करता है,अपनी आंखों से वह कलात्मक अभिव्यक्ति करने के अन्दर माहिर होता है,अपने चेहरे को सजा कर रखना उसकी नीयत होती है,सुन्दर भोजन और पेय पदार्थों की तरफ़ उसका रुझान होता है,अपनी वाकपटुता के कारण वह समाज और जान पहिचान वाले क्षेत्र में प्रिय होता है,संसारिक वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति अपनी समझने की कला से पूर्ण होने के कारण वह विद्वान भी माना जाता है,अपनी जानपहिचान का फ़ायदा लेने के कारण वह साहसी भी होता है,लेकिन अकेला फ़ंसने के समय वह अपने को नि:सहाय भी पाता है,खाने पीने में साफ़सफ़ाई रखने के कारण वह अधिक उम्र का भी होता है।
तीसरे भाव में शुक्र—

तीसरे भाव में शुक्र के होने पर जातक को अपने को प्रदर्शित करने का चाव बचपन से ही होता है,कालपुरुष की कुन्डली के अनुसार तीसरा भाव दूसरों को अपनी कला या शरीर के द्वारा कहानी नाटक और सिनेमा टीवी मीडिया के द्वारा प्रदर्शित करना भी होता है,तीसरे भाव के शुक्र वाले जातक अधिकतर नाटकबाज होते है,और किसी भी प्रकार के संप्रेषण को आसानी से व्यक्त कर सकते है,वे फ़टाफ़ट बिना किसी कारण के रोकर दिखा सकते है,बिना किसी कारण के हंस कर दिखा सकते है,बिना किसी कारण के गुस्सा भी कर सकते है,यह उनकी जन्म जात सिफ़्त का उदाहरण माना जा सकता है। अधिकतर महिला जातकों में तीसरे भाव का शुक्र बडे भाई की पत्नी के रूप में देखा जाता है,तीसरे भाव के शुक्र वाला जातक खूबशूरत जीवन साथी का पति या पत्नी होता है,तीसरे भाव के शुक्र वाले जातक को जीवन साथी बदलने में देर नही लगती है,चित्रकारी करने के साथ वह अपने को भावुकता के जाल में गूंथता चला जाता है,और उसी भावुकता के चलते वह अपने को अन्दर ही अन्दर जीवन साथी के प्रति बुरी भावना पैदा कर लेता है,अक्सर जीवन की अभिव्यक्तियों को प्रसारित करते करते वह थक सा जाता है,और इस शुक्र के धारक जातक आलस्य की तरफ़ जाकर अपना कीमती समय बरबाद कर लेते है,तीसरे शुक्र के कारण जातक के अन्दर चतुराई की मात्रा का प्रभाव अधिक हो जाता है,आलस्य के कारण जब वह किसी गंभीर समस्या को सुलझाने में असमर्थ होता है,तो वह अपनी चतुराई से उस समस्या को दूर करने की कोशिश करता है।
चौथे भाव में शुक्र—

चौथे भाव का शुक्र कालपुरुष की कुन्डली के अनुसार चन्द्रमा की कर्क राशि में होता है,जातक के अन्दर मानसिक रूप से कामवासना की अधिकता होती है,उसे ख्यालों में केवल पुरुष को नारी और नारी को पुरुष का ही क्याल रहता है,जातक आस्तिक भी होता है,परोपकारी भी होता है,लेकिन परोपकार के अन्दर स्त्री को पुरुष के प्रति और पुरुष को स्त्री के प्रति आकर्षण का भाव देखा जाता है,जातक व्यवहार कुशल भी होता है,और व्यवहार के अन्दर भी शुक्र का आकर्षण मुख्य होता है,जातक का स्वभाव और भावनायें अधिक मात्रा में होती है,वह अपने को समाज में वाहनो से युक्त सजे हुये घर से युक्त और आभूषणों से युक्त दिखाना चाहता है,अधिकतर चौथे शुक्र वाले जातकों की रहने की व्यवस्था बहुत ही सजावटी देखी जाती है,चौथे भाव के शुक्र के व्यक्ति को फ़ल और सजावटी खानों का काम करने से अच्छा फ़ायदा होता देखा गया है,पानी वाली जमीन में या रहने वाले स्थानों के अन्दर पानी की सजावटी क्रियायें पानी वाले जहाजों के काम आदि भी देखे जाते है,धनु या वृश्चिक का शुक्र अगर चौथे भाव में विराजमान होता है,तो जातक को हवाई जहाजों के अन्दर और अंतरिक्ष के अन्दर भी सफ़ल होता देखा गया है।
पंचम भाव में शुक्र—

पंचम भाव का शुक्र कविता करने के लिये अधिक प्रयुक्त माना जाता है,चन्द्रमा की राशि कर्क से दूसरा होने के कारण जातक भावना को बहुत ही सजा संवार कर कहता है,उसके शब्दों के अन्दर शैरो शायरी की पुटता का महत्व अधिक रूप से देखा जाता है,अपनी भावना के चलते जातक पूजा पाठ से अधिकतर दूर ही रहता है,उसे शिक्षा से लेकर अपने जीवन के हर पहलू में केवल भौतिकता का महत्व ही समझ में आता है,व्ह जो सामने है,उसी पर विश्वास करना आता है,आगे क्या होगा उसे इस बात का ख्याल नही आता है,वह किसी भी तरह पराशक्ति को एक ढकोसला समझता है,और अक्सर इस प्रकार के लोग अपने को कम्प्यूटर वाले खेलों और सजावटी सामानों के द्वारा धन कमाने की फ़िराक में रहते है,उनको भगवान से अधिक अपने कलाकार दिमाग पर अधिक भरोशा होता है,अधिकतर इस प्रकार के जातक अपनी उम्र की आखिरी मंजिल पर किसी न किसी कारण अपना सब कुछ गंवाकर भिखारी की तरह का जीवन निकालते देखे गये है,उनकी औलाद अधिक भौतिकता के कारण मानसिकता और रिस्तों को केवल संतुष्टि का कारण ही समझते है,और समय के रहते ही वे अपना मुंह स्वाभाविकता से फ़ेर लेते हैं।
छठे भाव में शुक्र—

छठा भाव कालपुरुष के अनुसार बुध का घर माना जाता है,और कन्या राशि का प्रभाव होने के कारण शुक्र इस स्थान में नीच का माना जाता है,अधिकतर छठे शुक्र वाले जातकों के जीवन साथी मोटे होते है,और आराम तलब होने के कारण छठे शुक्र वालों को अपने जीवन साथी के सभी काम करने पडते है,इस भाव के जातकों के जीवन साथी किसी न किसी प्रकार से दूसरे लोगों से अपनी शारीरिक काम संतुष्टि को पूरा करने के चक्कर में केवल इसी लिये रहते है,क्योंकि छठे शुक्र वाले जातकों के शरीर में जननांग सम्बन्धी कोई न कोई बीमारी हमेशा बनी रहती है,चिढचिढापन और झल्लाहट के प्रभाव से वे घर या परिवार के अन्दर एक प्रकार से क्लेश का कारण भी बन जाते है,शरीर में शक्ति का विकास नही होने से वे पतले दुबले शरीर के मालिक होते है,यह सब उनकी माता के कारण भी माना जाता है,अधिकतर छठे शुक्र के जातकों की माता सजने संवरने और अपने को प्रदर्शित करने के चक्कर में अपने जीवन के अंतिम समय तक प्रयासरत रहतीं है। पिता के पास अनाप सनाप धन की आवक भी रहती है,और छठे शुक्र के जातकों के एक मौसी की भी जीवनी उसके लिये महत्वपूर्ण होती है,माता के खानदान से कोई न कोई कलाकार होता है, या मीडिया आदि में अपना काम कर रहा होता है।
सप्तम भाव में शुक्र—

सप्तम भाव में शुक्र कालपुरुष की कुन्डली के अनुसार अपनी ही राशि तुला में होता है,इस भाव में शुक्र जीवन साथी के रूप में अधिकतर मामलों में तीन तीन प्रेम सम्बन्ध देने का कारक होता है,इस प्रकार के प्रेम सम्बन्ध उम्र की उन्नीसवीं साल में,पच्चीसवीं साल में और इकत्तीसवीं साल में शुक्र के द्वारा प्रदान किये जाते है,इस शुक्र का प्रभाव माता की तरफ़ से उपहार में मिलता है,माता के अन्दर अति कामुकता और भौतिक सुखों की तरफ़ झुकाव का परिणाम माना जाता है,पिता की भी अधिकतर मामलों में या तो शुक्र वाले काम होते है,अथवा पिता की भी एक शादी या तो होकर छूट गयी होती है,या फ़िर दो सम्बन्ध लगातार आजीवन चला करते है,सप्तम भाव का शुक्र अपने भाव में होने के कारण महिला मित्रों को ही अपने कार्य के अन्दर भागीदारी का प्रभाव देता है। पुरुषों को सुन्दर पत्नी का प्रदायक शुक्र पत्नी को अपने से नीचे वाले प्रभावों में रखने के लिये भी उत्तरदायी माना जाता है,इस भाव का शुक्र उदारता वाली प्रकृति भी रखता है,अपने को लोकप्रिय भी बनाता है,लेकिन लोक प्रिय होने में नाम सही रूप में लिया जाये यह आवश्यक नही है,कारण यह शुक्र कामवासना की अधिकता से व्यभिचारी भी बना देता है,और दिमागी रूप से चंचल भी बनाता है,विलासिता के कारण जातक अधिकतर मामलों में कर्म हीन होकर अपने को उल्टे सीधे कामों मे लगा लेते है।
आठवें भाव में शुक्र—

आठवें भाव का शुक्र जातक को विदेश यात्रायें जरूर करवाता है,और अक्सर पहले से माता या पिता के द्वारा सम्पन्न किये गये जीवन साथी वाले रिस्ते दर किनार कर दिये जाते है,और अपनी मर्जी से अन्य रिस्ते बनाकर माता पिता के लिये एक नई मुसीबत हमेशा के लिये खडी कर दी जाती है। जातक का स्वभाव तुनक मिजाज होने के कारण माता के द्वारा जो शिक्षा दी जाती है वह समाज विरोधी ही मानी जाती है,माता के पंचम भाव में यह शुक्र होने के कारण माता को सूर्य का प्रभाव देता है,और सूर्य शुक्र की युति होने के कारण वह या तो राजनीति में चली जाती है,और राजनीति में भी सबसे नीचे वाले काम करने को मिलते है,जैसे साफ़ सफ़ाई करना आदि,माता की माता यानी जातक की नानी के लिये भी यह शुक्र अपनी गाथा के अनुसार वैध्वय प्रदान करता है,और उसे किसी न किसी प्रकार से शिक्षिका या अन्य पब्लिक वाले कार्य भी प्रदान करता है,जातक को नानी की सम्पत्ति बचपन में जरूर भोगने को मिलती है,लेकिन बडे होने के बाद जातक मंगल के घर में शुक्र के होने के बाद या तो मिलट्री में जाता है,या फ़िर किसी प्रकार की सजावटी टेकनोलोजी यानी कम्प्यूटर और अन्य आई टी वाली टेकनोलोजी में अपना नाम कमाता है। लगातार पुरुष वर्ग कामुकता की तरफ़ मन लगाने के कारण अक्सर उसके अन्दर जीवन रक्षक तत्वों की कमी हो जाती है,और वह रोगी बन जाता है,लेकिन रोग के चलते यह शुक्र जवानी के अन्दर किये गये कामों का फ़ल जरूर भुगतने के लिये जिन्दा रखता है,और किसी न किसी प्रकार के असाध्य रोग जैसे तपेदिक या सांस की बीमारी देता है,और शक्तिहीन बनाकर बिस्तर पर पडा रखता है। इस प्रकार के पुरुष वर्ग स्त्रियों पर अपना धन बरबाद करते है,और स्त्री वर्ग आभूषणो और मनोरंजन के साधनों तथा महंगे आवासों में अपना धन व्यय करती है।
नवें भाव का शुक्र—

नवें भाव का मालिक कालपुरुष के अनुसार गुरु होता है,और गुरु के घर में शुक्र के बैठ जाने से जातक के लिये शुक्र धन लक्ष्मी का कारक बन जाता है,उसके पास बाप दादा के जमाने की सम्पत्ति उपभोग करने के लिये होती है,और शादी के बाद उसके पास और धन बढने लगता है,जातक की माता को जननांग सम्बन्धी कोई न कोई बीमारी होती है,और पिता को मोटापा यह शुक्र उपहार में प्रदान करता है,बाप आराम पसंद भी होता है,बाप के रहते जातक के लिये किसी प्रकार की धन वाली कमी नही रहती है,वह मनचाहे तरीके से धन का उपभोग करता है,इस प्रकार के जातकों का ध्यान शुक्र के कारण बडे रूप में बैंकिंग या धन को धन से कमाने के साधन प्रयोग करने की दक्षता ईश्वर की तरफ़ से मिलती है,वह लगातार किसी न किसी कारण से अपने को धनवान बनाने के लिये कोई कसर नही छोडता है। उसके बडे भाई की पत्नी या तो बहुत कंजूस होती है,या फ़िर धन को समेटने के कारण वह अपने परिवार से बिलग होकर जातक का साथ छोड देती है,छोटे भाई की पत्नी भी जातक के कहे अनुसार चलती है,और वह हमेशा जातक के लिये भाग्य बन कर रहती है,नवां भाव भाग्य और धर्म का माना जाता है,जातक के लिये लक्ष्मी ही भगवान होती है,और योग्यता के कारण धन ही भाग्य होता है। जातक का ध्यान धन के कारण उसकी रक्षा करने के लिये भगवान से लगा रहता है,और वह केवल पूजा पाठ केवल धन को कमाने के लिये ही करता है। सुखी जीवन जीने वाले जातक नवें शुक्र वाले ही देखे गये है,छोटे भाई की पत्नी का साथ होने के कारण छोटा भाई हमेशा साथ रहने और समय समय पर अपनी सहायता देने के लिये तत्पर रहता है।
दसम भाव का शुक्र—-

दसम भाव का शुक्र कालपुरुष की कुन्डली के अनुसार शनि के घर में विराजमान होता है,पिता के लिये यह शुक्र माता से शासित बताया जाता है,और माता के लिये पिता सही रूप से किसी भी काम के अन्दर हां में हां मिलाने वाला माना जाता है।छोटा भी कुकर्मी बन जाता है,और बडा भाई आरामतलब बन जाता है। जातक के पास कितने ही काम करने को मिलते है,और बहुत सी आजीविकायें उसके आसपास होती है। अक्सर दसवें भाव का शुक्र दो शादियां करवाता है,या तो एक जीवन साथी को भगवान के पास भेज देता है,अथवा किसी न किसी कारण से अलगाव करवा देता है। जातक के लिये एक ही काम अक्सर परेशान करने वाला होता है,कि कमाये हुये धन को वह शनि वाले नीचे कामों के अन्दर ही व्यय करता है,इस प्रकार के जातक दूसरों के लिये कार्य करने के लिये साधन जुटाने का काम करते है,दसवें भाव के शुक्र वाले जातक महिलाओं के लिये ही काम करने वाले माने जाते है,और किसी न किसी प्रकार से घर को सजाने वाले कलाकारी के काम,कढाई कशीदाकारी,पत्थरों को तरासने के काम आदि दसवें भाव के शुक्र के जातक के पास करने को मिलते है।
ग्यारहवें भाव का शुक्र—-

ग्यारहवां भाव संचार के देवता यूरेनस का माना जाता है,आज के युग में संचार का बोलबाला भी है,मीडिया और इन्टरनेट का कार्य इसी शुक्र की बदौलत फ़लीभूत माना जाता है,इस भाव का शुक्र जातक को विजुअल साधनों को देने में अपनी महारता को दिखाता है,जातक फ़िल्म एनीमेशन कार्टून बनाना कार्टून फ़िल्म बनाना टीवी के लिये काम करना,आदि के लिये हमेशा उत्साहित देखा जा सकता है। जातक के पिता की जुबान में धन होता है,वह किसी न किसी प्रकार से जुबान से धन कमाने का काम करता है,जातक का छोटा भाई धन कमाने के अन्दर प्रसिद्ध होता है,जातक की पत्नी अपने परिवार की तरफ़ देखने वाली होती है,और जातक की कमाई के द्वारा अपने मायके का परिवार संभालने के काम करती है। जातक का बडा भाई स्त्री से शासित होता है,जातक के बडी बहिन होती है,और वह भी अपने पति को शासित करने में अपना गौरव समझती है। जातक को जमीनी काम करने का शौक होता है,वह खेती वाली जमीनों को सम्भालने और दूध के काम करने के अन्दर अपने को उत्साहित पाता है,जातक की माता का स्वभाव भी एक प्रकार से हठीला माना जाता है,वह धन की कीमत को नही समझती है,और माया नगरी को राख के ढेर में बदलने के लिये हमेशा उत्सुक रहती है,लेकिन पिता के भाग्य से वह जितना खर्च करती है,उतना ही अधिक धन बढता चला जाता है।
बारहवें भाव में शुक्र—

बारहवें भाव के शुक्र का स्थान कालपुरुष की कुन्डली के अनुसार राहु के घर में माना जाता है,राहु और शुक्र दोनो मिलकर या तो जातक को आजीवन हवा में उडाकर हवाई यात्रायें करवाया करते है,या आराम देने के बाद सोचने की क्रिया करवाने के बाद शरीर को फ़ुलाते रहते है,जातक का मोटा होना इस भाव के शुक्र की देन है,जातक का जीवन साथी सभी जातक की जिम्मेदारियां संभालने का कार्य करता है,और अपने को लगातार किसी न किसी प्रकार की बीमारियों का ग्रास बनाता चला जाता है,जातक का पिता या तो परिवार में बडा भाई होता है,और वह जातक की माता के भाग्य से धनवान होता है,पिता का धन जातक को मुफ़्त में भोगने को मिलता है,उम्र की बयालीसवीं साल तक जातक को मानसिक संतुष्टि नही मिलती है,चाहे उसके पास कितने ही साधन हों,वह किसी न किसी प्रकार से अपने को अभावग्रस्त ही मानता रहता है,और नई नई स्कीमें लगाकर बयालीस साल की उम्र तक जितना भी प्रयास कमाने के करता है,उतना ही वह पिता का धन बरबाद करता है,लेकिन माता के भाग्य से वह धन किसी न किसी कारण से बढता चला जाता है। उम्र की तीसरी सीढी पर वह धन कमाना चालू करता है,और फ़िर लगातार मरते दम तक कमाने से हार नही मानता है। जातक का बडा भाई अपने जुबान से धन कमाने का मालिक होता है,लेकिन भाभी का प्रभाव परिवार की मर्यादा को तोडने में ही रहता है,वह अपने को धन का दुश्मन समझती है,और किसी न किसी प्रकार से पारिवारिक महिलाओं से अपनी तू तू में में करती ही मिलती है,उसे बाहर जाने और विदेश की यात्रायें करने का शौक होता है,भाभी का जीवन अपनी कमजोरियों के कारण या तो अस्पताल में बीतता है,या फ़िर उसके संबन्ध किसी न किसी प्रकार से यौन सम्बन्धी बीमारियों के प्रति समाज में कार्य करने के प्रति मिलते है,वह अपने डाक्टर या महिलाओं को प्रजनन के समय सहायता देने वाली होती है। आप अन्य जानकारियों के लिये मुझे ईमेल कर सकते हैं

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>किसको मिलता हैं माता का प्यार?

>किसको मिलता हैं माता का प्यार?
जन्म पत्रिका में माता एवं सुख का स्थान एक ही होता है। यह होता है चतुर्थ भाव। इसी स्थान से मातृ सुख एवं सांसारिक सुख के संबध में विचार होता है। अर्थात जिसको माता का सुख का मिलता है, वही संसार में अन्य सुखों को भोग पाता है। जिस लग्न कुंडली का चतुर्थ भाव खराब हो जाता है। वह जातक मातृ एवं संसारिक सुख दोनो से वंचित हो जाता है।

जन्म पत्रिका के चतुर्थ भाव में मित्रगत स्वराशि या स्वयं की राशि में गुरु, बुध, चंद्र, शुक्र आदि सौैम्य ग्रह हो तो जातक मां के सुख के साथ ही अन्य सुखों को भी प्राप्त करता है। उसी तरह चतुर्थ भावा शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो माता तथा अन्य सुखों की प्राप्ती होती है। स्त्रियों की कुंडली में यह स्थान सास के साथ उसके संबधों को दर्शाता है। स्त्री कुंडली का चतुर्थ भाव अच्छा हो तो उसे माता और ससुराल दोनों जगह मान सम्मान मिलता है। वहीं इस स्थान पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने से असर विपरित हो जाता है।

चतुर्थ भाव में सूर्य शुभ होने पर जातक की माता उच्च पद वाली दंबग महिला होती है। गुरु शुभ होने पर धार्मिक स्वभाव की, शुक्र हो ता तेजस्विनी, बुध हो तो बुद्धिमान, चंद्र हो तो अति दयालु, मंगल शुभ हो तो भूमिस्वामी, पोषण करने वाली, शनि हो तो धर्मपरायण, राहु हो तो राजनितिज्ञ, केतु हो तो सात्विक माता होती है।ग्रहों के विपरित होने पर इसके विपरित असर होता है।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>गृह पीड़ा दूर करने का उपाय–

>गृह पीड़ा दूर करने का उपाय

सूर्य–
सूर्य को बली बनाने के लिए व्यक्ति को प्रात:काल सूर्योदय के समय उठकर लाल पूष्प वाले पौधों एवं वृक्षों को जल से सींचना चाहिए।
2? रात्रि में ताँबे के पात्र में जल भरकर सिरहाने रख दें तथा दूसरे दिन प्रात:काल उसे पीना चाहिए।
3? ताँबे का कड़ा दाहिने हाथ में धारण किया जा सकता है।
4? लाल गाय को रविवार के दिन दोपहर के समय दोनों हाथों में गेहूँ भरकर खिलाने चाहिए। गेहूँ को जमीन पर नहीं डालना चाहिए।
5? किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्य पर जाते समय घर से मीठी वस्तु खाकर निकलना चाहिए।6? हाथ में मोली (कलावा) छ: बार लपेटकर बाँधना चाहिए।
7? लाल चन्दन को घिसकर स्नान के जल में डालना चाहिए।
सूर्य के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु रविवार का दिन, सूर्य के नक्षत्र (कृत्तिका, उत्तरा-फाल्गुनी तथा उत्तराषाढ़ा) तथा सूर्य की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
चन्द्रमा—
व्यक्ति को देर रात्रि तक नहीं जागना चाहिए। रात्रि के समय घूमने-फिरने तथा यात्रा से बचना चाहिए।
2? रात्रि में ऐसे स्थान पर सोना चाहिए जहाँ पर चन्द्रमा की रोशनी आती हो।
3? ऐसे व्यक्ति के घर में दूषित जल का संग्रह नहीं होना चाहिए।
4? वर्षा का पानी काँच की बोतल में भरकर घर में रखना चाहिए।
5? वर्ष में एक बार किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान अवश्य करना चाहिए।
6? सोमवार के दिन मीठा दूध नहीं पूना चाहिए।
7? सफेद सुगंधित पुष्प वाले पौधे घर में लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।
चन्द्रमा के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु सोमवार का दिन, चन्द्रमा के नक्षत्र (रोहिणी, हस्त तथा श्रवण) तथा चन्द्रमा की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
मंगल—-
1? लाल कपड़े में सौंफ बाँधकर अपने शयनकक्ष में रखनी चाहिए।
2? ऐसा व्यक्ति जब भी अपना घर बनवाये तो उसे घर में लाल पत्थर अवश्य लगवाना चाहिए।
3? बन्धुजनों को मिष्ठान्न का सेवन कराने से भी मंगल शुभ बनता है।
4? लाल वस्त्र लिकर उसमें दो मुठ्ठी मसूर की दाल बाँधकर मंगलवार के दिन किसी भिखारी को दान करनी चाहिए।
5? मंगलवार के दिन हनुमानजी के चरण से सिन्दूर लिकर उसका टीका माथे पर लगाना चाहिए।
6? बंदरों को गुड़ और चने खिलाने चाहिए।
7? अपने घर में लाल पुष्प वाले पौधे या वृक्ष लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।
मंगल के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु मंगलवार का दिन, मंगल के नक्षत्र (मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा) तथा मंगल की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
बुध—
1? अपने घर में तुलसी का पौधा अवश्य लगाना चाहिए तथा निरन्तर उसकी देखभाल करनी चाहिए। बुधवार के दिन तुलसी पत्र का सेवन करना चाहिए।
2? बुधवार के दिन हरे रंग की चूडिय़ाँ हिजड़े को दान करनी चाहिए।
3? हरी सब्जियाँ एवं हरा चारा गाय को खिलाना चाहिए।
4? बुधवार के दिन गणेशजी के मंदिर में मूँग के लड्डुओं का भोग लगाएँ तथा बच्चों को बाँटें।
5? घर में खंडित एवं फटी हुई धार्मिक पुस्तकें एवं ग्रंथ नहीं रखने चाहिए।
6? अपने घर में कंटीले पौधे, झाडिय़ाँ एवं वृक्ष नहीं लगाने चाहिए। फलदार पौधे लगाने से बुध ग्रह की अनुकूलता बढ़ती है।
7? तोता पालने से भी बुध ग्रह की अनुकूलता बढ़ती है।
बुध के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु बुधवार का दिन, बुध के नक्षत्र (आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती) तथा बुध की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
गुरु—
1? ऐसे व्यक्ति को अपने माता-पिता, गुरुजन एवं अन्य पूजनीय व्यक्तियों के प्रति आदर भाव रखना चाहिए तथा महत्त्वपूर्ण समयों पर इनका चरण स्पर्श कर आशिर्वाद लेना चाहिए।
2? सफेद चन्दन की लकड़ी को पत्थर पर घिसकर उसमें केसर मिलाकर लेप को माथे पर लगाना चाहिए या टीका लगाना चाहिए।
3? ऐसे व्यक्ति को मन्दिर में या किसी धर्म स्थल पर नि:शुल्क सेवा करनी चाहिए।
4? किसी भी मन्दिर या इबादत घर के सम्मुख से निकलने पर अपना सिर श्रद्धा से झुकाना चाहिए।
5? ऐसे व्यक्ति को परस्त्री / परपुरुष से संबंध नहीं रखने चाहिए।
6? गुरुवार के दिन मन्दिर में केले के पेड़ के सम्मुख गौघृत का दीपक जलाना चाहिए।
7? गुरुवार के दिन आटे के लोयी में चने की दाल, गुड़ एवं पीसी हल्दी डालकर गाय को खिलानी चाहिए।
गुरु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु गुरुवार का दिन, गुरु के नक्षत्र (पुनर्वसु, विशाखा, पूर्व-भाद्रपद) तथा गुरु की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
शुक्र—-
1? काली चींटियों को चीनी खिलानी चाहिए।
2? शुक्रवार के दिन सफेद गाय को आटा खिलाना चाहिए।
3? किसी काने व्यक्ति को सफेद वस्त्र एवं सफेद मिष्ठान्न का दान करना चाहिए।
4? किसी महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए जाते समय 10 वर्ष से कम आयु की कन्या का चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेना चाहिए।
5? अपने घर में सफेद पत्थर लगवाना चाहिए।
6? किसी कन्या के विवाह में कन्यादान का अवसर मिले तो अवश्य स्वीकारना चाहिए।
7? शुक्रवार के दिन गौ-दुग्ध से स्नान करना चाहिए।
शुक्र के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शुक्रवार का दिन, शुक्र के नक्षत्र (भरणी, पूर्वा-फाल्गुनी, पुर्वाषाढ़ा) तथा शुक्र की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
शनि—
1? शनिवार के दिन पीपल वृक्ष की जड़ पर तिल्ली के तेल का दीपक जलाएँ।
2? शनिवार के दिन लोहे, चमड़े, लकड़ी की वस्तुएँ एवं किसी भी प्रकार का तेल नहीं खरीदना चाहिए।3? शनिवार के दिन बाल एवं दाढ़ी-मूँछ नही कटवाने चाहिए।
4? भड्डरी को कड़वे तेल का दान करना चाहिए।
5? भिखारी को उड़द की दाल की कचोरी खिलानी चाहिए।
6? किसी दु:खी व्यक्ति के आँसू अपने हाथों से पोंछने चाहिए।
7? घर में काला पत्थर लगवाना चाहिए।
शनि के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शनिवार का दिन, शनि के नक्षत्र (पुष्य, अनुराधा, उत्तरा-भाद्रपद) तथा शनि की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
राहु—
1? ऐसे व्यक्ति को अष्टधातु का कड़ा दाहिने हाथ में धारण करना चाहिए।
2? हाथी दाँत का लाकेट गले में धारण करना चाहिए।
3? अपने पास सफेद चन्दन अवश्य रखना चाहिए। सफेद चन्दन की माला भी धारण की जा सकती है।4? जमादार को तम्बाकू का दान करना चाहिए।
5? दिन के संधिकाल में अर्थात् सूर्योदय या सूर्यास्त के समय कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीम करना चाहिए।6? यदि किसी अन्य व्यक्ति के पास रुपया अटक गया हो, तो प्रात:काल पक्षियों को दाना चुगाना चाहिए।
7? झुठी कसम नही खानी चाहिए।
राहु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शनिवार का दिन, राहु के नक्षत्र (आर्द्रा, स्वाती, शतभिषा) तथा शनि की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
केतु—-
1? भिखारी को दो रंग का कम्बल दान देना चाहिए।
2? नारियल में मेवा भरकर भूमि में दबाना चाहिए।
3? बकरी को हरा चारा खिलाना चाहिए।
4? ऊँचाई से गिरते हुए जल में स्नान करना चाहिए।
5? घर में दो रंग का पत्थर लगवाना चाहिए।
6? चारपाई के नीचे कोई भारी पत्थर रखना चाहिए।
7? किसी पवित्र नदी या सरोवर का जल अपने घर में लाकर रखना चाहिए।
केतु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु मंगलवार का दिन, केतु के नक्षत्र (अश्विनी, मघा तथा मूल) तथा मंगल की होरा में अधिक शुभ होते हैं।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>रुद्राक्ष—

>रुद्राक्ष

एक मुखी रुद्राक्ष—-
स्वरुप-एक मुखी रुद्राक्ष शिव का स्वरुप हैलाभ-एक मुखी रुद्राक्ष ब्रहम हत्या आदि पापो को दूर करने वाला हैमंत्र -एक मुखी रुद्राक्ष को “ॐ ह्रीं नमः “मंत्र का जाप कर के धारण करे
दो मुखी रुद्राक्ष—
स्वरुप-दो मुखी रुद्राक्ष देवता स्वरुप है,पापो को दूर करने वाला और अर्धनारीइश्वर स्वरुप हैलाभ-दो मुखी रुद्राक्ष धारण करने से अर्धनारीइश्वर प्रस्सन होते हैमंत्र -दो मुखी रुद्राक्ष को “ॐ नमः “का जाप कर के धारण करे
तीन मुखी रुद्राक्ष—
स्वरुप- तीन मुखी रुद्राक्ष अग्नि स्वरुप हैलाभ-तीन मुखी रुद्राक्ष हत्या आदि पापो को दूर करने में समर्थ है,शौर्य और ऐश्वर्या को बढाने वाला हैमंत्र -तीन मुखी रुद्राक्ष को “ॐ क्लीं नमः” का जाप कर के धारण करे
चतुर्मुखी रुद्राक्ष—
स्वरुप- चतुर्मुखी रुद्राक्ष साक्षात् ब्रह्म जी का स्वरुप है,लाभ-चतुर्मुखी रुद्राक्ष के स्पर्श और दर्शन मात्र से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, की प्राप्ति होती हैमंत्र -चतुर्मुखी रुद्राक्ष को “ॐ ह्रीं नमः” मन्त्र का जाप कर के धारण करे
पञ्च मुखी रुद्राक्ष—
स्वरुप- पञ्च मुखी रुद्राक्ष पञ्च देवो(विष्णु,शिव,गणेश,सूर्य और देवी)का स्वरुप हैलाभ- “पञ्च वक्त्रं तु रुद्राक्ष पञ्च ब्रहम स्वरूप्कम” इस के धारण मात्र से नर हत्या का पाप मुक्त हो जाता है,इस को धारण करने से काल अग्नि स्वरुप अगम्य पाप दूर होते हैमंत्र -पञ्च मुखी रुद्राक्ष को “ॐ ह्रीं नमः “मंत्र का जाप कर के धारण करे
छह मुखी रुद्राक्ष—-
स्वरुप-छह मुखी रुद्राक्ष साक्षात् कार्तिके स्वरुप हैलाभ-छह मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से श्री और आरोग्य की प्राप्ति होती हैमंत्र- छह मुखी रुद्राक्ष को “ॐ ह्रीं नमः”मंत्र का जाप कर के धारण करे”
सप्त मुखी रुद्राक्ष—-
स्वरुप- सप्त मुखी रुद्राक्ष साक्षात् कामदेव स्वरुप हैलाभ-सप्त मुखी रुद्राक्ष अत्यंत भाग्य शाली और स्वर्ण चोरो आदि पापो को दूर करता है
अष्ट मुखी रुद्राक्ष—-
स्वरुप- यह रुद्राक्ष साक्षात् साक्षी विनायक देव हैलाभ-इस के धारण करने से पञ्च पातको का नाश होता है
इस को “ॐ हम नमः” मंत्र का जाप कर के धारण करने से परम पद की प्राप्ति होती है!
नवमुखी रुद्राक्ष—
इसे भेरव और कपिल मुनि का प्रतीक माना गया हैनौ रूप धारण करने वाली भगवती दुर्गा इस की अधीश्तात्री मानी गई है
जो मनुष्य भगवती परायण हो कर अपनी बाई हाथ अथवा भुजा पर इस को धारण करता है, उस पर नव शक्तिया प्रसन्न होती है
वह शिव के सामान बलि हो जाता है इसे”ॐ ह्रीं हुं नमः”का जाप कर के धारण करना चाहये
दश मुखी रुद्राक्ष—-
दश मुखी रुद्राक्ष साक्षात् भगवान जनादन है
इस के धारण करने से ग्रह, पिचाश,बेताल,ब्रम्ह राक्षश,और नाग आदि का भय दूर होता है
इसे मंत्र”ॐ ह्रीं नमः”का जाप कर के धारण करना चाहिए
एकादश मुखी रुद्राक्ष—-
एकादश मुखी रुद्राक्ष एकादश रुदर स्वरुप है
शिखा पर धारण करने से पुण्य फल,श्रेष्ठ यज्ञो के फल की प्राप्ति होती है
एकादश मुखी रुद्राक्ष को “ॐ ह्रीं हम नमः का जाप कर के धारण करने से साधक सर्वत्र विजय होता है
द्वादश मुखी रुद्राक्ष—-
द्वादश मुखी रुद्राक्ष महा विष्णु का स्वरुप है
इस रुद्राक्ष को “ॐ क्रों क्षों रों नमः”का जाप कर के धारण करने से साधक साक्षात् विष्णु जी को मही धारण करता है
इसे कान में धारण करने से द्वादश आदित्य भी प्रस्सन होते है
तेरह मुखी रुद्राक्ष—
तेरह मुखी रुद्राक्ष काम देश स्वरुप है
इस रुद्राक्ष को धारण करने से समस्त कामनाओ की इच्छा भोगो की प्राप्ति होती है
इसे “ॐ ह्रीं हुम नमः का जाप कर के धारण करना चाहये
चौदह मुखी रुद्राक्ष—-
चौदह मुखी रुद्राक्ष अक्षि से उत्पन हुआ है,यह भगवान का नेत्र स्वरुप है
इस रुद्राक्ष को “ॐ नमः शिवाय” का जाप कर के धारण करना चाहिएइस को धारण करने से साधक शिव तुल्य हो कर सब व्यधियो और रोगों को हर लेता है और आरोग्य प्रदान करता है….ॐ नमः शिवाय:

>वास्तु दोष निवारण के कुछ सरल उपाय—

कभी-कभी दोषों का निवारण वास्तुशास्त्रीय ढंग से करना कठिन हो जाता है। ऐसे में दिनचर्या के कुछ सामान्य नियमों का पालन करते हुए निम्नोक्त सरल उपाय कर इनका निवारण किया जा सकता है।

* पूजा घर पूर्व-उत्तर (ईशान कोण) में होना चाहिए तथा पूजा यथासंभव प्रातः 06 से 08 बजे के बीच भूमि पर ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके बैठ कर ही करनी चाहिए।

* पूजा घर के पास उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में सदैव जल का एक कलश भरकर रखना चाहिए। इससे घर में सपन्नता आती है। मकान के उत्तर पूर्व कोने को हमेशा खाली रखना चाहिए।

* घर में कहीं भी झाड़ू को खड़ा करके नहीं रखना चाहिए। उसे पैर नहीं लगना चाहिए, न ही लांघा जाना चाहिए, अन्यथा घर में बरकत और धनागम के स्रोतों में वृद्धि नहीं होगी।

* पूजाघर में तीन गणेशों की पूजा नहीं होनी चाहिए, अन्यथा घर में अशांति उत्पन्न हो सकती है। तीन माताओं तथा दो शंखों का एक साथ पूजन भी वर्जित है। धूप, आरती, दीप, पूजा अग्नि आदि को मुंह से फूंक मारकर नहीं बुझाएं। पूजा कक्ष में, धूप, अगरबत्ती व हवन कुंड हमेशा दक्षिण पूर्व में रखें।

* घर में दरवाजे अपने आप खुलने व बंद होने वाले नहीं होने चाहिए। ऐसे दरवाजे अज्ञात भय पैदा करते हैं। दरवाजे खोलते तथा बंद करते समय सावधानी बरतें ताकि कर्कश आवाज नहीं हो। इससे घर में कलह होता है। इससे बचने के लिए दरवाजों पर स्टॉपर लगाएं तथा कब्जों में समय समय पर तेल डालें।

* खिड़कियां खोलकर रखें, ताकि घर में रोशनी आती रहे।

* घर के मुख्य द्वार पर गणपति को चढ़ाए गए सिंदूर से दायीं तरफ स्वास्तिक बनाएं।

* महत्वपूर्ण कागजात हमेशा आलमारी में रखें। मुकदमे आदि से संबंधित कागजों को गल्ले, तिजोरी आदि में नहीं रखें, सारा धन मुदमेबाजी में खर्च हो जाएगा।

* घर में जूते-चप्पल इधर-उधर बिखरे हुए या उल्टे पड़े हुए नहीं हों, अन्यथा घर में अशांति होगी।

* सामान्य स्थिति में संध्या के समय नहीं सोना चाहिए। रात को सोने से पूर्व कुछ समय अपने इष्टदेव का ध्यान जरूर करना चाहिए।

* घर में पढ़ने वाले बच्चों का मुंह पूर्व तथा पढ़ाने वाले का उत्तर की ओर होना चाहिए।

* घर के मध्य भाग में जूठे बर्तन साफ करने का स्थान नहीं बनाना चाहिए।

* उत्तर-पूर्वी कोने को वायु प्रवेश हेतु खुला रखें, इससे मन और शरीर में ऊर्जा का संचार होगा।

* अचल संपत्ति की सुरक्षा तथा परिवार की समृद्धि के लिए शौचालय, स्नानागार आदि दक्षिण-पश्चिम के कोने में बनाएं।

* भोजन बनाते समय पहली रोटी अग्निदेव अर्पित करें या गाय खिलाएं, धनागम के स्रोत बढ़ेंगे।

* पूजा-स्थान (ईशान कोण) में रोज सुबह श्री सूक्त, पुरुष सूक्त एवं हनुमान चालीसा का पाठ करें, घर में शांति बनी रहेगी।

* भवन के चारों ओर जल या गंगा जल छिड़कें।

* घर के अहाते में कंटीले या जहरीले पेड़ जैसे बबूल, खेजड़ी आदि नहीं होने चाहिए, अन्यथा असुरक्षा का भय बना रहेगा।

* कहीं जाने हेतु घर से रात्रि या दिन के ठीक १२ बजे न निकलें।

* किसी महत्वपूर्ण काम हेतु दही खाकर या मछली का दर्शन कर घर से निकलें।

* घर में या घर के बाहर नाली में पानी जमा नहीं रहने दें।

* घर में मकड़ी का जाल नहीं लगने दें, अन्यथा धन की हानि होगी।

* शयनकक्ष में कभी जूठे बर्तन नहीं रखें, अन्यथा परिवार में क्लेश और धन की हानि हो सकती है।

* भोजन यथासंभव आग्नेय कोण में पूर्व की ओर मुंह करके बनाना तथा पूर्व की ओर ही मुंह करके करना चाहिए।

>वास्तु में दिशाओं की अहमियत पहचानें—

वास्तु शास्त्र की अहमियत अब अंजानी नहीं रह गई है। अधिकांश लोग मान चुके हैं कि मकान की बनावट, उसमें रखी जाने वाली चीजें और उन्हें रखने का तरीका जीवन को प्रभावित करता है। ऐसे में, वास्तु शास्त्र की बारीकियों को समझना आवश्यक है। इन बारीकियों में सबसे अहम है-दिशाएं। वास्तु के अनुसार दिशाओं का भी भवन निर्माण मे उतना ही महत्व है, जितना कि पंच तत्वों का है। दिशाएं कौन-कौन सी हैं और उनके स्वामी कौन-कौन से हैं और वो किस तरह जीव को प्रभावित कर सकती हैं-ये समझना जरुरी है।वास्तु विज्ञान शास्त्रों के अनुसार चार दिशाओं के अतिरिक्त चार उपदिशाएं या विदिशाएं भी होती हैं। ये चार दिशाएं हैं- ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य। समरागण सूत्र में दिशाओं व विदिशाओं का उल्लेख इस प्रकार किया गया है।

1.पूर्वः- पूर्व दिशा का स्वामी इन्द्र हैं और इसे सूर्य का निवास स्थान भी माना जाता है। इस दिशा को पितृ स्थान माना जाता है अतः इस दिशा को खुला व स्वच्छ रखा जाना चाहिए। इस दिशा मे कोई रूकावट नहीं होनी चाहिए। यह दिशा वंश वृद्धि मे भी सहायक होती है। यह दिशा अगर दूषित होगी तो व्यक्ति के मान सम्मान को हानि मिलती है व पितृ दोष लगता है। प्रयास करें कि इस दिशा मे टॉयलेट न हो वरना धन व संतान की हानि का भय रहता है। पूर्व दिशा में बनी चारदीवारी पश्चिम दिशा की चार दीवारी से ऊंची नहीं होनी चाहिए। इससे भी संतान हानि का भय रहता है।

2.पश्चिमः- जब सूर्य अस्तांचल की ओर होता है तो वह दिशा पश्चिम कहलाती है। इस दिशा का स्वामी श्वरूणश् है। यह दिशा वायु तत्व को प्रभावित करती है और वायु चंचल होती है। अतः यह दिशा चंचलता प्रदान करती है। यदि भवन का दरवाजा पश्चिम मुखी है तो वहां रहने वाले प्राणियों का मन चंचल होगा। पश्चिम दिशा सफलता यश, भव्यता और कीर्ति प्रदान करती है। पश्चिम दिशा का स्वामी वरूण है। इसका प्रतिनिधि ग्रह शनि है। ऐसे में गृह का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा वाला हो तो वो गलत है। इस कारण ग्रह स्वामी की आमदनी ठीक नहीं होगी और उसे गुप्तांग की बीमारी हो सकती है।

3.उत्तरः- उत्तर दिशा का स्वामी कुबेर है और यह दिशा जल तत्व को प्रभावित करती है। भवन निर्माण करते समय इस दिशा को खुला छोड़ देना चाहिए। अगर इस दिशा में निर्माण करना जरूरी हो तो इस दिशा का निर्माण अन्य दिशाओं की अपेक्षा थोड़ा नीचा होना चाहिए। यह दिशा सुख सम्पति, धन धान्य एवं जीवन मे सभी सुखों को प्रदान करती है। उत्तर मुखी भवन इसकी दिशा का ग्रह बुध है। उत्तरी हिस्से में खाली जगह न हो। अहाते की सीमा के साथ सटकर और मकान हों और दक्षिण दिशा मे जगह खाली हो तो वह भवन दूसरों की सम्पति बन सकता है।

4.दक्षिणः- आम तौर पर दक्षिण दिशा को अच्छा नहीं मानते क्योंकि दक्षिण दिशा को यम का स्थान माना जाता है और यम मृत्यु के देवता है अतः आम लोग इसे मृत्यु तुल्य दिशा मानते है। परन्तु यह दिशा बहुत ही सौभाग्यशाली है। यह धैर्य व स्थिरता की प्रतीक है। यह दिशा हर प्रकार की बुराइयों को नष्ट करती है। भवन निर्माण करते समय पहले दक्षिण भाग को कवर करना चाहिए और इस दिशा को सर्वप्रथम पूरा बन्द रखना चाहिए। यहां पर भारी समान व भवन निर्माण साम्रगी को रखना चाहिए। यह दिशा अगर दूषित या खुली होगी तो शत्रु भय का रोग प्रदान करने वाले होगी।

5.ईशानः- पूर्व दिशा व उत्तर दिशा के मध्य भाग को ईशान दिशा कहा जाता है। ईशान दिशा को देवताओं का स्थान भी कहा जाता है। इसीलिए हिन्दू मान्यता के अनुसार कोई शुभ कार्य किया जाता है तो घट स्थापना ईशान दिशा की ओर की जाती है। सूर्योदय की पहली किरणें भवन के जिस भाग पर पड़े, उसे ईशान दिशा कहा जाता है। यह दिशा विवेक, धैर्य, ज्ञान, बुद्धि आदि प्रदान करती है। भवन मे इस दिशा को पूरी तरह शुद्ध व पवित्र रखा जाना चाहिए। यदि यह दिशा दूषित होगी तो भवन मे प्रायः कलह व विभिन्न कष्टों के साथ व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट होती है। इस दिशा का स्वामी रूद्र यानि भगवान शिव है और प्रतिनिधि ग्रह बृहस्पति है।

6.आग्नेयः- पूर्व दिशा व दक्षिण दिशा को मिलाने वाले कोण को अग्नेय कोण संज्ञा दी जाती है। जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है इस कोण को अग्नि तत्व का प्रभुत्व माना गया है और इसका सीधा सम्बन्ध स्वास्थ्य के साथ है। यह दिशा दूषित रहेगी तो घर का कोई न कोई सदस्य बीमार रहेगा। इस दिशा के दोषपूर्ण रहने से व्यक्ति क्रोधित स्वभाव वाला व चिड़चिड़ा होगा। यदि भवन का यह कोण बढ़ा हुआ है तो संतान को कष्टप्रद होकर राजभय आदि देता है। इस दिशा के स्वामी गणेश हैं और प्रतिनिधि ग्रह शुक्र है। यदि आग्नेय ब्लॉक की पूर्वी दिशा मे सड़क सीधे उत्तर की ओर न बढ़कर घर के पास ही समाप्त हो जाए तो वह घर पराधीन हो सकता है।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>टोने-टोटके – कुछ उपाय –—

>टोने-टोटके – कुछ उपाय –—

छोटे-छोटे उपाय हर घर में लोग जानते हैं, पर उनकी विधिवत्‌ जानकारी के अभाव में वे उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं। इस लोकप्रिय स्तंभ में उपयोगी टोटकों की विधिवत्‌ जानकारी दी जा रही है…

परीक्षा में सफलता हेतु :– परीक्षा में सफलता हेतु गणेश रुद्राक्ष धारण करें। बुधवार को गणेश जी के मंदिर में जाकर दर्शन करें और मूंग के लड्डुओं का भोग लगाकर सफलता की प्रार्थना करें।
पदोन्नति हेतु :— शुक्ल पक्ष के सोमवार को सिद्ध योग में तीन गोमती चक्र चांदी के तार में एक साथ बांधें और उन्हें हर समय अपने साथ रखें, पदोन्नति के साथ-साथ व्यवसाय में भी लाभ होगा।
मुकदमे में विजय हेतु :– पांच गोमती चक्र जेब में रखकर कोर्ट में जाया करें, मुकदमे में निर्णय आपके पक्ष में होगा।
पढ़ाई में एकाग्रता हेतु :— शुक्ल पक्ष के पहले रविवार को इमली के २२ पत्ते ले आएं और उनमें से ११ पत्ते सूर्य देव को ¬ सूर्याय नमः कहते हुए अर्पित करें। शेष ११ पत्तों को अपनी किताबों में रख लें, पढ़ाई में रुचि बढ़ेगी।
कार्य में सफलता के लिए :– अमावस्या के दिन पीले कपड़े का त्रिकोना झंडा बना कर विष्णु भगवान के मंदिर के ऊपर लगवा दें, कार्य सिद्ध होगा।
व्यवसाय बाधा से मुक्ति हेतु :– यदि कारोबार में हानि हो रही हो अथवा ग्राहकों का आना कम हो गया हो, तो समझें कि किसी ने आपके कारोबार को बांध दिया है। इस बाधा से मुक्ति के लिए दुकान या कारखाने के पूजन स्थल में शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को अमृत सिद्ध या सिद्ध योग में श्री धनदा यंत्र स्थापित करें। फिर नियमित रूप से केवल धूप देकर उनके दर्शन करें, कारोबार में लाभ होने लगेगा।
गृह कलह से मुक्ति हेतु :— परिवार में पैसे की वजह से कलह रहता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख में पांच कौड़ियां रखकर उसे चावल से भरी चांदी की कटोरी पर घर में स्थापित करें। यह प्रयोग शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार को या दीपावली के अवसर पर करें, लाभ अवश्य होगा। क्रोध पर नियंत्रण हेतु : यदि घर के किसी व्यक्ति को बात-बात पर गुस्सा आता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख को साफ कर उसमें जल भरकर उसे पिला दें।
मकान खाली कराने हेतु :– शनिवार की शाम को भोजपत्र पर लाल चंदन से किरायेदार का नाम लिखकर शहद में डुबो दें। संभव हो, तो यह क्रिया शनिश्चरी अमावस्या को करें। कुछ ही दिनों में किरायेदार घर खाली कर देगा। ध्यान रहे, यह क्रिया करते समय कोई टोके नहीं।
बिक्री बढ़ाने हेतु :– ग्यारह गोमती चक्र और तीन लघु नारियलों की यथाविधि पूजा कर उन्हें पीले वस्त्र में बांधकर बुधवार या शुक्रवार को अपने दरवाजे पर लटकाएं तथा हर पूर्णिमा को धूप दीप जलाएं। यह क्रिया निष्ठापूर्वक नियमित रूप से करें, ग्राहकों की संख्या में वृद्धि होगी और बिक्री बढ़ेगी।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>स्वास्थ्य के लिये टोटके—

>स्वास्थ्य के लिये टोटके

1॰ सदा स्वस्थ बने रहने के लिये रात्रि को पानी किसी लोटे या गिलास में सुबह उठ कर पीने के लिये रख दें। उसे पी कर बर्तन को उल्टा रख दें तथा दिन में भी पानी पीने के बाद बर्तन (गिलास आदि) को उल्टा रखने से यकृत सम्बन्धी परेशानियां नहीं होती तथा व्यक्ति सदैव स्वस्थ बना रहता है।

2॰ हृदय विकार, रक्तचाप के लिए एकमुखी या सोलहमुखी रूद्राक्ष श्रेष्ठ होता है। इनके न मिलने पर ग्यारहमुखी, सातमुखी अथवा पांचमुखी रूद्राक्ष का उपयोग कर सकते हैं। इच्छित रूद्राक्ष को लेकर श्रावण माह में किसी प्रदोष व्रत के दिन, अथवा सोमवार के दिन, गंगाजल से स्नान करा कर शिवजी पर चढाएं, फिर सम्भव हो तो रूद्राभिषेक करें या शिवजी पर “ॐ नम: शिवाय´´ बोलते हुए दूध से अभिषेक कराएं। इस प्रकार अभिमंत्रित रूद्राक्ष को काले डोरे में डाल कर गले में पहनें।

3॰ जिन लोगों को 1-2 बार दिल का दौरा पहले भी पड़ चुका हो वे उपरोक्त प्रयोग संख्या 2 करें तथा निम्न प्रयोग भी करें :-एक पाचंमुखी रूद्राक्ष, एक लाल रंग का हकीक, 7 साबुत (डंठल सहित) लाल मिर्च को, आधा गज लाल कपड़े में रख कर व्यक्ति के ऊपर से 21 बार उसार कर इसे किसी नदी या बहते पानी में प्रवाहित कर दें।

4॰ किसी भी सोमवार से यह प्रयोग करें। बाजार से कपास के थोड़े से फूल खरीद लें। रविवार शाम 5 फूल, आधा कप पानी में साफ कर के भिगो दें। सोमवार को प्रात: उठ कर फूल को निकाल कर फेंक दें तथा बचे हुए पानी को पी जाएं। जिस पात्र में पानी पीएं, उसे उल्टा कर के रख दें। कुछ ही दिनों में आश्चर्यजनक स्वास्थ्य लाभ अनुभव करेंगे।

5॰ घर में नित्य घी का दीपक जलाना चाहिए। दीपक जलाते समय लौ पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर हो या दीपक के मध्य में (फूलदार बाती) बाती लगाना शुभ फल देने वाला है।

6॰ रात्रि के समय शयन कक्ष में कपूर जलाने से बीमारियां, दु:स्वपन नहीं आते, पितृ दोष का नाश होता है एवं घर में शांति बनी रहती है।

7॰ पूर्णिमा के दिन चांदनी में खीर बनाएं। ठंडी होने पर चन्द्रमा और अपने पितरों को भोग लगाएं। कुछ खीर काले कुत्तों को दे दें। वर्ष भर पूर्णिमा पर ऐसा करते रहने से गृह क्लेश, बीमारी तथा व्यापार हानि से मुक्ति मिलती है।

8॰ रोग मुक्ति के लिए प्रतिदिन अपने भोजन का चौथाई हिस्सा गाय को तथा चौथाई हिस्सा कुत्ते को खिलाएं।

9॰ घर में कोई बीमार हो जाए तो उस रोगी को शहद में चन्दन मिला कर चटाएं।

10॰ पुत्र बीमार हो तो कन्याओं को हलवा खिलाएं। पीपल के पेड़ की लकड़ी सिरहाने रखें।

11॰ पत्नी बीमार हो तो गोदान करें। जिस घर में स्त्रीवर्ग को निरन्तर स्वास्थ्य की पीड़ाएँ रहती हो, उस घर में तुलसी का पौधा लगाकर उसकी श्रद्धापूर्वक देखशल करने से रोग पीड़ाएँ समाप्त होती है।

12॰ मंदिर में गुप्त दान करें।

13॰ रविवार के दिन बूंदी के सवा किलो लड्डू मंदिर में प्रसाद के रूप में बांटे।

14॰ सदैव पूर्व या दक्षिण दिषा की ओर सिर रख कर ही सोना चाहिए। दक्षिण दिशा की ओर सिर कर के सोने वाले व्यक्ति में चुम्बकीय बल रेखाएं पैर से सिर की ओर जाती हैं, जो अधिक से अधिक रक्त खींच कर सिर की ओर लायेंगी, जिससे व्यक्ति विभिन्न रोंगो से मुक्त रहता है और अच्छी निद्रा प्राप्त करता है।

15॰ अगर परिवार में कोई परिवार में कोई व्यक्ति बीमार है तथा लगातार औषधि सेवन के पश्चात् भी स्वास्थ्य लाभ नहीं हो रहा है, तो किसी भी रविवार से आरम्भ करके लगातार 3 दिन तक गेहूं के आटे का पेड़ा तथा एक लोटा पानी व्यक्ति के सिर के ऊपर से उबार कर जल को पौधे में डाल दें तथा पेड़ा गाय को खिला दें। अवश्य ही इन 3 दिनों के अन्दर व्यक्ति स्वस्थ महसूस करने लगेगा। अगर टोटके की अवधि में रोगी ठीक हो जाता है, तो भी प्रयोग को पूरा करना है, बीच में रोकना नहीं चाहिए।

16॰ अमावस्या को प्रात: मेंहदी का दीपक पानी मिला कर बनाएं। तेल का चौमुंहा दीपक बना कर 7 उड़द के दाने, कुछ सिन्दूर, 2 बूंद दही डाल कर 1 नींबू की दो फांकें शिवजी या भैरों जी के चित्र का पूजन कर, जला दें। महामृत्युजंय मंत्र की एक माला या बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ कर रोग-शोक दूर करने की भगवान से प्रार्थना कर, घर के दक्षिण की ओर दूर सूखे कुएं में नींबू सहित डाल दें। पीछे मुड़कर नहीं देखें। उस दिन एक ब्राह्मण -ब्राह्मणी को भोजन करा कर वस्त्रादि का दान भी कर दें। कुछ दिन तक पक्षियों, पशुओं और रोगियों की सेवा तथा दान-पुण्य भी करते रहें। इससे घर की बीमारी, भूत बाधा, मानसिक अशांति निश्चय ही दूर होती है।

17॰ किसी पुरानी मूर्ति के ऊपर घास उगी हो तो शनिवार को मूर्ति का पूजन करके, प्रात: उसे घर ले आएं। उसे छाया में सुखा लें। जिस कमरे में रोगी सोता हो, उसमें इस घास में कुछ धूप मिला कर किसी भगवान के चित्र के आगे अग्नि पर सांय, धूप की तरह जलाएं और मन्त्र विधि से ´´ ॐ माधवाय नम:। ॐ अनंताय नम:। ॐ अच्युताय नम:।´´ मन्त्र की एक माला का जाप करें। कुछ दिन में रोगी स्वस्थ हो जायेगा। दान-धर्म और दवा उपयोग अवश्य करें। इससे दवा का प्रभाव बढ़ जायेगा।

18॰ अगर बीमार व्यक्ति ज्यादा गम्भीर हो, तो जौ का 125 पाव (सवा पाव) आटा लें। उसमें साबुत काले तिल मिला कर रोटी बनाएं। अच्छी तरह सेंके, जिससे वे कच्ची न रहें। फिर उस पर थोड़ा सा तिल्ली का तेल और गुड़ डाल कर पेड़ा बनाएं और एक तरफ लगा दें। फिर उस रोटी को बीमार व्यक्ति के ऊपर से 7 बार वार कर किसी भैंसे को खिला दें। पीछे मुड़ कर न देखें और न कोई आवाज लगाए। भैंसा कहाँ मिलेगा, इसका पता पहले ही मालूम कर के रखें। भैंस को रोटी नहीं खिलानी है, केवल भैंसे को ही श्रेष्ठ रहती है। शनि और मंगलवार को ही यह कार्य करें।

19॰ पीपल के वृक्ष को प्रात: 12 बजे के पहले, जल में थोड़ा दूध मिला कर सींचें और शाम को तेल का दीपक और अगरबत्ती जलाएं। ऐसा किसी भी वार से शुरू करके 7 दिन तक करें। बीमार व्यक्ति को आराम मिलना प्रारम्भ हो जायेगा।

20॰ किसी कब्र या दरगाह पर सूर्यास्त के पश्चात् तेल का दीपक जलाएं। अगरबत्ती जलाएं और बताशे रखें, फिर वापस मुड़ कर न देखें। बीमार व्यक्ति शीघ्र अच्छा हो जायेगा।

21॰ किसी तालाब, कूप या समुद्र में जहां मछलियाँ हों, उनको शुक्रवार से शुक्रवार तक आटे की गोलियां, शक्कर मिला कर, चुगावें। प्रतिदिन लगभग 125 ग्राम गोलियां होनी चाहिए। रोगी ठीक होता चला जायेगा।

22॰ शुक्रवार रात को मुठ्ठी भर काले साबुत चने भिगोयें। शनिवार की शाम काले कपड़े में उन्हें बांधे तथा एक कील और एक काले कोयले का टुकड़ा रखें। इस पोटली को किसी तालाब या कुएं में फेंक दें। फेंकने से पहले रोगी के ऊपर से 7 बार वार दें। ऐसा 3 शनिवार करें। बीमार व्यक्ति शीघ्र अच्छा हो जायेगा।

23॰ सवा सेर (1॰25 सेर) गुलगुले बाजार से खरीदें। उनको रोगी पर से 7 बार वार कर चीलों को खिलाएं। अगर चीलें सारे गुलगुले, या आधे से ज्यादा खा लें तो रोगी ठीक हो जायेगा। यह कार्य शनि या मंगलवार को ही शाम को 4 और 6 के मध्य में करें। गुलगुले ले जाने वाले व्यक्ति को कोई टोके नहीं और न ही वह पीछे मुड़ कर देखे।

24॰ यदि लगे कि शरीर में कष्ट समाप्त नहीं हो रहा है, तो थोड़ा सा गंगाजल नहाने वाली बाल्टी में डाल कर नहाएं।

25॰ प्रतिदिन या शनिवार को खेजड़ी की पूजा कर उसे सींचने से रोगी को दवा लगनी शुरू हो जाती है और उसे धीरे-धीरे आराम मिलना प्रारम्भ हो जायेगा। यदि प्रतिदिन सींचें तो 1 माह तक और केवल शनिवार को सींचें तो 7 शनिवार तक यह कार्य करें। खेजड़ी के नीचे गूगल का धूप और तेल का दीपक जलाएं।

26॰ हर मंगल और शनिवार को रोगी के ऊपर से इमरती को 7 बार वार कर कुत्तों को खिलाने से धीरे-धीरे आराम मिलता है। यह कार्य कम से कम 7 सप्ताह करना चाहिये। बीच में रूकावट न हो, अन्यथा वापस शुरू करना होगा।

27॰ साबुत मसूर, काले उड़द, मूंग और ज्वार चारों बराबर-बराबर ले कर साफ कर के मिला दें। कुल वजन 1 किलो हो। इसको रोगी के ऊपर से 7 बार वार कर उनको एक साथ पकाएं। जब चारों अनाज पूरी तरह पक जाएं, तब उसमें तेल-गुड़ मिला कर, किसी मिट्टी के दीये में डाल कर दोपहर को, किसी चौराहे पर रख दें। उसके साथ मिट्टी का दीया तेल से भर कर जलाएं, अगरबत्ती जलाएं। फिर पानी से उसके चारों ओर घेरा बना दें। पीछे मुड़ कर न देखें। घर आकर पांव धो लें। रोगी ठीक होना शुरू हो जायेगा।

28॰ गाय के गोबर का कण्डा और जली हुई लकड़ी की राख को पानी में गूंद कर एक गोला बनाएं। इसमें एक कील तथा एक सिक्का भी खोंस दें। इसके ऊपर रोली और काजल से 7 निशान लगाएं। इस गोले को एक उपले पर रख कर रोगी के ऊपर से 3 बार उतार कर सुर्यास्त के समय मौन रह कर चौराहे पर रखें। पीछे मुड़ कर न देखें।

29॰ शनिवार के दिन दोपहर को 2॰25 (सवा दो) किलो बाजरे का दलिया पकाएं और उसमें थोड़ा सा गुड़ मिला कर एक मिट्टी की हांडी में रखें। सूर्यास्त के समय उस हांडी को रोगी के शरीर पर बायें से दांये 7 बार फिराएं और चौराहे पर मौन रह कर रख आएं। आते-जाते समय पीछे मुड़ कर न देखें और न ही किसी से बातें करें।

30॰ धान कूटने वाला मूसल और झाडू रोगी के ऊपर से उतार कर उसके सिरहाने रखें।

31॰ सरसों के तेल को गरम कर इसमें एक चमड़े का टुकड़ा डालें, पुन: गर्म कर इसमें नींबू, फिटकरी, कील और काली कांच की चूड़ी डाल कर मिट्टी के बर्तन में रख कर, रोगी के सिर पर फिराएं। इस बर्तन को जंगल में एकांत में गाड़ दें।

32॰ घर से बीमारी जाने का नाम न ले रही हो, किसी का रोग शांत नहीं हो रहा हो तो एक गोमती चक्र ले कर उसे हांडी में पिरो कर रोगी के पलंग के पाये पर बांधने से आश्चर्यजनक परिणाम मिलता है। उस दिन से रोग समाप्त होना शुरू हो जाता है।

33॰ यदि पर्याप्त उपचार करने पर भी रोग-पीड़ा शांत नहीं हो रही हो अथवा बार-बार एक ही रोग प्रकट होकर पीड़ित कर रहा हो तथा उपचार करने पर भी शांत हो जाता हो, ऐसे व्यक्ति को अपने वजन के बराबर गेहू¡ का दान रविवार के दिन करना

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>जन्म-समय का आप पर प्रभाव—

>जन्म-समय का आप पर प्रभाव—-

जन्म-समय सुबह 4 से 6 बजे—
आपका सूर्य पहले घर में मौजूद है। यह आपको अच्छा स्वास्थ्य और आत्मविश्वास दे रहा है। आप किसी भी बात को लेकर दृढ़ संकल्पित रहते हैं और आपका भविष्य अच्छा है।

जन्म समय सुबह 6 से 8 बजे–आपका सूर्य 12वें घर में है, यह आपकी जिंदगी में ऐसे रहस्यपूर्ण बदलाव लाएगा जिसकी व्याख्या करना मुश्किल है। सख्त दिनचर्या अपनाएं और अपने दिमाग को शांत बनाए रखें। आय के मुकाबले खर्च अधिक हो सकते हैं।

जन्म समय सुबह 8 से 10 बजेआपका सूर्य 11वें घर में है। इसके मायने हैं कि आपके ढेर सारे दोस्त होंगे, सामाजिक संबंध बनाने के लिए आपको पैसों की जरूरत होगी। ज्यादातर समय शुभचिंतकों और दोस्तों से हाल-चाल जानने में ही बीतेगा। आपको लगेगा कि आप जितने के हकदार हैं, उससे कहीं अधिक हासिल कर रहे हैं।

जन्म समय सुबह 10 से 12 बजे–आपका सूर्य 10वें घर में मौजूद है। पश्चिमी और भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह सूर्य का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। आप अपने प्रोजेक्ट्स और प्लान्स को सफलतापूर्वक पूरा करेंगे। आप सर्वश्रेष्ठ साबित होंगे। शक्ति का दुरुपयोग आपको परेशानी में डाल सकता है।

जन्म समय दोपहर 12 से 2 बजे–आपका सूर्य 9वें घर में है। यह स्थिति आपके यात्रा से भरी जिंदगी जीने, दार्शनिक, धार्मिक, तेज दिमाग, परोपकारी स्वभाव और प्रसिद्ध होने की ओर संकेत करती है। 9वां घर अच्छे भविष्य का है और आप भाग्य को अपने ऊपर मुस्कुराता महसूस कर सकते हैं। आपका स्वभाव परोपकार और दयालुता से भरा है।

जन्म समय दोपहर 2 से शाम 4 बजे–आपका सूर्य आठवें घर में है जो कि मुद्रा संबंधी मामलों जैसे ऋण, ट्रस्ट, सार्वजनिक फंड, बैंक आदि में खास दखल होने का संकेतक है। कई ज्योतिषी इसे सेक्स और दुर्घटनाओं से भी जोड़कर देखते हैं। कानूनी मसलों का सामना करना पड़ सकता है।

जन्म समय शाम 4 से 6 बजे–आपका सूर्य सातवें घर में है, जिसे सामान्यत: साझेदारियों का घर कहा जाता है। शादी आपको दूसरे लोगों के मुकाबले अधिक प्रभावित करेगी। इसलिए इसे सफल बनाने का प्रयास करें, भले ही इसके लिए आपको कठिन मेहनत क्यों न करनी पड़े। ऐसे पेशे या व्यवसाय को चुनें जो आपको लोगों से सीधे संपर्क करने की आजादी देता हो। चूंकि सातवां घर आपके दुश्मनों का भी है, ऐसे में कानूनी दिक्कत आ सकती हैं।

जन्म समय शाम 6 से रात्रि 8 बजे—आपका सूर्य छठवें घर में है, इसका मतलब यह है कि आपकी जिंदगी का बहुत कुछ साथियों और अधीनस्थों से आपको मिलने वाले सहयोग पर निर्भर करेगा। यह समाजसेवा की ओर भी संकेत करता है और आपको लोगों के स्वास्थ्य पर ध्यान देना होगा। अत्यधिक सतर्कता और परिश्रमी होने की आपकी आदत आपको लंबे समय तक कामयाबी और सम्मान दिलाएगी।

जन्म समय रात्रि 8 से 10 बजे—आपका सूर्य पांचवें घर में मौजूद है जो आपको कलाकार वाली क्षमता और कौशल देगा। यह आपको जिंदगी के प्रति आशावादी नजरिया और मौके तलाशने की इच्छाशक्ति देगा। आपकी रुचि व्यवसाय में तब्दील हो सकती है। आप स्टेज और वास्तविक जिंदगी, दोनों में अभिनय करने वाले महान प्रेमी साबित हो सकते हैं, लेकिन इसके अतिरेक से बचें।

जन्म समय रात्रि 10 से 12 बजे–आपका सूर्य चौथे घर में है जो घर और संपत्ति के लिहाज से बेहतरीन स्थान है। आप जमीन, रियल एस्टेट से लाभ अर्जित कर सकते हैं। आपके अभिभावक आपकी जिंदगी को बनाने या बिगाड़ने में उल्लेखनीय भूमिका निभा सकते हैं।
जन्म समय रात्रि 12 से 2 बजे—आपका सूर्य तीसरे घर में मौजूद है जो आपकी बौद्धिक क्षमता, यात्रा करने की चाहत और उच्च स्तर के रोमांच को दर्शाता है। आप पत्रकारिता या टीवी जर्नलिज्म से जुड़ सकते हैं। आपके भाई-बहन और पड़ोसी या तो आपको बना देंगे या बिगाड़ देंगे, लेकिन यह निश्चित है कि इनका आपके जीवन पर गहरा प्रभाव रहेगा। सूर्य की स्थिति आपको बेहतरीन सामाजिक जीवन देगी।

जन्म समय रात्रि 2 से तड़के 4 बजे—आपका सूर्य दूसरे घर में है। यह वित्त और परिवार का घर है। इसका मतलब है कि आप पैसे बनाने में कामयाब होंगे, भले ही आप इसे संभाल न पाएं। भारतीय ज्योतिष में दूसरे घर को वाककला और भोजन का घर माना जाता है। आप एक महान वक्ता हो सकते हैं, आपके पास पैसा भी होगा।

>बढ़ाएं अपना व्यवसाय ज्योतिष उपाय—-

व्यवसाय में उन्नति के लिए यहां कुछ विशिष्ट उपायों का विवरण दिया जा रहा है, जो अलग-अलग राशियों से संबंधित हैं। लोग अपने व्यापार वृद्धिकरण उपाय नवरात्र जैसे शुभ पर्व पर करके लाभ प्राप्त कर सकते हैं। जो किसी कारण नवरात्र पर न कर पाएं वे रामनवमी, हनुमान जयंती व अक्षय तृतीया पर उपाय कर लाभान्वित हो सकते हैं।

मेष- प्रथम नवरात्र को व्यवसाय स्थल पर कांच या मिट्टी के पात्र में जल भरकर रखें। लोहे, स्टील या अन्य धातु, वॉटर कूलर, जग में पीने का पानी भरकर नहीं रखना चाहिए। मीठा खाकर जल पीकर प्रस्थान करना शुभकारी है। कांच के बर्तन में थोड़ा पानी डालकर पांच सफेद फूल रखें। पानी बदलते रहें।

वृष- कार्यस्थल पर चमकीले एवं हल्के रंगों का प्रयोग कर साज-सज्जा करें। कार्यस्थल पर नवरात्र के किसी भी दिन एक दर्पण ऐसी दीवार पर लगाना चाहिए जो कि बाहर से दिखाई न दे, परंतु प्रवेश करते ही उस दर्पण पर दृष्टि पड़े। दरवाजे के सामने के बजाए किसी कोने में बैठने का स्थान होना चाहिए।

मिथुन- नवरात्र के दूसरे दिन हरे पत्तों सहित फूल लाकर अपनी दुकान या संस्था के ऑफिस में रखें। कार्यालय में आवाज करने वाला कोई भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण न रखें। उत्तर या पूर्व की दीवार पर डॉल्फिन या पेंडुलम घड़ी अवश्य लगाएं। नवरात्र में दुकान या संस्थान के बाहर पांच हरे पौधे लगाएं।

कर्क- किसी पवित्र नदी या सरोवर का जल कांच के पात्र में भरकर नवरात्र के किसी भी दिन दुकान के पूजाघर में रखना चाहिए। कार्यसिद्धि यंत्र नवरात्र में अपने पूजा घर में रख प्रतिदिन दर्शन करें। पूर्णिमा को अपनी दुकान के प्रवेश द्वार के दोनों ओर कुछ गंगाजल अवश्य छिड़कें।

सिंह- दुकान में इस प्रकार बैठना चाहिए कि बाहर से व्यक्ति का मुंह दिखाई न पड़े। नवरात्र में अष्टमी के दिन मिट्टी का शेर मंदिर में चढ़ाना चाहिए। लोहे या किसी भी धातु के फर्नीचर का प्रयोग बहुत कम करना चाहिए। प्रवेश द्वार पर रोली से जय मां दुर्गे अंकित करें। दुकान में प्रतिदिन भोग लगाएं ।

कन्या- प्रथम नवरात्र को मां दुर्गा का चित्र अपने दुकान या संस्थान के मंदिर में लगाएं। व्यापार शुरू करने से पहले पूरे नवरात्र दुर्गा चालीसा का पाठ करें। लकड़ी का फर्नीचर प्रयोग में लाएं। दूसरे नवरात्र को व्यवसाय स्थल के सम्मुख गाय को हरा चारा या पालक खिलाएं। अष्टमी को कन्या भोज करा उनका आशीर्वाद लें और हलवा-पूड़ी दक्षिणा में दें।

तुला- संस्थान के मध्य भाग में बैठना चाहिए। सात श्रीफल लाल वस्त्र में बांधकर कार्यस्थल की अलमारी में अष्टमी को रख दें। उस अलमारी में अन्य सामान नहीं होना चाहिए। शुक्रवार के दिन से शुरू कर सुगंधित पुष्प लाकर पूजा घर में चढ़ाने चाहिए। मां दुर्गा के दर्शन कर फिर दुकान खोलें। दुकान में सजावट व स्वच्छता का बहुत ध्यान रखें।

वृश्चिक- नवरात्र के प्रथम दिन मुख्य द्वार के दोनों ओर सिंदूर से स्वस्तिक बनाएं। दुकान के मंदिर में प्रथम मंगलवार, शनिवार को लाल पुष्प चढ़ाएं। नवरात्र के पहले दिन कार्यस्थल पर आते समय किसी पूज्य व्यक्ति के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेकर आएं। प्रत्येक मंगलवार गंगाजल लेकर दुकान के सभी कोनों में फूल द्वारा छिड़कें।

धनु- कोष स्थान पर सफेद चंदन की लकड़ी हल्के गुलाबी रंग के कपड़े में लपेटकर रखंे। तीसरे नवरात्र पर दुकान के मंदिर में गाय के दूध से बने घी में छोटी इलायची डालकर दीपक जलाएं। पीठ पीछे पूजा घर न बनाएं। मुख्य द्वार के सामने न बैठें। गुरुवार के दिन पीले फूल मंदिर में चढ़ाएं। गाय को रोटी-गुड़ खिलाएं। धनदा यंत्र व्यापार स्थल पर नवरात्र में स्थापित करें।

मकर- नवरात्र के शनिवार से शुरू करें। उस दिन दुकान पर आए हुए भिखारी को एक मुट्ठी काला तिल दें। घोड़े की नाल मुख्य द्वार पर शाम के समय पीपल वृक्ष को छुआकर लगाएं। व्यापार बहुत मंदा हो गया हो तो नवरात्र में पड़ने वाले शनिवार को मिट्टी के घड़े पर ढक्कन लगाकर, टेप से बंद कर दुकान में रख दें। बुधवार प्रात: काल उसे बहते जल में बगैर ढक्कन खोले प्रवाहित कर दें।

कुंभ- कार्यस्थल में इस प्रकार बैठें कि आगे का स्थान खुला हो। कोई कोना या बंद दरवाजा न हो। नवरात्र में पड़ने वाले शनिवार को मिट्टी के कुल्हड़ में मिट्टी का ढक्कन रखें। उस ढक्कन में 250 ग्राम काले तिल रखें तथा अगले दिन वह कुल्हड़ तिल सहित किसी को दान कर दें या पीपल पर रख आएं। सजावट में लाल व सफेद रंग का प्रयोग न करें। शनिवार को दुकान पर आए भिखारी को खाली हाथ न लौटाएं।

मीन- पहली नवरात्र को कार्यस्थल जाने से पूर्व पूज्य व्यक्ति के चरण स्पर्श व कार्यसिद्धि यंत्र के दर्शन कर घर से निकलना चाहिए। नवरात्र के गुरुवार को पीला फल लाकर कार्यस्थल के पूजाघर में रखें, दूसरे दिन उसे किसी भिखारी को दान दें। गुरुवार के दिन कार्यस्थल पर आए हुए साधु को दान अवश्य दें। सफेद चंदन को पीले वस्त्र में बांधकर नवरात्र की नवमी को दुकान की तिजोरी में रखें। बुधवार को पीला पपीता खिलाएं। पहली नवरात्र को सफेद कपड़े का झंडा बनाकर पीपल के वृक्ष पर लगाएं, फिर प्रतिदिन जल चढ़ाएं।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>काल सर्प दोष और निवारण—-

>काल सर्प दोष और निवारण—-

कालसर्प के बारे में बहुत सी भ्रांतियां सुनने को मिलती हैं.कालसर्प योग के बारे में पूरी तरह जानने के लिए इसका विस्तृत अध्ययन बहुत जरुरी है .कालसर्प के बारे में कुछ विद्वानों का मत है कि यह दोष अशुभ फलदायी होता है, जबकि कुछ विद्वान इस दोष को शास्त्र-सम्मत नहीं मानते.क्योंकि संसार के अनेक विद्वान, प्रतिष्ठित एवं राजनेताओं की जन्म कुंडली में यह दोष मौजूद है. उन्होंने इस दोष के होते हुए भी जीवन में कभी अभाव का अनुभव नहीं किया, बल्कि अपने-अपने कार्य क्षेत्र में अपनी प्रतिभा के दम पर सफलता और यश अर्जित किया.इसलिए मात्रा कालसर्प योग सुनकर भयभीत हो जाने की जरूरत नहीं बल्कि उसका ज्योतिषीय विश्लेषण करवाकर उसके प्रभावों की विस्तृत जानकारी हासिल कर लेना ही बुध्दिमत्ता कही जायेगी. जब असली कारण ज्योतिषीय विश्लेषण से स्पष्ट हो जाये तो तत्काल उसका उपाय करना चाहिए.

प्रत्येक मनुष्य कोई न कोई परेशानी से गुजरता है . कालसर्प दोष एक ऐसा नाम है जिससे आज का आम व्यक्ति अच्छी तरह से परिचित है. कुछ लोगों का तो ये हाल है कि जन्म कुंडली देखते ही चौंक पडते है और कह उठते है की तुम्हारी कुंडली में तो कालसर्प-दोष है क्या तुमने इसका कोई उपाय किया या नहीं. अगर सामने वाला व्यक्ति ये कहें कि मुझे तो इसके बारे में कुछ भी नहीं मालुम, मुझे आज तक किसी ने कुछ नहीं बताया या फिर मुझे मालुम तो था किन्तु मैने अभी तक कोई उपाय नहीं किया हैं। इतना सुनते ही कालसर्प-दोष को बताने वाला व्यक्ति सामने वाले व्यक्ति को कालसर्प-दोष के बारे में पूरा भाषण दे डालता है और फिर अनेको उपाय बताने लगता है.

कालसर्प दोष निवारण हेतु कुछ साधारण से उपाय भी हैं जिनसे इस दोष का निवारण किया जा सकता है. यदि पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका में क्लेश हो रहा हो, आपसी प्रेम की कमी हो रही हो तो भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या बालकृष्ण की ‍मूर्ति जिसके सिर पर मोरपंखी मुकुट धारण हो घर में स्थापित करें एवं प्रति‍दिन उनका पूजन करें एवं ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय अथवा ऊँ नमो वासुदेवाय कृष्णाय या ॐ नम: शिवाय का यथाशक्ति जाप करे. कालसर्प योग की शांति होगी। यदि कुंडली में कालसर्प दोष है तो नित्य प्रति भगवान शिव के परिवार का पूजन करें. आपके हर काम होते चले जाएँगे.यदि रोजगार में तकलीफ आ रही है अथवा रोजगार प्राप्त नहीं हो रहा है तो पलाश के फूल गोमूत्र में डूबाकर उसको बारीक करें. फिर छाँव में रखकर सुखाएँ. उसका चूर्ण बनाकर चंदन के पावडर में मिलाकर शिवलिंग पर त्रिपुण्ड बनाए.21 दिन या 25 दिन में नौकरी अवश्य मिलेग‍ी. शिवलिंग पर प्रतिदिन मीठा दूध में थोड़ी भाँग डाल दें, फिर इसे शिवलिंग पर चढ़ाएँ इससे गुस्सा शांत होता है, साथ ही सफलता तेजी से मिलने लगती है.यदि शत्रु से भय है तो चाँदी के अथवा ताँबे के सर्प बनाकर उनकी आँखों में सुरमा लगा दें, फिर किसी भी शिवलिंग पर चढ़ा दें, भय दूर होगा व शत्रु का नाश होगा, नारियल के गोले में सप्त धान्य(सात प्रकार का अनाज), गुड़, उड़द की दाल एवं सरसों भर लें व बहते पानी में बहा दें अथवा गंदे पानी में (नाले में) बहा दें, आपका चिड़चिड़ापन दूर होगा। यह प्रयोग राहूकाल में करें. कालसर्प योग वाले श्रावण मास में प्रतिदिन रूद्र-अभिषेक कराए एवं महामृत्युंजय मंत्र की एक माला रोज करें. जीवन में सुख शांति अवश्य आएगी और रूके काम होने लगेंगे.साथ ही साथ शुभ मुहूर्त में बहते पानी में कच्चा कोयला तीन बार प्रवाहित करें.हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें तथा भोजनालय (घर की रसोई )में बैठकर भोजन करें.साथ ही तांबे का बना सर्प विधिवत पूजन के उपरांत शिवलिंग पर समर्पित करें. इससे अनुकूल प्रभाव पड़ेगा और कालसर्प दोष का निवारण होगा.

>शनि, राहु और केतु : दोस्त या दुश्मन—?????

शनि के अनुचर हैं राहु और केतु। शरीर में इनके स्थान नियु‍क्त हैं। सिर राहु है तो केतु धड़। यदि आपके गले सहित ऊपर सिर तक किसी भी प्रकार की गंदगी या खार जमा है तो राहु का प्रकोप आपके ऊपर मँडरा रहा है और यदि फेफड़ें, पेट और पैर में किसी भी प्रकार का विकार है तो आप केतु के शिकार हैं।

राहु और केतु की भूमिका एक पुलिस अधिकारी की तरह है जो न्यायाधीश शनि के आदेश पर कार्य करते हैं। ‍शनि का रंग नीला, राहु का काला और केतु का सफेद माना जाता है। शनि के देवता भैरवजी हैं, राहु की सरस्वतीजी और केतु के देवता भगवान गणेशजी है।

शनि का पशु भैंसा, राहु का हाथी और काँटेदार जंगली चूहा तथा केतु का कुत्ता, गधा, सुअर और छिपकली है। शनि का वृक्ष कीकर, आँक व खजूर का वृक्ष, राहु का नारियल का पेड़ व कुत्ता घास और केतु का इमली का दरख्त, तिल के पौधे व केला है। शनि शरीर के दृष्टि, बाल, भवें, हड्डी और कनपटी वाले हिस्से पर, राहु सिर और ठोड़ी पर और केतु कान, रीढ़, घुटने, लिंग और जोड़ पर प्रभाव डालता है।

राहु की मार : यदि व्यक्ति अपने शरीर के अंदर किसी भी प्रकार की गंदगी पाले रखता है तो उसके ऊपर काली छाया मंडराने लगती है अर्थात राहु के फेर में व्यक्ति के साथ अचानक होने वाली घटनाएँ बढ़ जाती है। घटना-दुर्घटनाएँ, होनी-अनहोनी और कल्पना-विचार की जगह भय और कुविचार जगह बना लेते हैं।

राहु के फेर में आया व्यक्ति बेईमान या धोखेबाज होगा। राहु ऐसे व्यक्ति की तरक्की रोक देता है। राहु का खराब होना अर्थात् दिमाग की खराबियाँ होंगी, व्यर्थ के दुश्मन पैदा होंगे, सिर में चोट लग सकती है। व्यक्ति मद्यपान या संभोग में ज्यादा रत रह सकता है। राहु के खराब होने से गुरु भी साथ छोड़ देता है।

राहु के अच्छा होने से व्यक्ति में श्रेष्ठ साहित्यकार, दार्शनिक, वैज्ञानिक या फिर रहस्यमय विद्याओं के गुणों का विकास होता है। इसका दूसरा पक्ष यह कि इसके अच्छे होने से राजयोग भी फलित हो सकता है। आमतौर पर पुलिस या प्रशासन में इसके लोग ज्यादा होते हैं।

केतु की मार : जो व्यक्ति जुबान और दिल से गंदा है और रात होते ही जो रंग बदल देता है वह केतु का शिकार बन जाता है। यदि व्यक्ति किसी के साथ धोखा, फरेब, अत्याचार करता है तो केतु उसके पैरों से ऊपर चढ़ने लगता है और ऐसे व्यक्ति के जीवन की सारी गतिविधियाँ रुकने लगती है। नौकरी, धंधा, खाना और पीना सभी बंद होने लगता है। ऐसा व्यक्ति सड़क पर या जेल में सोता है घर पर नहीं। उसकी रात की नींद हराम रहती है, लेकिन दिन में सोकर वह सभी जीवन समर्थक कार्यों से दूर होता जाता है।

केतु के खराब होने से व्यक्ति पेशाब की बीमारी, जोड़ों का दर्द, सन्तान उत्पति में रुकावट और गृहकलह से ग्रस्त रहता है। केतु के अच्छा होने से व्यक्ति पद, प्रतिष्ठा और संतानों का सुख उठाता है और रात की नींद चैन से सोता है।

शनि की मार : पराई स्त्री के साथ रहना, शराब पीना, माँस खाना, झूठ बोलना, धर्म की बुराई करना या मजाक उड़ाना, पिता व पूर्वजों का अपमान करना और ब्याज का धंधा करना प्रमुख रूप से यह सात कार्य शनि को पसंद नहीं। उक्त में से जो व्यक्ति कोई-सा भी कार्य करता है शनि उसके कार्यकाल में उसके जीवन से शांति, सुख और समृद्धि छिन लेता है। व्यक्ति बुराइयों के रास्ते पर चलकर खुद बर्बाद हो जाता है। शनि उस सर्प की तरह है जिसके काटने पर व्यक्ति की मृत्यु तय है।

शनि के अशुभ प्रभाव के कारण मकान या मकान का हिस्सा गिर जाता है या क्षतिग्रस्त हो जाता है, नहीं तो कर्ज या लड़ाई-झगड़े के कारण मकान बिक जाता है। अंगों के बाल तेजी से झड़ जाते हैं। अचानक आग लग सकती है। धन, संपत्ति का किसी भी तरह नाश होता है। समय पूर्व दाँत और आँख की कमजोरी।

शनि की स्थिति यदि शुभ है तो व्यक्ति हर क्षेत्र में प्रगति करता है। उसके जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता। बाल और नाखून मजबूत होते हैं। ऐसा व्यक्ति न्यायप्रीय होता है और समाज में मान-सम्मान खूब रहता हैं।

बचाव का तरीका : शनि के उपाय- सर्वप्रथम भैरवजी के मंदिर जाकर उनसे अपने पापों की क्षमा माँगे। जुआ, सट्टा, शराब, वैश्या से संपर्क, धर्म की बुराई, पिता-पूर्वजों का अपमान और ब्याज आदि कार्यों से दूर रहें। शरीर के सभी छिद्रों को प्रतिदिन अच्छे से साफ रखें। दाँत, बाल और नाखूनों की सफाई रखें।

कौवे को प्रतिदिन रोटी खिलाएँ। छायादान करें, अर्थात कटोरी में थोड़ा-सा सरसो का तेल लेकर अपना चेहरा देखकर शनि मंदिर में रख आएँ। अंधे, अपंगों, सेवकों और सफाईकर्मियों से अच्छा व्यवहार रखें। रात को सिरहाने पानी रखें और उसे सुबह कीकर, आँक या खजूर के वृक्ष पर चढ़ा आएँ।

राहु के उपाय- सिर पर चोटी रख सकते हैं, लेकिन किसी लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर। भोजन भोजनकक्ष में ही करें। ससुराल पक्ष से अच्छे संबंध रखें। रात को सिरहाने मूली रखें और उसे सुबह किसी मंदिर में दान कर दें।

केतु के उपाय- संतानें केतु हैं। इसलिए संतानों से संबंध अच्छे रखें। भगवान गणेश की आराधना करें। दोरंगी कुत्ते को रोटी खिलाएँ। कान छिदवाएँ। कुत्ता भी पाल सकते हैं, लेकिन किसी लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>शाबर-मन्त्र-अनुभूत-प्रयोग—

>शाबर-मन्त्र-अनुभूत-प्रयोग—-

१॰ हनुमान रक्षा-शाबर मन्त्र—–
“ॐ गर्जन्तां घोरन्तां, इतनी छिन कहाँ लगाई ? साँझ क वेला, लौंग-सुपारी-पान-फूल-इलायची-धूप-दीप-रोट॒लँगोट-फल-फलाहार मो पै माँगै। अञ्जनी-पुत्र प्रताप-रक्षा-कारण वेगि चलो। लोहे की गदा कील, चं चं गटका चक कील, बावन भैरो कील, मरी कील, मसान कील, प्रेत-ब्रह्म-राक्षस कील, दानव कील, नाग कील, साढ़ बारह ताप कील, तिजारी कील, छल कील, छिद कील, डाकनी कील, साकनी कील, दुष्ट कील, मुष्ट कील, तन कील, काल-भैरो कील, मन्त्र कील, कामरु देश के दोनों दरवाजा कील, बावन वीर कील, चौंसठ जोगिनी कील, मारते क हाथ कील, देखते क नयन कील, बोलते क जिह्वा कील, स्वर्ग कील, पाताल कील, पृथ्वी कील, तारा कील, कील बे कील, नहीं तो अञ्जनी माई की दोहाई फिरती रहे। जो करै वज्र की घात, उलटे वज्र उसी पै परै। छात फार के मरै। ॐ खं-खं-खं जं-जं-जं वं-वं-वं रं-रं-रं लं-लं-लं टं-टं-टं मं-मं-मं। महा रुद्राय नमः। अञ्जनी-पुत्राय नमः। हनुमताय नमः। वायु-पुत्राय नमः। राम-दूताय नमः।”
विधिः- अत्यन्त लाभ-दायक अनुभूत मन्त्र है। १००० पाठ करने से सिद्ध होता है। अधिक कष्ट हो, तो हनुमानजी का फोटो टाँगकर, ध्यान लगाकर लाल फूल और गुग्गूल की आहुति दें। लाल लँगोट, फल, मिठाई, ५ लौंग, ५ इलायची, १ सुपारी चढ़ा कर पाठ करें।

२॰ गोरख शाबर गायत्री मन्त्र—
“ॐ गुरुजी, सत नमः आदेश। गुरुजी को आदेश। ॐकारे शिव-रुपी, मध्याह्ने हंस-रुपी, सन्ध्यायां साधु-रुपी। हंस, परमहंस दो अक्षर। गुरु तो गोरक्ष, काया तो गायत्री। ॐ ब्रह्म, सोऽहं शक्ति, शून्य माता, अवगत पिता, विहंगम जात, अभय पन्थ, सूक्ष्म-वेद, असंख्य शाखा, अनन्त प्रवर, निरञ्जन गोत्र, त्रिकुटी क्षेत्र, जुगति जोग, जल-स्वरुप रुद्र-वर्ण। सर्व-देव ध्यायते। आए श्री शम्भु-जति गुरु गोरखनाथ। ॐ सोऽहं तत्पुरुषाय विद्महे शिव गोरक्षाय धीमहि तन्नो गोरक्षः प्रचोदयात्। ॐ इतना गोरख-गायत्री-जाप सम्पूर्ण भया। गंगा गोदावरी त्र्यम्बक-क्षेत्र कोलाञ्चल अनुपान शिला पर सिद्धासन बैठ। नव-नाथ, चौरासी सिद्ध, अनन्त-कोटि-सिद्ध-मध्ये श्री शम्भु-जति गुरु गोरखनाथजी कथ पढ़, जप के सुनाया। सिद्धो गुरुवरो, आदेश-आदेश।।”
साधन-विधि एवं प्रयोगः—-
प्रतिदिन गोरखनाथ जी की प्रतिमा का पंचोपचार से पूजनकर २१, २७, ५१ या १०८ जप करें। नित्य जप से भगवान् गोरखनाथ की कृपा मिलती है, जिससे साधक और उसका परिवार सदा सुखी रहता है। बाधाएँ स्वतः दूर हो जाती है। सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है और अन्त में परम पद प्राप्त होता है।

३॰ दुर्गा शाबर मन्त्र—–
“ॐ ह्रीं श्रीं चामुण्डा सिंह-वाहिनी। बीस-हस्ती भगवती, रत्न-मण्डित सोनन की माल। उत्तर-पथ में आप बैठी, हाथ सिद्ध वाचा ऋद्धि-सिद्धि। धन-धान्य देहि देहि, कुरु कुरु स्वाहा।”
विधिः- उक्त मन्त्र का सवा लाख जप कर सिद्ध कर लें। फिर आवश्यकतानुसार श्रद्धा से एक माला जप करने से सभी कार्य सिद्ध होते हैं। लक्ष्मी प्राप्त होती है, नौकरी में उन्नति और व्यवसाय में वृद्धि होती है।

४॰ लक्ष्मी शाबर मन्त्र—-
“विष्णु-प्रिया लक्ष्मी, शिव-प्रिया सती से प्रकट हुई। कामाक्षा भगवती आदि-शक्ति, युगल मूर्ति अपार, दोनों की प्रीति अमर, जाने संसार। दुहाई कामाक्षा की। आय बढ़ा व्यय घटा। दया कर माई। ॐ नमः विष्णु-प्रियाय। ॐ नमः शिव-प्रियाय। ॐ नमः कामाक्षाय। ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं फट् स्वाहा।”
विधिः- धूप-दीप-नैवेद्य से पूजा कर सवा लक्ष जप करें। लक्ष्मी आगमन एवं चमत्कार प्रत्यक्ष दिखाई देगा। रुके कार्य होंगे। लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी।

>राहु का प्रभाव और उपाय
प्रथम भाव में राहु—-

प्रथम भाव में राहु सिंहासन पर बिराजमान राजा के समक्ष चिंघाड़ते हुए हाथी की तरह है। यह एक कुशल प्रशासक है। ४२ वर्ष बाद राहु का अनिष्ट प्रभाव दूर होता है।

अनिष्ट प्रभाव और कारण—

१. जातक को अपने जीवनसाथी के साथ अच्छा संबध हो।
२. दुश्मन उनसे डरते हैं।
३. वे अपना कार्य अच्छी तरह पूरा नहीं कर सकते, बारंबार नौकरी बदला करते हैं।
४. यदि सातवें भाव में शुक्र हो तो जातक के धनवान होने की संभावना है, परंतु उसकी पत्नी को सहन करना पड़ता है।

उपाय—-

१. गेहूँ, गुड़ और ताम्रपात्र का दान करना, तांबे के पात्र में गेहूँ तथा गुड़ भर कर रविवार बहते पानी में प्रवाहित कर दें।
२. ब्लू रंग के कपड़े न पहनें ।
३. गले में चाँदी की सिकड़ी पहनें ।
४. बहते जल में नारियल प्रवाहित करें।

दूसरे भाव में राहु—

यह राहु धन और परिवार के लिए प्रतिकूल है। किसी शस्त्र द्वारा व्यक्ति की मृत्यु होती है।

अनिष्ट प्रभाव और कारण—

१. धार्मिक संस्थाओं की तरफ से मिलनेवाली वस्तुओं पर उसका जीवन नीर्वाह होता है।
२. उसका पारिवारिक जीवन सुखी होता है। उसकी आर्थिक परिस्थिति का आधार कुंडली में गुरु के बैठने के स्थान पर आधारित है कि वह किस स्थान पर बैठा है।
३. वार्षिक कुंडली में यदि शनि प्रथम भाव में हो और गुरु अनुकूल हो तो सबकुछ सरलता से चलता है। परंतु शनि यदि नीच का हो तो उसका विपरीत प्रभाव पड़ता है।

उपाय—

१. चाँदी का एक छोटा सा ठोस गोला पास में रखें।
२. ससुराल से विद्युत उपकरण न स्वीकार करें।
३. माता के साथ अच्छा सम्बंध रखने से लाभ होगा।
४. सोने का ठोस गोला पास में रखें अथवा चाँदी की डिबिया में केसर रखने से लाभदायक रहेगा।

तीसरे भाव में राहु—

जातक समाज में अच्छा मान- सम्मानवाला होगा। बहुत जल्दी उसकी बराबरी में कोई खड़ा रहनेवाला नहीं होगा। वह स्वयं अच्छा होगा, परंतु अपने बाइयों के लिए बहुत लाभदायक साबित नहीं होता। उसके स्वप्न साकार होते हैं और जोरदार दूरदर्शिता रखता है। तलवार से भी अधिक उसकी कलम धारदार होती है। वह दीर्धजीवी और धनवान होता है।

अनिष्ट प्रभाव और कारण—-

१. बाईस वर्ष की आयु में उसका भाग्योदय होता है। उसके बालक सुखी और समृद्ध होते हैं।
२. जातक एक प्रबल लेखक होने की क्षमता रखता है।
३. चंद्र यदि नीच का हो तो जातक के लिए कष्टदायक परिस्थिति निर्मित होती है।
४. शुक्र यदि शुभ स्थान में बैठा हो तो ससुराल पक्ष में धन संपत्ति में वृद्धि होती हुई देखी जा सकती है।

उपाय—

१. शरीर पर चाँदी का कोई आभूषण पहनने की सलाह है।
२. ४०० ग्राम हरा धनिया बहते जल में प्रवाहित करें।
३. ४०० ग्राम बादाम बहते जल में प्रवाहित करें।

चौथे भाव में राहु—

यह स्थान चंद्र का है, जो राहु का दुश्मन है। इस भाव में यदि राहु शुभ हो तो जातक बुद्धिमान, श्रीमंत तथा शुभ कार्यों के पीछे धन खर्च करेगा। तीर्थयात्रा उसके लिए लाभदायक साबित होगी। यदि गुरु भी शुभ हो तो विवाह के बाद जातक का ससुराल पक्ष धनवान बनता है। यदि चंद्र उच्च का हो तो जातक अत्यंत समृद्धशाली बनता है और उसे पारा के साथ जुड़े किसी काम या व्यवसाय से लाभ होता है। यदि राहु अशुभ हो और चंद्र भी कमजोर हो तो पैसे के मामले में सहना पड़ता है। कोयला इकट्ठा करना, शौचालय मरम्मतकार्य, घर पर छप्पर बदलना और चून्हे बनाने जैसे कार्य उसके लिए अशुभ रहते हैं।

उपाय—-

१. चाँदी के आभूषण पहनें।
२. बहते जल में ४०० ग्राम हरा धनिया या बादाम अथवा दोनों जल में प्रवाहित करें।

पाँचवे भाव में राहु—

पाँचवाँ स्थान सूर्य का है और वह पुत्र संतान का सूचक है। यदि राहु शुभ हो तो जातक श्रीमंत, बुद्धिमान और तंदुरुस्त होता है। उसकी आय बहुत अच्छी होगी और प्रगति भी अच्छी करता है। ऐसे जातक चिंतक या दार्शनिक होते हैं। यदि राहु अशुभ हो तो स्त्री को गर्भवती होने की संभावना रहती है। पुत्र जन्म के पश्चात बारह वर्ष तक पत्नी की तबीयत खराब रहती है। यदि गुरु भी पाँचवाँ भाव हो तो जातक का पिता कठिनाई में पड़ता है।

उपाय—

१. चाँदी की हाथी साथ में रखें।
२. शराब, मांसाहार और व्यभिचार से दूर रहें।
३. पत्नी के साथ पुनः विवाह करें।

छठा भाव में राहु—

इस भाव में बुध अथवा केतु का प्रभाव पड़ता है। यहाँ राहु उच्च का बनता है और बहुत अच्छा परिणाम देता है। जातक कपड़ों के पीछे अधिक पैसे खर्च करता है। वह बुद्धिमान होते हैं और प्रतिस्पर्धियों पर विजय प्राप्त करता है। राहु यदि अशुभ हो तो जातक के भाई या मित्रों केलिए हानिकारक साबित होता है। बुध या मंगल जब बारहवें भाव में होता है तब राहु खराब फल देता है। जातक विविध बीमारियों से पीड़ित होता है और धन का व्यय होता है। किसी काम के लिए बाहर निकलते समय छींक आना अच्छे शकुन नहीं है।

उपाय—-

१. काला कुत्ता साथ में रखें।
२. जेब में शीशे की कील रखें।
३. किसी के भाई- बहन को नुकसान न पहुँचाएँ।

सातवें भाव में राहु—

जातक धनवान होगा, परंतु पत्नी की तबीयत अच्छी नहीं रहेगी। अपने दुश्मनों पर विजय प्राप्त करेगा। २१ वर्ष पहले यदि विवाह होगा तो अशुभ साबित होता है। जातक का सरकार के साथ अच्छे सम्बंध होने की संभावना है। परंतु यदि वह इलेक्ट्रीक उपकरण जैसे राहु के साथ जुड़े बिजनेस में पड़ेगा। तो नुकसान होगा। जातक को सिर दर्द रहेगा और यदि बुध, शुक्र अथवा केतु ११ वें भाव में हों तो बहन, पत्नी अतवा पुत्र द्वारा उस जातक का नाश होता है।

उपाय—

१. २१ वर्ष से पहले विवाह न करें।
२. नदी में छः नारियल प्रवाहित करें।

आठवाँ भाव में राह—

आठवाँ भाव शनि और मंगल के साथ जुड़ा है, इसलिए इस भाव में राहु अशुभ फल देता है। जातक कोर्ट के केसों के पीछे विपुल पैसा खर्च करता है। पारिवारिक जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। यदि कुंडली में मंगल शुभ हो और पहले या आठवे भाव में बैठा हो अथवा शनि आठवें भाव में बैठा हो तो जातक के अत्यंत समृद्धशाली होने की संभावना है।

उपाय—

१. चाँदी का एक चौरस टुकड़ा साथ रखें।
२. सोते समय तकिया के नीचे सौंफ रखें।
३. विद्युत विभाग में काम न करें।

नौवें भाव में राहु—-

नौवें भाव पर गुरु का प्रभाव है। यदि जातक का उसके संतानों के साथ अच्छा सम्बंध हो तो वह फलदायक है, अन्यथा वह जातक पर विपरीत प्रभाव डालता है। यदि जातक धार्मिक विचार न रखता हो तो उसके बच्चे उसके लिए निरर्थक साबित होंगे। यदि गुरु पाँचवें या ग्यारहवें भाव में हो तो वह निरर्थक है। नौवें भाव में राहु अशुभ हो तो पुत्र संतान कम होता है। विशेष रूप से जातक रक्त सम्बंध रखनेवाले किसी व्यक्ति के विरुद्ध अदालत में मुकदमा करता है। नौवे भाव में राहु हो और प्रथम भाव में कोई भी ग्रह न हो तो स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता । उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिक होती है और मानसिक समस्याएँ भी संभव बनती है।

उपाय—

१. नित्य केसर का तिलक करें।
२. सोने का आभूषण पहनें।
३. कुत्ते को हमेशा साथ में रखें।
४. ससुराल के साथ अच्छे सम्बंध रखना।

दसवें भाव में राहु—-

राहु के अच्छे या बुरे फल का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि शनि कहाँ बैठा है। यदि शनि शुभ हो तो जातक साहसी, दीर्धायु और श्रीमंत होगा और सभी क्षेत्रों में उसे मान- सम्मान प्राप्त होगा। दसवें भाव का राहु यदि चंद्र के साथ हो तो वह राजयोग करता है। यह जातक अपने पिता के लिए भाग्यशाली होता है। दसवें भाव में स्थित राहु अशुभ हो तो वह जातक की माता के लिए प्रतिकूल साबित होता है। चौथे भाव में चंद्र अकेला हो तो जातक की आँख के लिए नुकसानदायक होता है। उसे सिरदर्द अथवा संपत्ति का नुकसान होने की संभावना है।

उपाय—

१. नीले अथवा काले रंग की टोपी पहनें ।
२. सिर खुला न रखें।
३. मंदिर में ४ कि.ग्रा अथवा ४०० ग्राम मिश्री चढ़ाएँ अथवा नदी में प्रवाहित करें।
४. अंधजनों को भोजन कराएँ।

ग्यारहवें भाव में राहु—

इस भाव पर गुरु और शनि दोनों का प्रभाव है। जबतक जातक का पिता जीवित होगा तबतक वह धनवान रहता है। पैसे से सुखी रहता है। जातक के मित्र दुष्ट होंगे। उनकी आय के स्रोत हल्की जाति के लोगों तक होगा। पिता की मृत्यु के पश्चात जातक को गले में सोने का कोई आभूषण पहनना चाहिए। जातक की जन्म कुंडली के ग्यारहवें भाव में अशुभ मंगल यदि राहु के साथ हो तो जातक का पिता के साथ अच्छा सम्बंध नहीं होगा। अथवा ऐसा भी हो सकता है कि जातक के हाथ से पिता की हत्या हो। दूसरे भाव में रहा ग्रह शत्रु के रूप में काम करेगा। यदि गुरु या शनि तीसरे या ग्यारहवें भाव में हो तो शरीर पर लोहे की कोई वस्तु धारण करें और चाँद के ग्लास में पानी पीएँ। यदि पाँचवें भाव में केतु हो तो वह खराब फल देगा। जातक को कान, रीढ़ और किडनी सम्बंधी समस्याएँ पैदा होंगी। बिजनेस में हानि होने की भी संभावना है।

उपाय—

१. शरीर पर लोहे की कोई वस्तु पहनें चाँदी के गिलास में पानी पीएँ।
२. भेंट के रूप में विद्युत उपकरण न स्वीकार करें।
३. अपने पास नीलम, हाथीदाँत अथवा हाथी के आकार का कोई खिलौना नहीं रखना चाहिए।

बारहवें भाव में राहु—

बारहवें भाव पर गुरु का आधिपत्य है। वह शयनखंड सूचित करता है। इस स्थान में राहु होने से मानसिक तकलीफ देता है। इसके अतिरिक्त अनिद्रा की समस्या पैदा होती है। बहन और पुत्रियों के पीछे विपुल धन खर्च होगा। यदि इस भाव में राहु शत्रु ग्रह से घिरा हो तो तनतोड़ परिश्रम करने पर भी जातक को दोनों किनारे मिलाने में कठिनाई पड़े। इस हद तक वह आर्थिक तंगी वह अनुभव करता है। जातक पर गलत आरोप लगाए जाते हैं। मानसिक यातनाएँ असह्य बन जाने पर जातक आत्महत्या करने पर भी उतारन हो सकता है। वह झूठ बोलता है और दूसरों को ठगता है। यदि कोई नया कार्य शुरू करने जा रहे हों और यदि कोई छींके तो अशुभ फल देता है। चोरी अनेक रोग अथवा गलत आक्षेपों का शिकार बनता है। बारहवें स्थान में राहु के साथ यदि मंगल हो तो वह शुभ परिणाम देता है।

उपाय—
१. रसोई घर में ही बैठकर भोजन करें।
२. शांतिपूर्वक नींद आने के लिए तकिये के नीचे सौंफ और मिश्री रखें।

>कॅरियर और रुद्राक्ष—

जीवन में सफलता के लिए नवग्रह रुद्राक्ष माला सवरेतम है। किसी कारणवश जो इस अवसर पर रुद्राक्ष न पहन सकें, तो वे श्रावण माह में अवश्य धारण कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं। रुद्राक्ष बिल्कुल शुद्ध होना चाहिए।

* राजनेताओं को पूर्ण सफलता के लिए तेरह मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

* न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोग एक व तेरह मुखी रुद्राक्ष दोनों ओर चांदी के मोती डलवा कर पहनें ।

* वकील चार व तेरह मुखी रुद्राक्ष धारण कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

* बैंक मैनेजर ग्यारह व तेरह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* सीए आठ व बारह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* पुलिस अधिकारी नौ व तेरह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* डॉक्टर, वैद्य नौ व ग्यारह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* सर्जन दस, बारह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* चिकित्सा जगत के लोग ३ व चार मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* मैकेनिकल इंजीनियर दस व ग्यारह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* सिविल इंजीनियर आठ व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* इलेक्ट्रिकल इंजीनियर सात व ग्यारह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* कंप्यूटर सॉफ्टवेयर इंजीनियर चौदह व गौरी शंकर रुद्राक्ष पहनें।

* कंप्यूटर हार्डवेयर इंजीनियर नौ व बारह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* पायलट, वायुसेना अधिकारी दस व ग्यारह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* अध्यापक छह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* ठेकेदार ग्यारह, तेरह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* प्रॉपर्टी डीलर एक, दस व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* दुकानदार दस, तेरह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* उद्योगपति बारह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

* होटल मालिक एक, तेरह व चौदह मुखी रुद्राक्ष पहनें।

विद्यार्थियों व बच्चों की शिक्षा के लिए ‘गणोश रुद्राक्ष’ धारण करवाएं। बच्चा स्वयं अच्छी शिक्षा में नाम कमाएगा। इसे शुभ मुहूर्त में धारण करें।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Vastu Shastra – Part 1

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Description of effects of Vaastu Dosha

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Architect Thomas explains Vaastu – part 1

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Vaasthu – Award winning architecture Part 2

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Vaastu tips for health and financial crisis.mpg

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Money problem solution through Vaastu.mpg

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Vaastu Tips for Bedroom

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>VAASTU TIPS

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Jigyasa: Vastushastra – Part 1

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Jigyasa: Vastushastra – Part 2

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Jigyasa: Yuvaon Ka Margdarshan – Part 2

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Vaastu Epi 09

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Vaastu Epi 07

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Vastu Shastra – Part 3

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Vastu Shastra – Part 3

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Vastu Shastra – Part 2

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>Vastu Shastra – Part 7

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>SUKH KI AUR

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>Sukh Ki Aur

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>SUKH KI AUR Swaal or Jwaab (Part-2)

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>SUKH KI AUR Swaal or Jwaab (Part-1)

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>SUKH KI AUR Swaal or Jwaab (Part-2)

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Vrishabh Lagan (1)

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>Vrishabh Lagan (2)

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>Amogh Shiv Kavach (Part 1)

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>The Sun in Astrology (Hindi)

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Jyotish Vigyan – vcd 4 2 – Sri Sri Ravi Shankar

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Introduction to Jyotish, Part 5: The Vedic Calendar _005_of_009

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Introduction to Jyotish, Part 1: What is Vedic Astrology?

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Astrology: Pisces

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>Jyotish Vigyan – vcd 4 – 1 – Sri Sri Ravi Shankar

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>BASIC VEDIC ASTROLOGY – LESSON 6

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मेरा, उसका सबका वास्‍तु – ऊर्जा का प्रवाह—-

इस साल एक बार फिर वास्‍तु की कक्षाएं लेने का मौका मिला। पिछली बार जहां पहले से वास्‍तु के जानकार लोगों से लेकर छोटी बालिका तक के विद्यार्थी थे वहीं इस बार सभी युवा या अधेड़ थे, और मेरी लगातार परीक्षा लेने की फिराक में थे। कुछ ने इधर उधर कुछ पढ़ भी रखा था। एक चिकित्‍सक, दो इंजीनियर, एक वास्‍तुप्रेमी और बाकी लोग ऐवेंई कुछ सीखने आ गए थे। डांस क्‍लास और पेंटिंग क्‍लास में एक घंटे के अंतर के कारण।
पहला दिन ऊर्जा का प्रवाह और दूसरा दिन ग्रहों की स्थिति बताने में बीता। इसके साथ ही शुरू हुई बहस कि मंदिर कहां होना चाहिए, किस कोने में किस देवता का वास होता है, किस वास्‍तु में बुरी आत्‍माओं का दोष हो सकता है आदि आदि…
इन ढ़ेर सारे सवालों के जवाब में एक बात मैंने वापस पूछी कि अगर किसी हिन्‍दू का घर देखा जाए तो वहां एक मंदिर होना आवश्‍यक है, लेकिन क्‍या एक ईसाई के घर के वास्‍तु में भी ऐसा ही होगा, या इससे कुछ अलग हो सकता है। एक ने जवाब दिया उत्‍तरी पूर्वी कोने में जीजस की मूर्ति लगा दी जाए, इसी तरह एक मुसलमान उसी कोने में मोहम्‍मद साहब ही मूर्ति लगा देगा। बाकी लोग अपने अपने धर्म की आराधना इसी कोने में कर लें। ऐसे में नई समस्‍या यह कि फिर उत्‍तरी पूर्वी या ईशान कोण में आखिर होगा कि देवता का वास। काफी देर तक बहस चलने के बाद मैंने इस बिंदू पर बहस बढ़ाने से मना कर दिया और अपनी ओर से निर्णय किया कि वास्‍तु की कक्षा के दौरान आगे से केवल ऊर्जा के प्रवाह पर ही चर्चा होगी। अगर ऊर्जा बाधित हो रही है तो उसे ठीक करने का प्रयास किया जाएगा। यकीन मानिए बस इसी एक ट्रिक के जरिए सभी लोगों के दिमाग की खिड़की एक साथ खुल गई।
आइए आपको भी बताता हूं कि ऊर्जा के प्रवाह के बारे में मैंने क्‍या बताया और इसे आप खुद कैसे देख सकते हैं। हालांकि मैं यहां कोई लाइन या डायग्राम नहीं बना पा रहा हूं लेकिन शब्‍दों से ही इसे स्‍पष्‍ट करने का प्रयास करूंगा।
- किसी घर के वास्‍तु में तीन चीजों का प्रमुखता से ध्‍यान रखा जाए : हवा, पानी और रोशनी
- ऊर्जा के प्रवाह को रोशनी, हवा और पानी के बहाव से देखेंगे।
- ऊर्जा का प्रवाह उत्‍तर और पूर्व से आता है और दक्षिण तथा पश्चिम की ओर जाता है।
- उत्‍तरी पूर्वी कोने में सर्वाधिक ऊर्जा होती है।
- दक्षिणी पश्चिमी कोने में सबसे कम ऊर्जा होती है।
- परिवार के जिस सदस्‍य की जितनी ऊर्जा है उसे उतनी ही ऊर्जा के स्‍थान पर बैठाया जाए।
- उत्‍तरी पूर्वी कोना न केवल साधना बल्कि बच्‍चों के लिए भी बेहतर होगा
- दक्षिणी पश्चिमी कोना भण्‍डार के अलावा धैर्य के लिए परिवार के मुखिया का होगा
- उत्‍तरी पश्चिमी कोना दादा-दादी अथवा जो भी ग्रांड पेरेंट्स हों उनके लिए होगा।
- दक्षिण पूर्व में रसोई होगी।
- आंगन खाली होगा।
- भूमि भी अधिक ऊर्जा प्रवाह वाले स्‍थान पर नीची और कम ऊर्जा प्रवाह वाले स्‍थान पर ऊंची होगी।
- दुकान की वास्‍तु ऊर्जा का प्रवाह घर के ऊर्जा प्रवाह से ठीक उल्‍टा होगा।
- घर के अंदर दुकान होगी तो दोनों का ऊर्जा प्रवाह एक-दूसरे को प्रभावित करेगा।
- तीनों कारकों में से जो कारक प्रभावित हो रहा है उसी का ईलाज किया जाए। बाकी दोनों कारकों को छेड़ने की जरूरत ही नहीं है।

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वक्री अच्‍छा होता है या खराब

पिछले दिनों एक शादी समारोह के दौरान मेरे पुराने गुरुजी पंडित मंगलचंदजी पुरोहित मिल गए। चर्चा चली तो बात आ गई वक्री गहों पर। आमतौर पर ग्रहों के संबोधन को ही उनका असर मान लिया जाता है। जैसे नीच के ग्रह को नीच यानि घटिया और उच्‍च के ग्रह को उच्‍च यानि श्रेष्‍ठ मान लिया जाता है। यही स्थिति कमोबेश वक्री ग्रह के साथ भी होती है। उसे उल्‍टी चाल वाला मान लिया जाता है। यानि वक्री ग्रह की दशा में जो भी परिणाम आएंगे वे उल्‍टे ही आएंगे। ऐसा नहीं है कि केवल नौसिखिए या शौकिया ज्‍योतिषी ही यह गलती करते हैं बल्कि मैंने कई स्‍थापित ज्‍योतिषियों को भी यही गलती करते हुए देखा है।
कैसे होता है वक्री ग्रह
जो लोग एस्‍ट्रोनॉमी जानते हैं उन्‍हें पता है कि सौरमण्‍डल में सारे ग्रह सूर्य की दीर्धवृत्‍ताकार कक्ष में परिक्रमा करते हैं। इस दौरान ग्रह कई बार सूर्य के बिल्‍कुल नजदीक आ जाते हैं तो कई बार अधिकतम दूरी पर चले जाते हैं। भारतीय ज्‍योतिष में सूर्य को भी एक ग्रह मानकर गणनाएं की जाती हैं। ऐसे में पृथ्‍वी पर खड़ा अन्‍वेषक जब देखता है कि सूर्य के बिल्‍कुल पास पहुंच चुका ग्रह गति करते हुए रफ्तार में सूर्य से आगे निकल रहा है तो उसे कहते हैं तीव्रगामी और जब सूर्य से अधिकतम दूरी पर होता है तो अन्‍वेषक को ग्रह की गति सूर्य की तुलना में धीमी होती दिखाई देती है। इसे कहते हैं ग्रह का वक्री होना। चूंकि बुध सूर्य के सबसे नजदीक है। ऐसे में सबसे कम अंतराल में बुध वक्री, मार्गी और अतिगामी होता है। वहीं शनि सबसे अधिक दूरी पर होने के कारण बहुत धीमी रफ्तार से अपनी ऐसी गति प्रदर्शित करता है।
कैसा होगा वक्री ग्रह का प्रभाव
अब दूसरा और महत्‍वपूर्ण प्‍वाइंट है कि वक्री ग्रह का परिणाम क्‍या होगा। इसके लिए उदाहरण लेते हैं बुध का। बुध कभी भी सूर्य से तीसरे घर से दूर नहीं जा पाता है। यानि 28 डिग्री को पार नहीं कर पाता है। इसी के साथ दूसरा तथ्‍य यह है कि सूर्य के दस डिग्री से अधिक नजदीक आने वाला ग्रह अस्‍त हो जाता है। अब बुध नजदीक होगा तो अस्‍त हो जाएगा और दूर जाएगा तो वक्री हो जाएगा। ऐसे में बुध का रिजल्‍ट तो हमेशा ही नेगेटिव ही आना चाहिए। शब्‍दों के आधार पर देखें तो ग्रह के अस्‍त होने का मतलब हुआ कि ग्रह की बत्‍ती बुझ गई, और अब वह कोई प्रभाव नहीं देगा और वक्री होने का अर्थ हुआ कि वह नेगेटिव प्रभाव देगा।
वास्‍तव में दोनों ही स्थितियां नहीं होती।
टर्मिनोलॉजी से दूर आकर वास्‍तविक स्थिति में देखें तो सूर्य के बिल्‍कुल पास आया बुध अस्‍त तो हो जाता है लेकिन अपने प्रभाव सूर्य में मिला देता है। यही तो होता है बुधादित्‍य योग। ऐसे जातक सामान्‍य से अधिक बुद्धिमान होते हैं। यानि सूर्य के साथ बुध का प्रभाव मिलने पर बुद्धि अधिक पैनी हो जाती है। दूसरी ओर वक्री ग्रह का प्रभाव। सूर्य से दूर जाने पर बुध अपने मूल स्‍वरूप में लौट आता है। जब वह वक्री होता है तो पृथ्‍वी पर खड़े अन्‍वेषक को अधिक देर तक अपनी रश्मियां देता है। यहां अपनी रश्मियों से अर्थ यह नहीं है कि बुध से कोई रश्मियां निकलती हैं, वरन् बुध के प्रभाव वाली तारों की रश्मियां अधिक देर तक अन्‍वेषक को मिलती है। ऐसे में कह सकते हैं बुध उच्‍च के परिणाम देगा। अब यहां उच्‍च का अर्थ अच्‍छे से नहीं बल्कि अधिक प्रभाव देने से है।
तो बुध कब अच्‍छे या खराब प्रभाव देगा
इसका जवाब बहुत आसान है। जिस कुण्‍डली में बुध कारक हो और अच्‍छी पोजिशन पर बैठा हो वहां अच्‍छे परिणाम देगा और जिस कुण्‍डली में खराब पोजिशन पर बैठा हो वहां खराब परिणाम देगा। इसके अलावा जिन कुण्‍डलियों में बुध अकारक है उनमें बुध कैसी भी स्थिति में हो, उसके अधिक प्रभाव देखने को नहीं मिलेंगे।
कहां है बुध का प्रभाव
वर्तमान में हर जगह बुध का प्रभाव है। जहां भी संदेशों का आदान-प्रदान हो रहा है वहां बुध का प्रभाव है। इसमें हर तरह का मीडिया शामिल है। संचार क्रांति बुध की ही क्रांति है, इंटरनेट बुध का ही स्‍वरूप है, लेखा और बैंकिंग भी बुध के प्रभाव क्षेत्र के हिस्‍से हैं और हां शेयर बाजार में भी बुध का भीषण प्रभाव है। आम आदमी की जिंदगी में भी सूचना का आना, जाना, रुकना और सूचना पैदा करना बुध का ही काम है।

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किस भाव से क्‍या देखेंगे – कारक——

कारक विचार फलादेश की सबसे महत्‍वपूर्ण कड़ी है। कई बार जातक जब समस्‍या बताता है तो नए ज्‍योतिषियों को पता ही नहीं चलता है कि इसे किस भाव या ग्रह से देखें। ऐसे में जितने कारक फौरी तौर पर ध्‍यान में होते हैं, उन्‍हीं के अनुसार ज्‍योतिषी निष्‍कर्ष पेश करने की कोशिश करते हैं। कई बार तो यह भी स्‍पष्‍ट नहीं हो पाता है कि सवाल का जवाब कुण्‍डली में कहां खोजा जाए। शुरूआती दिनों में मेरी भी यही समस्‍या थी, गुरुजी ने जितने कारक बता दिए उतने तो कंठस्‍थ थे, लेकिन हर बार नई समस्‍या आने पर फिर गुरुजी को पूछता। तो एक दिन उन्‍होंने मुझे स्‍पष्‍ट किया कि मुझे पहले कारक पर ही काम करना चाहिए। तब जो पुस्‍तक मुझे सबसे सहायक लगी वह थी हेमवंता नेमासा काटवे। उनकी कारकत्‍व विचार पुस्‍तक में इतने कारक दिए गए हैं कि लगता है कि हर सवाल का जवाब दिया जा सकता है। काटवे के बाद केएस कृष्‍णामूर्ति की सैकण्‍ड रीडर पढ़ने के बाद तो लगा कि हर सवाल का जवाब ज्‍योतिष से दिया जा सकता है, बशर्ते आप कारकत्‍व के बारे में विस्‍तार से जानते हों। यहां मैं भावों के कारकों के बारे में बताने का प्रयास कर रहा हूं।

प्रथम भाव- इस भाव का कारक सूर्य है। यह सबसे प्रमुख भाव है। इसी भाव की राशि, इसमें बैठे ग्रह और इसके अधिपति ग्रह की स्थिति से जातक की स्थिति की प्राथमिक जानकारी मिल जाती है। बाकी भावों की तुलना में जातक की आत्‍मा को जानने का यह सबसे महत्‍वपूर्ण भाव है। जातक की जन्‍मकुण्‍डली अथवा प्रश्‍नकुण्‍डली के किसी सवाल के जवाब में उसके स्‍वास्‍थ्‍य, जीवंतता, सामूहिकता, व्‍यक्तित्‍व, आत्‍मविश्‍वास, आत्‍मसम्‍मान, आत्‍मप्रकाश, आत्‍मा आदि को देखा जाता है। हर सवाल के जवाब में पहले लग्‍न देखना ही होगा…
1st house - Sun. Health, vitality, integrity, personality, integration, confidence, healthy self-esteem, self-expression, soul radiance. 

दूसरा भाव – इस भाव का कारक गुरु है। वैदिक ज्‍योतिष में इसे धन भाव कहा जाता है। इससे बैंक एकाउण्‍ट, पारिवारिक पृष्‍ठभूमि, कई मामलों में आंखें देखी जाती है। इसके अलावा यह संसाधन, नैतिक मूल्‍य और गुणों के बारे में बताता है।
2nd house - Jupiter. Abundance of resources, values and virtues. 
तीसरा भाव - इस भाव का कारक मंगल है। इसे सहज भाव भी कहते हैं। कुण्‍डली को ताकत देने वाला भाव यही है। इसे आमतौर पर अनदेखा कर दिया जाता है, लेकिन भाग्‍य के ठीक विपरीत अपनी बाजुओं की ताकत से कुछ कर दिखाने वाले लोगों का यह भाव बहुत शक्तिशाली होता है। बौद्धिक विकास, साहसी विचार, दमदार आवाज, प्रभावी भाषण एवं संप्रेषण के अन्‍य तरीके इस भाव से देखे जाएंगे। छोटे भाई के लिए भी इसी भाव को  देखा जाएगा।
3nd house - Mars. Strong development of mind, bold constructive ideas, strong healthy voice, influential oratory and other communication. 

चौथा भाव - इसका कारक चंद्रमा है। यह सुख का घर है। किसी के घर में कितनी शांति है इस भाव से पता चलेगा। इसके अलावा माता के स्‍वास्‍थ्‍य और घर कब बनेगा जैसे सवालों में यह भाव प्रबल संकेत देता है। शांति देने वाला घर, सुरक्षा की भावना, भावनात्‍मक शांति, पारिवारिक प्रेम जैसे बिंदुओं के लिए हमें चौथा भाव देखना होगा। 
4th house - Moon. Peaceful home, sense of safety and security, emotional peace of mind, unconditional love in the family. 

पांचवां भाव - इसका कारक गुरु है। इसे प्रॉडक्‍शन हाउस भी कह सकते हैं। इंसान क्‍या पैदा करता है, वह इसी भाव से आएगा। इसमें शिष्‍य, पुत्र और पेटेंट वाली खोजें तक शामिल हो सकती हैं। ईमानदारी से की गई रिसर्च भी इसी से देखी जाएगी। ईमानदारी से मेरा अर्थ है ऐसी रिसर्च जिससे विद्यार्थी अथवा विषय के लिए कुछ नया निकलकर आ रहा हो। इसके अलावा आनन्‍दपूर्ण सृजन, सुखी बच्‍चे, सफलता, निवेश, जीवन का आनन्‍द, सत्‍कर्म जैसे बिंदुओं को जानने के लिए इस भाव को देखना जरूरी है। 
5th house - Jupiter. Joyful creation, blessed children, successful, investment. Joy in life, grounded in spiritual consciousness and devotion, and good karma naturally flowing from that. 

छठा भाव - इस भाव का कारक मंगल है। इसे रोग का घर भी कहते हैं। प्रेम के सातवें घर से बारहवां यानि खर्च का घर है। शत्रु और शत्रुता भी इसी भाव से देखे जाते हैं। कठोर परिश्रम, सश्रम आजीविका, स्‍वास्‍थ्‍य, घाव, रक्‍तस्राव, दाह, सर्जरी, डिप्रेशन, उम्र चढ़ना, कसरत, नियमित कार्यक्रम के सम्‍बन्‍ध में यह भाव संकेत देता है।
6th house - Mars, Saturn. Hard work, application of self in service to worthy causes. In health, Mars and Saturn are first-class malefics, fostering wounding, bleeding, inflammation, surgery, (Mars) and inertia, depression, losses, and aging (Saturn). Exercise, work, austerities, regular program or lifestyle, taking the long view to do what will maintain health over the lifetime are positive uses of Mars and Saturn in the 6th house.


सातवां भाव - इसका कारक शुक्र है। लग्‍न को देखने वाला यह भाव किसी भी तरह के साथी के बारे में बताता है। राह में साथ जा रहे दो लोगों के लिए, प्रेक्टिकल के लिए टेबल शेयर कर रहे दो विद्यार्थियों के लिए, एक ही समस्‍या में घिरे दो साथ-साथ बने हुए लोगों के लिए यह भाव देखा जाएगा। जीवनसाथी, करीबी दोस्‍त, सुंदरता, लावण्‍य जैसे विषय इसी भाव से जुड़े हुए हैं। सभी विपरीत लिंग वालों के लिए। समलैंगिकों को कैसे देखेंगे यह अभी स्‍पष्‍ट नहीं है, लेकिन कभी ऐसी कुण्‍डली आती है तो मैं दोनों का सातवां भाव ही देखने का प्रयास करूंगा। 
7th house - Venus. We desire peaceful relations with all, especially with significant others, a life full of love and affection, sattvic and full of goodness, beauty, graciousness. 

आठवां भाव - इसका कारक शनि है। स्‍वाभाविक रूप से गुप्‍त क्रियाओं, अनसुलझे मामलों, आयु, धीमी गति के काम इससे देखे जाएंगे। इसके अलावा दूसरे के संसाधनों का सृजन में इस्‍तेमाल, जिंदगी की जमीनी सच्‍चाइयां, तंत्र-मंत्र के लिए यही भाव है।
8th house - Saturn. Conservative use of other’s resources. Serious attitude to plumb the depths of reality. Conservative use of reproductive resources or ojas. Practice of yoga and austerities. 

नौंवां भाव - इसका कारक भी गुरु है। इसे भाग्‍य भाव भी कहते हैं। पिछले जन्‍म में किए गए सत्‍कर्म प्रारब्‍ध के साथ जुड़कर इस जन्‍म में आते हैं। यह भाव हमें बताता है कि हमारी मेहनत और अपेक्षा से अधिक कब और कितना मिल सकता है। धर्म, अध्‍यात्‍म, समर्पण, आशीर्वाद, बौद्धिक विकास, सच्‍चाई से प्रेम, मार्गदर्शक जैसे गुणों को भी इसमें देखा जाता है। 
9th house - Jupiter. Religious-spiritual experience, realization, and devotion. Love of God as a foundation for life and blessings all around. vision, perspective, increase in wisdom, compassion, love of truth. Spiritual teacher (guru) and spiritual teachings and path shown by the 9th house.


दसवां भाव - इसके कारक ग्रह अधिक हैं। गुरु, सूर्य, बुध और शनि के पास दसवें घर का कारकत्‍व है।  हम जो सोचते हैं वही बनते हैं। यह भाव हमारी सोच को कर्म में बदलने वाला भाव है। हर तरह का कर्म दसवें भाव से प्रेरित होगा। बस बाध्‍यता इतनी है कि एक्‍शन हमारा होना चाहिए। रिएक्‍शन के बारे में यह भाव नहीं बताता। प्रोफेशनल सफलताएं, साख, प्रसिद्धि, नेतृत्‍व, लेखन, भाषण, सफल संगठन, प्रशासन, स्किल बांटना जैसे काम यह भाव बताता है।
10th house - Jupiter, Sun, Mercury, Saturn. Professional success, good reputation based on virtue, fame, leadership (Jupiter, Sun). Success in commerce, writing, speaking (Mercury). Successful organization, administration, teaching essentials, sharing expertise and wisdom of experience (Saturn). Jupiter shows the spiritual basis for worldly success – doing well by doing good.


ग्‍यारहवां भाव - इसका कारक भी गुरु है। यह ज्‍यादातर उपलब्धि से जुड़ा भाव है। आय, प्रसिद्ध, मान सम्‍मान और शुभकामनाएं तक यह भाव एकत्रित करता है। हम कुछ करेंगे तो उस कर्म का कितना फल मिलेगा या नहीं मिलेगा, यह भाव अधिक स्‍पष्‍ट करता है। यह कर्म का संग्रह भाव है। उपलब्धि किसी भी क्षेत्र में हो सकती है। धैर्य, विकास और सफलता भी इसी भाव से देखे जाते हैं।
11th house - Jupiter. Success in achieving goals and dreams.  Success in friendships, in groups and community. Broad vision of well-being, tolerance, diversity, generosity for the common good. Jupiter again shows the spiritual basis for life success and flourishing community. 

बारहवां भाव - इसका कारक शनि है। यह खर्च का घर है। हर तरह का खर्च, शारीरिक, मानसिक, धन और जो भी खर्च हो सकते हैं सभी इसी से आएंगे। विद्या का खर्च भी इसी भाव से होता है। इस कारण बारहवें भाव में बैठा गुरु बेहतर होता है ग्‍यारहवें भाव की तुलना में क्‍योंकि सरस्‍वती की उल्‍टी चाल होती है, जितना संग्रह करेंगे उतनी कम होगी और जितना खर्च करेंगे उतनी बढ़ेगी। इसके अलावा बाहरी सम्‍बन्‍धों, विदेश यात्रा, धैर्य, ध्‍यान और मोक्ष इस भाव से देखे जाएंगे।
12th house - Saturn. The benefits of solitude and the contemplative life. Esoteric or metaphysical studies. Patience, depth, application of  self over time. Meditation, contemplation, study of scriptures, initiation, effective therapy, excellent listening. Seeking the truth on all levels. Karma from truth or falsity, sincerity or insincerity, application of self or not, depth or lack of it, character or lack of it, justice or injustice – Saturn weighs and sifts all of that. Completions. Moksha or liberation.

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यह समझ का खेल हैशेयर बाजार की नब्‍ज—–

ज्‍योतिष में मैंने निजी तौर पर अनुभव किया है कि कई बार ज्‍योतिषी गलत होता है तो कई बार जातक भी समझने में चूक कर जाता है। अधिकांशत: ऐसा होता है कि जातक वही सुनना चाहता है जो वह सोचकर आया है। ज्‍योतिषी तो उसके लिए महज एक बहाना होता है। उसकी हां में अगर ज्‍योतिषी दस प्रतिशत हां करता है तो वह उसे सौ प्रतिशत हां मानकर चलता है और ना में कर दे तो पांच प्रतिशत ना स्‍वीकार करता है।

शेयर बाजार की नब्‍ज
इस बात की कोई सीमा अब तक तय नहीं की गई है कि कौनसे विषयों पर ज्‍योतिषी अधिकारपूर्वक उत्‍तर दे सकता है और कौनसे विषयों पर तथ्‍यात्‍मक रूप से सही नहीं बताया जा सकता। इसके लिए मैं उदाहरण लेना चाहूंगा शेयर बाजार की भविष्‍यवाणी के। पूर्व में कई ज्‍योतिषी शेयर बाजार की भविष्‍यवाणियां करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे, लेकिन कुछ लोग ही होते हैं जो बाजार की नब्‍ज के बहुत करीब पहुंच पाते हैं, वह भी कुछ समय के लिए बाद में वह नब्‍ज भी उनसे कहीं गुम हो जाती है। मेरा मानना है कि इसमें बड़ा दोष होता है बाजार को देखने के नजरिए का।
कैसे पैदा होती है समस्‍या
इसे ऐसे समझिए कि शेयर बाजार एक ऐसी टर्म है जिसमें काफी चीजें एक साथ समाई हुई हैं। ऐसे में किसी एक ग्रह या किसी एक भाव का तो इस पर असर देखा नहीं जा सकता। अब किसी एक व्‍यक्ति का भाग्‍य भी इससे जुड़ा नहीं हो सकता। इसके अलावा किसी एक कंपनी या किसी कंपनी समूह के बारे में बात करें तो भी बेमानी हो जाएगी, क्‍योंकि पहली तीस कंपनियों में इस पांच साल में जो कंपनियां शामिल रहेंगी, जरूरी नहीं है कि अगले पांच साल में भी वही रहें। पल-पल अपनी स्थिति बदल रहे शेयर बाजार की गणना किस आधार पर की जाएगी। यह शोध का विषय है…
बात यहीं खत्‍म नहीं हो जाती
बात यहीं खत्‍म नहीं हो जाती। अब ज्‍योतिषी कहता है कि बाजार अच्‍छा रहेगा। इसका मतलब मोटे तौर पर यह निकाला जा सकता है कि बाजार में तेजी रहेगी। नहीं, ऐसा कदापि नहीं है। बाजार अच्‍छा रहेगा इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि शेयर बाजार का स्‍वास्‍थ्‍य ठीक रहेगा। इसके लिए कंपनियों के निवेश, घोटालों का पकड़ा जाना और संस्‍थागत तेजडि़यों और मंदडि़यों का दूर होना भी शामिल हैं। आमतौर पर ऐसी गतिविधियों से बाजार नीचे आ गिरता है। भले ही फौरी तौर पर यह नुकसान की स्थिति दिखाई दे लेकिन दीर्धकाल के पैमाने पर देखें तो यह बाजार के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए अच्‍छी घटनाएं हैं। तो वह ज्‍योतिषी कहां गलत हुआ जो कह रहा है कि बाजार की स्थिति अभी ठीक है। नियमित रूप से बाजार का उठाव और उसके करेक्‍शन के लिए गिरावट सामान्‍य बातें हैं। पर बाजार में हमेशा ऐसा ही नहीं होता है। इसके उलट कई बाते हैं जिन्‍हें परखने की कोशिश की जा सकती है।
तो सही विश्‍लेषण कैसे हो सकता है
इसके लिए कोई तय फार्मूला मुझे तो दिखाई नहीं देता। कभी बाजार गुप्‍त क्रियाओं में लगा हो और अपनी स्थिति मजबूत कर रहा हो तो उसे भी मैं तो अच्‍छी स्थिति कहूंगा, लेकिन बाजार में पैसा फेंक रहे निवेशक को यह बात नहीं जमेगी। इसलिए सबसे सुरक्षित तरीका तो यही है कि जातक की व्‍यक्तिगत कुण्‍डली का विश्‍लेषण करके ही पता लगाया जाए कि उसे फायदा होगा कि नहीं। बाजार की नब्‍ज पहचानने के लिए कोई फार्मूला बनाने के लिए तो एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों ज्‍योतिषियों के समूह को बैठकर लम्‍बे समय तक विश्‍लेषण करना पड़ेगा। तभी कोई ऐसा नियम निकल पाएगा जो बता सके कि आज बाजार कैसा रहेगा।

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हर कोई ज्योतिष को चची/ भुवा/ बनाने पर हे आमादा—

अब हर कोई भौजी बनाने को मुंह धो रहा है—-

हां, जी मैं बात कर रहा हूं ज्‍योतिष की। ब्राह्मण गरीब होता है और ज्‍योतिष को उसकी जोरू समझकर हर कोई भौजी बनाने पर तुला है। लम्‍बे समय से देख रहा हूं कि ज्‍योतिष पर लिखने वाले अधिकांश लोगों को भले ही इसकी टके भर जानकारी न हो लेकिन बोलते इतने अधिकार से हैं मानो ज्‍योतिष और विज्ञान का सारा बोझा इन्‍हीं के सिर पर रखा हुआ है। जमे और रहते हैं हिले नहीं कि दोनों विषय धड़ाम से जा गिरेंगे रसातल में।
बहुत साल पहले की बात है जब मैं अपने कर्मकाण्‍ड वाले गुरूजी नथमल जी पुरोहितजी से रुद्र अष्‍टाध्‍यायी सीख रहा था। उन्‍हीं दिनों उन्‍हें एक बड़ा यज्ञ करने के लिए सांभर जाना था। मैं अपनी पुस्‍तक खोले पाठ याद कर रहा था और गुरुजी अपनी किताबें संभालकर थैले में डाल रहे थे। मैंने पूछा गुरूजी आपको तो सबकुछ जबानी याद है फिर आप क्‍यों इतनी किताबें लेकर जा रहे हैं। तो गुरूजी का जवाब था कि ब्राह्मण ही ब्राह्मण का शत्रु होता है। सही उच्‍चारण करते हुए भी कई बार लोग चैलेंज कर देते हैं। ऐसे में पुस्‍तक निकालकर परिमार्जन करना पड़ता है। इसलिए पुस्‍तकें साथ लेकर जा रहा हूं। मैंने कहा यह तो सही प्रोसेस है। तो गुरूजी जो अब तक दाल-भात में कंकर (उनके मामले में कबाब में हड्डी नहीं लिख सकता :) ) बनने वालों को गालियां निकालने के मूड में आ चुके थे, मेरी बात सुनकर चौंके। पूछा कैसे। मैंने कहा इसी तरह को शुद्धि बनी रहेगी। वरना आज एक पंडित एक गलती करेगा, दूसरा दूसरी और इसी तरह ग‍लतियों की संख्‍या बढ़ेगी। गलती माफ करने की नीति तो एक दिन मूल विधा को ही चौपट कर देगी। तो गुरूजी खुश हो गए। बोले तुम्‍हारी बात में दम है जोशी। मैं ध्‍यान रखूंगा।
जब इंटरनेट पर अपने लेख डालने शुरू किए तब मैं ऐसी स्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार था। सही कहूं तो हर बार नया विचार पेश करने के बाद सोच रहा था कि लोग आगे आएंगे  और सवाल जवाब करेंगे। क्‍या, कैसे, क्‍यों, कारण, निवारण पर बहस होगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। इंटरनेट पर सैक्‍स, नंगापन, हल्‍का साहित्‍य, मनोरंजन बस यही सबकुछ बिक सकता है। गंभीर मुद्दों पर बात करना तो बेवकूफी ही है। फिर भी एक साल तक मैं हर पांच-दस दिन में नया विषय उठाता रहा और लोगों की प्रतिक्रिया का इंतजार करता रहा। सच कहूं तो दो चार लोगों को छोड़कर किसी ने गंभीर सवाल भी नहीं पूछे। आम लोग अपनी समस्‍याओं में ही इतना घिरे हैं कि उन्‍हें अपनी समस्‍या से बड़ा कुछ नजर ही नहीं आता। बाकी अधिकांश लोग ब्‍लॉगिंग में ऐसे हैं जैसे वे ब्‍लॉग लिखकर ही दुनिया पर अहसान कर रहे हैं। बाकी लोगों को कोसने का कोई मतलब नहीं है मैं सीधा कहना चाहता हूं साइंस ब्‍लॉगर्स एसोसिएशन को।
यह संस्‍था विज्ञान के बारे में सुपरफीशियल काम करती है। यानि इधर-उधर से जानकारियां जुटाना और हिन्‍दी में इस ब्‍लॉग के जरिए परोस देना। काम अच्‍छा है हिन्‍दी के लिहाज से। पर मैं बता दूं कि इंटरनेट पर बैठने वाले बहुत से लोग अपने फील्‍ड के प्रोफेशनल्‍स हैं। उन्‍हें क्‍या जरूरत है कि किसी साइंटिस्‍ट का नाम याद रखे या उसके विज्ञान में योगदान को। एडीसन ने कुछ भी उत्‍पाद बनाया हो बेचा स्मिथ ने। तो कॉमर्स के लोग स्मिथ को पढ़ेंगे। कला के लोग वॉन गॉग को पढेंगे। हां लियो नार्दो द विंसी कई विधाओं के जानकारों के लिए एक जैसा उपयोगी हो सकता है लेकिन उसे भी कितना लम्‍बा खींचोगे भाई।
ठीक है आपका ब्‍लॉग अपने अपने क्षेत्रों के प्रोफेशनल्‍स के लिए नहीं है बल्कि विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए है। तो विज्ञान का एक विद्यार्थी जो नियमित रूप से इंटरनेट पर बैठता है और सर्फिंग के लिए हिन्‍दी टूल यूज करता है वही तो आप तक पहुंचेगा। यकीन मानिए ऐसे अधिकांश विद्यार्थियों के पास वह गुटका छाप किताबें होंगी जिनमें इस प्रकार की छिछोरी ‍जानकारी दी गई होगी।
कुल मिलाकर मैंने सिद्ध किया कि साइंस ब्‍लॉगर्स एसोसिएशन साइंस के नाम पर टाइम पास करने वाले लोगों का जमावड़ा है।
ठीक है अब आता हूं, विज्ञान और ज्‍योतिष पर
भईया आप नाम लेकर बताएं कि कौन कह रहा है कि ज्‍योतिष वह विज्ञान है जिसे आप विज्ञान मानते हैं। विज्ञान की परिभाषा गीता के प्रथम अध्‍याय के नौंवे सूत्र में दी गई है। अनुभव से प्राप्‍त ज्ञान विज्ञान है। यह अनुभव प्रयोग प्रेक्षण और परिणाम से आता है। यह बात आधुनिक वैज्ञानिकों या कहूं कि पश्चिमी वैज्ञानिकों ने जोड़ी है। ये वही पश्चिमी वैज्ञानिक हैं जो पोप के कहने पर यह मानने को तैयार हो गए थे कि सूर्य पृथ्‍वी के चक्‍कर लगाता है। कुछ दिन पहले मैटर और एंटी मैटर के विषय में पंडित डी.के. शर्माजी ने लिखा था। तब इसी छिछोरे ब्‍लॉग के लेखकों को बात ही पल्‍ले नहीं पड़ी कि मैटर और एंटी मैटर को भारतीय वेदों में दिए गए सत-असत से कोई लेना देना हो सकता है क्‍या। ज्‍योतिष को चुनौती देना ठीक है, पॉजिटिव हो तो अच्‍छी बात है लेकिन पूंछ फाड़ने या बंबू करने के उद्देश्‍य को लेकर अपने ब्‍लॉग की हिट्स बढ़ाने के लिए ज्‍योतिष और ब्‍लॉ-ब्‍लॉ लिखना कहां तक उचित है।

अब साइंस ब्‍लॉगर्स एसोसिएशन से कुछ सवाल
- रदरफोर्ड के नाभिक से एक ही प्रोटोन वापस क्‍यों आया। अगर वह इतना ही ठोस है तो कई क्‍वार्क उससे बाहर कैसे निकल आते हैं। प्रोबेबिलिटी मत बोलना क्‍योंकि उसका अर्थ होगा कि आपको आधा पता है आधा पता नहीं है यह तो कोई गधा भी कह देगा।
- ब्रह्माण्‍ड से पहले क्‍या था। एंटी मैटर मत बोलना क्‍योंकि वह तो वेदों की देन है। और कुछ बताने का प्रयास करना।
- न्‍यूटन के गति के नियम खतरे में पड़ गए जब आइंस्‍टाइन ने कहा कि प्रकाश की गति भी सापेक्ष है और इसे द्रव्‍यमान प्रभावित करता है। क्‍या आइंस्‍टाइन की थ्‍योरी आखिरी है।  अगर नहीं तो विज्ञान किस दिशा में जा रहा है। मुझे यह अंधे के हाथी से ज्‍यादा कुछ नजर नहीं आता।
- अगर दवाएं ठीक करने के लिए है तो कुछ साल पहले हजारों लोगों को रॉफिकॉक्‍सिब दवा देने के जुर्म में मर्क कंपनी पर कई सौ अरब का जुर्माना क्‍यों लगाया गया।
- विज्ञान का इस्‍तेमाल बम बनाने और लोगों को नष्‍ट करने में क्‍यों किया जा रहा है। विज्ञान को मानव सेवा के लिए है। ज्‍योतिष की तरह जवाब मत देना कि यह तो व्‍यक्ति पर निर्भर करता है।
- साइकोलॉजी तो विज्ञान है। इसमें सबसे पहले आई मनोविश्‍लेषण, फिर अन्‍तरमन, फिर मॉर्डन साइकोलॉजी और अब फेलियर ऑफ मॉर्डन साइकोलॉजी। यानि विज्ञान लगातार खुद को ही धोखा दे रहा है।

और अंत में…
सालों पहले की बात है अमरीका में डिब्‍बाबंद दूध बनाने वाली कंपनियों ने कुछ हजार माताओं पर सर्वे कराया और निष्‍कर्ष निकाला कि मां का दूध पीने वाले बच्‍चे कमजोर रह गए। उनमें कुछ विटामिन्‍स की कमी पाई गई। इस भ्रामक तथ्‍य का जबरदस्‍त प्रचार किया गया। माताओं ने अपने बच्‍चों को दूध पिलाना बंद कर दिया। सब बच्‍चे डिब्‍बाबंद दूध पीने लगे। बाद में पता चला कि वास्‍तव में मां का दूध नहीं पीने वाले बच्‍चे अधिक कमजोर रहते हैं। अमरीका को अगले दस सालों तक मांओं को यह समझाने के लिए समय, श्रम और धन व्‍यय करना पड़ा कि बच्‍चों को स्‍तनपान कराए। वैज्ञानिक आधार पर निकाले गए निष्‍कर्षों ने धोखा दिया।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>कैसा है घर आपका——

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कैसा है घर आपका—-

घर की बनावट, उसकी दिशा, घर के सामान, पेड-पौधे बताते हैं कि घर किस ग्रह के प्रभाव में है। आमतौर पर देखा जाता है कि घर की दिशा क्‍या है और उसे संबंधित ग्रह के हवाले कर दिया जाता है लेकिन ऐसा नहीं है। पूर्व मुखी घर में भी राहू की समानताएं हो सकती हैं और पश्चिम मुखी घर में बुध की। इससे पहले की घर पर ग्रहों के विशद प्रभाव की चर्चा करूं मैं सरसरी तौर पर बता देना चाहता हूं कि पारंपरिक पध्‍दति में दिशा और ग्रह का क्‍या संबंध है। 

सूर्य का घर: 

आमतौर पर पूर्व की दिशा में जिन घरों का मुंह होता है उन्‍हें सूर्य से प्रभावित घर कहते हैं। इनमें परिवार का मुखिया पुरुष होता है यानि पितृ सत्‍तात्‍मक परिवार इसमें निवास करता है। पुरुषों की संख्‍या अधिक होती है और महिलाएं कष्‍ट पाती हैं। घर के वर्किंग मैम्‍बर्स का संबंध राजकीय सेवाओं से होता है चाहे नौकरी के तौर पर हो या ठेकेदारी से। 
बुध का घर: 
इन घरों का मुंह उत्‍तर दिशा में होता है। इनमें कंसल्‍टेंट रहते हैं लेकिन चिकित्‍सक नहीं। उत्‍तर दिशा का संबंध क्रिएटिविटी से जोडा गया है। ऐसे में आर्कीटेक्‍ट, कैरियर काउंसलर, इंटीरियर डेकोरेटर, बैंकिंग सेवाओं से जुडे और मध्‍यस्‍थ की भूमिका निभाने वाले लोगों का स्‍थान बताया गया है। इन घरों में बच्‍चे अच्‍छी संख्‍या में होते हैं और धमाचौकडी मचाते रहते हैं।
शनि का घर: इन घरों का मुंह पश्चिम दिशा में होता है। नौकरी पेशा लोगों के रहने की जगह। दिन में किसी सरकारी या निजी प्रतिष्‍ठान में बंधुआ मजदूर की तरह काम करके आने के बाद लोग इस घर में आराम, आमोद-प्रमोद करते हैं और सुख-दुख की बातें होती हैं। ये लोग खुद निर्णय लेने वाले लोग नहीं होते। जैसे जिन्‍दगी इन्‍हें धक्‍का देती है ये उसी रास्‍ते पर निकल पडते हैं। किसी एक की समस्‍या पूरे परिवार के लिए मिशन बन जाती है। एक समस्‍या निपटाने के बाद दूसरी समस्‍या निपटाने की तैयारी शुरू हो जाती है। 

मंगल का घर: 

इन घरों का मुंह दक्षिण दिशा में होता है। इसमें चिकित्‍सक और लौंडे मजे करते हैं और आम आदमी दुख पाता है। आमतौर पर हॉस्‍टल या अस्‍पताल का मुंह दक्षिण में शुभ होता है। सबसे सफल हॉस्‍टल भी दक्षिण दिशा में ही हो सकता है। इन घरों से कोई प्‍यार नहीं करता। न मकान मालिक और न ही रहवासे। लौंडे दिनभर के थके मांदे आते हैं और उल्‍टी-सीधी हरकतें करने के बाद सो जाते हैं। अगले दिन बिना किसी देख-रेख के इसे छोड जाते हैं। चिकित्‍सक सुबह और शाम के समय पूजा पाठ की बजाय लोगों के दुख दर्द सुनता है और पैसा बनाता है। घर का ध्‍यान नौकर या नौकरानी रखते हैं। 

इन चार प्रमुख दिशाओं के आधार पर घरों को शुभ या अशुभ बताया जाता है। हालांकि इसके अलावा गुरू, चंद्रमा, राहू और शुक्र की भी दिशाएं होती है लेकिन मोटे तौर पर उन्‍हें नजर अंदाज कर दिया जाता है। 


गुरू की दिशा – उत्‍तर पूर्व 
शुक्र की दिशा– दक्षिण पूर्व 
चंद्रमा की दिशा– उत्‍तर पश्चिम 
राहू की दिशा– दक्षिण पश्चिम 

घर और घर का वातावरण
अब मैं चर्चा करना चाहूंगा घर के वातावरण और आस-पास के वातावरण के आधार पर घर पर ग्रह के प्रभाव की- 
1. गुरू का घर: 
इस घर में एयर सर्कुलेशन बेहतरीन होगा। यानि चारों ओर से भले ही खुला न हो लेकिन हवा का असर हर कमरे और कोठरी में देखने को मिलेगा। इस घर का दरवाजा प्राय: उत्‍तर पूर्व में होता है। या फिर किनारे में होगा लेकिन बीच में नहीं होता। घर के आस-पास धार्मिक स्‍थान होता है। पीपल का पेड भी हो सकता है।
2. सूर्य का घर: 
इस घर में प्राकृतिक रोशनी के उत्‍तम साधन होते हैं। घर के हर कोने में सूर्य की रोशनी पहुंचती है। चाहे अंडरग्राउंड ही क्‍यों न हो। घर के मुख्‍य द्वार का संबंध पूर्व दिशा से होता है और मकान के दाहिने हाथ की ओर पानी निकासी की व्‍यवस्‍था होती है। एक बात और ऐसे मकान में डिप्रेशन का मरीज अधिक दिन नहीं रह सकता। अगर रहेगा तो जल्‍दी ही ठीक भी हो जाएगा। इसमें ऊर्जा का प्रवाह जबरदस्‍त होता है। इसे संभाल लेने की क्षमता मुखिया में होती है इसी कारण आमतौर पर इस परिवार का मुखिया मैनेजमेंट या प्रशासन में होता है। निर्णय लेने वाले लोगों की ऐशगाह। 
3. चंद्र का मकान:
इस मकान में पानी की पूर्ति पूरी रहती है। कई बार तो घर के भीतर ही बोरिंग कर पानी की व्‍यवस्‍था की गई होती है। अन्‍यथा घर से थोडी ही दूरी पर पानी का बडा स्रोत अवश्‍य होता है। इस मकान में बडे परिवार रहते हैं। घर की महिलाओं के लिए मुखिया की आज्ञा अंतिम आदेश होती है। अधिकांशत: ऐसे मकान का मुंह उत्‍तर पश्चिम होता है और मुखिया के बैठने की जगह भी उत्‍तर पश्चिम होती है। ये लोग मिल जुलकर काम करने वाले लोग होते हैं। आमतौर पर इस घर में शांति रहती है लेकिन छोटी-मोटी घटना भी इन लोगों को अन्‍दर तक झकझोर देती है। 
4. शुक्र का मकान: 
बनावट आलीशान वरना कच्‍ची जमीन के बीच बना हुआ आशियाना। दक्षिण पूर्व में इसका मुंह होने से मंगल और सूर्य की विशेषताएं लेकर शुक्र यहां आमोद करता है। यहां रहने वाले लोग नाजुक स्‍वभाव के और तरक्‍की पसंद होते हैं। इन घरों को कभी दक्षिण में गिन लिया जाता है तो कभी पूर्व में। लेकिन शुक्र का अपना रोल होता है। वह या तो मकान को हद तक खूबसूरत बना देता है या फिर कच्‍ची मिट्टी के बीच बना शांत स्‍थान। दोनों की मामलों में घर के भीतर का वातावरण खुशनुमा रहता है। इस घर में लाल रंग का अधिक उपयोग होता है। महिलाएं तेजी से तरक्‍की करती हैं और पतियों पर राज करती हैं। 
5. मंगल का मकान: 
जैसा कि मैं पहले बता चुका हूं कि ऐसे मकान चिकित्‍सकों के लिए होते हैं। यह आग रखने का स्‍थान है। इसके उपचार के लिए दक्षिण की दीवार पर मंदिर बनाकर आग जलाए रखने से घर की कलह में कुछ हद तक कमी आती है। किस्‍मत वाले लोगों को ऐसा घर बनाने के बाद भी इसमें रहने का अवसर नहीं मिल पाता है। अत: यह किराए पर अधिक रहता है। 
6. बुध का मकान: 
इस घर का मुंह प्राय: उत्‍तर दिशा में ही होगा लेकिन इसकी विशेषता होगी हर कोने का खुला होना। यानि मालिक अपना घर जमीन के बीचों-बीच बनाने की कोशिश करता है। घर में कच्‍ची जमीन होती है और न भी हो तो पेड पौधों के लिए गुंजाइश रखी जाती है। चाहे गमले में ही क्‍यों न हो। हरी पत्तियों के बीच बैठा इंसान लगातार सोचता है। भले ही आगे बढने की न सोचे पर अपने और दूसरों को जीवन को बेहतर बनाने के बारे में विचार करता रहता है। क्रिएटिव माइंड और कंसल्‍टेंसी इसकी फितरत है। 
7. शनि का मकान: 
घर का बडा दरवाजा पश्चिम दिशा में होगा। घर के भीतर घुसते ही दांयी ओर बनी कोटडी में रोशनी कम होगी। इस कोटडी को जब भी नीम अंधेरे में रखा जाएगा मकान मालिक का दिन अच्‍छा जाएगा। मकान में पत्‍थर गडा होता है। पुराना सा दिखाई देता है। बनाने के कुछ ही दिनों के भीतर ऐसा दिखाई देने लगता है जैसे सालों पहले बनाया हो और अब इसे रंग रोगन की जरूरत है। कितना ही संवार लो सुंदरता आ नहीं पाती। ताजगी का एकांतिक अभाव रहता है। इस घर में बडा गर्डर या खम्‍भे की गुंजाइश हमेशा होती है जो इसे हल्‍की भव्‍यता प्रदान करती है। 
8. राहू का मकान: 
राहू का काम ही गुमनामी का है। आप समझ सकते हैं कि घर के भीतर जाते ही ऐसा महसूस होगा कि जो कुछ दिखाई दे रहा है इससे इतर कुछ और इस मकान में है। भले ही सीधा-सादा मकान ही क्‍यो न हो। मुख्‍य द्वार में प्रवेश करने के बाद दाहिनी ओर गुमनाम गड्ढा होने की संभावना होती है। प्रवेश द्वार के नीचे से घर का गंदा पानी बहता हुआ बाहर निकलता है। सामने का घर या तो खाली होगा या उस मकान के मालिक के कोई संतान नहीं होगी। मकान की दीवारें वही रहती हैं और छत बदलती रहती है। मकान के बिल्‍कुल पास धुंआ छोडने वाली भट्टी होती है या गंदा पानी जमा करने का गड्ढा। कॉमन सेप्टिक टैंक भी हो सकता है जिसमें इलाके के कई घरों का गंदा पानी एकत्र होता हो। 
9. के‍तू का मकान: 
ऐसा घर जिसकी दीवारें दो गलियों से लगी हों। यानि कोने का मकान और तीन तरफ से खुला। इस घर में हवा आती है लेकिन कहां से पता नहीं लगता। साथ का एक मकान या तो गिरा हुआ होगा या‍ फिर बर्बाद हुआ होगा। साथ के मकान में कुत्‍तों के टट्टी जाने का स्‍थान होगा। केतू के मकान में नर संतान तीन या तीन से कम होती है। इससे अधिक नहीं हो पाती।

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मांगलिक होना विशिष्‍टता है, दोष नहीं——

आमतौर पर मांगलिक शब्‍द का स्‍वर घरों में तब सुनाई देता है जब कन्‍याएं शादी के योग्‍य नजर आने लगती हैं। कन्‍या मांगलिक हो तो मांगलिक लड़का ढूंढना पड़ता है और मांगलिक न हो तो भी लड़का तो ढूंढना ही पड़ता है। कई बार कुण्‍डली मिलान पर बात आकर अटक जाती है। कभी लड़की मांगलिक निकलती है तो कभी लड़का। इसके चलते कई अच्‍छे संबंध बनते-बनते रह जाते हैं। 
जैसा कि लोगों के मुंह से सुनता हूं कि मांगलिक दोष होता है और इसे कन्‍या में तो होना ही नहीं चाहिए। वर में हो तो चल जाता है लेकिन कन्‍या में मांगलिक दोष वैवाहिक जीवन को खराब कर देता है। मैं खुद भी इस थ्‍योरी को मानता हूं। इसलिए नहीं कि मैं पुरातनपंथी हूं बल्कि इसलिए कि मैं कल्‍पना कर सकता हूं कि एक मांगलिक लड़की की एक गैर मांगलिक लड़के साथ शादी कर दी जाए तो कन्‍या, वर पर हर तरह से हावी रहेगी। अब अगर ऐसा होता है तो वैवाहिक जीवन तो खराब होना ही है। इसके विपरीत वर मांगलिक हो और कन्‍या मांगलिक न हो तो वर हावी रहेगा और वैवाहिक जीवन ठीक चलता रहेगा। हो सकता है भारतीय सभ्‍यता की यह पुराने समय में तो ठीक रही होगी लेकिन आज के परिपेक्ष्‍य में देखा जाए तो पति और पत्‍नी दोनों ही बराबरी के हकदार हैं। सो या तो दोनों ही मांगलिक हों या दोनों ही गैर मांगलिक। इसमें अर्थ इतना ही है कि आपस की हार्मोनी बनी रहे। क्‍या जरूरत है कि रिश्‍ते में एक पक्ष हावी रहे। हो सकता है कुण्‍डली मिलान करने वाले बहुत से ज्‍योतिषियों को इस हार्मोनी के बारे में जानकारी न हो लेकिन वे इस आधार पर बन रहे बेमेल जोड़े को जाने-अनजाने रोकने की कोशिश करते हैं। गंभीरता के कुण्‍डली मिलान कराने वाले अधिकांश परिवारों में इस कारण तलाक के मामले भी बहुत कम होते हैं।
अब दूसरा पक्ष यानि मांगलिक होने का अर्थ क्‍या है ?
कोई जातक चाहे वह स्‍त्री हो या पुरुष उसके मांगलिक होने का अर्थ है कि उसकी कुण्‍डली में मंगल अपनी प्रभावी स्थिति में है। शादी के लिए मंगल को जिन स्‍थानों पर देखा जाता है वे लग्‍न, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें भाव हैं। इनमें से केवल आठवां और बारहवां भाव सामान्‍य तौर पर खराब माना जाता है। सामान्‍य तौर का अर्थ है कि विशेष परिस्थितियों में इन स्‍थानों पर बैठा मंगल भी अच्‍छे परिणाम दे सकता है। तो लग्‍न का मंगल व्‍यक्ति की पर्सनेलिटी को बहुत अधिक तीक्ष्‍ण बना देता है, चौथे का मंगल जातक को कड़ी पारिवारिक पृष्‍ठभूमि देता है। सातवें स्‍थान का मंगल जातक को साथी या सहयोगी के प्रति कठोर बनाता है। आठवें और बारहवें स्‍थान का मंगल आयु और शारीरिक क्षमताओं को प्रभावित करता है। इन स्‍थानों पर बैठा मंगल यदि अच्‍छे प्रभाव में है तो जातक के व्‍यवहार में मंगल के अच्‍छे गुण आएंगे और खराब प्रभाव होने पर खराब गुण आएंगे। जैसे एक आला दर्जे का सर्जन भी मांगलिक हो सकता है और एक डाकू भी। यह बहुत सामान्‍य उदाहरण है। यही स्थिति उच्‍च स्‍तरीय मैनेजर और सेना के अधिकारी में भी देखी जा सकती है जिसे कि कठोर निर्णय लेने हैं। मांगलिक व्‍यक्ति देखने में ललासी वाले मुख का, कठोर निर्णय लेने वाला, कठोर वचन बोलने वाला, लगातार काम करने वाला, विपरीत लिंग के प्रति कम आकर्षित होने वाला, प्‍लान बनाकर काम करने वाला, कठोर अनुशासन बनाने और उसे फॉलो करने वाला, एक बार जिस काम में जुटे उसे अंत तक करने वाला, नए अनजाने कामों को शीघ्रता से हाथ में लेने वाला और लड़ाई से नहीं घबराने वाला होता है। इन्‍हीं विशेषताओं के कारण गैर मांगलिक व्‍यक्ति अधिक देर तक मांगलिक के सानिध्‍य में नहीं रह पाता।
इन विशेषताओं और इसी के कारण पैदा हुई बाध्‍यताओं के कारण एक मांगलिक व्‍यक्ति की गैर मांगलिक से निभ नहीं पाती है। इस कारण दोनों को अलग-अलग करने की कोशिश की जाती है। सेना में प्रवेश लेने वाले अधिकांश लोग किसी न किसी कारण से मांगलिक असर वाले होते हैं। आपने भी गौर किया होगा कि सिविलियन्‍स से सेना को अलग रखा जाता है। कमोबेश इसका कारण यह भी होता है कि जिस डिसिप्लिन को सेना फॉलो करती है उसे आम आदमी समझ नहीं सकता और आम आदमी की गतिविधियों को सेना का जवान समझ नहीं पाता।
लॉजिकल एप्रोच
मांगलिक लोगों की यह एक और बड़ी खासियत होती है कि उनकी किसी भी काम के प्रति बहत लॉजिकल एप्रोच होती है। दुनियादारी में या प्रेम में दो और दो पांच हो सकते हैं लेकिन एक मांगलिक व्‍यक्ति के लिए दो और दो चार ही होंगे। प्‍यार में भी। इसी कारण किसी कुण्‍डली में मंगल और शुक्र की युति जातक को गणितज्ञ भी बना देती है। इसमें लॉजिक और लॉजिक के साथ लग्‍जरी का भाव होता है। आपको ऐसे लोगों का समूह सिलिकॉन वैली में दिखाई दे सकता है। ऑस्‍ट्रेलियाई चिंतक एलन पीज की मानूं तो पुरुष स्त्रियों की तुलना में अधिक लॉजिकल होते हैं। मुझे भी यही लगता है। इसी कारण सिलिकॉन वैली में शादियों की औसत आयु चार वर्ष है। सौ प्रतिशत लॉजिकल पुरुषों और लॉजिक के साथ कॉम्‍प्रोमाइज करने वाली स्त्रियों की अधिक दिनों तक बन नही पाती।
Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>कुछ अनुभूत और सिद्ध योग—–

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कुछ अनुभूत और सिद्ध योग—–

ज्‍योतिष अध्‍ययन के दौरान पढ़ने का तरीका भले ही परम्‍परागत हो लेकिन नाड़ी की तर्ज पर कुछ योग ऐसे भी बने जो वर्तमान दौर में अधिकांशत: ठीक बैठते हैं। इनके आधार पर विश्‍लेषण और फलादेश किया जाए तो उनके सटीक होने की संभावना बढ़ती है। हमारे ग्रुप में हर एक के पास खुद के नोट्स हैं जिनमें इस प्रकार के अनुभूत और सिद्ध योगों को समेटा गया है। अपनी डायरी के पन्‍नों में अलग-अलग बिखरे हुए कुछ योगों को यहां समेटने का प्रयास कर रहा हूं।

- फुटबॉल और क्रिकेट के खेल में मैच से पूर्व किसी जातक द्वारा सवाल पूछा जाने पर जिस टीम का नाम पहले आए उसे लग्‍न बना दो और दूसरी टीम को सातवें भाव का आधिपत्‍य दे दो। इससे दोनों टीमों की कुण्‍डलियां बन जाएंगी। पहली टीम के पांचवे भाव से टॉस का निर्णय होगा और ग्‍यारहवें भाव से होने वाले गोल की संख्‍या या पहली बारी में बनने वाले रनों की संख्‍या का अनुमान लगाया जा सकता है। फुटबाल वर्ड कप में यह प्रयोग बहुत सफल रहा था। बाद में इसे क्रिकेट पर भी लगाकर देख चुका हूं। बहुत करीबी फलादेश आते हैं।

- जो ग्रह दशानाथ के नक्षत्र में स्थित होता है वह अपने भाव और राशि के अनुसार दशानाथ के साथ मिलकर किसी दशा का परिणाम देता है।

- पाराशर की मानें तो दशा की तुलना में अंतरदशा अधिक सूक्ष्‍म विश्‍लेषण पेश करती है। इसी की तर्ज पर कहा जा सकता है कि किसी राशि में बैठे ग्रह की तुलना में यह देखना अधिक सटीक होगा कि ग्रह किस नक्षत्र में स्थित है।

- केतू की दशा में शनि और शनि की दशा में केतू हमेशा खराब परिणाम ही देंगे। चाहे ये किसी भी राशि या भाव में क्‍यों न हो। ऐसा ही फलादेश चंद्रमा और राहू के लिए भी होना चाहिए।

- शेयर और सट्टे में मूल अन्‍तर यह है कि शेयर में पैसा लगाने के बाद जातक के हाथ में कुछ बचा रहता है। यह पूर्णतया तरल न भी हो तो इसका कुछ हिस्‍सा तरल होने की क्षमता रखने वाला होता है वहीं दूसरी ओर सट्टा एक साथ लगता है और पूरे पैसे लगते हैं। यानि सीधा हार जीत का सौदा होता है। शेयर में नुकसान की सीमा आंशिक से अधिकतम तक होती है वहीं सट्टे में सौ प्रतिशत लाभ या हानि होते हैं। इसलिए दोनों के लिए कारक और ग्रह स्थितियां अलग-अलग होंगे

- आठवां भाव ऑपरेट होने वाला हो और कुण्‍डली में अप्रत्‍याशित लाभ के योग भी हों तो पूरी तैयारी के साथ शेयरों की खरीद की जा सकती है। आठवां भाव अपना समय आते ही उम्‍मीद से ज्‍यादा लाभ दिला सकता है।

- भौतिक संयोग फलादेश में कुण्‍डली पठन और सामुद्रिक के बराबर भूमिका का निर्वहन करते हैं। इन्‍हें ओमेन से समझा जा सकता है।

- मूक प्रश्‍न में चंद्रमा जिस भाव में सवाल उसी के संबंध में होता है। और यदि ज्‍योतिषी अपनी मर्जी से जातक के बताने से पहले प्रश्‍न का उत्‍तर देना चाहता है तो जातक के आने के समय जहां लग्‍नेश होगा प्रश्‍न भी उसी से संबंधित होगा। अन्‍यथा लग्‍न अथवा चंद्रमा में से जो अधिक शक्तिशाली हो वहां से फलादेश देना उत्‍तम रहेगा।

- राहू ऐसा ग्रह है जो कुण्‍डली में बद होने के साथ ही जातक को गंदे पानी के पास ला बैठाता है। राहू का प्रभाव अधिक होने पर जातक अपना कमरा भी दक्षिणी पश्चिमी कोने में शिफ्ट कर लेता है।

- राहू का उत्‍तम प्रभाव ऐसा होता है कि जातक अठारह साल की दशा के दौरान संयुक्‍त परिवार में रहता है। बाग बगीचे लगाता है और लगातार अपना विकास करता है लेकिन दिमागी फितूर का दौर तो फिर भी जारी रहता है।

- कुण्‍डली में कहीं भी सूर्य और केतू की युति हो तो जातक आदतन झूठ बोलने वाला होता है। यह मेरा अनुभूत योग है। मैं इस योग को आंकने से चूकने की गलती दो बार कर चुका हूं। इसका मुझे दुष्‍परिणाम भी भोगना पड़ा। मैं यह नहीं कहता कि ये लोग अपने लाभ के लिए झूठे होते हैं। ये यों ही झूठ बोल देते हैं बिना किसी कारण के। कई बार जब स्‍पष्‍ट झूठ बोल रहे होते हैं तो पकड़े जाने के बावजूद ढिठाई से अपने झूठ के साथ चिपके रहते हैं। इन लोगों के चेहरे पर मैंने तो कभी शिकन भी नहीं देखी। 

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ज्‍योतिष में शोध की संभावनाएं—-

कुण्डली देखने के दौरान कई बार ऐसा लगता है कि पूर्व में दिए गए सिद्धांत अब पुराने पड़ने लगे हैं। लोगों कीकई जरूरतें और दिए गए सिद्धांतों से परे नजर आती है। हो सकता है ज्योतिष की बहुत सी विधाएं औरबिंदुओं से मैं अनभिज्ञ होउंलेकिन फिर भी एक बात दावे से कही जा सकती है वह यह कि इस विज्ञान में अबभी शोध की अनन् संभावनाएं मौजूद है।

स्त्रियों के लिए

ज्योतिष में मूल रूप से जो योग दिए गए हैं उनमें से अधिकांश शुभ-अशुभ योग पुरुषों को ध्यान में रखकरदिए गए हैं। स्त्रियों के लिए महज कुछ योग हैं वे भी पुरुषों को यह बताने के लिए है कि स्त्री कैसी हो। मेरी एकपोस् में मैनें स्त्री की सुंदरता पर लिखा तो कई महिला ब्लॉगरों ने  केवल मुझे गालियां निकाली बल्कि यहजिज्ञासा भी प्रकट की कि क्या ऐसी ही कोई कसौटी पुरुषों के लिए भी बनी है क्या?
मुझे खेद के साथ बताना पड़ेगा कि पुरुषों को विवाह के योग् जांचने के लिए ऐसी किसी कसौटी को मैं ढूंढनहीं पाया हूं। हां लेकिन किसी पुरुष की कुण्डली देखकर यह बताया जा सकता है कि वह जिन्दगी में कितनासफल होगा और विकास की क्या संभावनाएं हैं। प्रेम करता है या नहींअपनी स्त्री से इसकी कैसी बनेगीजैसी कुछ बातें बताई जा सकती है लेकिन कोई तय पैमाने नहीं छोड़े गए हैं जैसे कि स्त्रियों के लिए दिए गएहैं।
ज्योतिष में अब तक हुए अधिकांश शोधों का आधार तात्कालिक आवश्यकताओं के अनुरूप होता है। ऐसे मेंप्राचीन काल में ‘शिकारी पुरुष’ और ‘घोंसला संभालने वाली स्त्री’ अपन-अपने काम कर रहे थे। सभ्यता केविकास के साथ लाइफ स्टाइल बदली और कम शारीरिक क्षमता वाले सार्वजनिक कामों में स्त्रियों कीभागीदारी बढ़ी। अब भी स्त्रियों का मुख् काम बच्चे पैदा करना और घर संभालना था। विलासिता में हुईबढ़ोतरी का परिणाम यह रहा कि बेहतर संतान के लिए बेहतर स्त्रियों की खोज होने लगी। ताकतवर वंश काअधिपति वंश की वृद्धि के लिए एक से अधिक स्त्रियों का वरण करने लगा ताकि उसे श्रेष्ठतम संतान प्राप् होसके। इसे कुछ-कुछ अच्छी नस् की गाएं पालने जैसा काम कह सकते हैं। बस यहां चुनाव करने वाला खुदश्रेष् सांड ही होता था।
युग बदला और भौतिक सुविधाएं और बढ़ी। कल के युग (कलयुगमें मशीनें ताकत का पर्याय बन चुकी है।शारीरिक क्षमताएं महज खेलों का हिस्सा है। अब वह हर काम जो पुरुष कर सकता है स्त्रियां भी कर सकतीहैं। ऐसे में बेहतर का चुनाव दोनों पक्षों की च्वाइस बन चुका है। ऐसे में स्त्री की सुंदरता के साथ पुरुष कीजनन क्षमता और काबिलियत की जांच जैसी आवश्यकताएं भी पैदा हुई है। किसी ज्योतिषी के पास इसकावाजिब जवाब  भी हो तो इसके हल्के फुल्के संकेत मिल सकते हैं। बाकी विशद शोध किया जाए तो पुरुषों केलिए भी ऐसे नॉर्म् बन सकेंगे जैसे स्त्रियों के लिए बने हैं।

कौन बनेगा राजा?

यह तो हुई स्त्री और पुरुष की बात मुझे अन् कई बिंदुओं पर भी शोध की आवश्यकता महसूस होती है।इनमें से एक है राजयोग। यानि राजा बनने की संभावनाव्यापक रूप में राजसी जीवन यापन की संभावना।पूर्व में हुए शोध बतलाते हैं कि मोटे तौर पर कुण्डली में सूर्य की बेहतर स्थिति राजा बनने की संभावना पैदाकरती है। इसी तरह गुरु से राजपुरोहितमंगल से सेनापतिशुक्र से ऐश्वर्य और शनि से भृत्य। समय के साथशासन प्रणाली में हुए बदलाव का नतीजा यह है कि राजा दैवीय होने के बजाय प्रजा द्वारा चुना गया वह व्यक्तिहोता है जो जनता की सेवा करता है। यानि जो जितना अधिक अच्छा सेवक होगा वह उतनी ही ऊंची गद्दी परबैठेगा। यकीन मानिए ऐसा ही हो रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लग् में शनि था। मैंने उनकीकुण्डली नहीं देखी लेकिन ऐसा ही बताया जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की कुण्डली मेंलग् में शनि था। और अब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी की कुण्डलीमें भी लग् में शनि है। यानि शनि की प्रमुखता शासन की प्रमुखता दिलाती है। इस बारे में अब तक तो कोईशोध मैंने नहीं देखा हैलेकिन ऐसे अन् लोगों का विश्लेषण किया जाए तो पता चलेगा कि पूर्व में दिए गएअधिकांश‍ नियम समय के साथ बदलते जा रहे हैं। तो मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि सूर्य की बजाय शनिताकत और अधिकार का पर्याय बन रहा है। कैसेइस सवाल का जवाब जानने के लिए ही शोध कीआवश्यकता है।

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कालसर्प योग के सफल होने की कहानी—-

भले ही सुनने में अजीब लगे, लेकिन एक बात पहले स्‍पष्‍ट कर देना चाहता हूं कि ऐसा कोई योग होता ही नहीं है
ज्‍योतिष की किसी भी शाखा में कभी भी कालसर्प जैसा योग नहीं बताया गया है। पिछले दो-तीन दशक में इस योग का जन्‍म हुआ और इसका असर इतना अधिक व्‍यापक बताया गया कि यह तेजी से सफल हुआ। आज भारत के किसी भी कोने में चले जाइए, पुराना हो या नया ज्‍योतिषी, प्राचीन भारतीय ज्‍योतिष का पक्षधर हो या पश्चिमी हर कोई कालसर्प योग को नकारने में असहज महसूस करेगा।
क्‍या है कालसर्प योग?
प्राचीन भारतीय ज्‍योतिष में सर्प योग बताया गया है। इस योग का अर्थ है कि कुण्‍डली में सात ग्रह राहू और केतु के एक ओर आ गए हैं। फर्ज कीजिए मेष में राहू है और तुला में केतु इसके साथ सारे ग्रह मेष से तुला या तुला से मेष के बीच हों। इसे सर्प योग कहा जाएगा। ऐसा माना गया है कि राहू सरीसृप है और इसके सिर से पूंछ के बीच सारे ग्रह हैं। बाद में जोधपुर के एक ज्‍योतिषी ने इस योग को कालसर्प बना दिया। यानि समय पर सांप कुण्‍डली मारकर बैठा हुआ। इन लोगों को उपचार नासिक के महाकाल मंदिर में शुरू किया गया और सफलता मिलने के कसीदे गढ़े गए। अति तो तब हुई जब जोधपुर से नासिक तक बाकायदा बस तक चलने लगी। बाद में देश के अन्‍य ज्‍योतिषियों ने भी बहती गंगा में हाथ धोए। सर्प से कालसर्प बना और कालसर्प से अब विषधकर कालसर्प, नागराज कालसर्प, विपरीत कालसर्प और राजयोग कालसर्प तक बनने लगे हैं। इससे जातकों को इस तरह शापित कर दिया जाता है कि संबंधित व्‍यक्ति के जुकाम भी हो जाए तो लगता है कालसर्प का दोष आड़े आ रहा है।
कैसे हुआ यह ?
इसे एक लाइन में कहूं तो लोगों के छिछले दु:खों ने इस योग का पोषण किया। अधिक स्‍पष्‍ट करूं तो प्रगति में बाधा एक ऐसा शब्‍द है जिसे कई मायनों में उपयोग किया जा सकता है। हर कोई जिन्‍दगी में भाग्‍योदय चाहता है। भाग्‍योदय का अर्थ हुआ कि छप्‍पर फाड़कर कब मिलेगा। होता यह है कि कुछ लोगों को छप्‍पर फाड़कर मिलता भी है। बाकी लोगों की आस बाकी रहती है। ऐसे में ‘छप्‍पर फटने में आ रही बाधा‘ के बारे में लोग जब ज्‍योतिषी से पूछते हैं तो ज्‍योतिषी उन्‍हें बतलाता है कि आपकी कुण्‍डली में कालसर्प योग है सो आप सफल नहीं हो सकते हैं। अब उपाय करना होगा। और लोग लग जाते हैं उपाय करने। उपाय के दौरान पूरा ध्‍यान सफलता और उसके प्रयासों पर लगता है। सफलता मिल जाए तो कालसर्प का ईलाज हो गया और सफलता न मिले तो ठीकरा बेचारे कालसर्प पर फूटना है ही।

कोई नहीं है शापित
एक बार रविन्‍द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि शिशु के जन्‍म को देखकर लगता है कि ईश्‍वर अब तक मनुष्‍य से निराश नहीं हुआ है। मुझे भी ऐसा लगता है। अगर एक इंसान ईश्‍वर की प्रिय संतान है तो हर इंसान ईश्‍वर की उतनी ही प्रिय संतान होगा। निर्गुण ब्रह्म की रुचि अलग-अलग इंसान पैदा करने की रही भी नहीं होगी। आवश्‍यकता है तो बस अपनी क्षमताओं को पहचानकर सफल होने की।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 27, 2011

>प्रश्‍न कुण्‍डली और फलादेश—–

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प्रश्‍न कुण्‍डली और फलादेश—–

कई बार लोगों की उलझन होती है कि हमारा जन्‍म समय या तिथि सही ज्ञात नहीं है। ऐसे में ज्‍योतिष संबंधी फलादेश कैसे किए जाएं। ज्‍योतिष में इसका सटीक जवाब प्रश्‍न कुण्‍डली है।
पिछले कुछ सालों में अस्‍पतालों में शिशु जन्‍म की स्थितियां बढ़ने के कारण जन्‍म समय कमोबेश सही मिलने लगे हैं। पर अब भी जन्‍म समय को लेकर कई तरह की उलझनें बनी हुई है। आमतौर पर शिशु के गर्भ से बाहर आने को ही जन्‍म समय माना जाता है। इसके अलावा माता से नाल के कटने या पहली सांस लेने का भी जन्‍म समय लेने के मत देखने को मिलते हैं। ऐसे में प्रश्‍न कुण्‍डली ऐसा जवाब है जिससे जन्‍म तिथि और जन्‍म समय को नजरअंदाज किया जा सकता है।
प्रश्‍न कुण्‍डली वास्‍तव में समय विशेष की एक कुण्‍डली है जो उस समय बनाई जाती है, जिस समय जातक प्रश्‍न पूछता है। यानि जातक द्वारा पूछे गए प्रश्‍न का ही भविष्‍य देखने का प्रयास किया जाता है। इसमें सवाल कुछ भी हो सकता है। आमतौर पर तात्‍कालिक समस्‍या ही सवाल होती है। ऐसे में समस्‍या समाधान का जवाब देने के लिए प्रश्‍न कुण्‍डली सर्वाधिक उपयुक्‍त तरीका है। ध्‍यान रखने की बात यह है, कि प्रश्‍न के सामने आते ही उसकी कुण्‍डली बना ली जाए। इससे समय के फेर की समस्‍या नहीं रहती। इसके साथ ही जातक की मूल कुण्‍डली भी मिल जाए और वह प्रश्‍न कुण्‍डली को इको करती हो तो समस्‍या का हल ढूंढना और भी आसान हो जाता है। कई बार जातक जो मूल कुण्‍डली लेकर आता है, वह भी संदेह के घेरे में होती है। ओमेने (जो कि संकेतों का विज्ञान है) बताता है कि जातक का ज्‍योतिषी के पास आने का समय और जातक की कुण्‍डली दोनों आमतौर पर एक-दूसरे के पूरक होते हैं। ऐसे में प्रश्‍न कुण्‍डली बना लेना फलादेश के सही होने की गारंटी को बढ़ा देता है।
प्रश्‍न कुण्‍डली के साथ सबसे बड़ी समस्‍या यही है कि जातक के सवाल का सही नहीं होना। ज्‍योतिष की जिन पुस्‍तकों में प्रश्‍नों के सवाल देने की विधियां दी गई हैं उन्‍हीं में छद्म सवालों से बचने के तरीके भी बताए गए हैं। इसका पहला नियम यह है कि ज्‍योतिषी को टैस्‍ट करने के लिए पूछे गए सवालों का जवाब कभी मत दो। ऐसा इसलिए कि ओमेने के सिद्धांत के अनुसार छद्म सवाल का कोई उत्‍तर नहीं होता। जातक का सवाल सही नहीं होने पर प्रश्‍न और कुण्‍डली एक-दूसरे के पूरक नहीं बन पाते हैं। ऐसे में प्रश्‍न कुण्‍डली बनाने के साथ ही ज्‍योतिषी को प्रश्‍न के स्‍वभाव का प्रारंभिक अनुमान भी कर लेना चाहिए। इससे प्रश्‍न में बदलाव की संभावना कम होती है। 
कमोबेश एक जैसे सवाल
ज्‍योतिष कार्यालय चलाने वाले लोग जानते हैं कि एक दिन में एक ही प्रकार की समस्‍याओं वाले लोग अधिक आते हैं। इसका कारण यह है कि गोचर में ग्रहों की जो स्थिति होती है उससे पीडि़त होने वाले लोगों का स्‍वभाव भी एक जैसा ही होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि समान राशि या कुण्‍डली वाले लोगों को एक जैसी समस्‍याएं होगी बल्कि ग्रह योगों की समान स्थिति से समान स्‍वभाव की समस्‍याएं सामने आएंगी। मेरा अनुभव बताता है कि जिस दिन गोचर में चंद्रमा और शनि की युति होगी, तो उस दिन मानसिक समस्‍याओं से घिरे लोग अधिक आएंगे। हां, मानसिक समस्‍याओं का प्रकार लग्‍न और अन्‍य ग्रहों के कारण बदल जाता। कोई सिजोफ्रीनिया से पीडि़त हो सकता है तो कोई क्रोनिक डिप्रेशन का मरीज हो सकता है। किसी को दिमागी सुस्‍ती की समस्‍या हो सकती है तो कोई साइको-सोमेटिक डिजीज से ग्रस्‍त हो सकता है। इस तरह प्रश्‍न कुण्‍डली से एक ओर जातक का विश्‍लेषण आसान हो जाता है तो दूसरी ओर भूतकाल स्‍पष्‍ट करने के बजाय भविष्‍य कथन में अधिक ध्‍यान लगाया जा सकता है।
प्रश्‍न कुण्‍डली के फायदे 

- जन्‍म समय का फेर नहीं होता

- अगर आपको पास सॉफ्टवेयर है तो यह हाथों-हाथ तैयार हो जाती है

- सही सवालों के जवाब स्‍पष्‍ट मिलते सकते हैं
- हर तरह के सवाल का जवाब दिया जा सकता है, बशर्ते सवाल सही हो।
- जिन लोगों को जन्‍म समय नहीं हैं, उनके अलावा जिन लोगों की गलत कुण्‍डली बनी हुई है वे भी अपनी चिंताओं का सही जवाब ले सकते हैं।
- भविष्‍य कथन के बजाय मौजूदा समस्‍याओं से संबंधित कई सवालों के सटीक जवाब मिलते हैं
- मैंने देखा है कि भविष्‍य कथन के बजाय ऐसे सवाल जिनके हां या ना में उत्‍तर होते हैं उनके सटीक जवाब मिल जाते हैं।

आज के मुहूर्त और राशिफल —28 मार्च, 2011

28 मार्च, 2011: सोमवार, जब तक 6:48 नवमी कृष्णा,

* 00:22 Uttarashadha तक, 5:42 * जब तक शिव योग,

जब तक 6:48 करण Garija, जब तक 19:31 करण Vanija,

RahuK: * 7:52-9:21 *, GulikaK: 13:51 * – * 15:21, YamaG: 10:51 * – 0:21 *,

18:33 पर सूर्योदय पर 6:19 सूर्यास्त, *,

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March 28, 2011: Monday, Krishna Navami till 6:48,

Uttarashadha till 0:22*, Siva yoga till 5:42*,

Garija karana till 6:48, Vanija karana till 19:31,

RahuK: 7:52* – 9:21*, GulikaK: 13:51* – 15:21*, YamaG: 10:51* – 12:21*,

Sunrise at 6:19*, Sunset at 18:33,

Moonrise at 3:12*, Moonset at 13:14, Moon in Makar (whole day)

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राशिफल–28, मार्च 2011 —दैनिक राशिफल

राशि फलादेश मेष—-प्रयास का उचित फल मिलेगा। दुस्साहसपूर्ण कार्यों से दूर रहे। नए कार्य-व्यापार में सफलता मिलेगी। संतान की ओर से सुखद समाचार मिलेंगे।

राशि फलादेश वृष—त्मविश्वास में वृद्धि होगी। आजीविका में उन्नति होगी। व्यापार में महत्वपूर्ण सौदे आपके पक्ष में होने की संभावना है। जीवनसाथी से विवाद संभव।

राशि फलादेश मिथुन—विलासिता की वस्तु क्रय करने का योग बनेगा। परिवार की चिंता रहेगी। व्यापार में विस्तार हेतु प्रयास अधिक करना पड़ेगा। संपर्क क्षेत्र बढ़ेगा।

राशि फलादेश कर्क–समाज में आपकी आलोचना होगी। पारिवारिक समस्या की ओर ध्यान दें। कार्यस्थिति में सुधार की संभावना है। व्यापार में सफलता मिलेगी।

राशि फलादेश सिंह—कानूनी उलझनें बढ़ सकती हैं। नई योजना में लाभ के योग हैं। आमदनी बढ़ने से निवेश में वृद्धि होगी। आपकी महत्वाकांक्षा कार्य में अनुकूल सफलता दिलाएगी।

राशि फलादेश कन्या—मांगलिक कार्यों की योजना बनेगी। शत्रुपक्ष से सावधान रहना होगा। पारिवारिक वातावरण उत्साहवर्धक रहेगा। व्यापार-व्यवसाय अच्छा चलेगा। मान-सम्मान में वृद्धि होगी।

राशि फलादेश तुला—आजीविका संबंधी कार्य होंगे। आपके प्रयासों में इच्छानुरूप सफलता प्राप्त नहीं होगी। लाभ में कमी आएगी। व्यर्थ के विवाद उलझन में डाल सकते हैं।

राशि फलादेश वृश्चिक—-परिवार के सदस्यों की चिंता रहेगी। दिन मध्यम फल देने वाला है। सोच-समझकर कार्य करें। अधिक प्रयास करने पर भी कम फल मिलेगा। व्यापार लाभदायक रहेगा।

राशि फलादेश धनु—-कार्यों के मनचाहे परिणाम मिलेंगे। उत्तेजना से काम न लें। अधिकारी सहयोग करेंगे। महत्वपूर्ण कार्य निर्विघ्न संपन्न होने की संभावना है।

राशि फलादेश मकर—नई योजनाओं का सूत्रपात होगा। स्वास्थ्य मध्यम रहेगा। साझेदारी में नए अनुबंध हो सकते हैं। घर का ध्यान रखें। चोरी की आशंका है।

राशि फलादेश कुंभ—नई वस्तु क्रय करने की संभावना है। साहित्य में रुचि बढ़ेगी। कार्यों के मनचाहे परिणाम मिल सकेंगे। परिवार में खुशी का माहौल रहेगा।

राशि फलादेश मीन—व्यापार में लाभ मानसिक प्रसन्नता देगा। उत्साह में वृद्धि होगी। संतान पक्ष के कामों की चिंता रहेगी। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। यात्रा होगी।

प्रिय मित्रो और स्वजनों, आप सभी का आभार  और धन्यवाद…आप सभी के सहयोग और इश्वर कृपा  से अंततः ” विनायक वास्तु टाईम्स ” का आरम्भ/ प्रसारण हो पाया हे/ गया हे…  यह एक प्रयास के वास्तु, ज्योतिष,हस्तरेखा/ लालकिताब /पल्मिस्ट्री/ कविताओ व् सूचनाओ और कर्मकांड/ मंत्र सम्बन्धी लेखो के संग्रह का../ संकलन का …..में उन सभी विद्वान् लेखकों. प्रकाशकों और संपादको का धन्यवाद ज्ञापित करता हु…आभार व्यक्त करता हु..जिनके लेख या अन्य सामग्री इस ब्लॉग संग्रह–”विनायक वास्तु टाईम्स” में प्रयोग में ली गयी हे….प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप  से….इसे एक समाचार पत्र का स्वरूप देने का प्रयास किया गया हे..आशा हे आपको पसंद आएगा…..आप सभी अपनी-अपनी अमूल्य राय/ सुझाव और लेख देकर/ भेजकर हमारा उत्साह बढ़ाते रहेंगे ..एसा में विश्वास हे…यह अब दो स्थानो पर उपलब्ध हे..

1. वर्ल्ड प्रेस पर—https://vinayakvaastutimes.wordpress.com;
2.ब्लोगर  पर—-http://vinayakvaastutimes.blogspot.com;
Posted by: vastushastri08 | मार्च 28, 2011

धड़कन—-

धड़कन की तरह एक दिन मेरे दिल में आ जाओ
ख्वाबो में तो आते हो कभी दिल में भी आ जाओ

एक उम्र हुई तुम बिन बिखरा सा रहा हूँ मैं
बस सूखे पत्तों सा उड़ता ही रहा हूँ मैं
चुपके से कभी आकर तुम मुझको सजा जाओ
ख्वाबो में तो आते हो कभी दिल में भी आ जाओ

कभी तन्हाई दिन में, कहीं रात कटी तनहा
भरी भीड़ में लोगों की मैं चलता रहा तनहा
महफ़िल से लिए अब तुम मेरे घर में आ जाओ
ख्वाबो में तो आते हो कभी दिल में भी आ जाओ

बरसे ना जहाँ बादल मैं वो जलता रेत रहा
जो जला उमर सारी मैं वो झुलसा खेत रहा
ये खुश्क जमीं दिल की कभी आ के भिगो जाओ
ख्वाबो में तो आते हो कभी दिल में भी आ जाओ

एक छोड़ के खुद को ही क्या क्या ना जिया मैंने
ये ज़हर कजाओं का हर रोज पिया मैंने
मुझे जियो कभी दो पल, तुम जीना सिखा जाओ
ख्वाबो में तो आते हो कभी दिल में भी आ जाओ

धड़कन की तरह एक दिन मेरे दिल में आ जाओ
ख्वाबो में तो आते हो कभी दिल में भी आ जाओ

Posted by: vastushastri08 | जून 5, 2011

Datta Swami—– Worship of Contemporary human incarnation—–

Datta Swami—–

Worship of Contemporary human incarnation—– 

Lord Datta means God given to the world in human form for the upliftment of humanity and hence, He is the highest as far as humanity is concerned from the point of convenience in worship. He is the only means of reaching/serving/pleasing the Lord. Lord Jesus stressed the same when He told ‘I am the only way’ and Lord Krishna said it through ‘Vasudevah Sarvamiti…’ in the Gita. Such, Lord in human form is called the human incarnation.

The ‘I’ in the above statement of Jesus refers to the human incarnation of Lord only, who comes in every generation otherwise, He becomes partial for a generation of people, place and time. The scriptures of both Christianity & Hinduism i.e., Bible and Gita support the human incarnation concept through the statements ‘God-in-flesh and Manushim Tanumaasritam…’ respectively. Even in Islam also, Mohammed is treated as a Prophet, which definitely means, He is above normal human beings because all the human beings are not treated as Prophets.

The worship of such contemporary human incarnation/Prophet gives the highest fruit as in the case of Hanuman (attained the post of future creator), who worshipped Lord Rama and Gopikas (attained Goloka), who worshipped Lord Krishna. Likewise, the disciples of Jesus, Mohammed Prophet, Buddha, Shankara, Mahavir, Rama Krishna Paramahamsa and Shirdi Sai worshipped the respective human incarnation only as Lord.

Worship means not mere words and feelings, but by participating in His mission through service, which consists of donating money & physical service. His mission is only to spread the divine knowledge and devotion in this world and to uplift everybody.

Human birth, urge for salvation and to come in contact with the human incarnation are the three real fortunes and the importance increases from left to right in the order (Manushyatvam, Mumukshatvam, Mahapurasha Samsrayah Durlabham—Shankara).

At lotus feet of Datta Swami
surya

Posted by: vastushastri08 | मार्च 28, 2011

Gopal Raju—-The 11th is a VERY deadly day , the worst DAY EVER.—–

Gopal Raju—-The 11th is a VERY deadly day , the worst DAY EVER.—–

Look what it has caused.

September, 11th = World Trade Center Crash 

January, 11th = Haiti Earthquake March,

11th = Japan Earthquake.

End of the first world war, November 11th… on the 11th hour…

And 2011 = so many natural disasters and major problems around the world

On December 11th 1939 the new Anti Jewish measurements are proclaimed in Poland by Hitler

The spiritual meaning of number eleven is quite diverse.

The number 11 is thought of as a “master” number in numerology because it is a double digit of the same number. When this occurs – the vibrational frequency of the prime number doubles in power. Meaning, the attributes of the Number One are doubled. So, the very basic & primary understanding of the Number One is that of new beginnings & purity. When we see this digit doubled as with the 11 – then these attributes double in strength. In numerology the number 11 represents higher ideals, invention, refinement, congruency, balance, fulfillment, vision. The 11 carries a vibrational frequency of balance. It represents male & female equality. It contains sun and moon both – while holding them both separate. Perfect balance. Consequently, constant reoccurances of Elevens often signal us to be aware of our balance. Balance emotion, thought, spirit – balance of masculine, feminine, – work, play – joy, sorrow – - – Elevens are magical messages asking us if we are centered or out-of-whack. When we add 1+1 (eleven reduced) we get two – which is also a balance number – two’s also deal with equality, justice, calm, kindness, tact, and duality. Those who recognize the spiritual meaning of number Eleven in their lives are obviously quite sensitive to many vibrational frequencies. The fact that this number is observed when the Elevens appear is indicative of a reflective, thoughtful and intuitive soul. Elevens often present themselves to psychically connected people. I believe this is the Universe sending us a message to be a part of an event – yet maintain your integrity as you do so (again, balance). If you observe the Eleven – as two straight lines side by side – together they serve as a full meaning – two figures forming one value – one image. However they do not touch – they are together yet separate. As we deal with energy in our lives it is integral for us to understand that we are all at once a part of it – yet we have the option to separate. The spiritual meaning of number Eleven deals directly with our involvement with the progression of life and reminds us however, that we must not be a slave to our self-involvement.

नव संवत्‍सर में ग्रह स्‍थतियां एवं संवत्‍सर परिचय—-
नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनंद’’
विक्रम वर्ष – विक्रम संवत 2068 , शक संवत 1933, यह नवीन वर्ष श्री क्रोधी एवं विश्‍वावसु नामकीय संवत्‍सर की गणना से प्रभावशील है । इस वर्ष के अधिपति सूर्य नारायण हैं तथा उपेश पद प्रभार चंद्र देव को मिला है । वर्ष का प्रधानमंत्री पदभार देवगुरू बृहस्‍पति को मिला है, सस्‍य विभाग शनिदेव पर एवं धान्‍य विभाग दैत्‍य गुरू भृगु -शुक्र देव को मिला है, मेघ पर्जन्‍य नायक पद का का अधिभार चंद्र सुत बुध देव के पास है, रसेश – चंद्र देव, नीरसेश – शनिदेव, फलेश- बुध, धन वित्‍त – शनिदेव, रक्षा –जल थल नभ आणविक शक्‍ति- बुध को मिले हैं ।
ग्रह स्‍थितियां – संवत्‍सर प्रारंभ में
4 अप्रेल 2011 चैत्र प्रतिपदा से नव वर्ष नव संवत्‍सर विक्रमाब्‍द 2068 प्रारंभ
सूर्य – मीन में 14 अप्रेल तक , 14 अप्रेल के बाद मेष राशि में, मंगल – 25 अप्रेल 2011 से मीन में मंगल उदय , बुध 17 अप्रेल 2011 से मीन राशि में बुधोदय, गुरू 24 अप्रेल 2011 से मीन राशि में गुरू उदय, शुक्र वर्तमान में कुंभ राशि में 16 अप्रेल 2011 से मीन राशि में, शनि कन्‍या राशि में वर्तमान वक्र गति शील – 13 जून से मार्गी एवं 26 सितम्‍बर को अस्‍त व 30 अक्‍टूबर को उदय तथा 15 नवम्‍बर 2011 को राशि परिवर्तन कर तुला राशि में इसके बाद वर्ष पर्यन्त तुला राशि में गोचर राहू – केतु – क्रमश: धनु एवं मिथुन राशि में वर्तमान 6 जून 2011 से राहू – वृश्‍चिक राशि में एवं केतु वृष राशि में गोचर करेंगें

Posted by: vastushastri08 | मार्च 28, 2011

Tools ‹ विनायक वास्तु टाईम्स — WordPress

Tools ‹ विनायक वास्तु टाईम्स — WordPress.

ADVANCED COURSE ON “NEW SCIENTIFIC TECHNOLOGIES IN VASTU” FOR VASTU EXPERTS ONLY.—————

What is going to be taught on 15th , 16th and 17th April 2011

1. Dowsing, principles and use.
2. Dowsing in general and applications in everyday life.
3. Dowsing in vastu.
4. What is vastu in real terms? The cosmic forces and how they work.
5. Effect of causative factor SUN and its effect on the directions considered harmful.
6. Validation of laws of vastu.
7. Understanding various types of negative energies.
8. Learning to define what is negative energy. It is not a word but a deep concept having various dimensions.
9. Checking the balance of elements and requirements of the owner.
10. Solutions to vastu problems. Learn to balance the cosmic forces by measurement.
11. Basics of working of pyramids. Which pyramids should be and why? Detailed analysis of plastic, metallic and other pyramids with applications.
12. Spiral dynamics. Applications in vastu rectification.
13. EARTH HEALING methodologies. Superiority of new systems.
14. Methods to increase the energy of the earth to make it suitable for good health and prosperity.

COST: ————– Rs 10,000 per head, inclusive of tea and lunch.
BOOKING: —Limited seats. —Students interested must book in advance.
TRAINING BY: ——- MR. Ashok Sachdeva. —09820001660 –( MUMBAI )

गायत्री मंत्र का तत्वज्ञान—खींवराज शर्मा

समस्त विद्याओं की भण्डागार-गायत्री महाशक्ति
ॐ र्भूभुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
गायत्री संसार के समस्त ज्ञान-विज्ञान की आदि जननी है । वेदों को समस्त प्रकार की विद्याओं का भण्डार माना जाता है, वे वेद गायत्री की व्याख्या मात्र हैं । गायत्री को ‘वेदमाता’ कहा गया है । चारों वेद गायत्री के पुत्र हैं । ब्रह्माजी ने अपने एक-एक मुख से गायत्री के एक-एक चरण की व्याख्या करके चार वेदों को प्रकट किया ।

‘ॐ भूर्भवः स्वः’ से-ऋग्वेद,
‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ से-यर्जुवेद,
‘भर्गोदेवस्य धीमहि’ से-सामवेद और
‘धियो योनः प्रचोदयात्’ से अथर्ववेद की रचना हुई ।

इन वेदों से शास्त्र, दर्शन, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक, सूत्र, उपनिषद्, पुराण, स्मृति आदि का निर्माण हुआ । इन्हीं ग्रन्थों से शिल्प, वाणिज्य, शिक्षा, रसायन, वास्तु, संगीत आदि ८४ कलाओं का आविष्कार हुआ । इस प्रकार गायत्री, संसार के समस्त ज्ञान-विज्ञान की जननी ठहरती है । जिस प्रकार बीज के भीतर वृक्ष तथा वीर्य की एक बूंद के भीतर पूरा मनुष्य सन्निहित होता है, उसी प्रकार गायत्री के २४ अक्षरों में संसार का समस्त ज्ञान-विज्ञान भरा हुआ है । यह सब गायत्री का ही अर्थ विस्तार है ।

मंत्रों में शक्ति होती है । मंत्रों के अक्षर शक्ति बीज कहलाते हैं । उनका शब्द गुन्थन ऐसा होता है कि उनके विधिवत् उच्चारण एवं प्रयोग से अदृश्य आकाश मण्डल में शक्तिशाली विद्युत् तरंगें उत्पन्न होती हैं, और मनःशक्ति तरंगों द्वारा नाना प्रकार के आध्यात्मिक एवं सांसारिक प्रयोजन पूरे होते हैं । साधारणतः सभी विशिष्ट मंत्रों में यही बात होती है । उनके शब्दों में शक्ति तो होती है, पर उन शब्दों का कोई विशेष महत्वपूर्ण अर्थ नहीं होता । पर गायत्री मंत्र में यह बात नहीं है । इसके एक-एक अक्षर में अनेक प्रकार के ज्ञान-विज्ञानों के रहस्यमय तत्त्व छिपे हुए हैं । ‘तत्-सवितुः – वरेण्यं-’ आदि के स्थूल अर्थ तो सभी को मालूम है एवं पुस्तकों में छपे हुए हैं । यह अर्थ भी शिक्षाप्रद हैं । परन्तु इनके अतिरिक्त ६४ कलाओं, ६ शास्त्रों, ६ दर्शनों एवं ८४ विद्याओं के रहस्य प्रकाशित करने वाले अर्थ भी गायत्री के हैं । उन अर्थों का भेद कोई-कोई अधिकारी पुरुष ही जानते हैं । वे न तो छपे हुए हैं और न सबके लिये प्रकट हैं ।

इन २४ अक्षरों में आर्युवेद शास्त्र भरा हुआ है । ऐसी-ऐसी दिव्य औषधियों और रसायनों के बनाने की विधियाँ इन अक्षरों में संकेत रूप से मौजूद हैं जिनके द्वारा मनुष्य असाध्य रोगों से निवृत्त हो सकता है, अजर-अमर तक बन सकता है । इन २४ अक्षरों में सोना बनाने की विधा का संकेत है । इन अक्षरों में अनेकों प्रकार के आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, नारायणास्त्र, पाशुपतास्त्र, ब्रह्मास्त्र आदि हथियार बनाने के विधान मौजूद हैं । अनेक दिव्य शक्तियों पर अधिकार करने की विधियों के विज्ञान भरे हुए हैं । ऋद्धि-सिद्धियों को प्राप्त करने, लोक-लोकान्तरों के प्राणियों से सम्बन्ध स्थापित करने, ग्रहों की गतिविधि तथा प्रभाव को जानने, अतीत तथा भविष्य से परिचित होने, अदृश्य एवं अविज्ञात तत्त्वोंको हस्तामलकवत् देखने आदि अनेकों प्रकार के विज्ञान मौजूद हैं । जिकी थोड़ी सी भी जानकारी मनुष्य प्राप्त करले तो वह भूलोक में रहते हुए भी देवताओं के समान दिव्य शक्तियों से सुसम्पन्न बन सकता है । प्राचीन काल में ऐसी अनेक विद्याएँ हमारे पूर्वजों को मालूम थीं जो आज लुप्त प्रायः हो गई हैं । उन विद्याओं के कारण हम एक समय जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक एवं स्वर्ग-सम्पदाओं के स्वामी बने हुए थे । आज हम उनसे वञ्चित होकर दीन-हीन बने हुए हैं ।

‍आवश्यकता इस बात की है कि गायत्री महामन्त्र में सन्निहित उन लुप्तप्राय महाविद्याओं को खोज निकाला जाय, जो हमें फिर से स्वर्ग- सम्पदाओं का स्वामी बना सके । यह विषय सर्वसाधारण का नहीं है । हर एक का इस क्षेत्र में प्रवेश भी नहीं है । अधिकारी सत्पात्र ही इस क्षेत्र में कुछ अनुसंधान कर सकते हैं और उपलब्ध प्रतिफलों से जनसामान्य को लाभान्वित करा सकते हैं ।

गायत्री के दोनों ही प्रयोग हैं । वह योग भी है और तन्त्र भी । उससे आत्म-दर्शन और ब्रह्मप्राप्ति भी होती है तथा सांसारिक उपार्जन-संहार भी । गायत्री-योग दक्षिण मार्ग है- उस मार्ग से हमारे आत्म-कल्याण का उद्देश्य पूरा होता है ।

‍दक्षिण मार्ग का आधार यह है कि- विश्वव्यापी ईश्वरीय शक्तियों को आध्यात्मिक चुम्बकत्व से खींच कर अपने में धारण किया जाय, सतोगुण को बढ़ाया जाय और अन्तर्जगत् में अवस्थित पञ्चकोष, सप्त प्राण, चेतना चतुष्टय, षटचक्र एवं अनेक उपचक्रों, मातृकाओं, ग्रन्थियों, भ्रमरों, कमलों, उपत्यिकाओं को जागृत करके आनन्ददायिनी = अलौकिक शक्तियों का आविर्भाव किया जाय ।

गायत्री-तन्त्र वाम मार्ग है- उससे सांसारिक वस्तुएँ प्राप्त की जा सकती हैं और किसी का नाश भी किया जा सकता है । वाम मार्ग का आधार यह है कि-” दूसरे प्राणियों के शरीरों में निवास करने वाली शक्ति को इधर से उधर हस्तान्तरित करके एक जगह विशेष मात्रा में शक्ति संचित कर ली जाय और उस शक्ति का मनमाना उपयोग किया जाय ।”

तन्त्र का विषय गोपनीय है, इसलिए गायत्री तन्त्र के ग्रन्थों में ऐसी अनेकों साधनाएँ प्राप्त होती हैं, जिनमें धन, सन्तान, स्त्री, यश, आरोग्य, पदप्राप्ति, रोग-निवारण, शत्रु नाश, पाप-नाश, वशीकरण आदि लाभों का वर्णन है और संकेत रूप से उन साधनाओं का एक अंश बताया गया है । परन्तु यह भली प्रकार स्मरण रखना चाहिये कि इन संक्षिप्त संकेतों के पीछे एक भारी कर्मकाण्ड एवं विधिविधान है । वह पुस्तकों में नहीं वरन् अनुभवी साधना सम्पन्न व्यक्तियों से प्राप्त होता है, जिन्हें सद्गुरु कहते हैं ।

गायत्री की २४ शक्ति

गायत्री मंत्र में चौबीस अक्षर हैं । तत्त्वज्ञानियों ने इन अक्षरों में बीज रूप में विद्यमान उन शक्तियों को पहचाना जिन्हें चौबीस अवतार, चौबीस ऋषि, चौबीस शक्तियाँ तथा चौबीस सिद्धियाँ कहा जाता है । देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा राजर्षि इसी उपासना के सहारे उच्च पदासीन हुए हैं । ‘अणोरणीयान महतो महीयान’ यही महाशक्ति है । छोटे से छोटा चौबीस अक्षर का कलेवर, उसमें ज्ञान और विज्ञान का सम्पूर्ण भाण्डागार भरा हुआ है । सृष्टि में ऐसा कुछ भी नहीं, जो गायत्री में न हो । उसकी उच्चस्तरीय साधनाएँ कठिन और विशिष्ट भी हैं, पर साथ ही सरल भी इतनी है कि उन्हें हर स्थिति में बड़ी सरलता और सुविधाओं के साथ सम्पन्न कर सकता है । इसी से उसे सार्वजनीन और सार्वभौम माना गया । नर-नारी, बाल-वृद्ध बिना किसी जाति व सम्प्रदाय भेद के उसकी आराधना प्रसन्नता पूर्वक कर सकते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुरूप लाभ उठा सकते हैं ।

‘गायत्री संहिता’ में गायत्री के २४ अक्षरों की शाब्दिक संरचना रहस्ययुक्त बतायी गयी है और उन्हें ढूँढ़ निकालने के लिए विज्ञजनों को प्रोत्साहित किया गया है । शब्दार्थ की दृष्टि से गायत्री की भाव-प्रक्रिया में कोई रहस्य नहीं है । सद्बुद्धि की प्रार्थना उसका प्रकट भावार्थ एवं प्रयोजन है । यह सीधी-सादी सी बात है जो अन्यान्य वेदमंत्रों तथा आप्त वचनों में अनेकानेक स्थानों पर व्यक्त हुई है । अक्षरों का रहस्य इतना ही है कि साधक को सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिए पे्रेरित करते हैं । इस प्रेरणा को जो जितना ग्रहण कर लेता है वह उसी अनुपात से सिद्ध पुरुष बन जाता है । कहा गया है-
चतुविंशतिवर्णेर्या गायत्री गुम्फिता श्रुतौ ।
रहस्ययुक्तं तत्रापि दिव्यै रहस्यवादिभिः॥ गायत्री संहिता -८५
अर्थात्-वेदों में जो गायत्री चौबीस अक्षरों में गूँथी हुई है, विद्वान् लोग इन चौबीस अक्षरों के गूँथने में बड़े-बड़े रहस्यों को छिपा बतलाते हैं ।

गायत्री की २४ शक्तियों की उपासना करने के लिए शारदा तिलकतंत्र का मार्गदर्शन इस प्रकार है ।
ततः षडङ्गान्यभ्र्यचेत्केसरेषु यथाविधि ।
प्रह्लादिनी प्रभां पश्चान्नित्यां विश्वम्भरां पुनः॥
विलासिनी प्रभवत्यौ जयां शांतिं यजेत्पुनः ।
कान्तिं दुर्गा सरस्वत्यौ विश्वरूपां ततः परम्॥
विशालसंज्ञितामीशां व्यापिनीं विमलां यजेत् ।
तमोऽपहारिणींसूक्ष्मां विश्वयोनिं जयावहाम्॥
पद्मालयां परांशोभां पद्मरूपां ततोऽर्चयेत् ।
ब्राह्माद्याः सारुणा बाह्यं पूजयेत् प्रोक्तलक्षणाः॥ -शारदा० २१ ।२३ से २६
अर्थात्-पूजन उपचारों से षडंग पूजन के बाद प्रह्लादिनी, प्रभा, नित्या तथा विश्वम्भरा का यजन (पूजन) करें । पुनः विलासिनी, प्रभावती, जया और शान्ति का अर्चन करना चाहिए । इसके बाद कान्ति, दुर्गा, सरस्वती और विश्वरूपा का पूजन करें । पुनः विशाल संज्ञा वाली-ईशा (विशालेशा), ‘व्यापिनी’ और ‘विमला’ का यजन करना चाहिए । इसके अनन्तर ‘तमो’, ‘पहारिणी’, ‘सूक्ष्मा’, ‘विश्वयोनि’, ‘जयावहा’, ‘पद्मालया’, ‘पराशोभा’ तथा पद्मरूपा आदि का यजन करें । ‘ब्राह्मी’ ‘सारुणा’ का बाद में पूजन करना चाहिए ।

तन्त्र-एक परिचय —खींवराज शर्मा

तन्त्र का शाब्दिक उद्भव इस प्रकार माना जाता है – “तनोति त्रायति तन्त्र” । जिससे अभिप्राय है – तनना, विस्तार, फैलाव इस प्रकार इससे त्राण होना तन्त्र है। हिन्दू, बौद्ध तथा जैन दर्शनों में तन्त्र परम्परायें मिलती हैं। यहाँ पर तन्त्र साधना से अभिप्राय “गुह्य या गूढ़ साधनाओं” से किया जाता रहा है।
तन्त्रों को वेदों के काल के बाद की रचना माना जाता है और साहित्यक रूप में जिस प्रकार पुराण ग्रन्थ मध्ययुग की दार्शनिक-धार्मिक रचनायें माने जाते हैं उसी प्रकार तन्त्रों में प्राचीन-अख्यान, कथानक आदि का समावेश होता है। अपनी विषयवस्तु की दृष्टि से ये धर्म, दर्शन, सृष्टिरचना शास्त्र, प्रचीन विज्ञान आदि के इनसाक्लोपीडिया भी कहे जा सकते हैं।

तन्त्रों के विषय वस्तु को मोटे तौर पर निम्न तौर पर बतलाया जा सकता है-
ज्ञान, या दर्शन,
योग,
कर्मकाण्ड,
विशिष्ट-साधनायें, पद्धतियाँ तथा समाजिक आचार-विचार के नियम।
सांख्य तथा वेदान्त के अद्वैत विचार दोनों का प्रभाव तन्त्र ग्रन्थों में दिखलायी पड़ता है। तन्त्र में प्रकृति के साथ शिव अद्वैत दोनों की बात की गयी है। परन्तु तन्त्र दर्शन में ‘शक्ति’ (ईश्वर की शक्ति) पर विशेष बल दिया गया है।

तन्त्र की तीन परम्परायें मानी जाती हैं –
शैव आगम या शैव तन्त्र,
वैष्णव संहितायें, तथा
शाक्त तन्त्र

शैव आगम
शैव आगमों की चार विचारधारायें हैं –
1. शैवसिद्धान्त,
2. तमिल शैव,
3. कश्मीरी शैवदर्शन, तथा
4. वीरशैव या लिंगायत शैव दर्शन
आगमों की भारतीय परम्परा में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। प्राचीन मन्दिरों, प्रतिमाओं, भवनों, एवं धार्मिक-आध्यात्मिक विधियों का निर्धारण इनके द्वारा हुआ है।

शैव सिद्धान्त
प्रचीन तौर पर शैव सिद्धान्त के अन्तर्गत 28 आगम तथा 150 उपागमों को माना गया है।
शैव सिद्धान्त के अनुसार सैध्दान्तिक रूप से शिव ही केवल चेतन तत्त्व हैं तथा प्रकृति जड़ तत्त्व है। शिव का मूलाधार शक्ति ही है। शक्ति के द्वारा ही बन्धन एवं मोक्ष प्राप्त होता है।

कश्मीरी शैवदर्शन
प्रमुख ग्रन्थ शिवसूत्र है। इसमें शिव की प्रत्यभिज्ञा के द्वारा ही ज्ञान प्राप्ति को कहा गया है। जगत् शिव की अभिव्यक्ति है तथा शिव की ही शक्ति से उत्पन्न या संभव है। इस दर्शन को ‘त्रिक’ दर्शन भी कहा जाता है क्योंकि यह – शिव, शक्ति तथा जीव (पशु) तीनों के अस्तित्व को स्वीकार करता है।

वीरशैव दर्शन
इस दर्शन का महत्पूर्ण ग्रन्थ “वाचनम्” है जिससे अभिप्राय है ‘शिव की उक्ति’।
यह दर्शन पारम्परिक तथा शिव को ही पूर्णतया समस्त कारक, संहारक, सर्जक मानता है। इसमें जातिगत भेदभाव को भी नहीं माना गया है।
इस दर्शन के अन्तर्गत गुरु परम्परा का विशेष महत्व है।

वैष्णव संहिता
वैष्णव संहिता की दो विचारधारायें मिलती हैं – वैखानस संहिता, तथा पंचारात्र संहिता।
वैखानस संहिता – यह वैष्णव परम्परा के वैखानस विचारधारा है। वैखानस परम्परा प्राथमिक तौर पर तपस् एवं साधन परक परम्परा रही है।

पंचरात्र संहिता – पंचरात्र से अभिप्राय है – ‘पंचनिशाओं का तन्त्र’। पंचरात्र परम्परा प्रचीनतौर पर विश्व के उद्भव, सृष्टि रचना आदि के विवेचन को समाहित करती है। इसमें सांख्य तथा योग दर्शनों की मान्यताओं का समावेश दिखायी देता है। वैखानस परम्परा की अपेक्षा पंचरात्र परम्परा अधिक लोकप्रचलन में रही है। इसके 108 ग्रन्थों के होने को कहा गया है। वैष्णव परम्परा में भक्ति वादी विचारधारा के अतिरिक्त शक्ति का सिद्धान्त भी समाहित है।

तंत्र भारतीय उपमहाद्वीप की एक वैविधतापूर्ण एवं सम्पन्न आध्यात्मिक परिपाटी है। तंत्र के अन्तर्गत विविध प्रकार के विचार एवं क्रियाकलाप आ जाते हैं। तन्यते विस्तारयते ज्ञानं अनेन् इति तन्त्रम् – अर्थात ज्ञान को इसके द्वारा तानकर विस्तारित किया जाता है, यही तंत्र है। इसका इतिहास बहुत पुराना है। समय के साथ यह परिपाटी अनेक परिवर्तनों से होकर गुजरी है और सम्प्रति अत्यन्त दकियानूसी विचारों से लेकर बहुत ही प्रगत विचारों का सम्मिश्रण है। तंत्र अपने विभिन्न रूपों में भारत, नेपाल, चीन, जापान, तिब्बत, कोरिया, कम्बोडिया, म्यांमार, इण्डोनेशिया और मंगोलिया में विद्यमान रहा है।
भारतीय तंत्र साहित्य विशाल और वैचित्र्यमय साहित्य है। यह प्राचीन भी है तथा व्यापक भी। वैदिक वाड्मय से भी किसी किसी अंश में इसकी विशालता अधिक है। चरणाव्यूह नामक ग्रंथ से वैदिक साहित्य का किंचित् परिचय मिलता है, परंतु इसकी अपेक्षा उपलब्ध वैदिक साहित्य एक प्रकार से साधारण मालूम पड़ता है। तांत्रिक साहित्य का अति प्राचीन रूप लुप्त हो गया है। परंतु उसके विस्तार का जो परिचय मिलता है उससे अनुमान किया जा सकता है कि प्राचीन काल में वैदिक साहित्य से भी इसकी विशालता अधिक थी और वैचित्र्य भी। संक्षेप में कहा जा सकता है कि परम अद्वैत विज्ञान का सूक्षातिसूक्ष्म विश्लेषण और विवरण जैसा तंत्र ग्रंथों में है वैसा किसी शास्त्र के ग्रंथों में नहीं है। साथ ही साथ यह भी सच है कि उच्चाटन, वशीकरण प्रभृति क्षुद्र विद्याओं का प्रयोग विषयक विवरण भी तंत्र में मिलता है। स्पष्टत: वर्तमान हिंदू समाज वेदाश्रित होने पर भी व्यवहार-भूमि में विशेष रूप से तंत्र द्वारा ही नियंत्रित है।

नारी-जगत—वस्तुस्थिति पर एक दृष्टि …….. गोपाल ‘राजू ‘
नारी-जाति आधी मानव-जाति है। पुरुष-जाति की जननी है। पुरुष (पति) की संगिनी व अर्धांगिनी है। नबी, रसूल, पैग़म्बर, ऋषि, मुनि, महापुरुष, चिंतक, वैज्ञानिक, शिक्षक, समाज-सुधारक सब की जननी नारी है, सब इसी की गोद में पले-बढ़े। लेकिन धर्मों, संस्कृतियों, सभ्यताओं, जातियों और क़ौमों का इतिहास साक्षी है कि ईश्वर की इस महान कृति को इसी की कोख से पैदा होने वाले पुरुषों ने ही बहुत अपमानित किया, बहुत तुच्छ, बहुत नीच बनाया; इसके नारीत्व का बहुत शोषण किया; इसकी मर्यादा, गरिमा व गौरव के साथ बहुत खिलवाड़ किया, इसके शील को बहुत रौंदा; इसके नैतिक महात्म्य को यौन-अनाचार की गन्दगियों में बहुत लथेड़ा।
● प्राचीन यूनानी सभ्यता में एक काल्पनिक नारी-चरित्रा पांडोरा (Pandora) को इन्सानों की सारी मुसीबतों की जड़ बताया गया। इस सभ्यता के आरंभ में तो स्त्री को अच्छी हैसियत भी प्राप्त थी लेकिन आगे चलकर, उसे वेश्यालयों में पहुँचा दिया गया जो हर किसी की दिलचस्पी के केन्द्र बन गए। कामदेवी Aphrodite की पूजा होने लगी और कामवासना भड़काने वाली प्रतिमाएँ कला के नमूनों का महत्व पा गईं।
● रूमी सभ्यता में भी उपरोक्त स्थिति व्याप्त थी। औरतें (04-56 ई॰ पूर्व में) अपनी उम्र का हिसाब पतियों की तादाद से लगातीं। सेंट जेरोम (340-420 ई॰) ने एक औरत के बारे में लिखा कि उसने आख़िरी शादी 23वें पति से की और स्वयं वह, उस पति की 21वीं पत्नी थी। अविवाहित संबंध को बुरा समझने का विचार भी समाप्त हो गया था। वेश्यावृत्ति का कारोबार इतना बढ़ा कि वै़$सर टाइबरियस के दौर (14-37 ई॰) में शरीफ़ ख़ानदानों की स्त्रियों को पेशेवर वेश्या बनने से रोकने के लिए क़ानून लागू करना पड़ा। फ्लोरा नामक खेल में स्त्रियों को पूर्ण नग्न-अवस्था में दौड़ाया जाता था।
● पाश्चात्य धर्मों में नारी को ‘साक्षात पाप’ कहा गया। ‘तर्क’ यह था कि प्रथम स्त्री (हव्वा Eva) ने, अपने पति, प्रथम पुरुष (आदम Adam) को जन्नत (Paradise) में ईश्वर की नाफ़रमानी करने पर उक्साया और परिणामतः दोनों स्वर्गलोक से निकाले गए। इस ‘तर्क’ पर बाद की तमाम औरतों को ‘जन्मगत पापी (Born Sinner) कहा गया, और यह मान्यता बनाई गई कि इस अपराध व पाप के प्रतिफल-स्वरूप पूरी नारी जाति को प्रसव-पीड़ा का ‘दंड’ हमेशा झेलना पड़ेगा।
● भारतीय सभ्यता में, अजंता और खजुराहो की गुफाएँ (आज भी बता रही हैं कि) औरत के शील को सार्वजनिक स्तर पर कितना मूल्यहीन व अपमानित किया गया, जिसको शताब्दियों से आज तक, शिल्पकला के नाम पर जनसाधारण की यौन-प्रवृत्ति के तुष्टिकरण और मनोरंजन का साधन बनने का ‘श्रेय’ प्राप्त है। ‘देवदासी’ की हैसियत से देवालयों (के पवित्र प्रांगणों) में भी उसका यौन शोषण हुआ। अपेक्षित पुत्र-प्राप्ति के लिए पत्नी का परपुरुषगमन (नियोग) जायज़ तथा प्रचलित था। ‘सती प्रथा’ के विरुद्ध वर्तमान में क़ानून बनाना पड़ा जिसका विरोध भी होता रहा है। वह पवित्र धर्म ग्रंथ वेद का न पाठ कर सकती थी, न उसे सुन सकती थी। पुरुषों की धन-सम्पत्ति (विरासत) में उसका कोई हिस्सा नहीं था यहाँ तक कि आज भी, जो नारी-अधिकार की गहमा-गहमी और शोर-शराबा का दौर है, कृषि-भूमि में उसके विरासती हिस्से से उसे पूरी तरह वंचित रखा गया है।
● अरब सभ्यता में लड़कियों को जीवित गाड़ देने की प्रथा थी। स्त्रियाँ पूर्ण नग्न होकर ‘काबा’ की परिक्रमा (तवाफ़) करती थीं। औरत को कोई अधिकार प्राप्त न थे। यह प्रथा भी प्रचलित थी कि एक स्त्री दस पुरुषों से संभोग करती; गर्भधारण के बाद दसों को एक साथ बुलाती और जिसकी ओर उंगली उठा देती वह बच्चे का पिता माना जाता। मर्दों की तरह औरतों (दासियों) को भी ख़रीदने-बेचने का कारोबार चलता था।
प्राचीन सभ्यता के वैश्वीय दृश्य-पट (Global Scenario) पर औरत की यह हैसियत थी जब इस्लाम आया और सिर्फ़ 21 वर्षों में पूरी कायापलट कर रख दी। यह वै$से हुआ, इस विस्तार में जाने से पहले, वर्तमान स्थिति पर एक नज़र डाल लेनी उचित होगी, क्योंकि इस्लाम वही भूमिका आज भी निभाने में सक्षम है जो उसने 1400 वर्ष पहले निभाई थी।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

Is Super Moon Dangerous—–Gopal Raju

Is Super Moon Dangerous—-Gopal Raju

Full Moon at Perigree in an Excess of 4, 066 miles than the Normal Extreme of 225, 622 miles
The distance of the earth to the moon in miles varies in distance from 225, 622 miles to 252,088 miles in distance from one another. The extreme in proximity or “close-ness” to earth is the 225, 622 miles.
The full moon on March 19, 2011 will be 4, 066 miles closer, being at a distance of 221,556 miles from the earth on that date. The Spring Equinox is the next day. (Daylight Savings time begins Sunday March 13, 2011. – 1st Sunday in Lent, Daylight Savings Begins
Tuesday March 16, 2011 – The Ides of March “Beware the Ides of March!” (The ides are the ‘middle’)
Friday March 18, 2011 – The moon is on the celestial equator
Saturday March 19, 2011 – Full Worm Moon (moon at perigree in excess of extreme 4,066 miles
On Friday March 11, 2011 We have seen an 8.9 (or 8.8) earth quake hit Japan
On January 12, 2010 there was the 5.9 magnitude earthquake in Haiti
Page 108 of 2010 Old Farmer’s Almanac says that when the moon “rides high” or “runs low” (The Moon is highest above or farthest below the celestial equator) that this begins a most likely five day period when earthquakes are most likely (“rides high” for Northern Hemisphere and “runs low” for the Southern Hemisphere. Also there are two days in the month when the moon is on the celestial equator indicating the most likely time for an earthquake in either hemisphere). These days are marked in the Old Farmer’s Almanac on the ‘right hand pages for the calendar year.
When the Haitian quake hit Jan. 12, 2010 the moon “ran low”
The Japan quake on March 10, 2011. The moon “rides high” on the next day March 11, 2011 (which is still very close).
Next Saturday March 19, 2011 the full moon will be in excess of it’s usual perigree by 4, 066 miles and the moon will be on the celestial equator (two days of the month when earthquakes are most likely to happen in either the Northern or Southern Hemispheres). It is a full Worm Moon (http://www.farmersalmanac.com/full-moon-… and most usually a full moon is bad enough, but this one is closer than it’s usual perigree distance and it is right at the time when the moon is on the celestial equator.
The news reports about a connection between the Japan quake and the unusually large full moon next week say that there is no connection. They are probably answering that question in respect to the Japan quake being caused by moon riding high as opposed to the quake being caused by an unusually close perigree. You may be able to see the deception in that answer given to there being no connection.
There may be nothing to be concerned about, but I thought I’d pass it along as a “be-advised” or FYI. Take care.
SOURCE(S):
The Old Farmer’s 2010 Almanac (Southern Edition) by Robert B. Thomas
The Old Farmer’s 2011 Almanac (Southern Edition) by

परिक्रमा क्यों, कब, किसलिए और कौनसे भगवान की कितनी ?
भगवान की पूजा-आराधना के बाद हम उनकी परिक्रमा करते हैं। सामान्यत: यह बात सभी जानते हैं कि आरती आदि के होने के बाद देवी-देवताओं की परिक्रमा करनी है परंतु यह क्यों की जाती है और इसकी क्या वजह है?भगवान की भक्ति में एक महत्वपूण क्रिया है प्रतिमा की परिक्रमा। वैसे तो सामान्यत: सभी देवी-देवताओं की एक ही परिक्रमा की जाती है परंतु शास्त्रों के अनुसार अलग-अलग देवी-देवताओं के लिए परिक्रमा की अलग संख्या निर्धारित की गई है।इस संबंध में धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान की परिक्रमा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और इससे हमारे पाप नष्ट होते है। सभी देवताओं की परिक्रमा के संबंध में अलग-अलग नियम बताए गए हैं।

आरती और पूजा-अर्चना आदि के बाद भगवान की मूर्ति के आसपास सकारात्मक ऊर्जा एकत्रित हो जाती है, इस ऊर्जा को ग्रहण करने के लिए परिक्रमा की जाती है।

किस देवी-देवता की कितनी परिक्रमा:
-महिलाओं द्वारा वटवृक्ष की परिक्रमा करना सौभाग्य का सूचक है।
- शिवजी की आधी परिक्रमा की जाती है।
- देवी मां की तीन परिक्रमा की जानी चाहिए।
- भगवान विष्णुजी एवं उनके सभी अवतारों की चार परिक्रमा करनी चाहिए।
- श्रीगणेशजी और हनुमानजी की तीन परिक्रमा करने का विधान है।
-सूर्य मंदिर की परिक्रमा करने से मन पवित्र और आनंद से भर उठता है तथा बुरे और कड़वे विचारों का विनाश होकर श्रेष्ठ विचार पोषित होते हैं। हमें भास्कराय मंत्र का भी उच्चारण करना चाहिए, जो कई रोगों का नाशक है जैसे सूर्य को अर्घ्य देकर “ॐ भास्कराय नमः” का जाप करना।

देवी के मंदिर में महज एक परिक्रमा कर नवार्ण मंत्र का ध्यान जरूरी है।

इससे सँजोए गए संकल्प और लक्ष्य सकारात्मक रूप लेते हैं।

परिक्रमा के संबंध में नियम:—-

परिक्रमा शुरु करने के पश्चात बीच में रुकना नहीं चाहिए। साथ परिक्रमा वहीं खत्म करें जहां से शुरु की गई थी। ध्यान रखें कि परिक्रमा बीच में रोकने से वह पूर्ण नही मानी जाती। परिक्रमा के दौरान किसी से बातचीत कतई ना करें। जिस देवता की परिक्रमा कर रहे हैं, उनका ही ध्यान करें। इस प्रकार देवी-देवताओं की परिक्रमा विधिवत करने से जीवन में हो रही उथल-पुथल व समस्याओं का समाधान सहज ही हो जाता है। इस प्रकार सही परिक्रमा करने से पूर्ण लाभ की प्राप्ती होती है।जिस स्थान पर मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हुई हो,उसके मध्य बिंदु से लेकर कुछ दूरी तक दिव्य प्रभा अथवा प्रभाव रहता है,यह निकट होने पर अधिक गहरा और दूर दूर होने पर घटता जाता है,इस प्रकार प्रतिमा के निकट परिक्रमा करने से दैवीय शक्ति के ज्योतिर्मंडल से निकलने वाले तेज की सहज ही प्राप्ति हो जाती है!यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है,कि दैवीय शक्ति कीआभामंडल की गति दक्षिणवर्ती होती है,इसीलिए शास्त्रों में मूर्ति के दायें हाथ की और से परिक्रमाकरने का विधान है! उलटी यानी बाएं हाथ की परिक्रमा करने से दैवीय शक्ति के ज्योतिर्मंडल की गति और हमारे अन्दर के दिव्या परमाणुओ में टकराव उत्पन होता है,परिणाम स्वरूप हमारा तेज नष्ट हो जाता है, इसीलिए बाएं हाथ की परिक्रमा वर्जित मानी जाती है!

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

शुक्र और दांपत्य जीवन———-

लाल किताब में शुक्र का उपाय —-
लाल किताब में प्रत्येक भाव में शुक्र की शुभता एवं उपचार सम्बन्धी उपाय बताए गये हैं.शुक्र की शुभता के लिए कुछ सामान्य उपायों में पत्नी का सम्मान करना चाहिए.शुक्रवार का व्रत करना चाहिए.मन और हृदय पर काबू रखना चाहिए और भटकाव की ओर जाने से रोकना चाहिए.सात प्रकार के अनाज और चरी का दान करना चाहिए.चतुर्थ भाव में शुक्र मंदा होने पर पत्नी से दो बार शादी करनी चाहिए.धन एवं संतान के लिए स्त्री को बालों में सोने की क्लिप या सूई लगाकर रखना चाहिए.खाना नम्बर 6 में शुक्र मंदा होने पर संतान हेतु अंगों को दूध से धोना चाहिए.लाल किताब शुक्र के सम्बन्ध में मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने पर विशेष बल देता है….

शुक्र और दांपत्य जीवन———-

संसार का प्रत्येक व्यक्ति दांपत्य सुख की कामना करता है, लेकिन ऎसा हर एक व्यक्ति के जीवन में संभव नहीं होता है।
1-8 मेष-वृश्चिक लग्न: मेष लग्न वालों के दांपत्य सुख का कारक ग्रह शुक्र होता है। ऎसे व्यक्ति हीरा, ओपेल, जरकिन अथवा सरपोंखा की जड़ में से कोई एक धारण करें। शुक्रवार का व्रत करें। चावल, मिश्री, श्वेत चंदन, सफेद चमकीला वस्त्र आदि दान करें। बुजुर्ग महिलाओं का सम्मान कर आशीर्वाद लें। “ú शुं शुक्राय नम:” मंत्र की माला का जाप करें।

2-7 वृष एवं तुला: इस लग्न का दांपत्य सुख का कारक ग्रह मंगल है। मंगलवार का व्रत करें। लाल चंदन का तिलक लगाएं। मूंगा स्वर्ण में धारण करें अथवा अनंतमूल की जड़ लाल डोरे में धारण करें। गेहूं, मसूर की दाल, घी, गुड़, लाल चंदन, लाल फूल, तांबे का पात्र दान करें। “ú अं अंगार काय नम:” मंत्र का जाप करें तथा जेब में लाल रू माल रखें।

3-6 मिथुन एवं कन्या लग्न: इन लग्न वालों का दांपत्य सुख का कारक ग्रह बृहस्पति है। गुरूवार का व्रत रखें। केले की पूजा करें और केले की जड़ पीले कपड़े अथवा पीले ताबीज में धारण करें। तुलसी के पौधे पर घी का दीपक जलाएं। एकादशी के सात व्रत करें। भगवान को चने की दाल अथवा बेसन के पकवान का भोग लगाएं। गाय को चने की दाल, गुड़ खिलाएं। पीले चावल, पीले फूल, पीले वस्त्र दान करें। घर के बुजुर्ग महिला-पुरूषों का सम्मान कर आशीर्वाद प्राप्त करें।

4-5 कर्क एवं सिंह लग्न: इन लग्नों के कारक ग्रह शनि है। दांपत्य सुख के लिए ऎसे व्यक्तियों को पीपल वृक्ष पर तिल्ली के तेल का दीपक जलाना चाहिए। काले घोड़े की नाल अथवा जहाज की कील का छल्ला मघ्यमा अंगुली में धारण करें। शनिवार को हनुमानजी के यहां भीगे चने और गुड़ चढ़ाएं तथा हनुमान अष्टक का पाठ करें। गरीब, असहाय, विकलांग व्यक्तियों की सेवा कर आशीर्वाद प्राप्त करें। झूठ, बेईमानी से अपने को बचा के रखें।

9-12धनु एवं मीन लग्न: इस लग्न धारकों को दांपत्य सुख के कारक बुध ग्रह है। गणेशजी अराधना लाभकारी है तथा साथ ही भगवान विष्णु की पूजा करें। प्रत्येक बुधवार को गणेशजी दुर्वा (दोब), सिंदूर, मूंग के लड्डू अर्पण करें। बुधवार को कन्याओं को भोजन कराकर, हरा वस्त्र दान करें। बुधवार का व्रत रखें। पन्ना अथवा विधारा की जड़ हरे डोरे में धारण करें। मूंग, चीनी, हरा वस्त्र, हरी सब्जी, कांस्य पात्र का दान करें।

10. मकर लग्न: इस लग्न वाले का दांपत्य सुख का कारक ग्रह चंद्रमा होता है। सोमवार का व्रत रखें। श्रावण मास में शिवजी को बिल्वपत्र अर्पित करें। चंद्र यंत्र भोजपत्र पर बनाकर पूजनघर में रखकर नित्य पूजन करें। रूद्राक्ष के साथ मोती धारण करें। सफेद वस्तुओं का दान करें तथा दोज के चंद्रमा के दर्शन कर सफेद धागा अर्पित करें। खिरनी की जड़ सफेद धागे में धारण करें।

11.कुंभ लग्न: प्रतिदिन सूर्य उदय होने के दो घंटे के अंदर-अंदर तांबे के पात्र में पानी लेकर उसमें चुटकी भर चावल डालकर, लाल चंदन के छींटे देकर सूर्य को अƒर्य दें तथा वहीं पर सात परिक्रमा कर आदित्य ह्वदय स्तोत्र का पाठ करें। रविवार का व्रत करें। बिल्वपत्र की जड़ लाल डोरे में धारण करें अथवा तांबे का छल्ला गले में लाल डोरे में धारण करें।

सुखी और सुंदर दांपत्य जीवन की मनोकामना पूर्ण करने के लिए कुछ और सरल उपाय————–

मेष लग्न : मेष का दाम्पत्य सुख का कारक ग्रह शुक्र होता है। ये लोग दांपत्य सुख के लिए निम्न उपाय करें – गाय व पक्षियों को चावल खिलाएं। चावल उबालकर, पकाकर देसी घी डालकर पक्षी को दें। गाय को प्रतिदिन दो रोटी तेल लगाकर दें। घर में बुजुर्ग महिलाओं का सम्मान करना चाहिए व आशीर्वाद लेना चाहिए।

वृष लग्न : वृष लग्न में कारक ग्रह मंगल होता है। वृष लग्न के जातक लाल कपड़े में (सूती, चमकीला न हो) थोड़ी सी सौंफ बांधकर अपने शयनकक्ष में रखें। लाल चंदन का तिलक ललाट पर लगाएं। मंगलवार को हनुमान मंदिर में लाल चंदन दें। नया जूता-चप्पल जनवरी-फरवरी के महीने में न खरीदें।

मिथुन लग्न : मिथुन लग्न में कारक ग्रह गुरु होता है। दांपत्य सुख के लिए ये गुरुवार का व्रत रखकर एक समय भोजन करें। प्रतिदिन तुलसी के पौधे के समक्ष घी का दीपक संध्या समय दो लौंग डालकर जलाएं व प्रणाम करें। रविवार को यह उपाय न करें। दाम्पत्य सुख के लिए माथे पर गोपीचंदन का टीका लगाना चाहिए।

कर्क लग्न : कर्क लग्न में कारक ग्रह शनि होता है। इनका दाम्पत्य जीवन बहुत सुखी नहीं कहा जा सकता। दांपत्य सुख के लिए इन्हें प्रत्येक शनिवार को प्रात:काल पीपल वृक्ष के समक्ष तिल्ली के तेल का दीपक जलाना चाहिए। शनिवार व मंगलवार शाम के समय अपने जीवनसाथी के साथ हनुमान मंदिर जरूर जाना चाहिए।

सिंह लग्न : सिंह लग्न में कारक ग्रह शनि होता है। ऐसे में निम्न उपाय करें-शनिपुष्य योग में नाव की कील का छल्ला बनवाकर मध्यमा उंगली में पहनें। राधाकृष्ण की मूर्ति के सामने तुलसी का पौधा एवं गंगाजल रखें। उसमें दो पत्ते तुलसी के डाल दें। दीपक, गुलाब की अगरबत्ती जलाएं। राधाकृष्ण की मूर्ति पर गुलाब का हार चढ़ाएं।

कन्या लग्न : कन्या लग्न का कारक ग्रह गुरु होता है। ऐसे जातक निम्न उपाय करें- भगवान लक्ष्मीनारायण की आराधना करें। ग्यारह एकादशी में 17 प्रकार के फल, 7 प्रकार की विभिन्न दालें श्रद्धासहित हरिमंदिर यानी लक्ष्मीनारायण भगवान के आगे मंदिर में चढ़ानी चाहिए व एक घी का दीपक जलाना चाहिए।

तुला लग्न : तुला लग्न का कारक ग्रह मंगल होता है। ये लोग निम्न उपाय करें-प्रथम मंगलवार का व्रत रखें। एक वक्त मीठे से भोजन करें। हनुमानजी को चोला चढ़ाएं। लाल फूल, चमेली का तेल, चांदी का वर्क, अनार अर्पित करें। 21 मंगलवार तक भगवान शिव पर लाल चंदन का लेप तथा लाल चंदन मंदिर में दान करना चाहिए।

वृश्चिक लग्न : वृश्चिक लग्न का कारक ग्रह शुक्र होता है। इनके उपाय इस प्रकार हैं-मछलियों को मिश्रीयुक्त उबले चावल चढ़ाएं। राधाकृष्ण के मंदिर में गुरुवार की शाम को सुगंधित इत्र चढ़ाएं। प्रत्येक सोमवार एवं शुक्रवार को भगवान शिव को सफेद सुंगधित पुष्प चढ़ाने चाहिए। शिवलिंग पर सफेद चंदन का लेप करें।

धनु लग्न : धनु लग्न का कारक ग्रह बुध होता है। दाम्पत्य सुख के लिए जातकों को भगवान गणपति की आराधना करनी चाहिए। हर बुधवार 21 दुर्वा, सिंदूर की डब्बी व पांच लड्डू वर्क लगाकर गणोश मंदिर में अर्पण करें। बुधवार के दिन हरे वस्त्र पहनें। हरे वस्त्र व हरी चूड़ियां बुधवार को किन्नरों को दान करें।

मकर लग्न : मकर लग्न का कारक ग्रह चंद्रमा होता है। इन जातकों को गौरीशंकर रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार, प्रदोष, त्रयोदशी, सावन के सोमवार, इन शुभ योगों में धारण करें। चांदी का बना चंद्रमा यंत्र गंगा जल से पवित्र कर पूजा घर में रखें। हर पूर्णिमा पर गंगा जल से यंत्र को स्नान कराएं।

कुंभ लग्न : कुंभ लग्न का कारक ग्रह सूर्य है। ऐसे जातक को प्रतिदिन सूर्य भगवान को तांबे के पात्र में जल चढ़ाना चाहिए। जल में सात बूंद गुलाब जल की डालें। तांबे का शुद्ध छेदवाला सिक्का शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार को लाल धागे में गले में धारण करें। पुरुष दाहिने हाथ की व स्त्रियां बाएं हाथ की रिंगफिंगर में ब्लू टोपाज रत्न पहनें।

मीन लग्न : मीन लग्न का कारक ग्रह बुध होता है। इन जातकों को भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। बुधवार के दिन कन्याओं को हरे रंग के वस्त्र उपहार स्वरूप भेंट करें। सात अशोक वृक्ष के पत्ते शुक्ल पक्ष में सोमवार को घर के मंदिर में रखें। धूप-दीप से पूजा करें। मुरझाने पर नए पत्ते लाकर पुराने पत्तों को पीपल के नीचे रख दें।

सूर्य दे सकता है जानलेवा बीमारियां—–ज्योतिषाचार्य अंजू कपूर
आप और हम सभी जानते हैं कि सूर्यदेव की कृपा से ये संसार चलता है… लेकिन यह बात बहुत की कम लोग जानते हैं कि दुनिया भर को रोशनी से उजाला करने वाला यही सूर्य ग्रह रुप में अगर आपकी कुंडली में गलत जगह पर बैठ गया तो आपको जानलेवा बीमारियां भी दे सकता है… यानि कि कुंडली में सूर्य राहू, केतू या शनि के साथ बैठ गए तो आपको दिल की बीमारी, आंखों की रोशनी जाना, हड्डी रोग, किसी भी अंग का ऑपरेशन, पेट रोग या फिर उंचाई से गिरने और आग से झुलसने जैसी पीडा भी दे सकता है….

ये सब हम आपको डराने के लिए नहीं कह रहे हैं… यह बताने के पीछे हमारा मकसद आपको सही जानकारी देना है… अगर आप डाक्टरों के चक्कर काट काट कर परेशान हो चुके हैं और जानलेवा बीमारियां आपका पीछा कर ही रही हैं, तो एक बार किसी विद्वान ज्योतिषाचार्य को अपनी जन्मकुंडली दिखाएं… क्योंकि आपकी कुंडली में सूर्य के साथ राहु, केतू और शनि का खराब तालमेल आपको ह्दयरोग भी दे सकता है… दिल की बीमारी के लोग अपनी कुंडली दिखाकर अपने खराब ग्रहों का उपाय करके इस परेशानी से बच भी सकते हैं… ये तो सभी जानते हैं कि सूर्य से हमारे शरीर को शक्ति मिलती है… लेकिन आज के जमाने में दिल की बढती बीमारी को सूर्य के कोप का ही असर माना जाता है… ज्योतिष के जानकारी हमेशा बताते हैं कि राहु और केतू अचानक अपना असर दिखाते हैं… ये ग्रह जैसे ही आपकी कुंडली में बैठे सूर्य के प्रभाव में आए… तभी हार्ट अटैक जैसी बीमारी आपके शरीर को प्रभावित कर देगी… लेकिन कुंडली देखकर यह भी बताया जा सकता है कि कौनसी बीमारी आपको किस उम्र में परेशान कर सकती है… ऐसे में ज्योतिष के सफल उपाय और ग्रहों और देवी देवताओं की पूजा अर्चना करने से आपको इस परेशानी से छुटकारा भी मिल सकता है… ऐसे में सूर्य देव की अराधना करना फायदेमंद होता है… इसके अलावा रत्नों के जरिए भी आप सूर्यदेव को शांत कर सकते हैं….

हम आपको यहां यह भी बता दें आपकी कुंडली में सूर्य की खराब स्थिति से आंखों की रोशनी जाना, अंधापन, हड्डी संबंधी रोग, शरीर के किसी भी हिस्से का ऑपरेशन होना, उंचाई से गिरने से चोट लगना जैसी बीमारियां या परेशानियां भी हो सकती है… इसलिए दर्शकों, हम आपको सावधान कर रहे हैं कि अगर इन में से आपको कोई बीमारी है… तो आप अपनी कुंडली जरुर एक बार किसी विद्वान को दिखा सकते हैं… एक बात और दर्शकों… सूर्य अग्नि का भी प्रतिनिधित्व करता है…. अगर आपकी कुंडली में अगर मंगल पर किसी अशुभ ग्रह की दृष्टि हो तो ये आपको जलने या झुलसने जैसी पीडा भी दे सकता है….

अगर आपकी कुंडली में सूर्य के साथ केतू बैठा है तो आपको किसी उंचाई से गिराने जैसा कष्ट दे सकता है… यहां तक कि ऐसी स्थिति में व्यक्ति की मृत्यु तक के योग बन जाते हैं… लेकिन डरने की बात नही… इसका भी इलाज संभव है… जहां सही जानकारी आपको बीमारियों के बारे में आगाह कर सकती है, वहीं ग्रह शांति के उपाय इन तकलीफों से आपको छुटकारा भी दिला सकते हैं…. यहां आपको फिर विस्तार से बता दें कि अगर किसी की कुंडली में सूर्य . राहु या शनि से दृष्ट हो तो ये रीढ की हड्डी खराब होना या हड्डियों संबंधी बीमारियां भी दे सकता है… दर्शकों यहां पहले मैं आपको सूर्य की खराब स्थिति की हालत में धारण किये जाने वाले रत्न के बारे में बता दूं…. इस हालत में पीडित व्यक्ति को माणिक्य धारण करना चाहिए…. ज्यादा से ज्यादा नारंगी रंग का इस्तेमाल करें… आपको यहां हम ये भी बता दें कि माणिक्य को कब धारण किया जाना चाहिए…. जब सूर्य कृतिका नक्षत्र में हो तभी माणिक्य धारण करना चाहिए….. इसके साथ साथ सूर्य के कुछ मंत्रों का जाप करके भी आप इन बीमारियों से छुटकारा पा सकते हैं…

शनि अमावस्या- पूजा-अर्चना से पूरी होगी हर मनोकामना—पं. विरेंद्र बाबा, राज ज्योतिषी
शनि देव की करुणा दृष्टि जिस पर पड़े उसका कल्याण हो जाता है। शनि देव को प्रसन्न करने की बेला चार साल बाद आई है। शनि जयंती और शनिचरी अमावस्या के एक साथ पड़ने से स्वार्थ सिद्धीयोग का सर्वोच्चम योग बन रहा है। इस स्वार्थ सिद्धी योग के शुभ मौके पर शनि दोष मुक्ति के लिए श्रद्धामय होकर शनि देव की उपासना करें, इससे सभी मनोकामनाएं पूर्ण होगी, अर्थात शनि देव की करुणा दृष्टि सदैव पड़ती रहेगी।

शनि देव को प्रसन्न करने का उपाय—

सुबह स्नानवृत करके शनिदेव का ध्यान करना चाहिए। शनिदेव को काला नारियल (नारियल को काले कपड़े में बांध कर) अर्पित करें, काली दाल, सरसों का तेल, काले कपड़ों का दान, जरूरतमंदों व रोगियों की सहायता करना, गरीबों को खाना खिलाना, दक्षिणा देना शुभ माना जाता है। इसके अलावा इस दिन भक्तों को शनि देव का व्रत रखना चाहिए और शनि ग्रह का पूजन शुभ होगा।

वेदों के अनुसार शनि जयंती के दिन ही अमावस्या का आना शनिचरी अमावस्या कहलाता है। इसदिन रोहणी नक्षत्र का बनना स्वार्थ सिद्धी योग बनाता है। इससे शनि देव को प्रसन्न करने पर सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

आज है शनि जयंती…….

शनि के भक्तों के लिए आज का दिन बहुत खास है। आज शनि बाबा की जयंती है और श्नेच्री अमावस एक साथ हैं। आज का दिन अति पूज्य धर्म दान पुण्य वाला है। ये दिन दुर्लभ है क्योकि शनि दिवस को अमावस बड़े भाग्य से आती है। आजकल शनि की भक्ति का दौर है। इस दिन शनि की प्रिय वस्तूए लोहा काले तिल सरसों का तेल काली दाल और काला वस्त्र का दान सुपात्र को सूर्य उदय से लेकर अस्त होने तक घर के देहलीज़ पर बैठ कर उत्तर दिशा की और मुख करके शांत भाव से देना चाहिए। कथाओं में शनि को क्रूर ग्रह कहा गया है पर ये सब मिथ्या है। शनि तो न्याय का अधिकारी देव ग्रह है। शनि की ख़ुशी के लिए काले कुत्ते या काले भैंसा को काली दाल मे भात पका कर खिलाना चाहिए। साँझ को पीपल के पेड़ तले सरसों के तेल का दीपक जलाना अति उत्तम कहा गया है। स्मरण रहे शनि की दशा तीस मास हर किसी की राशि पर जरुर आती है। अमुक की जन्म कुंडली मे जन्म राशी से चोथे या आठवे भाव मे शनि हो तो इसको शनि ढईया भी कहते है। और यदि किसी जातक की जन्म कुंडली मे जन्मराशी से द्वादश भाव मे या फिर जन्मराशी मे या जन्मराशी से दुसरे भाव मे शनि हो तो आमुक को शनि की 90 मास की यातना भोगनी पडती है। जन्मराशी मे द्वादस भाव मे ढाई साल, फिर जन्मराशी मे शनि ढाई साल और फिर जन्मराशी से दुसरे भाव मे ढाई साल शनि विचरण करता है। पर जो जन मात पिता का आदर पूजा करता उसको शनि अपनी दशा मे भी पीड़ा नहीं देते हैं। जिस पर शनि की कुद्रिष्टी पड़ जाये उसको कोई नहीं बचा सकता है। शनि धोखा, ईर्ष्या, छल व् मक्कारी करने वाले को माफ़ नहीं करते। शनि को खुश करने के लिए नित्य हनुमान चालीसा का पाठ शुभकर होता है। शनि ही एकल ग्रह है जो अपनी अगली और पिछली राशी पर ढाई साल तक छाया प्रभाव बनाये रहता है। शनि अपनी दशा मे सब को एक नजर से देखते हैं। क्योकि ये न्यायप्रिय हैं। शनि की प्रसन्नता हेतु शनि के दस नाम का उचार्ण करना चाहिए; “पिंगल, कृष्णा, छाया- नन्दन, व-भ्रू, कोन्न्स्थ, रोद्र, दुःख-भंजन; सौरी, मंद, शनि दश नामा, भानु पुत्र पुज्य्ही सब कामा ” !! प्रात शनि सिमरन और सूर्य दर्शन श्रेयकर होता है। शनि या सूर्य की प्रतिमा के सम्मुख भूमि पर लेट कर नतमस्तक हो व्न्धना करनी चाहिए। शनि की देह नीली व नजर विकराल लाल आंखें चार भूजैं हैं। शनि के सात वाहन मृग, स्वाना, गदर्भ, दिग्गज, गज और ज्म्ब्क, सिंह हैं। ये सब ही नखधारी हैं। और शनि के चार चरण लोहा, तांबा, चांदी व् स्वर्ण हैं। राजा दक्ष, भोले शंकर, हरिश्चन्द्र, रजा नल, पांडव, कौरव, राजा राम, राजा जंक, राजा दशरथ, गणपति और महाराज दमयंती, लंकेश, राजा बली और राजा बाली, सती द्रोपदी, माता सीता, सती सवित्री, आदि को शनि ने भीष्म दुःख देकर परीक्षा ली। शनि पिता दिनकर भगवान और माता छाया के सूत और यमुना व् यम के अग्रज भ्राता हैं। मकर और कुम्भ राशी व पुष्य, उत्तर भाद्रपद सहित अनुराधा के अधिकारी हैं। शनि बाबा की जाती क्षत्रिय और गोत्र कश्यप है। शनि भगवान शंकर व कृष्ण भगत हैं और मित्र काल भेरव, बुध व राहू हैं। शनि की दशा मे शनि का ही प्रिय रत्न नीलम धारण करो। शनि दशा मे लोह्पत्र मे भोजन करो और भूमि शयन करो तो शनि की क्रूर दशा से बचाव रहता है। शनि अपनी माता के संताप दुःख के कारण ही पिता सूर्य के घोर विरोधी हुए थे। शनि स्तुति मे सदा ही उनकी नजर नीची रखने की विनती करनी चाहिए। बाकि सब देवी देवता की नजर उपर ही मांगनी चाहिए। शनि-अमावस को शनि पूजन ध्यान दान दया धर्म का बड़ा मर्म होता है। शनि को मोदक मिष्ठान पान-सुपारी भी प्रिय हैं। शनि की आशीष से न्याय, लोह का व्यापार, पेट्रो प्रोडक्ट्स, ट्रांसपोर्ट निर्माण, कलपुर्जे व मुरम्मत, का व्यवसाय अत्तिलाभ्प्र्द साबित होता है। शनि आराधना जन्म-जन्म के जीवन मरण के बंधन से मुक्त करती है।

शनि की चाल रहस्यमई होती है। विश्वास धेर्य धर्म वाले पर शनि की किरपा रहती है। करजई मानस को शनि स्रोत्र का 18 या 30 शनि दिवस पथ करना हितकर होता है। बाँझ ओरतें शनि की उपासना करके सन्तान सुख पति हैं क्योकि शनि नारी जात का आदर करते हैं। करजई व्यक्ति को युधिष्ठर -नारद सम्वाद का श्रवण करना लाभप्रद होता है। शनि चालीसा पाठ भगत हनुमान की आरती के बिना अधुरा माना जाता है।

शनि, राहु और केतु की त्रिवेणी, कुछ अच्छी-कुछ बुरी–पं. विरेंद्र बाबा, राज ज्योतिषी………..

शनि के अनुचर हैं राहु और केतु। शरीर में इनके स्थान नियु‍क्त हैं। सिर राहु है तो केतु धड़। यदि आपके गले सहित ऊपर सिर तक किसी भी प्रकार की गंदगी या खार जमा है तो राहु का प्रकोप आपके ऊपर मँडरा रहा है और यदि फेफड़ें, पेट और पैर में किसी भी प्रकार का विकार है तो आप केतु के शिकार हैं। राहु और केतु की भूमिका एक पुलिस अधिकारी की तरह है जो न्यायाधीश शनि के आदेश पर कार्य करते हैं। ‍शनि का रंग नीला, राहु का काला और केतु का सफेद माना जाता है। शनि के देवता भैरवजी हैं, राहु की सरस्वतीजी और केतु के देवता भगवान गणेशजी है। शनि का पशु भैंसा, राहु का हाथी और काँटेदार जंगली चूहा तथा केतु का कुत्ता, गधा, सुअर और छिपकली है। शनि का वृक्ष कीकर, आँक व खजूर का वृक्ष, राहु का नारियल का पेड़ व कुत्ता घास और केतु का इमली का दरख्त, तिल के पौधे व केला है। शनि शरीर के दृष्टि, बाल, भवें, हड्डी और कनपटी वाले हिस्से पर, राहु सिर और ठोड़ी पर और केतु कान, रीढ़, घुटने, लिंग और जोड़ पर प्रभाव डालता है।

राहु की मार :—- यदि व्यक्ति अपने शरीर के अंदर किसी भी प्रकार की गंदगी पाले रखता है तो उसके ऊपर काली छाया मंडराने लगती है अर्थात राहु के फेर में व्यक्ति के साथ अचानक होने वाली घटनाएँ बढ़ जाती है। घटना-दुर्घटनाएँ, होनी-अनहोनी और कल्पना-विचार की जगह भय और कुविचार जगह बना लेते हैं। राहु के फेर में आया व्यक्ति बेईमान या धोखेबाज होगा। राहु ऐसे व्यक्ति की तरक्की रोक देता है। राहु का खराब होना अर्थात् दिमाग की खराबियाँ होंगी, व्यर्थ के दुश्मन पैदा होंगे, सिर में चोट लग सकती है। व्यक्ति मद्यपान या संभोग में ज्यादा रत रह सकता है। राहु के खराब होने से गुरु भी साथ छोड़ देता है। राहु के अच्छा होने से व्यक्ति में श्रेष्ठ साहित्यकार, दार्शनिक, वैज्ञानिक या फिर रहस्यमय विद्याओं के गुणों का विकास होता है। इसका दूसरा पक्ष यह कि इसके अच्छे होने से राजयोग भी फलित हो सकता है। आमतौर पर पुलिस या प्रशासन में इसके लोग ज्यादा होते हैं।

केतु की मार : —- जो व्यक्ति जुबान और दिल से गंदा है और रात होते ही जो रंग बदल देता है वह केतु का शिकार बन जाता है। यदि व्यक्ति किसी के साथ धोखा, फरेब, अत्याचार करता है तो केतु उसके पैरों से ऊपर चढ़ने लगता है और ऐसे व्यक्ति के जीवन की सारी गतिविधियाँ रुकने लगती है। नौकरी, धंधा, खाना और पीना सभी बंद होने लगता है। ऐसा व्यक्ति सड़क पर या जेल में सोता है घर पर नहीं। उसकी रात की नींद हराम रहती है, लेकिन दिन में सोकर वह सभी जीवन समर्थक कार्यों से दूर होता जाता है। केतु के खराब होने से व्यक्ति पेशाब की बीमारी, जोड़ों का दर्द, सन्तान उत्पति में रुकावट और गृहकलह से ग्रस्त रहता है। केतु के अच्छा होने से व्यक्ति पद, प्रतिष्ठा और संतानों का सुख उठाता है और रात की नींद चैन से सोता है।

शनि की मार:—- पराई स्त्री के साथ रहना, शराब पीना, माँस खाना, झूठ बोलना, धर्म की बुराई करना या मजाक उड़ाना, पिता व पूर्वजों का अपमान करना और ब्याज का धंधा करना प्रमुख रूप से यह सात कार्य शनि को पसंद नहीं। उक्त में से जो व्यक्ति कोई-सा भी कार्य करता है शनि उसके कार्यकाल में उसके जीवन से शांति, सुख और समृद्धि छिन लेता है। व्यक्ति बुराइयों के रास्ते पर चलकर खुद बर्बाद हो जाता है। शनि उस सर्प की तरह है जिसके काटने पर व्यक्ति की मृत्यु तय है। शनि के अशुभ प्रभाव के कारण मकान या मकान का हिस्सा गिर जाता है या क्षतिग्रस्त हो जाता है, नहीं तो कर्ज या लड़ाई-झगड़े के कारण मकान बिक जाता है। अंगों के बाल तेजी से झड़ जाते हैं। अचानक आग लग सकती है। धन, संपत्ति का किसी भी तरह नाश होता है। समय पूर्व दाँत और आँख की कमजोरी। शनि की स्थिति यदि शुभ है तो व्यक्ति हर क्षेत्र में प्रगति करता है। उसके जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता। बाल और नाखून मजबूत होते हैं। ऐसा व्यक्ति न्यायप्रीय होता है और समाज में मान-सम्मान खूब रहता हैं।

बचाव का तरीका:— शनि के उपाय- सर्वप्रथम भैरवजी के मंदिर जाकर उनसे अपने पापों की क्षमा माँगे। जुआ, सट्टा, शराब, वैश्या से संपर्क, धर्म की बुराई, पिता-पूर्वजों का अपमान और ब्याज आदि कार्यों से दूर रहें। शरीर के सभी छिद्रों को प्रतिदिन अच्छे से साफ रखें। दाँत, बाल और नाखूनों की सफाई रखें। कौवे को प्रतिदिन रोटी खिलाएँ। छायादान करें, अर्थात कटोरी में थोड़ा-सा सरसो का तेल लेकर अपना चेहरा देखकर शनि मंदिर में रख आएँ। अंधे, अपंगों, सेवकों और सफाईकर्मियों से अच्छा व्यवहार रखें। रात को सिरहाने पानी रखें और उसे सुबह कीकर, आँक या खजूर के वृक्ष पर चढ़ा आएँ।

राहु के उपाय- –सिर पर चोटी रख सकते हैं, लेकिन किसी लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर। भोजन भोजनकक्ष में ही करें। ससुराल पक्ष से अच्छे संबंध रखें। रात को सिरहाने मूली रखें और उसे सुबह किसी मंदिर में दान कर दें।

केतु के उपाय- —संतानें केतु हैं। इसलिए संतानों से संबंध अच्छे रखें। भगवान गणेश की आराधना करें। दोरंगी कुत्ते को रोटी खिलाएँ। कान छिदवाएँ। कुत्ता भी पाल सकते हैं, लेकिन लाल किताब के विशेषज्ञ से इस बारे में सलाह करना न भूलें।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

क्यों होता है सूर्य ग्रहण —-

क्यों होता है सूर्य ग्रहण —-

सूर्य ग्रहण सूर्य का चन्द्रमा के पीछे छिप जाने की घटना को कहते हैं। यह घटना सदा सर्वदा अमावस्या को ही होती है। पृथ्वी सूरज की परिक्रमा करती है और चाँद पृथ्वी की। कभी-कभी चाँद, सूरज और धरती के बीच आ जाता है। फिर वह सूरज की कुछ या सारी रोशनी रोक लेता है जिससे धरती पर साया फैल जाता है। इस घटना को सूर्य ग्रहण कहा जाता है। अक्सर चाँद, सूरज के सिर्फ कुछ हिस्से को ही ढ़कता है। यह स्थिति खण्ड-ग्रहण कहलाती है। कभी-कभी ही ऐसा होता है कि चाँद सूरज को पूरी तरह ढँक लेता है। इसे पूर्ण-ग्रहण कहते हैं। पूर्ण-ग्रहण धरती के बहुत कम क्षेत्र में ही देखा जा सकता है। ज्यादा से ज्यादा दो सौ पचास (२५०) किलोमीटर के सम्पर्क में। इस क्षेत्र के बाहर केवल खंड-ग्रहण दिखाई देता है। पूर्ण-ग्रहण के समय चाँद को सूरज के सामने से गुजरने में दो घंटे लगते हैं। चाँद सूरज को पूरी तरह से, ज्यादा से ज्यादा, सात मिनट तक ढँकता है। इन कुछ क्षणों के लिए आसमान में अंधेरा हो जाता है, या यूँ कहें कि दिन में रात हो जाती है सूर्य ग्रहण अमावस्या तिथि को होता है। भौतिक विज्ञान की दृष्टि से जब सूर्य व पृथ्वी के बीच में चन्द्रमा आ जाता है तो चन्द्रमा से सूर्य का बिम्ब कुछ समय के लिए ढक जाता है, उसी को सूर्य ग्रहण कहा जाता है। चन्द्रमा द्वारा सूर्य के बिम्ब के पूरे या कम भाग के ढके जाने की वजह से सूर्य ग्रहण तीन प्रकार के होते हैं जिन्हें पूर्ण सूर्य ग्रहण, आंशिक सूर्य ग्रहण व वलयाकार सूर्य ग्रहण कहते हैं।

पूर्ण सूर्य ग्रहण —-

जब चन्द्रमा पृथ्वी के काफी पास रहते हुए पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है तब पृथ्वी पर से पूरा सूर्य दिखाई नहीं देता। इसे पूर्ण सूर्य ग्रहण कहते हैं।

आंशिक सूर्य ग्रहण —-

जब चन्द्रमा सूर्य व पृथ्वी के बीच में इस प्रकार आए कि सूर्य का कुछ ही भाग पृथ्वी से दिखाई न दे तो पृथ्वी के उस भाग विशेष में लगा ग्रहण आंशिक सूर्य ग्रहण कहा जाता है।

वलयाकार सूर्य ग्रहण—–

जब चन्द्रमा पृथ्वी के काफी दूर रहते हुए पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है तो पृथ्वी से देखने पर चन्द्रमा द्वारा सूर्य पूरी तरह ढका दिखाई नहीं देता बल्कि उसका बाहरी हिस्सा एक कंकण या वलय के रूप में चमकता दिखाई देता है। इसलिए उसे वलयाकार सूर्य ग्रहण कहते हैं।

श्राद्ध – पितृ ऋण से मुक्ति का सरल साधन – आचार्य राघवकीर्ति ( काकागुरू )

हिंदू मास गणना में अश्विन मास के कृष्ण पक्ष के दौरान सूर्य देवता पृथ्वी के अत्यधिक निकट रहते हैं,जिससे पितरों का प्रभाव पृथ्वी पर अधिक होता है,इसलिए इस पक्ष में पितरों के निमित्त कर्म ( दान-तर्पण-भोजन )किया जाना महत्वपूर्ण माना गया हैं, पूर्व पितृजनों कि पूजा,उनके प्रति नम्रता कृतज्ञता प्रकट करने एवं उन्हेंश्रद्धांजलि प्रदान करने के साथ साथ उन सत्पुरुषों – गुरुजनॉ – पितरों के प्रति भी श्रद्धा और शिष्टाचार का पाठ इस पर्व पर दोहराते हैं जो जीवित हैं, इस तरह शिष्टाचार-श्रद्धा का पर्व हैं- श्राद्ध पक्ष
शास्त्रों में श्राद्ध की महिमा में कहा गया हैं-

श्राद्धम् भावस्य श्रद्धया: कृतज्ञत्वस्य च तथा

नूनमभिव्यक्तिरेव कथ्यते च मनीषिभिः

अर्थात श्रद्धा भावना का प्रकटीकरण तथा कृतज्ञता की अभिव्यक्ति को ही विद्वान श्राद्ध कहते हैं,

बहुमान: सज्जनानाम् स्मृति स्तेषाम् च पावनी

परम्परा पालनं च श्राद्धं भवति वस्तुतः

अर्थात सज्जनों का सम्मान करना,उनकी पावन स्मृति रखना और परम्परा का पालन करना ही वास्तविक श्राद्ध होता हैं,

श्राद्धेन तुष्टा: पितरो मृताश्च जीवितास्तु वा

श्रद्धालोर्जायते भद्रं तेयच्छान्त्याशिषस्तदा

अर्थात श्राद्ध कर्म से मृत या जीवित पितृ-गण संतुष्ट होते हुए अपना आशीर्वाद देते हैं जिससे श्रद्धालु का कल्याण-मंगल होता हैं,

एवं विधानतः श्राद्धं कुर्यात स्वविभाचितम्

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं जगत प्रीणाति मानवः

अर्थात जो श्रद्धालु विधिपूर्वक अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध करता है,यथाशक्ति अन्न-वस्त्र दान करता है,वह ब्रह्मलोक से लेकर भू-लोक तक के सभी प्राणियों को संतुष्ट करता है,उसके पितृ प्रसन्न होते हैं और वह सुबह प्राप्त करता हैं-उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं,

सर्वप्रथम पूजा वेदी के पास ही एक चौकी पर यम देवता – पितृ देवता और पञ्चभूतों की स्थापना करें,एक नारियल पर लाल कपड़ा एवं कलावा आदि लपेटकर चौकी के मध्य में मुठ्टी भर चांवलों पर रखें,उसके पास मुठ्टी भर तिल पितरों के प्रतिक स्वरुप रखें,नारियल के दूसरी ओर चांवलों को लाल,हरे,काले,सफ़ेद और पीले रंग कर पञ्च स्थानों पर पंचभूतों के प्रतीक स्वरुप में रखें-श्रीगणपति – गुरु – पितरों का स्मरण कर,प्रणाम कर पूजन प्रारम्भ करे,

- दिनचर्या में समय का पालन एवं नियंत्रित कार्यक्रम रखना भी यम-पूजन का उद्देश्य है

ॐ यमाय नम :

गन्धाक्षत – पुष्पाणि समर्पयामी

ऐसा भाव करते हुए चन्दन (सफ़ेद)-अक्षत और पुष्प यम देवता के स्थान पर चढाएं,प्रणाम करें और मंगल की प्रार्थना करें

- जिन लोगों का हाथ हमारे शरीर – जीवन निर्माण में रहा,जिन जिन ने हमारे लिए त्याग किया-कष्ट उठाये,जो अपने ज्ञान- धन-संस्कृति-वैभव-समृद्धि आदि की धरोहर हमें सौंप गए,उन सबके प्रति अपनी श्रद्धा,भक्ति भावना,कृतज्ञता प्रकट करने के लिए पितृ पूजन किया जाता है

ॐ पितृभ्य: स्वधायीभ्य: स्वधा नम: , पितामहेभ्य: स्वधायीभ्य: स्वधा नम: , प्रपितामहेभ्य: स्वधायीभ्य: स्वधा नम: ,अज्ञन्पितरोsमीमदन्त पितरोsती तृपन्त पितरः पितरः शुन्धध्वम्

यह मंत्र पढते हुए अपने पितरों को प्रणाम कर मंगल कि प्रार्थना करते हुए गंध ( सफ़ेद चन्दन )- अक्षत और सफ़ेद पुष्प अर्पित करे

- अब पञ्च देवता ( भूमि,अग्नि,वायु,आकाश और वरुण ) का स्मरण करते हुए उन्हें प्रणाम कर गंध-अक्षत-पुष्प अर्पित करे और मंगल की प्रार्थना करें

इसके पश्चात पितरों के प्रति अपनी श्रद्धा-कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उसे श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है,जलांजलि भेंट की जाती है,जलांजलि भेंट करने कि प्रक्रिया ही तर्पण कहलाती है

तर्पण (जलांजलि) के सम्बन्ध में स्थानाभाव – समयाभाव को देखते हुए संक्षिप्त मार्गदर्शन दिया जा रहा है,साधारण गृहस्थ भी बताई हुई विधि अनुसार अपने अपने पितरों को तर्पण रूप में जलांजलि दे कर संतुष्ट कर उनके आशीर्वाद से सुख-समृद्धि प्राप्त कर सकता है ( विस्तृत प्रक्रिया कर्मकांडी वैदिक विद्वान से संपन्न करावें )

तर्पण प्रारंभ करने से पूर्व दोनों हाथों की अनामिका अँगुलियों में पवित्री धारण की जाये,पवित्री कुशाओं में गांठ लगाकर इस प्रकार छल्ले (अंगूठी) की तरह बनाई जाती है,जिसमेंकुषाओं के दोनों सिरे मूल एवं अग्र भाग अलग अलग निकलें हुए रहें ,

पवित्री धारण करने के पश्चात एक बड़े पात्र में जल-चांवल-जौ-तिल-दूध-सफ़ेद पुष्प रखें और सामने एक बड़ी थाली ( परात ) रखें,जो श्रद्धालु यज्ञोपवीत ( जनेऊ ) धारण नहीं करते उन्हें तर्पण करते समय जनेऊ धारण जरुर करना चाहिए,अब छ: चरणों में तर्पण प्रक्रिया का प्रारंभ करे

1- देव तर्पण

विशेष- देव तर्पण करते समय कुशों के अग्र भाग से जल अर्पण किया जाता है,पूर्व कि ओर मुंह कर बैठे,जनेऊ कि स्थिति सामान्य अर्थात जनेऊ बांये कंधे पर रहे ( तर्पण करने को तैयार इस अवस्था स्थिति को देव तीर्थ कहा जाता है ) बड़े पात्र से अंजुली में जल भर कर कुशा से सामने कि ओर निम्न मंत्र पढते हुए सामने रखे पात्र ( परात )में 29 बार देवता को सामने से जलांजलि देते हुए उनके निमित्त तर्पण करे – ॐ ब्रह्मा तृप्यताम् 2- ऋषि तर्पण

अब (देव तीर्थ अवस्था में ही) नौ बार ॐ नारद तृप्यताम् का उच्चारण करते हुए ऋषियों का स्मरण कर जलांजलि दें

3- दिव्य मनुष्य

दिव्य मनुष्यों का तर्पण करते समय उत्तर कि ओर मुहँ कर बैठे,जनेऊ को माला कि तरह कंठ ( गले ) में धारण करे,जलांजलि के समय दांये हाथ कि कनिष्ठिका उंगली के मूल में कुशा रख कर उसी के सहारे अर्थात कनिष्ठिका के मूल से ही जलांजलि दी जाती है ( दिव्य मनुष्य के तर्पण के समय कि इस अवस्था -स्थिति को प्रजापत्य तीर्थ कहा जाता है )

निम्न मंत्र पढते हुए ऊपर दी गई विधि अनुसार सात दिव्य पुरुषों के लिए 14 बार जल दें-जलांजलि अर्पित करें-

ॐ सनकस्तृप्यताम्

4- दिव्य पितर

दिव्य पितर तर्पण के समय दक्षिण कि ओर मुहँ रखे ,जनेऊ कि स्थिति दायें कंधे पर हो,कुशाओं के मूल एवं अग्र भाग को संयुक्त करके तर्जनी और अंगुष्ठ के बीच से अंजुली से अंगुष्ठ के पास से जल दाहिनी ओर जलांजलि दें याने जल गिरावे, जलांजलि की इस स्थिति को इस अवस्था को इस मुद्रा को पितृ तीर्थ कहा जाता है

जलांजलि देते समय पितृ तर्पण करते समय इस मंत्र का उच्चारण करे-अपने पितरों का स्मरण करें उनसे संतुष्ट हो आशीर्वाद देने किप्रार्थना करते हुए सात पितरो को तीन तीन बार जलांजलि देते हुए इक्कीस बार जलांजलि दे तर्पण करे,

ॐ तस्मै स्वधा

5- यम तर्पण

दिव्य पितर कि अवस्था,स्थिति में अर्थात पितृ तीर्थ कि अवस्था में प्रत्येक यम के लिए तीन तीन अंजुली के मान से चौदह यम के लिए, 42 बार जलांजलि दें- तर्पण करें, इस क्रिया के दौरान निम्न मंत्र पढ़ें

ॐ यमाय नम:

6- पित् गण तर्पण

दिव्य पितर कि अवस्था,स्थिति में अर्थात पितृ तीर्थ कि अवस्था में ही अपने पितृ गण का नाम गौत्र आदि का उच्चारण करते हुए एक एक पिटर के निमित्त तीन तीन जलांजलि -तर्पण प्रयोग करें

अस्मत्पिता ( पिता का नाम ) अमुकसगोत्रों वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:

अस्मत्पितामह: ( पितामह याने दादा का नाम ) अमुकसगोत्रों रूद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:

अस्मप्रत्पितामह: ( प्रपितामह याने परदादा का नाम ) अमुकसगोत्रों आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:

अस्मन्माता ( माता का नाम ) देवी अमुकसगोत्रों वसुरूपास्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:

अस्मन्मातातामही ( मातामही याने दादी का नाम ) अमुकसगोत्रों रूद्ररूपास्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम

अस्मप्रन्मातातामही (प्रमातामही याने परदादी का नाम) अमुकसगोत्रों आदित्यरूपास्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:

( यदि सौतेली माता हो तो यह जलांजलि दें अन्यथा यह जलांजलि न दें )

अस्मन्माता ( माता का नाम ) देवी अमुकसगोत्रों वसुरूपास्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:

अंत में अन्यान्य पितृ गण के निमित्त तीन बार जलांजलि अर्पित करे,

अब सभी पितृ गण का पुण्य स्मरण करते हुए निम्न मंत्रो से प्रणाम करें-संतुष्ट हो आशीर्वाद देने की प्रार्थना करे,

ॐ नमो व: पितरो रसाय नमो व: पितर: शोषाय नमो व: पितरो जीवाय नमो व: पितर: स्वधायै नमो व: पितरो

घोराय नमो व: पितरो मन्यवे नमो व: पितर: पितरो नमो वो गृहान्न पितरो दत्त सतो व: पितरो देष्मैतद्व: पितरो वास आधत्त

पितृ गण को दोनों हाथ जोड़ कर श्रद्धा भक्तिपूर्वक नमस्कार करने के बाद संसार के हितकर और प्रेरणादायी प्राणियों ( गाय-कुत्ता-कौवा-चींटी ) के लिए भोजन का अंश प्रदान कर उनके प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करें,अब खीरान्न – पूड़ी आदि भोजन पदार्थ पितरों के निमित्त ब्राह्मण / अतिथी को भेंट करें-भोजन करावे और दक्षिणा प्रदान कर आशीर्वाद ग्रहण करें-मंगल होगा…..

श्राद्ध से तृप्त होते हैं पितृगण————-

शास्त्रों में विधान है, घर में कुछ भी न होने पर पितरों की तिथि में एकान्त में दोनों हाथ ऊपर उठाकर भक्ति भाव से अश्रुपात करते हुए पितरों से विनती पर तृप्त होने के लिए भगवान से प्रार्थना करें। इससे श्राद्ध का महत्व जीवन में कितना है, अनुमान किया जा सकता है। पितृगण भी श्राद्ध से तृप्त होकर अपने संतति को सभी सुख समृद्धि से तृप्त कर देते हैं।
अश्विन कृष्णापक्ष को अपर पक्ष व पितृपक्ष माना जाता है। धर्मशास्त्र के अनुसार जब कन्या राशि पर सूर्य पहुंचते हैं, वहां से 16 दिन पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण पिण्डदान आदि करना पितरों के लिए तृप्ति कारक माना गया है। पितरों की तृप्ति से घर में पुत्र पौत्रादिवंश वृद्धि एवं गृहस्थाश्रम में सुख शांति बनी रहती है। श्राद्ध कर्म की आवश्यकता के सम्बंध में शास्त्रों में बहुधा प्रमाण मिलते हैं। गीता में भी भगवान् लुप्त पिण्डोदक क्रिया कहकर उसकी आवश्यकता की ओर संकेत किए हैं। क‌र्तव्य के संबंध में शास्त्र ही प्रमाण है। इसलिए पितृ, देव, एवं मनुष्यों के लिए वेद शास्त्र को ही प्रमाण माना गया है, जंगल में रहकर कन्दमूलफल खाकर मन वाणी एवं कर्म से सर्वथा सत्य को ही पालन करने वाले महर्षि गणलोकोपकार के लिए शास्त्र माध्यम से हमें कल्याण मार्ग को बताते हैं। संसार को गुमराह करने के लिए नहीं। अत:आज भी आस्तिक लोग श्रद्धापूर्वक शास्त्र प्रतिपादित धार्मिक कृत्यों का अनुष्ठान करते हैं। जिस प्रकार चिकित्सक द्वारा प्रदत्त औषध के सम्पूर्ण विवरण जाने बिना खाने से भी रोगी लाभान्वित होता है, इसी प्रकार ऋषियों द्वारा प्रवर्तित या वेद प्रतिपादित कल्याण मार्ग के रहस्य को बिना जाने आचरण करने पर भी जीव का कल्याण हो जाता है। तथ्य का ज्ञान केवल ज्ञान -वृद्धि में सहायक होगा। जब तक अनुष्ठान नहीं किया जाएगा, तब तक कल्याण नहीं होगा, इसलिए ज्ञान पक्ष से क्रिया पक्ष अधिक महिमा मण्डित है। शरीर के दो भेद हैं। सूक्ष्म तथा स्थूल शरीर। पंचभौतिक शरीर मरणोपरान्त नष्ट हो जाता है। सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ उस प्रकार जाता है, जिस प्रकार पुष्प का सुगन्ध वायु के साथ। जिन धर्मग्रन्थों में मरने के बाद गति का वर्णन है, उन्हें स्थूल शरीर के अतिरिक्त सूक्ष्म शरीर मानना पडेगा। सूक्ष्म शरीर को प्रभावित करने वाला सूक्ष्म तत्व ही होता है, जिसको स्थूल मानदण्ड से मापा नहीं जा सकता। वेदों में आत्मा वे जायतेपुत्र: अर्थात पुत्र को आत्म-स्वरूप माना गया है। वैसे सजातीय धर्म का भी एक अपना महत्व है। मनुष्य-मनुष्य में, चुम्बक-चुम्बक में, तार-तार में आदि सजातीय धर्म सुदृढ़ रहता है। अत:इन सजातीय धर्म के आधार पर ही राजनीति में पिता के ऋण को पुत्र को चुकाना पडता है। पुत्र के ऋण को पिता को चुकाना पडता है। जिस प्रकार रेडियो स्टेशन से विद्युत तरंग से ध्वनि प्रसारित करने पर समान धर्म वाले केंद्र से ही उसे सुना जा सकता है, उसी प्रकार इस लोक में स्थित पुत्र रूपी मशीन के भी भावों को श्राद्ध में यथा स्थान स्थापित किए हुए आसन आदि की क्रिया द्वारा शुद्ध और अनन्य बनाकर उसके द्वारा श्राद्ध में दिए गए, अन्नादिकके सूक्ष्म परिणामों को स्थान्तरण कर पितृलोक में पितरों के पास भेजा जाता है। सामान्य व्यवहार में लोगों द्वारा प्रयुक्त अपशब्द या सम्मान जनक शब्द अगर लोगों के मन को उद्वेलित या प्रसन्न कर सकता है, तो पवित्र वेद मंत्रों से अभिमन्त्रित शुद्ध भाव से समर्पित अन्नादिके सूक्ष्मांशपितृ लोगों को तृप्त क्यों नहीं कर सकता? अवश्य करता है। श्राद्ध धन से ही सम्पन्न होगा, ऐसा नही है। जिसके पास अपने खाने के लिए भी दाना नहीं है, वह भी अपने पितरोंको श्रद्धा भाव से तर्पित कर सकता है।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

तिल बताएं भविष्य……

तिल बताएं भविष्य…
व्यक्ति के चेहरे पर किसी भी प्रकार के घाव आदि के चिन्ह या दाग, धब्बा आदि उसके सौंदर्य का नाश करते हैं, भले ही व्यक्ति के चेहरे का रंग गोरा अथवा सांवला हो। व्यक्ति के चेहरे पर तिल तो निश्चय ही सौंदर्यवर्धक हुआ करते हैं। तिल चेहरे की सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं। ऐसी मान्यता भी है कि व्यक्ति के चेहरे पर काले तिल उसे लोगों की बुरी नजर से बचाते हैं। इसलिए आजकल युवतियां अपने चेहरे को सुंदर बनाने के लिए कृतिम तिल भी बनवा लेती हैं। शरीर के विभिन्न अंगों पर पाए जाने वाले तिलों का सामान्य फल इस प्रकार है।तिल मात्र सौंदर्य बोधक ही नहीं होते हैं, ये व्यक्ति के भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का संकेत भी देते हैं। शरीर के विभिन्न अंगों पर तिल की स्थिति, उनके रंग और आकृति आदि के अध्ययन से जातक के भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है।प्राय: शरीर के अलग-अलग अंगों पर तिल के फल भी अलग-अलग होते हैं। पुरुष के शरीर पर दाहिनी ओर तिल होना शुभ एवं लाभकारी माना गया है जबकि महिलाओं के बायीं तरफ वाले तिल शुभ एवं लाभकारी माने जाते हैं। यदि किसी के हृदय पर तिल हो तो वह सौभाग्यवती होती है। किसी भी व्यक्तिके शरीर पर बारह से ज्यादा तिल होना अच्छा नहीं माना जाता। बारह से कम तिलों का होना शुभ फलदायक है।

पीठ पर तिल – पीठ पर तिल हो तो जातक भौतिकवादी, महत्वाकांक्षी एवं रोमांटिक हो सकता है। वह भ्रमणशील भी हो सकता है। ऐसे लोग धनोपार्जन भी खूब करते हैं और खर्च भी खुलकर करते हैं। वायु तत्व के होने के कारण ये धन संचय नहीं कर पाते।
पेट पर तिल – पेट पर तिल हो तो व्यक्ति चटोरा होता है। ऐसा व्यक्ति भोजन का शौकीन व मिष्ठान्न प्रेमी होता है। उसे दूसरों को खिलाने की इच्छा कम रहती है।
घुटनों पर तिल – दाहिने घुटने पर तिल होने से गृहस्थ जीवन सुखमय और बायें पर होने से दांपत्य जीवन दुखमय होता है।

पैरों पर तिल – पैरों पर तिल हो तो जीवन में भटकाव रहता है। ऐसा व्यक्ति यात्राओं का शौकीन होता है। दाएं पैर पर तिल हो तो यात्राएं सोद्देश्य और बाएं पर हो तो निरुद्देश्य होती हैं।

गले पर तिल – गले पर तिल वाला जातक आरामतलब होता है। गले पर सामने की ओर तिल हो तो जातक के घर मित्रों का जमावड़ा लगा रहता है। मित्र सच्चे होते हैं। गले के पृष्ठ भाग पर तिल होने पर जातक कर्मठ होता है।

छाती पर तिल – छाती पर दाहिनी ओर तिल का होना शुभ होता है। ऐसी स्त्री पूर्ण अनुरागिनी होती है। पुरुष भाग्यशाली होते हैं। शिथिलता छाई रहती है। छाती पर बायीं ओर तिल रहने से भार्या पक्ष की ओर से असहयोग की संभावना बनी रहती है। छाती के मध्य का तिल सुखी जीवन दर्शाता है। यदि किसी स्त्री के हृदय पर तिल हो तो वह सौभाग्यवती होती है।

कमर पर तिल – यदि किसी व्यक्ति की कमर पर तिल होता है तो उस व्यक्ति की जिंदगी सदा परेशानियों से घिरी रहती है।

ललाट पर तिल – ललाट के मध्य भाग में तिल निर्मल प्रेम की निशानी है। ललाट के दाहिने तरफ का तिल किसी विषय विशेष में निपुणता, किंतु बायीं तरफ का तिल फिजूलखर्ची का प्रतीक होता है। ललाट या माथे के तिल के संबंध में एक मत यह भी है कि दायीं ओर का तिल धन वृद्धिकारक और बायीं तरफ का तिल घोर निराशापूर्ण जीवन का सूचक होता है।

भौंहों पर तिल – यदि दोनों भौहों पर तिल हो तो जातक अकसर यात्रा करता रहता है। दाहिनी पर तिल सुखमय और बायीं पर तिल दुखमय दांपत्य जीवन का संकेत देता है।
आंख की पुतली पर तिल – दायीं पुतली पर तिल हो तो व्यक्ति के विचार उच्च होते हैं। बायीं पुतली पर तिल वालों के विचार कुत्सित होते हैं। पुतली पर तिल वाले लोग सामान्यत: भावुक होते हैं।

पलकों पर तिल – आंख की पलकों पर तिल हो तो जातक संवेदनशील होता है। दायीं पलक पर तिल वाले बायीं वालों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होते हैं।

आंख पर तिल – दायीं आंख पर तिल स्त्री से मेल होने का एवं बायीं आंख पर तिल स्त्री से अनबन होने का आभास देता है।

कान पर तिल – कान पर तिल व्यक्ति के अल्पायु होने का संकेत देता है।

नाक पर तिल – नाक पर तिल हो तो व्यक्ति प्रतिभासंपन्न और सुखी होता है। महिलाओं की नाक पर तिल उनके सौभाग्यशाली होने का सूचक है।

होंठ पर तिल – होंठ पर तिल वाले व्यक्ति बहुत प्रेमी हृदय होते हैं। यदि तिल होंठ के नीचे हो तो गरीबी छाई रहती है।

मुंह पर तिल – मुखमंडल के आसपास का तिल स्त्री तथा पुरुष दोनों के सुखी संपन्न एवं सज्जन होने के सूचक होते हैं। मुंह पर तिल व्यक्ति को भाग्य का धनी बनाता है। उसका जीवनसाथी सज्जन होता है।

गाल पर तिल – गाल पर लाल तिल शुभ फल देता है। बाएं गाल पर कृष्ण वर्ण तिल व्यक्ति को निर्धन, किंतु दाएं गाल पर धनी बनाता है।

जबड़े पर तिल – जबड़े पर तिल हो तो स्वास्थ्य की अनुकूलता और प्रतिकूलता निरंतर बनी रहती है।

ठोड़ी पर तिल – जिस स्त्री की ठोड़ी पर तिल होता है, उसमें मिलनसारिता की कमी होती है।

कंधों पर तिल – दाएं कंधे पर तिल का होना दृढ़ता तथा बाएं कंधे पर तिल का होना तुनकमिजाजी का सूचक होता है।

दाहिनी भुजा पर तिल – ऐसे तिल वाला जातक प्रतिष्ठित व बुद्धिमान होता है। लोग उसका आदर करते हैं।

बायीं भुजा पर तिल – बायीं भुजा पर तिल हो तो व्यक्ति झगड़ालू होता है। उसका सर्वत्र निरादर होता है। उसकी बुद्धि कुत्सित होती है।

कोहनी पर तिल – कोहनी पर तिल का पाया जाना विद्वता का सूचक है।

हाथों पर तिल – जिसके हाथों पर तिल होते हैं वह चालाक होता है। गुरु क्षेत्र में तिल हो तो सन्मार्गी होता है। दायीं हथेली पर तिल हो तो बलवान और दायीं हथेली के पृष्ठ भाग में हो तो धनवान होता है। बायीं हथेली पर तिल हो तो जातक खर्चीला तथा बायीं हथेली के पृष्ठ भाग पर तिल हो तो कंजूस होता है।

अंगूठे पर तिल – अंगूठे पर तिल हो तो व्यक्ति कार्यकुशल, व्यवहार कुशल तथा न्यायप्रिय होता है।

तर्जनी पर तिल – जिसकी तर्जनी पर तिल हो, वह विद्यावान, गुणवान और धनवान किंतु शत्रुओं से पीड़ित होता है।

मध्यमा पर तिल – मध्यमा पर तिल उत्तम फलदायी होता है। व्यक्ति सुखी होता है। उसका जीवन शांतिपूर्ण होता है।

अनामिका पर तिल – जिसकी अनामिका पर तिल हो तो वह ज्ञानी, यशस्वी, धनी और पराक्रमी होता है।

कनिष्ठा पर तिल – कनिष्ठा पर तिल हो तो वह व्यक्ति संपत्तिवान होता है, किंतु उसका जीवन दुखमय होता है।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

श्राद्ध के विविध स्वरूप—–

श्राद्ध के विविध स्वरूप——
मत्स्य पुराण में तीन प्रकार के श्राद्ध बतलाए गए है, जिन्हें नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य के नाम से जाना जाता है। यमस्मृतिमें पांच प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता है। जिन्हें नित्य, नैमित्तिक काम्य, वृद्धि और पार्वण के नाम से जाना जाता है।नित्य श्राद्ध- नित्य का अर्थ प्रतिदिन। अर्थात् रोज-रोज किए जानें वाले श्राद्ध को नित्यश्राद्ध कहते हैं। इस श्राद्ध में विश्वेदेव को स्थापित नहीं किया जाता। अत्यंत आवश्यकता एवं असमर्थावस्थामें केवल जल से इस श्राद्ध को सम्पन्न किया जा सकता है।

नैमित्तिक श्राद्ध- किसी को निमित्त बनाकर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे नैमित्तिक श्राद्ध कहते हैं। इसे एकोद्दिष्ट के नाम से भी जाना जाता है। एकोद्दिष्ट का मतलब किसी एक को निमित्त मानकर किए जाने वाला श्राद्ध जैसे किसी की मृत्यु हो जाने पर दशाह, एकादशाह आदि एकोद्दिष्ट श्राद्ध के अन्तर्गत आता है। इसमें भी विश्वेदेवोंको स्थापित नहीं किया जाता।

काम्य श्राद्ध- किसी कामना की पूर्ति के निमित्त जो श्राद्ध किया जाता है। वह काम्य श्राद्ध के अन्तर्गत आता है।

वृद्धि श्राद्ध- किसी प्रकार की वृद्धि में जैसे पुत्र जन्म, विवाहादिमांगलिक कार्यो में जो श्राद्ध होता है। उसे वृद्धि श्राद्ध कहते हैं। इसे नान्दीश्राद्धया नान्दीमुखश्राद्ध के नाम भी जाना जाता है।

पार्वण श्राद्ध- पार्वण श्राद्ध पर्व से सम्बन्धित होता है। किसी पर्व जैसे पितृपक्ष, अमावास्याअथवा पर्व की तिथि आदि पर किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाता है। यह श्राद्ध विश्वेदेवसहित होता है।

विश्वामित्रस्मृतितथा भविष्यपुराणमें बारह प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता हैं जिन्हें नित्य, नैमित्तिक काम्य, वृद्धि, पार्वण, सपिण्डन,गोष्ठी, शुद्धयर्थ,कर्माग,दैविक, यात्रार्थतथा पुष्ट्यर्थके नामों से जाना जाता है। यदि ध्यान पूर्वक देखा जाय तो इन बारहों श्राद्धों का स्वरूप ऊपर बताए गए पांच प्रकार के श्राद्धों में स्पष्ट रूप से झलकता है।

सपिण्डनश्राद्ध- सपिण्डनशब्द का अभिप्राय पिण्डों को मिलाना। दरअसल शास्त्रों के अनुसार जब जीव की मृत्यु होती है, तो वह प्रेत हो जाता है। प्रेत से पितर में ले जाने की प्रक्रिया ही सपिण्डनहै। अर्थात् इस प्रक्रिया में प्रेत पिण्ड का पितृ पिण्डों में सम्मेलन कराया जा सकता है। इसे ही सपिण्डनश्राद्ध कहते हैं।

गोष्ठी श्राद्ध- गोष्ठी शब्द का अर्थ समूह होता है। जो श्राद्ध सामूहिक रूप से या समूह में सम्पन्न किए जाते हैं। उसे गोष्ठी श्राद्ध कहते हैं।

शुद्धयर्थश्राद्ध- शुद्धि के निमित्त जो श्राद्ध किए जाते हैं। उसे शुद्धयर्थश्राद्ध कहते हैं। जैसे शुद्धि हेतु ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए।

कर्मागश्राद्ध- कर्मागका सीधा साधा अर्थ कर्म का अंग होता है, अर्थात् किसी प्रधान कर्म के अंग के रूप में जो श्राद्ध सम्पन्न किए जाते हैं। उसे कर्मागश्राद्ध कहते हैं। जैसे- सीमन्तोन्नयन, पुंसवन आदि संस्कारों के सम्पन्नता हेतु किया जाने वाला श्राद्ध इस श्राद्ध के अन्तर्गत आता है।

यात्रार्थश्राद्ध- यात्रा के उद्देश्य से किया जाने वाला श्राद्ध यात्रार्थश्राद्ध कहलाता है। जैसे- तीर्थ में जाने के उद्देश्य से या देशान्तर जाने के उद्देश्य से जिस श्राद्ध को सम्पन्न कराना चाहिए वह यात्रार्थश्राद्ध ही है। यह घी द्वारा सम्पन्न होता है। इसीलिए इसे घृतश्राद्धकी भी उपमा दी गयी है।

पुष्ट्यर्थश्राद्ध- पुष्टि के निमित्त जो श्राद्ध सम्पन्न हो, जैसे शारीरिक एवं आर्थिक उन्नति के लिए किया जाना वाला श्राद्ध पुष्ट्यर्थश्राद्ध कहलाता है।

वर्णित सभी प्रकार के श्राद्धों को दो भेदों के रूप में जाना जाता है। श्रौत तथा स्मा‌र्त्त।पिण्डपितृयागको श्रौतश्राद्धकहते हैं तथा एकोद्दिष्ट पार्वण आदि मरण तक के श्राद्ध को स्मा‌र्त्तश्राद्ध कहा जाता है।

श्राद्धैर्नवतिश्चषट्-धर्मसिन्धुके अनुसार श्राद्ध के 96अवसर बतलाए गए हैं। एक वर्ष की अमावास्याएं(12) पुणादितिथियां (4),मन्वादि तिथियां (14)संक्रान्तियां (12)वैधृति योग (12),व्यतिपात योग (12)पितृपक्ष (15), अष्टकाश्राद्ध(5) अन्वष्टका(5) तथा पूर्वेद्यु:(5) मिलाकर कुल 96अवसर श्राद्ध के हैं।

श्राद्ध विवेचन

प्रत्येक शरीर में आत्मा तीन रूप में पाई जाती है,पहली विज्ञान आत्मा दूसरी महान आत्मा और तीसरी भूत आत्मा,विज्ञान आत्मा वह है,तो गर्भाधान से पहले स्त्री पुरुष में संभोग की इच्छा उत्पन्न करती है,वह आत्मा रोदसी नामक मंडल से आता है,उक्त मंडल पृथ्वी से सत्ताइस हजार मील दूर है,दूसरी है महान आत्मा वह चन्द्रलोक से अट्ठाइस अंशात्मक रेतस बनाकर आता है,उसी २८ अंश रेतस से पुरुष पुत्र पैदा करता है,तीसरी है भूतात्मा जो माता पिता द्वारा खाने वाले अन्न के रस से बने वायु द्वारा गर्भ पिण्ड में प्रवेश करता है,उससे खाये गये अन्न और पानी की मात्रा के अनुसार अहम भाव शामिल होता है,इसी को प्रज्ञानात्मा तथा भूतात्मा कहते है,यह भूतात्मा पृथ्वी के अलावा किसी अन्य लोक में नही जा सकती है,मृत प्राणी की महानात्मा स्वजातीय चन्द्र लोक में चला जाता है,चन्द्र लोक में उस महानात्मा से २८ अंश रेतस मांगा जाता है,क्योंकि चन्द्रलोक से २८ अंश रेतस लेकर ही वह उत्पन्न हुआ था,इसी अट्ठाइस अंश रेतस को पितृ ऋण कहते है,२८ अंश रेतस के रूप में श्रद्धा नामक मार्ग से भेजे जाने वाले पिण्ड तथा जल आदि के दान को श्राद्ध कहते हैं। इस श्रद्धा नामक मार्ग का सम्बन्ध मध्यान्हकाल में पृथ्वी से होता है,इसलिये ही मध्यान्हकाल में श्राद्ध करने का विधान है,पृथ्वी पर कोई भी वस्तु सूर्यमण्डल तथा चन्द्रमण्डल के सम्पर्क से ही बनती है,संसार में सोम सम्बन्धी वस्तु विशेषत: चावल और जौ ही है,जौ में मेधा की अधिकता है,धान और जौ में रेतस (सोम) का अंश विशेष रूप से रहता है,अश्विन कृष्ण पक्ष में यदि चावल तथा जौ का पिण्डदान किया जावे तो चन्द्रमण्डल को रेतस पहुंच जाता है,पितर इसी चन्द्रमा के ऊर्ध्व देश में रहते है,”विदूर्ध्वभागे पितरो वसन्त: स्वाध: सुधादीधीत मामनन्ति”।

अश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ऊपर की ओर रश्मि तथा रश्मि के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है,श्राद्ध की मूलभूत परिभाषा यह है कि प्रेत और पितर के निमित्त उनकी आत्मा की तृप्ति के लिये श्रद्धा पूर्वक जो अर्पित किया जाता है,वह ही श्राद्ध है। मृत्यु के पश्चात दसगात्र और षोडशी पिण्डदान तक मृत व्यक्ति की प्रे संज्ञा रहती है,सपिण्डन के बाद वह पितरों में सम्मिलित हो जाता है।

पितृ पक्ष में भर में जो तर्पण किया जाता है,उससे वह पितृप्राण स्वयं आप्यायित होता है,पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो जौ या चावल का पिण्डदान देता उसमें रेतस का अंश लेकर चन्द्रलोक में अम्भप्राण का ऋण चुका देता है,ठीक अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से वह चक्र ऊपर की ओर होने लगता है,१५ दिन पश्चात अपना अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से उसी रश्मि के साथ रवाना हो जाता है,इसलिये इसे पितृ पक्ष कहते है,अन्य दिनों में जो श्राद्ध किया जाता है,उसका सम्बन्ध सूर्य की सुषुम्ना नाडी से रहता है,जिसके द्वारा श्रद्धा मध्यान्हकाल में पृथ्वी पर आती है,और यहां से तत पितर का भाग लेजाती है,परन्तु पितृ पक्ष में पितृप्राण चन्द्रमा के ऊर्ध्व देश में रहते है,वे स्वत: ही चन्द्र पिण्ड की परिवर्तित स्थिति के कारण पृथ्वी पर व्याप्त होते है,इसी कारण पितृपक्ष में तर्पण का इतना महात्म्य है।

शास्त्रों में निर्देश है,के माता पिता आदि के निमित्त उनके नाम और उच्चारण मन्त्रों द्वारा जो अन्न आदि अर्पित किया जाता है,वह उनको व्याप्त होता है,यदि अपने कर्मों के अनुसार उनको देवयोनि प्राप्त हो तो वह अन्न उन्हे अमृत रूप में प्राप्त होता है,यदि उन्हे गन्धर्व लोक की प्राप्ति हो तो वह अन्न उन्हे भोग्यरूप में उन्हे प्राप्त होता है,यदि वह पशु योनि में हो तो वह अन्न उन्हे तृण रूप में प्राप्त होता है,यदि वह प्रेत योनि में प्राप्त हो तो वह अन्न उन्हे रुधिर रूप में प्राप्त होता है,यदि कर्मानुसार मनुष्य योनि प्राप्त हो तो वह अन्न उन्हे अन्न आदि के रूप में प्राप्त होता है।

श्राद्ध पक्ष की सूचना पाते ही सभी पितृ एक दूसरे का स्मरण करते हुये मनोमय रूप में श्राद्ध स्थल पर उपस्थित होते है,और ब्राह्मणों के साथ वायु रूप में भोजन प्राप्त करते है,किंवदन्ति के अनुसार सूर्य कन्या राशि में आता है,तो पितर अपने पुत्र और पौत्रों के घर जाते है,विशेषत: अश्विन अमावस्या को उनका श्राद्ध नही करने पर वे श्राप देकर लौट जाते है,अत: उन्हे पत्र पुष्प फ़ल और जल तर्पण से यथा शक्ति उन्हे तृप्त करना चाहिये,हमे श्राद्ध विमुख नही होना चाहिये।

॥ कन्यागते सवितरि पितरौ यान्ति वै सुतान,अमावस्या दिने प्राप्ते गृहद्वारं समाश्रिता:,श्रद्धाभावे स्वभवनं शापं दत्वा ब्रजन्ति ते॥

मुख्यत: श्राद्ध दो प्रकार के होते है,एकोदिष्ट,और पार्वण,कालान्तर में चार प्रकार के श्राद्धों को मुख्यता दी गयी,वे है पार्वण,एकोदिष्ट वृद्धि और सपिण्डन,यही चार प्रकार के श्राद्ध समाज में प्रचलित है,वृद्धि श्राद्ध का स्पष्ट अर्थ नान्दिमुख श्राद्ध है,श्राद्धों की पूर्ण संख्या बारह है।

॥ नित्यं नैमित्तिकं काम्यं वृद्धिश्राद्ध सपिण्डनं,पार्वण चेति विज्ञेय गोष्ठ्यां शुद्ध्यर्थष्टमम,कर्मागं नवम प्रोक्तं दैविकं दशमं स्मृतम,यात्रास्वेकादशं प्रोक्तं पुष्टयर्थ द्वादशं स्मृतम॥

इसमें नित्य श्राद्ध तर्पण और पंचमहायज्ञ के रूप में किया जाता है,नैमित्तिक श्राद्ध का ही नाम एकोदिष्ट है,यह किसी एक व्यक्ति के लिये किया जाता है,मृत्यु के बाद यही श्राद्ध किया जाता है,प्रतिवर्ष मृत्यु तिथि पर भी एकोदिष्ट ही किया जाता है,काम्य श्राद्ध किसी कामना की पूर्ति की इच्छा से किया जाता है,वृद्धि श्राद्ध पुत्र जन्म के अवसर पर किया जाता है,इसी को नान्दि श्राद्ध भी कहते है,सपिण्डन श्राद्ध मृत्यु के पश्चात दसगात्र षोडशी के बाद किया जाता है इसके द्वारा म्रुत व्यक्ति को पितरों के साथ मिलाया जाता है।

प्रेत श्राद्ध में जो पिण्डदान करते है,उस पिण्ड को पितरों को दिये पिण्ड में मिला दिया जाता है,पार्वण श्राद्ध प्रतिवर्ष अश्विन कृष्ण पक्ष में मृत्यु तिथि और अमावस्या के दिन किया जाता है,इसके अतिरिक्त अन्य सभी पर्वों पर भी यह श्राद्ध किया जाता है,गोष्ठी-श्राद्ध विद्वानों को सुखी समृद्ध बनाने के लिये किया जाता है,इससे पितरों को तृप्ति होना भी स्वाभाविक है,शुद्धि-श्राद्ध शारीरिक मानसिक और अशौचादि अशुद्धि के निवारण हेतु किया जाता है,कर्मांग-श्राद्ध सोमयाग पुंसवन सीमन्तोन्नयन आदि के अवसर पर किया जाता है,दैविक-श्राद्ध देवताओं की प्रसन्नता के लिये किया जाता है,यात्रा श्राद्ध यात्रा के समय किया जाता है,पुष्टि-श्राद्ध धन धान्य समृद्धि हेतु किया जाता है।हमारे धर्म शास्त्रों में श्राद्ध के सम्बन्ध में इतने विस्तार से अध्ययन किया गया है,कि इसके सामने अन्य समस्त धार्मिक कृत्य गौण लगते है,श्राद्ध के सूक्ष्मतम कृत्यों के सम्बन्ध में इतनी सूक्ष्म मीमांसा की गयी है,कि विचारशील मनुष्य इससे चमकृत हो उठते है,मनोविज्ञान के अध्ययन कर्ताओं के लिये श्राद्धीय कर्मकाण्ड विवेचन एवं अध्ययन हेतु उत्तम सामग्री है,शास्त्रकारों ने अपने पाण्डित्य और मनोविज्ञान का अद्वितीय रूप प्रकट किया है। नया मकान बनवाने पर नया कूप या पानी का साधन बनवाने पर,समृद्धि प्राप्त करने पर देश में कोई असाधारण घटना घटने पर शत्रुओं पर विजय प्राप्त होने पर पुत्र जन्म यज्ञोपवीत विवाह कन्यादान आदि अवसरों पर जब परिवार के सभी लोग मिलकर उत्सव मना रहे हों,मन उत्साहित हो उस समय अपने स्वर्गीय पूर्वजों की स्मृति होना नितांत आवश्यक है,उस समय यह इच्छा भी जागृत होती है,कि यदि इस अवसर पर माता पिता बडे भाई या अन्य कोई आत्मीय यहां होते तो वे सभी यह देखकर बहुत आनन्दित होते। जो हमारे सुख में अन्तरात्मा से सुखी तथा दुख में अन्तरात्मा से दुखी होते थे।

इस मनोवैज्ञानिक सत्य से इन्कार नही किया जा सकता कि मानसिक भावना सर्वशक्तिमान है,श्रद्धानत मन के समक्ष स्वर्गीय आत्मा सजीव और साकार हो उठती है,श्राद्ध में माता पिता आदि का ध्यान करना हमारा परम कर्तव्य है,अनेक श्रद्धालु लोगों का यह अनुभव है,कि श्राद्ध के समय उन्हे माता पिता या किसी अन्य आत्मीय की झलक दिखाई दी,भगवान राम ने जब अपने पिता का श्राद्ध किया था तब पिण्डदान के पश्चात भगवती सीता को दशरथ आदि पितरों के दर्शन करवाये थे,यह व्यर्थ कल्पना नही है,क्योंकि कालान्तर का मनोविज्ञान भी श्राद्ध के इस शाश्वत सत्य के निकट पहुंचता जा रहा है।

श्राद्ध के लिये आवश्यक वस्तुओं पर भी शास्त्रों में विस्तार से विचार किया गया है,कौनसी वस्तु कैसी हो,कहां से ली जाये,व कब ली जाये,भोजन सामग्री कैसी हो,किन पात्रों में वे कैसी बनायी जायें,इस सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का शास्त्रों में वर्णन किया गया है,फ़ल साग तरकारी आदि में कुछ वस्तुयें अश्राद्धीय बतायी गयी है,शास्त्रों में प्रत्येक वस्तु की शुद्धता व स्तर निर्धारित किया गया है,शास्त्रों द्वारा निर्धारित पुष्प व चन्दन का ही प्रयोग करना चाहिये। इसके अलावा श्राद्ध में कैसे ब्राह्मणों को आमन्त्रित किस प्रकार किया जाये,कब आमन्त्रित किया जाये,निमत्रण के बाद ब्राह्मण किस प्रकार आचरण करें,और ब्राह्मण किस प्रकार भोजन करें,इन सभी बातों का शास्त्रों में विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है,शास्त्रों में ब्राह्मण को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है,उत्तम,मध्यम और अधम,शास्त्रों में निषिद्ध ब्राह्मणों की सूची बहुत लम्बी है,शास्त्रों में कठोर आदेश है,कि अन्य किसी धार्मिक कृत्य में ब्राह्मणों की परीक्षा नही लेनी चाहिये,परन्तु श्राद्ध में प्रयत्नपूर्वक इस ब्राह्मण की परीक्षा लेनी चाहिये,और यह परीक्षा निमन्त्रण से पूर्व ही कर लेनी चाहिये।श्राद्ध किसी दूसरे के घर में दूसरे की भूमि में कभी नही करना चाहिये,ज भूमि सार्वजनिक हो,जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व नही हो,वहां श्राद्ध कर्म किया जा सकता है,शास्त्रीय निर्देशों के अनुसार दूसरों के घर मे श्राद्ध करने पर खुद के पितरों को कुछ नही मिलता है,गृहस्वामी के पितर बलपूर्वक श्राद्ध करने वाले के पितरों से सब कुछ छीन लेते है।घर में किये गये श्राद्ध का पुण्य तीर्थ-स्थल पर किये गये श्राद्ध से आठ गुना अधिक मिलता है।यदि किसी विवशता के कारण ही दूसरे के गृह अथवा भूमि में श्राद्ध करना पडे,तो सर्वप्रथम उस भूमि का किराया अथवा मूल्य उस भूस्वामी को दे देना चाहिये।मृतक की अन्त्येष्टि और श्राद्ध को जो व्यवस्था कालान्तर से प्रचलित है,वह भी हमारे वेदों में वर्णित है,गृह्यसूत्रों में पितृ यज्ञ अथवा पितृ श्राद्ध का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है,आश्वलायन गृह्यसूत्र के सप्ततमी अष्टमी कण्डिका में विस्तारपूर्वक श्राद्ध-विधि वर्णित की गयी है,जो कि पाठन व मनन दोनों की द्रिष्टि से उत्तम है। अन्त्येष्टि विधि का वर्णन भी इसमें उपल्ब्ध है,चिता प्रज्वलित होने पर ऋग्वेद का यह मन्त्र पढा जाता है,”प्रेहि प्रेहि पथभि: पूर्वेभि:”,अर्थात जिस मार्ग से पूर्वज गये है,तुम भी उसी मार्ग से जाओ,मूलत: वेदों में भी श्राद्ध और पिण्डदान का उल्लेख किया गया है,श्राद्ध में जो मन्त्र पढे जाते है,वे उनमे से कुछ इस प्रकार है,” अत्र पितरों मादध्वं यथाभागमा वृषायव्यम”,अर्थात पितृ यज्ञ में पित्रुगण उपस्तित हों,और अंशानुसार अपना अपना भाग ग्रहण करें। दूसरा इस प्रकार है,”नम: व: पितरो रसाय,नम: व: पितरो शोषाय”,अर्थात पितरों को नमस्कार ! बसन्त ऋतु का उदय होने पर सभी पदार्थ रसवान हो,तुम्हारी कृपा से देश सुन्दर बसन्त ऋतु को प्राप्त हो,पितरों को नमस्कार ! ग्रीष्म ऋतु आने पर सर्व पदार्थ शुष्क हों,देश में ग्रीष्म ऋतु भली प्रकार व्याप्त हों”।

इसी प्रकार छ: ऋतुओं के सुन्दर और सुखद होने की कामना की गयी है,यह भी कहा गया है कि पितरो ! तुमने हमे गृहस्थ बना दिया है,अत: हम तुम्हारे लिये दातव्य वस्तु अर्पित कर रहे है।

वेदों के बाद हमारे स्मृतिकारों और धर्माचार्यों ने श्राद्धीय विषयों को बहुत व्यापक बनाया है,और जीवन के प्रत्येक अंग के साथ सम्बद्ध कर दिया,मनुस्मृति से लेकर आधुनिक निर्णयसिन्धु धर्मसिन्धु तक की परम्परा यह सिद्ध करती है कि इस विधि में समय समय पर युगानुरूप संशोधन परिवर्धन और परिवर्तन होता रहा है,नयी मान्यता नयी परिभाषा नयी विवेचना और तदुनुरूप नयी व्यवस्था समान होती रही है,दुर्भाग्य की बात यह है कि विदेशी आधिपत्य के बाद जब हिन्दू समाज पंगु हो गया,तब समाज का नियंत्रण विदेशी पद्धति और विधि विधान से होने लगा,तब युग की आवश्यकता के अनुरूप नयी परिभाषा व्यवस्थाक्रम भी अवरुद्ध हो गया,फ़लस्वरूप उपयोगितावाद मानव मन की तुष्टि अपने पुरातन संस्कारों से नही हो पा रही है,और वह वेदान्ती मानव संस्कार विहीन होता जा रहा है,जीवित माता पिता भाई बहिन रिस्तेदार भी आज मात्र उपयोगितावाद की कसौटी पर कसे जा रहे है,तब हमारी आस्था स्वयं पर से ही विचलित होती जा रही है,देश में व्याप्त समस्त अशान्ति विक्षोभ असन्तोष अनैतिकता आदि का मूल कारण यही है,यही कारण द्वापर में यादव कुल को समाप्त करने के लिये पैदा हुये थे,जब एक ऋषि से मजाक करने और उनकी सत्यता को परखने के चक्कर में एक युवक के पेट में लोहे की कढाही बांध कर पूंछा गया था कि इसके पेट में क्या है,और उन ऋषि को सत्यता का पता चलते ही उन्होने कह दिया था कि इसके पेट में वही है,जो इस कुल का विनाश करेगा,डर की बजह से उस कढाही को समुद्र के किनारे पर पत्थर पर घिसा गया,बचे हुये टुकडे को समुद्र में फ़ेंका गया,उस टुकडे को एक मछली के द्वारा निगला गया,बहेलिये के द्वारा उस मछली को मारा गया,और उस टुकडे को बहेलिये के द्वारा तीर पर लगाया गया,लोहे की घिसन एक घास के अन्दर व्याप्त हुई,और वही घिसन से व्याप्त घास जब यादवों के पर्व पर नहाने के समय एक दूसरे को मारने से सभी मरते गये,और अन्त में उसी कुल की बजह से भगवान श्रीकृष्ण को भी उसी बहेलिये के द्वारा बनाये गये उसी तीर का शिकार होकर इस संसार से जाना पडा था,उसी प्रकार से आजका मानव उसी प्रकार के तत्वों को पैदा किये जा रहा है,जो पूर्व की सहायतायें थीं,उनके द्वारा अभी तक मानव चलता रहा,और अब धीरे धीरे समाप्त होने के कारण वह हर तरीके से परेशान दिखाई दे रहा है,उसे रास्ता नही मिल रहा है,जिससे वह अपने और अपने कारकों को वह संभाल पाये,लेकिन जो सभी तरह से मोक्ष यानी शांति को देने वाला कारण है,वह केवल अपने ऊपर आदेश देने और शांति देने के लिये पूर्वज ही माने जा सकते हैं।

मां शैलपुत्री की पूजा के साथ नवरात्र शुरु—-

नवरात्र की शुरुआत हो गई है और देश भर के मंदिरों में तैयारियां शुरु हो गई हैं..
मां शैलपुत्री की पूजा के साथ इन पावन नवरात्रों की शुरुआत हो रही है…
नवरात्र के हर दिवस का एक विशेष महत्व है। माता के नवरात्रों में ऐसे विशेष योग बनते हैं जिससे सभी समस्याओं का समाधान मिलता है। सारे कष्ट दूर होते हैं और पूर्ण होती है हर मनोकामना, क्योंकि माता के नवरात्रों में बनते हैं सर्वार्थ सिद्धि योग। नवरात्र की नौ देवियों में से सबसे प्रथम हैं मां शैलपुत्री।

अब बात करते हैं नवरात्र पूजन की। नवरात्र पूजन में विशेष महत्व होता है घट स्थापना और खैत्री बोने का। फिर चलिए जानते हैं क्या है पूजा विधि…

प्रथम देवी शैलपुत्री पूजन

-सर्वप्रथम लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं
-चावल से चौकी पर शं अक्षर लिखें
-शैलपुत्री माता की तस्वीर स्थापित करें
-दीपक व धूप प्रजज्वलित करें
-ऊँ श्री गणेशाय नमः मंत्र का 21 बार जाप करें
-ऊँ पुष्प मालाम समरपयामि का जाप करते हुए, गणेशजी पर दूर्वा, चावल, चीनी, जनेऊ व माला चढ़ाएं
-अम्बिका देव्यै नमः का जाप करते हुए माता को चुनरी, श्रंगार, मिष्ठान, पुष्प व दक्षिणा अर्पित करें
-शैलपुत्री देवी से स्वास्थ्य संबंधी आशीर्वाद मांगे व आरती करें

तो ये तो थीं नवरात्र पूजा के लिए घट स्थापना और पूजन विधियां। अब बात करते हैं प्रथमं नवरात्र की देवी शैलपुत्री माता की। शक्ति के नौ स्वरूपों में से पहला स्वरूप है मां शैलपुत्री का। स्वास्थ्य एवं आरोग्य की देवी हैं मां शैलपुत्री और माता के आशीर्वाद से जातक को मिलता है चिरायु होने का वरदान। भगवती दुर्गा का प्रथम स्वरूप भगवती शैलपुत्रीके रूप में है। हिमालय के यहां जन्म लेने से भगवती को शैलपुत्री कहा गया। भगवती का वाहन वृषभ है, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बायें हाथ में कमल का पुष्प है। इस स्वरूप का पूजन नवरात्र के पहले दिन किया जाता है। शैलपुत्री के पूजन से मूलाधार चक्र जाग्रत होता है। स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं। सब प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है और सदा निरोग रहने का अलौकिक आशीर्वाद मिलता है।

कैसे करें पूजा —–

मेष – पूजन का विशेष समय प्रातः 7 बजे से प्रातः 9 बजे तक
-पूर्व की ओर मुख कर शैलपुत्री देवी का पूजन करेंपीले रंग के वस्त्र धारण करें
ऊँ शं शैलपुत्रये फट् मंत्र की 11 माला का जाप करें

वृषभ – साधना का विशेष समय प्रातः 5 बजे से प्रातः 7 बजे तक
-पश्चिम दिशा की ओर मुख कर बैठें
-सफेद रंग के वस्त्र धारण कर पूजन करें
-ऊँ शं शैलपुत्रयै फट् व ऊँ ह्रीं बग्लामुखी नमः मंत्र का जाप करें

मिथुन – पूजन का विशेष समय प्रातः 9 बजे से 12 बजे तक
-पूर्व दिशा की ओर मुख कर बैठें
-हरे रंग के वस्त्र धारण कर पूजन करें
-ऊँ शं शैलपुत्रयै फट् मंत्र की 11 माला का जाप करें व 11 बार हनुमान चालीसा का पाठ करें

कर्क – साधना का विशेष समय दोपहर 2 बजे से दोपहर 4 बजे तक
-दक्षिण की ओर मुख कर शैलपुत्री देवी का पूजन करें
-पीले रंग के वस्त्र धारण करें
-ऊँ शं शैलपुत्रये फट् मंत्र की 3 माला का जाप करें व 11 बार दुर्गा चालीसा का पाठ करें

कर्क – साधना का विशेष समय दोपहर 2 बजे से दोपहर 4 बजे तक
-दक्षिण की ओर मुख कर शैलपुत्री देवी का पूजन करें
-पीले रंग के वस्त्र धारण करें
-ऊँ शं शैलपुत्रये फट् मंत्र की 3 माला का जाप करें व 11 बार दुर्गा चालीसा का पाठ करें

सिंह – साधना का विशेष समय प्रातः 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक
-ईशान कोण(पूर्व-उत्तर) की ओर मुख कर बैठें
-लाल रंग के वस्त्र धारण कर पूजन करें
-ऊँ शं शैलपुत्रयै फट् मंत्र की 5 माला का जाप करें

कन्या – साधना का विशेष समय रात्रि 10 बजे से रात्रि 12 बजे तक
-आग्नेय कोण(पूर्व-दक्षिण) की ओर मुख कर बैठें
-लाल रंग के वस्त्र धारण करें
-ऊँ शं शैलपुत्रयै फट् मंत्र की 11 माला का जाप करें, 5 बार भैरव चालीसा का पाठ करें

तुला – पूजन का विशेष समय प्रातः 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक
-पूर्व दिशा की ओर मुख कर बैठें
-पीले व सफेद रंग के वस्त्र धारण कर पूजन करें
-ऊँ शं शैलपुत्रयै फट् मंत्र की 11 माला का जाप करें

वृश्चिक – पूजन का विशेष समय दोपहर 3 बजे से सायं 6 बजे तक
-उत्तर दिशा की ओर मुख कर बैठें
-गुलाबी रंग के वस्त्र धारण कर पूजन करें
-ऊँ शं शैलपुत्रयै फट् मंत्र की 7 माला का जाप करें, ऊँ श्री गणेशाय नमः मंत्र की 5 माला का जाप करें

धनु – पूजन का विशेष समय प्रातः 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक
-पूर्व की ओर मुख कर बैठें
-लाल रंग के वस्त्र धारण कर पूजन करें
-ऊं शं शैलपुत्रयै फट् व ऊं क्लीं कालिका भ्यां नमः मंत्र का जाप करें

मकर – पूजन का विशेष समय रात्रि 1 बजे से रात्रि 3 बजे तक
-पश्चिम दिशा की ओर मुख कर बैठें
-लाल रंग के वस्त्र धारण कर पूजन करें
-ऊँ शं शैलपुत्रयै फट् मंत्र की 5 माला का जाप करें, 13 बार भैरव चालीसा का पाठ करें

कुंभ – पूजन का विशेष समय रात्रि 12 बजे से रात्रि 3 बजे तक
-दक्षिण दिशा की ओर मुख कर बैठें
-नीले रंग के वस्त्र धारण कर पूजन करें
-ऊँ शं शैलपुत्रयै फट् व ऊँ पदमावत्यै नमः मंत्र की 11 माला का जाप करें

मीन – पूजन का विशेष समय सायं 7 बजे से प्रातः 9 बजे तक
-पूर्व दिशा की ओर मुख कर बैठें
-पीले व सफेद रंग के वस्त्र धारण कर पूजन करें
-ऊँ शं शैलपुत्रयै फट् व ऊँ दुं दुर्गाय नमः मंत्र का जाप करें

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

राहु का चमत्कार—-

राहु का चमत्कार—-
भारत ही वह देश है जहाँ सर्प को देखकर हाथ जो़डे जाते हैं। देवता के रूप में उसकी प्रतिष्ठा की जाती है, जिसका प्रमाण नागपंचमी का पर्व है। नींव पूजन के समय चाँदी का नाग-नागिन का जो़डा स्थापित कर घर के स्थायित्व की कामना की जाती है। इस विश्वास का आधार यह माना जाता है कि यह पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है, वही शेषनाग जिनकी शय्या पर पालनकर्ता विष्णु विराजमान हैं। ज्योतिष में राहु सर्प के प्रतीक हैं। वस्तुत: राहु में देवत्व के गुण भी विद्यमान हैं। राहु सिंहिका राक्षसी के पुत्र हैं तथा इनके पिता विप्रचिति सदैव आसुरी संस्कारों से दूर रहे, साथ ही समुद्र मंथन के समय अमृतपान करने के कारण इन्हें अमरत्व एवं देवत्व की प्राप्ति हुई, तभी से शंकर भक्त राहु अन्य ग्रहों के साथ ब्रम्हा जी की सभा में विराजमान रहते हैं इसीलिए इन्हें ग्रह के रूप में मान्यता मिली है। संकुचित विचारधारा के कारण राहु को संकट का पर्याय मान लिया गया परन्तु राहु उच्चा पद, राज, सत्ता और गुप्त ज्ञान की राह भी खोलते हैं।
जन्मपत्रिका में राहु के रहस्य को समझकर उच्चाकोटि की भविष्यवाणी की जा सकती है। सर्प का जो संबंध भूमि से है उस संबंध को जन्मपत्रिका में राहु से समझा जा सकता है। जब जन्मपत्रिका में राहु का संबंध भूमि के कारक मंगल से होता है तो यह वास्तु संबंधी दोष का संकेत देता है। इसी प्रकार चौथा भाव जन्म स्थान, भूमि, भवन का कारक भाव है, यहाँ राहु की उपस्थिति यह संकेत देती है कि भूमि-भवन में कोई वास्तु दोष होगा या जन्म स्थान जल्दी छूट जाएगा। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इन्हीं राहुदेव की दशा-अंतर्दशा में ही वास्तु दोष दूर होने का साधन भी बनता है।
मंगल-राहु की यह युति यदि शुभ हो तो यह व्यक्ति को उच्चाकोटि का वास्तुशास्त्री भी बनाती है। गृह निर्माण के प्रथम चरण नींव पूजन में जहाँ राहु के प्रतीक सर्प की प्रतिष्ठा होती है, वहीं नींव स्थापना का स्थान भी राहु की स्थिति के आधार पर ही निर्धारित किया जाता है। नींव सदैव राहु पृष्ठ में ही रखे जाने का विधान है। जन्मपत्रिका में राहु की स्थिति जहाँ कुछ बाधाओं, पूर्वजन्म के कर्मो का संकेत देती है वहीं कुछ भावों में उत्तर कालामृत नामक ग्रंथ में कवि कालिदास ने छत्र और चँवर को राहु से विचार करने योग्य कहा है।
लघुपाराशरी में केन्द्र-त्रिकोण के स्वामियों के साथ राहु की युति को अत्यंत उच्चाकोटि का राजयोग माना गया है। जन्मपत्रिका का पंचम भाव जहाँ पूर्वजन्म के कर्मो का फल है वहीं संतान सुख का भी है। पंचम भाव में राहु हों या पंचम भाव के स्वामी के साथ राहु हों तो यह संतान प्राप्ति में आने वाली बाधा का संकेत है। यदि इन स्थितियों में मंगल भी प्रभावित करें तो स्थिति और भी विकट हो जाती है, जिसे शास्त्रों में सर्प दोष कहा गया है।
सर्प प्रतिष्ठा और सर्प की पूजा ही इस दोष को शांत करने में सहायक होती है। पंचम भाव में स्थित राहु जहाँ एक ओर संतान की हानि देते हैं, वहीं कूटनीतिज्ञ बुद्धि भी देते हैं,यह स्थिति व्यक्ति को गूढ़ दृष्टि भी देती है। साथ ही यह एक राजयोगकारक स्थिति है अर्थात् राहुदेव का हिसाब एकदम साफ है, एक हाथ से लिया तो दूसरे हाथ से दो गुना दे दिया। यह आश्चर्यजनक और सुखद तथ्य है कि शुक्र के समान राहु भी विवाह के कारक है। सप्तम भाव या सप्तम भाव के स्वामी के साथ राहु का संबंध हो तो राहु की दशा-अंतर्दशा विवाहकारक सिद्ध होती है।
दोनों प्रकाशक ग्रहों सूर्य और चंद्रमा को कांतिहीन करने की क्षमता राहुदेव में हैं। चंद्रमा मन के कारक हैं। चंद्रमा के साथ युति करके राहु विचारों और भावनाओं में उथल-पुथल मचा देते हैं। ऎसी स्थिति में राहु की दशा मानसिक तनाव लेकर आती है। संभवत: भगवान शिव का हलाहल पान और राहु का गहरा संबंध है। राहु के कारकत्व में दुर्गा पूजा का भी उल्लेख है, अर्थात् शक्ति की पूजा राहु से प्रेरित है। माँ सरस्वती को राहु की अभीष्ट देवी माना गया है। अर्थात् ज्ञान और बुद्धि की देवी का आशीर्वाद भी राहुदेव को प्राप्त है। ज्ञान, भक्ति और शक्ति का अद्भुत संगम हैं राहुदेव।
राहुदेव की आराधना निम्न श्लोक से की जानी चाहिए-
अर्धकायं महावीर्य चन्द्रादित्यविमर्दनम्।
सिंहिकागर्भ सम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ||

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

वास्तुदोष और उसके परिणाम————-

वास्तुदोष और उसके परिणाम————-

दक्षिण नैॠत्य द्वार – घर की स्त्री को हानि
उत्तर- ईशान का द्वार – पूर्ण सुख व उन्नति का आधार
पश्चिम का द्वार – सुख व कुशलता का द्वार
पूर्व का द्वार -शुभता की मुख्य भेंट
उत्तर में द्वार बनायो – सुख को भी मार्ग दिखाओ
पूर्व की ऊँची दीवार – स्वास्थ्य सदा रहे खराब
पश्चिम में टेडी दीवार – अनिष्ट की लगे कतार
ईशान कमरे का पूर्वद्वार – सुख सम्पति अपार
ईशान कमरे का उत्तर द्वार – बरसे धन बारम्बार अपार
पूर्व पश्चिम सीढ़ी हो – जग में राजा समान जियो
पूर्व को अलमारी होना – अपनी सारी सम्पति खोना.
दक्षिण में रखी अलमारी – दौलत आने की बारी
पश्चिम में हो जब आँगन – पूर्व में भी अवश्य हो आँगन
दक्षिण की ऊँची दीवार – घर में सुख रहे अपार
पश्चिम का नाला – सुख सम्पति हरने वाला
पूर्व का स्नानघर – सुख सम्पति भरे अपार
बच्चे जब उत्तर में सोयें -आशाओं के दीप जलाएं
दम्पति ईशान में सोयें -विकलांग बच्चा अवश्य पायें
उत्तर सर कर नहीं सोना -स्वास्थ्य नहीं है खोना
सेप्टिक टैंक दक्षिण में -जीवन हो संकट में
घर के ईशान में अलमारी -दरिद्र से भर लो घर भारी
दक्षिण का उच्च चबूतरा -दौलत से आये हजारों जेवर
पूर्व का उच्च चबूतरा -पुरुष हमेशा खाए फटकार
मुख्यद्वार पर माँ दुर्गा विराजे -घर को उपरी हवा सदा त्यागे
दम्पति ईशान में सोना – विकलांग संतान होना
उत्तर सर करके नही सोना – स्वास्थ्य नहीं है खोना .
पश्चिम में सेप्टिंक टैंक होना-घर में रोगों का होना
पश्चिम में तुलसी लगाओ -महिला का स्वास्थ्य बनाओ
बाथरूम में खुला नमक रखो -बीमारी को दूर भगाओ
सीडी मुड़े बाएँ से दायें -भाग्य भी चढ़े आसानी से
मुख्य द्वार के सामने हो कोई कोना -घर में सुख न होना…………

लोक आस्था की देवी त्रिपुर सुन्दरी—-

भारतवर्ष में शक्ति उपासना का इतिहास अत्यन्त प्राचीन एवं व्यापक है। अनादिकाल से जगन्माता की उपासना प्रचलित है। कहा गया है- शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं न चे देवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि। अतस्त्वामाराध्यां हरि हर विरिन्च्यादिभिरप प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृत पुण्यः प्रभवति ॥ अर्थात स्वयं शिव भी तभी कुछ करने में समर्थ होते हैं जब शक्ति से युक्त होते हैं। इसके बिना तो किंचित मात्र हिलने में भी वे असमर्थ हैं। शक्ति साधना के महत्व से हर कोई अच्छी तरह परिचित है। देश के कोने-कोने में शक्तिपूजा अपने भिन्न-भिन्न स्वरूपों में विद्यमान है। नवरात्रि पर्व के दौरान इसका दिग्दर्शन सर्वत्र सहज ही किया जा सकता है। ख़ासकर शक्तिपीठों एवं सिद्ध-जागृत स्थलों में देवी पूजा की विभिन्न परंपराएँ आज भी अक्षुण्ण बनी हुई शाक्त उपासना का कीर्तिगान कर रही हैं। राजस्थान का दक्षिणाँचल वाग्वर प्रदेश भी देश के उन गिने-चुने स्थलों में है जहाँ शक्ति पूजा का पुरातन स्वरूप अपनी सम्पूर्ण मौलिकता के साथ बरकरार है। त्रिपुर सुन्दरी मन्दिर की स्थापना के बारे में अधिकृत जानकारी कहीं नहीं मिलती, तथापि सत्य है कि यह अत्यधिक पुराना धाम रहा है। ऎसा माना जाता है कि इसका निर्माण सम्राट कनिष्क से पूर्व हुआ है। उस जमाने के श्विलिंग इस मन्दिर के आस-पास पाए गए हैं जिनसे इसकी प्राचीनता का बोध होता है। कुछ विद्वान इसका निर्माण तीसरी शताब्दी से पूर्व होना बताते हैं। यह देश के प्रमुख श्रद्धा केन्द्रों में अपनी पहचान बना चुका है। माना जाता है कि जिस स्थान पर आज यह मन्दिर अवस्थित है वहाँ किसी समय दुर्गापुर नामक नगर बसा हुआ था। यहाँ प्राप्त शिलालेख में ‘त्रिउरारी’ अर्थात ‘त्रिपुरारी’ शब्द का उल्लेख मिलता है। इसी क्षेत्र में शिवपुरी, शक्तिपुरी एवं विष्णुपुरी नामक तीन दुर्ग थे। अतीत में इस मन्दिर को विशेष महत्व प्राप्त था । मन्दिर के पृष्ठ भाग में युगल देवताओं ब्रह्मा-विष्णु-महेश, दक्षिण में काली तथा उत्तर में आठ भुजाओं वाली महा सरस्वती के मन्दिर थे। इसका प्रमाण दुर्गा सप्तशती के वैकृतिक रहस्य में देखने को मिलता है। विशालकाय एवं ऎतिहासिक मन्दिर के गर्भ गृह में अष्टादश भुजाओं वाली देवी की मनोहारी भव्य मूर्ति है जिसे भक्तजन तरतई माता, त्रिपुर सुन्दरी, दुर्गा, महालक्ष्मी आदि नामों से संबोधित कर अगाध आस्था व्यक्त करते हैं। सिंहारूढ़ देवी की अठारह भुजाओं में विविध आयुध सुशोभित हैं। श्यामवर्ण की भव्य कांतियुक्त तेजोपुञ्ज मूर्ति के दर्शनमात्र से हर कोई दर्शनार्थी आत्मविभोर हो सहज ही आकर्षण के पाश में बंध कर चैतन्य तत्व का आभास पाता है। बरबस यह स्वर फूट पड़ते हैं –विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषण कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम् !हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनी विभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे ॥ मूर्ति के प्रभामण्डल में छोटी-छोटी किन्तु सुन्दर मूर्तियाँ हैं जो शिल्प कला की दृष्टि से भी अन्यतम हैं। देवी की मूर्ति के अधोभाग में काले-चमकीले संगमरमर पर ‘श्री यंत्र’ अंकित है जिसका तंत्र शास्त्रीय दृष्टि से विशेष महत्व है। यहाँ के परमार शासकों के समय देवी की पूजा-अर्चना की विशेष व्यवस्था थी।कई राजा-महाराजाओं ने यहाँ शक्ति साधना के विशेष अनुष्ठान, शाक्त कराए और देवी की कृपा प्राप्त की। भारतवर्ष के विभिन्न हिस्सों से राजा-महाराजा अपनी ख़ास मनौतियों के लिए त्रिपुर सुन्दरी की शरण में आते रहे हैं। यही नहीं तो अनेक तपस्वियों एवं शाक्त साधकों की यह सिद्ध स्थली रहा है, जहाँ रह कर इन्होंने दैवी से साक्षात्कार किया। यही कारण है कि शक्तिपीठों व उप पीठों के संबंध में पुराणों में वर्णित अधिकृत सूची में स्थान न होते हुए भी त्रिपुरा सुन्दरी तीर्थ शक्तिपीठ के बराबर का दर्जा रखता है। देवी के चमत्कारों की अनेकों गाथाएँ बहुश्रुत हैं। इनमें कई घटनाओं का संबंध महाराज विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह, मालवा के नरेश जगदेव परमार आदि से जोड़ा जाता है। हालांकि इस मन्दिर को त्रिपुर सुन्दरी का मन्दिर कहा जाता है लेकिन तथ्य यह है कि यह अष्टादशभुजा महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी का मन्दिर है और निज मन्दिर में प्रतिष्ठित मूर्ति का स्वरूप भी वही है, जिसके बारे में दुर्गा सप्तशती में कहा गया है – अष्टादशभुजा चैषा पूज्या महिषमर्दिनी। महालक्ष्मीर्महाकाली सैव प्रोक्ता सरस्वती ईश्वरी पुण्यपापानां सर्वलोकमहेश्वरी महिषान्तकरी येन पूजिता स जगत्प्रभुः पूजयेज्जगतां धात्रीं चण्डिकां भक्तवत्सलाम् त्रिपुर सुन्दरी के वास्तविक स्वरूप के बारे में श्रीविद्या ग्रंथों में इस तरह बताया गया है – महाकामेशमहिषी पन्चप्रेतासनस्थिता सेयं विराजते देवी महात्रिपुरसुन्दरी । लौहित्यनिर्जित जपाकुसुमानुरागां पाशांकुशौ धनुरिषूनपिधारयन्तीम्। तामे्रक्षणामरुणमाल्य विशेषभूषां ताम्बूलपूरितमुखीं त्रिपुरां नमामि॥ अर्थात त्रिपुर सुन्दरी देवी लाल रंग, जपा कुसुम के अनुरूप, पाश, अंकुश, धनुष, बाण धारण किए हैं। यह देवी मन्दिर श्रद्धा के साथ-साथ पर्यटन की दृष्टि से भी ख्याति पर है। मन्दिर को पूरी तरह आधुनिक स्वरूप दिया गया है। मन्दिर में विश्राम बरामदों के अलावा बड़ी धर्मशाला भी है जहाँ हर तरह की आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। रोजाना यहाँ दर्शनार्थियों का जमघट लगा रहता है किन्तु अष्टमी, रविवार, नवरात्रि तथा दीपावली के दिनों और ख़ास पर्वं-त्योहारों पर मेले जैसा दृश्य बना रहता है। देश के विभिन्न हिस्सों से यहाँ श्रद्धालु आते हैं। बांसवाड़ा आने वाले सैलानी और विशिष्टजनों में शायद ही कोई ऎसा होता है जो यहाँ आकर भी मैया के दरबार में न पहुँचे। वागड़ अंचल सहित देश के विभिन्न हिस्सों से यहाँ आने वाले श्रद्धालु भक्तजन देवी के दर्शन पाकर धन्य हो उठते हैं। अनुष्ठानों का क्रम यहाँ सदैव बना रहता है। वर्ष में कई बार मन्दिर परिसर में विशिष्ट मनोकामना के लिए विशेष तांत्रिक अनुष्ठान होते हैं। रोजाना देवी की मूर्ति का अलग-अलग मनोहारी श्रृंगार होता है। विशेष अवसरों पर रजत एवं स्वर्णाभूषणों से श्रृंगार और गरबा नृत्योत्सव होता है। वनाँचल के आदिवासियों में भी देवी के प्रति अगाध आस्था के भाव हैं और ये लोग ‘तरतई माता’ कहकर देवी माँ को पूजते रहे हैं। वागड़ में त्रिपुर सुन्दरी के प्रति इस कदर आत्मीयता है कि लोग अपनी संरक्षक के रूप में माँ के आशीर्वाद का सदैव अनुभव करते हैं और जब भी कभी विपत्ति आती है या मनोकामना होती है, माँ के सम्मुख निवेदित कर देते हैं। जन विश्वास है कि देवी हर किसी भक्त की कामना पूरी करती है और कष्टों से उबारती है। माँ त्रिपुरा अपने दरबार में आए हर किसी भक्तजन के जीवन में आशा की नई किरण भर देती हैं। माँ के दरबार से कोई निराश नहीं लौटता। शास्त्र में कहा है – यत्रास्ति भोगो न च तत्र मोक्षो यत्रास्ति मोक्षो न च तत्र भोगो देवी पादयुगार्चकानां भोगश्च मोक्षश्च करस्थ ऎवः ।

किराये के घर में कैसे करें वास्तु दोष दूर …———–

घर में वास्तु दोष होने पर परिवार के सदस्यों को आर्थिक,शारीरिक और मानसिक परेशानियाँ उठानीपड़ती हैं|इन सभी परेशानियों से बचने के लिए जरूरी है की हमारे घर के सभी वास्तुदोष दूर कियेजायें या उन्हें सुधारा जाये|यदि आप किराये के मकान में रहते हैं और वहां कोई वास्तु दोष है तो आपघर में बिना कोई तोड़ फोड़ किये उन दोषों को दूर कर सकते हैं|कुछ बातों का ध्यान रखा जाये तोकिराये के घर में भी वास्तु दोष से छुटकारा पाया जा सकता है|जैसे—–
भवन का उत्तर-पूर्व का भाग अधिक खाली रखें|
दक्षिण-पश्चिम दिशा के भाग में अधिक भार या समान रखें|
पानी की सप्लाई उत्तर-पूर्व से लें|
शयनकक्ष में पलंग का सिरहाना दक्षिण दिशा में रखें और सोते समय सिर दक्षिण दिशा में वे पैर उत्तर दिशा में रखें|यदि ऐसा न हो तो पश्चिम दिशा में सिरहाना व सिर कर सकते हैं|
भोजन दक्षिण-पूर्व की और मुख करके ग्रहण करें|
पूजास्थल उत्तर-पूर्व दिशा में स्थापित करें यदि अन्यदिशा में हो तो पानी ग्रहण करते समय मुख ईशान(उत्तर-पूर्व)कोण की और रखें|
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इन वास्तु उपायों से भरेगा आपका घर……..

अगर आपपैसों की कमीसे जूझ रहेहैं|घर मेंआमदनी सेअधिक खर्चआपके लिएअक्सरमानसिकतनाव काकारण बनजाता है तोनीचे लिखे वास्तुप्र्योग अपना कर आप माँ लक्ष्मी की प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं—–
साल में एक दो-बार हवन करें|
घर में अधिक कबाड़ इकठ्ठा न करें|
शाम के समय एक बार पूरे घर की लाइट जरूर जलाएं|इस समय घर में लक्ष्मी का प्रवेश होता है|
सुबह-शाम सामूहिक आरती करें|
महीने में एक या दो बार उपवास करें|
घर में हमेशा चन्दन और कपूर की खुशबु का प्रयोग करें|
जो व्यक्ति श्रेष्ट धन की इच्छा रखते हैं व रात्रि में सताईस हकिक पत्थर लेकर उसके ऊपर लक्ष्मी का चित्र स्थापित करें,तो निश्चय ही उसके घर में अधिक उन्नति होती है|
यदि ग्यारह हकिक पथेर लेकर किसी मंदिर में चदा दें|कहें की अमुक कार्य में विजय होना चाहता हूँ तो निश्चय ही उस कार्य में विजय प्राप्त होती है|
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29 मार्च, 2011: मंगलवार, जब तक 8:22 Dasami कृष्णा,
* 02:46 Sravanam तक, 6:11 * तक सिद्ध योग,
जब तक 8:22 करण Vishti, जब तक 21:19 करण बावा,
RahuK: 13:49 GulikaK: YamaG, 12:19: 15:19-16:49 – 9:19-10:49,
18:33 पर सूर्योदय पर 6:18 सूर्यास्त, *,
* 03:49 Moonrise पर, 14:10 पर Moonset,) दिन में चंद्रमा मकर (पूरी)
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March 29, 2011: Tuesday, Krishna Dasami till 8:22,
Sravanam till 2:46*, Siddha yoga till 6:11*,
Vishti karana till 8:22, Bava karana till 21:19,
RahuK: 15:19 – 16:49, GulikaK: 12:19 – 13:49, YamaG: 9:19 – 10:49,
Sunrise at 6:18*, Sunset at 18:33,
Moonrise at 3:49*, Moonset at 14:10, Moon in Makar (whole day)
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29 मार्च, 2011—दैनिक राशिफल—-

राशि फलादेश– मेष
वाणी प्रभावी साबित होगी। लोगों से अपनी बात मनवा सकेंगे। व्यापार में नए कार्यों की शुरुआत होगी। अच्छे व्यक्तियों के साथ अच्छे संबंध रहेंगे।
राशि फलादेश— वृष
यात्रा सफलतादायक रह सकती है। आपकी ख्याति और प्रतिष्ठा-सम्मान बढ़ेगा। अपनी वाणी पर संयम रखें। सुख-समृद्धि बढ़ेगी।

राशि फलादेश— मिथुन
आमदनी में इजाफा होगा। रुके कार्य पूर्ण होने की संभावना। जल्दबाजी में कोई निर्णय न लें। आपकी बुद्धिमानी की अधिकारी प्रशंसा करेंगे। अपने कार्य के प्रति लगन रहेगी।

राशि फलादेश— कर्क
घर में किसी से विवाद हो सकता है। पारिवारिक उन्नति होगी। प्रिय व्यक्तियों से मिलाप के योग। कामकाज अच्छा चलेगा। आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी।

राशि फलादेश– सिंह
नई योजनाएँ क्रियान्वित नहीं हो पाएँगी। परिश्रम अधिक करना पड़ेगा। व्यापार-व्यवसाय मध्यम रहेगा। खर्चों में वृद्धि से चिंता होगी।

राशि फलादेश– कन्या
व्यर्थ के दिखावे के चक्कर में न पड़े। संतान की स्वास्थ्य का ध्यान रखें। परिवार से सहयोग मिलेगा। विद्यार्थी वर्ग पढ़ाई पर ध्यान दें।

राशि फलादेश– तुला
आपके तिष्ठा में कमी आएगी। कामों को समय पर करें। व्यापार में नए अनुबंध न करें। किसी सदस्य के स्वास्थ्य की चिंता रहेगी।

राशि फलादेश– वृश्चिक
किसी की आलोचना न करें। सुखद यात्रा के योग बनेंगे। स्वयं के द्वारा लिए निर्णय लाभप्रद होंगे। दांपत्य सुख रहेगा। बड़े लोगों से मेल-जोल बढ़ेगा।

राशि फलादेश– धनु
कठिन कामों में सोच कर ही हाथ डालें। विचारों में सकारात्मकता रखें। अच्छे लोगों से भेंट होगी, जो आपके हितचिंतक रहेंगे। रुका धन मिलेगा। क्रोध पर संयम रखें।

राशि फलादेश– मकर
सामाजिक सम्मान मिलेगा। कशमकश दूर होगी। व्यावसायिक क्षेत्र में आशानुकूल सफलता के योग बनेंगे। घर में आनंददायक माहौल रहेगा।

राशि फलादेश– कुंभ
नौकरी में कार्य की प्रशंसा होगी। आर्थिक स्थिति अच्छी रहेगी। आलस्य का त्याग करना चाहिए। प्रयास-परिश्रम करें। कार्य में सफलता मिलने के योग हैं।

राशि फलादेश– मीन
व्यर्थ संदेह नहीं करें। अर्थ संबंधी कार्य बनेंगे। नई सफलता मिलने से हर्ष होगा। सुखद भविष्य का स्वप्न साकार होगा। कार्य की गति बढ़ेगी।

Posted by: vastushastri08 | जून 5, 2011

निवेदन है………

निवेदन है……….
गर्मी आ गयी है, गर्मी के कारण पंछी प्यास के मारे मर जाते है, आप अपने घर की छत या दीवार पर एक पानी का बर्तन जरूर रखिये………ताकि कोई पंछी कम से कम प्यास के कारण न मरे………………….

मंगल उष्ण प्रकृति का ग्रह है.इसे पाप ग्रह माना जाता है.????—-Astro Vastu–

विवाह और वैवाहिक जीवन में मंगल का अशुभ प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है…?????

मंगल दोष जिसे मंगली के नाम से जाना जाता है इसके कारण कई स्त्री और पुरूष आजीवन अविवाहित ही रह जाते हैं.इस दोष को गहराई से समझना आवश्यक है ताकि इसका भय दूर हो सके.

मंगली दोष का ज्योतिषीय आधार ——
वैदिक ज्योतिष में मंगल को लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में दोष पूर्ण माना जाता है.इन भावो में उपस्थित मंगल वैवाहिक जीवन के लिए अनिष्टकारक कहा गया है.जन्म कुण्डली में इन पांचों भावों में मंगल के साथ जितने क्रूर ग्रह बैठे हों मंगल उतना ही दोषपूर्ण होता है जैसे दो क्रूर होने पर दोगुना, चार हों तो चार चार गुणा.मंगल का पाप प्रभाव अलग अलग तरीके से पांचों भाव में दृष्टिगत होता है जैसे:

लग्न भाव में मंगल ——
लग्न भाव से व्यक्ति का शरीर, स्वास्थ्य, व्यक्तित्व का विचार किया जाता है.लग्न भाव में मंगल होने से व्यक्ति उग्र एवं क्रोधी होता है.यह मंगल हठी और आक्रमक भी बनाता है.इस भाव में उपस्थित मंगल की चतुर्थ दृष्टि सुख सुख स्थान पर होने से गृहस्थ सुख में कमी आती है.सप्तम दृष्टि जीवन साथी के स्थान पर होने से पति पत्नी में विरोधाभास एवं दूरी बनी रहती है.अष्टम भाव पर मंगल की पूर्ण दृष्टि जीवनसाथी के लिए संकट कारक होता है.

द्वितीय भाव में मंगल —-
भवदीपिका नामक ग्रंथ में द्वितीय भावस्थ मंगल को भी मंगली दोष से पीड़ित बताया गया है.यह भाव कुटुम्ब और धन का स्थान होता है.यह मंगल परिवार और सगे सम्बन्धियों से विरोध पैदा करता है.परिवार में तनाव के कारण पति पत्नी में दूरियां लाता है.इस भाव का मंगल पंचम भाव, अष्टम भाव एवं नवम भाव को देखता है.मंगल की इन भावों में दृष्टि से संतान पक्ष पर विपरीत प्रभाव होता है.भाग्य का फल मंदा होता है.

चतुर्थ भाव में मंगल —–
चतुर्थ स्थान में बैठा मंगल सप्तम, दशम एवं एकादश भाव को देखता है.यह मंगल स्थायी सम्पत्ति देता है परंतु गृहस्थ जीवन को कष्टमय बना देता है.मंगल की दृष्टि जीवनसाथी के गृह में होने से वैचारिक मतभेद बना रहता है.मतभेद एवं आपसी प्रेम का अभाव होने के कारण जीवनसाथी के सुख में कमी लाता है.मंगली दोष के कारण पति पत्नी के बीच दूरियां बढ़ जाती है और दोष निवारण नहीं होने पर अलगाव भी हो सकता है.यह मंगल जीवनसाथी को संकट में नहीं डालता है.

सप्तम भाव में मंगल —–
सप्तम भाव जीवनसाथी का घर होता है.इस भाव में बैठा मंगल वैवाहिक जीवन के लिए सर्वाधिक दोषपूर्ण माना जाता है.इस भाव में मंगली दोष होने से जीवनसाथी के स्वास्थ्य में उतार चढ़ाव बना रहता है.जीवनसाथी उग्र एवं क्रोधी स्वभाव का होता है.यह मंगल लग्न स्थान, धन स्थान एवं कर्म स्थान पर पूर्ण दृष्टि डालता है.मंगल की दृष्टि के कारण आर्थिक संकट, व्यवसाय एवं रोजगार में हानि एवं दुर्घटना की संभावना बनती है.यह मंगल चारित्रिक दोष उत्पन्न करता है एवं विवाहेत्तर सम्बन्ध भी बनाता है.संतान के संदर्भ में भी यह कष्टकारी होता है.मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण पति पत्नी में दूरियां बढ़ती है जिसके कारण रिश्ते बिखरने लगते हैं.जन्मांग में अगर मंगल इस भाव में मंगली दोष से पीड़ित है तो इसका उपचार कर लेना चाहिए.

अष्टम भाव में मंगल —-
अष्टम स्थान दुख, कष्ट, संकट एवं आयु का घर होता है.इस भाव में मंगल वैवाहिक जीवन के सुख को निगल लेता है.अष्टमस्थ मंगल मानसिक पीड़ा एवं कष्ट प्रदान करने वाला होता है.जीवनसाथी के सुख में बाधक होता है.धन भाव में इसकी दृष्टि होने से धन की हानि और आर्थिक कष्ट होता है.रोग के कारण दाम्पत्य सुख का अभाव होता है.ज्योतिष विधान के अनुसार इस भाव में बैठा अमंलकारी मंगल शुभ ग्रहों को भी शुभत्व देने से रोकता है.इस भाव में मंगल अगर वृष, कन्या अथवा मकर राशि का होता है तो इसकी अशुभता में कुछ कमी आती है.मकर राशि का मंगल होने से यह संतान सम्बन्धी कष्ट देता है।

द्वादश भाव में मंगल ——-
कुण्डली का द्वादश भाव शैय्या सुख, भोग, निद्रा, यात्रा और व्यय का स्थान होता है.इस भाव में मंगल की उपस्थिति से मंगली दोष लगता है.इस दोष के कारण पति पत्नी के सम्बन्ध में प्रेम व सामंजस्य का अभाव होता है.धन की कमी के कारण पारिवारिक जीवन में परेशानियां आती हैं.व्यक्ति में काम की भावना प्रबल रहती है.अगर ग्रहों का शुभ प्रभाव नहीं हो तो व्यक्ति में चारित्रिक दोष भी हो सकता है..भावावेश में आकर जीवनसाथी को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं.इनमें गुप्त रोग व रक्त सम्बन्धी दोष की भी संभावना रहती है.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

बृहस्पति और शुक्र….Astro Vastu

बृहस्पति और शुक्र दो ग्रह हैं जो पुरूष और स्त्री का प्रतिनिधित्व करते हैं.मुख्य रूप ये दो ग्रह वैवाहिक जीवन में सुख दु:ख, संयोग और वियोग का फल देते हैं.
बृहस्पति और शुक्र दोनों ही शुभ ग्रह हैं .सप्तम भाव जीवन साथी का घर होता है .इस घर में इन दोनों ग्रहों की स्थिति एवं प्रभाव के अनुसार विवाह एवं दाम्पत्य सुख का सुखद अथवा दुखद फल मिलता है.पुरूष की कुण्डली में शुक्र ग्रह पत्नी एवं वैवाहिक सुख का कारक होता है और स्त्री की कुण्डली में बृहस्पति.ये दोनों ग्रह स्त्री एवं पुरूष की कुण्डली में जहां स्थित होते हैं और जिन स्थानों को देखते हैं उनके अनुसार जीवनसाथी मिलता है और वैवाहिक सुख प्राप्त होता है.

ज्योतिषशास्त्र का नियम है कि बृहस्पति जिस भाव में होता हैं उस भाव के फल को दूषित करता है (Jupiter has bad effect on the house it is in) और जिस भाव पर इनकी दृष्टि होती है उस भाव से सम्बन्धित शुभ फल प्रदान करते हैं.जिस स्त्री अथवा पुरूष की कुण्डली में गुरू सप्तम भाव में विराजमान होता हैं उनका विवाह या तो विलम्ब से होता है अथवा दाम्पत्य जीवन के सुख में कमी आती है.पति पत्नी में अनबन और क्लेश के कारण गृहस्थी में उथल पुथल मची रहती है.

दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने में बृहस्पति और शुक्र का सप्तम भाव और सप्तमेश से सम्बन्ध महत्वपूर्ण होता है.जिस पुरूष की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश और विवाह कारक ग्रह शुक बृहस्पति से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर गुणों वाली अच्छी जीवनसंगिनी मिलती है.इसी प्रकार जिस स्त्री की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश और विवाह कारक ग्रह बृहस्पति शुक्र से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर और अच्छे संस्कारों वाला पति मिलता है.

शुक्र भी बृहस्पति के समान सप्तम भाव में सफल वैवाहिक जीवन के लिए शुभ नहीं माना जाता है.सप्तम भाव का शुक्र व्यक्ति को अधिक कामुक बनाता है जिससे विवाहेत्तर सम्बन्ध की संभावना प्रबल रहती है.विवाहेत्तर सम्बन्ध के कारण वैवाहिक जीवन में क्लेश के कारण गृहस्थ जीवन का सुख नष्ट होता है.बृहस्पति और शुक्र जब सप्तम भाव को देखते हैं अथवा सप्तमेश पर दृष्टि डालते हैं तो इस स्थिति में वैवाहिक जीवन सफल और सुखद होता है.लग्न में बृहस्पति अगर पापकर्तरी योग से पीड़ित होता है तो सप्तम भाव पर इसकी दृष्टि का शुभ प्रभाव नहीं होता है ऐसे में सप्तमेश कमज़ोर हो या शुक्र के साथ हो तो दाम्पत्य जीवन सुखद और सफल रहने की संभावना कम रहती है.

वास्तु के प्राचीन शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि निर्माण के लिए भूमि का चयन करते समय मिट्टी के स्वरूप की परख अवश्य की जाए। अन्य पहलुओं के साथ-साथ वह भी महत्वपूर्ण कारक है। वास्तु में मिट्टी को उसके रंग, स्वाद और महक के आधार पर चार श्रेणियों में बांटा गया है- ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य व शूद्र। जो मिट्टी श्वेत, थोड़ी लाल, भीनी-भीनी महक वाली और उपजाऊ होती है वह आवास तथा व्यावसायिक कार्यों के लिए बहुत शुभ होती है। काले वर्ण की दुर्गंधित और तीखे स्वाद वाली मिट्टी को अशुभ माना जाता है।

मिट्टी का विश्लेषण मिट्टी में निहित पंचतत्वों के गुणों के आधार पर किया जाता है। वास्तु संबंधी शास्त्रों में मिट्टी की विशेषताओं की व्याख्या रूप, रस , गंध , रंग , आकार , स्पर्श व ढलान के आधार पर की गई है और उसे ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य तथा शूद्र श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
मिट्टी की विशेषताओं का रहने वाले लोगों पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार अलग-अलग श्रेणी की मिट्टी विभिन्न वर्ग और श्रेणी के निवासियों के लिए उपयुक्त होती है। उदाहरण के लिए ब्राह्मणी भूमि बुद्धिजीवियों , वैज्ञानिकों व धार्मिक नेताओं के लिए अच्छी मानी जाती है। इसका रंग श्वेत होता है , महक अच्छी होती है और स्वाद मीठा होता है। प्राचीन समय में देखा गया था कि अलग-अलग प्रकार की मिट्टी की जैविक संरचना और विशेषताएं अलग-अलग तरह के लोगों के लिए अनुकूल सिद्ध होती है और प्रभामंडल को और प्रभावी बनाती है।

मिट्टी की विशेषताओं और वहां रहने वाले लोगों के गुणों में परस्पर संबंध होता है। इनके सही मेल से वांछित लाभ अर्जित किया जा सकता है। ध्यान रखें कि यह वर्गीकरण जाति के आधार पर नहीं किया गया है, बल्कि व्यवसाय , कार्य के स्वरूप व मूल प्रवृत्ति के आधार पर किया गया है।

मिट्टी की जांच—-
प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूचाल , चक्रवात आदि की विनाशक शक्ति को झेलने में कोई भवन कितना सक्षम है , यह इस बात पर निर्भर करता है कि भवन का मूल आधार अर्थात् मिट्टी कितनी उपयुक्त व सुदृढ़ है। हमारे मनीषियों ने भवन की सुदृढ़ता और स्थायित्व के लिए भूखंड की मिट्टी की
गुणवत्ता , शुभता और अनुकूलताएं नींव स्थापना और भूखंड के सही आकार की महत्ता पर बल दिया था।
वास्तुशास्त्र के अनुसार निर्माण उसी भूमि पर करना चाहिए, जिस भूमि की मिट्टी में घनत्व अधिक हो। आधुनिक समय में भी मिट्टी के अधिक घनत्व वाली भूमि को अच्छा माना जाता है और मिट्टी की सुदृढ़ता व उपयुक्तता की परख करने के लिए जांच की जाती है। यकीनन , हमारे पूर्वजों को भवन निर्माण संबंधी सभी पहलुओं का ज्ञान था। उन्हें न केवल वास्तुकला के सिद्धांतों का ज्ञान था, बल्कि मनुष्य में और उसके चारों ओर व्याप्त सूक्ष्म ब्रह्मांडीय ऊर्जा का भी पता था।
वास्तु में मिट्टी की शक्ति को परखने के लिए उसकी जांच करने की बात कही गई है, क्योंकि मिट्टी को ही भवन का पूरा भार वहन करना पड़ता है और प्राकृतिक शक्तियों और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है। हमारे प्राचीन वास्तु ग्रंथों में मिट्टी के घनत्व की जांच के लिए बहुत साधारण और सरल विधियां बताई गईं हैं।
भूखंड के बीच में एक हाथ लंबा, एक हाथ चौड़ा और एक हाथ गहरा गड्ढा खोदकर उसे उसमें से निकाली गई मिट्टी से ही भर देना चाहिए। यदि गड्ढे को अच्छी तरह भरने के बाद भी मिट्टी बच जाए तो वह भूमि घर बनाने के लिए उत्तम होती है। यदि उस मिट्टी से गड्ढा भर दिया जाए और मिट्टी न बचे तो भूमि मध्यम होती है और यदि गड्ढा भरने में मिट्टी कम पड़ जाए तो उस भूमि पर भवन निर्माण नहीं करना चाहिए।
मिट्टी को परखने के लिए खाली गड्ढे को शाम के समय पानी से भरकर छोड़ देना चाहिए। सुबह तक यदि इस गड्ढे में कुछ पानी बचे तो वह भूमि मकान बनाने के लिए शुभ होती है। यदि गड्ढे में गीली-गीली मिट्टी हो तो भूमि मध्यम होती है , यदि गड्ढे में पानी न हो और दरारें हो तो उस भूमि पर मकान नहीं बनाना चाहिए।

भूमि जांच का एक अन्य तरीका भूमि पर हल चलाकर भी किया जाता है। हल चलाने से ऊपरी सतह के हट जाने के बाद मिट्टी की सही जानकारी प्राप्त हो जाती है। यदि पशुओं की हड्डियां , बाल आदि मिले तो उस भूमि को निर्माण के लिए अशुभ माना जाता है। भूमि का मुख्य गुण उसका चिकनापन और ठोस होना माना गया है। रेतीली मिट्टी एक स्थिर भवन के निर्माण के लिए सही नहीं समझी जाती। दरारों वाली , चींटियों और दीमकों के बिल वाली , दलदली और ऊंची-नीची भूमि पर भवन निर्माण नहीं करना चाहिए।
अगर ऐसी भूमि पर भवन बनाना जरूरी हो तो उसकी ( 5.5-6 फुट तक) खुदाई कर उसमें अशुभ चीजों का शोधन करके बडे़ गोल पत्थरों और चिकनी मिट्टी से भरकर समतल कर लेना चाहिए। उसके बाद पानी से पूरे भूखंड को संचित कर फिर भवन निर्माण करवाना चाहिए।

विवाह एवं वैवाहिक जीवन के विषय में ग्रहों की स्थिति काफी कुछ बताती है.सप्तम भाव को विवाह एवं जीवनसाथी का घर कहा जाता है.इस भाव एवं इस भाव के स्वामी के साथ ग्रहों की स्थिति के अनुसार व्यक्ति को शुभ और अशुभ फल मिलता है.

शनि देव की भूमिका विवाह के विषय में क्या है आइये देखें.

विवाह में सप्तम शनि का प्रभाव: —–
सप्तम भाव विवाह एवं जीवनसाथी का घर माना जाता है.इस भाव शनि का होना विवाह और वैवाहिक जीवन के लिए शुभ संकेत नहीं माना जाता है.इस भाव में शनि होने पर व्यक्ति की शादी सामान्य आयु से विलम्ब से होती है.सप्तम भाव में शनि अगर नीच का होता है तब यह संभावना रहती है कि व्यक्ति काम पीड़ित होकर किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करता है जो उम्र में उससे काफी बड़ा होता है.शनि के साथ सूर्य की युति अगर सप्तम भाव में हो तो विवाह देर से होता है एवं कलह से घर अशांत रहता है .चन्द्रमा के साथ शनि की युति होने पर व्यक्ति अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम नहीं रखता एवं किसी अन्य के प्रेम में गृह कलह को जन्म देता है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सप्तम शनि एवं उससे युति बनाने वाले ग्रह विवाह एवं गृहस्थी के लिए सुखकारक नहीं होते हैं.

शनि और विवाह में विलम्ब: —–
नवमांश कुण्डली या जन्म कुण्डली में जब शनि और चन्द्र की युति हो तो शादी की बात 30 वर्ष की आयु के बाद ही सोचनी चाहिए क्योकि इससे पहले शादी की संभावना नहीं बनती है जिनकी कुण्डली में चन्द्रमा सप्तम भाव में होता है और शनि लग्न में उनके साथ भी यही स्थिति होती है एवं इनकी शादी असफल होने की भी संभावना प्रबल रहती है.जिनकी जन्मपत्री में लग्न स्थान से शनि द्वादश होता है और सूर्य द्वितीयेश होता है एवं लग्न कमज़ोर उनकी शादी बहुत विलम्ब से होती है अथवा ऐसी स्थिति बनती है कि वह शादी नहीं करते.शनि जिस कन्या की कुण्डली में सूर्य या चन्द्रमा से युत या दृष्ट होकर लग्न या सप्तम में होते हैं उनकी शादी में भी बाधा रहती है.

शनि जिनकी कुण्डली में छठे भाव में होता है एवं सूर्य अष्टम में और सप्तमेश कमज़ोर अथवा पाप पीड़ित होता है उनकी शादी में भी काफी बाधाएं आती हैं.शनि और राहु की युति जब सप्तम भाव में होती है तब विवाह सामान्य से अधिक आयु में होता है.इसी प्रकार की स्थिति तब भी होती है जब शनि और राहु की युति लग्न में होती है और वह सप्तम भाव पर दृष्टि डालते हैं.जन्मपत्री में शनि राहु की युति होने पर सप्तमेश व शुक्र अगर कमज़ोर रहता है तो विवाह अति विलम्ब से हो पाता है.

कुण्डली के कौन से योग प्रेम विवाह की संभावनाएं—–एस्ट्रो वास्तु
प्रेम विवाह करने वाले लडके व लडकियों को एक-दुसरे को समझने के अधिक अवसर प्राप्त होते है. इसके फलस्वरुप दोनों एक-दूसरे की रुचि, स्वभाव व पसन्द-नापसन्द को अधिक कुशलता से समझ पाते है. प्रेम विवाह करने वाले वर-वधू भावनाओ व स्नेह की प्रगाढ डोर से बंधे होते है. ऎसे में जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी दोनों का साथ बना रहता है.
पर कभी-कभी प्रेम विवाह करने वाले वर-वधू के विवाह के बाद की स्थिति इसके विपरीत होती है. इस स्थिति में दोनों का प्रेम विवाह करने का निर्णय शीघ्रता व बिना सोचे समझे हुए प्रतीत होता है. आईये देखे कि कुण्डली के कौन से योग प्रेम विवाह की संभावनाएं बनाते है.

1. राहु के योग से प्रेम विवाह की संभावनाएं——

1) जब राहु लग्न में हों परन्तु सप्तम भाव पर गुरु की दृ्ष्टि हों तो व्यक्ति का प्रेम विवाह होने की संभावनाए बनती है. राहु का संबन्ध विवाह भाव से होने पर व्यक्ति पारिवारिक परम्परा से हटकर विवाह करने का सोचता है. राहु को स्वभाव से संस्कृ्ति व लीक से हटकर कार्य करने की प्रवृ्ति का माना जाता है.
2.) जब जन्म कुण्डली में मंगल का शनि अथवा राहु से संबन्ध या युति हो रही हों तब भी प्रेम विवाह कि संभावनाएं बनती है. कुण्डली के सभी ग्रहों में इन तीन ग्रहों को सबसे अधिक अशुभ व पापी ग्रह माना गया है. इन तीनों ग्रहों में से कोई भी ग्रह जब विवाह भाव, भावेश से संबन्ध बनाता है तो व्यक्ति के अपने परिवार की सहमति के विरुद्ध जाकर विवाह करने की संभावनाएं बनती है.
3.) जिस व्यक्ति की कुण्डली में सप्तमेश व शुक्र पर शनि या राहु की दृ्ष्टि हो, उसके प्रेम विवाह करने की सम्भावनाएं बनती है.
4) जब पंचम भाव के स्वामी की उच्च राशि में राहु या केतु स्थित हों तब भी व्यक्ति के प्रेम विवाह के योग बनते है.

2. प्रेम विवाह के अन्य योग—-

1) जब किसी व्यक्ति कि कुण्ड्ली में मंगल अथवा चन्द्र पंचम भाव के स्वामी के साथ, पंचम भाव में ही स्थित हों तब अथवा सप्तम भाव के स्वामी के साथ सप्तम भाव में ही हों तब भी प्रेम विवाह के योग बनते है.
2) इसके अलावा जब शुक्र लग्न से पंचम अथवा नवम अथवा चन्द लग्न से पंचम भाव में स्थित होंने पर प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है.
3) प्रेम विवाह के योगों में जब पंचम भाव में मंगल हों तथा पंचमेश व एकादशेश का राशि परिवतन अथवा दोनों कुण्डली के किसी भी एक भाव में एक साथ स्थित हों उस स्थिति में प्रेम विवाह होने के योग बनते है.
4) अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में पंचम व सप्तम भाव के स्वामी अथवा सप्तम व नवम भाव के स्वामी एक-दूसरे के साथ स्थित हों उस स्थिति में प्रेम विवाह कि संभावनाएं बनती है.
5) जब सप्तम भाव में शनि व केतु की स्थिति हों तो व्यक्ति का प्रेम विवाह हो सकता है.
6) कुण्डली में लग्न व पंचम भाव के स्वामी एक साथ स्थित हों या फिर लग्न व नवम भाव के स्वामी एक साथ बैठे हों, अथवा एक-दूसरे को देख रहे हों इस स्थिति में व्यक्ति के प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है.
7) जब किसी व्यक्ति की कुण्डली में चन्द्र व सप्तम भाव के स्वामी एक -दूसरे से दृ्ष्टि संबन्ध बना रहे हों तब भी प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है.
8) जब सप्तम भाव का स्वामी सप्तम भाव में ही स्थित हों तब विवाह का भाव बली होता है. तथा व्यक्ति प्रेम विवाह कर सकता है.
9) पंचम व सप्तम भाव के स्वामियों का आपस में युति, स्थिति अथवा दृ्ष्टि संबन्ध हो या दोनों में राशि परिवर्तन हो रहा हों तब भी प्रेम विवाह के योग बनते है.
10) जब सप्तमेश की दृ्ष्टि, युति, स्थिति शुक्र के साथ द्वादश भाव में हों तो, प्रेम विवाह होता है.
11) द्वादश भाव में लग्नेश, सप्तमेश कि युति हों व भाग्येश इन से दृ्ष्टि संबन्ध बना रहा हो, तो प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है.
12) जब जन्म कुण्डली में शनि किसी अशुभ भाव का स्वामी होकर वह मंगल, सप्तम भाव व सप्तमेश से संबन्ध बनाते है. तो प्रेम विवाह हो सकता है.

केतु का प्रत्येक भाव के लिए उपाय ………….एस्ट्रो वास्तु
आमतौर पर वैदिक ज्योतिष में जब ग्रह कमजोर या अशुभ स्थिति मे़ होता है तो उसका उपाय किया जाता है.

परन्तु लाल किताब के अनुसार ग्रह चाहे शुभ स्थिति में हो या अशुभ उसका उपाय करने से जहाँ उसके फल में स्थायित्व रहता हें, वही दूसरी तरफ अशुभ ग्रह का उपाय करने से उसके दूष्प्रभाव की शान्ति होती है. इस लेख के माध्यम से केतु ग्रह के प्रत्येक भाव मेँ स्थित होने पर उसके उपाय की जानकारी दी गई है. प्रत्येक व्यक्ति जिनका केतु जिस-2 भाव में स्थित है वह यहाँ दी गई सूची के आधार पर उपाय कर सकता है.

प्रथम भाव में स्थित केतु के उपाय
1) बन्दर को गुड़ खिलाएं
2) काला, सफेद दो रंग का कम्बल मन्दिर में दान करें.
3) दोना पावों के अंगुठे में चाँदी या सफेद धागा बाधँ कर रखें.
4) ब्रह्मचर्य का पालन करें.
5) केसर का तिलक लगाएं.

द्वितीय भाव में स्थित केतु के उपाय
1) अपने चरित्र को उत्तम बनाए रखें.
2) माथे पर केसर का तिलक लगाएं.
3) मन्दिर में प्रतिदिन दर्शन के लिए जाएं.

तृतीय भाव में स्थित केतु के उपाय
1) कानो में सोना पहनें.
2) वृद्ध् की सेवा करें.
3) माथे पर केसर का तिलक लगाएं.
4) बहते पानी में गुड़ प्रवाहित करें.
5) भाई बन्धुओं से अच्छे सम्बन्ध बनाकर रखें.
6) जीभ पर केसर रखें.

चतुर्थ भाव में स्थित केतु का उपाय
1) दूध में सोना बुझा कर पीएं.
2) पीले रंग के नींबु चलते पानी में प्रवाहित करें.
3) कुत्ता पालें.
4) शरीर पर चाँदी धारण करें.

पचंम भाव में स्थित केतु के उपाय
1) दूध, चावल, देसी खाण्ड , सौंफ दरिया में प्रवाहित करें.
2) पिता व दादा की सेवा करें.
3) पितरो का श्राद्ध करें.
4) कन्याओं का आशीर्वाद लें.
5) केसर का तिलक लगाएं.
6) ब्राह्मण को बृहस्पति की वस्तुऎं दान करें.

छटे भाव में स्थित केतु के उपाय
1) कुत्ता पालें.
2) काला, सफेद कम्बल मन्दिर में दान करें.
3) बाएं हाथ में सोने का छ्ल्ला पहने.
4) दूध में केसर मिलाकर पीयें.

सप्तम भाव में स्थित केतु के उपाय
1) मीठी वाणी का प्रयोग करें.
2) अपने वचन पालन करें.

अष्टम भाव में स्थित केतु का उपाय
1)कुत्ता पालें.
2) काला, सफेद कम्बल मन्दिर में दान करें.
3) कानो में सोना पहनें.
4) अपने चरित्र को उत्तम बनाएं रखें.

नवम भाव में स्थित केतु का उपाय
1) कानो में सोना पहने व घर में सोना रखें.
2) कुत्ता पालें.
3) पिता, दादा के साथ रहें व उनकी सेवा करें.

दशम भाव में स्थित केतु के उपाय
1) चांदी के बर्तन में शहद भर कर घर में रखें.
2) 48 वर्ष से पहले मकान ना बनाएं.
3) व्यभिचार से बचें.
4) अपने चरित्र को उत्तम बनाएं रखें.

एकादश भाव में स्थित केतु के उपाय
1) दूध से सोना बुझा कर पियें.
2) काले रंग का कुत्ता पालें.
3) रात में स्त्री के सिरहाने मूली रख कर सुबह मन्दिर में दान करें.
4) दूध में केसर डालकर पिएं.

द्वादश भाव में स्थित केतु के उपाय

1) कुत्ता पालें, यदि किसी कारणवश कुत्ता मर जाए तो दोबारा कुत्ता पालें.
इस प्रकार लाल किताब के अनुसार केतु के उपाय करने से तुरन्त लाभ मिलता हैं.
नोट

1) एक समय में केवल एक ही उपाय करें.
2) उपाय कम से कम 40 दिन और अधिक से अधिक 43 दिनो तक करें.
3) उपाय में नागा ना करें यदि किसी करणवश नागा हो तो फिर से प्रारम्भ करें.
4) उपाय सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक करें.
5) उपाय खून का रिश्तेदार ( भाई, पिता, पुत्र इत्यादि) भी कर सकता है

बुध व गुरु ग्रह की शान्ति के उपाय——एस्ट्रो वास्तु
ग्रहों के अनुकुल फल प्राप्त करने के लिये संबन्धित ग्रह की शान्ति के उपाये किये जाते है. अन्य कारणों से भी ग्रहों की शान्ति करानी आवश्यक हो जाती है. जैसे:- गण्डमूळ, गण्डान्त, अभुक्तमूल

इन अशुभ नक्षत्रों में जन्म होने पर इस अशुभता को दूर करने के लिये उपाय करने पड्ते है. गोचर में जब ग्रह अनिष्ट फल दे रहा हो या फिर दशा में कष्ट देने कि स्थिति में हों ऎसे में ग्रह के उपाय करना हितकारी रहता है.

जन्म कुण्डली में जब किसी ग्रह का सहयोग प्राप्त न होने की स्थिति में उस ग्रह से जुडे उपाय करने से ग्रह का शुभ सहयोग प्राप्त होता है. ये उपाय ग्रह से संबन्धित कार्यो में भी किये जा सकते है. जैसे:- शिक्षा में रुचि कम होने पर बुध के उपाय करने लाभकारी रहते है . इसी तरह बुध से संबधित अन्य कार्यो में भी बुध के उपाय करना हितकारी रहता है.

1. बुध की वस्तुओं से स्नान
बुध की वस्तुओं का स्नान करने के लिये स्नान के पानी में साबुत चावल के दाने डालकर स्नान किया जाता है . तांबे के बर्तन में जल भरकर रात भर रखने के बाद इस जल को ग्रहण किया जाता है . ऎसा करने पर तांबे के गुण जल के साथ व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करते है. तथा बुध से जुडे रोगों होने पर यह उपाय करने पर लाभ प्राप्त होता है. इस उपाय को करते समय बुध के मंत्र का जाप करने पर उतम फल प्राप्त होते है

2. बुध के दान
बुध के लिये किये जाने वाली वस्तुओं में हरी मूंग की दाल आती है. बुध की वस्तुओं में तांबे का दान भी किया जा सकता है. बुध की वस्तुएं दान करने पर बुद्धि व शिक्षा कार्यो में सफलता मिलती है. ये दान प्रत्येक बुधवार को किये जा सकते है. दान कि मात्रा अपने सामर्थ्य के अनुसार लेनी चाहिए.

3. बुध का मंत्र
बुध मंत्र में “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:” का जप करना चाहिए. इस मंत्र का एक माला अर्थात 108 बार जाप करने से बुध ग्रह की शान्ति होती है. बुध ग्रह जब गोचर में व्यक्ति के अनुकुल फल नहीं दे रहा हों तो इस मंत्र का जाप प्रतिदिन करना चाहिए . बुध की महादशा के शुभ फल पाने के लिये बुध की महादशा अन्तर्दशा में नियमित रुप से इस मंत्र का जाप करना लाभकारी रहता है.

4. बुध यंत्र को धारण करना
बुध यंत्र को अपने या अपनी संतान के अध्ययन कक्ष में लगाने से शिक्षा में उतम फल प्राप्त होने की संभावना बनती है. इस यंत्र को विशेष रुप से अपने व्यापारिक क्षेत्र में लगाने से व्यापार में उन्नति की संभावनाएं बनती है.

बुध ग्रह के अंकों का योग करने पर योगफल 24 आता है इस यन्त्र को तांबे के पत्र पर, भोजपत्र पर या फिर कागज पर बनाया जा सकता है. जब इस यन्त्र को भोजपत्र या फिर कागज पर स्वयं बनाते समय इसके लिये अनार की कलम व स्याही के लिये लाल चन्दन, कस्तूरी व केसर की स्याही का प्रयोग किया जाना चाहिए. यन्त्र का निर्माण करते समय शुद्धता का ध्यान रखना आवश्यक होता है.

5. गुरु ग्रह के शान्ति उपाय
गोचर में या दशा में जब गुरु के शुभ फल प्राप्त न होने की स्थिति में गुरु ग्रह की शान्ति के उपाय करना लाभकारी रहता है. गुरु सबसे शुभ ग्रह है . इसलिये इनकी शुभता की सबसे अधिक आवश्यकता होती है. जब कुण्डली में गुरु अशुभ भावों का स्वामी हों तो गुरु की महादशा में इसकी शान्ति के उपाय करने लाभकारी रहते है . गुरु धन, ज्ञान व संतान के कारक ग्रह है. इसलिये गुरु के उपाय करने पर धन, ज्ञान व संतान का सुख प्राप्त होने कि संभावनाएं बनती है. गुरु के शान्ति उपायों में निम्न उपाय आते है:-

1. गुरु की वस्तुओं से स्नान
इस उपाय के लिये गंगाजल में पीली सरसों या शह्द दोनों को मिलाकर स्नान किया जाता है स्नान करते समय गुरु मंत्र का जाप करना लाभकारी रहता है. तथा इसके बाद शुद्ध जल से स्नान कर लिया जाता है. यह उपाय करने पर स्नान करने पर वस्तु का प्रभाव रोमछिद्रों से होते हुए व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करते है. उपाय के फलस्वरुप व्यक्ति को गुरु के गोचर या फिर दशा में शुभ फल प्राप्त होने की संभावना बढ जाती है.

2. गुरु की वस्तुओं का दान
स्नान करने के उपाय के अतिरिक्त इसकी वस्तुओं का दान करने से भी व्यक्ति को लाभ प्राप्त होते है. दान की जाने वाली वस्तुओं में नमक, हल्दी की गांठें, नींबू आदि का दान किया जा सकता है इनमें से किसी एक वस्तु या फिर सभी वस्तुओं का दान गुरुवार को किया जा सकता है. दान करते समय शुभ समय में गौधुली मुहूर्त का प्रयोग किया जा सकता है. वस्तुओं का दान करते समय अपने सामर्थय से अधिक वस्तुओं का दान नहीं करना चाहिए. जिस व्यक्ति के लिये यह दान किया जा रहा है. उसके स्वयं के संचित धन का प्रयोग इस कार्य के लिये करना विशेष रुप से शुभ रहता है.

3. गुरु मंत्र का जाप करना
गुरु की शुभता प्राप्त करने के लिये गुरु मंत्र का जाप किया जा सकता है. ” ऊं गुं गुरुवाये नम: ” इस मंत्र का जाप प्रतिदिन एक माला या एक से अधिक माला प्रतिदिन करना शुभ रहता है. इसके अलावा गुरु का जाप गुरुवार के दिन करना भी लाभकारी रहता है. जिस अवधि के लिये यह उपाय किया जा रहा है उस अवधि में हवन कार्यो में इस मंत्र का जाप किया जा सकता है

4. गुरु यन्त्र निर्माण
गुरु यन्त्र की पूजा करने से या फिर इसे धारण करने से धन संबन्धित परेशानियों में कमी होती है. आर्थिक स्थिति को सुदृढ करने में भी गुरु यन्त्र उपयोगी रहता है. गुरु यन्त्र के प्रभाव से संतान सुख प्राप्ति की संभावनाओं को सहयोग प्राप्त होगा. शिक्षा क्षेत्र में सफलता पाने के लिये यह योग विशेष रुप से लाभकारी सिद्धि होता है. गुरु यन्त्र की सभी संख्याओं का योग 27 होता है.

गुरु यन्त्र को बनाकर धन स्थान में या फिर पूजा स्थान में रखकर पूजा करने से इस यन्त्र के सभी शुभ फल प्राप्त होने की संभावना बनती है. इसकी पहली लाईन में 10, 5,12 ये संख्यायें आती है. मध्य की लाईन में 11,9,7 संख्याएं आती है. तथा अन्तिम लाईन में 6,13 व 8 ये संख्यायें आती है. गुरु यन्त्र की प्राण प्रतिष्ठा करने के लिये किसी योग्य पण्डित की सहायता ली जा सकती है

राहु को अंग्रेजी में ड्रैगन हेड के नाम से जाना जाता है.पौराणिक ग्रंथों में भी इसे सर्प का सिर कहा गया है.केतु के साथ मिलकर यह कालसर्प नामक अशुभ योग का निर्माण करता है.यह इसी प्रकार विभिन्न ग्रहों एवं स्थान में रहकर यह अलग अलग योग बनाता है.

अष्टलक्ष्मी योग – Ashtalakshmi yoga
वैदिक ज्योतिष में राहु नैसर्गिक पापी ग्रह के रूप में जाना जाता है.इस ग्रह की अपनी कोई राशि नहीं है अत: जिस राशि में होता है उस राशि के स्वामी अथवा भाव के अनुसार फल देता है.राहु जब छठे भाव में स्थित होता है और केन्द्र में गुरू होता है तब यह अष्टलक्ष्मी योग (Ashtalakshmi yoga) नामक शुभ योग का निर्माण करता है. अष्टलक्ष्मी योग (Ashtalakshmi yoga) में राहु अपना पाप पूर्ण स्वभाव त्यागकर गुरू के समान उत्तम फल देता है. अष्टलक्ष्मी योग (Ashtalakshmi yoga) जिस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है वह व्यक्ति ईश्वर के प्रति आस्थावान होता है.इनका व्यक्तित्व शांत होता है.इन्हें यश और मान सम्मान मिलता है.लक्ष्मी देवी की इनपर कृपा रहती है.

लग्न कारक योग – Lagna Karaka Yoga
राहु द्वारा निर्मित शुभ योगों में लग्न कारक योग ( Lagna Karaka Yoga) का नाम भी प्रमुख है. लग्न कारक योग ( Lagna Karaka Yoga) मेष, वृष एवं कर्क लग्न वालों की कुण्डली में तब बनता है जबकि राहु द्वितीय, नवम अथवा दशम भाव में नहीं होता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में लग्न कारक योग ( Lagna Karaka Yoga) उपस्थित होता है उसे राहु की अशुभता का सामना नहीं करना होता है. राहु इनके लिए शुभ कारक होता है जिससे दुर्घटना की संभावना कम रहती है.स्वास्थ्य उत्तम रहता है.आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है एवं सुखी जीवन जीते हैं.

परिभाषा योग (Paribhasha Yoga)
जिस व्यक्ति की कुण्डली में राहु परिभाषा योग (Paribhasha Yoga) का निर्माण करता है.वह व्यक्ति राहु के कोप से मुक्त रहता है.यह योग जन्मपत्री में तब निर्मित होता है जब राहु लग्न में स्थित हो अथवा तृतीय, छठे या एकादश भाव में उपस्थित हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो.राहु का परिभाषा योग (Paribhasha Yoga) व्यक्ति को आर्थिक लाभ देता है.स्वास्थ्य को उत्तम बनाये रखता है.इस योग से प्रभावित व्यक्ति के कार्य आसानी से बन जाते हैं.

कपट योग (Kapata Yoga)
दो पापी ग्रह राहु और शनि जब जन्मपत्री में क्रमश: एकादश और षष्टम में उपस्थित होते हैं तो कपट योग (Kapata Yoga) बनता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में कपट योग (Kapata Yoga) निर्मित होता है वह व्यक्ति अपने स्वार्थ हेतु किसी को भी धोखा देने वाला होता है .इनपर विश्वास करने वालों को पश्चाताप करना होता है.सामने भले ही लोग इनका सम्मान करते हों परंतु हुदय में इनके प्रति नीच भाव ही रहता है.

पिशाच योग – Pishach Yoga
पिशाच योग (Pishach Yoga) राहु द्वारा निर्मित योगों में यह नीच योग है.पिशाच योग (Pisach Yoga) जिस व्यक्ति की जन्मपत्री में होता है वह प्रेत बाधा का शिकार आसानी से हो जाता है.इनमें इच्छा शक्ति की कमी रहती है.इनकी मानसिक स्थिति कमज़ोर रहती है, ये आसानी से दूसरों की बातों में आ जाते हैं.इनके मन में निराशात्मक विचारों का आगमन होता रहता है.कभी कभी स्वयं ही अपना नुकसान कर बैठते हैं.

चांडाल योग (Chandal Yoga or Guru Chandal Yoga)
चांडाल योग (Chandal Yoga) गुरू और राहु की युति से निर्मित होता है. चांडाल योग (Chandal Yoga) अशुभ ग्रह के रूप में माना जाता है. चांडाल योग (Chandal Yoga)जिस व्यक्ति की कुण्डली में निर्मित होता है उसे राहु के पाप प्रभाव को भोगना पड़ता है. चांडाल योग (Chandal Yoga) में आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है.नीच कर्मो के प्रति झुकाव रहता है.मन में ईश्वर के प्रति आस्था का अभाव रहता है.

किचन से प्रभावित होता है पति-पत्नी का स्वभाव
व्यक्ति का स्वभाव और उसके घर की बीच गहरा संबंध होता है। जैसा घर होता है वैसा ही परिवार के सदस्यों का स्वभाव। वास्तु के अनुसार घर का हर हिस्सा, हर कमरा और किचन का अपना अलग महत्व होता है और यह सभी हमारे स्वभाव को प्रभावित करते हैं।

किचन घर का सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है। वास्तु के अनुसार किचन हमेशा आग्नेय कोण में होना चाहिए। कई लोगों के घर में वास्तु की जानकारी के अभाव में वास्तुदोष रहते हैं।

किचन आग्नेय कोण या दक्षिण-पूर्वी कोने में ही सबसे अच्छा रहता है लेकिन यदि किचन किसी और स्थान पर हो तो उसका अलग प्रभाव पड़ता है। किचन किस स्थान पर है? इसी बात से यह मालूम किया जा सकता है कि पति-पत्नी कितने खुश और शरारती हैं?

जिस घर में किचन दक्षिण या नैऋत्य कोण में होता है उस घर की मालकिन ऊर्जा से भरपूर, उत्साहित एवं शरारती मिजाज की होती है। वह हर पल को खुशी के साथ जीने वाली होती हैं और हमेशा अपने परिवार का ध्यान रखती हैं।

जिस घर का किचन वायव्य कोण में होता है, उसका मुखिया शरारती मिजाज और हमेशा खुश रहने वाला होता है। ऐसे घर के मालिक का स्वभाव शरारती होता है। उसका महिलाओं के प्रति विशेष झुकाव होता है।

आग्नेय कोण में किचन की यह स्थिति बहुत शुभ होती है । आग्नेय कोण में किचन होने पर घर की स्त्रियां खुश रहती हैं। घर में समस्त प्रकार के सुख रहते हैं।

इस दिशा में किचन होने से परिवार में मानसिक अशांति बनी रहती है। घर के मालिक को क्रोध अधिक आता है और उसका स्वास्थ्य साधारण रहता है।

जिस घर में किचन पश्चिम दिशा में होता है, उस घर का सारा कार्य घर की मालकिन देखती है। उसे काफी खुशियां प्राप्त होती हैं। घर की सभी महिला सदस्यों में आपसी तालमेल अच्छा बना रहते हैं परंतु खाने की बर्बादी ज्यादा होती है।

जिस घर में किचन उत्तर दिशा में होता है, उसकी स्त्रियां बुद्धिमान होती हैं। उस परिवार के पुरुष सरलता से अपना कारोबार करते हैं और उन्हें धनार्जन में सफलता मिलती है।

ईशान कोण में किचन होने पर परिवार के सदस्यों को सामान्य सफलता मिलती है। परिवार की स्त्रियां धार्मिक होती है, परंतु घर में कलह भी होती है। जिस घर में पूर्व दिशा में किचन होता है, उसकी आय अच्छी होती है। उस घर में पत्नी की ज्यादा बात मानी जाती है।

बिना तोड़-फोड़ ऐसे मिटाएं वास्तु दोष———
बिना सोचे-विचारे मकान बनवाने पर उसमें कई वास्तु दोष आ जाते हैं। जिनका असर हमारे जीवन पर पड़ता है। वास्तु शास्त्रियों के अनुसार कुछ मामूली परिवर्तन कर इन वास्तु दोषों को समाप्त किया जा सकता है, जैसे-

1- यदि आपके घर की छत पर व्यर्थ का सामान पड़ा हो तो उसे वहां से हटा दें।

2- प्लास्टर आदि उखड़ गया हो तो उसकी तत्काल मरम्मत करवा दें।

3- यदि आपकी रसोई के गेट के ठीक सामने बाथरूम का गेट हो तो यह नकारात्मक ऊर्जा देगा। इस दोष से बचने के लिए बाथरूम तथा रसोई के बीच में एक कपड़े का पर्दा या किसी अन्य प्रकार का पार्टीशन खड़ा कर सकते हैं ताकि रसोई से बाथरूम दिखाई न दे।

4- यदि घर के दरवाजे व खिड़कियां खुलने व बंद होने पर आवाज करते हैं तो उनकी आवश्यक मरम्मत करवाएं।

5- आग्नेय कोण में रसोई न होने पर गैस चूल्हे को रसोई के आग्नेय कोण में रखकर दोष का निवारण कर सकते हैं। और यह भी नहीं सकते तो आग्नेय कोण में एक जीरो वाट का बल्ब जलाकर भी इस दोष से बचा जा सकता है।

6- यदि ईशान में बोरिंग या अण्डर ग्राउंड टैंक आदि न बनवा सके हों तो ईशान में एक सादा जल लगवा कर दोष का निवारण कर सकते हैं।

7- यदि भूखण्ड चौकोर नहीं हो तो यह अवश्य देख लें कि लंबाई, चौड़ाई की दुगुनी से अधिक न हो। यदि लंबाई, चौड़ाई से दुगुनी हो तो अतिरिक्त भूभाग पर स्वतंत्र इकाई का निर्माण करवाया जा सकता है।

Posted by: vastushastri08 | जून 5, 2011

लाल किताब के सामान्य उपाय—

नौकरी बार बार छूट जाती है ?

Ans :- 10 साधुओं को हर साल खाना खिलाए पर उनको पैसे ना दें, 43 दिन तक गेंहू और गुड़ मिला कर उनके लड्डू बनाए और स्कूल के बच्चो को बाँटे, हर रोज केसर का तिलक माथे ज़ुबान और नाभि मे लगाए, 43 दिन तक तीन केले मंदिर मे दान दें

घर मे रोज झगड़ा होता रहता है ?

Ans:- 43 दिन सिरहाने पानी रख कर कीकर के पेड़ मे डाले, 43 दिन 3 केले मंदिर मे दें, चाँदी के बर्तन मे गंगा जल और चाँदी का चकोर टुकड़ा डाल कर रखे, विद्वान या माता के पावं मे हाथ लगाकर आशीर्वाद ले, घर के उत्तर पूर्व कोने से संदूक, ट्रंक या किसी भी प्रकार की गंदगी हो तो हटा दे, (चंद्र केतु मध्यम मार्तंड यंत्रा गले मे धारण करे)

मरने का डर लगता है ?

Ans :- 96 दिन के लिए नाक छेदन करवा कर चाँदी धारण करे, 43 दिन खाली मटका जल प्रवाह करें, लोहे का छल्ला बीच वाली उंगली मे धारण करे, (बुध गुरु सर्वा मार्तंड यंत्रा गले मे धारण करे, और तांबे के छेड़ वाला पैसा गले मे पहने)

सब से अधिक अपने आपको ग़रीब बेसहारा समझता हूँ ?

Ans :- हर सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण पर 4 नारियल और 400 ग्राम साबुत बादाम जल प्रवाह करें, घर के उत्तर पूर्व मे पानी का कुंभ लगाएँ, चाँदी तन मे धारण करें, हर शुक्रवार अपने वजन के बराबर हरा चारा गाए को खिलाए, हर रोज इत्र का इस्तेमाल करें, हर रोज नहा कर साफ़ कपड़े प्रेस किए हुए पहने, हर रोज उगते हुए सूरज के सामने खड़े हों.

—-काली मिर्च के पाँच दाने लेकर अपने सिर पर से सात बार उसार कर चार दाने चारो दिशा मे फ़ैक दे एवम एक दाना आकाश की ओर उछाले तो शीघ्र ही धन आगमन होगा
—-यदि पुत्र आपकी नहीं सुनता, तो केतु का उपचार करें। केतु संबंधी वस्तुओं का दान दें।
—-यदि पति-पत्नी के रिश्तों में किसी तरह की परेशानियां आ रही हैं तो शुक्रदेव को मनाएं। शुक्रवार को शुक्र ग्रह से संबंधित वस्तुओं का दान करें।
—–भाई या मित्र से संबंध ठीक नहीं रहते तो मंगलदेव की आराधना करें। प्रति मंगलवार शिवलिंग पर लाल फूल चढ़ाएं।
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Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

मंगली दोष—-एस्ट्रो वास्तु

मंगली दोष—-एस्ट्रो वास्तु
मंगल उष्ण प्रकृति का ग्रह है.इसे पाप ग्रह माना जाता है. विवाह और वैवाहिक जीवन में मंगल का अशुभ प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है.
मंगल दोष जिसे मंगली के नाम से जाना जाता है इसके कारण कई स्त्री और पुरूष आजीवन अविवाहित ही रह जाते हैं.इस दोष को गहराई से समझना आवश्यक है ताकि इसका भय दूर हो सके.

मंगली दोष का ज्योतिषीय आधार (Astrological analysis of Manglik Dosha)
वैदिक ज्योतिष में मंगल को लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में दोष पूर्ण माना जाता है.इन भावो में उपस्थित मंगल वैवाहिक जीवन के लिए अनिष्टकारक कहा गया है.जन्म कुण्डली में इन पांचों भावों में मंगल के साथ जितने क्रूर ग्रह बैठे हों मंगल उतना ही दोषपूर्ण होता है जैसे दो क्रूर होने पर दोगुना, चार हों तो चार चार गुणा.मंगल का पाप प्रभाव अलग अलग तरीके से पांचों भाव में दृष्टिगत होता है जैसे:

लग्न भाव में मंगल (Mangal in Ascendant )
लग्न भाव से व्यक्ति का शरीर, स्वास्थ्य, व्यक्तित्व का विचार किया जाता है.लग्न भाव में मंगल होने से व्यक्ति उग्र एवं क्रोधी होता है.यह मंगल हठी और आक्रमक भी बनाता है.इस भाव में उपस्थित मंगल की चतुर्थ दृष्टि सुख सुख स्थान पर होने से गृहस्थ सुख में कमी आती है.सप्तम दृष्टि जीवन साथी के स्थान पर होने से पति पत्नी में विरोधाभास एवं दूरी बनी रहती है.अष्टम भाव पर मंगल की पूर्ण दृष्टि जीवनसाथी के लिए संकट कारक होता है.

द्वितीय भाव में मंगल (Mangal in Second Bhava)
भवदीपिका नामक ग्रंथ में द्वितीय भावस्थ मंगल को भी मंगली दोष से पीड़ित बताया गया है.यह भाव कुटुम्ब और धन का स्थान होता है.यह मंगल परिवार और सगे सम्बन्धियों से विरोध पैदा करता है.परिवार में तनाव के कारण पति पत्नी में दूरियां लाता है.इस भाव का मंगल पंचम भाव, अष्टम भाव एवं नवम भाव को देखता है.मंगल की इन भावों में दृष्टि से संतान पक्ष पर विपरीत प्रभाव होता है.भाग्य का फल मंदा होता है.

चतुर्थ भाव में मंगल (Mangal in Fourth Bhava)
चतुर्थ स्थान में बैठा मंगल सप्तम, दशम एवं एकादश भाव को देखता है.यह मंगल स्थायी सम्पत्ति देता है परंतु गृहस्थ जीवन को कष्टमय बना देता है.मंगल की दृष्टि जीवनसाथी के गृह में होने से वैचारिक मतभेद बना रहता है.मतभेद एवं आपसी प्रेम का अभाव होने के कारण जीवनसाथी के सुख में कमी लाता है.मंगली दोष के कारण पति पत्नी के बीच दूरियां बढ़ जाती है और दोष निवारण नहीं होने पर अलगाव भी हो सकता है.यह मंगल जीवनसाथी को संकट में नहीं डालता है.

सप्तम भाव में मंगल (Mangal in Seventh Bhava)
सप्तम भाव जीवनसाथी का घर होता है.इस भाव में बैठा मंगल वैवाहिक जीवन के लिए सर्वाधिक दोषपूर्ण माना जाता है.इस भाव में मंगली दोष होने से जीवनसाथी के स्वास्थ्य में उतार चढ़ाव बना रहता है.जीवनसाथी उग्र एवं क्रोधी स्वभाव का होता है.यह मंगल लग्न स्थान, धन स्थान एवं कर्म स्थान पर पूर्ण दृष्टि डालता है.मंगल की दृष्टि के कारण आर्थिक संकट, व्यवसाय एवं रोजगार में हानि एवं दुर्घटना की संभावना बनती है.यह मंगल चारित्रिक दोष उत्पन्न करता है एवं विवाहेत्तर सम्बन्ध भी बनाता है.संतान के संदर्भ में भी यह कष्टकारी होता है.मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण पति पत्नी में दूरियां बढ़ती है जिसके कारण रिश्ते बिखरने लगते हैं.जन्मांग में अगर मंगल इस भाव में मंगली दोष से पीड़ित है तो इसका उपचार कर लेना चाहिए.

अष्टम भाव में मंगल (Mangal in Eigth Bhava)
अष्टम स्थान दुख, कष्ट, संकट एवं आयु का घर होता है.इस भाव में मंगल वैवाहिक जीवन के सुख को निगल लेता है.अष्टमस्थ मंगल मानसिक पीड़ा एवं कष्ट प्रदान करने वाला होता है.जीवनसाथी के सुख में बाधक होता है.धन भाव में इसकी दृष्टि होने से धन की हानि और आर्थिक कष्ट होता है.रोग के कारण दाम्पत्य सुख का अभाव होता है.ज्योतिष विधान के अनुसार इस भाव में बैठा अमंलकारी मंगल शुभ ग्रहों को भी शुभत्व देने से रोकता है.इस भाव में मंगल अगर वृष, कन्या अथवा मकर राशि का होता है तो इसकी अशुभता में कुछ कमी आती है.मकर राशि का मंगल होने से यह संतान सम्बन्धी कष्ट देता है।

द्वादश भाव में मंगल (Mangal in Twelth Bhava)
कुण्डली का द्वादश भाव शैय्या सुख, भोग, निद्रा, यात्रा और व्यय का स्थान होता है.इस भाव में मंगल की उपस्थिति से मंगली दोष लगता है.इस दोष के कारण पति पत्नी के सम्बन्ध में प्रेम व सामंजस्य का अभाव होता है.धन की कमी के कारण पारिवारिक जीवन में परेशानियां आती हैं.व्यक्ति में काम की भावना प्रबल रहती है.अगर ग्रहों का शुभ प्रभाव नहीं हो तो व्यक्ति में चारित्रिक दोष भी हो सकता है..भावावेश में आकर जीवनसाथी को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं.इनमें गुप्त रोग व रक्त सम्बन्धी दोष की भी संभावना रहती है.

जानें और कब तक रहेंगे आपके बुरे दिन?—एस्ट्रो वास्तु

राशियां और ग्रह हमारे जीवन को पूरी तरह से प्रभावित करते है। यदि आपकी कुंडली में कोई ग्रह अशुभ फल देने वाला है तो वह अपनी वर्तमान स्थिति के अनुसार जब तक उस राशि में रहेगा तब तक आपको परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। उसी तरह शुभ ग्रह अच्छा फल प्रदान करते हैं।

जानिए… कौन सा ग्रह, एक राशि में कितने समय तक रहता है और कब तक आपके जीवन को प्रभावित करता है।

जो ग्रह आपकी राशि में रहता है उसी के अनुसार आपको फल प्राप्त होते हैं। अत: ग्रह स्थिति के अनुसार विशेष पूजा-अर्चना करनी चाहिए।

सूर्य- अगर आपकी कुंडली में सूर्य अशुभ है तो आपको सूर्य की वर्तमान स्थिति के अनुसार एक माह तक उसका फल मिलेगा।

चंद्र- किसी राशि वाले के लिए यह ग्रह अशुभ होने पर कुछ समय के लिए ही बुरा फल देता है। यानी सवा दो दिन ।

मंगल- एक राशि पर डेढ़ माह तक रहता है इसलिए इसका बुरा फल 45 दिन तक ही रहता है।

बुध- यह ग्रह एक राशि पर 30 तक ही अपना अच्छा या बुरा फल देता है।

गुरु- एक राशि पर गुरु का प्रभाव 12 महीने तक रहता है।

शुक्र- यह ग्रह एक राशि पर 27 दिन तक रहता है। इसलिए इसका शुभ अशुभ प्रभाव 27 दिन तक ही रहता है।

शनि- एक राशि पर शनि का शुभ-अशुभ प्रभाव ढाई साल तक रहता है।

राहु और केतु एक राशि पर डेढ़ साल तक अपना प्रभाव देते हैं। ये दोनो छाया ग्रह है इसलिए इनका शुभ अशुभ प्रभाव बदलता रहता है।

लाल किताब मे चन्द्रमा—एस्ट्रो वास्तु
चन्द्रमा शुभ ग्रह है.यह शीतल और सौम्य प्रकृति धारण करता है.ज्योतिषशास्त्र में इसे स्त्री ग्रह के रूप में स्थान दिया गया है.यह वनस्पति, यज्ञ एवं व्रत का स्वामी ग्रह है.
लाल किताब में सूर्य के समान चन्द्रमा को भी प्रभावशाली और महत्वपूर्ण माना गया है (Moon is considered as important as Sun in Lal Kitab) . टेवे में अपनी स्थिति एवं युति एवं ग्रहों की दृष्टि के अनुसार यह शुभ और मंदा फल देता है.

लाल किताब में खाना नम्बर चार को चन्द्रमा का घर कहा गया है (The fourth house is considered the house of Moon in Lal Kitab).चन्द्रमा सूर्य और बुध के साथ मित्रपूर्ण सम्बन्ध रखता है.मंगल, गुरू, शुक्र, शनि एवं राहु के साथ चन्द्रमा शत्रुता रखता है.केतु के साथ यह समभाव रखता है.मिथुन और कर्क राशि में यह उच्च होता है एवं वृश्चिक में नीच.सोमवार चन्द्रमा का दिन होता है.लाल किताब के टेवे में 1, 2, 3, 4, 5, 7 एवं 9 नम्बर खाने में चन्द्रमा श्रेष्ठ (Moon is exalted) होता है जबकि 6,7, 10, 11 एवं 12 नम्बर खाने में मंदा होता है.

उच्च राशि के साथ सप्तम खाने में चन्द्रमा होने से धन एवं जीवन के सम्बन्ध में उत्तम फल मिलता है.कुण्डली में चतुर्थ भाव यानी चन्द्र का पक्का घर अगर खाली हो और इस पर उच्च ग्रहों की दृष्टि भी न हो और अन्य ग्रह अशुभ स्थिति में हों तब भी चन्द्रमा व्यक्ति को अशुभ स्थितियों से बचाता और शुभता प्रदान करता है.

लाल किताब के सिद्धान्त के अनुसार जब चन्द्रमा पर शुक्र, बुध, शनि, राहु केतु की दृष्टि होती है तो मंदा फल होता है (When Venus, Mercury, Saturn, Rahu or Ketu aspects Moon then it is debilitated) जबकि इसके विपरीत चन्द्र की दृष्टि इन ग्रहों पर होने से ग्रहों के मंदे फल में कमी आती है और शुभ फल मिलता है.चन्द्र के घर का स्थायी ग्रह शत्रु होने पर भी मंदा फल नहीं देता है.ज्योतिष की इस विधा में कहा गया है कि चन्द्रमा अगर टेवे में किसी शत्रु ग्रह के साथ हो तब दोनों नीच के हो जाते हैं जिससे चन्द्रमा का शुभ फल नहीं मिलता है.लाल किताब में खाना नम्बर 1, 4, 7 और 10 को बंद मुट्ठी का घर कहा गया है.इन घरो में स्थित ग्रह अपनी दशा में व्यक्ति को अपनी वस्तुओं से सम्बन्धित लाभ प्रदान करते हैं.

शरीर का बायां अंग, बायीं आंख, स्त्रियों में मासिक धर्म, रक्त संचार इन पर चन्द्र का प्रभाव रहता है.मन, दया की भावना, आकांक्षाएं चन्द्रमा द्वारा संचालित होते हैं.जिनके टेवे में चन्द्रमा मंदा या कमज़ोर होता है उनमें दया की भावना का अभाव होता है (If Moon is weak, a person may lack empathy).ये दूसरों की उन्नति देखकर उदास होते हैं.मन में अहंकार की भावना रहती है.इनकी माता को एवं स्वयं को कष्ट उठाना पड़ता है.पैतृक सम्पत्ति को संभालकर नहीं रख पाता है.जिस स्त्री के टेवे में चन्द्रमा कमज़ोर होता है उन्हें मासिक चक्र में परेशानी होती है.

लाल किताब में मंदे चन्द्र की पहचान: (How to recognise debilitated Moon as per Lal Kitab)
लाल किताब कहता है चन्द्रमा जब मन्दा होता है तब नल, कुआं, तालाब का जल सूख जाता है.संवेदनशीलता एवं हृदय में भावनाओं की कमी हो जाती है.

लल किताब चन्द्र का उपचार: (Remedies of Moon from Lal Kitab)
लाल किताब में टेवे के पत्येक खाने में चन्द्रमा की शुभता एवं उपचार हेतु उपाय बताए गये हैं.टेवे में खाना संख्या एक में चन्द्रमा के लिए बुजुर्ग स्त्री की सेवा करनी चाहिए एवं उनसे आशीर्वाद लेना चाहिए.वट वृक्ष की जड़ को जल से सींचन करना चाहिए.खाना नम्बर दो में चन्द्रमा के उपचार हेतु 40 से 43 दिनों तक कन्याओं को हरे रंग का कपड़ा देना चाहिए.टेवे में खाना नम्बर 3 में चन्द्रमा मंदा होने पर गेहूं और गुड़ का दान करना चाहिए.चतुर्थ भाव में चन्द्रमा समान्यत: अशुभ नहीं होता है फिर भी चन्द्र की शुभता के लिए चन्द्र की वस्तु जैसे चावल, दूध, दही, मोती, सफेद वस्त्र घर में रखना चाहिए, यह लाभप्रद होता है.लाल किताब कहता है चन्द्रमा पंचम भाव में मंदा होने पर बुध की वस्तुएं जैसे हरे रंग का कपड़ा, पन्ना घर में नहीं रखना चाहिए इससे परेशानी बढ़ती है.छठे भाव में चन्द्रमा की शुभता के लिए रात्रि के समय दूध का सेवन नहीं करना चाहिए.दूध से बने पदार्थ का सेवन किया जा सकता है.

सप्तम भाव में चन्द्रमा होने पर इसकी शुभता के लिए ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे माता को कष्ट हो.अष्टम में बड़ों का आशीर्वाद एवं चरणस्पर्श लाभप्रद होता है.नवम में मंगल की वस्तुएं जैसे लाल वस्त्र, मसूर की दाल, शहद का दान करना चाहिए.खाना नम्बर दस में चन्द्रमा मंदा होने पर चन्द्र की वस्तु घर में रखना लाभप्रद होता है.केले के वृक्ष में जल देने से भी लाभ मिलता है.एकादश में चन्द्र मंदा होने पर बुध की वस्तुएं जैसे मूंग की दाल, हरे रंग का कपड़ा व पन्ना घर में नहीं लाना चाहिए.द्वादश भाव में चन्द्रमा की उपस्थिति से मंदा फल प्राप्त होने पर बड़ों का आशीर्वाद ग्रहण करना चाहिए.चांदी के बर्तन में दूध पीने से चन्द्रमा शुभ रहता है.

स्ट्रेस कम करने के लिए ऊँ का जप ही क्यों ?
आज की जिन्दगी भागदौड़ से भरी है। इसीलिए मानसिक तनाव होना एक आम बात है। मानसिक तनाव से छुटकारा पाने के लिए योगा व मेडिटेशन के साथ ऊँ का जप करने की सलाह दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि मानसिक तनाव से राहत पाने का यह सबसे कारगर तरीका है। मानसिक तनाव ऊँ के उच्चारण के कई सारे फायदे हैं। ऊँ की ध्वनि मानव शरीर के लिये प्रतिकुल डेसीबल की सभी ध्वनियों को वातावरण से निष्प्रभावी बना देती है।विभिन्न ग्रहों से आने वाली अत्यंत घातक अल्ट्रावायलेट किरणों का प्रभाव ओम की ध्वनि की गुंज से समाप्त हो जाता है।

मतलब बिना किसी विशेष उपाय के भी सिर्फ ओम् के जप से भी अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव को कम किया जा सकता है। ऊँ का उच्चारण करने वाले के शरीर का विद्युत प्रवाह आदर्श स्तर पर पहुंच जाता है। इसके उच्चारण से इंसान को वाक्सिद्धि प्राप्त होती है। नींद गहरी आने लगती है। साथ ही अनिद्रा की बीमारी से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाता है।मन शांत होने के साथ ही दिमाग तनाव मुक्त हो जाता है।
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..फिर आपका हर काम फायदेमंद होगा——-

हर कोई चाहता है उसको कर्म के परिणाम मिले और वह भी लाभ की शक्ल में। हानि उठाने को कोई भी तैयार नहीं है। जो लोग कर्म और उसके परिणाम के प्रति बहुत आग्रहशील हैं उन्हें अपने तन और मन की गति को संतुलित और नियंत्रित करना पड़ेगा। फकीरों ने कहा है-

मन चलतां तन भी चलै, ताते मन को घेर।
तन मन दोऊ बसि करै, होय राई सुमेर।।

मन से ही तन प्रभावित होता है। जब मन किसी विषय से आकर्षित होकर सक्रिय होता है, तो यह तन भी चलायमान हो जाता है। इसलिए सदैव मन को वश में करना चाहिए। यदि तन और मन दोनों को वश में कर लिया जाए तो इस थोड़े से समय में होने वाले संयम-साधना का परिणाम-लाभ सुमेरु पर्वत के समान पाया जा सकता है। मन को साधने के लिए यूं तो अनेक तरीके हैं, लेकिन तीन तरीके थोड़े आसान हैं-पहला सत्संग किया जाए। इससे मन को शुभ समय मिलता है। दूसरा गुरु कृपा हो जाए। गुरु मंत्र की ताकत भी मन को नियंत्रित करने में मददगार होती है और तीसरा है थोड़ा योग किया जाए। मन के लिए कहा गया है-

पहिले यह मन काग था, करता जीवन घात।
अब तो मन हंसा भया, मोती चुनि-चुनि खात।।

पहले अज्ञान दशा में यह मन कौवे की भांति था। इसका खान-पान, बोल-चाल तथा रंग-ढंग आदि सब अशुभ था। यह हिंसक था, इसीलिए जीवों को घात करता था। परन्तु अब सत्संगति तथा सद्गुरु के ज्ञानोपदेश से मन हंस की भांति हो गया है। अत: सहज-सरल तथा विवेकी भाव से दुर्गुणों को छोड़कर सद्गुण-ज्ञान रूपी मोतियों को ही चुन-चुनकर खाता है। इसलिए मन पर काम किया जाए और मन का भोजन है सांस। जितनी गहरी सांस लेंगे और उसे अपनी चेतना से जोड़ेंगे उतना मन नियंत्रित होता जाएगा और संसार में मोतियों के परिणाम मिलेंगे।

सूर्य को बनाएं बली—-एस्ट्रो वास्तु

सूर्य अगर मंदा हो तो जीवन में रोजी रोजगार के क्षेत्र में कठिनाईयों का सामना करना होता है. राजकीय पक्ष से सहायता नहीं मिल पाती है. इस स्थिति में जिनकी कुण्डली में सूर्य मंदा हो उसे लाल किताब के अनुसार सूर्य को जगाना चाहिए।

प्रथम भाव में सूर्य ( Placement of Sun in the First House)
लाल किताब के अनुसार ग्रह को जगाने का अर्थ है उसे शुभ फलदायी बनाना. अगर सूर्य मंदा हो तो उसे शुभ फलदायी बनाने के लिए 24 वर्ष के बाद शादी करनी चाहिए. व्यक्ति को अपने मान मर्यादा का ख्याल रखना चाहिए किसी के आगे व्यर्थ नहीं झुकना चाहिए. इस खाने में स्थित सूर्य के मन्दे फल से बचाव के लिए व्यवहार एवं चरित्र का भी ख्याल रखना चाहिए.
द्वितीय भाव में सूर्य (Placement of Sun in the Second House)
सूर्य द्वितीय भाव में मंदा हो तो मंदे प्रभाव से बचाव हेतु कुटुम्बीजनों से आशीर्वाद लेना चाहिए. व्यक्ति को दूसरे का धन नहीं लेना चाहिए. अगर उपहार में भी धन प्राप्त हो तो उससे भी परहेज रखना चाहिए. इस भाव में सूर्य वाले व्यक्ति के लिए लालच हानिकारक होता है.
तृतीय भाव में सूर्य (Placement of Sun in the Third House)
लाल किताब की कुण्डली मे सूर्य तीसरे घर में अशुभ होकर बैठा हो तो चारित्रिक दुर्बलताओं से स्वयं को बचाकर रखना चाहिए. रविवार के दिन तांबे का पात्र मन्दिर में दान करने से सूर्य का मन्दा फल दूर होता है. रविवार के दिन चांदी का चौकोर टुकड़ा धारण करने से भी सूर्य नेक होता है.

चतुर्थ भाव में सूर्य (Placement of Sun in the Fourth House)
सूर्य अगर चौथे खाने में अशुभ होकर बैठा हो तो व्यक्ति को अपना मन शांत रखना चाहिए. कलह और विवाद में उलझना हानिप्रद होता है. बुजुर्गों का अशीर्वाद लेना चाहिए. किसी भी व्यक्ति को कष्ट अथवा नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए अन्यथा सूर्य का फल और भी मंदा हो जाता है. लोहे और मशीनरी के काम में लाभ की संभावना नहीं रहती, बल्कि व्यक्ति को नुकसान होता है अत: इन वस्तुओं के कारोबार से बचना चाहिए.

पांचवे भाव में सूर्य (Placement of Sun in the Fifth House)
पांचवें भाव में मंदे सूर्य को नेक बनाने के लिए घर में पूर्व और उत्तर दिशा में रोशनदान रखना चाहिए. सूर्य का शुभ फल प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को दसरों की सहायता के लिए आगे आना चाहिए. जिद्द और हठी होना इस भाव में मंदे सूर्य को और भी मंदा करता है अत: इनसे बचना चाहिए.
छठे भाव में सूर्य ( Placement of Sun in the Sixth House)
छठे भाव में सूर्य मंदा होने पर सूर्य के मंदे प्रभाव को दूर करने के लिए रात्रि के समय दूध डालकर अग्नि को बुझाना चाहिए.बन्दर को गुड़ खिलाने से भी छठे भाव में सूर्य का मंदा फल प्रभावी नहीं होता है. घर में नदी का जल रखने से सूर्य का शुभ फल प्राप्त होता है. चीटियों को चीनी डालने से सूर्य का मंदा प्रभाव नहीं प्राप्त होता है.
सातवें भाव में सूर्य (Placement of Sun in the Seventh House)
सूर्य सातवें घर में मंदा होकर बैठा हो तो चांदी का चौकोर टुकड़ा ज़मीन में दबाने से मंदा फल दूर होता है.इस भाव में मंदे सूर्य को नेक बनाने के लिए आदित्य हृदयस्तोत्र एवं हरिवंश पुरण का पाठा करना चाहिए. सींग वाली गाय की सेवा करनी चाहिए. बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए.
आठवें भाव में सूर्य ( Placement of Sun in the Eighth House)
अगर सूर्य आठवें घर में मदा होकर अशुभ फल दे रहा हो तो इसे नेक बनाने के लिए बरसात का पानी जमा करके घर के पूर्व दिशा में रखना चाहिए. किसी कार्य को शुरू करने से पहले मीठी वस्तुओं का सेवन करना चाहिए. किसी भी काम में असामाजिक और अनैतिक आचरण वाले लोगों की सहायता नहीं लेनी चाहिए.
नवम भाव में सूर्य ( Placement of Sun in the Ninth House)
सूर्य अगर नवम खाने में मंदा हो तो मनोकामना पूर्ति के लिए भूमि पर सोना चाहिए. सूर्य के मंदे प्रभाव से बचाव हेतु घर में टूटे फूटे बर्तनो को नहीं रखना चाहिए. (घर के बड़े और आदरणीय व्यक्तियों से आशीर्वाद लेना चाहिए. अपने स्वभाव को सामान्य रखना चाहिए न तो अधिक क्रोध करना चाहिए और न ही अधिक शांत होना चाहिए.
दशम भाव में सूर्य ( Placement of Sun in the Tenth House)
दसवें घर में बैठा सूर्य अगर मंदा फल दे रहा हो तो सूर्य का शुभ फल प्राप्त करने के लिए 43 दिनो तक तांबे का सिक्का नदी मे प्रवाहित करना चाहिए. आदित्य हृदय स्तोत्र और हरिवंश पुराण का पाठ शुभ फलदायी होता है. सूर्य को नियमित जल देने से भी इस भाव मे स्थित सूर्य का मंदा फल दूर होता है.
एकादश भाव में सूर्य ( Placement of Sun in the Eleventh House)
सूर्य एकादश भाव में अशुभ हो तो लाल किताब के अनुसार इसे नेक बनाने के लिए व्यक्ति को मांस मदिरा के सेवन से परहेज रखना चाहिए. कल पूर्जे वाले सामान, मशीन आदि खराब हो गए हों तो उसे ठीक करा लेना चाहिए अन्यथा घर में नहीं रखना चाहिए इससे भी सूर्य मंदा फल देता है. सूर्य मंदा होने पर घर में काला पत्थर रखना भी अशुभ फल देता है.
द्वादश भाव में सूर्य ( Placement of Sun in the Twelfth House)
खाना नम्बर 12 में सूर्य मंदा हो तो नेक प्रभाव पाने के लिए नदी में कच्चा जल प्रवाहित करना चाहिए. मंदे सूर्य से नेक फल पाना हो तो 43 दिनों तक नदी में गुड़ प्रवाहित करना चाहिए. 24 वर्ष के बाद विवाह करना से एवं तीन माला गायत्री मंत्र का जप करना भी मंदे सूर्य के मंदे फल को दूर करने में सहायक होता है.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

बच्चों की समस्याओं के टोटके—–

बच्चों की समस्याओं के टोटके—–

इस संसार में शायद ही कोई बच्चा होगे जिसे कभी कोई समस्या न आती हो|कभी बच्चे को नज़र लगती है,कभी पेट में दर्द होता है,कभी दूध हज़म नहीं होता| यहाँ पर कुछ उपाय जा रहें हैं उनका प्रयोग आप बिना किसी भय के कर सकते हैं|

दूध न पचने पर:-
किसी बच्चे का यदि दूध न पचता हो अथवा वह माँ का दूध पीते ही उलटी कर देती तो आप शनिवार को सवा सो ग्राम कच्चा दूध लेकर बच्चे के ऊपर से सात बार उसार कर वह दूध किसी काले कुत्ते को पिला दें |

बच्चे को अँधेरे में भय लगता हो:-

बच्चे को यदि अँधेरे में भय लगता हो अथवा कहीं अकेले में जाने मैं घबराता हो तो आप शुक्लपक्ष के मंगलवार को श्री हनुमान चालीसा की छोटी से छोटी पुस्तक की व्यवस्था कर पुस्तक को हनुमान जी को अर्पित कर उनके दायें कंधे के सिन्दूर से तिलक कर बच्चे को सामने बिठा कर उस पुस्तक में से श्री हनुमान चालीसा का पाठ ११ बार करें|उस पुस्तक को छोटा रूप देकर किसी ताम्बे के तावीज़ में रख कर बच्चे को धारण करवा दें|भय दूर होगा|

नज़र जल्दी लगती हो :-
किसी बच्चे को जल्दी जल्दी नज़र लगती हो तो आप मंगलवार को बच्चे को सामने बिठा कर श्री हनुमान बाहुक का ५ बार पाठ करें|प्रत्येक पाठ क्ले बाद आप उस पर फूंक मारे|एक ताम्बे का कड़ा ले कर प्रभु के चरणों से अर्पित कर उसके हाथ में धारण करवा दें|

नींद में मूत्र त्याग :-
-आपका बच्चा यदि सोते समय में मूत्र त्याग करता है तो शमशान से थोड़ी सी मिटटी ला कर चांदी के पात्र में रख कर बच्चे के हाथ से पीपल के नीचे दबा दें|बच्चा सोते समय मूत्र करना त्याग देगा|

बच्चे अचानक डर जातें हैं:-
कई बच्चे ऐसे होते हैं जो सोते समय अचानक डर जातें हैं अर्थात सोते हुए भय से हिल जाते हैं ऐसे बच्चों के लिए सिरहाने मोर पंख रख देना चाहिए|इस से बच्चा डरना बंद कर देता है|

बच्चा ज्यादा शेतानी करता हो :-
कोई बच्चा यदि शेतानी करता है उसके गले में चांदी का चन्द्र में मूनस्टोन वह मोती जडवा दें बच्चा शेतानी करना बंद कर देगा|

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

लाल किताब के टोटके……..

सुबह उठ कर सबसे पहले घर की मालकिन अगर एक लोटा पानी घर के मुख्य द्वार पर डालती है तो घर में लक्ष्मी देवी के आने का रास्ता खुल जाता हैं।

अगर आप चाहते हैं की घर में सुख शान्ति बनी रहे तो हर एक अमावास के दिन घर की अच्छी तरह सफाई करके (बेकार सामान घर में न रखें) कच्ची लस्सी का छिट्टा देकर ५ अगरबत्ती जलाइए।

महीने में २ बार किसी भी दिन घर में उपला जलाकर लोबान व गूगल की धुनी देने से घर में उपरी हवा का बचाव रहता हैं तथा बीमारी दूर होती है।

आपके घर में अगर अग्नि कोण में पानी की टंकी रखी हो तो घर में कर्जा व बीमारी कभी समाप्त नही होती है इससे बचने के लिए इस कोने में एक लाल बल्ब लगा दें जो हर वक्त जलता रहे।

नमक को कभी भी खुला न रखें।

घर में सुख-शान्ति न हो तो पीपल पर सरसों के तेल का दीया जलाना और जला कर काले माह (उड़द ) के तीन दाने दीये में डालना चाहिए, ऐसा तीन शनिवार शाम को करें।

दुर्घटना या सर्जरी का भय हो तो तांबें के बर्तन में गुड़ हनुमान जी के मन्दिर में देने से बचाव होता है और अगर सरसों के तेल का दीया वहीं जलाये और वहीं बैठ कर हनुमान चालीसा पढ़े और हलवा चढाये तो काफ़ी बचाव होता है, ऐसा चार मंगलवार रात्रि करें।

बहन भाईओं से कोई समस्या हो तो सवा किलो गुड़ जमीन में दबाने से समझौता होता है, ऐसा मंगलवार को करें।

बच्चों की पढ़ाई के लिए सवा मीटर पीले कपडें में २ किलो चने की दाल बांधकर लक्ष्मी-नारायण जी के मन्दिर में चढाये, ऐसा पाँच शाम वीरवार को करें।

कमर, गर्दन में तकलीफ रहती हो तो दोनों पैरों के अंगूठे में काला सफ़ेद धागा बांधें।

घर में पैसा रखने वाली अलमारी का मुंह उत्तर की तरफ़ रखे, ऐसा करने से घर में लक्ष्मी बदती है।

किसी भी रोज़ संध्याकाल में गाय को कच्चा ढूढ़ मिटटी के किसी बर्तन में भरकर बाएँ हाथ से नज़र लगे बच्चे के सर से सात बार उतारकर चौराहे पर रख आयें या किसी कुत्ते को पिला दे, नज़र दोष दूर हो जायेगा।

घर के किसी भी कार्य के लिए निकलते समय पहले विपरीत दिशा में ४ पग जावें, इसके बाद कार्य पर चले जाएँ, कार्य जरूर बनेगा।

परिवार में सुख-शान्ति और सम्रद्धि के लिए प्रतिदिन प्रथम रोटी के चार बराबर भाग करें, एक गाय को, दूसरा काले कुत्ते को, तीसरा कौए को और चौथा चौराहे पर रख दें।

हल्दी की ७ साबुत गाठें ७ गुड़ की डलियाँ, एक रूपये का सिक्का किसी पीले कपड़े में वीरवार को बांधकर रेलवे लाईन के पार फेंक दें, फेंकते समय अपनी कामना बोलें, इच्छा पूर्ण होने की सम्भावना हो जायेगी।

घर में सुख-शान्ति के लिए मिट्टी का लाल रंग का बन्दर, जिसके हाथ खुले हो, घर में सूर्य की तरफ़ पीठ करके रखें, ऐसा रविवार को करें।

चांदी के बर्तन में केसर घोल कर माथे पर टीका लगाना, सुख-शान्ति सम्रद्धि और प्रसद्धि देता है, यह प्रयोग वीरवार को करें।

शादी न हो रही हो या पढ़ाई में दिक्कत हो तो पीले फूलों के दो हार लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में चढाये, आपका काम जरूर होगा, यह प्रयोग वीरवार शाम को करें।

कंजकों को बुधवार के दिन साबुत बादाम, जो मन्दिर के बाहर बैठीं हों, देना चाहिए इससे घर की बीमारी दूर होती है।

अगर किसी को अपनी नौकरी में तबादले या स्थानांतर को लेकर कोई समस्या है तो ताम्बे की गडवी/ लोटे में लाल मिर्ची के बीज डालकर सूर्य को चढाने से समस्या दूर होती है। सूर्य को यह जल लगातार २१ दिनों तक चढाये।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

सुखी दाम्पत्य जीवन के टोटके…

सुखी दाम्पत्य जीवन के टोटके……

यहाँ कुछ ऐसे सरल टोटके बताये जा रहे हैं जिन्हें अपना कर अपने दांपत्य जीवन को सुखी बनाया जा सकता है|

जिन महिलायों के पति अधिक शराब का सेवन करते हैं तथा अपनी आय का अधिक हिस्सा शराब पर लुटातें हैं,उनके लिए यह सब से सरल उपाय है|जिस दिन आपके पति शराब पीकर घर आयें और अपने जूते और उनका जूता अपने आप ही उल्टा हो जाये तो आप उस जूते के वजन के बराबर आटा लेकर उसकी बिना तवे तथा चकले की मदद से रोटी बनाकर कुत्ते को खिला दें|कुछ ही समय में वह शराब से घृणा करने लगेंगे|यदि ऐसा संजोग लगातार कम से कम तीन दिन हो जाये तो वह तुरंत ही शराब छोड़ देंगे|

शराब छुड़ाने का एक उपाए यह भी है की आप किसी भी रविवार को एक शराब की उस ब्रांड की बोतल लायें जो ब्रांड आपके पति सेवन करते हैं|रविवार को उस बोतल को किसी भी भैरव मंदिर पर अर्पित करें तथा पुन: कुछ रूपए देकर मंदिर के पुजारी से वह बोतल वापिस घर ले आयें|जब आपके पति सो रहें हो अथवा शराब के नशे में चूर होकर मदहोश हों तो आप उस पूरी बोतल को अपने पति के ऊपर से उसारते हुए २१ बार “ॐ नमः भैरवाय”का जाप करें|उसारे के बाद उस बोतल को शाम को किसी भी पीपल के वृक्ष के नीचे छोड़ आयें|कुछ ही दिनों में आप चमत्कार देखेंगी|

कुत्ते का नाख़ून अथवा बिच्छु का डंक आप किसी भी बी हने से ताबीज में पति को धारण करवा दें|इसके प्रभाव से वो अन्य महिला का साथ छोड़ देंगे|

शराब छुडवाने का एक यह भी उपाय है की आप एक शराब की बोतल किसी शनिवार को पति के सो जाने के बाद उन पर से २१ बार वार लें|उस बोतल के साथ किसी अन्य बोतल में आठ सो ग्राम सरसों का तेल लेकर आपस में मिला लें और किसी बहते हुए पानी के किनारे में उल्टा गाढ़ दें जिससे बोतलों के ऊपर से जल बहता रहे|

आपको यदि शक हो की आपके पति के किसी अन्य महिला से सम्बन्ध हैं तो आप इसके लिए रात में थोडा कपूर अवश्य जलाया करें इससे यदि सम्बन्ध होंगे तो छूट जायेंगे|

रविवार की रात में सोते समय कुछ सिन्दूर बिस्तर पर पति के सोने वाले हिस्से की और बिखरा दें तथा प्रात: नहा कर माँ पार्वती का नाम लेकर उससे अपनी मांग भर लें|

जिस महिला से आपके पति का संपर्क है उसके नाम के अक्षर के बराबर मखाने लेकर प्रत्येक मखाने पर उसके नाम का अक्षर लिख दें|उस औरत से पति का छुटकारा पाने की ईशवर से प्रार्थना करते हुए उन सारे मखानो को जला दें तथा किसी भी प्रकार से उसकी काली भभूत को पति के पैर के नीचे आने की व्यवस्था करें|

किसी के पति यदि अधिक क्लेश करते हैं तो वह स्त्री सोमवार से यह उपाय आरम्भ करे |प्रथम सोमवार को अशोक वृक्ष के पास जाकर धुप-दीप से अर्चना कर अपनी समस्या का निवेदन कर जल अर्पित करें|सात पत्ते तोड़कर अपने घर के पूजास्थल में रख कर उनकी पूजा करें|अगले सोमवार को पुन:यह क्रिया दोहराएँ तथा सूखे पत्तों को मंदिर तथा बहते जल में प्रवाहित कर दें|

यदि पति पत्नी का आपस में बिना बात के झगड़ा होता है और झगडे का कोई कारण भी नही होता तो अपने शयनकक्ष में पति अपने तकिये के नीचे लाल सिन्दूर रखे व पत्नी अपने तकिये के नीचे कपूर रखे|प्रात: पति आधा सिन्दूर घर में ही कहीं गिरा दें और आधे से पत्नी की मांग भर दें तथा पत्नी कपूर जला दे|
पति-पत्नी के क्लेश के लिए पत्नी बुधवार को तीन घंटे का मोंन रखें|शुक्रवार को अपने हाथ से साबूदाने की खीर में मिश्री दाल कर खिलाएं तथा इतर दान करें व अपने कक्ष में भी रखें|इस प्रयोग से प्रेम में वृद्धि होती है|

कनेर के पुष्प को पानी मैं घिसकर अथवा तथा पीसकर उस से पति के माथे पर तिलक करें .यह भी अन्य महिला से सम्बन्ध समाप्त करने का अच्छा उपाय है .
जब आपको लगे की आपके पति किसी महिला के पास से आरहें हैं तो आप किसी भी बहाने से अपने पति का आंतरिक वस्त्र लेकर उसमे आग लगा दें और राख को किसी चौराहे पर फैंक कर पैरों से रगड़ कर वापिस आजाएं.

होली जलते समय तीन अभिमंत्रित गोमती चक्र लेकर उस महिला का नाम लेकर थोडा सिन्दूर लगाकर होली की अग्नि में फैंक दें|पति का उस महिला से पीछा छूट जायेगा|

किसी अन्य महिला के पीछे आपके पति यदि आपका अपमान करते हैं तो किसी भी गुरूवार को तीन सो ग्राम बेसन के लड्डू ,आटेके दो पेड़े,तीन केले व इतनी ही चने की गीली दाल लेकर किसी गाय को खिलाये जो अपने बछड़े को दूध पिला रही हो|उसे खिला कर यह निवेदन करें की हे माँ,मैंने आपके बच्चे को फल दिया आप मेरे बच्चे को फल देना|कुछ ही दिन में आपके पति रस्ते में आ जायेंगे|

गुरूवार को केले पर हल्दी लगाकर गुरु के १०८ नामों के उच्चारण से भी पति की मनोवृति बदलती है|

केले के वृक्ष के साथ यदि पीपल के वृक्ष की भी सेवा कर सकें तो फल और भी जल्दी प्राप्त होता है|

गृह क्लेश दूर करने के लिए तथा आर्थिक लाभ के लिए गेँहू शनिवार को पिसवाना चाहिए|उसमे प्रति दस किलो गेँहू पर सो ग्राम काले चने डालने चाहिए|

यदि किसी महिला अथवा किसी अन्य कारण से आपको लग रहा है की आपका परिवार टूट रहा है अथवा तलाक तक की हालत पैदा हो गयी हैं तो ऐसे परिस्थिति से बचाव के लिए किसी शिव मंदिर में श्रावण मास में आप किसी विद्वान ब्राह्मण से ग्यारह दिन तक लगातार ‘रुद्राष्टध्यायी’ जिसे म्हारुदरी यग भी कहते हैं ,से अभिषेक करवाएं|

यदि स्त्री को श्वेत प्रदर ,मासिक धर्म में अनियमितता अथवा इसके होने पर कमर दर्द हो तो वह पीपल की जटाको गुरूवार की दोपहर में काट कर छाया में सुखा लें|जब जटा अच्छी तरह से सुख जाये तो उसे पीस कर २०० ग्राम दही में १० ग्राम जटा का चूर्ण का नियमित सात दिन तक सेवन करे तथा रात में सोते समय त्रिफला चूर्ण भी सादा जल से ले|सात दिन में इस समस्या से मुक्ति मिल जाएगी
|
यदि किसी स्त्री का समय से पहले अर्थात ४२ वर्षायु से पहले ही मासिक रुक जाये तो उस स्त्री को पुन:मासिक धर्म आरम्भ करने के लिए इन्द्रायन की जड़ का योनी पर धुआं देने से लाभ प्राप्त होता है|

यदि किसी स्त्री अथवा कन्या को मासिक से पहले पेट में बहुत दर्द होता है,तो उसे रात में सोते समय मूंज की रस्सी से पेट बाँध लें,प्रात: उस रस्सी को किसी चौराहे पर फैंक देने से लाभ होता है.

यदि किसी स्त्री को मासिक धर्म के समय कमर में दर्द हो तो वह मासिक आरम्भ होने से तीन दिन पहले पीपल की जड़ वह पीपल की सुखी शाखा को काले कपडे में लपेट कर अपने तकिये के नीच रख लें.

यदि किसी महिला को पेट मैं किसी कारण से अधिक दर्द रहता है तो वह मंगलवार से अपने सिरहाने किसी ताम्बे के लोटे में जल रखे और प्रति उठाने खाली पेट उस जल का सेवन करें .इस प्रकार से हर प्रकार के पेट दर्द का निवारण हो जायेगा .

प्रसूता के पेट पर यदि केसर का लेप किया जाये तो भी प्रसव आसानी से हो जाता है .

प्रसव काल से कुछ ही समय पहले यदि प्रसूता को १०० ग्राम गोमूत्र पिलाया जाये तो प्रसव आसानी से हो जाता है .

विवाहित महिला को अपने परिवार की सलामती के लिए ही माँ दुर्गा चालीसा के साथ माँ के १०८ नाम अथवा ३२ नाम की माला का जाप करना चाहिए .

कभी किसी महिला को दान करने की इच्छा हो तो दान सामग्री में लाल सिन्दूर के साथ इतर की शीशी ,चने की दाल तथा केसर अवश्य रखें .इस से सुहाग की आयु में वृद्धि होती है.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

What is accurate predictions….?? Sunit P Mehta— Vedic Astrologer…

1. while making predictions, what weight shud be given to Vimshottri dashas, esp, PD, SD, PD. (which come after seeing MD-AD).
in my opinion, ‘a lot’.
2. why the Chandra gochar also should be checked
3. why Vimsottari dasha system is not enough.
If we make a percentage chart of all the systems to be checked what are those?
Eg. Vim. dasha – 60%, transits 25%, divisional charts 10%………
Thank u!

Vedic Astrologer:
1) Vimsottari (120yrs) Dasa is the best to use in Kali Yuga. Mahadasa shows the theme of the Period. Antardasa shows the area of Focus and Pratyantar shows the Event. Sookshma and Prana Dasa, one should not really consider. Even a 1 minute time difference will change it by a few days and will thus defeat the purpose of these smaller dasas. 90% of Charts do not havean accurate birth time by the minute. The Doctor’s Job is to ‘deliver’ the child safely for both the baby and the mother, NOT to note down the exact time for Jyotish Purposes. Besides, would he write down the time when he:

a) Cuts the Umbilical Cord
b) Baby emerges from the Mother
c) Hears the Baby Cry
d) Lets the Umbilicus dry naturally till it falls off on its own.

Do you think that all doctors follow a common one out of the above 4, NO! These factors would cause a minimum of +/- 10 to 15 Minutes presuming the Doctor is aware of actually noting down the time and not guessing the time when he fills it in for the ‘hospital records’ Why do we assume that all birth times are correct, they are NOT!!

2) Gochara is seen from the Moon to see the effect of circumstances on a person’s mind. From the Lagna, to see all events. Arudha Lagna – related to Maya or reality and Surya Lagna – to judge a person’s vitality and confidence. Out of all of these Chandra Lagna is the most important. Eg If Mars is 5th lord in a person’s chart. If Mars is in 8th in Transit, it cause problems with childbirth of the person’s child or problems with his emotions, intelligence and 5th House Siginificances.

3) Vimsottari dasa is not enough because it will not focus on every impending circumstance. Narayana Dasa is for showing sustenance and all outer circumstances. Lagna Kendradi Rasi Dasa shows fructification of Yogas and all kinds of prosperity. Sudasa is the main dasa to check for a Native’s Wealth and Prosperity. It shows the movement of the Sri Lagna across the Rasis. Shoola Dasa for health issues and Death. Ashottari and Charadasa may also be used. Day time births in Krishna Paksha and Night time Births in Shukla Paksha:- Ashottari (108) Year Dasa should be used for more accuracy than Vimsottari Dasa. Conditional Dasas are used in certain conditions:- 1st lord in 7th or 7th in 1st – Dwi Saptati Sama Dasa (72 year) could show more accuracy than Vimosattari Dasa. This is ‘especially’ important if Rahu is in a Quadrant or Kendra from Lagna. There is no Criteria of giving weightage to Dasas, Transits or Divisional Charts. A specific malefic Transit will give take more precedence in a person’s life at times. Eg. Asthama Sani, Rahu over Moon etc than when in a good Vimsottari Dasa Period could totally deny the effects of a Raja Yoga Planet Dasa. The astrologer has to be intuitive to use different aspects of Chart Interpretation. There is also Badhakesh, Rasi Dristi, Ashtakvarga, Nakshatras, Argalas, Different lagnas. How can you judge a Transit or a Dasa without using Ashtakvarga, Nakshatras, Transits, Shodasvargas etc. Example when you judge a Mahadasa, don’t just see its Position from the Lagna and Chandra, see which Nakshatra it is posited in, understand the meaning, the symbol, the deity of the Nakshatra. See where the Lord is Posited. If Rahu is in Hasta Nakshatra in the 8th and Moon is in the 12th, Rahu Mahadasa in the 8th will also give you the effect of Moon in the 12th House. Why? Moon Rules Hasta. One should also use the Panchanga System.

Tithi – Its lord – Relationship, its position from Venus.
Karana – Energy of the Native, Focus of Work, Karma
Vareshwara (Lord of the Day) – Health of the Native
Nakshatra – Of Chandra, Lagna to see all aspects using their Lord’s position

Use all these rules carefully and wisely to make accurate predictions.

तेरे छूने से सहरा हो गया गुलज़ार चुटकी में
ख़ुशी से झूम उट्ठा ये दिले-बीमार चुटकी में
भरोसा क्या करें तुझ पर तेरी फ़ितरत कुछ ऐसी है
कभी इनकार चुटकी में कभी इक़रार चुटकी में
मुसीबत में मदद माँगी जो अपनों से तो सब के सब
रफ़ू-चक्कर हुए पकड़ी ग़ज़ब रफ़्तार चुटकी में
जो बदक़िस्मत थे उनकी कश्तियाँ साहिल पे डूबी थीं
जो किस्मत के धनी थे हो गये वो पार चुटकी में
है सिक्कों की खनक में बात कुछ ऐसी कि इसने तो
किया रिश्तों को कैसे देखिये बाज़ार चुटकी में
हमारा ज़िक्र जब छेड़ा किसी ने उसकी महफ़िल में
हुए हैं सुर्ख़ तब उसके लबो-रुख़सार चुटकी में
मिले गैरों से हँस-हँस कर तू मेरा जी जलाने को
मज़ा इस बात का लेते हैं मेरे यार चुटकी में
जुआख़ाना है इक बाज़ार सट्टेबाज़ है दुनिया
किसी की जीत चुटकी में किसी की हार चुटकी में
मेरे मौला, मेरे साईं, मेरे दाता मेरी सुन ले
ग़रीबों दर्द-मंदों का तू कर उद्वार चुटकी में
‘नसीम’ उनका था नाम उस्ताद मिर्ज़ा दाग़ थे उनके
उन्होंने ही कहे चुटकी पे थे अशआर चुटकी में
सियासी लोग हैं इनकी ‘ख़याल’ अपनी सियासत है
कभी इनकार चुटकी में कभी इक़रार चुटकी मे

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

हमको याद करो——

हमको याद करो——

अपनी बिज़ी जिंदगी से..
थोडा खुद को आजाद करो…
उठाओ अपना मोबाईल..
और हमको याद करो…
पूछ लिया करो कभी -कभी…
आप हमारी भी अहमियत…
हमने माना हे आपको दोस्त…
आप भी हमें दो …..
फ्रेन्ड सी अहमियत….
दो लफ्ज/ अल्फ़ाज अपनेपन के….
बड़ा सहारा देते हे…
ये अल्फाज़ ही तो…..
अंधेरों में भी उजियारा देते हे…..
### दयानंद “बन्धु “

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

National Conference on Removal of Confusions from Vaastu—-

National Conference on Removal of Confusions from Vaastu

Dear Friends,
Jai Hind,

Society of Vaastu Science proposes to hold a one day National Vaastu Conference from 10 AM onwards on 22 May (Sunday) at the Constitution Club, Rafi Marg, New Delhi. The aim is to remove the aberrations & anomalies from the prevalent Vaastu. The modus operandi would be to invite Vaastu Consultants from all over the country and request them to answer the under mentioned questions in understandable scientific terms:-

1. Why did ancient Temples remained intact while newly constructed Buildings collapsed during the Bhuj Earth Quake in Gujrat?
2. Why the water cement ratio in Concrete mix should be religiously maintained and kept minimum?
3. Why the length of a plot should not exceed twice its width?
4. Is breathing of building materials necessary for good Vaastu?
5. Should we take formaldehyde and PVC as Vaastu Friendly? If not, then why?
6. Is it safe to use granite stone in Residential Buildings?
7. Should we avoid human activity under a deep beam or stair case, and if so,why?
8. Can an idol of Shri Ganesh at the entrance make a difference in our happiness and prosperity? And if so. Under what conditions?
9. Can demolition be an answer to Vaastu Remedy?
10. How does cosmic energy affects our life, from where does it come, what is its magnitude and can it be stored? Why it is different from sun Energy?
11. What is the relevance of Pyramids; are the Pyramid models effective and if so under what conditions?
12. Are two windows better than an entrance door in the North East i.e. Ishaan Kuan?
13. Why should the slope of a building be towards North as per Vaastu?
14. Wearing of silver and golden ornaments was a good omen and beneficial to our health in the past but is it beneficial today? If not, why?
15. Why should we sleep with our heads towards South as per Vaastu?
16. Can smell, touch, look and taste could be used as Vaastu corrections?
17. Why did our Rishi – Munees climb to Himalayas for meditation?
18. Can the filtration between the infra red rays and ultra violets rays be defined as Vaastu Science? If yes, Why?
19. Why do we leave open space and keep water bodies in front of North facing Houses? Is this tenet applicable to South facing plots?
20. Why should we have kitchen in the South East? Is it applicable to Kerela and Uttar Kashi also? If not, why?
21. Is our mother earth negatively charged? If so, to what tune? Does it remain constant?
22. What importance you assign to curing and cover to the reinforcement in building construction and how it affects Vaastu?
23. Why should we not have houses in the immediate vicinity of the Temples? Is this principle applicable for very old Temples also? If Not, Why?
24. Can stress removal be connected to Temperature Reversal or Anulom Vilom? How can this principle be applied to Buildings?

The participation fee in the aforesaid historic and eye opening Vaastu Conference is Rs 1000/- ( One Thousand only) which may be remitted to the General Secretary through Cheque or Bank Draft in the name of Society of Vaastu Science (PNB, Ambedkar Road, Ghaziabad S/F A/C No-3948000100430130) at 133 B, Model Town East, Ghaziabad, UP, 201009.

Those who wish to air their views are requested to send their write up in Hindi or English with a self photo on the e-mail tptyagi@gmail.com in MS Word latest by 30 April 2011. Decision of the Selection Committee will be final. At the end of the Conference, a common minimum standard of the principles of Vaastu Consultations would be released to the print and electronic media. Vaastu is an Engineering subject and hence you are requested to depute your representatives from the Technical and Management Departments, in particular.

Society of Vaastu Science is a Registered National Organisation comprising renowned Vaastu Consultants, Engineers, Architects, Doctors and other Dignitaries. A brief write up about the Society of Vaastu Science bringing out its aims and objectives, membership, philosophy and modus operandi for consultations is attached for your kind perusal.

Shri Deepak Bharadwaj, CMD, Nitish Kunj Hotel Complex, Delhi and CMD of Deep Ganga Apartments, Haridwar will be requested to Preside over the National Vaastu Conference.

(Col Tejandra Pal Tyagi, Vir Chakra) ( Er Vinod Sharma)
B Sc, B E (Civil), M Tech (Structures) Railway Engineer
0120-2717031

Notes:-
1. Catering for the already booked participation, we are now left with only 173 seats. We will honestly go by first come first served basis.
2. Registered Head Office – 133 B, Model Town East, Ghaziabad, Phone- 0120-2717031
3. Corporate Head Office- Nitish Kunj Hotel Complex, 22nd Milestone, NH-8, Near Shiv Murty, Smalkha, New Delhi-110037

Posted by: vastushastri08 | मार्च 29, 2011

अरे जीतेगा क्या जीत गया…

अरे जीतेगा क्या जीत गया….लाखो दिलो की धड़कन …आखिरकार ….”भारत ” सेमीफाईनल में …जीत ही गया….पाकिस्तान को हराकर…अब तो मुम्बई के वानखेड़े स्टेडियम में होगा श्रीलंका से फाईनल में मुकाबला….२अप्रेल ,२०११..रविवार को……मेरे अनुमान से पहले खेलने वाली टीम…६ विकेट पर २६० रन के आसपास स्कोर करेगी…… क्या लगता हे आपको….कल क्या होगा..???? कल बिना किसी अनुरोध/ निवेदन और दबाव के “भारत-बंद ” या कर्फ्यू जेसी स्तिथि नहो रहेगी- कल दोपहर में …२ बजे से…रात्रि १० बजे तक..??

Posted by: vastushastri08 | मार्च 30, 2011

हिन्दू पंचांग—

हिन्दू पंचांग—

हिन्दू पंचांग हिन्दू समाज द्वारा माने जाने वाला कैलेंडर है। इसके भिन्न-भिन्न रूप मे यह लगभग पूरे भारत मे माना जाता है। पंचांग नाम पांच प्रमुख भागो से बने होने के कारण है, यह है: पक्ष, तिथी, वार, योग और कर्ण। एक साल मे १२ महीने होते है। हर महिने मे १५ दिन के दो पक्ष होते है, शुक्ल और कृष्ण।पंचांग (पंच + अंग = पांच अंग) हिन्दू काल-गणना की रीति से निर्मित पारम्परिक कैलेण्डर या कालदर्शक को कहते हैं। पंचांग नाम पाँच प्रमुख भागों से बने होने के कारण है, यह है- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इसकी गणना के आधार पर हिंदू पंचांग की तीन धाराएँ हैं- पहली चंद्र आधारित, दूसरी नक्षत्र आधारित और तीसरी सूर्य आधारित कैलेंडर पद्धति। भिन्न-भिन्न रूप में यह पूरे भारत में माना जाता है।

एक साल में १२ महीने होते हैं। प्रत्येक महीने में १५ दिन के दो पक्ष होते हैं- शुक्ल और कृष्ण। प्रत्येक साल में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में २७ नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं।१२ मास का एक वर्ष और ७ दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पैर रखा जाता है। यह १२ राशियाँ बारह सौर मास हैं। जिस दिन सूर्य जिस राशि मे प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र मे होता है उसी आधार पैर महीनो का नामकरण हुआ है। चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से ११ दिन ३ घड़ी ४८ पल छोटा है। इसीलिए हर ३ वर्ष मे इसमे एक महीना जोड़ दिया जाता है जिसे अधिक मास कहते हैं।

तिथि—

एक दिन को तिथि कहा गया है जो पंचांग के आधार पर उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे तक की होती है। चंद्र मास में ३० तिथियाँ होती हैं, जो दो पक्षों में बँटी हैं। शुक्ल पक्ष में एक से चौदह और फिर पूर्णिमा आती है। पूर्णिमा सहित कुल मिलाकर पंद्रह तिथि। कृष्ण पक्ष में एक से चौदह और फिर अमावस्या आती है। अमावस्या सहित पंद्रह तिथि।

तिथियों के नाम निम्न हैं- पूर्णिमा (पूरनमासी), प्रतिपदा (पड़वा), द्वितीया (दूज), तृतीया (तीज), चतुर्थी (चौथ), पंचमी (पंचमी), षष्ठी (छठ), सप्तमी (सातम), अष्टमी (आठम), नवमी (नौमी), दशमी (दसम), एकादशी (ग्यारस), द्वादशी (बारस), त्रयोदशी (तेरस), चतुर्दशी (चौदस) और अमावस्या (अमावस)।

वार—

एक सप्ताह में सात दिन होते हैं:- रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार।

नक्षत्र—-

आकाश में तारामंडल के विभिन्न रूपों में दिखाई देने वाले आकार को नक्षत्र कहते हैं। मूलत: नक्षत्र 27 माने गए हैं। ज्योतिषियों द्वारा एक अन्य अभिजित नक्षत्र भी माना जाता है। चंद्रमा उक्त सत्ताईस नक्षत्रों में भ्रमण करता है। नक्षत्रों के नाम नीचे चंद्रमास में दिए गए हैं-

योग—

योग 27 प्रकार के होते हैं। सूर्य-चंद्र की विशेष दूरियों की स्थितियों को योग कहते हैं। दूरियों के आधार पर बनने वाले 27 योगों के नाम क्रमश: इस प्रकार हैं:- विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यातीपात, वरीयान, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इन्द्र और वैधृति।

27 योगों में से कुल 9 योगों को अशुभ माना जाता है तथा सभी प्रकार के शुभ कामों में इनसे बचने की सलाह दी गई है। ये अशुभ योग हैं: विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ और वैधृति।

करण—

एक तिथि में दो करण होते हैं- एक पूर्वार्ध में तथा एक उत्तरार्ध में। कुल 11 करण होते हैं- बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (14) के उत्तरार्ध में शकुनि, अमावस्या के पूर्वार्ध में चतुष्पाद, अमावस्या के उत्तरार्ध में नाग और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के पूर्वार्ध में किस्तुघ्न करण होता है। विष्टि करण को भद्रा कहते हैं। भद्रा में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं।

पक्ष—-

प्रत्येक महीने में तीस दिन होते हैं। तीस दिनों को चंद्रमा की कलाओं के घटने और बढ़ने के आधार पर दो पक्षों यानी शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में विभाजित किया गया है। एक पक्ष में लगभग पंद्रह दिन या दो सप्ताह होते हैं। एक सप्ताह में सात दिन होते हैं। शुक्ल पक्ष में चंद्र की कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्ण पक्ष में घटती हैं।

महीनों के नाम—–

इन बारह मासों के नाम आकाशमण्डल के नक्षत्रों में से १२ नक्षत्रों के नामों पर रखे गये हैं। जिस मास जो नक्षत्र आकाश में प्राय: रात्रि के आरम्भ से अन्त तक दिखाई देता है या कह सकते हैं कि जिस मास की पूर्णमासी को चन्द्रमा जिसनक्षत्र में होता है, उसी के नाम पर उस मास का नाम रखा गया है। चित्रा नक्षत्र के नाम पर चैत्र मास (मार्च-अप्रैल), विशाखा नक्षत्र के नाम पर वैशाख मास (अप्रैल-मई), ज्येष्ठा नक्षत्र के नाम पर ज्येष्ठ मास (मई-जून), आषाढ़ा नक्षत्र के नाम पर आषाढ़ मास (जून-जुलाई), श्रवण नक्षत्र के नाम पर श्रावण मास (जुलाई-अगस्त), भाद्रपद (भाद्रा) नक्षत्र के नाम पर भाद्रपद मास (अगस्त-सितम्बर), अश्विनी के नाम पर आश्विन मास (सितम्बर-अक्तूबर), कृत्तिका के नाम पर कार्तिक मास (अक्तूबर-नवम्बर), मृगशीर्ष के नाम पर मार्गशीर्ष (नवम्बर-दिसम्बर), पुष्य के नाम पर पौष (दिसम्बर-जनवरी), मघा के नाम पर माघ (जनवरी-फरवरी) तथा फाल्गुनी नक्षत्र के नाम पर फाल्गुन मास (फरवरी-मार्च) का नामकरण हुआ है।

महीनों के नाम – पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा इस नक्षत्र होता है—–
चैत्र – चित्रा , स्वाति
बैशाख – विशाखा , अनुराधा
ज्येष्ठ – ज्येष्ठा , मूल
आषाढ़ – पूर्वाषाढ़ , उत्तराषाढ़
श्रावण – श्रवण , धनिष्ठा, शतभिषा
भाद्रपद – पूर्वभाद्र , उत्तरभाद्र
आश्विन – रेवती , अश्विन , भरणी
कार्तिक – कृतिका , रोहणी
मार्गशीर्ष – मृगशिरा , आर्द्रा
पौष – पुनवर्सु ,पुष्य
माघ – अश्लेशा, मघा
फाल्गुन – पूर्व फाल्गुन , उत्तर फाल्गुन , हस्त

सौरमास—–

सौरमास का आरम्भ सूर्य की संक्रांति से होता है। सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति का समय सौरमास कहलाता है। यह मास प्राय: तीस, इकतीस दिन का होता है। कभी-कभी अट्ठाईस और उन्तीस दिन का भी होता है। मूलत: सौरमास (सौर-वर्ष) 365 दिन का होता है।

12 राशियों को बारह सौरमास माना जाता है। जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है। इस राशि प्रवेश से ही सौरमास का नया महीना ‍शुरू माना गया है। सौर-वर्ष के दो भाग हैं- उत्तरायण छह माह का और दक्षिणायन भी छह मास का। जब सूर्य उत्तरायण होता है तब हिंदू धर्म अनुसार यह तीर्थ यात्रा व उत्सवों का समय होता है। पुराणों अनुसार अश्विन, कार्तिक मास में तीर्थ का महत्व बताया गया है। उत्तरायण के समय पौष-माघ मास चल रहा होता है।

मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण होता है जबकि सूर्य धनु से मकर राशि में प्रवेश करता है। सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है तब सूर्य दक्षिणायन होता है। दक्षिणायन व्रतों का और उपवास का समय होता है जबकि चंद्रमास अनुसार अषाढ़ या श्रावण मास चल रहा होता है। व्रत से रोग और शोक मिटते हैं।दक्षिणायन में विवाह और उपनयन आदि संस्कार वर्जित है,जब कि अग्रहायण मास में ये सब किया जा सकता है अगर सूर्य वृश्चिक राशि में हो।और उत्तरायण सौर मासों में मीन मास मै विवाह वर्जित है।

सौरमास के नाम : मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्‍चिक, धनु, कुंभ, मकर, मीन।

चंद्रमास—-

चंद्रमा की कला की घट-बढ़ वाले दो पक्षों (कृष्‍ण और शुक्ल) का जो एक मास होता है वही चंद्रमास कहलाता है। यह दो प्रकार का शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होकर अमावस्या को पूर्ण होने वाला ‘अमांत’ मास मुख्‍य चंद्रमास है। कृष्‍ण प्रतिपदा से ‘पूर्णिमात’ पूरा होने वाला गौण चंद्रमास है। यह तिथि की घट-बढ़ के अनुसार 29, 30 व 28 एवं 27 दिनों का भी होता है।

पूर्णिमा के दिन, चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। सौर-वर्ष से 11 दिन 3 घटी 48 पल छोटा है चंद्र-वर्ष इसीलिए हर 3 वर्ष में इसमें 1 महीना जोड़ दिया जाता है।

सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है। इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है। फिर भी ऐसे बड़े हुए दिनों को ‘मलमास’ या ‘अधिमास’ कहते हैं।

चंद्रमास के नाम : —-चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, अषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, अगहन, पौष, माघ और फाल्गुन।

नक्षत्रमास—-

आकाश में स्थित तारा-समूह को नक्षत्र कहते हैं। साधारणतः यह चंद्रमा के पथ से जुडे हैं। ऋग्वेद में एक स्थान पर सूर्य को भी नक्षत्र कहा गया है। अन्य नक्षत्रों में सप्तर्षि और अगस्त्य हैं। नक्षत्र से ज्योतिषीय गणना करना वेदांग ज्योतिष का अंग है। नक्षत्र हमारे आकाश मंडल के मील के पत्थरों की तरह हैं जिससे आकाश की व्यापकता का पता चलता है। वैसे नक्षत्र तो 88 हैं किंतु चंद्र पथ पर 27 ही माने गए हैं।

चंद्रमा अश्‍विनी से लेकर रेवती तक के नक्षत्र में विचरण करता है वह काल नक्षत्रमास कहलाता है। यह लगभग 27 दिनों का होता है इसीलिए 27 दिनों का एक नक्षत्रमास कहलाता है।

महीनों के नाम पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र में रहता है:—–

चैत्र : चित्रा, स्वाति।
वैशाख : विशाखा, अनुराधा।
ज्येष्ठ : ज्येष्ठा, मूल।
आषाढ़ : पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, सतभिषा।
श्रावण : श्रवण, धनिष्ठा।
भाद्रपद : पूर्वभाद्र, उत्तरभाद्र।
आश्विन : अश्विन, रेवती, भरणी।
कार्तिक : कृतिका, रोहणी।
मार्गशीर्ष : मृगशिरा, उत्तरा।
पौष : पुनर्वसु, पुष्य।
माघ : मघा, अश्लेशा।
फाल्गुन : पूर्वाफाल्गुन, उत्तराफाल्गुन, हस्त।

नक्षत्रों के गृह स्वामी—-

केतु : अश्विन, मघा, मूल।
शुक्र : भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़।
रवि : कार्तिक, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़।
चंद्र : रोहिणी, हस्त, श्रवण।
मंगल : मॄगशिरा, चित्रा, श्रविष्ठा।
राहु : आद्रा, स्वाति, शतभिषा ।
बृहस्पति : पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वभाद्रपदा।
शनि . पुष्य, अनुराधा, उत्तरभाद्रपदा।
बुध : अश्लेशा, ज्येष्ठा, रेवती।

ज्योतिष : क्या और क्यों? – राजेंद्र प्रसाद द्विवेदी

आकाश की तरफ नजर डालते ही दिमाग में सवाल पैदा होता है कि ग्रह-नक्षत्र क्या होते हैं? इनमें से कुछ दिन में और कुछ रात में क्यों छुप जाते हैं? सारे ग्रह एक साथ डूब क्यों नहीं जाते? सूरज, प्रतिदिन पूर्व दिशा से ही क्यों उगता है?

इन्हीं सवालों की वजह से आदमी ने आकाश के ग्रह-तारों को देखना-परखना-समझना शुरू किया। धीरे-धीरे ग्रहों-नक्षत्रों की चाल आदमी की समझ में आने लगी। वह अपने आस-पास की घटनाओं को ग्रहों-नक्षत्रों की गतिविधियों से जोड़ने लगा और इस तरह एक शास्त्र ही बन गया, जिसे आज हम ज्योतिष कहते हैं। ज्योतिष शास्त्र की प्रामाणिक परिभाषा वेदो में है।

‘ज्योतिषां सूर्यादि ग्रहाणां बोधकं शास्त्र्‌म’ इसका मतलब यह हुआ कि ग्रह (ग्रह, नक्षत्र, धूमकेतु आदि) और समय का ज्ञान कराने वाले विज्ञान को ज्योतिष अर्थात ज्योति प्रदान करने वाला विज्ञान कहते हैं। एक तरह से यह रास्ता बतलाने वाला शास्त्र है। जिस शास्त्र से संसार का ज्ञान, जीवन-मरण का रहस्य और जीवन के सुख-दुःख के संबंध में ज्योति दिखाई दे वही ज्योतिष शास्त्र है। इस अर्थ में वह खगोल से ज्यादा अध्यात्म और दर्शनशास्त्र के करीब बैठता है।

ऐसा माना जाता है कि ज्योतिष का उदय भारत में हुआ, क्योंकि भारतीय ज्योतिष शास्त्र की पृष्ठभूमि 8000 वर्षों से अधिक पुरानी है। भारतीय ज्योतिष के प्रमुख ज्योतिर्विद और उनके द्वारा लिखे गए खास-खास ग्रंथ-
1. पाराशर मुनि वृहद पाराशर, होरा शास्त्र
2. वराह मिहिर वृहद संहिता, वृहत्जातक, लघुजातक
3. भास्कराचार्य सिद्धांत शिरोमणि
4. श्रीधर जातक तिलक

ज्योतिष शास्त्र के कुछ और जाने-माने ग्रंथ इस प्रकार हैं-
1. सूर्य सिद्धांत
2. लघु पाराशरी
3. फल दीपिका
4. जातक पारिजात
5. मान सागरी
6. भावप्रकाश
7. भावकुतूहल
8. भावार्थ रत्नकारा
9. मुहूर्त चिन्तामणि

भारतीय ज्योतिष की अवधारणा मूल रूप से नौ ग्रहों पर टिकी हुई है। इसमें सात ग्रह मुख्य माने जाते हैं और दो को छाया ग्रह कहते हैं। सूर्य राजा है, चंद्रमा मंत्री, बुध मुंशी, बृहस्पति गुरु, शुक्र पुरोहित, शनि राजपुत्र और छाया ग्रह राहु, चांडाल केतु अछूत है।

जीवन का मुख्य आधार प्रकाश जिस दिन इस धरती पर नहीं होगा, शायद जीवन भी संभव नहीं होगा, इसलिए ज्योतिष शास्त्र में सूर्य ग्रहों का राजा कहलाता है और उसको आधार मानकर समय की गणना की जाती है।

‘एते ग्रहा बलिष्ठाः प्रसूति काले नृणां स्वमूर्तिसमम्‌। कुर्युनेंह नियतं वहवश्च समागता मिश्रम्‌॥’
ऊपर दिए गए श्लोक से जाहिर है कि सभी ग्रहों का प्रकाश और नक्षत्रों का प्रभाव धरती पर रहने वाले सभी जीव-जन्तुओं और चीजों पर पड़ता है। अलग-अलग जगहों पर ग्रहों की रोशनी का कोण अलग-अलग होने की वजह से प्रकाश की तीव्रता में फर्क आ जाता है। समय के साथ इसका असर भी बदलता जाता है। जिस माहौल में जीव रहता है, उसी के अनुरूप उसमें संबंधित तत्व भारी या हल्के होते जाते हैं। हरेक की अपनी विशेषता होती है। जैसे, किसी स्थान विशेष में पैदा होने वाला मनुष्य उस स्थान पर पड़ने वाली ग्रह रश्मियों की विशेषताओं के कारण अन्य स्थान पर उसी समय जन्मे व्यक्ति की अपेक्षा अलग स्वभाव और आकार-प्रकार का होता है।

इस तरह ज्योतिष कोई जादू-टोना या चमत्कार नहीं, बल्कि विज्ञान की ही एक शाखा जैसा है। मोटे तौर पर विज्ञान के अध्ययन को दो भागों में बाँटा जाता है :-
1. भौतिक विज्ञान
2. व्यावहारिक विज्ञान

भौतिक विज्ञान के तहत वैज्ञानिक किसी भी घटना के कारण और उसके परिणामों का अध्ययन कर एक अभिकल्पना बनाते हैं। इसके बाद वे समीकरण पेश करते हैं, जिसकी पुष्टि भौतिक प्रयोग के परिणामों और तथ्यों के जरिए की जाती है। व्यावहारिक विज्ञान में हम कारण और उनके प्रभावों का अध्ययन कर अभिकल्पना बनाते हैं कि कौन से कारण क्या प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं? जैसे, नोबल पुरस्कार विजेता डॉ. अमर्त्य सेन ने अर्थशास्त्र को नया सिद्धांत दिया। इसमें आर्थिक विकास को साक्षरता की दर से जोड़ा गया है। उनका यह सिद्धांत जनगणना से प्राप्त आँकड़ों पर आधारित है। इसी तरह ज्योतिषी भी मनुष्य पर सौरमण्डल के प्रभावों का व्यवस्थित अध्ययन करके एवं इकठ्ठा किए गए आँकड़ों का विश्लेषण करके फलादेश करते हैं।

इस प्रकार ज्योतिष, विज्ञान जैसा ही है, जिसमें मानव जीवन पर ग्रह-नक्षत्रों के प्रभाव का तर्कसम्मत एवं गणितीय आधार पर अध्ययन किया जाता है और उपलब्ध आँकड़ों एवं सूचनाओं के आधार पर मानव विशेष के वर्तमान, भूत एवं भविष्य की जानकारी दी जाती है। यदि ज्योतिष को चमत्कार या अंधविश्वास न मानकर उसे अपने जीवन में सही ढंग से प्रयोग में लाया जाए तो वह बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

जन्म पत्रिका क्यों बनवाएँ? – पं. अशोक पंवार ‘मयंक’

जन्म कुंडली जातक का शरीर है। जिस प्रकार डॉक्टर रोग पहचानकर इलाज करता है, ठीक उसी प्रकार एक कुशल ज्योतिष भी निदान बताने में समर्थ होता है। पीड़ा तो होगी, लेकिन उस पीड़ा का अहसास कम होगा। जन्म कुंडली में विराजमान ग्रहों के चक्कर से कोई नहीं बच सकता। रावण जैसा राजा नीति कुशल, विद्वान, बलशाली और सभी ग्रहों को वशीभूत करने वाला भी शनि की कुदृष्टि से नहीं बच पाया।

राजा हरिशचंद्र को भी ग्रहों ने श्मशान में चौकीदारी करवा दी। राजा नल व दमयंती को भी ग्रहों ने नहीं छोड़ा और चोरी का इल्जाम लगा। भगवान राम को वन-वन भटकना पड़ा। गांडीवधारी अर्जुन को लूट लिया गया। ग्रह किसी को भी नहीं बख्शते। एक ग्वाले को प्रसिद्ध राजा नेपोलियन बोनापार्ट बना दिया। चाहे कोई भी समाज हो, कोई भी धर्म हो ग्रहों की प्रतिकूल स्थिति से कोई नहीं बच सकता।

उदाहरणार्थ यदि किसी की जन्म पत्रिका में यह मालूम है कि इसका किसी ट्रक से एक्सीडेंट होगा, उसे उस ग्रहों को अनुकूल बनाने वाले उपाय करने से टक्कर तो होगी, लेकिन साइकल से होगी। यदि पहले से जाना जाए कि इसका तलाक हो सकता है तो उस तलाक करवाने वाले ग्रहों को अनुकूल बनाकर उसे टाला जा सकता है।

ग्रह कोई भगवान नहीं होते, बल्कि आकाशीय मंडल में पृथ्वी के समान ही हैं। हमारे जन्म के समय उन ग्रहों की रश्मि किस प्रकार पड़ रही है, बस इसी का ज्ञान जन्म पत्रिका से जाना जा सकता है। दशा-अंतरदशा व गोचर स्थिति को जानकर सही-सही भविष्यवाणी की जा सकती है। मनुष्य अपने जीवन में आने वाली कई परेशानियों से बच सकता है। अत: इसी कारण ही जन्म पत्रिका बनवाना चाहिए।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 30, 2011

ज्योतिष संवारे व्यक्तित्व—-

ज्योतिष संवारे व्यक्तित्व—–
ज्योतिष का नाम आते ही जन्मपत्री के 12 भावों में बैठे ग्रह, ज्योतिष की गूढ़ भाषा या हस्तरेखाओं का जाल और उनमें फैली जटिलता ही सामने आती है। और उनसे जुडी होती हैं कुछ भविष्यवाणियाँ …जन्म से लेकर नौकरी,शादी ,प्रमोशन, मोक्ष तक सब कुछ… इन रेखाओं में निहित ग्रहों की स्थिति के अनुसार फलादेश तो किया ही जाता है मगर इनके पीछे छिपे संकेतों को हम शायद ही समझाने का प्रयास करते हैं।

हमारे हाथ या कुण्डली में किसी ग्रह की कमजोरी या मजबूती का सीधा सा अर्थ हमारे व्यक्तित्व की मजबूती या कमजोरी से होता है। जब कुण्डली या हाथ में कोई ग्रह कमजोर होता है यानी सही स्थान में नहीं होता है तो उस ग्रह से सम्बंधित बुराइयां या कमजोरियां हमारे शरीर में, स्वभाव में घर करती जायेंगी और इन्हीं के चलते हमें भाग्य की खराबी या भाग्य में अवरोधों का सामना करना पडेगा। उदाहरण के लिए यदि चन्द्रमा की स्थिति कमजोर है तो व्यक्ति भावनात्मक रूप से कमजोर होगा। निर्णय क्षमता प्रभावित होगी,स्मरण शक्ति कम होती जाएगी… इन सबके चलते व्यक्ति के भाग्य में अवरोध आना तय सा ही है।

तात्पर्य यह है कि भाग्य की कमजोरी का मुख्य कारण हमारे व्यक्तित्व में उस ग्रह विशेष के कारण आई हुई नकारात्मकता ही होती है। अत: ग्रह को सुधारने के लिए हमें ग्रह के कारण हमारे स्वभाव में आ रही कमियों को भी सुधारने का प्रयास करना चाहिए। जब भी कुण्डली या हाथ का अवलोकन कराया जाए या स्वयं देखा जाए तो मुख्य ग्रह और कमजोर ग्रहों की जानकारी लेना चाहिए और उसके अनुसार अपने स्वभाव की, व्यक्तित्व की कमियों को सुधारने का उपाय करना चाहिए। स्व निरीक्षण करना, ध्यान करना और गुरू की सलाह लेना व्यक्तित्व सुधार का अच्छा उपाय हो सकता है ।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 30, 2011

गणपति अथर्वशीर्ष—–

गणपति अथर्वशीर्ष—–
श्री गणेशाय नम: ।। (शान्तिमन्त्रा:)
ॐ भद्रड् कर्णेभि: शृणुयाम देवा: ।
भद्रम् पश्येमाक्षभिर्यजत्रा: ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभि: व्यशेम देवहितं यदायु: ।।
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृध्दश्रवा: ।
स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा: ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽअरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।।
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ।। (अथ अथर्वशीर्षारम्भ: ।)

ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।
त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम्॥१॥
ऋतं वच्मि । सत्यं वच्मि॥२॥
अव त्वं मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानुचानमव शिष्यं।
अव पश्चात्तात्। अव पुरस्तात्।
अवोत्तरात्तात्। अव दक्षिणात्तात्।
अव चोर्ध्वात्तात। अवाधरात्तात।
सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात्॥३॥
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥४॥
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं तत्त्वस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।
त्वं चत्वारि वाक्पदानि॥५॥
त्वं गुणत्रयातीत:। त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मुलाधारस्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मक:।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्तवं
रुद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्॥६॥
गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।
अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋध्दं। एतत्तव मनुस्वरूपं।
गकार: पूर्वरुपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरुपं। बिन्दुरुत्तररुपं।
नाद: संधानं। स हिता संधि:।
सैषा गणेशविद्या:। गणक ऋषि:।
निचृद्वायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नम:॥७॥
एकदंताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात्॥८॥
एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगंधानुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृते: पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:॥९॥
नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नम: प्रमथपतये। नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नम:॥१०॥
फलश्रुति

एतदथर्वशीर्षं योऽधिते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्वत: सुखममेधते।
स सर्वविघ्नैर्नबाध्यते।
स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते॥
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रात: प्रयुंजानो अपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति॥
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्दास्यति।
स पापीयान् भवति।
सहस्त्रावर्तनात् यं यं काममधीते
तं तमनेन साधयेत्॥११॥
अनेन गणपतिमभिषिंचति।
स वाग्मी भवति।
चतुर्थ्यामनश्नन् जपति।
स विद्यावान् भवति।
इत्यथर्वणवाक्यं।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्।
न बिभेति कदाचनेति॥१२॥
यो दूर्वांकुरैर्यजति।
स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लार्जैर्यजति स यशोवान् भवति।
स मेधावान् भवति।
यो मोदकसहस्त्रेण यजति।
स वाञ्छितफलमवाप्नोति।
य: साज्यसमिभ्दिर्यजति।
स सर्वं लभते स सर्वं लभते॥१३॥
अष्टौ ब्राह्मणान् समम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्ता सिध्दमंत्रो भवति।
महाविघ्नात्प्रमुच्यते।
महादोषात्प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति।
य एवं वेद इत्युपनिषद्॥१४॥

Posted by: vastushastri08 | मार्च 30, 2011

श्रीरामरक्षा स्तोत्र—-

श्रीरामरक्षा स्तोत्र

श्रीगणेशाय नमः

श्रीगणेशाय नमः
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमंत्रस्य ।
बुधकौशिकऋषिः ।
श्रीसीतारामचन्द्रो देवता ।
अनुष्टुप् छन्दः । सीता शक्तिः ।
श्रीमद्धनुमान् कीलकम् ।
श्रीरामचंद्रप्रीत्यर्थे जपेविनियोगः ।
अथ ध्यानम् ।
ध्यायेदाजानबाहुं धृतशरधनुषंबद्धपद्मासनस्थम् ।
पीतं वासो वसानंनवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ।
वामाङ्कारुढसीतामुखकमलमिलल्लोचनंनीरदाभं ।
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनंरामचंद्रम् ॥
इति ध्यानम् ।

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥१॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामंराजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्॥२॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम्।
स्वलीलया जगत् त्रातुम् आविर्भूतमजंविभुम् ॥३॥
रामरक्षां पठेत् प्राज्ञः पापघ्नींसर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः॥४॥
कौसल्येयो दृशौ पातुविश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखंसौमित्रिवत्सलः ॥५॥
जिव्हां विद्यानिधिःपातु कण्ठंभरतवन्दितः ।
स्कन्धौ दिव्यायुधःपातु भुजौभग्नेशकार्मुकः ॥६॥
करौ सीतापतिःपातु हृदयंजामदग्न्यजित् ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिंजाम्बवदाश्रयः ॥७॥
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनीहनुमत्प्रभुः ।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत् ॥८॥
जानुनी सेतुकृत् पातु जङ्घेदशमुखान्तकः ।
पादौ बिभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलंवपुः ॥९॥
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृतीपठेत् ।
सचिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयीभवेत् ॥१०॥
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितंरामनामभिः ॥११॥
रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वास्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिंमुक्तिं च विन्दति ॥१२॥
जगज्जेत्रैकमन्त्रेणरामनाम्नाभिरक्षितम् ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था सर्वसिध्दयः ॥१३॥
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्॥१४॥
आदिष्टवान् यथा स्वप्नेरामरक्षामिमां हरः ।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुध्दोबुधकौशिकः ॥१५॥
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामःसकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान् सनः प्रभुः ॥१६॥
तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौचीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौरामलक्ष्मणौ ॥१८॥
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौसर्वधनुष्मताम् ।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नौरघूत्तमौ ॥१९॥
आत्तसज्यधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथिसदैव गच्छताम् ॥२०॥
संनद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन् मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः ॥२१॥
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयोरघुत्तमः ॥२२॥
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशःपुराणपुरुषोत्तमः ।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः॥२३॥
इत्येतानि जपन् नित्यं मद्भक्तःश्रध्दयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति नसंशयः ॥२४॥
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षंपीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न तेसंसारिणो नरः ॥२५॥
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिंसुंदरम्
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिंविप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयंश्यामलं शान्तमूर्तिं
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवंरावणारिम् ॥२६॥
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥२७॥
श्रीराम राम रघुनंदन राम राम
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥
श्रीरामचंद्रचरणौ मनसा स्मरामि
श्रीरामचंद्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचंद्रचरणौ शिरसा नमामि
श्रीरामचंद्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥
माता रामो मत्पिता रामचंद्रः ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्रः ।
सर्वस्वं मे रामचंद्रो दयालुर्नान्यंजाने नैव जाने न जाने ॥३०॥
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तुजनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वंदेरघुनंदनम् ॥३१॥
लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रंरघुवंशनाथम् ।
कारुण्यरुपं करुणाकरं तंश्रीरामचंद्र शरणं प्रपद्ये ॥३२॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेंद्रियंबुध्दिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतंशरणं प्रपद्ये ॥३३॥
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥३४॥
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयोनमाम्यहम् ॥३५॥
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम् ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्॥३६॥
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशंभजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मैनमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्यदासोऽस्महं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राममामुध्दर ॥३७॥
रामरामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनामतत्तुल्यं रामनाम वरानने॥३८॥
इति श्रीबुधकौशिकविरचितंश्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम् ।
॥ श्रीसीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥

Posted by: vastushastri08 | मार्च 30, 2011

हनुमान चालीसा—–

हनुमान चालीसा

श्रीगुरु चरन सरोज रज,
निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु,
जो दायकु फल चारि ।।
बुद्धिहीन तनु जानिके,
सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं,
हरहु कलेस बिकार ।।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ।। १ ।।
राम दूत अतुलित बल धामा ।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा ।। २ ।।
महाबीर बिक्रम बजरंगी ।
कुमति निवार सुमति के संगी ।। ३ ।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुंडल कुंचति केसा ।। ४ ।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।
काँधे मूँज जनेऊ साजै ।। ५ ।।
संकर सुवन केसरीनंदन ।
तेज प्रताप महा जग बंदन ।। ६ ।।
बिद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ।। ७ ।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ।। ८ ।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लंक जरावा ।। ९ ।।
भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचंद्र के काज सँवारे ।। १० ।।
लाय सजीवन लखन जियाये ।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ।। ११ ।।
रघुपति कीन्ही बहुत बडाई ।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ।। १२ ।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं ।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ।। १३ ।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहीसा ।। १४ ।।
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ।। १५ ।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा ।
राम मिलाय राज पद दीन्हा ।। १६ ।।
तुम्हरो मन्त्र बिभीषन माना ।
लंकेस्वर भए सब जग जाना ।। १७ ।।
जुग सहस्र जोजन पर भानू ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ।। १८ ।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं ।। १९ ।।
दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ।। २० ।।
राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ।। २१ ।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना ।
तुम रच्छक काहू को डर ना ।। २२ ।।
आपन तेज सम्हारो आपै ।
तीनों लोक हाँक ते काँपै ।। २३ ।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै ।
महाबीर जब नाम सुनावै ।। २४ ।।
नासै रोग हरै सब पीरा ।
जपत निरंतर हनुमत बीरा ।। २५ ।।
संकट तें हनुमान छुडावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ।। २६ ।।
सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिन के काज सकल तुम साजा ।। २७ ।।
और मनोरथ जो कोइ लावै ।
सोइ अमित जीवन फल पावै ।। २८ ।।
चारों जुग परताप तुम्हारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ।। २९ ।।
साधु संत के तुम रखवारे ।
असुर निकंदन राम दुलारे ।। ३० ।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ।। ३१ ।।
राम रसायन तुम्हरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा ।। ३२ ।।
तुम्हरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ।। ३३ ।।
अंत काल रघुबर पुर जाई ।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई ।। ३४ ।।
और देवता चित्त न धरई ।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ।। ३५ ।।
संकट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ।। ३६ ।।
जै जै जै हनुमान गोसाई ।
कृपा करहु गुरु देव की नाई ।। ३७ ।।
जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बंदि महा सुख होई ।। ३८ ।।
जो यह पढै हनुमानचालीसा ।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ।। ३९ ।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ।। ४० ।।
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ।।

विशेष चौपाइयोंका अर्थ
हनुमानजी कपिरूपमें साक्षात् शिवके अवतार हैं । इसलिए यहां इन्हें कपीश कहा गया है । यहां हनुमानजी की तुलना सागरसे की गई है । सागरकी दो विशेषताएं है । एक तो सागरसे भंडारका तात्पर्य है और दूसरा सभी वस्तुओंकी उसमें परिसमाप्ति होती है । अतः हनुमानजी भी ज्ञानके भंडार हैं और इनमें त्रिगुणोंकी परिसमाप्ति होती है । किसी विशिष्ट व्यक्तिका ही जयजयकार किया जाता है । हनुमानजी ज्ञानियोंमें अग्रगण्य हैं, सकल गुणोंके निधान तथा तीनों लोकोंको प्रकाशित करनेवाले हैं । अतः यहां उनकी जयजयकार की गई है ।। १ ।।
सामुद्रिक शास्त्रके अनुसार वज्र एवं ध्वजाका चिन्ह सर्वसमर्थ महानुभाव एवं सर्वत्र विजयश्री प्राप्त करनेवालेके हाथ होता है और कंधेपर जनेऊ तथा मूंजकी करधनी नैष्ठिक ब्रह्मचारीका प्रतीक है । हनुमानजी इन सभी गुणोंसे संपन्न हैं ।। ५ ।।
हनुमानजी अविद्याके विपरीत साक्षात् विद्यास्वरूप हैं और गुणोंसे अतीत गुणी तथा अत्यंत चतुर हैं । ‘राम काज लगि तव अवतारा’ (जन्म नहीं) के अनुसार आपका अवतार रामकाजके लिए ही हुआ है । ब्रह्मकी दो शक्तियां है – एक स्थित्यात्मक व दूसरी गत्यात्मक । हनुमानजी गत्यात्मक क्रियाशक्ति हैं अर्थात् निरंतर रामकाजमें संनद्ध रहते हैं ।। ७ ।।
हनुमानजीमें अष्टसिद्धियां विराजमान हैं । इसी कारण एक स्थानपर आपने छोटा रूप धारण किया, दूसरे स्थानपर आवश्यकतानुसार बडा रूप धारण किया । सूक्ष्म बुद्धिसे ही ब्रह्म जाना जा सकता है – ‘सूक्ष्मत्वात् विज्ञेयं’ तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारोंके आगार लंकाको विशेष पराक्रम और विकटस्वरूपसे ही भस्मसात् किया जा सकता है ।। ९ ।।
उपमाके द्वारा किसी वस्तुका आंशिक ज्ञान हो सकता है, पूर्णज्ञान नहीं । कवि-कोविद् उपमाका ही आश्रय लिया करते हैं । हनुमानजीकी महिमा अनिर्वचनीय है । अतः वाणीके द्वारा उसका वर्णन संभव नहीं ।। १५ ।।
राजपदपर उसकी ही स्थिति है और उसका ही कंठ सुकंठ है, जिसके कंठपर सदैव श्रीरामनामका वास हो । यह कार्य हनुमानजीकी कृपासे ही संभव है । सुग्रीव बालिके भयसे व्याकुल रहता था और उसका सर्वस्व हरण कर लिया गया था । भगवान् श्रीरामने उसका राज्य उसे वापस दिलवा दिया तथा उसे अभय करा दिया । हनुमानजीने ही सुग्रीवकी मित्रता भगवान् रामसे करवाई ।। १६ ।।
संसारमें रहकर मोक्ष प्राप्त करना ही दुर्गम कार्य है, जो आपकी कृपासे सुलभ है । आपका अनुग्रह न होनेपर सुगम कार्य भी दुर्गम प्रतीत होता है, परंतु सरल साधनसे जीवपर हनुमानजीकी कृपा शीघ्र हो जाती है ।। २० ।।
संसारमें मनुष्यके लिए चार पुरुषार्थ हैं – अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष । भगवानके दरबारमें बडी भीड न हो, इसके लिए भक्तोंके तीन पुरुषार्थको हनुमानजीके द्वारपर ही पूरा कर देते हैं । अंतिम पुरुषार्थ, मोक्षप्राप्तिके अधिकारी हनुमानजीकी अनुमतिसे ही भगवानके दरबार में प्रवेश पाते हैं ।
मुक्तिके ४ प्रकार हैं – सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य व सायुज्य । यहां सालोक्य मुक्तिसे अभिप्राय है ।। २१ ।।

रोगके नाशके लिए बहुतसे साधन एवं औषधियां हैं । यहां रोगसे मुख्य तात्पर्य भवरोगसे है व पीडासे तात्पर्य तीनों तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) से है, जिसका शमन आपके स्मरणमात्रसे होता है ।
हनुमानजीके स्मरणसे आरोग्य तथा निद्र्वंद्वता प्राप्त होती है ।। २५ ।।

जो मनसे सोचते हैं, वही वाणीसे बोलते हैं तथा वही कर्म करते हैं – ऐसे महात्मागणको हनुमानजी संकटसे छुडाते हैं । जो मनमें कुछ सोचते हैं, वाणीसे कुछ दूसरी बात बोलते हैं तथा कर्म कुछ और करते हैं, वे दुरात्मा हैं । वे संकटसे नहीं छूटते ।। २६ ।।
मनुष्यके जीवनमें प्रतिदिन-रात्रिमें चारों युग आते-जाते रहते हैं । इसकी अनुभूति हनुमानजीके द्वारा ही होती है या जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीया – चारों अवस्थामें भी आप ही द्रष्टा रूपसे सदैव उपस्थित रहते हैं ।। २९ ।।
यहां भजनका मुख्य तात्पर्य सेवासे है । सेवा दो प्रकारकी होती है – सकाम व निष्काम । ईश्वरको प्राप्त करनेके लिए निष्काम और निःस्वार्थ सेवा करना आवश्यक है, जो हनुमानजी करते चले आ रहे हैं । अतः श्रीरामकी ऐसी सेवा करनी चाहिए, जैसी हनुमानजीने उनकी की ।। ३३ ।।
भजन या सेवाका परम फल है हरिभक्तिकी प्राप्ति । यदि भक्तको पुनः जन्म लेना पडा, तो अवध आदि तीर्थों में जन्म लेकर प्रभुका परम भक्त बन जाता है ।। ३४ ।।
जन्म मरण-यातनाका अंत अर्थात् भवबंधनसे छुटकारा परमात्म प्रभु ही करा सकते हैं । भगवान हनुमानजीके वशमें हैं । अतः हनुमानजी संपूर्ण संकट और पीडाओंको दूर करते हुए जन्म-मरणके बंधनसे मुक्त करानेमें पूर्ण समर्थ हैं ।। ३६ ।।
गुरुदेव जैसे शिष्यकी धृष्टता आदिका ध्यान नहीं रखते और उसके कल्याणमें ही लगे रहते हैं (जैसे काकभुशुंडिके गुरु), उसी प्रकार आप भी मेरे ऊपर गुरुदेवकी ही भांति कृपा करें ।। ३७ ।।
भक्तके हृदयमें भगवान रहते ही हैं । इसलिए भक्तको हृदयमें विराजमान करनेपर प्रभु स्वयं विराजमान हो जाते हैं । हनुमानजी भगवान रामके परमभक्त हैं । उनसे अंतमें यह प्रार्थना की गई है, कि प्रभुके साथ मेरे हृदयमें आप विराजमान हों ।
बिना श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीताजीके हनुमानजीका स्थायी निवास संभव नहीं है । इन चारोंको हृदयमें बैठाने का तात्पर्य चारों पदार्थोंको एक साथ प्राप्त करनेका है । चारों पदार्थोंसे तात्पर्य ज्ञान (राम), विवेक (लक्ष्मण), शांति (सीताजी) एवं सत्संग (हनुमानजी) से
है ।
सत्संगके द्वारा ही विवेक, ज्ञान एवं शांतिकी प्राप्ति होती है । यहां हनुमानजी सत्संगके प्रतीक है । अतः हनुमानजीकी आराधनासे सबकुछ प्राप्त हो सकता है ।

संकटनाशन स्तोत्र – नारद पुराण—–

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्
भक्तावासं स्मरेनित्यम आयुष्कामार्थ सिध्दये ॥१॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्
तृतीयं कृष्णपिङगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम ॥२॥
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धुम्रवर्णं तथाषष्टम ॥३॥
नवमं भालचंद्रं च दशमं तु विनायकम्
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम ॥४॥
द्वादशेतानि नामानि त्रिसंध्यं य: पठेन्नर:
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिध्दीकर प्रभो ॥५॥
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम ॥६॥
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षडभिर्मासे फलं लभेत्
संवत्सरेण सिध्दीं च लभते नात्र संशय: ॥७॥
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा य: समर्पयेत
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत: ॥८॥

March 30, 2011: Wednesday, Krishna Ekadasi till 10:22,
Dhanishtha till 5:30*, Sadhya yoga (whole day),
Balava karana till 10:22, Kaulava karana till 23:29,
RahuK: 12:19* – 13:49*, GulikaK: 10:49* – 12:19*, YamaG: 7:49* – 9:19*,
Sunrise at 6:17*, Sunset at 18:34,
Moonrise at 4:23*, Moonset at 15:04, Moon in Makar till 16:06
———————————————————————————————————-
30 मार्च, 2011: बुधवार, 10:22 तक एकादसी कृष्णा,
, दिन Dhanishtha तक 5:30 *, Sadhya योग (पूरी)
जब तक 10:22 करण Balava, जब तक 23:29 करण Kaulava,
RahuK: * 12:19-13:49 *, GulikaK: 10:49 * – 0:19 *, YamaG: 7:49 * – 9:19 *,
18:34 पर सूर्योदय पर 6:17 सूर्यास्त, *,
* 04:23 Moonrise पर, 15:04 पर Moonset, 16:06 तक मकर में चंद्रमा
————————————————————————————————————
30 मार्च, 2011– दैनिक राशिफल—

राशि फलादेश मेष–
महत्वाकांक्षा की पूर्ति हो सकेगी। व्यापारिक गोपनीयता भंग न करें। स्थायी संपत्ति प्राप्ति के योग। कार्यक्षेत्र में आपका महत्व बढ़ेगा।

राशि फलादेश वृष—
नवीन योजनाओं के प्रति उत्साह बढ़ेगा। यात्रा सुखद, सुफलदायक रहेगी। स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही न करें। किसी विशेष कार्य के बन जाने से हर्ष होगा।

राशि फलादेश मिथुन—
व्यापारिक कार्यों से श्रीवृद्धि होगी। स्व-विवेक से कार्य करना लाभप्रद रहेगा। अर्थ संबंधी कार्यों में सफलता मिलने से हर्ष होगा। हस्तक्षेप से बचें।

राशि फलादेश कर्क—-
आर्थिक योग मध्यम रहेगा। नए कार्यों के साथ जुड़ने का योग। व्यापार अच्छा चलेगा। फालतू कामों में समय बर्बाद न करें।

राशि फलादेश सिंह—
आकस्मिक लाभ होगा। निकटजनों की प्रगति से मन में प्रसन्नता रहेगी। सुसंगति से लाभ होगा। परिवार की समस्याओं को अनदेखा न करें। कार्य का विस्तार होगा।

राशि फलादेश कन्या—-
संघर्षपूर्ण वातावरण में काम करना होगा। पारिवारिक जीवन भी सुखद नहीं रहेगा। किसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। कार्य में विलंब की आशंका।

राशि फलादेश तुला—-
अपना कार्य स्वयं कीजिए। महत्वपूर्ण कामों में हस्तक्षेप से नुकसान हो सकता है। परिवार में तनाव रहेगा। आर्थिक स्थिति कष्टकारी होगी। किसी के भरोसे न रहे।

राशि फलादेश वृश्चिक—
मांगलिक आयोजनों में भाग लेंगे। किए गए कार्य फलीभूत होंगे। आर्थिक स्थिति उत्तम रहेगी। निर्णय लेने में विलंब न करें। प्रतिस्पर्धा में सफलता के योग हैं।

राशि फलादेश धनु—
नई योजनाएँ फलीभूत होंगी। कार्य का विस्तार होगा। संतान की मदद मिलने से कार्य पूर्ण होंगे। विद्यार्थी अपनी पढ़ाई पर ध्यान दें।

राशि फलादेश मकर—-
व्यवसाय में उन्नति होगी। जीवनसाथी के स्वास्थ्य की चिंता रहेगी। प्रतिष्ठित व्यक्तियों से मेल-जोल बढ़ेगा। नवीन योजनाओं से लाभ होगा।

राशि फलादेश कुंभ—
धर्म में रुचि बढ़ेगी। नौकरी में पदोन्नति के योग। आपको समाज, परिवार में प्रशंसा मिलेगी। संतान के व्यवहार से कष्ट होगा। आर्थिक स्थिति अच्छी रहेगी।

राशि फलादेश मीन—–
आर्थिक चिंता हल होगी। नया कार्य मिलने की संभावना है। दिनचर्या व्यवस्थित रहेगी। बड़े लोगों से मेलजोल बढ़ेगा। संतान के कार्य बनेंगे।

शुभ विक्रम संवत- 2067, शालिवाहन शक संवत- 1932,
संवत्सर का नाम- शोभन, अयन- उत्तरायन, ऋतु- वसंत,
मास- चैत्र, पक्ष- कृष्ण, तिथि- एकादशी प्रात: 10.22 पश्चात द्वादशी,
हिजरी सन्- 1432, मु. मास- रबिलाखर, तारीख- 24,
नक्षत्र- घनिष्‍ठा मंगलरात्रि 5.31 पश्चात शततारा, योग- साध्य अहोरात्र,
सूर्योदयकालीन करण- कौलव,
चन्द्रमा- मकर राशि से कुंभ राशि में प्रवेश सायं 04.07 मिनट पर करेंगे।
ग्रह योग- पंचक सायं 04.07 मिनट से प्रारंभ होंगे। दिन- शुभ।
दिशाशूल- उत्तर ‍में। मुहूर्त- निवेश का मुहूर्त।
दिन का पर्व- पापमोचनी एकादशी।
कार्य की अनुकूलता के लिए- रस पदार्थ का दान करें।
उपयोगी ज्ञान- भवन के अग्नि कोण (पूर्व-दक्षिण का कोना) में जल रखने से निराशा आती है।
शुभ समय- प्रात: 07.19 से 09.06 दिन 3.20 से 05.16।
सुझाव- आवश्यक न हो तो दिन 12.31 से 2.14 के मध्य शुभ कार्य न करें

वाह वाह…छा गए गुरु…. क्या बात हे….
आज ना तो दीवाली हे और न ही होली….
आज तो १५ अगस्त या २६ जनवरी भी नहीं हे जी…..
फिर सारे भारत वासी दीवाली क्यों मन रहे हे यारों….
सारे भारत वासी एक साथ-एक सुर में —जय हो….जय हो….कर रहे हे जी…..
विश्वगुरु भारत ने आज फिर एक बार वर्ड कप के सेमीफाईनल में अपने चिरप्रतिद्वंदी—-
पाकिस्तान को हराकर पटखनी दे दी हे …..
भारत माता की जय हो…वन्दे मातरम….
#####

दिल का दर्द अभी जारी हे….
आज का दिन/ आने वाला दिन बहुत भारी हे….
दिल का टूटना कोई नयी बात नहीं दोस्तों….
आज पाकिस्तान तो कल श्रीलंका की बरी हे दोस्तों….
गो इंडिया गो…..जय हो ….जय हो…
वन्दे मातरम….भारत माता की जय ….

Posted by: vastushastri08 | मार्च 31, 2011

MY THOUGHT—-

“EVERY ONE WANTS OTHERS TO UNDERSTAND THEIR FEELINGS….
BUT NO ONE WANTS TO UNDERSTAND WHAT OTHERS FEEL……
“!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!……
READ TWICE—-THINK THRICE!!!!!!

Posted by: vastushastri08 | मार्च 31, 2011

सूचनाएं—// INFORMATION—–

सूचनाएं—// INFORMATION—–
##- – आप सभी को नवसंवत्सर की बहुत बहुत हार्दिक शुभ मंगल कामनाएं….
यह नवसंवत आप सभी के लिए वैभव -सुख-सम्रद्धि और सफलता दायक हो ….
(“”विक्रम संवत- 2068 ;;;शक संवत – 1933 ,,,चेत्र माह की एकं, शुक्ल पक्ष और गुडी पड़वा”")-
–विनायक वास्तु टाईम्स परिवार—पंडित दयानंद शास्त्री और सभी शुभ चिन्तक…मित्र तथा प्रशंसक….पुनः बधाई……

##- – यदि हस्त रेखा पर एक अच्छी पुस्तक पढ़ना चाहते हे तो कृपया –
-”हस्त सामुद्रिक शास्त्र ” नामक पुस्तक अवश्य पढ़े -
इसके लेखक हे- श्री श्री राम जोशी, अ-1,
“प्राची “सीओ-आपरेटिव हाऊसिंग सोसायटी,
शाहजी राजे मार्ग, विले परले (पूर्व ) मुम्बई-400057 ;;; मोबाईल नम्बर हे–09869268638 ;;;
फोन नंबर हे .—o22 – 26827643

### – भारतीय वैदिक ज्योतिष संस्थानं, वाराणसी द्वारा
एक “अखिल भारतीय ज्योतिष निर्देशिका ” का प्रकाशन किया जा रा हे….
अंतिम तिथि हे- 31 मई 2011 ;; मूल्य- एक प्रति का रूपये मात्र- चार सो;;;
विज्ञापन शुल्क- सत– सो रूपये और पांच सो रूपये मात्र;;;;;
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें-
भारतीय वैदिक ज्योतिष संस्थानं,
एन-८/ २३६, एन-१ प्रज्ञा नगर कालोनी,
सुन्दरपुर( बी. एच यु. ) वाराणसी-221005 (उत्तर प्रदेश )
मोबाईल नम्बर हे-09889684960 ;;;09889293796 ;;;
इ-मेल- astroguru @ rediffmail .com ;;;
बैंक का नाम- आई सि आई सि आई – एकाउंट नंबर- -31005003897 ;;;;

### – भगवन श्री परशुराम सर्व ब्रह्मण समाज समिति —उदयपुर ( राजस्थान )
द्वारा अक्षय तृतीय ( छह मई , दो हजार ग्यारह )02 -05 -2011 -को प्रथम सर्व ब्रह्मण समाज सामूहिक विवाह सम्मलेन का आयोजन किया जा रहा हे -
आप सभी सदर आमंत्रित हे….अपने परिवार; परिचित या रिश्तेदारी में विवाह योग्य युवक-युवती को भी इस कार्य हेतु जानकारी देवें..
.पंजीयन शुल्क हे- ११०००/- रूपये मात्र ( ग्यारह हजार रूपये मात्र )…
संपर्क करें—मोबाईल नंबर —09001994404 ;;म-09414168305 ;
म- 09414156458 ;;म० -09414158925 ;;म-9413356469 ;;;;
विवाह सम्मलेन स्थल- राजकीय फतह उच्च माध्यमिक विद्यालय , उदयपुर ( राजस्थान )

Posted by: vastushastri08 | मार्च 31, 2011

आप सभी को जानकारी देना चाहता —

प्रिय मित्रो…
आप सभी को जानकारी देना चाहता हु की अब आगे से यानी–
एक अप्रेल 2011 से में रोजाना राशिफल और मुहूर्त नहीं लिख पाउँगा …
सभी जगह पर–आप सभी से आग्रह/ निवेदन की कृपया -
इसके लिए आप सभी मेरे ब्लोग्स पर जाकर/ फोलो करके – शेयर करके -
जानकारी प्राप्त कर सकते हे—-
नए लेख आदि भी पढ़ सकते हे…..
धन्यवाद…प्रतीक्षारत….आपका—
“विनायक वास्तु टाईम्स”–पंडित दयानंद शास्त्री-09024390067—
@@— vinayakvaastutimes.blogspot.com;;
@@—-vinayakvaastutimes.wordpress.com;;;

आज के मुहूर्त –गुरूवार,, 31 मार्च 2011 ::—

शुभ विक्रम संवत- 2067, शालिवाहन शक संवत- 1932,
संवत्सर का नाम- शोभन, अयन- उत्तरायन, ऋतु- वसंत,
मास- चैत्र, पक्ष- कृष्ण, तिथि- द्वादशी प्रात: 12.39 पश्चात त्रयोदशी,
हिजरी सन्- 1432, मु. मास- रबिलाखर, तारीख- 25, नक्षत्र- शततारा अहोरात्र,
योग- साध्य प्रात: 6.54 पश्चात शुभ, सूर्योदयकालीन करण- गरज,
चन्द्रमा- कुंभ राशि में दिवसपर्यंत रहेंगे। ग्रह योग- पंचक जारी।
बुध वक्रीय गति से गमन करेंगे। दिन- मध्यम।
दिशाशूल- दक्षिण ‍में। मुहूर्त- कार्य पूर्ण करने का मुहूर्त।
दिन का पर्व- प्रदोष व्रत, वारूणी योग।
कार्य की अनुकूलता के लिए- सायंकाल किसी देवस्थान में दर्शन-पूजन करें।
उपयोगी ज्ञान- भवन के अग्नि कोण में काला रंग होने से कार्य में बाधाएँ आती हैं।
शुभ समय- प्रात: 09.17 से 11.10 दिन 4.26 से 06.21।
सुझाव- आवश्यक न हो तो दिन 02.03 से 5.35 के मध्य शुभ कार्य न करें
———————————————————————————————–
31 मार्च 2011– दैनिक राशिफल—-

राशि फलादेश मेष—-
परिचय क्षेत्र का विस्तार होगा। व्यापार में लाभकारी परिवर्तन हो सकते हैं। मानसिक दृढ़ता से निर्णय लेकर काम करें। संतान की हलचल पर नजर रखें।

राशि फलादेश वृष—
मन प्रसन्न रहेगा। व्यापार-व्यवसाय पर ध्यान दें। खर्च अनावश्यक रूप से बढ़ेंगे। समय का दुरुपयोग न करें। परिवार में सुख-शांति रहेगी। पराक्रम बढ़ेगा।

राशि फलादेश मिथुन—
आलस्य से बचकर रहें। सक्रिय होकर कार्य करें तो लाभप्रद रहेगा। व्यापार अच्छा चलेगा। आर्थिक स्थिति प्रसन्नतादायी रहेगी।

राशि फलादेश कर्क—
नए कार्य में महत्वपूर्ण विचार-विमर्श होंगे। व्यर्थ के भ्रम में न पड़ें। स्व-विवेक से काम करें। सफलता संभव है। घर खर्च की पूर्ति होगी।

राशि फलादेश सिंह—
परिवार में सुख-शांति- रहेगी। व्यापार में आने वाली बाधाएँ हल होंगी। पुराने संबंधों में यश की वृद्धि होगी। जीवनसाथी के व्यवहार में अनुकूलता रहेगी।

राशि फलादेश कन्या
समाज में आपके कार्य की प्रशंसा होगी। व्यापार में हानि की आशंका है। काम में शीघ्रता नहीं करें। परिवार में असंतोष रहेगा। कार्य में बाधाएँ आएँगी।

राशि फलादेश तुला—
समय अनुकूल है। उसका सदुपयोग करें। आपकी यश, मान-प्रतिष्ठा बढ़ेगी। जीवनसाथी की भावनाओं को समझें।

राशि फलादेश वृश्चिक—
संस्था की तरफ से भेंट, उपहार मिलेगा। व्यापारिक स्थिति आशाजनक रहेगी। नवीन गतिविधियाँ लाभकारक रहेंगी। बुद्धि चातुर्य से अनेक कठिनाइयाँ दूर हो सकेंगी।

राशि फलादेश धनु—
व्यापार में अधिक लाभ प्राप्ति के योग हैं। जोखिम के कार्य से बचना चाहिए। लक्ष्य को ध्यान में रखकर काम करें। सफलता अवश्य मिल सकेगी।

राशि फलादेश मकर—
लाभ का मार्ग प्रशस्त होगा। व्यवसाय में वृद्धि होगी। परिवार का कलह दूर होगा। रिश्तेदारों से संबंध प्रगाढ़ होंगे। नए आयोजन होंगे।

राशि फलादेश कुंभ—
अनावश्यक क्रोध न करें। पारिवारिक सुख व धन बढ़ेगा। पठन-पाठन में रुचि बढ़ेगी। मित्रों के सहयोग से समस्या का समाधान होगा। व्यापार में प्रगति के योग हैं।

राशि फलादेश मीन—
किसी भी कार्य में दुस्साहस नहीं करें। आर्थिक निवेश लाभदायक रहेगा। धार्मिक आस्था बढ़ेगी। अनुकूलता के कारण मन में प्रसन्नता रहेगी।

Posted by: vastushastri08 | मार्च 31, 2011

भारत की ताकत दिखा देंगे —–

चार बज गए लेकिन
पार्टी अभी बाकी हे….
विदेशियों को हरा दिया ..
अब पडोसी की बारी हे….
कल पाकिस्तान था ,….
अब श्रीलंका की बरी हे…..
मेसेज नया हे …दे घुमा के…
क्यों की मेच अभी बाकी हे…
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सबको धुल छठा देंगे
भारत की ताकत दिखा देंगे
पाकिस्तान को कह देना
मोहाली मैं हमसे पंगा न ले
वरना दिन मैं तारें दिखा देंगे
### –दयानंद “”बन्धु “-झालरापाटन

Posted by: vastushastri08 | मार्च 31, 2011

कविताएँ/ ग़ज़ल्स —-

क्यूं कहते हो मेरे साथ कुछ भी बेहतर नही होता
सच ये है के जैसा चाहो वैसा नही होता
कोई सह लेता है कोई कह लेता है क्यूँकी ग़म कभी ज़िंदगी से बढ़ कर नही होता
आज अपनो ने ही सीखा दिया हमे
यहाँ ठोकर देने वाला हैर पत्थर नही होता
क्यूं ज़िंदगी की मुश्क़िलो से हारे बैठे हो
इसके बिना कोई मंज़िल, कोई सफ़र नही होता
कोई तेरे साथ नही है तो भी ग़म ना कर
ख़ुद से बढ़ कर कोई दुनिया में हमसफ़र नही होता……………

hum yaad bahut aayenge kissi din dekh lena.
chale us paar jayenge kisi din dekh lena.
zamana to pukarega hame aawaz dekar.
palat kar hum na aayenge kisi din dekh lena.
rahe pyase sada aapke dar par magar hum.
ghata banke chhayenge kisi din dekh lena.
kisi majboor ki chahat me jo has rahe hai.
wo ek din aanshu bhi bahayenge kisi din dekh lena….

Jaan kar bhi woh Mujhe jaan na paaye,
Aaj tak woh Mujhe pehchaan na paaye,
Khud hi kar li bewafai humne,
taaki unpar koi ilzaam na aaye….

Aye kaash kisi des se paigaam aaye koi,
mujhe bhi chahe aur dil mein basaye koi.
koi bechaini se karta ho mera bhi intezaar,
apni aankhon mein mere khwaab sajaye koi.
koi shikwa kiye bina hi mere naaz uthaye,
mein rooth jaoon to pyaar se manaye koi.
koi aisa ho jo har lamha mere deedaar ko tarse,
beqarari se mujhe paas bulaye koi.
koi mujhko bhi seene se lagane wala ho,
shararat kare aur mujhko sataye koi.
mera bhi is duniya se chale jaane ka waqt aaye ga,
mein mar jaoon to meri maut pe aansoo bahaye koi.
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AM A COOL GUY…..HAVING FEW DREAMS IN MY LIFE WHICH I HAVE TO COME TRUE…..ALSO AM A HAPPY~GO~LUCKY PERSON…..N’JOY LIFE TO THE FULL EXTENT…CAUSE IT HAS BEEN GIVEN ONCE…….MORE TO SAY BUT I DONT WANT TO BORE YOU….

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i want to make my life beautiful with the help of my friends & family………….:)

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just cant find the way
To express my love for you
You are just amazing
In everything you do
The time I spend with you
… Is the best Ive ever had
And you always know how to help me
When its me whose feeling sad
I dont know how to say this
But i’ll do my best and try
And I just want you to know
That you are the perfect guy

You make me feel so special
You make me feel so right
And if I had it my way
I would always hold you tight

I hope that I dont lose you
I pray to god each day
Because as long as you are here
I can push my pain away

I love you oh so much
And that I know is true
Because no matter what I do
I can’t be without you

I hope we are together
For time and time to come
Because I need you in my life
To change who I’ve become… ♥♥♥
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एक पत्र, दोस्त के नाम

दोस्ती करें, फूलों से ताकि हमारी जीवन-बगिया महकती रहे।

दोस्ती करें, पँछियों से ताकि जिन्दगी चहकती रहे।

दोस्ती करें, रंगों से ताकि हमारी दुनिया रंगीन हो जाए।

दोस्ती करें, कलम से ताकि सुन्दर वाक्यों का सृजन होता रहे।

दोस्ती करें, पुस्तकों से ताकि शब्द-संसार में वृद्धि होती रहे।

दोस्ती करें,ईश्वर से ताकि संकट की घड़ी में वह हमारे काम आए।

दोस्ती करें, अपने आप से ताकि जीवन में कोई विश्वासघात ना कर सके।

दोस्ती करें, अपने माता-पिता से क्योंकि दुनिया में उनसे बढ़कर कोई शुभचिंतक नहीं।

दोस्ती करें, अपने गुरु से ताकि उनका मार्गदर्शन आपको भटकने ना दें।

दोस्ती करें, अपने हुनर से ताकि आप आत्मनिर्भर बन सकें।
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SHAADI
Shaadi ke pehle – Agar Tum Na Hote:(
Shaadi ke baad – Agar Tum Na Hote:)

Shaadi ke pehle – Maine Pyar Kiya
Shaadi ke baad – Ye Maine Kya Kiya?

Shaadi ke pehle – Kuch Kuch Hota Hai
Shaadi ke baad – Kuch Nahi Hota Hai

Shaadi ke pehle – Dil To Pagal Hai
Shaadi ke baad – Dil To Pagal Tha

Shaadi ke pehle – Ek Duje Ke Liye
Shaadi ke baad – Sirf Bachcho Ke Liye

Shaadi ke pehle – Dilwale Dulhaniya Le Jayenge
Shaadi ke baad – Baaki Log Sukhi Ho Jayenge

Shaadi ke pehle – Chandramukhi
Shaadi ke baad – Jwaalamukhi

Shaadi ke pehle – Kuwara Baap
Shaadi ke baad – Bechara Baap

Shaadi ke pehle – Titanic
Shaadi ke baad – Mortgage

Shaadi ke pehle – Hum Aapke Hai Koun?
Shaadi ke baad – Barbadi Ka Kaaran

Shaadi ke pehle – Yes Boss:)
Shaadi ke baad – Yes Boss:(

Shaadi ke pehle – Mere Sapno Ki Rani
Shaadi ke baad – Chutki Ki Amma

Shaadi ke pehle – Kabhi Kabhi
Shaadi ke baad – If you are lucky

Shaadi ke pehle – Aao Pyar Karen Shaadi

Posted by: vastushastri08 | मार्च 31, 2011

Moleosophy ~ Study of Moles–by Dr. Anjna Agarwal

Moleosophy ~ Study of Moles–by Dr. Anjna Agarwal—-

Moles in Astrology—-
The study of moles is called “Moleosophy”. Like palmistry, tarot and numerology, Moleosophy or the study of moles is also a branch of astrology Moleosophy helps to understand what the moles located in different parts of ones body mean. Usually moles are found by birth but it is observed that moles appear also during one’s life time and also disappear, change their size and color. This is an indication of change of fortune. A raised mole is called a wart. Moles on the right side of a male body and left of a female body is considered auspicious. Honey brown, emerald green, and red colored moles are considered more auspicious and benefic than black moles.

In Indian and Chinese Astrology, moles are interpreted as representing the destiny of the person. The influence of the planets on the person would start at the time of fetus formation in the mother’s womb. Some planets influence the fetus more and some less. These influences result into mole formation when focused at the surface of the body. As per astrology the significance of moles increases with the size of the mole.
The interpretation of moles and birthmarks depends upon two factors, their actual physical appearance and the part of the person’s body that they appear upon. In Samketa Nidhi, Slokas ii-25, iv-16 and vi-5 clearly indicate that moles have definite effects. The moles on different body parts indicates the Zodiac sign by which the person is being dominated. In astrology, each Zodiac sign dominates a particular part of the body as summarized below:—
1. Aries : Head
2. Taurus : Face, Neck, Throat, Right Eye and Nose.
3. Gemini : Arms, Shoulders, Right Ear, Upper Ribs and Right Hand
4. Cancer : Chest, Breast, Stomach, Elbow Joints and lungs.
5. Leo : Heart , Liver, Belly and Back
6. Virgo : Kidney, Abdomen and Anus.
7. Libra : Private parts Uterus and Lumbar Region.
8. Scorpio : Testicles, Groins and Scrotum.
9. Sagittarious : Thighs, Legs and Hips.
10. Capricorn : Knees, Nails and Knee Cap.
11. Aquarius : Legs, Ankle, Left Ear and Teeth.
12. Pisces : Feet, Left Eye and Toes.
Significance of size in Moles
Small moles–Small moles which are not so visible, will not give any results.
Big moles–Only big moles will produce results.
Long moles–Long moles give good results.
Significance of shapes in Moles
Square– give bad results in the starting, but they produce good results by the end
Triangle– produce mixed results, sometimes good and sometimes bad
Zigzag– produce bad result
Round — goodness in people
Significance of Moles based on color
Light Colored Moles – lucky, moles in red color or honey color or green color will generally bring good fortune.
Black Moles – not good, surmount obstacles in order to achieve the desired results.
Effects of moles according to their placement on human body
Right side of the head — excel in politics, social status and success

Left side of the head — not have enough money, spiritual life, interest in literature
Right side of the forehead — prosperous and well settled
Left side and the forehead – selfish
Right temple — early marriage, beautiful wife, sudden financial gain
Left temple — sudden marriage and sudden wealth, losses too
Middle of the eyebrows — leadership qualities, wealth, name and fame
Right eyebrow — early marriage with a good lady. lucky after marriage
Left eyebrow – unlucky, cannot utilize the money properly, faces troubles in the job or business
Right eyelid — brings wealth
Left eyelid — general life, meager amount of money

Right eye — gives easy money
Left eye — an arrogant person who would be after ladies
Front side of ear– good earnings and luxurious life
Backside of the ear — person who follows customs. He will get his wife from a higher family.
Tip of the nose — quick thinking and quick temper. Such a person will have high self-respect and generally win on others.

Right side of the nose — more money with fewer efforts.
Left side of the nose — bad results.

Middle of the chin — lofty person who receives laurels from others.

Right side of the chin — logical thinking and diplomatic nature, earnings will be very good, get name and fame easily.
Left side of the chin — talks straight forward and hence people do not like him, quarrelsome. Expenditure will be uncontrollable.
Upper lip — does good to every one, weakness of ladies and luxurious items.
Lower lip — loves good food, interest in acting and theatre arts.

Right cheek — sensitive person, lot of respect to his parents. loves his wife and relatives, enjoys wealth and health
Left cheek — introvert and an arrogant , face troubles in the life, will be happy in the old age
Middle of the tongue — obstacles in the education, there will be health problems
Tip of the tongue — can convince others with his speech, intelligent and diplomatic
Back side of the neck –angry and aggressive person, may involve into anti-social activities
Front side of the neck — an artistic person with sweet voice, good fortune
Right shoulder — brave and courageous person who will not sleep until finishing any project
Left shoulder involves into quarrels with others.
Right side of the chest — indicates more female progeny, financial problems trouble him
Left side of the chest – clever, does not maintain good relation with relations and friends, financial problems
Nipple– fickle nature, woman has a mole on nipple indicates desire for social status
Right armpit — desire for wealth
Left armpit — desire for ladies
Right ribs — a lot of inner fear, lies easily
Left ribs — earning will be average
Right side of the stomach — good earnings, weakness of ladies
Left side of the stomach — jealous person who likes to earn easy money, problem with children
Nearer to navel cavity — luxurious life
Right hand — talented and make a success of their lives
Left hand — average level, desire to be a rich

Left or right elbow — wealth and success
Wrist — childhood in poverty, writer or painter, devotional, income increases with age
Palm — represent various obstacles
Fingers– represent various obstacles
Back: nearer to the backbone — name and fame, leader or minister
Right side of the back — good health, courage
Left side of the back – diplomatic nature
Right buttock – wisdom, creativity, artist
Left buttock – poverty, deprived life
Genitals –
Right thigh – valor, opportunity to go abroad, profit from a lady
Left thigh — skilled in some art, lazy, fewer friends
Right calf — success in all ventures
Left calf — journeys due to job or business, many friends
Right ankle – foresightedness, gift of gab, belief in God
Left ankle — devotion towards God, talks less
Right foot — good spouse and family life
Left foot — problems with spouse, faces financial problems and wrath of others
Bottom of the feet — journeys, enemies and licentious nature, lover of fine arts.

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Posted by: vastushastri08 | मार्च 31, 2011

Vashikaran Yantra—by Dr. Anjna Agarwal

Vashikaran Yantra—by Dr. Anjna Agarwal

Vashikaran is an Occult Science of Attraction which drives up immense powers with the combination on Mantra and Yantra. It’s a Science which is used to Control the Minds, Thoughts, Feelings, Speech, Action and Behavior of the person. Vashikaran is a Sanskrit expression composed of two Words Vashi and Karan. `Vashi’ means to Attract, Influence, Allure, Excite or Entice the Desired Person. In other words it refers to bringing a particular person under your Complete Control. `Karan’ indicates The Method or Technique of performing it as laid down in Ancient Scriptures. This Yantra can be used to bring back the lost love in your life or for attracting someone in your life with whom you want to spend your life. It can also be used to bring back any other relative back in your life like Mother, Father, Brother, Sister or any other relatives. This yantra can also be used to attract prosperity and success in your life.

If Planet Saturn is malifec in your Birth Chart then, you can use Vashikaran together with Nav Graha Yantra to maximize the benefit. It brings the energy of your Mind Waves to influence the Woman or Man of your dreams towards you. The more intense your desire, the faster the results. If your love is true you will see the result Instantly.

Posted by: vastushastri08 | जून 5, 2011

Remedies for Moon –Chandra Dosha Shanti Upay—by Dr. Anjna Agarwal

Remedies for Moon –Chandra Dosha Shanti Upay—by Dr. Anjna Agarwal

Remedies for Moon –Chandra Dosha Shanti Upay

Chandra Mantras:–

Worship of Moon God can be done by the following mantra taken from the Puran.

Dadhi Shankha tushaarabham ksheero darnava sambhavam
Namaami shashinam somam shambhor mukuta bhushanam

Cryptic Mantra :–

Om shram sreem shraum sah chandraya namah

General Mantra :—

Om Som Somay Namah

MOOLA MANTRA :-

Om Shram Sreem Shraum Sah Chandraya Namah

Gayatri Mantra of Chandra:–

Om Ksheeraputraya Vidmahe Amruta-tatvaya Dhimahi Tanno Chandra Prachodayat

Other Gayatries of Chandra :—

AUM Nisakaraaya vidmahe, kalanaathaya dhimahi, tanno Somah prachodayat.

AUM ATRI PUTRAYAI SAGRONDARYA DHIMAHI, TANNO CHANDRA
PRACHODAYAT

Any of the above given mantras can be chanted repeatedly for fixed numbers with faith and devotion. Chanting of this mantra should be done for 11,000 times during evening time.

Other than that you can also recite Annapoorna stotram and worship Maa Gouri.

Worship Lord Shiva with milk

Wear 2 mukhi Rudraksha.

Fasting on Mondays.

Wear Gemstone Pearl

Donating on mondays- donation should be preferably given during late evening.

donate milk, white rice, water, silver or a white stone (such as a pearl or a moonstone), Camphor, White-cloth, conch, white sandal, white flower, curd. Now another thing is the person whom you are giving the donation. The person should be a lady
(whose leadership embodies the value of motherhood).

Posted by: vastushastri08 | मार्च 31, 2011

Magha Navaratri — Gupt Navaratri–by Dr. Anjna Agarwal

Magha Navaratri — Gupt Navaratri–by Dr. Anjna Agarwal

Navratri is a Hindu festival celebrated for nine days worshipping the various forms of Durga. The Navratri festival is celebrated four times in a year: Vasanta Navratri, Ashadh Navratri, Sharad Navratri and Magha Navratri. These are further divided into Prakat and Gupt Navaratri. From the above mentioned Navaratri, Vasanta and Sharad Navratri are Prakat Navaratri; while Ashadh and Magha Navaratri are called Gupt Navaratri.

Magha Navaratri: Magha Navratri, also referred as Gupta Navratri, is nine days dedicated to the nine forms of Shakti (Mother Goddess) in the month of Magha (January–February). Magha Navaratri is observed during the Magha Shukla Paksha (waxing phase of moon). Magh Navratri in 2011 starts on February 4 and ends on February 12.

Gupt Navaratri is very powerful and yield quick results, if any one chants either of these mantras with specific purposes secretly. Rules are simple. A person has to perform a ‘Panchopar Puja’ before Goddess Durga and communicate one’s wishes and surrender oneself totally. Chant the mantras at least 108 times before an earthen lamp. Recitations of mantra can be done from either of these Holy Navaratri days. People whose marriage is delaying must chant related mantra jaap during Gupt Navratri to get desired results.

SIDDHSAMPUT MANTRAS FOR SPECIAL PURPOSES :—

1. Mantra for welfare
“Sarv Mangala Mangalye Shive Sarvarth Sadhike
Sharanye Trayambke Gouri Narayani Namostute.”

2. Mantra for wealth
“Durge Smrita Harasi Bhitimshesh Jantoh Swasthaih Smritamati Mateev Shubhaam Dadasi Daridray Duhkh Bhayaharini ka Twadanya Sarvopakarkaranay Sadadrachitta.”

3. Mantra for power
“Srishtisthiti Vinashaanam Shaktibhute Sanatani Gunaashraye Gunamaye Narayani Namostute.”

4. Mantra for overcoming problems
“Sharanagat Deenart Paritranaparayane Sarvsyartihare Devi, Narayani Namostute.”

5. Mantra for overcoming fear
“Sarvaswarupe Sarveshe Sarvashakti Samanvite Bhaye Bhyastrahi No Devi! Durge Devi Namostute.”

6. Mantra for getting protection
“Shulen Pahi No devi! Pahi Khadagen Chambike Ghanta Swanen Nah Pahi, Chapajyanihswanen Cha.”

7. Mantra for health and good luck
“Dehi Saubhagyamaarogyam Dehi Me Paramam Sukham Rupam Dehi Jayam Dehi, Yasho Dehi Dwikho Jahi.”

8. Mantra for the eradication of an epidemic
“Jayanti Mangala Kali, Bhadrakali Kapalini Durga Kshama Shiva Dhatri Swaha Swadha Namoastute Te.”

9. Mantra for getting suitable wife
“Patni Manormam Dehi, Manovrittanusarinim Tarineem Durgsansarsaagarasya Kulodbhavaam.”

10. Mantra for getting suitable husband

“Om katyayani mahabhage mahayoginy adhishvarim
Nand gop sutam devi patiam me kurute namah”

11. Mantras for Progeny

“Om devkisut govind vasudev jagatpite
Dehi ye taney Krishna tawamahem sharanam gata”

Posted by: vastushastri08 | मार्च 31, 2011

Mantra — by Dr. Anjna Agarwal

Mantra for wealth—
“Durge Smrita Harasi Bhitimshesh Jantoh Swasthaih Smritamati Mateev Shubhaam Dadasi Daridray Duhkh Bhayaharini ka Twadanya Sarvopakarkaranay Sadadrachitta.”

Mantra for welfare—
“Sarv Mangala Mangalye Shive Sarvarth Sadhike
Sharanye Trayambke Gouri Narayani Namostute.”

Mantra for power—
“Srishtisthiti Vinashaanam Shaktibhute Sanatani Gunaashraye Gunamaye Narayani Namostute.”

Mantra for overcoming problems—
“Sharanagat Deenart Paritranaparayane Sarvsyartihare Devi, Narayani Namostute.”

Mantra for overcoming fear—
“Sarvaswarupe Sarveshe Sarvashakti Samanvite Bhaye Bhyastrahi No Devi! Durge Devi Namostute.”

Mantra for getting protection—
“Shulen Pahi No devi! Pahi Khadagen Chambike Ghanta Swanen Nah Pahi, Chapajyanihswanen Cha.”

Mantra for health and good luck—
“Dehi Saubhagyamaarogyam Dehi Me Paramam Sukham Rupam Dehi Jayam Dehi, Yasho Dehi Dwikho Jahi.”

Mantra for the eradication of an epidemic—
“Jayanti Mangala Kali, Bhadrakali Kapalini Durga Kshama Shiva Dhatri Swaha Swadha Namoastute Te.”

Mantra for getting suitable wife—
“Patni Manormam Dehi, Manovrittanusarinim Tarineem Durgsansarsaagarasya Kulodbhavaam.”

Mantra for getting suitable husband—
“Katyayani Mahamaye Mahayoginyadheswari
Nandogopa sutam Devi Patim Me Kurute Namah.”

Posted by: vastushastri08 | मार्च 31, 2011

Diwali Special ~ Mantras of Goddess Lakshmi by— Dr. Anjna Agarwal

Diwali Special ~ Mantras of Goddess Lakshmi—
by Dr. Anjna Agarwal

Diwali is both a festival of traditional poojas and calibrations.Traditionally Diwali Pooja is performed after sunset at home. On Diwali night, Ganesha shares the altar with Lakshmi. Shree Ganesha is the god of good beginnings and the fabled remover of obstacles. It is when placed side by side, Lakshmi and Ganesha hold out promise of fulfillment of desires, freedom from wants and obstacles.Those who know the ritualistic pooja perform it in the traditional way. Several people call a priest to perform the pooja. Others recite the stotras of Ganesha and Lakshmi. Doing the mantra japa of Ganesha and Lakshmi is very auspicious on this day. Maha Lakshmi is claimed to fulfill the promises of material, wealth and contentment. Lakshmi is the goddess of wealth, luxury, beauty, power, generosity and auspiciousness.

Mantra with respective Yantra will bring more effective results. In ancient texts, Lord Shiva is supposed to have explained the mystical meaning of the Yantra to his consort, Goddess Parvati: “The Yantra is as essential to a god as oil is to the oil lamp or as a body is to a living human being”. The Yantra is actually more powerful than a picture of a God which, to be energized, requires a Yantra to be affixed at its base or back. A Yantra always contains a Mantra associated with it. Just as the mind is a part of, yet different from the body, so is the Mantra from the Yantra. The Mantra is the mind consciousness while the Yantra is the form of the deity.

Ganesha Mantra :—

AUM
GAJANANAM BHOOTGANADHISEVITAM
KAPITTHYA JAMBOO PHALCHARU BHAKSHANAM
UMASUTAM SHOKVINASHKARAKAM
NAMAMI VIGHNESHWAR PADPANKAJAM
AUM

Meaning : Elephant-faced, worshipped by the existing beings, of all living beings, tasting the elephant apple (kaith) and jambolana (jamun), the son of Uma, destroyer of grief, I bow to the lotus feet of Ganesha who is Lord of all.

Mantras of Goddess Lakshmi are as follows:—

Meaning: I have heard of the Goddess from the teachers and the scriptures and have tried to mediate upon Her. I now beseech the same Goddess Lakshmi to motivate me to mediate upon Her.

I have heard of Lord Ganesh from the teachers and scriptures and have mediated upon him. I pray to Lord Ganesh to motivate me to mediate upon him.

I have prepared this collection of flowers by procuring flowers which grow in this season from different places. Oh, great Goddess, kindly accept my offering of flowers.

“Sarvagyay Sarvavarday Sarvadushtbhaydkree
Sarvadukhaharay Devi Mahalakshmi Namostutay”

Meaning: O Maa Lakshmi, you know everything, you grant favors to all, you are a terror to the evil and your art removes the misery of all. O propitious goddess, I surrender to you.

“Siddhi Buddhipraday Devi Bhuktimuktipradayeenee
Mantramurtay Sada Devi Mahalakshmi Namostutay”

Meaning: O divine goddess, you are the provider of success and intelligence. You are the benefactor of both worldly pleasure and freedom. The magical sound symbols-the Mantras, verily comprise their form with your grace. Propitious Mother, I surrender to you always.

“Aadhantarhitay Devi Aadhshakti Maheshwari
Yogajay Yogasambhutay Mahalakshmi Namostutay”

Meaning: O Ultimate Mother, your art is without beginning and end. Your art is the primal power. Your art comes out of Yogic practice and your art is evident through Yoga. Promising Mother, I surrender to you.

“Sthulsukshmay Maharodray Mahashakti Mahodray
Mahapaapharay Devi Mahalakshmi Namostutay”

Meaning: Goddess Lakshmi, your art in gross and subtle, is the most awful and powerful. Mother, you contain all things and you remove even the greatest sins. Auspicious Mother, I surrender to you.

“Padnaasanstithay Devi Parbrahmaswaroopeenee
Parmashree Jaganmatra Mahalakshmi Namostutay”

Meaning: Maa Lakshmi, you reside in the hearts of devotees and prove the art of the Supreme Brahman. You are mother of the universe with your supreme art. O Great Mother, I bow to you.

Goddess Mahalakshmi Gayatri :—

Om MahaDevyaicha Vidhmahe
Vishnu Patnyaicha Dheemahi
Thanno Lakshmi Prachotayaath

Mahalakshmi Mantra :

|| om shreem shreem kamale kamalalaye prasid prasid shreem hleem om mahalakshmaye namaha ||

MAHALAKSHMI MANTRA :—
AUM
SHRING HRING KLEENG MAHALAKSHMI NAMAH
AUM

Shring is the Lakshmi bija. Recite with Shri Yantra will bring Mother lakshmi’s blessings in the form of peace, prosperity and harmony.

MAHALAKSHMI MANTRA :—

“Om Sri Maha Lakshmyai Namah”
The mantra of Goddess Lakshmi, the goddess of all the wealth and Prosperity in the world.
Goddess Laxmi Mantra Siddhi Japa : Daily worship of this mantra helps in attaining Siddhi:

OM SHREEM HEEM SHREEM KAMLE KAMALALAYE PRASEED PRASEED,
SHREEM HEEM SHREEM OM MAHALAXMI NAMAHA

Lakshmi mantras according to ascending signs (lagnas) :

ASCANDENT ~MANTRA

MESHA ~EIM KLEEM SAUHA
VRISHABH ~AUM EIM KLEEM SHREEM

MTHUN ~AUM KLEEM EIM SAUHA

KARKA ~AUM EI KLEEM SHREEM

SIMHA ~AUM HEEM SHREEM SAUHA

KANYA ~AUM SHREEM EIM SAUN (N has a nasal sound)

TULA ~AUM HEEM KLEE SHREE

VRISHCHIKAUM~EIM KLEE SAUHA

DHANU~AUM HEE KLEE SAUHA

MAKARAUM~EIM KLEEM HEEM SHREEM SAUHA

KUMBHA~AUM HEE EIM KLEE SHREEM

MEEN~ AUM HEE KLEE SAUHA

Lord Kubera Mantra :—

Om Hreem Yakshaya Kuberaya Vaishravanaya Dhana Akarshanaya Sarvaloka Vasigaraya Dhana Dhanya Adhipataya Dhana Dhanya
Shri Lakshmi Astothra : Sadha Naamavali
Aum Prakruthyai Namah

Aum Vikruthyai Namah

Aum Vidyaayai Namah

Aum Sarvabhoothahithapradayai Namah
Aum Shraddhayai Namah

Aum Vibhuthyai Namah

Aum Surabhyai Namah
Aum Paramatmikaayai Namah

Aum Vache Namah

Aum Padmalayaayai Namah

Aum Padmaayai Namah

Aum Shuchaye Namah

Aum Swahaayai Namah
Aum Swadhaayai Namah

Aum Sudhaayai Namah

Aum Dhanyaayai Namah

Aum Hiranmaiyai Namah

Aum Lakshmaiyai Namah
Aum Nityapushtayai Namah

Aum Vibhavaryai Namah

Aum Adhithyai Namah

Aum Dheethyai Namah
Aum Deepthaayai Namah

Aum Vasudhaayai Namah

Aum Vasudhaarinyai Namah

Aum Kamalaayai Namah

Aum Kaanthayai Namah

Aum Kaamakshyai Namah

Aum Kamala sambhavaayai Namah

Aum Anugrahapradhaayai Namah

Aum Buddhaiyai Namah

Aum Anaghaayai Namah

Aum Harivallabhaayai Namah

Aum Ashokaayai Namah

Aum Amruthaayai Namah

Aum Deepaayai Namah

Aum Lokashoka vinashinyai Namah

Aum Dharmanilayaayai Namah

Aum Karunaayai Namah
Aum Lokamatre Namah

Aum Padmapriyaayai Namah

Aum Padmahasthaayai Namah

Aum Padmakshyai Namah
Aum Padmasundariyai Namah

Aum Padmodbhavaayai Namah

Aum Padmamukhyai Namah

Aum Padmanabha priyaayai Namah

Aum Ramaayai Namah

Aum Padmamalaadharaayai Namah

Aum Deviyai Namah
Aum Padminiyai Namah

Aum Padmagandhinyai Namah

Aum Punyagandhaayai Namah

Aum Suprasannaayai Namah

Aum Prasadabhi mukhyai Namah
Aum Prabhaayai Namah

Aum Chandravadhanaayai Namah

Aum Chandraayai Namah
Aum Chandrasahodharyai Namah

Aum Chaturbhujaayai Namah

Aum Chandrarupaayai Namah

Aum Indiraayai Namah
Aum Indhu sheethalaayai Namah

Aum Ahlaadha jananvaya Namah

Aum Pushtyai Namah

Aum Shivaayai Namah

Aum Shivakariyai Namah
Aum Satyaayai Namah

Aum Vimalaayai Namah

Aum Vishwajananyai Namah

Aum Dhustyai Namah

Aum Dharidriya naashinyai Namah

Aum Preethi Pushkarinyai Namah

Aum Shanathayai Namah
Aum Shuklamaalyaambharaayai Namah

Aum Bhaskaryai Namah

Aum Bilva nilayaayai Namah

Aum Vararohaayai Namah

Aum Yashaswinyai Namah

Aum Vasundharaayai Namah

Aum Udhaarangaayai Namah

Aum Harinyai Namah

Aum Hemamalinyai Namah

Aum Dhana dhanyakaryai Namah

Aum Siddhayai Namah

Aum Sthraina Soumyaayai Namah

Aum Shubhapradaayai Namah

Aum Nrubavema gathanandhayai Namah

Aum Varalakshmaiyai Namah

Aum Vasupradhaayai Namah

Aum Shubhaayai Namah

Aum Hiranya praakaaraayai Namah

Aum Samudhra dhanaayayai Namah

Aum Jayaayai Namah

Aum Mangalaayai Namah

Aum Vishnuvakshah Sthalasdhithaayai Namah
Aum Vishnupathnyai Namah

Aum Prasannaakshyai Namah
Aum Narayana Samashrithayai Namah

Aum Dharidriya Dhwamsinyai Namah

Aum Devlakshmi Namah

Aum Sarva padhrava nivaarinyai Namah
Aum Navadurgaayai Namah

Aum Mahakaalyai Namah

Aum Brahma-Vishnu-Shivathmikaayai Namah

Aum Thrikaalagyanasampannaayai Namah

Aum Bhuvaneshwaryai Namah

Aum MahaaLakshmi Astothra sadha Namah

Posted by: vastushastri08 | मार्च 31, 2011

Diwali ~ Festival of Lights– by Dr. Anjna Agarwal

Diwali ~ Festival of Lights (Diwali special Yantra and Lockets)
by Dr. Anjna Agarwal

Diwali ~ Festival of Lights—
Diwali is known as the ‘festival of lights’ comes exactly 20 days after Dussehra on Amavas (new moon), during the dark fortnight of Kartik some time in October or November. According to Hindu religious scriptures On this day, Lord Ram returned to his Kingdom Ayodhya after the exile of fourteen years (vanvaas) imposed by his stepmother Kaikeyi in jealousy, because Ram would become the king and not her own son Bharat. During this period he put an end to the demon Ravana of Lanka, who was a great Pundit, highly learned but still evil dominated his mind. After this victory of Good over Evil, Rama returned to Ayodhya. In Ayodhya, the people welcomed them by lighting rows of clay lamps. So, it is an occasion in honor of Rama’s victory over Ravana.

Five Days of Diwali—

Diwali is a festival of lights and is celebrated with great enthusiasm. The uniqueness of this festival is its harmony of five varied philosophies, with each day to a special thought or ideal. If people celebrate each of its five days of festivities with true understanding, it will uplift and enrich their lives.

The first day of Diwali–Dhanteras :—

Diwali starts with the 13th lunar day of Krishna Paksh called Dhanvantari Triodasi or Dhanwantari Triodasi also called Dhanteras. On this day, Lord Dhanwantari came out of the ocean with Ayurvedic for mankind. On this day at sunset, Hindus should bathe and offer a lighted deeya with Prasad to Yama Raj (the Lord of Death) and pray for protection from untimely death. Dhanteras holds a lot more significance for the business community.

The second day of Diwali–Choti Diwali :—

Second day of Diwali is called Narak Chaturdasi or Choti Diwali. On this day Lord Krishna destroyed the demon Narakasur and made the world free from fear.

The third day of Diwali–Lakshmi Puja on Diwali :—

The third day of Diwali is the actual Diwali. On this day Maa Lakshmi (Goddess of prosperity and wealth) is worshipped to achieve the blessings of wealth and prosperity, the triumph of good over evil and light over darkness. It is believed that Goddess Laxmi visit everyone during Diwali and brings peace and prosperity to all.

The fourth day of Diwali–Padwa & Govardhan Puja :–

On this day, Govardhan Pooja is performed. On this day Lord Krishna caused the people of Brij to perform Govardhan Pooja. This day is also observed as Annakoot meaning mountain of food. People cook fifty-six or 108 different types of food for the bhog (the offering of food) to Krishna.
The fifth day of Diwali–Bhai Dauj :—

The fifth day of the Diwali is called Bhratri Dauj. This is the day after Goverdhan Pooja is performed and normally two days after Diwali day. It is a day dedicated to sisters. On this day Yama (Lord of death) visited his sister Yamuna. He gave his sister a Vardhan (a boon) that whosoever visits her on this day shall be liberated from all sins. They will achieve Moksha or final emancipation. From then on, brothers visit their sisters on this day to enquire of their welfare.

Ganesh-Lakshmi Puja—
Ganeshji is a must for Diwali pooja as he is to be worshiped in all pujas before any other god or goddess. Lakshmi Puja consists of a combined puja of five deities: Ganesha is worshiped at the beginning of every auspicious act as Vighnaharta; Goddess Lakshmi is worshiped in her three forms – Mahalakshmi (the goddess of wealth and money), Mahasaraswati (the goddess of books and learning), and Mahakali; Kuber (the treasurer of the gods) is also worshiped. Traditionally on Diwali night, Ganesh shares the altar with Lakshmi. During puja, the idol of goddess Lakshmi is placed on the left and Lord Ganesha, the elephant headed god is kept on the right. Shree Ganesh is the god of good beginnings and the fabled remover of obstacles. Lakshmi is the goddess of wealth and prosperity and also personifies beauty, grace, and charm. She is normally depicted seated on a lotus with gold coins. On Diwali when both is placed side by side, Lakshmi Ganesh hold out promise of a year of fulfillment.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 31, 2011

Rules for Wearing Rudraksha—by Dr. Anjna Agarwal

Rules for Wearing Rudraksha—by Dr. Anjna Agarwal

Precautions in Wearing Rudraksha Beads—

Though Rudraksha Beads are God’s gift to mankind. In general the wearer and the worshipper of Rudraksha is blessed with prosperity, peace and health yet there are following precautions need to be taken :—-

1. Rudraksha must be worn after Sidhhi. It should be worn on auspicious day.

2. Rudraksha Mantra and Rudraksha Origin Mantra is to be chanted daily 9 times while wearing in the morning and after removing before going to bed

4. The wearer of the Rudraksha should avoid non vegetarian food and should not take alcohol.

5. Rudraksha must not be taken to the cremation grounds and funerals. Also it must not be taken to the place while visiting a new born baby.

6. Rudraksha should not be worn during sexual intimacy.

7. Women should not wear the Rudraksha during their menstrual cycle.

8. Rudraksha is hot in nature. Some people just can’t wear it. Their skin shows signs of allergy. For them Rudraksha beeds should be kept in Mandir or Puja room and offer daily Namaskars.

9. Rudrakasha beads should always be worn in a cotton thread or a gold or a silver chain.

Care of Rudraksha Bead—-

1. Keep the Rudraksha beads in a clean place.

2. Always clean the beads occasionally with a brush with soft bristles.

3. Oil the beads occasionally. Bitter oils like mustard oil (sarson) or Sesame oil/Gingelly Oil (til) can be used for this purpose.

4. Do not wear the Rudraksha beads while sleeping. The beads may break due to pressure. The beads may be kept under the pillow.

5. Rosary, if used for mantra chanting then do not wear the same on the body.

Posted by: vastushastri08 | मार्च 31, 2011

Navratra ~ The Auspicious Nine days by– Dr. Anjna Agarwal

Navratra ~ The Auspicious Nine days
by Dr. Anjna Agarwal

‘NAVSHAKTIBHI SANYUKT NAVRATRATDUCHAYATE’
Navratra is a period when nine shakti (power) combine together into one and become Mahashakti (superpower).

The Navratra commences on the first day of the bright fortnight of the lunar month of Ashwini. Navratra means Nine Nights which are dedicated to Maa Durga. On this occasion, devotees worship all nine forms of Goddess Durga. The festival is celebrated for nine nights once every year during the beginning of October, although as the dates of the festival are determined according to the lunar calendar, the festival may be held for a day more or a day less. Bhajan, Kirtan, Jagran, adorning the house, feasting and fasting take precedence over all normal daily activities in these nine days amongst the Hindus.

In Samvat 2067, year 2010, Shaaradiya Navratra will start from Friday sunrise. From 11:45 am to 12:33 pm, there is Abhijit Mahurat. Those who start Navratri during this time will be blessed with prosperity and success. The auspicious Chaugharia will start from 12:08 pm and Rahu-Kaal will also be finished by then. Shubh Chaugharia is believed best to establish Kalash in temples. It will finish on October 16, 2010 on Mahanavami.

Navratra is a sacred festival solely devoted to the divine form of Maa Shakti. Hindus invoke JAGDAMBA ‘Mother of the Universe’ during these days and take her blessings. She symbolizes a woman in all its forms. She is “Adishakti” who represents woman’s energy, She is “Annpurna” who feeds the universe, She is “Virtuous” who grants all wishes of devotees. She is Trigunatamaka–Mahalaxmi (Goddess of wealth) represents power of wealth and prosperity, Mahasaraswati (Goddess of wisdom) represents power of wisdom, Mahakali (Goddess of valour) represents will power that helps to win over own negativity and wickedness.

There are four Navratra’s in one Samvatsar in India. Navratra in Ashad and Magh months are called Secret Navratra (Gupt Navratris). Tantriks perform tantric sadhanas at secret places in these navratra. Chitra Navratra is ‘Vasantic Navratra’ and Ashwin Navratra is ‘Sharadiya Navratra’. Navratra is the time when change in season takes place. According to Ayurveda this is the time when body is purified. Extra vaat, pitt and cough in the body is destroyed.

‘Shardiya Navratra’ takes precedence on all the Navaratras that is why they are called annual Navratra’s. During these days Mahapooja is organized. In ‘Chiatra Navratra’ Ramnavami is celebrated, while in ‘Ashwini navratra’ Shri Durga Navami is celebrated. Goddess’s energy is manifested during these nine days, that is the reason worship of Durga has special significance. During this nine night long festival of Navratra, nine different forms of Maa Durga signifying power, wealth, prosperity and knowledge are worshipped. Each day is dedicated to different aspect of divine almighty. The nine shaktis which are invoked during Navratras are–

(1) Shailputri—
Maa Shailputri is the daughter of Himalaya and first among the nine aspects of Maa Durga. Mounting on a bull, Maa Shailputri holds a trishul in the right hand and a flower in the left hand. Maa Shailputri’s glories are endless.

(2) Brahmcharini—
“Brahma” means “Tapa”. Maa Brahmacharini is the second form of Navdurga and is worshipped on the second day of Navratra. Maa Brahmacharini practices Tapa and is very gorgeous giving the message of love to the whole world. She holds a rosary (mala) in her right hand and Kamandal in left hand. The goddess is full with merriment.

(3) Chanraghanta—
Maa Chandraghanta is the third manifestation of Maa Durga. She is always in a gesture as if prepared for fighting. Her roaring voice makes all Danava, Daitya and Rakshasas tremble. The Goddess establishes justice by saving her devotees from all kinds of danger. This form of Navdurga is known as Chandraghanta as there is a half-circular moon in her forehead. This face of Maa Durga is very charming and bright. She possesses three eyes and ten hands holding ten different types of swords, weapons and arrows etc and mounts on a Lion.

(4) Kushmanda—
Maa Kushmanda, the fourth aspect of Navdurga is adored on the fourth day of Navratri. Maa Kushmanda represents the source of providing basic necessities to the whole world. This form of Durga is said to be the creator of the universe and resides in the innermost core of the earth. She has eight hands which hold seven types of weapons in seven hands and a rosary in her right hand. She seems brilliant riding on a Lion.

(5) Skandmata–
Skandamata is the fifth form of Navdurga therefore she is worshipped on the fifth day of Navratri. Skandamata bestows her devotees with the gift of differentiation of right from wrong to the world. She holds her son, “Skanda” in her lap while displaying three eyes and four hands; two hands hold lotus while the other two hands respectively display defending and granting gestures.

(6) Katyayani—
On sixth day of Navratri, the sixth form of Maa Durga known as Maa Katyayani is worshipped. It is believed that Maa Katyayani persistently battles against the evil and deceitful entities. She has three eyes and four arms. One left hand holds a weapon and the other a lotus. The other two hands respectively display defending and granting gestures. Her mount is a lion.

(7) Kalratri—
Maa Kaalratri is the seventh form of Navdurga. Maa Kaalratri is also known as Maha Kaali. Kalaratri is the one of the fiercest forms of Maa Durga and her appearance itself evokes fear. This form of Goddess is believed to be the destroyer of all demon entities. Mounted upon a Donkey the goddess possess black skin with bountiful hair and four hands, two clutching a cleaver and a torch, while the remaining two are in the mudras.

(8) Mahagauri—
Mahagauri is the soft spoken and simplest form of Maa Durga. She is calm and kind and exists in peaceful style. She has four arms and fairest complexion of all the Durga Shakti. She holds a drum and a trishul and is often depicted riding a bull. Durga Ashtami Puja is also held on this day in many parts of the country.

(9) Siddhidatri—
Navdurga’s ninth aspect is Maa Siddhidatri. Maa Siddhidatri showers knowledge over all her devotees making their soul pure. The Goddess drives on Lion. She has four hands and looks are very pleasing. The day is also observed as Mahanavami in many parts of the world.

MAA DURGA not only manifests power required to destroy devilish tendencies in all of us, she also manifests vital force of energy required for life. Lord Rama invoked Durga maa before going to the battle with Ravana in Navratri and got victory of this demonic force on Vijayadashami. She is not only a nurturing factor which takes care of all her children like Mother. She is an epitome of Shakti who kills all the demonic forces whether visible or invisible, and thus brings balance & harmony which is required for regulation & mobilization of the universe.

If one worships mother of entire unverise goddess Durga with selflessness and devotion and recite Durga Saptashati once throughout these nine days, all of his/her problems get resolved certainly and life becomes blessed with divinity. The way we worship Maa Durga, we should similarly worship our mother too, only then it will be called a true worship.

SIDDHSAMPUT MANTRAS OF SRI DURGASAPTASHATl & SRIMAD BHAGAVAT :—

Mantra for wealth
“Durge Smrita Harasi Bhitimshesh Jantoh Swasthaih Smritamati Mateev Shubhaam Dadasi Daridray Duhkh Bhayaharini ka Twadanya Sarvopakarkaranay Sadadrachitta.”

Mantra for welfare—
“Sarv Mangala Mangalye Shive Sarvarth Sadhike
Sharanye Trayambke Gouri Narayani Namostute.”

Mantra for power—
“Srishtisthiti Vinashaanam Shaktibhute Sanatani Gunaashraye Gunamaye Narayani Namostute.”

Mantra for overcoming problems—
“Sharanagat Deenart Paritranaparayane Sarvsyartihare Devi, Narayani Namostute.”

Mantra for overcoming fear—
“Sarvaswarupe Sarveshe Sarvashakti Samanvite Bhaye Bhyastrahi No Devi! Durge Devi Namostute.”

Mantra for getting protection—
“Shulen Pahi No devi! Pahi Khadagen Chambike Ghanta Swanen Nah Pahi, Chapajyanihswanen Cha.”

Mantra for health and good luck—
“Dehi Saubhagyamaarogyam Dehi Me Paramam Sukham Rupam Dehi Jayam Dehi, Yasho Dehi Dwikho Jahi.”

Mantra for the eradication of an epidemic—
“Jayanti Mangala Kali, Bhadrakali Kapalini Durga Kshama Shiva Dhatri Swaha Swadha Namoastute Te.”

Mantra for getting suitable wife—
“Patni Manormam Dehi, Manovrittanusarinim Tarineem Durgsansarsaagarasya Kulodbhavaam.”

Mantra for getting suitable husband—
“Katyayani Mahamaye Mahayoginyadheswari
Nandogopa sutam Devi Patim Me Kurute Namah.”

Posted by: vastushastri08 | मार्च 31, 2011

Gemstones ~Power, effects and uses of Gemstones by– Dr. Anjna Agarwal

Gemstones ~Power, effects and uses of Gemstones
by Dr. Anjna Agarwal

Gemstones ~Power, effects and uses of Gemstones

Gemology postulates that gems not only enhance fortune but also have therapeutic properties which can be used in the medical field. The inherent powers of Gemstones are recognized by modern science in the technological uses of crystals in watches, lasers, and computers but the more subtle potencies, such as their ability to promote physical healing in the body or their power to help balance human emotions, elude modern science. Gemstones are connected with the Planets & helps to maintain health, status, marital bliss, financial gains, professional success. According to Puranas and other authentic sources following kinds of Gems and jewels are prominent :—
1) Manikya (Ruby).
2) Moti (Pearl).
3) Mungaa (Coral).
4) Panna (Emerald).
5) Pukhraj (Yellow Sapphire).
6) Neelam (Blue Sapphire).
7) Heera (Diamond).
8) Gomed (Hassonite).
9) Lahsumiya (Cat’s eye).
10) Phiroza (Turquoise).
11) Chandrakant (Moon stone).
12) Ghrit Mani.
13) Tail Mani.
14) Bheeshmak.
15) Upalak Mani (Opal).
16) Sphatic Mani (Rock Crystal).
17) Paras Mani.
18) Ulook Mani.
19) Larvart (Lapis Mani)
20) Masar Mani.
21) Ishiv.

Legend of the Gemstones:—
According to Vishnu Purana and Shrimad Bhagwat Mahapurana, Bali, the grandson of Prahlad was a great king of the demons. With a resolution of dethroning Indra as the king of heaven, Bali organized a hundred Ashwamedha Yagyas. On the appeal of Indra, Lord Vishnu decided to stop the hundredth Ashwamedha Yagya of Bali and arrived there in the guise of Vamana and begged him to donate land measuring three steps. In two steps, Lord measures entire earth and heaven. Since there was not room then to put the third step, Bali offered his head for the Lord to put his third step. Thus, Lord Vishnu sent Bali direct to the hell. But with the touch of the Lord’s foot, Bali’s body converted into gems and stones. According to another version of the lore, a fierce battle followed between Lord Vishnu and Bali. During the battle, Lord Vishnu broke Bali’s body into pieces. Thus different pieces of Bali’s body fell at different places and took the shape of gems and jewels. Thus, origin of different gems and jewels is as follows:—

Ruby: It originated from the blood drops of Bali, hence it has red or pink colour.
Pearl: It is believed to have originated from the mind of Bali.
Coral: That part of Bali’s blood which flowed down to the sea formed the coral.
Yellow Sapphire: It originated from the flesh of Bali.
Blue Sapphire: It originated from the eyes of the demon King Bali.
Diamond: It originated from the pieces of Bali’s brain.
Hassonite: This gem originated from the fat of the demon king.
Cat’s Eye: This jewel originated from the Yagyopavit (sacred thread) of Bali.
Turquoise: It originated from the nervous system of the demon king Bali.
Moonstone: It originated from the radiance of the eye’s pupils.
Ghrit Mani: This jewel originated from the pieces of the waist.
Tail Mani: Skin of the king Bali formed this jewel.
Bheeshmak: This gem was produced from the head pieces of Bali.
Upalak Mani: Cough or phlegm of Bali produced this jewel.
Sphatik Mani (Rock Crystal): This jewel was formed from the sweat of Bali.
Paras Mani: Pieces of Bali’s heart formed Paras Mani.
Ulook Mani: This jewel was formed from the pieces of Bali’s tongue.
Lapis Lazuli: Bali’s hair formed this jewel.
Masar Mani: This jewel was produced from the faeces of Bali.
Ishiv Mani: This jewel is believed to have from the semen of King Bali.

Thus in all, eighty four different parts and constituents of the demon king Bali. Of them, only twenty-one are described as Gems or Jewels due to peculiar brilliance they possess. Of these twenty-one gems, only nine are most famous for their radiance and are hence known as Navaratna. Thus, there are nine main gems or jewels, twelve common gems and sixty-three ordinary gems which are also known as sub-gems.

Why Gemstones are Prescribed :—
Gemstones are prescribed to either strengthen or balance the energies of these planets in question, i.e. strengthen weak planets so that they do create some good effect, or further strengthen already strong planets, such that their effect is more pronounced. As an example, someone may want to strengthen Mercury to cure any speech impediment or skin inflammation, as a weak Mercury is known to cause these ailments. A person may want to strengthen Saturn if it is a Raj Yoga causing planet, in that case, in Saturn’s dasha or bhukti, the results given by Saturn multiply. Surely all good and bad effects multiply at the same time, there is a need for balance.

Gemstones should be worn strictly after consulting an astrologer because an Astrologer can only know which Gemstone is suitable and which is not according to your Rashi/Lagna/Ascendant and the position of the planet associated with the stone in your birth chart to get maximum benefits in life. It is necessary to purify the gemstone before wearing and the mantra associated with that Gemstone. When a Gemstone is worn it generates positive vibrations and powerful aura around the individual, which in turn protective and resists any untoward vibrations coming from external sources.

Power of gemstones :—
The Gemstones selected for use should always be in contact with one’s body to absorb their healing properties. All stones or gems have magnetic powers in varying degrees, and many of them are beneficial to us for their therapeutic cures. They emit vibrations and frequencies which have strong potential influence on our whole being. They create strong energy fields which enable us to be charged with their energies. The Gemstones are used for healing, transforming, balancing, and attuning the body, mind and soul. They are a manifestation of vibrancy, light and color, life, textures, transparency and clarity. They activate our abilities, soothe and comfort, heal and balance through the purity of their rays. The patterns in the stones reveal to us the changes that keep taking place, indicating that life is change – that the process of evolution is a cosmic law. Each Gem, tuned to a particular ray, has a special role to play. The more precious stones that you wear, the more strongly will you be charged with cosmic forces, radiating out into your surroundings.

Gemstone therapy :—
It is based on the theory that certain Gemstones possess specific healing energies. Physical and emotional problems can block the body’s energy center, resulting in illness of some kind. When a Gemstone comes into contact with the body, its energy is released and transferred to the person. Use Gemstone therapy to unblock negative energy or heal the body and Gemstone meditation to heal the spirit.

Gemstones have an amazing capacity to absorb the cosmic vibes from the planets. Each precious stone has its own special energetic vibration from its magnetic field. Gemstones have been recognized since Ancient times. They were very much used in Ayurvedic medicine in the form of dust, or infusions or dipped in water. Due to this power they are considered as a part of the planets themselves. Almost every branch of astrology discusses gemstones as way to influence the impact of the planets on the native.

श्राद्ध कर्म का औचित्य और पितृ्दोष–????

जन्म एवं मृ्त्यु का रहस्य अत्यन्त गूढ है। वेदों में,दर्शन शास्त्रों में,उपनिषदों एवं पुराण आदि में हमारे पुर्वाचार्यों नें इस विषय पर विस्तृ्त विचार किया है। श्रीमदभागवत में भी स्पष्ठ रूप से बताया गया है कि जन्म लेने वाले की मृ्त्यु और मृ्त्यु को प्राप्त होने वाले का जन्म निश्चित है। भगवान श्री कृ्ष्ण ने स्वयं जन्म-मरण के चक्र को एक ध्रुव सत्य माना है।

मनुष्य योनि त्रिगुणात्मक है और इसमें जो गुण हो,उसके अनुसार ही उसका कर्म और स्वभाव निर्मित होता है। जिन मनुष्यों में सत्वगुण की प्रधानता रहती है–वे अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा भाव रखते हुए,धर्म का आश्रय लिए जीवनपथ पर बढते चले जाते हैं। रजोगुण प्रधान मनुष्य भूत-प्रेत,पीरों-फकीरों के चक्कर उलझा रहता है और तमोगुणी व्यक्ति को तो भौतिक सुखों के अतिरिक्त कुछ ओर दिखाई ही नहीं देता। नास्तिक भाव का प्रादुर्भाव सिर्फ तमोगुणी व्यक्ति में ही होता है।
श्रीमदभागवत गीता भी कहती है—-साथ ही पूर्वजन्म संबंधी अनेक बातें अनेक सामयिकों में भी यदा कदा पढने को मिल ही जाती है। जिसमें कि किसी मनुष्य को अपने पूर्वजन्म की बातों का स्मरण रहता है। इस प्रकार की एक घटना का प्रत्यक्षदर्शी या कहें कि भुक्तभोगी तो मैं स्वयं हूँ। ऎसी ही एक घटना मेरे परिवार में घट चुकी है,जिसके कि आज भी सैकंडों की संख्या में प्रत्यक्षदर्शी मौजूद हैं। खैर…कभी समय मिला तो उस घटना के बारे में फिर कभी लिखूँगा। बहरहाल हम मूल विषय पर बात करते हैं।

इस पूर्वजन्म के आधार पर ही कर्मकाँड में श्राद्धादि कर्म का विधान निर्मित किया गया है। अपने पूर्वजों के निमित दी गई वस्तुएँ/पदार्थ सचमुच उन्हे प्राप्त हो जाते हैं——–
इस विषय में अधिकतर लोगों को संदेह है। हमारे पूर्वज अपने कर्मानुसार किस योनि में उत्पन हुए हैं,जब हमें इतना ही नहीं मालूम तो फिर उनके लिए दिए गये पदार्थ उन तक कैसे पहुँच सकते हैं? क्या एक ब्राह्मण को भोजन खिलाने से हमारे पूर्वजों का पेट भर सकता है? वैसे इन प्रश्नों का सीधे सीधे उत्तर देना तो शायद किसी के लिए भी संभव न होगा,क्यों कि वैज्ञानिक मापदंडों को इस सृ्ष्टि की प्रत्येक विषयवस्तु पर लागू नहीं किया जा सकता। दुनियाँ में कईं बातें ऎसी हैं जिनका कोई प्रमाण न मिलते हुए भी उन पर विश्वास करना पडता है। यहाँ इसके लिए हम एक व्यवहारिक उदाहरण ले सकते है—जैसे कि दवाईयाँ । अमूमन दवा के किसी भी पैक पर उसका फार्मूला या कंटेन्ट् लिखा रहता है। किन्तु हमारे पास इस बात का कोई सबूत नहीं है कि जो दवा हम खा रहे हैं;वास्तव में उसमें उसके पैक पर लिखे सभी कंटैन्स होंगे ही!!! यहाँ हम सिर्फ श्रद्धा से काम लेते हैं। यही सोच हमें कर्मकाँड के विषय में भी रखनी चाहिए। श्रद्धा रखकर ही हम फलप्राप्ति की अपेक्षा करें। मान लीजिए यदि कुछ नहीं भी हुआ तो कोई नुक्सान तो नहीं है न ? अब ये तो बात हुई सिर्फ श्रद्धा की, लेकिन इस विषय में शास्त्रों का कथन है कि–जिस प्रकार मानव शरीर पंचतत्वों से निर्मित है,उसी प्रकार से जो देव और पितर इत्यादि योनियों हैं; प्रकृ्ति द्वारा उनकी रचना नौ तत्वों द्वारा की गई है। जो कि गंध तथा रस तत्व से तृ्प्त होते हैं,शब्द तत्व में निवास करते हैं और स्पर्श तत्व को ग्रहण करते हैं। जैसे मनुष्यों का आहार अन्न है,पशुओं का आहार तृ्णादि,ठीक उसी प्रकार इन योनियों का आहार अन्न का सार-त्तत्व है। वे सिर्फ अन्न और जल का सार-त्तत्व ही ग्रहण करते हैं,शेष जो स्थूल वस्तुएं/पदार्थ हैं,वह तो यहीं स्थित रह जाते हैं।

पितृ्दोष क्या है?

‘सीमा’ एक ऎसा शब्द है,जिससे कि पूरी दुनिया जुडी भी हुई है और उससे प्रभावित भी होती है। प्रत्येक वस्तु,प्रत्येक जीव इस शब्द से प्रत्यक्ष रूप से जुडा हुआ है,सभी की अपनी अपनी सीमाएं हैं। जब भी इस सीमा का,इस मर्यादा का उलंघन किया जाता है तो सदैव अनिष्ट ही होता है। जैसे कि जल को ही ले लीजिए,जब तक जल अपनी मर्यादा में है,हम सब को जीवन देने वाला है। परन्तु यदि जल अपनी सीमाओं को लाँघ दे तो यही प्राणदायी जल बाढ,सुनामी इत्यादि के रूप में हमारे विनाश का कारण भी बन जाता है। वायु जब तक अपने मूल स्वभाव अनुरूप बह रही है तो शीतलता देने वाली है,हमारी साँसें भी इसी के जरिए चल रही है। परन्तु यदि वो अपनी सीमाओं को लाँघ जाए,अनुशासन त्याग दे तो आँधी,तूफान,चक्रवात के रूप में चारों ओर हाहाकार ही सुनाई देगा। अत: यह तो स्पष्ट है कि जब तक प्रत्येक वस्तु,पदार्थ,प्राणी एक सीमा—एक मर्यादा—एक अनुशासन में बंधे हुए हैं,तब तक तो वह सबके लिए उत्तम है। बिल्कुल यही बात हमारे घर-परिवार व धार्मिक संस्कारों पर भी लागू होती है। घर का कोई सदस्य अपनी मर्यादा का उल्लंघन करे,अनुशासन भंग करे तो उसके परिणामस्वरूप सभी पारिवारिक सदस्यों को कष्ट/परेशानी का सामना करना पडेगा ही। एक घर परिवार का अनुशासन टूटेगा,मर्यादा भंग होगी तो उसका प्रभाव आस-पडोस में,मोहल्ले में और बाकी समाज पर भी निश्चित रूप से पडेगा।

इसी प्रकार परिवार के मुखिया द्वारा जो सत्कर्म अथवा दुष्कर्म अपने जीवन में किए जाते हैं,उनका फल उसके जाने के बाद पारिवारिक सदस्यों को भोगना पडता है—विशेषरूप से उसकी संतान को। अब वो फल अच्छा है या बुरा,वो तो उस मुखिया के किए गये कर्मों पर निर्भर करता है। यदि पूर्वज द्वारा अच्छे कार्य किए गये हैं तो निश्चित रूप से वह अपने परिवार को सम्पन्नता एवं प्रसन्नता दे पाएगा। यदि उसने अपने जीवन में अनैतिक कर्मों का ही आश्रय लिया है तो वह अपने परिवार को अपमान एवं दुख के अतिरिक्त ओर क्या दे सकता है।

अक्सर इस प्रकार के बहुत से दुष्परिणामों का एक कारण व्यक्ति की कुंडली में होने वाला पितृदोष भी होता है। जन्मकुंडली में यह दोष अपने किसी पूर्वज द्वारा मर्यादा भंग किए जाने से निर्मित होता है।

लेकिन जो व्यक्ति नियमपूर्वक अपने पूर्वजों के निमित श्राद्धादि कर्म करता है,उसे पितृ्दोष इत्यादि किसी दोष से भय की कोई आवश्यकता नहीं, अन्य किसी प्रकार की बाह्य आडंबर,दिखावा अथवा भारी भरकम पूजा-अनुष्ठान इत्यादि करने की भी कोई आवश्यकता नहीं। क्यों कि श्राद्ध का अर्थ है “श्रद्धा”—अपने पूर्वजों/पितरों के प्रति श्रद्धा भाव रखना। उनके निमित किसी भूखे,गरीब व्यक्ति को भोजन करा दें तो समझिए वही आपके द्वारा किया गया सच्चा श्राद्ध है और पितृ्दोष से पीडित व्यक्ति के लिए दोष निवृ्ति का सबसे बडा उपाय्।

देखा जाए तो हमारे पूर्वजों ने हम पर जो अहसान किए हैं,उनसे मुक्त होने का जो एक माध्यम है–उसी का नाम श्राद्ध है,जिसे कि हमारे आध्यात्मिक और समाजिक जीवन के कर्तव्यों का निर्वहण भी कहा जा सकता है।

ये ज्योतिष शास्त्र है या संभावनाओं का विज्ञान……by पं.डी.के.शर्मा”वत्स”—

यह बात मैं समय समय पर पूर्व के अपने कईं लेखों में कह चुका हूँ कि ज्योतिष पूरी तरह से कर्म आधारित शास्त्र है, हालाँकि ऎसे लोगों की कोई कमी नहीं, जो इस विधा को विज्ञान सिद्ध करने के बेफालतू के प्रयास में जुटे रहते हैं, उन लोगों से मेरा यही कहना रहता है कि क्या विज्ञान में कोई ऎसा सिद्धांत,कोई ऎसी पद्धत्ति है–जिसके जरिए कर्मों को मापा जा सके, मानव के भाग्य, दुर्भाग्य या पुरूषार्थ को किसी कसौटी पर परखा जा सके ?.

दरअसल आज ज्योतिष जैसी इस दैवीय विधा का सबसे अधिक बंटाधार किया है तो सिर्फ इसे विज्ञान साबित करने वाले लोगों ने. ये वो लोग हैं, जो नए नए कपोल कल्पित सिद्धांतों का निर्माण करके कोई काली किताब लिख रहा है,कोई नीली किताब लिख रहा है, कोई कहता है कि फलाना ज्योतिष तो कोई ढिमकाणा ज्योतिष. इस विद्या के वास्तविक सत्य को ये लोग अपने कल्पित सिद्धान्तों के कचरे के ढेर के नीचे कहीं गहरे दबाते चले जा रहे है. कभी इस धरती पर इस विधा के ऎसे ज्ञाता भी हुए हैं, जो कि जन्मपत्रिका देखकर इन्सान के पूर्व तथा आगामी जन्मों का हाल तक बता दिया करते थे,लेकिन आज इस प्रकार की स्थिति हो चुकी है जिसे देख-सुन कर कभी कभी तो हँसी भी आती है ओर रोना भी।

अभी कल एक चैनल पर देखा कि एक ज्योतिषी महाराज गले में ढेरों मालाएं,लाकेट और दोनों हाथों की दसों उंगलियों में रत्नों की अंगूठियाँ धारण किए हुए विराजमान थे, जिन्हे कि सामने बैठा व्यक्ति आचार्य जी के नाम से संबोधित कर रहा था. वो व्यक्ति पत्रों के ढेर में से कोई एक पत्र निकालता ओर भेजने वाले के नाम के साथ उसमे पूछे गए सवाल के बारे में आचार्य जी को बताता. आचार्य जी अपने लैपटाप पर कुछ क्षण( बामुश्किल 1 मिन्ट) ग्रह गणना करते और जिज्ञासु के प्रश्न का उत्तर देने लगते. पत्रों के ढेर में से उन्होने एक पत्र उठाया, जिसमें किसी अविवाहित लडकी नें उनसे सवाल पूछा था कि “पंडित जी,मेरी आयु 26 वर्ष है और माता-पिता मेरी शादी के लिए बहुत चिन्तित है, बहुत से लडके देखे लेकिन कहीं बात नहीं बन रही. कृ्पा करके आप बताइये कि मेरी शादी कब तक हो पाएगी “

अब जरा आचार्य जी का उत्तर सुन लीजिए कि उन्होने क्या जवाब दिया—”आपकी शादी 32 वर्ष की आयु पश्चात होने की संभावना है,किन्तु आपका वैवाहिक जीवन बहुत ही कष्टकारी रहेगा क्यों कि आपकी जन्मकुंडली बता रही है कि आपको जीवनसाथी क्रोधी स्वभाव एवं बुरे कर्म करने वाला मिलेगा. लेकिन आप एक काम कीजिए—शुक्रवार के दिन आप एक लाल रंग का सेब जमीन में दबाएं और प्राणप्रतिष्ठित किया गया नवग्रह लाकेट(न्यौछावर मात्र 5100 रूपये) गले में धारण कर लें तो शीघ्र ही आपका विवाह एक अच्छे कुल में हो जाएगा और आगामी जीवन भी सुखमय व्यतीत होगा.

अब भला कोई इन आचार्य जी से पूछे कि एक ओर तो आप कह रहे हैं कि विवाह 32 वर्ष की आयु पश्चात होने की संभावना है ओर आपका वैवाहिक जीवन कष्टपूर्ण रहेगा वहीं दूसरी ओर आप कह रहे हैं कि ये उपाय कर लें तो विवाह जल्दी हो जाएगा ओर गृ्हस्थ जीवन भी सुखमय व्यतीत होगा. वो भी सिर्फ एक सेब भूमी में दबा देने और लाकेट पहन लेने से. धन्य हो महाराज! भला बताईये कि सेब नहीं हुआ, जादुई चिराग हो गया, जिसे रगडा ओर बस इच्छापूर्ती हो गई. ओर देखिए, सेब और उस लाकेट में इतनी जादुई शक्ति छिपी है कि जो कार्य अब से छ: वर्ष बाद होना था,वो अभी के अभी हो जाएगा. धन्य हो प्रभु!!!!! मैं तो ये नहीं समझ पा रहा हूं कि ये आचार्य किस चीज के हैं! जरूर या तो इन्होने ये आचार्य की पदवी चने देकर हासिल की है या फिर अपनी जिन्दगी में इन्होने सिर्फ गधे हाँके हैं. ज्योतिष से तो इन लोगों का कहीं दूर दूर तक भी वास्ता नहीं. इस दैवीय विधा का पूरी तरह से बेडा गर्क करके रख दिया इन लोगों नें. ज्योतिष शास्त्र को “सम्भावना-शास्त्र” में बदल डाला है.

इनके जैसे पाखंडियों के कारण ही आज हर कोई ऎरा-गेरा जिसे कि ज्योतिष की एक धेले की भी समझ नहीं हैं,इस विधा के औचित्य पर उंगली उठाने लगता है.
मेरी नजर में एक सही ज्योतिषी की यही पहचान है कि ऎसा व्यक्ति कभी भी संभावना जैसे शब्दों का आश्रय नहीं लेगा. अगर जातक के भाग्य में ये होना लिखा है तो पक्का लिखा है. उसे कोई भी दुनिया की ताकत नहीं मिटा सकती. हाँ उपाय का अर्थ सिर्फ इतना है कि यदि भाग्य में किसी अहितकारी घटना का होना लिखा है तो उपाय से हम लोग उसकी तीव्रता को तो अवश्य कम कर सकते हैं किन्तु उसे टाल नहीं सकते. यदि कोई घटना किसी अमुक वर्ष में होनी निश्चित है तो वो उसी समयान्तराल में ही घटित होगी, ये नहीं कि किसी उपाय द्वारा आप उसके समय में किसी भी प्रकार का परिवर्तन कर सकें. ईश्वर द्वारा ये विधा मनुष्य को सिर्फ भविष्य दर्शन हेतु प्रदान की गई है ये नहीं कि इसके माध्यम से आप ईश्वर को ही चुनौती देने लगें.

###भारतीय वैदिक ज्योतिष का एकमात्र रहस्य यह है कि यह शास्त्र चिरन्तन और जीवन से सम्बद्ध सत्य का विश्लेषण करता है. संसार के समस्त शास्त्र जहाँ जगत के किसी एक अंश का निरूपण करते हैं,वहीं वैदिक ज्योतिष शास्त्र आन्तरिक एवं बाह्य दोनों जगतों से सम्बंधित समस्त ज्ञेयों का प्रतिपादन करता है. इसका सत्य दर्शन के समान जीव और ईश्वर से या विज्ञान के समान पदार्थ के घनत्व-तापमान आदि से ही सम्बंद्ध नहीं है,अपितु यह उससे कहीं आगे का भाग है. मानव के समक्ष जहाँ दर्शन एवं भौतिक विज्ञान नैराश्यवाद,वैराग्य अथवा भयोत्पादन की धूमिल रेखा अंकित करता है,वहाँ ज्योतिष उसे कर्तव्य क्षेत्र में ला उपस्थित करता है. साथ ही भविष्य को अवगत करा कर अपने कर्तव्यों द्वारा उसे अनुकूल बनाने के लिए ज्योतिष ही प्रेरणा देता है. यही प्रेरणा प्राणियों के लिए दु:ख-विघातक और पुरूषार्थ साधक होती है.
वैदिक ज्योतिष और कर्म सिद्धान्त के आपसी गहन सम्बन्ध की बात की जाए तो,उसके लिए सबसे पहले तो बताना चाहूँगा कि सम्पूर्ण ज्योतिष शास्त्र सिर्फ इसी कर्म-सिद्धान्त की भित्ति पर खडा है.बल्कि यूँ कहें कि कर्म चक्र का ये सिद्धान्त ही तो इस शास्त्र की आत्मा है.यदि इस आत्मा को इससे विलग कर दिया जाए तो फिर शेष रह जाता है——लाल किताब,काली किताब,सुनहरी किताब और अलाणा ज्योतिष-ढिमकाणा ज्योतिष के रूप में इसका निर्जीव शरीर.और एक मृ्त शरीर सिवाय उस पर पलने वाले जीवों के उदर भरण के, किसी का भला क्या हित साध सकता है.
जो विद्वान इस विद्या के मर्म को जानते है, इसके गहन तत्वों को आत्मसात कर चुके है, वो भलीभान्ती जानते है कि इस आदिकालीन शास्त्र के प्रवर्तक ऋषियों-मुनियों,महर्षियों नें कहीं भी किसी ऎसे निर्दयी विधाता की सत्ता की कल्पना नहीं की,जो जैसे चाहे,जब चाहे,मनुष्य के साथ खेल खेलता रहे. इसके विपरीत यहाँ तो स्पष्ट शब्दों में घोषणा की गई है,कि इस ब्राह्मंड में घटने वाली प्रत्येक घटना एक सुनियोजित,सुनिश्चित नियम द्वारा बँधी है और वो नियम है—कर्म सिद्धान्त. इन्सान को उसके वर्तमान जीवन में जो कुछ भी मिल रहा है,कर्म के नियमों द्वारा सुनिश्चित व सुनियोजित है.एक बार कर्म करके उसका फल तो आपको मिलेगा ही. यद्यपि इन्सान कर्म करने या न करने में अपनी स्वतन्त्र इच्छा-शक्ति का प्रयोग कर सकता है. किन्तु जब एक बार कर्म कर दिया गया,तो फिर उसका फल मिलने से आपको इस सृ्ष्टि की कोई ताकत नहीं रोक सकती—-स्वयं विधाता भी नहीं. उसके बाद कर्म के अनिवार्य फल से बच निकलने का कोई मार्ग नहीं है. हाँ, इन्सान अपनी स्वतन्त्रबुद्धि द्वारा फल की अनुभूति में बहुत कुछ अँशों तक तारतम्य उत्पन कर सकता है,और सतत अभ्यास एवं प्रयास द्वारा अपना भविष्य बना सकता है. एक प्रकार से कहें तो वो अपने भाग्य का सृ्जन कर सकता है……..

ज्योतिष और रोग–by पं.डी.के.शर्मा”वत्स”—

मनुष्य का जन्म ग्रहों की शक्ति के मिश्रण से होता है. यदि यह मिश्रण उचित मात्रा में न हो अर्थात किसी तत्व की न्यूनाधिकता हो तो ही शरीर में विभिन्न प्रकार के रोगों का जन्म होता है. शरीर के समस्त अव्यवों,क्रियाकलापों का संचालन करने वाले सूर्यादि यही नवग्रह हैं तो जब भी शरीर में किसी ग्रह प्रदत तत्व की कमी या अधिकता हो, तो व्यक्ति को किसी रोग-व्याधि का सामना करना पडता है. यूँ तो स्वस्थता,अस्वस्थता एक स्वाभाविक विषय है. परन्तु यदि किसी प्रकार का कोई भयानक रोग उत्पन हो जाए तो वह उस रोगग्रस्त प्राणी के लिए ही नहीं, बल्कि समस्त कुटुम्बीजनों के लिए दु:खदायी हो जाता है.

ज्योतिष सिद्धान्तानुसार प्रत्येक ग्रह प्राणी की संरचना के लिए निम्नलिखित तत्व प्रदान करता है:—

सूर्य:-आत्मा,प्रकाश,शक्ति,उत्साह,तीक्ष्णता,ह्रदय,जीवनीशक्ति,मस्तिष्क,पित्त एवं पीठ
चन्द्र:- जल,नाडियाँ,प्रभाव-विचार,चित्त,गति,स्तन,रूप,छाती,तिल्ली
मंगल:- रक्त,उत्तेजना,बाजू,क्रूरता,साहस,कान
बुध:- वाणी,स्मरण-शक्ति,घ्राण-शक्ति,गर्दन,निर्णायक-मति,भौहें
गुरू:-ज्ञान,गुण,श्रुति,श्रवण-शक्ति,सदगति,जिगर,दया,जाँघ,चर्बी तथा गुर्दे
शुक्र:- वीर्य,सुगन्ध,रति,त्वचा,गुप्ताँग,गाल
शनि:- वायु,पिंडली,टांगें,केश,दाँत
राहू:- परिश्रम,विरूद्धता,आन्दोलन/विद्रोही भावनाएं,शारीरिक मलिनता,गन्दा वातावरण
केतु:- गुप्त विद्या-ज्ञान,मूर्छा,भ्रम,भयानक रोग,सहनशक्ति,आलस्य

यदि ग्रह प्रभावी न हो तो रोग नहीं होते. यह स्थिति तब भी उत्पन हो सकती है,जब अपनी निश्चित मात्रा के अनुसार कोई ग्रह प्राणी पर प्रभाव न डाल पाए. उदाहरण के लिए—-सूर्य के साथ( विशेष अंशो में) कोई ग्रह स्थित हो तो वो ग्रह अपना प्रभाव नियमानुसार नहीं दे पाएगा. अब ग्रह जिस शक्ति का स्वामी है,वह शक्ति जब निश्चित मात्रा में जब प्राणी को नहीं मिल पाती तो ऎसे में विभिन्न जटिल स्थिति पैदा होना तय है. शुक्र सौन्दर्यानुभूति प्रदायक ग्रह है. यदि शुक्र सूर्य के प्रकाश में अस्त हो जाए तो वह व्यक्ति की सौन्दर्यशीलता में कमी करेगा ही. ऎसे ही,यदि मंगल सूर्य के प्रभाव क्षेत्र में हो तो व्यक्ति को रक्ताल्पता जैसी शारीरिक व्याधि का सामना करना पड जाता है. कहने का तात्पर्य ये है कि जो भी ग्रह सूर्य के प्रभाव में आकर निस्तेज होगा,शरीर में उस ग्रह से सम्बंधित तत्वों में न्यूनता रहेगी.

शारीरिक असुविधाएं तथा रोग—–by पं.डी.के.शर्मा”वत्स”—-

आज हम लोगों नें स्वास्थय की समस्या को बिल्कुल टेढी खीर बना डाला है, स्वाभाविकता और सादगी तो जैसे बिल्कुल ही दूर भाग चुकी है. हम प्रकृ्ति के नियमों को न तो समझते हैं और न ही समझ कर उन्हे मानते हैं. बस हम अपनी जिम्मेदारी कभी मौसम पर, कभी जलवायु पर, कभी चिकित्सकों पर तो कभी दवाओं पर—और सब से अधिक जीवाणुओं/विषाणुओं पर डाल देते हैं.

प्रकृ्ति के नियमों के अनुरूप जीवन व्यतीत कर स्वस्थ रहना आसान है. स्वास्थय मानव शरीर की स्वाभाविक अवस्था है. मनुश्य, जैसा कि वह देखने में मालूम होता है, वैसा नहीं है. उससे कहीं ऊँचा है. वह पृ्थ्वी पर रोगी बने रहने के लिए नहीं आया है. वह स्वर्गीय है, ईश्वरीय है,दिव्य है. यदि वह अपने वास्तविक बडप्पन को समझे और उसी के अनुरूप जीवन व्यतीत करे तो वह कभी भी रोग ग्रस्त न हो. ऎसे ही जीने को जीना कहा जाता है और वैसा जीना, जिसमें हर रोज कोई न कोई रोग पीछे लगा है,मरने से भी बुरा है.

आज बनावटी सभ्यता के इस युग में प्रकृ्ति के ये नियम कहीं खो से गए हैं और किसी को समझाओ तो भी जल्दी से किसी को समझ में भी नहीं आते, या कहें कि कोई समझना ही नहीं चाहता. अगर कोई समझाने का प्रयास भी करता है तो सुनने वाले ताज्जुब करने और हँसने लगते हैं.

रोगों का कारण:-
सृ्ष्टि के प्रत्येक क्रियाकलाप की भान्ती ही रोगों के बारे में भी कार्य-कारण का सिद्धान्त काम करता है. जब रोग के सही कारण का पता चले तो ही हम उन कारणों को दूरकर रोग को जड-मूल से भगा सकते हैं. और यदि सच्चे कारण को न जाना, केवल इधर-उधर की या ऊपरी बातों को ही जानकर संतुष्ट हो गए, तो, एक के बाद एक दूसरा और दूसरे के बाद तीसरा रोग बना रहेगा. और जैसा कि अब है, मैडीकल साईंस की इतनी उन्नति और गली गली में डाक्टरों की मौजूदगी के बावजूद दुनिया बीमारियों की खान बनी हुई है,और रहेगी भी.

सच पूछिए, तो सारे रोगों का एक ही कारण है—-शरीर में विकार का आ जाना. मनुष्य शरीर प्रकृ्ति के नियमों के अनुसार अपने को बराबर ही साफ सुथरा और स्वस्थ रखना चाहता है. हर रोज हम देखते हैं कि शरीर के अन्दर यह क्रिया बराबर ही जारी रहती है, जिससे भीतर की गन्दगी शरीर से बाहर निकाल दी जाती है. गन्दगी दूर होने के चार ढंग या रास्ते हैं—–फेफडे से सारे शरीर की एक खास तरह की गन्दगी लेकर सांस का बाहर आना, त्वचा से पसीने के रूप में गन्दगी का बाहर निकलना, शौच और मूत्र के रूप में गन्दगी का निष्काषन. यदि इन साधारण विधियों से शरीर के अन्दर का विकार नहीं निकल पाता तो शरीर द्वारा अन्य असाधारण ढंग काम में लाए जाते हैं. इस हालत में शरीर की शक्तियाँ तेजी के साथ दूसरे ढंगों से सफाई का काम शुरू कर देती हैं. या तो शरीर के अन्दर की गर्मी ज्वर के रूप में बढकर भीतर की गन्दगी को जला देती है या कुछ दस्त ज्यादा आते हैं या ऎसी ही कोई असाधारण बात होती है, जिससे शरीर के अन्दर की सफाई हो जाती हैं. याद रहे, शरीर की रक्षा के लिए विकारों का बाहर निकल जाना आवश्यक है. इसी से जब जब भी शरीर द्वारा अन्य असाधारण ढंग से सफाई अभियान चलाया जाता है—–तभी कहा जाता है कि रोग हुआ. वैसे तो रोग का नाम ही बुरा है, लेकिन इस तरह गहराई में जाकर देखने से पता चलता है कि शरीर की गन्दगी को बाहर निकाल फैंकनें के लिए, विकारों को जला देने के लिए, प्रकृ्ति की ओर से अपनाया गया ये साधारण ढंग अपने आप में एक जबरदस्त साधन हैं.

अब जो बात सबसे महत्वपूर्ण है, वो ये कि शरीर द्वारा भीतरी अशुद्धियों के निष्काषण के परिणाम स्वरूप उत्पन हुई जिन स्थितियों को हम रोग कहकर पुकारते है, दरअसल ये रोग नहीं होते—ये होती हैं असुविधाएं. रोग तो वह है जो मनुष्य के किसी अंग का कार्य-संचालन रोक देता है. एक दुबला-पतला आदमी अपना कार्य करने में कुशल है. यदि उसके समस्त अंग ठीक हैं तो वह स्वस्थ है और अगर एक हष्ट-पुष्ट मनुष्य अपने अंगों का प्रयोग ठीक से नहीं कर पाता तो वह रोगी माना जाएगा.

ब्राह्मंड की भान्ती ही मानवी शरीर भी जल,पृ्थ्वी,अग्नि,वायु एवं आकाश नामक इन पंचतत्वों से ही निर्मित है और ये पँचोंतत्व मूलत: ग्रहों से ही नियन्त्रित रहते हैं. आकाशीय नक्षत्रों(तारों, ग्रहों) का विकिरणीय प्रभाव ही मानव शरीर के पंचतत्वों को उर्जस्वित करता है. इस उर्जाशक्ति का असंतुलन होने पर अर्थात जब भी कभी इन पंचतत्वों में वृ्द्धि या कमी होती है या किसी तरह का कोई “कार्मिक दोष” उत्पन होता है,तब उन तत्वों में आया परिवर्तन एक प्रतिक्रिया को जन्म देता है. यही प्रतिक्रिया रोग के रूप में मानव को पीडित करती है. एक रोग वह है,जिससे शरीर का कोई अंग सामान्य रूप से कार्य नहीं कर पाता. इसका समाधान करने के लिए भी कईं विज्ञान हैं,सैकडों प्रकार की औषधियाँ हैं,जिनके माध्यम से रोग मुक्त हुआ जा सकता है. परन्तु कईं ऎसे रोग भी हैं,जिनका सम्बंध आत्मा से होता है (यह विषय अत्यधिक विस्तार माँगता है, सो इसे कभी अलग से किसी पोस्ट के जरिए स्पष्ट करने का प्रयास रहेगा). उनका समाधान दवाओं तथा डाक्टरों,हस्पतालों के जरिए नहीं हो सकता. उसके लिए तो सिर्फ अपने कर्मों की शुद्धता तथा आध्यात्मिकता ही एकमात्र उपाय है.

हमारे इस शरीर की स्थिति के लिए जन्मकुंडली का लग्न(देह) भाव, पंचमेश और चतुर्थेश सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. लग्न भाव देह को दर्शाता है,चतुर्थेश मन की स्थिति और पंचमेश आत्मा को. जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में लग्न(देह),चतुर्थेश(मन) और पंचमेश(आत्मा) इन तीनों की स्थिति अच्छी होती है,वह सदैव स्वस्थ जीवन व्यतीत करता है.

रोगों से बचाव और मुक्ति का रामबाण हल:–

वर्तमान युग को यदि “लोहयुग” कहा जाए तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी. अन्य सभी धातुओं को कहीं पीछे छोड आज लोहा हमारे समूचे जीवन में कितना अधिक समा चुका है. जीवन के हर क्षेत्र में बस इसी धातु की घुसपैठ दिखाई पडती है ——दरअसल बीमारीयों/रोगों का मूल कारण भी यही है. हम भोजन इत्यादि के लिए जिन पात्रों(बर्तनों) का प्रयोग करते हैं, उस धातु का कितना अधिक प्रभाव हमारे शरीर पर पडता है, ये शायद हम लोग नहीं जानते. ज्योतिष की बात की जाए तो इसमें लोहा/स्टील शनि ग्रह की धातु मानी जाती है. जिसका प्रभाव मुख्य रूप से मानव शरीर के वात-संस्थान पर पडता है. लोहे का अधिक मात्रा में किया गया उपयोग शरीरगत अग्नितत्व(सूर्य, मंगल प्रभाव) एवं आकाशतत्व( बृ्हस्पति प्रभाव) को दूषित कर मानवी शरीर को रोगों का विश्राम गृ्ह बना देता है.

अग्नितत्व दूषित होने से रक्त और पितजन्य विकार, मसलन रक्त विकार, शिरोरोग, ह्रदयघात, पीडा, चक्कर, नेत्रकष्ट, स्मृ्तिनाश, मृ्गी, विक्षिप्तता, भ्रम, आन्त्रशोथ, मंदाग्नि, अतिसार और अजीर्ण तथा आकाशतत्व के दूषित होने से शोथ, गुल्म, ब्रण, चर्मदोष आदि इन प्रक्रियात्मक(Functional) रोगों में से किसी न किसी एक अथवा एक से अधिक व्याधि से आज के युग में अधिकतर व्यक्ति पीडित है.

आईये जानते हैं कि आप अपनी जन्मकुंडली के अनुसार कैसे निज शरीर का विभिन्न प्रकार के रोगों से बचाव और उनसे मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं:—

1. मेष, सिँह, वृ्श्चिक लग्न के व्यक्ति यदि भोजन के लिए ताँबे के बर्तनों का प्रयोग करें तो जहाँ एक ओर ये उनके पित्त को निर्दोष रख, गुर्दे का रोग, ह्रदय दौर्बल्य, मेद रोग, रक्त व्याधि, यक्ष्मा, अर्श-भगंदर इत्यादि किसी प्रकार के पुराने चले आ रहे रोग के लिए रामबाण औषधी का काम करेगा, वहीं इसके नियमित प्रयोग से नया रोग भी उनके नजदीक फटकने से पहले सौ बार सोचेगा.
2. मिथुन,कन्या, धनु और मीन लग्न के व्यक्तियों द्वारा लोह(स्टील) पात्रों का अधिक मात्रा में प्रयोग विस्मृ्ति(यादद्दाश्त में कमी), अनिन्द्रा, गठिया, जोडों का दर्द, मानसिक तनाव, अमलता, आन्त्रदोष इत्यादि किसी रोग का कारण बनता है. इनके लिए भोजन में काँसे के बर्तनों को प्रयुक्त करना शारीरिक रूप से सदैव हितकारी रहेगा.
3. वृ्ष, कर्क, तुला लग्न के व्यक्तियों को सदैव भोजन के लिए चाँदी और पीतल(मिश्र धातु) दोनों प्रकार के बर्तनों का संयुक्त रूप से प्रयोग करना चाहिए. लोह पात्रों का अधिकाधिक उपयोग इनके लिए नेत्र पीडा, स्वाद ग्रन्थियाँ, कफजन्य रोग, असन्तुलित रक्त प्रवाह, कर्णनाद, शिरोव्यथा, श्वासरोग इत्यादि किसी रोग-व्याधी का कारण बनता है.
4. मकर लग्न के व्यक्ति के लिए अन्य किसी भी धातु के सहित प्रतिदिन लकडी के पात्र का प्रयोग करना भी इन्हे वायु दोष, चर्म रोग, विचार शक्ति की उर्वरता में कमी, एवं तिल्ली के विकारों से मुक्ति में सहायक और भविष्य में उनसे बचाव हेतु रामबाण इलाज है.
5. कुम्भ लग्न के व्यक्ति के लिए तो लोहा(स्टील) ही सर्वोतम धातु है. इसके साथ ही इस लग्न के व्यक्तियों को यदाकदा मिट्टी के पात्र में “केवडा मिश्रित जल” का भी सेवन करते रहना चाहिए.

सुखी दाम्पत्य जीवन का आधार—सप्तपदी—by पं.डी.के.शर्मा”वत्स”—

विवाह के समय लिए जाने वाले सात वचन सात जन्मों तक साथ रहने का प्रतीक माने जाते हैं, किन्तु आज इन वचनों से भला कितने लोग ठीक से परिचित हैं…..

विवाह समय फेर इत्यादि समस्त आवश्यक कार्य हो जाने पर भी जब तक कन्या वर के वाम भाग में नहीं आती, तब तक विवाह कार्य सम्पन्न नहीं होता तथा कन्या भी तब तक कुमारी ही कहलाती है. यहाँ पर कन्या वर से सात वचन माँगती है, जिनसे उसके भावी जीवन की सुरक्षा, मान-सम्मान, गरिमा-गौरव तथा अस्मिता की रक्षा हो सके. पति द्वारा इन वचनों को स्वीकारने के पश्चात वह निश्चिंत होकर भावी जीवन का प्रारम्भ करती है. इस प्रकार से जो ये सात वचन माँगे जाते हैं, वे सप्तपदी के रूप में प्रचलित हैं. प्राचीनकाल से इन वचनों का हिन्दू समाज में बहुत अधिक प्रभाव रहा है. यह सात वचन वर-वधू को सुखी दाम्पत्य जीवन की ओर प्रेरित करते हैं.

कन्या का विवाह करते समय किसी भी माता-पिता के मन में यह आशंका तो रहती है कि विवाह पश्चात उनकी पुत्री का जीवन कैसा व्यतीत होगा? ससुराल में उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा? माता-पिता की इसी आशंका को दूर करने के लिए ही युगों पूर्व ऋषि-मुनियों द्वारा ऎसी व्यवस्था की गई, जिससे विवाह पश्चात कन्या को किसी कष्ट का सामना न करना पडे. इसके लिए कन्या पति के वामांग में आने से पूर्व उससे ये सात वचन मांगती है—

यही सातों वचन दाम्पत्य सम्बन्धों को सुदृ्ड आधार प्रदान करते हैं. कभी जिस समय यह व्यवस्था बनाई गई होगी, उस युग में पुरूष दिए गए वचनों को पूरी तरह से निभाने को संकल्पशील होता होगा. कहा भी तो गया है कि “प्राण जाई पर वचन न जाई”. विवाहोपरान्त पत्त्नि की समस्त आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ साथ उसकी अस्मिता तथा गरिमा की रक्षा का दायित्व भी पति का ही होता था, इसलिए यह वचन भी पति से ही लिए जाते ताकि वह पत्नि का पूर्ण रूप से ध्यान रख सके. पति भी जी जान से अपने वचनों को निभाता था. इस कारण तब दाम्पत्य सम्बंधों में भी मधुरता, प्रेम, अनुराग, समर्पण आदि देखने को मिलता था. लेकिन आज के जमाने में भला किसी शपथ, संकल्प या वचन की कीमत ही क्या रह गई है. जहाँ लोग जुबान देकर मुकरने में एक पल भी नहीं लगाते तो वहा जीवनभर इन वचनों पर खरा उतर पाने की उम्मीद भी कहाँ की जा सकती है……

बहरहाल दूसरी ओर, आज शादी-विवाह के अवसर पर जल्दबाजी भी इतनी मची होती है कि विवाह सम्पन्न कराने वाले पंडित जी क्या कह रहे हैं, इसकी तरह किसी का ध्यान भी नहीं जाता. वे न तो इन सात वचनों के भाव को समझ पाते हैं और न ही इनका महत्व जान पाते हैं.

वर्तमान में दाम्पत्य सम्बंधों के कमजोर होने तथा टूटने-बिखरने का सम्वतय: यह भी एक बडा कारण हो सकता है.

सात वचन—सुखी जीवन के सात आधार स्तम्भ—–

विवाह समय पति द्वारा पत्नि को दिए जाने वाले सात वचनों के महत्व को देखते हुए यहाँ उन वचनों के बारे में कुछ जानकारी देने का प्रयास कर रहा हूँ. यदि आज भी इनके महत्व को समझ लिया जाता है तो दाम्पत्य सम्बन्धों में उत्पन अनेक समस्यायों का समाधान स्वत: ही हो जाएगा.

1.तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी!
यहाँ कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना. कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांती ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें. यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.)
किसी भी प्रकार के धार्मिक कृ्त्यों की पूर्णता हेतु पति के साथ पत्नि का होना अनिवार्य माना गया है. जिस धर्मानुष्ठान को पति-पत्नि मिल कर करते हैं, वही सुखद फलदायक होता है.पत्नि द्वारा इस वचन के माध्यम से धार्मिक कार्यों में पत्नि की सहभागिता, उसके महत्व को स्पष्ट किया गया है.

2.पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!
(कन्या वर से दूसरा वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ)
यहाँ इस वचन के द्वारा कन्या की दूरदृ्ष्टि का आभास होता है. आज समय और लोगों की सोच कुछ इस प्रकार की हो चुकी है कि अमूमन देखने को मिलता है–गृ्हस्थ में किसी भी प्रकार के आपसी वाद-विवाद की स्थिति उत्पन होने पर पति अपनी पत्नि के परिवार से या तो सम्बंध कम कर देता है अथवा समाप्त कर देता है. उपरोक्त वचन को ध्यान में रखते हुए वर को अपने ससुराल पक्ष के साथ सदव्यवहार के लिए अवश्य विचार करना चाहिए.

3.जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात
वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!
(तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप मुझे ये वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं(युवावस्था, प्रौढावस्था, वृ्द्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगें, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ)

4.कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!
(कन्या चौथा वचन ये माँगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से पूर्णत: मुक्त थे. अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ती का दायित्व आपके कंधों पर है. यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतीज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूँ )
इस वचन में कन्या वर को भविष्य में उसके उतरदायित्वों के प्रति ध्यान आकृ्ष्ट करती हैं. विवाह पश्चात कुटुम्ब पौषण हेतु प्रयाप्त धन की आवश्यकता होती है. अब यदि पति पूरी तरह से धन के विषय में पिता पर ही आश्रित रहे तो ऎसी स्थिति में गृ्हस्थी भला कैसे चल पाएगी. इसलिए कन्या चाहती है कि पति पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर होकर आर्थिक रूप से परिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ती में सक्षम हो सके. इस वचन द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र का विवाह तभी करना चाहिए जब वो अपने पैरों पर खडा हो प्रयाप्त मात्रा में धनार्जन करने लगे.

5.स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!
(इस वचन में कन्या जो कहती है वो आज के परिपेक्ष में अत्यंत महत्व रखता है. वो कहती है कि अपने घर के कार्यों में, विवाहादि, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मन्त्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ)
यह वचन पूरी तरह से पत्नि के अधिकारों को रेखांकित करता है. बहुत से व्यक्ति किसी भी प्रकार के कार्य में पत्नि से सलाह करना आवश्यक नहीं समझते. अब यदि किसी भी कार्य को करने से पूर्व पत्नि से मंत्रणा कर ली जाए तो इससे पत्नि का सम्मान तो बढता ही है, साथ साथ अपने अधिकारों के प्रति संतुष्टि का भी आभास होता है.

6.न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम!!
(कन्या कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूँ तब आप वहाँ सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगें. यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ)
वर्तमान परिपेक्ष्य में इस वचन में गम्भीर अर्थ समाहित हैं. विवाह पश्चात कुछ पुरूषों का व्यवहार बदलने लगता है. वे जरा जरा सी बात पर सबके सामने पत्नि को डाँट-डपट देते हैं. ऎसे व्यवहार से बेचारी पत्नि का मन कितना आहत होता होगा. यहाँ पत्नि चाहती है कि बेशक एकांत में पति उसे जैसा चाहे डांटे किन्तु सबके सामने उसके सम्मान की रक्षा की जाए, साथ ही वो किन्ही दुर्वसनों में फँसकर अपने गृ्हस्थ जीवन को नष्ट न कर ले.

7.परस्त्रियं मातृ्समां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!
(अन्तिम वचन के रूप में कन्या ये वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें. यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.)
विवाह पश्चात यदि व्यक्ति किसी बाह्य स्त्री के आकर्षण में बँध पगभ्रष्ट हो जाए तो उसकी परिणिति क्या होती है–ये आप सब भली भान्ती से जानते हैं. इसलिए इस वचन के माध्यम से कन्या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है.

देखा आपने कि किस प्रकार ईश्वर को साक्षी मानकर किए गए इन सप्त संकल्प रूपी स्तम्भों पर सुखी गृ्हस्थ जीवन का भार टिका हुआ है……..

इन वैदिक उपायों से मन भी मान जाता है……..by पं.डी.के.शर्मा”वत्स”—

प्राय: लोगों की यह शिकायत होती है कि हमारा मन पढाई में नहीं लगता या अमुक बुराई से हटता नहीं. इच्छा तो बहुत करते हैं, धर्मानुष्ठान भी करते हैं, उसके लिए दान- जाप और उपासना इत्यादि का भी सहारा लेते हैं, किन्तु मन है कि सही मार्ग की ओर अग्रसर होता ही नहीं. हम अपनी ओर से बहुत प्रयास करते हैं, लेकिन वो है कि फिर उसी ओर भागने लगता है. जब इस प्रकार की बातें सुनने को मिलती हैं तो लगता है कि मन ही सब कुछ है, वही जीवन की सम्पूर्ण गतिविधियों का संचालन कर्ता है.
यह बात यदि मान भी लें तो यह नहीं कहा जा सकता कि मन स्वभावत: अधोमुखी है. दरअसल हमारी रूचि जिन विषयों में होती है, हम उन्ही का चिन्तन करने लगते हैं और उन्ही में तृ्प्ती अनुभव करते हैं. मन को जब किसी विषय में रूचि नहीं होती, तभी वह अन्यत्र भागता है. कल्याणकारी विषयों से दुराव और विपरीत दिशा की ओर भटकता मन ही मानवी दुख का सबसे बडा कारण बनता है. इस अवस्था से तब तक छुटकारा नहीं पाया जा सकता, जब तक मन को वहाँ से हटाकर उसे अन्य किसी उपयोगी विषय में नहीं लगा पाते.जीवन साधना का प्रमुख कर्तव्य भी यही है कि हमारी मानसिक चेष्टाएँ पतनोन्मुख न होने पाएं.
चलिए अब बात करते हैं कि वैदिक ज्योतिष का आधार लेकर हम अपने मन को किस प्रकार विपरीत विषयों, व्यसनों से दूर कर अनुकूल विषय की ओर मोड सकते हैं. इसके लिए मन से जुडी हुई कुछ समस्यायों के लिए बेहद आसान एवं सटीक उपाय दिए जा रहे हैं:—-
विद्याध्ययन (पढाई) में अरूचि:-
1. अब एक व्यक्ति विद्याध्ययन करना चाहता है किन्तु उसका मन पढाई की ओर न लगकर अन्य किसी ओर जैसे खेलना, घूमना-फिरना या फिर यूँ ही पढते समय आलस हावी होने लगता है तो उसके लिए:—
(A) अगर बालक की खेल-कूद में अधिक रूचि उसकी विद्याध्ययन में बाधा उत्पन कर रही है तो उसकी जन्मपत्रिका के चतुर्थेश( Lord of 4th house) का रत्न (Gem stone) चाँदी में धारण करवा दिया जाए और साथ में गरिष्ठ भोजन की अपेक्षा उसे जलीय पदार्थों का सेवन अधिक मात्रा में करने को दिया जाए तो आप देखेंगें कि उसका मन कुछ ही दिनों में खेल-कूद की ओर से मुडने लगेगा.
(B) ऎसे ही यदि कारण उसका अधिक घूमना-फिरना, मित्र संगति है तो उसे लग्नेश (Lord of 1st house) का रत्न धारण करा दिया जाए. साथ में किसी प्रकार (चाहे कुछ देर के लिए ही सही) उसे नियमित रूप से व्यायाम करने को कहा जाए तो उसका मन स्वत: ही भ्रमणकारी प्रवृ्ति तथा अत्यधिक मित्र-संगति से मुख मोड लेगा.
(C) यदि आलस के कारण पढाई में मन नहीं लग रहा तो उसके लिए व्यक्ति पंचमेश(Lord of 5th house) रत्न तांबें में या नवमेश (Lord of 9th house) का रत्न सोने में धारण कर ले, साथ में उसे खाने में नमक की अपेक्षा मीठा अधिक मात्रा में दिया जाए तो आलस चुटकियों में गायब समझिए……
विभिन्न प्रकार के व्यसनों से मुक्ति (Get rid of addiction) :—-
2. जो व्यक्ति भाँग के अतिरिक्त शराब इत्यादि अन्य किसी प्रकार के नशे का शिकार है और वो नशे को छोडना भी चाहता है किन्तु आत्मबल की कमी एवं मन की दुष्प्रवृ्ति उसे व्यसन से मुक्त नहीं होने दे पा रही तो ऎसा व्यक्ति यदि द्वितीयेश ( Lord of 2nd house) और नवमेश (Lord of 9th house) का रत्न एक साथ धारण करे और खानपान में चरपरे पदार्थों की कमी करके खट्टे पदार्थों का सेवन अधिकाधिक मात्रा में करे तो धीरे धीरे उसका मन स्वत: ही व्यसन से दूर भागने लगेगा.
* सिर्फ एकमात्र ये ध्यान रहे कि धारण किए जा रहे रत्न(Gem stone) का स्वामी ग्रह जन्मकुंडली में नीच राशि में स्थित न हो.
अनुकूल किया हुआ मन ही मनुष्य का सहायक है और इससे बढकर उसका उद्धारकर्ता संसार में शायद ही कोई हो. जिस मन पर मनुष्य की उन्नति अवलम्बित है, उसे इच्छित, अनुकूल एवं कल्याणकारी विषय की ओर मोडने के लिए वैदिक ज्योतिष के इन उपायों से बढकर अन्य कोई भी श्रेष्ठ किन्तु सरल माध्यम नहीं हो सकता.

इस बात को तो प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि ज्योतिष के माध्यम से भविष्य की वास्तविक जानकारी हेतु व्यक्ति के पास अपनी जन्मपत्रिका अथवा सही जन्म विवरण यथा जन्म तारीख, जन्म समय, जन्म स्थान का होना परम आवश्यक है, जिसके आधार पर ही उसके जन्मकालीन ग्रहों के माध्यम से उसके भविष्य का स्पष्ट आंकलन किया जा सकता है. किन्तु अपने भविष्य के बारे में जानने के अथवा अपने जीवन की किसी समस्या, बाधा से मुक्ति हेतु समाधान प्राप्ति के इच्छुक जनों की ओर से हमें रोजाना प्राप्त होने वाली ढेर सारी ई-मेल में से अक्सर कुछ संख्या ऎसे लोगों की भी होती हैं, जिन्हे अपना जन्म विवरण भी ज्ञात नहीं होता, लेकिन उनके पास होता है तो सिर्फ एक विश्वास, एक उम्मीद कि शायद यहाँ से उन्हे अपनी किसी समस्या का कोई समाधान मिल जाए. सो, आज की यह पोस्ट ऎसे ही पाठकों तथा उनके द्वारा अक्सर रखी जाने वाली कुछ समस्यायों के निवारणार्थ प्रस्तुत है:——.
पराविज्ञान का क्षेत्र जिसमें ज्योतिष सहित तंत्र, मंत्र, योग तथा टोटके इत्यादि विषय आते हैं, परम्परागत प्राचीन भारतीय धरोहर हैं.ये सब विषय आदि काल से मानव के साथ जुडे हुए हैं. भय, रोग, संतान संबंधी समस्याएं तथा वैवाहिक विषमताएं जैसी समस्याएं अथवा धन-संपत्ति, सामाजिक मान-सम्मान, घर में सुख-शांती, युद्ध, शत्रु दमन जैसी अभिलाषाएं भी अनंत काल से मानव के हर्ष-विषाद का कारण रही हैं. अत: मानव के अभ्युदय के साथ ही,पूर्ण सफलता उन्ही व्यक्तियों को मिलती देखी गई है, जो लौकिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में प्रयास करते हैं. ईश्वर की आराधना, जप, भजन, दान, संत सेवा, तीर्थ यात्रा भ्रमण, धार्मिक स्थल निर्माण इत्यादि जहाँ आध्यात्मिक कर्म क्षेत्र है, वहीं भौतिक उपलब्धियों को पाने के उपाय, जिनमें धन-वैभव,मान-सम्मान-सुखी गृ्हस्थ आते हैं, लौकिक कर्म हैं. इनमें यदि टोटका रूपी उपायों की बात की जाए तो उन्हे निम्न प्रकार से समझा जा सकता है:-
शाब्दिक रूप से टोटका रूपी इस प्रकार के त्वरित उपाय का आशय ऎसे कार्य से लिया जाता है,जिसके द्वारा कोई कठिन कार्य सफलतापूर्वक एवं शीघ्रता से पूर्ण कर लिया जाता है । टोटके वास्तव में तन्त्र विधा का ही एक भाग हैं.वास्तुशास्त्र,तन्त्रशास्त्र एवं शकुनशास्त्र इत्यादि अनेक विधाओं में विभिन्न कामनाओं की शीध्रता एवं सरलतापूर्वक पूर्ति हेतु इन उपायों का प्रयोग किया जाता है। ऎसे उपाय वस्तुत: सर्वव्यापी है । प्राचीनकाल से लेकर अब तक सभी युगों में तथा आदिवासी अशिक्षित समाज से लेकर मध्यम वर्ग एवं उच्च वर्गीय समाज तक कहीं ना कहीं सदैव इस प्रकार के उपायों का प्रचलन रहा है । इनके प्रचलन के भी मुख्यत: दो कारण हैं। प्रथम तो इनका चमत्कारी प्रभाव और दूसरा व्यक्ति के अन्तर्मन में व्याप्त असफलता का भय.जो व्यक्ति अपनी सफलता के प्रति अधिक सचेत रहता है, वह टोटका आदि पराविधाओं की ओर उन्मुख भी होता है;क्योंकि कहीं न कहीं उसके मन में असफलता का भय व्याप्त रहता है।
इस प्रकार के टोटके रूपी उपाय जीवन में यदा कदा उपयोग में लाए जाते ही रहे हैं.लेकिन फिर भी अपनी बुद्धि-विवेक से ही निर्णय लेना चाहिए. वैसे भी इन्सान को सदैव अपने जीवन में तथ्यपरक होना चाहिए. यद्यपि ये सब अपने आप में पवित्र एवं सफल क्रियाएं रही हैं, परन्तु इनसे उचित तथा अपेक्षित लाभ हेतु विश्वास, संयम एवं समय की भी अपनी एक महता है. ये विद्याएं आदि काल से समाज द्वारा उपयोग में लाई जाती रही हैं और इनके जीवंत रहने का आधार इनसे जुडा विश्वास ही है, जो सदियों से अटूट तो है, पर अंधा कदापि नहीं हैं.
अक्सर जीवन में बहुत बार ऎसा भी देखने में आता है कि मानव की अनेक समस्याओं के समाधान, रोग उपचार में जहाँ विज्ञान असफल हो जाता है, वहाँ एक छोटा सा नुस्खा उपाय ऎसा चमत्कारी लाभ दे जाता है कि मानने को विवश हो जाना पडता है कि इन सब के पीछे कहीं कुछ तो ऎसा है, जिसे इन्सानी बुद्धि अभी तक समझ नहीं पा रही.
पारिवारिक मतभेद, गृ्ह-कलह इत्यादि से मुक्ति हेतु कुछ स्वनुभूत उपाय:-
व्यक्ति के जीवन में पारिवारिक कलह सबसे बडी समस्या के रूप में सामने आता है. इन्सान जीवन की अन्य समस्यायों से तो निज आत्मविश्वास एवं परिवारजन के सहयोग से पार पा लेता है, लेकिन गृ्ह क्लेश से एकदम टूट जाता है. घर परिवार में नित्यप्रति का कलह क्लेश इन्सान को शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक–इन तीनों पक्ष से पीडित कर उसके प्रगति मार्ग को ही अवरूद्ध कर डालता है. फलस्वरूप जीवन में सिवाए दुखों के कुछ भी हाथ नहीं लगता…..ऎसे व्यक्ति, जो पारिवारिक अशान्ती रूपी कष्ट झेल रहे हैं, उनके लिए कुछ बेहद सरल, किन्तु पूर्णत: फलदायी उपाय दिए जा रहे हैं. श्रद्धा एवं विश्वास को आधार में रखकर, उनमें से किसी एक या दो उपायों को किया जाए तो निश्चय ही गृ्ह कलह से राहत प्राप्त कर सकेंगें.:—–
1.जिस परिवार में नित्य क्लेश, कलह, अशांती का वास रहता हो तो उससे मुक्ति एवं सुख-सौहार्द की अभिवृ्द्धि हेतु ऎसे परिवार की गृ्हणी को सूर्योदय से पूर्व ही जगना चाहिए और घर की साफ-सफाई इत्यादि कर लेनी चाहिए. तत्पश्चात स्नानादि क्रिया से निवृ्त हो सूर्योदय समय सूर्यदेव को अर्घ्य देना चाहिए. ऎसा करने से सिर्फ कुछ ही दिनों में गृ्ह क्लेश से मुक्ति मिलने लगती है और धीरे धीरे परिवार के सभी मतभेद समाप्त हो,आपसी प्रेम एवं सौहार्द का वास होने लगता है.
2. यदि कलह पति-पत्नि के मध्य है तो दम्पति को वृ्हस्पतिवार के दिन श्री लक्ष्मीनारायण के मन्दिर में दर्शनार्थ अवश्य जाना चाहिए. वहाँ बेसन की कोई मिठाई प्रशाद रूप में वितरित करें.
3. घर के पूजनस्थल में एक शंख अवश्य रखें. नित्य अथवा सप्ताह में कम से कम दो बार ( किसी भी दिन) प्रात: समय शंख में जल भरकर रखें तथा संध्याकाल में उस जल को घर में चारों ओर थोडा थोडा छिडक दें.
4. घर की उत्तर दिशा में स्फटिक का श्रीयन्त्र तथा चाँदी की छोटी छोटी चरण पादुका बनवाकर स्थापित करें.
व्यक्ति को ऋण मुक्त कराने में यह उपाय अवश्य ही सहायता करेगा:——
न्यूनतम दस मंगलवार लगातार नियमित रूप से शिव लिंग पर मसूर की दाल ॐ ऋण मुक्तेश्वर महादेवाय नम: मन्त्र का उच्चारण करते हुए अर्पित करें तो अवश्य ही ऋण से मुक्ति की परिस्थितियाँ निर्मित होने लगेंगी.

क्या वास्तु निर्माण के जरिए भाग्य में बदलाव संभव है?—by पं.डी.के.शर्मा”वत्स”—

हमारी भारतीय हिन्दू संस्कृ्ति अपने आप में एक ऎसी विलक्षण संस्कृ्ति रही है,जिसका प्रत्येक सिद्धान्त ज्ञान-विज्ञान के किसी न किसी विषय से संबंधित हैं और जिसका एक मात्र उदेश्य मनुष्य जीवन का कल्याण करना ही रहा है.मनुष्य का सुगमता एवं शीघ्रता से कल्याण कैसे हो ? इसका जितना गम्भीर विचार भारतीय संस्कृ्ति में किया गया है. उतना अन्यत्र कहीं नहीं मिलता.जन्म से लेकर मृ्त्युपर्यंत मनुष्य जिन जिन वस्तुओं एवं व्यक्तियों के सम्पर्क में आता है, ओर जो जो क्रियाएं करता है,उन सभी को ऋषि-मुनि रूपी वैज्ञानिकों नें नितांत वैज्ञानिक ढंग से,सुनियोजित,मर्यादित एवं सुसंस्कृ्त किया है. ऎसी ही पूर्णत: विज्ञान सम्मत विद्या रही है—भारतीय वास्तु शास्त्र,जो कि भारत की अति प्राचीन विद्या है. विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद में भी इस विद्या का उल्लेख मिलता है.पिछले कुछ वर्षों से देखने में आ रहा है कि लोगों का ध्यान इस विद्या की ओर उन्मुख हुआ है

एक ज्योतिषी होने के नाते अक्सर लोगों द्वारा वास्तु विषयक जिज्ञासाओं/शंकाओं संबंधित विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछे जाते है. जिनमें अक्सर एक सवाल ये भी होता है कि वास्तु और भाग्य का जीवन में कितना संयोग है? क्या वास्तु के द्वारा भाग्य बदलना सम्भव है? इस प्रश्न के उत्तर में हमें सिर्फ यह समझना चाहिए कि भाग्य का निर्माण किसी वास्तु से नहीं, अपितु इन्सान के कर्मों से होता है. वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन/मकान इत्यादि निर्मित करने पर कुवास्तुजनित कष्ट तो अवश्य दूर हो जाते हैं,परन्तु प्रारब्धजनित कष्ट तो इन्सान को हर स्थिति में भोगने ही पडते हैं.वास्तु का जीवन में उपयोग मात्र एक कर्म है और इस कर्म की सफलता का आधार वास्तुशास्त्रीय ज्ञान है,जो,एक विज्ञान के साथ-साथ एक धार्मिक विषय भी है. इसलिए वास्तु ज्ञान के साथ-साथ,वास्तु के पूजन और वास्तु के धार्मिक पहलुओं का भी हमें ज्ञान होना चाहिए.

सबसे पहले तो हमें ये जान लेना चाहिए कि किसी प्रकार की तोडफोड का नाम वास्तु नहीं है. वास्तु का अर्थ है ‘निवास करना’(वस निवासे) जिस भूमी पर मनुष्य निवास करते हैं, उसे ही वास्तु कहा जाता है. प्रकृ्ति द्वारा पाँच आधारभूत तत्वों—-भूमी,जल,अग्नि,वायु और आकाश से ही यह सम्पूर्ण ब्राह्मंड रचा गया है और ये पाँचों पदार्थ ही पंच महाभूत कहे जाते हैं. इन पंच तत्वों के प्रभावों को समझकर,उनका सामंजस्य बनाए रखे हुए,उनके अनुसार अपने भवन के आकार-प्रकार से,मनुष्य अपने जीवन को अधिक सुखी एवं सुविधासम्पन्न बना सकता है. दिशाओं के अनुसार भवनों की स्थिति और विन्यास का उसमें निवास करने वालों के जीवन पर सीधा एवं स्पष्ट प्रभाव पडता है.

सूर्य,चन्द्रादि अन्य ग्रहों तथा तारों आदि का पृ्थ्वी के वातावरण पर क्या प्रभाव पडता है ? अति प्राचीन काल में इसका पर्याप्त अध्ययन-मनन करने के उपरान्त ही अनुभव के आधार पर इस शास्त्र का जन्म हुआ है. सूर्य इस ब्राह्मंड की आत्मा है और उर्जा का मुख्य स्त्रोत. सूर्य और अन्य तारों से प्राप्त उष्मा और प्रकाश,समस्त आकाशीय पिंडों की परस्पर आकर्षण शक्ति,पृ्थ्वी पर उत्पन चुम्बकीय बल क्षेत्र और इस प्रकार के अन्य भौतिक कारकों का पृ्थ्वी की भौतिक दशा,वातावरण और जलवायु पर निश्चित प्रभाव पडता है. और इन सब का अनुकूल,या प्रतिकूल प्रभाव पडता है मानव जीवन पर. अत: वास्तु शास्त्र का ज्योतिष और खगोल से अति निकट सम्बंध है. मनुष्य के रहन-सहन को बहुत हद तक, ज्योतिष और खगोल संबंधी कारक प्रभावित करते हैं. अत: वास्तु शास्त्र के समस्त सिद्धान्त ज्योतिष विद्या पर आधारित हैं. किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य करने से पूर्व इन सब सिद्धान्तों पर भली प्रकार से विचार कर लेना ही मनुष्य के लिए कल्याणकारी है…….
“वास्तु शास्त्रं प्रवक्ष्यामि लोकानां हित काम्याया”

अब इसमें दोष किसका ? वास्तुशास्त्र , भाग्य अथवा निज कर्म का ?

वास्तुविद्या का कितना अधिक महत्व है.अब बहुत से लोग ऎसे भी होते हैं जो कि जीवन में वास्तु इत्यादि को कोई महत्व नहीं देते, बल्कि अच्छी-बुरी कैसी भी परिस्थिति के लिए सिर्फ निज भाग्य को ही सर्वोपरी मानते हैं. ये ठीक है कि भाग्य सर्वोपरी है, बल्कि भाग्य का महत्व तो विश्व की सभी संस्कृ्तियों में स्वीकारा गया है. चूंकि किसी भी व्यक्ति के भाग्य का निर्धारण किन्ही दैवीय शक्तियों द्वारा हमारे सौरमंडल के सूर्य चन्द्रादि नवग्रहों की रश्मियों के माध्यम से ही होता है, अत: इन पर किसी का कोई नियन्त्रण भी नहीं होता. इन कारकों का हमारे जीवन के विकास में अति महत्वपूर्ण स्थान है, परन्तु इनमें से बहुत सी विशेषताओं एवं गुणों को बदला नहीं जा सकता. यही व्यक्ति-विशेष की विशेषता के रूप में जाना जाता है.
अब अनेक व्यक्ति हैं, जो भाग्य जैसी किसी सत्ता में विश्वास नहीं करते. वो लोग अपने निज कर्म(पुरूषार्थ) को ही भाग्य निर्माता समझते हैं. परिश्रम या कर्म हमारे जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक है. अब देखिए, हममें से कुछ की अभिरूचि अध्ययन में, कुछ का लगाव धन में होता है तथा कुछ ऎसे भी लोग होते हैं, जो आरामपूर्वक जिन्दगी व्यतीत करना चाहते हैं. हम अपने जीवन की धारा का प्रवाह अपने मनोवांछित मार्ग की ओर ले जाने का भरकस प्रयास करते हैं, किन्तु कोई एक ऎसी अदृ्श्य शक्ति तो है ही, जो इस प्रवाह का मार्ग परिवर्तित कर देती है. अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ती में लोग कुछ सीमा तक सफल भी होते हैं, किन्तु दुनिया में ऎसे लोगों की भी कोई कमी नहीं, जो इच्छा-पूर्ती में सफल नहीं हो पाते. ऎसे व्यक्ति अपनी असफलताओं के लिए भाग्य को दोषी ठहराने लगते हैं. वस्तुत: इसके लिए भी व्यक्ति के स्वयं के कर्म ही दोषी हैं, न कि भाग्य. भाग्य तो हमारे किए गए कर्मों का प्रतिसाद मात्र है. कर्म क्या है?—कर्म अर्थात हमारे द्वारा किए गए प्रयासों का नाम ही तो कर्म है. अपने जीवन में जिस भी सुख या दुख, सफलता-असफलता, हानि-लाभ को हम प्राप्त करते हैं, वो सब कुछ भी तो हमारे प्रयासों अर्थात कर्मों का ही तो परिणाम है.
कर्म का व्यक्ति के जीवन में कितना अधिक प्रभाव पडता है, यह इस एक उदाहरण के माध्यम से सहज ही समझा जा सकता है———एक व्यक्ति जिसनें अपने लिए एक नए घर का निर्माण किया, लेकिन उस नए घर में प्रवेश करते ही उसे बुरी तरह से आर्थिक समस्यायों का सामना करना पडा. बेचारे का खाना-पीना, सोना-जागना तक हराम हो गया. हालाँकि उसने घर का निर्माण पूरी तरह से वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुरूप ही कराया, लेकिन फिर ऎसा क्या हुआ कि उसे उस घर में प्रवेश करते ही आर्थिक समस्यायों का सामना करना पड गया. देखा गया है कि इन्सान को जब किसी भीषण संकट, कष्ट, परेशानी का सामना करना पडता है तो अनायास ही मन में कईं प्रकार की शंकाएं, द्वन्द जन्म लेने लगते हैं. उस व्यक्ति के साथ भी यही हुआ…एक ओर तो उसके मन में ये विचार घर कर बैठा कि हो न हो मकान की ये जगह ही मनहूस है, दूसरी ओर ये शंका भी जन्म लेने लगी कि कहीं वास्तुशास्त्र के कारण ही तो ये सारी गडबड नहीं हुई ?
खैर, वो व्यक्ति किसी की सलाह से मेरे पास आया. मैने जब उसके मकान का सूक्ष्मतापूर्वक अवलोकन किया तो यही पाया कि मकान तो वाकई वास्तुशास्त्र अनुरूप बना है. सिर्फ एक ही दोष था कि उसका ईशान कोण 90 अंशों से कुछ अधिक था, जो कि लाभप्रद नहीं माना जाता. अब असमंजस ये कि क्या सिर्फ ईशान कोण ही उस व्यक्ति की समस्यायों का वास्तविक कारण है ? नहीं! वास्तव में मकान में ऎसा कोई दोष था ही नहीं, जिसे कि उसकी समस्यायों का वास्तविक कारण कहा जा सकता.
दरअसल व्यक्ति की व्यापारिक एवं आर्थिक स्थिति पर चर्चा के दौरान ये बात स्पष्ट हो पाई कि उसकी समस्यायों का एकमात्र कारण था—-निर्माण कार्य में अपनी क्षमता से काफी अधिक मात्रा में धन का नियोजन. वस्तुत: उसनें बैंकों से ऋण लेकर तथा अपने व्यापार में से बहुत सारी पूंजी निकालकर मकान के निर्माण में लगा दी, जिसके कारण उसे आर्थिक समस्यायों का सामना करना पड रहा था. अभी भी धन की कमी के चलते, मकान की ऊपरी मंजिल का निर्माण कार्य बीच अधर में लटका हुआ था. समस्या का मूल कारण तो अब एकदम सामने स्पष्ट था….सो, उसे यही समझाया कि इधर-उधर से पैसा उधार लेकर मकान पर लगाने का कोई औचित्य नहीं है. अब इस पर ओर धन लगाना बन्द कर दे, क्यों कि समस्यायों का कारण मकान नहीं, अपितु तुम्हारा कर्म (उपर्युक्त निर्णय न लेना) है. जब उसके पास पर्याप्त धन नहीं था, तो उसे घर के निर्माण में इतना अधिक पैसा नहीं लगाना चाहिए था. अत: यदि दोष का निराकरण करना है तो इस घर को बेच देना ही उचित रहेगा. अन्तत: उस व्यक्ति नें सलाह मानकर घर बेच दिया ओर ऋण चुकता करके कुछ पैसा अपने व्यापार में लगाकर शेष बची पूंजी से अपने लिए एक छोटा घर खरीद लिया. बस हो गया उसकी समस्यायों का निवारण…….
अब देखिए, ये ठीक है कि भाग्य का निर्माण किसी सर्वशक्तिमान ईश्वरीय सत्ता द्वारा किया जाता है, लेकिन उसने हमें यह स्वतन्त्रता तो प्रदान की ही हुई है कि हम स्वयं में सुधारकर अपनी इच्छा एवं कार्यों(कर्मों) द्वारा उत्तम जीवन व्यतीत कर सकें. कर्मों को मूल तत्व एवं अनुकूल वातावरण की सहायता की आवश्यकता होती है. यदि हम ज्योतिष, वास्तुशास्त्र के अनुरूप अपने भवन इत्यादि में कोई परिवर्तन करते हैं तो वो भी तो कर्म का ही एक हिस्सा है.किन्तु ये हो सकता है कि कभी किसी ग्रह इत्यादि के कुप्रभाव के कारण भी भवन-सम्बंधी किन्ही कठिनाईयों, परेशानियों का सामना करना पड जाए. तब ग्रह शान्ती तथा मन्त्र-यन्त्रादि का आश्रय लेकर ही इनसे मुक्ति पाई जा सकती है.

कार्यस्थल के वास्तु सूत्र………..

केवल घर को निर्मित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि आजीविका के लिए आधारभूत कार्यालय, या दुकान इत्यादि भी शुभ लक्षणों से युक्त होने चाहिए और उसके अन्दर उपकरणों को यथास्थान कैसे सजाना है, या किस दिशा की ओर मुँह करके आसीन होना है, इत्यादि बातों की जानकारी भी आवश्यक है.

दक्षिणमुखी कार्यस्थल:- दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर तथा पश्चिम से पूर्व की ओर फर्श ढलवां बना कर नैऋत्य(दक्षिण-पश्चिम कोण) में पूर्वाभिमुख हो, बैठने पर दायीं ओर तिजोरी/कैश बाक्स को रखना चाहिए. उसी स्थान पर उत्तराभिमुख होकर आसीन(Sitting) होने पर कैश बाक्स हमेशा बाईं ओर रखना चाहिए. दक्षिण दिशा के कार्यस्थल में कभी भी आग्नेय(South-East), वायव्य(North-West) और ईशान(North-East) दिशाओं में बैठकर व्यापार नहीं करना चाहिए अन्यथा व्यापार में उधार वगैरह दिया गया पैसा डूबने लगता है.

पश्चिम दिशामुखी कार्यस्थल:- पश्चिम से पूर्व की ओर, दक्षिण से उत्तरी दिशा में फर्श को ढलवां बनाकर नैऋत्य(South-West) में अपना आसन(siting) रख, बाईं ओर तिजोरी/ कैश बाक्स को रखना चाहिए. इस दिशा के व्यापारिक स्थल में कभी वायव्य, ईशान और आग्नेय की ओर नहीं बैठना चाहिए अन्यथा सावन में हरे और भादों में सूखे वाली स्थिति सदैव बनी रहेगी अर्थात व्यापार में एकरूपता नहीं रहेगी.

उत्तर दिशामुखी कार्यस्थल:- फर्श उत्तर से दक्षिण की ओर,पश्चिम से पूर्व की ओर ढलवां रखना चाहिए. वायव्य कोण(North-West) की उत्तरी दीवार को स्पर्श किए बिना यानि उस दीवार से थोडी दूरी रख, आसन रखना चाहिए. पूर्वाभिमुखी आसीन होने पर कैश बाक्स सदैव दाहिनी दिशा में रखें. यदि संभव हो तो नैऋत्य कोण में अपनी टेबल लगाएं, लेकिन ईशान या आग्नेय कोण में कभी भूलकर भी सिटिंग न रखें.

पूर्व दिशाभिमुख कार्यस्थल:- द्वार यदि पूर्व में हो तो पश्चिम से पूर्व की ओर तथा दक्षिण से उत्तर की ओर फर्श को ढलानदार बनाने की व्यवस्था करनी चाहिए. व्यापारी को आग्नेय(South-East) या पूर्वी दीवार की सीमा का स्पर्श किए बिना, दक्षिण आग्नेय की दीवार से सट कर, उत्तर दिशा की ओर ही मुख करके अपनी सिटिंग रखनी चाहिए और कैश बाक्स हमेशा दायीं तरफ रखें. उसी स्थल पर सिटिंग पूर्वाभिमुख होकर भी की जा सकती हैं किन्तु ईशान अथवा वायव्य दिशा की ओर नहीं होनी चाहिए.

कार्यस्थल की शुभता हेतु :-

1. कार्यस्थल का ब्रह्म स्थान (केन्द्र स्थान) हमेशा खाली रखना चाहिए. ब्रह्म स्थान में कोई खंबा, स्तंभ, कील आदि नहीं लगाना चाहिए.
2. कार्यस्थल पर यदि प्रतीक्षा स्थल बनाना हो, तो सदैव वायव्य कोणे में ही बनाना चाहिए.
3. अपनी पीठ के पीछे कोई खुली खिडकी अथवा दरवाजा नहीं होना चाहिए.
4. विद्युत का सामान, मोटर, स्विच, जैनरेटर, ट्रासंफार्मर, धुंए की चिमनी इत्यादि को अग्नि कोण अथवा दक्षिण दिशा में रखना चाहिए.
5. कम्पयूटर हमेशा अग्नि कोण अथवा पूर्व दिशा में रखें.
6. बिक्री का सामान या जो सामान बिक नहीं रहा हो तो उसे वायव्य कोण अर्थात उत्तर-पश्चिम दिशा में रखें तो शीघ्र बिकेगा.
7. सजावट इत्यादि हेतु कभी भी कांटेदार पौधे, जैसे कैक्टस इत्यादि नहीं लगाने चाहिए.
8. यदि किसी को चलते हुए व्यवसाय में अचानक से अनावश्यक विघ्न बाधाएं, हानि, परेशानी का सामना करना पड रहा हो तो उसके लिए कार्यस्थल के मुख्य द्वार की अन्दर की ओर अशोक वृ्क्ष के 9 पत्ते कच्चे सूत में बाँधकर बंदनवार के जैसे बाँध दें. पत्ते सूखने पर उसे बदलते रहें तो नुक्सान थम जाएगा और व्यवसाय पूर्ववत चलने लगेगा.

वास्तु के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य एवं बिना तोडफोड के दोष निवारण—

आज के जमाने में वास्तु शास्त्र के आधार पर स्वयं भवन का निर्माण करना बेशक आसान व सरल लगता हो, लेकिन पूर्व निर्मित भवन में बिना किसी तोड फोड किए वास्तु सिद्धान्तों को लागू करना जहाँ बेहद मुश्किल हैं, वहाँ वह प्रयोगात्मक भी नहीं लगता. अब व्यक्ति सोचता है कि अगर भवन में किसी प्रकार का वास्तु दोष है, लेकिन उस निर्माण को तोडना आर्थिक अथवा अन्य किसी दृ्ष्टिकोण से संभव भी नहीं है, तो उस समय कौन से ऎसे उपाय किए जाएं कि उसे वास्तुदोष जनित कष्टों से मुक्ति मिल सके. आज की इस पोस्ट में प्रस्तुत हैं कुछ ऎसे उपाय, जिन्हे अपनाकर आप किसी भी प्रकार के वास्तुजनित दोषों से बहुत हद तक बचाव कर सकते हैं.

* 4 X 4 इन्च का ताम्र धातु में निर्मित वास्तु दोष निवारण यन्त्र भवन के मुख्य द्वार पर लगाना चाहिए.
* भवन के मुख्य द्वार के ऊपर की दीवार पर बीच में गणेश जी की प्रतिमा, अन्दर और बाहर की तरफ, एक जगह पर आगे-पीछे लगाएं.
*वास्तु के अनुसार सुबह पूजा-स्थल (ईशान कोण) में श्री सूक्त, पुरूष सूक्त एवं संध्या समय श्री हनुमान चालीसा का नित्यप्रति पठन करने से भी शांति प्राप्त होती है.
*यदि भवन में जल का बहाव गलत दिशा में हो, या पानी की सप्लाई ठीक दिशा में नहीं है, तो उत्तर-पूर्व में कोई फाऊन्टेन (फौव्वारा) इत्यादि लगाएं. इससे भवन में जल संबंधी दोष दूर हो जाएगा.
* टी. वी. एंटीना/ डिश वगैरह ईशान या पूर्व की ओर न लगाकर नैऋत्य कोण में लगाएं, अगर भवन का कोई भाग ईशान से ऊँचा है, तो उसका भी दोष निवारण हो जाएगा.
* भवन या व्यापारिक संस्थान में कभी भी ग्रेनाईट पत्थर का उपयोग न करें. ग्रेनाईट चुम्बकीय प्रभाव में व्यवधान उत्पन कर नकारात्मक उर्जा का संचार करता है.
* भूखंड के ब्रह्म स्थल (केन्द्र स्थान) में ताम्र धातु निर्मित एक पिरामिड दबाएं .
* जब भी जल का सेवन करें, सदैव अपना मुख उत्तर-पूर्व की दिशा की ओर ही रखें.
* भोजन करते समय, थाली दक्षिण-पूर्व की ओर रखें और पूर्व की ओर मुख कर के ही भोजन करें.
* दक्षिण-पश्चिम कोण में दक्षिण की ओर सिराहना कर के सोने से नींद गहरी और अच्छी आती है. यदि दक्षिण की ओर सिर करना संभव न हो तो पूर्व दिशा की ओर भी कर सकते हैं.
* यदि भवन की उत्तर-पूर्व दिशा का फर्श दक्षिण-पश्चिम में बने फर्श से ऊँचा हो तो दक्षिण-पश्चिम में फ़र्श को ऊँचा करें.यदि ऎसा करना संभव न हो तो पश्चिम दिशा के कोणे में एक छोटा सा चबूतरा टाईप का बना सकते हैं.
* दक्षिण-पश्चिम दिशा में अधिक दरवाजे, खिडकियाँ हों तो, उन्हे बन्द कर के, उनकी संख्या को कम कर दें.
* भवन के दक्षिण-पश्चिम कोने में सफेद/क्रीम रंग के फूलदान में पीले रंग के फूल रखने से पारिवारिक सदस्यों के वैचारिक मतभेद दूर होकर आपसी सौहार्द में वृ्द्धि होती है.
* श्यनकक्ष में कभी भी दर्पण न लगाएं. यदि लगाना ही चाहते हैं तो इस प्रकार लगाएं कि आप उसमें प्रतिबिम्बित न हों, अन्यथा प्रत्येक दूसरे वर्ष किसी गंभीर रोग से कष्ट का सामना करने को तैयार रहें.
* भवन की दक्षिण अथवा दक्षिण-पूर्व दिशा(आग्नेय कोण) में किसी प्रकार का वास्तुदोष हो तो उसकी निवृ्ति के लिए उस दिशा में ताम्र धातु का अग्निहोत्र(हवनकुण्ड) अथवा उस दिशा की दीवार पर लाल रंग से अग्निहोत्र का चित्र बनवाएं.
* सीढियाँ सदैव दक्षिणावर्त अर्थात उनका घुमाव बाएं से दाएं की ओर यानि घडी चलने की दिशा में होना चाहिए. वामावर्त यानि बाएं को घुमावदार सीढियाँ जीवन में अवनति की सूचक हैं. इससे बचने के लिए आप सीढियों के सामने की दीवार पर एक बडा सा दर्पण लगा सकते हैं, जिसमें सीढियों की प्रतिच्छाया दर्पण में पडती रहे.
* भवन में प्रवेश करते समय सामने की तरफ शौचालय अथवा रसोईघर नहीं होना चाहिए. यदि शौचालय है तो उसका दरवाजा सदैव बन्द रखें और दरवाजे पर एक दर्पण लगा दें. यदि द्वार के सामने रसोई है तो उसके दरवाजे के बाहर अपने इष्टदेव अथवा ॐ की कोई तस्वीर लगा दें.
* आपके भवन में जो जल के स्त्रोत्र हैं, जैसे नलकूप, हौज इत्यादि, तो उसके पास गमले में एक तुलसी का पौधा अवश्य लगाएं.
* अकस्मात धन हानि, खर्चों की अधिकता, धन का संचय न हो पाना इत्यादि परेशानियों से बचने के लिए घर के अन्दर अल्मारी एवं तिजोरी इस स्थिति में रखनी चाहिए कि उसके कपाट उत्तर अथवा पूर्व दिशा की तरफ खुलें.
* भवन का मुख्यद्वार यथासंभव लाल, गुलाबी अथवा सफेद रंग का रखें.
* दक्षिण-पश्चिम दिशा में अधिक भार, या सामान रखें. इस कोण की भार वहन क्षमता अधिक होती है.
* जिस घर की स्त्रियाँ अधिक बीमार रहती हों, तो उस घर के मुख्य द्वार के पास ऊपर चढती हुई बेल लगानी चाहिए. इससे परिवार के स्त्री वर्ग को शारीरिक-मानसिक व्याधियों से छुटकारा मिलता है.
* रसोई यदि गलत दिशा में बनी है, और उसे आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व दिशा) में बनाना संभव न हो तो, गैस सिलेंडर अवश्य रसोई के दक्षिण पूर्व में रखें. रसोई को कभी भी स्टोर न बनाए, अन्यथा गृ्हस्वामिनी को तनाव, परिवार में किसी न किसी सद्स्य को रक्तचाप,मधुमेह, नेत्र पीडा अथवा पेट में गैस इत्यादि की कोई न कोई समस्या लगी रहेंगीं.
* ध्यान रहे कि कभी भी अध्ययन स्थल के पीछे दरवाजा या खिडकी आदि नहीं होनी चाहिए; यदि है, तो मन अशांत रहता है, क्रोध एवं आक्रोश का सृ्जन होता है,जिससे कि सफलता पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है. जब कि भवन की उत्तर-पूर्व दिशा अथवा संभव न हो तो अध्ययन स्थल के उत्तर-पूर्व में बैठकर पढने से सफलता अनुगामी बन पीछे पीछे चलने लगती है.
* एक बात बताना चाहूँगा, जो कि योग शास्त्र से संबंध रखती है, लेकिन किसी भी अध्ययनकर्ता के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. वो ये कि अध्ययन करते सदैव आपकी इडा नाडी अर्थात बायाँ स्वर चल रहा होना चाहिए. इससे मस्तिष्क की एकाग्रता बनी रहकर किया गया अध्ययन मस्तिष्क में बहुत देर काल तक संचित रहता है. स्मरणशक्ति में वृ्द्धि होती है. अन्यथा यदि कहीं पिंगला नाडी अर्थात दाहिना स्वर चलता हो तो फिर वही होगा कि “आगा दौड पीछा छोड”. इधर आपने याद किया और उधर दिमाग से निकल गया. यानि मन की एकाग्रता और स्मरणशक्ति की हानि……
इन उपरोक्त उपायों को आप अपनी दृ्ड इच्छा शक्ति व सकारात्मक सोच एवं दैव कृ्पा का विलय कर करें, तो यह नितांत सत्य है कि इनसे आप अपने भवन से अधिकांश वास्तुजन्य दोषों को दूर कर कईं प्रकार की समस्याओं से मुक्ति प्राप्त कर सकेंगें…….

आज के मुहूर्त और राशिफल–01अप्रेल 2011—

आज के मुहूर्त –शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011—-

शुभ विक्रम संवत- 2067, शालिवाहन शक संवत- 1932, संवत्सर का नाम- शोभन, अयन- उत्तरायन,
ऋतु- वसंत, मास- चैत्र, पक्ष- कृष्ण, तिथि- त्रयोदशी दिन 03.06 पश्चात चतुर्दशी,
हिजरी सन्- 1432, मु. मास- रबिलाखर, तारीख- 26,
नक्षत्र- शततारा प्रात: 8.25 पश्चात पूर्वाभाद्रपद,
योग- शुभ प्रात: 7.45 पश्चात शुक्ल,
सूर्योदयकालीन करण- विष्टि,
चन्द्रमा- कुंभ राशि से मीन राशि में प्रवेश मंगलरात्रि 4.39 मिनट पर करेंगे।
ग्रह योग- पंचक जारी है। दिन- सामान्य।
दिशाशूल- पश्‍चिम ‍में। मुहूर्त- शिवाभिषेक का मुहूर्त।
दिन का पर्व- मास शिवरात्रि। कार्य की अनुकूलता के लिए- सूर्योदय के पूर्व स्नान करें।
उपयोगी ज्ञान- भवन के अग्नि कोण में तरल पदार्थ में सिर्फ ईंधन ही रखना उचित होता है
। शुभ समय- प्रात: 07.19 से 9.06 दिन 1.40 से 03.22।
सुझाव- आवश्यक न हो तो दिन 10.58 से 12.30 के मध्य शुभ कार्य न करें
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दैनिक राशिफल—

राशि फलादेश मेष—
नौकरी में श्रेष्ठजनों से भेंट होगी। नई योजनाओं का क्रियान्वयन होगा। शुभ समाचार मिलेंगे। संतान सुख मिलेगा। व्यापार लाभप्रद रहेगा।

राशि फलादेश वृष—
अपनी उत्तेजना पर नियंत्रण रखें। विद्यार्थी वर्ग संभलकर चलें। अन्यथा नुकसान संभव। माता-पिता के स्वास्थ्य का ध्यान रखें। नए कार्य बनेंगे।

राशि फलादेश मिथुन—
संपत्ति की खरीदी से लाभ होगा। नौकरी करने वालों से अधिकारी वर्ग संतुष्ट रहेगा। मशीन के प्रयोग में सावधानी रखें। पारिवारिक स्थिति सुखद रहेगी।

राशि फलादेश कर्क—
आमदनी बढ़ेगी। घर में नए मेहमान का आगमन होगा। परिवार में खुशनुमा माहौल रहेगा। पत्नी के स्वास्थ्य की चिंता रहेगी। अत: ध्यान रखें।

राशि फलादेश सिंह—
महत्वपूर्ण कामों से लाभ के योग। जीवनसाथी से संबंध अच्छे बनेंगे। आय से ज्यादा व्यय नहीं करें। कार्यक्षेत्र की बाधाएँ दूर होगी।

राशि फलादेश कन्या—
रुके कार्य पूरे होंगे। सोच-समझकर निर्णय लें। सही तरीके से काम करें। काम-काज की स्थिति मध्यम रहेगी। घर-परिवार में विवाद होंगे।

राशि फलादेश तुला—
कई दिनों से पेंडिंग कार्य बनने की संभावना है। उत्तरदायित्व की पूर्ति कर पाएँगे। उन्नति के अवसर मिलेंगे। जल्दबाजी में कोई निर्णय न लें।

राशि फलादेश वृश्चिक—
सफलता मिलेगी। रुके कार्य पूरे होने के योग हैं। परिवार में अनुकूल काम होंगे। व्यापार अच्छा चलेगा। कानूनी मामलों में लापरवाही न करें।

राशि फलादेश धनु—-
आपके महत्व को स्वीकार किया जाएगा। सफल यात्रा के योग बनेंगे। परिवार में कोई समस्या रह सकती है। अनुभवों का लाभ मिलेगा।

राशि फलादेश मकर—
पारिवारिक विवाद सुलझेंगे। विश्वासप्रद वातावरण रहेगा। परिश्रम का उचित फल मिल सकेगा। कार्य की प्रशंसा होगी। आय से अधिक व्यय नहीं करें।

राशि फलादेश कुंभ—
आय में वृद्धि होगी। व्यावसायिक सफलता से हर्ष होगा। सुख-संपन्नता के योग बनेंगे। विरोधी आपकी योग्यता से प्रभावित होंगे। जल्दबाजी न करें।

राशि फलादेश मीन—
लाभ मिलेगा। आय में वृद्धि के योग हैं। विरोधी छवि खराब करने का प्रयत्न करेंगे। परिवार के सदस्यों की आर्थिक प्रगति होगी।

विराट ज्योतिष एवं वास्तु संगोष्ठी-2011 ,
दिनांक – 02 -04 -2011 से 03 -04 -2011 तक
Tomorrow at 9:00am – Sunday at 6:00pm
कार्यक्रम स्थल——श्री जी मेरिज हल, जवाहर नगर, कोटा (RAJASTHAN)
विषय—-
(A)-SHIKSHA एवं रोजगार,
(B)- विवाहिक समस्याएं,
(C)- KUNDALI OR वास्तु,
(D)- संतान प्रकरण,…
(E)–वास्तु और SVASTHYA …
(F)–मंगल दोष / योग और परिहार/ उपाय
(G)– हस्तरेखा द्वारा उक्त VISHAYON पर लेख;;
आयोजक / संयोजक—
आचार्य धीरेन्द्र ,
वेदांग ज्योतिष अनुसन्धान SANSTHA ,
4-क-5, तलवंडी,
कोटा (RAJASTHAN)
MOB.-09828481766;;09413442631;;09414266026;;;;

वर्ल्ड कप २०११ फ़ाइनल मैच का परिणाम :- विजेता भारत…==

भारत :-भारत की कुंडली वृषभ लग्न की है कल यानी २ अप्रैल को ग्रह गोचर के अनुसार, दुसरे भाव में केतु, पंचम भाव में शनि, अष्टम भाव में राहू, दशम भाव में शुक्र , लाभ भाव में सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, व गुरु विराजमान रहेंगे | लग्न का स्वामी शुक्र दशम भाव में स्थित होकर मज़बूत स्थिती बना रहा है | लाभ स्थान में सूर्य , चन्द्रमा , मंगल , बुध, गुरु का एक साथ होना भी अति शुभ योग का निर्माण कर रहा है | भाग्येश शनि पंचम भाव में स्थित होकर लाभ भाव को देख रहा है यह स्थिती भी अति उत्तम है |

श्रीलंका :-श्रीलंका की कुंडली कुम्भ लग्न की है कल यानी २ अप्रैल को ग्रह गोचर क अनुसार, लग्न में शुक्र , दुसरे भाव में सूर्य , चन्द्र , मंगल , बुध , गुरु , पंचम भाव में केतु , अष्टम भाव में शनि और एकादश भाव में राहू स्थित रहेंगे | लग्नेश शनि अष्टम भाव में बैठ कर लग्न को कमज़ोर कर रहा है, यह स्थिती श्रीलंका के लिए शुभ नहीं है | यद्दपि भाग्येश शुक्र लग्न में स्तिथ है परन्तु सूर्य , चन्द्र , मंगल , बुध , गुरु , दुसरे भाव में स्थित हैं जिन पर अष्टम भाव में बैठे शनि की दृष्टि पड़ रही है अतः ये स्तिथि भी ग्रहों को कमज़ोर करती है |

नोट :- वानखडे स्टेडीयम की राशि वृषभ बनती है जो भारत की राशि भी है अतः दोनों मित्र हुए | अतः उपरोक्त ज्योतिष विश्लेषण व ग्रह गोचर से यह प्रतीत होता है की स्थिती संघर्षपूर्ण रहेगी परन्तु अंत में भारत ही विजेता बनेगा | हरी ॐ तत्सत |
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INDIA will win—-

Based on the Date & Time of the India Vs Sri Lanka Final Match: The ascendant is cancer and its lord Moon is well placed in the 9th house with yogadhipathi Mars. This indicates strong possibility for India to win the world cup final match; however, the chart also indicates that the match is going to be a tough one. Lot of expectations is there from Sachin and he will be able to meet the expectations to a certain extent. Moreover, Jupiter and Sun are also favoring India by their placement in Pisces along with Moon.

So, according to our astrologers, India Vs Sri Lanka Final Match will be a tough one; however, the planets are strongly favoring India to gift us our 2nd world Cup trophy.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 1, 2011

वर्ड कप मेच के बारे में–

नमस्कार प्रिय मित्रो,
आज की बात…कल के वर्ड कप मेच के बारे में—
कप्तान हे —महेंद्र सिंह धोनी , स्थान- वानखेड़े स्टेडियम, मुम्बई….
विपक्षी देश की क्रिकेट टीम हे- श्रीलंका,
मेरे विचार / अनुमान से यदि भारत / धोनी टॉस जीतते हे तो भारत को पहले बल्लेबाजी/ बेटिंग करनी चाहिए
और कम से कम 310 रन जरुर बनाने चाहिए…कल के मेच में कड़ा संघर्ष होनी की पूरी संभावना हे .
.सभी का ध्यान वही पर होगा/ रहेगा…मेरी और से भी जीत/ विजय की prarthana / विनती- ईश्वर / ऊपर वाले से…
हम सभी भारत वासियों की कामना पूरी हो…बरसों पुराना इंतजार ख़त्म हो….
इसी आशा और विश्वास के साथ….रब राखा…
आपका-
दयानन्द शास्त्री

विक्रम संवत 2068 आप सभी के लिए शुभ और मंगलकारी हो—

इस बार नव वर्ष (विक्रम संवत-2068)सोमवार, 04 अप्रेल 2011 से आरंभ हो रहा हे..चेत्र शुक्ल प्रतिप्रदा सोमवार को हे / गुडी पडवा …इस वर्ष का राजा चन्द्र बनेगा और मंत्री गुरु रहेगा…

मेष संक्रांति गुरुवार – 14 को हे, क्रोधी नाम का यह संवत राजनेतिक टकराव, प्राकृतिक आपदा और प्रकोप में बढ़ोतरी करेगा..इस संवत का वाहन मृग और रोहिणी का वास समुद्र में रहेगा, समय का वास माली के घर रहेगा इसके कारण फसल की उपज अच्छी / अनुकूल होगी…समुद्र का वास ओए मेघेश बुध होने के कारण वर्षा समय पर और पर्याप्त होने की संभावना हे….आश्विन नामक वर्ष होने से इस वर्ष अनुकूलता रह सकती हे…

8 मई 2011 को मंत्री वृहस्पति अपनी राशी मीन को छोड़कर मेष राशी में प्रवेश करेंगे…, मेष राशी में पहले से ही मंगल,शुक्र और बुध बेठे हे,..इन सभी का शनि के साथ षडाष्टक योग बन जायेगा, इस कारण महंगाई और बढ़ेगी तथा वातावरण तनावपूर्ण हो सकता हे…

6 जून को रहू , वृश्चिक राशी में और केतु वर्ष राशी में आ जायेंगे.. इस दोरान राजनेतिक उठापटक होने की संभावना हे….मंगल-राहू का द्रष्टि सम्बन्ध रक्तपात की सम्भावना बढ़ता हे…सभी जगह अशांति में वृद्धि / द्रष्टि दिखाई दे सकती हे…१५-१६ जून की रात्रि में होने वाला चन्द्र -ग्रहण –मूल और ज्येष्ठा नक्षत्र पर लग रहा हे… // साथ ही इसका प्रभाव वृश्चिक और धनु राशी में भी होगा …यह ग्रहण भारत के लिए ठीक नहीं हे…./ अनुकूल नहीं रहेगा….

25 जुलाई से 09 सितम्बर तक मंगल -शनि का , चतुर्थ-दशम द्रष्टि सम्बन्ध और श्रावण मास में पांच(5) शनिवार –का यह खप्पर योग अनेक प्रकार की आपदाओ को जन्म देगा—बढ़ / भरी वर्षा/ जन-मॉल की हनी होने के साथ -साथ किसी जाने माने प्रतिष्ठित व्यक्ति का वियोग भी संभव हे…

15 नवम्बर से शनि अपनी उच्च राशी -तुला में आ जायेंगे… सूर्य का शनि से मात्र कन्धा ही टकराएगा…इस कारण बहुत बड़ी/ भरी हनी/ नुकसान की संभंव हे..इस समय सीमा पर तनाव बढेगा और उग्रवाद में वृद्धि होने की भी संभावना हे…१० दिसंबर को होने वाला चन्द्र ग्रहण जनता की परेशानी बढ़ाएगा…..

जनवरी माह में पांच मंगलवार प्राकृतिक आपदा/ प्रकोप, सत्ता परिवर्तन और वायुयान दुर्घटना के संकेत देते हे..शशक डालो में टकराव तथा मतभेद बढेगा…आम जनता की परेशानी बढ़ेगी….

फरवरी और मार्च माह भी बहुत अच्छे नहीं रहेंगे…महंगाई और बढ़ेगी…. वस्तुओं का कृत्रिम आभाव रहेगा…
कुल मिला कर सीमा विवाद, राजा -प्रजा में विद्रोह, महंगाई और दुष्टजनो का प्रकोप बढेगा,…वर्षा सामान्य होगी ….कही-कहीं जन-धन की हनी और प्राकृतिक प्रकोप का सामना करना पद सकता हे…

ईश्वर से प्राथना की आप सभी को यह नव वर्ष-( संवत-२०६८) शुभ फल प्रदान करें…
नव संवत्सर शुभ और मंगलमय हो ऐसी कामना करता हु..
“”इति शुभम भवतु”"

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

अयनांश का उपयोग–अप्रैल 2011–

भू () प्रतिदिन) की स्थिति पर ग्रहों दिल्ली 5:30 पर 28-36N 77 13E (नई )—
AYANAMSA उपयोग लाहिड़ी —-
गणना पश्चिमी चार्ट: ग्रहों यहाँ दी पदों विधि) नाक्षत्र हैं अनुसार वैदिक (करने के लिए. इन डिग्री) कर सकते हैं प्रणाली पश्चिमी (आसानी से परिवर्तित करने के लिए उष्णकटिबंधीय किया जाना है. बस ग्रह डिग्री से प्रत्येक (पुरस्सरण) विषुव के लिए ayanamsa मूल्य का मौजूदा जोड़ने और आप चार्ट के लिए अपने पश्चिमी या उष्णकटिबंधीय. aynamsha कम मूल्य के वर्तमान मिनट है 23 डिग्री 59. तुम पदों की स्थिति ग्रहों और नाक्षत्र जोड़ सकते हैं मोटे तौर पर 23 डिग्री से प्रत्येक लग्न पश्चिमी करने के लिए अपने. बिंदु के रूप में एक प्रारंभिक ayanamsha के लिए तारीखों का प्रयोग करें निम्नलिखित: —-

अप्रैल 2011—–

दिन सूरज चांद मंगल ग्रह पारा बृहस्पति शुक्र शनि ग्रह राहू केतु
01 फर 16Pis54 रेव 18Aqu34 शनि 05Pis03 UBA R00Ari16 ASW 21Pis05 रेव 11Aqu39 शनि R20Vir06 HST R03Sag32 एमयूएल R03Gem32 एमआरआई
02 सा 17Pis54 रेव 00Pis25 PBA 05Pis50 UBA R00Ari04 ASW 21Pis20 रेव 12Aqu51 शनि R20Vir01 HST R03Sag28 एमयूएल R03Gem28 एमआरआई
03 र 18Pis53 रेव 12Pis17 UBA 06Pis36 UBA R29Pis46 रेव 21Pis34 रेव 14Aqu03 शनि R19Vir57 HST R03Sag25 एमयूएल R03Gem25 एमआरआई
04 मो 19Pis52 रेव 24Pis10 रेव 07Pis23 UBA R29Pis22 रेव 21Pis49 रेव 15Aqu16 शनि R19Vir52 HST R03Sag22 एमयूएल R03Gem22 एमआरआई
05 मं 20Pis51 रेव 06Ari06 ASW 08Pis10 UBA R28Pis52 रेव 22Pis03 रेव 16Aqu28 शनि R19Vir47 HST R03Sag19 एमयूएल R03Gem19 एमआरआई
हम 06 21Pis50 रेव 18Ari06 Bhr 08Pis57 UBA R28Pis18 रेव 22Pis18 रेव 17Aqu40 शनि R19Vir43 HST R03Sag16 एमयूएल R03Gem16 एमआरआई
07 गु 22Pis49 रेव 00Tau13 KRI 09Pis43 UBA R27Pis39 रेव 22Pis32 रेव 18Aqu53 शनि R19Vir38 HST R03Sag13 एमयूएल R03Gem13 एमआरआई
08 फर 23Pis48 रेव 12Tau27 रोह 10Pis30 UBA R26Pis57 रेव 22Pis47 रेव 20Aqu05 PBA R19Vir33 HST R03Sag09 एमयूएल R03Gem09 एमआरआई
09 सा 24Pis47 रेव 24Tau53 एमआरआई 11Pis16 UBA R26Pis13 रेव 23Pis01 रेव 21Aqu17 PBA R19Vir29 HST R03Sag06 एमयूएल R03Gem06 एमआरआई
10 र 25Pis46 रेव 07Gem34 अर्द 12Pis03 UBA R25Pis27 रेव 23Pis16 रेव 22Aqu30 PBA R19Vir24 HST R03Sag03 एमयूएल R03Gem03 एमआरआई
11 मो 26Pis45 रेव 20Gem34 यमक 12Pis49 UBA R24Pis41 रेव 23Pis30 रेव 23Aqu42 PBA R19Vir19 HST R03Sag00 एमयूएल R03Gem00 एमआरआई
12 मं 27Pis44 रेव 03Can56 मवाद 13Pis36 UBA R23Pis55 रेव 23Pis45 रेव 24Aqu54 PBA R19Vir15 HST R02Sag57 एमयूएल R02Gem57 एमआरआई
हम 13 28Pis43 रेव 17Can43 ASL 14Pis22 UBA R23Pis10 रेव 23Pis59 रेव 26Aqu07 PBA R19Vir10 HST R02Sag53 एमयूएल R02Gem53 एमआरआई
14 वीं 29Pis42 रेव 01Leo57 पहुंच 15Pis09 UBA R22Pis27 रेव 24Pis14 रेव 27Aqu19 PBA R19Vir06 HST R02Sag50 एमयूएल R02Gem50 एमआरआई
15 फर 00Ari41 ASW 16Leo36 PPL 15Pis55 UBA R21Pis46 रेव 24Pis28 रेव 28Aqu32 PBA R19Vir01 HST R02Sag47 एमयूएल R02Gem47 एमआरआई
16 सा 01Ari39 ASW 01Vir35 UPL 16Pis41 रेव R21Pis09 रेव 24Pis43 रेव 29Aqu44 PBA R18Vir57 HST R02Sag44 एमयूएल R02Gem44 एमआरआई
17 र 02Ari38 ASW 16Vir46 HST 17Pis28 रेव R20Pis36 रेव 24Pis57 रेव 00Pis57 PBA R18Vir52 HST R02Sag41 एमयूएल R02Gem41 एमआरआई
18 मो 03Ari37 ASW 02Lib00 सीआईटी 18Pis14 रेव R20Pis06 रेव 25Pis11 रेव 02Pis09 PBA R18Vir48 HST R02Sag38 एमयूएल R02Gem38 एमआरआई
19 मं 04Ari35 ASW 17Lib05 SVA 19Pis00 रेव R19Pis42 रेव 25Pis26 रेव 03Pis22 UBA R18Vir43 HST R02Sag34 एमयूएल R02Gem34 एमआरआई
हम 20 05Ari34 ASW 01Sco51 विज़ 19Pis46 रेव R19Pis22 रेव 25Pis40 रेव 04Pis34 UBA R18Vir39 HST R02Sag31 एमयूएल R02Gem31 एमआरआई
21 गु 06Ari33 ASW 16Sco13 अनु 20Pis32 रेव R19Pis07 रेव 25Pis55 रेव 05Pis47 UBA R18Vir35 HST R02Sag28 एमयूएल R02Gem28 एमआरआई
22 फर 07Ari31 ASW 00Sag07 एमयूएल 21Pis18 रेव R18Pis57 रेव 26Pis09 रेव 06Pis59 UBA R18Vir30 HST R02Sag25 एमयूएल R02Gem25 एमआरआई
23 सा 08Ari30 ASW 13Sag32 PSA 22Pis04 रेव R18Pis53 रेव 26Pis23 रेव 08Pis12 UBA R18Vir26 HST R02Sag22 एमयूएल R02Gem22 एमआरआई
24 र 09Ari28 ASW 26Sag31 PSA 22Pis50 रेव D18Pis53 रेव 26Pis38 रेव 09Pis24 UBA R18Vir22 HST R02Sag19 एमयूएल R02Gem19 एमआरआई
25 मो 10Ari27 ASW 09Cap07 अमेरिका 23Pis36 रेव 18Pis59 रेव 26Pis52 रेव 10Pis37 UBA R18Vir18 HST R02Sag15 एमयूएल R02Gem15 एमआरआई
26 मं 11Ari25 ASW 21Cap25 Sra 24Pis22 रेव 19Pis09 रेव 27Pis06 रेव 11Pis50 UBA R18Vir14 HST R02Sag12 एमयूएल R02Gem12 एमआरआई
हम 27 12Ari23 ASW 03Aqu30 धा 25Pis08 रेव 19Pis24 रेव 27Pis20 रेव 13Pis02 UBA R18Vir10 HST R02Sag09 एमयूएल R02Gem09 एमआरआई
28 गु 13Ari22 Bhr 15Aqu27 शनि 25Pis54 रेव 19Pis44 रेव 27Pis35 रेव 14Pis15 UBA R18Vir06 HST R02Sag06 एमयूएल R02Gem06 एमआरआई
29 फर 14Ari20 Bhr 27Aqu19 PBA 26Pis40 रेव 20Pis08 रेव 27Pis49 रेव 15Pis28 UBA R18Vir02 HST R02Sag03 एमयूएल R02Gem03 एमआरआई
30 सा 15Ari18 Bhr 09Pis10 UBA 27Pis26 रेव 20Pis36 रेव 28Pis03 रेव 16Pis40 रेव R17Vir58 HST R01Sag59 एमयूएल R01Gem59 एमआरआई
दिन सूरज चांद मंगल ग्रह पारा बृहस्पति शुक्र शनि ग्रह राहू केतु

Posted by: vastushastri08 | जून 5, 2011

VAASTU SHASTRA : THEORY AND PRACTICE—-

VAASTU SHASTRA : THEORY AND PRACTICE—

VAASTU SHASTRA is an ancient Hindu practice which tells us how to construct buildings in harmony with natural forces for the well being of an individual as well as humanity as a whole. This precious Hindu philosophy forms the the basis of the traditional Indian system of architecture. Vaastu literally means the dwelling place. The rules of Vaastu are derived from ‘Vaastu Purusha’ who is depicted as a man lying with his head pointing northeast, in a grid of usually 64 squares. The different parts and directions are assigned to different Gods and Guardians. The ‘Vaastu Purusha’ is said to be the spirit of the site. Aesthetically correct dimensions of rooms, doors windows and even the structural parts like plinth and pillars can be determined on the concept of ‘Vaastu Purusha’.

The purpose of the vaastu of Vaastushastra is to provide guidelines for proper construction of houses, shops, commercial buildings with brand name stores and online bingo operating offices etc. Vaastu determines the position of the house with regard to points of a compass and suggests the points to keep in mind with respect to buildings, lines, directions, skylines, elongations, levels, slopes, water (underground and overhead), kitchen, bedrooms, toilets, staircase, heights of ceilings and roofs, entrances, location of doors and windows, compound walls etc. etc.

The importance of Vaastushastra lies in the fact that it is a result-oriented science and gives desired results if applied properly. Vaastushastra suggests ways in which we can live in tune with the laws of nature, so that we can be healthy, peaceful and efficiently and prosperous.

We can describe some ideal situations of houses and buildings according to VastuShastra. Accdording to this science, an ideal plot should be a square. Its all four sides are straight and equal in length and it has equal angle of 90 degree at all four corners. Square is the best shape of a plot. A rectangular plot having its length not more that double the breadth (length and breadth ratio not more than 1:2) is also a good plot. While selecting a plot, geographical surrondings & level of the land and roads around the plot must given due importance

Direction of a plot can be determined by using a magnetic compass. It is a device for finding direction. It has a freely moving needle which always points to the magnetic North. Make two lines crossing each other dividing a paper in four equal parts at 90-degree angle. Place a compass on paper in the middle of your plot and align it with two lines in the North and the South of the needle of the compass. Extend these lines on the plot and mark it to have exact direction.

The size of length, breadth both effect the fortune of the person who lives in it. The Southwest portion of the house is meant for bedroom for adults. It may be located in the South, and will be congenial for comfortable living. Master bedroom may be on the upper storey, if any, in the Southwest portion of the house. Direction of a person while sleeping also has importance in Vaastushastra. One should never sleep having head towards the North Pole and legs towards the South Pole. However one may sleep having legs towards the West and head towards the East for mental peace, good thoughts and spirituality.

Children room should be in the northwest or West Side. To have a better concentration they should have a separate study close to their bedrooms. Location of kitchen has health implications. Presiding deity of the Southeast is Agni, the God of fire; hence kitchen may be located the southeast corner of the house.

The dining room should be located in the East or the West or the North near the kitchen. Northwest corner is good for perishable goods. Dinning room may be in the Northwest direction, which leads to quicker consumption of food. Drawing room should be preferably in the Northeast or the North or the East but not in the Southwest portion of the house. More vacant space should be given in the Northeast corner of the drawing room.. Door is preferable on the East towards the Northeast side.

While studying, one should face the North or the East or the Northeast Therefore the best locations for study room are the north, east, or northeast. These directions attract the positive effects of Mercury increasing brain power, Jupiter increasing wisdom, Sun increasing ambition and Venus helps in bringing about creativity in new thoughts and ideas. Books may be kept in the Southwest side of the room. Study room may have door on the East or the North, or the Northeast

As per Vaastushastra, the East is the place for the bathroom. Attached bathroom may preferably be in the North, or the East of a bedroom. Shower, bathing tub and wash basin in the bathroom may be in the Northeast, or the North or the East direction. One may have bath in the North or the East area in the bathroom. Bathroom should never be constructed in the center or in the southwest corner of the house.

Storeroom should be made in the Northwest or Southwest portion of the house. It is very beneficial if grains and other provisions are stored in the Northwest store. All heavy things should be kept in the Southwest of the storeroom. Garbage may be collected in the Southern part of the house.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

Follow These and See the Good Results Yourself —

Quick Vaastu Tips—-

Follow These and See the Good Results Yourself —

Learn Vaastu —-

# Keep all electrical/heat generating appliances in the SE corner of the room.

# Do not construct kitchen, toilets and prayer room (puja-room) next to one another.

# The kitchen should not be directly in front of the main door.

# Do not keep broken mirrors, and watches and electrical gadgets which are either lying idle or out of order in the house.

# Mirrors, sinks, wash-basins and taps should preferably be along the NE wall.

# The safe should open towards the north or the east. So, keep it along south or the west.

# The toilet seat ahould preferably be along the North-South axis. The septic tank can be in the NW or the SE corner of the House.

# Avoid having garbage dump, street-light pole, or boulders in front of the main gate or door.

# Your main door should not be opposite the main door of another house.

# The number of doors and windows should be more on the ground floor and less on the upper floor.

# The image of Gajalaxmi at the main door is considered auspicious.

# The north-east corner is the face house and should always be kept clean.

# While cleaning the floor with any disinfectant, a little sea salt should be added.

# Students should study facing the north or east.

# Do not sit or sleep under a beam.

# Do not keep or hang paintings depicting war, crime, violence, unrest, agony or distress.

# Construct the front door in such a manner as to avoid the fall of a shadow on it.

# Grow a tulsi or basil plant in front of the house.

# Do not have any cactus in the house. Having it outside the boundry is good.

# Rain water or drainage should flow towards NE-East-North.

# Material to be used in the construction of a house or even commercial building should always be new, except when renovating.

# Elderly people are always more comfortable in the South-West corner.

# The height of the building should reduced from the SW to the NE.

# Walls along the SW should be thicker as compared to walls along the NE.

# Bhumi-pujan ceremony should be performed before commencing the construction of a new house and Griha-pravesh ceremony before shifting into it.

# Do not have a toilet or prayer room (puja room) under a staircase.

# Do not dig well in the middle of a house or plot. It is very inauspicious.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

Indian/Vedic Astrology: Basic Information & Learning Material for Beginners—-

Indian/Vedic Astrology: Basic Information & Learning Material for Beginners—-

Indian astrology also known as vedic astrology or Hindu astrology enjoys a wide popularity and prestige in the world. Its mathematical accuracy and predictions systems are simply marvellous. The following information in the form of tables will be of immense help to students of vedic astrology.

There are seven real planets and two shadowy planets (Rahu & Ketu) in Indian Astrology.
Their features, characteristics and other relevant details are give below:

Planets (Graha)—
———————————————————-
Planet Owns Sex Aspects Sanskrit
Name Sign / Hindi Name
—— —- — ——- ————
Sun Leo Male 7 Surya
Moon Cancer Female 7 Chandra
Mars Aries, Scorpio Male 4-7-8 Mangal
Mercury Gemini, Virgo Neutral 7 Budha
Jupiter Sagit, Pisces Male 5-7-9 Guru
Venus Taur, Libra Female 7 Shukra
Saturn Cap, Aquarius Neutral 3-7-10 Shani
Rahu Aries Female 5-7-9 Rahu
Ketu Libra Neutral 5-7-9 Ketu
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Planets and Their Significations—-
———————————————————-
Planet Main Significator of
—— ————————————————
Sun Soul, Self, Power, Esteem, Ambition

Moon Emotions, Mind, Health, purity, Mental Balance, Mother

Mars Energy, Drive, Agility, Agression, Accidents

Mercury Intellect, Speech, Relating, Dimplomacy, Communications

Jupiter Fortune, Law, God, Wealth, Status, Expansiveness

Venus Desires, Pleasures, artistry, beauty, additions,Sex

Saturn Obstacles, seriousness, truthfulness, Sorrows

Rahu Karma, eccentricities, disturbances, foreign things
——————————————————————

Signs (Rashis) and Their Characteristics

There are twelve sign. Their features and details are given below:—
—————————————————————————————
Sign Sanskrit Meaning Lord Type Mobility Height Strong Rise
English / Hindi During By
—————————————————————————————-
Aries Mesha Ram Mars Fire Movable Short Night Hind
Taurus Vrishaba Bull Venus Earth Fixed Short Night Hind
Gemini Mithuna Embracing Mercury Air Common Medium Night Head
Cancer Karkata Crab Moon Water Movable Medium Night Hind
Leo Simha Lion Sun Fire Fixed Tall Day Head
Virgo Kanya Teenage Girl Mercury Earth Common Tall Day Head
Libra Thula Scales Venus Air Movable Tall Day Head
Scorpio Vrishchika Scorpion Mars Water Fixed Tall Day Head
Sagitt Dhanus Bow Jupiter Fire Common Medium Night Hind
Capricorn Makara Crocodile Saturn Earth Movable Medium Night Hind
Aquarius Kumbha Jug Saturn Air Fixed Short Day Head
Pisces Meena Fish Jupiter Water Common Short Day Both
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Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

Method to Calculate Chaughadia Muhurats—-

Chaughadia Muhurats—

In Vedic Astrology, Chaughadia Muhurtas are a quick and effective method to find out the intraday auspicious times to start a new venture / project or begin an important / auspicious work. These muhurtas are extensively used in Guajrat and other western states of India. In this method, 24 hours of a day are divided into 16 time segments of approximately one and a half hours each (i.e., approx. 3.75 Ghati). Each of these time segments is called a Chaughadia due to its approximate duration of 3.75 Ghati. These Chawghariya / chaughadias are of 7 types and are either good or bad or medium (neutral) in nature.

To begin any good work, only “Good” Chaughadias are selected. It is believed that that if a work is started in “Good” Chaughadia and other Muhurta determining factors (such as Tithi, Nakshatra, Yoga etc.) are also favourable, success is almost assured in one’s efforts.

Method to Calculate Chaughadia Muhurats—

First each day is divided into two time periods:

1. day time (Din-maan) – the period from local sunrise to sunset
2. night-time (Ratri-maan) – the period from sunset to sunrise (next day)

Each time period contains eight Chaughadias. To calculate the duration of each Chaughadia, the respective time period is divided by eight to get 8 chaughadias of equal time. Since there are only 7 types of chaughadias, therefore, in each time period six Chaughadias get 1 division each in their share while one Chaughadia gets 2 divisions.

The Chaughadias are assigned to 8 equal divisions of each time period (day time or night time) in a pre-determined order according to the weekday. The sequence of day-time and night-time Chaughadias varies for each week day. However, the sequence is fixed and does not change for each week day. For example, the sequence for Monday is different to that for Tuesday, which in turn is different to that for Wednesday. But the sequence for each Monday is the same, as also for each Tuesday. [Study the Tables Below]

Clearly, the 16 time divisions of 24 hours are assigned to 7 types of Chaughadias. There will be at least two Chaughadias of the same type within 24 hrs. and two types of Chaughadias are repeated three times within 24 hrs.

The seven types of Chaughadias are as follows:—

Chaughadia Ruled by Nature

1. Udwega ruled by Sun Bad
2. Amrit ruled by Moon Good
3. Roga ruled by Mars Bad
4. Laabh ruled by Mercury Good
5. Shubh ruled by Jupiter Good
6. Chara ruled by Venus Medium
7. Kaala ruled by Saturn Bad

Please note that all important works / projects etc. should be commenced during favorable chaughadias.

Amrit, Shubh and Laabh are favourable Chaughadias.
Chara is an intermediate or neutral Chaughadia.
Udwega,Roga and Kaala are unfavourable Chaughadias.
Chara is generally good for travelling.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

कुछ मुहूर्त हमेशा शुभ होते हैं —

कुछ मुहूर्त हमेशा शुभ होते हैं —

जानिए स्वयं सिद्ध मुहूर्त—-

हम यूँ तो किसी भी काम को करने से पहले मुहूर्त देखते हैं लेकिन कुछ मुहूर्त ऐसे होते हैं जो हमेशा शुभ ही होते हैं। नीचे दिए गए मुहूर्त स्वयं सिद्ध माने गए हैं जिनमें पंचांग की शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं है-

1 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

2 वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया)

3 आश्विन शुक्ल दशमी (विजय दशमी)

4 दीपावली के प्रदोष काल का आधा भाग।

भारत वर्ष में इनके अतिरिक्त लोकचार और देशाचार के अनुसार निम्नलिखित तिथियों को भी स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना जाता है-

1 भड्डली नवमी (आषाढ़ शुक्ल नवमी)

2 देवप्रबोधनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल एकादशी)

3 बसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी)

4 फुलेरा दूज (फाल्गुन शुक्ल द्वितीया)

इनमें किसी भी कार्य को करने के लिए पंचांग शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं है। परंतु विवाह इत्यादि में तो पंचांग में दिए गए मुहूर्तों को ही स्वीकार करना श्रेयस्कर रहता है।

आज के मुहूर्त –शनिवार, 2 अप्रैल 2011—
शुभ विक्रम संवत- 2067, शालिवाहन शक संवत- 1932,
संवत्सर का नाम- शोभन, अयन- उत्तरायन, ऋतु- वसंत,
मास- चैत्र, पक्ष- कृष्ण, तिथि- चर्तुदशी सायं 05.35 पश्चात अमावस्या,
हिजरी सन्- 1432, मु. मास- रबिलाखर, तारीख- 27,
नक्षत्र- पूर्वाभाद्रपद प्रात: 11.24 पश्चात उत्तराभाद्रपद,
योग- शुक्ल प्रात: 8.40 पश्चात ब्रह्मा, सूर्योदयकालीन करण- चतुष्पाद,
चन्द्रमा- मीन राशि में दिवसपर्यंत रहेंगे। ग्रह योग- पंचक जारी है।
बुध वक्री होकर मेष राशि से मीन राशि में प्रवेश प्रात: 11.43 मिनट पर करेंगे।
दिन- सामान्य। दिशाशूल- पूर्व ‍में। मुहूर्त- दानादि कार्य का मुहूर्त।
दिन का पर्व- मेला पहोवा ‍तीर्थ (हरियाणा)।
कार्य की अनुकूलता के लिए- तेल में तली हुई वस्तुओं का दान करें।
उपयोगी ज्ञान- भवन के अग्नि कोण में अंधेरा होने से स्त्री पक्ष को निराशा आने की संभावना रहती है।
शुभ समय- प्रात: 06.55 से 8.12 दिन 11.30 से 1.24। सुझाव- आवश्यक न हो तो प्रात: 09.2 से 10.57 के मध्य शुभ कार्य न करें
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शनिवार, 2 अप्रैल 2011—- दैनिक राशिफल—

राशि फलादेश मेष–
दिन मध्यम रहने की संभावना है। विरोधी काम बिगाड़ने की चेष्टा करेंगे। मान-प्रतिष्ठा में कमी आएगी। खर्च बढ़ने से आर्थिक तंगी हो सकती है।

राशि फलादेश वृष
पारिवारिक दृष्टि से अनुभवों का लाभ मिलेगा। नौकरी में उत्साह रहेगा। कानूनी मामलों में समय का ध्यान रखें। घर में सौहार्दपूर्ण माहौल रहेगा।

राशि फलादेश मिथुन—
आजीविका में अपने लाभ की ओर प्रयत्नशील रहें। संतान के कार्यों पर नजर रखना होगी। सुख-समृद्धि बढ़ेगी। व्यापार अच्छा चलेगा। पठन-पाठन की ओर रुझान रहेगा।

राशि फलादेश कर्क—
नए संबंध बनेंगे। कामकाज के अवरोध दूर होंगे। सत्कार्यों में मन लगेगा। अर्थ के लेनदेन में सफलता मिलेगी। समय का दुरुपयोग न करें।

राशि फलादेश सिंह–
उन्नति पथ प्रशस्त करेंगे। आय-व्यय में संतुलन रहेगा। व्यापारिक मामलों में जवाबदारी बढ़ेगी। संपत्ति संबंधी कार्यों के लिए दिन अनुकूल रहेगा।

राशि फलादेश कन्या—
मन में ऊर्जा का संचार होगा। नई योजनाओं का श्रीगणेश होगा। भौतिक सुख-साधनों में रुचि बढ़ेगी। विरोधियों से सतर्क रहें। कार्यक्षमता में वृद्धि होगी।

राशि फलादेश तुला–
आर्थिक स्थिति अच्छी रहेगी। परिवार में शुभ कार्य का निर्णय होगा। जल्दबाजी में काम न करें। धैर्य व सहनशीलता बनाएँ रखें।

राशि फलादेश वृश्चिक–
व्यापार-व्यवसाय मध्यम रहेगा। आमदनी के अनुरूप खर्च करें। परेशानी को नजरअंदाज न करें। आपसी मामलों को सावधानी से हल करें।

राशि फलादेश धनु—
पुरुषार्थ का फल मिलेगा। दाम्पत्य जीवन में अनुकूलता रहेगी। राज्य पक्ष के कामों में सफलता मिलेगी। व्यावसायिक निर्णय सोच-समझकर लें। आपकी बुद्धिमानी से समस्या का समाधान संभव है।

राशि फलादेश मकर–
मानसिक अस्थिरता दूर करें। कार्यक्षेत्र विस्तृत होगा। व्यावसायिक बाधाएँ प्रयासों से दूर होंगी। दूसरों पर बहुत अधिक विश्वास न करें। आय-व्यय में संतुलन रहेगा।

राशि फलादेश कुंभ–
किसी भी कार्य में सोच-समझकर निर्णय लें। नए संबंध लाभकारी होंगे। व्यावसायिक सहयोग मिलेगा। परिवार में मांगलिक कार्यों की चर्चा होगी।

राशि फलादेश मीन–
अपने कार्यों को समय पर करने का प्रयत्न करें। मनोरंजन में समय व्यतीत होगा। व्यापार लाभदायक रहेगा। परिवार में सुख-शांति रहेगी।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

वास्तु पुजन…….

वास्तु पुजन…….

नवीन घर का प्रवेश उत्तरायण सूर्य में वास्तु पुजन करके ही करना चाहीये | उसके पहले वास्तु का जप यथाशक्ती करा लेना चाहिये | शास्त्रानुसार गृह प्रवेश में माघ ,फाल्गुन ,वैशाख, ज्येष्ठ , आदि मास शुभ बताये गये है | माघ महीने में प्रवेश करने वाले को धन का लाभ होता है | जो व्यक्ति अपने नये घर में फाल्गुन मास में वास्तु पुजन करता है , उसे पुत्र,प्रौत्र और धन प्राप्ति दोनो होता है | चैत्र मास में नवीन घर में रहने के लिये जाने वाले को धन का अपव्यय सहना पडता है | गृह प्रवेश बैशाख माह में करने वाले को धन धान्य की कोई कमी नहीं रहती है | जो व्यक्ति पशुओ एवँम पुत्र का सुख चाहता हो, ऐसे व्यक्ति को अपने नये मकान मे ज्येष्ठ माह में करना चाहिए | बाकी के महीने वास्तु पुजन व गृह प्रवेश में साधारण फल देने वाले होते हैं| शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर कृष्णपक्ष की दशमी तिथी तक वास्तुनुसार गृह प्रवेश वंश वृध्दि दायक माना गया है | धनु मीन के सुर्य यानी के मळमास में भी नये मकान में प्रवेश नहीं करना चाहीए | पुराने मकान को जो व्यक्ति नया बनाता है , और वापस अपने पुराने मकान में जाना चाहे , तब उस समय उपरोक्त बातों पर विचार नहीं करना चाहीए | जिस मकान का द्वार दक्षिण दिशा में हो तो गृह प्रवेश एकम् , छठ , ग्यारस आदि तिथियों में करना चाहिए | दूज , सातम् और बारस तिथि को पश्चिम दिशा के द्वार का गृह प्रवेश श्रेष्ठ बतलाया गया है|

नवीन घर का प्रवेश उत्तरायण सूर्य में वास्तु पुजन करके ही करना चाहीये | उसके पहले वास्तु का जप यथाशक्ती करा लेना चाहिये | शास्त्रानुसार गृह प्रवेश में माघ ,फाल्गुन ,वैशाख, ज्येष्ठ , आदि मास शुभ बताये गये है | माघ महीने में प्रवेश करने वाले को धन का लाभ होता है | जो व्यक्ति अपने नये घर में फाल्गुन मास में वास्तु पुजन करता है , उसे पुत्र,प्रौत्र और धन प्राप्ति दोनो होता है | चैत्र मास में नवीन घर में रहने के लिये जाने वाले को धन का अपव्यय सहना पडता है | गृह प्रवेश बैशाख माह में करने वाले को धन धान्य की कोई कमी नहीं रहती है | जो व्यक्ति पशुओ एवँम पुत्र का सुख चाहता हो, ऐसे व्यक्ति को अपने नये मकान मे ज्येष्ठ माह में करना चाहिए | बाकी के महीने वास्तु पुजन व गृह प्रवेश में साधारण फल देने वाले होते हैं| शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर कृष्णपक्ष की दशमी तिथी तक वास्तुनुसार गृह प्रवेश वंश वृध्दि दायक माना गया है | धनु मीन के सुर्य यानी के मळमास में भी नये मकान में प्रवेश नहीं करना चाहीए | पुराने मकान को जो व्यक्ति नया बनाता है , और वापस अपने पुराने मकान में जाना चाहे , तब उस समय उपरोक्त बातों पर विचार नहीं करना चाहीए | जिस मकान का द्वार दक्षिण दिशा में हो तो गृह प्रवेश एकम् , छठ , ग्यारस आदि तिथियों में करना चाहिए | दूज , सातम् और बारस तिथि को पश्चिम दिशा के द्वार का गृह प्रवेश श्रेष्ठ बतलाया गया है|

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

अपना घर बनाने का योग—

अपना घर बनाने का योग—

घर भी रोटी और कपडा की तरह से जरूरी है,मनुष्य अपने लिये रहने और व्यापार आदि के लिये घर बनाता है,पक्षी अपने लिये प्रकृति से अपनी बुद्धि के अनुसार घोंसला बनाते है,जानवर अपने निवास के लिये गुफ़ा और मांद का निर्माण करते है। जलचर अपने लिये जल में हवा मे रहने वाले वृक्ष आदि पर और जमीनी जीव अपने अपने अनुसार जमीन पर अपना निवास करते है। अपने अपने घर बनाने के लिये योग बनते है। गुरु का योग घर बनाने वाले कारकों से होता है तो रहने के लिये घर बनता है शनि का योग जब घर बनाने वाले कारकों से होता है तो कार्य करने के लिये घर बनने का योग होता है जिसे व्यवसायिक स्थान भी कहा जाता है। बुध किराये के लिये बनाये जाने वाले घरों के लिये अपनी सूची बनाता है तो मंगल कारखाने और डाक्टरी स्थान आदि बनाने के लिये अपनी अपनी तरह से बल देता है। लेकिन घर बनाने के लिये मुख्य कारक शुक्र का अपना बल देना भी मुख्य है,अलग अलग राशियों के लोगों को अपने अपने समय में घर बनाने के योग बनते है।

मेष राशि वालों के लिये गुरु जब भी कर्क राशि का वृश्चिक राशि का या मीन राशि का होगा तभी उनके लिये घर बनाने के लिये योग बन जाते है। लेकिन गुरु जब कर्क राशि का होता है तो अपने द्वारा अर्जित आय से घर बनता है,गुरु जब वृश्चिक राशि का होता है तो दूसरे के बनाये गये घर या मृत्यु के बाद की सम्पत्ति पर अपना निवास बनाये जाने या किसी बेकार की पडी सम्पत्ति पर अपना अधिकार जमाकर घर बनाने वाली बात सामने आती है। मंगल के अनुसार घर बनाने की स्थिति भी अपने अपने समय पर बनती है। इस राशि वालों के लिये घर बनाना और घर छोडना बारह साल में तीन बार देखने को मिलता है। जब गुरु कर्क राशि का होता है तो यह घर के अन्दर ही नये प्रकार का निर्माण करते है,वृश्चिक राशि का होता है तो पुराने निर्माण को तुडवाकर अपना निर्माण करते है और जब मीन राशि का होता है तो सामाजिक या किसी अन्य प्रकार से बेदखल जमीन पर अपना निर्माण करते है। गुरु के साथ बुध की युति होती है तो कर्जा लेकर या घर के सामने वाले पोर्सन को सही किया जाता है,अथवा कोई दुश्मनी वाली जमीन पर कब्जा किया जाता है,शनि की साथ वाली स्थिति और केतु के सहयोग से जो घर बनता है वह वकीलो और कब्जा लेने वाली बातों से घर बनता है। सबसे अधिक खतरनाक स्थिति तब बनती है जब राहु किसी तरह से घर बनाने वाले कारकों पर अपना असर देता है।

वृष राशि वालों के लिये भी गुरु जब सिंह राशि का हो धनु राशि का हो या मेष राशि का हो तभी घर बनाने वाली बाते सामने आती है। सिंह राशि के गुरु के सानिध्य में घर बनता है लेकिन घर के अन्दर कई तरह की राजनीति बन जाती है,लेकिन घर बनता जरूर है और धनु राशि में बनाये जाने वाले घर के अन्दर या किसी प्रकार के बंटवारे को लेकर पुरानी सम्पत्ति को लेकर या बाप दादा की सम्पत्ति के बारे मे फ़ैसला लेकर घर बनवाया जाता है,लेकिन मेष राशि में गुरु के होने पर बनवाये जाने वाले घर में दिक्कत ही पैदा होती है। इस राशि वालों के लिये अक्सर घर और जमीनी कारणों में अदालती कारण भी सामने आते है और उन कारणों से वे अपने घर में चैन से नही रह पाते है। मिथुन और मेष राशि का दखल होने से भी घर के अन्दर की सभी बाते गुप्त नही रह पाती है और उस घर को एक धर्मशाला के रूप में भी माना जाये तो अन्यथा नही है। इस राशि के घर बनाने के बाद अक्सर दाहिनी तरफ़ वाला पडौसी अपने घर में रहने वाली व्यापारिक क्रिया को ही रखता है और वृष राशि वालों से किसी न किसी प्रकार का पंगा लेने के लिये ही तैयार रहता है जबकि बायीं ओर का पडौसी शांत भी होता है और घर की बातों को भी धीरे धीरे अपने उपक्रमो से सुनकर समझ कर और दूसरों के अन्दर अफ़वाह फ़ैलाकर बदनाम करने की कोशिश करता है।

मिथुन राशि वाले अपने घर को कन्या के गुरु में मकर के गुरु में और वृष राशि के गुरु में अपना घर बनाते है। कन्या राशि के अन्दर गुरु के रहने पर बनाये जाने वाले घर अक्सर कर्जा और किस्त आदि से बनाये जाते है और घर को बनाते समय पानी या किसी प्रकार की जनता की लडाई से भी जूझना पडता है। इस राशि वालों के घर के पडौसी भी बायीं तरफ़ वाले कोई राजनीतिक लोग या सरकारी सेवा वाले लोग होते है और दाहिनी तरफ़ वाले कोई व्यापारी या कानूनी जानकार रहते है। इस राशि वाले जब मकर के गुरु में अपना घर बनाते है तो उनके लिये यह भी देखना जरूरी होता है कि पहले उस स्थान पर या तो घर बन चुका होता है या उन्हे तोडकर घर बनाया जाता है। इसके साथ ही इस भाव में गुरु होने पर जो घर बनाया जाता है तो घर का बायां पडौसी किसी धार्मिक संस्था से जुडा होता है और दायां पडौसी किसी न किसी प्रकार के लगातार लाभ या कमन्यूकेशन के कारणों से जुडा होता है लेकिन दाहिना पडौसी हमेशा इस राशि वाले के लिये भाई जैसा व्यवहार ही करता है। लेकिन इस राशि का जीवन साथी अपनी गतिविधियों से उस पडौसी पर अपना वर्चस्व कायम रखने की कोशिश करता है। इस राशि के द्वारा जो भी घर वृष राशि के गुरु में बनाये जाते है वे केवल धन की कमाई या ऊपरी इन्कम को ध्यान में रखकर बनाये जात्गे है।

कर्क राशि वाले अपने घर को तुला के गुरु में कुम्भ के गुरु में और मिथुन के गुरु में ही बनाने की कोशिश करते है,इस राशि वाले जब भी अपना घर तुला के गुरु में बनाते है तो इन्हे सौगात में दाहिनी तरफ़ या तो सन्तान हीन लोग मिलते है और बायीं तरफ़ नौकरी पेशा और अपने घर को किराये पर चलाने वाले लोग मिलते है,दाहिनी तरफ़ वाला घर हमेशा तुला राशि वाले से मानसिक शत्रुता रखता है और दाहिनी तरफ़ वाला पडौसी केवल मतलब से ही मतलब रखने वाला होता है। इस राशि वालों का मकान अक्सर पूर्व मुखी ही मिलता है। जब इस राशि वाले कुम्भ राशि के गुरु में अपना मकान बनाते है तो मित्र इनकी सहायता में बहुत जल्दी आते है और इस राशि के बायीं तरफ़ एक मकान को दुबारा तोड कर बनाया जाता है और उसका दरवाजा पहले जो रहा होता है वह बदल कर लगाया जाता है,इसके अलावा जो मकान दाहिनी तरफ़ का होता है वह कई हिस्सेदारों का होता है और अक्सर उसके तीन ही हिस्सेदार मिलते है,लेकिन वह मकान किसी धर्म स्थान या सामाजिक जमीन को कब्जे में लेकर अनैतिक रूप से भी बनाया गया होता है। मिथुन राशि के गुरु में जब इस राशि वालों का मकान बनता है तो वह तीसरी सम्पत्ति के रूप में भी माना जाता है और तीन मन्जिल के आकार का भी बनता है। उस मकान से इस राशि वालों की पहिचान होती है। उस मकान के दाहिने साइड में कोई धन से सम्बन्धित या खाने पीने के सामान को बेचने से सम्बन्धित व्यक्ति का मकान होता है तथा बायीं तरफ़ जनता से जुडे व्यक्ति का या पब्लिक के लिये कार्य करने वाले व्यक्ति का मकान होता है।

सिंह राशि के लिये मकान बनाने के लिये वृश्चिक राशि के गुरु में मीन राशि के गुरु में और कर्क राशि के गुरु में मकान बनाने की बारी आती है,इस राशि वालों का मकान पहले तो उसी स्थान पर बनाया जाता है जहां पहले कोई रहता ही नही हो और बंजर जमीन पर बनाये जाने वाले मकानों की श्रेणी में आता है। अक्सर इस प्रकार के लोग इस गुरु की उपस्थिति में उस जमीन को सरसब्ज करने की कोशिश करते है जिसका पहले कोई मूल्य नही रहा होता है। मीन राशि में गुरु के होने पर भी इस राशि वाले किसी प्रकार की मौत के बाद की सम्पत्ति को अपने आधीन करने के बाद अपना घर बनाने की कोशिश करते है,और इसके दाहिने तरफ़ वाला पडौसी या तो रक्षा सेवा में होता है या डाक्टरी या इन्जीनियरिंग वाले कामों के अन्दर अपना स्थान रखता है,बायीं तरफ़ वाला व्यक्ति पहले उस मकान मालिक का कोई बनाया गया रिस्तेदार होता है लेकिन जैसे ही इस राशि वाला मकान का निर्माण करता है उससे पहले ही वह अपना मकान जो पहले होता है उसे तोड कर बनाने की कोशिश करता है। कर्क राशि के गुरु में मकान की बनाने की क्रिया जनता के बीच में या बाजार में बनाने की होती है और अक्सर पानी वाले स्थानों नदियों या समुद्र के किनारे तालाबों या नालों के किनारे मकान बनाने की क्रिया होती है।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

श्रीगणेश वन्दना—

श्रीगणेश वन्दना—

Om Gan Ganptye Namah:—

“Shri Ganesh ka Naam Liya to Badha Fatak nahi pati hai, Devon Ka vardan Barasta, Budhdhi vimal ban jati hai.”

Praying Lord Ganesha makes a human free from all problems and obstacles. He is marked by intelligence, sharpness and wisdom as he is blessed by other divinity powers. All our works starts with remembering to Lord Ganesha. Lord Ganesha is worshiped worldwide.

OM—
Om represents Shri Maha Ganpati. In hindu literature, all letters (of devnagri lipi or script) are worshiped as seed mantra or beej mantra. Every character describes a deity and is a perfect symbol and mantra of that particular deity. As example we can see Lord Ram by decorating “अ (A)” we can look Lord Hanuman by designing क्रौं (Kraun)”, and we can find face of Lord Krishna in शं (Shan)”. Like this we can take another example of “ई (E)” which is Beej Mantra of Shakti (Goddes of Power). For example the word “शव (Shav)” is used for a dead person in Hindi but when we add “ई” in “Shav” the association becomes “शिव” (Shiv)” means Kaal (death) of Kaal or Mahakaal which can conquer death. If we write ऊँ OM in reverse order it takes form of Allah (Holy God of Islam).

Place of Chandra Bindu ( ँ )—
Chandra Bindu in Omkar is right hand of Chandrama (Moon), and Chandrama (Moon) is covered in a Bindu which represents Al-might who made the universe and everything in this world. Simply we can say that Chandra Bindu associates power with OM. Here “अ (A)” means Aja (Brahma), “उ (U)” means Udar (Vishnu) and “म (M)” means Makar (Shiv) who are the powers of creation, coordination and destruction. These three power are safe in OM if they are covered by Chandra Bindu. Like this OM shows us the reality of God Almighty in a simple symbol.

Aradhna (worship) of Ganeshji as Brahma-Vidya (Supreme knowledge)
The Brahma Vidya is the mool (root) of all vidyas (knowledge). No one can be perfect in anything if he does not know Brahma Vidya. When we add power (Shakti or Bindu) in pronunciation generated from roof and nose, it makes Brahma Vidya. It is said that a dull person can be wise, intelligent and perfect in any Vidya (knowledge or science) if he/she practices Brahma Vidya continuously without laziness.

Pronunciation of Brahma Vidya with the Name of Ganeshji–
In Ganesha Mantra “Om Gan Ganpatye Namah:” “Gan” letter describes the complete Brahma Vidya. Continuously recitation of “Gan” seed mantra removes dirt of our roof and inner parts of nose, our nerves start to opening their gates to mind. Nervous system of eye, nose, ear and our sensory system begins to use its functioning and then it makes us more conscious, more wise and more intelligent.

Recitation of Brahma Vidya is worship of Sarv Ganpati (Maha Ganpati)–
अं आं इं ईं उं ऊं ऋं लृं एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं डं. चं छं जं झं यं टं ठं डं णं तं थं दं धं नं पं फ़ं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं त्रं ज्ञं, is Brahma Vidya. To do recitation from first to last and then in reverse order is said Anulom Vilom Vidya. But when we recite this vidya in the form of Ganeshji or Omkar, we start to touch higher level of Sadhna.

ऊँ गं गणपतये नम:—
“श्री गणेश का नाम लिया तो बाधा फ़टक न पाती है,देवों का वरदान बरसता बुद्धि विमल बन जाती है”कहावत सटीक भी और खरी भी उतरती है.बिना गणेश के कोई भी काम बन ही नही सकता,चाहे कितने ही प्रयास क्यों नही किये जायें,भारत ही नही विश्व के कौने कौने मे भगवान श्री गणेश जी की मान्यता है,कोई किस रूप में पूजता है तो कोई किसी रूप में उनकी पूजा और श्रद्धा रखता है।

ऊँ–
ऊँ का वास्त्विक रूप ही गणेश जी का रूप है,हिन्दू धर्म के अन्दर अक्षरों की पूजा की जाती है,अक्षर को ही मान्यता प्राप्त है,हर देवता का रूप है हिन्दी भाषा का प्रत्येक अक्षर,”अ” को सजाया गया और श्रीराम की शक्ल बन गयी,”क्रौं” को सजाया गया तो हनुमान जी का रूप बन गया,”शं” को सजाया गया तो श्रीकृष्ण का रूप बन गया,इसी तरह से मात्रा को शक्ति का रूप दिया गया,जैसे “शव” को मुर्दा का रूप तब तक माना जायेगा जब तक कि छोटी इ की मात्रा को इस पर नही चढाया जाता,छोटी की मात्रा लगाते ही “शव” रूप बदल कर और शक्ति से पूरित होकर “शिव” का रूप बन जाता है। ऊँ को उल्टा करने पर वह “अल्लाह” का रूप धारण कर लेता है.

चन्द्र बिन्दु का स्थान—
ऊँ के ऊपर चन्द्र बिन्दु का स्थान चन्द्रमा की दक्षिण भुजा का रूप है,चन्द्रमा का आकार एक बिन्दु के अन्दर बताया गया है,और बिन्दु को ही श्रेष्ठ उपमा से सुशोभित किया गया है,बिन्दु का रूप उस कर्ता से है जिससे श्रष्टि का निर्माण किया है,अ उ और म के ऊपर भी शक्ति के रूप में चन्द्र बिन्दु का रूपण केवल इस भाव से किया गया है कि अ से अज यानी ब्रह्मा,उ से उदार यानी विष्णु और म से मकार यानी शिवजी का भी आस्तित्व तभी सुरक्षित है जब वे तीनो शक्ति रूपी चन्द्र बिन्दु से आच्छादित है।

ब्रह्म-विद्या है श्रीगणेश जी आराधना में—
ब्रह्म विद्या को जाने बिना कोई भी विद्या मे पारंगत नही हो पाता है,तालू और नाक के स्वर से जो शक्ति का निरूपण अक्षर के अन्दर किया जाता है वही ब्रह्मविद्या का रूप है। बीजाक्षरों को पढते समय बिन्दु का प्रक्षेपण करने से वह ब्रह्मविद्या का रूप बन जाता है.ब्रह्मविद्या का नियमित उच्चारण अगर एक मंदबुद्धि से भी करवाया जाये तो वह भी विद्या में उसी तरह से पारंगत हो जाता है जैसे महाकवि कालिदास जी विद्या में पारंगत हुये थे।

गणेशजी के नाम के साथ ब्रह्मविद्या का उच्चारण—
ऊँ गं गणपतये नम: का जाप करते वक्त “गं” अक्षर मे सम्पूर्ण ब्रह्मविद्या का निरूपण हो जाता है,गं बीजाक्षर को लगातार जपने से तालू के अन्दर और नाक के अन्दर जमा मल का विनास होता है और बुद्धि की ओर ले जाने वाली शिरायें और धमनियां अपना रास्ता मस्तिष्क की तरफ़ खोल देतीं है,आंख नाक कान और ग्रहण करने वाली शिरायें अपना काम करना शुरु कर देतीं है और बुद्धि का विकास होने लगता है.

ब्रह्म विद्या का उच्चारण ही सर्व गणपति की आराधना है—
अं आं इं ईं उं ऊं ऋं लृं एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं डं. चं छं जं झं यं टं ठं डं णं तं थं दं धं नं पं फ़ं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं त्रं ज्ञं,ब्रह्म विद्या कही गयी है। उल्टा सीधा जाप करना अनुलोम विलोम विद्या का विकास करना कहा जाता है,लेकिन इस विद्या को गणेश की शक्ल में या ऊँ के रूप को ध्यान में रख कर करने से इस विद्या का विकास होता चला जाता है।

पति पत्नी के सुखी जीवन के लिये वास्तु की उपयोगिता—
आज के भौतिक संसार में मनुष्य अध्यात्म को छोड़कर भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है। समय के अभाव ने उसे रिश्तों के प्रति उदासीन बना दिया है। किंतु आज भी मनुष्य अपने घर में संसार के सारे सुखों को भोगना चाहता है। इसके लिए हमें वैवाहिक जीवन को वास्तु से जोड़ना होगा। वास्तव में हम ऐसा क्या करें कि पति-पत्नी के बीच अहंकार की जगह प्रेम, प्रतियोगिता के स्थान पर सानिध्य मिले।

यद्यपि गृहस्थ जीवन में या व्याहारिक जीवन में कोई भी छोटा सा कारण एक बड़े कारण में परिवर्तित हो जाता है। चाहे वह आर्थिक हो या घर के अन्य सदस्यों को लेकर हो। इसका सीधा प्रभाव पति-पत्नी के आपसी संबंधों पर पड़ता है। इसलिए घर का वातावरण ऐसा होना चाहिए कि ऋणात्मक शक्तियां कम तथा सकारात्मक शक्तियां अधिक क्रियाशील हों। यह सब वास्तु के द्वारा ही संभव हो सकता है।

घर के ईशान कोण का बहुत ही महत्व है। यदि पति-पत्नी साथ बैठकर पूजा करें तो उनका आपस का अहंकार खत्म होकर संबंधों में मधुरता बढ़ेगी। गृहलक्ष्मी द्वारा संध्या के समय तुलसी में दीपक जलाने से नकारात्मक शक्तियों को कम किया जा सकता है। घर के हर कमरे के ईशान कोण को साफ रखें, विशेषकर शयनकक्ष के।

पति-पत्नी में आपस में वैमनस्यता का एक कारण सही दिशा में शयनकक्ष का न होना भी है। अगर दक्षिण-पश्चिम दिशाओं में स्थित कोने में बने कमरों में आपकी आवास व्यवस्था नहीं है तो प्रेम संबंध अच्छे के बजाए, कटुता भरे हो जाते हैं।

शयनकक्ष के लिए दक्षिण दिशा निर्धारित करने का कारण यह है कि इस दिशा का स्वामी यम, शक्ति एवं विश्रामदायक है। घर में आराम से सोने के लिए दक्षिण एवं नैऋत्य कोण उपयुक्त है। शयनकक्ष में पति-पत्नी का सामान्य फोटो होने के बजाए हंसता हुआ हो, तो वास्तु के अनुसार उचित रहता है।

घर के अंदर उत्तर-पूर्व दिशाओं के कोने के कक्ष में अगर शौचालय है तो पति-पत्नी का जीवन बड़ा अशांत रहता है। आर्थिक संकट व संतान सुख में कमी आती है। इसलिए शौचालय हटा देना ही उचित है। अगर हटाना संभव न हो तो शीशे के एक बर्तन में समुद्री नमक रखें। यह अगर सील जाए तो बदल दें। अगर यह संभव न हो तो मिट्टी के एक बर्तन में सेंधा नमक डालकर रखें।

घर के अंदर यदि रसोई सही दिशा में नहीं है तो ऐसी अवस्था में पति-पत्नी के विचार कभी नहीं मिलेंगे। रिश्तों में कड़वाहट दिनों-दिन बढ़ेगी। कारण अग्नि का कहीं ओर जलना। रसोई घर की सही दिशा है आग्नेय कोण। अगर आग्नेय दिशा में संभव नहीं है तो अन्य वैकल्पिक दिशाएं हैं। आग्नेय एवं दक्षिण के बीच, आग्नेय एवं पूर्व के बीच, वायव्य एवं उत्तर के बीच।

अत: यदि हम अपने वैवाहिक जीवन को सुखद एवं समृद्ध बनाना चाहते हैं और अपेक्षा करते हैं कि जीवन के सुंदर स्वप्न को साकार कर सकें। इसके लिए पूर्ण निष्ठा एवं श्रद्धा से वास्तु के उपायों को अपनाकर अपने जीवन में खुशहाली लाएं।

श्री विष्णु सहस्त्रनामस्तोत्र—-

ध्यान—-

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् ।
सहारवक्षः स्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥
स्तोत्र
यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् ।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
नमः समस्तभुतानामादिभुताय भूभृते ।
अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः ।
युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ १ ॥
युधिष्ठिर उवाच
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् ॥ ९ ॥
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ १० ॥
यतः सर्वाणि भुतानि भवन्त्यादियुगागमे ।
यस्मिश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ ११ ॥
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।
विष्णोर्नामसहस्त्रं मे श्रृणु पापभयापहम् ॥ १२ ॥
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ १३ ॥
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्‍कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १४ ॥
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ १५ ॥
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान्केशवः पुरुषोत्तमः ॥ १६ ॥
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ १७ ॥
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरत्तमः ॥ १८ ॥
अप्रमेयो ह्रषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ १९ ॥
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतिस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ २० ॥
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ २१ ॥
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ २२ ॥
सुरेशः शरण शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ २३ ॥
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगाविनिःसृतः ॥ २४ ॥
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा सम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ २५ ॥
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतः स्थाणूर्वरारोहो महातपाः ॥ २६ ॥
सर्वगः सर्वविद्भनुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्‍ कविः ॥ २७ ॥
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्युहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ २८ ॥
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ २९ ॥
उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ ३० ॥
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ ३१ ॥
महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ ३२ ॥
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदाम पतिः ॥ ३३ ॥
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ ३४ ॥
अमृत्युः सर्वदृक्‍ सिंहः सन्धाता सन्धिमान्सिथरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ ३५ ॥
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्त्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ ३६ ॥
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान्न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्त्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात् ॥ ३७ ॥
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ ३८ ॥
सुप्रसादः प्रसनात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ ३९ ॥
असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ ४० ॥
वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ ४१ ॥
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ ४२ ॥
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ ४३ ॥
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ ४४ ॥
भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ ४५ ॥
युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्योऽव्यक्तरूपश्च सहस्त्रजिदनन्तजित् ॥ ४६ ॥
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ ४७ ॥
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपां निधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ४८ ॥
स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥ ४९ ॥
अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ ५० ॥
पद्मभानोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ।
महर्द्धिऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ ५१ ॥
अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान्समितिञ्ञयः ॥ ५२ ॥
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ ५३ ॥
उद्भवः क्षोभणॊ देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ ५४ ॥
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ ५५ ॥
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नेयोऽनय ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ ५६ ॥
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ ५७ ॥
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ५८ ॥
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ ५९ ॥
अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥ ६० ॥
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ६१ ॥
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुह्रत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ६२ ॥
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ६३ ॥
धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् ।
अविज्ञाता सहस्त्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ ६४ ॥
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्‌गुरुः ॥ ६५ ॥
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीरभूतभृद्बोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ ६६ ॥
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः ॥ ६७ ॥
जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ ६८ ॥
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ ६९ ॥
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्याक्षो महाश्रृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ ७० ॥
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ ७१ ॥
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणोऽच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ ७२ ॥
भगवान्‍ भगहानन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ ७३ ॥
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिविस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ ७४ ॥
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥ ७५ ॥
शुभाङ्ग शान्तिदः स्त्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ ७६ ॥
अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीनिवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ॥ ७७ ॥
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥ ७८ ॥
स्वक्षः स्वङ्ग शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वर्ह ।
विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ ७९ ॥
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ ८० ॥
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ ८१ ॥
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकशः केशवः केशिहा हरिः ॥ ८२ ॥
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनंजयः ॥ ८३ ॥
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्‍ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद्‍ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ ८४ ॥
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ ८५ ॥
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ ८६ ॥
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ ८७ ॥
सद्‍गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ ८८ ॥
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥ ८९ ॥
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्थ शतमूर्तिः शताननः ॥ ९० ॥
एको नैकः सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ ९१ ॥
सुर्वणोवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ ९२ ॥
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ ९३ ॥
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश्रृङ्गो गदाग्रजः ॥ ९४ ॥
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ ९५ ॥
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ ९६ ॥
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ ९७ ॥
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः श्रृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ ९८ ॥
सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागिश्वरेश्वरः ।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ ९९ ॥
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ १०० ॥
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥ १०१ ॥
सहस्त्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ १०२ ॥
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ १०३ ॥
भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ १०४ ॥
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्तानियमोऽयमः ॥ १०५ ॥
सत्त्ववान्सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः ॥ १०६ ॥
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ १०७ ॥
अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ १०८ ॥
सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरप्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥ १०९ ॥
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ ११० ॥
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ १११ ॥
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ ११२ ॥
अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरस्त्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ ११३ ॥
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ ११४ ॥
आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ ११५ ॥
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ ११६ ॥
भूर्भुवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ ११७ ॥
यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ ११८ ॥
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्त्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ ११९ ॥
शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ १२० ॥
॥ सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ॥
॥ फलश्रुतिः ॥
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।
नाम्नां सहस्त्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥ १२१ ॥
य इदं श्रृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ १२२ ॥
वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् ।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥ १२३ ॥
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात्प्रजाम् ॥ १२४ ॥
भक्तिमान्यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।
सहस्त्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥ १२५ ॥
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ १२६ ॥
न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।
भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥ १२७ ॥
रोगार्तो मुच्यते रोगाद्‍ बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ १२८ ॥
दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन्नामसहस्त्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ १२९ ॥
वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ १३० ॥
न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् ।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ १३१ ॥
इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥ १३२ ॥
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ १३३ ॥
द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः ।
वासुदेवस्य वीर्ये विधृतानि महात्मनः ॥ १३४ ॥
ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।
जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ १३५ ॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्व्म तेजो बलं धृतिः ।
वासुदेआत्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ १३६ ॥
सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥ १३७ ॥
ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ १३८ ॥
योगो ज्ञानं तथा सांख्यं विद्याः शिल्पादि कर्म च ।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥ १३९ ॥
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।
त्रील्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ १४० ॥
इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।
पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयःप्राप्तुः सुखानि च ॥ १४१ ॥
विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभवाप्ययम् ।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥ १४२ ॥
॥ ॐ तत्सदिति श्रीमहाभारते शतसाहस्त्रयां संहितायां वैयासिक्यामानुशासनिके पर्वणि भीष्मयुधिष्ठिरसंवादे श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्त्रनामस्तोत्रम् ॥

शनि की साढ़े साती और शांति के उपाय—

प्रायः जीवन में शनि की साढे सती तीन बार आती है। प्रथम बचपन में , दुसरी यौवनावस्था में और तीसरी वृध्दावस्था में । प्रथम का प्रभाव शिक्षा पर , द्वितीय का प्रभाव धन , मान-सम्मान, नौकरी – रोजगार आदि पर और तृतीय का प्रभाव आयु और स्वास्थ्य पर पडता है। ९ सितम्बर तक शनी सिंह राशी में रहेगा तथा ९ सितम्बर से वर्ष पर्यंत शनी कन्या राशी में रहेगा. वर्ष के आरम्भ से ९ सितम्बर तक कर्क, सिंह,कन्या राशी वालो को साढ़ेसाती एवम मकर, वृष राशी वालो को ढैया रहेगा,एव, ९ सितम्बर से वर्ष पर्यंत सिंह,कन्या, तुला राशीवालो को साढ़ेसाती तथा कुम्भ,मिथुन राशी वालो को ढैया रहेगा.

जिस व्यक्ति की जन्म कुंड़ली में शनि अच्छे स्थान पर अपनी उच्च राशि में या किसी शुभ फल देने वाले अपने मित्र गृह के साथ स्थित हो, तथा दशा अन्तर्दशा अच्छी चल रही हो, उनको शनि का अशुभ फल कम होगा। जिस व्यक्ति की जन्म कुंडलि में चंद्र-शनि अशुभ ग्रह से युक्त, अशुभ स्थानो में हो तो साढेसती और ढैया उस व्यक्ति के लिये चिंता धन हानि, कार्य में विघ्न रोजगार में कमी परिवार में कलह, विघटन धन व्यय का कारण बनती हैं| शनि के अनिष्ट फल निवारण के लिये तेल के छाया पात्र का दान करना चाहीये| शनि मंत्र का जाप, दशांश हवन हनूमानजी की पूजा अभिषेक , तेल यूक्त सिंदुर अर्पण कर भक्ति पूर्वक शनिवार का व्रत, सप्त धान्य का दान, शनिवार को पीपल का पूजन करने से शनि का अनिष्ट फल निवृत होता हैं|

शनि की साढ़े साती के शांति उपाय—-

१॰ श्रीशिवशंकर पर ताँबे का सर्प (नाग) चढ़ाना हितकर है।
२॰ पाँच शनिवार लगातार किसी लोहे के पात्र में तेल लें और उसमें अपना चेहरा देखकर तेल आक के पौधे पर डाल दें। अन्तिम शनिवार अर्थात् पाँचवें शनिवार को तेल चढ़ाने के बाद तेल वाला पात्र आक के पौधे के पास ही गाड़ दें।
३॰ “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं शनैश्चराय नमः” इस मंत्र का जप प्रतिदिन १०८ बार करें।
४॰ सात शनिवार तक आक के पौधे पर लोहे की सात कील चढ़ानी चाहिए।
५॰ काले रंग की वस्तुएं एवं सात बादाम सात शनिवार तक लगातार किसी मन्दिर में दान करें।
६॰ श्री हनुमान की पूजा-अर्चना तथा तेल युक्त सिंदूर समर्पण कर भक्तिपूर्वक शनिवार का व्रत करना चाहिए।
७॰ सूर्यास्त के उपरान्त “सुन्दरकाण्ड” का पाठ करना चाहिए। पाठ के दौरान स्वयं की लम्बाई के बराबर कच्चे सूत के धागे से बनी बत्ती का तेल से दीपक प्रज्जवलित रखें तथा प्रत्येक शनिवार को किसी भी हनुमान मन्दिर में हनुमान जी की प्रतिमा को सिंदूर, चमेली का तेल, चांदी के वर्क से चोला चढ़ावें। जनेऊ, लाल फूल की माला, लड्डु तथा पान अर्पण करें।
८॰ सात प्रकार के धानों का दान तथा शनिवार को प्रातः पीपल का पूजन करें।
९॰ लाजवन्ती, लौंग, लोबान, चौलाई, काला तिल, गौर, काली मिर्च, मंगरैला, कुल्थी, गौमूत्र आदि में से जो भी प्राप्त हो (कम से कम पांच या सात) के चूर्ण को जल में मिलाकर दक्षिणमुखी खड़े होकर स्नान करें। इस जल से स्नान करने के पश्चात् किसी भी तरह का साबुन या तेल का प्रयोग नहीं करें।
१०॰ बिच्छु की जड़ या शमी वृक्ष की जड़ का पूजन कर अभिमंत्रित कर काले कपड़े में बाँधकर श्रवण नक्षत्र में विधि पूर्वक धारण करने से शनि दोष क्षीण होता है।
११॰ लाल चंदन या काली वैजयन्ती की अभिमंत्रित माला धारण करें।
१२॰ शनिवार के दिन काले उड़द, तेल, तिल, लोहे से बनी वस्तु तथा श्याम वस्त्र दान देने से शनि पीड़ा का शमन होता है।
१३॰ काले घोड़े की नाल को प्राप्त कर उसमें से अपनी मध्यमा अंगुली की नाप का छल्ला बनवायें। इस छल्ले का मुँह खुला रखें। शनिवार के दिन कच्चे सूत से अपनी लम्बाई नाप कर उसको मोड़कर बत्ती बनाए, इस बत्ती से तेल का दीपक प्रज्जवलित कर उसमें छल्ला डाल दें तथा निम्नलिखित मन्त्र का काली वैजयन्ती माला से ५ माला जप करें-”ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनेश्चराय नमः” मंत्र जप के उपरान्त क्रमशः जल, पंचामृत तथा गंगाजल से छल्ले को स्नान कराकर मध्यमा अंगुली में धारण करें।

१४॰ एक गट (सूखा नारियल) लेकर उसमें चाकू से छोटा सा गोल छेद काट लें। इस छेद से नारियल में बूरा तथा बादाम, काजू, किशमिश, पिस्ता, अखरोट या छुआरा भी गट में भरें। अब इसे पुनः बन्द कर किसी पीपल के पास भूमि के अन्दर इस प्रकार गाड़ दें की चीटियां आसानी से तलाश लें, किन्तु अन्य जानवर न पा सकें। घर लौटकर पैर धोकर घर में प्रवेश करें। इस प्रकार ८ शनिवार तक यह क्रिया सम्पन्न करें।

१५॰ शिवलिंग पर कच्चा दूध चढावें व “अमोघ शिव कवच” का पाठ करें।
१६॰ प्रत्येक शनिवार जौ के आटे से बनी गोलियाँ मछलियों को खाने को डालें।
१७॰ “शनि वज्रपंजर कवच” , दशरथ-कृत-शनि-स्तोत्र अथवा शनैश्चरस्तवराजः का नियमित पाठ करें।
१८॰ एक काला छाता, सवा किलो काले चने, सवा किलो काले तिल, काला कम्बल, तेल का दीपक शनिवार कि दिन शनिदेव के मन्दिर में दान करें।
१९॰ भोजन करने से पूर्व परोसी गयी थाली में से एक ग्रास निकालकर काले कुत्ते को खिलाएँ अथवा शनिवार को शाम के समय उड़द की दाल के पकौडे व इमरती कुत्ते को खिलाए।
२०॰ शनिवार के दिन काले कपड़े में जौ, नारियल, लोहे की चौकोर शीट, काले तिल, कच्चे कोयले व काले चने को पोटली में बांधकर बहते हुए पानी में डालना शुभ रहता है।
२१॰ काली गाय व काले कुत्ते को तेल से चुपड़ी रोटी, चने की दाल व गुड खिलाना लाभप्रद रहता है।
२२॰ दूध में शहद व गुड़ को मिलाकर वट वृक्ष को सींचे।
२३॰ शनिवार, अमावस्या आदि दिनों पर ‘शनि-मन्दिर’ में जाकर आक-पर्ण (मदार के पत्ते) एवं पुष्पों की माला मूर्ति पर चढ़ाएँ। एक या आधा चम्मच तेल भी चढ़ाएँ। अब मूर्ति के सामने बैठकर शान्त-चित्त से निम्न मन्त्र, मूर्ति के भ्रू-मध्य या दाहिनी आँख पर त्राटक-पूर्वक प्रेम-भाव से, ११ बार जपें-”नीलाञ्जन-समाभासं, रविपुत्रं यमाग्रजम्। छाया-मार्तण्ड-सम्भूतं, तं नमामि शनैश्चरम्।।”
अब सूर्य-भगवान् को गायत्री-मन्त्र से एक बार अर्घ्य दें। या “ॐ ह्रीं सूर्याय नमः” का यथा-शक्ति जप करें।

२४॰ ‘आक’ के कुछ पत्ते सुखाकर उसका चूर्ण तैयार करके रखें। १ चौरस १ इंच लोहे के टुकड़े पर “ॐ चैतन्य-शनैश्चरम्” यह मन्त्र खुदवा लें। यदि धनाभाव हो, तो कम से कम एक काला गोल पत्थर ले आकर उसमें ‘शनिदेव’ की भावना रख, पूजा-स्थान में रखें। ‘भगवान् शनि’ के प्रति “चैतन्य” की भावना रखनी चाहिए।
उक्त प्रतिमा को किसी थाली में रखकर उसका पूजन करें। गन्ध, हल्दी-कुंकुम और ११ उड़द चढ़ाएँ। आक के १०८ पुष्प “ॐ चैतन्य-शनीश्चराय नमः” मन्त्र से अर्पित करें। ‘आक’ के ही सूखे पत्तों के चूर्ण की धुप दें। दीप दिखाकर सुख-शन्ति हेतु ‘शनि’ की प्रार्थना करें। भोजन में उड़द के बड़ों का नैवेद्य देना चाहिए।
हर शनिवार को उक्त उपासना करें। उपासना-काल में शनिवार को नही; गुरुवार को उपवास करें। यह बात ध्यान में रखें। ‘साढ़े साती’ काल पूर्ण होने के ढाई मास बाद उपासना बन्द करें और प्रतिमा को जलाशय में विसर्जित कर दें।

॰ शिवलिंग का यथा शक्ति पूजन करें। हो सके, जलाभिषेक करें। पाँच श्वेत पुष्प और एक बिल्व-पत्र चढ़ाएँ। शिव-मन्त्र का जप करें, फिर प्रार्थना करें। यथा-”ॐ श्रीशंकराय नमः। श्रीकैलास-पतये नमः। श्रीपार्वती-पतये नमः। श्रीविघ्न-हर्ताय नमः। श्रीसुख-दात्रे नमः। ॐ शान्ति! शान्ति!! शान्ति!!!”
इस प्रकार प्रार्थना के शिवलिंग के सामने एक नारियल और एक मुठ्ठी गेहूँ रखें। नमस्कार कर घर वापस आएँ।

२५॰ शनि एवं शनि-भार्या-स्तोत्र का नित्य तीन पाठ करने से ‘शनि-ग्रह’ की पीड़ा निश्चय की दूर होती है—-

यः पुरा राज्य-भ्रष्टाय, नलाय प्रददो किल। स्वप्ने शौरिः स्वयं, मन्त्रं सर्व-काम-फल-प्रदम्।।१
क्रोडं नीलाञ्जन-प्रख्यं, नील-जीमूत-सन्निभम्। छाया-मार्तण्ड-सम्भूतं, नमस्यामि शनैश्चरम्।।२
ॐ नमोऽर्क-पुत्राय शनैश्चराय, नीहार-वर्णाञ्जन-नीलकाय।
स्मृत्वा रहस्यं भुवि मानुषत्वे, फल-प्रदो मे भव सूर्य-पुत्र।।३
नमोऽस्तु प्रेत-राजाय, कृष्ण-वर्णाय ते नमः। शनैश्चराय क्रूराय, सिद्धि-बुद्धि प्रदायिने।।४
य एभिर्नामभिः स्तौति, तस्य तुष्टो भवाम्यहम्। मामकानां भयं तस्य, स्वप्नेष्वपि न जायते।।५
गार्गेय कौशिकस्यापि, पिप्लादो महामुनिः। शनैश्चर-कृता पीड़ा, न भवति कदाचन।।६
क्रोडस्तु पिंगलो बभ्रुः, कृष्णो रौद्रोऽन्तको यमः। शौरिः शनैश्चरो मन्दः, पिप्लादेन संयुतः।।७
एतानि शनि-नामानि, प्रातरुत्थाय यः पठेत्। तस्य शौरेः कृता पीड़ा, न भवति कदाचन।।८
ध्वजनी धामनी चैव, कंकाली कलह-प्रिया। कलही कण्टकी चापि, अजा महिषी तुरगंमा।।९
नामानि शनि-भार्यायाः, नित्यं जपति यः पुमान्। तस्य दुःखा विनश्यन्ति, सुख-सौभाग्यं वर्द्धते।।१०

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

गण्डात नक्षत्र ………

गण्डात नक्षत्र ………

भारतीय ज्योतिष में संधिकाल या संक्रमणकाल सदैव अशुभ माना गया हैं | संधि से

मतलब दो परस्पर ग्रह, नक्षत्र , राशियों का समाप्तीकाल और दुसरों का प्रारंभकाल से माना गया हैं |

सर्वविदित हैं कि जब दो ऋतुयें परस्पर मिलती हैं तो उसी समय दुनियाँ में रोग ज्यादा

फैलते हैं | दिन और रात्री के संधिकाल में भजन किर्तन करना उपयुक्त होता हैं |

जब देश और राज्य की सरकारे बदलती हैं तो उस समय भी संक्रामण काल के कारण

प्रजा को कष्ट मिलता हैं |ज्योतिष में भी संधिकाल स्थिती के अनेक उदाहरण देखने

मिलते हैं | जैसे संक्रातीसंधि, नक्षत्रसंधि ,राशिसंधि, लग्नसंधि , भावसंधि आदि हैं |

इन संधियो में जन्में जातको को काफी कठनाईयों का सामना करना पडता हैं |

इन्ही संधियो में शुभकार्य , विवाह, यात्रा करना वर्जित हैं |

इसी प्रकार छः नक्षत्र ऐसे है जहाँ राशिसंधि और नक्षत्रसंधि एक साथ आते हैं |

इन्ही को गंडात नक्षत्र कहते हैं | रेवती अश्वनी से मीन और मेष की संधी बनती हैं |

अश्लेषा व मघा से कर्क और सिंह की संधि बनती हैं | ज्येष्ठा व मूल से वृश्चिक तथा

धनु की संधी बनती हैं | यदि इन राशी पर हम ध्यान दे तो मेष ,धनु , सिंह अग्नि

तत्ववाली राशियाँ हैं |कर्क, वृश्चिक, मीन जलचरवाली राशियाँ हैं | अश्वनी मघा मूल

नक्षत्रों के स्वामी केतु हैं और ये तमोगुणी हैं | रेवती ,अश्लेषा व ज्येष्ठा का स्वामी

बुध हैं और ये स्वभाव से रजोगुणी हैं | अतः नक्षत्रों की जोडियाँ रेवती , अश्लेषा ,

मघा , तथा ज्येष्ठा मूल ये गडांत कहलाते हैं | ज्येष्ठा मूल और अश्लेषा बडे मूल

कहलाते हैं | मघा , रेवती , अश्विनी छोटे मूल कहलाते हैं बडे मूल में जन्मे जातको

का जन्म के २७ वें दिन जब चंद्रमा उसी नक्षत्र में आता हैं तब मूल शांति कराई

जाती हैं | छोटे मूलो की शांति १० वें या १९ वें दिन जब उसी स्वामी का

दूसरा या तीसरा नक्षत्र आता हैं तब कराई जाती हैं | ज्येष्ठा नक्षत्र की अंतिम १ घडी
अर्थात २४ मिनिट तथा मूल नक्षत्र की प्रारंभ की १ घडी अभूक्त घडी कहलाते हैं |

अश्वनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने के कारण पिता को कष्ट , दूसरे चरण में ऐश्वर्य,

तिसरे चरण में उच्चपद , तथा चोथे चरण में राज्य सम्मान मिलता हैं | अश्लेषा नक्षत्र में

प्रथम चरण में राज्य सुख , द्वितीय में धन हानि , तृतीय में माता को कष्ट, चतुर्थ में

पिता को कष्ट रहता हैं | मघा में पहले चरण में माता को कष्ट , दूसरे में पिता को

कष्ट , तिसरे में सुख संपत्ति और चोथे में धन लाभ रहता हैं | ज्येष्ठा के प्रथम चरण

में भाई को कष्ट , द्वितीय में अनुज को पीङा , तृतीय में माता को कष्ट चतुर्थ में

स्वयं कष्ट पाता हैं | मूल नक्षत्र के प्रथम में पितु कष्ट , दुसरे में माता को पीङा ,

तिसरे में धन नाश , चोथे में धन लाभ होता हैं | रेवती में पहले चरण में राज्य सम्मान ,
दुसरे में राज्य सुख , तिसरे में सुख संपदा पर चोथे में स्वयं को कष्ट रहता हैं |

दुसरे में राज्य सुख , तिसरे में सुख संपदा पर चोथे में स्वयं को कष्ट रहता हैं |

अतः मूल शांति किसी विद्वान पंडीत से करानी चाहियें |

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

12 महिनों के व्रत त्यौहार ::—–

12 महिनों के व्रत त्यौहार ::—–

चैत्र सुदी एकम् को हिंदु समाज का नव वर्ष का आरंभ होता हैं। इसे सभी हिंदु धर्म के लोग काफी उल्लास से मनाते हैं। महाराष्ट् में नववर्ष को गुडी पाडवा भी कहते हैं। इस दिन से नव रात्रौं की घट स्थापना होती हैं। नौ दिन तक दुर्गा माता के सप्तशती के पाठ किये जाते हैं। और रामायण के पाठ किये जाते हैं। नौ दिन तक उपवास रखा जाता हैं। माँ दुर्गा को शक्ति की देवी माना जाता हैं। और ९ वें दिन ९ कन्याओं की पूजा करके उन्हें भोजन कराके दक्षिणा दी जाती हैं। इन्हीं दिनों नवरात्री के बीच में गणगौर की पुजा भी की जाती हैं,जिसमें सभी सुहागनें पार्वती रुपी गौरा की १६ दिनो की पूजा का समापन करती हैं। चैत्र के ९ वें दिन में ही राम जन्म के रुप में राम नवमी मनाते हैं। चैत्र मास के पहले पखवाडें में कामदा एकादशी आती हैं। चैत्र सुदी पूर्णिमा के दिन ही हनुमान जयंती मनातेहैं। मंदिर में ज। के प्रसाद का भोग लगाते हैं।

वैशाख बदी … अप्रैल ….

इस माह में पहला त्यौंहार चतुर्थी व्रत का आता हैं| जिसमें गणेश चौथ का व्रत पति और संतान की लम्बी आयु के लिये किया जाता हैं | और चंद्र दर्शन के पश्चात भोजन करते हैं | बासेडा भी इस माह के सोमवार शुक्रवार या बुधवार को करना चाहीये| रात को बना हुआ खाने का शीतला माता के भोग लगा के वो ही लेना चाहीये | उसके पहले गर्म वस्तु खाना वर्जित हैं| इस पखवाडे में वरुथिनी नामक एकादशी आती हैं| बदी में ही अमावस्या आती

वैशाख सुदी …….

सुदी में आखातीज मनाई जाती हैं, जिसमें कोई शुभ मुर्हुत ना होने पर भी सभी शुभ कार्य किये जाते हैं | इसे अक्षय तृतिया भी कहते हैं | परशुरामजी का जन्म वैशाख शुक्ल पक्ष की तीसरी तिथि अर्थात तृतीया को रात्रि के प्रथम प्रहर में हुआ था। अतः इस दिन को परशुराम जयंती के रूप में मनाते हैं। और आखा तीज को ही भगवान बद्रीनाथ जी के पट भी इसी दिन खुलते हैं | वैशाख सुदी नौमी को सीता नवमी मनाई जाती हैं | इस पखवाडे मोहनी नामक एकादशी आती हैं | सुदी तेरस को नृसिंह अवतार होने के कारण इसको नृसिंही जंयती भी कहते हैं | वैशाख की पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा कहते

जेठ बदी…..मई….

जेठ बदी एकम् को नारद जंयती मानी जाती हैं | जेठ के महिने में भी चतुर्थी व्रत आता हैं, जिसे महिलायें करती हैं | अष्टमी को बंगाल में त्रिलोकाष्टमी मानी जाती हैं | जेठ बदी को अपरा एकादशी आती हैं| अमावस्या के दिन शनि देव का जन्म होने के कारण इसे शनैश्वर जयंती के रुप में भी मनाते हैं | वट सावत्री व्रत भी जेठ के मास मे किया जाता हैं | महिलायें पुरे मास बरगद पूजा करती हैं |

जेठ सुदी……मई..

गंगा दशहरे का आरंभ सुदी के एकम् के दिन होता हैं | भगीरथ ने गंगा को धरती पर लाने के लिये काफी कठोर तपस्या की थी | एकम् को शुरु हो के गंगा दशहरा दशमी को मनाया जाता हैं उस दिन गंगा धरती पर प्रकट हुई थी | वैशाख माह में निर्जला एकादशी आती हैं, इस दिन कहते है कि यदि सामर्थ्य हो तो बिना पानी पिये ये व्रत करना चाहिये, और दुसरे दिन पानी से भरा मटका या बाल्टी देनी चाहिये | पूर्णिमा के दिन वट सावत्री का व्रत पूर्ण होता हैं |

आषाढ़ बदी….जून…

चतुर्थी व्रत सबसे पहले आता हैं| आषाढ़ बदी कि पाँचम को बंगाल की नागपांचम होती हैं, जिसमें नाग देवता की पूजा की जाती हैं | बदी की एकादशी का नाम योगिनी एकादशी हैं |जिसमें हर बार की तरह फलाहार करते है | बदी की अमावस्या को देवपुतृअमावस्या कहते हैं |

आषाढ़ सुदी…..जून

सुदी की दूज को रथ यात्रा निकलती है, जिसमें भगवान जगदीश जी की पूजा की जाती हैं | जगन्नाथ पूरी में काफी धूमधाम से यात्रा निकालते हैं | सुदी की ग्यारस को देव शयनी एकादशी कहते हैं, कहा जाता हैं कि इस दिन भगवान विष्णू क्षीर सागर में शयन करने जाते हैं | इसी पखवाडे के बारस को भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था | और तेरस से कन्याओं का जयापार्वती व्रत आंरभ होता हैं| आषाढ़ की पूर्णिमा को गुरु पुर्णिमा कहते हैं जिस ने किसी को गुरु बनाया हो उन्हें इस दिन गुरु को भेंट देनी चाहीये |

श्रावण बदी…जुलाई…

पूरे सावन में भगवान को हिंडोला देना चाहीये | चतुर्थी व्रत के समय रात को अरग देकर खाना खाना चाहिये | राजस्थानीयों का नागपंचमी सावन की पाँचम को आता हैं | उस दिन भी ठंडा भोजन करना चाहीये और नाग देवता की पूजा करनी चाहीये | सावन का महिना शिव पूजा के लिये उत्तम माना गया हैं, कई लोग पूरे सावन का एक बार भोजन कर के व्रत करते है जिनमें सोमवार प्रमुख हैं | हर मंगलवार को सावन में मंगला गौरी व्रत आता हैं जिनका उद्यापन १६ या २० व्रत के बाद होता हैं | सावन में कामिका एकादशी आती हैं | और हरियाली अमावस्या आती हैं |

श्रावन …सुदी….जूलाई…

सावन की तीज को सिंधारा मनाया जाता हैं, जिनमें घर की लडकीयों रुपयें या मिठाई दी जाती हैं | सुदी की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं | सावन की पूर्णिमा को रक्षा बंधन कहते हैं, जिसमें बहनें अपने भाईयों को राखी बांधती हैं और भाई उसे रक्षा का वचन देता हैं |

भाद्र बदी…..अगस्त ….
चतुर्थी व्रत सबसे प्रमुख हैं | इस माह की छठ को चाना छठ कहते हैं, जिसमें लडकीयाँ चाँद को देख कर भोजन करती हैं | और अष्टमी को कृष्ण जन्म मनाते है, उसे जन्माष्टमी कहते हैं | नौमी को गुगा नौमी आती हैं | इस माह की एकादशी को अजा कहते हैं | बारस को बच्छ बारस कहते हैं | इस दिन गाय की पूजा की जाती हैं और गाय के दूध घी या दही का उपयोग नहीं किया जाता हैं | भाद्र बदी की अमावस्या को भादी अमावस्या कहते हैं |

भाद्र सुदी…..अगस्त ….

सुदी की तीज को हरतालिका तीज कहते हैं | इस दिन शिव गौरी का पूजन किया जाता हैं | भाद्र पद की चतुर्थी को गणेश जी का जन्म हुआ था, इसलिये हर जगह उस दिन काफी धूमधाम से गणेशोत्सव मनाया जाता हैं | भाद्र की पाँचम को ऋषि पंचमी कहते हैं | सातम् को दुबडी सातम् आती हैं | और अष्टमी को राधाष्टमी कहते है | दशमी को बाबा रामदेव का मेला राजस्थान में लगता हैं | और पदमा् नामक एकादशी सुदी में आती हैं | चौदस को गणेश विर्सजन किया जाता हैं, इसे अंनत चतुर्दशी कहते हैं | सुदी की पूर्णिमा को श्राद्ध आते हैं |

अश्वनीबदी ….सितम्बर ….

अश्वनी बदी से पितृपक्ष शुरू होते हैं | ये अमावस्या तक रहते हैं | इस माह में पितरों के नाम पर तर्पन करते हैं| आसोज बदी माह में इंदिरा एकादशी आती हैं | आशा भगोती का व्रत अष्टमी को किया जाता हैं | अमावस्या के दिन बडा श्राद्ध निकाला जाता है|
अश्वनीसुदी …..सितम्बर …..

एकम् से नवरात्रे आंरभ होते हैं | इन्ही दिनों राम रावण के जीवन रुपी लीला का प्रदर्शन किया जाता हैं | पुरे नौ दिन तक रामायण का पाठ किया जाता हैं | दुर्गा माता के आगे झवारे रखे जाते हैं | नवमी के दिन कन्या पूजन किया जाता हैं | सुदी के दशमी के दिन विजया दशमी मनाई जाती हैं | राम की विजय के रुप में विजया दशमी मनाई जाती हैं | पाशांकुशा एकादशी सुदी मे आती हैं | शरद पूर्णिमा के दिन से ही कार्तिक स्नान आंरभ हो जाता हैं |

कार्तिक बदी ….. अक्टुबर ….

इस माह को सबसे बडा और पुण्यवान समझा जाता हैं | सबसे ज्यादा व्रत और त्यौहार भी इसी माह में आते हैं | करवाँ चौथ का व्रत भी इसी माह से शुरु होता हैं | करवाँ चौथ से ही चौथ का व्रत किया जाता हैं | बदी की सातम् को होई सातम और आठम् को होई आठम् का पूजन व व्रत आता हैं | बदी की एकादशी को रमा एकादशी के नाम से जाना जाता हैं | तेरस के दिन धनतेरस मानते हैं जिसमें धन की पुजा की जाती हैं | सोने चांदी की खरिददारी भी की जाती हैं | चौदस के दिन छोटी दिवाली मनाते हैं | जिसे रुप चौदस भी कहते हैं | अमावस्या के दिन दिवाली मनाते हैं | रात को लक्ष्मी जी का पुजन कर पुरे घर को दियों से सजाते हैं | कार्तिक माह में कई उपवास किये जाते हैं | जिनमें तारा भोजन, तारायण नारायण, चंद्रायण व्रत,पंच भीखु आदि होते हैं | अपनी शक्ति और भक्ति के अनुसार करने चाहीये |

कार्तिक सुदी…..अक्टुबर….

सुदी की दूज को भाई दूज कहते हैं |.यम द्वितिया भी इसी को कहते हैं | पाँचम् को लाभ पाँचम् या पांडव पाँचम् कहते हैं | बिहार के सूर्य षष्ठी या छठ पूजा भी छठ को आती हैं | अष्टमी को गौपाष्टमी कहते हैं जिसमें गाय की पुजा की जाती हैं | आँवला नौमी जिसमें आँवला की पूजा होती हैं, नवमी को आता हैं | सबसे बडी एकादशी देवउठनी एकादशी जिसमें कहते हैं कि ४ माह के पश्चात देव सो के उठते हैं | तुलसी विवाह भी एकादशी को किया जाता हैं | चौदस को वैंकुठ चर्तुदशी कहा जाता हैं | पूर्णिमा को कार्तिक स्नान समाप्त होता हैं | और देव दिवाली भी तभी मनाते हैं |

मंगसिर बदी…… नवम्बर….

मंगसिर बदी को चौथ का व्रत आता हैं | जिसे माही चौथ कहते हैं | सातम् को कालभैरव जयंती आती हैं | वैतरणी व्रत या उत्पतीएकादशी भी मंगसिर के महीने में आती हैं |

मंगसिर सुदी ……नवम्बर ….

इस माह में स्कंद जयंती, मोक्षदा एकादशी और अनंग त्रयोदशी तथा दत्तात्रय जयंती आती हैं |

पौष बदी…….दिसम्बर ….

तीज को सौभाग्य सुंदरी का व्रत किया जाता हैं | चौथ का व्रत, सफला एकादशी, दर्शअमावस्या आती हैं | पौष में मलमास लगता हैं जिसमें कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता हैं |

पौष सुदी …….दिसम्बर…..

बंगाल की अनुरुपा षष्ठी मनाई जाती हैं | नौमी से शाकम्भरी नवरात्रे किये जाते हैं | पुत्रदा एकादशी पौष के माह में आती हैं |

माह बदी…….जनवरी…..

माही चौथ का व्रत, षटतिला एकादशी तथा मौनी अमावस्या माह के महिने में आते हैं | मकर संक्राती भी माह में ही आती हैं |

माह सुदी……जनवरी …

माह सुदी में वंसत पंचमी पाँचम के दिन मनाते हैं | बंगाल की शीतला षष्ठी छठ को और सातम् को सूर्य सप्तमी आती हैं | जया एकादशी, भीष्म द्वादशी माह सुदी में आते हैं |

फाल्गुन बदी…..फरवरी…..

फागण में चौथ व्रत जो आता हैं उसे भी करना आवश्कय होता हैं | विजया एकादशी नामक एकादशी आती हैं | शिव और पार्वती के विवाह के रुप में शिवरात्री भी इसी महिने में आती हैं | बदी में अमावस्या आती हैं |

फागन सुदी…….फरवरी ……

सुदी में फूलरिया दूज मनाते हैं | दुर्गाष्टमी बदी में आती हैं | होली के ८ दिन पहले होलाष्टक आता हैं | आमला एकादशी सुदी आती हैं | जयपुर से २ घंटे की दूरी पर रिंगस के पास खाटु में श्याम बाबा का बारस पर मेला लगता हैं | जो कि ३ से ५ दिन तक होता हैं | लाखों की तादाद में भक्त दर्शन लेने आते हैं | श्यामबाबा को कृष्णवतार मानते हैं | पूर्णिमा के दिन होलि आती हैं | उस रात को होलिका दहन करते हैं | चैतन्य जयंती भी पूर्णिमा को आती हैं |

चैत्र बदी……मार्च ……

एकम् को धुलटी मनाते हैं | इसमें रंग से खेलते हैं | चौथ का व्रत तीज के दिन या चौथ के दिन आता हैं | पाचँम को रंग पचंमी मनाते हैं | शीतला सातम के दिन ठंडा खाना बनाके भोग लगा के खाया जाता हैं | उस दिन गर्म खाना नहीं खाते हैं | पापमोचनी एकादशी आती हैं |

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

क्या होता है विवाह मुहूर्त…????

क्या होता है विवाह मुहूर्त…????

विवाह स्त्री और पुरुष की जीवन यात्रा की शुरुआत मानी जाती है,पुरुष का बायां और स्त्री का दाहिना भाग मिलाकर एक दूसरे की शक्ति को पूरक बनाने की क्रिया को विवाह कहा जाता है,भगवान शिव और पार्वती को अर्धनारीश्वर की संज्ञा देना इसी बात का प्रमाण है। ज्योतिष में चार पुरुषार्थों में काम नाम का पुरुषार्थ विवाह के बाद ही पूर्ण होता है,जिस प्रकार से धर्म के अन्दर माता पिता और पूर्वजों की मान्यता है,अर्थ के अन्दर जीवन यापन के लिये धन कमाने की क्रिया को माना जाता है,उसी प्रकार से काम के अन्दर स्त्री और पुरुष के संगम के बाद आगे की वंश प्रणाली को चलाने के लिये विवाह का महत्व माना जाता है,विवाह के बाद संतान और संतान का पालन पोषण संसार के प्रत्येक जीव के अन्दर अपने आप पनपता है।

क्यों किया जाता है विवाह????

संसार में संतान को बिना विवाह किये भी पैदा किया जा सकता है,लेकिन संसारी मर्यादा का हनन न हो,आने वाली संतान को इस बात का भान हो कि वह अमुक समाज की वंश प्रणाली का हिस्सा है,अपने पिता के स्वभाव के अनुसार कार्य और सामाजिक प्रणाली को चलाने की क्षमता उसके अन्दर अपने आप पता लगे,माता अपने पुत्र और पुत्रियों के साथ सम्मान से रह सके,पीछे चलने वाला समाज किसी भी प्रकार के सुख दुख में शामिल हो सके,किसी प्रकार के अक्समात दुख में समाज सहयोग कर सके,अपने समाज और कुल को आगे बढाने के लिये पैदा होने वाला जातक चिंतित हो सके,अपने पुत्र या पुत्री को पाल पोष कर उच्च से उच्च स्थान देने की हिम्मत माता पिता के अन्दर चल सके आदि कारणो के लिये विवाह किया जाता है। अगर बिना विवाह के संतान को पैदा किया जायेगा तो वह अपने को नितांत अकेला समझकर दूसरों को भी हेय द्रिष्टि से देखेगा,उसे मा और बहिन तथा दूसरी स्त्रियों के अन्दर भेद नही मिलेगा,इन कारणो से समाज में अनैतिकता का बोलबाला हो जायेगा,तथा मनुष्य और पशु के अन्दर भेद करना मुश्किल हो जायेगा।

विवाह मुहूर्त क्या है ????

सभी ग्रह अपनी अपनी उपस्थिति जीवित अवस्था में बताते है,यथा ब्रह्माण्डे,तथा पिण्डे के कथन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति सभी ग्रहों से पूर्ण है,संसार में पिता के रूप में सूर्य माता के रूप में चन्द्र भाई के और पति के रूप में मंगल बहिन बुआ और बेटी के रूप में बुध धर्म और भाग्य के प्रदाता तथा शिक्षा को देने वाले गुरु के रूप में बृहस्पति,पत्नी और भौतिक सम्पन्नता के रूप में शुक्र,जमीन जायदाद कार्य तथा कामकरने वाले लोगों के रूप में शनि ससुराल और दूर के सम्बन्धियों के रूप में राहु,पुत्र भान्जा साले आदि के रूप में केतु जीवित रूप में माना जाते है,इन सभी ग्रहों के अनुसार व्यक्ति के लिये विवाह मुहूर्त बनाये गये है,जिस प्रकार की प्रकृति व्यक्ति के अन्दर होती है उसी प्रकार के ग्रह की शक्ति के समय में विवाह किया जाता है,जब स्त्री और पुरुष के आपसी सम्बन्धों के लिये विवाह मिलान किया जाता है,तथा दोनों के ग्रहों को राशि स्वामियों के अनुसार समय को तय किया जाता है तभी विवाह किया जाता है,और उसी ग्रह के नक्षत्र के समय में लगन और समय निकाल कर विवाह किया जाता है,इस प्रकार से उन ग्रहों की शक्तियो का आशीर्वाद मिलने पर विवाह करने से जीवन सुचारु रूप से किया जाता है,अगर बिना मुहूर्त और प्रकृति के मिलाये विवाह कर दिया जाता है तो कुछ समय में शारीरिक संतुष्टि के बाद विवाह विच्छेद आदि के कारणों,आत्म हत्या और कई तरह के दोषों से पूर्ण हो जाता है,तथा एक परिवार में पुरुष तो आराम से जिन्दा रह लेता है,लेकिन स्त्री की दशा सोचनीय हो जाती है,समाज में भ्रष्टाचार का बोलबाला हो जाता है,अधिक से अधिक काम संतुष्टि के लिये स्त्री और पुरुष दोनो ही चरित्र से नीचे गिर जाते है,तामसी भोजन और शराब कबाब भूत के भोजन से खुद को बरबाद करने के बाद दुनिया से कूच कर जाते है।

विवाह क्यों नही होता है..????

मानव जीवन एक पेड की भांति होता है,जिस जमीन पर पेड को लगाया जाताहै उसकी परवरिस की जाती है,उस के अनुसार ही पेड फ़लता फ़ूलता है,व्यक्ति का जन्म सितारों की शक्ति से होता है,सितारे उस जीवन को चलाते है,उनकी किरणें जैसे जैसे जीवन को प्राप्त होती है,जीवन अच्छा या बुरा चलता है,कुन्डली का सप्तम भाव सभी के लिये जरूरी होता है,सुर नर मुनि सभी को इस भाव ने प्रवाभित किया होता है,कहा भी गया है कि,”चिन्ता सांपिनि केहि नहिं खाया,केहि जग जाहि न व्यापी माया”,इस माया रूपी जिन्दगी को जीने के लिये सभी लालियत रहते है,हर कोई एक प्रकार के अजीब नशे के अन्दर जीना चाहता है,जीवन साथी का नशा सबसे अधिक गहरा होता है,वह जब चढता है तो ताज और तख्त की भी चिंता नही करता है,लेकिन यह जरूरी भी नही होता है कि सभी का वैवाहिक जीवन सुखी ही हो,वैवाहिक जीवन को सुखी रखने के लिये और उत्तम ग्रह-रश्मियों को प्राप्त करने के लिये रत्नों का प्रयोग किया जाता है,उत्तम रत्न हमेशा ही सफ़ल वैवाहिक जीवन देता है,रत्न परामर्श करने के लिये और मंगवाने के लिये आप सम्पर्क कर सकते है।

क्या होता है विवाह मुहूर्त…????

विवाह स्त्री और पुरुष की जीवन यात्रा की शुरुआत मानी जाती है,पुरुष का बायां और स्त्री का दाहिना भाग मिलाकर एक दूसरे की शक्ति को पूरक बनाने की क्रिया को विवाह कहा जाता है,भगवान शिव और पार्वती को अर्धनारीश्वर की संज्ञा देना इसी बात का प्रमाण है। ज्योतिष में चार पुरुषार्थों में काम नाम का पुरुषार्थ विवाह के बाद ही पूर्ण होता है,जिस प्रकार से धर्म के अन्दर माता पिता और पूर्वजों की मान्यता है,अर्थ के अन्दर जीवन यापन के लिये धन कमाने की क्रिया को माना जाता है,उसी प्रकार से काम के अन्दर स्त्री और पुरुष के संगम के बाद आगे की वंश प्रणाली को चलाने के लिये विवाह का महत्व माना जाता है,विवाह के बाद संतान और संतान का पालन पोषण संसार के प्रत्येक जीव के अन्दर अपने आप पनपता है।

क्यों किया जाता है विवाह????

संसार में संतान को बिना विवाह किये भी पैदा किया जा सकता है,लेकिन संसारी मर्यादा का हनन न हो,आने वाली संतान को इस बात का भान हो कि वह अमुक समाज की वंश प्रणाली का हिस्सा है,अपने पिता के स्वभाव के अनुसार कार्य और सामाजिक प्रणाली को चलाने की क्षमता उसके अन्दर अपने आप पता लगे,माता अपने पुत्र और पुत्रियों के साथ सम्मान से रह सके,पीछे चलने वाला समाज किसी भी प्रकार के सुख दुख में शामिल हो सके,किसी प्रकार के अक्समात दुख में समाज सहयोग कर सके,अपने समाज और कुल को आगे बढाने के लिये पैदा होने वाला जातक चिंतित हो सके,अपने पुत्र या पुत्री को पाल पोष कर उच्च से उच्च स्थान देने की हिम्मत माता पिता के अन्दर चल सके आदि कारणो के लिये विवाह किया जाता है। अगर बिना विवाह के संतान को पैदा किया जायेगा तो वह अपने को नितांत अकेला समझकर दूसरों को भी हेय द्रिष्टि से देखेगा,उसे मा और बहिन तथा दूसरी स्त्रियों के अन्दर भेद नही मिलेगा,इन कारणो से समाज में अनैतिकता का बोलबाला हो जायेगा,तथा मनुष्य और पशु के अन्दर भेद करना मुश्किल हो जायेगा।

विवाह मुहूर्त क्या है ????

सभी ग्रह अपनी अपनी उपस्थिति जीवित अवस्था में बताते है,यथा ब्रह्माण्डे,तथा पिण्डे के कथन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति सभी ग्रहों से पूर्ण है,संसार में पिता के रूप में सूर्य माता के रूप में चन्द्र भाई के और पति के रूप में मंगल बहिन बुआ और बेटी के रूप में बुध धर्म और भाग्य के प्रदाता तथा शिक्षा को देने वाले गुरु के रूप में बृहस्पति,पत्नी और भौतिक सम्पन्नता के रूप में शुक्र,जमीन जायदाद कार्य तथा कामकरने वाले लोगों के रूप में शनि ससुराल और दूर के सम्बन्धियों के रूप में राहु,पुत्र भान्जा साले आदि के रूप में केतु जीवित रूप में माना जाते है,इन सभी ग्रहों के अनुसार व्यक्ति के लिये विवाह मुहूर्त बनाये गये है,जिस प्रकार की प्रकृति व्यक्ति के अन्दर होती है उसी प्रकार के ग्रह की शक्ति के समय में विवाह किया जाता है,जब स्त्री और पुरुष के आपसी सम्बन्धों के लिये विवाह मिलान किया जाता है,तथा दोनों के ग्रहों को राशि स्वामियों के अनुसार समय को तय किया जाता है तभी विवाह किया जाता है,और उसी ग्रह के नक्षत्र के समय में लगन और समय निकाल कर विवाह किया जाता है,इस प्रकार से उन ग्रहों की शक्तियो का आशीर्वाद मिलने पर विवाह करने से जीवन सुचारु रूप से किया जाता है,अगर बिना मुहूर्त और प्रकृति के मिलाये विवाह कर दिया जाता है तो कुछ समय में शारीरिक संतुष्टि के बाद विवाह विच्छेद आदि के कारणों,आत्म हत्या और कई तरह के दोषों से पूर्ण हो जाता है,तथा एक परिवार में पुरुष तो आराम से जिन्दा रह लेता है,लेकिन स्त्री की दशा सोचनीय हो जाती है,समाज में भ्रष्टाचार का बोलबाला हो जाता है,अधिक से अधिक काम संतुष्टि के लिये स्त्री और पुरुष दोनो ही चरित्र से नीचे गिर जाते है,तामसी भोजन और शराब कबाब भूत के भोजन से खुद को बरबाद करने के बाद दुनिया से कूच कर जाते है।

विवाह क्यों नही होता है..????

मानव जीवन एक पेड की भांति होता है,जिस जमीन पर पेड को लगाया जाताहै उसकी परवरिस की जाती है,उस के अनुसार ही पेड फ़लता फ़ूलता है,व्यक्ति का जन्म सितारों की शक्ति से होता है,सितारे उस जीवन को चलाते है,उनकी किरणें जैसे जैसे जीवन को प्राप्त होती है,जीवन अच्छा या बुरा चलता है,कुन्डली का सप्तम भाव सभी के लिये जरूरी होता है,सुर नर मुनि सभी को इस भाव ने प्रवाभित किया होता है,कहा भी गया है कि,”चिन्ता सांपिनि केहि नहिं खाया,केहि जग जाहि न व्यापी माया”,इस माया रूपी जिन्दगी को जीने के लिये सभी लालियत रहते है,हर कोई एक प्रकार के अजीब नशे के अन्दर जीना चाहता है,जीवन साथी का नशा सबसे अधिक गहरा होता है,वह जब चढता है तो ताज और तख्त की भी चिंता नही करता है,लेकिन यह जरूरी भी नही होता है कि सभी का वैवाहिक जीवन सुखी ही हो,वैवाहिक जीवन को सुखी रखने के लिये और उत्तम ग्रह-रश्मियों को प्राप्त करने के लिये रत्नों का प्रयोग किया जाता है,उत्तम रत्न हमेशा ही सफ़ल वैवाहिक जीवन देता है,रत्न परामर्श करने के लिये और मंगवाने के लिये आप सम्पर्क कर सकते है।

विवाह योग के लिये जो कारक मुख्य है वे इस प्रकार हैं-

सप्तम भाव का स्वामी खराब है या सही है वह अपने भाव में बैठ कर या किसी अन्य स्थान पर बैठ कर अपने भाव को देख रहा है।
सप्तम भाव पर किसी अन्य पाप ग्रह की द्रिष्टि नही है।
कोई पाप ग्रह सप्तम में बैठा नही है।
यदि सप्तम भाव में सम राशि है।
सप्तमेश और शुक्र सम राशि में है।
सप्तमेश बली है।
सप्तम में कोई ग्रह नही है।
किसी पाप ग्रह की द्रिष्टि सप्तम भाव और सप्तमेश पर नही है।
दूसरे सातवें बारहवें भाव के स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हैं,और गुरु से द्रिष्ट है।
सप्तमेश की स्थिति के आगे के भाव में या सातवें भाव में कोई क्रूर ग्रह नही है।
विवाह नही होगा अगर
सप्तमेश शुभ स्थान पर नही है।
सप्तमेश छ: आठ या बारहवें स्थान पर अस्त होकर बैठा है।
सप्तमेश नीच राशि में है।
सप्तमेश बारहवें भाव में है,और लगनेश या राशिपति सप्तम में बैठा है।
चन्द्र शुक्र साथ हों,उनसे सप्तम में मंगल और शनि विराजमान हों।
शुक्र और मंगल दोनों सप्तम में हों।
शुक्र मंगल दोनो पंचम या नवें भाव में हों।
शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ हो और पंचम या नवें भाव में हो।
शुक्र बुध शनि तीनो ही नीच हों।
पंचम में चन्द्र हो,सातवें या बारहवें भाव में दो या दो से अधिक पापग्रह हों।
सूर्य स्पष्ट और सप्तम स्पष्ट बराबर का हो।
विवाह में देरी
सप्तम में बुध और शुक्र दोनो के होने पर विवाह वादे चलते रहते है,विवाह आधी उम्र में होता है।
चौथा या लगन भाव मंगल (बाल्यावस्था) से युक्त हो,सप्तम में शनि हो तो कन्या की रुचि शादी में नही होती है।
सप्तम में शनि और गुरु शादी देर से करवाते हैं।
चन्द्रमा से सप्तम में गुरु शादी देर से करवाता है,यही बात चन्द्रमा की राशि कर्क से भी माना जाता है।
सप्तम में त्रिक भाव का स्वामी हो,कोई शुभ ग्रह योगकारक नही हो,तो पुरुष विवाह में देरी होती है।
सूर्य मंगल बुध लगन या राशिपति को देखता हो,और गुरु बारहवें भाव में बैठा हो तो आध्यात्मिकता अधिक होने से विवाह में देरी होती है।
लगन में सप्तम में और बारहवें भाव में गुरु या शुभ ग्रह योग कारक नही हों,परिवार भाव में चन्द्रमा कमजोर हो तो विवाह नही होता है,अगर हो भी जावे तो संतान नही होती है।
महिला की कुन्डली में सप्तमेश या सप्तम शनि से पीडित हो तो विवाह देर से होता है।
राहु की दशा में शादी हो,या राहु सप्तम को पीडित कर रहा हो,तो शादी होकर टूट जाती है,यह सब दिमागी भ्रम के कारण होता है।
विवाह का समय
सप्तम या सप्तम से सम्बन्ध रखने वाले ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा में विवाह होता है।
कन्या की कुन्डली में शुक्र से सप्तम और पुरुष की कुन्डली में गुरु से सप्तम की दशा में या अन्तर्दशा में विवाह होता है।
सप्तमेश की महादशा में पुरुष के प्रति शुक्र या चन्द्र की अन्तर्दशा में और स्त्री के प्रति गुरु या मंगल की अन्तर्दशा में विवाह होता है।
सप्तमेश जिस राशि में हो,उस राशि के स्वामी के त्रिकोण में गुरु के आने पर विवाह होता है।
गुरु गोचर से सप्तम में या लगन में या चन्द्र राशि में या चन्द्र राशि के सप्तम में आये तो विवाह होता है।
गुरु का गोचर जब सप्तमेश और लगनेश की स्पष्ट राशि के जोड में आये तो विवाह होता है।
सप्तमेश जब गोचर से शुक्र की राशि में आये और गुरु से सम्बन्ध बना ले तो विवाह या शारीरिक सम्बन्ध बनता है।
सप्तमेश और गुरु का त्रिकोणात्मक सम्पर्क गोचर से शादी करवा देता है,या प्यार प्रेम चालू हो जाता है।
चन्द्रमा मन का कारक है,और वह जब बलवान होकर सप्तम भाव या सप्तमेश से सम्बन्ध रखता हो तो चौबीसवें साल तक विवाह करवा ही देता है।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

दैविक कार्य और कलश-स्थापना—-

कलश स्थापना—
किसी भी धार्मिक समय में और योजना आदि में कलश स्थापना का बहुत महत्व है,पृथ्वी को कलश रूप में स्थापित किया जाता है,फ़िर कलश में सम्बन्धित देवी देवता का आवाहन कर विराजित किया जाता है,चूंकि पृथ्वी एक कलश की भांति है,और जल को संभाल कर लगातार गोल घूम रही है,जल का एक एक बूंद कितने ही अणुओं की भण्डारिणी है,कलश स्थापना का वैदिक महत्व समझने के बाद किसी भी पूजा पाठ या श्रीदुर्गा स्थापना आदि में कलश से सम्बन्धित भ्रान्तियां अपने आप समाप्त हो जायेंगी।

कलश का रूप—-
एक मिट्टी का कलश जो कि काला न हो,कभी कभी अधिक आग से कलश का रंग कहीं कहीं काला हो जाता है,उसे नही लेना चाहिये पीले कलर का कलश लेकर उसे पवित्र जल से साफ़ कर लेना है,और कलश के गले में तीन धागा वाली मोटी मोली को उसी प्रकार से बांधना है जिस प्रकार से गले में धागा आदि बांधते है,फ़िर कलश के चारों तरफ़ चावल का आटा पीसकर चार स्वास्तिक के निशान बना लेने है,और प्रत्येक स्वास्तिक के अन्दर चार चार टीका लगा देने है,जहां पर कलश को स्थापित किया जाना है,उस स्थान को साफ़ करने के बाद कुमकुम या रोली से अष्टदल कमल बना लेना है उसके बाद भूमि का स्पर्श करने के बाद इस मंत्र को पढना है—-

ऊँ भूरशि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री, पृथ्वीं यच्छ पृथ्वीं दृ ँ ह पृथ्वीं मा हिं सी:।

इस मन्त्र को पढकर पूजित भूमि पर सप्तधान्य अथवा गेंहूँ या चावल या जौ एक अंजुलि भर कर रख दें।
धान्य को रखकर इस मंत्र को पढें-
ऊँ धान्यमसि धिनुहि देवान प्राणाय त्वो दानाय त्वा व्यानाय त्वा,दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो व: सविता हिरण्यपाणि: प्रति गृभ्णात्वच्छिद्रेण पणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि।

इस मंत्र को पढने के बाद कलश को धान्य के ऊपर स्थापित कर दें।
इसके बाद इस मंत्र को पढें-
ऊँ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्वन्दव: पुनुरूर्जा नि वर्तस्व सा न: सहस्त्रं धुक्ष्वोरूधारा पयस्वती पुनर्मा विशाद्रयि:।

इसके बाद कलश के अन्दर जल भरते समय इस मन्त्र को पढना है-
ऊँ वरुणस्योत्त्म्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसनमसि वरुणस्य ऋतसदनमा सीद।

इसके बाद किसी साफ़ पत्थर पर सफ़ेद चंदन की लकडी को घिसकर चंदन को किसी साफ़ कटोरी में समेट कर कलश के चारों तरफ़ चन्दन के टीके चारों स्वास्तिकों पर लगाने है,और इस मन्त्र को पढते जाना है-
ऊँ त्वां गन्धर्वा अखनँस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पति:,त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान यक्ष्मादमुच्यत।

कलश के अन्दर सर्वोषधि (मुरा,जटामांसी,वच,कुष्ठ,शिलाजीत,हल्दी,दारूहल्दी,सठी,चम्पक,मुस्ता) को डालते वक्त यह मन्त्र पढना है-
ऊँ या औषधी: पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा,मनै नु बभ्रूणामहँ शतं धामानि सप्त च ।

इसके बाद किसी नदी या तालाब के किनारे से सफ़ेद और हरे रंग की दूब जिसकी लम्बाई एक बलिस्त की हो लानी है,उसे कलश के अन्दर डालते वक्त यह मन्त्र पढना है-
ऊँ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुष: परुषस्परि,एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्त्रेण शतेन च।

कलश के ऊपर पंचपल्लव (बरगद,गूलर,पीपल,आम,पाकड के पत्ते) रखते समय यह मन्त्र पढना है-
ऊँ अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता,गोभाज इत्किलासथ यत्सन्वथ पूरुषम।

इसके बाद कुशा नामकी घास जो कि अश्विन मास की अमावस्या को विधि पूर्वक लायी गयी हो,उसे कलस के अन्दर डालना है,और इस मन्त्र को पढना है-
ऊँ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्व: प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभि:,तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्काम: पुने तच्छकेयम।

इसके बाद कलश में सप्तमृत्ति को ( घुडसाल हाथीसाल बांबी नदियों के संगम तालाब राजा के द्वार और गोशाला के मिट्टी) को डालते समय इस मंत्र को पढना चाहिये-
ऊँ स्योना पृथ्वी नो भवानृक्षरा निवेशनी,यच्छा न: शर्म सप्रथा:।

इसके बाद कलश में सुपारी को डालते वक्त यह मंत्र पढते हैं-
ऊँ या: फ़लिनीर्या अफ़ला अपुष्पा याश्च पुष्पिणी:,बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुंचन्त्वँहस:।

इसके बाद कलश में पंचरत्न (सोना हीरा मोती पद्मराग और नीलम) डालने के समय इस मंत्र को पढना चाहिये-
ऊँ परि वाजपति: कविरग्निअर्हव्यान्यक्रमीत,दधद्रत्नानि दाशुषे।

कलश में द्रव्य (चलती हुई मुद्रा) को डालते वक्त इस मंत्र को पढना चाहिये-
ऊँ हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत,स दाधार पृथ्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।

कलश के ऊपर वस्त्र पहिनाने के समय इस मंत्र को पढें-
ऊँ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमाऽसदत्स्व:,वासो अग्ने विश्वरूपँ व्ययस्व विभावसो।

कलश के ऊपर पूर्ण पात्र (मिट्टी का बना प्याला जो कलश के साथ कुम्हार से लावें) को रखते समय इस मन्त्र को पढें-
ऊँ पूर्णा दर्वि परा पत सुपूर्णा पुनरा पत,वस्नेव विक्रीणावहा इषमूर्जँ शतक्रतो।

चावल से भरे पूर्णपात्र को कलश पर स्थापित करें और उसपर लाल कपडा लपेट हुये नारियल को इस मंत्र पढकर रखें-
ऊँ या: फ़लिनीर्या अफ़ला अपुष्पा याश्च पुष्पिणी:,बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुंचन्त्वँहस:।

इसके बाद कलश में देवी देवताओं का आवाहन करना चाहिये,सबसे पहले हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्र से वरुण का आवाहन करे-
कलश में वरुण का ध्यान और आवाहन-
ऊँ तत्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भि:,अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशँ स मा न आयु: प्र मोषी:।
अस्मिन कलशे वरुणं सांड्ग सपरिवारं सायुधं सशक्तिकमावाहयामि। ऊँ भूभुर्व: स्व: भो वरुण ! इहागच्छ इह तिष्ठ स्थापयामि,पूजयामि मम पूजां गृहाण,ऊँ अपां पतये नम:।

इस मन्त्र को कह कर कलश पर अक्षत और फ़ूल छोड दें,फ़िर हाथ में अक्षत और फ़ूल लेकर चारों वेद एवं अन्य देवी देवताओं का आवाहन करे-
कलश में देवी-देवताओं का आवाहन
कलशस्य मुखे विष्णु: कण्ठे रुद्रळ समाश्रित:,मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा,ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथर्वण:।
अंगेश्च सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:,अत्र गायत्री सावित्री शान्ति: पुष्टिकरी तथा।
आयान्तु देवपूजार्थं दुरितक्षयकारका:,गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धुकावेरि जलेऽस्मिन संनिधिं कुरु।
सर्वे समुद्रा: सरितीर्थानि जलदा नदा:,आयान्तु मम शान्त्यर्थं दुरितक्षयकारका:।

इस तरह जलाधिपति वरुणदेव तथा वेदों तीर्थों नदों नदियों सागरों देवियों एवं देवताओं के आवाहन के बाद हाथ में अक्षत पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्र से कलश की प्रतिष्ठा करें-
प्रतिष्ठा मंत्र
ऊँ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु,विश्वे देवास इह मादयन्तामोउम्प्रतिष्ठ। कलशे वरुणाद्यावाहितदेवता: सुप्रतिष्ठता वरदा भवन्तु,ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:।

यह कहकर कलश के पास अक्षत और फ़ूल छोड दें।
कलश में जल के रूप में वरुण की स्थापना की गयी है,सभी प्रधान वस्तुओं के रूप में पृथ्वी के रूप में स्थल कारक सप्तमृत्तिका,औषधि के रूप में सर्वोषधि,स्थल बीज के रूप में सुपाडी,जल बीज के रूप में नारियल,क्योंकि बीज के अन्दर जीव है,और जब जीव है तो आत्मा का आना जरूरी है,कारक कलश है,इस प्रकार वरुणदेवता का ध्यान पूजा आदिक का विवरण इस प्रकार से सम्पन्न किया जाता है।
ध्यान
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,ध्यानार्थे पुष्पं समर्पयामि। (ध्यान के लिये फ़ूल कलश पर छोडें)

आसन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,आसनार्थे अक्षतान समर्पयामि। (कलश के पास चावल रखें)

पाद्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,पादयो: पाद्यम समर्पयामि। (जल चढायें)

अर्ध्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,हस्तयोर्ध्यं समर्पयामि। (जल चढायें)

स्नानीय जल
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:.स्नानीयं जलं समर्पयामि। (स्नानीय जल चढायें)

स्नानांग आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,स्नानते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमनीय जल चढायें)

पंचामृत स्नान
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,पंचामृतस्नानं समर्पयामि। (पंचामृत से स्नान करवायें,पंचामृत के लिये दूध,दही,घी,शहद,शक्कर का प्रयोग करें)

गन्धोदक स्नान
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,गन्धोदकस्नानं समर्पयामि। (पानी में चन्दन को घिस कर पानी में मिलाकर स्नान करवायें)

शुद्धोदक स्नान
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:.स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। ( शुद्ध जल से स्नान करवायें)

आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमन के लिये जल चढायें)

वस्त्र
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: वस्त्रं समर्पयामि। (वस्त्र चढायें)

आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: वस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमन के जल चढायें)

यज्ञोपवीत
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: यज्ञोपवीतं समर्पयामि। (यज्ञोपवीत चढायें)

आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमन के लिये जल चढायें)

उपवस्त्र
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: उपवस्त्रं समर्पयामि। (उपवस्त्र को चढायें)

आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: उपवस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमन के लिये जल चढायें)

चन्दन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: चन्दनं समर्पयामि। (चन्दन को चढायें)

अक्षत
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: अक्षतान समर्पयामि। (चावलों को चढायें)

पुष्पमाला
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: पुष्पमालां समर्पयामि। (पुष्पमाला चढायें)

नानापरिमल द्रव्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: नानापरिमल द्रव्यं समर्पयामि। (नाना परिमल द्रव्य चढायें)

सुगन्धित द्रव्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: सुगन्धित द्रव्यं समर्पयामि। (सुगन्धित द्रव्य चढायें)

धूप
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: धूपमाघ्रापयामि। (धूपबत्ती को आघ्रापित करायें)

दीप
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: दीपं दर्शयामि। (दीपक दिखायें)

हस्तप्रक्षालन
दीपक दिखाकर हाथ धो लें।

नैवैद्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: सर्वविधं नैवैद्यम निवेदयामि। (नैवैद्य निवेदित करें)

आचमनादि
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: आचमनीयं जलम,मध्ये पानीयं,उत्तरापोऽशने मुखप्रक्षालनार्थे हस्तप्रक्षालनार्थे च जलं समर्पयामि। (आचमनीय जल एवं पानीय तथा मुख और हस्तप्रक्षालन के लिये जल चढायें)

करोद्वर्तन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: करोद्वर्तनं समर्पयामि। (करोद्वर्तन के लिये गन्ध समर्पित करें)

ताम्बूल
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: ताम्बूलं समर्पयामि। (सुपारी इलायची लौंग सहित पान का ताम्बूल समर्पित करें)

दक्षिणा
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: कृताया: पूजाया: सादुर्गण्यार्थे द्रव्य दक्षिणां समर्पयामि। (दक्षिणा प्रदान करें)

आरती
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: आरार्तिकं समर्पयामि। (आरती करें)

प्रदक्षिणा
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: प्रदक्षिणां समर्पयामि। (प्रदक्षिणा करें)

प्रार्थना
हाथ में पुष्प लेकर इस प्रकार से प्रार्थना करें-

देवदानव संवादे मद्यमाने महोदधौ,उत्पन्नोऽसि तथा कुम्भ विधृतो विष्णुना स्वयं।
त्वत्तोये सर्वतीर्थानि देवा: सर्वे त्वयि स्थिता:,त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणा: प्रतिष्ठता:।
शिव: स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापति,आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा: सपैतृका:।
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यत: कामफ़लप्रदा:,त्वत्प्रसादादिमां पूजां कर्तुमीहे जलोद्भव।
सांनिध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा।
नमो नमस्ते स्फ़टिकप्रभाय सुश्वेतहाराय सुमंगलाय,सुपाशहस्ताय झषासनाय जलाधिनाथाय नमो नमस्ते।
ऊँ अपां पतये वरुणाय नम:।

नमस्कार
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान समर्पयामि। (इस मन्त्र से नमस्कार पूर्वक पुष्प समर्पित करें)

अब हाथ में जल लेकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण कर जल कलश के पास छोडते हुये समस्त पूजन कर्म भगवान वरुणदेव को निवेदित करें-

समर्पण
कृतेन अनेन पूजनेन कलशे वरुनाद्यावाहितदेवता: प्रीयन्तां न मम।

इति कलश-स्थापना

ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उनको नुकसान पहुंचाता है। नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।

वैदिक वाक्य है कि पिछले जन्म में किया हुआ पाप इस जन्म में रोग के रूप में सामने आता है। शास्त्रों में बताया है-पूर्व जन्मकृतं पापं व्याधिरूपेण जायते अत: पाप जितना कम करेंगे, रोग उतने ही कम होंगे। अग्नि, पृथ्वी, जल, आकाश और वायु इन्हीं पांच तत्वों से यह नश्वर शरीर निर्मित हुआ है। यही पांच तत्व 360 की राशियों का समूह है।

इन्हीं में मेष, सिंह और धनु अग्नि तत्व, वृष, कन्या और मकर पृथ्वी तत्व, मिथुन, तुला और कुंभ वायु तत्व तथा कर्क, वृश्चिक और मीन जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। कालपुरुष की कुंडली में मेष का स्थान मस्तक, वृष का मुख, मिथुन का कंधे और छाती तथा कर्क का हृदय पर निवास है जबकि सिंह का उदर (पेट), कन्या का कमर, तुला का पेडू और वृश्चिक राशि का निवास लिंग प्रदेश है। धनु राशि तथा मीन का पगतल और अंगुलियों पर वास है।

इन्हीं बारह राशियों को बारह भाव के नाम से जाना जाता है। इन भावों के द्वारा क्रमश: शरीर, धन, भाई, माता, पुत्र, ऋण-रोग, पत्नी, आयु, धर्म, कर्म, आय और व्यय का चक्र मानव के जीवन में चलता रहता है। इसमें जो राशि शरीर के जिस अंग का प्रतिनिधित्व करती है, उसी राशि में बैठे ग्रहों के प्रभाव के अनुसार रोग की उत्पत्ति होती है। कुंडली में बैठे ग्रहों के अनुसार किसी भी जातक के रोग के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं।

कोई भी ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उन अंगों को नुकसान पहुंचाता है। जैसे आज कल सिंह राशि में शनि और मंगल चल रहे हैं तो मीन लग्न मकर और कन्या लग्न में पैदा लोगों के लिए यह समय स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता।

अब सिंह राशि कालपुरुष की कुंडली में हृदय, पेट (उदर) के क्षेत्र पर वास करती है तो इन लग्नों में पैदा लोगों को हृदयघात और पेट से संबंधित बीमारियों का खतरा बना रहेगा। इसी प्रकार कुंडली में यदि सूर्य के साथ पापग्रह शनि या राहु आदि बैठे हों तो जातक में विटामिन ए की कमी रहती है। साथ ही विटामिन सी की कमी रहती है जिससे आंखें और हड्डियों की बीमारी का भय रहता है।

चंद्र और शुक्र के साथ जब भी पाप ग्रहों का संबंध होगा तो जलीय रोग जैसे शुगर, मूत्र विकार और स्नायुमंडल जनित बीमारियां होती है। मंगल शरीर में रक्त का स्वामी है। यदि ये नीच राशिगत, शनि और अन्य पाप ग्रहों से ग्रसित हैं तो व्यक्ति को रक्तविकार और कैंसर जैसी बीमारियां होती हैं। यदि इनके साथ चंद्रमा भी हो जाए तो महिलाओं को माहवारी की समस्या रहती है जबकि बुध का कुंडली में अशुभ प्रभाव चर्मरोग देता है।

चंद्रमा का पापयुक्त होना और शुक्र का संबंध व्यसनी एवं गुप्त रोगी बनाता है। शनि का संबंध हो तो नशाखोरी की लत पड़ती है। इसलिए कुंडली में बैठे ग्रहों का विवेचन करके आप अपने शरीर को निरोगी रख सकते हैं। किंतु इसके लिए सच्चरित्रता आवश्यक है। आरंभ से ही नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।

मंत्र चिकित्सा के लाभ—-
मंत्र से विविध शारीरिक एवं मानसिक रोगों में लाभ मिलता है। यह बात अब विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं कि मनुष्य के शरीर के साथ-साथ यह समग्र सृष्टि ही वैदिक स्पंदनों से निर्मित है। शरीर में जब भी वायु-पित्त-कफ नामक त्रिदोषों में विषमता से विकार पैदा होता है तो मंत्र चिकित्सा द्वारा उसका सफलता पूर्वक उपचार किया जाना संभव है।

अमेरिका के ओहियो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार कैंसरयुक्त फेफड़ों, आंत, मस्तिष्क, स्तन, त्वचा और फाइब्रो ब्लास्ट की लाइनिंग्स पर जब सामवेद के मंत्रों और हनुमान चालीसा के पाठ का प्रभाव परखा गया तो कैंसर की कोशिकाओं की वृद्धि में भारी गिरावट आई। इसके विपरीत तेज गति वाले पाश्चात्य और तेज ध्वनि वाले रॉक संगीत से कैंसर की कोशिकाओं में तेजी के साथ बढ़ोतरी हुई।

मंत्र चिकित्सा के लगभग पचास रोगों के पांच हजार मरीजों पर किए गए क्लीनिकल परीक्षणों के अनुसार दमा, अस्थमा रोग में सत्तर प्रतिशत, स्त्री रोगों में 65 प्रतिशत, त्वचा एवं चिंता संबंधी रोगों में साठ प्रतिशत, उच्च रक्तदाब, हाइपरटेंशन से पीड़ितों में पचपन प्रतिशत, आर्थराइटिस में इक्यावन प्रतिशत, डिस्क संबंधी समस्याओं में इकतालीस प्रतिशत, आंखों के रोगों में इकतालीस प्रतिशत तथा एलर्जी की विविध अवस्थाओं में चालीस प्रतिशत औसत लाभ हुआ। निश्चित ही मंत्र चिकित्सा उन लोगों के लिए तो वरदान ही है जो पुराने और जीर्ण क्रॉनिक रोगों से ग्रस्त हैं।

कहा गया है कि जब भी कोई व्यक्ति गायत्री मंत्र का पाठ करता है तो अनेक प्रकार की संवेदनाएं इस मंत्र से होती हुई व्यक्ति के मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं। जर्मन वैज्ञानिक कहते हैं कि जब भी कोई व्यक्ति अपने मुंह से कुछ बोलता है तो उसके बोलने में आवाज का जो स्पंदन और कंपन होता है, वह 175 प्रकार का होता है। जब कोई कोयल पंचम स्वर में गाती है तो उसकी आवाज में 500 प्रकार का प्रकंपन होता है लेकिन जर्मन वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि दक्षिण भारत के विद्वानों से जब विधिपूर्वक गायत्री मंत्र का पाठ कराया गया, तो यंत्रों के माध्यम से यह ज्ञात हुआ कि गायत्री मंत्र का पाठ करने से संपूर्ण स्पंदन के जो अनुभव हुए, वे 700 प्रकार के थे।

जर्मन वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति पाठ नहीं भी करे, सिर्फ पाठ सुन भी ले तो भी उसके शरीर पर इसका प्रभाव पड़ता है। उन्होंने मनुष्य की आकृति का छोटा सा यंत्र बनाया और उस आकृति में जगह-जगह कुछ छोटी-छोटी लाइटें लगा दी गईं। लाइट लगाने के बाद यंत्र के आगे लिख दिया कि यहां पर खड़ा होकर कोई आदमी किसी भी तरह की आवाजें निकालें तो उस आवाज के हिसाब से लाइटें मनुष्य की आकृति में जलती नजर आएंगी, लेकिन अगर किसी ने जाकर गायत्री मंत्र बोल दिया तो पांव से लेकर सिर तक सारी की सारी लाइटें एक साथ जलने लग जाती है। दुनियाभर के मंत्र और किसी भी प्रकार की आवाजें निकालने से यह सारी की सारी लाइटें नहीं जलतीं। एक गायत्री मंत्र बोलने से सब जलने लग जाती हैं क्योंकि इसके अंदर जो वाइब्रेशन है, वह अद्भुत है।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

धन आने का समय—

धन प्राप्त करने के लिये जो नियम है उनके अनुसार वह ग्रह जो केन्द्र तथा त्रिकोण का स्वामी हो अथवा अन्य शुभ भावों का स्वामी हो तो वह धन पदवी आदि वांछित पदार्थों की उपलब्धि करवाता है। इसके अलावा जो भाव पापी है,और उनके स्वामी यदि केवल पाप प्रभाव में हों तो पापत्व के नाश के द्वारा धन की सृष्टि करते हैं। ग्रहों के द्वारा यह पता लग सकता है कि ग्रह की कीमत कितने रुपये की है,और एक ही लगन में अगर अलग अलग प्रकार के ग्रह हैं तो वे अलग अलग कीमत का बखान करेंगे,लेकिन उस ग्रह की कीमत तब और बढ जायेगी,जब वह साधारण बली से अति बली स्थिति में पहुंच जायेगा। किसी कुन्डली के धनेश की दशा में कोई भी बात कहने से पहले यह पता कर लेंगे कि कुन्डली का स्तर क्या है,यह बात शुभ धन दायक ग्रहों के योगों के द्वारा पता लगेगी। इन योगों की संख्या जितनी अधिक होती है उतना ही अधिक धन मिलता है। धन दायक योगों के लिये पहले शुक्र को देखना होगा,कि वह एक या एक से अधिक लगनों में बैठा है।लगन दूसरे भाव नवम भाव और एकादस भाव के बलवान स्वामियों की परस्पर युति अथवा द्रिष्टि द्वारा हो,नवम दसम के स्वामियों का सम्बन्ध,चौथे और पांचवें भाव के स्वामियों का सम्बन्ध शुभ सप्तमेश तथा नवमेश का संबन्ध पंचमेश और सप्तमेश का शुभ सम्बन्ध भी धन का कारक बनता है। तीन छ: आठ और बारह भावों के स्वामी अगर अपनी राशियों से बुरे भावों में बैठें और बुरे ही ग्रहों द्वारा देखे जावें तो भी धन की सृष्टि होती है।

उदाहरण—

मेष राशि का बुध वृश्चिक राशि में अष्टम स्थान में है,और शनि के पाप प्रभाव में हो,तो बुध बहुत निर्बल हो जायेगा,कारण-
वह अनिष्टदायक भाव में है,
वह शत्रु राशि में स्थित है,
वह शनि द्वारा द्रष्ट है,
वह तृतीय स्थान से छठे स्थान में विराजमान है,
वह छठे स्थान से तीसरा होकर बुरा है,

तीनो लगनों के स्वामी आपस में युति कर लेते है तो भी धन दायक योग बन जाता है। शुक्र गुरु से बारहवें भाव में बैठ जावे तो भी धन दायक हो जाता है,चार या चार से अधिक भावों का अपने स्वामियों से द्र्ष्ट होने पर भी धनदायक योग बन जाता है। किसी ग्रह का तीनों लगनों से शुभ बन जाना भी धनदायक योग बना देता है,सूर्य या चन्द्र का नीच भंग हो जाना भी धनदायक बन जाता है। कोई उच्च का ग्रह शुभ स्थान में चला जाये,और जिस स्थान में वह उच्च का ग्रह गया उसका स्वामी भी उच्च में चला जाये तो भी धनदायक योग बन जाता है। शुभ भाव का स्वामी अगर बक्री हो जाये तो भी धनदायक योग बन जाता है,यदि यह सब कारण तीनों लगनों में आजाये तो शुभता कई गुनी बढ जाती है।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

महामृत्युंजय मंत्र—-

महामृत्युंजय मंत्र के जप व उपासना के तरीके आवश्यकता के अनुरूप होते हैं। काम्य उपासना के रूप में भी इस मंत्र का जप किया जाता है। जप के लिए अलग-अलग मंत्रों का प्रयोग होता है। मंत्र में दिए अक्षरों की संख्या से इनमें विविधता आती है। यह मंत्र निम्न प्रकार से है-

एकाक्षरी(1) मंत्र- ‘हौं’ ।
त्र्यक्षरी(3) मंत्र- ‘ॐ जूं सः’।
चतुराक्षरी(4) मंत्र- ‘ॐ वं जूं सः’।
नवाक्षरी(9) मंत्र- ‘ॐ जूं सः पालय पालय’।
दशाक्षरी(10) मंत्र- ‘ॐ जूं सः मां पालय पालय’।

(स्वयं के लिए इस मंत्र का जप इसी तरह होगा जबकि किसी अन्य व्यक्ति के लिए यह जप किया जा रहा हो तो ‘मां’ के स्थान पर उस व्यक्ति का नाम लेना होगा)

वेदोक्त मंत्र-
महामृत्युंजय का वेदोक्त मंत्र निम्नलिखित है-

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌ ॥

इस मंत्र में 32 शब्दों का प्रयोग हुआ है और इसी मंत्र में ॐ’ लगा देने से 33 शब्द हो जाते हैं। इसे ‘त्रयस्त्रिशाक्षरी या तैंतीस अक्षरी मंत्र कहते हैं। श्री वशिष्ठजी ने इन 33 शब्दों के 33 देवता अर्थात्‌ शक्तियाँ निश्चित की हैं जो कि निम्नलिखित हैं।

इस मंत्र में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य 1 प्रजापति तथा 1 वषट को माना है।
मंत्र विचार :
इस मंत्र में आए प्रत्येक शब्द को स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि शब्द ही मंत्र है और मंत्र ही शक्ति है। इस मंत्र में आया प्रत्येक शब्द अपने आप में एक संपूर्ण अर्थ लिए हुए होता है और देवादि का बोध कराता है।

शब्द बोधक शब्द बोधक
‘त्र’ ध्रुव वसु ‘यम’ अध्वर वसु
‘ब’ सोम वसु ‘कम्‌’ वरुण
‘य’ वायु ‘ज’ अग्नि
‘म’ शक्ति ‘हे’ प्रभास
‘सु’ वीरभद्र ‘ग’ शम्भु
‘न्धिम’ गिरीश ‘पु’ अजैक
‘ष्टि’ अहिर्बुध्न्य ‘व’ पिनाक
‘र्ध’ भवानी पति ‘नम्‌’ कापाली
‘उ’ दिकपति ‘र्वा’ स्थाणु
‘रु’ भर्ग ‘क’ धाता
‘मि’ अर्यमा ‘व’ मित्रादित्य
‘ब’ वरुणादित्य ‘न्ध’ अंशु
‘नात’ भगादित्य ‘मृ’ विवस्वान
‘त्यो’ इंद्रादित्य ‘मु’ पूषादिव्य
‘क्षी’ पर्जन्यादिव्य ‘य’ त्वष्टा
‘मा’ विष्णुऽदिव्य ‘मृ’ प्रजापति
‘तात’ वषट

इसमें जो अनेक बोधक बताए गए हैं। ये बोधक देवताओं के नाम हैं।

शब्द की शक्ति-
शब्द वही हैं और उनकी शक्ति निम्न प्रकार से है-

शब्द शक्ति शब्द शक्ति
‘त्र’ त्र्यम्बक, त्रि-शक्ति तथा त्रिनेत्र ‘य’ यम तथा यज्ञ
‘म’ मंगल ‘ब’ बालार्क तेज
‘कं’ काली का कल्याणकारी बीज ‘य’ यम तथा यज्ञ
‘जा’ जालंधरेश ‘म’ महाशक्ति
‘हे’ हाकिनो ‘सु’ सुगन्धि तथा सुर
‘गं’ गणपति का बीज ‘ध’ धूमावती का बीज
‘म’ महेश ‘पु’ पुण्डरीकाक्ष
‘ष्टि’ देह में स्थित षटकोण ‘व’ वाकिनी
‘र्ध’ धर्म ‘नं’ नंदी
‘उ’ उमा ‘र्वा’ शिव की बाईं शक्ति
‘रु’ रूप तथा आँसू ‘क’ कल्याणी
‘व’ वरुण ‘बं’ बंदी देवी
‘ध’ धंदा देवी ‘मृ’ मृत्युंजय
‘त्यो’ नित्येश ‘क्षी’ क्षेमंकरी
‘य’ यम तथा यज्ञ ‘मा’ माँग तथा मन्त्रेश
‘मृ’ मृत्युंजय ‘तात’ चरणों में स्पर्श

यह पूर्ण विवरण ‘देवो भूत्वा देवं यजेत’ के अनुसार पूर्णतः सत्य प्रमाणित हुआ है।

महामृत्युंजय के अलग-अलग मंत्र हैं। आप अपनी सुविधा के अनुसार जो भी मंत्र चाहें चुन लें और नित्य पाठ में या आवश्यकता के समय प्रयोग में लाएँ। मंत्र निम्नलिखित हैं-

तांत्रिक बीजोक्त मंत्र-ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ ॥

संजीवनी मंत्र अर्थात्‌ संजीवनी विद्या-ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूर्भवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनांन्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ।

महामृत्युंजय का प्रभावशाली मंत्र-ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ॥

महामृत्युंजय मंत्र जाप में सावधानियाँ
महामृत्युंजय मंत्र का जप करना परम फलदायी है। लेकिन इस मंत्र के जप में कुछ सावधानियाँ रखना चाहिए जिससे कि इसका संपूर्ण लाभ प्राप्त हो सके और किसी भी प्रकार के अनिष्ट की संभावना न रहे।

अतः जप से पूर्व निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए-

1. जो भी मंत्र जपना हो उसका जप उच्चारण की शुद्धता से करें।
2. एक निश्चित संख्या में जप करें। पूर्व दिवस में जपे गए मंत्रों से, आगामी दिनों में कम मंत्रों का जप न करें। यदि चाहें तो अधिक जप सकते हैं।
3. मंत्र का उच्चारण होठों से बाहर नहीं आना चाहिए। यदि अभ्यास न हो तो धीमे स्वर में जप करें।
4. जप काल में धूप-दीप जलते रहना चाहिए।
5. रुद्राक्ष की माला पर ही जप करें।
6. माला को गोमुखी में रखें। जब तक जप की संख्या पूर्ण न हो, माला को गोमुखी से बाहर न निकालें।
7. जप काल में शिवजी की प्रतिमा, तस्वीर, शिवलिंग या महामृत्युंजय यंत्र पास में रखना अनिवार्य है।
8. महामृत्युंजय के सभी जप कुशा के आसन के ऊपर बैठकर करें।
9. जप काल में दुग्ध मिले जल से शिवजी का अभिषेक करते रहें या शिवलिंग पर चढ़ाते रहें।
10. महामृत्युंजय मंत्र के सभी प्रयोग पूर्व दिशा की तरफ मुख करके ही करें।
11. जिस स्थान पर जपादि का शुभारंभ हो, वहीं पर आगामी दिनों में भी जप करना चाहिए।
12. जपकाल में ध्यान पूरी तरह मंत्र में ही रहना चाहिए, मन को इधर-उधरन भटकाएँ।
13. जपकाल में आलस्य व उबासी को न आने दें।
14. मिथ्या बातें न करें।
15. जपकाल में स्त्री सेवन न करें।
16. जपकाल में मांसाहार त्याग दें।

कब करें महामृत्युंजय मंत्र जाप?
महामृत्युंजय मंत्र जपने से अकाल मृत्यु तो टलती ही है, आरोग्यता की भी प्राप्ति होती है। स्नान करते समय शरीर पर लोटे से पानी डालते वक्त इस मंत्र का जप करने से स्वास्थ्य-लाभ होता है।

दूध में निहारते हुए इस मंत्र का जप किया जाए और फिर वह दूध पी लिया जाए तो यौवन की सुरक्षा में भी सहायता मिलती है। साथ ही इस मंत्र का जप करने से बहुत सी बाधाएँ दूर होती हैं, अतः इस मंत्र का यथासंभव जप करना चाहिए। निम्नलिखित स्थितियों में इस मंत्र का जाप कराया जाता है-

(1) ज्योतिष के अनुसार यदि जन्म, मास, गोचर और दशा, अंतर्दशा, स्थूलदशा आदि में ग्रहपीड़ा होने का योग है।
(2) किसी महारोग से कोई पीड़ित होने पर।
(3) जमीन-जायदाद के बँटबारे की संभावना हो।
(4) हैजा-प्लेग आदि महामारी से लोग मर रहे हों।
(5) राज्य या संपदा के जाने का अंदेशा हो।
(6) धन-हानि हो रही हो।
(7) मेलापक में नाड़ीदोष, षडाष्टक आदि आता हो।
(8) राजभय हो।
(9) मन धार्मिक कार्यों से विमुख हो गया हो।
(10) राष्ट्र का विभाजन हो गया हो।
(11) मनुष्यों में परस्पर घोर क्लेश हो रहा हो।
(12) त्रिदोषवश रोग हो रहे हों।

महामृत्युंजय जप मंत्र
महामृत्युंजय मंत्र का जप करना परम फलदायी है। महामृत्युंजय मंत्र के जप व उपासना के तरीके आवश्यकता के अनुरूप होते हैं। काम्य उपासना के रूप में भी इस मंत्र का जप किया जाता है। जप के लिए अलग-अलग मंत्रों का प्रयोग होता है। यहाँ हमने आपकी सुविधा के लिए संस्कृत में जप विधि, विभिन्न यंत्र-मंत्र, जप में सावधानियाँ, स्तोत्र आदि उपलब्ध कराए हैं। इस प्रकार आप यहाँ इस अद्‍भुत जप के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

महामृत्युंजय जपविधि – (मूल संस्कृत में)

कृतनित्यक्रियो जपकर्ता स्वासने पांगमुख उदहमुखो वा उपविश्य धृतरुद्राक्षभस्मत्रिपुण्ड्रः । आचम्य । प्राणानायाम्य। देशकालौ संकीर्त्य मम वा यज्ञमानस्य अमुक कामनासिद्धयर्थ श्रीमहामृत्युंजय मंत्रस्य अमुक संख्यापरिमितं जपमहंकरिष्ये वा कारयिष्ये।

॥ इति प्रात्यहिकसंकल्पः॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॐ गुरवे नमः।
ॐ गणपतये नमः। ॐ इष्टदेवतायै नमः।
इति नत्वा यथोक्तविधिना भूतशुद्धिं प्राण प्रतिष्ठां च कुर्यात्‌।

भूतशुद्धिः
विनियोगः
ॐ तत्सदद्येत्यादि मम अमुक प्रयोगसिद्धयर्थ भूतशुद्धिं प्राण प्रतिष्ठां च करिष्ये। ॐ आधारशक्ति कमलासनायनमः। इत्यासनं सम्पूज्य। पृथ्वीति मंत्रस्य। मेरुपृष्ठ ऋषि;, सुतलं छंदः कूर्मो देवता, आसने विनियोगः।

आसनः
ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय माँ देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌।
गन्धपुष्पादिना पृथ्वीं सम्पूज्य कमलासने भूतशुद्धिं कुर्यात्‌।
अन्यत्र कामनाभेदेन। अन्यासनेऽपि कुर्यात्‌।

पादादिजानुपर्यंतं पृथ्वीस्थानं तच्चतुरस्त्रं पीतवर्ण ब्रह्मदैवतं वमिति बीजयुक्तं ध्यायेत्‌। जान्वादिना भिपर्यन्तमसत्स्थानं तच्चार्द्धचंद्राकारं शुक्लवर्ण पद्मलांछितं विष्णुदैवतं लमिति बीजयुक्तं ध्यायेत्‌।

नाभ्यादिकंठपर्यन्तमग्निस्थानं त्रिकोणाकारं रक्तवर्ण स्वस्तिकलान्छितं रुद्रदैवतं रमिति बीजयुक्तं ध्यायेत्‌। कण्ठादि भूपर्यन्तं वायुस्थानं षट्कोणाकारं षड्बिंदुलान्छितं कृष्णवर्णमीश्वर दैवतं यमिति बीजयुक्तं ध्यायेत्‌। भूमध्यादिब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त माकाशस्थानं वृत्ताकारं ध्वजलांछितं सदाशिवदैवतं हमिति बीजयुक्तं ध्यायेत्‌। एवं स्वशरीरे पंचमहाभूतानि ध्यात्वा प्रविलापनं कुर्यात्‌। यद्यथा-पृथ्वीमप्सु। अपोऽग्नौअग्निवायौ वायुमाकाशे। आकाशं तन्मात्राऽहंकारमहदात्मिकायाँ मातृकासंज्ञक शब्द ब्रह्मस्वरूपायो हृल्लेखार्द्धभूतायाँ प्रकृत्ति मायायाँ प्रविलापयामि, तथा त्रिवियाँ मायाँ च नित्यशुद्ध बुद्धमुक्तस्वभावे स्वात्मप्रकाश रूपसत्यज्ञानाँनन्तानन्दलक्षणे परकारणे परमार्थभूते परब्रह्मणि प्रविलापयामि।तच्च नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं सच्चिदानन्दस्वरूपं परिपूर्ण ब्रह्मैवाहमस्मीति भावयेत्‌। एवं ध्यात्वा यथोक्तस्वरूपात्‌ ॐ कारात्मककात्‌ परब्रह्मणः सकाशात्‌ हृल्लेखार्द्धभूता सर्वमंत्रमयी मातृकासंज्ञिका शब्द ब्रह्मात्मिका महद्हंकारादिप-न्चतन्मात्रादिसमस्त प्रपंचकारणभूता प्रकृतिरूपा माया रज्जुसर्पवत्‌ विवर्त्तरूपेण प्रादुर्भूता इति ध्यात्वा। तस्या मायायाः सकाशात्‌ आकाशमुत्पन्नम्‌, आकाशाद्वासु;, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अदभ्यः पृथ्वी समजायत इति ध्यात्वा। तेभ्यः पंचमहाभूतेभ्यः सकाशात्‌ स्वशरीरं तेजः पुंजात्मकं पुरुषार्थसाधनदेवयोग्यमुत्पन्नमिति ध्यात्वा। तस्मिन्‌ देहे सर्वात्मकं सर्वज्ञं सर्वशक्तिसंयुक्त समस्तदेवतामयं सच्चिदानंदस्वरूपं ब्रह्मात्मरूपेणानुप्रविष्टमिति भावयेत्‌ ॥

॥ इति भूतशुद्धिः ॥

अथ प्राण-प्रतिष्ठा
विनियोगःअस्य श्रीप्राणप्रतिष्ठामंत्रस्य ब्रह्माविष्णुरुद्रा ऋषयः ऋग्यजुः सामानि छन्दांसि, परा प्राणशक्तिर्देवता, ॐ बीजम्‌, ह्रीं शक्तिः, क्रौं कीलकं प्राण-प्रतिष्ठापने विनियोगः।
डं. कं खं गं घं नमो वाय्वग्निजलभूम्यात्मने हृदयाय नमः।
ञं चं छं जं झं शब्द स्पर्श रूपरसगन्धात्मने शिरसे स्वाहा।
णं टं ठं डं ढं श्रीत्रत्वड़ नयनजिह्वाघ्राणात्मने शिखायै वषट्।
नं तं थं धं दं वाक्पाणिपादपायूपस्थात्मने कवचाय हुम्‌।
मं पं फं भं बं वक्तव्यादानगमनविसर्गानन्दात्मने नेत्रत्रयाय वौषट्।
शं यं रं लं हं षं क्षं सं बुद्धिमानाऽहंकार-चित्तात्मने अस्राय फट्।
एवं करन्यासं कृत्वा ततो नाभितः पादपर्यन्तम्‌ आँ नमः।
हृदयतो नाभिपर्यन्तं ह्रीं नमः।
मूर्द्धा द्विहृदयपर्यन्तं क्रौं नमः।
ततो हृदयकमले न्यसेत्‌।
यं त्वगात्मने नमः वायुकोणे।
रं रक्तात्मने नमः अग्निकोणे।
लं मांसात्मने नमः पूर्वे ।
वं मेदसात्मने नमः पश्चिमे ।
शं अस्थ्यात्मने नमः नैऋत्ये।
ओंषं शुक्रात्मने नमः उत्तरे।
सं प्राणात्मने नमः दक्षिणे।
हे जीवात्मने नमः मध्ये एवं हदयकमले।

अथ ध्यानम्‌रक्ताम्भास्थिपोतोल्लसदरुणसरोजाङ घ्रिरूढा कराब्जैः
पाशं कोदण्डमिक्षूदभवमथगुणमप्यड़ कुशं पंचबाणान्‌।
विभ्राणसृक्कपालं त्रिनयनलसिता पीनवक्षोरुहाढया
देवी बालार्कवणां भवतुशु भकरो प्राणशक्तिः परा नः ॥

॥ इति प्राण-प्रतिष्ठा ॥जप‍

अथ महामृत्युंजय जपविधि
संकल्प
तत्र संध्योपासनादिनित्यकर्मानन्तरं भूतशुद्धिं प्राण प्रतिष्ठां च कृत्वा प्रतिज्ञासंकल्प कुर्यात ॐ तत्सदद्येत्यादि सर्वमुच्चार्य मासोत्तमे मासे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रो अमुकशर्मा/वर्मा/गुप्ता मम शरीरे ज्वरादि-रोगनिवृत्तिपूर्वकमायुरारोग्यलाभार्थं वा धनपुत्रयश सौख्यादिकिकामनासिद्धयर्थ श्रीमहामृत्युंजयदेव प्रीमिकामनया यथासंख्यापरिमितं महामृत्युंजयजपमहं करिष्ये।

विनियोग
अस्य श्री महामृत्युंजयमंत्रस्य वशिष्ठ ऋषिः, अनुष्टुप्छन्दः श्री त्र्यम्बकरुद्रो देवता, श्री बीजम्‌, ह्रीं शक्तिः, मम अनीष्ठसहूयिर्थे जपे विनियोगः।

अथ यष्यादिन्यासः
ॐ वसिष्ठऋषये नमः शिरसि।
अनुष्ठुछन्दसे नमो मुखे।
श्री त्र्यम्बकरुद्र देवतायै नमो हृदि।
श्री बीजाय नमोगुह्ये।
ह्रीं शक्तये नमोः पादयोः।

॥ इति यष्यादिन्यासः ॥

अथ करन्यासः
ॐ ह्रीं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः त्र्यम्बकं ॐ नमो भगवते रुद्रायं शूलपाणये स्वाहा अंगुष्ठाभ्यं नमः।

ॐ ह्रीं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः यजामहे ॐ नमो भगवते रुद्राय अमृतमूर्तये माँ जीवय तर्जनीभ्याँ नमः।

ॐ ह्रौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्‌ ओं नमो भगवते रुद्राय चन्द्रशिरसे जटिने स्वाहा मध्यामाभ्याँ वषट्।

ॐ ह्रौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः उर्वारुकमिव बन्धनात्‌ ॐ नमो भगवते रुद्राय त्रिपुरान्तकाय हां ह्रीं अनामिकाभ्याँ हुम्‌।

ॐ ह्रौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः मृत्योर्मुक्षीय ॐ नमो भगवते रुद्राय त्रिलोचनाय ऋग्यजुः साममन्त्राय कनिष्ठिकाभ्याँ वौषट्।

ॐ ह्रौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः मामृताम्‌ ॐ नमो भगवते रुद्राय अग्निवयाय ज्वल ज्वल माँ रक्ष रक्ष अघारास्त्राय करतलकरपृष्ठाभ्याँ फट् ।

॥ इति करन्यासः ॥

अथांगन्यासः
ॐ ह्रौं ॐ जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः त्र्यम्बकं ॐ नमो भगवते रुद्राय शूलपाणये स्वाहा हृदयाय नमः।

ॐ ह्रौं ओं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः यजामहे ॐ नमो भगवते रुद्राय अमृतमूर्तये माँ जीवय शिरसे स्वाहा।

ॐ ह्रौं ॐ जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्‌ ॐ नमो भगवते रुद्राय चंद्रशिरसे जटिने स्वाहा शिखायै वषट्।

ॐ ह्रौं ॐ जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः उर्वारुकमिव बन्धनात्‌ ॐ नमो भगवते रुद्राय त्रिपुरांतकाय ह्रां ह्रां कवचाय हुम्‌।

ॐ ह्रौं ॐ जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः मृत्यार्मुक्षीय ॐ नमो भगवते रुद्राय त्रिलोचनाय ऋग्यजु साममंत्रयाय नेत्रत्रयाय वौषट्।

ॐ ह्रौं ॐ जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः मामृतात्‌ ॐ नमो भगवते रुद्राय अग्नित्रयाय ज्वल ज्वल माँ रक्ष रक्ष अघोरास्त्राय फट्।

॥ इत्यंगन्यासः ॥

अथाक्षरन्यासः
त्र्यं नमः दक्षिणचरणाग्रे।
बं नमः,
कं नमः,
यं नमः,
जां नमः दक्षिणचरणसन्धिचतुष्केषु ।
मं नमः वामचरणाग्रे ।
हें नमः,
सुं नमः,
गं नमः,
धिं नम, वामचरणसन्धिचतुष्केषु ।
पुं नमः, गुह्ये।
ष्टिं नमः, आधारे।
वं नमः, जठरे।
र्द्धं नमः, हृदये।
नं नमः, कण्ठे।
उं नमः, दक्षिणकराग्रे।
वां नमः,
रुं नमः,
कं नमः,
मिं नमः, दक्षिणकरसन्धिचतुष्केषु।
वं नमः, बामकराग्रे।
बं नमः,
धं नमः,
नां नमः,
मृं नमः वामकरसन्धिचतुष्केषु।
त्यों नमः, वदने।
मुं नमः, ओष्ठयोः।
क्षीं नमः, घ्राणयोः।
यं नमः, दृशोः।
माँ नमः श्रवणयोः ।
मृं नमः भ्रवोः ।
तां नमः, शिरसि।
॥ इत्यक्षरन्यास ॥
अथ पदन्यासः
त्र्यम्बकं शरसि।
यजामहे भ्रुवोः।
सुगन्धिं दृशोः ।
पुष्टिवर्धनं मुखे।
उर्वारुकं कण्ठे।
मिव हृदये।
बन्धनात्‌ उदरे।
मृत्योः गुह्ये ।
मुक्षय उर्वों: ।
माँ जान्वोः ।
अमृतात्‌ पादयोः।

॥ इति पदन्यास ॥

मृत्युंजयध्यानम्‌
हस्ताभ्याँ कलशद्वयामृतसैराप्लावयन्तं शिरो,
द्वाभ्याँ तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्याँ वहन्तं परम्‌ ।

अंकन्यस्तकरद्वयामृतघटं कैलासकांतं शिवं,
स्वच्छाम्भोगतं नवेन्दुमुकुटाभातं त्रिनेत्रभजे ॥

मृत्युंजय महादेव त्राहि माँ शरणागतम्‌,
जन्ममृत्युजरारोगैः पीड़ित कर्मबन्धनैः ॥

तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड,
इति विज्ञाप्य देवेशं जपेन्मृत्युंजय मनुम्‌ ॥

अथ बृहन्मन्त्रः
ॐ ह्रौं जूं सः ॐ भूः भुवः स्वः। त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्‌। उर्व्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्‌। स्वः भुवः भू ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ॥

समर्पण
एतद यथासंख्यं जपित्वा पुनर्न्यासं कृत्वा जपं भगन्महामृत्युंजयदेवताय समर्पयेत।

गुह्यातिगुह्यगोपता त्व गृहाणास्मत्कृतं जपम्‌।
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादान्महेश्वर ॥

॥ इति महामृत्युंजय जपविधिः ॥

व्यवसाय में फ़लदायी मंत्र—
मंत्र शास्त्र स्न.कारोबारी परेशानियों से बचाता है ‘श्री लक्ष्मी गणेश मंत्र’ मानव जीवन के घटनाचक्र को जानने एवं पूर्वानुमान की प्रक्रिया बतलाने वाले महर्षि पाराशर ने व्यापार एवं आर्थिक स्थिति का विचार बड़े ही तर्कसंगत ढंग से किया है। उनका मानना है कि जन्मकुंडली में लग्न, पंचम एवं नवम भाव लक्ष्मी के स्थान होने के कारण धनदायक होते हैं यथा -
‘लक्ष्मीस्थानं त्रिकोणं स्यात्’ तथा
‘प्रथमं नवमं चैव धनमित्युच्यते बुधै:’।

कुंडली में चतुर्थ एवं दशम स्थान इच्छाशक्ति एवं कर्मठता के सूचक होने के कारण धन कमाने में सहायक होते हैं। दूसरी ओर षष्ठ, अष्टम एवं व्यय भाव, जो कर्ज, अनिष्ट एवं हानि के सूचक हैं, व्यापार में हानि और परेशानी देने वाले होते हैं।

कारोबार में परेशानी सूचक योग—-
महर्षि पाराशर ने अपनी कालजयी रचना ‘मध्यपाराशरी’ में व्यापार में हानि एवं परेशानी के सूचक निम्न योग बताए हैं-

लग्नेश षष्ठभाव में और षष्ठेश लग्न या सप्तम भाव में हो तथा वह मारकेश से दृष्ट हो।
लग्नेश एवं चंद्रमा, दोनों केतु के साथ हों और मारकेश से युत या दृष्ट हों।
लग्नेश पाप ग्रह के साथ छठे, आठवें या 12 वें स्थान में मौजूद हो।
पंचमेश एवं नवमेश षष्ठ या अष्टम भाव में हों।
लग्नेश, पंचमेश या नवमेश का त्रिकेश के साथ परिवर्तन हो।
लग्नेश जिस नवांश में हो, उसका स्वामी त्रिक स्थान में मारकेश के साथ हो।
कुंडली में भाग्येश ही अष्टमेश या पंचमेश ही षष्ठेश हो और वह व्ययेश से युत या दृष्ट हो।
जातक की कुंडली में केमद्रुम, रेका, दरिद्री, या भिक्षुक योग हो।
परेशानी से बचने का उपाय
वैदिक चिंतनधारा में व्यक्ति के विचार एवं निर्णयों को विकृत करने वाला तत्व ‘विघ्न’ तथा उसके काम-धंधे में रुकावटें डालने वाला तत्व बाधा कहलाता है। इन विघ्न-बाधाओं को दूर करने की क्षमता भगवान श्रीगणोश जी में है। मां लक्ष्मी तो स्वभाव से ही धन, संपत्ति एवं वैभव स्वरूपा हैं, इसीलिए व्यापार एवं काम-धंधे में आने वाली विघ्न-बाधाओं को दूर कर धन-संपत्ति प्राप्त करने के लिए श्रीलक्ष्मी गणोशजी के पूजन की परंपरा हमारे यहां आदिकाल से है।

श्री लक्ष्मीविनायक मंत्र :–
ऊं श्रीं गं सौम्याय गणपतये वरवरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।

विनियोग :–
ऊं अस्य श्री लक्ष्मी विनायक मंत्रस्य अंतर्यामी ऋषि:गायत्री छन्द: श्री लक्ष्मी विनायको देवता श्रीं बीजं स्वाहा शक्ति: सर्वाभीष्ट सिद्धये जपे विनियोग:।

करन्यास – अंगन्यास
ऊं श्रीं गां अंगुष्ठाभ्यां नम:। – ऊं श्रीं गां हृदयाय नम:।
ऊं श्रीं गीं तर्जनीभ्यां नम:। – ऊं श्रीं गीं शिरसे स्वाहा।
ऊं श्रीं गूं मध्यमाभ्यां नम:। – ऊं श्रीं गूं शिखायै वषट्।
ऊं श्रीं गैं अनामिकाभ्यां नम:। – ऊं श्रीं गैं कवचाय हुम्।
ऊं श्रीं गौं कनिष्ठकाभ्यां नम:। – ऊं श्रीं गौं नेत्रत्रयाय वौषट्।
ऊं श्रीं ग: करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:। ऊं श्रीं ग: अस्त्रायं फट्।

ध्यान—
दन्ताभये चक्रदरौदधानं कराग्रगस्वर्णघटं त्रिनेत्रम्।
धृताब्जयालिंगितमब्धिपु˜या लक्ष्मीगणोशं कनकाभमीडे ।।

विधि—
नित्य नियम से निवृत्त होकर आसन पर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख बैठकर आचमन एवं प्राणायाम कर श्रीलक्ष्मी विनायक मंत्र के अनुष्ठान का संकल्प करना चाहिए। तत्पश्चात चौकी या पटरे पर लाल कपड़ा बिछाएं। भोजपत्र/रजत पत्र पर असृगंध एवं चमेली की कलम से लिखित इस लक्ष्मी विनायक मंत्र पर पंचोपचार या षोडशोपचार से भगवान लक्ष्मी गणोश जी का पूजन करना चाहिए। इसके बाद विधिवत विनियोग, न्यास एवं ध्यान कर एकाग्रतापूर्वक मंत्र का जप करना चाहिए। इस अनुष्ठान में जपसंख्या सवा लाख से चार लाख तक है।

अनुष्ठान के नियम—-
साधक स्नान कर रेशमी वस्त्र धारण करे। भस्म का त्रिपुंड या तिलक लगाकर रुद्राक्ष या लाल चंदन की माला पर जप करना चाहिए। इस जप को परेशानियों का नाश करने वाला माना गया है।
पूजन में लाल चंदन, दूर्वा, रक्तकनेर, कमल के पुष्प, मोदक एवं पंचमेवा अर्पित किए जाते हैं।
भक्ति भाव से पूजन, मनोयोगपूर्वक जप एवं श्रद्धा सहित हवन करने से सभी कामनाएं पूरी होती हैं।
अनुष्ठान के दिनों में गणपत्यथर्वशीर्षसूक्त, श्रीसूक्त, लक्ष्मीसूक्त कनकधारास्तोत्र आदि का पाठ करना फलदायक है।

वास्तु विचार—-

घर बनाना हो तो पहले गन्ध वर्ण रस तथा आकृति के द्वारा क्षेत्र यानी भूमि की परीक्षा कर लेनी चाहिये। यदि उस स्थान में मिट्टी मधु शहद के समान गन्ध हो तो ब्राहमणों के लिये फ़ूल जैसी गन्ध हो तो क्षत्रियों के लिये खटाई जैसी गन्ध हो तो वैश्यों के लिये और मांस जैसी गन्ध हो तो वह स्थान शूद्र जाति के लिये मान्य होता है। वहां की मिट्टी का रंग सफ़ेद हो तो ब्राहमणों के लिये,लाल हो तो क्षत्रियों के लिये और पीली हो तो वैश्य के लिये और काली हो तो शूद्र के निवास के लिये उपयुक्त मानी जाती है,यदि वहां की मिट्टी का स्वाद मीठा हो तो ब्राहमणो के लिये और कडुआ यानी मिर्च की भांति चरपरी लगे तो क्षत्रियों के लिये,खटीली हो तो वैश्यों के लिये और कसैला स्वाद हो तो शूद्रों के लिये ठीक मानी गयी है। ईशान पूर्व और उत्तर दिशा सबके लिये अत्यन्त वृद्धि देने वाली मानी गयी है। अन्य दिशाओं में नीची भूमि सबके लिये हानिकारक होती है।

गृहभूमि परीक्षा—

जहां घर बनाना हो,वहां अरन्त्रि यानी कोहनी से कनिष्ठा उंगली तक के बराबर लम्बाई चौडाई और गहराई के करके कुन्ड बना लें,फ़िर उस कुन्ड में खोदी हुई मिट्टी को भरना चाहिये,मिट्टी को भरने के बाद अगर मिट्टी बचती है,तो उस स्थान में बास करने से सम्पत्ति बढती है,यदि मिट्टी कम पड जाती है तो वहां रहने से हानि होती है ,और अगर कुन्ड भर जाये तो जमीन को मध्यम माननी चाहिये,इसके बाद उस कुन्ड से मिट्टी वापस निकाल कर उसे पानी से भर देना चाहिये,और शाम को भरने के बाद सुबह को देखने पर अगर पानी उसमे शेष बचता है,तो वह स्थान आगे कीमत बढाने वाला है,और नही बचता है तो मध्यम है और अगर उस के अन्दर दरार पड जाती है,तो वह भूखी मिट्टी है,वहां रहने पर केवल पेट भरने का काम ही हो पायेगा।

इस प्रकार से निवास करने योग्य स्थान की भलीभांति परीक्षा करके उक्त लक्षण युक्त भूमि में दिक्साधन यानी दिशाओं का ज्ञान करना चाहिये,उसके लिये समतल भूमि में एक वृत यानी गोल घेरा बनावे और उसके बीच में द्वादसांगुल शंकु यानी बारह विभाग या पर्व से युक्त बारह अंगुल की लकडी को नाप कर सीधी खडी हुई उस घेरे के बीच में स्थापित करे,और दिक्साधन विधि से दिशाओं का ज्ञान करे,फ़िर कर्ता के नाम यानी जिसके नाम प्लाट या भूमि हो,वह खुद षडवर्ग शुद्ध क्षेत्रफ़ल (वास्तु भूमि की लम्बाई-चौडाई का गुणनफ़ल करे),अभीष्ट लम्बाई चौडाई के बराबर दिशा साधित रेखा के अनुसार चतुर्भुज बनावे,उस चतुर्भुज रेखामार्ग पर सुन्दर प्राकार यानी चारदीवारी बनावे,लम्बाई चौडाई में पूर्व आदि चारों दिशाओं में आठ आठ द्वार के भाग होते है,प्रदक्षिण क्रम से उसे इस प्रकार से लिखे,जैसे पूर्व वाली दीवाल के उत्तर से दक्षिण तक-पहला-हानि,दूसरा-निर्धनता,तीसरा-धन लाभ,चौथा- राजसम्मान,पांचवां बहुत धन,छठा अति चोरी,सातवां अति क्रोध,और आठवां-भय इस प्रकार से लिखे,इसके बाद दक्षिण वाली दीवाल के पूर्व से पश्चिम तक के आठ भाग भी लिखे।

पूर्व दिशा की दीवाल (उत्तर से दक्षिण)
ईशान हानि निर्धनता धनलाभ राजसम्मान बहुतधनलाभ अतिचोरी अतिक्रोध भय अग्नि
दक्षिण दिशा की दीवाल (पूर्व से पश्चिम)
अग्नि मरण बन्धन भय धनलाभ धनवृद्धि निर्भयता व्याधिभय निर्बलता नैऋत्य
पश्चिम दिशा की दीवाल (दक्षिण से उत्तर)
नैऋत्य पुत्रहानि शत्रुवृद्धि लक्ष्मीप्राप्ति धनलाभ सौभाग्य अतिदुर्भाग्य दुख शोक वायव्य
उत्तर दिशा की दीवाल (पश्चिम से पूर्व )
वायव्य स्त्रीहानि निर्बलता हानि धान्यलाभ धनागम सम्पत्तिवृद्धि भय रोग ईशान
इसी प्रकार से पूर्व आदि दिशाओं के गृहादि में भी द्वार और उसके फ़ल समझने चाहिये,द्वार का जितना विस्तार यानी चौडाई हो,उससी दुगुनी ऊंचाई की किवाडॆं बनाकर घर के दरवाजे पर उपरोक्त फ़लानुसार लगानी चाहिये,दिवाल बनाने के बाद चाहरदीवारी के भीतरी भाग में जितनी भूमि बचती है,उसके इक्यासी खन्ड बनाकर बनावे। उनके बीच के नौ खन्डों में ब्रहमा का स्थान समझे,चाहरदीवारी के साथ सटे हुये जो बत्तीस भाग है,वे पिशाचांश कहलाते है,उनके साथ मिलाकर घर बनाने से दुख शोक और भय देने वाला होता है,शेष बचे अंशों के अन्दर घर बनाया जाये तो पुत्र और पौत्र और धन की वृद्धि देने वाला होता है। (नारद-पुराण श्लोक ५४० से ५५५.१/२,त्रिस्कंध ज्योतिष संहिताप्रकरण)

वास्तु भूमि की दिशा और विदिशा रेखा वास्तु की शिरा कहलाती है,एवं ब्रह्मभाग,पिशाचभाग,और शिरा का जहां जहां योग हो वह वास्तु की मार्म सन्धि कहलाती है,वह मार्म सन्धि गृहारम्भ तथा गृहप्रवेश में अनिष्ट कारक समझी जाती है। (ना.पु.त्रि.ज्यो.सं.प्र.५५८.१/२)

गृहारम्भ में प्रशस्त मास—

मार्गशीर्ष,फ़ाल्गुन,बैशाख,माघ,श्रावण और कार्तिक यह मास गृहारम्भ में पुत्र आरोग्य और धन देने वाले होते है।

दिशाओं में वर्ग और वर्गेश—

पूर्व आदि आठों दिशाओं में क्रमश: अकारादि आठ वर्ग होते है,इन दिशावर्गों के क्रमश: गरुण मार्जार सिंह श्वान सर्प मूषक गज और शशक ये योनियां होती है,अपने से पांचवे वर्ग वाले परस्पर शत्रु होते है,जिस ग्राम में या जिस दिशा में घर बनाना हो,वह साध्य ततहा घर बनानेवाला साधक,कर्ता और भर्ता आदि कहलाता है,इसको ध्यान में रखना चाहिये,साध्य ग्राम की वर्ग संख्या को लिखकर उसके पीछे बायें भाग में साधक की वर्ग संख्या रखकर आठ का भाग देकर जो शेष बचे वह साधक का धन होता है,इसके विपरीत विधि से अर्थात साधक की वर्ग संख्या के बायें भाग में साध्य की वर्ग संख्या रखकर जो संख्या बने उसमें आठ से भाग देकर शेष साधक का ऋण होता है,इस प्रकार से ऋण की संख्या अल्प और धन की संख्या अधिक हो,तो अधिक शुभ माने,अर्थात उस दिशा और ग्राम में घर बनाकर रहना शुभ होता है। उदाहरण इस प्रकार से है:—-

उदाहरण:—- विचार करना है कि जयनारायण नामक व्यक्ति को गोरखपुर में बसने या व्यापार करने में किस प्रकार का लाभ होगा,तो साध्य गोरखपुर की वर्ग संख्या २ के बायें भाग में साधक जयनारायण की वर्ग संख्या ३ रखने से ३२ हुआ,इसमें ८ का भाग देने से शून्य अर्थात आठ ही बचा,वह जयनाराण का धन हुआ,तथा इसके विपरीत वर्ग संख्या २३ रखकर इसमें आठ का भाग दिया,तो शेष ७ बचा,यह साधक जयनारायण का हुआ,यहां ७ से ८ धन अधिक है,अत; जयनारायण के लिये गोरखपुर रहने के योग्य है,यह सिद्ध हुआ,तात्पर्य है कि जयनारायण का गोरखपुर में ८ लाभ और ७ खर्च मिलता है।

वास्तु भूमि तथा घर के धन ऋण आय नक्षत्र वार और अंश के ज्ञान का साधन—-

वास्तु भूमि या घर की लम्बाई से चौडाई का गुणा करने पर गुणनफ़ल पद कहलाता है,उस पद को ६ स्थानों में रखकर क्रमश: ८,३,९,८,६ से गुणा करें और गुणनफ़ल में क्रमश: १२,८,८,२७,७,९ से भाग देम,फ़िर जो शेष बचे,वे क्रमश: धन,ऋण आय नक्षत्र वार तथा अंश होते है,धन अधिक हो तो घर शुभ होता है,ऋण अधिक हो तो घर अशुभ होता है,तथा विषम १,३,५,७,९ आय हो तो शुभ होता है,और सम २,४,६,८,आय अशुभ होता है,घर का जो नक्षत्र हो वहां से अपने नक्षत्र (नाम के नक्षत्र) तक गिन कर जो संख्या हो,उसमें ९ का भाग दें,फ़िर यदि शेष यानी तारा ३ बचे तो धन का नाश होता है,५ बचे यश की हानि होती है,और ७ बचे तो गृह मालिक की मौत होती है,घर की राशि और अपनी राशि गिनने पर परस्पर २ या १२ हो तो धन की हानि होती है,और ९ या ५ हो तो पुत्र की हानि होती है,और ६ या ८ हो तो अनिष्ट होता है,अन्य संख्या में शुभ होता है,सूर्य और मंगल के वार तथा अंश हो तो उस घर को अग्नि का भय होता है,अन्य वार या अंश हों तो सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं की सिद्धि होती है। (नारद पुराण ज्यो.५६३-५६७)

वास्तु पुरुष की स्थिति—

भादों आदि तीन तीन मासों में क्रमश: पूर्व आदि दिशाओं की ओर मस्तक करके बायीं करवट सोये हुये महासर्पस्वरूप चर नामक वास्तुपुरुष प्रदक्षिणक्रम से विचरण करते है,जिस समय जिस दिशा में वास्तु पुरुष का मस्तक हो,उस समय उसी दिशा का में घर का दरवाजा बनाना चाहिये,मुख से विपरीत दिशा में घर का दरवाजा बनाने से रोग शोक और भय होते है,किन्तु अगर घर की चारों दिशाओं में द्वार हो,तो यह दोष नही होता है।

घर की नींव में रखा जाने वाला सामान—

घर की नींव लगाने के लिये नैऋत्य दिशा का मान है,उस दिशा में नैऋत्य कोण में अपने दाहिने हाथ की लम्बाई चौडाई और गहराई का खड्डा बनाकर स्वर्ण,पवित्र स्थान की मिट्टी,धान्य,और सेवार सहित ईंट घर के भीतरी भाग में रखें,घर की जितनी लम्बाई हो,उसके मध्य भाग में वास्तुपुरुष की नाभि रहती है,उसके तीन अंगुल नीचे वास्तु पुरुष की कुच्छि रहती है,और उसके अन्दर शंकु का न्यास करने से पुत्र आदि की वृद्धि होती है।

शंकु प्रमाण—

खादिर (खैर) अर्जुन शाल युगपत्र (कचनार) रक्त चन्दन पलाश रक्तशाल विशाल आदि वृक्ष से किसी की लकडी से शंकु बनता है,ब्राहमण आदि वर्णों के लिये २४,२३,२० और १६ अंगुल के शंकु बनते है,उस शंकु के बराबर बराबर तीन भाग करके ऊपर वाले भाग में चतुष्कोण मध्यवाले भाग में अष्टकोण और नीचे वाले भाग में गोल वृत स्वरूप बनाया जाता है,इस प्रकार से उत्तम लक्षणो से युक्त कोमल और छेद रहित शंकु शुभ दिन में बनाया जाता है,उसको षडवर्ग द्वारा शुद्ध सूत्र से सूत्रित (घर की लम्बाई और चौडाई के बराबर सूत्र) भूमि गृह क्षेत्र में मृदु ,ध्रुव,क्षिप्रसंज्ञक,नक्षत्रों में अमावस्या और रिक्ता तिथि को छोड कर अन्य तिथियों में रविवार मंगलवार तथा चर लगनों को छोड कर अन्य वारों और अन्य स्थिर या द्विस्वभाव लग्नों में अष्टम स्थान शुद्ध ग्रह रहित हो,शुभ राशि लगन हो,और उसमें शुभ नवमांश हो,उस लग्न में शुभ ग्रह का संयोग हो,ऐसे समय में ब्राह्मणों द्वारा पुण्याहवाचन कराते हुये मांगलिक वाद्य और सौभाग्यवती स्त्रियों के मंगलगीत आदि के साथ मुहूर्त बताने वाले दैवज्ञ (ज्योतिष के विद्वान ब्राह्मण) के पूजन (सत्कार) पूर्वक कुक्षिस्थान में शंकु की स्थापना करे,लग्न से केन्द्र और त्रिकोण में शुभ ग्रह तथा ३,६,११, में पापग्रह और चन्द्रमा हो,तो वह शंकु स्थापना श्रेष्ठ कहलाती है।

घर के भेद—-

घर के छ: भेद होते है,इनमें एक शाला,द्विशाला,त्रिशाला,चतुष्शाला,सप्तशाला,और दसशाला,इन दसों शालाओं में प्रत्येक के १६ भेद होते है,ध्रुव,धान्य,जय,नन्द,खर,कान्त,मनोरम,सुमुख,दिर्मुख,क्रूर,शत्रुद,स्वर्णद,क्षय,आक्रन्द,विपुल और विजय, नाम के गृहो होते है,चार अक्षरों के प्रस्तार भेद से क्रमश: इन गृहों की गणना करनी चाहिये।

प्रस्तार भेद—

प्रथम में चार गुरु ऽ लिखकर उनमें प्रथम गुरु के नीचे लघु । चिन्ह लिखते है,फ़िर आगे जैसा ऊपर हो उसी प्रकार के गुरु या लघु चिन्ह लिखना चाहिये,फ़िर उसके नीचे तीसरी लाइन पंक्ति में प्रथम गुरु चिन्ह के नीचे लघु चिन्ह लिखकर आगे दाहिने भाग में जैसे ऊपर गुरु या लघु हो वैसा ही चिन्ह लिखें,तथा पीछे बायें भाग में गुरु चिन्ह से पूरा करे,इसी प्रकार पुन: पुन: तब तक लिखता जाये,जब तक कि पंक्ति (प्रस्तार) में सब लघु चिन्ह हो जायें। इस प्रकार चार दिशा होने के कारण ४ अक्षरों से १६ भेद होते है,प्रत्येक भेद में चारों चिन्हों को प्रदक्षिणाक्रम से पूर्व आदि दिशा समझ कर जहां जहां लघु चिन्ह पडे,वहां वहां घर का द्वार और आलिन्द (द्वार के आगे का भाग,चबूतरा) बनाना चाहिये,इस प्रकार से पूर्वादि दिशाओं में आलिन्द के भेदों से १६ प्रकार के घर होते हैं।

वास्तु भूमि की पूर्व दिशा में स्नान गृह अग्नि कोण में पाक गृह दक्षिण में शयनघर नैऋत्य में शस्त्रागार,पश्चिम में भोजन गृह वायु कोण में धन धान्यादि रखने का घर उत्तर में देवताओं का घर और ईशान कोण में जल का स्थान रखना चाहिये,और आग्नेय कोण से शुरु करके पहले रसोई,फ़िर दूध घी निकालने का स्थान,फ़िर शौचालय, उसके बाद विद्याभ्यास,फ़िर स्त्री सहसवास अरु औषिधि और श्रंगार सामग्री का,बनाना शुभ कहा गया है।

आयों के नाम और दिशा—

पूर्वादि आठ दिशाओं में क्रमश: ध्वज,धूम्र सिंह स्वान वृष खर (गदहा) गज और ध्वांक्ष (कौआ) यह आठ प्रकार के आय होते है।

घर के समीप निन्दनीय वृक्ष (पेड)—-

पाकर गूलर वहेडा आम नीम और कांटे वाले पेड दूध वाले सभी तरह के पेड,पीपल,कपित्थ (कैथा), अगस्त्य,सिन्धुवार और इमली यह सब पेड निन्दनीय कहे गये है,अगर यह सब पेड घर के दक्षिण और पश्चिम में हों तो वे घर की वंश हानि करते है,पाकर के पेड पर छोटे बच्चों की आत्मायें,गूलर के पेड पर स्त्रियों की आत्मायें,आम के पेड पर ब्राह्मणों की आत्मायें,नीम के ऊपर पिशाच की आत्मायें और इमली के पेड पर सभी प्रकार की आत्मायें निवास करना चालू कर देती है,जब भी घर के अन्दर किसी प्रकार की उनकी प्रकृति के विपरीत काम होते है तो वे अपना विघ्न शुरु कर देते है।

गृह प्रमाण—-

घर के खम्भे घर के पैर होते है,इसलिये वे संख्या में सम होने उत्तम होते है जैस २,४,६,८, आदि,विषम संख्या में हानिकारक माने जाते है,घर को न तो बहुत ऊंचा ही करना चाहिये और न ही अधिक नीचा,इसीलिये अपनी इच्छा निर्वह के अनुसार भित्ति यानी दीवाल की ऊंचाई करनी चाहिये,घर के ऊपर जो घर दूसरा मंजिल बनाया जाता है,उसमें भी इसी प्रकार का विचार करना चाहिये। घरों की ऊंचाई के आठ प्रमाण कहे गये है,पान्चाल,वैदेह,कौरव,कान्यकुब्ज,मागध,शूरसेन,गान्धार,और आवन्तिक । जहां घर की ऊंचाई उसकी चौडाई से सवागुनी अधिक होती है,वह घर पान्चाल घर कहलाता है,फ़िर उसी ऊंचाई को लगातार सवागुनी बढाने से वैदेह आदि प्रकार के मकान होते है,इसके अन्दर पान्चाल सर्वसाधारण जनो के लिये शुभ है। ब्राह्मणों के लिये आवन्तिक मान,क्षत्रियों के लिये गान्धारमान,और वैश्यों के लिये कान्यकुब्जमान,इस प्रकार से ब्राह्मणादि वर्णों के लिये यथोत्तर गृहमान समझना चाहिये,तथा दूसरे मंजिल और तीसरे मंजिल के मकान में भी पानी का बहाव पहले बताये अनुसार ही बनाना चाहिये।
ध्वज और गज आय में सवारी के साधनों का घर बनाना चाहिये,शय्या आसन छाता और द्वजा इन सब के निर्माण के लिये वृष अथवा द्वज आय होने चाहिये।

नूतन गृह प्रवेश के लिये वास्तु पूजा का विधान—

घर के मध्यभाग में तन्दुल यानी चावल पर पूर्व से पश्चिम की तरफ़ एक एक हाथ लम्बी दस रेखायें खींचे,फ़िर उत्तर से दक्षिण की भी उतनी ही लम्बी चौडी रेखायें खींचे,इस प्रकार उसमे बराबर के ८१ पद बन जायेंगे,उनके अन्दर आगे बताये जाने वाले ४५ देवताओं का यथोक्त स्थान में नामोल्लेख करें,बत्तीस देवता बाहर वाली प्राचीर और तेरह देवता भीतर पूजनीय होते हैं। उनके लिये सारणी को इस प्रकार से बना लेवें:—-

शिखी पर्जन्य जयन्त इन्द्र सूर्य सत्य भृश आकाश वायु
दिति आप जयन्त इन्द्र सूर्य सत्य भृश सावित्र पूषा
अदिति अदिति आपवत्स अर्यमा अर्यमा अर्यमा सविता वितथ वितथ
सर्प सर्प पृथ्वीधर विवस्वान गृहक्षत गृहक्षत
सोम सोम पृथ्वीधर ब्रह्मा विवस्वान यम यम
भल्लाटक भल्लाटक पृथ्वीधर विवस्वान गन्धर्व गन्धर्व
मुख्य मुख्य राज्यक्षमा मित्र मित्र मित्र विवुधिप भृंग भृंग
अहि रुद्र शेष असुर वरुण पुष्पदन्त सुग्रीव जय मृग
रोग राज्यक्षमा शेष असुर वरुण पुष्पदन्त सुग्रीव दौवारिक पितर

इस प्रकार से ४५ देवताओं को स्थापित कर लेना चाहिये,और यही ४५ देवता पूजनीय होते है,आप,आपवर्स पर्जन्य अग्नि और दिति यह पांच देवता एक पद होते है,और यह ईशान में पूजनीय होते है,उसी प्रकार से अन्य कोणों में भी पांच पांच देवता भी एक पद के भागी है,अन्य झो बाह्य पंक्ति के बीस देवता है,वे सब द्विपद के भागी है,तथा ब्रह्मा सी पूर्व दक्षिण पश्चिम और उत्तर दिशामें जो अर्यमा विवस्वान मित्र और पृथ्वीधर ये चार देवता है,वे त्रिपद के भागी है,अत: वास्तु की जानकारी रखने वाले लोग ब्रह्माजी सहित इन एक पद,द्विपद और त्रिपद देवताओं का वास्तु मन्त्रों से दूर्वा,दही,अक्षत,फ़ूल,चन्दन धूप दीप और नैवैद्य आदि से विधिवत पूजन करें,अथवा ब्राह्ममंत्र से आवहनादि षोडस या पन्च उपचारों द्वारा उन्हे दो सफ़ेद वस्त्र समर्पित करें,नैवैद्य में तीन प्रकार के भक्ष्य,भोज्य,और लेह्य अन्न मांगलिक गीत और वाद्य के साथ अर्पण करे,अन्त में ताम्बूल अर्पण करके वास्तु पुरुष की इस प्रकार से प्रार्थना करे- “वास्तुपुरुष नमस्तेऽस्तु भूशय्या निरत प्रभो,मदगृहं धनधान्यादिसमृद्धं कुरु सर्वदा”, भूमि शय्या पर शयन करने वाले वास्तुपुरुष ! आपको मेरा नमस्कार है। प्रभो ! आप मेरे घरको धन धान्य आदि से सम्पन्न कीजिये।

इस प्रकार प्रार्थना करके देवताओं के समक्ष पूजा कराने वाले पुरोहित को यथाशक्ति दक्षिणा दे तथा अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हे भी दक्षिणा दे,जो मनुष्य सावधान होकर गृहारम्भ में या गृहप्रवेश के समय इस विधि से वास्तुपूजा करता है,वह आरोग्य पुत्र धन और धान्य प्राप्त करके सुखी होता है,जो मनुष्य वास्तु पूजा न करके नये घर में प्रवेश करता है,वह नाना प्रकार के रोगों,क्लेश,और संकटों से जूझता रहता है।

जिन मकानों में किवाड नही लगाये गये हो,जिनके ऊपर छाया नही की गयी हो,जिस मकान के अन्दर अपनी परम्परा के अनुसार पूजा और वास्तुकर्म नही किये गये हो,उस घर में प्रवेश करने का अर्थ नरक मे प्रवेश करना होता है॥ नारद पुराण ज्योति.स्कन्ध श्लोक -५९६ से ६१९॥

भारत की कुन्डली मे लगन मे केतु आज की तारीख मे विराजमान है,केतु का देखना तीसरे भाव मे सराकर के घर मे है और शिक्षा वाले घर मे है,सप्तम मे वह सूर्य शुक्र और बक्री बुध की ओर देख रहा है। तथा नवे भाव मे विराजमान गुरु को देख रहा है। केतु भारत का प्रधानमंत्री है,और प्रधान मंत्री को देखने वाले लोगों में राज्य की महान हस्तियां धनवान लोग और व्यापारी लोग है,केतु का समर्थक राहु है लेकिन राहु जो मुसलमान के रूप मे है वह भी इन्ही लोगों के साथ है,केतु पश्चिम के देशों के प्रधानो से राय ले रहा है कि जो समस्यायें चल रही है उनके बारे मे क्या किया जा सकता है।

सरकार तो कह रही है वह अब जाने वाली है और उस पर मुस्लिम शासकों का शिकंजा पूरी तरह से कस गया है,देश का प्रधान मंत्री बनाने के लिये कोई मुस्लिम सामने आ रहा है,इधर लाभ और कर्जा दुश्मनी तथा बीमारियां प्रदान करने वाला मंगल केतु के सामने धन भाव मे बैठा है,लाभ भाव मे धन भाव का मालिक चन्द्रमा जनता के रूप मे बैठा है,लाभ और धन का मालिक अब बक्री हो चुका है और वह केतु की तरफ़ अपनी नीच हरकत को लेकर बढता चला जा रहा है। जैसे जैसे केतु की तरफ़ मंगल बढता जा रहा है वैसे वैसे केतु को समर्थन देने वाला ग्रह राहु भी कर्जा दुश्मनी और बीमारी की तरफ़ बढता चला जा रहा है।

वैसे केतु और मंगल की टक्कर नही हो पायेगी,उसके पहले ही सरकार नामका सूर्यआने वाली चौदह जनवरी के आसपास खड्डे मे पडी मकर राशि मे चला जायेगा और यह सरकार के लिये गिरने जैसी बात भी हो सकती है,इधर सरकार को बल देने वाली कांग्रेस का कारक बुध बक्री है,उसकी आवाज भी आजकल बन्द सी हो रही है उसके ऊपर भी कोई बडा शिकंजा घिरता चला जा रहा है,और हो सकता है कि पंजाब के कुछ लोग इस सरकार के प्रति अपनी कोई चाल बना रहे हो.गुरु के अन्दर एक तो डिग्री कम है और दूसरे वह केतु को जो मृत प्राय पडा है को सांस दे रहा है.केतु सांस को लेकर इस नीच मंगल से लडने को दम भरता है और मंगल नीच का होकर बक्री है और उसे कुछ समझ मे नही आ रहा है।

इस केतु की जगह अब मोबाइल कम्पनियों को भी लिया जा सकता है,आज तीन कम्पनिया भारत मे मुख्य रह गई है,रिलायन्स,टाटा और बी एस एन एल,इन कम्पनियों के लिये,बी एस एन एल कोई नया काम करने जा रहाहै जो वह जनवरी के महिने मे अपनी घोषणा करेगा,कारण टाटा ने अपने मोबाइलों में नई नई स्कीम निकाल कर बाकी की कम्पनियों की हवा निकालनी शुरु कर दी है,उसकी गाडी पहले हिचकोले खा खा कर चल रही थी,उसके पास समझदारी है और वह जैसे धीरे धीरे करके मरसर्डीज गाडी के मामले मे अचानक सामने आया था और लोग बाकी की कम्पनियों की गाडिया लेना ही भूल गये थे,अब उसकी पूरी निगाह भारत की मोबाइल व्यवस्था पर है,बाकी की कम्पनियां जो जनता से कमाकर अपने अपने घर भरती चली जा रही थी,अब यह सोचने को मजबूर है कि उनके लिये जो पहले बहुत बडा स्टाफ़ काफ़ी मंहगी सेलरी पर नियुक्त था,अब वह लगातार काम करने के लिये बेकार सा होता जा रहा है उधर जनता के अन्दर टाटा के मोबाइलों के लिये भीड लगने लगी है,और वह एक रुपये मे दस मिनट तक बात करवाने के लिये तैयार हो गया है तो बाकी का क्या हो सकता है,बाकी की कम्पनी के सेल्स वाले भागते घूमेंगे और अपनी अपनी सेल्स को नौकरी बचाने के चक्कर मे बढाने के लिये झूठ सांच का सहारा देंगे लेकिन टाटा वाले केवल अपनी एजेंसी देकर ही काम करवाते रहेंगे,यह सब खेल केतु का है और आगे चल कर लगभग तीन साल के बाद एक ही कम्पनी सामने होगी और वह होगी टाटा।

इसी केतु को अगर दलालों के रूप में लाये तो उनके लिये मंगल के शिकंजे कसने चालू हो गये है,यहां तक कि स्थानीय पुलिस भी समझ चुकी है कि दलालों की कितनी कमाई है,दलालों का जो काम जमीन आदि को अधिक से अधिक कमाने के चक्कर मे एक दूसरे को बेच कर और पुलिस को लेदे कर काम चला लिया जाता था वह भी अब सबके सामने आने से पुलिस भी सीधे से जमीन को कई जगह बेच कर फ़्रोड करने वाले दलालों को अन्दर किये जा रही है। लेकिन दलाल भी अन्दर जाकर इसलिये सुरक्षित है क्यों कि जनता जो लाभ भाव मे चन्द्रमा के रूप में विराजमान है,वकीलो और अदालतों से तंग आकर सीधे से हमला करने के मूड मे है,और वह भी चाहती है कि रुपया गया सो गया अब सामने आजाये तो कम से कम हाथ पैर तो एक जगह कर ही दिये जावे।

जो लोग अभी तक केतु नामक दलालों को बल देने वाले थे,वे अपनी अपनी जुबान को घुमाने लगे है,यह कार्य बुध के बक्री होने से माना जा सकता है,बुध बक्री होकर खुद को कर्जा दुश्मनी और बीमारी की तरफ़ देख रहा है,इधर बुध को कानूनी और अदालत वाली बातें भी अखर रही है,वह भारत मे राज करने के लिये आया था लेकिन अब खुद संकट मे घिर कर अपना पल्ला बचाने के मूड मे है।

उपचार करने की तीन विधियां है,यह लगभग उसी प्रकार से है,जैसे सभी कार्यों के प्रति संसार में रीतियां अपनाई जाती है,निम्न,मध्यम और उच्च,उसी प्रकार से तीन विधियां लालकिताब के अन्दर अपनाई जातीं है,टोटके,उपाय और सदाचरण.टोटके तात्कालिक राहत देने वाले होते है,जैसे किसी को बुखार आ गया है,और लगातार बढता जा रहा है,तो उसे उतारने के लिये ठंडे पानी की पट्टी माथे पर लगाने और शरीर को बर्फ़ आदि से ठंडा किया जाता है,तो चढता हुआ बुखार कम हो जाता है,या बुखार के आने पर बुखार उतारने की गोली खा ली जाती है,उससे आराम तो कुछ समय के लिये हो जाता है,लेकिन बुखार हमेशा के लिये नही जाता है.दूसरा उपाय उपचार कहलाता है,जिसके द्वारा बुखार का इलाज सही तरीके से कर लिया जाये,और लगातार पूरी दवाई लेकर उसे हमेशा के लिये खत्म कर दिया जावे,तीसरा उपाय जो हमेशा के लिये किया जाता है,जिसे सदाचरण कहते है,अगर बुखार वाली जगह पर नही रहना,बुखार पैदा करने वाले भोजन को नही करना,शरीर को तंदुरुस्त बनाये रखना,और लगातार व्यायाम आदि करने के बाद शरीर को बीमारियों से बचाव करने के लिये सक्षम रखना.
जैसे किसी की कुन्डली में शनि द्वारा सूर्य पीडित है,औकात बनाने के लिये जगह नही मिलती है,जहां भी और जिस काम के लिये हाथ डाला जाता है,कामयाबी नही मिलती है,पिता को केवल यही चिन्ता रहती है,कि पुत्र कब काम करेगा,साथ ही दोनो में से एक ही कर्म कर सकता है,चाहे पिता करे या पुत्र करे,पिता और पुत्र की साथ साथ उन्नति नही हो पाती है,तो उसके उपाय तीन तरह से किये जा जायेंगे,जिससे शनि के द्वारा पीडित सूर्य शांति प्राप्त कर सके:-

पहले सामयिक राहत देने के लिये मंगल को दबाना पडेगा,कारण शनि और सूर्य की युति में मंगल बद हो जाता है,जातक के अन्दर तामसी वृत्तियों का प्रभाव दिखाई देने लगता है,वह शराब कबाब और भूत के भोजन की तरफ़ अपना मानस बना लेता है,अपनी संगति बुरे पुरुषों या बुरी स्त्रियों के साथ बना लेता है,शरीर में कितनी ही बीमारियां घर कर जाती है,अधिकतर मानसिक बीमारियां ही पैदा होती है,तो राहत देने के लिये मंगलवार के दिन आठ कुल्ल्हडों के अन्दर गुड भरकर उन कुल्ल्हडों के ऊपर मिट्टी के ढक्कन लगाकर शमशानी जमीन के अन्दर दबा देते है,इससे प्राथमिक उपचार मिल जाता है,जातक का दिमाग जो मारकाट और बुरी संगति के अन्दर जा रहा होता है,उसमे कमी आ जाती है.

दूसरी लम्बी अवधि के लिये पिता और पुत्र को दूर दूर कर देते है,पुत्र का धन पिता को नही देते और पिता का धन पुत्र को नही देते,या एक ही छत के नीचे पिता और पुत्र को नही रहने देते,पिता के द्वारा घर के अन्दर किसी भी भाग में अन्धेरा नही रह पाये,यह उपाय करवा दिया जाता है,क्योंकि शनि का बास घर के अन्धेरे में रहता है,पिता को कार्य करते वक्त बुध का सहारा लेना उत्तम होता है.

तीसरा उपाय जो हमेशा के लिये प्रभावी होता है,वह सूर्य और शनि की युति वालों को खास रूप से समझ लेना चाहिये,कि पिता को पुत्र का सुख नही है,इसीलिये उसकी शादी विवाह कर देने के बाद उसके लिये अपनी तरफ़ से कोई रोजीरोजगार का बन्दोबस्त करने के बाद अपने से दूर बसा देना चाहिये,और जिस प्रकार माता या परिवार का मोह प्रपौत्रों का सम्मोहन अगर आकर्षित करता है,तो केवल दुनियावी तौर पर ही देखना चाहिये.यह दीर्घकालिक उपाय कहा जायेगा.और जो सबसे बडा सदाचार कहलायेगा,वह यह होगा कि पुत्र कभी अपने पिता के सामने बैठ कर किसी बात का तर्क कुतर्क न करे,और अपने में मस्त रहकर पिता की उपेक्षा नही करे,इस प्रकार से पिता के साथ रहते हुये भी पुत्र के प्रति पिता का रुख कभी खराब नही होगा,किसी बात या लेन देन के लिये पुत्र अपनी अपनी पत्नी का सहारा ले,और की जाने वाली कमाई को पिता पुत्र एक ही स्थान पर नही रखें,पिता अपनी कमाई को अपने पास रखे,और घर आदि के निर्माण के लिये अधिक कार्य न करे,और न ही कभी बनाये घर को तोड कर दुबारा से बनाये,यह प्रभाव लगातार पुत्र की बयालीस साल की उम्र तक मिलता है,अधिकतर मामलों में एक ही पुत्र की उपाधि मिलती है,और पिता का व्यवसाय भी जनता से सम्बन्धित होता है,जैसे चावल,पानी,चांदी,और बैंक आदि पब्लिक से जुडे कार्य.

प्राचीन समय में ज्योतिषी,डाक्टर और अध्यापक के लिये तीन डिग्री रखना जरूरी होता था,ज्योतिषी को डाक्टरी विद्या के साथ मास्टरी विद्या का रखना जरूरी होता था,डाक्टर को ज्योतिष के साथ मास्टरी भी जरूरी हुआ करती थी,और मास्टर यानी अध्यापक को ज्योतिष और डाक्टरी विद्या का पूरा पूरा ज्ञान रखना आवश्यक होता था.इसी प्रकार से लालकिताबकार को अपने पास इन तीनों का होना बहुत ही आवश्यक है,जब तक किसी डाक्टर की तरह से समस्या का निदान नही निकालता है,और जो रोग है,उसका हटाने का निराकरण नही जानता है,और समस्या से ग्रस्त व्यक्ति को मास्टर की तरह से समझाने की हैसियत नही रखता है,वह कदापि लालकिताब या ज्योतिष का प्रयोग नही कर सकता है,लालकिताब कार को कभी भी समस्या से ग्रसित व्यक्ति के प्रति दुनियावी व्यवहार नही रखना चाहिये,और यह सत्य भी है,कि डाक्टरी और मास्टरी के साथ ज्योतिष कभी भी बैर,प्रीति और व्यवहार में नही चलती है.इन सब के रहते मानसिक प्रभंजना बिगड जाती है,और जो सामने वाले के प्रति करना चाहिये,या उपाय देना चाहिये वह नही दिया जा सकता है,अगर किसी प्रकार से जातक से बैर है,तो या तो जातक बताये जाने वाले उपाय को करेगा नही,वह किसी भी बताये गये उपाय को खिल्ली बनाकर उडा देगा,और समाज में बदनाम करने की कोशिश करेगा,या ज्योतिषी या डाक्टर या अध्यापक की मानसिक प्रभंजना जातक के प्रति धनात्मक न होकर ऋणात्मक होगी,जिससे वह किसी प्रकार से चाह कर भी सही उपाय नही दे पायेगा.प्रेम करने वाला घर की मुगी दाल बराबर मान कर किसी प्रकार से अपने को उन प्रयोगों में नही ले जा पायेगा,जो उसके लिये फ़लदायी है,व्यवहार के चलते जातक को या तो इन तीनो से लोभ के कारण काम करने का मानस बनेगा,या ज्योतिषी अथवा डाक्टर या मास्टर अधिक धन कमाने के चक्कर में सही उपाय नही दे पायेगा.

सदाचरण एक सबसे बहुमूल्य उपाय कहा जाता है,इसके द्वारा ग्रह की अशुभता सदा के लिये खत्म हो जाती है,लालकिताब की आचार संहिता का पालन करना ही सदाचार का पालन करना कहलाता है,सदाचार का पालन करने के बाद किसी प्रकार की हानि नही होती है,यह अटल सत्य है,और जब तक सृष्टि का विस्तार रहेगा,यह बात कभी झूठी भी नही हो सकती है,लालकिताब के टोटके केवल सिर दर्द में पेन किलर टेबलेट के समान है,जबकि सदाचार से कभी भी सिरदर्द हो ही नही सकता है.

लालकिताब का नियम है कि जिस प्रकार से धन और सम्पत्ति विरासत में मिलते है,उसी प्रकार से अनिष्ट भी विरासत में मिलते है,जातक ने पाप की कमाई से धन को जोडा,उसके धन में पाप चिपक गया,जातक की मृत्यु के बाद वह धन उसके पुत्र को मिला,तो वे पाप भी पुत्र के पास आ गये,और उन पापों की बजह से पुत्र को कष्ट भुगतने भी जरूरी है,इसी लिये कहा गया है,कि निसंतान की सम्पत्ति नही लेनी चाहिये,पता नही किन किन पापो की बजह से उसके पुत्र नही हुये,वे पाप कही जातक के पास आ गये तो उसे भी निपुत्र मरना पडेगा,हमारी जानकारी कितने ही केश इस प्रकार के आये है,जयपुर में ही बैंक वालों की गली में एक जैन साहब निवास करते है,वे किसी के पास दत्तक पुत्र के रूप में आये थे,उनके पैतृक कारणों से उनके दो पुत्र और दो पुत्रियां हो गये,दोनो पुत्रों का कोई सम्बन्ध नही हो पाया,और दोनो पुत्रियों में एक ने तो जबरदस्ती शादी भी कर ली लेकिन उसके भी संतान नही चल पायी.यह माया का खेल है,किसी के समझ में नही आता है,जब समझ में आता है तो समय उसी प्रकार से निकल गया होता है,जिस प्रकार से पानी सिर के ऊपर से निकल जाता है,बाद में हो भी कुछ नही पाता है,जातक अगर किसी प्रकार से सदाचार का पालन करता रहे तो उसका धन निर्मल होता रहता है,उसके अन्दर खोट नही आ पाती है,और जो भी सम्पत्ति उसके पास होती है,वह हमेशा के लिये होती है,कभी खत्म नही होती है,सदाचार वाले को अगर किसी प्रकार से सामयिक कष्ट मिलते है,तो वे जरा से उपाय के द्वारा ठीक भी हो जाते है,अभी कल ही एक व्यक्ति मेरे पास आया था,उसकी कुन्डली में बारहवां मंगल परेशान कर रहा था,उसे लालकिताब के अनुसार उपाय बताये थे,उपाय भी लगभग एक माह पहले बताये थे,लेकिन उसने कहा कि उसे कोई फ़ायदा नही हो रहा है,शुक्र की गति को जब ध्यान से देखा तो पता लगा कि उसकी संगति किसी प्रकार की गलत महिलाओं से है,उससे पूंछा कि शादी हो गयी है,उसने कहा कि हो गयी है,मैने पूंछा कि किसी प्रकार से कभी किसी गलत महिला से कोई संगति तो नही की है,उसने जो बताया वह सोचने लायक है,उसने शादी के बाद एक अन्य महिला से जाकर मन्दिर में माला पहिनाकर शादी का खेल रच लिया,शादी वाला कोई भी काम संस्कार के रूप में नही हुआ था,अब वह समाज नौकरी परिवार और शरीर सभी बातो से दुखी है,मेरे द्वारा दिया गया उपाय भी काम का नही है,कारण दूध को अगर दूध वाले बर्तन में न डालकर किसी छाछ वाले बर्तन में डाल दिया जायेगा,तो वह दूध भी छाछ बन जायेगा,और छाछ को भी अगर दूध के बर्तन में डाला जायेगा,तो छाछ दूध को भी फ़ाड देगा,उस आदमी का मंगल वाला उपाय तभी कारगर होगा जब वह मंगल के प्रति खरा है,मंगल तभी प्रताडित करता है,जब आदमी का दिमाग खराब आचरणों की तरफ़ चला जाता है,चोरी करने का दंड भुगत कर पाप दूर किया जा सकता है,हत्या करने के बाद उसका प्रायश्चित करने पर पाप से निकला जा सकता है,लेकिन किसी प्रकार से दूसरे पुरुष या दूसरी स्त्री से किया गया संस्कार विरोधी संसर्ग सिवाय बरबादी और कुछ नही दे सकता है,जवानी के नशे में या शराब के नशे में संस्कारों को तिलांजलि दी जा सकती है,लेकिन शरीर की ताकत कम होने पर या नशा उतरने पर जब हकीकत का सामना करना पडता है,तब जाकर समझ में आता है,कि बोये पेड बबूल के,अब आम कहां से होंय.

####लालकिताब के अन्दर तीन सिद्धान्त अपनी प्रबल मान्यता रखते है,पहला यह कि इस अनन्त ब्रह्मान्ड में सर्वशक्ति ईश्वर की ही सत्ता है,उसके बिना पत्ता भी नही हिलता है,अनन्त आकाश में भ्रमण करने वाले अनन्त ग्रह भी उसी की सत्ता के आधीन है,जो नौ ग्रह पहिचाने गये है,वह काम ईश्वर के द्वारा ही दिया गया है,और उन नौ ग्रहों की सत्ता के आधिकार में जो क्षेत्र आते है वे इस प्रकार से हैं- बुध विस्तार और व्यापकता का भाव देता है,राहु बुध का सहयोगी और मित्र है,देखने में नीला दिखाई देता है,लेकिन उसका विस्तार कितना है,किसी ने आजतक उसे नाप नही पाया है,जितने पास जाने की कोशिश की जाती है,वह उतनी दी दूर होता चला जाता है,सूर्य प्रकाश का दाता है,शनि को लालकिताब में अन्धकार के रूप में माना जाता है,और हर इन्सान को किसी न किसी प्रकार के अन्धेरे से लडना होता है,उसी लडाई का नाम ही कार्य है,गुरु हवा का कारक है,जब तक जीव के अन्दर प्रवाहित होती रहती है,वह जिन्दा माना जाता है,और जैसे ही अपना स्वप्रवाह बन्द हो जाता है,जीव मृत्यु को प्राप्त हो जाता है,शुक्र पाताल के रूप में जाना जाता है,जमीन के अन्दर क्या है,किसी को पता नही है,कितनी गहराई पर क्या छुपा बैठा है,यह सब मेहनत के बाद ही पता चलता है,केतु को शुक्र का सहयोगी माना जाता है,चन्द्रमा को धरती माना गया है,इसके द्वारा ही किसी भी जीव का जन्म और आगे के जीवन के बारे में जाना जा सकता है,मंगल अपना पराक्रम दिखाने वाला पूंछ वाला सितारा कहा गया है,इसके पराक्रम के बिना कोई भी कार्य संभव नही है.

लालकिताब का दूसरा सिद्धान्त है कि जब इन्सान जमीन पर पैदा होता है,तो अपने साथ अपना भाग्य मुट्टी के अन्दर बन्द करके लाता है,जो वह अपनी हथेली पर लिखाकर लाया है,उसे कोई बदल नही सकता है,केवल बदल सकता है,तो रास्ता बदल सकता है,जिस प्रकार से किसी नदी का पानी बह रहा है,उसका काम तो बहना ही है,अगर उस पानी को रोक कर और बान्ध बना कर उस पानी को नहरों द्वारा मोड कर दूसरी जगहों पर ले जाया जाये,और पानी को नीचे गिराकर उससे बडे बडे टरबाइन चलाकर मशीने या बिजली बनाकर उस नदी के पानी का सदुपयोग किया जाय,अगर किसी प्रकार से कोई किसी का भाग्य बदलने की कोशिश करता है,तो उसे अपनी उसके स्थान पर बलि देनी पडती है,कुन्डली में दो प्रकार के प्रभाव सामने आते है,एक तो सामने होते है,और दूसरे शक के दायरे में होते है,सितारा तो कहता है कि जातक को राज-योग है,लेकिन जातक को भीख मांग कर अपनी जिन्दगी को चलाना पड रहा है,जो भी निश्चित प्रभाव होता है,वही भाग्य का संकेत देता है,और वही अटल होता है,जब तक किसी प्रकार से किसी देश काल और परिस्थति का अध्ययन नही कर लिया जाता निश्चित कथन नही किया जा सकता है,कारण कि देश काल और परिस्थति के अनुसार कुछ दिखाई दे रहा होता है,और होता कुछ और ही है,लालकिताब ने साफ़ कहा है,कि ईश्वर के अलावा इस संसार में कोई नही है,जो तात्कालिक समस्या का हूबहू बखान कर दे,अगर कोई कह सकता है,तो उसके अन्दर किसी न किसी प्रकार से ईश्वर ही विराजमान है.

ग्रहों का शक वाला क्षेत्र हमेशा के लिये स्थिर नही होता है,उस प्रभाव को लालकिताब के उपायों के द्वारा दूर किया जा सकता है,ग्रह गोचर के द्वारा या अपनी वास्तविक युति के द्वारा प्रभाव देते है,यह युति जब खराब होती है,तो अनिष्ट भी होना जरूरी होता है,ग्रहों के द्वारा दिये जाने वाले गलत प्रभावों को जानने के लिये जन्म कुन्डली की जरूरत तब पडती है,या तो जातक दूर होता है,या जातक किसी प्रकार से अपनी दिक्कतों को रूबरू होकर बता नही सकता है,वरना दिक्कतों के द्वारा ही कष्ट का निवारण देखा जाता है,अधिक सूक्षमता से जानने के लिये भी कुन्डली की जरूरत पडती है,अधिकतर जातकों का स्वभाव होता है,कि अपनी दिक्कत को बताने की अपेक्षा ज्योतिषी की परख करते है,और जन्म तारीख को बताकर जानना चाहते है,कि वह क्या है,और किस प्रकार की जानकारी चाहता है,या वह किस परेशानी से गुजर रहा है,यह सब उसके पास रहने वाला ज्योतिषी अधिक बता सकता है,कारण वह उस स्थान की जलवायु और रहन सहन की परिस्थिति को भली भांति जानता है.यह तब भी संभव है,जबकि दूर का ज्योतिषी अगर किसी प्रकार से उस जलवायु से गुजर चुका है.सबसे पहले जो कार्य है वह है जातक की कुन्डली की जानकारी करना,किस प्रकार से कुन्डली की परीक्षा करते है,उसका विवेचन आगे के अध्याय में देना उचित रहेगा.

गणेश की सिद्धी—
गणेश की सिद्धि के लिये बुधवार का व्रत और केतु के जाप जरूरी है.

लक्ष्मी की वृद्धि—
कहावत है कि चिन्ता से चतुराई घटे दुख से घटे शरीर,पाप से लक्ष्मी घटे कहि गये दास कबीर,दूसरे के लिये भला सोचने वाले की लक्ष्मी कभी घटती नही है और पाप करने वाले की एक बार लक्ष्मी बढती दिखाई देती है वह केवल उसकी आगे की पीढियों के लिये जो स्थिर लक्ष्मी होती है वह अक्समात सामने आकर धीरे धीरे विलुप्त होने लगती है,श्री सूक्त का पाठ और लोगों के प्रति दया तथा भला करने की भावना लक्ष्मी की व्रुद्धि करता है.

चाणक्य की बुद्धि—
बुद्धि का मालिक बुध है और बुधवार के शाम के समय सरस्वती की आराधना ही चाणक्य की बुद्धि को प्रदान करने वाला है,सिर पर रखे जाने वाले बाल भी बुद्धि को कम करते है.एक वस्त्र और दरी पर सोना जाडे में भी कम वस्त्रों का उपयोग और शरीर को आराम नही मिलने वाले साधन ही बुद्धि को बढाने के लिये माने जाते है.

विक्रमादित्य का न्याय—
गुरु न्याय देने का मालिक है और न्याय को मानने के लिये सूर्य जिम्मेदार होता है,जिनकी कुंडली में गुरु और सूर्य प्रबल होते है वे कभी भी अपने न्याय के रास्ते को नही छोड सकते है,ईश्वरीय शक्तियां खुद आकर उसके शरीर और आत्मा की रक्षा करती है और जो आगे होना है उसका फ़ल बताती है.

पन्ना सी धाय—
सेवा भाव और कन्या राशि का यह अनूठा उदाहरण मेवाड में माना जाता है,वह सेवा की भावना कि जिसके प्रति समर्पण की भावना है उसके लिये अपने खुद के जीवन को बरबाद करने के बाद भी सेवा करने वाले व्यक्ति की रक्षा करना इसी श्रेणी में माना जाता है.

कामधेनू सी गाय—
नवां और बारहवां शुक्र कामधेनु रूपी गाय के रूप में माना जाता है,नवे भाव से शुक्र मन चाही वस्तु को देने वाला होता है और बारहवां शुक्र किसी भी आपत्ति को अपने ऊपर झेलकर दूसरे को सुखी रखता है.

भीष्म की प्रतिज्ञा—
जो कह दिया वह कर दिया ही इस कहावत के अन्दर आता है,मेष राशि का लगन का मंगल अपनी कही बात को पूरी करने के लिये अपने को बलिदान भी करवा सकता है.

हरिश्चन्द्र की सत्यता—
कहना और करना तथा जो है उसी को बताना कोई भी गुप्त भेद नही रखना और जो रास्ता है उसी पर चलना कभी अपने पथ से विचलित नही होना,यह कारण केवल सूर्य के अन्दर ही प्रकट होता है,लेकिन सूर्य को ग्रहण देने वाला राहु है,जो सूर्य से अष्टम होने पर अपनी दशा अन्तर्दशा में राजा हरिश्चन्द्र जैसी दशा को उत्पन्न करता है.

मीरा की भक्ति—
गुरु केतु का अनूठा संगम ही मीराबाई जैसी भक्ति को प्रदान करता है,जिसकी कुंडली में गुरु केतु एक साथ होते है वह आसमानी ताकतों का सरताज होता है,उसे दीन दुनिया से कोई मतलब नही होता है,वह केवल उसी परमात्मा के लिये अपने जीवन को समर्पित कर देता है,अक्सर गुरु बाहवां और चौथा केतु भी इसी आदत को देता है.

शिव की भक्ति—
भगवान शिव को चन्द्रमा और उनकी भक्ति को गुरु से जोडा जाता है,जिसकी कुंडली में गुरु किसी तरह से वृश्चिक राशि को बल दे रहा हो,और केतु उसके आसपास हो,अथवा केतु भी बल दे रहा हो,चन्द्रमा जिसका चौथा आठवां या बारहवां है वह शिवकी भक्ति में चला जाता है,इस प्रकार के लोग अन्दरूनी बातों को जानने वाले और भावुक भी होते है,दूसरे का भला करने में इनको मजा आता है भले ही शाम को घर पर सभी भूखे सोयें लेकिन दूसरे के भोजन की चिन्ता इनके अन्दर होती है.

कुबेर की सम्पन्नता—
कुबेर को धन का राजा कहा गया है,उनकी धन प्राप्त करने की कला केवल व्यक्ति की कामनाओं से है,और धन उन्ही को प्रदान किया जाता है जो बुद्धि से ऊंचे और कार्यों में तेज होते है,बुध शनि की युति वाले जातक कुबेर की श्रेणी में आते है.

विदेह की विरक्ति—
राजा जनक का दूसरा नाम ही विदेह है जो व्यक्ति अपने शरीर और भौतिक कारणों का ध्यान नही रख कर केवल अपने को ईश्वरीय ताकत के सहारे छोड देता है उसे कभी बडे से बडे कार्य में भी बाधा नही आ सकती है,संसार के स्वामी की शक्ति रूपी धनुष को तोडने के लिये भगवान विष्णु को और माता जानकी के रूप में लक्ष्मी को खुद उनके दरवाजे पर अवतरित होना पडा था तथा सभी देवी देवताओं ने उनकी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने में अपनी पूरी शक्तियां लगा दीं थी.धनु राशि का गुरु और सिंह का केतु विदेह की विरक्ति को पैदा करता है.

तानसेन का राग—
संगीत को इतना अच्छा जानना कि दीपक राग के चलाते ही दीपक अपने आप प्रज्ज्वलित हो जाये,बादलों से अपने आप राग के शुरु होते ही बारिस शुरु हो जाये,आने जाने वाले अपने अपने स्थान रुक जावें और कर्णमोहिनी विद्या से अभिभूत होकर अपने को ही भूल जावें.
दधीचि का त्याग,
भृर्तहरी का बैराग,
एकलव्य की लगन,
सूर के भजन,
कृष्ण की मित्रता,
गंगा की पवित्रता,
मां का ममत्व,
पारे का घनत्व,
कर्ण का दान,
विदुर की नीति,
रघुकुल की रीति

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 2, 2011

कालसर्प दोष निवारण–

कालसर्प दोष निवारण—

जयोतिष में राहु और केतु को छाया ग्रह का नाम दिया गया है। राहु शंकाओं का कारक है और केतु उस शंका को पैदा करने वाला स्थान। जब शंका को पैदा करने वाले स्थान,और शंका के एक तरफ़ ही सब बोलने वाले हों और समाधान करने वाले हों तो फ़ैसला एक तरफ़ा ही माना जायेगा,अगर शंका के समाधान के लिये दूसरी तरफ़ से कोई अपना बचाव या फ़ैसले के प्रति टीका टिप्पणी करे,तो अगर एक तरफ़ा फ़ैसला किसी अहित के लिये किया जा रहा है,तो उसके अन्दर समाधान का कारक मिल जाता है,और किसी भी प्रकार का अहित होने से बच जाता है। जीवन शंकाओं के निवारण के प्रति समर्पित है,किसी को शरीर के प्रति शंका है,किसी को धन और कुटुम्ब के प्रति शंका है,किसी को अपना बल और प्रदर्शन दिखाने के प्रति शंका है,किसी को अपने निवास स्थान और लगातार मन ही शंकाओं से हमेशा घिरा है,किसी को अपनी शिक्षा और संतान के प्रति शंका है,किसी को अपने कर्जा दुश्मनी और बीमारी के प्रति शंका है,किसी को अपने जीवन साथी और जीवन के अन्दर की जाने वाली जीवन के प्रति लडाइयों के प्रति शंका है,किसी को अपने शरीर की समाप्ति और अपमान के साथ जानजोखिम के प्रति ही शंका है,किसी को अपने जाति कुल धर्म और भाग्य के प्रति ही शंकायें है,किसी को अपने कार्य और जीवन यापन के लिये क्या करना चाहिये उसके प्रति ही शंकायें हैं,किसी को अपने मित्रों अपने बडे भाइयों और लगातार लाभ के प्रति ही शंकाये हैं,किसी को अपने द्वारा आने जाने खर्चा करने और अंत समय के प्रति शंकायें हुआ करती हैं। अक्सर कोई शंका जब की जाती है तो उस शंका के समाधान के लिये कोई न कोई हल अपने आप अपने ही दिमाग से निकल आता है,अपने दिमाग से नही तो कोई न कोई आकर उस शंका का समाधान बता जाता है,लेकिन राहु जो शंका का नाम है और केतु जो शंका को पैदा करने का कारक है,के एक तरफ़ बहुत सभी ग्रह हों और दूसरी तरफ़ कोई भी ग्रह नही हो तो शंका का समाधान एक तरफ़ा ही हो जाता है,और अगर वह समाधान किसी कारण से अहित देने वाला है तो उसे कोई बदल नहीं पाता है,जातक का स्वभाव एक तरफ़ा होकर वह जो भी अच्छा या बुरा करने जा रहा है करता ही चला जाता है,जातक के मन के अन्दर जो भी शंका पैदा होती है वह एक तरफ़ा समाधान की बजह से केवल एक ही भावना को पैदा करने का आदी हो जाता है,जब कोई शंका का समाधान और उस पर टिप्पणी करने का कारक नहीं होता है तो जातक का स्वभाव निरंकुश हो जाता है,इस कारण से जातक के जीवन में जो भी दुख का कारण है वह चिरस्थाई हो जाता है,इस चिरस्थाई होने का कारण राहु और केतु के बाद कोई ग्रह नही होने से कुंडली देख कर पता किया जाता है,यही कालसर्प दोष माना जाता है,यह बारह प्रकार का होता है।

विष्णु अथवा अनन्त–
इस योग का दुष्प्रभाव स्वास्थ्य आकृति रंग त्वचा सुख स्वभाव धन बालों पर पडता है,इसके साथ छोटे भाई बहिनों छोटी यात्रा में दाहिने कान पर कालरबोन पर कंधे पर स्नायु मंडल पर, पडौसी के साथ सम्बन्धों पर अपने को प्रदर्शित करने पर सन्तान भाव पर बुद्धि और शिक्षा पर परामर्श करने पर पेट के रोगों पर हाथों पर किसी प्रकार की योजना बनाने पर विवेक पर शादी सम्बन्ध पर वस्तुओं के अचानक गुम होजाने,रज और वीर्य वाले कारणों पर याददास्त पर किसी प्रकार की साझेदारी और अनुबन्ध वाले कामों पर पिता और पिता के नाम पर विदेश यात्रा पर उच्च शिक्षा पर धर्म और उपासना पर तीर्थ यात्रा पर पौत्र आदि पर पडता है.

अजैकपाद अथवा कुलिक–
इसका प्रभाव धन,परिवार दाहिनी आंख नाखूनों खरीदने बेचने के कामों में आभूषणों में वाणी में भोजन के रूपों में कपडों के पहिनने में आय के साधनों में जीभ की बीमारियों में नाक दांत गाल की बीमारियों में धन के जमा करने में मित्रता करने में नया काम करने में भय होने शत्रुता करवाने कर्जा करवाने बैंक आदि की नौकरी करने कानूनी शिक्षा को प्राप्त करवाने नौकरी करने नौकर रखने अक्समात चोट लगने कमर की चोटों या बीमारियों में चाचा या मामा परिवार के प्रति पेशाब की बीमारियों में व्यवसाय की जानकारी में राज्य के द्वारा मिलने वाली सहायताओं में सांस की बीमारियों में पीठ की हड्डी में पुरस्कार मिलने में अधिकार को प्राप्त करने में किसी भी प्रकार की सफ़लता को प्राप्त करने में अपना असर देता है.

अहिर्बुन्ध अथवा वासुकि–
राहु तीसरे भाव में और केतु नवें भाव में होता है तो इस कालसर्प योग की उत्पत्ति होती है। ग्रहों का स्थान राहु केतु के एक तरफ़ कुंडली में होता है। यह योग किसी भी प्रकार के बल को या तो नष्ट करता है अथवा उत्तेजित दिमाग की वजह से कितने ही अनर्थ कर देता है।

कपाली या शंखपाल–
इस दोष में राहु चौथे भाव में और केतु दसवें भाव में होता है,यह माता मन और मकान के लिये दुखदायी होता है,जातक को मानसिक रूप से भटकाव देता है।

हर या पद्म–
इस योग मे राहु पंचम में और केतु ग्यारहवें भाव में होता है,बाकी के ग्रह राहु केतु की रेखा से एक तरफ़ होते हैं इस योग के कारण जातक को संतान या तो होती नही अगर होती है तो अल्प समय में नष्ट होजाती है।

बहुरूप या महापद्म—
इस योग में राहु छठे भाव मे और केतु बारहवें भाव में होता है जातक अपने नाम और अपनी बात के लिये कोई भी योग्य अथवा अयोग्य कार्य कर सकता है,जातक की पत्नी या पति बेकार की चिन्ताओं से ग्रस्त होता है,साथ जातक के परिवार में अचानक मुसीबतें या तो आजाती है या खत्म हो जाती है,धन की बचत को झूठे लोग चोर या बीमारी या कर्जा अचानक खत्म करने के लिये इस दोष को मुख्य माना जाता है।

त्र्यम्बक या तक्षक—
यह योग जीवन के लिये सबसे घातक कालसर्प योग होता है,त्र्यम्बक का मतलब त्रय+अम्ब+क=तीन देवियों (सरस्वती,काली,लक्ष्मी) का रूप कालरूप हो जाना। इस योग के कारण जीवन को समाप्त करने के लिये और जीवन में किसी भी क्षेत्र की उन्नति शादी के बाद अचानक खत्म होती चली जाती है,जातक सिर धुनने लगता है,उसके अन्दर चरित्रहीनता से बुद्धि का विनाश,अधर्म कार्यों से और धार्मिक स्थानों से अरुचि के कारण लक्ष्मी का विनाश,तथा हमेशा दूसरों के प्रति बुरा सोचने के कारण संकट में सहायता नही मिलना आदि पाया जाता है।

अपाराजित या करकट—
यह योग भी शादी के बाद ही अचानक धन की हानि जीवन साथी को तामसी कारणों में ले जाने और अचानक मौत देने के लिये जाना जाता है,इस योग के कारण जातक जो भी काम करता है वह शमशान की राख की तरह से फ़ल देते है,जातक का ध्यान शमशान सेवा और म्रुत्यु के बाद के धन को प्राप्त करने में लगता है,अचानक जातक कोई भी फ़ैसला जीवन के प्रति ले लेता है,यहां तक इस प्रकार के ही जातक अचानक छत से छलांग लगाते या अचानक गोली मारने से मरने से मृत्यु को प्राप्त होते है,इसके अलावा जातक को योन सम्बन्धी बीमारियां होने के कारण तथा उन रोगों के कारण जातक का स्वभाव चिढ चिढा हो जाता है,और जातक को हमेशा उत्तेजना का कोपभाजन बनना पडता है,संतान के मामले में और जीवन साथी की रुग्णता के कारण जातक को जिन्दगी में दुख ही मिलते रहते हैं।

वृषाकपि या शंखचूड—
इस योग में राहु नवें भाव में और केतु तीसरे भाव में तथा सभी अन्य ग्रह राहु केतु के एक तरफ़ होते है,इस योग के अन्दर जातक धर्म में झाडू लगाने वाला होता है,सामाजिक मर्यादा उसके लिये बेकार होती है,जातक का स्वभाव मानसिक आधार पर लम्बा सोचने में होता है,लोगों की सहायता करने और बडे भाई बहिनों के लिये हानिकारक माना जाता है,जातक की पत्नी को या पति को उसके शरीर सहित भौतिक जिन्दगी को सम्भालना पडता है,जातक को ज्योतिष और पराशक्तियों के कारकों पर बहस करने की आदत होती है,जातक के घर में या तो लडाइयां हुआ करती है अथवा जातक को अचानक जन्म स्थान छोड कर विदेश में जाकर निवास करना पडता है।

शम्भु या घातक–
इस योग में राहु दसवें भाव मे और केतु चौथे भाव में होते है अन्य ग्रह राहु केतु के एक तरफ़ होते है,इस योग के कारण जातक को या तो दूसरों के लिये जीना पडता है अथवा वह दूसरों को कुछ भी जीवन में दे नही पाता है,जातक का ध्यान उन्ही कारकों की तरफ़ होता है जो विदेश से धन प्रदान करवाते हों अथवा धन से सम्बन्ध रखते हों जातक को किसी भी आत्मीय सम्बन्ध से कोई मतलब नही होता है। या तो वह शिव की तरह से शमशान में निवास करता है,या उसे घर परिवार या समाज से कोई लेना देना नही रहता है,जातक को शमशानी शक्तियों पर विश्वास होता है और वह इन शक्तियों को दूसरों पर प्रयोग भी करता है।

कपर्दी या विषधर—
इस योग में ग्यारहवें भाव में राहु और पंचम स्थान में केतु होता है,इसकी यह पहिचान भी होती है कि जातक के कोई बडा भाई या बहिन होकर खत्म हो गयी होती है,जातक के पिता को तामसी कारकों को प्रयोग करने की आदत होती है जातक की माँ अचानक किसी हादसे में खत्म होती है,जातक की पत्नी या पति परिवार से कोई लगाव नही रखते है,अधिकतर मामलों में जातक के संतान अस्पताल और आपरेशन के बाद ही होती है,जातक की संतान उसकी शादी के बाद सम्बन्ध खत्म कर देती है,जातक का पालन पोषण और पारिवारिक प्रभाव दूसरों के अधीन रहता है।

रैवत या शेषनाग—
इस योग में लगन से बारहवें भाव में राहु और छठे भाव में केतु होता है,जातक उपरत्व वाली बाधाओं से पीडित रहता है,जातक को बचपन में नजर दोष से भी शारीरिक और बौद्धिक हानि होती है,जातक का पिता झगडालू और माता दूसरे धर्मों पर विश्वास करने वाली होती है,जातक को अकेले रहने और अकेले में सोचने की आदत होती है,जातक कभी कभी महसूस करता है कि उसके सिर पर कोई भारी बजन है और जातक इस कारण से कभी कभी इस प्रकार की हरकतें करने लगता है मानों उसके ऊपर किसी आत्मा का साया हो,जातक के अन्दर सोचने के अलावा काम करने की आदत कम होती है,कभी जातक भूत की तरह से काम करता है और कभी आलसी होकर लम्बे समय तक लेटने का आदी होता है,जातक का स्वभाव शादी के बाद दूसरों से झगडा करने और घर के परिवार के सदस्यों से विपरीत चलने का होता है,जातक की होने वाली सन्तान अपने बचपन में दूसरों के भरोसे पलती है।

ऊँ और स्वास्तिक का महत्व—

स्वास्तिक भारतीयों में चाहे वे वैदिक मतालम्बी हों या सनातनी हो या जैन मतालम्बी,ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सभी मांगलिक कार्यों जैसे विवह आदि संस्कार घर के अन्दर कोई भी मांगलिक कार्य होने पर “ऊँ” और स्वातिक का दोनो का अथवा एक एक का प्रयोग किया जाता है। इन दोनो का प्रयोग करने का तरीका यह जरूरी नही है कि वह पढे लिखे या विद्वान संगति में ही देखने को मिलता हो,यह किसी भी ग्रामीण या शहरी संस्कृति में देखने को मिल जाता है। किसी के घर में मांगलिक कार्य होते है तो दरवाजे पर लिखा जाता है,किसी मंदिर में जाते है तो उसके दरवाजे पर यह लिखा मिलता है,किसी प्रकार की नई लिखा पढी की जाती है तो शुरु में इन दोनो को या एक को ही प्रयोग में लाया जाता है। “ऊँ” के अन्दर तीन अक्षरों का प्रयोग किया जाता है,”अ उ म” इन तीनो अक्षरों में अ से अज यानी ब्रह्मा जो ब्रह्माण्ड के निर्माता है,सृष्टि का बनाने का काम जिनके पास है,उ से उनन्द यानी विष्णुजी जो ब्रह्माण्ड के पालक है और सृष्टि को पालने का कार्य करते है, म से महेश यानी भगवान शिवजी,जो ब्रह्माण्ड में बदलाव के लिये पुराने को नया बनाने के लिये विघटन का कार्य करते है। वेदों में ऊँ को प्रणव की संज्ञा दी गयी है,जब भी किसी वेद मंत्र का उच्चारण होता है तो ऊँकार से ही शुरु किया जाता है,स्वास्तिक को चित्र के रूप में भी बनाया जाता है और लिखा भी जाता है जैसे “स्वास्ति न इन्द्र:” आदि.

हिन्दू समाज में किसी भी शुभ संस्कार में स्वास्तिक का अलग अलग तरीके से प्रयोग किया जाता है,बच्चे का पहली बार जब मुंडन संस्कार किया जाता है तो स्वास्तिक को बुआ के द्वारा बच्चे के सिर पर हल्दी रोली मक्खन को मिलाकर बनाया जाता है,स्वास्तिक को सिर के ऊपर बनाने का अर्थ माना जाता है कि धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों का योगात्मक रूप सिर पर हमेशा प्रभावी रहे,स्वास्तिक के अन्दर चारों भागों के अन्दर बिन्दु लगाने का मतलब होता है कि व्यक्ति का दिमाग केन्द्रित रहे,चारों तरफ़ भटके नही,वृहद रूप में स्वास्तिक की भुजा का फ़ैलाव सम्बन्धित दिशा से सम्पूर्ण इनर्जी को एकत्रित करने के बाद बिन्दु की तरफ़ इकट्ठा करने से भी माना जाता है,स्वास्तिक का केन्द्र जहाँ चारों भुजायें एक साथ काटती है,उसे सिर के बिलकुल बीच में चुना जाता है,बीच का स्थान बच्चे के सिर में परखने के लिये जहाँ हड्डी विहीन हिस्सा होता है और एक तरह से ब्रह्मरंध के रूप में उम्र की प्राथमिक अवस्था में उपस्थित होता है और वयस्क होने पर वह हड्डी से ढक जाता है,के स्थान पर बनाया जाता है। स्वास्तिक संस्कृत भाषा का अव्यय पद है,पाणिनीय व्याकरण के अनुसार इसे वैयाकरण कौमुदी में ५४ वें क्रम पर अव्यय पदों में गिनाया गया है। यह स्वास्तिक पद ’सु’ उपसर्ग तथा ’अस्ति’ अव्यय (क्रम ६१) के संयोग से बना है,इसलिये ’सु+अस्ति=स्वास्ति’ इसमें ’इकोयणचि’सूत्र से उकार के स्थान में वकार हुआ है।

’स्वास्ति’ में भी ’अस्ति’ को अव्यय माना गया है और ’स्वास्ति’ अव्यय पद का अर्थ ’कल्याण’ ’मंगल’ ’शुभ’ आदि के रूप में प्रयोग किया जाता है। जब स्वास्ति में ’क’ प्रत्यय का समावेश हो जाता है तो वह कारक का रूप धारण कर लेता है और उसे ’स्वास्तिक’ का नाम दे दिया जाता है। स्वास्तिक का निशान भारत के अलावा विश्व में अन्य देशों में भी प्रयोग में लाया जाता है,जर्मन देश में इसे राजकीय चिन्ह से शोभायमान किया गया है,अन्ग्रेजी के क्रास में भी स्वास्तिक का बदला हुआ रूप मिलता है,हिटलर का यह फ़ौज का निशान था,कहा जाता है कि वह इसे अपनी वर्दी पर दोनो तरफ़ बैज के रूप में प्रयोग करता था,लेकिन उसके अंत के समय भूल से बर्दी के बेज में उसे टेलर ने उल्टा लगा दिया था,जितना शुभ अर्थ सीधे स्वास्तिक का लगाया जाता है,उससे भी अधिक उल्टे स्वास्तिक का अनर्थ भी माना जाता है।

स्वास्तिक की भुजाओं का प्रयोग अन्दर की तरफ़ गोलाई में लाने पर वह सौम्य माना जाता है,बाहर की तरफ़ नुकीले हथियार के रूप में करने पर वह रक्षक के रूप में माना जाता है। काला स्वास्तिक शमशानी शक्तियों को बस में करने के लिये किया जाता है,लाल स्वास्तिक का प्रयोग शरीर की सुरक्षा के साथ भौतिक सुरक्षा के प्रति भी माना जाता है,डाक्टरों ने भी स्वास्तिक का प्रयोग आदि काल से किया है,लेकिन वहां सौम्यता और दिशा निर्देश नही होता है। केवल धन (+) का निशान ही मिलता है। पीले रंग का स्वास्तिक धर्म के मामलों में और संस्कार के मामलों में किया जाता है,विभिन्न रंगों का प्रयोग विभिन्न कारणों के लिये किया जाता है।

ऊँ परमात्मा वाची कहा गया है,ऊँ को मंगल रूप में जाना गया है,जैन धर्म के अनुसार ऊँ पंच परमेष्ठीवाचक की उपाधि से विभूषित है। णमोकार मंत्र के पहले इसे प्रयोग किया गया है। ऊँ एक बीजाक्षर की भांति है,इसके मात्र उच्चारण करने से ही भक्ति महिमा का निष्पादन हो जाता है। इसका रूप दोनो आंखों के बीच में आंखों को बन्द करने के बाद सुनहले रूप में कल्पित करते रहने से यह सहज योग का रूप सामने लाना शुरु कर देता है,और उन अनुभूतियों की तरफ़ मनुष्य जाना शुरु कर देता है जिन्हे वह कभी सोच भी नही सकता है।

ऊँ कार बिन्दु संयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिना:।
कामदं मोक्षदं चैव ऊँकाराय नमो नम:॥

बालारिष्ट योग—

जीवन मे आयु का विचार गुरु से किया जाता है और मौत का विचार राहु से किया जाता है,कुंडली में गोचर का गुरु जब जब जन्म के राहु से युति लेता है,या राहु जन्म के गुरु से युति लेता है,अथवा गोचर का राहु गोचर के गुरु से युति लेता है,अथवा गुरु और राहु का षडाष्टक योग बनता है,अथवा गुरु के साथी ग्रह राहु से अपनी मित्रता कर रहे हो,अथवा राहु के आसपास अपनी युति मिला रहे हो,तो बालारिष्ट-योग की उत्पत्ति हो जाती है,इस योग में जातक की मौत निश्चित होती है,लेकिन मौत भी आठ प्रकार की होती है,जिसके अन्दर तीन मौत भयानक मानी जाती है।
शरीर की मौत जो बारह भावों के अनुसार उनके रिस्तेदारों के सहित मानी जाता है,धन की हानि जो बारह भावों के कारकों के द्वारा जानी जाती है,मन की हानि जो बारह भावों के सम्बन्धियों से बिगाडखाता या दुश्मनी के रूप में मानी जाती है।

गुरु जीव का कारक है—

गुरु जो जीव का कारक है,गुरु जो प्रकृति के द्वारा दी गयी सांसों का कारक है,गुरु जो जीवन के हर भाव का प्रोग्रेस का कारक है,गुरु अगर मौत का भी मालिक है तो वह मौत भी किसी न किसी प्रकार के फ़ायदे के लिये ही देता है,गुरु अगर दुशमनी का मालिक है तो वह दुश्मनी भी किसी बहुत बडे फ़ायदे के लिये मानी जाती है,गुरु अगर खर्चे के भाव का मालिक है तो खर्चा भी किसी न किसी अच्छे कारण के लिये ही करवायेगा। गुरु की युति अगर क्रूर ग्रहों से भी हो जाती है तो गुरु के प्रभाव में क्रूर ग्रह भी क्रूरता तो करते है लेकिन व्यक्ति या समाज की भलाई के करते है,गुरु के साथ पापी ग्रह मिल जाते है तो वे पाप भी भलाई के लिये ही करते है,मतलब गुरु का साथ जिस ग्रह के साथ मिल जाता है उसी की “पौ बारह हो जाती है” इस कहावत का रूप भी गुरु के अनुसार ही माना जाता है मतलब जब गुरु किसी भी भाव में प्रवेश करता है तो जीत का ही संकेत देता है,जब वह मौत के भाव में प्रवेश करता है तो जो भी जैसी भी भावानुसार मौत होती है वह आगे के जीवन के लिये या आगे की सन्तान की भलाई के लिये ही होती है। गुरु हवा कारक है उसे ठोस रूप में नही प्राप्त किया जा सकता है गुरु सांस का कारक है सांस को कभी बांध कर नही रखा जा सकता है।

गुरु की राहु के साथ नही निभती है,राहु के साथ मिलकर गुरु चांडाल योग बन जाता है,एक गुरु की हैसियत चांडाल की हो जाती है वह अपने ज्ञान को मौज मस्ती के साधनो में खर्च करना शुरु कर देता है,उसे बचाने से अधिक मारने के अन्दर मजा आने लगता है,वह अपने पराक्रम को धर्म और समाज की भलाई के प्रति न सोचकर केवल बुराई और बरबादी के लिये सोचने का काम करने लगता है,गुरु जो पीले रंग का मालिक है अपने अन्दर राहु रूपी भेडिया को छुपाकर धर्म के नाम पर यौन शोषण,धन का शोषण,जीवन का शोषण करना चालू कर देता है। गुरु जो ज्ञान का कारक है वह उसे मारण मोहन वशीकरण उच्चाटन के रूप में प्रयोग करना शुरु कर देता है,वह पीले कपडों में बलि स्थानों मे जाकर जीव की बलि देना शुरु कर देता है,जब कोई भी ज्ञान मानव जीवन या जीव के अहित में प्रयोग किया जायेगा तो वह चांडाल की श्रेणी में चला जायेगा,और यही गुरु चांडाल योग की परिभाषा कही जायेगी।

इसी बात को आज के युग में सूक्षमता से देखें तो जो व्यक्ति आतंकवादी गतिविधियों में लगे है,जो अकारण ही जीव हत्या और मानव के वध के उपाय सोचते है,जो खून बहाने में अपनी अतीव इच्छा जाहिर करते है,जिनके पास वैदिक ज्ञान तो है लेकिन उस ज्ञान के द्वारा वे बजाय किसी की सहायता करने के उस ज्ञान की एवज में धन को प्राप्त करते है,उसे महंगे होटलों में जाकर बीफ़ और मदिरा के साथ उपभोग करते है,उनके वैदिक ज्ञान का प्रयोग गुरु चांडाल की श्रेणी में ही माना जायेगा,”अपना काम बनता,भाड में जाये जनता”,का प्रयोग केवल धर्म गुरुओं के प्रति ही नही माना जा सकता है,वह किसी प्रकार के प्राप्त किये गये ज्ञान के प्रति भी माना जा सकता है,जैसे राजनीति के अन्दर असीम ज्ञान को हासिल कर लिया और उस ज्ञान का प्रयोग जनहित में लगाना था लेकिन राहु के द्वारा दिमाग में असर आजाने से वे उसे केवल अपने अहम के लिये खर्च करने लगे,राहु जो सभी तरह से विराट रूप का मालिक है खुद को विराट रूप में दिखाने की कोशिश करने लगे,राहु जो शुक्र के साथ मिलकर चमक दमक का मालिक बना देता है,साज सज्जा से युक्त व्यक्तियों की श्रेणी में लेजाकर खडा कर देता है के रूप में अपने को प्रदर्शित करने में लग गये,लेकिन गुरु का अपना राज्य है वह सांसों के रूप में व्यक्ति के जीव के अन्दर अपना निवास बनाकर बैठा है,उसकी जब इच्छा होगी वह अपनी सांसों को समेट कर चला जायेगा,फ़िर इस देह को राहु ही अपनी रसायनिक क्रिया के द्वारा सडायेगा,या ईंधन बनकर जलायेगा,या विस्फ़ोट में उडायेगा,अथवा आसमानी यात्रा में चिथडे करके उडायेगा,आदि कारणों राहु का कारण भी सामने अवश्य आयेगा।

जीव के साथ राहु का समागम—

राहु वास्तव में छाया ग्रह है,यह अपने ऊपर कोई आक्षेप नही लेता है,यह एक बिन्दु की तरह से है जो जीव के उसी के रूप में आगे पीछे चलता है,कभी जीव का साथ नही छोडता है,इसके अन्दर एक अजीब सी शक्ति होती है,जब जीव का दिमाग इसके अन्दर फ़ंस जाता है तो वह जीव के साथ जो नही होना होता है वह करवा देता है। यह तीन मिनट की गति से कुंडली में प्रतिदिन की औसत चाल चलता है,इसका भरोसा नही होता है,कि सुबह यह क्या कर रहा है दोपहर को क्या करेगा और शाम होते ही यह क्या दिखाना शुरु कर देगा। राहु को ही कालपुरुष की संज्ञा दी गयी है,वह विराट रूप में सभी के सामने है उसकी सीमा अनन्त है,उसकी दूरी को कोई नाप नही सका है,केवल उसकी संज्ञा नीले रंग के रूप में अनन्त आकाश की ऊंचाइयों में देखी जा सकती है,यह केतु से हमशा विरोध में रहता है,और उसकी उल्टी दिशा का बोधक होता है,जो केतु सहायता के रूप में सामने आता है यह उसी का बल हरण करने के बाद उसकी शक्ति और बोध दोनो को बेकार करने के लिये अपनी योग्यता का प्रमाण देने से नही चूकता है। सूर्य के साथ अपनी युति बनाते ही वह पिता या पुत्र को आलसी बना देता है,जो कार्य जीवन के प्रति उन्नति देने वाले होते है वे आलस की बजह से पूरे नही हो पाते है,वह आंखो को भ्रम में डाल देता है होता कुछ है और वह दिखाना कुछ शुरु कर देता है। जातक के साथ जो भी कार्य चल रहा होता है उसके अन्दर असावधानी पैदा करने के बाद उस कार्य को बेकार करने के लिये अपनी शक्ति को देता है,पलक झपकते ही आंख की किरकिरी बनकर सडक में मिला देता है,सूर्य के साथ जब भी मिलता है तो केवल जो भी सुनने को मिलता है वह अशुभ ही सुनने को मिलता है,जातक के स्वास्थ्य में खराबी पैदा करने के लिये राहु और सूर्य की युति मुख्य मानी जाती है। राहु से अष्टम में जब भी सूर्य का आना होता है तो या तो बुखार परेशान करता है,अथवा किसी सूर्य से सम्बन्धित कारक का खात्मा सुनने को मिलता है।

बालारिष्ट—

गुरु और राहु दोनो मिलकर जहरीली गैस जैसा उपाय करते है,घर परिवार समाज वातावरण भोजन पानी आदि जीवन के सभी कारक इतना गलत प्रभाव देना चालू कर देते है कि व्यक्ति का जीवन दूभर हो जाता है,अगर व्यक्ति घर वालों के द्वारा परेशान किया जा रहा है तो पडौस के लोग भी उसे परेशान कर देते है,वह पडौस से भी दूर जाना चाहता है तो उसे कालोनी या गांव के लोग परेशान करना चालू कर देते है,जब कि उसकी कोई गल्ती नही होती है केवल वह अपने अन्दर के हाव भाव इस तरह से प्रदर्शित करने लगता है जैसे कि उसके पास कोई बहुत बडी आफ़त आने वाली हो और वह हर बात में डर रहा हो। राहु जो विराट है वह जीव को अपने में समालेने के लिये आसपास अपना माहौल फ़ैला लेता है,और जीव किसी भी तरह से उसके चंगुल में आ ही जाता है,बहुत ही भाग्य या पौरुषता होती है तो जीव बच पाता है,अन्यथा वह राहु का ग्रास तो बन ही जाता है।

मंगल नही होता है अमंगल—

मंगल से अमंगल होना विचित्र बात है,किन्तु परम्परागत ज्योतिष के की यह मान्यता है कि मंगल,शनि,राहु,और क्षीण चन्द्रमा पापी ग्रह है,इनमे कोई भी १,४,७,८,१२ भावों में स्थित हो या इन भावों को देखता हो,तो वह मंगलीक दोष होता है.जन्म कुन्डली के १,४,७,८,१२ भावों को समझना बहुत जरूरी है,फला भाव शारीरिक गठन,कद,काठी,रंग रूप,शारीरिक शक्ति और स्वास्थ्य का कारक है,इस भाव के पीडित होने पर जातक के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पडता है,स्वास्थ्य खराब होने पर जातक चिढचिढा हो जाता है,और उग्र स्वभाव तथा हठी हो जाता है,चौथा भाव माता का भाव होता है,और जीवन के प्रति बहुत ही उपयोगी माना जाता है,उसके पीडित होने पर जातक जीवन उपयोगी वस्तुओं केव लिये तरस जाता है,अभाव सौ अनर्थों का एक अनर्थ होता है,जहां भी देखो टोटे की लडाइयां ही मिलती है,जीवन दुख और दैन्य से भर जाता है.सप्तम भाव विवाह,दाम्पत्य सुख,सन्तान और परिवार की बढोत्तरी का कारक है,साझेदार से भी जुडा हुआ है,विवाह की द्रिष्टि से यह भाव बहुत ही महत्व पूर्ण माना जाता है,इस भाव में अगर पापी ग्रह बैठे हों,या इस भाव को पाई ग्रह देखते हो,तो विवाहित जीवन सुख मय नही होता है,पति पत्नी को एक दूसरे से सन्तुष्टि नही मिलती है,परिवार में तरह तरह के अमंगल होते रहते है,इन सबसे पारिवारिक जीवन नर्क मय हो जाता है.अष्टम भाव उम्र और शान्ति का कारक है,यह मोक्ष का भाव भी कहा जाता है,अन्तिम प्रणित का कारण भी माना जाता है,इसके पीडित होने पर जातक की उम्र चिन्ताओं में ही कट जाती है,उसे किसी प्रकार की शान्ति नही मिल पाती है,बारहवें भाव को व्यय और यात्रा का भाव भी बोला जाता है,इसे अगर कोई पापी ग्रह देखते हों तो व्यय अधिक होता है,यात्रा और घर से बाहर ही मन लगता है,हर समय दिमाग में आगे के जीवन की कल्पनायें ही दिमाग खराब करती रहती है,इन सबसे मानसिक परेशानिया तब और बढ जाती है,ज्योतिष में मांगलिक दोष की शुरुआत कब हुई किसी को पता नही है,समय समय पर लेखकों और विद्वानो ने अपने अपने विचारों से इसे अपने अपने अनुसार लिखा है,महर्षी पाराशर,मणित्थ बैद्यनाथ,और वराहमिहिर जैसे और आचार्यों ने इस विषय को कोई मायने नही दिया,लेकिन बाद के ज्योतिषियों ने इस मंगलीक दोष का हौआ खडा कर दिया,किसी ने लिखदिया,”लग्ने च व्यये पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे,कन्या भर्तुर्विनाशाय भर्तुर कन्या विनाशक:”,इसका मतलब होता है कि १,४,७,८,१२ भावों में मम्गल हो तो कन्या अपने होने वाले पति का विनाश करती है,और वर अपनी होने वाली पत्नी का विनाश करता है,सामान्य बोलचाल की भाषा में “नाश कर देना”,का मतलब है मार देना या नष्ट कर देना होता है,जैसे किसी ने दरवाजे के कपाट बनाये और एक पल्ला बडा और एक छोटा कर दिया तो हम कहेगे कि किवाड का नाश कर दिया,लेकिन जो नाश करदेना का मतलब मम्गल के लिये व्याख्याकारों ने दिया वह संसय से भरा ही कहा जायेगा,एक महिला की कुन्डली में मंगल,शुक्र और चन्द्र तीनो लगन में विराजमान थे,कन्या के पिता ने जितने लोगों को कुन्डली दिखाई सभी ने मंगली का दोष उस बेचारी कन्या के सिर पर थोप दिया,लेकिन किसी ने भी जरा सी मेहनत करने के बाद कुन्डली को देखा होता तो देख लेते कि कन्या के सप्तम में मंगल और ग्यारहवें भाव में गुरु केतु भी विराजमान है,कन्या का भाग्य प्रबल था,और वह पुलिस की एक ट्रेफ़िक एस.पी.बन कर जब सामने आयी तो कन्या के पिता को भी संतोष हुआ,और उसके लिये हजारों रिस्ते खुद ब खुद चलकर सामने आने लगे,आखिर में उसकी शादी एक अच्छे होनहार जज के साथ हुई और वह बडे आराम से अपने दो बच्चों के साथ नौकरी भी कर रही है,और घर भी सम्भाल रही है,मंगल का कारक पराक्र्म से होता है,मंगल के बारे में इतने बुरे व्याख्यान देना एक बेकार सी बात ही कही जायेगी,मंगल स्त्री की कुन्डली में पति का कारक होता है,और पति की कुन्डली में भाई का कारक होता है,कार्य के अन्दर बिजली और होस्पिटल से अथवा इन्जीनियर से जुडा होता है,शरीर में खून का कारक होता है,अगर सही तरीके से लग,सूर्य लग,चन्द्र लगन,और नवांश को देखा जाये तो संसार के निन्न्यानबे प्रतिशत लोग मंगली मिलेंगे,बाद में कुछ लोगों ने पापी ग्रहों में सूर्य और चन्द्र को भी शामिल कर लिया,सूर्य अगर पिता है,सूर्य अगर व्यक्ति का नाम है,सूर्य अगर व्यक्ति का ढांचा है तो सूर्य के पापी होने से सब कुछ बेकार ही हो जायेगा,शुक्र को पापी कहा है,इस ग्रह की सिफ़्त भौतिकता और लक्षमी से मानी जाती है,घर की लक्ष्मी पत्नी से मानी जाती है,जमीन और जमीन से पैदा होने वाली फ़सल से मानी जाती है,तो किस प्रकार से शुक्र पापी हो सकता है,इस प्रकार से नौ ग्रहों में से छ: मंगली दोष के दाता हों तो बताइये कितने लोग इस संसार में मंगली दोष से बाहर हो सकते है,इस बात के लिये मंगलीक की काट खोजी गयी तो कन्या के लिये वर को मंगलीक होना अनिवार्य माना गया,और वर के लिये कन्या को मंगलीक होना उचित बताया गया,और बताया गया कि इस प्रकार से मंगलीक का दोष समाप्त हो जायेगा.मेष लगन के लिये मंगल लगन का किस प्रकार से दोषी बना सकता है,जब कि वह लगन का मालिक ही है,वृष लगन के लिये मम्गल खुद ही सप्तमेश का भाव पैदा करता है,और मिथुन लगन के लिये लाभ भाव का स्वामी और कर्जा दुश्मनी काटने का कारक माना जाता है,कर्क लगन के लिये पंचम और कर्म का कारक मंगल भी दोषी नही हो सकता है,सिंह लगन के लिये माता के भाव का मालिक और भाग्यविधाता ही क्या दोषी हो सकता है?,कन्या के लिये पराक्रम भाव और छोटे भाई बहिनो का मालिक,और आठवें भाव से अपमान मृत्यु और जानजोखिम को समाप्त करने वाला कभी खराब हो सकता है,तुला लगन के लिये धन और जीवन साथी के भाव का मालिक किस प्रकार से गलत कर सकता है,वृश्चिक लगन के लिये खुद शरीर का मालिक और कर्जा दुश्मनी और बीमारी को खत्म करने वाला भी खराब नही हो सकता है,धनु लगन के लिये व्यय और यात्राओं पर अंकुश लगाने तथा,शिक्षा तथा परिवार को सम्भालने वाला भी खराब नही हो सकता है,मकर लगन के लिये ग्यारहवें भाव और सुखों का मालिक भी खराब नही हो सकता है,कुम्भ लगन के लिये छोटे भाई बहिनो का मालिक और कर्म का कारक भी खराब नही होता,मीन लगन के लिये धन और भाग्य का कारक मंगल किस प्रकार से खराब हो सकता है.इन सब बातों से पता लगता है,कि गुरु यानी जीव और सूर्य यानी आत्मा अगर किसी प्रकार से राहु,केतु,और शनि के साथ किसी प्रकार से कलुषित हो रही है,तो मंगल खराब हो सकता है,सूर्य और शनि की युति से मंगल बद हो जाता है,उस मंगल को खराब मान सकते है,सूर्य पिता और शनि किसी प्रकार से तामसी वस्तुओं का भोजन और तामसी लोगों से उठक बैठक जातक के खून को खराब कर सकती है,केवल अकेला मंगल तो इस प्रकार के भाव नही पैदा कर सकता है,नवांश नौ मिनट का प्रभाव देता है,लगन सवा दो घन्टे का प्रभाव देती है,सूर्य लगन महिने भर का प्रभाव देता है,और चन्द्र लगन सवा दो दिन का प्रभाव देता है,गुरु का प्रभाव साल भर का होता है,बुध का कभी महिने भर का और बक्री हो जाये तो सवा महिने का प्रभाव देता है,मंगल की चाल भी औसत एक महिने की ही होती है,तो फ़िर किस प्रकार से गलत प्रभाव मिलते है?गलत प्रभाव देने के लिये राहु,शनि और केतु ही जिम्मेदार होते है,मंगल नही.अगर कुन्डली में मंगली दोष है,और पति पत्नी का निर्वाह किसी प्रकार से नही हो पा रहा है,तो जातक के अन्दर से निम्न लिखित दोष दूर करने की कोशिश करने पर मंगली दोष खत्म हो जायेगा और किसी प्रकार की पूजा पाठ करने की आवश्यकता नही पडेगी,यह मेरे द्वारा अनुभूत और पूरी तरह से अंजवाया हुआ है.-सदाचार का पालन करवाना,झूठ नही बोलने देना,झूठी गवाही नही देना,गाली नही देना,शराब का नही पीना,मांस मछली का नही खाना,किसी से भी मुफ़्त में कुछ नही लेना,नि:संतान की सम्पत्ति नही खरीदना,दक्षिणी मुख वाले घर में नही रहना,काले कांणे और गंजे से दूर रहना,सुबह सुबह शहद का सेवन करना,मीठा भोजन खुद खाना और दूसरों को खिलाना,जन्म दिन पर मिठाई खिलाना,घर आये हुए मेहमान को सौंफ़ और मिश्री खरीदना,पत्नि की देखभाल करना,भाई की संतान की पालना करना,विधवा स्त्रियों की सेवा करना,हाथी दांत और जानवरों के अंगों को घर में नही रखना,जंग लगा हुआ हथियार और बारूदी हथियार घर में नही रखना,आदि सहायक होते है,अगर ऊपर लिखे किसी प्रकार के साधन को त्यागने में परेशानी होती है,तो रोजाना हनुमानचालीसा का पाठ करना चाहिये,हनुमानजी को प्रसाद चढाकर बांटना चाहिये,हनुमानजी को सिंदूर का चोला चढाना चाहिये,रामायण का सुन्दर काण्ड का पाठ करना चाहिये,लाल रूमाल पास में रखना चाहिएय,चांदी का छल्ला बिना जोड का पहिनना चाहिये,तांबे या सोने की अंगूठी में मूंगा धारण करना चाहिये,स्त्रियां चांदी के कडे में मेख जडवा करवा कर पहिन सकती है,बन्दरों को भोजन देना चाहिये,तन्दूर पर पकी मीठी रोटी कुत्तो को खिलानी चाहिये,मन्दिर में मीथा प्रसाद चढाना चाहिये,चीनी को बहते पाने में बहाना चाहिये,शहद और सिन्दूर को पानी में बहाना चाहिये,कच्ची दीवार बनाकर गिरानी चाहिये,घर और दफ़्तर में सहायक कर्मचारी रखने चाहिये.

शकुन शास्त्र—
ज्योतिष सीखने के लिये सबसे पहले भारतीय ज्योतिष के अन्दर शकुन शास्त्र को जानना जरूरी है,क्योंकि भेद को जाने बिना भाव का अर्थ समझ में नही आता है,तरीके से सीखा गया काम हर जगह फ़लदायी होता है,अक्सर ज्योतिषी से पूंछा जाता है कि हमे यात्रा करनी है,या हमे अमुक काम करना है,मुहूर्त बतादो,अब पूरी ज्योतिष की जानकारी तो है,लेकिन शकुन शास्त्र का जरा सा भी ज्ञान नही है,तो ज्योतिष वहीं पर अपना नाम खराब करवा देती है,सबसे पहले आपको शकुन शास्त्र,दिशाओं का ज्ञान,यात्रा और कार्य को करने के मुहूर्त आदि की जानकारी जानवरों के द्वारा प्रत्यक्ष में बताये जाने वाले शकुन आदि का विवेचन करते है.

यात्रा मुहूर्त तथा शुभाशुभ शकुन विचार–
अनुराधा ज्येष्ठा मूल हस्त मृगसिरा अश्विनी पुनर्वसु पुष्य और रेवती ये नक्षत्र यात्रा के लिये शुभ है,आर्द्रा भरणी कृतिका मघा उत्तरा विशाखा और आशलेषा ये नक्षत्र त्याज्य है,अलावा नक्षत्र मध्यम माने गये है,षष्ठी द्वादसी रिक्ता तथा पर्व तिथियां भी त्याज्य है,मिथुन कन्या मकर तुला ये लगन शुभ है,यात्रा में चन्द्रबल तथा शुभ शकुनो का भी विचार करना चाहिये.

दिकशूल—-
शनिवार और सोमवार को पूर्व दिशा में यात्रा नही करनी चाहिये,गुरुवार को दक्षिण दिशा की यात्रा त्याज्य करनी चाहिये,रविवार और शुक्रवार को पश्चिम की यात्रा नही करनी चाहिये,बुधवार और मंगलवार को उत्तर की यात्रा नही करनी चाहिये,इन दिनो में और उपरोक्त दिशाओं में यात्रा करने से दिकशूल माना जाता है.

सर्वदिशागमनार्थ शुभ नक्षत्र—
हस्त रेवती अश्वनी श्रवण और मृगसिरा ये नक्षत्र सभी दिशाओं की यात्रा के लिये शुभ बताये गये है,जिस प्रकार से विद्यारम्भ के लिये गुरुवार श्रेष्ठ रहता है,उसी प्रकार पुष्य नक्षत्र को सभी कार्यों के लिये श्रेष्ठ माना जाता है.

योगिनी विचार—
प्रतिपदा और नवमी तिथि को योगिनी पूर्व दिशा में रहती है,तृतीया और एकादशी को अग्नि कोण में त्रयोदशी को और पंचमी को दक्षिण दिशा में चतुर्दशी और षष्ठी को पश्चिम दिशा में पूर्णिमा और सप्तमी को वायु कोण में द्वादसी और चतुर्थी को नैऋत्य कोण में,दसमी और द्वितीया को उत्तर दिशा में अष्टमी और अमावस्या को ईशानकोण में योगिनी का वास रहता है,वाम भाग में योगिनी सुखदायक,पीठ पीछे वांछित सिद्धि दायक,दाहिनी ओर धन नाशक और सम्मुख मौत देने वाली होती है.

यात्रा हेतु तिथि विचार–
यात्रा के लिये प्रतिपदा श्रेष्ठ तिथि मानी जाती है,द्वितीया कार्यसिद्धि के लिये,त्रुतीया आरोग्यदायक,चतुर्थी कलह प्रिय,पंचमी कल्याणप्रदा षष्ठी कलहकारिणी सप्तमी भक्षयपान सहित,अष्टमी व्याधि दायक नवमी मौत दायक,दसमी भूमि लाभ प्रद,एकादसी स्वर्ण लाभ करवाने वाली,द्वादसी प्राण नाशक,और त्रयोदसी सर्व सिद्धि दायक होती है,त्रयोदसी चाहे शुक्ल पक्ष की हो या कृष्ण पक्ष की सभी सिद्धियों को देती है,पूर्णिमा एवं अमावस्या को यात्रा नही करनी चाहिये,तिथि क्षय मासान्त तथा ग्रहण के बाद के तीन दिन यात्रा नुकसान दायक मानी गयी है.

पंथा राहु विचार—
दिन और रात को बराबर आठ भागों में बांटने के बाद आधा आधा प्रहर के अनुपात से विलोम क्रमानुसार राहु पूर्व से आरम्भ कर चारों दिशाओं में भ्रमण करता है,अर्थात पहले आधे प्रहर पूर्व में दूसरे में वाव्य कोण में तीसरे में दक्षिण में चौथे में ईशान कोण में पांचवें में पश्चिम में छठे में अग्निकोण में सातवें में उत्तर में तथा आठवें में अर्ध प्रहर में नैऋत्य कोण में रहता है.

राहु आदि का फ़ल—
राहु दाहिनी दिशा में होता है तो विजय मिलती है,योगिनी बायीं तरह सिद्धि दायक होती है,राहु और योगिनी दोनो पीछे रहने पर शुभ माने गये है,चन्द्रमा सामने शुभ माना गया है.

यात्रा या वार परिहार–
रविवार को पान,सोमवार को भात (चावल),मंगलवार को आंवला,बुधवार को मिष्ठान,गुरुवार को दही,शुक्रवार को चटपटी वस्तु और शनिवार को माह यानी उडद खाकर यात्रा पर जाने से दिशा शूल या काम नही बिगडता है.

दिशाशूल परिहार–
रविवार को घी पीकर,सोमवार को दूध पीकर,मंगलवार को गुड खाकर,बुधवार को तिल खाकर,गुरुवार को दही खा कर शुक्रवार को जौ खाकर और शनिवार को उडद खाकर यात्रा करने से दिशाशूल का दोष शान्त माना जाता है.

राहु विचार—
रविवार को नैऋत्य कोण में सोमवार को उत्तर दिशा में,मंगलवार को आग्नेय कोण में,बुधवार को पश्चिम दिशा में,गुरुवार को ईशान कोण में,शुक्रवार को दक्षिण दिशा में,शनिवार को वायव्य कोण में राहु का निवास माना जाता है.

चन्द्रबल विचार—
पहला चन्द्रमा कल्याण कारक,दूसरा चन्द्रमा मन संतोष दायक,तीसरा चन्द्रमा धन सम्पत्ति दायक,चौथा चन्द्रमा कलह दायक,पांचवां चन्द्रमा ज्ञान दायक,छठा चन्द्रमा सम्पत्ति दायक,सातवां चन्द्रमा राज्य सम्मान दायक,आठवां चन्द्रमा मौत दायक,नवां चन्द्रमा धर्म लाभ दायक,दसवां चन्द्रमा मन इच्छित फ़ल प्रदायक,ग्यारहवां चन्द्रमा सर्वलाभ प्रद,बारहवां चन्द्रमा हानि प्रद होता है,यात्रा विवाह आदि कार्यों को आरम्भ करते समय चन्द्रबल का विचार करना चाहिये.

घात चन्द्र विचार—
मेष की पहली वृष की पांचवी मिथुन की नौवीं कर्क की दूसरी सिंह की छठी कन्या की दसवीं तुला की तीसरी वृश्चिक की सातवीं धनु की चौथी, मकर की आठवीं कुम्भ की ग्यारहवीं मीन की बारहवीं घडी घात चन्द्र मानी गयी है,यात्रा करने पर युद्ध में जाने पर कोर्ट कचहरी में जाने पर खेती में कार्य आरम्भ करने पर व्यापार के शुरु करने पर घर की नीव लगाने पर घात चन्द्र वर्जित मानी गयी है,घात चन्द्र में रोग होने पर मौत,कोर्ट में केस दायर करने पर हार,और यात्रा करने पर सजा या झूठा आरोप,विवाह करने पर वैधव्य होना निश्चित है.

यात्रा में सूर्य विचार—
गत रात्रि के अन्तिम प्रहर से आरम्भ करके दो दो प्रहर तक सूर्य पूर्वादि दिशाओं में भ्रमण करता है,यात्रा के समय सूर्य को दाहिने और बायें तथा प्रवेश के समय पीछे शुभ माना गया है.

कुलिक विचार—
रविवार को चौदहवां सोमवार को बारहवां,मंगलवार को दसवां बुधवार को आठवां,बृहस्पतिवार को छठा और शुक्र वार को चौथा शनिवार को दूसरा मुहूर्त कुलिक संज्ञक होता है,यह मुहूर्त अशुभ माना जाता है.

कालहोरा ज्ञान—
सोमवार को इष्टघटी ग्यारह हो तो इसको दो से गुणा करने पर बाइस होते है,इसमें पांच का भाग देने पर शेष दो बचते है,इस शेष दो को बाइस में से घटाने पर बीस शेष बचते है,इसमे एक जोडने पर इक्कीस होते है,दहाई और इकाई को जोडने पर तीन का लाभ मिलता है,तीन का इक्कीस में भाग देने पर लभति सात आती है,सोमवार से सातवीं कालहोरा रविवार की होती है.

कालहोरा ज्ञात करने की दूसरी विधि—
कालहोरा ज्ञान की दूसरी विधि है कि जिस दिन कालहोरा का ज्ञान करना हो,उस दिन के क्रम से इक्कीस इक्कीस घडी का प्रमाण कालहोरा सूर्य,शुक्र,बुध,चन्द्र,शनि,गुरु और मंगल इस क्रम से गिनकर समझ लें,शुभ ग्रह की होरा को शुभ तथा पाप ग्रह की होरा को अशुभ समझना चाहिये,जैसे सोमवार की इष्टघडी इक्कीस में किसकी काल होरा होगी? यह जानने के लिये दो सौ ग्यारह घडी के प्रमाण से ग्यारह घडी इष्टघडी में पांच वीं होरा हुयी,वह सोमवार से चन्द्र एक शनि दो गुरु तीन मंगल चार और सूर्य पांच वीं होरा हुयी,उस समय में सूर्यवार का कर्तव्य मानना चाहिये.

नासिका विचार—
नासिका का बांया स्वर चन्द्र तथा दाहिना स्वर सूर्य संज्ञक होता है,चन्द्र स्वर यात्रा करना शुभ और सूर्य स्वर में अशुभ मानते है,जो स्वर बह रहा हो,उसी ओर का पैर पहले उठाकर यात्रा करने से विजय प्राप्त होती है,जब दोनो स्वर एक साथ चलते हों तो शून्य स्वर कहलाता है,उस समय में यात्रा करना हानिकारक होता है,यह यात्रा शब्द का बोध दैनिक जीवन यात्रा से भी जुडा होता है,यानी जब हम सबसे पहले अपनी रोजाना की जीवन यात्रा से भी मानकर चलते है,और सुबह जाग कर बिस्तर से पैर को नीचे रखने से ही यात्रा का शुभारम्भ हो जाता है.

सर्वांक ज्ञान—
शुक्र पक्ष की प्रतिपदा से तिथि संख्या रविवार से वार संख्या और अश्विनी नक्षत्र से नक्षत्र संख्या अपने अपने अनुसार अलग अलग जगह पर लिखते है,फ़िर २,३,४ से गुणा करने के बाद ३,७,८ से भाग देते है,प्रथम स्थान पर शून्य शेष रहे तो हानि द्वितीय स्थान में शून्य रहे तो शत्रु भय और तृतीय स्थान में शून्य रहे तो मरण होता है,तीनो स्थान में शून्य हो तो विजय मिलती है.

वत्स दिशा विचार–
भाद्रपद मास से प्रारम्भ कर तीन तीन महीने तक वत्स पूर्व आदि दिशाओं मे रहता है,अर्थात भाद्रपद,अश्विन,कार्तिक मास में पूर्व में अगहन,पौष,माघ में दक्षिण दिशा में,फ़ाल्गुन,चैत्र,बैसाख मास में पश्चिम में,और ज्येष्ट,आषाड,और श्रावण मास में उत्तर दिशा में निवास करता है,यात्रा,विवाह,गृहद्वार निर्माण बडे लोगों से भेंट और कोर्ट केश आदि में सम्मुख वत्स विचार वर्जित माना जाता है.

कुत्ते के द्वारा शुभाशुभ शकुन विचारने का नियम—
कुत्ता आज के जमाने में प्रत्येक घर में मिल जाता है,और सभी को पता है कि कुत्ता की अतीन्द्रिय जागृत होती है,किसी भी होनी अनहोनी को वह जानता है,अद्र्श्य आत्मा को देखने और किसी भी बदलाव को सूंघ कर जान लेने की क्षमता कुत्ते के अन्दर होती है,कुत्ते को दरवेश का दर्जा दिया गया है,समय असमय को बताने में कुत्ता अपनी भाषा में इन्सान को बताने की कोशिश करता है,और जो कुत्ते की भाषा को समझते है,वे अनहोनियों से बचे रहते है,और जो मूर्ख होते है,और अपने को जबरदस्ती हानि की तरफ़ ले जाना चाहते है वे उसकी भाषा को बकवास कह कर टाल देते है,कुत्ता अगर यात्रा के शुरु करते ही किसी कचडे पर पेशाब करता है,तो जान लीजिये कि यात्रा या शुरु किया जाने वाला कार्य सफ़ल है,यदि किसी सूखी लकडी पर पेशाब करता है,तो भौतिक धन की प्राप्ति होती है,अगर कुत्ता कांटेदार झाड पर,पत्थर या राख पर पेशाब करने के बाद काम शुरु करने वाले के आगे चल दे तो वह कार्य खराब हो जाता है,यदि कुत्ता किसी कपडे को लाकर सामने खडा हो तो समझना चाहिये कि कार्य सफ़ल है,यदि कुत्ता कार्य शुरु करने वाले के पैर चाटे,कान फ़डफ़डाये,अथवा काटने को दौडे तो समझना चाहिये कि सामने काफ़ी बाधायें आ रही है,यदि कुत्ता यात्रा के समय या काम शुरु करने के समय अपने शरीर को खुजलाना चालू कर दे तो जान लेना चाहिये के वह कार्य करने अथवा यात्रा पर जाने से मना कर रहा है,यदि कुत्ता किसी कार्य को शुरु करते वक्त या यात्रा पर जाते वक्त चारों पैर ऊपर की तरफ़ करके सोये तो भी कार्य या यात्रा नही करनी चाहिये,यदि गली मोहल्ले के आवारा कुत्ते किसी भी समय ऊपर की तरफ़ मुंह करके रोना चालू करें तो समझना चाहिये कि उस गली या मोहल्ले के प्रमुख व्यक्ति पर कोई मुशीबत आने वाली है,यात्रा करने के साथ या काम करने के साथ कुत्ते आपस में लड पडें तो भी काम या यात्रा में विघ्न पैदा होता है,कुत्ते के कान फ़डफ़डाने का समय सभी कामों के लिये त्यागने में ही भलाई होती है,कुत्ता अगर बैचैन होकर इधर उधर भागना चालू करे,तो समझना चाहिये कि कोई आकस्मिक मुशीबत आ रही है,किसी बात को सोचने के पहले या धन खर्च करते वक्त अगर कुत्ता अपनी पूंछ को पकडने की कोशिश करता है,तो मान लेना चाहिये कि आपने अपने भविष्य के लिये नही सोचा है,और खर्च करने के बाद पछताना पडेगा,कुत्ता अगर सुबह के समय लान या बगीचे में घास खा रहा हो तो समझ लेना चाहिये कि घर के अन्दर जो खाना बना है,उसमे किसी प्रकार इन्फ़ेक्सन है,कुत्ता अगर जूता लेकर भाग रहा हो तो समझना चाहिये कि वह बाहर जाने से रोक रहा है,लडकी के अपने ससुराल जाने के वक्त अगर कुत्ता रोना चालू कर दे,तो समझना चाहिये कि लडकी को ससुराल से वापस आने में संदेह है,कुत्ता अगर मालिक के पैर के पास जाकर सोना चालू कर दे तो समझना चाहिये कि घर में किसी सदस्य के आने का संकेत है,कुत्ता अगर अपने खुद के पैर चाटना चालू करे तो यात्राओं की शुरुआत समझनी चाहिये,कुत्ता अगर एकान्त में बैठना चालू कर दे,और बुलाने से आने में आनाकानी करे तो समझना चाहिये कि घर मे किसी सदस्य के लम्बी बीमारी में जाने का संकेत है,कुत्ता अगर पूंछ नीचे डालकर मुख्य दरवाजे के पास कुछ खोजने का प्रयत्न कर रहा हो तो समझना चाहिये कि कोई कर्जा मांगने वाला आ रहा है,कुत्ता अगर भोजन करते वक्त बार बार बाहर और अन्दर भाग रहा हो तो समझना चाहिये कि भोजन और कोई करने आने वाला है.

सूर्य-साधना—

ज्योतिष की आंख सूर्य है,सूर्य साधना करने के बाद ही ज्योतिष का अंतरंग ज्ञान प्राप्त हो सकता है,सूर्य साधना कैसे की जाती है इसका विवेचन करने के लिये प्रयास किया है,किसी भी भूल को विद्वजन क्षमा करने की कृपा करेंगे और सुधार की प्रेरणा देंगे।
सूर्य मंत्र–

“ऊँ घृणि: सूर्य आदित्याय: नम:” यह सूर्य का मंत्र है।
सूर्य का पूजन यंत्र–

सूर्य यंत्र को अष्टगंध से बनी स्याही से भोजपत्र या तांबे की चौकोर प्लेट पर बनाकर पूजन के लिये स्थापित किया जाता है।

पूजा-विधि—

रविवार को प्रात:काल प्राणायाम आदि प्रात:कालीन क्रियाओं से निवृत होकर “पीठ-न्यास” करना चाहिये,न्यास में विशेषता यह है कि-’ह्रदय का पूर्वादि दिशाओं के भीतर प्रभुता,विमला,सारा,समारा,परमसुखा इन आधार शक्तियों का “अयं सूर्यमण्डलायदशकलात्मने नम:” इस प्रकार से न्यास करना चाहिये।आवरण पूजा हेतु श्रीसूर्ययंत्र का चित्र बनाकर उसे रखें। पहले दिशाओं में पीठ शक्तियों की पूजा करे,फ़िर प्रभूत विमल सार रूपा आधार शक्तियों का यजन करें,अन्त मे परमादि सुखम्पीठ स्वबिम्बान्त को कल्पित करें,फ़िर केशर के मध्य में “रां दीप्तायै नम:,रीं सूक्ष्मायै नम:,रूं जयायैनम:,रें भद्रायै नम:,रैं विभूत्यै नम:,रों विमलायै नम:,रौं अमौघाये नम:,रं विद्युतायै नम:,र: सर्व्वतोमुख्ये नम:” इस प्रकार पीठ शक्तियों का यजन करना चाहिये।
पीठ शक्तियों में दीप्ता,सूक्ष्मा,जया,भद्रा,विभूति,विमला,अमोघा,विद्युता,सर्वतोमुखी यह नौ पीठ शक्तियां मानी जाती है।

ऋष्यादि-न्यास–

इसके पश्चात ऋष्यादि न्यास करना चाहिये,शिरसिदेवभाग ऋषये नम:,मुखे गायत्रीछंदसे नम:,ह्रदि आदित्यायदेवत्यै नम: इस मंत्र के देवभाग ऋषि गायत्री छंद तथा दृष्ट्यादृष्ट के फ़ल देने वाले आदित्य देवता हैं।

करांग-न्यास—

इसके बाद करांग न्यास करना चाहिये,यथा- “सत्यायेतोजी ज्वालामणुहं फ़ट स्वाहा अंगुष्ठाभ्याम नम:। ब्रह्मणे तेजोज्वालामणे हुं तर्ज्जनीभ्यां स्वाहा। विष्णवेतेजोज्वालामणे हुं मध्यमाभ्यां
व्वषट। रुद्रायतेजो ज्वालामणे हुं अनामिकाभ्यां हुम। आग्नये तेजोज्वालामणे हुं कनिष्ठाभ्यांव्वौषट। सर्व्वायतेजोज्वालामणे हुं करतलपृष्ठभ्यांफ़ट। करन्यास के यही मंत्र है,एलिन उच्चारण का विशेष ध्यान देना चाहिये,हो सके तो साफ़ शुद्ध स्थान पर बैठ कर इन मंत्रों को उच्चारण के लिये पहले से ही प्रयास कर लेने से अशुद्धि का कोई भाव नही रह जाता है।

मूर्ति-न्यास–
इसके बाद मूर्ति का न्यास करना चाहिये,मूर्ति के लिये जो यंत्र बनाया हुआ है उसी का न्यास होता है,”ऊँ शिरसि आदित्याय नम:। मुखे ऐं रवये नम:। ह्रदये ऊँ भानवे नम:। गुह्ये इं भास्कराय नम:। चरणयों: अं सूर्याय नम:। निबन्ध के अनुसार न्यास की विधि इस प्रकार से है -”शिरसि ऊँ नम:। आस्ये ऊँ घृ नम:। कण्ठे ऊँ णि नम:। ह्रदि ऊँ सू नम:। कुक्षौ ऊँ र्य नम:। नाभौ ऊँ आ नम:। लिंगे ऊँ दि नम:। पादयो ऊँ त्य नम:। का रूप बताया गया है यह श्रद्धा के ऊपर निर्भर है कि पूजा में कौन सा भाव किस व्यक्ति के अन्दर प्रवेश करता है।

ध्यान के मंत्र–

ध्यान के मंत्र इस प्रकार से है,-”रक्ताब्जयुग्माभयदान हस्तंकेयूरहारांगद कुंडलाढ्यम। माणिक्य मोलिन्दिन नाथमीद्रेबन्धूककान्तिब्बिलसत्रिनेत्रम।”इस प्रकार से ध्यान करने के बाद मानसी पूजा करें,फ़िर कुंभ की स्थापना करेम,फ़िर गुरु की पूजा करने के बाद पीठ की पूजा करें,”ऊँ खं खखोल्काय नम:” मंत्र का मूर्ति में संकल्प करके पुनर्वार ध्यान करें,तथा आवाहनादि पंचपुष्पांजलिदान पर्यन्त विधिपूर्वक आवरण पूजा करें। निबन्ध में कहा है-”तारादि खंखखोल्काय मनुना मूर्ति कल्पना। साक्षिणं सर्ब्बलोकानान्तस्या मावाहयं पूजयेत॥” केसर में आग्न्यादि कोण के भीतर “सत्याय तेजोज्वालामणि हुं फ़ट स्वाहा ह्रदयाय नमं। ब्रह्मणे तेजोज्वालामणि हुं फ़ट स्वाहा शिरसे स्वाहा। विष्णवे तेजोज्वालामणि हुं फ़ट स्वाहा शिखाये वषट। रुद्राय तेजोज्वालामणि हुं फ़ट स्वाहा कवचाय हुम। अग्नये तेजो ज्वालामणि हुं फ़ट स्वाहा नेत्र त्राय वौषट। सर्व्वाय तेजोज्वालामणि हुं फ़ट स्वाहा अस्त्राय फ़ट। इस तरह से पूजा करने के बाद यंत्र के भीतर जो दल बने हुये है उनकी पूजा की जाती है।
पत्र के भीतर ब्रह्मा और अरुण की पूजा करें,तथा बाहरी भाग में ग्रहों की पूजा करें।
“ऊँ चन्द्राय नम:,ऊँ मंगलाय नम:,ऊँ बुद्धाय नम:,ऊँ बृहस्पतये नम:,ऊँ शुक्राय नम:,ऊँ शनिश्चराय नम:,ऊँ राहुवे नम:,ऊँ केतुवे नम: शारदा तंत्र में कहा गया है कि सूर्य के मंत्र का आठ लाख जाप करना चाहिये और उसका दशांश हवन करना चाहिये। मंत्र जाप के साथ में सूर्य कवच स्तोत्र आदि का पठन भी कल्याणकारी होता है।

पितर पूजा से शुरु हुआ “धर्म”—

मानवजाति के भाग्य निर्माण मे जितनी शक्तियों ने योगदान दिया है और दे रही हैं,उन सब में धर्म के रूप में प्रकट होने वाली शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण कोई नही है। सभी सामाजिक संगठनों के मूल में कही न कहीं यही अस्भुत शक्ति काम करती रही है,तथा अब तक मानवता की विविध इकाइयों को संघटित करने वाली सर्वश्रेष्ठ प्रेरणा इसी शक्ति से प्राप्त हुयी है। हम सभी जानते है कि धार्मिक एकता का सम्बन्ध प्राय: जातिगत जलवायुगत तथा वंशानुगत एकता के सम्बन्धो से भी द्रढतर सिद्ध होता है।यह सर्वविदित तथ्य है कि एक ईश्वर को पूजने वाले तथा एक धर्म में विश्वास करने वाले लोग जिस द्रढता और शक्ति से एक दूसरे का साथ देते हैं,एक ही वंश के लोगों की बात तो क्या भाई भाई में भी देखने को नही मिलती है। धर्म के प्रादुर्भाव को समझने के लिये अनेक प्रयास किये गये है,अब तक हमें जितने प्राचीन धर्मों का ज्ञान है वे सब एक यह दावा करते है कि वे सभी अलौकिक हैं,मानो उनका उद्भव मानव मष्तिस्क से नही बल्कि उस स्तोत्र से हुया जो उनके बाहर है। आधुनिक विद्वान दो सिद्धान्तों के बारे में कुछ अंश तक सहमत है,एक है धर्म का आत्मामूलक सिद्धान्त और दूसरा असीम की धारणा का विकासमूलक सिद्धान्त। पहले सिद्धान्त के अनुसार पूर्वजों की पूजा से ही धार्मिक भावना का विकास हुआ,दूसरे के अनुसार प्राकृतिक शक्तियों को वैयक्तिक स्वरूप देने धर्म का प्रारम्भ हुआ। मनुष्य अपने दिवंगत सम्बन्धियों की स्मृति सजीव रखना चाहता है,और सोचता है कि यद्यपि उनके शरीर नष्ट हो चुके है,फ़िर भी वे जीवित है। इसी विश्वास पर वह उनके लिये खाद्यपदार्थ रखना तथा एक अर्थ में उसकी पूजा करना चाहता है। मनुष्य की इस भावना से धर्म का विकास हुआ। मिस्त्र बेबीलोन चीन तथा अमेरिका आदि के प्राचीन धर्मों के अध्ययन से ऐसे स्पष्ट चिन्हों का पता चलता है जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि पितर पूजा से धर्म का अविर्भाव हुया है। प्राचीन मिस्त्रवासियों की आत्मा सम्बन्धी धारणा द्वितत्वमूलक थी। उनका विश्वास था कि प्रत्येक मानव शरीर के भीतर एक और जीव रहता है जो शरीर के ही समरूप होता है और मनुष्य के मर जाने पर भी उसका यह प्रतिरूप शरीर जीवित रहता है,किन्तु यह प्रतिरूप शरीर तभी तक जीवित रहता है,जब तक मृत शरीर को सुरक्षित रखने की प्रथा पाते हैं। और इसी के लिये उन्होने विशाल पिरामिडों का निर्माण किया,जिसमें मृत शरीर को सुरक्षित ढंग से रखा जा सके। उनकी धारणा थी कि अगर इस शरीर को किसी तरह की क्षति पहुंची तो उस प्रतिरूप शरीर को ठीक वैसी ही क्षति पहुंचेगी। यह स्पष्टत: पितर पूजा ही है। बेबिलोन के प्राचीन निवासियों में प्रतिरूप शरीर की ऐसी ही धारणा देखने को मिलती है। यद्यपि वे कुछ अंश में इसे भिन्न है। वे मानते है कि प्रतिरूप शरीर में स्नेह का भाव नही रह जाता है,उसकी प्रेतात्मा भोजन और पेय तथा अन्य सहायताओं के लिये जीवित लोगों को आतंकित करती है। अपनी पत्नी और बच्चों तक के लिये उनके अन्दर कोई प्रेम नही होता है। प्राचीन हिन्दुओ मे भी इस पितर पूजा के उदाहरण देखने को मिलते है। चीन वालों के सम्बन्ध में भी इस पितर पूजा की मान्यता देखी जाती है और आज भी व्याप्त है। अगर चीन में कोई धर्म माना जा सकता है तो केवल पितर पूजा ही मानी जा सकती है। इस तरह से ऐसा प्रतीत होता है कि धर्म पितर पूजा से विकसित मानने वालों का आधार काफ़ी मजबूत है। किन्तु कुछ ऐसे विद्वान है जो प्राचीन आर्य साहित्य के आधार पर सिद्ध करते है कि धर्म का अविर्भाव प्रकृति की पूजा से हुआ,यद्यपि भारत में पितरपूजा के उदाहरण सर्वत्र देखने को मिलते है,तथापि प्राचीन ग्रंथों में इसकी किंचित चर्चा भी नही मिलती है। आर्य जाति के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद संहिता में इसका कोई उल्लेख नही है,आधुनिक विद्वान उसमे प्रकृति पूजा के ही चिन्ह पाते है। मानव मस्तिष्क जो प्रस्तुत द्रश्य के परे है,उसकी एक झांकी पाने के लिये आकुल प्रतीत होता है,उषा संध्या चक्रवात प्रकृति की विशाल और विराट शक्तियां उसका सौंदर्य इस सबने मानव मस्तिष्क के ऊपर ऐसा प्रभाव डाला कि वह इन सबके परे जाने की और उसे समझने की आकांक्षा करने लगा। इस प्रयास में मनुष्य ने इन द्रश्यों में वैयक्तिक गुणों का आरोपण करना शुरु कर दिया,उन्होने उनके अन्दर आत्मा और शरीर की प्रतिष्ठा की,जो कभी सुन्दर और कभी परात्पर होते थे,उनको समझने के हर प्रयास में उन्हे व्यक्तिरूप दिया गया,या नही दिया गया,किन्तु उनका अन्त उनको अमूर्त रूप कर देने में हुआ। ठीक ऐसी ही बात प्राचीन यूनानियों के सम्बन्ध में हुयी,उनके तो सम्पूर्ण पुराणोपाख्यान अमूर्त प्रकृति पूजा ही है। और ऐसा ही प्राचीन जर्मनी तथा स्केंडिनेविया के निवासियों एवं शेष सभी आर्य जातियों के बारे में भी कहा जा सकता है। इस तरह प्रकृति की शक्तियों का मानवीकरण करने में धर्म का आदि स्तोत्र मानने वालों का भी यश काफ़ी प्रबल हो जाता है। यद्यपि दोनो सिद्धान्त परस्पर विरोधी लगते है,किन्तु उनका समन्वय एक तीसरे आधार पर किया गया जा सकता है,जो मेरी समझ में धर्म का वास्तविक बीज है। और जिसे मैं इन्द्रियों की सीमा का अतिक्रमण करने के लिये संघर्ष मानता हूँ,एक ओर मनुष्य अपने पितरों की आत्माओं की खोज करता है,मृतकों की प्रेतात्माओं को ढूंढता है,अर्थात शरीर के विनष्ट हो जाने पर भी वह जानना चाहता है कि मौत के बाद क्या होता है,दूसरी ओर मनुष्य प्रकृति की विशाल द्रश्यावली के पीछे काम करने वाली शक्ति को समझना चाहता है,इन सब बातों से लगता है कि वह इन्द्रियों की सीमा से बाहर जाना चाहता है,वह इन्द्रियो से संतुष्ट नही है,वह इनसे भी परे जाना चाहता है।इस व्याख्या को रहस्यात्मक रूप देने की आवश्यक्ता नही है। मुझे तो यह स्वाभाविक लगता है कि धर्म की पहली झांकी स्वप्न में मिली होगी। मनुष्य अमरता की कल्पना स्वप्न के आधार पर कर सकता है।कैसी अद्भुत है यह स्वप्न की अवस्था ! हम जानते है कि बच्चे और कोरे मस्तिष्क वाले लोग स्वप्न और जाग्रत में भेद नही समझते है,उनके लिये साधारण तर्क के रूप में इससे अधिक और क्या स्वाभाविक हो सकता है। स्वपनावस्था में जब शरीर प्राय: मृतक जैसा हो जाता है,मन के सारे जटिल क्रिया कलाप चलते रहते है, अत: इसमे क्या आश्चर्य,यदि मनुष्य हठात यह निष्कर्ष निकाल ले कि इस शरीर के विनष्ट हो जाने पर इसकी क्रियायें जारी रहेंगी ? मेरे विचार से अलौकितता की इससे अधिक स्वाभाविक व्याख्या और कोई हो ही नही सकती है। और स्वप्न पर आधारित इस धारणा को क्रमश: विकसित करता हुआ मनुष्य ऊंचे से ऊंचे विचारों तक पहुंचा होगा,हाँ यह भी अवश्य ही सत्य है कि समय पाकर अधिकांश लोगों ने यह अनुभव किया कि ये स्वप्न हमारी जाग्रतावस्था में सत्य सिद्ध नही होते,और स्वप्नावस्था में मनुष्य का कोई आस्तित्व नही हो जाता है,बल्कि वह जाग्रतावस्था के अनुभवों का ही स्मरण करता है।
(स्वामी विवेकानन्द का कथन)

मूल संज्ञक नक्षत्र और उनका प्रभाव—

ज्येष्ठा आश्लेषा और रेवती,मूल मघा और अश्विनी यह नक्षत्र मूल नक्षत्र कहलाये जाते है,इन नक्षत्रों के अन्दर पैदा होने वाला जातक किसी न किसी प्रकार से पीडित होता है,ज्येष्ठा के मामले में कहा जाता है,कि अगर इन नक्षत्र को शांत नही करवाया गया तो यह जातक को तुरत सात महिने के अन्दर से दुष्प्रभाव देना चालू कर देता है। अगर किसी प्रकार से जातक खुद बडा है,तो माता पिता को अलग कर देता है,और खुद छोटा है,तो अपने से बडे को दूर कर देता है,या अन्त कर देता है। यही बात अश्लेशा नक्षत्र के बारे मे कही जाती है कि अगर पहले पद मे जन्म हुया है तो माता को त्याग देता है,दूसरे पाये में पिता को त्याग देता है,तीसरे पाये में अपने बडे भाई या बहिन को और चौथे पाये मे अपने को ही सात दिन,सात महिने,सात साल के अन्दर सभी प्रभावों को दिखा देता है।

अभुक्त मूल विचार—

ज्येष्ठा नक्षत्र की अन्त की दो घडी तथा मूल नक्षत्र की आदि की दो घडी अभुक्त मूल कहलाती है,लेकिन यह बातें तब मानी जाती थीं,जब जातक के माता पिता पहले से ही धर्म कार्यों के अन्दर खुद को लगा कर रखते थे,मगर आज के जमाने में सभी भौतिक कारणों से और सब कुछ पोंगा पंडित की किताब मानने के कारण दोनो नक्षत्रों की चारों ही घडी अभुक्त मूल कहलाने लगी हैं,इन दो नक्षत्रों में पैदा होने वाला जातक अपने मामा या पिता परिवार को बरबाद कर देता है,अथवा खुद ही बरबाद हो जाता है। कर्क लगन मे और कर्क राशि के अन्दर पैदा हुआ जातक अश्लेशा का जातक कहा जाता है,यह पिता के लिये भारी कहा जाता है,माता को परदेश वास देता है,तथा धन के लिये माता को सभी सुख देता है और पिता को मरण देता है।

मूल शांति के उपाय—

ज्येष्ठा मूल या अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक के लिये नीचे लिखे मंत्रों का जाप २८००० जाप करवाने चाहिये,और २८वें दिन जब वही नक्षत्र आये तो मूल शान्ति का प्रयोजन करना चाहिये,जिस मन्त्र का जाप किया जावे उसका दशांश हवन करवाना चाहिये,और २८ ब्राह्मणों को भोजन करवाना चाहिये,बिना मूल शांति करवाये मूल नक्षत्रों का प्रभाव दूर नही होता है।

मंत्र—

ऊँ मातवे पुत्र पृथ्वी पुरीत्यमग्नि पूवेतो नावं मासवातां विश्वे र्देवेर ऋतुभि: सं विद्वान प्रजापति विश्वकर्मा विमन्चतु॥

मूल नक्षत्र का बडा मंत्र यह है,इसके बाद छोटा मंत्र इस प्रकार से है:—-

ऊँ एष ते निऋते। भागस्तं जुषुस्व।

ज्येष्ठा नक्षत्र का मंत्र इस प्रकार से है:—-

ऊँ सं इषहस्त: सनिषांगिर्भिर्क्वशीस सृष्टा सयुयऽइन्द्रोगणेन। सं सृष्टजित्सोमया शुद्धर्युध धन्वाप्रतिहिताभिरस्ता।

आश्लेषा मंत्र—

ऊँ नमोऽर्स्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथ्वीमनु। ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्य: सर्पेभ्यो नम:॥

मूल शांति की सामग्री–

घडा एक,करवा एक,सरवा एक,पांच प्रकार के रंग,नारियल एक,५०सुपारी,दूब,कुशा,बतासे,इन्द्र जौ,भोजपत्र,धूप,कपूर आटा चावल २ गमछे, दो गज लाल कपडा चंदोवे के लिये, मेवा ५० ग्राम, पेडा ५० ग्राम, बूरा ५० ग्राम,केला चार,माला दो,२७ खेडों की लकडी, २७ वृक्षों के अलग अलग पत्ते,२७ कुंओ का पानी,गंगाजल यमुना जल,हरनन्द का जल,समुद्र का जल अथवा समुद्र फ़ेन,आम के पत्ते,पांच रत्न,पंच गव्य वन्दनवार,हल,२ बांस की टोकरी,१०१ छेद वाला कच्चा घडा,१ घंटी २ टोकरी छायादान के लिये,१ मूल की मूर्ति स्वनिर्मित,बैल गाय २७ सेर सतनजा,७ प्रकार की मिट्टी, हाथी के नीचे की घोडे के नीचे की गाय के नीचे की तालाब की सांप की बांबी की नदी की और राजद्वार की वेदी के लिये पीली मिट्टी।

हवन सामग्री—-

चावल एक भाग,घी दो भाग बूरा दो भाग, जौ तीन भाग, तिल चार भाग,इसके अतिरिक्त मेवा अष्टगंध इन्द्र जौ,भोजपत्र मधु कपूर आदि। एक लाख मंत्र के एक सेर हवन सामग्री की जरूरत होती है,यदि कम मात्रा में जपना हो तो कम मात्रा में प्रयोग करना चाहिये।

हीन भावना को समाप्त करने का उपाय—-

जगदीश पुर जिला सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश के एक पाण्डेय जी मेरे पास ज्योतिष के विषय में आते है,उनकी पत्नी भी उनके साथ आती है,पहले वे एक प्राइवेट फ़ैक्टरी में काम करते थे,तन्खाह भी बहुत कम थी,ऊपर से दो बच्चों का पालन पोषण कमरे का किराया सभी कुछ छोटी सी पगार में ही पूरा करना पडता था,बहुत दुखी थे,और अपने को यही कहा करते थे कि बेकार में इस जमीन पर जन्म लिया है,इस तरह से जीने का मतलब तो कुछ निकलता ही नही है,दो बच्चों में भी एक बच्चा बडा बच्चा मंद बुद्धि है,जीवन ही बेकार है,जब भी वे आते अपनी जन्म पत्री को दिखाते,उनकी जन्म पत्री को देखकर मुझे उनके मंगल पर काफ़ी सोचना पडता था,उनका मंगल नकारात्मक राशि वृश्चिक में था,और केतु से द्रश्य था,खून के अन्दर नकारात्मकता,यह साधारण भाव होता है वृश्चिक राशि के मंगल का और ऊपर से केतु जो खुद ही नकारात्मक है का प्रभाव भी मंगल के साथ हो तो एक तो करेला ऊपर से नीम चढा वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है। पाण्डेयजी की पत्नी एक ही बात करतीं कि गुरुजी ऐसी कोई चीज देदो,जिससे मेरे परिवार का भला हो जाये और हम भी अपने समाज में ऊंची स्थिति में जा खडे हों। मुझे बचपन से ही मंत्रों पर पूरा विश्वास रहा है,लेकिन मंत्र के प्रयोग करने पर उसके प्रति की जाने वाली सावधानियां भी ध्यान में रखने वाली होती हैं। कई चक्कर लगाने के बाद मैने उन्हे एक मंत्र दिया और कहा कि वे उस मंत्र को अकेले में ही जाप किया करें,उसका भेद और जाप के समय की इच्छा को भी बता दिया। उन्होने उस मंत्र को तीन महिने बिना किसी रुकावट के अकेले में जाप किया,उनका लडका जो मंदबुद्धि था वह ठीक हो गया,पाण्डेयजी ने फ़ैक्टरी को छोड कर अपना खुद का कपडे का काम कर लिया,उनकी पत्नी ने भी कपडे के काम में अपना हाथ बटाया,मुहल्ले पडौस की औरतों को जो बेकार थीं उन्हे कपडे सिलने का और कढाई आदि का काम दिया,बाजार से बीस रुपया किलो का कपडा खरीद कर लाकर उससे सिलाई की मशीनों से औरतों से विभिन्न डिजायन के कपडे सिलवा कर पाण्डेयजी के द्वारा दुकानों में सप्लाई का काम शुरु कर दिया,दो साल के अन्दर आज उनके पास खुद का मकान है,गांव की गिरवी रखी जमीन भी उन्होने छुडवा ली है और आने वाली तेरह अप्रैल को वे गांव जा रहे है और अपने एक मकान को गांव में भी बनवाने की बात कर रहे थे,उनके मंदबुद्धि वाले लडके की शादी की भी बात चल रही है,उनका लडका छोटा जो सरकारी स्कूल में पढता था और निम्न कोटि के साथियों की सोहबत में आकर साइकिल जैसी चोरी कर चुका था,वह अच्छे स्कूल में पढ रहा है और इस साल दसवीं की परीक्षा भी दे रहा है,अपने फ़ालतू समय में अपने बडे भाई के साथ कपडों को इकट्ठा करना और पिता के साथ काम में हाथ बंटाने का काम भी करता है,दोनो के पास अलग अलग मोटर साइकिलें है। मंत्र जाप की विधि और तरीके तथा जाप के समय की जाने वाली इच्छा के बारे में आपको बता देना चाहता हूँ।

क्या है मंत्रजाप का प्रभाव—

मनुष्य शरीर एक बायोकैमिकल मशीन की तरह से है,यह केवल जैविक तत्वों से ही चलता है,जो तत्व जमीन से उगे होते है,जिन तत्वों के अन्दर भी एक स्वयं की उत्पादित होने की क्षमता होती है,उन्ही तत्वों से शरीर चलता है। शरीर में ग्रहण करने की क्षमताओं में भोजन से शरीर के विकास,पानी से शरीर के लवणों क्षारों और सभी तत्वों की पूर्ति और निकास का काम,वायु से शरीर के तत्वों को आगे पीछे करने का काम,अग्नि से शरीर के अन्दर तत्वों को पकाने और बेकार के तत्वों को जलाने का काम,सभी तत्वों के आपसी संघर्षण करने से उत्पन्न विद्युत के द्वारा भाग्य और दुर्भाग्य को बुद्धिबल से प्रकट करने वाली बात को माना जाता है। शरीर में आंखे प्रकाश के विभिन्न रूपों से शक्ति को ग्रहण करती है,नाक हवा में उपस्थित शक्तियों को ग्रहण करती है,कान धरातलीय कर्षण विकर्षण से उत्पन्न आवाजों से शक्ति को ग्रहण करते है,जीभ विभिन्न स्वरों को पैदा करने के बाद शरीर के अन्दर ग्राह्य तन्त्रिका तंत्र को मजबूत करती है और उन अणुओं को खोलने का काम करती है जो पहले खोले नही गये है अथवा खोले तो गये है लेकिन समयावधि के बाद बे स्वत: बन्द हो गये है,इसके साथ ही जीभ और ह्रदय के आपसी तालमेल से स्वाद,रस,वाणी,कर्मेन्द्रियों का साथ देना भी जीभ का काम है। मंत्र जाप का रूप उसी प्रकार से माना जा सकता है जिस प्रकार से कम्पयूटर के कीबोर्ड पर विभिन्न बटनो को दबाने से विभिन्न काम होते है।

हीन भावना से दूर होने का मंत्र—

हीन भावना से ग्रसित व्यक्ति को अपने को एक घंटे के लिये एकान्त कमरे मे ले जाना चाहिये,वह समय कोई भी हो,दिन या रात सुबह या शाम जो भी उसके लिये उपयुक्त हो। दिमाग के अक्ष को साधने के लिये अक्षर “क्ष” का प्रयोग करने के लिये उसके सभी रूपों का उच्चारण जीभ और ह्रदय से एक साथ चलाना चाहिये। मतलब जाप करते वक्त जीभ की गति स्थिर होकर चले,लेकिन जोर से बोलना,आवाज निकालना आदि नही हो,इस प्रकार से मंत्र को जाप करते वक्त केवल यही ध्यान रखना चाहिये कि “मैं समर्थ हूँ,यह प्रकृति मेरे साथ है,मैं अपने को अमुक काम में अमुक व्यक्ति के साथ अमुक व्यक्ति के ठीक होने अमुक समय तक समर्थ होना चाहता हूँ”.इस सोच के साथ जो मंत्र है वह इस प्रकार से है,-”क्षं क्षां क्षिं क्षीं क्षुं क्षूं क्षृं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्ष:” इस मंत्र का फ़ल तीन महिने में साक्षात सामने आने लगता है,लेकिन मंत्र जाप के समय अन्य चिन्तायें नही होनी चाहिये,पेशाब पानी अन्य शरीर की गतियों को पहले से ही पूर्ण करने के बाद ही इसका जाप करना चाहिये। जब सभी इच्छायें पूरी होने लगें तो भी इस मंत्र को नही त्यागना चाहिये,यह ही अक्ष या यक्ष का मंत्र बोला जाता है,जिससे शरीर का मुख्य बिन्दु जागृत हो जाता है और शरीर के वे अणु धीरे धीरे खुलने लगते है जो उन्नति के लिये प्राय: बन्द हो गये होते है या पहले से खोले ही नही गये होते है। अपने अनुभव जरूर लिखते रहें जिससे नये आगुन्तकों को भी आपके किये जाने वाले प्रयासों से सफ़लता की तरफ़ जाने की दिशा मिलती रहे।

मंगल देता है सजा—

मंगल खून और मज्जा का स्वामी है,कानों में बैठ कर सुनने का बल देता है,तथा मनोबल को कुछ भी पास में नही रहने पर बनाये रखता है।मंगल लडाई झगडे का कारक भी है,इसलिये पुलिस मिलट्री आदि रक्षा संस्थानो में नौकरी करवाने का सहायक भी है। इसका रंग लाल है,यदि यह जोश नही पैदा करे तो संसार में लडाई झगडे आदि नही हो सकते है। पिछले जीवन में (जो जीवन बीत गया है) अच्छे काम करने परोपकार करने के कारण यह मंगल फ़ौज मिलट्री डाक्टरी और इन्जीनियरिंग होटल आदि के व्यवसाय से शान शौकत देता है,तकनीकी क्षेत्रों में ख्याति और नाम देता है,लेकिन जब मंगल को बिगाडना होता है तो राहु अपना बल जातक को देने लगता है,जातक को शराब पीने की आदत पड जाती है पुरुष है तो स्त्री को और स्त्री है तो पुरुष को प्रताडना देना शुरु कर देता है। उसके गलत सम्बन्ध बनने लगते है,वह अन्य स्त्रियों या पुरुषों में अपने मन को लगाने लगता है,अपने पराक्रम का दुरुपयोग करने लगता है,यह कारण भी माना जाता है कि बुध अगर मंगल के साथ कहीं से भी सम्बन्ध रखता है तो उसकी सामाजिक पोजीसन के साथ साथ आगे की सन्तान जीवन सभी कुछ बरबाद कर देता है। वैसे बुध और मंगल सूर्य के मित्र है लेकिन बुध जब मंगल को सहायता देने लगे तो वह सूर्य को भी गर्त में डालने में नही चूकता है। बुध मंगल को गर्त मे ले जाने के लिये चन्द्र और शनि की सहायता लेता है,राहु उसके ऊपर हावी होता है,वह अपने को सुपीरियर समझने लगता है। मंगल का प्रभाव अक्सर परिवार की तबाही के लिये जिम्मेदार भी माना जाता है,जातक पर जब राहु का नशा चढता है तो वह अपने नेक मंगल को भी बद मंगल में बदल देता है। वह किसी प्रकार की पदवी पाकर अपने पराक्रम का दुरुपयोग करने लगता है,धन के नशे में चूर होकर अपने धन को और अधिक बढाने के लिये नये नये पाप करने लगता है,किसी प्रकार से उसकी इच्छा शान्त नही होती है,खून खराबी मारपीट लूटपाट आदि करने में उसे कतई हिचकिचाहट नही होती है,खून खराबा करने के बाद अपने व्यवसाय को बढाने लगता है,और अहंकार के मद में दया और धर्म को दरकिनार कर देता है,अपने मद में वह लुटेरों की फ़ौज इकट्टी कर लेता है,दूसरों से पैसा लेकर हत्या करवाना,डाकुओं की संगति में रहकर लूटपाट और निर्दोष लोगों की हत्या करना आदि उसके मुख्य व्यवसाय बन जाते है,अपने अहम के कारण अपने ही लोगों को बरबाद करना घर और गांव को बरबाद कर देना,शहर के अन्दर आतंक फ़ैलाकर अपने नाम और शौहरत के लिये कुछ भी करवा देना आदि बातें मंगल के बद होने से और राहु की संगति के कारण बन जाते है। बद मंगल वाला अधिकतर मामलों में हथियारों की नोक पर धन कमाने का काम करने लगता है,जो भी धन मिलता है उसका पूर्ण रूप से दुरुपयोग करने लगता है,शास्त्र धर्म की आज्ञा को एक तरफ़ रख देता है,और जघन्य से जघन्य अपराध करना शुरु कर देता है। प्रकृति सभी बातों के संतुलन के लिये अपने अपने हथियार समय पर प्रयोग करती है,जब व्यक्ति को अधिक मद हो जाता है तो वह अपने ही हथियास से उसे काट देती है,कितना ही चालाक या बल वाला हो लेकिन प्रकृति के हथियार के वार से वह बच नही सकता है। इसके के लिये प्रकृति ने मंगल को ही उसे सजा देने के लिये नियुक्त किया हुआ है,जैसे ही वह प्रकृति के संतुलन को बिगाडने की कोशिश करता है,उसे मंगल आजीवन कष्ट देने के लिये अपनी योग्यता को देने लगता है,एक ही जन्म में नही वह दूसरे जन्मों में भी अपनी की गयी करतूतों को भुगतने के लिये मजबूर होता है। जब तक उसके पापों का प्रायश्चित नही हो जाता है मंगल उसे अस्पताल में रगडता है,घर की संतान को अपंग लूला लंगडा अपाहिज मंदबुद्धि बना देता है,पुत्री संतान को वह चरित्र हीन बना देता है उसका ही जीवन साथी उसे कदम कदम पर धोखा देने लगता है,हाथ पैर या किसी अंग से अपाहिज बनाकर दर दर की ठोकरें खाने के लिये मजबूर कर देता है। जब तक मंगल उसके पिछले कृत्यों की सजा पूरी नही कर लेता है तब तक जातक का पिंड नही छोडता है। जातक सोचता है कि मैने तो कभी पाप नही किया है,मैं धार्मिक हूँ मैं पूजापाठ में मन लगाता हूँ,मै समाज की सेवा करता हूँ,फ़िर उसे कष्ट क्यों मिल रहे है। इस प्रकार के जातक अपने पूर्व जन्मों का भुगतान प्राप्त कर रहे होते हैं। इसकी पहिचान के लिये देखा गया है कि जातक पहले तो धन सम्बन्धी काम करता है,फ़िर घर में ही अस्पताल या इन्जीनियरिंग के अथवा भोजन पका कर बेचने का काम शुरु करता है,फ़िर सरकारी कामो की ठेकेदारी या राजनीति में हिस्सा लेकर अपने को राजनीतिक बना लेता है,उस के बाद उसके घर में अधिक ध्यान नही देने और अपने बच्चों और पत्नी को सही रूप से नही संभालने के कारण वे रास्ता भटक जाते है,कभी कभी वह अपने बच्चों के साथ बैठता है तो वह अपने ही परिवार के प्रति उनके दिल में बुरी भावनायें भरता है,जिससे समय पडने पर और बच्चों को कष्ट के समय कोई परिवार वाला भी उनके साथ नही आ पाये,यह सब होने के बाद मंगल सीधे से उसे किसी बडे अस्पताल या जेलखाने में पहुंचाने का बन्दोबस्त कर देता है जहां जातक भरपूर शक्तिवान होते हुये भी गंदगी भरे वातावरण में रहने को मजबूर हो जाता है। मंगल सबसे बडा दण्ड यह देता है कि वह जातक का मनोबल गिरा देता है,जिससे वह सारी उम्र घर के अन्दर पडा रहता है या फ़िर जेल खाने या अस्पताल में सडता रहता है।

वर्तमान मे मंगल का स्थान भारतवर्ष की कुंडली में नवम भाव मे सूर्य के साथ है,सूर्य भारत की आत्मा के रूप में है और भारत की आत्मा भारत के दाहिने भू-भाग में स्थापित है। भारत की कुंडली में शनि कन्या राशि का होकर वर्तमान में पंचम भाव मे है जो भारत की आत्मा को अपने अन्धकार और ठंडक से कलुषित कर रहा है,जन जीवन में भ्रष्टाचार और अनैतिकता से कितने ही दोष उपस्थित होकर सामने आ रहे है,यही मंगल भारत वर्ष की कुण्डली में दूसरे भाव में है जो धन और कुटुम्ब का कारक कहा जाता है, मिथुन राशि में होने के कारण यह कमन्यूकेशन के मामले में अपनी तकनीकी बुद्धि को प्रकाशित भी करता है,इसी कारण से पिछले कुछ दशकों से भारत में जो कमन्यूकेशन के मामले में बढावा मिला है वह भी एक तंत्र के कारण माना जाता है। यह तंत्र मंगल की स्थिति के रूप में भी माना जा सकता है। वर्तमान में मंगल से मंगल ही षडाष्टक योग बना रहा है और जो भी कार्य कमन्यूकेशन के रूप में माने जाते है एक दूसरे के प्रति ही अपनी अपनी दुर्भावना को प्रकट करने से बाज नही आ रहे है। कानून का कारक गुरु भारत की कुंडली में छठे भाव में पडा है जो नौकरशाही के नाम से जाना जाता है,और वर्तमान में भारत की कुंडली में लाभ के भाव में विद्यमान है। कानूनी नौकरशाही वर्तमान में लगातार लाभ के लिये अपने अपने प्रयासों में तेजी लाने की कारक भी है। लेकिन यह अधिक दिन तक नही चलने वाला यही गुरु मई से अपने स्थान को बदलेगा और कानूनी नौकरशाही के अन्दर अपना भूचाल किसी एक तंत्रात्मक कानून के रूप में मचाने से बाज नही आयेगा,जो भी कानूनी रूप से अपने को छुपा रुस्तम मानकर कानून को बेचने का कार्य करने की कोशिश कर रहे है यही गुरु अपनी स्थिति से अक्समात ही सभी नौकरशाही के रवैये को बे-पर्दा करने से नही चूकेगा,और अपनी छवि बनाने के लिये जो रुख अपनाया जायेगा वह भारत के लिये सदैव याद रखने के लिये माना जायेगा। मंगल से युति लेने के बाद गुरु रक्षा सेवाओं से सीधा जुडेगा और जहां भी अनीति देखी जायेगी वहाँ पर एक तंत्रात्मक कानून फ़ोर्स से लगाया जाना माना जाता है। भारतवर्ष के ह्रदय पर राज करने के लिये शनि भी नवम्बर से अपनी व्यापार वाली नीति से साझा सरकार बनाने के लिये अपनी चाल चले बिना नही मानेगा।

सन्तान योग—

किस मनुष्य की कैसी सन्तान होती इस्का पता भी लगाया जा सकता है। जन्म कुण्डली में चलित नवमांश कारकांश के द्वारा जन्म योग है या नही इसका पता लगाना तो असंभव नही है तो कठिन अवश्य है।

सन्तान सुख का विचार करने के लिये त्रिकोण यानी पहले पांचवे और नवे भाव तथा दूसरे ग्यारहवे भाव से सन्तान सम्बन्धी विचार करना चाहिये।
पहले भाव यानी शरी के भाव से जो शरीर के बारे में नये जन्म का विचार देता है से सन्तान के प्रति जानने के महत्वपूर्ण भाव के रूप में जाना जाता है। इसके अन्दर सबसे पहले पति और पत्नी जातक के शरीर के बारे में परीक्षा करनी चाहिये। स्त्री के शरीर से में प्रजनन क्षमता है कि नही और पुरुष के अन्दर प्रजनन के लिये कारक वीर्य की बलवता है कि नही इस बारे में पहले विचार किया जाना उत्तम रहता है। इसके बाद दूसरे भाव से यह भी जानना आवश्यक है कि शरीर से उत्पन्न कुटुंब की बढोत्तरी है कि नही,कहीं ऐसा तो नही कि मारक ग्रह दूसरे स्थान में हो और संतान के पैदा होते ही वह ग्रह सन्तान को समाप्त कर दे। अगर मारक ग्रह है तो उसका इलाज भी करना जरूरी है। इसके बाद पंचम भास एसन्तान सुख का विचार किया जाता है,पांचएं स्थान से पांचवे स्थान यानी नवें स्थान अप्र आखिर में ग्यारहवां स्थान यानी लाभ स्थान पांचवे स्थान से सामने बैठे हुये ग्रह भी देखने जरूरी होते है और अपना असर पूरा संतान के मामले में देते है।

इन पांचों स्थान पर गुरु की द्रिष्टि युति और अन्य प्रकार की गुरु वाली बाते याद रखनी चाहिये,इसके बाद सप्तमांश नवमांश कारकांश यह कुण्डली में जन्म के इन पांचों स्थानों के स्वामी की क्या पोजीसन है उसका भी ध्यान होने के बाद सन्तान सम्बन्धी जातक को योग्य मार्गदर्शन करना चाहिये।

सूर्य मंगल गुरु पुत्र संतान के कारक होते है,चन्द्रमा स्त्री ग्रह है और बुध शुक्र शनि कुंडली में बलवान होने पर पुत्र या पुत्री का सुख प्रदान करते है,सूर्य की सिंह राशि बहुत कम सन्तान देने वाली है,और अगर सूर्य ग्यारहवें भाव में बैठ कर पंचम को देखता है तो एक पुत्र से अधिक का योग नही बन पाता है,कभी कभी इस सूर्य के कारण वंश वृद्धि में बाधा भी मिलती है। लेकिन सूर्य कम से कम एक पुत्र तो देगा ही। यदि चन्द्रमा की राशि कर्क किसी प्रकार से योगकारक बन रही है और माता के कारक चन्द्रमा का प्रभाव जीवन में अधिक है या राहु के द्वारा चन्द्रमा और शुक्र को देखा जा रहा है तो भावना के अनुसार चन्द्रमा का भय यानी राहु और चन्द्रमा मिलकर सास का रूप देते है और पत्नी भय से केवल सास के अलावा और किसी के बारे में सोच भी नही पाती है तो कन्या सन्तान का होना आवश्यक हो जाता है और तीन कन्या तक की मान्यता मानी जाती है। एक कहावत “चन्द्र कन्या प्रजावान” के अनुसार भी माना जाता है कि कन्या राशि का चन्द्रमा अधिक प्रजा को उत्पन्न करने वाला होता है। इसके बाद भी पंचम में अगर कर्क या मीन राशि है तो भी कन्या सन्तान की अधिकता होती है। अगर पंचम में कर्क राशि को ग्यारहवे भाव से शनि देखता हो तो वास्तव में सात पुत्री का भी योग बनता है। और पुत्र भी एक ही होता है। शनि पुत्र सुख नही देता है यह बात अटल रूप से मानकर चलनी चाहिये।
अगर पंचम स्थान पर शनि और मंगल की द्रिष्टि होती है या पंचम स्थान का मालिक व्यय स्थान से सम्बन्ध रखता है अथवा पंचम और धन स्थान पर पाप ग्रहों की युति होती है तो पुत्र का सुख नही मिल पाता है पुत्र होता भी है तो वह या तो बाहर चला जाता है या घर पर भी रहते हुये अजनबी जैसा व्यवहार करता है।

मनपसन्द सन्तान के लिये स्त्री के ऋतुकाल से सोलह रात तक ऋतुकाल रहता है,उसमें ही गर्भ धारण हो सकता है,उसमें पहली चार रातें ऋतुदान के वास्ते मना की गयी है,क्योंकि दम्पति के आरोग्य को पहली चार राते रोग पैदा करने वाली होती है,यह समय अनेक रोगों और बाधाओं को बढाने वाला होता है,और विद्वान स्त्री पुरुष इन रातों का परित्याग करते है। इसके बाद की बारह रातें ऋतुदान के लिये मानी गयी है,चौथी रात के ऋतुदान से पुत्र की प्राप्ति होती है लेकिन उसकी उम्र कम होती है,पंचम रात से पुत्री उत्पन्न होती है लेकिन उसकी भी या तो उम्र कम होती है या रोगी होकर पूरी जिन्दगी निकालती है,छठी रात को पुत्र की पैदाइस मानी जाती है और लम्भी उम्र तथा वंश के आगे वृद्धि के लिये माना जाता है,सातवीं रात से पुत्री पैदा होती है लेकिन वह आजीवन सन्तान पैदा करने से दूर रहती है,आठवीं रात से पुत्र पैदा होता है नवी रात से पुत्री दसवीं रात से श्रेष्ठ पुत्र पैदा होता है,ग्यारहवी रात से सुन्दर पुत्री की पैदाइस होती है,बारहवीं रात से श्रेष्ठ पुत्र की पैदाइस होती है,तेरहवीं रात से चिन्ता करने वाली पुत्री पैदा होती है,चौदहवीं रात से पुत्र और पन्द्रहवी रात से लक्ष्मीवान पुत्री प्राप्त होती है,सोलहवीं रात से सर्वगुण सम्पन्न पुत्र की उत्पत्ति होती है,इसके बाद के संयोग से पुत्र संतान की प्राप्ति नही होती है,अगर होती भी है तो या तो गर्भ स्त्राव हो जाता है अथवा मृत अवस्था में पैदा होती है।

राहु मंगल का योग—-

मंगल शक्ति का दाता है,और राहु असीमितिता का कारक है,मंगल की गिनती की जा सकती है लेकिन राहु की गिनती नही की जा सकती है।राहु अनन्त आकाश की ऊंचाई में ले जाने वाला है और मंगल केवल तकनीक के लिये माना जाता है,हिम्मत को देता है,कन्ट्रोल पावर के लिये जाना जाता है।

अगर मंगल को राहु के साथ इन्सानी शरीर में माना जाये तो खून के अन्दर इन्फ़ेक्सन की बीमारी से जोडा जा सकता है,ब्लड प्रेसर से जोडा जा सकता है,परिवार में लेकर चला जाये तो पिता के परिवार से माना जा सकता है,और पैतृक परिवार में पूर्वजों के जमाने की किसी चली आ रही दुश्मनी से माना जा सकता है। समाज में लेकर चला जाये तो गुस्से में गाली गलौज के माना जा सकता है,लोगों के अन्दर भरे हुये फ़ितूर के लिये माना जा सकता है। अगर बुध साथ है तो अनन्त आकाश के अन्दर चढती हुयी तकनीक के लिये माना जा सकता है। गणना के लिये उत्तम माना जा सकता है। गुरु के द्वारा कार्य रूप में देखा जाने वाला मंगल राहु के साथ होने पर सैटेलाइट के क्षेत्र में कोई नया विकास भी सामने करता है,मंगल के द्वारा राहु के साथ होने पर और बुध के साथ देने पर कानून के क्षेत्र में भ्रष्टाचार फ़ैलाने वाले साफ़ हो जाते है,उनके ऊपर भी कानून का शिकंजा कसा जाने लगता है,बडी कार्यवाहियों के द्वारा उनकी सम्पत्ति और मान सम्मान का सफ़ाया किया जाना सामने आने लगता है,जो लोग डाक्टरी दवाइयों के क्षेत्र में है उनके लिये कोई नई दवाई ईजाद की जानी मानी जाती है,जो ब्लडप्रेसर के मामले में अपनी ही जान पहिचान रखती हो। धर्म स्थानों पर बुध के साथ आजाने से मंगल के द्वारा कोई रचनात्मक कार्यवाही की जाती है,इसके अन्दर आग लगना विस्फ़ोट होना और तमाशाइयों की जान की आफ़त आना भी माना जाता है। वैसे राहु के साथ मंगल का होना अनुसूचित जातियों के साथ होने वाले व्यवहार से मारकाट और बडी हडताल के रूप में भी माना जाता है। सिख सम्प्रदाय के साथ कोई कानूनी विकार पैदा होने के बाद अक्समात ही कोई बडी घटना जन्म ले लेती है। दक्षिण दिशा में कोई बडी विमान दुर्घटना मिलती है,जो आग लगने और बाहरी निवासियों को भी आहत करती है,आदि बाते मंगल के साथ राहु के जाने से मिलती है।

चित्त भ्रम योग—

सभी सुख है लेकिन दिमाग में शांति नही है,भोजन भरपेट किया है,सोने के लिये बढिया सर्दी गर्मी से बचने का साधन है,सन्तान ठीक है,घर में कोई आफ़त भी नही है लेकिन दिमाग अशान्त है,रोजी रोजगार भी सही है,धन की भी कोई कमी नही है,हितू नातेदार रिस्तेदार सभी माफ़िक है,कोई बुराई नही कर रहा है लेकिन दिमाग फ़िर भी अशांत है। दिमागी अशान्ति इस कदर हावी है कि रात को खूब सोने की चेष्टा की जाती है,लेकिन सुबह के समय जब सभी के जगने का समय होता है तभी नींद का आना होता है,सभी लोग जाग कर अपने अपने कार्यों में लगे है लेकिन उस समय नींद का आना होता है,किसी न किसी बहाने से कोई आकर जगा भी देता है या शोर सुनकर आंख खुल जाती है तो दिन भर के लिये झल्लाहट पैदा हो जाती हर किसी से बात करते समय कार्य करते समय झल्लाहट ही सवार रहती है,किसी भी काम को हाथ में लिया और किसी ने कुछ कह दिया बस एक दम ताव आया और हाथ के काम को छोड कर जो मन में आया बक दिया या एकान्त में जाकर बैठ गये,रोना आगया बिना कारण के बिना बात के घर के अन्दर क्लेश पैदा हो गया। यह सब होने का कारण एक ही जिसे चित्त-भ्रम योग की संज्ञा दी जाती है।

चित्त भ्रम जरूरी नही है कि किसी समझदार व्यक्ति में या वयस्क व्यक्ति में ही पैदा हो,यह बच्चे के अन्दर भी पैदा हो जाता है,टीचर ने कार्य करने के लिये दिया जल्दबाजी में रफ़ कापी की बजाय किसी फ़ेयर कापी में काम को नोट कर लिया,काम भी ऐसी जगह पर नोट किया जहां बाद में भी कुछ टापिक लिखा जाना है,लेकिन चित्त भ्रम के कारण ऐसा हो गया,घर आकर उसे देख कर दिमाग और भी खराब हो गया,और जो काम दिया गया उसे पूरा नही किया गया परिणाम में सुबह स्कूल जाकर टीचर से कोई झूठा बहाना बनाया और टीचर ने एक नोट कापी के अन्दर डाल दिया,घर आकर डर की बजह से खुद ही पेरेन्ट के साइन कर लिये और टीचर को दिखा दिया,कुछ समय के लिये तो इस चित्त भ्रम वाली स्थिति पर पर्दा डाल दिया लेकिन समय के साथ वह झूठ जब खुला तो और भी बुरा हाल हो गया,चित्त इतना भ्रम में गया कि स्कूल जाने से ही मन दूर हो गया और जो पढा लिखा जा रहा था उसे भूल कर दोस्तों के साथ दिन बिताये जाने लगे,आगे का परिणाम सभी जानते है,यह भी एक चित्त भ्रम का योग चल रहा था,जब तक योग खत्म हुआ तब तक प्रोग्रेस का समय निकल गया।

शिक्षा को पूरा कर लिया नौकरी की तलाश शुरु हो गयी,कोई कम्पनी आयी और उसके अन्दर इन्टरव्यू दे दिया,साथ में विना विचार किये उस कम्पनी के साथ एग्रीमेन्ट भी तीन साल के लिये कर दिया,जब अपनी योग्यता की जांच काम करने के दौरान की तो पता लगा कि जिस कम्पनी में अपनी योग्यता के कारण जोब किया जा रहा है उससे कहीं अधिक दूसरी कम्पनी में पगार भी मिलती और समय भी काम केलिये कम था,लेकिन अब पछताने से क्या होता है,जो होना था वह जरा से चित्त भ्रम की बजह से हो गया,काम भी करना पडेगा और पगार भी उतनी नही कि जीवन आसानी से जिया जा सके,गुस्सा भी उस पल पर आयेगी जब नौकरी के लिये हाँ भी की और एग्रीमेन्ट भी कर लिया,यह क्षणिक चित्त-भ्रम का योग था जिसने आगे के तीन साल तक एक ही पगार में रगडने के लिये मजबूर कर दिया।

सडक पर गाडी ले कर जा रहे है,गाडी भी स्पीड में जा रही है,सामने से एक व्यक्ति सडक को क्रास कर रहा है,चित्त में यही रहा कि जब तक वह आदमी सडक को पार करेगा,तब तक वहाँ गाडी नही पहुंचेगी,लेकिन जैसे ही कुछ फ़ासले पर गाडी पहुंची वह आदमी वापस जिधर से आया था उधर के लिये ही चल दिया,वह आदमी भी मारा गया और खुद भी मय गाडी के लोट पोट हो गये,अस्पताल में गये टूटे अंगो का इलाज चला जीवन भर के लिये अपंग हो गये,मरने वाले के लिये हर्जाना खुद ने या बीमा कम्पनी ने भरा,वह भी मात्र चित्त-भ्रम के कारण,जरा सी देर के लिये चित्त में भ्रम नही आता तो शायद यह पोजीसन जो आज है वह नही होती।

शादी के लिये माता पिता ने वर की तलाश कर दी,शादी का समय निश्चित हो गया,लेकिन जाने कहां से पिछले प्रेमी का टेलीफ़ोन नम्बर मिल गया,लगाया और बातें होने लगीं,उस प्रेमी को भी नम्बर की तलाश थी,बदे दिनों के बाद बात हुयी पता लगा कि शादी होने जा रही है,कब कोई प्रेमी चाहेगा कि उसकी मासूका की शादीकिसी और के साथ हो जाये,दोनो के अन्दर बातें हुई जीने मरने की कसमें खायी गयीं,निश्चित समय पर एक स्थान पर मिलने का वादा हुआ घर से निकलने के लिये कोई झूठ गढा गया,जो भी पास में था सो और कुछ चोरी से लिया गया,सम्बन्धित स्थान पर पहुंचे और प्रेमी के साथ फ़रार,शादी करने के लिये माता पिता पर बज्रपात समाज मेम बुराई,जान पहिचान वालों को मसाला मिला और कुछ दिन बाद जैसे ही प्रेमी को पुराना लगने लगा,उसने भी किनारा काट लिया,हो गयी जिन्दगी बरबाद,जो शील सम्भाल कर रखा था वह भी नही रहा और जो स्वप्न देखे थे सभी मटियामेट वह भी जरा से चित्त-भ्रम के कारण।

यह चित्त को भ्रम देने के लिये राहु को माना जाता है,गुरु या चन्द्रमा पर जब भी राहु अपना असर देता है चित्त के अन्दर भ्रम पैदा हो जाता है,जो गूढ दिमाग का होता है उसके अन्दर कचरा भर जाता है,उस कचरे के कारण जो भी अच्छा कार्य होता है उसके प्रति गहन शंकायें दिमाग के अन्दर घर बना लेती है,व्यक्ति के अन्दर एक नशा हो जाता है वह नशा किसी प्रकार से नही उतरता है,उस नशे को उतारने के लिये लैला मजनू के किस्से बने शीरी फ़हरात के फ़साने बने,लेकिन जब नशा उतरा तो बहुत देर हो चुकी थी,कितनी ही आत्महत्यायें की जाती है,कितने ही मुकद्दमे अदालतों मे चल रहे है,कितने ही लोग अपना घर द्वार छोड कर मारे मारे फ़िर रहे है,वह भी केवल जरा से चित्त-भ्रम के कारण,इस चित्त भ्रम के कारण अपनों की बातें बुरी लगने लगती है,जो उसी प्रकार के चित्त-भ्रम वाली बाते करते है उन्ही की बातें भी अच्छी लगती है,जो कल्पनाओं के आकाश में साथ उडने की कला को जानते है उनसे ही प्रेम करना अच्छा लगता है,लेकिन जैसे ही हकीकत की दुनियां में प्रवेश किया जाता है नशे का पता नही होता है फ़िर सोचना केवल सोचना ही रह जाता है,यही हाल मर्डर करने के समय होता है यही हाल किसी से गाली गलौज करने के समय होता है,यही हाल एक साथ मिलकर आगजनी और पथराव करने के समय होता है,इसे ही चित्त-भ्रम की संज्ञा से सम्बोधित किया जाता है।

इस चित्त भ्रम के आते ही अगर इस चित्त का सही उपाय कर लिया जाये,जो नही समझ में आ रहा है उसके लिये पूंछ लिया जाये,कहावत है लोहा लोहे को ही काटता है,लेकिन गर्म लोहा ठंडे लोहे से काटा जाता है,अगर दिमाग में ठंडक मिलने वाले उपाय किये जायें,जब दिमाग भारी होने लगे तो किसी न किसी प्रकार से अच्छे साहित्य से अपने को जोड लिया जाये जो भी जानकार है उनके साथ बैठ कर कुछ समय तक अपने विचारों के आदान प्रदान को किया जाये,जो भी मानसिक शंका है उसके लिये बुजुर्गों से राय ली जाये तथा मिली राय पर अपने पूर्ण विश्वास और श्रद्धा से अमल किया जाये,राहु की शांति के उपाय के लिये लम्बी यात्रायें की जायें अपने अपने धर्म के अनुसार धार्मिक स्थानों की यात्रायें की जायें,कहावत है कैसा भी चित्त का भ्रम पहाडी यात्रा के बाद समाप्त हो जाता है,कैसा भी चित्त का भ्रम धर्म कार्य करने से खत्म हो जाता है,बीस प्रतिशत सहायता रत्न आदि भी करते है,चित्त भ्रम में होने से सुलेमानी पत्थर को पहिना जाये,बालों पर किया जाने वाला खिजाब कुछ समय के लिये बन्द कर दिया जाये,कपूर को नारियल के तेल मे मिलाकर रोजाना सिर में लगाया जाये,टीवी एम्यूजमेन्ट में सबके साथ बैठ कर ही भाग लिया जाये,जब दिमागी भ्रम चल रहे हों तो किसी प्रकार का जीवन से सम्बन्धित निर्णय नही लिया जाये,ध्यान करने और मेडीटेसन की तरफ़ जाया जाये,किसी योग्य गुरु के सानिध्य में योग का उपाय किया जाये तो बडे से बडे कारण को पैदा होने से रोका जा सकता है।

वास्तु और एक्वेरियम (मत्स्य ऊर्जा)—

मछली को हमेशा से शुभ माना गया है। भाग्य के अनुसार जब किसी दिशा से भाग्य की प्राप्ति नही होती है और लगता है कि भाग्य रुक गया है तो उस दिशा में कांच के बने एक्वेरियम को स्थापित किया जाता है और अपनी राशि के अनुसार विभिन्न प्रकार की मछलियों को पाला जाता है। मछलियों की आदत होती है कि वे अपने को कभी भी रोकती नही है,उनकी कोई न कोई क्रिया पानी के अन्दर चला ही करती है। इसके बाद जल कांच के अन्दर जब भर दिया जाता है तो उसके अन्दर रोशनी को देखने के बाद पता लगता है कि वह इन्द्रधनुष जैसी आभा में दिखाई देती है। मछलियों को लगातार देखते रहने के बाद भी जी नही भरता है। इस प्रकार से भाग्य वर्धन वाली दिशा का संचालन होने के बाद रुके हुये कार्य होने लगते है और हम इसे चीन देश का दिया हुआ तोहफ़ा मानने लगते है कि यह ची नामक ऊर्जा शक्ति को प्रदान करने वाली हो,खैर जो भी हो रामचरितमानस में भी दधि और मीन के रूप में मछली को और दही को शुभ माना जाता है आज भी जब किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिये कोई घर का सदस्य बाहर जाता है तो उसके दही का तिलक किया जाता है दही को खिलाकर भेजा जाता है,और सामने मछली को रखा जाता है,जिससे कोई भी कार्य रुक नही सके। अलग अलग राशियों के लिये अलग अलग दिशाओं में एक्वेरियम को स्थापित किया जाता है।

मेष राशि के लिये भाग्य वर्धक दिशा दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य कोण को माना गया है,इस दिशा में चौकोर एक्वेरियम लगाने से तथा उसके अन्दर सात मछलिया जिनके अन्दर एक काली मछली होनी आवश्यक है बहुत अच्छा फ़ल देती है। लेकिन इस दिशा में लगाये जाने वाले एक्वेरियम का स्थान कमर से ऊंचा होना चाहिये। साथ ही ध्यान रखना चाहिये कि एक्वेरियम के अन्दर कभी पानी गंदा नही हो और जो भी मछली रखी जाये वह अपने अनुसार कभी बीमार न हो,पानी के तापमान के लिये भी ध्यान रखना आवश्यक है। बडी मछली छोटी मछली के तापमान में नही रह सकती है इसलिये समान आकार वाली मछली को रखना शुभ होता है,वैसे छ: पीली और एक काली मछली भी रखी जा सकती है।

वृष राशि के लिये घर में एक्वेरियम के लिये दक्षिण दिशा को शुभ माना गया है,और इसके अन्दर नौ लाल रंग की मछली बहुत ही शुभफ़लदायक होती है,भूल कर भी हरे रंग की सीनरी और हरे रंग के पत्थर या एक्वेरियम को सजाने वाले सामान से बचना चाहिये। इससे इस राशि वालों के लिये कभी भी धन और मान सम्मान की कमी नही आती है,अगर बहुत ही शक्ति को प्राप्त करना है तो एक्वेरियम के अन्दर लाल सफ़ेद मिक्स पत्थर डाल देने चाहिये।

मिथुन राशि के लिये दक्षिण-पूर्व यानी अग्नि कोण शुभ माना गया है,एक्वेरियम को दक्षिण पूर्व दिशा के कोने में लगाने के बाद इस राशि वालों की मदद उनके मित्रों और लगातार लाभ के साधनों से मिलनी शुरु हो जाती है। इस दिशा में इस राशि वालों को ग्यारह मछली जिसके अन्दर तीन कार्प फ़िस होनी जरूरी है रखनी चाहिये,कोई न कोई एक रंग काले सफ़ेद से सम्बन्धित भी हो सकता है,रोजाना भोजन भी इन मछलियों को घर के मालिक के द्वारा देना चाहिये और साफ़ सफ़ाई का बन्दोबस्त भी मालिक को ही करना चाहिये,एक्वेरियम को कभी भी जीना या सीढी के नीचे नही रखना चाहिये और वास्तु से जो लोग इस दिशा में रसोई आदि का निर्माण कर लेते है तो उससे बचकर ही एक्वेरियम को लगाना चाहिये।

कर्क राशि वालों के लिये भी अग्निकोण में ही मछली स्थापित करनी चाहिये और सिल्वर डालर या सफ़ेद रंग की मछलिया जिनकी संख्या समान होनी चाहिये रखना चाहिये,हरे रंग की सीनरी और पत्थरों को प्रयोग में लाया जा सकता है लेकिन भूल कर भी डरावनी या लाल रंग की सीनरी नही लगाने चाहिये। इस राशि वालों को अगर कोई दिक्कत महिलाओं के सम्बन्ध में आती है तो चौकोर की जगह गोल आकार के एक्वेरियम को लगा लेना चाहिये।

सिंह राशि वाले अपने रहने वाले स्थान में एक्वेरियम को पूर्व दिशा में लगा सकते है और गोल्डन फ़िस को पाल सकते है,लेकिन काली मछली उनके पास कम ही रुकेगी,धारी वाली मछली केट फ़िस आदि दिक्कत देने वाली होगी और पत्थरों के अन्दर पीले पत्थर ही अच्छे रहते है और हरे रंग की बैक ग्राउंड सजावट भी सही रहती है। मछलियों के अन्दर लाल धब्बे पैदा होने पर उन्हे फ़ौरन तापमान के अनुसार रखे जाने की जरूरत होती है।

कन्या राशि वालों के लिये घर की पूर्वोत्तर दिशा में एक्वेरियम लगाने से भाग्य की बढोत्तरी होती है। और जो भी धन वाले साधन होते है वे अपने अपने समय पर खुलते रहते है। इस राशि वालों के लिये भी भूरे रंग की मछली शुभ फ़लदायक होती है और सिल्वर डालर या इसी प्रकार की मछलिया फ़ायदा देने वाली होती है। भूल कर भी इस दिशा में रखे जाने वाले एक्वेरियम में काली सफ़ेद मछली नही रखनी चाहिये अन्यथा मानसिक शांति भंग होने की दिक्कत देखी जाती है।

तुला राशि वालों के लिये भी पूर्वोत्तर दिशा में पछली रखना शुभ होता है और जहां तक हो सके असमान संख्या में मछलियों को रखना चाहिये,इस क्रिया से तुला राशि वालों की कमन्यूकेशन की शक्ति बढती है और वे अपने को लगातार प्रसिद्धि और धन के क्षेत्र में उन्नति करते जाते है। लेकिन आलसी स्वभाव होने से वे अपने कार्य को दूसरे से करवाने के कारण खुद मछलियों की देखभाल नही कर पाते है इसके लिये उन्हे खुद ही प्रयास करना चाहिये,या घर में कोई बहिन बुआ या बेटी को इस काम की जिम्मेदारी देनी चाहिये.इस राशि वालों के लिये भी गोल एक्वेरियम काफ़ी सहायक सिद्ध होता देखा गया है।

वृश्चिक राशि वालों के लिये उत्तर दिशा में एक्वेरियम रखना शुभ माना गया है,और उनके लिये भी सफ़ेद मछली रखना उत्तम माना जाता है इस कार्य से उन्हे गूढ विषयों की जानकारी और धन कमाने के साधारण लोगों से अलग प्रकार के साधन मिलने लगते है। इस राशि वालों को भूल कर भी मछलियों के साथ हाथ से खेलने की भूल नही करनी चाहिये,अन्यथा उनके किसी भी प्रयास से जैसे कि बार बार उन्हे छूने या पकडने की भूल से मछली अपने वास्तविक रंगों को भी बदल सकती है और मर भी सकती है।

धनु राशि वालों के लिये उत्तर-पश्चिम दिशा में एक्वेरियम को लगाना सही रहता है,उन्हे लाल रंग की असमान संख्या में मछलियों को रखा जाना उत्तम रहता है। गोल एक्वेरियम उनके लिये भी फ़ायदा देने वाला माना जाता है,एक्वेरियम के पास अगर वे कोई पानी में पलने वाला पेड भी लगाते है तो उन्हे भाग्य में अचानक परिवर्तन मिलता है।

मकर राशि वालों को भी उत्तर पश्चिम दिशा लाभदायक सिद्ध होती है इसी दिशा में एक्वेरियम को रखा जाना उनके लिये भाग्य में बढोत्तरी करने वाला होता है। हरे रंग की बैक ग्राउंड सीनरी रखना भी लाभदायक है। इस स्थान पर एक्वेरियम रखने के बाद उनकी पैतृक स्थान में चलने वाली कर्जा दुश्मनी बीमारी आदि में लाभ वाली पोजीसन पैदा होनी शुरु हो जाती है और वे कार्य के मामले में अपने को स्थिर रखने में समर्थ होने लगते है।

कुम्भ राशि वालों के लिये भी पश्चिम दिशा में एक्वेरियम रखा शुभ होता है और सफ़ेद रंग की चितकबरी मछलियों को रखना शुभ फ़लदायी माना जाता है। इस कार्य से उनके लाभ वाले साधनों में और न्याय आदि के क्षेत्र में काफ़ी प्रगति मिलती है। अगर इस प्रकार से लोग विदेशी कार्य और व्यापार की तरफ़ भी अग्रसर होते है तो उन्हे आशातीत लाभ मिलना शुरु हो जाता है।

मीन राशि वालों के लिये भी दक्षिण पश्चिम की दिशा ही शुभ फ़लदायक होती है और उनके लिये यह जरूरी होता है कि एक्वेरियम के ऊपर किसी गोल कांच के बर्तन में नमक मिला पानी रखना उत्तम फ़लदायक होता है। वे नीले रंग की सीनरी और अपने अनुसार नीले रंग के साधन भी प्रयोग में ले सकते है। इस प्रकार से पैशाचिक शक्तियां उनसे दूर रहती है,लेकिन ध्यान रखना चाहिये कि मछली के कैसी भी हालत में मरने पर फ़ौरन दूसरी मछली को समान मात्रा में रखा जाना चाहिये।

पानी और हमारा घर—-

घर को बाद में बनवाया जाता है पहले पानी की व्यवस्था देखी जाती है। आजकल कम से कम लोग ही प्राकृतिक पानी का उपयोग करते है पानी अधिकतर या तो सरकारी स्तोत्रों से सुलभ होता है या फ़िर अपने द्वारा ही बोरिंग आदि करवाने से प्राप्त होता है। भारत में पानी के लिये हिमाचल काश्मीर और उत्तराखण्ड के साथ बंगाल बिहार आसाम नागालेंड तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ समुद्र तटीय स्थान पानी की सुलभता से पूर्ण है। अधिकतर भागों से स्वच्छ जल की प्राप्ति होती है और अधिकतर भागों में पानी बहुत कीमती हो जाता है जैसे राजस्थान के पश्चिमी जिलों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में और मध्य प्रदेश तथा छत्तीस गढ के साथ उडीसा आदि स्थानों में पानी की कमी मिलती है,कहीं कहीं पानी तो पांच सौ फ़ीट के नीचे से बोरिंग के द्वारा प्राप्त किया जाता है।

बिना पानी के क्षेत्रों के लोगों का स्वभाव रूखा होता है,पानी की अधिकता वाले क्षेत्रों के लोगों का स्वभाव मधुर भी होता है और दिमागी भी होता है। उत्तर में भारी पानी मिलता है तो दक्षिण में पानी हल्का मिलता है। जितनी गहराई से पानी को प्राप्त किया जाता है उतने ही मिनरल अधिक पानी के अन्दर पाये जाते है और जितना पानी उथला मिलता है उतना ही पानी के अन्दर कीटाणुओं का मिलना पाया जाता है। अधिकतर स्थानों में नमी के कारण लोगों का रहना मुश्किल होता है और अधिकतर स्थानों में अगर बरसात में अच्छा पानी बरस जाये तो लोग बेघर भी बहुत जल्दी हो जाते है।

मकान में पानी का स्थान सभी मतों से ईशान से प्राप्त करने को कहा जाता है और घर के पानी को उत्तर दिशा में घर के पानी को निकालने के लिये कहा जाता है,लेकिन जिनके घर पश्चिम दिशा की तरफ़ अपनी फ़ेसिंग किये होते है और पानी आने का मुख्य स्तोत्र या तो वायव्य से होता है या फ़िर दक्षिण पश्चिम से होता है,उन घरों के लिये पानी को ईशान से कैसी प्राप्त किया जा सकता है,इसके लिये वास्तुशास्त्री अपनी अपनी राय के अनुसार कहते है कि पानी को पहले ईशान में ले जायें,घर के अन्दर पानी का इन्टरेन्स कहीं से भी हो,लेकिन पानी को ईशान में ले जाने से पानी की घर के अन्दर प्रवेश की क्रिया से तो दूर नही किया जा सकता है,मुख्य प्रवेश को महत्व देने के लिये पानी का घर मे प्रवेश ही मुख्य माना जायेगा।

पानी के प्रवेश के लिये अगर घर का फ़ेस साउथ में है तो और भी जटिल समस्या पैदा हो जाती है,दरवाजा अगर बीच में है तो पानी को या तो दरवाजे के नीचे से घर में प्रवेश करेगा,या फ़िर नैऋत्य से या अग्नि से घर के अन्दर प्रवेश करेगा,अगर अग्नि से आता है तो कीटाणुओं और रसायनिक जांच से उसमे किसी न किसी प्रकार की गंदगी जरूर मिलेगी,और अगर वह अग्नि से प्रवेश करता है तो घर के अन्दर पानी की कमी ही रहेगी और जितना पानी घर के अन्दर प्रवेश करेगा उससे कहीं अधिक महिलाओं सम्बन्धी बीमारियां मिलेंगी।

पानी को उत्तर दिशा वाले मकानों के अन्दर ईशान और वायव्य से घर के अन्दर प्रवेश दिया जा सकता है,लेकिन मकान के बनाते समय अगर पानी को ईशान में नैऋत्य से ऊंचाई से घर के अन्दर प्रवेश करवा दिया गया तो भी पानी अपनी वही स्थिति रखेगा जो नैऋत्य से पानी को घर के अन्दर लाने से माना जा सकता है। पानी को ईशान से लाते समय जमीनी सतह से नीचे लाकर एक टंकी पानी की अण्डर ग्राउंड बनवानी जरूरी हो जायेगी,फ़िर पानी को घर के प्रयोग के लिये लेना पडेगा,और पानी को वायव्य से घर के अन्दर प्रवेश करवाते है तो घर के पानी को या तो दरवाजे के नीचे से पानी को निकालना पडेगा या फ़िर ईशान से पानी का बहाव घर से बाहर ले जायेंगे,इस प्रकार से ईशान से जब पानी को बाहर निकालेंगे तो जरूरी है कि पानी के प्रयोग और पानी की निकासी के लिये ईशान में ही साफ़सफ़ाई के साधन गंदगी निस्तारण के साधन प्रयोग में लिये जानें लगेंगे। और जो पानी की आवक से नुकसान नही हुआ वह पानी की गंदगी से होना शुरु हो जायेगा।

पूर्व मुखी मकानों के अन्दर पानी को लाने के लिये ईशान को माना जाता है,दक्षिण मुखी मकानों के अन्दर पानी को नैऋत्य और दक्षिण के बीच से लाना माना जाता है,पश्चिम मुखी मकानों के अन्दर पानी को वायव्य से लाना माना जाता है,उत्तर मुखी मकानों के अन्दर भी पानी ईशान से आराम से आता है,इस प्रकार से पानी की समस्या को हल किया जा सकता है।

जिन लोगों ने पानी को गलत दिशा से घर के अन्दर प्रवेश दे दिया है तो क्या वे पानी की खातिर पूरी घर की तोड फ़ोड कर देंगे,मेरे हिसाब से बिलकुल नही,इस प्रकार की कभी भूल ना करे,कोई भी कह कर अपने घर चला जायेगा लेकिन एक एक पत्थर को लगाते समय जो आपकी मेहनत की कमाई का धन लगा है वह आप कैसे तोडेंगे,उसके लिये केवल एक बहुत ही बढिया उपाय है कि नीले रंग के प्लास्टिक के बर्तन में नमक मिलाकर पानी को घर के नैऋत्य में रख दिया जाये,और इतनी ऊंचाई पर रखा जाये कि उसे कोई न तो छुये और न ही उसे कभी बदले,उस बर्तन का ढक्कर इतनी मजबूती से बन्द होना चाहिये कि गर्मी के कारण पानी का आसवन भी नही हो,अगर ऐसे घरों में पानी की समस्या से दुखी है तो यह नमक वाला पानी रख कर देंखे,आपको जरूर फ़ायदा मिलेगा,इसके अलावा घर के वायव्य में ईशान में पूर्व में नैऋत्य और दक्षिण के बीच में एक्वेरियम स्थापित कर दें तो भी इस प्रकार का दोष खत्म हो जाता है।

पानी को उतना ही फ़ैलायें जितना कि बहुत ही जरूरी हो,पानी अमूल्य है पानी ही जीवन है,बरसात के पानी को स्टोर करने के लिये घर के बीच में एक बडा टेंक बना सकते है,इस तरह से ब्रह्म-स्थान भी सुरक्षित हो जायेगा और आसमानी आशीर्वाद भी घर के अन्दर हमेशा मौजूद रहेगा,इस प्रकार के स्थान को ईशान वायव्य और पश्चिम दिशा में बना सकते है।

बरसात के पानी को निकालने के लिये जहां तक हो उत्तर दिशा से ही निकालें,फ़िर देखें घर के अन्दर धन की आवक में कितना इजाफ़ा होता है,लेकिन उत्तर से पानी निकालने के बाद आपका मनमुटाव सामने वाले पडौसी से हो सकता है इसके लिये उससे भी मधुर सम्बन्ध बनाने की कोशिश करते रहे।

मकान की सीढी—-

वास्तु के द्वारा मकान बनाने पर सीढी का उपयोग दूसरी या तीसरी मंजिल पर जाने अथवा छत पर जाने के लिये किया जाता है,अधिकतर मकानों में सीढी लेंटर से ही बना ली जाती है और बाद में उसे ईंटों या चौकोर आयताकार पत्थरों के टुकडों से बना लिया जाता है। अधिकतर मकानों में लकडी की सीढी भी प्रयोग में लायी जाती है,कुछ लोग लोहे की सीढी को घर के अन्दर प्रयोग में लाते है,सीढी से मकान के वास्तु पर क्या असर पडता है आइये हम आपको इसकी जानकारी देते है:-
उत्तर दिशा में सीढी बनाने से मकान बनाने वाला हमेशा कर्जाई रहता है और उसकी तीन पीढी तक भी कर्जा समाप्त नही होता है.
मकान के पूर्व की तरफ़ सीढी बनाने से घर के सदस्यों का व्यवहार धर्म से धन कमाने के लिये प्रयोग में लाया जाता है,यानी मकान का मालिक धर्म को बेच कर भी अपने लिये धन कमाने से नही चूकेगा.
मकान की सीढियां उत्तर से घुमावदार होकर वायव्य की तरफ़ उतरती है तो मकान मालिक का वंश आहत होता है और संतान अनैतिक कामों की तरफ़ भागना शुरु कर देती है.
अग्नि कोण की सीढियां घर की महिलाओं में चिक चिक करवाने में अपना पूरा योगदान देती है.
सीढियों के नीचे रसोई बनाने के बाद घर के सदस्यों में कोई अन्जानी बीमारी अपना असर हमेशा दिया करती है और घर का धन अस्पताली कारणों में बरबाद होता रहता है.
मकान के बीच से दक्षिण की तरफ़ चढती सीढियां मकान मालिक को भोजन और निर्माण वाले कारणों से अलग नही जाने देती है और कोई अलावा प्रोग्रेस नही हो पाती है.
मकान के प्रवेश के साथ ही सीढिया अगर उत्तर दिशा की तरफ़ घुमाव में होती है तो घर की बडी संतान अपने कारणों से पूरे परिवार को छिन्न भिन्न कर देती है.
सीढियां मुख्य दरवाजे के अनुसार बनायी जाती है,जिस दिशा मे दरवाजा होता है उसके विपरीत दिशा में सीढिया बनायी जाती है,लेकिन आग और पानी के कोण से दूर रखना पडता है.
घर के मुखिया को सीढियों के पास अपने सोने और आराम करने का स्थान नही बनाना चाहिये,अन्यथा राते जाग कर काटनी पडती है.
डाक्टरों के लिये दवाइयों का काम करने वाले व्यक्तियों के लिये दरवाजे के पास वाली सीढियां फ़ायदा देती है.
हवाई कम्पनी और आकाशीय काम करने वालों के मुख्य दरवाजे के पास ही सीढियां होती है,और अक्सर सुबह को जागकर उन्हे सबसे पहले सीढियों के ही दर्शन करने पडते है.
सीढियों की संख्या समान होनी चाहिये,असमान सीढियां अक्सर घर की महिलाओं को पीठ सम्बन्धी रोग देने के लिये मुख्य मानी जाती है.
सीढी के नीचे पानी का साधन नही बनाना चाहिये,अन्यथा घर के अन्दर एक स्त्री दिमागी रूप से विक्षिप्त अवस्था में होगी.
सीढी मकान के निर्माण के समय में ही बनवा लेनी चाहिये,बाद में सीढी बनवाने से बने हुये घरों मे कोई ना कोई बाधा बनी रहती है.
अक्सर बिना सीढी वाले घरों के बच्चे शिक्षा में पिछड जाते है,और जो ऊंचाइयां उन्हे मिलनी चाहिये वे नही मिल पाती है.
अग्नि दिशा में उतरती सीढियां अक्सर घर में दो भाइयों के परिवार को रखती है लेकिन एक भाई का परिवार अक्सर खत्म हो जाता है,बडे भाई को असहनीय दुख झेलने पडते है और कुछ समय में वह अपने पुत्रों की करतूत से असमय ही मृत्यु को वरण करता है.

शरीर पर तिल मस्से और उनका प्रभाव—-

शरीर पर प्रकृति द्वारा बनाये निशान अपने आप व्यक्ति की आदतों और उसके अन्दर वाली भावनाओं को प्रदर्शित करने के लिये पुराने जमाने से मानी जाती हैं। सिर से लेकर पैर तक प्रकृति अपना कोई न कोई निशान बना ही देती है और जानने वाले लोग उस निशान से व्यक्ति की आदत और स्वभाव तथा भूत वर्तमान भविष्य समझ जाते है,अक्सर थोथी बातें तब लगती है जब वह सत्यता की तरफ़ नही जाती हो,और केवल कपोल कल्पना के आधार पर लिखी गयीं हों। स्त्री पुरुष दोनो के शरीर के अंगों पर विभिन्न स्थानों पर तिल मस्से तो कहीं न कहीं उग ही जाते है,अथवा जन्म से ही होते है,कई निशान बन कर समय पर समाप्त हो जाते है और कई निशान जीवन की अलग अलग श्रेणियों में बनते भी रहते है। पहले हम आपको तिल और मस्सों के बारे में विभिन्न प्रान्तों की धारणाओं के प्रति बताने जा रहे हैं। तिल या मस्सा शरीर के किसी भी हिस्से में होते है। लेकिन चेहरे के तिल और मस्से अपने अनुसार पहिचान बना लेते है। उन्हे किसी भी प्रकार से शरीर से सर्जरी आदि से अलग भी कर दिया जाये तो भी उनका प्रभाव तो कम होते नही देखा गया है। ज्योतिष के अनुसार तिल को शनि केतु की श्रेणी में रखा गया है और मस्से को शनि केतु बुध की श्रेणी में रखा गया है। उसी जगह लहसन जो काली त्वचा के रूप में जो शरीर में कहीं भी हो सकती है के बारे में धारणा बनाई जाती है,लहसन भी काले और नीले अथवा कत्थई रंग के होते है यही हाल तिल और मस्सों में पाया जाता है। पुरुष के दाहिने और स्त्री के बायें तिल मस्सा लहसन उत्तम माने जाते है जबकि पुरुष के बायें और स्त्री के दाहिने खराब माने जाते हैं। चेहरे से पहिचान के रूप में तिलों का वर्गीकरण पहले करते हैं। जिस स्त्री के माथे पर तिल होता है वह किसी भी हिस्से में हो तो वह स्त्री को परिश्रमी बनाता है,यही बात मस्से के लिये मानी जाती है लेकिन लहसन के लिये यह बात उल्टी होती है,स्त्री के लिये माथे पर लहसन घर समाज के रीति रिवाज से बिलग होकर चलने वाली बातों के लिये माना जाता है,माथे का लहसन स्त्री को जननांगों की बीमारियों के लिये भी सूचित करता है,वह भी कोई छोटी बीमारी नही बल्कि किसी बडी बीमारी के रूप में स्त्री की जवान अवस्था में देता है। पुरुष के लिये यह लहसन अधिक कामुकता को और दुर्भाग्य को देने वाला होता है,वह हमेशा किसी न किसी नकारात्मक विचार में ही ग्रसित रहता है,सकारत्मक विचारों के आते ही उसे क्रोध आना शुरु हो जाता है। स्त्री के बायें गाल पर तिल सौभाग्यवती बनाता है,उसके पति की उम्र लम्बी होती है और वह सभी तरह के अपने कार्य पूरे करके ही मरती है लेकिन सौभाग्यवती ही मरती है। अधिकतर इस प्रकार की स्त्रियां दुराचार से दूर रहती है और अपने परिवार को भी दुराचार की तरफ़ जाने से रोकती रहती है,बिगडी स्त्रियों के लिये वह हमेशा कांटे की तरह ही चुभती रहती है,इस प्रकार की स्त्री को खरी बात कहने से कोई रोक नही सकता है,और अपने परिवार कुटुम्ब के लिये वह जान भी दे सकती है। इस प्रकार की स्त्री को हमेशा चलने की आदत होती है,जिसके बायें गाल पर तिल होता है उसकी बायीं कोख में भी तिल होता है,लेकिन काला तिल हमेशा सही रहता है लेकिन लाल तिल होने से प्रभाव उल्टे मिलते है। खून की बीमारियां घर के भेद को बाहर कहना,चोरी से घर की वस्तुओं को बरबाद करना और झूठ बोलने की आदत भी देखी जाती है। नाक के अग्रभाग पर लाल मस्सा या तिल हो तो वह गरीब घर में जन्म लेने के बाद भी वैभवशाली जिन्दगी को जीती है,और आगे ही आगे बढने में उसका हमेशा मन रहता है,संसार की लडाइयों से लडने के लिये उसने पूरे पूरे प्रयास किये होते है,अक्सर इस प्रकार की स्त्रियों के पिता का सुख नही के बराबर होता है,माता के द्वारा ही इस प्रकार की स्त्रियां पाली पोषी गयी होती है,बहिनों की संख्या भी अधिक होती है और बडी बहिन का जीवन भी इसी प्रकार की स्त्री के द्वारा संभाला जाता है। लेकिन काला तिल हो तो स्त्री को व्यभिचारिणी बनाता है वह अपने अनुसार ही चलने वाली होती है माता पिता को तभी तक मानती है जब तक वह अपने पैरों पर खडी नही हो जाती है,उसे रोकना टोकना कतई पसंद नही होता है,वह छुपे रूप से कार्य करना पसंद करती है और धनी से धनी घर में पैदा होने के बाद भी उसे गरीब और भटकने वाली स्थिति में पहुंचना पडता है। उसके ख्वाब बहुत ही लम्बे होते है,अधिक से अधिक पुरुषों से प्रीत करना और अपने स्वार्थ को पूरा करने के बाद छोड देना उसकी आदत होती है,बातों में चपलता होती है,किसी भी मोड पर पलट जाना उसकी आदत होती है। खाने पीने के मामले में उसकी आदत चटोरी होती है,तामसी भोजन की तरफ़ उसका ध्यान अधिक जाता है,घर के अन्दर कौन सी कीमती चीज कहां रखी है,प्रवेश करते ही उसका ध्यान उसी तरफ़ जाता है,खाना खाते समय चपर चपर करने की आदत होती है।

होंठ पर तिल होना भी अय्यास होने की निशानी है अक्सर इस प्रकार की स्त्रियों की शादी होते ही उनके पति का झुकाव अन्य स्त्री की तरफ़ हो जाता है और घर में क्लेश ही पैदा होते रहते है,नीचे के होंठ पर तिल पति की आयु को हरता है और ऊपर के होंठ का बीच का तिल महसूस करने की शक्ति को प्रदान करता है,और पति की आयु को भी बढाने वाला होता है। नाक के मध्य में लटकने वाला तिल भी इसी प्रकार की बात को सूचित करता है। आंख में तिल होने पर व्यक्ति परिश्रमी होता है,इसके अलावा उसे नजर से पहिचान लेने की आदत होती है,घर के लोगों के लिये समर्पित होता है,उसे अपने परिवार के प्रति कतई बुराई सुनने की आदत नही होती है,तथा इस प्रकार का व्यक्ति बात का भी पक्का होता है,यह बात स्त्री और पुरुष दोनो प्रकार के जातकों में देखी गयी है। अक्सर देखा जाता है कि स्त्री या पुरुष जातक के नीचे के होंठ पर तिल होने पर उसके घुटने पर भी तिल होता है। थोडी पर तिल होने से दायें पैर में भी तिल होता है,पुरुष के लिये अधिक संतति जो नर संतान के रूप में होती है और स्त्री के कम संतति के लिये माना जाता है। जननांग वाली बीमारियां अधिकतर लगी रहती है,पेट में गांठ बनने और उसके आपरेशन का भी योग होता है। इसी प्रकार से कान के तिल के बारे में कहा जाता है,किसी भी जातक के कान का तिल आयु को कम करता है,बायीं भौंह पर तिल होना अधिक यात्रा का सूचक माना जाता है,स्त्री के स्वभाव को समझने के लिये दाहिनी तरफ़ की स्त्री घर बाहर को जाने वाली और बायीं तरफ़ का तिल घर के अन्दर की मर्यादाओं में रहने वाली होती है। गर्दन पर तिल बार बार स्थान बदलने और घर की समस्याओं के प्रति हमेशा चिन्ता में रहने वाले के लिये देखा गया है,छाती का तिल साहस और वीरता वाले कामो के लिये माना जाता है लेकिन स्त्री पुरुष के बायीं और दाहिनी ओर का अच्छा और बुरा प्रभाव भी देखा जाता है। व्यक्ति की हथेली पर तिल का होना भी एक प्रकार से जल्दी से पहिचान करने के लिये माना जाता है,हाथ पर बने तिलों में काले रंग का तिल बहुधा मिलता है लेकिन इसका रंग कभी कभी पीले रंग का या सफ़ेद रंग का भी मिलता है,काले रंग के तिल बहुत अच्छा या बुरा प्रभाव डालने वाले होते है जबकि सफ़ेद और पीले तिल कम प्रभाव देने वाले होते हैं। हाथ के अन्दर सफ़ेद बिन्दु जैसे धब्बे अधिक सफ़लता देने वाले भी माने गये है,जबकि पीले बिन्दु दुर्भाग्य और कठिनाई वाला जीवन जीने के लिये सूचना देने वाले होते हैं। हाथ पर लाल रंग के तिल ब्लड प्रेसर की बीमारी को भी सूचित करने वाले होते है,अधिक पीले तिल शरीर में खून की कमी को भी दर्शाते हैं। हथेली के अन्दर पुरुष के दाहिने और स्त्री के बायें होने का भी अधिक महत्व माना जाता है,जिस पुरुष के दाहिने हाथ में तिल है और मुट्ठी को बन्द करते ही वह बन्द हो जाता है तो गरीब घर में भी जन्म लेने के बाद वह एक अच्छा अमीर आदमी बनता है और यही बात स्त्री के बायें हाथ में जानी जा सकती है,लेकिन मुट्ठी से बाहर होने पर वह चाहे लाख रोजाना कमाये लेकिन उसके पास धेला बचाने को नही रहता है। हथेली में गुरु क्षेत्र में काला तिल होना कार्य को करने पर बाधाओं को देने वाला होता है,लेकिन कार्य पूरा हो जाता है,वह अपनी मर्जी से चलने वाला नही होता है हमेशा दूसरों के कहने पर चला करता है,वह अपनी बुद्धि का प्रयोग नही कर पाता है। शनि पर्वत के आसपास तिल होना प्रेम सम्बन्धो के कारण बदनामी देने वाला माना जाता है,वह किसी भी आयु में बदनामी को दे सकता है। अक्सर बदनामियों के मिलने का समय उम्र के पैंतीसवें साल से शुरु होता है। अक्सर इस प्रकार के जातकों के घर परिवार में कलह अधिक होती है और आत्महत्या तक देखने को मिली हैं। यही काला तिल अगर सूर्य पर्वत के आसपास होता है तो मान सम्मान में हमेशा दिक्कत आती है,किसी न किसी बात पर उसे अपमानित होना पडता है,अच्छा काम करने के बाद भी उसे बुराई मिलती है। बुध क्षेत्र में होने वाला काला तिल व्यवसाय में हानि और बातचीत में बुराई देने वाला होता है,शुक्र क्षेत्र में होने वाले तिल से व्यक्ति का अधिक कामुक होना भी पाया जाता है।

मकान की बनावट और वास्तु—

कहावत है कि “कमाना हर किसी को आता है खर्च करना किसी किसी को आता है”,शरीर और मकान की रूपरेखा को समझना और सजाना संवारना एक जैसा ही है। आज के जमाने में जब व्यक्ति को एक समय का भोजन जुटाना भारी है उसके बाद मकान का बन्दोबस्त करना कितनी टेढी खीर होगी इसका अन्दाज एक मध्यम वर्गीय परिवार आराम से लगा सकता है। हाँ उन लोगों को कोई फ़र्क नही पडता है जिनके बाप दादा कमा कर रख गये है और वे अपने जीवन में मनमाने तरीके से खर्च कर रहे है,लेकिन उनकी औलादों के लिये भी सोचना तो पडेगा ही। मकान बनाने के लिये जीवन की गाढी कमाई को प्रयोग में लेना पडता है,उस गाढी कमाई को अगर समझ बूझ कर खर्च नही किया तो वह एक दिन अपने ही कारण से रोना बन कर रह जाती है। मकान का ढांचा इस प्रकार से बनाना चाहिये कि वह किसी भी तरह के बोझ को आराम से सहन कर ले। जून की गर्मी हो या अगस्त की बरसात अथवा दिसम्बर का जाडा,सभी ऋतुओं की जलवायु को मकान का ढांचा सहन कर लेता है तो वह आराम से निवास करने वालों के लिये दिक्कत वाला नही होता है। प्रकृति के नियम के अनुसार अक्सर जाडे में बनाये हुये मकान गर्मी में अपनी बनावट में परिवर्तन करते है,अक्सर भारत के मध्य में जो मकान गर्मी में बन जाते है वे दिसम्बर में अपने अन्दर बदलाव करते है। मकान का ढांचा अपने स्थान से कुछ ना कुछ घटता है,इस घटाव के कारण अगर मकान का ढांचा बनाकर फ़टाफ़ट पलस्तर कर दिया गया है और उसके बाद फ़टाफ़ट रंग रोगन कर दिया गया है तो वह कहीं ना कहीं से चटक दिखायेगा जरूर,मकान की चटक किसी भी तरह से रंग रोगन के बाद दबाने से नही दबती है,वह अगली साल में अपनी फ़िर से रंगत दिखा देती है और अच्छा पैसा लगाने के बाद भी समझ में नही आता है कि मकान की चटक को कैसे दबाया जाये। अक्सर बडे बडे कारीगर और मकान का निर्माण करने वाले कह देते है कि मकान ने सांस ले ली है। भूतकाल में जो मकान बनाये जाते थे,वे धीरे धीरे बनाये जाते थे,जैसे जैसे हाथ फ़ैलता था मकान का निर्माण कर लिया जाता था,और जब मकान धीरे धीरे बनता था जो लाजिमी है कि मकान का पहले ढांचा बनता था फ़िर कुछ समय बाद पलस्तर होता था उसके बाद महीनो या सालों के बाद उसके अन्दर रंग रोगन किया जाता था। वे मकान आज भी सही सलामत है कोई उनके अन्दर दरार या कमी नही मिलती है। किसी प्रकार से वास्तु का प्रभाव भी होता था तो उसे समय रहते बदल दिया जाता था,लेकिन आज के भागम भाग युग में हर कोई आज ही मकान बनाकर उसके अन्दर ग्रह-प्रवेश कर लेना चाहता है। कई मंजिला मकान बनाने के लिये जो ढांचा बनाना पडता है उसके लिये पहले जमीन में जाल भरा जाता है,उस जाल को भरने के बाद बीम भरे जाते है,उन बीमों को भरने के बाद कुछ समय के लिये उन्हे छोड दिया जाता है,उसके बाद उनकी कार्य लेने की गति के अनुसार बाकी का साज सज्जा वाला काम किया जाता है। बीम के अन्दर या जाल के अन्दर जो सरिया सीमेंट बजरी और रोडी आदि प्रयोग में ली जाती है उसे मानक दंडों से माप कर ही प्रयोग में लाया जाता है,बडे बडे जो पुल बनाये जाते है उनके अन्दर भले ही दो इन्च की जगह रखी जाये लेकिन जगह जरूर छोडी जाती है,जिससे गर्मी के मौसम में अगर बीम अपने स्थान से बढता है तो वह अपनी जगह पर ही बना रहे,नीचे नही गिरे,जैसे रेलवे लाइनों के बीच में जगह छोडी जाती है,उसी प्रकार से घर बनाने के समय डाले गये बीम में किसी ना किसी प्रकार की जगह छोडी जाती है,इसके अलावा गर्मी और सर्दी का असर देखने के लिये रोजाना की तराई भी अपना काफ़ी काम करती है,जून के महिने में अगर मकान को बनाया जाता है तो रोजाना की जाने वाली पानी की तराई उस लगे हुये सीमेंट और सरिया के अन्दर अपना घटाने और बढाने वाला औसत बनाने के लिये काफ़ी अच्छा माना जाता है,तराई करते वक्त सीमेंट बजरी और सरिया रोडी अपने स्थान से सिकुडते भी है और पानी की तरावट पाकर सीमेंट अपने अन्दर पानी के बुलबुलों से जगह भी बनाता है,इस प्रकार से दिवाल में एक फ़ोम जैसा माहौल बन जाता है जो किसी भी मौसम में उसी प्रकार से काम करता है जैसे फ़ोम को दिशा के अनुसार घटाया बढाया जा सकता है। यह ध्यान रखना चाहिये कि मकान का झुकाव हमेशा ईशान की तरफ़ होता है,कितनी ही डिग्री को संभाल कर बनाया जाये लेकिन कुछ समय उपरान्त मकान ईशान की तरफ़ कुछ ना कुछ डिग्री में झुकेगा जरूर,इसका कारण सूर्य की गर्मी वाली किरणें शाम के साम पश्चिम दिशा की तरफ़ से पडती है और रात हो जाने के बाद ईशान दिशा सबसे पहले ठंडी हो जाती है,गर्मी हमेशा ठंड की तरफ़ भागती है,इसी प्रक्रिया के कारण मकान का झुकाव ईशाव की तरफ़ हो जाता है।

कहावत है कि “कमाना हर किसी को आता है खर्च करना किसी किसी को आता है”,शरीर और मकान की रूपरेखा को समझना और सजाना संवारना एक जैसा ही है। आज के जमाने में जब व्यक्ति को एक समय का भोजन जुटाना भारी है उसके बाद मकान का बन्दोबस्त करना कितनी टेढी खीर होगी इसका अन्दाज एक मध्यम वर्गीय परिवार आराम से लगा सकता है। हाँ उन लोगों को कोई फ़र्क नही पडता है जिनके बाप दादा कमा कर रख गये है और वे अपने जीवन में मनमाने तरीके से खर्च कर रहे है,लेकिन उनकी औलादों के लिये भी सोचना तो पडेगा ही। मकान बनाने के लिये जीवन की गाढी कमाई को प्रयोग में लेना पडता है,उस गाढी कमाई को अगर समझ बूझ कर खर्च नही किया तो वह एक दिन अपने ही कारण से रोना बन कर रह जाती है। मकान का ढांचा इस प्रकार से बनाना चाहिये कि वह किसी भी तरह के बोझ को आराम से सहन कर ले। जून की गर्मी हो या अगस्त की बरसात अथवा दिसम्बर का जाडा,सभी ऋतुओं की जलवायु को मकान का ढांचा सहन कर लेता है तो वह आराम से निवास करने वालों के लिये दिक्कत वाला नही होता है। प्रकृति के नियम के अनुसार अक्सर जाडे में बनाये हुये मकान गर्मी में अपनी बनावट में परिवर्तन करते है,अक्सर भारत के मध्य में जो मकान गर्मी में बन जाते है वे दिसम्बर में अपने अन्दर बदलाव करते है। मकान का ढांचा अपने स्थान से कुछ ना कुछ घटता है,इस घटाव के कारण अगर मकान का ढांचा बनाकर फ़टाफ़ट पलस्तर कर दिया गया है और उसके बाद फ़टाफ़ट रंग रोगन कर दिया गया है तो वह कहीं ना कहीं से चटक दिखायेगा जरूर,मकान की चटक किसी भी तरह से रंग रोगन के बाद दबाने से नही दबती है,वह अगली साल में अपनी फ़िर से रंगत दिखा देती है और अच्छा पैसा लगाने के बाद भी समझ में नही आता है कि मकान की चटक को कैसे दबाया जाये। अक्सर बडे बडे कारीगर और मकान का निर्माण करने वाले कह देते है कि मकान ने सांस ले ली है। भूतकाल में जो मकान बनाये जाते थे,वे धीरे धीरे बनाये जाते थे,जैसे जैसे हाथ फ़ैलता था मकान का निर्माण कर लिया जाता था,और जब मकान धीरे धीरे बनता था जो लाजिमी है कि मकान का पहले ढांचा बनता था फ़िर कुछ समय बाद पलस्तर होता था उसके बाद महीनो या सालों के बाद उसके अन्दर रंग रोगन किया जाता था। वे मकान आज भी सही सलामत है कोई उनके अन्दर दरार या कमी नही मिलती है। किसी प्रकार से वास्तु का प्रभाव भी होता था तो उसे समय रहते बदल दिया जाता था,लेकिन आज के भागम भाग युग में हर कोई आज ही मकान बनाकर उसके अन्दर ग्रह-प्रवेश कर लेना चाहता है। कई मंजिला मकान बनाने के लिये जो ढांचा बनाना पडता है उसके लिये पहले जमीन में जाल भरा जाता है,उस जाल को भरने के बाद बीम भरे जाते है,उन बीमों को भरने के बाद कुछ समय के लिये उन्हे छोड दिया जाता है,उसके बाद उनकी कार्य लेने की गति के अनुसार बाकी का साज सज्जा वाला काम किया जाता है। बीम के अन्दर या जाल के अन्दर जो सरिया सीमेंट बजरी और रोडी आदि प्रयोग में ली जाती है उसे मानक दंडों से माप कर ही प्रयोग में लाया जाता है,बडे बडे जो पुल बनाये जाते है उनके अन्दर भले ही दो इन्च की जगह रखी जाये लेकिन जगह जरूर छोडी जाती है,जिससे गर्मी के मौसम में अगर बीम अपने स्थान से बढता है तो वह अपनी जगह पर ही बना रहे,नीचे नही गिरे,जैसे रेलवे लाइनों के बीच में जगह छोडी जाती है,उसी प्रकार से घर बनाने के समय डाले गये बीम में किसी ना किसी प्रकार की जगह छोडी जाती है,इसके अलावा गर्मी और सर्दी का असर देखने के लिये रोजाना की तराई भी अपना काफ़ी काम करती है,जून के महिने में अगर मकान को बनाया जाता है तो रोजाना की जाने वाली पानी की तराई उस लगे हुये सीमेंट और सरिया के अन्दर अपना घटाने और बढाने वाला औसत बनाने के लिये काफ़ी अच्छा माना जाता है,तराई करते वक्त सीमेंट बजरी और सरिया रोडी अपने स्थान से सिकुडते भी है और पानी की तरावट पाकर सीमेंट अपने अन्दर पानी के बुलबुलों से जगह भी बनाता है,इस प्रकार से दिवाल में एक फ़ोम जैसा माहौल बन जाता है जो किसी भी मौसम में उसी प्रकार से काम करता है जैसे फ़ोम को दिशा के अनुसार घटाया बढाया जा सकता है। यह ध्यान रखना चाहिये कि मकान का झुकाव हमेशा ईशान की तरफ़ होता है,कितनी ही डिग्री को संभाल कर बनाया जाये लेकिन कुछ समय उपरान्त मकान ईशान की तरफ़ कुछ ना कुछ डिग्री में झुकेगा जरूर,इसका कारण सूर्य की गर्मी वाली किरणें शाम के साम पश्चिम दिशा की तरफ़ से पडती है और रात हो जाने के बाद ईशान दिशा सबसे पहले ठंडी हो जाती है,गर्मी हमेशा ठंड की तरफ़ भागती है,इसी प्रक्रिया के कारण मकान का झुकाव ईशाव की तरफ़ हो जाता है।

दोषी ज्योतिषी या ज्योतिष पूँछने वाला ????

एक महिला ने अमेरिका से अपनी बच्ची की जन्म तारीख भेजी और जानना चाहा कि इसकी कुंडली में कोई दोष है क्या ? मैने कुंडली देखी और जबाब जैसा लिखता आया हूँ वैसा लिख दिया कि इस बच्ची का शनि अच्छा है और काम करने के बाद सीखने वाली लडकी है,शिक्षा मे थोडा धीरे चलेगी क्योंकि शनि की दशा चल रही है। उसने अमेरिका और भारत के अन्य ज्योतिषियों के बार में कहा कि इस लडकी के लिये कह दिया गया है कि यह छ: महिने से अधिक जिन्दा नही रहेगी,मुझे आश्चर्य हुआ कि मौत का मालिक अगर लगन में गुरु की द्रिष्टि से पूर्ण हो और उसके बारे में कह दिया जाये कि वह मर जायेगी,”दिवाल बनकर जिसकी रक्षा हवा करे,वह शमा क्या बुझे जिसे रोशन खुदा करे”,इस मामले में सोचना पडा,उसने दूसरे ईमेल में लिखा कि उसके पहले बच्चे के प्रति भी इसी प्रकार की भविष्यवाणी की गयी थी,और अमेरिका में उसने उस बच्चे का ज्योतिषीय उपाय करवाने के चक्कर में तीन हजार डालर खर्च कर दिये,तथा भारत में उस बच्चे के उपाय के लिये तीस हजार रुपये खर्च कर दिये थे। ईमेल की कापी संलग्न फ़ोटो मे आप देख सकते हैं।इसे पढने के बाद सोचना पडता है कि जिस विद्या को हमारे ऋषि मुनि पूर्वज केवल मनुष्य के हित के लिये प्रदान करके गये है और उसे अगर अपने स्वार्थ के लिये इस तरीके से डराकर प्रयोग किया जायेगा तो विद्या का अन्त निश्चित है,कारण लोगों का भाव इस विद्या के प्रति भी व्यवसायिक हो जायेगा,और धर्म को बेच कर खाने वाली बात से फ़िर मुकरा नही जा सकता है। एक बहुत ही प्रसिद्ध ज्योतिषी जी से मेरी इस मामले में बात हुयी तो उन्होने मेरे से उल्टा सवाल ही कर डाला,-”एक डाक्टर अपनी पढाई किसलिये करता है,उसे अपनी फ़ीस देनी पडती है,उसे अपने समय को खराब करना पडता है वह मरीज को देखने और सलाह देने के ही पैसे लेता है,उसी तरीके से जब हमने ज्योतिष की पढाई की है और उस पर नये नये कारण खोजे है,तो हम पैसा क्यों नही ले सकते”,मैने उनसे फ़िर सवाल किया कि फ़िर पैसा लेना है तो केवल अपनी फ़ीस ही लो,डराकर धन बटोरने से तो पाप ही लगेगा,वे फ़िर तमक कर बोले,-” एक डाक्टर को तबियत खराब होने पर दिखाने जाते है,वह कई प्रकार की जाचें करने के लिये अलग अलग जगह पर बनी लेब्रोटरियों में भेज देता है,उसके बाद जब जांच पूरी हो जाती है तो इलाज करता है,इलाज में लगने वाले दवाई और मशीनों के खर्चे को वह लेता है कि नहीं,और जब कोई ग्राहक अच्छे पैसे वाला होता है तो डाक्टर भी उससे धन केवल इसीलिये कमाता है क्योंकि पैसे वाले का धन अगर डाक्टर नही कमायेगा तो वह उसे खर्च कहाँ करेगा,डाक्टर को भी धन की जरूरत होती है वह दवाइयों की एवज में लेब्रोटरी की जाचों के दौरान मिलने वाले कमीशन के रूप में,दवाई किसी मेडिकल स्टोर से खरीदने के लिये कहने पर उससे भी कमीशन के रूप में प्राप्त करता है,तो ज्योतिषी भी मेहनत करता है पढाई करता है,रत्नों को बताता है,रत्नों की परख को पहिचानता है,तो वह भी डाक्टर की तरह से ही धन कमा सकता है”,मेरा उनकी बात सुनकर दिमाग खराब हो गया,मैने दूसरे ज्योतिषी से पूँछा भाई तुम आज कल क्याकर रहे हो,वे तपाक से बोले अपनी आफ़िस का अपग्रेडेशन करवा रहा हूँ,उसमे नया फ़र्नीचर लगवा रहा हूँ,रिसेप्सनिष्ट को बैठने की जगह बना रहा हूँ,उसे एयरकण्डीशन वाला बना रहा हूँ,मैने उनसे पूंछा कि ज्योतिष में इन चीजों की क्या जरूरत पड गयी,वे बोले आज की दुनिया बहुत आरामतलब हो गयी है,लोगों को पूंछने के लिये समय देना पडता है,अगर कोई जब तक घंटा दो घंटा इन्तजार ना कर ले तब तक काहे की प्रसिद्धि,भले ही केबिन में बैठ कर कम्पयूटर से चेटिंग की जा रही हो,लेकिन बाहर बैठे सज्जन को यही पता होगा कि मैं किसी काम में व्यस्त हूँ,मेरा माथा तुनक गया कि एक साल में कम से कम बीस हजार लोगों को लिखता हूँ,कोई दो चार लोग अपनी इच्छा से दक्षिणा भेजदेते है.इसकी एवज में क्या करना चाहिये,लोगों को डराकर धन कमाने से अच्छा है डकैती डालनी शुरु कर देनी चाहिये,या फ़िर जो मर रहा है उसका इन्तजार कर लेना चाहिये या जल्दी से उसे और मारने का उपाय करना चाहिये,जिससे कम से कम उसके अंग तो काम आ ही जायेंगे,डाक्टरों की बुद्धि से किडनी भी बिक जायेगी,आंखे भी बिक जायेंगी,और न जाने क्या क्या बिक जायेगा। अंकुश लगाने की बजाय लोगों को इनपर इतना भरोसा हो जाता है कि अपने घर की पूरी रामायण तो इन्हे बता ही देते है,और जब ज्योतिषी जी पूरी घर की गाथा को सुन लेते है तो उन्हे अच्छी तरह से काटने का मौका भी मिल जाता है।

एक संत अगर तपस्या करने के बाद अपनी तपस्या से प्राप्त सिद्धि को बेचने का काम करने लगते है तो तपस्या का कोई औचित्य तो रहा नहीं,उसी प्रकार से जो सितारों की विद्या को सीख लेता है और सितारों की एवज में लोगों को काटने का इन्तजाम अपने स्वार्थ के लिये करता है तो उन्हे क्या सितारों के द्वारा दिये जाने वाले कष्टों का भी भान नही होता है।धार्मिक प्रवचन देने वाला,अगर कुछ किताबों का अध्ययन करके और बोलने की क्लास ज्वाइन करने के बाद एक सभा बनाकर धार्मिक प्रवचनों को लय बद्ध तरीके से करता है और अधिक से अधिक जनता को बटोरने का काम करता है तो वह भी धर्म को बेचकर खाने वाला हो गया ? अगर धर्म बिकने लगा है तो धर्म के अन्दर ही भगवान आते है,यानी भगवान भी बिकने लगे । भगवान के बिकने पर केवल जो धनी है या फ़िर चालाकी जानते है वे ही भगवान को मना सकते है,ज्योतिषी जिस बात से डराकर धन वसूलते है और अपने ठाट बाट को चलाकर नाम कमाने की इच्छा से जायदाद इकट्ठी करने पर विश्वास करते है क्या उन्हे नही पता होता है कि कल उन्हे भी अपने कार्यों का जबाब देना पडेगा। हर व्यक्ति को पता है कि समयानुसार ही कार्य होता है,उसे कम या अधिक अपने अपने विवेक से बनाया जाता है,लेकिन विवेक का प्रयोग नही करने पर केवल धोखा खाना ही होता है। मैने एक बार पढा था कि “चमक दमक और मीठी मीठी बातें स्त्री और मूर्खों को ही पसंद होती है”यह बात आज सोलह आने सही मिल रही है। मुझे लगता है कि अगर लोग इसी तरह से इस ज्योतिष को डराकर कमाने वाली विद्या के रूप में प्रयोग करते रहे,तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब लोग ज्योतिष या ज्योतिषी के नाम से डरकर अपने बारे में जो दिग्दर्शन लेना भी उसे भी लेना पसंद नहीं करेंगे.

विद्या के तीन स्थान माने जाते है,पहला चौथा भाव होता है दूसरा उसके पंचम में यानी मृत्यु का आठवां भाव होता है और सबसे महत्वपूर्ण बारहवां भाव होता है। विद्या के लिये अपने को पहले सबसे नीचे यानी मृत्यु भाव मे ले जाना पडता है,और समझना पडता है कि हम कुछ नही है,जिसके अन्दर हम का भाव पैदा हो जाता है वह विद्या को प्राप्त नही कर सकता है। दूसरे विद्या के प्रति जो भी शरीर या शरीर से प्राप्त साधन होते है सभी को तिलांजलि देनी पडती है। इन तीन भावों में अगर किसी भी एक में गुरु का प्रभाव हो जाता है तो जातक जीवन में विद्या में सफ़लता ले लेता है। गुरु को बल देने के लिये जो ग्रह सामने आते है वे भी अपनी अपनी योगात्मक शक्तियां देकर जातक को अपने अपने क्षेत्र में ले जाने की कोशिश करते हैं। गुरु जो ज्ञान का राजा कहा जाता है वह जब अष्टम में बैठ जाता है तो जातक को बाल में खाल निकालने की आदत भी होती है,वह अपने ज्ञान को कूडे के ढेर से भी निकाल सकता है,राहु मंगल की युति खून के अन्दर बल देने वाली होती है,लेकिन खून के अन्दर बल देने के कारकों में अगर शुक्र का समावेश हो जाता है तो वह नशा बजाय शिक्षा के अनैतिक रिस्तों की तरफ़ अपना झुकाव बना लेता है,इस जातक की कुंडली में शुक्र बुध और मंगल राहु का प्रभाव भी है लेकिन शुक्र के बक्री हो जाने से शुक्र का असर राहु के पास नही जा पा रहा है,शुक्र बुध की तरफ़ जा रहा है और बुध शुक्र की तरफ़ जा रहा है,इस काम को जातक की बहिने पूरा कर रही है जातक को अपने घर परिवार या औकात से कोई लेना देना नही है उसके सिर पर तो केवल ऊंची शिक्षा का भूत सवार है। जातक के जीवन में लगातार बढोत्तरी का एक कारण और भी बनता है कि वह अपने केतु को बारहवे भाव में लेकर पैदा हुआ है,केतु का स्थान सूर्य की सिंह राशि में है,वह सरकारी शिक्षा संस्थानों में अकेला रहकर पढा है,वह अपने सभी काम अकेले कर सकता है,उसी किसी का भी यह सहारा लेने की जरूरत नही है कि उसे कोई चाय देगा तो वह अपनी पढाई को करेगा,उसे कोई चिन्ता नही है कि खाने में आज क्या बना है,उसे कोई चिन्ता नही है कि वह आज चटाई पर सो रहा है,उसके अन्दर तो एक ही भूत भरा है कि वह अच्छी सी अच्छी शिक्षा लेकर सबसे ऊंची पोस्ट पर जाकर विराजमान हो जाये,गुरु ने जो रिस्क के भाव में बैठा है उसे अपनी पंचम द्रिष्टि से आगे से आगे बढाने की कोशिश कर रहा है,वह अन्धेरे स्थान में रहकर भी पढने के लिये अपनी योग्यता को बता रहा है। कालपुरुष का कार्य तीन भावों से जाना जाता है,एक कालपुरुष दूसरे भाव के धन और भौतिक साधनों का प्रयोग करने के बाद अपने जीवन को चलाने के लिये प्रयोग करता है,दूसरे कालपुरुष अपने द्वारा दूसरों की सेवा करने से प्राप्त धन को प्रयोग करने के बाद अपने जीवन को चलाने की कोशिश करता है,तीसरा कालपुरुष अपने पैतृक व्यवसाय को प्रयोग करने के बाद अपने जीवन को चलाने की कोशिश करता है,इस जातक की कुंडली में अगर आप ध्यान से देखेंगे तो जीवन को चलाने के लिये कन्या राशि जो जीवन को नौकरी या सेवा करने के लिये जानी जाती है के अन्दर चन्द्रमा का स्थान है,चन्द्रमा माता से सम्बन्धित है,माता का नवें भाव से सम्बन्ध है,नवे भाव में वृष राशि का सूर्य विद्यमान है,जातक की माता को वित्त की प्राप्ति सूर्य यानी सरकार और सूर्य यानी पिता से प्राप्त होती है,उस वित्त को जातक की माता खर्च करने के लिये बारहवे भाव के केतु का प्रयोग करती है,बारहवे भाव का केतु सिंह राशि का है और यह केतु सरकारी शिक्षण संस्थानों को सम्भालने वाला भी माना जाता है और ईसाई मिसनरी वाले स्कूलों के सम्भालने वाले के रूप में भी माना जाता है,केतु का सम्बन्ध जब धनु के बक्री शनि से होता है तो वह माता के द्वारा किये खर्चे को जातक के विद्या के लिये और जातक के अस्थाई निवास के लिये भी खर्च करता है,इस शनि से पंचम में गुरु होने और गुरु का स्थान प्राइवेट स्थान में होने से जातक को उस संस्था के ही अध्यापकों द्वारा ट्यूशन आदि पढाकर भी ज्ञान दिया जाता है। माता के लिये शिक्षण संस्थान में रहने और विद्या के लिये खर्च करना लिखा है तो सूर्य यानी पिता के लिये ट्यूशन आदि के रूप में जातक की शिक्षा के प्रति धन खर्च करना लिखा है इस प्रकार से दोनो ही माता पिता जिनका सम्बन्ध पारिवारिक और धार्मिक है के प्रति जातक के प्रति ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभानी जरूरी हो जाती है। सूर्य से चन्द्रमा जब पंचम में होता है तो माता का पारिवारिक होना जरूरी है,लेकिन माता का पारिवारिक होना और माता के प्रति जातक के पिता का पूर्ण सहयोग होना तभी सम्भव है जब गुरु पिता के त्रिक भावों में अपना योगात्मक रूप दे रहा हो।

नवे भाव का सूर्य चाहे जिस राशि में हो लेकिन उसका तेज पीलापन लिये होता है,पीलापन लेकर सूर्य मर्यादा मे रहकर चलने वाला होता है,सूर्य के अन्दर पीलापन तभी होता है या तो वह अस्त हो रहा हो या सूर्य उदय हो रहा हो,जातक की कुन्डली में सूर्य के द्वारा शनि को पूर्ण अष्टम द्रिष्टि से देखा जाना भी एक विशिष्ट बात को पैदा करता है कि सूर्य को भी रिस्क लेने की आदत है,रिस्क वही ले सकता है जिसके अन्दर यह भावना हो कि जो मेरा है वह तो मेरे ही पास रहेगा,और जो मेरा नही है वह तो चला ही जाना है। अक्सर जो यह भावना रखते है वे सफ़ल होने के रास्ते पर अपने अनुसार चले जाते है। मेष राशि का सूर्य उच्च का होता है और तुला राशि का शनि उच्च का माना जाता है,राशि से आगे के तीन घरों में सूर्य अपनी उच्चता को कायम रखता है,जैसे कि मिथुन राशि के दस अंश तक सूर्य अपनी उच्चता को कायम रखता है,इस सूर्य का प्रबल प्रताप भी कभी कभी देखने को जब मिलता है जब सूर्य गुरु के घर में ही जाकर बैठ गया हो,जब ईश्वर भलाइयां देता है सुख देता है तो उसी हिसाब से ईश्वर उसे बुराइयां और और दुख भी देता है,इस जातक के साथ जैसे उच्च पदवी वाले कारण दिये गये है तो निम्न प्रकार के कठोर दुख भी दिये गये है,राहु से आगे गुरु तक बीच में कोई ग्रह नही होने के कारण जातक के साथ हमेशा कोई ना कोई हादसा होता ही रहेगा,इन हादसों में जातक के बडे भाई के साथ हादसा मिलता है,जातक की पत्नी के हादसा मिलता है जातक को जीवन से कभी कभी अरुचि होने के कारण भी गुरु केतु का आपस का सम्बन्ध देता है,जातक के अन्दर खून का उबाल उसे कहीं से कहीं लेजाकर पटक सकता है,जातक के अन्दर नशे वाली आदतें पनप सकती है जातक अपनी कर्णधार माता के लिये अपमान दे सकता है,जातक के अन्दर खून की खराबियां पैदा हो सकती है,शुक्र का बक्री हो जाना और बुध का साथ होना जातक के लिये राजयोग का बाधक भी बन सकता है,जातक की पत्नी अधिक गुस्सा के कारण जातक का साथ छोड सकती है,शुक्र बुध की युति जातक को अवैद्य सम्बन्धों की तरफ़ भी ले जा सकता है,आदि बातें भी सोचनीय होती हैं

वास्तु के नियम—

कहावत है कि आधा भाग्य मनुष्य का और आधा भाग्य रहने वाले स्थान का काम करता है,अगर किसी प्रकार से मनुष्य का भाग्य खराब हो जावे तो रहने वाले घर का भाग्य सहारा दे देता है,और जब घर का भाग्य भी खराब हो और मनुष्य का भाग्य भी खराब हो जावे तो फ़िर सम्स्या पर समस्या आकर खडी हो जाती है और मनुष्य नकारात्मकता के चलते सिवाय परेशानी के और कुछ नही प्राप्त कर पाता है.मैने अपने पच्चीस साल के ज्योतिषीय जीवन में जो अद्भुत गुर वास्तु के स्वयं अंजवाकर देखे है,और लोगों को बता कर उनकी परेशानियों का हल निकालने में सहायता दी है वह विकिपीडिया के पाठकों को सप्रेम अर्पित कर रहा हूँ,यह कोई ढकोसला या प्रोप्गंडा नही है.

वास्तु क्या है…???

कम्पास को देखने के बाद और पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव के बारे में सभी जानते है,कम्पास की सुई हमेशा उत्तर की तरफ़ रहती है,कारण खिंचाव केवल सकारात्मक चुम्बकत्व ही करता है और विपरीत दिशा में धक्का देने का काम नकारात्मक चुम्बकत्व करता है,कभी आपेन चुम्बक को देखा होगा होगा,उसकी उत्तरी सीमा में लोहे को ले जाते ही वह चुम्बक की तरफ़ खिंचता है और नकारात्मक सीमा में ले जाते ही वह चुम्बक विपरीत दिशा की तरफ़ धक्का देता है,उत्तरी ध्रुव पर सकारात्मक चुम्बकत्व है,और दक्षिणी ध्रुव की तरफ़ नकारात्मक चुम्बकत्व है,उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की तरफ़ लगातार बिना किसी रुकावट के प्रवाहित होती रहती है,यही जीवधारियों के अन्दर जो जैविक करेन्ट उपस्थित होता है,वह इस प्रवाहित होने वाले चुम्बकीय प्रभाव से अपनी गति को बदलता है,सकारात्मक प्रभाव के कारण दिमाग में सकारात्मक विचार उत्पन्न होते है और नकारात्मक प्रभाव के कारण नकारात्मक प्रभाव पैदा होते है.

सकारात्मकता के होते भी नकारात्मक प्रभाव—-

मनुष्य शरीर के पैर के तलवे,और हाथों की हथेलियां दोनो ही शरीर के करेंट को प्रवाहित करने और सोखने के काम आती हैं,हाथ मिलाना भी एक ऊर्जा को अपने शरीर से दूसरे के शरीर में प्रवाहित करने की क्रिया है,चुम्बन लेना और देना भी अत्यन्त प्रभावशाली ऊर्जा को प्रवाहित करने और सोखने का उत्तम साधन है,बिना चप्पल के घूमना शरीर की अधिक सकारात्मक ऊर्जा को ग्राउंड करने का काम है जबकि लगातार चप्पल पहिन कर और घर में रबर का अधिक प्रयोग करने पर व्यक्ति अधिक उत्तेजना में आ जाता है,और नंगे पैर रहने वाला व्यक्ति अधिकतर कम उत्तेजित होता है.नकारात्मक पभाव का असर अधिकतर स्त्रियों में अधिक केवल इसलिये देखने को मिलता है कि वे अपने निवास स्थान में नंगे पैर अधिक रहना पसम्द करती है,और जो स्त्रियां पुरुषॊ की तरह से चप्पले या जूतियां पहना करती है वे सकारात्मक काम करना और सकारात्मक बोलना अधिक पसंद करती है.सूर्य सकरात्मकता का प्रतीक है,सूर्योदय के समय जो प्रथम किरण निवास स्थान में प्रवेश करती है,वह ऊर्जा का पूरा असर निवास स्थान में भरती है,और जो भी लोग उस निवास स्थान में रहते है,चाहे वह पशु पक्षी हो या मनुष्य सभी को उसका प्रभाव महसूस होता है.भारत के पुराने जमाने के जो भी किले बनाये जाते थे,उनका सबका सामरिक महत्व केवल इसलिये ही अधिक माना जाता था कि,उनके दरवाजे दक्षिण की तरफ़ ही अधिकतर खुलते थे,मन्दिर जिनके भी दरवाजे दक्षिण की तरफ़ खुलते है,वे सभी मन्दिर प्रसिद्ध है,अस्पताल भी दक्षिण मुखी प्रसिद्ध इसी लिये हो जाते है कि उनका वास्तविक प्रभाव मंगल से जुड जाता है.

साउथ फ़ेसिंग मकान और कार्य स्थलों मे अन्तर—

साउथ को मंगल का क्षेत्र कहा गया है,उज्जैन में मंगलनाथ नामक स्थान पर जो मंगल का यंत्र स्थापित है उसकी आराधना करने पर आराधना करने वाले का फ़ेस दक्षिण की तरफ़ ही रहता है,मन्दिर का मुख्य दरवाजा भी दक्षिण की तरफ़ है,मंगल का रूप दो प्रकार का ज्योतिष में कहा गया है,पहला मंगल नेक और दूसरा मंगल बद,मंगल नेक के देवता हनुमानजी,और मंगल बद के देवता भूत,प्रेत,पिसाच आदि माने गये है.इसी लिये जिनके परिवारों में पितर और प्रेतात्मक शक्तियों की उपासना की जाती है,अधिकतर उन लोगों के घर में शराब कबाब और भूत के भोजन का अधिक प्रचलन होता है,जबकि नेक मंगल के देवता हनुमानजी की उपासना वाले परिवारों के अन्दर मीठी और सुदर भोग की वस्तुओं के द्वारा पूजा की जाती है.साउथ फ़ेसिंग मकान में रहने वाले लोग अगर तीसरे,सातवें,और ग्यारहवें शनि से पूरित हैं तो भी वे अच्छी तरह से निवास करते हैं.साउथ फ़ेसिंग भवन केवल डाक्टरी कार्यों,इन्जीनियरिन्ग वाले कार्यों,बूचडखानों,और भवन निर्माण और ढहाने वाले कार्यों, के प्रति काफ़ी उत्साह वर्धक देखे गये हैं,धार्मिक कार्यों का विवेचन करना,पूजा पाठ हवन यज्ञ वाले कार्यों,आदि के लिये भी सुखदायी साबित हुए हैं,टेक्नीकल शिक्षा और बैंक आदि जो उधारी का काम करते हैं,भी सफ़ल होते देखे गये है,गाडियों के गैरेज और वर्कशाप आदि का मुख दक्षिण दिशा का फ़लदायी होता है,होटल और रेस्टोरेंट भी दक्षिण मुखी अपना फ़ल अच्छा ही देते है.

वास्तु के नियमों का विवेचन—

कुन्डली को देखने के बाद पहले कर्म के कारक शनि को देखने के बाद ही मकान या दुकान का वास्तु पहिचाना जाता है,राहु जो कि मुख्य द्वार का कारक है,को अगर मंगल के आधीन किया जाता है तो वह शक्ति से और राहु वाली शक्तियों से अपने को मंगल के द्वारा शासित कर लिया जाता है,राहु जो कि फ़्री रहने पर अपने को अन्जानी दिशा में ले जाता है,और पता नही होता कि वह अगले क्षण क्या करने वाला है,इस बात को केवल मंगल के द्वारा ही सफ़ल किया जा सकता है.हर ग्रह को समझने के लिये और हर ग्रह का प्रभाव देखने के बाद ही मुख्य दरवाजे का निर्माण उत्तम रहता है,अग्नि-मुखी दरवाजा आग और चोरी का कारक होता है,यह नियम सर्व विदित है,लेकिन उसी अग्नि मुखी दरवाजे वाले घर की मालिक अगर कोई स्त्री है और वह घर स्त्री द्वारा शासित हि तो यह दिशा जो कि शुक्र के द्वारा शासित है,और स्त्री भी शुक्र का ही रूप है,उस घर को अच्छी तरह से संभाल सकती है,लेकिन उस घर में पुरुष का मूल्य न के बराबर हो जाता है,दूसरी विवाहित स्त्री के घर में स्थान पाते ही और उसके पुत्र की पैदायस के बाद ही वह घर या तो बिक जाता है,या फ़िर खाली पडा रहता है,उस घर का पैसा भी स्त्री सम्बन्धी परेशानियों में जिसका शनि और केतु उत्तरदायी होता है,के प्रति कोर्ट केशों और वकीलों की फ़ीस के प्रति खर्च कर दिया जाता है.ईशान दिशा सूर्योदय की पहली सकारात्मक किरण को घर के अन्दर प्रवेश देती है,अगर किसी प्रकार से इस पहली किरण को बाधित कर दिया जाये और उस किरण को जिस भी ग्रह से मिलाकर घर के अन्दर प्रवेश दिया जाता है,उसी ग्रह का प्रभाव घर के अन्दर चालू हो जाता है,पहली किरण के प्रवेश के समय अगर कोई बिजली का या टेलीफ़ोन का खम्भा है,तो पहली किरण केतु को साथ लेकर घर में प्रवेश करेगी,और केतु के १८० अंश विपरीत दिशा में राहु अपने आप स्थापित हो जाता है,यह राहु उस घर को संतान विहीन कर देगा,या फ़िर वहां पर बने किसी भी प्रकार कृत्रिम निर्माण को समाप्त करके शमशान जैसी वीरानी दे देगा,इस बात का सौ प्रतिशत फ़ल आप किसी भी मन्दिर या मीनार की पहली सूर्योदय की किरण के पडने वाले स्थान को देखकर लगा सकते है,उस मंदिर या मीनार के दक्षिण-पश्चिम दिशा में वीराना ही पडा होगा.

वास्तुशास्त्र के अचूक प्रयोग—-

वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों के अनुसार अगर मकान या व्यवसायिक भवन का निर्माण नही हुआ है तो कुछ अचूक उपायों के द्वारा वास्तु में सुधार किया जा सकता है। यह तो पता ही है कि वास्तु का प्रभाव जीवन में धर्म अर्थ काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों में बराबर का पडता है,अगर धर्म खराब हो जाता है तो अर्थ पर भी असर आता है और अर्थ के खराब होने पर काम पर असर आयेगा और काम पर असर आते ही मोक्ष नही मिल पायेगा। पहले इन पुरुषार्थों को समझ लेना उचित रहेगा।

धर्म—

धर्म का मतलब कोई पूजा पाठ और जाप हवन से ही नही माना जाता है धर्म के और भी कई रूप है,माता पिता ने जन्म दिया है और उन्होने बिना किसी मोह के परवरिस केवल इसलिये की है कि उनका नाम चले और उनके नाम चलने के बाद उनकी संतान इस संसार में अपने नाम को चलाकर आगे की संतति को सही रूप से पाल पोश कर बडा बनाये,इसलिये भी माना जाता है कि माता पिता के बुजुर्ग होने के बाद उनकी संतान उनकी भी देखभाल करे,उनकी मृत्यु के समय उनकी संतान उनके पास हो और वे आराम से अपनी अन्तगति को प्राप्त कर सकें। घर मे रहने वाले लोग अगर अपने अपने अनुसार घर के अन्दर के सदस्यों और उन सदस्यों के रिस्तेदारों को मानते है आने जाने पर और घर के अन्दर रहने के समय चाही गयी आवभगत और एक दूसरे की तकलीफ़ में शामिल होते है,किसी समय चाही गयी सहायता में एक दूसरे की सहायता करते है यह ही धर्म का रूप कहा गया है,फ़र्ज को निभाना और एक ही घर के सदस्य होने के बाद भी तुमने हमारे साथ क्या किया है,हमने तुम्हारे साथ क्या किया है,इन बातों से धर्म नही माना जाता है,परिवार का मतलब होता है सभी सदस्य एक दूसरे के प्रति समर्पित होते है,और किसी भी आडे वक्त पर एक दूसरे के काम आते है। अगर इन बातों में फ़र्क है और घर के अन्दर एक दूसरे की बातों और कार्यों के प्रति बुराइया की जाती है एक दूसरे पर आक्षेप विक्षेप किये जाते है किसी ने किसी की किसी भी मामले में सहायता की है तो उसके प्रति अहसान दिया जा रहा है तो भी धर्म का रूप खराब हो जाता है। इसी प्रकार से घर जहां पर बना है उसके आसपास के पडौसियों से बनती नही है,बात बात पर नालियों और दरवाजों पर किये जाने वाले अतिक्रमणों का प्रभाव है,रोजाना किसी ना किसी मामले में थाना पुलिस होता है कोर्ट केश चलते है लडाई झगडा होता है तो भी वास्तु में धर्म नाम की कोई ना कोई बुराई मिलती ही है।

अर्थ—

अर्थ का रूप परिवार में आने वाली आय से माना जाता है। परिवार मे आने वाली आय के स्तोत्र अच्छे है और घर के बनने के बाद आय के साधनों में बढोत्तरी हुयी है या आय के साधनों में कमी आयी है,परिवार के लोग एक दूसरे से अधिक कमाने की प्रतिस्पर्धा कर रहे है कि एक दूसरे के भरोसे रहकर ही काम कर रहे है,घर बनाने के बाद या घर के अन्दर किये गये निर्माण या घर की बनावट रहन सहन करने के बाद कोई अक्समात फ़र्क कमाई पर पडा है आदि बातें वास्तु मे दोष की तरफ़ सूचित करती है,अक्सर देखा गया है कि वास्तु के बिगडते ही बेकार के खर्चे बढने लगते है घर के अन्दर की जाने वाली कमाइयां या तो अस्पतालों की दवाइयों में जाती है या लडाई झगडे में जाती है और कुछ नही तो घर के अन्दर अन्चाहा मेहमान आकर काफ़ी दिन के लिये रुक जाता है। घर के सदस्यों के अन्दर धन के मामले में तूतू मैं मैं होने लगती है,कर्जा बढने लगता है घर के ऊपर कर्ज ले लिये जाते है और वे चुकते नहीं है इस प्रकार से घर के चले जाने की चिन्ता दिमाग में लगी रहती है। घर में कन्या संतान का बोलबाला होने लगता है और उनकी शादी के बाद या तो घर कन्या संतान के हिस्से में चला जाता है अथवा कन्या सन्तान के ससुराल वाले किसी ना किसी राजनीति से घर के ऊपर कब्जा करने लगते है,यह सब अर्थ और भौतिक कारणों से वास्तु के खराब होने की बात कही जाती है। अभी जो कन्या संतान के मामले में बात लिखी है उसके अन्दर अक्सर इस प्रकार के घरों में दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) दिशा में पानी के बहने के स्थान,जमीन से पानी निकालने के साधन,अग्नि दिशा से ही पानी को उत्तर दिशा के लिये निकाला जाता हो,पानी सदर दरवाजे के दाहिने से निकाला जाता हो,पानी का बहाव सीढी नुमा दक्षिण से उत्तर की तरफ़ गिरता हो,घर के पांच सौ मीटर के दायरे में दक्षिण की तरफ़ बहती हुयी कोई नदी या कृत्रिम नहर बह रही हो। इसके अलावा वह घर भी कन्या संतान के द्वारा प्रताडित किया जाता है जिसके उत्तर-पूर्व में कोई बडा बिजली का ट्रांसफ़ारमर रखा हो या बिजली घर का सबस्टेशन आदि बना हो। अक्सर बुध का प्रभाव खतरनाक तब और हो जाता है जब घर की किसी महिला को घर के लोगों के द्वारा ही प्रताणित किया जाने लगा हो। वह महिला भी बिना कुछ बोले मन ही मन में परिवार को समाप्त करने की बददुआयें देने लगी हो,अथवा परिवार की बडी और इकलौती बहू हो। पश्चिम मुखी घर अक्सर इन कारणों से सात से पन्द्रह साल के अन्दर उजड जाते है,पूर्व मुखी घर बदचलनी की तरफ़ चले जाते है,दक्षिणमुखी घर रहते तो है लेकिन अक्सर बंद ही रहते है,उत्तर मुखी घर तमाम तरह के राजनीतिक आक्षेप विक्षेपों की बजह से आने वाली पीढी के लिये खतरनाक होजाते हैं।

काम—-

काम का मतलब शादी विवाह,सन्तान का जन्म और आगे की पीढी की बढोत्तरी से माना जाता है। घर के बनाने के समय काम नामक पुरुषार्थ का विशेष ख्याल रखना पडता है। घर के अन्दर जब पुत्र संतान है और उसकी शादी विवाह के बाद आगे की संतान भी सही सलामत है तो ही माना जा सकता है कि घर सही बना है,अगर घर बनाने के बाद घर में पुत्र संतान की शादी हो गयी,जब तक खुद का या पुत्र का भाग्य सही चला तब तक तो कोई परेशानी नही आयी,लेकिन कुछ समय बाद जैसे ही अपने भाग्य का असर बुरा हुआ और घर का भाग्य भी बुरा था ही अचानक छोटी छोटी बातों में घर के अन्दर क्लेश होने लगा,पुत्रवधू अचानक या तो अपने पीहर चली गई और वहां जाकर कोर्ट केश या अन्य तरह की परेशानी को पैदा करने में लग गयी,अथवा उसका मन नकारात्मक इनर्जी में समाता चला गया,वह लाख दवाई करने और तरह तरह के उपाय करने के बाद भी अपने को सही नही रख पायी,तो यह काम नाम के पुरुषार्थ का बिगडना कहा जा सकता है। अक्सर इस प्रकार के घरों का पानी सदर दरवाजे के नीचे से निकलता है,घर के अगल बगल में या सामने अथवा अग्नि कोण की तरह कोई नि:संतान व्यक्ति या काला या काना रहता होगा। घर के सामने कोई चरित्र से हीन स्त्री का निवास होगा,अथवा घर के बगल में कोई ऐसा व्यक्ति रहता होगा जो अपनी पत्नी से पीडित होगा और उसकी पत्नी नाजायज संबध अपने ही परिवार के व्यक्ति से बनाकर चल रही होगी। अक्सर इस प्रकार के घरों में महिलाओं का स्वास्थ किसी ना किसी कारण से खराब रहता है,इस प्रकार के घरों में घर का दरवाजा भी गंदगी से पूर्ण रास्तों पर खुलता है,अथवा घर के अग्नि कोण में पानी का साधन होता है।

मोक्ष—

घर के अन्दर जब उपरोक्त तीनो पुरुषार्थों को पूरा करने का साधन बनता है तभी मोक्ष यानी शांति का प्रादुर्भाव घर के अन्दर समावेशित होता है। खूब धन दौलत है खूब संतान घर के अन्दर है लेकिन घर में शांति नही है तो वह घर भूतों का डेरा ही माना जा सकता है। अक्सर समय से घर का निर्माण करने के लिये वेदों में बताया भी गया है,किसी घर के मालिक की कुंडली में शनि आठवें भाव में गोचर कर रहा है और उसने अपने घर को बनाने या निर्माण करने के बाद कुछ बदलाव करने की सोच ली तो उसका मतलब यह होगा कि घर में अगर पांच रुपये का खर्चा होगा तो अन्य कामों में पचास रुपये का खर्चा हो जायेगा। शांति की स्थापना के लिये घर के ईशान को समजना चाहिये। शांति की किरण सुबह के उगते सूर्य की किरण से जोडा जाता है,जिन घरों में सुबह की किरण प्रवेश करती है,वे घर सभी तरह से शांति मय कहे जाते है,घर में अगर सुबह की सूर्य की किरण नही पहुंचती है तो उन घरों में ईशान कोण में पूजा पाठ और कृत्रिम रोशनी का बन्दोबस्त करना पडता है,ध्यान रखना चाहिये कि ईशान की पूजा कभी धन को बढाने वाली नही होती है केवल घर के सदस्यों के मन को शांत करने वाली होती है घर के अन्दर जो भी काम किये जाते है वे शांति से पूरे होजाते है और सभी सदस्य नमक रोटी भी खाकर मजे से रहते हैं।

तलाक से बचने के तरीके—-

शादी एक पवित्र रिस्ता होता है जो व्यक्ति के काम नाम के पुरुषार्थ को पूर्ण करता है। वर या कन्या की शादी के लिये पहले वर या कन्या की तलाश की जाती है,पहले यह कार्य सगे सम्बन्धियों पर निर्भर हुआ करता था उसके बाद यह पत्र पत्रिकाओं पर निर्भर हो गया और आज यह नेट और शादी विवाह वाली साइटों पर निर्भर हो गया है। शादी करना एक मंहगी गाडी को खरीदने के जैसा है,गाडी को किस्त आदि पर खरीदा तो आसानी से जा सकता है लेकिन उसकी देख रेख और किस्तों के भुगतान का सही प्रबन्ध नही है तो वह गाडी किस्त देने वाले ले ही जायेंगे और बाद में सोचना पडेगा कि कितना नुकसान और कितना फ़ायदा हुआ,जो पहले जेब से था वह भी दे दिया और पेनल्टी में भी देना पडा,जानकार और परिवार के लोगों के बीच में बेइज्जती भी हुयी,कल अपने को शंहशाह समझे जाने वाले आज अपना चेहरा छुपाकर कमरे के अन्दर पड गये। शादी करने से पहले यह सोच लेना चाहिये कि पत्नी को लाने के पहले घर का वातावरण सही है,घर में बहने है वे कितनी होशियार है और शादी के बाद वे पत्नी से सामजस्य बिठा पायेंगी या नही,माँ का स्नेह पुत्र के प्रति आजीवन रहता है,पत्नी के आने के बाद माँ भी अपना अधिकार पूरा समझती है,माँ और पत्नी के बीच की खाई को पाटने के लिये हिम्मत है कि नहीं,यह भी सोचना चाहिये कि बहू किसी दूसरे घर से आयेगी और उस घर के रीति रिवाज और चाल चलन अच्छे भी हो सकते है और बुरे भी हो सकते है,उन्हे सम्भालने की हिम्मत है कि नही,अगर यह सोचा जाये कि पैसा बहुत है और किसी भी समस्या का समाधान पैसे से निकाल लिया जायेगा तो यह बहुत बडी भूल है,शादी और पैसे में जमीन आसमान का फ़र्क है,शादी सन्तति की बढोत्तरी और ग्रहस्थ जीवन के लिये की जाती है जबकि पैसा जीवन यापन में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिये कमाया जाता है। अगर सही पत्नी मिली है और वह घर को चलाना जानती है तो धन की एक बार कमी भी हो जायेगी तो पत्नी घर को चलाकर आगे की स्थिति को सम्भाल लेगी,लेकिन कितना ही पैसा है और पत्नी की नजर अगर घूम गयी तो पूरा पैसा और इज्जत मान सम्मान सभी बरबाद होने में देर नही लगती है।

पति को पत्नी को खोजने के लिये जहां तक हो अपने रिस्तेदारों से सम्पर्क में रहना चाहिये,जब कोई रिस्तेदारी में पत्नी जो जीवन में साथ देने वाली नही मिले तब बाहर की दुनिया में अपनी कोशिश को करना चाहिये,नेट पर या पत्र पत्रिकाओं में आने वाले रिस्ते अक्समात भरोसा करने वाले नही होते है,जो लोग अपने समाज से कटे होते है और एकान्त जीवन जीने के आदी होते है वही इन बातों का सहारा लेते है,और सबसे अधिक सामाजिक व्यक्ति एक ही बात को समझ सकता है कि जो व्यक्ति अपने समाज और परिवार का ही नही हो सका है उसकी सन्तति जिससे शादी करनी है वह सामाजिकता और परिवार वाली बातों में कितना साथ दे पायेगी।
शादी विवाह के लिये चुने जाने वाले रिस्ते में शिक्षा को सबसे पहले देखा जाना चाहिये,शिक्षा के अन्दर यह भी देखना चाहिये कि लडकी ने शिक्षा को प्राप्त करने के लिये कितने समय अकेले जीवन को बिताया है,उस अकेले जीवन को बिताने के अन्दर वह अपनी प्राप्त करने वाली शिक्षा के अन्दर कितना परसेंट ला पायी है,अगर वह बाहर रहकर शिक्षा में कमजोर रही है तो यह बात जरूरी है कि उसने किसी न किसी प्रकार का रोग अपने दिमाग में पाला है और उस रोग के कारण उसकी पढाई कमजोर हुयी है या तो वह अपनी जिम्मेदारी को नही समझ कर तथा अपने परिवार वालों को धोखा देकर बोर्डिंग आदि में रहकर अथवा कम्पयूटर आदि से अपनी नेट वाली गतिविधियों के प्रति अपनी कारगुजारी करती रही है या मोबाइल से एस एम एस आदि से वह मानसिक प्यार प्रेम वाली भावना में बहती रही है इसलिये उसका शिक्षा के अन्दर परसेंटेज कम आया है। जब इस बात का ध्यान हो जाये तो समझना चाहिये कि जो व्यक्ति अपने परिवार वालों को जिन्होने उसे पाला पोषा बडा किया हर सुख दुख का ध्यान रखा उन्हे ही धोखा दे सकती है तो तुम्हारी पत्नी बनकर वह तुम्हारे साथ कितना भला कर सकती है।

खोजी जाने वाली पत्नी की माता के बारे में भी पता करना चाहिये कि वह अपने देवर जेठ सास स्वसुर और परिवार से कितना बनाकर चली है,अगर वह अपनी दूर रहने की मजबूरी को बयान करती है तो उसके पूर्व खान्दान के बारे में उनसे मिलकर पता करना चाहिये,कि उनकी बहू ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया है,वैसे यह भी कहा जायेगा कि जिनसे पूंछा गया है वे लोग पुराने रीति रिवाज के है,उन्हे उनसे जलन है आदि,लेकिन एक बात तो ध्यान में रखी ही जा सकती है कि जो माँ अपने परिवार से दूरी बनाकर चली जिसने अपने पति को अपनी उंगलियों पर नचाया वह अपनी पुत्री को क्या शिक्षा दे सकती है और समय आने पर वह तुम्हारे साथ क्या व्यवहार कर सकती है,अथवा वह शादी के तुरत बाद तुम्हारे माता पिता से परिवार से अलग रहने के लिये जोर देगी जिससे उसकी बेटी आगे के जीवन में तुम्हे भी उन्ही की तरह से नचाने की कोशिश करे,और तुम्हारे को यह हजम नही हो मामला कोर्ट केश तक पहुंचे।

शादी विवाह के मामले में यह भी सोचना चाहिये कि कोई कितना खूबशूरत है,और उस खूबशूरती पर फ़िदा होकर अगर शादी की जाती है तो जिस दिन शादी होती है उससे अधिक से अधिक तीन महिने वह खूबशूरती अच्छी लगती है उसके बाद उस खूबशूरती से अचानक नफ़रत पैदा हो जाती है,उस नफ़रत का एक ही कारण होता है कि शरीर अपना कार्य करना बन्द कर देता है तरह तरह की कमजोरी आने लगती है दिमाग में चिढचिढापन पैदा हो जाता है। सिर दर्द की शिकायत हो जाती है,भोजन पचने में दिक्कत आने लगती है,उस समय वह खूबशूरती काल लगने लगती है और उस खूबशूरती के सामने आने में भी दिक्कत होने लगती है,या तो गुस्से में कोई बुरी बात कह दी जाती है या फ़ोन आदि से खूबशूरती के घर वालों से कोई बुरी बात कहते ही खूबशूरती के घर वाले आकर सवार हो जाते है और मामला गम्भीर इसलिये भी हो जाता है कि शरीर मे दम नही होता है,माता पिता बहिन भाई अपनी अपनी ईगो को कायम रखना चाहते है,खूबशूरती सीधी अपने घर जाती है किसी वकील से राय लेती है,वकील को भी ऐसे ही केश लेने में मजा इसलिये भी आता है कि कमाई का साधन चोरी के डकैती के केशों में नही होता है,केवल सामाजिक और पारिवारिक रिस्तों के अन्दर कमाई का साधन इसलिये अधिक बनता है क्योंकि उसे पुलिस को भी सम्भालना पडता है जिन लोगों के नाम रिपोर्ट में उस खूबशूरती ने लिखवाये होते है उनके लिये पुलिस अपनी पूरी शक्ति का प्रयोग केवल इसलिये करती है क्योंकि जितनी उसकी कोशिश होगी उतना ही धन उससे बचने के लिये खर्च किया जायेगा,और केवल वकील के अलावा और कोन बीच का कार्य कर सकता है,पुलिस को जितना देना है उससे दो सौ परसेंट वकील अपने लिये पहले निकाल लेगा उसके बाद ही वह पुलिस से अपनी सांठ गांठ बिठापाने में सफ़ल होगा। इस खूबशूरती के लिये जब कानून ने सीधा ही अन्दर जाने का उपक्रम जारी कर रखा हो,वह भी केवल इसलिये कि हिन्दू समाज में शादी के बाद जो बन्धन होते है वे आजीवन के होते है,और ब्रिटिस कानून की मान्यता केवल वहीं खंडित हो जाती है जहां वह देखता है कि हिन्दू विवाह में एक से अधिक पत्नी को रखने का रिवाज नही है,तो जो कानून बनाये गये उनके द्वारा यह ही पक्का सिद्धान्त बनाया गया कि सबसे पहले हिन्दू की शक्ति को ही विदीर्ण कर दिया जाये,और उसे अपनी पत्नी को किसी दूसरे के पास भोगने के लिये कानूनी रूप से भेजना पडे और किसी दूसरे की पत्नी को अपने पास भोगने के लिये लाना पडे। इस कानून का पूरा फ़ायदा वह खूबशूरती लेती तो है लेकिन वह अपने परिवार के उन सदस्यों के ईगो के कारण जो पहले से ही इस बिर्टिसिया कानून की चपेट में है और उसी कानून को अपनी रोजी रोटी बनाकर यानी कान्वेंट की शिक्षा से पूर्ण होकर अपने पूर्ण विद्वान की श्रेणी में लाने की कोशिश करते है। तो वह खूबशूरती जो महज जवानी के जोश में होश को खोकर लायी गयी थी एक झटके में अपने लटके दिखाकर चली गयी और जो था वह भी गया आगे के जीवन के लिये भी कोई आशा भी नही है कि वह सही चल पायेगा या नहीं।

शादी करने के लिये जहां तक हो सके दिन का समय निश्चित करना चाहिये,रात में केवल गन्धर्व विवाह ही किये जाते है,और गन्धर्व विवाह को किसी नाटक के विवाह की तरह से समझा जाता है जो रात को किया गया और सुबह को बरबाद,दिन में हिन्दू विवाह के लिये नियम बनाये गये है,सूर्य की आभा में जो किरणें सम्बन्धो के अन्दर अपना असर देती है वहां रात की कालिमा कितने ही प्रकास को प्रकट करने के बाद मिटाने की कोशिश की जाये खत्म नही होती है। देवताओं का दिन होता है रात तो केवल निशाचरों की होती है,कलयुग की यही विडम्बना कही जायेगी कि रात को शादी करने के लिये हिन्दू समुदाय को किस प्रकार से अपने समय के अभाव के रूप में प्रकट किया है। शादी करने के लिये भी वही समय निश्चित किया जाना चाहिये जो खुद के लिये सहूलियत वाला हो,लोगों को शादी पर बुलाने के लिये केवल आशीर्वाद समारोह रात को कर देना चाहिये जहां शादी के बाद लोग अपना अपना आशीर्वाद दे सकें,आजकल के अनुसार शादी के पहले स्टेज शो होता है और शादी के पहले ही घर वाले और बाहर वाले बिना ब्याही वधू को और बिना ब्याहे वर को आशीर्वाद देकर अपने उदर की शांति करके चले जाते है,और बाद में मंत्रों से उस जोडे को शादी के बन्धन में बांधा जाता है जो पहले ही शादी के रूप में लोक मान्यता को प्राप्त कर चुका है।

शादी के बाद पति और पत्नी के घर वालों को तय कर लेना चाहिये कि शादी के बाद पति और पत्नी के बीच में एक समय सीमा में दूर रहने के लिये बाध्य होना पडेगा,उस समय सीमा में दूर रहने के लिये अगर पत्नी का कोई सम्बन्धी नही है तो वर को इस प्रकार का बन्दोबस्त करना चाहिये कि एक या दो माह के लिये एक वर्ष में दोनो दूर रह सकें,वैसे शादी के बाद पत्नी को केवल चार दिन के लिये ही अपने ससुराल में रहने दिया जाय,उसके बाद तीन महिने का अन्तराल देकर फ़िर भेजा जाये,उस समय पति और पत्नी दोनो कहीं भी हनीमून के लिये जा सकते है,और जैसे ही वापस आयें उन्हे फ़िर से एक माह के लिये अलग किया जाये,इस प्रकार से शादी के तीन साल तक ससुराल में कम ही रखा जाये,तो शादी आजीवन चलने से कोई रोक नही सकता है।

आज के जमाने से पति और पत्नी अगर अलग अलग नही रह सकते है तो उन्हे आपसी समझौतों से एक दूसरे से दूरी बनाकर चलना चाहिये,कम से आपसी सम्बन्धों के मामले में एक माह की और नही चल पाये तो एक सप्ताह की दूरी बनाकर अवश्य चलना चाहिये,इस प्रकार से आपसी आकर्षण का रूप बढता जायेगा,और शादी आराम से आजीवन चल सकती है।

शादी के बाद पति और पत्नी को अपनी अपनी शारीरिक शक्ति का भी ख्याल रखना चाहिये,शादी के बाद शरीर पर अचानक मानसिक दबाब बढता है,वह सम्बन्धो के मामले में भी और परिवार के मामले में भी,अति आकर्षण की वजह से काम भी रुकते है और शरीर भी थकता है,एक दूसरे की कमजोरी को रोकने के लिये बाहरी भोजनो से अरुचि बनानी चाहिये और शक्ति से पूर्ण भोजन को लेना उत्तम बात मानी जाती है,इसके लिये फ़्रेस दूध का सेवन जितना हो सके करना चाहिये,अन्यथा मज्जा बढाने वाली चीजों का सेवन करना चाहिये.यह बात पूरी तरह से सत्य है कि शरीर से ही मन जुडा है और शरीर कमजोर है तो मन अपने आप कमजोर होगा,वासनाओं की वृद्धि तब और बढ जाती है जब शरीर के अन्दर दम नही होता है और वह सीधा दिमाग पर असर देता है,पीजा और बर्गर खाकर शक्ति नही बढती है केवल उदर पूर्ति होती है।

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नमस्कार,
‎”नव संवत्सर” (विक्रम संवत-2068 )और “चेत्र शुक्ल प्रतिपदा” एवं “चेत्र नवरात्रि “के आगमन के साथ आई नव वर्ष की पावन वेला पर ” विनायक वास्तु टाईम्स” परिवार और पंडित दयानंद शास्त्री की ओर से आपको एवं आपके प्रियजनों को हार्दिक शुभ मंगल कामनाये!!!
“शुभम भवतु “

सभी का कल्याण हो…
श्री -सम्रद्धि और आनंद आप सभी के जीवन में बना रहे …परिवार, समाज एवं राष्ट्र कल्याण के आप सहभागी-सहयोगी बने…यही कामना हे…

श्रीमान जी, आपको जानकर ख़ुशी/ हर्ष होगा की पंडित दयानंद शास्त्री को राष्ट्र स्तरीय संस्था-”सोसायटी आफ वास्तु साईंस (पंजीकृत)” की राष्ट्रीय कार्यकारणी में राष्ट्रीय प्रशासनिक सदस्य( मेंबर) मनोनीत किया गया हे…
विवरण सलग्न हे…संस्था का पत्र –इस संस्था द्वारा राजस्थान में केवल दो ही लोगो / व्यक्तियों का चयन इस पद हेतु हुआ हे…
उनमे से दयानद शास्त्री भी एक हे…
आप सभी को भी बधाई और आभार…कृपया उक्त्त समाचार प्रकाशित / छाप कर कृतार्थ करे…
आभार/ धन्यवाद….
आपका-
पण्डित दयानंद शास्त्री-09024390067 / 09413103883 /
//vastushastri08 @hotmail .com ;;
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Thenx u veri much for make me ur friend.
Pt. DAYANANDA SHASTRI;
vastushastri08@gmail.com;
vastushastri08@rediffmail.com;
प्रिय मित्रो. आप सभी मेरे ब्लोग्स पर जाकर/ फोलो करके – शेयर करके – जानकारी प्राप्त कर सकते हे—- नए लेख आदि भी पढ़ सकते हे….. धन्यवाद…प्रतीक्षारत….
आपका—
“विनायक वास्तु टाईम्स”–पंडित दयानंद शास्त्री-
M – 09024390067—
— vinayakvaastutimes.blogspot.com;;
—-vinayakvaastutimes.wordpress.com;;;

आज का मुहूर्त और राशिफल—सोमवार ,4 ,अप्रैल 2011—

शुभ विक्रम संवत- 2068, शालिवाहन शक संवत- 1933,
संवत्सर का नाम- क्रोधी, अयन- उत्तरायन, ऋतु- वसंत,
मास- चैत्र, पक्ष- शुक्ल, तिथि- प्रतिपदा रात्रि 10.24 पश्चात द्वितीया,
हिजरी सन्- 1432, मु. मास- रबिलाखर, तारीख- 29,
नक्षत्र- रेवती सायं 5.15 पश्चात आश्विनी, योग- ऐंद्र प्रात: 10.24 पश्चात वैधृति,
सूर्योदयकालीन करण- किंस्तुघ्न, चन्द्रमा- मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश सायं 5.15 पर करेंगे।
दिन- शुभ। दिशाशूल- पूर्व में। मुहूर्त- नवीन प्रतिष्ठान प्रारंभ करने का मुहूर्त।
कार्य की अनुकूलता के लिए- देवी दर्शन, पूजन करें।
दिन का पर्व- संवत्सर आरंभ, गुड़ी पड़वा, चैत्र नवरात्रि, घटस्थापना।
उपयोगी ज्ञान- नवरात्रि में बोए जाने वाले जवारे गेहूँ के अलावा जौ, चावल अथवा अन्य धान्यों के भी बोए जा सकते हैं।
शुभ समय- प्रात: 09.52 से 11.48 दिन 3.16 से 5.11।
सुझाव- आवश्यक न हो तो प्रात: 07.51 से 09.23 के मध्य शुभ
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दैनिक राशिफल—

राशि फलादेश मेष–
व्यापार-व्यवसाय में उतार-चढ़ाव रहेगा। अपने गुस्सा पर काबू रखें। नए अनुबंध नहीं करें। आर्थिक वृद्धि के प्रयास निष्फल होंगे। सरकारी मामले उलझेंगे।

राशि फलादेश वृष—
किसी बात को लेकर मन परेशान रहेगा। परिश्रम का महत्व समझें। आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ सकता है। अनावश्यक वाद-विवाद को टालें।

राशि फलादेश मिथुन—
फिजूल की बातों को नजरअंदाज करें। सामाजिक मामलों में आपकी आलोचना होगी। परिवार में सुख-शांति रहेगी। व्यावसायिक कार्य सफल नहीं हो पाएँगे।

राशि फलादेश कर्क—
सुख-साधनों में वृद्धि होगी। व्यापार, नौकरी में स्थिति मध्यम रहेगी। कामकाज में सुधार के योग हैं। रचनात्मक कार्यों का प्रतिफल मिलेगा।

राशि फलादेश सिंह—
लापरवाही हानिकारक हो सकती है। पारिवारिक समस्याओं से उबर सकेंगे। कार्य में आशातीत सफलता मिलेगी। राज्यपक्ष से लाभ एवं प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी।

राशि फलादेश कन्या—
उन्नति का मार्ग प्रशस्त होगा। नए परिचय फायदेमंद होंगे। संतान से खट-पट हो सकती है। कारोबार में लाभदायी परिवर्तन की संभावना है।

राशि फलादेश तुला—
संतान की चिंता रहेगी। शत्रु पक्ष आपकी छवि बिगाड़ने की कोशिश करेंगे। व्यापार की समस्याओं से मन परेशान रहेगा।

राशि फलादेश वृश्चिक—
अधिकारियों से संबंध मधुर होंगे। रुका पैसा मिलेगा। परिवार की समस्याओं पर ध्यान दीजिए। व्यापार, नौकरी के सिलसिले में की गई यात्राएँ लाभदायक होंगी।

राशि फलादेश धनु—
अधूरे कार्य पूर्ण होंगे। नई योजनाएँ सफल होंगी। संयम रखकर काम करें। व्यापार में लाभदायक सौदे होने के योग हैं। माता का स्वास्थ्य ठीक रहेगा।

राशि फलादेश मकर—
समाज में आपका प्रभाव बढ़ेगा। व्यापार में नई योजनाओं का शुभारंभ होगा। खर्चों में कमी आवश्यक है। आपके कार्यों की प्रशंसा होगी।

राशि फलादेश कुंभ–
कार्यक्षेत्र में वांछित प्रगति की संभावना है। आवास संबंधी समस्या रह सकती है। लाभ बढ़ने से निवेश एवं बचत में वृद्धि होगी।

राशि फलादेश मीन—
सामाजिक कार्यों में सीमित रहना चाहिए। क्रोध, उत्तेजना पर संयम रखें। उत्साह और उमंग का वातावरण रहेगा। महत्व के कार्य सिद्ध होंगे।

क्या कहती है नए साल की कुंडली –पं. अशोक पँवार ‘मयंक’—

शनि-मंगल समसप्तक योग : खतरे का संकेत—

नए वर्ष की शुरुआत 4 अप्रैल 2011, सोमवार से हो रही है। इस समय प्रातःकालीन लग्न कुंडली से जानेंगे कि यह वर्ष कैसा रहेगा?

मीन लग्न से नववर्ष की कुंडली में षष्ट स्थान (रोग, कर्ज, शत्रु भाव) का स्वामी सूर्य पंचमेश चन्द्र व भाग्येश धनेश मंगल के साथ है।
दशमेश गुरु लग्न में स्वराशिस्थ होने के साथ-साथ चतुर्थेश व सप्तमेश बुध से शनि सप्तक में रहकर समसप्तक योग बना रहा है।

इस कारण भारत के शासकों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। कहीं भूकंप, बाढ़ या समुद्री विनाश लीला से भारी जन-धन की हानि के योग बनते हैं। शत्रु पक्ष से भी परेशानियों का सामना करना पडे़गा। नक्सलवाद, माओवाद भी हावी रहेगा। भारी वर्षा से जन-धन हानि के योग भी बनते है।

चन्द्र, गुरु, मंगल व सूर्य, बुध सभी जल चर राशियों में है। शनि मंगल का समसप्तक योग किसी भारी दुर्घटना का भी संकेत देता है।

दशम भाव में नीच का राहु केन्द्र सरकार को किसी भारी मुसीबत में डाल सकता है। इधर नीच का केतु चतुर्थ भाव में होने से जनता में क्लेश का कारण बनेगा। जनता महँगाई से निजात नहीं पाएगी।
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##चैत्र प्रतिपदा : कैसा होगा साल देश के लिए —- विक्रम संवत 2068 और देश का भविष्य—-

संवत्‌ 2068 का राजा चंद्र स्त्री ग्रह है। चंद्र का वर्षेश होना सशक्त शासन का संकेत नहीं है। लेकिन मंत्री पद गुरु के पास होने से न्याय के क्षेत्र में, नारी जगत के मामलों मे कुछ कार्य सराहनीय होंगे। ग्रह परिषद में शनि को शस्येश, नीरसेश व धनेश ये तीन पद प्राप्त हुए है। शस्येश शनि राजनीतिज्ञों मे परस्पर भेद बुद्धि पैदा करेगा। ईख, जो, गेहूँ आदि की फसलों को क्षति पहुँचाएगा।

सत्ता की दौड़ में राजनीतिक वर्ग एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते नजर आएँगे। जनता के लिए कुछ भी कार्य नहीं होंगे। शनि का नीरसेश होना, जमीन-जायदाद, खाद्य तेलों, दाल-दलहनादि में तेजी लाएगा। इससे जनता परेशान रहेगी।

शुक्र, धान्येश होने से शीतकालीन अनाज आदि फसलों को हानि पहुँचने की आशंका है। इससे किसान वर्ग परेशान रहेगा। महँगाई पर सरकार लगाम लगाने में नाकाम रहेगी।

बुध को मेघेश, फलेश व दुर्गेश जैसे महत्वपूर्ण पद होने के कारण वर्षा पर्याप्त होगी। गेहूँ, चना, जौ आदि की फसलें भी अच्छी होंगी। दुर्गेश जैसा महत्वपूर्ण पद बालग्रह के पास होने से कहीं-कहीं दुःखद घटनाओं का सामना करना पड़ सकता है। इस वजह से सैन्य बल का प्रयोग करना पड़ सकता है। भ्रष्टाचार, अनैतिक कार्य, चोरी आदि रोकने के लिए कठोर कदम भी उठाना पड़ेंगे।

कहीं-कहीं मुस्लिम राष्ट्र में सेना राष्ट्रनायकों के नियंत्रण में नहीं रहेगा, जिससे शासन हतप्रभ रहेगा। आकाशीय मंत्री मंडलानुसार राष्ट्रनायकों के लिए चिंताजनक स्थिति रहेगी।
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भारतीय नववर्ष आरंभ –चंद्रमा का रहेगा राज, मंत्री बने बृहस्पति— डॉ. रामकृष्ण डी. तिवारी —

नव संवत्सर से प्रारंभ हो रहा नया वर्ष उतार-चढ़ाव वाला रहने के आसार हैं। रोहिणी का आवास समुद्र पर होने से वर्षा सामान्य से अधिक होगी। अनाज, पुष्प और फल ज्यादा मात्रा में होंगे। कर्ज से काम करने की प्रवृत्ति बढ़ने के योग हैं। नवीन नेतृत्व के उदय की संभावना भी दिखाई दे रही है।

भारतीय नववर्ष (विक्रमी संवत्‌) को नव संवत्सर भी कहते हैं। इस संवत्सर का नाम क्रोधी तथा इसका राजा चंद्र तथा मंत्री बृहस्पति है। संवत्सर के क्रम में अठारहवें क्रम पर ‘क्रोधी’ नामक संवत्सर आता है। दान, जप, पुण्य व धार्मिक कृत्य के संकल्प में इस नाम का ही उपयोग चालू वर्ष में होगा। इसका वर्ष पर प्रभाव इस प्रकार रहेगा जिससे राजनेता, शासक वर्ग व प्रशासन की कार्य करने की नियति में व्यक्तिगत स्वार्थ का समावेश अधिक होगा।

स्वयं के लोभ की पूर्ति नहीं होने पर विवाद, तनाव की स्थिति बनेगी। इस संवत्सर के कर्मों में भूकम्प, भूस्खलन, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अति-गर्मी व अति-शीत, अग्निकांड, विस्फोट आदि से जनहानि का योग बनेगा। यह रेवती नक्षत्र व ऐंद्र योग से 4 अप्रैल 2011 से प्रारंभ होकर 22 मार्च 2012 तक रहेगा। इस वर्ष में रोहिणी का आवास समुद्र पर होने से वर्षा सामान्य से अधिक होगी।

इस कारण अन्न, पुष्प, फल प्रचुर मात्रा में होंगे। संवत्‌ का घर माली के यहाँ होने से गेहूँ, चावल, चना, गन्ना, उड़द आदि की पैदावार अच्छी रहेगी। इनकी कीमत सोना, चाँदी, ताँबा के अनुसार वृद्धिकारक रहेगी। संवत्‌ अपनी सवारी मृग पर करेंगे। मृग भ्रमण से बाह्य आडंबर, आकर्षण के प्रति लोगों का रुझान व विस्तार होगा। अच्छी बारिश व अच्छी पैदावार की स्थिति भी निर्मित होगी।

वर्ष का राजा चंद्रमा बनने से धान्य, फल, घास, फूल व रसदार फसल की पैदावार में आशातीत वृद्धि होगी। समारोह और मंगल कार्यों पर व्यय की अधिकता से महँगाई में वृद्धि होगी। महिला संतों का प्रभाव बढ़ेगा। समाज में स्त्रियों के कार्यों की सराहना व उनके अधिकारों का उपयोग अधिक होगा। सामान्यजन को आर्थिक परेशानी होगी। मानसिक रोगों, मधुमेह, श्वास, कफ के रोगों का असर शीघ्र व अधिक रहेगा।

अनाज के व्यापारियों को स्वर्णकार को लाभ प्रदान करने में बृहस्पति सबसे प्रमुख होंगे। न्यायपालिका का सम्मान बढ़ेगा। धार्मिक कार्यों से जु़ड़े व्यक्तियों के लिए वर्ष अनुकूल फलदायी रहेगा। दुर्गेश बुध की वजह से सभी को अपनी आंतरिक शक्ति बढ़ाने का उपाय करने का प्रयास करते हुए देखा जाएगा। धनेश शनि के कारण जनसामान्य में पूँजी की कमी रहेगी।

विद्वानों की आर्थिक स्थिति नकारात्मक रहेगी। किसान व व्यापारी को अधिकारियों के कारण तनाव व परेशानी होने के आसार हैं। नीरसेश विभाग शनि के पास होने से इनके अधिकार की वस्तुएँ, तेल, पेट्रोलियम पदार्थ, डीजल, कच्चा तेल, फर्नेस ऑइल, गर्म कपड़ा, चमड़े की वस्तुएँ, काली मिर्च, लकड़ी, लौह पदार्थ और मसालों में वृद्धि कारक योग बनेगा।

कुंडली में सौतन का योग—-

वर्तमान में राहु के साथ शुक्र का गोचर होने से महिलाओं के अन्दर एक भय बहुत जोर से व्याप्त है। इस भय के कारण वे अपने में ही सिमट कर रह गयी है। जब जब शुक्र मंगल या गुरु के साथ राहु का गोचर होता है,पुरुषों के अन्दर स्त्रियों के प्रति और स्त्रियों के अन्दर पुरुषों के प्रति आकर्षण की भावना अपने आप पनपने लगती है। भगवान शिवजी की समाधि में जब कामदेव को उनकी समाधि को भंग करने के लिये देवताओं ने लगाया था उस समय इसी शुक्र और राहु का इन्तजाम किया गया था। कामदेव ने अपने बल से सुन्दरता नही होने के बावजूद भी स्त्री पुरुष वनस्पति जीव जन्तु के अन्दर काम नामकी भावना को भरा था और जिसे देखो वही अपनी कामुकता की बजह से ग्रस्त हो गया था। राहु को विस्तार के रूप मे माना जाता है और यह जब शुक्र यानी सुन्दरता के अन्दर अपना प्रवेश करता है तो वह शरीर के अन्दर न कुछ भी नही होने से अपने को विस्तार को बढाने की कोशिश करता है। शुक्र नाम की मादकता के चलते राह चलते लोग अपने अपने विरोधी सेक्स के प्रति अचानक आकर्षित हो जाते है और जो कार्य जीवन में सिवाय परेशानी देने के और कुछ नही माना जाता है शुरु हो जाता है। इस युति में लोग अपने वैवाहिक जीवन को भूल कर और अपने को अनन्तता की ओर लेजाने के चक्कर में गृहस्थ जीवन को समाप्त कर लेते है,इस युति के चलते ही अपने अन्दर कुत्सित विचारों को भरने के बाद समाज स्थान और आसपास के लोगों के अन्दर अपने को बदनाम कर लेते है। धनी लोग धन से,शरीर में बल रखने वाले लोग शरीर के बल से,चालाक लोग चालाकी से,और जो जिस काबिल होता है उस काबिलियत की बजह से अपने स्वार्थ की पूर्ति के उपाय करने लगता है।
वर्तमान मे राहु का स्थान धनु राशि में है यह स्थान धर्म और मर्यादा का भी माना जाता है,लोग अपने अपने कारणो से धर्म और मर्यादा को समाप्त करने में लग गये होते है। साथ ही शुक्र के साथ गोचर करने से जो भी समाज परिवार और खुद के द्वारा धार्मिक रिस्ते बनाये जाते है उनके अन्दर कोई न कोई विकृति पैदा हो जाती है। जो स्त्रियां अपने को अपने मर्यादा वाले जीवन से दूर ले जाती है उनकी अपनी चाहत केवल यही होती है कि वे अपने को धनु राशि की उच्चता में बिना मेहनत किये ही ले जाना चाहती है। उनके अन्दर एक प्रकार का भाव भर जाता है,जो उन्हे अन्य किसी भी कारण को सोचने से असमर्थ कर देता है। इस प्रकार के कारणों में वे स्त्रियां भी आजाती है जिनके अन्दर विदेशी भावना भरी होती है,जो अपने को उच्च शिक्षा की तरफ़ ले जाना चाहती है और जो विदेशी यात्रा से सम्बन्धित होती है और हवाई कम्पनियों आदि से जुडी होती है।
यह बात केवल स्त्रियों के लिये भी मान्य नही है,उन पुरुषों के अन्दर भी एक भूत सा भर जाता है जो ऐन केन प्रकारेण अपने स्वार्थ की पूर्ति करने में लगा रहता है। यह बात उम्र के लिहाज से भी सोचने के लिये मजबूर करती है,चाहे वह उम्र कितनी ही हो,लोग अपने अपने अनुसार अपने अपने साधन खोजने में लगे रहते है। इस प्रकार की भावना को दूर करने के लिये अलग अलग राशियों के अलग अलग उपाय होते है।
जन्म के राहु के साथ शुक्र का गोचर,जन्म के शुक्र के साथ राहु का गोचर,पुरुषों के लिये आकर्षण का समय माना जाता है,जन्म के मंगल के साथ राहु का गोचर और जन्म के राहु के साथ मंगल का गोचर स्त्रियों को आकर्षण की तरफ़ ले जाता है। इनके लिये समय को समझ कर अगर सम्बन्धित उपाय कर दिये जायें तो इस प्रकार के सौतन वाले योगों से बचा जा सकता है,और जो जीवन एक धार्मिक रूप से आजीवन साथ देने का वादा करता है वह हमेशा के लिये साथ दे सकता है।

॥श्री:॥
वेद नेत्र ज्योतिष

नमो देवि महा विद्ये नमामि चरणौ तव सदा ज्ञान प्रकाशं मे देहि सर्वार्थदे शिवे।।
यत्कृपालेश लेशांशलेशलवांशकम,लबध्वा मुक्तो भवेज्जन्तुस्तां न सेवेत को ज।
स्वयमाचरेत शिष्यानाचारे स्थापयत्यापि आचिनोतीह शास्त्रार्थानाचार्यस्तेन कथ्यते॥
चराचरस्मासन्नमध्यापयति य: स्वयम यमादि योगसिद्धत्वादाचार्य इति कथ्यते॥।
जन्महेतु हि पितरौ पूजनीयौ प्रयत्नत: गुरुर्विशेषत: पूज्यो धर्माधर्मप्रदर्शक:॥

ज्योतिषमान जाग्रत जगत की एक दिव्य ज्योति का नाम हीजीवन है। ज्योति का पर्या ज्योतिष या ज्यौतिष है; अथवा ज्यौतिष स्वरूप ब्रह्म की व्याख्या का नाम ज्योतिष है,ऐतरेय ब्राह्मण ने ब्रह्म को क्रियादामृत स्वरूप त्रयी त्रीणी ज्योतिषीं नाम से पुकारा है (५।५।२)

वेद स्वरूप ज्योतिष ब्रह्मरूप ज्योति या ज्योतिष है,जिसका द्वतीय नाम संवत्सर ब्रह्म या महाकाल (महारुद्र) है जो अक्षर ब्रह्म से भी उच्चारित किया जाता है,ब्रह्मसृष्टि के मूल बीजाक्षरो या मूल अनन्त कलाओं को एक एक कर जानना,वैदिक दार्शनिक ज्योतिष या अव्यक्त ज्योतिष कहा जाता है।

इसका दूसरा स्वरूप लौकिक या व्यक्त ज्योतिष है जिसे खगोलीय या ब्रह्माण्डीय ज्योतिष कहा जाता है,व्यक्त या अव्यक्त इन दोनो के आकार दोनों की कलायें एक समान है। एक बिम्ब है तो दूसरा प्रतिबिम्ब है,इस प्रकार वैदिक दर्शन के नौ प्रकार के अहोरात्र या सम्वत्सर ब्रह्म दर्शन का गणित् से लोक व्यवहारिक विवेचन करते हुये आज तक वैदिक ज्योतिष की सुरक्षा मध्य युग के पहिले के आचार्यों ने की है।

वैदिक दर्शन के परिचय के लिये यह वेदान्गी भूत ज्योतिष दर्शन सूर्य के समान प्रकाश देने का काम करता है,अतएव इसे वेद पुरुष या ब्रह्मपुरुष का चक्षु: (सूर्य) भी कहा गया है। ज्योतिषामयनं चक्षु: सूर्यो अजायत,इत्यादि आगम वचनों के आधार से त्रिस्कंध ज्योतिष शास्त्र के के प्रधान प्रमुख सर्वोपादेय ग्रह गणित ग्रन्थ का नाम तक सूर्य सिद्धान्त या चक्षुसिद्धान्त कहा गया है। अथवा अनन्त आकाशीय ग्रह नक्षत्र आकाश गंगा नीहारिका सम्पन्न जो स्वयं अनन्त है,उस ब्रह्म दर्शक चक्षु रूप शास्त्र का नाम ज्योतिष शास्त्र कहा गया है। जिसके यथोचित स्वरूप का ज्ञान प्राचीन भारतीयों को हो चुका था,संक्षेप मे इसी लिये यहां ज्योतिष शास्त्र का इतिहास लिखा जा रहा है।

प्राचीन भारतीय ज्योतिष
भारतीय ज्योतिष का प्राचीनतम इतिहास (खगोलीय विद्या) के रूप सुदूर भूतकाल के गर्भ मे छिपा है,केवल ऋग्वेद आदि प्राचीन ग्रन्थों में स्फ़ुट वाक्याशों से ही आभास मिलता है,कि उसमे ज्योतिष का ज्ञान कितना रहा होगा। निश्चित रूप से ऋग्वेद ही हमारा प्राचीन ग्रन्थ है,बेवर मेक्समूलर जैकीबो लुडविंग ह्विटनी विंटर निट्ज थीवो एवं तिलक ने रचना एवं खगोलीय वर्णनो के आधार पर ऋग्वेद के रचना का काल ४००० ई. पूर्व स्वीकार किया है। चूंकि ऋग्वेद या उससे सम्बन्धित ग्रन्थ ज्योतिष ग्रन्थ नही है,इसलिये उसमे आने वाले ज्योतिष सम्बन्धित लेख बहुधा अनिश्चित से है,परन्तु मनु ने जैसा कहा है कि “भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिद्धयति”। इससे स्पष्ट है कि वेद त्रिकाल सूत्रधर है, और इसके मंत्र द्रष्टा ऋषि भी भी त्रिकादर्शी थे। वेदों के मंत्र द्रष्टा ऋषि भूगोल खगोल कृष शास्त्र एव राजधर्म प्रभृति के अन्वेषण में संलग्न रहते थे। खगोल सम्बन्धी परिज्ञान के लिये आकाशीय ग्रह नक्षत्रों के सिद्धान्त वेदों में अन्वेषित किये जा सकते हैं। क्योंकि आधुनिक काल की घडियों के अभाव मे मंत्रद्रष्टा ऋषि आकाशीय ग्रह उपग्रह एवं नक्षत्रों के आधार पर ही समय का सुपरिज्ञान कर लेते थे। इसके बारे में भास्कराचार्य ने निर्दिष्ट किया है:-

वेदास्तावद यज्ञकर्मप्रवृता: यज्ञा प्रोक्तास्ते तु कालाश्रयेण,
शास्त्रादस्मात काबोधो यत: स्याद वेदांगत्वं ज्योतिषस्योक्तमस्सात।
शब्दशास्त्रं मुखं ज्योतिषं चक्षुषी श्रोत्रमुक्तं निरुक्तं कल्प: करौ,
या तु शिक्षा‍ऽस्य वेदस्य नासिका पादपद्मद्वयं छन्दं आद्यैर्बुधै:॥
वेदचक्षु: किलेदं स्मृतं ज्यौतिषं मुख्यता चान्गमध्येऽस्य तेनोच्यते,
संयुतोऽपीतरै: कर्णनासादिभिश्चक्षुषाऽगेंन हीनो न किंचित कर:।
तस्मात द्विजैर्ध्ययनीयमेतत पुंण्यं रहस्यं परमंच तत्वम,
यो ज्योतिषां वेत्ति नर: स सम्यक धर्मार्थकामान लभते यशश्च॥

उक्त श्लोक का आशय इस प्रकार है:-

समग्र वेदों का तात्पर्य यज्ञ कर्मो से है,यज्ञों का सम्पादन शुभ समयों के आधीन होता है। अतएव शुभ समय या अशुभ समय का बोध ज्योतिष शास्त्र द्वारा ही होने से ज्योतिष शास्त्र का नाम वेदांग ज्योतिष कहा जाता है। वेद रूप पुरुष के मुख्य छ: अंगों में व्याकरणशास्त्र वेद का मुख ज्योतिष शास्त्र दोनो नेत्र निरुक्त दोनो कान कल्प शास्त्र दोनो हाथ शिक्षा शास्त्र वेद की नासिका और छन्द शास्त्र वेद पुरुष के दोनो पैर कहे गये हैं।

पर पुरुष रूप वेद का ज्योतिष शास्त्र नेत्र स्थानीय होने से ज्योतिष शास्त्र ही वेद का मुख्य अंग हो जाता है।

हाथ पैर कान आदि समाचीन इन्दिर्यों की स्थिति के बावजूद नेत्र स्थानीय ज्योतिष शास्त्र की अनभिज्ञता किसी की नही होती अतएव सर्वशास्त्रों के अध्ययन की सत्ता होती हुयी भी ज्योतिष शास्त्र ज्ञान की परिपक्वता से वेदोक्त धर्म कर्म नीति भूत भविष्यादि ज्ञान पूर्वक धर्म अर्थ काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इस प्रकार उपरोक्त श्लोक से वेद एवं ज्योतिष शास्त्र का निकटतम सम्बन्ध स्वत: सिद्द है। ग्रह नक्षत्रों के परिज्ञान से काल का उद्बोधन करने वाला शास्त्र ज्योतिष शास्त्र ही है। प्रन्तु उस उद्बोधन के साथ आकाशीय चमत्कार को देखने के लिये गणित ज्योतिष के तीन भेद किये गये हैं।

१. सिद्धान्त गणित
२. तंत्र गणित
३. करण गणित

१.सिद्धान्त गणित
जिस गणित के द्वारा कल्प से लेकर आधुनैक काल तक के किसी भी इष्ट दिन के खगोलीय स्थितिवश गत वर्ष मास दिन आदि सौर सावन चान्द्रभान को ज्ञात कर सौर सावन अहर्गण बनाकर मध्यमादि ग्रह स्पष्टान्त कर्म किये जाते है,उसे सिद्धान्त गणित कहा जाता है।

२. तंत्र गणित
जिस तंत्र द्वारा वर्तमान युगादि वर्षों को जानकर अभीष्ट दिन तक अहर्गण या दिन समूहों के ज्ञान के मध्यमादि ग्रह गत्यादि चमत्कार देखा जाता है,उसे तंत्र गणित कहा जाता है।

३. करण गणित
वर्तमान शक के बीच में अभीष्ट दिनों को जानकर अर्थात किसी दिन वेध यंत्रों के द्वारा ग्रह स्थिति देख कर और स्थूल रूप से यह ग्रह स्थिति गणित से कब होगी,ऐसा विचार कर तथा ग्रहों के स्पष्ट वश सूर्य ग्रहण आदि का विचार जिस गणित से होता है,उसे करण गणित कहते हैं।

तंत्र तथा करण ग्रन्थों का निर्माण वेदों से हजारों वर्षों के उपरान्त हुआ,अत: इस पर विचार न करके वेदों में सिद्धान्त गणित सम्बन्धी बीजों का अन्वेषण आवश्यक होगा।

वेदों में सूर्य के आकर्षण बल पर आकाश में नक्षत्रों की स्थिति का वर्णण मिलता है।

“तिस्त्रो द्याव: सवितर्द्वा उपस्थां एका यमस्य भुवने विराषाट,अणिं न रथ्यममृताधि तस्थुरिह ब्रवीतु य उ तच्चिकेतत॥

(सूर्य ही दिन और रात का कारण होता है) (ऋ.म.१.सू.३५.म-६)

आकृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेश्यन्नमृतं मर्त्य च हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन.

(सूर्य के आकर्षण पर ही पृथ्वी अपने अक्ष पर स्थिर है) (य.वे.अ.३३ म.४३)

भारतीय आचार्यों का आकर्षण सिद्धान्त का सम्यक ज्ञान था:-

सविता: यन्त्रै: पृथ्वीमरम्णाद्सक्म्भने सविता द्यामदृहत अश्वमिवाधुक्षदधुनिमन्तरिक्षमतूर्ते वद्धं सविता अमुद्रम” (ऋ.म.१० सू.१४९ म.१)

चन्द्रमा के विषय मे भी वेदों में पर्याप्त जानकारी मिलती है। चन्द्रमा स्वत: प्रकाशवान नही है। इस सिद्धान्त की पुष्टि वेद मंत्रों में ही है जैसे:-

अत्राह गोर्मन्वतनाम त्वष्टुरपीच्यम इत्था चन्द्रमसो ग्रहे (ऋ.,म.१.सू.८४ म.१५)

चन्द्रमा आकाश मे गतिशील है,यह नित्यप्रति दौडता है,चन्द्रिका के साथ जो निम्न मंत्र से व्यक्त हो रहा है:-

चन्द्रमा अप्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि,न वो हिरण्यनेमय: पदं विदन्ति विद्युतो वित्तं मे अस्य रोदसी (ऋ.म.१.सू.१०५म.१)

चन्द्रमा का नाम पंचदश भी है,जो पन्द्रह दिन में क्षीण और पन्द्रह दिन में पूर्ण होता है,जो निम्न मंत्र में व्यक्त हो रहा है:-

चन्द्रमा वै पंचदश: एष हि पंचद्श्यामपक्षीयते,पंचदश्यामापूर्यते॥ (तैतरीय ब्राह्मण १.५.१०)

वेदों में महिनों की चर्चा भी है,अधिमास के संदर्भ में ऋकसंहिता की ऋचा विचारणीय है:-

वेदमासो धृतव्रतो द्वादश प्रयावत:॥ वेदा य उपजायते। (ऋ.स.१.२५.८.)

तैत्तरीय संहिता में ऋतुओं एवं मासों के नाम बताये गये है,जैसे :-
बसंत ऋतु के दो मास- मधु माधव,
ग्रीष्म ऋतु के शुक्र-शुचि,
वर्षा के नभ और नभस्य,
शरद के इष ऊर्ज,
हेमन्त के सह सहस्य और
शिशिर ऋतु के दो माह तपस और तपस्य बताये गये हैं।

बाजसनेही संहिता में पूर्वोक्त बारह महिनों के अतिरिक्त १३ वें मास का नाम अहंस्पति बताया गया है:-

मधवे स्वाहा माधवाय स्वाहा शुक्राय स्वाहा शुचये स्वाहा नभसे स्वाहा नभस्याय स्वाहेस्वाय स्वाहोर्जाय स्वाहा सहसे स्वाहा तपसे स्वाहा तपस्याय स्वाहांहस्पतये स्वाहा॥ (वा.सं.२२.३१)

तैत्तरीय ब्राह्मण में १३ मासों के नाम इस प्रकार हैं:-

अरुणोरुण्जा: पुण्डरीको विश्वजितभिजित। आर्द्र: पिन्वमानोन्नवान रसवाजिरावान। सर्वौषध: संभरो महस्वान॥ (तैत्तरीय.ब्रा.३.१०.१)

१. अरुण
२. अरुणरज
३. पुण्डरीक
४. विश्वजित
५. अभिजित
६.आर्द्र
७.पिन्वमान
८.उन्नवान
९.रसवान
१०.इरावान
११.सर्वौषध
१२.संभर
१३.सहस्वान

ऋग्वेद में ९४ अवयव कहे गये है:-
चतुर्भि: साकं नवति च नामभिश्चक्रं न वृतं व्यतीखींविपत। बृहच्छरीरो विमिमान ऋक्कभियुर्वाकुमार: प्रत्येत्याहवम॥ (ऋ.म.१.सू.१५५.म.६.)

उक्त मंत्र में गति विशेष द्वारा विविध स्वभाव शाली काल के ९४ अंशों को चक्र की तरह वृत्ताकार कहा गया है। उक्त कालावयवों में १ सम्वतसर २ अयन ५ ऋतुयें १२ माह २४ पक्ष ३० अहोरात्र ८ पहर और १२ आरा मानी गयी हैं। ऋतुओं में हिमन्त और शिशिर एक ऋतु मानी गयी है। इस प्रकार ९४ कलावयवों की गणना की गयी है।

ऋग्वेद में रशियों की गणना निम्न मंत्र से की गयी है:-

“द्वादशारं नहि तज्जराय बर्वर्तिचक्रं परिद्यामृतस्य। आपुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्तशतानि विंशतिश्च तस्थु:॥” (ऋ.म.सू.१६५म.१६)

सत्यामक आदित्य का १२ अरों (माह) सयुंक्त चक्र स्वर्ग के चारों ओर बारह भ्रमण करता है। जो कभी पुराना नही होता है,इस चक्र में पुत्र स्वरूप ७२० (३६० दिन,३६० रात) निवास करते हैं।

ज्योतिष में वर्ष को उत्तरायण एव दक्षिणायन दो विभागों में विभाजित किया गया है,उत्तरायण का अर्थ है बिन्दु से सूर्य का उत्तर दिशा की ओर जाना तथा दक्षिणायन से तात्पर्य है सूर्य का सूर्योदय बिन्दु से दक्षिण की ओर चलना। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार:-

“बसंतो ग्रीष्मो वर्षा:। ते देवा ऋतव: शरद्धेमतं शिशिरस्ते पितरौ………स (सूर्य:) यत्रो तगार्वतते देवेषु र्तहि भवति………यत्र दक्षिणावर्तते पितृषु र्तहि भवति॥

उक्त मंत्र के अनुसार बसंत ग्रीष्म वर्षा ये देव ऋतुयें है,शरद हेमन्त और शिशिर यह पितर ऋतुयें हैं। जब सूर्य उत्तरायण मे रहता है तो ऋतुये देवों में गिनी जाती है। तैत्तरीय उपनिषद में वर्णन है कि सूर्य ६ माह उत्तरायण और ६ माह दक्षिणायन में रहता है:-

“तस्मादादित्य: षण्मासो दक्षिणेनैति षडुत्तरेण”. (तै.स.६.५.३)

वैदिक काल में महिनो के नाम मधु और माधव से ही चलते थे,परन्तु कालान्तर में इनके नाम मिट गये और तारों के नाम पर नवीन नाम प्रचलित हो गये। हमारे ऋषियों ने इस बात को स्वीकार नही किया कि ऋतुओं एवं महिनो में सम्बन्ध ना रहे,उन्होने तारों के नाम से महिना बनाना शुरु कर दिया,तैत्तरीय ब्राह्मण मे एक स्थान पर यह स्पष्ट होता है,कि तारों का वेध मास निर्धारण के लिये आरम्भ हो गया था।

वैदिक काल में नक्षत्र केवल चमकीले तारे या सुगमता से पहचाने जाने वाले छोटे तारे के पुंज थे,परन्तु आकाश में इनकी बराबर दूरी न होना एवं तारों का पुंज न रहने से बडी असुविधा रही होगी। इसके अतिरिक्त चन्द्रमा की जटिल गति भी कठिनाई से ज्ञात हुयी होगी। पूर्णिमा के के होने की सही स्थिति का भान न होना भी एक कठिनाई रही होगी। चन्द्रमा का मार्ग आकाश में स्थिर न होना भी एक कठिनाई थी। एक ही तारे को कभी समीप और कभी पास रहने से भी तारों को देखकर माह बनाने में कठिनाई रही होगी। परन्तु यह सभी बातें कालान्तर में स्पष्ट हो गयी होंगी। चन्द्रमा का समीप होना और तारों का दूर होना भी एक कठिनाई रही होगी। सभी कठिनाइयों के कारण ही स्पष्ट हो गया कि तैत्तरीय-ब्राह्मण तक चन्द्रमा का नियमित वेध प्रारम्भ हो गया था।

वेद संहिता ब्राह्मण किसी मे भी महिनों के चैत्र बैसाख आदि नाम नही हैं। ये नाम वेदांग ज्योतिष में जो १२०० ईशा से पूर्व का ग्रंथ है। इस प्रकार यह अनुमान किया जा सकता है कि नवीन मासों के नाम २००० ईशा पूर्व से परिवर्तन में आये होंगे।

प्राचीन काल में सप्ताह का कोई महत्व नही था। सप्ताह के दिनों के नाम का उल्लेख वेद संहिता और ब्राह्मण ग्रंथों में नही है। उस समय पक्ष एवं उनके उपविभाग ही चलते थे।

वैदिक काल में संवत शब्द वर्ष का वाचक था। संवत्सर इद्वत्सर इत्यादि ये संवत्सर के पर्यायवाची शब्द हैं। इसी आधार पर से सूर्य सिद्धांतकार ने काल गणना से प्रसिद्ध नौ विभागों का उल्लेख किया है:-

“ब्राह्मं दिव्यं तथा पित्र्यं प्राजापत्यंच गौरवम। सौरं च सावनं चान्द्रमार्क्षं मानानि वै नव॥”

इस प्रकार अवान्तर के ज्योतिषकाल में वर्षों के नौ भेद कहे गये हैं। जैसे-

१. ब्राह्मवर्ष
२. दिव्यवर्ष
३. पितृवर्ष
४. प्रजापत्यवर्ष
५. गौरववर्ष
६. सौरवर्ष
७. सावनवर्ष
८. चान्द्रवर्ष
९. नाक्षत्रवर्ष

इस प्रकार सिद्धान्त ज्योतिषकाल में शुद्धगणित ज्योतिष विकासोन्मुख हो गया था। वैदिक काल में आज के अर्थ में तिथि का प्रयोग नही होता था। ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार जहां चन्द्रमा अस्त होता है और उदय होता है वह तिथि है। इसका मतलब है कि तिथि का अर्थ कुछ और ही है,कालान्तर में तिथि का यह अर्थ हुआ कि जितने में सूर्य का सापेक्ष में चन्द्रमा १२ अंशों आगे चलता है,वही तिथि है। सामविधान ब्राह्मण (२/६,२/७/३/३) मे कृष्ण चतुर्दशी कृष्ण पंचमी शुक्ल चतुर्दशी आदि शब्द आये हैं। क्षय तिथियों का वैदिक काल में उल्लेख नही प्राप्त होता है,शंकर बालकृष्ण दीक्षित मानते है कि प्रतिपदा एवं द्वितीया से तात्पर्य इस काल में पहली दूसरी रातों के लिये प्रयुक्त होता था। कालान्तर मे इनका नाम बदल गया होगा और जो वर्तमान में प्रयुक्त होता है वह हो गया होगा। वैदिक काल में दिन को चार भागों में विभाजित करने की प्रथा थी। पूर्वाह्न मध्याह्न अपराह्न सायाह्न ये नाम थे। दिनों को पन्द्रह भागों को बांट कर उनमे से एक को मुहूर्त कहा जाता था। परन्तु अब मुहूर्त का अर्थ बदला हुआ है,और वह भी फ़लित संयोग के कारण। तैत्तरीय ब्राह्मण (३.११.१) में एक ही जगह पर सूर्य चन्द्रमा नक्षत्र संवत्सर ऋतु मास अर्धमास अहोरात्र आदि शब्द प्रयुक्त हुये है।

कैसा होगा लाइफ पार्टनर – क्या आपको मिलेगा बंगला और बैलेंस- मृदुला दशोरिया –

हर लड़की की इच्छा होती है कि उसका होने वाला पति अमीर हो, आकर्षक हो और प्यार करने वाला हो। हर युवक की इच्छा वाइफ के मामले में होती है कि वह सुंदर हो, पढ़ी-लिखी हो, घर-परिवार को लेकर चलने वाली हो। आइए जानते हैं कुछ ऐसे प्लेनेट कॉम्बिनेशन ‍जो बताते हैं कि कैसा होगा आपका लाइफ पार्टनर :

- यदि मेष लग्न हो और सातवें भाव में शुक्र हुआ तो लाइफ पार्टनर सुंदर होगा, वहीं वह फाइनेंशियली साउंड भी होगा।

- वृषभ लग्न हो और सप्तम भाव में मंगल हो व चंद्र लग्न में हो तो वह जीवनसाथी उग्र स्वभाव का होगा लेकिन धन के मामलों में सौभाग्यशाली होगा।

- मिथुन लग्न हो और सप्तम भाव का मालिक भी सातवें भाव में ही बैठा हो तो ऐसी पत्रिका ‍जिसकी होगी वह ज्ञानी, न्यायप्रिय, मधुरभाषी, परोपकारी, धर्म-कर्म को मानने वाला या वाली होगी।

- कर्क लग्न वालों के लिए शनि सप्तम भाव में या सप्तमेश उच्च का होकर चतुर्थ भाव में हो तो वह साँवला या साँवली होगी, लेकिन जीवनसाथी सुंदर होगा या होगी व शनि उच्च का हुआ तो विवाह सुख उत्तम मिलेगा।

- सिंह लग्न हो और सप्तमेश सप्तम में हो या उच्च का हो तो वह साधारण रंग-रूप की होगी पर उसका पति या पत्नी पराक्रमी होगें लेकिन भाग्य में रुकावटें आएँगी।

- कन्या लग्न हो और सप्तम भाव में गुरु हो तो पति या पत्नी सुंदर मिलता है। स्नेही व उत्तम संतान सुख मिलेगा। ऐसी स्थिति वाला प्रोफेसर, जज, गजेटेट ऑफिसर भी हो सकता है। लाइफ पार्टनर सम्माननीय होगा।

- तुला लग्न हो और सप्तम भाव में मेष का मंगल हो तो वह उग्र स्वभाव, साहसिक, परिवार से अलग रहने वाली होगा। लाइफ पार्टनर की पारिवारिक स्थिति मध्यम होगी व नौकरी या व्यापार में बाधा होगी।

- वृश्चिक लग्न हो और सप्तम भाव में शुक्र हो तो स्वराशि का होने से उसे सुसराल से धन मिलेगा। पति पत्नी से लाभ पाने वाला और पत्नी पति से लाभ पाने वाली होगी।

- धनु लग्न हो और सप्तम भाव में बुध हो तो लाइफ पार्टनर समझदार, विद्वान, विवेकी, पढ़ी-लिखा होगा। अगर पत्रिका लड़के की है तो लड़की सर्विस में हो सकती है।

- मकर लग्न हो और चंद्रमा सप्तम भाव में हो तो ऐसा युवा सुंदर, सॉफ्ट स्पोकन, शांतिप्रिय होगा। लाइफ पार्टनर बेहद खूबसूरत होगा।

- कुंभ लग्न हो और सप्तम भाव में सूर्य हो तो वह साहसिक, महत्वाकांक्षी, तेजस्वी स्वभाव की होगी व हुकूमत करने वाली होगी। परिवार से भी अलग हो सकती है।

- मीन लग्न हो और सप्तम में उच्च का बुध हो तो वह युवा प्रतिष्ठित होगा, ऐसी प्लेनेट कंडीशन वाली वाली युवती पढ़ी-लिखी, समझदार, माता-पिता, भूमि-भवन से लाभ पाने वाली होगी। परिवार में सम्माननीय होगी।

यदि इन प्लेनेट कॉम्बिनेशन पर अशुभ प्रभाव हुआ तो फल में परिवर्तन आ सकता है। उसी प्रकार अन्य ग्रहों की स्थिति भी देखी जानी चाहिए। उसी प्रकार सप्तमेश सप्तम में ही हो, लेकिन वक्री या अस्त हो तब भी फल में अंतर आ जाएगा।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 4, 2011

अंगूठे से जानिए भविष्य —

अंगूठे से जानिए भविष्य –

एस्ट्रोलॉजी या पॉमेस्ट्री में जहाँ रेखाओं का महत्व होता है, वहीं अँगूठे का भी अपना अलग महत्व होता है। अँगूठे से उस व्यक्ति के नेचर और क्वॉलिटी के बारे में जाना जा सकता है। इसका सीधा संबंध मस्तिष्क से होता है। अँगूठे को देखकर व्यक्ति के विचारों को भी जाना जा सकता है।

एक्सपर्ट्स के अनुसार यदि चारों अँगुलियाँ कट भी जाएँ तो इतना नुकसान नहीं होता, जितना अकेला अँगूठा कट जाने पर। कभी-कभी अधिक रक्त स्त्राव के कारण मौत भी हो सकती है या पागल भी हो सकता है।

लम्बे अँगूठे वाले व्यक्ति प्रोग्रेसिव विचारों वाले होते हैं। इसके विपरीत छोटे अँगूठे वाला व्यक्ति अविकसित पर्सनेलिटी का परिचायक होता है। लम्बे अँगूठे वाले व्यक्ति प्रैक्टिकल अप्रोच वाले आत्मविश्वास से भरपूर होते हैं। ये लोग निर्णय इमोशनल न होकर अपनी विवेकशीलता के साथ करते हैं। लम्बे अँगूठे के साथ लम्बी अँगुलियाँ फैली हुई हो तो वह व्यक्ति मैथ्स सबजेक्ट में पारंगत होता है। ऐसे लोग इंजीनियर या शिल्पी भी हो सकते हैं।

जिनके अँगूठे छोटे होते हैं, उनकी भावनाएँ और प्रतिक्रियाएँ आप आसानी से जान सकते हैं। ऐसे व्यक्ति अधिकतर आर्टिस्टिक होते हैं। अत्यन्त छोटा अँगूठा ठिगने व्यक्ति को छोड़कर हो तो वह अच्छे वक्ता के लक्षण उत्पन्न कर देता है। ऐसे व्यक्ति अपराधी प्रवृत्ति के भी हो सकते हैं।

अपनी सामान्य स्थिति से अधिक ऊपर जुड़े हुए अँगूठे व्यक्तियों के अज्ञान और मूर्खता की निशानी होते हैं। यदि अँगूठा कलाई के पास से शुभ हो तो व्यक्ति में मानवीय गुण अधिक पाए जाते हैं। तर्जनी और अँगूठे में जितनी दूरी होती है व्यक्ति उतना ही अधिक विशाल ह्रदय और गुणों से भरपूर होता है।

लचीला और पीछे की तरफ सहज मुड़ने वाला हो तो ऐसा व्यक्ति अपने आपको ढालने में प्रवीण होता है। इन लोगों में सामाजिक आवश्यकताओं को समझने की शक्ति होती है। यदि किसी का अँगूठा सख्त हो तो उस व्यक्ति के लक्षण ठीक लचीले अँगूठे वाले के विपरीत होते हैं।

ऐसे व्यक्ति की इच्छा शक्ति दृढ़ होती है, लेकिन संदेहशील होने के कारण मित्र नहीं बना पाते, यदि हो तो जल्दी मित्रता खत्म कर लेते हैं। ऐसे लोग आर्थिक मामलों में सफल होते हैं।

शक्ति क्या है????—-रामेन्द्र सिंह भदौरिया

सारा आस्तिक जगत यह स्वीकार करता है कि अवश्य किसी सार्वभौम अलक्ष्य सत्ता कोई महामहती शक्ति इस प्रपन्च में सब कार्यों को चला रही है। जिस समय हम घट घट आदि भेदों की उपेक्षा कर इस प्रपंच पर द्रिष्टि डालते है तो हमारे ह्रदय में इस जगत का एक भावापन्न अगाध अप्रमेय स्वरूप अंकित हो जाता है। जल कणों से ही जल बनता है,सहस्त्रश: एक भावापन्न जल कणों को ही जल कहा जाता है,और ऐसे ऐसे कोटिश: जल जब एकत्रित होते है तब हम उसे समुद्र कहते है। उस समय यह एकभावापन्न जलराशि मनुष्य के लिये अगाध अप्रमेय अचिन्त्य जैसी हो जाती है। यही तुलना जगत की है,अनन्त भेद का नाम जगत या प्रपंच है जिसका फ़िर टुकडा न हो सके,इस प्रकार के अनन्त टुकडों से और भेदों से यह सारा प्रपंच बना है। और तब यह अगाध अनन्त अप्रमेय और अचिन्त्य जैसा हो गया है। इतना दुर्बोध रहते भी हम यह तो देख ही रहे है कि प्रत्येक पल में इस अगाध अचिन्त्य विश्व का भी प्रत्येक लघु अवयव अपने एक रूप को छोड कर दूसरे विचित्र रूप को धारण करता रहता है। यह गति रोकने से रुकती नही है। कभी कभी तो यह हाल होता है कि विश्व की किसी छोटी से छोटी गति को भी रोकने वाला स्वयं उस गति के प्रवाह में बहने लगता है,इस विश्व की गति को कोई समझकर भी नही समझ पाता। कोई कोई सुनकर देखकर भी नही समझने पाते। यह सारा जगत किसी चतुष्पात यानी चारो तरफ़ समान निवास करने वाले महाशक्तिमान का एक चरण भाग है,”पादोऽस्य विश्वा भूतानि”। जिसके मान लिये हुये एक तुकडे का भी जब बडे बडे बुद्धिमान लोग जैसे शिव सनकादि पता नही पा सकते,तब फ़िर उस सर्वांशी सर्वेशान सर्वश्य वशी सच्चिदानन्द भगवान का पता अल्पाल्पज्ञ जीव कैसे पा सकता है। हमारी शक्ति भी उतने ही नाप तौल की होती है जितने हम होते है,इस उदाहरण से ही यदि काम लें तो कह सकते है कि उस विश्वातीत सर्वेश्वर भगवान की शक्ति भी वैसी है जैसा वह है। वह विश्वातीत है तो यह भी अप्रमेया है,वह सर्वेश्वर है तो यह भी सर्वेश्वरी है,वह सब को वश में कर लेने वाला है,तो यह भी विश्वमोहिनी है,यदि उनकी महिमा मन वचनों से अतीत है तो फ़िर भगवती की भी लीला अपरम्पार है। ऐसी दशा में हम उस अचिन्त्य शक्तिमान और उसकी शक्ति को,जो दोनो मिलकर इस अचिन्त्य जगत को चला रहे है,कैसे और किस रूप में दुनिया के आगे प्रकाशित करें। हमारी सामर्थ्य नही है,चलो छुट्टी मिली सोना चाहते ही थे बिछौना मिल गया। किन्तु यह हमारा कल्याण हमें चैन से बैठने नहीं देता। यह हमारे ह्रदय में बैठा बैठा ही साल में एक बार तो हमें उठा ही देता है,कहता है कब तक औंघते रहोगे,एक दिन तो चलना ही है,इस धर्मशाला में कितने दिन सो सकोगे,और कहीं ठिकाना नही हो तो फ़िर कल्याण के घर ही चलकर चलकर सो जाओ,वहाँ अगर जाकर सो गये तो फ़िर कोई जगाने वाला नही है। तो क्या जबरदस्ती कल्याण के घर चलना होता? अच्छी बात है,हम तो ऐसे पोस्ती है कि – “अनाहूता न यास्यामो गृहे मृत्योर्हररपि”। किन्तु मेरे मित्र कल्याण ! तुम्हारे घर का का तो हमें पता ही नही,कैसे पहुंचेंगे ? कया कहा ? यह लकडी थाम लो ? इसके सहारे फुंच जाओगे ! बहुत से अंधे आज भी अपना काम चला रहे हैं। अंधों की लकडी है। लकडी के द्वारा वे अपने घर का मार्ग तै कर लेते है। “सर्वस्य लोचनं शास्त्रम” – अज्ञानियों को अपना ध्येय प्राप्त करने के लिये नेत्र शास्त्र ही है। उस परात्पर भगवान की शक्ति का निरूपण करने के लिये शास्त्र ही नेत्र ज्योति है,हमे उसके लिये शास्त्र ही शरण हैं।

शक्ति का स्वरूप—-

भगवान की शक्ति भगवान से पृथक नही है। वह भी भगवान ही है,ये सच्चिदानन्द भगवान जिस समय (सृष्टि के पूर्व) तिरोहितधर्म सुप्त-शक्ति अतएव अन्त:क्रीड व्यापक रहते है उस समय उनकी यह शक्ति-महारानी भी उनके स्वरूप में मिली हुयी जागती हुयी भी सोती रहती है। एक और व्यापक रहती है,और जब वे भगवान जगत-रूप से अनन्त रूप धारण करते है तब यह शक्ति-महारानी भी अपने अनन्त रूप बना लेती हैं। भगवान ने जगत रूप अपनी क्रीडा के व्यवहारों को यथावस्थित चलाने के लिये विरुद्धाविरुद्ध अनेक रूप धारण किये है,तो शक्ति भी इसी प्रकार से विरुद्धाविरुद्ध विविध प्रकार से प्रकत हुयी। अतएव भगवान के अनन्त रूप है,तो उनकी शक्तियां भी अनन्त हैं। उनमें विरुद्ध शक्तियां भी सप्रयोजन है,जिस कार्य की अपेक्षा है उसको करने के लिये तदनुकूल शक्ति का भी निर्माण किया गया है। विरुद्ध शक्ति के प्रादुर्भाव से कार्य को अनुकूल कर लिया जाता है,जड को किंवा चेतन जब किसी पदार्थ की किसी दूसरे पदार्थ में अति आशक्ति होकर क्रीडा होने लगती है,और इस क्रीडा से दोष होने की सम्भावना होने लगती है,किंवा दोष उत्पन्न होते है तब भगवान उसी समय उससे विरुद्ध शक्ति को उत्पन्न कर उन आते हुये दोषों को दूर कर पदार्थों का समीकरण करते रहते हैं। इस तरह वे कर्मज कालज और स्वभावज दोषों का निवर्तन करते हैं। और मोहिनी माया से आते हुये दोषों को अपनी चिच्छाशक्ति से दूर करते हैं। देश दोष तो भगवान में आ ही नही सकता है। क्योंकि भगवान अपने आत्मा में ही सर्वदा निवास करते हैं। यह अक्षर ब्रह्मरूप भगवदात्मा सर्व धर्मों से अस्पृष्ट ही रहता है,इस तरह भगवान सर्वजगत रूप रहने पर भी उच्चावच सर्व प्रकार की लीलाओं को काते रहने पर भी अपने स्वरूप में- लीला में पांचों प्रकार के दोषों का सम्बन्ध न होने देने के लिये विविध अनन्त शक्तियों का आविर्भाव करते हैं। इन अनन्त शक्तियों में तीन शक्तियां प्रधान है। सर्वभवनसामर्थ्य,मोहिनी और क्रिया। ये प्रधान किंवा अप्रधान सब प्रकार की शक्तियां शास्त्रों माया शब्द से कही गयी है,अतएव कभी कभी विद्वानों को भी माया का अर्थ समझने में भूल हो जाती है। वास्तव में देखा जाय तो सर्वभवनसामर्थ्यरूप माया का ही सब खेल है,सारा जगत जड या चेतन सब का सब इस सर्वभनसामर्थरूप माया के द्वारा ही बनाया गया है। इसे एक मशीन की तरह से समझिये। सुनारों के पास जो एक ढालने का सांचा होता है,वे लोग सांचे का स्पर्श करके अनेक पदार्थ तैयार कर लेते हैं। सुवर्ण भी उस सांचे का स्पर्श पाकर अनेक रूपों में प्रकट हो जाता है। इसी प्रकार भगवान भी उस सर्वभवनसामर्थ्य (सबकुछ होने की ताकत) रूप अपनी माया शक्ति का स्पर्श कर जब प्रकट होता है तब उस भगवान को ही अल्पबुद्धि लोग जगत कहने लगते है। और कितने ही उसे भगवान से अलग समझते है। सबसे बडी यह शक्ति है। उत्कर्ष-अपकर्ष समता-विषमता भला-बुरा सत्य-असत्य जो कुछ दिखाई देता है,वह सब कुछ इसी माया महाशक्ति का ही सामर्थ्य है। माया के सहारे सृष्टि का निर्माण होना यह पौराणवर्णन है,श्रौत नही। श्रुति में तो माया के स्पर्श बिना ही भगवान अपने आप को जगत रूप में प्रकाशित करता है-”स आत्मानँस्वयमकुरुत”,और श्रीमद्भागवतादि पुराणों में तो इस प्रकार वर्णन है- “स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया। दसद्रूपया चासौ गुणमयागुणो विभु:”। सबसे पहले इस सर्वसमर्थ भगवान ने अपनी उच्च नीच स्वरूपा अतएव गुनम्यी मायाशक्ति से इस जगत को पैदा किया। भगवान निर्दोष और अप्राकृत अनन्त गुण वाले है,अतएव अपने स्पर्श से उसे गुणमयी और तत्तादृश आकृतिवाली बना देते है,भगवान के स्पर्श से ही वह बुनमयी हुयी और अब वह जगत की प्रक्रुति (अवानतरमूल) हुयी,अतएव उसमें आने के बाद वे गुण प्राकृत कहलाने लगे। स्पर्श परस्पर होता है,जैसे भगवान का स्वर्श माया को हुआ,इसी प्रकार माया का स्पर्श भगवान को भी हुआ ही। किन्तु भगवदगुण तो माया में आये,पर भगवान में माया के गुण नहीं आये। भगवान तो निर्गुण के निर्गुण ही रहे। इसीलिये मूल में ’विभु:’ पद दिया गया है। भगवान में वैसी सामर्थ्य है। कमलपत्रों में ही सामर्थ्य है कि वह जल का स्पर्श होने पर भी उससे निर्लेप रहे,लेकिन जल उसके गुण यानी सुगन्ध को ले जाये। इसी प्रकार भगवान भी उस अपनी माया शक्ति में प्रवेश करते हैं। अपने सच्चिदानन्दादि गुणों को माया में से होकर निकालते है,तथापि उसके धर्म भगवान का अभिभव नही कर सकते। यह भगवान का विभुत्व है।

नाम बदलो, भाग्य चमकाओ –नाम है अच्छा तो काम मिले सच्चा— राजीव शर्मा

एक समय वह भी था जब लोग अपने नाम के बजाए काम पर अधिक ध्यान दिया करते थे, परंतु इस संबंध में युवाओं की बदलती हुई प्रवृत्ति को देखकर लगता है कि अब उनके लिए नाम का इंपॉर्टेंस पहले की तुलना में बहुत ज्यादा हो गया है और इसीलिए वे अपने पहले रखे गए नामों को बदलने में लगे हैं।

अब प्रश्न आता है कि युवाओं को नाम बदलने की जरूरत क्यों पड़ती है! वास्तव में इस प्रश्न के कई पहलू हैं। नाम परिवर्तन के ज्यादातर मामलों में लड़कियाँ ही अपना नाम बदल रही होती हैं और इसका सबसे बड़ा कारण तो यही है कि करीब-करीब सभी धर्मों में मैरिज से पहले लड़कियों के नाम के साथ जहाँ पिता का उपनाम या सरनेम लगता है वहीं विवाह के बाद पति का कुलनाम लगने लगता है। ऐसे मामलों में नॉर्मली उनका उपनाम ही बदलता है। कुछ परिवारों में विवाह के बाद लड़की का नाम बदलने का भी ट्रेडीशन है।

कुछ मामलों में लोग इसलिए भी नाम बदलते हैं क्योंकि उनके नाम में पिता का नाम या उनका सरनेम नहीं जुड़ा होता। शुरू में तो इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता, लेकिन बाद में बड़े होने पर अथवा जरूरत पड़ने पर उन्हें यह फील होता है कि उनका सरनेम भी नाम के साथ होना चाहिए। अतः लोग अपना नाम चैंज कर लेते हैं।

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बचपन में रखे गए पिंकी, पिंकू, मुन्ना, मुन्नी, पप्पू आदि जैसे बच्चों के प्यार के नाम ही बर्थ सर्टिफिक‍िट्स या स्कूल के सर्टिफिक‍िट्स में यह सोचकर दर्ज करवा दिए जाते हैं कि फिलहाल तो यही रहने देते हैं, बाद में बदल देंगे, लेकिन समय बीतता रहता है और पैरेंट्स को नाम बदलना याद ही नहीं रहता। ऐसे में बड़े होने पर बच्चों को अपने ही नाम से शर्म आने लगती है। अतः इस स्थिति से छुटकारा पाने के लिए भी युवा अपना नाम बदल देते हैं।

कई बार लोग किसी एस्ट्रोलॉजर की सलाह पर अपने लक को बदलने के लिए नाम में परिवर्तन कर लेते हैं। ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ एस्ट्रोलॉजर्स सोसाइटी के अरुण कुमार बंसल बताते हैं – ज्योतिष में नाम बहुत महत्वपूर्ण होता है। नाम वह होता है जिसे सुनकर व्यक्ति या पशु जाग जाए या मुड़कर देखने लगे। व्यक्ति का नाम बार-बार बोला जाता है, इसलिए उसका बहुत बड़ा प्रभाव हम पर पड़ता है।

ज्योतिष में नाम का केवल पहला लेटर ही मैटर करता है, परंतु न्यूमरोलॉजी में पूरे नाम की स्पेलिंग का महत्व होता है। लोग अपने मूलांक और भाग्यांक को ध्यान में रखते हुए नाम रखने का प्रयास करते हैं। यदि किसी का नाम इनके अनुरूप न हो तो वह अपना नाम बदलने की सोचता है। वैसे एस्ट्रो के पॉइंट ऑफ व्यू से नाम बदलने का चलन ज्यादातर रइसजादों में ही देखा जाता है।

एस्ट्रो रिजन से युवा कभी तो अपना पूरा नाम ही बदल डालते हैं या कभी अपने पुराने नाम में ही थोड़ा बहुत हेरफेर अथवा स्पेलिंग में परिवर्तन कर देते हैं। ऐसे लोग नाम परिवर्तन करने के लिए कभी उसमें कुछ जोड़ते हैं तो कभी कुछ घटाते हैं। इसमें उनके नाम के अंकों को जोड़कर जो अंक आता है वह राशि के अनुसार भी लकी होता है। कभी-कभार लोग इसलिए भी नाम में मामूली परिवर्तन करते हैं क्योंकि उनके पुराने नाम की स्पेलिंग गलत होती है और जब उन्हें इस बात का ज्ञान होता है तो वे भी मानने लगते हैं कि गलत स्पेलिंग वाला नाम उनकी पर्सनेलिटी में बाधा डाल रहा है। इस प्रकार के मामलों में भी लोग अपना नाम बदल लेते हैं।

यूँ तो नाम रखना या उसमें परिवर्तन करना पूरी तरह से पर्सनल मैटर होता है और कोई भी कभी भी अपना नाम बदल सकता है लेकिन जहाँ तक सरकारी डॉक्यूमेंट्स, सर्टिफिक‍िट्स, अकाउंट्स आदि में नए नाम के अनुसार परिवर्तन करवाने की बात है तो इसके लिए कुछ रूल्स व रेग्यूलेशन का पालन करना पड़ता है। नाम बदलने के लिए व्यक्ति को इस संबंध में ‘एफिडेविट’ के साथ-साथ किन्हीं दो नेशनल न्यूज पेपर्स में अपनी डिटेल्स देते हुए इस बात की जानकारी देनी पड़ती है।

विदेश यात्रा के योग –(अब्रॉड जाने का सपना होगा सच–फॉरेन के लिए एस्ट्रोलॉजी)– भारती पण्डित —

फॉरेन जाना हरेक युवा का सपना होता है। ये फॉरेन टूर या तो घूमने के लिए हो सकता है या एजुकेशन के सिलसिले में हो सकता है या फिर करियर यानी जॉब या बिजनेस के सिलसिले में भी हो सकता है। ये सब सोचना और इस ड्रीम का रियलिटी में बदल पाना आपके पक्के इरादों के साथ कई बार हॉरोस्कोप पर भी डिपेंड कर सकता है। ऐसे में अच्‍छा हो प्रिपरेशन करते-करते एक नजर अपने हॉरोस्कोप पर भी डाल ली जाएँ –

हॉरोस्कोप में आपका मनुष्य ग्रह (लग्न का या एसेंडेंट का स्वामी) यदि 3, 6, 8, 12 हाउस में हो तो आपका फॉरेन जाना हो सकता है। इसके साथ मून जितना पावरफुल होता है, यह 1, 3, 8, 9, 12 हाउस में हो तो दूर की यात्रा होती है।

यदि मून बहुत पावरफुल हो मगर किसी प्लेनेट से रिलेशन न बनाता हो तो यात्रा केवल घूमने घामने के इंजॉयमेंट के परपज से ही होती है। ये यात्राएँ भले ही बार-बार होती हैं मगर वहाँ जाकर सैटलमेंट के योग नहीं आते।

यदि मून का रिलेशन पावरफुल ज्यूपिटर के साथ हो, स्पेशली 1, 3, 8, 9, 12 में तो एजुकेशन के सिलसिले में फॉरेन जाने का चाँस मिलता है और ग्रहों की दशा-महादशा के हिसाब से वहाँ समय बिताने को मिलता है।

यदि मून का डायरेक्ट रिलेशन वीनस के साथ बन रहा हो तो ये टूर बिजनेस के सिलसिले में हो सकता है और वहाँ सैटल होने का मौका भी मिल सकता है। कब और किस उम्र में, यह आपके नवें हाउस पर डिपेंड करेगा।

यदि 12वें हाउस राहु-केतु के इफेक्ट में हैं तो बर्थप्लेस से काफी दूर जाकर भाग्योदय होता है और अचानक फॉरेन जाने के चांस मिलते हैं, अचानक वापस भी आना पड़ता है।

इसी तरह मून-वीनस यदि सैटर्न (नीच का) राहु या केतु के बुरे प्रभाव में हो तो यात्रा में नुकसान हो सकता है।

तो अब अपने फ्यूचर प्लान को सेट करने से पहले हॉरोस्कोप पर भी नजर डालें और उसके हिसाब से अपने प्लेनेट मजबूत करें, शुभ योगों को बढ़ाएँ और बेधड़क फॉरेन जाएँ, नाम-पैसा और प्रसिद्धि कमाएँ।

लकी नंबर से चु‍निए करियर –एस्ट्रो की नजर, आपका करियर— भारती पंडित

मूलांक यानी आपकी डेट ऑफ बर्थ या जन्मदिन। यदि होरोस्कोप न हो तो केवल इसके द्वारा भी आप अपनी वर्किंग फील्ड के बारे में जान सकते है और मनचाही सफलता हासिल कर सकते हैं—–

* यदि आप मूलांक 1 को रिप्रेजेंट करते है तो आपको डिजाइनर, टीम लीडर, फिल्म मेकिंग या नवीन इन्वेंशन के क्षेत्र में जाना चाहिए।

* यदि आपका मूलांक 2 है तो आपको किसी भी रचनात्मक काम को करना चाहिए जैसे डाँसिंग, राइटिंग, पोएट्री या रिसर्च के कार्य कर सकते हैं।

* यदि आपका मूलांक 3 है तो आपके लिए एक्टिंग, टीचिंग, जर्नलिज्म, काउंसलिंग आदि बेहतर ऑप्शन है।

* यदि आपका मूलांक 4 है तो आपको इंजीनियर, बिल्डर, प्रोग्रामर, मशीनों से रिलेटेड काम करना चाहिए।

* यदि आपका मूलांक 5 है तो आपको प्रकाशन, विज्ञापन,लेखन आदि क्षेत्र में काम करना चाहिए।

* यदि आप मूलांक 6 को रिप्रेजेंट करते है तो आप सोशल वर्क, मेडिकल, आयुर्वेद,कुकिंग आदि फील्ड में काम कर सकते हैं।

* यदि आपका मूलांक 7 है तो आपको वैज्ञानिक, दार्शनिक, जासूस, मिस्ट्री नॉवेल राइटर होना चाहिए।

* यदि आपका मूलांक 8 है तो आपको बैंकिंग, मैनेजर, किसी संस्था का डायरेक्टर या मशीनों का काम करना चाहिए।

* यदि आपका मूलांक 9 है तो आप खिलाड़ी, फिजिशियन, वकील,सैनिक आदि हो सकते हैं।

बेहतर होगा कि आप अपने मूलांक को सूट करता हुआ करियर चुने। यदि ऐसा न कर पाए तो मेहनत बहुत अधिक करनी होगी, तभी सफलता मिल पाएगी।

रिजल्ट शानदार बनाएँ : टिप्स आजमाएँ–भारती पंडित

भले ही ये टोटके दादी-नानी के ज़माने के माने जाते हैं मगर यह सच है कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी कई बार सही ठहरते हैं। वास्तव में इन टोटकों के द्वारा नेगेटिव एनर्जी को दूर किया जाता है। जिससे मन में और कार्यों में पॉजिटिविटी आती है।
आप भी आजमाएँ इन टोटको को:—

1. परीक्षा देने व परीक्षा होने के बाद से रिजल्ट तक रोज पलंग के नीचे सोते समय राई डाल दे और सुबह उसे स्वयं बुहार दें।
2 . सूर्य के दर्शन रोज करें और जल चढ़ाएँ।
3. रोज चार तुलसी के पत्ते खाली पेट जीभ के नीचे रखे,निगले नहीं।
4. सो कर उठने के बाद नाक से जोर से साँस ले. जो सुर चल रहा हो (नाक का ) उसी पैर को धरती पर रखें।
5 . पहला पग धरती पर रख कर धरती को प्रणाम करें।
6. काले कुत्ते और गाय को नियमित कुछ भोजन दें।
7. घर के किसी कोने या कमरे की सफाई स्वयं करें ।
8. अपने नौकर को हर शनिवार कोई काली मिठाई या काली दाल भेंट करें।

रिजल्ट लेने जाते समय : —-

1. सौंफ-मिश्री अपने पास रखें और सुबह उसे खाकर ही कुछ और खाएँ।
2. जागते ही इष्ट का ध्यान करें और उनकी तस्वीर देखें।
3 . नहाने के बाद बाथरूम खुद साफ़ करें।
4 . बड़ों के चरण छुएँ,आशीर्वाद लें और तुलसी की 5 पत्तियाँ अपने रुमाल में बाँधे।
5 . जाते समय दही-शक्कर खाएँ। भूखे पेट घर से न निकले।
6 . बाहर निकलते समय खाली बर्तन न दिखे,इसका ध्यान रखे. पानी की भरी बालटी रख सकते है.
7. दूधवाले को देखना शुभ होगा। चाहे तो अपने दूधवाले को उस समय दूध भरी बाल्टी के साथ बुला लें।
8. घर से निकलते समय नाक का जो सुर चल रहा हो, उसी पैर को पहले बाहर निकालें।
9 . इत्र या डियो का प्रयोग जरूर करें।
10. अपने लकी कलर और लकी चीजों का प्रयोग करें(साथ रखें)। यदि आपका कोई लकी चार्म हो,तो उसका चेहरा देख कर ही बाहर निकले।

यह टिप्स सिर्फ आपका लक फेवरेबल कर सकते हैं, रिजल्ट शानदार आए इसके लिए जरूरी है कि आपने एक्जाम में कुछ लिखा भी हो। वैसे आल द बेस्ट!

मुखाकृति से भविष्य ज्ञान- डॉ. गोविंद बल्लभ जोशी

भविष्य जानने के लिए कई विद्याओं का प्रचलन है जिनमें फलित ज्योतिष, अंक विद्या, स्वर विज्ञान, हस्तरेखा विज्ञान प्रमुख हैं लेकिन सामने खड़े व्यक्ति की मुखाकृति को देखकर व्यक्तित्व एवं उसका भविष्य जानने का विज्ञान भी भारत में प्राचीन काल से चला आ रहा है।

वर्गाकार मुखाकृति —
वर्गाकार मुखाकृति वाले व्यक्ति पृथ्वी तत्व प्रधान होते हैं। ऐसे व्यक्तियों की मुखाकृति की तस्वीर लेकर अगर चारों ओर लाइन लगाकर चतुष्कोण खींचा जाए तो इनका चेहरा चतुष्कोण में पूरा फिट आ जाएगा। यह जातक स्वस्थ, सुडौल एवं शक्तिसंपन्न होते हैं। इनमें उद्यमशीलता, व्यावहारिकता तथा संचय करने की प्रवृत्ति एवं गुण पाए जाते हैं। ऐसे लोग भौतिक साधनों से संपन्न, सुखी, समृद्ध होते हैं।

ये लोग सैद्धांतिक होते हैं और दूसरों से प्रभावित होकर आसानी से अपने सिद्धांत नहीं बदलते। अगर इनके चेहरे में पृथ्वी तत्व की मात्रा अधिक हो तो ये व्यक्ति हठी, अदूरदर्शी, आलसी, विलासी होते हैं तथा अपनी अकर्मण्यता के कारण बाद में दुखी होते हैं।

वर्गाकार मुखाकृति वाली स्त्रियों का शरीर स्थूल होता है। इनकी चाल धीमी तथा मतवाली होती है। ऐसी स्त्रियाँ कर्मठ, व्यवहारकुशल तथा मनमौजी होती हैं। अगर इनकी मुखाकृति में पृथ्वी तथ्व अधिक मात्रा में हो तो ये स्वभाव की दृष्टि से दुर्बल होती हैं।

वृत्ताकार मुखाकृति —
वृत्ताकार मुखाकृति वाले जल तत्व प्रधान होते हैं। यदि इनके चेहरे का चित्र लेकर एक गोले में फिट किया जाए तो उनमें यह लगभग फिट हो जाता है। ऐसे जातक के गाल भरे हुए माँसल एवं स्निग्ध होते हैं। इनका शरीर स्थूल तथा उदर लंबा होता है। यह लोग भावुक, कल्पनाशील, प्रसन्नचित्त, सहृदय, स्वप्नदर्शी मिलनसार एवं संवेदनशील होते हैं।

ऐसे लोग आराम पसंद जीवन बिताना पसंद करते हैं तथा संघर्ष से दूर भागते हैं। जिसके चेहरे पर जल तत्व का प्रभाव अधिक हो वे निराशावादी और अकर्मण्य होते हैं। गोल चेहरे वाली औरतें श्रृंगारप्रिय हावभाव वाली, बुद्धिमती तथा पतिव्रता, उदारहृदया, स्नेही तथा चंचल होती हैं। अगर जल तत्व का प्रभाव अधिक हो तो ये दुर्बल, निराश एवं रोगग्रस्त होती हैं।

नुकीली मुखाकृति – –
नुकीली मुखाकृति वाले व्यक्ति अग्नि तत्व प्रधान होते हैं। अगर इनके चेहरे की तस्वीर चतुष्कोण में फिट की जाए तो ललाट वाला ऊपरी भाग चौड़ा होगा और नीचे का ठोड़ी वाला भाग संकरा होगा अथवा यूँ कहा जा सकता है कि इनके चेहरे की आकृति बाल्टी जैसी होगी। कोनों में गोलाई नहीं होगी। ऊपर का भाग विस्तृत होने के कारण ऐसे लोग बुद्धिमान, चिंतक, दूरदर्शी, साहसी, स्वस्थ एवं समृद्ध, स्पष्ट वक्ता, अभिमानी, नेतृत्वप्रिय एवं हठी होते हैं। ये लोग शक्ति में विश्वास करते हैं और अगर कहीं वाद-विवाद में उलझ जाएँ तो पीछे नहीं हटते।

रचनात्मक एवं विध्वंसात्मक दोनों प्रकार के कार्य करते हैं। अगर चेहरे पर अग्नि तत्व का प्रभाव अधिक हो तो जातक अत्यंत क्रोधी, हिंसात्मक एवं पाश्विक वृत्ति का होगा। नुकीली मुखाकृति वाली स्त्रियाँ स्वाधीनताप्रिय, असहिष्णु एवं वाचाल होती हैं। गृहस्थ जीवन में ये औरतें सफल नहीं होतीं क्योंकि जरा-सी बात पर इन्हें क्रोध आ जाता है। हाँ, नौकरी, राजनीति एवं सामाजिक क्षेत्र में ये स्त्रियाँ उन्नति कर सकती हैं।

अंडाकार मुखाकृति – —
अंडाकार मुखाकृति वायु तत्व प्रधान मुखाकृति होती है। जातक सामान्य कद के पुष्ट शरीर एवं उभरे स्निग्ध गालों वाले, आकर्षक और लुभावने होते हैं। ऐसे व्यक्ति आशावादी, स्वच्छंद, साहसी होते हैं तथा हर बात तर्क से करते हैं। यह हमेशा ज्ञान की जिज्ञासा, आनंद की खोज, शांति की चाह रखते हुए प्रगति की राह पर चलते हैं। अगर चेहरे का नीचे का भाग पुष्ट हो तो यह व्यक्ति प्रेम और सौंदर्य की इच्छा, काम पिपासा तथा व्यर्थ आचरण की कामना रखते हैं। यदि इन व्यक्तियों का चेहरा उलटे अंडे की तरह हो अर्थात इनका ललाट का भाग संकुचित हो और नीचे का भाग विस्तृत हो तो ऐसे व्यक्तियों की बुद्धि इतनी विकसित नहीं होती।

यह लोग हास्य एवं व्यंग्यप्रिय, मनमौजी, उथले स्वभाव के होते हैं। चेहरे के नीचे के भाग में वायु तत्व की प्रधानता जातक को असत्यवादी, अस्वस्थ एवं चिड़चिड़ा बनाती है। अंडाकार मुखाकृति वाली स्त्रियाँ सामान्य होती हैं परंतु थोड़े प्रयत्न से अच्छा जीवन साथी सिद्ध हो सकती हैं।

उलटे घड़े के समान मुखाकृति – —
ऐसे जातक को देखकर ऐसा लगता है जैसे शरीर पर गर्दन सहित उलटा घड़ा रखा हो। इनमें आकाश तत्व की प्रधानता होती है। इनके चेहरे पर अद्भुत कांति तथा आँखों में विशेष तेज होता है। ऐसे लोग उदार हृदय, महत्वाकांक्षी, स्वाभिमानी एवं आदर्शयुक्त, एकांतप्रिय, सौम्य, तेजस्वी, आत्मबली एवं असाधारण प्रवृत्ति के होते हैं।

गरु पुष्य नक्षत्र पर आवश्यक जानकारी —

गुरु-पुष्य नक्षत्र का महत्व शास्त्रों में सबसे अधिक है । इस समय में किया गया दान और पुण्य कई गुना अधिक फल देता है। आइए देखे विभिन्न मूलांक वाले लोगों को इस शुभ योग में क्या खरीदना चाहिए और क्या दान करना चाहिए। विशेषकर तब जब हमारे युवा इस दिन किसी परीक्षा या इंटरव्यू के लिए जाना चाहते हो।

* मूलांक 1 : सूर्य का अंक है. सूर्य अभी मेष में उच्च के है। अतः ये जातक सफेद और नारंगी वस्त्र पहने, इन्हीं रंगों की वस्तुओं का दान करे और माणिक रत्न पहने।

* मूलांक 2 : यह चन्द्र का अंक है। चन्द्र इस दिन कर्क राशि में है। अतः ये जातक सफेद ड्रेस पहने, चावल का और दूध का दान करे और मोती रत्न धारण करें।

* मूलांक 3 : यह गुरु का अंक है। गुरु अभी कुंभ में है अतः इन जातकों को पुखराज या सुनहला धारण करना चाहिए, हल्के पीले वस्त्र पहने और चने की दाल और गुड का दान करना चाहिए।

मूलांक 4 : यह राहू का अंक है। राहू अभी धनु में मैं है अतः इन जातकों को गहरे रंग के वस्त्रों से बचना चाहिए, गहरे नीले वस्त्र का दान करना चाहिए और राहू की जडी धारण करना चाहिए।

* मूलांक 5 : यह बुध का अंक है और बुध अभी सूर्य के साथ है। अत: इन जातकों को हरे वस्त्र धारण करना चाहिए, गाय को चारा खिलाना चाहिए और पन्ना पहनने के लिए भी यह दिन शुभ है।

* मूलांक 6 : यह शुक्र का अंक है। शुक्र अभी अपनी राशि वृषभ में है अतः इन जाताकों को सफ़ेद ड्रेस पहननी चाहिए, साबूदाना दान करना चाहिए और हीरा धारण करना चाहिए।

* मूलांक 7 : यह केतु का अंक है। केतु अभी मिथुन में है। स्लेटी और काले वस्त्र न पहने, हलके रंगों का प्रयोग करे। केतु की जडी धारण करे और कुत्ते को मीठी रोटी खिलाएँ।

* मूलांक 8 : यह शनि का अंक है। शनि अभी कन्या में है अतः इन जातकों को गहरे रंगों से बचना चाहिए, काली वस्तुओं का व तेल का दान करना चाहिए। नौकरों को कुछ खाद्य सामग्री दान दें।

* मूलांक 9 : यह मंगल का अंक है। मंगल अभी कर्क में नीच के है। अतः इन जातकों को लाल रंग का प्रयोग करना चाहिए, मूंगा पहन सकते हैं और चुकंदर, मसूर की दाल का दान करें। रक्त दान भी बेहतर उपाय है।

विशेष : अपने मूलांक के अनुसार इष्ट का ध्यान करना और दान करना सफलता के प्रतिशत को निश्चित ही बढ़ाएगा।
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ज्योतिष शास्त्र में ग्रह, नक्षत्र, वार, करण, तिथि, मास आदि अनेक महत्त्वपूर्ण घटक हैं जो अपने प्रभाव व युति के कारण शुभ व अशुभ समय का निर्माण करते हैं। जिसके कारण मानव इच्छित कार्यों में उच्च सफलता प्राप्त करता है। चाहे वह जीवन का कोई भी क्षेत्र हो।

गुरुवार के दिन यदि पुष्य नक्षत्र हो वह बहुत ही शुभ होता है। इस दिन व नक्षत्र के योग से गुरु पुष्य योग का निर्माण होता है, जो अत्यन्त शुभ व किसी कार्य में 99.5 प्रतिशत सफलता दिलाने वाला कहा गया है।

‘गुरू’ ग्रह ज्ञान व सफलता का प्रतीक है इसलिए इस योग में उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, कला, साहित्य, नाट्य, वाद्य या किसी विषय में शोध प्रारम्भ करना, शैक्षणिक व आध्यात्मिक गुरु चुनना, तंत्र, मंत्र व दीक्षा लेना, विदेश यात्रा, व्यापार, धार्मिक कार्यों का आयोजन आदि कार्य करना शुभ होता है।

किन्तु मुहूर्त की सूक्ष्मता पर इसमें विचार किया जाए तो इस दिन बनने वाले योग में भी चंद्रबल, तारा बल, गुरु-शुक्रादि ग्रहों का उदय-अस्त, ग्रहणकाल, पितृपक्ष व अधिक मास आदि तथ्यों का भी विचार किया जाता है। इसलिए नूतन गृह निर्माण व प्रवेश तथा विवाह आदि कार्यों में सभी तथ्यों पर विचार कर ही करना लाभकारी रहेगा।

इस गुरु-पुष्य नक्षत्र अर्थात्‌ जिन जातकों की कुण्डली में गुरु प्रतिकूल है या उच्च का होकर भी प्रभावहीन है अर्थात्‌ अपना फल नहीं दे रहा उन्हें इस अवसर पर पीले रंग की दालें, हल्दी, सोना, आदि वस्तुओं दान देना चाहिए।

इसके अतिरिक्त कोई भी जातक इस दिन अपने कल्याण हेतु व गुरु की अनुकूलता प्राप्त करने के लिए धर्मस्थलों में या गरीबों को विविध प्रकार की खाद्य सामग्री, वस्त्रादि भेंट कर सकते हैं। कोई धार्मिक अनुष्ठान जैसे भगवान विष्णु व उनके अवतारों की पूजा-पाठ हवनादि कर ब्राह्मणों को प्रसन्न कर अपने सौभाग्य में वृद्धि सकते हैं।

दुर्भाग्य व दरिद्रता का नाश करने वाला, मनोवांछित फल देने वाला तथा धार्मिक कार्यों को संपन्न करने वाला, यह गुरु-पुष्य योग अत्यधिक पवित्र एवं शुभ है।
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गुरु-पुष्य अत्यंत ही शुभ मुहूर्त माना जाता है। इस दिन खरीदी गई वस्तु के साथ लक्ष्मी, सुख, सौभाग्य, समृद्धि और हर्ष लेकर आती है। इस पवित्र संयोग को विष्णु-लक्ष्मी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त है। इस योग में सारा दिन मंगलकारी रहता है लेकिन फिर भी शुभ मुहूर्त देखकर ही वस्तुएँ खरीदी जाएँ तो अत्यंत शुभ फल की प्राप्ति होती है। प्रश्न यह उठता है कि इस मुहूर्त में खरीदा क्या जाए? प्रस्तुत है, राशियों के अनुसार विशेष जानकारी :

मेष : इस राशि का स्वामी मंगल है। यह पराक्रम का कारक है। इस राशि वालों को अपने लिए रत्न मूँगा खरीदना शुभ रहता है। मेष राशि वाले लाल रत्नों के गहने भी खरीद सकते हैं। सामर्थ्य अनुसार लाल रंग की वस्तुएँ भी खरीदी जा सकती है। गुरु के शुभ संयोग के कारण साथ में पीले फूल अवश्य खरीदें और नृसिंह भगवान को चढ़ाएँ।

वृषभ : इस राशि का स्वामी शुक्र है। यह सौन्दर्य, प्रेम और गुप्त भावनाओं का कारक है। अत: इस राशि वालों को शुभ मुहूर्त में हीरा अवश्य खरीदना चाहिए। हीरा खरीदने के साथ ही धारण भी इसी दिन करें। अगर हीरा (डायमंड) खरीदने की क्षमता नहीं हो तो चमकते सफेद रंग, सिल्वर कलर के परिधान खरीदना अत्यंत मंगलकारी होगा। ‍गुरु के शुभ संयोग के कारण साथ में मौसमी पीले फल खरीदें और जिस हाथ में हीरा धारण किया है उस हाथ से गुरु को भेंट करें।

मिथुन : इस राशि का स्वामी बुध है। यह वाणी का कारक है। इस राशि वालों को इस दिन शैक्षणिक सामग्री खरीदना चाहिए। क्षमता हो तो पन्ना रत्न खरीद कर धारण करें। अगर नहीं खरीद सकते हैं तो हरे रंग से मुद्रित दुर्गा चालीसा के पाँच छोटे संस्करणों का देवी मंदिर में वितरण करें। गुरु के शुभ संयोग की वजह से पीली ध्वजा सजाकर मंदिर में अर्पित करें।

कर्क : इस राशि का स्वामी चन्द्र है। यह मन का कारक है। इस राशि वालों को मोती के आभूषण अवश्य खरीदना चाहिए। हो सके तो सफेद फूल शिव मंदिर में चढ़ाएँ। इस दिन घर के किसी बुजुर्ग को सफेद रंग की मिठाई खिलाएँ। वाहन खरीदना हो तो कर्क राशि वालों के लिए इससे बेहतर कोई मुहूर्त नहीं है। गुरु के शुभ संयोग में पीले रंग का एक रूमाल खरीदना भी लाभकारी होगा।

सिंह : इस राशि का स्वामी सूर्य है। यह आत्मा का कारक है। इस राशि वालों को स्वर्णाभूषण अवश्य खरीदना चाहिए। हो सके तो प्रात: सूर्य को मिश्री व कुँकू मिलाकर जल चढ़ाएँ। इस दिन मंगल मुहूर्त में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण खरीद सकते हैं। विशेषकर फ्रिज या माइक्रोवेव। युवा वर्ग मोबाइल हैंडसेट बदलने पर विचार कर सकते हैं। गुरु के शुभ संयोग में संतरा खरीद कर गरीब बस्तियों में बाँटना अत्यंत प्रगतिकारक रहेगा।

कन्या : इस राशि का फल मिथुन राशि के अनुसार देखें।

तुला : इस राशि का फल वृषभ राशि के अनुसार देखें।

वृश्चिक : इस राशि का फल मेष राशि के अनुसार देखें।

धनु : इस राशि का स्वामी गुरु है। यह जीवन में शुभ कार्यों का कारक है। यह व्यक्तित्व में गंभीरता प्रदान करता है। इस राशि वालों को इस दिन पीले वस्त्र ही धारण करने चाहिए। पुखराज रत्न खरीदना चाहिए। हो सके तो आटे में हल्दी मिलाकर दीपक बनाएँ और हनुमान मंदिर में जलाएँ। मंदिर ना हो तो पीपल के पेड़ को बिना स्पर्श किए दीपक रखें। जीवन की बाधाएँ दूर होगी। इस दिन सोना, पीले परिधान, पीले फूल, पीले फल तथा पीली मिठाई खरीदें। गुरु के शुभ संयोग में केसर का तिलक लगाएँ तथा जुबान पर शुभ मुहूर्त में केसर रखें।

मकर : इस राशि का स्वामी शनि है। इस राशि वालों को तेल की बनी वस्तुएँ, मोटरबाइक, कार, रेफ्रिजरेटर, कूलर, एसी तथा मोबाइल जैसी हर इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ खरीदना मंगलकारी रहेगा। इस दिन हनुमान मंदिर में सिंदूर का चोला चढ़वाना विशेष फलदायक रहेगा। गुरु के शुभ संयोग के कारण मकर राशि वाले अपने गुरु को श्रीफल तथा पीले फूल भेंट करें। हो सके तो वृद्धाश्रम में पीले फल दान करें।

कुंभ : अगर क्षमता हो तो इस राशि वालों को शहर में प्याऊ खुलवाना चाहिए। यह आने वाले समय के लिए अत्यंत शुभ फलदायी रहेगा। अगर यह क्षमता नहीं हो तो मिट्टी के मटके, सुराही या पानी रखने के अन्य पात्र खरीद कर दान देना चाहिए। पक्षियों के लिए सकोरे लगवाना, पक्षियों को पीला अनाज चुगवाना भी फलदायक रहेगा। नीलम रत्न खरीदना शुभ होगा लेकिन नीलम संभव नहीं हो तो ब्लू टोपाज अवश्य खरीदें।

मीन : इस राशि का फल धनु राशि के अनुसार देखें।

Posted by: vastushastri08 | जून 5, 2011

GEMSTONE REMEDIE

DISEASE
GEMS STONE
Addiction (Mild)
Amethyst, White Agate
Addiction (Strong)
Blue Sapphire
Allergies
Aquamarine
Aneamic (Blood Deficiency)
Magnetit
Appendicitis
Citrine
Arthritis
Golden Tiger’s Eye, Green Emrald
Attention Deficit
Black Agate
Bladder
Bloodstone
Bleeding(Not4female)
Heliotrope
Blood Pressure (High- Low)
Aventurine
Blood Purification
Bloodstone
Bone (Joining Cracks)
Pearl,Calcite
Bone Marrow Inflammed
Crystal, Clear Quartz
Bone Problems
Fluorite,Calcite
Brain
Blue Sapphire
Brain Fatigue
Amazonite
Cancer
Cat’s Eye
Central Nervous System
Alexandrite, Aventurine
Childbirth(Ease)
Golden Topaz,Pearl,Apricot Agate
Colon Infections
Green Agate,Amber
Diabetes
White Coral, White Sapphire
Dysmenorrhoea
Turquoise
Ear Infections
Blue Agate
Enlarged Glands
Aquamarine
Eye Disease
Opal, Amethyst
Fertility
Moonstone,Rose Quartz
Fever(With Acidity)-
Red Coral
Fever(With Cold)-
Pearl
Flatulence
Emerald,Red Coral,Pearl
Fluid Retention
Aquamarine
Glandular Disorders
Lapiz
Gynaec Problems
Red Agate, Red Jasper
Hair
Marble Or Granite
Harmone Imbalance
Topaz,Amber
Heart Disorders (Mild)
Emerald
Heart Disorders (Strong)
Blue Sapphire
Hyperactive Child
Green Emrald, Green Agate, Jade,
Hypersensitivity
Moonstone,Amazonite
Impotency
Daimond, Zircon, Shiv Lingam Stone
Indigestion
Red Coral, Agate
Insomnia
Agate(Any),Tourmaline
Irregular Stools
Green Agate
Kidney Infections
Red Agate,Amazonite,Amethyst
Kidney Stone
(To Crack&Dissolve)
Garnet, Malachite
Leukaemia
Alexandrite
Liver Sluggish
Red Coral, Amazonite, Amethyst
Lung Disorders
Green Emrald, Jade, Amber
Memory
Emerald, Gomes, Peridot, Jade
Menopause
Citrine
Menstrual Pains
Green Emrald, Jade, Amazonite
Nails
Gomed
Neuralgia
Aquamarine
Neurological Disorders
Gomed, Black Hawk’s Eye
Nose Bleed
Red Agate, Carnelian,
Osteoporosis
Green Emrald, Jade, Aventurine.
Paralysis
Blue Sapphire
Piles
Mariam
Rhuematism (Chronic)
Amazonite
Rhuematsm
Red Coral
Sexual Energy
Agate Botswana
Skin
Diamond, Amethyst
Speech Disorders
Blue Lace Agate.
Teething(Babies)
Amber, Citrine
Throat
Citrine, Amber,Blue Lace Agate
Thyroid
Citrine, Amber,Amethyst, Aquamarine
Toothache
Aquamarine
Urinary Tract Infection
Bloodstone
Uterian Disorders
Mother Of Pearl
Weight(To Increase)
Citrine, Amber
Weight(To Loose)
Ruby
Note:- Above list is for information purpose only, Befor Wearing Any Gems Sont Check Qulaty of Gems Stone & Know thear Complet Effect. We Are not responsible to effect of gems stone.

जीवन रेखा भी बताती है, अवैध संबंध—-

जीवन रेखा ही हमारी आयु, बीमारी और जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को बताती है। जीवन रेखा से किसी भी व्यक्ति के व्यवहार, आचार-विचार की सही-सही जानकारी प्राप्त हो सकती है। हस्तरेखा में सबसे महत्वपूर्ण रेखा जीवन रेखा मानी गई है।
जीवन रेखा गुरु पर्वत (इंडेक्स फींगर के नीचे के भाग को गुरु पर्वत कहते हैं।) के नीचे हथेली के प्रारंभ से शुरू होती है। जीवन रेखा शुक्र क्षेत्र (अंगूठे के नीचे का भाग) को घेरते हुए मणिबंध की ओर जाती है।

लंबी, गहरी, पतली, बिना टूट-फूट की क्रास-चिह्न रहित तथा दोष-हीन जीवन रेखा व्यक्ति के लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य को दर्शाती है।
यदि मस्तिष्क रेखा और जीवन रेखा के मध्य थोड़ा अंतर हो तो व्यक्ति स्वतंत्र विचारों वाला होता है।
यदि मस्तिष्क रेखा और जीवन रेखा के मध्य अधिक अंतर हो तो व्यक्ति बिना सोच-विचार के कार्य करने वाला होता है।
यदि जीवन रेखा दोनों हाथों में टूटी हुई हो तो वह व्यक्ति की असमय मृत्यु को दर्शाती है। परंतु यदि एक हाथ में जीवन रेखा टूटी हो तो वह व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो सकता है।
यदि जीवन रेखा, हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा तीनों प्रारंभ में मिली हुई हो तो व्यक्ति भाग्यहीन, दुर्बल और परेशानियों से घिरा होता है।
जीवन रेखा जहां-जहां श्रृंखलाकार होगी उस आयु में व्यक्ति किसी बीमारी से ग्रसित हो सकता है।
यदि जीवन रेखा को कई छोटी-छोटी रेखाएं काटती हुई नीचे की ओर जाती हो तो व्यक्ति के जीवन में परेशानियों को दर्शाती हैं। यदि इस तरह की रेखाएं ऊपर की ओर जा रही हो तो व्यक्ति को सफलताएं प्राप्त होती है।- यदि जीवन रेखा गुरु पर्वत से प्रारंभ हुई हो तो व्यक्ति अति महत्वकांशी होता है।
यदि जीवन रेखा अंत में दो भागों में विभाजित हो गई हो तो व्यक्ति की मृत्यु जन्म स्थान से दूर होती है।
जीवन रेखा पर वर्ग चिह्न व्यक्ति के जीवन की रक्षा करते हैं। जबकि अन्य चिह्न रोग का सूचक होते हैं।
यदि किसी स्त्री के हाथों में मंगल क्षेत्र (हथेली के मध्य क्षेत्र को मंगल क्षेत्र कहते हैं) से निकल कर छोटी-छोटी रेखाएं जीवन रेखा का स्पर्श करे तो वह उस स्त्री के किसी पुरुष के साथ अवैध संबंध को दर्शाती है। इस रिश्ते की वजह से उस स्त्री कई परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
आयु के संबंध में जीवन रेखा के साथ स्वास्थ्य रेखा, हृदय रेखा, मस्तिस्क रेखा और अन्य छोटी-छोटी रेखाओं पर भी विचार किया जाना चाहिए।

आज के मुहूर्त –मंगलवार, 5 अप्रैल 2011—

शुभ विक्रम संवत- 2068, शालिवाहन शक संवत- 1933,
संवत्सर का नाम- क्रोधी, अयन- उत्तरायन,
ऋतु- वसंत, मास- चैत्र, पक्ष- शुक्ल, तिथि- द्वितीया मंगलरात्रि 12.35 पश्चात तृतीया,
हिजरी सन्- 1432, मु. मास- रबिलाखर, तारीख- 30,
नक्षत्र- आश्विनी रात्रि 7.59 पश्चात भरणी, योग- वैधृति प्रात: 11.09 पश्चात विष्कुंभ,
सूर्योदयकालीन करण- बालव, चन्द्रमा- मेष राशि में दिवसपर्यंत रहेंगे।
दिन- शुभ। दिशाशूल- उत्तर में। मुहूर्त- आभूषण क्रय करने का मुहूर्त।
कार्य की अनुकूलता के लिए- देवी मंदिर में लाल पुष्प या पुष्प माला चढ़ाएँ।
उपयोगी ज्ञान- नवरात्रि में बोए जाने वाले जवारों को नवरात्रि समाप्त होने ‍तक ही स्थान पर रखे रहने देना चाहिए।
शुभ समय- प्रात: 06.37 से 8.29 दिन 12.11 से 2.04।
सुझाव- आवश्यक न हो तो दिन 03.35 से 05.08 के मध्य शुभ कार्य न करें
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दैनिक राशिफल—

राशि फलादेश मेष—
सहयोगी कर्मचारियों से मदद मिलेगी। परिश्रम से अच्छे फल मिलने की उम्मीद है। रुके हुए कार्य पूर्ण किए जा सकेंगे। नौकरी में पदोन्नति के योग बनेंगे।

राशि फलादेश वृष—
जीवनसाथी से संबंधों में मधुरता आएगी। नए कार्यकलापों में सफलता मिलने के योग बनते हैं। किसी की आलोचना, नकल न करें।

राशि फलादेश मिथुन—
व्यापार के क्षेत्र का विस्तार होगा। भाग्योदय होगा। लाभ के अच्छे अवसर प्राप्त होंगे। व्यवसाय ठीक चलेगा। भाइयों से खटपट हो सकती है।

राशि फलादेश कर्क—–
आपका गृहस्थ जीवन शांतिमय रहेगा। जोखिम के कार्यों से दूर रहें। मौके का लाभ उठा सकेंगे। मधुर संबंध बनेंगे, जो लाभदायी रहेंगे। जरूरत से ज्यादा संग्रह नहीं करें।

राशि फलादेश सिंह—–
व्यापार में नई योजनाओं का क्रियान्वयन होगा। पारिवारिक समस्या हल होगी। कोर्ट-कचहरी के कामों में मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। अत: ध्यान रखकर कार्य करें।

राशि फलादेश कन्या—–
परिश्रम का पूरा फल मिलेगा। व्यापारिक यात्रा लाभप्रद रहेगी। फिजूलखर्ची से बचना चाहिए। पारिवारिक स्थिति संतोषप्रद रहेगी।

राशि फलादेश तुला—-
शत्रु पक्ष से सावधान रहें। व्यावसायिक दृष्टि से समय लाभदायक। नौकरी में अनुकूल संयोग प्राप्त होंगे। पुराने रुके कार्य पूरे हो सकेंगे।

राशि फलादेश वृश्चिक—
वाहन सावधानी से चलाएँ। नए कार्यों में सफलता मिलने की संभावना। पारिवारिक संबंध प्रगाढ़ होंगे। आत्मविश्वास बढ़ेगा। आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकेगी।

राशि फलादेश धनु—
अति उत्साह से हानि की आशंका। घर में किसी से विवाद होगा। व्यापार में निर्णय सोच-समझकर लें। संतान की गतिविधियों पर ध्यान रखें।

राशि फलादेश मकर—
बुरी आदतों पर नियंत्रण रखना होगा। आपकी सलाह को स्वीकार किया जाएगा। संतान पक्ष से शुभ समाचार मिलेंगे। आर्थिक निवेश लाभदायी रहेगा।

राशि फलादेश कुंभ—
सोच-समझकर निर्णय लें। धन लाभ होगा। निराशा के वातावरण से दूर रहे। अपनी वस्तुओं को संभालकर रखें। पारिवारिक जीवन सुखद रहेगा।

राशि फलादेश मीन—
ईश्वर के प्रति आस्था बढ़ेगी। समय पर कार्य पूरा न होने से तनाव रहेगा। व्यापार मध्यम। संतान के व्यवहार से मन दुखी होगा। आर्थिक स्थिति को लेकर चिंता रहेगी।

नवरात्री में क्या दें उपहार-कन्या पूजन में????

नवरात्र में कंजिका पूजा यानी कन्या पूजन का बड़ा महत्व है। कन्या पूजन में दान में देने हेतु कई वस्तुएँ प्रचलित हैं मगर पूजन में वही वस्तुएँ देने चाहिए जिसे पाकर कन्या प्रसन्न हो। आइए, हम कुछ विकल्पों पर नजर डालें :—-

* सिर्फ 10 रुपए में एक हेयर बैंड आ जाएगा और कन्याएँ भी खुश हो जाएँगी।

* एक पेंसिल बॉक्स खरीदिए, उसमें पेंसिल, रबर, कटर, एक रूमाल और एक चॉकलेट डाल दीजिए। इसे खूबसूरती से पैक कर दीजिए। साथ में छोटी प्यारी सी चुनरी भी दीजिए।

*आप कन्याओं को प्यारी सी डॉल भी दे सकती हैं।

* आप कन्याओं को कार्टून बने टिफिन बॉक्स में टॉफी भर कर भी दे सकती हैं।

* बार्बी डॉल वाले स्टीकर भी बच्चियों को भाते हैं।

* 10 वर्ष से ज्यादा उम्र की कन्याओं को डायरी दीजिए। आजकल तो लॉक वाली डायरी भी आ रही है।

* बाजार में सुंदर और सस्ते फोटो फ्रेम मिल रहे हैं। ये बढ़िया ऑप्शन है।

*आप बच्चियों को छोटे-छोटे ईयररिंग भी दे सकती हैं।

* बच्चों को गेम देने की पुरानी परंपरा है। इसे पसंद भी किया जाता है।

* ध्यान दें कि गिफ्ट इनमें से कोई भी हो, पैकिंग सुंदर कीजिए। कन्याओं को बड़े प्यार से माथे पर लाल चुनरी बाँधिए। गिफ्ट के साथ चॉकलेट जरूर दीजिए। पैसे कुछ ज्यादा भी लग जाएँ तो झिझकने की जरूरत नहीं है। माता बार-बार तो आती नहीं हैं।

केसे बनाये घर को सुकून प्राप्ति हेतु वास्तु अनुकूल—-

आवास/मकान/घर केवल ईंट ,चुने और पत्थर से बनी एक आकृति नहीं हे..वरन इसका अर्थ उस स्थान से हे जहाँ पर वहां रहने वाला परिवार शांति.सुख और सुकून/चेन से एक साथ रहकर उसे “घरोंदा ” बनाते हे..
.यदि वास्तु के सिद्धांतों को ध्यान में रखकर घर/ आवास/ मकान को बनाया जाये तो वह स्थान सभी को शांति-सुकून देता हे तथा इन्हें अपनाकर वस्तुदोशो से भी मुक्ति पाई जा सकती हे…
वर्तमान बदलते परिवेश में वास्तु का महत्त्व (प्रचार-प्रसार ) दिनों दिन बढ़ता जा रहा हे…आजकल सभी बिल्डर और आर्किटेक्ट तथा इंटीरियर डिजाईनर भी घर बनाते समय वास्तु सिद्धांतो का पूरा ध्यान रखने लगे हे…
इस प्रकार बना घर खुबसूरत हेने के साथ-साथ पोजिटिव एनर्जी भी देता हे…ऐसे घर को सजाते समय निम्न आवश्यक बैटन का ध्यान रखे—

१.- घर के एंट्रेंस गेट पर “स्वस्तिक” या “ॐ” की आकृति अवश्य लगवाएं,,,सुख शांति बनी रहेगी..

२.- ध्यान रखे की आपके मकान पर किसी मंदिर की छाया/ उस मंदिर के झंडे/ ध्वजा की छाया न पड़ती हो..यदि ऐसा हे तो शारीरिक और आर्थिक परेशानियाँ दिन-ब-दिन बढेंगी…

३.- श्री/ सम्रद्धि हमेशा बनी रहे उसके लिए इशान दिशा में पानी से भरा कलश / एक्वेरियम या कोई झरना जरुर रखें…

४.-घर की पोजिटिव/ सकारात्मक उर्जा / वातावरण बढ़ने में सूर्य की रोशनी का विशेष महत्त्व होता हे… मकान का इंटीरियर करवाते समय ध्यान रखें की सूर्य की रोशनी उस घर में पर्याप्त रूप से प्रवेश करती हो…

५.-घर के ड्राईंग रूम में हमेश फूलों का गुलदस्ता रखें—अशांति और कलह ससे बचे रहेंगे…

६.-रात्रि में कपडे धोकर न सुखाएं और न ही अशुद्ध वस्त्रों को प्रवेश द्वार के सामने रखे / सुखाएं..

७.- कई जगह भोजनशाला/ रसोई घर में ही पूजाघर/ देवस्थान बना दिया जाता हे जो वास्तु सिद्धांतो के विपरीत हे…परेशानियाँ बढ़ती हे…

८.-घर/ मकान के किसी भी शयन कक्ष/ बेडरूम में भगवन/ आपके इष्ट के फोटो/चित्र या टीवी/ कांच नहीं होना चाहिए,,,विवाद/क्लेश होता हे बिनावाजः…

९.-वहा बना देवस्थान/ पूजाघर शोचालय से दूर होना चाहिए…या दोनों की दीवारें अलग-अलग होनी चाहिए…

१०.-कोशिश करें, घर के सभी सदस्य एक समय, साथ में डिनर/ भोजन करें…प्यार-एकता-सदभाव -विश्वास बढ़ता हे…

===Pt. DAYANANDA SHASTRI;
vastushastri08@gmail.com;
vastushastri08@rediffmail.com;
प्रिय मित्रो. आप सभी मेरे ब्लोग्स पर जाकर/ फोलो करके – शेयर करके – जानकारी प्राप्त कर सकते हे—- नए लेख आदि भी पढ़ सकते हे….. धन्यवाद…प्रतीक्षारत….
आपका—
“विनायक वास्तु टाईम्स”–पंडित दयानंद शास्त्री-
M – 09024390067—
— vinayakvaastutimes.blogspot.com;;
—-vinayakvaastutimes.wordpress.com;;;

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 5, 2011

KITCHEN AS PAR VASTU—–

KITCHEN AS PAR VASTU—–

Kitchen is an extremely important part of the house where healthy food is prepared for the family.

When we talk of ‘kitchen’ in terms of Vastu Shastra, we talk of the South-East angle of our house which is called ‘Agney’. ‘Agni’ is the God of this direction and is ruled by planet Venus. Therefore kitchen is best suited here because the tasks performed in the kitchen is related to Fire.

Agney is also related to the health and longevity of the inhabitants and Venus determines the beauty, vastness and richness of the house. Therefore it is very important to have a neat and clean, vastu-compliant kitchen in our house for health and prosperity. Any fault in this direction will cause ill-health of the inhabitants and unexpected expenses of the house-hold.
We are what we eat and what we eat greatly depends on the mindset of the person preparing food which can be enhanced by creating a right atmosphere in the kitchen.

Sink in the kitchen should always be in the North-East angle and away from the cooking gas.
Place the gas stove in the South-east angle and always face the East while you cook.

Generally medium Red to Pink colour is recommended for the kitchen, but in case the native has a powerfully placed Venus in the Birth-chart, white or cream colour is more advisable as it begets more riches in the household. However, natives with a malefic Venus on the Birth-chart should completely avoid White in the kitchen to avoid failures.

Kitchen is the best place for serving food and an ideal direction would be West or North-West avoiding the centre.
Refrigerator can be placed in the North-West or South-West, but the micro-wave, exhaust fan, mixer, etc. should be placed in the South-East.
Water filter and drinking water should be stored in the North-East.

Kitchen should not be opposite to the main door.

The walls of the kitchen should not be broken, dirty or dull as this creates an environment of disappointment, conflict and anger.
Avoid place of worship in the kitchen.

Kitchen in the South-west angle will make life hell.

Kitchen in the North will cause excessive and sudden expenses.
Avoid leaky taps.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 6, 2011

Why vastu is important…????—JYOTI PANCHOLI—

Why vastu is important…????—JYOTI PANCHOLI—

Vastu Shastra is based on various natural energies which are available free of cost in the atmosphere like:
Solar energy from Sun
Lunar energy from Moon
Earth energy
Sky energy
Electric energy
Magnetic energy
Thermal energy
Wind energy
Light energy
Cosmic energy
Utilization of such energies gives us pleasure,peace & prosperity..
There 3 forces in action to create harmony-Wind,Water & Fire.If these forces are kept in appropriate places,there wil be no disturbance.But if water is placed in fire place & wind in water place or any other combination the forces will start acting accordingly causing disharmony because fire pollutes wind with smoke,water extinguishes fire ,etc.

AUTHENTICITY OF VASTU SHASTRA—–

Although,Vastushastra lost its glory during the Mughal rule & then further damaged by the British, it still exists.
Mughals damaged our ancient buildings & reconstructed them as they wished & completely overlooked the principles of Vastushastra.
The ships passing by the sea adjoining the Konark Sun Temple in Orissa used to sail near the temple attracted by the magnetic power of the stones & were able to sail further only after sunset.The British destroyed the rocks of magnetic power of the temple by dynamite.However the temple exists on the sea beach even today.
The whole city of Jaipur was constructed as per the principles of Vastu by Maharaja Sawai Jai Singh in 1727 A.D.
The Balaji Temple of Tirupati is the most prosperous temple with Vastu qualities.
Other examples of Vastu constructions is the Joshi Haveli of Jodhpur, Vidyaranya Temple of Shrangeri, Dashavtar temple of Devgarh, Venkateshwar Temple of Tirupati, Meenakshi Temple of Madurai, Sai Baba Ashram of Puttaparthi & Mahakaleshwar Temple of Ujjain.
It can only be imagined how the knowledge of Vastu must have prospered among the people of Italy.The Pyramids which were constructed thousands of years ago still exist in the same form.Even today the mummies are safely kept in those pyramids.

IMPORTANCE OF THE FIVE ELEMENTS——

Our environment is made up of the five elements- Jal, Vayu, Aakash, Prithvi, Agni(water,gas,space,earth and fire), and so is our body too, made up of these five elements!

Until the balance of these five elements is maintained in our body, we remain healthy and happy,thus maintaining our mental balance!

In the same way, proper balance of the five elements in our environment is equally important for a peaceful life!
There are many planets in the universe , however life exists only on the Earth because of these five elements.

WHO IS VASTU PURUSH?????

Earth energy or the energy released by earth or land is called Vastu Purusha, where ‘Vastu’ is the land or place & ‘Purusha’ is the energy of that place.

A vacant plot has free flowing energy which is disturbed to a great extent by construction of walls,doors,windows,etc (not following the rules of vastu).This disbalance of energy causes disturbance in the natives life which can be rectified by Vastu Shastra.

OFFICE AS PAR VASTU :—–

Nowadays,a growing trend of Vastu for Office has been noticed in the architecture and interior designing world.
To ensure good profits and efficiency in work, people design their workplace as per the norms of Vastushastra.
Office, which is so important for our livelihood, should follow vastu guidelines because vastu office ensures smoothness of work in the office premises and thus more profits and progress.Also,it is very important that the office should be in control of the owner.
Sometimes, one has to face unexplained losses in business, unsuccessful projects at the work place and many such failures.We might not realize but the past problems associated to our office might have been due to a Vastu Dosha in the office plan.
If offices are not made according to Vastu principles, there will be no balance of energies thus less efficiency of the employees, unability to do work; owner may not manage the staff and thus failure.

Some Vastu tips for office which will balance the cosmic energy flowing through your work area:-

The advisable placement of treasury or safe is best suited with face towards the North.
Try to keep the North direction free of any heavy furniture like almirahs or racks.
The work table of the boss should be placed facing the entrance door with a picture of mountains on the back wall.
The entrance of an office should not face a blank wall.
The financial condition will suffer if there is a boring or tube well or an underground tank in the South direction.
A picture of particular God and Goddess symbolizing that direction and proper placement of mirrors brings financial gains to the business.
A well placed aquarium or a fountain will have a soothing affect on the customers and guests.
A dirty, dark and congested entrance is bad for business and will keep away customers.
It is better to have a large main door.
There should be no obstacle in the opening of any door.
Central zone of the office premises should be kept empty.
We have to take care of the following points while studying about the vastu of the offices:—–
The exteriors of the office like shape, slope, height, water level.Generally, a square or rectangular plot is preferable.
The direction of the Entrance.
The direction & placement of the windows.It is advisable to have more windows in the North and East.
The location of the beams.
The location of the basement.
The direction & placement of the MD room
The direction & placement of the employees.
The direction & placement of the reception.
The direction & placement of AC, cooler, audio systems.
The direction and placement of the stairs.
The direction & placement of the electronic equipment
The direction & placement of the pantry/kitchen
The direction & placement of the toilets
The direction & placement of the seminar and conferences room
The direction & placement of the water products
The colour scheme of the room

वास्तु द्वारा धन संपदा को आमंत्रित करें..

कर्ज और गरीबी से तुरंत छुटकारा पाना चाहते है तो, उत्तर-पूर्व की ओर उत्तर-पूर्व की दीवार का फर्श की तरफ झुकावदार होना बहुत जरूरी है. इससे व्यापार बढ़ता है. धन दौलत की घर में वर्षा होने लगती है.अधिकांश लोग अपने घर के उत्तर-पूर्व के कोने में आग,चूल्हा,कुकिंग गैस, ज्योत, हवन आदि की व्यवस्था करते है.जो बिलकुल ही गलत होता है. इस कोने में आग से सम्बन्धित कोई भी काम नहीं होना चाहिए.जेनरेटर, गीजर, बायलर, भट्टी की गर्मी तक भी इस कोने में नहीं आनी चाहिए.

अपने घर के हर कमरे में उत्तर-पूर्व की ओर ढलान रखें. इससे गयी खुशहाली भी लौट आती है. दक्षिण-पश्चिम भाग की ऊँचाई और उत्तर-पूर्व की ओर का ढलान घर में सुख शान्ति को बहाल करने वाला होता है. घर के उत्तर-पूर्व में पानी का दरिया, झील, या तालाब हो तो व्यक्ति को अमीर बनते देर नहीं लगती है.

आपके आवासीय भवन या फेक्ट्री के भवन में उत्तर-पूर्व का कोना कटा हुआ है तो आपकी उन्नति किसी भी प्रकार से नहीं हो अक्ती है. अर्थात उन्नति के मार्ग में अनेक बाधाए उत्पन्न हो सकती है. उत्तर-पूर्व में यदि ऊँचा चबूतरा भी है तो दुनिया के सारे कष्ट आपको भोगने ही है.उत्तरी क्षेत्र का कटाव उस भवन में रेह्न्र वाले, पुरुषों को बर्बाद कर देता है. और पूर्वी क्षेत्र का कटाव स्त्रियों को भारी कष्ट प्रदान कर देता है.हमेशा याद रखे कि कैसीभी स्थिति हो कभी भी भूल कर उत्तर-पूर्व को ऊँचा ना रखें. यदि है तो इसे ठीक करवा देने में ही भलाई होती है.
बिजनेस बहुत ही यदि मन्दा पढ़ गया हो तो दक्षिण की चाहरदीवारी के मुंडेर पर ईंटो की चिनाई करवा कर उसे ऊँचा कर दे, इससे व्यापार में तेजी आनी शुरू हो जायेगी. और उत्तरी दीवार को नीचा राखे, कहने का मतलब यह है कि ऊँची उत्तरी दीवार व्यापार को रोकती है, और उसमे बाधा उत्पन्न करती है. उत्तरी फर्श और उत्तरी दीवार को ठीक करके आप बंद पड़े व्यापार को भी एक गति दे सकते है. घर का भवन या फेक्ट्री का भवन बनाते समय सबसे बाद में उत्तरी दीवार बनवायें.

भवन के उत्तरी वायव्य, पश्चिमी, नैऋत्य, दक्षिणी नैऋत्य, और पूर्वी आग्नेय में यदि द्वार होता है तो, धन के लिए यह शुभ नहीं होता है. इस दिशाओं में खिड़कियाँ, दरवाजे, रोशनदान, बंद करा दें और हवा एवं प्रकाश तक भी इन दिशाओं में न आने दें. अन्यथा प्राप्त धन या अपनी जमा पूँजी भी खत्म हो जाती है. भवन का उत्तरी भाग ऊँचा न रखे इससे दुर्भाग्य पूर्ण हवाए उत्पन्न होती है. और घर का दक्षिण-पश्चिम भाग नीचा ना रखे, और यहां कुआं, अंडरग्राउण्ड टैंक, बौरवेल, आदि भी ना लगाए. इससे जानलेवा ऊर्जा पैदा होती है. और इस बात का भी हमेशा ध्यान रखे कि भवन के बीचो बीच में कुआं, टैंक, बोरवेल, बेसमेंट, आदि नहीं होना चाहिए. इनसे घर के लोगो का दुर्भाग्य शुरू हो जाता है.

दूकान/ऑफिस में वास्तु से अधिक लाभ कमायें..

हम वास्तु के द्वारा अपनी दूकान या ऑफिस का लाभ कई प्रतिशत तक बढ़ा सकने में सक्षम है जरूरत है सिर्फ वहां वास्तु के नियम अपनाने की, व्यावसायिक प्रतिष्ठान दूकान और ऑफिस का वास्तु अनुसार यदि उपचार करें तो बंद व्यापार भी खुल जाता है. कोई भी दूकान अपना व अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए किया जाता है. यदि वस्तु के नियमानुसार व्यवसाय या दूकान की व्यवस्था करेंगे तो, वह शुभ होगा और लाभ में वृद्धि होने लगेगी. और इसका उत्तम फल प्राप्त होगा.अन्यथा मानसिक एवं आर्थिक परेशानियां ही प्राप्त होंगी.

दूकान के लिए गिने चुने भवन के ईशान कोण को बिलकुल खाली रखें और वह स्थान स्वच्छ व पवित्र बनाएँ रखें. ईशान कोण की स्वच्छता ही ग्राहक को आकर्षित करने में सहायक होती है.

दूकान या ऑफिस में पानी की व्यवस्था ईशान कोण में अथवा पूर्व दिशा या उत्तर दिशा में रखनी चाहिए.

दूकान या ऑफिस में पूजा स्थान भी आप ईशान कोण या पूर्व दिशा अथवा उत्तर दिशा में रखकर लाभ उठा सकते है.

दूकान या ऑफिस में जूते या भारी सामान के कार्टन अथवा अन्य प्रकार का भारी सामान यदि ईशान कोण में रखा है तो उसे तुरंत हटा दें यह व्यापार के लिए घातक सिद्ध होता है. जहां तक सम्भव हो सके तो, इस प्रकार का सामान दक्षिण या पश्चिम दिशा में स्थापित करें तो बिक्री अधिक होगी तथा आपके माल पर कोई शिकायत भी नहीं मिलेगी. ग्राहक हमेशा संतुष्ट रहेगा.
दूकान में तोलने वाला यंत्र, तराजू आदि को पश्चिमी या दक्षिणी दीवार के साथ किसी स्टैंड पर रखें तो, इससे नुक्सान नहीं होगा.

अपनी दूकान या ऑफिस में उत्तर-पूर्व (ईशान कोण), उत्तर और पूर्व दिशा का भाग ग्राहकों के आने जाने के लिए हमेशा खाली रखे. और यदि किसी कारण से मेला या गन्दगी से खराब हो जाए तो तुरंत सफाई करवा लें. इससे कोई भी विवाद ग्राहक से नहीं होता है. और ग्राहक प्रसन्न रहेगा.

दूकान में माल का भंडारण दक्षिण, पश्चिम अथवा नैऋत्य कोण में करें तो, शुभ फलदायक रहेगा.

दूकान या अपने ऑफिस में बिजली का मीटर, स्विच बोर्ड, इन्वर्टर आदि सामान आग्नेय कोण अर्थात दक्षिण-पूर्व दिशा के कोने में उचित रहता है. इसके परिणाम स्वरुप दूकान आदि में कभी भी कोई चोरी या अग्नि का भय नहीं रहेगा.

दूकान में सीडियां ईशान कोण के अतिरिक्त किसी भी दिशा में रख कर उपयोग कर सकते है.

दूकान, दफ्तर, फैक्ट्री के सामने कोई भी वेध नहीं होना चाहिए. अर्थात खम्भा, सीढी, पेड़ या बिजली, टेलीफोन आदि का खम्भा हानि का योग बनाते है.

पूर्व मुखी दूकान या ऑफिस में सड़क दूकान पर चढ़ने के लिए सीढियां ईशान कोण में बनवा सकते है.

दूकान का मालिक या मुख्य व्यवस्थापक को अपने बैठने का स्थान यथा संभव नैऋत्य कोण में बनवाना चाहिए. और अपना मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर करके बैठना चाहिए. दूकान में पीने का पानी का पात्र ईशान कोण में रखें तथा प्रतिदिन दूकान खोलते समय भर कर रखें व पांच तुलसी के पत्ते उसमे डाल दिया करे. ऐसा करने पर ग्राहक जब भी दूकान में आएगा कोई न कोई वस्तु जरूर खरीदेगा, अर्थात वह दूकान से खाली वापस नहीं जाएगा.

गृह निर्माण में वास्तु की महत्वपूर्ण भूमिका… ( वास्तुसम्मत गृह निर्माण )—–

जीवन में सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है अपना मकान/कोठी/बंगला बनाना, क्योंकि इसमें हमारी सम्पूर्ण कमाई व्यय होती है. किसी महापुरुष ने ठीक ही कहा है कि घर और वर के बारें में जीवन में बहुत सोच समझ कर ही निर्णय करना चाहिए. घर का तात्पर्य अपने आशियाने से है और वर का तात्पर्य अपनी बेटी के सुहाग से कहा गया है. उसी सन्दर्भ में इस लेख में चर्चा कर रहा हूं, कि मकान के अंदर किस किस प्रयोजन के लिए किस किस स्थान का उपयोग करना चाहिए. इसका निर्देश वास्तु शास्त्र के द्वारा क्या है..

शयनकक्ष—-

गृहस्वामी का शयनकक्ष घर के दक्षिण-पश्चिम में होना चाहिए. पलंग को दक्षिणी दीवार से इस प्रकार लगा हुआ होना चाहिए कि शयन के समय सिरहाना दक्षिण दिशा की ओर व पैर उत्तर दिशा की ओर हों. यह स्थिति श्रेष्ठ मानी जाती है. ऐसा यदि किसी कारण वश न हो सके तो, इसका विकल्प यह है कि सिरहाना पश्चिम की ओर करना चाहिए. इसके विपरीत यदि हम करते है तो वास्तु के अनुरूप नहीं माना जाता है. और इसके कारण हमे हानि का सामना करना पड़ सकता है.

स्नान घर—

स्नानघर को पूर्व दिशा में बनाना चाहिए तथा शौचालय को दक्षिण-पश्चिम में बनाना चाहिए. यह श्रेष्ठ समाधान है. लेकिन आजकल व्यवहार में देखने को आता है कि स्थान की कमी आदि के कारण इन दोनों को एक ही स्थान पर बनाया जाता है. यदि किसी भी कारण इन्हें एक ही स्थान पर बनाना पड़े तो वहां इन्हें कमरों के बीच में दक्षिण-पश्चिम दिशा में बनाना चाहिए. पूर्व दिशा में स्नानघर के साथ शौचालय कभी भी नहीं बनाना चाहिए.
स्नानघर के जल का बहाव उत्तर-पूर्व दिशा की ओर रखना चाहिए. उत्तर-पूर्व दीवार पर एक्जोस्ट फैन Exhaust Fan लगाया जा सकता है.गीजर लगाना हो तो दक्षिण-पूर्व के कोण में लगाया जा सकता है.क्योंकि यह आग्नेय कोण है, गीजर का सम्बन्ध अग्नि से होता है.

रसोईघर—

रसोई के लिए आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) सबसे अच्छी स्थिति मानी जाती है. अतः रसोई मकान के दक्षिण-पूर्व कोण में ही होनी चाहिए. रसोई में भी जो दक्षिण-पूर्व का कोना है, वहां गैस सिलिंडर या चूल्हा या स्टोव रखा जाना चाहिए.

भोजन कक्ष—-

भोजन यदि रसोई घर में न किया जाए तो इसकी व्यवस्था ड्राइंगरूम में की जा सकती है. अतः डायनिंग टेबल ड्राइंगरूम के दक्षिण-पूर्व में रखनी चाहिए.

बैठक—

वर्तमान समय में ड्राइंगरूम का विशेष महत्व है. इसमें फर्नीचर दक्षिण और पश्चिम दिशाओं में ही रखना चाहिए. ड्राइंगरूम में हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि उत्तर-पूर्व अर्थात ईशान कोण को हमेशा खाली रखना चाहिए.

अतिथि कक्ष—

घर/ भवन में अतिथि कक्ष की सर्व श्रेष्ठ स्थिति उत्तर-पश्चिम का कोना है. इस जगह पर यदि अतिथि निवास करता है तो, वह आपके पक्ष में ही हमेशा रहेगा.

अन्न भण्डार गृह—

पहले समय में लोग अपने घर में पूरे वर्ष भर का अनाज भंडारण किया करते थे. अतः अन्न भण्डार के लिए अलग से एक कमरा हुआ करता था. लेकिन वर्तमान समय में एक मास या इससे भी कम अवधि के लिए अन्न रखा जाता है इसे रसोईघर में ही रख लेना वास्तु शास्त्र द्वारा सम्मत है.

गैराज—

गैराज का निर्माण दक्षिण-पूर्व या उत्तर-पश्चिम दिशा में अनुकूल होता है.

नगदी व भण्डार—-

रोकड़ एवं घरेलू सामान उत्तर में रखना चाहिए एवं कीमती सामान आभूषण आदि दक्षिण की सेफ में रखना चाहिए. इससे सम्पन्नता में वृद्धि होने लगती है.

पोर्टिको—-

इसे उत्तर पूर्व में बनवाना चाहिए एवं इसकी छत मुख्य छत से नीची होनी चाहिए.

नौकरों के घर—-

नौकरों के घरों का रुख हमेशा उत्तर में या उत्तर-पूर्व में करना चाहिए.

तहखाना—

यदि तहखाने का निर्माण कराना हो तो, उत्तर में या उत्तर-पूर्व में करना चाहिए. तहखाने में प्रवेश द्वार भी उत्तर या पूर्व दिशा की ओर से करना चाहिए.

बालकनी—

सवा और भवन की सुंदरता के लिए बालकनी का निर्माण किया जाता है. इसे उत्तर-पूर्व में बनाना चाहिए यदि पूर्व निर्मित मकानों में दक्षिण-पश्चिम दिशा में बालकनी बनी हो तो, इन्हें फिर उत्तर-पूर्व में बनाना श्रेष्ठ रहता है.

योग एवं ध्यान—

अपने जीवन में शारीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए योग और ध्यान की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है. अतः इसके लिए घर में उत्तर-पूर्व का कोना जिसे ईशान कोण भी कहते है वहा पर योग और ध्यान करने से एकाग्रता में वृद्धि होती है.

सीढ़ी —–

सीढ़ीयां उत्तर-पूर्व को छोड़ कर अन्य दिशाओं में सुविधानुसार बनाई जा सकती है. लेकिन पश्चिम या उत्तर दिशा इसके लिए अभीष्ट है. सीढ़ीयां का निर्माण विषम संख्या में होना चाहिए एवं चढ़ते समय दांयी ओर मुड़नी चाहिए.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 6, 2011

दिशाशूल का महत्व.. यात्रा में—-

दिशाशूल का महत्व.. यात्रा में—-

यात्रा एक ऐसा शब्द है जो कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में प्रयोग होता है. यात्रा कभी सुखदायी होती है तो कभी इतनी यातनाएं यात्रा में मिलती है कि व्यक्ति सोचता है कि यह यह यात्रा, यात्रा नहीं यातना थी. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि हम कभी भी यात्रा में जाने से पहले शकुन और दिशा शूल का विचार नहीं करते, फलस्वरूप कभी सफल हो जाते है तो कभी हमें असफलता का मुंह देखना पडता है. शास्त्र और ऋषि मुनियों का अनुभव कहता है कि दिशा शूल के समय यात्रा करने से यात्रा सफल नहीं होती है. तथा यात्रा मार्ग में विभिन्न परेशानियों का सामना करना पडता है.दिशा शूल होने पर यात्रा यथासंभव स्थगित कर देनी चाहिए या उसका परिहार कर देना चाहिए. जिसे आज मै आपके लाभार्थ लिख रहा हूं.

सोमवार और शनिवार को पूर्व दिशा कि ओर यात्रा में दिशा शूल होता है.
मंगलवार और बुधवार को उत्तर दिशा कि ओर यात्रा में दिशा शूल होता है.
रविवार और शुक्रवार को पश्चिम दिशा कि ओर यात्रा में दिशा शूल होता है.
सोमवार और वृहस्पतिवार को आग्नेय (दक्षिण-पूर्व कोण) दिशा कि ओर यात्रा में दिशा शूल होता है.
बुधवार और शुक्रवार को ईशान (पूर्व-उत्तर कोण) दिशा कि ओर यात्रा में दिशा शूल होता है.

इसलिए उपरोक्त दिशा और उपदिशाओं में यात्रा नहीं करनी चाहिए. विस्तार के लिए निम्न तालिका पर ध्यान रखे.

पूर्व–सोमवार, शनिवार,
ईशान (उत्तर-पूर्व)–बुधवार, शुक्रवार,
उत्तर–बुधवार, मंगलवार,
वायव्य (उत्तर-पश्चिम)–मंगलवार,
पश्चिम–रविवार, शुक्रवार,
नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)–विवार,शुक्रवार,
दक्षिण–वृहस्पतिवार,
आग्नेय (दक्षिण-पूर्व)–सोमवार, वृहस्पतिवार,

शास्त्रानुसार दिशा शूल हमेशा पीठ का या बांया लेना श्रेष्ठ रहता है. सम्मुख और दाहिना कभी भी भूल कर भी ना लें.इसके बारे में लिखा गया है कि..

दिशा शूल ले जाओ बामे

राहू योगिनी पूठ,!

सन्मुख लेवें चंद्रमा

लावे लक्ष्मी लूट !!

यदि यात्रा करनी अति आवश्यक हो, और उस दिन दिशा शूल हो तो उन वस्तुओं को खा कर यात्रा करने से दिशा शूल का दोष का फल न्यून हो जाता है. और कार्य सिद्धि होने लगती है, जिस कार्य के लिए हम यात्रा पर निकले है वह कार्य बिना किसी बाधा के पूर्ण हो जाता है. इसके लिए प्रत्येक वार की वस्तुएं निम्न है..

रविवार को पान खाकर यात्रा पर जाना चाहिए.

सोमवार को यात्रा पर जाने से पहले दर्पण देख कर ही घर से निकलना चाहिए.

मंगलवार को यात्रा से पूर्व धनिया खाए, तो यात्रा सुखपूर्वक होगी.

बुधवार को गुड़ खाएं.

वृहस्पतिवार को दही खा कर यात्रा पर निकलना चाहिए.

शुक्रवार को राई खा कर जाए.

शनिवार को बायविडिंग खा कर यात्रा करने से लाभ प्राप्त होता है.

यह तो मुख्य दिशाओं के दिशा शूल का परिहार था लेकिन उपदिशाओं में यात्रा करने के लिए भी शास्त्र में उपाय दिए है कि रविवार को चन्दन का तिलक, सोमवार को दही का तिलक, मंगलवार को मिट्टी का तिलक, बुधवार को घी का तिलक, वृहस्पतिवार को आटे का तिलक, शुक्रवार को तिल खा कर और शनिवार को खल खा कर यात्रा करने से उपदिशा का दिशा शूल नहीं लगता है.

दिशा शूल के निवारन के लिए लोकाचार के नियमों का पालन अवश्य करें. जो व्यक्ति प्रतिदिन अपनी नौकरी या व्यवसाय के लिए यात्रा करते है. वह भी इस बात का ध्यान रखे कि घर से निकलते समय नासिका (नाक) का जो स्वर चलता हो, उसी तरफ का पैर आगे रख कर यात्रा में निकलने से सभी दिशा शूल का दोष समाप्त हो जाता है. तथा प्रत्येक व्यक्ति जब भी यात्रा करनी हो उसू समय का नासिका का जो स्वर चल रहा हो और उसी तरफ का पैर आगे बढ़ा कर यात्रा में निकलता है तो दिशा शूल का प्रभाव मिट जाता है.

वास्तु और ज्योतिष का अटूट सम्बन्ध————-

भवन निर्माण का कार्य भी एक धार्मिक कार्य के रूप में माना जाता है. भूमि पूजन से लेकर गृहे प्रवेश तक के हर कार्य को धार्मिक भावनाओं से जोड़ा गया है. महर्षि नारद जी ने स्वयं कहा है कि जो वास्तु का पूजन करता है, वह नितोग, पुत्र, धन-धान्य आदि से परिपूर्ण होता है. पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि इन पांच तत्वों संतुलित रखना प्राकृतिक नुयम है और वास्तु अनुकूल भवन बनाने का मुख्य उद्देश्य भी यही होता है.

वास्तु का ज्योतिष से गहरा रिश्ता है. ज्योतिष शास्त्र का मानना है कि मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का पूरा प्रभाव होता है. वास्तु शास्त्र में इन ग्रहों की स्थितियों का पूरा ध्यान रखा जाता है. वास्तु के सिद्धांतों के अनुसार भवन का निर्माण कराकर आप उत्तरी ध्रुव से चलने वाली चुम्बकीय ऊर्जा, सूर्य के प्रकाश में मोजूद अल्ट्रा वायलेट रेज और इन्फ्रारेड रेज, गुरुत्वाकर्षण – शक्ति तथा अनेक अदृश्य ब्रह्मांडीय तत्व जो मनुष्य को प्रभावित करते है के शुभ परिणाम प्राप्त कर सकते है. और अनिष्टकारी प्रभावों से अपनी रक्षा भी कर सकते है. वास्तु शास्त्र में दिशाओं का सबसे अधिक महत्व है. सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र दिशाओं पर ही निर्भर होता है. क्योंकि वास्तु की दृष्टि में हर दिशा का अपना एक अलग ही महत्व है.

पूर्व-दिशा:—
- पूर्व की दिशा सूर्य प्रधान होती है.सूर्य का महत्व सभी देशो में है. पूर्व सूर्य के उगने की दिशा है. सूर्य पूर्व दिशा के स्वामी है. यही वजह है कि पूर्व दिशा ज्ञान, प्रकाश, आध्यात्म की प्राप्ति में व्यक्ति की मदद करती है. पूर्व दिशा पिता का स्थान भी होता है. पूर्व दिशा बंद, दबी, ढकी होने पर गृहस्वामी कष्टों से घिर जाता है. वास्तु शास्त्र में इन्ही बातो को दृष्टि में रख कर पूर्व दिशा को खुला छोड़ने की सलाह दी गयी है.

दक्षिण-दिशा:—-
दक्षिण-दिशा यम की दिशा मानी गयी है. यम बुराइयों का नाश करने वाला देव है और पापों से छुटकारा दिलाता है. पितर इसी दिशा में वास करते है. यह दिशा सुख समृद्धि और अन्न का स्रोत है. यह दिशा दूषित होने पर गृहस्वामी का विकास रुक जाता है. दक्षिण दिशा का ग्रह मंगल है.और मंगल एक बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रह है.

उत्तर-दिशा:- —
यह दिशा मातृ स्थान और कुबेर की दिशा है. इस दिशा का स्वामी बुध ग्रह है. उत्तर में खाली स्थान ना होने पर माता को कष्ट आने की संभावना बढ़ जाती है.

दक्षिण-पूर्व की दिशा:—-
इस दिशा के अधिपति अग्नि देवता है. अग्निदेव व्यक्ति के व्यक्तित्व को तेजस्वी, सुंदर और आकर्षक बनाते है. जीवन में सभी सुख प्रदान करते है.जीवन में खुशी और स्वास्थ्य के लिए इस दिशा में ही आग, भोजन पकाने तथा भोजन से सम्बंधित कार्य करना चाहिए. इस दिशा के अधिष्ठाता शुक्र ग्रह है.

उत्तर-पूर्व दिशा:- —
यह सोम और शिव का स्थान होता है. यह दिशा धन, स्वास्थ्य औए एश्वर्य देने वाली है. यह दिशा वंश में वृद्धि कर उसे स्थायित्व प्रदान करती है. यह दिशा पुरुष व पुत्र संतान को भी उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करती है. और धन प्राप्ति का स्रोत है. इसकी पवित्रता का हमेशा ध्यान रखना चाहिए.

दक्षिण-पश्चिम दिशा:—-
यह दिशा मृत्यु की है. यहां पिशाच का वास होता है. इस दिशा का ग्रह राहू है. इस दिशा में दोष होने पर परिवार में असमय मौत की आशंका बनी रहती है.

उत्तर-पश्चिम दिशा:—-
यह वायुदेव की दिशा है. वायुदेव शक्ति, प्राण, स्वास्थ्य प्रदान करते है. यह दिशा मित्रता और शत्रुता का आधार है. इस दिशा का स्वामी ग्रह चंद्रमा है.

पश्चिम-दिशा:- —
यह वरुण का स्थान है. सफलता, यश और भव्यता का आधार यह दिशा है. इस दिशा के ग्रह शनि है. लक्ष्मी से सम्बंधित पूजा पश्चिम की तरफ मुंह करके भी की जाती है.

इस प्रकार सभी दिशाओं के स्वामी अलग अलग ग्रह होते है और उनका जीवन में अलग अलग प्रभाव उनकी स्थिति के अनुसार मनुष्य के जीवन में पडता रहता है.

आज के मुहूर्त और राशिफल- 06 अप्रेल,2011 (बुधवार)—–

शुभ विक्रम संवत- 2068, शालिवाहन शक संवत- 1933,
संवत्सर का नाम- क्रोधी, अयन- उत्तरायन, ऋतु- वसंत,
मास- चैत्र, पक्ष- शुक्ल, तिथि- तृतीया मंगलरात्रि 2.31 पश्चात चतुर्थी,
हिजरी सन्- 1432, मु. मास- जमादिउलअव्वल, तारीख- 1,
नक्षत्र- भरणी रात्रि 10.30 पश्चात कृतिका, योग- विष्कुंभ प्रात: 11.45 पश्चात प्रीति,
सूर्योदयकालीन करण- तैतिल,
चन्द्रमा- मेष राशि से वृषभ राशि में मंगलरात्रि 5.06 पर प्रवेश करेंगे।
दिन- शुभ। दिशाशूल- उत्तर में। मुहूर्त- सौभाग्य सामग्री क्रय का मुहूर्त।
दिन का पर्व- गौरी तृतीया, गौरी शंकर का दोलोत्सव, सौभाग्य शयन व्रत।
कार्य की अनुकूलता के लिए- किसी कन्या को फल खिलाएँ।
उपयोगी ज्ञान- नवरात्रि में बोए जाने वाले जवारे शुद्ध व नए मिट्‍टी के पात्र में ही बोना शुभ रहता है।
शुभ समय- प्रात: 07.19 से 9.10 दिन 03.04 से 5.01।
सुझाव- आवश्यक न हो तो दिन 12.29 से 02.02 के मध्य शुभ
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दैनिक राशिफल—-

राशि फलादेश मेष—
आर्थिक स्थिति उत्तम रहेगी। साझेदारी की समस्या का निराकरण होगा। नए कार्य में सफलता मिलेगी। बोलचाल में ध्यान रखें। किसी से विवाद संभव।

राशि फलादेश वृष—
परिवार में खुशी का माहौल रहेगा। नवीन कार्य रचनाएँ साकार होंगी। नौकरीपेशा व्यक्ति का स्थानांतरण होगा। उत्तेजना पर नियंत्रण रखें।

राशि फलादेश मिथुन—
विलासिता के प्रति रुझान बढ़ेगा। धन-संपत्ति में बढ़ोतरी होगी। आत्मप्रसन्नता का अनुभव होगा। अधिकारी प्रसन्न रहेंगे। विद्यार्थियों को पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।

राशि फलादेश कर्क—–
सामाजिक आयोजनों में रुचि लेंगे। भागीदारी में नए अनुबंध लाभकारी होंगे। मौके का फायदा उठाना आपके हाथ में है। संतान से सुख मिलेगा।

राशि फलादेश सिंह—–
बिना सोचे कोई कार्य न करें। व्यापार में उन्नति के योग। लाभ की आशा प्रबल होगी। पारिवारिक समस्याओं का निकाल होगा।

राशि फलादेश कन्या—–
प्रसन्नता का वातावरण बनेगा। प्रवास में सतर्कता आवश्यक। कामकाज में आशानुकूल अवसर प्राप्त होंगे। स्वास्थ्य की ओर ध्यान दें। विरोधी अपने मंतव्य में कामयाब नहीं हो पाएँगे।

राशि फलादेश तुला—–
बड़े लोगों से मुलाकात होगी। निवेश का लाभ मिलेगा। व्यापार-व्यवसाय में बढ़ोतरी होगी। कर्ज से दूर रहें। परिवार के सदस्यों की तरक्की होगी।

राशि फलादेश वृश्चिक—–
व्यापार में वृद्धि होकर आर्थिक क्षेत्र में सुधार की संभावना है। आपके कार्यों की प्रशंसा होगी। गैरजरूरी वाद-विवाद से बचकर रहें।

राशि फलादेश धनु—-
व्यापार-व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलेगी। बोलचाल में संयम रखें। पुरानी उधारी, लेनदारी में सफलता मिलेगी। वाहन तेज गति से न चलाएँ।

राशि फलादेश मकर—
रुपयों के लेनदेन में सावधानी रखें। संतान के कार्यों से समाज में आलोचना होगी। व्यर्थ विवाद की स्थिति को टालें। नए कार्यों में सफलता मिलेगी।

राशि फलादेश कुंभ—
व्यापार-व्यवसाय में उन्नति के योग। कामकाज में मन लगेगा। प्रभावी वातावरण रहेगा। दूसरों की मदद मिलेगी। लाभ की आशा प्रबल होगी।

राशि फलादेश मीन—-
आशानुकूल लाभ होने की संभावना बनती है। ज्यादा साहस नहीं करें। वैवाहिक प्रस्ताव आएँगे। पूँजी निवेश एवं बचत में वृद्धि होगी।

प्यार और हस्तरेखा का संबंध–प्रेमी-प्रेमिका के बारे में बताती है हस्तरेखा–

अधिकतर लोगों के मुँह से यह सुनने में आता है कि हमारे तो गुण मिल गए थे परन्तु हमारे (पति-पत्नि) विचार नहीं मिल रहे हैं या हम लोगों ने एक-दूसरे को देखकर समझ-बूझकर शादी की थी। परन्तु बाद में दोनों में झगड़े बहुत होने लगे हैं। आप हस्तरेखा के द्वारा होने वाले धोखे, मंगेतर के बारे में या प्रेमी-प्रेमिका के बारे में जान सकते हैं।

किसी भी स्त्री या पुरुष के प्रेम के बारे में पता लगाने के लिए उस जातक के मुख्य रूप से शुक्र पर्वत, हृदय रेखा, विवाह रेखा को विशेष रूप से देखा जाता है। इन्हें देखकर किसी भी व्यक्ति या स्त्री का चरित्र या स्वभाव जाना जा सकता है।

शुक्र क्षेत्र की स्थिति अँगूठे के निचले भाग में होती है। जिन व्यक्तियों के हाथ में शुक्र पर्वत अधिक उठा हुआ होता है। उन व्यक्तियों का स्वभाव विपरीत सेक्स के प्रति तीव्र आकर्षण रखने वाला तथा वासनात्मक प्रेम की ओर झुकाव वाला होता है। यदि किसी स्त्री या पुरुष के हाथ में पहला पोरू बहुत छोटा हो और मस्तिष्क रेखा न हो तो वह जातक बहुत वासनात्मक होता है। वह विपरीत सेक्स के देखते ही अपने मन पर काबू नहीं रख पाता है।

अच्छे शुक्र क्षेत्र वाले व्यक्ति के अँगूठे का पहला पोरू बलिष्ठ हो और मस्तक रेखा लम्बी हो तो ऐसा व्यक्ति संयमी होता है। यदि किसी स्त्री के हाथ में शुक्र का क्षेत्र अधिक उन्नत हो तथा मस्तक रेखा कमजोर और छोटी हो तथा अँगूठे का पहला पर्व छोटा, पतला और कमजोर हो, हृदय रेखा पर द्वीप के चिह्न हों तथा सूर्य और बृहस्पति का क्षेत्र दबा हुआ हो तो वह शीघ्र ही व्याकियारीणी हो जाती है।

यदि किसी पुरुष के दाएँ हाथ में हृदय रेखा गुरू पर्वत तक सीधी जा रही है तथा शुक्र पर्वत अच्छा उठा हुआ है तो वह पुरुष अच्छा व उदार प्रेमी साबित होता है। परन्तु यदि यही दशा स्त्री के हाथ में होती है तथा उसकी तर्जनी अँगुली अनामिका से बड़ी होती है तो वह प्रेम के मामले में वफादार नहीं होती है।

यदि हथेली में विवाह रेखा एवं कनिष्ठा अँगुली के मध्य में दो-तीन स्पष्ट रेखाएँ हो तो उस स्त्री या पुरुष के उतने ही प्रेम संबंध होते हैं।

यदि किसी पुरुष की केवल एक ही रेखा हो और वह स्पष्ट तथा अन्त तक गहरी हो तो ऐसा जातक एक पत्निव्रता होता है और वह अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम भी करता है। जैसा कि बताया गया है कि विवाह रेखा अपने उद्गम स्थान पर गहरी तथा चौड़ी हो, परन्तु आगे चलकर पतली हो गई हो तो यह समझना चाहिए कि जातक या जातिका प्रारम्भ में अपनी पत्नि या पति से अधिक प्रेम करती है, परन्तु बाद में चल कर उस प्रेम में कमी आ गई है।

शास्त्रों के अनुसार कई ऐसे योग बताए गए हैं जब किसी भी शुभ कार्य को करने से अक्षय पुण्य और सफलता की प्राप्ति होती है। ऐसे योग हर माह बनते हैं। इन खास योगों में सभी मांगलिक कार्य शुभ फल प्रदान करते हैं। जानिए इस माह कौन-कौन से अद्भुत योग बन रहे हैं-

सर्वार्थ सिद्धि योग- इस योग में पूजन आदि कर्म करने से हमारे सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। इस माह दिनांक 3 अप्रैल को सूर्योदय के बाद दिन के 1.42 के तक यह योग रहेगा। 5 अप्रैल सूर्योदय के बाद शाम 6.30 तक यह योग बनेगा। 6 अप्रैल को रात 8.30 के बाद रात अंत तक सर्वार्थ सिद्धि योग बनता है। 17 अप्रैल को सूर्योदय से दिन के 3.11 तक, 20 अप्रैल को दिन के 10.50 से 21 अप्रैल को दिन के 10 बजे तक, दिनांक 24 को दिन में 9.35 से रात तक। दिनांक 25 को दिन के 10.25 से रात तक सर्वार्थ सिद्धि योग बनेगा।

पुष्य नक्षत्र- इस माह 11 अप्रैल को रात के 11.20 से दिनांक 21 के 10.30 रात तक पुष्य नक्षत्र योग रहेगा।

मेष संक्रांति- अप्रैल 14 को 2.30 के बाद।

त्रिपुष्कर योग- 19 अप्रैल को दिन के 12 बजे से रात 4.10 तक। दिनांक 24 अप्रैल को सुबह के 9.35 बजे से रात के 11 बजे तक त्रिपुष्कर योग रहेगा।

अमृत सिद्धि योग- 5 अप्रैल को सूर्योदय के बाद शाम 6.30 तक यह योग रहेगा। इसके बाद 17 अप्रैल सूर्योदय से दोपहर 3.10 बजे तक। 20 अप्रैल को सुबह 10.50 से रात के आखिरी पहर तक अमृत सिद्ध योग रहेगा।

आइये ईश्वर को जाने—पंडित सुरेश मिश्र ( Knowing God by Suresh Mishra)–

In this world, many beliefs exist about God. As a result, people understand God in their own way and often in their own imagination. But what is required is the understanding God as He is, what He is and how He is. The correct understanding about God has to be given by God Himself!

There are some who don’t believe in the existence of God, often the reason being His existence cannot be proved like that of human beings. But because we cannot see God with the gross eyes, it doesn’t mean that God doesn’t exist. Just like wind, which cannot be seen but can be very much felt, it is possible to experience God’s presence through Godly knowledge and meditation.

Who is God and what is His form and name?
We shall now try to understand who God or the Supreme Soul is. The term ‘Supreme Soul’ means He is supreme among all souls. It implies that, He is also ‘a soul’, though He is the Highest of all. He is above birth and death. God is the Supreme Father-Mother, Supreme teacher and Supreme Preceptor to all the human beings and He himself has no father-mother, teacher and preceptor.

God is a subtle, infinitesimal point of Light. He is not visible to the naked eye but it is very much possible to experience His presence and proximity in meditation. He is incorporeal in the sense that he does not have a body of his own. He is not a human being nor does He have a human form. He is immune to pleasure and pain unlike human beings.

Names are a means of identification of human beings after they are born. They do not speak of qualities and actions of the person; they are simply proper nouns and are not attributive names. But the name of the supreme soul or God is based on His qualities and actions. His self-revealed name is ‘Shiva’. ‘Shiva’ means doer of good or benefactor. God does good to all and therefore He is called Shiva. All souls ask for salvation and beatitude i.e. peace and happiness from Him. People remember Him by many other expressive names.

His Virtues
God is the Supreme Father of all. He is called the creator. He is oceanic in his virtues – the ocean of peace, the ocean of love, the ocean of bliss, the ocean of knowledge, the ocean of happiness, the ocean of mercy, etc. He is the truth. He is the Almighty and Authority. He is reputed to be the preserver or sustainer of virtues and the destroyer of all evils. He is also the liberator, the guide, and the bestower of salvation, therefore the sadguru. He dispels sorrow, bestows joy. God is perfect in all ways and absolutely detached and loving. He is very benevolent and helpful and so souls ask all things of him. When in sorrow and losing all hope, souls turn to him intuitively and inevitably.

Many are the religions and paths that souls take in their quest for reaching God. Many wars have been waged in his name. However, he does not exclusively belong to anyone. He belongs to everyone equally.

The Supreme Father of all Souls
God is the father of all souls in this world. It is observed that all religions have images, idols or memorials bearing one name or another to represent the form of Light that God is. All over India, the images of the form that Shiva has is found installed; these images are without any human form, in the form of linga, which is the symbol of an incorporeal Being. At Mecca, in the holy place of Kaaba, a stone image with oval form is called “Sang-e-Aswad”. The devotees who go for Haj kiss this holy stone. Jesus Christ said, “God is Light”. Guru Nanak, the founder of Sikhism also sang the praise of Him who is ‘All-Light’ ( ek Omkar) and is incorporeal. In olden days, the Jews held a stone of this shape in their hands while taking a solemn oath and it is believed that Moses had vision of this form of God when he saw a flame behind the bush. The Zoroastrians worship God as fire. The ancient Egyptians worshipped the sun as god. A Buddhist sect in Japan focuses the mind on a small oval shape. They call it Karni, the peace giver.

It seems therefore that human beings, without realizing, have all been worshipping and trying to discover the same God. There is only one God and His form is a point of light. He is called by different names in different religions.

The Divine Abode of God
Where does God live? Is there somewhere one can go to see Him, to be with Him? God is a subtle point of light, and He does not pervade the physical universe. Nor does he live in the heart of any human being or in any matter. Neither is He omnipresent; nor is He having a human form. His home is the incorporeal world, an infinite expanse of golden-red light, which is beyond this physical world we live. It is the original abode of all souls as well. The incorporeal world is known as Paramdham or Brahmlok. Knowing where the Supreme Father is, we can establish connection with Him through thoughts during meditation.

The Divine Descent of God
God descends into this world when it is under the spell of extreme darkness of ignorance, unrighteousness, moral turpitude, spiritual lassitude and religious decrepitude. This is described in scriptures as “Dharma Glani”. Looking at the state of affairs today, it should not be difficult for us to conclude that the time the world is undergoing at present is indeed the Dharma Glani. This is the period of darkness when sins and crimes of all kinds usually take place; when man gropes around for want of clear vision. It is at this time that God intervenes in the affairs of mankind. The divine intervention takes place at the darkest hour of human history when the human soul is groping in the darkness of ignorance about the self, the creator and the creation; when the souls are blinded by the vices of lust, arrogance, anger, greed and attachment.

It is in this time that God descends in the body of an ordinary man to reveal the Godly Knowledge, which paves way to victory over vices and cultivate divine qualities in life. This enables human beings to transform into divine beings again.
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सोच-समझकर ही करवाएं शुभ मुहूर्त के चक्कर में सिजेरियन डिलीवरी—(शुभ मुहूर्त में ‘जन्म’ सेहत के लिए अशुभ-)–

नए साल में बेबी को जन्म देने की चाहत में एक पेशेंट ने डिलीवरी डेट को कम किया और आपरेशन के द्वारा बेबी को जन्म दिया। एक परिवार की चाह थी कि मैरीज एनिवर्सरी की डेट पर ही बच्चे का जन्म हो। यह नॉर्मल डिलीवरी से हो नहीं सकता था, इसलिए उन्होंने सिजेरियन को चुना। शुभ मुहूर्त के चलते एक परिवार ने डॉक्टर के समक्ष रात को बारह बजे सिजेरियन की माँग की। क्योंकि यह सामान्य प्रसव से मुमकिन नहीं था।

आजकल मनपसंद तारीख या शुभ घड़ी के मुताबिक प्रसव का चलन बढ़ा है। इसी के चलते लोग मुहूर्त में बच्चे को जन्म देना चाहते हैं। अपनी चाह को पूरा करने के लिए वे सिजेरियन का ऑप्शन चुनते हैं। डाक्टर्स के मुताबिक यदि कोई कॉम्प्लीकेशन्स न हो तो सिजेरियन करवाना खतरे को बुलावा देना है। क्योंकि वे यह सलाह तभी देते हैं, जब एक्सपेक्टिंग मदर या उसके बेबी को कोई खतरा हो। एक्सपर्ट के अनुसार प्रसव एक कुदरती प्रक्रिया है, जिसे बदलने की कोशिश करना एक गंभीर खतरे को बुलावा देना है। राजधानी के भी इस तरह की माँग कर रहे हैं।

40 वीक के बाद ही सर्जरी :— जेरियन प्रसव तब तक नहीं कराना चाहिए, जब तक बच्चे का गर्भ में पूरा समय नहीं हो गया हो। या यूँ कहें कि गर्भ के 40 वीक पूरे होने के बाद ही सर्जरी कराना चाहिए। स्त्री रोग विशेषज्ञ के मुताबिक समय से पहले सर्जरी कराने से कई तरह की जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है, यहाँ तक की नवजात शिशु की मृत्यु भी हो सकती है। हालाँकि सिजेरियन प्रसव मुश्किल हालात में माँ और बच्चे की जिंदगी बचा सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह सामान्य प्रसव की तुलना में अधिक सुरक्षित है।

सिजेरियन प्रसव में आमतौर पर समय से पूर्व बच्चे का जन्म होता है। यानी बच्चा प्रीमेच्योर होता है। इससे बच्चे में ट्रांजिएंट टैकिप्निया होने की अधिक आशंका रहती है। इसमें बच्चा जन्म के बाद कुछ दिनों तक असामान्य रूप से तेजी से साँस लेता है। किसी भी परिस्थिति में 39 सप्ताह से पहले बच्चे के फेफड़े का पूरा विकास नहीं हो पाता है।

सिजेरियन प्रसव से मदर के यूटेरस या किडनी जैसे पैल्विक अंग संक्रमित हो सकते हैं। वेजायना से नार्मल डिलीवरी की तुलना में सिजेरियन में दोगुना रक्त का नुकसान होता है। कुछ मामलों में डिलीवरी के बाद कुछ दिनों तक आंत में सूजन की आशंका रहती है और आंत के काम में कुछ कमी आ सकती है।

कुछ लोग रात में या अर्ली मार्निंग सिजेरियन की माँग करते हैं इसमें कई तरह की परेशानियाँ हो सकती है। मसलन ब्लड और दवाइयों की आवश्यकता हुई तो रात में इनका इंतजाम करना आसान नहीं होता है। सिजेरियन के दौरान ब्लड लॉस भी ज्यादा होता है।

एक्स्ट्रा केयर की जरूरत नहीं—-
बच्चे के जन्म के लिए प्रकृति ने जो समय निर्धारित किया है वह सर्वश्रेष्ठ है। माँ के पेट से अच्छी जगह कोई नहीं हो सकती है। वहीं बच्चे का संपूर्ण विकास होता है और वह सुरक्षित रहता है। सर्जरी के दौरान माँ को एनस्थिसिया या अन्य दवाइयों से रिएक्शन हो सकता है, इससे रक्तचाप अचानक गिर सकता है।

एनस्थिसिया के इस्तेमाल से माँ को निमोनिया हो सकता है। बच्चे पर भी सडेटिव इफेक्ट हो सकता है। सर्जरी के दौरान आंत या मूत्राशय भी क्षतिग्रस्त हो सकता है, इससे हिस्टेरेक्टमी या आंत की मरम्मत जैसी अतिरिक्त सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा महिला के पैरों, पेल्विक अंगों या फेफड़ों में रक्त का क्लॉट हो सकता है, जिससे विनस थ्रंबोसिस हो सकता है। माँ और बच्चे को इन्फेक्शन के चाँसेस बढ़ जाते हैं। जबकि सामान्य प्रसव में बच्चा इंडिपेंडेंट जीवन जीता है। उसे एक्स्ट्रा केयर या फिर नर्सरी की आवश्यकता नहीं होती है। यदि किसी शुभ मुहूर्त के लिए सिजेरियन बच्चे के जन्म को दिया है और बाद में इसके चलते कोई मुश्किल हालात का सामना करना पड़ रहा है तो ऐसे में मुहूर्त शुभ कहाँ रह गया।

कई बार जन्म कुण्डली न होने या जन्म समय, स्थान आदि की सही जानकारी न होने से कई आवश्यक बातों का पता नहीं चलता। ऐसे में मूलांक यानि अंक ज्योतिष सही आधार हो सकता है जिसके द्वारा आप कई समस्याओं का समाधान जान सकते हैं।

मूलांक के आधार पर आप अपने भाग्योदय के वर्ष भी जान सकते हैं। इन वर्षों के बारे में यदि आपको पता हो तो उनकी पहले से तैयारी की जा सकती है और समय आने पर अवसर को कैश किया जा सकता है।

मूलांक 1 वालों का भाग्यशाली वर्ष 22 वाँ वर्ष होता है। इस वर्ष से इन्हें सफलता मिलनी प्रारंभ हो जाती है।
मूलांक 2 वालों के लिए 24 वाँ वर्ष विशेष फलकारक होता है।
मूलांक 3 वालों के लिए 32 वाँ वर्ष अति फलदायी होता है।
मूलांक 4 के लिए 36 और 42 वें वर्ष अति शुभ होते है व अटूट धन संपत्ति कारक होते हैं।
मूलांक 5 के लिए 32 वाँ वर्ष बहुत अच्छा होता है। सफलता के द्वार खुलते जाते हैं।
मूलांक 6 के लिए 25 वाँ वर्ष शुभता लेकर आता है। हर कार्य में सफलता कदम छूती है।
मूलांक 7 के लिए 38 व 44 व वर्ष शुभ होता है। प्रारम्भ के संघर्ष के बाद खूब सफलता मिलती है।
मूलांक 8 के लिए 36 व 42 वें वर्ष अति शुभ होते हैं। इन्हें पहले खूब मेहनत करनी पड़ती है, फिर लाभ मिलता है।
मूलांक 9 के लिए 28 वाँ वर्ष बहुत शुभ होता है और खूब यश-धन दिलाता है।

विशेष : भाग्योदय का वर्ष जानने के बाद अपने मूलांक से मिलाती-जुलती फील्ड चुननी चाहिए और खूब मेहनत करनी चाहिए ताकि अवसर आने पर आप उसका उपयोग कर सके और धन-यश का मजा लूट सकें।

भाग्यशाली वर्ष में तो भाग्य वृद्धि होती ही है, फिर इनके गुणक वर्षों में भी सफलता मिलती जाती है। जैसे मूलांक 1 को 22 वें वर्ष के अलावा 33, 44, 55, 66 वें वर्ष में भी विशेष सफलता मिलती है। इसी तरह अन्य मूलांक के गुणक वर्ष निकाले जा सकते हैं।
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क्या है मूलांक और भाग्यांक – भारती पंडित

मूलांक और भाग्यांक हमारी लाइफ में बड़ा महत्व रखते हैं। कई बार हमें जन्म का समय या स्थान मालूम नहीं होता। ऐसे में कुंडली बना पाना कठिन हो जाता है। मूलांक उन लोगों के लिए एक सटीक आधार है। अपने बारे में जानने का और भविष्य में घटने वाली घटनाओं का अनुमान लगाने का अंक ज्योतिष एक सरल माध्यम हो सकता है।

मूलांक का अर्थ है —

आपके जन्म की तारीख। यानि यदि आपका जन्म 2 मार्च को हुआ है तो आपका मूलांक 2 होगा। मूलांक हमारे स्वभाव, प्रकृति, गुण,दोष आदि के बारे बताता है। हमारे लिए जीवन में क्या उपयोगी है और क्या अनुपयोगी, यह मूलांक से ही जाना जाता है। यह आपके मित्र और शत्रुओं के बारे में भी बताता है।

आपके करियर, जीवनसाथी, कार्यक्षेत्र और भाग्योदय की भी जानकारी देता है। मूलांक 1 से 9 तक माने जाते हैं। जिन लोगों का जन्म 9 से अधिक संख्या वाली तारीख को हुआ है वे अपने जन्मदिनांक को आपस में जोड़कर मूलांक पा सकते हैं। जैसे जिनका जन्म 11 तारीख को हुआ है उनका मूलांक 2 होगा। (1+1=2)। इसी तरह अन्य मूलांक आपस में जोड़कर निकाले जा सकते हैं।

भाग्यांक :- ——

भाग्यांक की गणना थोड़ी विस्तृत होती है। यह वह अंक होता है जो आपके जीवन में बार-बार किसी न किसी तरह आता ही है और आपको अच्छे या बुरे रूप में प्रभावित करता है।

भाग्यांक का उपयोग महत्वपूर्ण घटनाओं का समय या तिथि जानने के लिए किया जाता है। आजकल जो नाम का अक्षर बदलने का चलन चल रहा है, वह भी भाग्यांक के ही आधार पर किया जाता है।

भाग्यांक निकलने के लिए जन्म तारीख, माह और सन लिखा जाता है और फिर उनका योग किया जाता है। जैसे यदि आपकी जन्म तारीख, माह व सन 2-3-1970 है तो आपका भाग्यांक 2+3+1+9+7+0 =22 = 2+2 = 4 होगा। यानि इस पूरी डीटेल्स के लिए भाग्यांक 4 होगा। विवाह, काम करने की जगह, भाग्यशाली शहर, लकी अंक आदि के बारे में भाग्यांक के द्वारा ही जाना जाता है।

लग्न के अनुसार मंत्र का जप -इष्ट को मनाएँ उनके ही मंत्र से—

इष्ट का बड़ा महत्व होता है। यदि इष्ट का साथ मिल जाए तो जीवन की मुश्किलें आसान होता चली जाती हैं। कुंडली में कितने भी कष्टकर योग हो, इष्ट की कृपा से जीवन आसान हो जाता है। अतः हर व्यक्ति को अपने इष्ट और उसके मन्त्र की जानकारी होना जरूरी है।

लग्न कुंडली का नवम भाव इष्ट का भाव होता है और नवम से नवम होने से पंचम भाव इष्ट का भाव माना जाता है। इस भाव में जो राशि होती है उसके ग्रह के देवता ही हमारे इष्ट कहलाते है। उनका मंत्र ही इष्ट मन्त्र कहलाता है। यहाँ लग्न के अनुसार आपके इष्टदेव और उनके मंत्र की जानकारी दी जा रही है।

मेष लग्न के इष्ट देव हैं विष्णु जी – मंत्र- ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय
वृषभ लग्न के इष्ट हैं गणपति जी – मंत्र- ऊँ गं गणपतये नमः
मिथुन लग्न की इष्टदेवी हैं माँ दुर्गा – मंत्र- ऊँ दुं दुर्गाय नमः
कर्क लग्न के इष्ट हैं हनुमान जी – मंत्र- ऊँ हं हनुमंताय नमः
सिंह लग्न के इष्ट है विष्णु जी – मंत्र- ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय
कन्या लग्न के इष्ट हैं शिव जी – मंत्र-ऊँ नमः शिवाय
तुला लग्न के इष्ट हैं रूद्र जी – मंत्र- ऊँ रुद्राय नमः
वृश्चिक लग्न के इष्ट होंगे विष्णु जी – मंत्र- ऊँ गुं गुरुवे नमः , ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय
धनु लग्न के इष्ट है हनुमान जी – मंत्र- ऊँ हं हनुमंताय नमः
मकर लग्न की इष्ट है देवी भगवती – मंत्र- ऊँ दुं दुर्गाय नमः
कुम्भ लग्न के इष्ट है गणपति जी – मंत्र- ऊँ गं गणपतये नमः
मीन लग्न के इष्ट हैं शिव जी – मंत्र- ऊँ नमः शिवाय

विशेष : इष्ट मंत्र का जाप नियमित रूप से और रोज एक निश्चित समय पर ही करना चाहिए। विशेष अवसर पर इष्ट पूजन के बाद ही कार्य प्रारम्भ करना चाहिए।

मेष और मीन लग्न वालों को क्रमशः गायत्री मंत्र और ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सह चन्द्रमसे नमः का जाप करना भी लाभ देता है।

हस्तरेखा से जानिए व्यक्ति का व्यव्हार—

मनुष्य की प्रकृति के विश्लेषण, अध्ययन एवं परीक्षण करने के जितने भी माध्यम हैं, उनमें हस्तरेखा विज्ञान यानी पॉमिस्ट्री का विशेष महत्व है। हाथ मनुष्य के आचरण व व्यवहार रूपी बक्से की चाबी है, जिसके भीतर प्रकृति ने प्रेरक शक्ति और उसकी उन अंतर्निहित क्षमताओं, गुणों एवं कार्यशक्ति को बंद किया हुआ है, जिनके द्वारा हम स्वयं को पहचानकर अपने जीवन को रूपांतरित कर सकते हैं। हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी लिखा है कि-

कराग्रे वस्ते लक्ष्मी, कर मध्ये सरस्वती।
कर पृष्ठे स्थितो ब्रह्मा, प्रभाते कर दर्शनम्‌॥

ये दो पंक्तियाँ हाथ के महत्व को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से हमारे हाथ में सभी देवताओं का निवास है और भौतिक दृष्टि से मनुष्य की उज्ज्वलता, प्रखरता व कार्यशैली का पुंज है। हमारा जीवन परिवर्तनशील है और जीवन संघर्ष का, घात-प्रतिघातों का यह संपूर्ण रूप से प्रतिबिंब है, जिसके माध्यम से हम भूत को जानकर विश्वास करते हैं व वर्तमान को समझते हैं।

प्रायः सभी व्यक्तियों के हाथ एक ही प्रकार के नहीं होते, न ही रेखाएँ व योग। सभी में भिन्नता होती है।

मुख्यतः हाथ 7 प्रकार के होते हैं, जिनका क्रम इस प्रकार है-

1. अविकसित अथवा निम्न श्रेणी के हाथ।
2. चमचाकार अथवा गतिशील हाथ।
3. दार्शनिक अथवा गाँठदार हाथ।
4. नुकीले अथवा कलात्मक हाथ।
5. आदर्श हाथ।
6. मिश्रित हाथ।
7. वर्गाकार अथवा उपयोगी हाथ।

बहरहाल, हाथों की लकीरों पर बात ना करें और उनकी गतिविधियों पर बात करें तो आपको अचरज होगा कि इस अध्ययन से भी सामने वाले का नेचर जाना जा सकता है। कोई व्यक्ति किसी दूसरे से हाथ मिलाता है।

हाथ मिलाते समय —
दूसरा हाथ सामने वाले के हाथ पर जैसे- कलाई, बाजू या कंधे पर रखे तो वह निम्न स्वभाव वाला होगा। यह सामने वाले का हितैषी होगा। सामने वाले की अच्छाई चाहेगा। उसकी खुशी, उसकी उन्नति, उसकी समृद्धि चाहेगा। उसे अच्छा मार्गदर्शन देगा एवं यथाशक्ति मदद करेगा। सामने वाले के सुख-दुख में, हँसी-खुशी में, अच्छे-बुरे में साथ देगा एवं सामने वाले का शुभचिंतक होगा।

यदि कोई व्यक्ति सामने वाले की हथेली को ऊपर से दबाकर हाथ मिलाता है तो वह निम्न स्वभाव का होगा—-

वह गुस्सैल एवं घमंडी होगा। सुपीरियरीटी कॉम्प्लेक्स उसमें कूट-कूटकर भरा होता है। सामने वाले को तुच्छ या नहीं के बराबर मानता है। अपने आपको सभी से उच्च समझता है। दूसरों की चिंता नहीं करता। दूसरों पर अपना प्रभाव जमाकर या दबाब डालकर काम करवाता है। तानाशाही प्रवृत्ति का होता है। वह चाहता है कि लोग उसे मानें, जानें एवं सम्मान दें। चाहे वह कैसा भी हो, हर जगह अपने को उच्च मानता है।

राशि के अनुसार देवता को मनाएँ : करियर चमकाएँ —-

अच्छा करियर सचमुच सभी की जरुरत होता है। यह लाइन सेफ हो जाए तो जीवन की आधी प्रॉब्लम दूर हो जाती है। क्या एस्ट्रो में भी ऐसे उपाय हैं जिनको करने से करियर बनाने में मदद मिल सके? आइए देखते हैं :

कुंडली का दसवा भाव और दसवें से दसवा यानी सातवाँ भाव नौकरी या व्यवसाय को दिखाते हैं। दसवाँ भाव ज्यादा इसके लिए जिम्मेदार होता है। आपको करना क्या है .. अपनी कुंडली का दसवाँ भाव देखिए और उसमें कौनसी राशि आ रही है उस पर ध्यान दीजिए। उस राशि का स्वामी ग्रह कौनसा है यह भी देखें। क्या यह प्लेनेट मजबूत है यानी इसके साथ कोई बुरा ग्रह तो नहीं है या किसी बुरे ग्रह की नजर तो नहीं है?

यदि ऐसा है तो ग्रह कमजोर माना जाएगा। इसी तरह यदि इस ग्रह के साथ सन है तो भी यह ग्रह अस्त यानी कम पावर का माना जाएगा। अब ऐसा ग्रह आपको सही दिशा नहीं दे सकता अतः इस ग्रह को मनाना आपके लिए जरूरी है।

इसी तरह लगे हाथों सातवें भाव पर भी नजर डाल लें और इसके ग्रह को भी जाँच लें। अगर यह ठीक है तो आपको केवल दसवें भाव को ठीक करना है।

नीचे सभी राशियों के देवता दिए जा रहे हैं। अपनी राशि के अनुसार देवता की आराधना करे और मनचाहा करियर पाएँ—

मेष : हनुमान जी
वृषभ : दुर्गा माँ
मिथुन : गणपति जी
कर्क: शिव जी
सिंह : विष्णु जी (श्रीराम )
कन्या : गणेश जी
तुला : देवी माँ
वृश्चिक : हनुमान जी
धनु : विष्णु जी
मकर : शिव जी
कुम्भ : शिव का रूद्र रूप
मीन : विष्णु जी (सत्यनारायण भगवान)

विशेष : संबंधित राशि के रत्न पहनने से और जप दान करने से अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।

सात सितारों के रूप में सप्तर्षि –तारा मंडल और सप्तर्षि–

आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान सात संतों के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है। यहाँ प्रस्तुत है सात महान ‍ऋषियों का संक्षिप्त परिचय।

वेदों के रचयिता ऋषि : ऋग्वेद में लगभग एक हजार सूक्त हैं, लगभग दस हजार मन्त्र हैं। चारों वेदों में करीब बीस हजार हैं और इन मन्त्रों के रचयिता कवियों को हम ऋषि कहते हैं। बाकी तीन वेदों के मन्त्रों की तरह ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना में भी अनेकानेक ऋषियों का योगदान रहा है। पर इनमें भी सात ऋषि ऐसे हैं जिनके कुलों में मन्त्र रचयिता ऋषियों की एक लम्बी परम्परा रही। ये कुल परंपरा ऋग्वेद के सूक्त दस मंडलों में संग्रहित हैं और इनमें दो से सात यानी छह मंडल ऐसे हैं जिन्हें हम परम्परा से वंशमंडल कहते हैं क्योंकि इनमें छह ऋषिकुलों के ऋषियों के मन्त्र इकट्ठा कर दिए गए हैं।

वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है:- 1.वशिष्ठ, 2.विश्वामित्र, 3.कण्व, 4.भारद्वाज, 5.अत्रि, 6.वामदेव और 7.शौनक।

पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :- वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत। विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।। अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।

इसके अलावा पुराणों की अन्य नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है।

महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियाँ मिलती हैं। एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली में पाँच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं। कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है। यहाँ प्रस्तुत है वैदिक नामावली अनुसार सप्तऋषियों का परिचय।

1. वशिष्ठ : राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।

2. विश्वामित्र : ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।

माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहाँ शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है।

3. कण्व : माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।

4. भारद्वाज : वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी।

ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में 10 ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम ‘रात्रि’ था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं। ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के 765 मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के 23 मन्त्र मिलते हैं। ‘भारद्वाज-स्मृति’ एवं ‘भारद्वाज-संहिता’ के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। ऋषि भारद्वाज ने ‘यन्त्र-सर्वस्व’ नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने ‘विमान-शास्त्र’ के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।

5. अत्रि : ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा माँगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था।

अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहाँ उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।

6. वामदेव : वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं।

7. शौनक : शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे।

फिर से बताएँ तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है।

इसके अलावा मान्यता हैं कि अगस्त्य, कष्यप, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, ऐतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है।

लकी नंबर (भाग्यांक )से चु‍निए करियर —-

मूलांक यानी आपकी डेट ऑफ बर्थ या जन्मदिन। यदि होरोस्कोप न हो तो केवल इसके द्वारा भी आप अपनी वर्किंग फील्ड के बारे में जान सकते है और मनचाही सफलता हासिल कर सकते हैं।

* यदि आप मूलांक 1 को रिप्रेजेंट करते है तो आपको डिजाइनर, टीम लीडर, फिल्म मेकिंग या नवीन इन्वेंशन के क्षेत्र में जाना चाहिए।

* यदि आपका मूलांक 2 है तो आपको किसी भी रचनात्मक काम को करना चाहिए जैसे डाँसिंग, राइटिंग, पोएट्री या रिसर्च के कार्य कर सकते हैं।

* यदि आपका मूलांक 3 है तो आपके लिए एक्टिंग, टीचिंग, जर्नलिज्म, काउंसलिंग आदि बेहतर ऑप्शन है।

* यदि आपका मूलांक 4 है तो आपको इंजीनियर, बिल्डर, प्रोग्रामर, मशीनों से रिलेटेड काम करना चाहिए।

* यदि आपका मूलांक 5 है तो आपको प्रकाशन, विज्ञापन,लेखन आदि क्षेत्र में काम करना चाहिए।

* यदि आप मूलांक 6 को रिप्रेजेंट करते है तो आप सोशल वर्क, मेडिकल, आयुर्वेद,कुकिंग आदि फील्ड में काम कर सकते हैं।

* यदि आपका मूलांक 7 है तो आपको वैज्ञानिक, दार्शनिक, जासूस, मिस्ट्री नॉवेल राइटर होना चाहिए।

* यदि आपका मूलांक 8 है तो आपको बैंकिंग, मैनेजर, किसी संस्था का डायरेक्टर या मशीनों का काम करना चाहिए।

* यदि आपका मूलांक 9 है तो आप खिलाड़ी, फिजिशियन, वकील,सैनिक आदि हो सकते हैं।

बेहतर होगा कि आप अपने मूलांक को सूट करता हुआ करियर चुने। यदि ऐसा न कर पाए तो मेहनत बहुत अधिक करनी होगी, तभी सफलता मिल पाएगी।

शनि, राहु और केतु : दोस्त या दुश्मन (तीन ग्रहों की त्रिवेणी, कुछ अच्छी-कुछ बुरी)—-

शनि के अनुचर हैं राहु और केतु। शरीर में इनके स्थान नियु‍क्त हैं। सिर राहु है तो केतु धड़। यदि आपके गले सहित ऊपर सिर तक किसी भी प्रकार की गंदगी या खार जमा है तो राहु का प्रकोप आपके ऊपर मँडरा रहा है और यदि फेफड़ें, पेट और पैर में किसी भी प्रकार का विकार है तो आप केतु के शिकार हैं।

राहु और केतु की भूमिका एक पुलिस अधिकारी की तरह है जो न्यायाधीश शनि के आदेश पर कार्य करते हैं। ‍शनि का रंग नीला, राहु का काला और केतु का सफेद माना जाता है। शनि के देवता भैरवजी हैं, राहु की सरस्वतीजी और केतु के देवता भगवान गणेशजी है।

शनि का पशु भैंसा, राहु का हाथी और काँटेदार जंगली चूहा तथा केतु का कुत्ता, गधा, सुअर और छिपकली है। शनि का वृक्ष कीकर, आँक व खजूर का वृक्ष, राहु का नारियल का पेड़ व कुत्ता घास और केतु का इमली का दरख्त, तिल के पौधे व केला है। शनि शरीर के दृष्टि, बाल, भवें, हड्डी और कनपटी वाले हिस्से पर, राहु सिर और ठोड़ी पर और केतु कान, रीढ़, घुटने, लिंग और जोड़ पर प्रभाव डालता है।

राहु की मार : यदि व्यक्ति अपने शरीर के अंदर किसी भी प्रकार की गंदगी पाले रखता है तो उसके ऊपर काली छाया मंडराने लगती है अर्थात राहु के फेर में व्यक्ति के साथ अचानक होने वाली घटनाएँ बढ़ जाती है। घटना-दुर्घटनाएँ, होनी-अनहोनी और कल्पना-विचार की जगह भय और कुविचार जगह बना लेते हैं।

राहु के फेर में आया व्यक्ति बेईमान या धोखेबाज होगा। राहु ऐसे व्यक्ति की तरक्की रोक देता है। राहु का खराब होना अर्थात् दिमाग की खराबियाँ होंगी, व्यर्थ के दुश्मन पैदा होंगे, सिर में चोट लग सकती है। व्यक्ति मद्यपान या संभोग में ज्यादा रत रह सकता है। राहु के खराब होने से गुरु भी साथ छोड़ देता है।

राहु के अच्छा होने से व्यक्ति में श्रेष्ठ साहित्यकार, दार्शनिक, वैज्ञानिक या फिर रहस्यमय विद्याओं के गुणों का विकास होता है। इसका दूसरा पक्ष यह कि इसके अच्छे होने से राजयोग भी फलित हो सकता है। आमतौर पर पुलिस या प्रशासन में इसके लोग ज्यादा होते हैं।

केतु की मार : जो व्यक्ति जुबान और दिल से गंदा है और रात होते ही जो रंग बदल देता है वह केतु का शिकार बन जाता है। यदि व्यक्ति किसी के साथ धोखा, फरेब, अत्याचार करता है तो केतु उसके पैरों से ऊपर चढ़ने लगता है और ऐसे व्यक्ति के जीवन की सारी गतिविधियाँ रुकने लगती है। नौकरी, धंधा, खाना और पीना सभी बंद होने लगता है। ऐसा व्यक्ति सड़क पर या जेल में सोता है घर पर नहीं। उसकी रात की नींद हराम रहती है, लेकिन दिन में सोकर वह सभी जीवन समर्थक कार्यों से दूर होता जाता है।

केतु के खराब होने से व्यक्ति पेशाब की बीमारी, जोड़ों का दर्द, सन्तान उत्पति में रुकावट और गृहकलह से ग्रस्त रहता है। केतु के अच्छा होने से व्यक्ति पद, प्रतिष्ठा और संतानों का सुख उठाता है और रात की नींद चैन से सोता है।

शनि की मार : पराई स्त्री के साथ रहना, शराब पीना, माँस खाना, झूठ बोलना, धर्म की बुराई करना या मजाक उड़ाना, पिता व पूर्वजों का अपमान करना और ब्याज का धंधा करना प्रमुख रूप से यह सात कार्य शनि को पसंद नहीं। उक्त में से जो व्यक्ति कोई-सा भी कार्य करता है शनि उसके कार्यकाल में उसके जीवन से शांति, सुख और समृद्धि छिन लेता है। व्यक्ति बुराइयों के रास्ते पर चलकर खुद बर्बाद हो जाता है। शनि उस सर्प की तरह है जिसके काटने पर व्यक्ति की मृत्यु तय है।

शनि के अशुभ प्रभाव के कारण मकान या मकान का हिस्सा गिर जाता है या क्षतिग्रस्त हो जाता है, नहीं तो कर्ज या लड़ाई-झगड़े के कारण मकान बिक जाता है। अंगों के बाल तेजी से झड़ जाते हैं। अचानक आग लग सकती है। धन, संपत्ति का किसी भी तरह नाश होता है। समय पूर्व दाँत और आँख की कमजोरी।

शनि की स्थिति यदि शुभ है तो व्यक्ति हर क्षेत्र में प्रगति करता है। उसके जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता। बाल और नाखून मजबूत होते हैं। ऐसा व्यक्ति न्यायप्रीय होता है और समाज में मान-सम्मान खूब रहता हैं।

बचाव का तरीका : शनि के उपाय- सर्वप्रथम भैरवजी के मंदिर जाकर उनसे अपने पापों की क्षमा माँगे। जुआ, सट्टा, शराब, वैश्या से संपर्क, धर्म की बुराई, पिता-पूर्वजों का अपमान और ब्याज आदि कार्यों से दूर रहें। शरीर के सभी छिद्रों को प्रतिदिन अच्छे से साफ रखें। दाँत, बाल और नाखूनों की सफाई रखें।

कौवे को प्रतिदिन रोटी खिलाएँ। छायादान करें, अर्थात कटोरी में थोड़ा-सा सरसो का तेल लेकर अपना चेहरा देखकर शनि मंदिर में रख आएँ। अंधे, अपंगों, सेवकों और सफाईकर्मियों से अच्छा व्यवहार रखें। रात को सिरहाने पानी रखें और उसे सुबह कीकर, आँक या खजूर के वृक्ष पर चढ़ा आएँ।

राहु के उपाय- सिर पर चोटी रख सकते हैं, लेकिन किसी लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर। भोजन भोजनकक्ष में ही करें। ससुराल पक्ष से अच्छे संबंध रखें। रात को सिरहाने मूली रखें और उसे सुबह किसी मंदिर में दान कर दें।

केतु के उपाय- संतानें केतु हैं। इसलिए संतानों से संबंध अच्छे रखें। भगवान गणेश की आराधना करें। दोरंगी कुत्ते को रोटी खिलाएँ। कान छिदवाएँ। कुत्ता भी पाल सकते हैं, लेकिन किसी लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 6, 2011

आज की माँ….!!!!!!!!!!

आज की माँ, अम्मा, मम्मी——

तन को सजाना व्यर्थ है तेरा,

यदि मन को नहीं सजाती ।

ब्यूटी पार्लर में जा-जा जाकर तुम,

क्यों ? मातृत्व, सतीत्व, वात्सल्य

की सूक्ष्म-शक्ति को गंवाती??

द्वारा – गुरुतत्व शिवोम्‌ तीर्थजी।

क्या माँ, बहिन, बेटी, भाभी, बहू आदि को उपरोक्तानुसार सूक्ष्म-श्रृंगार मातृत्व, नारीत्व, वात्सल्य मिल सकता है ? कदापि नहीं । इसी के कारण घर, परिवार, समाज में ऋणात्मक-ऊर्जा का सृजन हो रहा है । इसके कारण प्रत्येक घर में मन्थरा, कैकयी आदि का प्रादुर्भाव हो रहा है।

जब नन्ही-नन्ही बिटियों से लेकर 60 वसन्त पार करने वाली कल के भविष्य का निर्माण करने वाली सूक्ष्म-शक्तियों में एवं अन्य ब्यूटी-पार्लर के पायदानों पर चढते तथा उतरते देखते हैं तो यह ऋणात्मक भाव एवं भावना (Negative Emotions of Feeling) की मनोवृत्ति उत्पन्न होती है कि मातृ-शक्तियों को कहां ले जाएगी?

आज की नारियाँ न जाने किस भ्रम-विभ्रम के जाल में फंसकर स्वयं के साथ इतना अत्याचार करती हैं कि स्वयं को आकर्षक दिखाने के चक्कर में मातृत्व, सतीत्व, वात्सल्य आदि का सर्वदा त्याग करती जा रही हैं और उसका दोषारोपण न जाने किस-किस को दे रही हैं । वे टेम्पररी (Temporary) जवान दिखने के चक्कर में समय से पहिले ही परमानेन्ट (Permanent) बूढी होती जा रही हैं ।

नारी जितना वक्त तुम साज-सज्जा में खर्च करती हो या अन्य किसी रूप में सौन्दर्य बढाने के लिए खर्च करती हो, उतना ही वक्त यदि अपने पुत्र-बच्चों, बच्चियों को धनात्मक संस्कार बनाने में लगा देती तो निश्चित ही संसार में समस्त प्रकार का पर्यावरण स्वतः ही सामान्य हो जायेगा।

आज की नारियाँ?

कभी आइब्रो,

आज की नारियाँ?

कभी थ्रेडिंग,

आज की नारियाँ?

कभी ब्लीचिंग,

आज की नारियाँ?

कभी लेग ब्यूटी,

आज की नारियाँ?

कभी बॉडी वेक्सिंग,

आज की नारियाँ?

कभी फेशियल,

आज की नारियाँ?

कभी स्टेटनिंग,

आज की नारियाँ?

हेयर कलर,

आदि-आदि करके मातृत्व, सतीत्व, वात्सल्य की होली प्रतिदिन जलाकर पर्यावरण को बिगाडने में पूर्ण रूप से सहायक हैं ।

यह नारी-शक्ति अपना-अपना पिण्ड भी खराब कर रही हैं और ब्रह्माण्ड का पर्यावरण भी दूषित कर रही हैं ।

द्वारा – गुरुतत्व शिवोम् तीर्थ जी।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 6, 2011

वेदमाता गायत्री महिमा – 5—-

वेदमाता गायत्री महिमा – 5

गायत्री के २४ छन्द

ऋषियों की कार्य पद्धति छन्द हैं । मोटे रूप से इसे उनकी उपासना में प्रयुक्त होने वाले मंत्रों की उच्चारण विधि-स्वर संहिता कह सकते हैं । सामवेद में मंत्र विद्या के महत्त्वपूर्ण आधार उच्चारण विधान-स्वर संकेतों का विस्तारपूर्वक विधान, निर्धारण मिलता है । प्रत्येक वेद मंत्र के साथ उदात्त-अनुदात्त-स्वरित के स्वर संकेत लिखे मिलते हैं । यह जप एवं पाठ प्रक्रिया का सामान्य विधान हुआ । पर यह वर्णन भी बालबोध जैसा ही है । वस्तुतः छन्द उस साधना प्रक्रिया को कहते हैं, जिसमें प्रगति के लिए समग्र विधि-विधानों का समावेश हो ।

साधना की विधियाँ वैदिकी भी हैं और तांत्रिकी भी । व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुरूप उनके क्रम-उपक्रम में अन्तर भी पड़ता है । किस स्तर का व्यक्ति किस प्रयोजनों के लिए, किस स्थिति में क्या साधना करे, इसका एक स्वतंत्र शास्र है । इसका स्पष्ट र्निदेश ग्रंथ रूप में करा सकना कठिन है । इस प्रक्रिया का निर्धारण अनुभवी मार्गदर्शक की सूक्ष्म दृष्टि पर निर्भर है । रोगों के निदान और उनके उपचार का वर्णन चिकित्सा ग्रंथों में विस्तार पूर्वक मिल जाता है । इतने पर भी अनुभवी चिकित्सक द्वारा रोगी की विशेष स्थिति को देखते हुए उपचार का विशिष्ट निर्धारण करने की आवश्यकता बनी ही रहती है । यह चिकित्सक की स्वतंत्र सूझबूझ पर ही निर्भर है । इसके लिए कोई लक्ष्मण रेखा खिंच नहीं सकती, जिसके अनुसार चिकित्सक पर यह प्रतिबंध लगे कि वह अमुक स्थिति के रोगी का उपचार अमुक प्रकार करने के लिए प्रतिबंधित है ।

चिकित्सक की सूझ-बूझ को मौलिक कहा जा सकता है । ठीक इसी प्रकार छन्द को अनुभवी मार्ग दर्शक द्वारा किया गया इंगित कहा जा सकता है । साधना विधियों का वर्णन एक ही प्रक्रिया का अनेक प्रकार से हुआ है । उसमें से किस परिस्थिति में क्या उपयोग हो सकता है, इसकी बहुमुखी निर्धारण प्रज्ञा को ‘छन्द’ कह सकते हैं ।

समस्त गायत्री साधना का स्वतंत्र विधान है । यों स्थिति के अनुरूप उस विधान के भी भेद और उपभेद हैं, किन्तु २४ अक्षरों में सन्निहित किसी शक्ति विशेष की साधना करनी हो तो व्यक्ति के स्तर तथा प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए जो निर्धारण करना पड़े, उसका संकेत ‘छन्द’ रूप में किया गया है । अच्छा तो यह होता है कि पिंगलशास्र में जिस प्रकार छन्दों के स्वरूप का स्पष्ट निर्धारण कर दिया गया है, उसी प्रकार साधना की छन्द-प्रक्रिया का भ्ाी शास्र बना होता, भले ही उसका विस्तार कितना ही बड़ा क्यों न करना पड़ता, यदि ऐसा हो सका होता तो सरलता रहती, किन्तु इतने पर भी स्वतंत्र निर्धारण की आवश्यकता से छुटकारा नहीं ही मिलता ।

जो भी हो आज स्थिति यही है कि छन्द रूप में यह संकेत मौजूद हैं कि उपचार की दिशा-धारा क्या होनी चाहिए । यह सांकेतिक भाषा है । पारंगतों के लिए इस अंगुलि र्निदेश से भी काम चल सकता है और प्राचीन काल में चलता भी रहा है । पर आज की आवश्यकता यह है कि ‘गुरु परम्परा’ तक सीमित रहने वाली रहस्मयी विधि-व्यवस्था को अब सर्व सुलभ बनाया जाय । प्राचीनकाल में ऐसे प्रयोजन गोपनीय रखे जाते थे । आज भी अणु-विस्फोट जैसे प्रयोगों की विधियाँ गोपनीय ही रखी जा रही हैं । राजनैतिक रहस्यों के सम्बन्ध में भी अधिकारियों को गोपनीयता की शपथ लेनी पड़ती है । पर एक सीमा तक ही यह उचित है । ‘छन्द’ के सम्बन्ध में भी एक सीमा तक गोपनीयता बरती जा सकती है, फिर भी उसका उतना विस्तार तो होना ही चाहिए कि उसके लुप्त होने का खतरा न रहे ।
गायत्री मंत्र के हर अक्षर का एक स्वतंत्र छन्द स्वतंत्र साधना विधान है, जिसका संकेत-उल्लेख ‘गायत्री’ तंत्र में इस प्रकार मिलता है-

गायत्र्युष्णिगनुष्टुप च बृहती पंक्तिरेव च ।
त्रिष्टुभं जगती चैव तथाऽतिजगती मता॥
शक्वर्यतिशक्वरी च धृतिश्चातिधृतिस्तथा ।
विराट् प्रस्तारपंक्तिश्च कृतिः प्रकृतिराकृतिः॥
विकृतिः संकृतिश्चैवाक्षरपंक्तिस्तथैव च॥
र्भूभुवः स्वरिति छन्दस्तथा ज्योतिष्मती स्मृतम् ।
इत्येतानि च छन्दासि कीर्तितानि महामुने॥
अर्थात्-हे नारद! गायत्री के २४ अक्षरों में २४ छन्द सन्निहित हैं-
(१)गायत्री
(२) उष्णिक
(३) अनुष्टुप
(४) वृहती
(५) पंक्ति
(६) त्रिष्टुप
(७) जगती
(८) अतिजगती
(९) शक्वरी
(१०) अतिशक्वरी
(११) धृति
(१२) अतिधृति
(१३) विराट्
(१४) प्रस्तार पंक्ति
(१५) कृति
(१६) प्रकृति
(१७) आकृति
(१८) विकृति
(१९) संकृति
(२०) अक्षर पंक्ति
(२१) भूः
(२२) भुवः
(२३) स्वः
(२४) ज्योतिष्मती ।

संक्षेप में ऋषि गुण हैं, देवता प्रभाव, छन्द को विधाता कह सकते हैं ।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 6, 2011

माँ गायत्री – एक शोध / विचार–पंडित खींवराज शर्मा (जोधपुर) —-

गायत्री के समग्र विनियोग में सविता देवता, विश्वामित्र ऋषि एवं गायत्री छन्द का उल्लेख किया गया है, परन्तु उसके वर्गीकरण में प्रत्येक अक्षर एक स्वतंत्र शक्ति बन जाता है । हर अक्षर अपने आप में एक मंत्र है । ऐसी दशा में २४ देवता, २४ ऋषि एवं २४ छन्दों का उल्लेख होना भी आवश्यक है । तत्वदर्शियों ने वैसा किया भी है । गायत्री विज्ञान की गहराई में उतरने पर इन विभेदों का स्पष्टीकरण होता है । नारंगी ऊपर से एक दीखती है, पर छिलका उतारने पर उसके खण्ड घटक स्वतंत्र इकाइयों के रूप में भी दृष्टिगोचर होते हैं । गायत्री को नारंगी की उपमा दी जाय तो उसके अन्तराल में चौबीस अक्षरों के रूप में २४ खण्ड घटकों के दर्शन होते हैं । जो विनियोग एक समय गायत्री मंत्र का होता है, वैसा ही प्रत्येक अक्षर का भी आवश्यक होता है । चौबीस अक्षरों के लिए चौबीस विनियोग बनने पर उनके २४ देवता २४ ऋषि एवं २४ छन्द भी बन जाते हैं ।

ऋषियों और देवताओं का परस्पर समन्वय है । ऋषियों की साधना से विष्णु की तरह सुप्तावस्था में पड़ी रहने वाली देवसत्ता को जाग्रत होने का अवसर मिलता है । देवताओं के अनुग्रह से ऋषियों को उच्चस्तरीय वरदान मिलते हैं । वे सार्मथ्यवान् बनते हैं और स्व पर कल्याण की महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करते हैं ।

ऋषि सद्गुण हैं और देवता उनके प्रतिफल । ऋषि को जड़ और देवता को वृक्ष कहा जा सकता है । ऋषित्व और देवत्व के संयुक्त का परिणाम फल-सम्पदा के रूप में सामने आता है । ऋषि लाखों हुए हैं और देवता तो करोड़ों तक बताये जाते हैं । ऋषि पृथ्वी पर और देवता स्वर्ग में रहने वाले माने जाते हैं । स्थूल दृष्टि से दोनों के बीच ऐसा कोई तारतम्य नहीं है, जिससे उनकी संख्या समान ही रहे । उस असमंजस का निराकरण गायत्री के २४ अक्षरों से सम्बद्ध ऋषि एवं देवताओं से होता है । हर सद्गुण का विशिष्ट परिणाम होना समझ में आने योग्य बात है । यों प्रत्येक सद्गुण परिस्थिति के अनुसार अनेकानेक सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकता है, फिर भी यह मान कर ही चलना होगा कि प्रत्येक सत्प्रवृत्ति की अपनी विशिष्ट स्थिति होती है और उसी के अनुरूप अतिरिक्त प्रतिक्रिया भी होती है । ऋषि रूपी पुरुषार्थ से देवता रूपी वरदान संयुक्त रूप से जुड़े रहने की बात हर दृष्टि से समझी जाने योग्य है ।
मूर्धन्य ऋषियों की गणना २४ है । इसका उल्लेख गायत्री तंत्र में इस प्रकार मिलता है-

वामदेवोऽत्रिर्वसिष्ठः शुक्रः कण्वः पराशरः ।
विश्वामित्रो महातेजाः कपिलः शौनको महान्॥ १३॥
याज्ञवल्क्या भरद्वाजो जमदग्निस्तपोनिधिः ।
गौतमो मुद्गलश्चैव वेदव्यासश्च लोमशः॥ १४॥
अगस्त्यः कौशिको वत्सः पुलस्त्यो मांडुकस्तथा ।
दुर्वासास्तपसां श्रेष्ठो नारदः कश्यपस्तथा॥ १५॥
इत्येते ऋषयः प्रोक्ता वर्णानां क्रमशोमुने ।

अर्थात्-गायत्री के २४ अक्षरों के द्रष्टा २४ ऋषि यह है-
(१) वामदेव
(२) अत्रि
(३) वशिष्ठ
(४) शुक्र
(५) कण्व
(६) पाराशर
(७) विश्वामित्र
(८) कपिल
(९) शौनक
(१०) याज्ञवल्क्य
(११) भरद्वाज
(१२) जमदग्नि
(१३) गौतम
(१४) मुद्गल
(१५) वेदव्यास
(१६) लोमश
(१७) अगस्त्य
(१८) कौशिक
(१९) वत्स
(२०) पुलस्त्य
(२१) माण्डूक
(२२) दुर्वासा
(२३) नारद
(२४) कश्यप । – गायत्री तंत्र प्रथम पटल

इन २४ ऋषियों को सामान्य जन-जीवन में जिन सत्प्रवृत्तियों के रूप में जाना जा सकता है, वे यह हैं- (१) प्रज्ञा (२) सृजन (३) व्यवस्था (४) नियंत्रण (५) सद्ज्ञान (६) उदारता (७) आत्मीयता (८) आस्तिकता (९) श्रद्धा (१०) शुचिता (११) संतोष (१२) सहृदयता (१३) सत्य (१४) पराक्रम (१५) सरसता (१६) स्वावलम्बन (१७) साहस (१८) ऐक्य (१९) संयम (२०) सहकारिता (२१) श्रमशीलता (२२) सादगी (२३) शील (२४) समन्वय । प्रत्यक्ष ऋषि यही २४ हैं ।
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वेदमाता गायत्री महिमा – 4

ॐ र्भूभुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

आर्शग्रंथों मे गयत्रि मन्त्र
यह महामन्त्र वेदों में कई-कई बार आया है ।
ऋग्वेद में ६ ।६२ ।१०,
‍सामवेद में २ ।८ ।१२,
यर्जुवेद वा० सं० में ३ ।३५-२२ ।९ -३० । २-३६ ।३,
अथर्व वेद में १९ । ७१ ।१
में गायत्री की महिमा विस्तार पूर्वक गाई गई है ।

ब्राह्मण ग्रन्थों में गायत्री मन्त्र का उल्लेख अनेक स्थानोंपर है । यथा-
ऐतरेय ब्राह्मण ४ ।३२ ।२-५ ।५ ।६-१३ ।८, १९ ।८,
‍कौशीतकी ब्राह्मण २२ ।३-२६ ।१०,
गोपथ ब्राह्मण १ ।१ ।३४,
दैवत ब्राह्मण ३ ।२५,
शतपथ ब्राह्मण २ ।३ ।४ ।३९-२३ ।६ ।२ ।९-१४ ।९ ।३ ।११,
तैतरीय सं० १ ।५ ।६ ।४-४ ।१ ।१,
मैत्रायणी सं० ४ ।१० ।३-१४९ ।१४

आरण्यकों में गायत्री का उल्लेख इन स्थानों पर है-
तैत्तरीय आरण्यक १ ।१ ।२१० ।२७ ।१,
वृहदारण्यक ६ ।३ ।११ ।४ ।८,

उपनिषदों में इस महामन्त्र की चर्चा निम्न प्रकरणों में है-
नारायण उपनिषद् १५-२,
मैत्रेय उपनिषद् ६ ।७ ।३४,
जैमिनी उपनिषद् ४ । २८ ।१,
श्वेताश्वतर उपनिषद् ४ ।१८ ।

सूत्र ग्रंथों में गायत्री का विवेचन निम्न प्रसंगों में आया है-
आश्वालायन श्रोैत सूत्र ७ । ६ । ६-८ । १ । १८,
शांखायन श्रौत सूत्र २ । १० ।२-१२ ।७-५ ।५ ।२-१० ।६ ।१०-९ ।१६,
आपस्तम्भ श्रौत सूत्र ६ । १८ । १,
शांखायन गृह्य सूत्र २ । ५ ।१२,७ । १९,६ । ४ । ८,
कौशीतकी सूत्र ९१ । ६,
खगटा गृह्य सूत्र २ । ४ । २१,
आपस्तम्भ गृह्य सूत्र २ । ४ । २१,
बोधायन ध० शा० २ । १० । १७ । १४,
मान०ध०शा० २ ।७७,
ऋग्विधान १ । १२ । ५
मान० गृ० सू० १ । २ । ३-४ । ४ ।८-५ ।२ ।

गायत्री का शीर्ष भाग : ॐ र्भूभुवः स्वः
गायत्री, वैदिक संस्कृत का एक छन्द है जिसमें आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण-कुल २४ अक्षर होते हैं । गायत्री शब्द का अर्थ है- प्राण-रक्षक । गय कहते हैं प्राण को, त्री कहते हैं त्राण-संरक्षण करने वाली को । जिस शक्ति का आश्रय लेने पर प्राण का, प्रतिभा का, जीवन का संरक्षण होता है उसे गायत्री कहा जाता है । और भी कितने अर्थ शास्त्रकारों ने किये हैं । इन सब अर्थों पर विचार करने पर यह कहा जा सकता है कि यह छोटा-सा मन्त्र भारतीय संस्कृति, धर्म एवं तत्वज्ञान का बीज है । इसी के थोड़े से अक्षरों में सन्निहित प्रेरणाओं की व्याख्या स्वरूप चारों वेद बने ।
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वेदमाता गायत्री महिमा – 3

गायत्री मंत्र के २४ अक्षरों को २४ देवताओं का शक्ति – बीज मंत्र माना गया है । प्रत्येक अक्षर का एक देवता है । प्रकारान्तर से इस महामंत्र को २४ देवताओं का एवं संघ, समुच्चय या संयुक्त परिवार कह सकते हैं । इस परिवार के सदस्यों की गणना के विषय में शास्र बतलाते हैं-

गायत्री मंत्र का एक-एक अक्षर एक-एक देवता का प्रतिनिधित्व करता है । इन २४ अक्षरों की शब्द शृंखला में बँधे हुए २४ देवता माने गये हैं-
गायत्र्या वर्णमेककं साक्षात देवरूपकम् ।
तस्मात् उच्चारण तस्य त्राणयेव भविष्यति॥ -गायत्री संहिता
अर्थात्-गायत्री का एक-एक अक्षर साक्षात् देव स्वरूप है । इसलिए उसकी आराधना से उपासक का कल्याण ही होता है ।

दैवतानि शृणु प्राज्ञ तेषामेवानुपूर्वशः ।
आग्नेयं प्रथम प्रोक्तं प्राजापत्यं द्वितीयकम्॥
तृतीय च तथा सोम्यमीशानं च चतुर्थकम् ।
सावित्रं पञ्चमं प्रोक्तं षष्टमादित्यदैवतम्॥
वार्हस्पत्यं सप्तमं तु मैवावरुणमष्टमम् ।
नवम भगदैवत्यं दशमं चार्यमैश्वरम्॥
गणेशमेकादशकं त्वाष्ट्रं द्वादशकं स्मृतम् ।
पौष्णं त्रयोदशं प्रोक्तमैद्राग्नं च चतुर्दशम्॥
वायव्यं पंचदशकं वामदेव्यं च षोडशम् ।
मैत्रावरुण दैवत्यं प्रोक्तं सप्तदशाक्षरम्॥
अष्ठादशं वैश्वदेवमनविंशंतुमातृकम् ।
वैष्णवं विंशतितमं वसुदैवतमीरितम्॥
एकविंशतिसंख्याकं द्वाविंशं रुद्रदैवतम् ।
त्रयोविशं च कौवेरेगाश्विने तत्वसंख्यकम्॥
चतुर्विंशतिवर्णानां देवतानां च संग्रहः । -गायत्री तंत्र प्रथम पटल ।

अर्थात्-हे प्राज्ञ! अब गायत्री के २४ अक्षरों में विद्यमान २४ देवताओं के नाम सुनों-
(१) अग्नि
(२) प्रजापति
(३) चन्द्रमा
(४) ईशान
(५) सविता
(६) आदित्य
(७) बृहस्पति
(८) मित्रावरुण
(९) भग
(१०) अर्यमा
(११) गणेश
(१२) त्वष्टा
(१३) पूषा
(१४) इन्द्राग्नि
(१५) वायु
(१६) वामदेव
(१७) मैत्रावरूण
(१८) विश्वेदेवा
(१९) मातृक
(२०) विष्णु
(२१) वसुगण
(२२) रूद्रगण
(२३) कुबेर
(२४) अश्विनीकुमार ।
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गायत्री के चौबीस अक्षरों से संबंधित कलाएँ एवं मातृकाएँ इस प्रकार हैं-
(१) तापिनी
(२) सफला
(३) विश्वा
(४) तुष्टा
(५) वरदा
(६) रेवती
(७) सूक्ष्मा
(८) ज्ञाना
(९) भर्गा
(१०) गोमती
(११) दर्विका
(१२) थरा
(१३) सिंहिका
(१४) ध्येया
(१५) मर्यादा
(१६) स्फुरा
(१७) बुद्धि
(१८) योगमाया
(१९) योगात्तरा
(२०) धरित्री
(२१) प्रभवा
(२२) कुला
(२३) दृष्या
(२४) ब्राह्मी ।

२४ मातृकाएँ

(१) चन्द्रकेश्वरी
(२) अजतवला
(३) दुरितारि
(४) कालिका
(५) महाकाली
(६) श्यामा
(७) शान्ता
(८) ज्वाला
(९) तारिका
(१०) अशोका
(११) श्रीवत्सा
(१२) चण्डी
(१३) विजया
(१४) अंकुशा
(१५) पन्नगा
(१६) विर्वाक्षी
(१७) वेला
(१८) धारिणी
(१९) प्रिया
(२०) नरदत्ता
(२१) गन्धारी
(२२) अम्बिका
(२३) पद्मावती
(२४) सिद्धायिका ।

सामान्य दृष्टि से कलाएँ और मातृकाएँ अलग-अलग प्रतीत होती हैं, किन्तु तात्विक दृष्टि से देखने पर उन दोनों का अन्तर समाप्त हो जाता है । उन्हें श्रेष्ठता की सार्मथ्य कह सकते हैं और उनके नामों के अनुरूप उनके द्वारा उत्पन्न होने वाले सत्परिणामों का अनुमान लगा सकते हैं ।

गायत्री के २४ अक्षर २४ दिव्य प्रकाश स्तम्भ
गोपथ ब्राह्मण में गायत्री के २४ अक्षरों को २४ स्तम्भों का दिव्य तेज बताया गया है । समुद्र में जहाजों का मार्गदर्शन करने के लिए जहाँ-तहाँ प्रकाश स्तम्भ खड़े रहते हैं । उनमें जलने वाले प्रकाश को देखकर नाविक अपने जलपोत को सही रास्ते से ले जाते हैं और वे चट्टानों से टकराने एवं कीचड़ आदि में धँसने से बच जाते हैं । इसी प्रकार गायत्री के २४ अक्षर २४ प्रकाश स्तम्भ बनकर प्रजा की जीवन नौका को प्रगति एवं समृद्धि के मार्ग पर ठीक तरह चलते रहने की प्रेरणा करते हैं । आपत्तियों से बचाते हैं और अनिश्चितता को दूर करते हैं ।

गोपथ के अनुसार गायत्री चारों वेदों की प्राण, सार, रहस्य एवं तन है । साम संगीत का यह रथन्तर आत्मा के उल्लास को उद्देलित करता है । जो इस तेज को अपने में धारण करता है, उसकी वंश परम्परा तेजस्वी बनती चली जाती है । उसकी पारिवारिक संतति और अनुयायियों की शृंखला में एक से एक बढ़कर तेजस्वी, प्रतिभाशाली उत्पन्न होते चले जाते हैं । श्रुति कहती है-
तेजो वै गायत्री छन्दसां रथन्तरमं साम्नाम् तेजश्चतुर्विशस्ते माना तेज एवं तत्सम्यक् दधाति पुत्रस्थ पुत्रस्तेजस्वी भवति॥ -गोपथ
अर्थात्-गायत्री सब वेदों का तेज है । सामवेद का यह रथन्तर छन्द ही २४ स्तम्भों का यह दिव्य तेज है । इस तेज को धारण करने वाले की वंश परम्परा तेजस्वी होती है ।
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गायत्री मंत्र का तत्वज्ञान

समस्त विद्याओं की भण्डागार-गायत्री महाशक्ति
ॐ र्भूभुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
गायत्री संसार के समस्त ज्ञान-विज्ञान की आदि जननी है । वेदों को समस्त प्रकार की विद्याओं का भण्डार माना जाता है, वे वेद गायत्री की व्याख्या मात्र हैं । गायत्री को ‘वेदमाता’ कहा गया है । चारों वेद गायत्री के पुत्र हैं । ब्रह्माजी ने अपने एक-एक मुख से गायत्री के एक-एक चरण की व्याख्या करके चार वेदों को प्रकट किया ।

‘ॐ भूर्भवः स्वः’ से-ऋग्वेद,
‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ से-यर्जुवेद,
‘भर्गोदेवस्य धीमहि’ से-सामवेद और
‘धियो योनः प्रचोदयात्’ से अथर्ववेद की रचना हुई ।

इन वेदों से शास्त्र, दर्शन, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक, सूत्र, उपनिषद्, पुराण, स्मृति आदि का निर्माण हुआ । इन्हीं ग्रन्थों से शिल्प, वाणिज्य, शिक्षा, रसायन, वास्तु, संगीत आदि ८४ कलाओं का आविष्कार हुआ । इस प्रकार गायत्री, संसार के समस्त ज्ञान-विज्ञान की जननी ठहरती है । जिस प्रकार बीज के भीतर वृक्ष तथा वीर्य की एक बूंद के भीतर पूरा मनुष्य सन्निहित होता है, उसी प्रकार गायत्री के २४ अक्षरों में संसार का समस्त ज्ञान-विज्ञान भरा हुआ है । यह सब गायत्री का ही अर्थ विस्तार है ।

मंत्रों में शक्ति होती है । मंत्रों के अक्षर शक्ति बीज कहलाते हैं । उनका शब्द गुन्थन ऐसा होता है कि उनके विधिवत् उच्चारण एवं प्रयोग से अदृश्य आकाश मण्डल में शक्तिशाली विद्युत् तरंगें उत्पन्न होती हैं, और मनःशक्ति तरंगों द्वारा नाना प्रकार के आध्यात्मिक एवं सांसारिक प्रयोजन पूरे होते हैं । साधारणतः सभी विशिष्ट मंत्रों में यही बात होती है । उनके शब्दों में शक्ति तो होती है, पर उन शब्दों का कोई विशेष महत्वपूर्ण अर्थ नहीं होता । पर गायत्री मंत्र में यह बात नहीं है । इसके एक-एक अक्षर में अनेक प्रकार के ज्ञान-विज्ञानों के रहस्यमय तत्त्व छिपे हुए हैं । ‘तत्-सवितुः – वरेण्यं-’ आदि के स्थूल अर्थ तो सभी को मालूम है एवं पुस्तकों में छपे हुए हैं । यह अर्थ भी शिक्षाप्रद हैं । परन्तु इनके अतिरिक्त ६४ कलाओं, ६ शास्त्रों, ६ दर्शनों एवं ८४ विद्याओं के रहस्य प्रकाशित करने वाले अर्थ भी गायत्री के हैं । उन अर्थों का भेद कोई-कोई अधिकारी पुरुष ही जानते हैं । वे न तो छपे हुए हैं और न सबके लिये प्रकट हैं ।

इन २४ अक्षरों में आर्युवेद शास्त्र भरा हुआ है । ऐसी-ऐसी दिव्य औषधियों और रसायनों के बनाने की विधियाँ इन अक्षरों में संकेत रूप से मौजूद हैं जिनके द्वारा मनुष्य असाध्य रोगों से निवृत्त हो सकता है, अजर-अमर तक बन सकता है । इन २४ अक्षरों में सोना बनाने की विधा का संकेत है । इन अक्षरों में अनेकों प्रकार के आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, नारायणास्त्र, पाशुपतास्त्र, ब्रह्मास्त्र आदि हथियार बनाने के विधान मौजूद हैं । अनेक दिव्य शक्तियों पर अधिकार करने की विधियों के विज्ञान भरे हुए हैं । ऋद्धि-सिद्धियों को प्राप्त करने, लोक-लोकान्तरों के प्राणियों से सम्बन्ध स्थापित करने, ग्रहों की गतिविधि तथा प्रभाव को जानने, अतीत तथा भविष्य से परिचित होने, अदृश्य एवं अविज्ञात तत्त्वोंको हस्तामलकवत् देखने आदि अनेकों प्रकार के विज्ञान मौजूद हैं । जिकी थोड़ी सी भी जानकारी मनुष्य प्राप्त करले तो वह भूलोक में रहते हुए भी देवताओं के समान दिव्य शक्तियों से सुसम्पन्न बन सकता है । प्राचीन काल में ऐसी अनेक विद्याएँ हमारे पूर्वजों को मालूम थीं जो आज लुप्त प्रायः हो गई हैं । उन विद्याओं के कारण हम एक समय जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक एवं स्वर्ग-सम्पदाओं के स्वामी बने हुए थे । आज हम उनसे वञ्चित होकर दीन-हीन बने हुए हैं ।

‍आवश्यकता इस बात की है कि गायत्री महामन्त्र में सन्निहित उन लुप्तप्राय महाविद्याओं को खोज निकाला जाय, जो हमें फिर से स्वर्ग- सम्पदाओं का स्वामी बना सके । यह विषय सर्वसाधारण का नहीं है । हर एक का इस क्षेत्र में प्रवेश भी नहीं है । अधिकारी सत्पात्र ही इस क्षेत्र में कुछ अनुसंधान कर सकते हैं और उपलब्ध प्रतिफलों से जनसामान्य को लाभान्वित करा सकते हैं ।

गायत्री के दोनों ही प्रयोग हैं । वह योग भी है और तन्त्र भी । उससे आत्म-दर्शन और ब्रह्मप्राप्ति भी होती है तथा सांसारिक उपार्जन-संहार भी । गायत्री-योग दक्षिण मार्ग है- उस मार्ग से हमारे आत्म-कल्याण का उद्देश्य पूरा होता है ।

‍दक्षिण मार्ग का आधार यह है कि- विश्वव्यापी ईश्वरीय शक्तियों को आध्यात्मिक चुम्बकत्व से खींच कर अपने में धारण किया जाय, सतोगुण को बढ़ाया जाय और अन्तर्जगत् में अवस्थित पञ्चकोष, सप्त प्राण, चेतना चतुष्टय, षटचक्र एवं अनेक उपचक्रों, मातृकाओं, ग्रन्थियों, भ्रमरों, कमलों, उपत्यिकाओं को जागृत करके आनन्ददायिनी = अलौकिक शक्तियों का आविर्भाव किया जाय ।

गायत्री-तन्त्र वाम मार्ग है- उससे सांसारिक वस्तुएँ प्राप्त की जा सकती हैं और किसी का नाश भी किया जा सकता है । वाम मार्ग का आधार यह है कि-” दूसरे प्राणियों के शरीरों में निवास करने वाली शक्ति को इधर से उधर हस्तान्तरित करके एक जगह विशेष मात्रा में शक्ति संचित कर ली जाय और उस शक्ति का मनमाना उपयोग किया जाय ।”

तन्त्र का विषय गोपनीय है, इसलिए गायत्री तन्त्र के ग्रन्थों में ऐसी अनेकों साधनाएँ प्राप्त होती हैं, जिनमें धन, सन्तान, स्त्री, यश, आरोग्य, पदप्राप्ति, रोग-निवारण, शत्रु नाश, पाप-नाश, वशीकरण आदि लाभों का वर्णन है और संकेत रूप से उन साधनाओं का एक अंश बताया गया है । परन्तु यह भली प्रकार स्मरण रखना चाहिये कि इन संक्षिप्त संकेतों के पीछे एक भारी कर्मकाण्ड एवं विधिविधान है । वह पुस्तकों में नहीं वरन् अनुभवी साधना सम्पन्न व्यक्तियों से प्राप्त होता है, जिन्हें सद्गुरु कहते हैं ।

गायत्री की २४ शक्ति

गायत्री मंत्र में चौबीस अक्षर हैं । तत्त्वज्ञानियों ने इन अक्षरों में बीज रूप में विद्यमान उन शक्तियों को पहचाना जिन्हें चौबीस अवतार, चौबीस ऋषि, चौबीस शक्तियाँ तथा चौबीस सिद्धियाँ कहा जाता है । देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा राजर्षि इसी उपासना के सहारे उच्च पदासीन हुए हैं । ‘अणोरणीयान महतो महीयान’ यही महाशक्ति है । छोटे से छोटा चौबीस अक्षर का कलेवर, उसमें ज्ञान और विज्ञान का सम्पूर्ण भाण्डागार भरा हुआ है । सृष्टि में ऐसा कुछ भी नहीं, जो गायत्री में न हो । उसकी उच्चस्तरीय साधनाएँ कठिन और विशिष्ट भी हैं, पर साथ ही सरल भी इतनी है कि उन्हें हर स्थिति में बड़ी सरलता और सुविधाओं के साथ सम्पन्न कर सकता है । इसी से उसे सार्वजनीन और सार्वभौम माना गया । नर-नारी, बाल-वृद्ध बिना किसी जाति व सम्प्रदाय भेद के उसकी आराधना प्रसन्नता पूर्वक कर सकते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुरूप लाभ उठा सकते हैं ।

‘गायत्री संहिता’ में गायत्री के २४ अक्षरों की शाब्दिक संरचना रहस्ययुक्त बतायी गयी है और उन्हें ढूँढ़ निकालने के लिए विज्ञजनों को प्रोत्साहित किया गया है । शब्दार्थ की दृष्टि से गायत्री की भाव-प्रक्रिया में कोई रहस्य नहीं है । सद्बुद्धि की प्रार्थना उसका प्रकट भावार्थ एवं प्रयोजन है । यह सीधी-सादी सी बात है जो अन्यान्य वेदमंत्रों तथा आप्त वचनों में अनेकानेक स्थानों पर व्यक्त हुई है । अक्षरों का रहस्य इतना ही है कि साधक को सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिए पे्रेरित करते हैं । इस प्रेरणा को जो जितना ग्रहण कर लेता है वह उसी अनुपात से सिद्ध पुरुष बन जाता है । कहा गया है-
चतुविंशतिवर्णेर्या गायत्री गुम्फिता श्रुतौ ।
रहस्ययुक्तं तत्रापि दिव्यै रहस्यवादिभिः॥ गायत्री संहिता -८५
अर्थात्-वेदों में जो गायत्री चौबीस अक्षरों में गूँथी हुई है, विद्वान् लोग इन चौबीस अक्षरों के गूँथने में बड़े-बड़े रहस्यों को छिपा बतलाते हैं ।

गायत्री की २४ शक्तियों की उपासना करने के लिए शारदा तिलकतंत्र का मार्गदर्शन इस प्रकार है ।
ततः षडङ्गान्यभ्र्यचेत्केसरेषु यथाविधि ।
प्रह्लादिनी प्रभां पश्चान्नित्यां विश्वम्भरां पुनः॥
विलासिनी प्रभवत्यौ जयां शांतिं यजेत्पुनः ।
कान्तिं दुर्गा सरस्वत्यौ विश्वरूपां ततः परम्॥
विशालसंज्ञितामीशां व्यापिनीं विमलां यजेत् ।
तमोऽपहारिणींसूक्ष्मां विश्वयोनिं जयावहाम्॥
पद्मालयां परांशोभां पद्मरूपां ततोऽर्चयेत् ।
ब्राह्माद्याः सारुणा बाह्यं पूजयेत् प्रोक्तलक्षणाः॥ -शारदा० २१ ।२३ से २६
अर्थात्-पूजन उपचारों से षडंग पूजन के बाद प्रह्लादिनी, प्रभा, नित्या तथा विश्वम्भरा का यजन (पूजन) करें । पुनः विलासिनी, प्रभावती, जया और शान्ति का अर्चन करना चाहिए । इसके बाद कान्ति, दुर्गा, सरस्वती और विश्वरूपा का पूजन करें । पुनः विशाल संज्ञा वाली-ईशा (विशालेशा), ‘व्यापिनी’ और ‘विमला’ का यजन करना चाहिए । इसके अनन्तर ‘तमो’, ‘पहारिणी’, ‘सूक्ष्मा’, ‘विश्वयोनि’, ‘जयावहा’, ‘पद्मालया’, ‘पराशोभा’ तथा पद्मरूपा आदि का यजन करें । ‘ब्राह्मी’ ‘सारुणा’ का बाद में पूजन करना चाहिए ।

आज के मुहूर्त और राशिफल—07 अप्रेल ,2011====

7 अप्रैल 2011: गुरुवार, 4:08 * तक Sukla चतुर्थी, *
00:43 Krittika तक, जब तक 12:07 योग प्रीति, जब तक 15:23 करण Vanija, 4:08 * तक Vishti करण,
RahuK: * 13:40-15:10 *, GulikaK: * 9:10-10:40 *, YamaG: 6:10 * – 7:40 *,
18:38 पर सूर्योदय पर 6:08 सूर्यास्त, *,
8:10 पर Moonrise, 22:09 पर Moonset,) दिन चंद्रमा में Vrish (पूरी )
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April 7, 2011:Thursday,
Sukla Chaturthi till 4:08*, Krittika till 0:43*,
Priti yoga till 12:07, Vanija karana till 15:23, Vishti karana till 4:08*,
RahuK: 13:40* – 15:10*, GulikaK: 9:10* – 10:40*, YamaG: 6:10* – 7:40*,
Sunrise at 6:08*, Sunset at 18:38, Moonrise at 8:10, Moonset at 22:09, Moon in Vrish (whole day)
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दैनिक राशिफल—-

राशि फलादेश मेष—-
नए कार्यों से लाभ का मार्ग प्रशस्त होगा। साझेदारी की समस्या का निराकरण होगा। महत्वपूर्ण कार्यों को ध्यान रखकर कार्य करें। अपने काम में सक्रिय होना आवश्यक है।

राशि फलादेश वृष—-
नए अवसर चूकने से निराशा होगी। चलते हुए कार्यों में अवरोध उत्पन्न होंगे। परिवारजनों से सामंजस्य बनाए रखें। अधिक विश्वास किसी पर नहीं करें। धन का अपव्यय होगा।

राशि फलादेश मिथुन—-
कार्यस्थल पर अपने काम से काम रखें। यात्रा, प्रवास में लाभ मिलने की संभावना बनती है। मान-प्रतिष्ठा बढ़ेगी। आलस्य न करें।

राशि फलादेश कर्क—-
व्यापार में नए प्रस्ताव मिलेंगे। धन समृद्धि के संकेत। आर्थिक प्रयासों में सफलता के योग। यात्रा में लाभ मिलने की संभावना बनती है।

राशि फलादेश सिंह—-
परिवार के सदस्यों की मदद रहेगी। आपकी बुद्धिमानी से सम्मान मिलेगा। व्यापार में उन्नति होगी। रुका पैसा अचानक ही प्राप्त होगा। वाहन सावधानी से चलाएँ।

राशि फलादेश कन्या—–
धर्म-स्वाध्याय में रुचि बढ़ेगी। मन में उल्लास रहेगा। जोश से कार्य करने से व्यापार को नई गति प्रदान होगी।। सामाजिक कामों में रुचि बढ़ेगी।

राशि फलादेश तुला—-
अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण रखें। ख समृद्धि बढ़ने से अनेक रुके कार्य पूर्ण होंगे। लाभ के महत्वपूर्ण अवसर प्राप्त होने के योग हैं। परिवार की समस्याओं को अनदेखा न करें।

राशि फलादेश वृश्चिक—-
व्यावहारिकता से कार्य करें। सफलता मिलेगी। नौकरीपेशा व्यक्तियों को नौकरी में पदोन्नति मिलेगी। कई दिन के रुके काम पूरे होने के योग हैं।

राशि फलादेश धनु—-
शत्रु हानि पहुँचाने का प्रयास करेंगे। व्यय करने की प्रवृत्ति आर्थिक कष्ट प्रदान करेगी। व्यापार-व्यवसाय की स्थिति में सुधार होगा। परिवारजनों से मतभेद हो सकता है।

राशि फलादेश मकर—-
व्यापार अच्छा चलेगा। व्यर्थ के दिखावे से दूर रहें। नौकरीपेशा व्यक्ति कार्य में लापरवाही न रखें। नुकसान की आशंका है। व्यापारिक समस्याएँ रहेंगी।

राशि फलादेश कुंभ—-
परिवार में सुख-शांति होगी। मानसिक द्वंद्व रहेगा। आर्थिक स्थिति संपन्न रहेगी। शासकीय कार्यों में विघ्न आ सकते हैं। व्यापार मध्यम रहेगा।

राशि फलादेश मीन—-
घर-परिवार में आर्थिक स्थिति अच्छी रहेगी। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। अपने प्रयासों से प्रगति की ओर अग्रसर होंगे। कानूनी मामले आपके पक्ष में हल होंगे।

जानिए क्या हैं हिंदू पंचांग? हिंदू पंचांग की तीन धाराएँ—–

आकाश में तारामंडल के विभिन्न रूपों में दिखाई देने वाले आकार को नक्षत्र कहते हैं। मूलतः नक्षत्र 27 माने गए हैं।

हिंदू पंचांग की उत्पत्ति वैदिक काल में ही हो चुकी थी। सूर्य को जगत की आत्मा मानकर उक्त काल में सूर्य व नक्षत्र सिद्धांत पर आधारित पंचांग होता था। वैदिक काल के पश्चात आर्यभट, वराहमिहिर, भास्कर आदि जैसे खगोलशास्त्रियों ने पंचांग को विकसित कर उसमें चंद्र की कलाओं का भी वर्णन किया।

वेदों और अन्य ग्रंथों में सूर्य, चंद्र, पृथ्वी और नक्षत्र सभी की स्थिति, दूरी और गति का वर्णन किया गया है। स्थिति, दूरी और गति के मान से ही पृथ्वी पर होने वाले दिन-रात और अन्य संधिकाल को विभाजित कर एक पूर्ण सटीक पंचांग बनाया गया है। जानते हैं हिंदू पंचांग की अवधारणा क्या है। पंचांग काल दिन को नामांकित करने की एक प्रणाली है। पंचांग के चक्र को खगोलकीय तत्वों से जोड़ा जाता है। बारह मास का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है।

पंचांग की परिभाषा : पंचांग नाम पाँच प्रमुख भागों से बने होने के कारण है, यह है- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण।

इसकी गणना के आधार पर हिंदू पंचांग की तीन धाराएँ हैं- पहली चंद्र आधारित, दूसरी नक्षत्र आधारित और तीसरी सूर्य आधारित कैलेंडर पद्धति। भिन्न-भिन्न रूप में यह पूरे भारत में माना जाता है। एक साल में 12 महीने होते हैं। प्रत्येक महीने में 15 दिन के दो पक्ष होते हैं- शुक्ल और कृष्ण। प्रत्येक साल में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में 27 नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं।

तिथि : एक दिन को तिथि कहा गया है जो पंचांग के आधार पर उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे तक की होती है। चंद्र मास में 30 तिथियाँ होती हैं, जो दो पक्षों में बँटी हैं। शुक्ल पक्ष में 1-14 और फिर पूर्णिमा आती है। पूर्णिमा सहित कुल मिलाकर पंद्रह तिथि। कृष्ण पक्ष में 1-14 और फिर अमावस्या आती है। अमावस्या सहित पंद्रह तिथि।

तिथियों के नाम निम्न हैं- पूर्णिमा (पूरनमासी), प्रतिपदा (पड़वा), द्वितीया (दूज), तृतीया (तीज), चतुर्थी (चौथ), पंचमी (पंचमी), षष्ठी (छठ), सप्तमी (सातम), अष्टमी (आठम), नवमी (नौमी), दशमी (दसम), एकादशी (ग्यारस), द्वादशी (बारस), त्रयोदशी (तेरस), चतुर्दशी (चौदस) और अमावस्या (अमावस)।

वार : एक सप्ताह में सात दिन होते हैं:- रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार।

नक्षत्र : आकाश में तारामंडल के विभिन्न रूपों में दिखाई देने वाले आकार को नक्षत्र कहते हैं। मूलतः नक्षत्र 27 माने गए हैं। ज्योतिषियों द्वारा एक अन्य अभिजित नक्षत्र भी माना जाता है। चंद्रमा उक्त सत्ताईस नक्षत्रों में भ्रमण करता है। नक्षत्रों के नाम नीचे चंद्रमास में दिए गए हैं-

योग : योग 27 प्रकार के होते हैं। सूर्य-चंद्र की विशेष दूरियों की स्थितियों को योग कहते हैं। दूरियों के आधार पर बनने वाले 27 योगों के नाम क्रमशः इस प्रकार हैं:- विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यतिपात, वरीयान, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इंद्र और वैधृति।

पक्ष को भी जानें : प्रत्येक महीने में तीस दिन होते हैं। तीस दिनों को चंद्रमा की कलाओं के घटने और बढ़ने के आधार पर दो पक्षों यानि शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में विभाजित किया गया है। एक पक्ष में लगभग पंद्रह दिन या दो सप्ताह होते हैं। एक सप्ताह में सात दिन होते हैं। शुक्ल पक्ष में चंद्र की कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्ण पक्ष में घटती हैं।

भारतीय संस्कृ्ति का महान प्रतीक चिन्ह—–स्वस्तिक(a symbol of life and preservation )—

स्वस्तिक —- स्वस्तिक शब्द मूलभूत सु+अस धातु से बना हुआ है। सु का अर्थ है अच्छा, कल्याणकारी, मंगलमय और अस का अर्थ है अस्तित्व, सत्ता अर्थात कल्याण की सत्ता और उसका प्रतीक है स्वस्तिक। किसी भी मंगलकार्य के प्रारम्भ में स्वस्तिमंत्र बोलकर कार्य की शुभ शुरूआत की जाती है–

” स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदा:। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।। “

महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करो, विश्व के ज्ञानस्वरूप पूषादेव हमारा कल्याण करो। जिसका हथियार अटूट है ऐसे गरूड़ भगवान हमारा मंगल करो। बृहस्पति हमारा मंगल करो। यह आकृति हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व निर्मित की है। एकमेव और अद्वितीय ब्रह्म विश्वरूप में फैला, यह बात स्वस्तिक की खड़ी और आड़ी रेखा स्पष्ट रूप से समझाती हैं। स्वस्तिक की खड़ी रेखा ज्योतिर्लिंग का सूचन करती है और आड़ी रेखा विश्व का विस्तार बताती है। स्वस्तिक की चार भुजाएँ यानि भगवान विष्णु के चार हाथ। भगवान श्रीविष्णु अपने चारों हाथों से दिशाओं का पालन करते हैं।

स्वस्तिक अपना प्राचीन धर्मप्रतीक है। देवताओं की शक्ति और मनुष्य की मंगलमय कामनाएँ इन दोनों के संयुक्त सामर्थ्य का प्रतीक यानि स्वस्तिक। स्वस्तिक यह सर्वांगी मंगलमय भावना का प्रतीक है। हिन्दू धर्म जितना विशाल और गहन है,उसकी मान्यताएं और प्रक्रियाएं भी उतनी ही विशद और विस्तृ्त हैं । आज हम देखते हैं कि जागरूकता की अधिकता के चलते बहुत से व्यक्ति विशेष रूप से पश्चिमी सभ्यता से अति प्रभावित लोग, अपने धर्म से संबंधित मान्यताओं,रीति-रिवाजों एवं कर्मकांडों पर शंका व्यक्त करने लगे हैं ।बहुत ही बातों को बिना जाने-समझे सिर्फ उन्हे ढकोसला एवं अनावश्यक समझने लगे हैं । जब कि यदि वे इन सब चीजों,प्रक्रियाओं के बारें में गहराई से मनन करें तो पाएंगें कि हिन्दू धर्म विश्व का एकमात्र ऎसा धर्म है जो कि अपने प्रत्येक कर्म,संस्कार और परम्परा में पूर्णत: वैज्ञानिकता समेटे हुए है ।

प्राचीन काल में शिक्षा पद्धति ऎसी थी कि बालकों को प्रारंभ से ही धर्म के बारे में विस्तृ्त जानकारी दी जाती थी,जिससे कि उनकी आस्था स्वधर्म और परम्पराओं के प्रति बनी रहे……..ओर वो उनका पालन सिर्फ एक दिखावे के लिए नहीं अपितु आन्तरिक श्रद्धा भाव से करें । किन्तु आज स्थिति ऎसी नहीं है । आज न तो हमारी शिक्षा प्रणाली ऎसी है कि बच्चों को इस प्रकार की शिक्षा दी सके और न ही ऎसे विद्वान आचार्य ही दिखाई पडते हैं जो कि धर्म के क्षेत्र में समाज को एक सही मार्ग दिखा सकें । जैसे कि ये तो सर्वविदित है कि प्रत्येक कार्य के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य छिपा होता है,क्यों कि कार्य हमेशा कारण से ही उपजता है । यदि एक स्त्रोत है तो दूसरा उसकी परिणति है । हिन्दू धर्म के अनुष्ठानों,परम्पराओं,मान्यताओं,सिद्धान्तों इत्यादि के मूल में भी सटीक वैज्ञानिक कारण निहित हैं । इन्ही में से कुछ कारणों को यहाँ उदघाटित करना हमारे इस ब्लाग का उदेश्य रहा है ।

आज बात करते हैं—भारतीय संस्कृ्ति में आदिकाल से प्रयोग किए जा रहे प्रतीक चिन्ह स्वस्तिक की———

स्वस्तिक चिन्ह:– भारतीय संस्कृ्ति में वैदिक काल से ही स्वस्तिक को विशेष महत्व प्रदान किया गया है । यूँ तो बहुत से लोग इसे हिन्दू धर्म का एक प्रतीक चिन्ह ही मानते हैं । किन्तु वे लोग ये नहीं जानते कि इसके पीछे कितना गहरा अर्थ छिपा हुआ है । सामान्यतय: स्वस्तिक शब्द को “सु” एवं “अस्ति” का मिश्रण योग माना जाता है । यहाँ “सु” का अर्थ है— शुभ और “अस्ति” का— होना । संस्कृ्त व्याकरण अनुसार “सु” एवं “अस्ति” को जब संयुक्त किया जाता है तो जो नया शब्द बनता है–वो है “स्वस्ति” अर्थात “शुभ हो”, “कल्याण हो” । मानक दर्शन अनुसार स्वस्तिक दक्षिणोन्मुख दाहिने हाथ की दिशा (घडी की सूई चलने की दिशा) का संकेत तथा वामोन्मुख बाईं दिशा (उसके विपरीत) के प्रतीक हैं । दोनों दिशाओं के संकेत स्वरूप दो प्रकार के स्वस्तिक स्त्री एवं पुरूष के प्रतीक के रूप मे भी मान्य हैं । किन्तु जहाँ दाईं ओर मुडी भुजा वाला स्वस्तिक शुभ एवं सौभाग्यवर्द्धक हैं ,वहीं उल्टा (वामावर्त) स्वस्तिक को अमांगलिक,हानिकारक माना गया है । प्राचीन काल में राजा महाराज द्वारा किलों का निर्माण स्वस्तिक के आकार में किया जाता रहा है ताकि किले की सुरक्षा अभेद्य बनी रहे। प्राचीन पारम्परिक तरीके से निर्मित किलों में शत्रु द्वारा एक द्वार पर ही सफलता अर्जित करने के पश्चात सेना द्वारा किले में प्रवेश कर उसके अधिकाँश भाग अथवा सम्पूर्ण किले पर अधिकार करने के बाद नर संहार होता रहा है । परन्तु स्वस्तिक नुमा द्वारों के निर्माण के कारण शत्रु सेना को एक द्वार पर यदि सफलता मिल भी जाती थी तो बाकी के तीनों द्वार सुरक्षित रहते थे । ऎसी मजबूत एवं दूरगामी व्यवस्थाओं के कारण शत्रु के लिए किले के सभी भागों को एक साथ जीतना संभव नहीं होता था । यहाँ स्वस्तिक किला/दुर्ग निर्माण के परिपेक्ष्य में “सु वास्तु” था ।

स्वस्तिक का महत्व सभी धर्मों में बताया गया है। इसे विभिन्न देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। चार हजार साल पहले सिंधु घाटी की सभ्यताओं में भी स्वस्तिक के निशान मिलते हैं। बौद्ध धर्म में स्वस्तिक का आकार गौतम बुद्ध के हृदय स्थल पर दिखाया गया है। मध्य एशिया के देशों में स्वस्तिक चिन्ह मांगलिक एवं सौभाग्य सूचक माना जाता रहा है। नेपाल में हेरंब, मिस्र में एक्टोन तथा बर्मा में महा पियेन्ने के नाम से पूजित हैं। आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड के मावरी आदिवासियों द्वारा आदिकाल से स्वस्तिक को मंगल प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा हैं। यदि आधुनिक दृ्ष्टिकोण से देखा जाए तो अब तो विज्ञान भी स्वस्तिक, इत्यादि माँगलिक चिन्हों की महता स्वीकार करने लगा है ।

आधुनिक विज्ञान ने वातावरण तथा किसी भी जीवित वस्तु,पदार्थ इत्यादि के उर्जा को मापने के लिए विभिन्न उपकरणों का आविष्कार किया है ओर इस उर्जा मापने की इकाई को नाम दिया है—”बोविस” । मृत मानव शरीर का बोविस शून्य माना गया है और मानव में औसत ऊर्जा क्षेत्र 6,500 बोविस पाया गया है। स्वस्तिक में इस उर्जा का स्तर 1,00,0000 बोविस है। यदि इसे उल्टा बना दिया जाए तो यह प्रतिकूल ऊर्जा को इसी अनुपात में बढ़ाता है। इसी स्वस्तिक को थोड़ा टेड़ा बना देने पर इसकी ऊर्जा मात्र 1,000 बोविस रह जाती है। इसके साथ ही विभिन्न धार्मिक स्थलों यथा मन्दिर,गुरूद्वारा इत्यादि का ऊर्जा स्तर काफी उंचा मापा गया है जिसके चलते वहां जाने वालों को शांति का अनुभव और अपनी समस्याओं,कष्टों से मुक्ति हेतु मन में नवीन आशा का संचार होता है। यही नहीं हमारे घरों,मन्दिरों,पूजा पाठ इत्यादि में प्रयोग किए जाने वाले अन्य मांगलिक चिन्हों यथा ॐ इत्यादि में भी इसी तरह की ऊर्जा समाई है। जिसका लाभ हमें जाने अनजाने में मिलता ही रहता हैं। स्वस्तिक का शक्तिवर्धक प्रभाव इतना प्रगाढ़ है।

अपनी भारतीय संस्कृति की परम्परा के अनुसार विवाह-प्रसंगों, नवजात शिशु की छठ्ठी के दिन, दीपावली के दिन, पुस्तक-पूजन में, घर के प्रवेश-द्वार पर, मंदिरों के प्रवेशद्बार पर तथा अच्छे शुभ प्रसंगों में स्वस्तिक का चिह्न कुमकुस से बनाया जाता है एवं भावपूर्वक ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि हे प्रभु! मेरा कार्य निर्विघ्न सफल हो और हमारे घर में जो अन्न, वस्त्र, वैभव आदि आयें वह पवित्र बनें।

ज्योतिषी कोई भगवान तो नहीं कि आपके भाग्य को बदल डाले …

आज सबसे पहले तो मैं अपने सभी पाठकों से एक बात कहना चाहूँगा कि इस ब्लाग को आरम्भ करने के पीछे मेरा सिर्फ एक ही उदेश्य रहा है…वो ये कि इसके माध्यम से ज्योतिष एवं संबंधित पराविद्याओं के वास्तविक स्वरूप को आमजन तक पहुँचाना तथा तथाकथित पढे लिखे बुद्धिजीवी वर्ग की इन विषयों के प्रति अविश्वास एवं उपेक्षापूर्ण दृ्ष्टिकोण में बदलाव लाना । अपने आरम्भिक काल से ही मेरी ये मान्यता है कि जिस विषय की जानकारी जितने कम लोगों को होती है, उस विषय के प्रति अविश्वास तथा भ्रान्तियाँ भी उतनी ही अधिक देखने को मिलती है । इस ब्लाग के माध्यम से विगत एक वर्ष के दौरान ज्योतिष, मंत्र, संस्कृ्ति एवं अन्य पराविद्याओं के वास्तविक स्वरूप को अत्यन्त सरल और सटीक शब्दों में पाठकों के समक्ष रखा है ओर ये मेरा भरपूर प्रयास रहा है कि इन विषयों की पृ्ष्ठभूमी न रखने वाला व्यक्ति भी इन के बारे में आसानी से समझ सके । नित्य प्रति आप लोगों की तरफ से आने वाले ईमेल तथा फोन इत्यादि से विदित होता है कि मैं अपने इस प्रयास में कुछ हद तक सफल भी हुआ हूँ । ज्योतिष के प्रति लोगों में सकारात्मक दृ्ष्टिकोण का विकास हुआ है। आशा करता हूँ कि अपने इस प्रयास में अब तक जो सहयोग आप लोगों की ओर से मिलता रहा है, वैसा ही भविष्य में भी यूँ ही मिलता रहेगा ।

जब आप बीमारी बता रहे हो तो उसकी दवा भी तो बताईये न—-ऎसा तो डाक्टर भी किसी काम का नहीं जो सिर्फ बीमारी तो बता दे लेकिन उस बीमारी की दवा न दे “। उनकी बात सुनकर पहले तो मुझे हँसी भी आई लेकिन खैर जब मैने उसके बाद उनकी जन्मकुंडली देखी तो पाया कि विदेश में जाकर निवास करने का उनके भाग्य में किसी भी प्रकार का कोई योग नहीं है ओर वो इस विषय में चाहे लाख प्रयत्न कर लें किन्तु अन्त समय तक सफल नहीं हो सकते । जब उन्हे मैने ये बात स्पष्ट रूप से बता दी तो उनका फिर से वही सवाल था कि कुछ तो ऎसा उपाय बताईये, जिससे कि मेरी विदेश में सैटिंग हो जाए !

तो यहाँ मैं अपने पाठकों से भी वही बात कहना चाहूँगा जो कि मैने उनसे कही है। वो ये कि व्यक्तिगत भविष्यकथन तथा राशीगत भविष्यफल में जमीन आसमान की भिन्नता होती है । किसी भी राशी के अनुसार जो भविष्यफल बताया जाता है वो तात्कालीक ग्रह गोचर भ्रमण के अनुसार होता है । जब कि आपकी जन्मकुंडली जो कि आपके जन्मकालीन ग्रहों पर आधारित होती हैं, वास्तव में वो ही आपके समस्त जीवन का सार है । आप अपने पूर्वार्जित कर्मों के अनुसार जन्म के साथ ही जो कुछ भी हानि-लाभ,सुख-दुख, कर्म-अकर्म, भाग्य-दुर्भाग्य इत्यादि के रूप में अपने साथ संग्रहित कर के लाते हो—उसे जानने का एकमात्र माध्यम सिर्फ आपकी जन्मकुंडली ही है । उसी के आधार पर आपको अपने भावी जीवन में फल की प्राति होती है ।

अब बात की जाए किसी समस्या के निवारणार्थ किए जाने उपाय की तो—उपाय हमेशा जन्मकुंडली के अनुसार ही फलीभूत होते हैं ओर सबसे बडी बात ये कि उपाय का अर्थ ये नहीं कि उसके जरिए आप किसी भी समस्या से मुक्त हो सकेंगें या कि अपनी इच्छापूर्ती कर सकते हैं । उपाय का अर्थ सिर्फ इतना है कि जो कुछ भी आपके भाग्य में है, किन्तु प्रयास करने पर भी वो आपको मिल नहीं पा रहा है । तो उपाय उसकी प्राप्ति में आपके लिए एक सहायक, मददगार सिद्ध हो सकता है । लेकिन यदि कोई वस्तु आपके भाग्य में लिखी ही नहीं गई है तो उसमें उपाय क्या कर सकता है? आप चाहे दिन रात उपाय करते रहें—–जब भाग्य में है ही नहीं तो उसमे उपाय क्या करेगा । अगर एक झोपडी में रहने वाला इन्सान कहे कि पंडित जी ! मैं बंगले में रहने का सुख लेना चाहता हूँ तो आप मुझे कोई ऎसा उपाय बता दीजिए कि मेरी ये इच्छा पूरी हो जाए——तो भई ज्योतिषी भी एक इन्सान ही है, कोई जादूगर नहीं कि हाथ घुमाया ओर चीज प्रकट हो गई । या कि वो कोई भगवान है जो कि आपके भाग्य को बदल देगा ।

ज्योतिष विद्या का कार्य इतना है कि इसके जरिए आप अपने भाग्य की सीमा का आँकलन कर सकते हैं, ताकि आप उसके जरिए अपने भावी जीवन के लक्ष्य निर्धारित कर सकें ओर उन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु सही मार्ग का चुनाव कर सकें–ओर उपाय का अर्थ ये है कि यदि हमारे वर्तमान/ संचित कर्मों के कारण उस मार्ग में किसी प्रकार की कोई विध्न बाधा उत्पन होती है तो उसके जरिए हम उन बाधाओं से मुक्ति पा सकें—- न कि अपने भाग्य में बदलाव का किसी प्रकार का भ्रम पालने लगें ।

क्या जन्मकुंडली देखकर बताया जा सकता है कि ये जन्मकुंडली स्त्री/पुरूष/पशु/पक्षी आदि किस की है ?—

अक्सर जब भी कोई पाठक मुझसे ज्योतिष अथवा सनातन धर्म के विषय में कोई प्रश्न करता है तो मेरा ये भरकस प्रयास रहता है कि तुरन्त ही उसके सवाल का उत्तर उसे मिल सके। प्रश्न यदि व्यक्तिगत हो तो प्राथमिकता के आधार पर उनका जवाब पहले देने का प्रयास करता हूँ। किन्तु यदि प्रश्न निजि न होकर सामाजिक हो तो यदा कदा समयाभाव के कारण उनके उत्तर देने में देरी हो ही जाती है। आज कुछ ऎसे ही प्रश्नों को लेकर ये पोस्ट लिख रहा हूँ,जो कि ईमेल अथवा टिप्पणी के माध्यम से विभिन्न पाठकों के द्वारा पूछे गये थे किन्तु अभी तक उन्हे व्यक्तिगत रूप से जवाब प्रेषित नहीं कर पाया हूँ। यहाँ इस पोस्ट के जरिये सिर्फ ये सोचकर उन सवालों के जवाब देने का प्रयास कर रहा हूँ कि हो सकता है कि कुछ लोग ऎसे भी हों,जिनके मन में भी ऎसा ही कोई प्रश्न कौंध रहा हो और मेरा जवाब उनके जिज्ञासा भाव का शमन करने और साथ ही कुछ नया जानने,समझने में सहायक हो सकें। किन्तु गोपनीयता बनाए रखने हेतु यहाँ प्रश्नकर्ता के नाम का उल्लेख नहीं किया जा रहा।

सवाल:- भारतीय ज्योतिष में सूर्योदय से ही वार का प्रारम्भ माना जाता है । पश्चिमी मतानुसार् अर्धरात्री (12 बजे से) आगामी वार की प्रवृ्ति मानी जाती है । कौन सा मत ठीक है ?

ये तो सर्वविदित है कि सूर्य जिस काल अवधि में दिखाई देता है उसे “दिन” और जिस अवधि में वह अदृ्श्य रहता है,उसे रात्रि कहा जाता है । दिन और रात की ये मूल परिभाषा तो समस्त संसार में एक जैसी ही है । तदनुसार भारतीय ज्योतिष शास्त्रीय वार प्रणाली का सिद्धान्त बिल्कुल सही है । वैसे तो पश्चिमी एवं अन्य देशों के लोग भी मूलत: इसी परिभाषा के अनुयायी हैं,लेकिन तीव्रगति के इस आधुनिक युग में अलग अलग देशों में वार प्रारम्भ होने की भिन्न भिन्न प्रणाली होने से व्यवहारिक दृ्ष्टि से बडी भारी अव्यवस्था से बचने के लिए ही स्थानीय स्टैंण्डर्ड टाईम अनुसार अर्धरात्रि 12 बजे से ही वार आरंभ करने की प्रणाली को अपनाया गया है । जो कि मूल रूप से सही न होने पर भी सुविधा की दृ्ष्टि से तो उचित ही है ।

सवाल:- क्या किसी जन्मकुंडली को देखकर ये बताया जा सकता है कि ये जन्मकुंडली लडका,लडकी,पशु या पक्षी में से किसकी है ? क्या ये जान पाना संभव है ?

जन्मकुंडली देखकर जातक के लिंग(स्त्री एवं पुरूष) अथवा उसकी योनि (पशुयोनि,पक्षीयोनि इत्यादि) का निर्धारण कर पाना किसी भी ज्योतिषी के लिए संभव नहीं है । क्यों कि जन्म के क्षणों को लिंगभेद अथवा योनिभेद से विभाजित नहीं किया जा सकता । प्रकृ्ति नें ऎसी कोई व्यवस्था नहीं बनाई है कि समय के इस अन्तराल में केवल पुरूषों का जन्म होगा, इस क्षण में स्त्रियों का, इस क्षण में पशुओं का या कि इस क्षण में सिर्फ पक्षी ही जन्म लेंगें । कोई भी प्राणी चाहे वह किसी भी लिंग,जाति अथवा योनि का क्यों न हो, वह किसी भी क्षण में जन्म लेने के लिए स्वतंत्र है ।
अब यदि विज्ञान प्रकृ्ति के नियमों में सेंध लगाकर ये सुनिश्चित करवा सके कि दिनरात के चौबीस घंटों में इतने घंटे इन्सानों के जन्म के लिए रक्षित हैं ओर इतने पशु पक्षियों के लिए तो फिर जरूर बतलाया जा सकता है कि जन्मपत्री इन्सान की है या कि जानवर की :)

पीडित् चन्द्र करता है मन को अवसाद ग्रस्त—

आधुनिक भागदौड के इस जीवन में कभी न कभी हर व्यक्ति डिप्रेशन अर्थात अवसाद का शिकार हो ही जाता है।. डिप्रेशन आज इतना आम हो चुका है कि लोग इसे बीमारी के तौर पर नहीं लेते और नजरअंदाज कर देते हैं। किन्तु ऎसा करने का परिणाम कभी कभी बहुत ही बुरा हो सकता है।
डिप्रेशन मानसिक लक्षणों के अतिरिक्त शारीरिक लक्षण प्रकट करता है,जिनमे छाती में दर्द,दिल की धडकन में तेजी,कमजोरी,आलस और शिरोव्यथा(सिर दर्द) सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त इस रोग से ग्रसित व्यक्ति का मन किसी काम-धंधे में नहीं लगता,उसके स्वभाव में चिडचिडापन आ जाता है,उदासी रहने लगती है और वह शारीरिक स्तर पर भी थका थका सा अनुभव करता है। वैसे तो यह बीमारी किसी भी आयु वर्ग के व्यक्ति को कभी भी हो सकती है,किन्तु अनुभव सिद्ध है कि बहुधा इस रोग से पीडित किशोरावस्था के जातक तथा स्त्रियां अधिक होती हैं…….कारण,कि इस रोग का केद्रबिन्दु मन हैं ओर मन भावुक व्यक्ति को अपनी चपेट में जल्दी लेता है।जैसा कि आप सब लोग जानते ही हैं कि स्त्रियों को सृ्ष्टि नें पुरूषों की तुलना में अधिक भावनात्मक बनाया है (परन्तु आधुनिक परिवेश में देखा जाए तो इसका भी अपवाद है,इसी समाज में आपको ऎसी भी स्त्रियां देखने को मिल जाएंगी जो कि निर्दयता में हिंसक जीवों को भी पीछे छोड दें) दूसरा,किशोरावस्था के जातक इस रोग की चपेट में अधिक आते हैं, क्यों कि उनका मन अपने आगामी भविष्य के अकल्पनीय स्वपन संजोने लगता है। स्वपनों की असीमित उडान के पश्चात जब यथार्थ के ठोस धरातल से उनका सामना होता है तो मन अवसादग्रस्त होने लगता है।

डिप्रेशन जैसे मानसिक रोगों का केन्द्रबिन्दु मन है। मन जो कि शरीर का बहुत ही सूक्ष्म अव्यव होता है,लेकिन आन्तरिक एवं बाह्य सभी प्रकार की क्रियायों को यही प्रभावित करता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार अवसाद(डिप्रेशन)मूल रूप से मस्तिष्क में रसायनिक स्त्राव के असंतुलन के कारण होता है,किन्तु वैदिक ज्योतिष अनुसार इस रोग का दाता, मन को संचालित करने वाला ग्रह चन्द्रमा तथा व्यक्ति की जन्मकुंडली में चतुर्थ भाव के स्वामी को माना जाता है। अगर चंद्रमा या चतुर्थेश नीच राशी में स्थित हो, अथवा षष्ठेश के साथ युति हो,या फिर राहू या केतु के साथ युति होकर कुंडली में ग्रहण योग निर्मित हो रहा हो तो इस रोग की उत्पति होती है।
इस रोग से पीडित व्यक्ति का सबसे पहले तो वातावरण परिवर्तित कर देना चाहिए,लेकिन यह समझ लेना गलत होगा कि सिर्फ वातावरण के परिवर्तन से रोग मुक्ति संभव है। इसके अतिरिक्त उसके आत्मविश्वास को जगाने का प्रयास करते रहना चाहिए, साथ ही कुछ महत्वपूर्ण सुझाव तथा उपाए भी इसके निवारणार्थ यहां दिए जा रहे हैं;—–

1.रोगी को चांदी के पात्र (गिलास आदि) में जल,शर्बत इत्यादि शीतल पेय पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
2.सोमवार तथा पूर्णिमा की रात्री को चावल,दूध,मिश्री,चंदन लकडी,चीनी,खीर,सफेद वस्त्र,चांदी इत्यादि वस्तुओं
का दान करना चाहिए।
3.आशावादी बनें। प्रत्येक स्थिति में आशावादी दृ्ष्टिकोण अपनाऎं। अपनी असफलताओं को नहीं वरन सफलताओं को याद करें।
4.एकांत में न रहें। बाहर निकले,दूसरों से मेलजोल बढाएं और उनमें दिलचस्पी लें।
5.कभी भी खाली न बैठे क्यों कि अगर आप खाली बैठेंगे तो मन को अपनी उडान भरने का समय मिलेगा,जिससे भांती भांती के कुविचार उत्पन होने लगेंगे।
6.हो सके तो बेहतर मनोंरंजक साहित्य पढें,सिद्ध पुरूषों के प्रवचन सुनें,व्यायाम-योग-ध्यान साधना इत्यादि विधियों को अपनाऎं।
उपरोक्त उपायों एवं सुझावों को अपनाएं तथा अपने घर परिवार,समाज के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करें,दूसरों की खुशियों में अपने लिए खुशियां ढूंढने का प्रयास करें……….जिससे आपका जीवन भी खुशियों से महके उठे।
श्रीरस्तु………………………..शुभमस्तु…………………………..कल्याणमस्तु

ज्योतिष: शास्त्र, कला या विज्ञान=(ज्योतिष एक सच, झूठ या कुछ और..)—–

ज्योतिष विद्या भारत की बहुत सी महान उपलब्धियों में से एक है, लेकिन भारत में अब इस विद्या के जानकार को खोजना मुश्किल ही है। ऋग्वेद में ज्योतिष से संबंधित 30 श्लोक हैं, यजुर्वेद में 44 तथा अथर्ववेद में 162 श्लोक हैं। वेदों के उक्त श्लोकों पर आधारित आज का ज्योतिष पूर्णत: बदलकर भटक गया है। कुंडली पर आधारित फलित ज्योतिष का संबंध वेदों से नहीं है।

ज्योतिष विज्ञान की श्रेणी में आता है। यह उतना ही पुराना है जितने की वेद। इसलिए इसे वेदांग भी कहते हैं। जो तारे-सितारों की चमक या ज्योति दिखाई दे रही है उसका धरती के मौसम और जीवों के शरीर तथा मन पर होने वाले असर का अध्ययन करने की विद्या को ही ज्योतिष विद्या कहा जाता है।

क्या से क्या हो गया :
वैदिक ज्ञान के बल पर भारत में एक से बढ़कर एक खगोलशास्त्री, ज्योतिष व भविष्यवक्ता हुए हैं। इनमें गर्ग, आर्यभट्ट, भृगु, बृहस्पति, कश्यप, पाराशर वराहमिहिर, पित्रायुस, बैद्धनाथ आदि प्रमुख हैं। वराहमिहिर का ज्ञान काफी उच्चकोटि का था और इस ज्ञान को उन्होंने यवनों को भी दिया था। भारत से यह ज्ञान ग्रीक गया। भारत के साथ ही ग्रीक, चीन, बेबीलोन, परशिया (ईरान) आदि देशों के विद्धानों ने भी ज्योतिष शास्त्र का विस्तार अपने यहाँ कि आबोहवा को जानकर किया। आज से करीब 2600 वर्ष पूर्व चेल्डिया के पंडितों व पुजारियों ने इस विषय पर गहन शोध किया और इसकी बारीकियों को उजागर किया।

प्रारंभ में यह ज्ञान राजा, पंडित, आचार्य, ऋषि, दार्शनिक और विज्ञान की समझ रखने वालों तक ही सीमित था। ये लोग इस ज्ञान का उपयोग मौसम को जानने, वास्तु रचना करने तथा सितारों की गति से होने वाले परिवर्तनों को जानने के लिए करते थे। इस ज्ञान के बल पर वे राज्य को प्राकृतिक घटनाओं से बचाते थे और ठीक समय पर ही कोई कार्य करते थे।

धीरे-धीरे यह विद्या जन सामान्य तक पहुँची तो राजा और प्रजा सहित सभी ने इस विद्या में मनमाने विश्वास और धारणाएँ जोड़ी। अंध धारणाओं के कारण धीरे-धीरे इसमें विकृतियाँ आने लगीं, लोग इसका गलत प्रयोग करने लगे। राजा भी इस विद्या के माध्यम से लोगों को डराकर अपने राज्य में विद्रोह को दबाना चाहता था और पंडित ने भी अपना चोला बदल लिया था।

इस सब कारण के चलते विद्धान ज्योतिषाचार्य व ज्योतिषग्रंथ समाप्त हो गए। शोध कार्य मृतप्राय होकर बंद हो गए। अज्ञानी लोगों ने ज्योतिष का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया। इसे व्यापार का रूप देकर धन कमाने के लालच में झूठी भविष्यवाणी करके शोषक ‍वर्ग शोषण के धंधे में लग गया। जो भविष्यवाणी सच नहीं होती उसके भी मनमाने कारण निर्मित कर लिए जाते और जो सच हो जाती उसका बढ़ाचढ़ाकर प्रचार-प्रसार किया जाता। इसके चलते भारत में ज्योतिष का जन्म होने के बावजूद अब यह विद्या भारत से ही लुप्त हो चली है।

अब इस विद्या की जगह एक नई विद्या है कुंडली पर आधारित फलित ज्योतिष। ज्योतिषाचार्यो की महँगी फीस, महँगे व गलत उपायों से जनसामान्य आज भी धोखे में जी रहा है। आज ज्योतिष मात्र खिलवाड़ का विषय बन गया है। टीवी चैनलों के माध्यम से तो इस विद्या के दुरुपयोग का और भी विस्तार हो गया है। अब इसे विज्ञान कहना गलत होगा।

समय-समय पर ज्योतिष शास्त्र में उन्नति होती रही, लेकिन करीब दौ सौ सालों से ज्योतिष पर शोध किए जाने की आवश्यकता बनी हुई है। खगोल, भूगोल आदि सभी तरह का विज्ञान स्वयं को अपडेट करता रहता है, लेकिन ज्योतिष विद्या को कभी अपडेट करने का खयाल शायद ही किसी को आता हो। आधुनिक युग में बाजारवाद के चलते तो अब ज्योतिष एक विज्ञान नहीं व्यापार रह गया है। दूसरा यह कि इसमें इतना भ्रम है कि सही और गलत का फैसला नहीं कर सकते।

अपडेट करने की जरूरत इसलिए है कि लाखों वर्षों के सफर में धरती बहुत तरह के झटके झेलकर अब अपने स्थान पर नहीं रही है। पूरे तीन डिग्री अपनी धूरी से खसक गई है। उसी तरह ब्रह्मांड का कोई भी तारा ठीक उसी जगह नहीं है जहाँ वह लाखों साल पहले था। तापमान बदल गया है, मौसम बदल गया है और न जाने क्या-क्या बदला है इसका आकलन करना अभी बाकी है। असंख्‍य महातारों में से किसी एक तारे में एक प्रस्फोट होता है और ब्रह्मांड में एक नई सृष्टि की रचना हो जाती है। सब कुछ बदल गया है, लेकिन ज्योतिष विद्या वही प्राचीन है।

ग्रहों के देवता : प्रत्येक ग्रह के साथ एक देवी या देवता को जोड़कर उक्त देवी-देवता की जीवन कथा भी अब भ्रमपूर्ण हो चली है। जब राहु और केतु छाया ग्रह है और जिनका कोई अस्तित्व नहीं है तो फिर उनकी कथा का क्या मतलब। यह कथा कितनी सच और कितनी झूठ है यह कोई नहीं बता सकता।

यह भी हो सकता है कि राहु और केतु नाम के दो राक्षस हुए हों और उन्ही के नाम पर छाया ग्रहों का नामकरण कर दिया गया हो, जैसे कि आधुनिक युग में प्लेटो ग्रह का नाम दार्शनिक प्लूटो पर रखा गया है। अब प्लूटो को पूजने से क्या प्लूटो ग्रह के दोष ठीक हो जाएँगे? यह भी हो सकता है कि ग्रहों की गति-दुर्गति, अच्छे और बुरे असर को मिथकीय रूप दिया गया हो। यह मामला अभी स्पष्ट होना बाकी है।

ज्योतिष की शिक्षा : ज्योतिष की शिक्षा देने वाले बहुत कम संस्थान है और ज्योतिषाचार्य की तादाद लाखों में। इन लाखों में से सिर्फ सैकड़ों ही ऐसे ज्योतिष हैं जिन्होंने विधिवत ज्योतिष की शिक्षा ली है बाकी सभी किताबी ज्ञान वाले हैं और फिर वे मनमाने फंडे बताकर लोगों को ठगने में माहिर हो चुके हैं। बातों को इस तरह गोलगोल घुमाते हैं कि जो न तो सच लगती है और ना ही झूठ। लेकिन यह भी सच है कि बहुत से ऐसे ज्योतिष हैं जिन्होंने विधिवत शिक्षा नहीं ली, फिर भी वे ज्योतिष का ज्ञान रखते हैं और अच्छा रखते हैं एवं शास्त्र सम्मत बातें ही कहते हैं। कुछ भी अपने मन से नहीं जोड़ते।

वैज्ञानिक की माने या ज्योतिष की : इंग्लैंड की प्रतिष्ठित संस्था रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी 1922 में ही विज्ञान कांग्रेस में घोषणा कर चुकी है कि राशि 12 नहीं 13 है। यानी सूर्य और अन्य ग्रह 13 राशि मंडल (तारा मंडल) से होकर गुजरता है। इस तेरहवें तारा मंडल को वैज्ञानिकों ने नाम दिया है- ओफियुकस। यह एक यूनानी देवता का नाम भी है।

माना जाता है कि ज्योतिष शास्त्र की कुछ गणितीय समस्याएँ थी जिस कारण से 13वीं राशि को शामिल नहीं किया गया। पहली समस्या यह कि 13 का पूर्ण भाग नहीं हो सकता। कुंडली को 13 खानों में बाँटना मुश्किल था। ग्रहों को 30 डिग्री से कम का ज्यादा गति करवाने से ज्योतिष गणित गड़बड़ा जाता है।

360 डिग्री को 12 हिस्सों में बाँटना आसान हैं। विषम संख्‍या से कई तरह कि विषमताएँ पैदा होती है शायद इसिलिए 13वीं राशि को नजरअंदाज किया गया। दूसरी ओर पाश्चात्य जगत में 13 का अंक अशुभ माना जाता है इसलिए राशियों का तेरह होना उन्हें जमा नहीं। परम्परागत पाश्चात्य ज्योतिष भी 12 पर अड़ा रहा।

हालाँकि वैज्ञानिकों की माने तो राशियाँ तो 88 होना चाहिए। दरअसल वैज्ञानिकों ने हमारी आकाशगंगा को 88 तारा मंडलों में विभक्त किया है। तारामंडल अर्थात कुछ या ज्यादा तारों का एक समूह। इन तारा मंडलों में से ज्योतिष अनुसार 12 और वैज्ञानिकों अनुसार 13-14 तारा मंडलों में सूर्य और सौर्य परिवार के अन्य ग्रह भ्रमण करते हैं जिस वक्त चंद्र वृश्चिक तारा मंडल या राशि में भ्रमण कर रहा है उस काल में यदि किसी का जन्म हुआ है तो उसकी राशि वृश्चिक मानी जाएगी। तारा मंडल दरअसल मील के पत्थरों की तरह है जिससे आकाश गंगा के विस्तार क्षेत्र का पता चलता है। ऐसी कई आकाश गंगाएँ है।

जरूरी नहीं की ग्रह सिर्फ 12 से 13 राशियों में ही भ्रमण करते रहते हैं। कुछ ग्रह सैकड़ों सालों में तो कुछ थोड़े ही सालों में बारह राशियों को छोड़कर 88 में से किसी भी राशि में कुछ काल के लिए भ्रमण करने लगते हैं, तब ऐसे में शुभ और अशुभ विचारों के बारे में क्या सोचना चाहिए यह तय नहीं है।

जैसे मान लो कि गुरु के धनु राशि में प्रवेश करने के बाद ही विवाह आदि शुभ कार्य शुरू होते हैं, लेकिन 2007 में गुरु नासा की एफेमरिज अनुसार ओफियुकस राशि में भ्रमण कर रहा था और शुक्र हाइड्रा राशि में, लेकिन भारतीय ज्योतिषानुसार गुरु धनु राशि में था। अब आप ही बताएँ ज्योतिष की माने या वैज्ञानिकों की?

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 7, 2011

स्त्री कुंडली में ग्रह फ़ल—–

संक्षिप्त स्त्री कुन्डली में ग्रह-फ़ल—-

House Sun Moon Mars Mercury Jupiter Venus Saturn Rahu Ketu
1st क्रोधी अल्पायु विधवा भाग्यवान परिव्रता सुखी बांझ नि:संतान दुखी
2nd गरीब धनी नि:संतान धनी धनी भाग्यवान दुखी गरीब कपटी चिंतित
3rd संतान अच्छी सुखी भाई नही संतान सहित अच्छे भाई धनी होशियार धनी रोगी
4th रोगी दुर्भागिन दुखी अच्छे घरवाली सुखी सुखी करुणावाली रोगी माता को कष्ट
5th पुत्र से दुखी अच्छी संतान नि:संतान समझदार कलाकुशल बहुसंतान नि:संतान नि:संतान संतान से दुख
6th सुखी रोगी स्वस्थ क्रोधी संकटवाली गरीब शिल्पी धनी धनी
7th दुखी पतिप्रिया विधवा पतिव्रता इज्जतदार पतिप्रिया विधवा दुखी पति से दुखी
8th विधवा दुखी चरित्रहीन कृतघ्न रोगी दुखी दुखी पति से दुखी दुखी
9th धार्मिक बेकार संतान शुभकार्य शिष्ट धनी आचारहीन दुष्कर्मा दुष्कर्मा चिन्तित
10th उच्चाभिलाषी धार्मिक बेकार संतान शुभकार्य सुशील धनी आचारहीन दुष्कर्मा आचारहीन
11th धनी कलाकुशल धनी पतिव्रता शिष्ट संतान अतिधनी शिष्ट संतान स्वस्थ भाग्यवान
12th क्रोधी अपंग पापिनी वैरागिन शुभव्यय शुभकार्य मूर्ख मक्कार बीमार

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 7, 2011

पुरुष कुण्डली में ग्रह फ़ल—-

पुरुष कुण्डली में ग्रह फ़ल—-

भाव सूर्य चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु
1st बहादुर सुखी घायल सुखी विद्वान सुखी दुखी बीमार अय्याश
2nd गरीब धनी ऋणी विद्वान धनी धनी निर्धन निर्धन पापी
3rd स्वस्थ सराहनीय साहसी विजयी पापी पापी साहसी साहसी बहादुर
4th दुखी सुखी दुखी सुखी सुखी सुखी दुखी घर में अशुभ दुखी
5th कम संतान बहुसंतान नि:संतान निकम्मी संतान प्रतापी बुद्धिमान संतान से कष्ट कुबुद्धि निर्बुद्धि
6th विजयी अल्पायु विजयी बीमार अय्याश रोगी विजयी बहादुर शक्तिवान
7th कुलटा स्त्री सुभार्या पत्नी से कष्ट धर्मात्मा सुभार्या अय्याश कुलटा स्त्री रोगी पत्नी कुभार्या
8th अल्पायु रोगी शरारती कलाकुशल अल्पायु आचारहीन नेत्ररोगी रोगी कलहकर्ता
9th अधर्मी धर्मी आचारहीन सुखी धर्मी तपस्वी अधर्मी वक्ता कुलपालक
10th बहादुर पितृहीन कटुवक्ता राजपुरुष अधर्मी स्त्रीपालक गरीब इज्जतदार पिता को कष्ट
11th धनी धनी धनी धनी धनी बुद्धिमान धनी विख्यात धनी
12th मूडी कामी कुभार्या गरीब कपटी रोगी दुखी कुजाति दु:स्वभाव

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 7, 2011

ज्योतिष बताता हे नशे का कारण—-

सभी जानते हैं कि नशा खराब है, इससे शरीर, मन, धन, परिवार सब कुछ दाँव पर लग जाता है, मगर फिर भी लोग विशेषकर युवा बुरी तरह से इसकी गिरफ्‍त में आ जाते हैं। आज हर दूसरा युवा किसी न किसी नशे को अपनाता है। प्रारंभ में शौक में किया गया नशा बाद में लत बनता जाता है और सारा करियर तक चौपट कर सकता है।

यह सच है कि नशे का आदी बनने में वातावरण का भी हाथ होता है, मगर हॉरोस्कोप यह संकेत पहले ही दे देता है कि किस व्यक्ति की रुचि नशा करने में रहेगी और वह किस तरह का नशा करेगा। यदि किशोरावस्था में ही इन संकेतों को समझकर संबंधित उपाय किए जाएँ तो उसे नशे के दानव की गिरफ्‍त में आने से बचाया जा सकता है।

* लग्न में पाप ग्रह हो तो व्यक्ति की रुचि नशे में रहेगी।

* लग्नेश अर्थात मुख्‍य ग्रह निर्बल हो, पाप प्रभाव में हो, तो नशे में रुचि रहेगी।

* यदि लग्नेश नीच का हो, शत्रु क्षेत्री हो, चंद्रमा भी वीक हो तो नशे में रुचि रहेगी।

* लग्नेश का मंगल देखें तो व्यसन में रुचि होती है।

* व्यय स्थान का पापी ग्रह अध्ययन में धन व्यय कराता है।

* बृहस्पति नीच का हो तो व्यसन में रुचि रहती है।

* शुक्र-राहु या केतु के साथ हो, मुख्‍य ग्रह व चंद्रमा कमजोर हो तो व्यसन में रुचि होती है।

* शनि का लग्न हो, शुक्र अष्टस्थ हो और शनि से दृष्ट हो तो भयंकर व्यसन होता है। लग्न पर सूर्य की दृष्टि माँस-मदिरा में, शनि की दृष्टि सिगरेट-गांजा आदि, मंगल की दृष्टि मदिरापान में रुचि जगाती है।

यदि हॉरोस्कोप पितृ दोष से प्रभावित हो तो भी परिवार में नशे का दानव घर जमाता है।

नोट : संबंधित ग्रहों की शांति कराने व उपाय करने से कष्ट कम अवश्य होते हैं।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 7, 2011

अंगूठा खोले आपका भेद—

अँगूठे में छुपे कैसे-कैसे भेद —-

अँगूठा मानवीय चरित्र का प्रतीक है। अँगूठा वह धुरी है जिस पर संपूर्ण जीवन चक्र घूमता रहता है। सफलता दिलवाने वाला अँगूठा सुडौल, सुंदर और संतुलित होना चाहिए। उसकी इच्छा व तार्किक बुद्धि एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए।

चौकोर अँगूठे वाले व्यक्ति आक्रामक और शीघ्र काम करने वाले होते है। चपटे अँगूठे वाले व्यक्ति कोमल स्वभाव के होते हैं। ऐसा व्यक्ति अपने लक्ष्य के रास्ते में आने वाली बाधा को नष्ट कर देता है। ऐसे युवाओं को सही मार्गदर्शन मिलना बड़ा जरूरी होता है। पतली कमर के समान अँगूठे वाला व्यक्ति चुस्त व चालाक बुद्धि का होता है, लेकिन यदि दूसरा पोर मोटा हो तो वह अपना उल्लू सीधा करने के लिए कोई भी अनैतिक कार्य कर सकता है, ऐसा व्यक्ति कूटनीति में प्रवीण होता है।

बृहस्पति पर्वत से काफी नीचे से निकलने वाले अँगूठे वाला व्यक्ति मिलनसार, विवेकी होने के साथ अच्छे साहित्य का ज्ञाता होता है, वह अत्याचारों का विरोधी होता है। बृहस्पति पर्वत से कम दूरी पर निकलने वाले अँगूठे का व्यक्ति अल्पबुद्धि वाला होता है। ऐसे व्यक्ति स्वार्थी, लालची व संकीर्ण विचारों वाले होते हैं।

अँगूठा जितना ऊँचा और गुरु पर्वत के समीप होगा, उतना ही दिमाग कम होगा। पहले पोर की अपेक्षा यदि अँगूठे का दूसरा पोर लंबा हुआ और पहला छोटा हुआ तो व्यक्ति कानूनी बात करने वाला, विचारक और बहुभाषी होता है।

अँगूठे के प्रथम पोर के नीचे की ओर शुक्र पर्वत के ऊपर से दो रेखाएँ हों तो संपत्ति मिलती है। यदि ये रेखाएँ मिल-जुलकर चलती जाएँ या अंत में मिल जाएँ तो ऐसा व्यक्ति जुआ खेलकर प्रायः संपत्ति नष्ट करता है।

दो अँगूठे वाले अपने आप किसी द्वंद्व में उलझ जाते हैं। सामान्य रूप से काम करते-करते वे उलझनों का निर्माण कर फिर विद्रोह करते हैं। संघर्ष करते रहने में उन्हें एक आनंद आता है और उसमें अंतिम दम तक रत रहते हैं। तीस से चालीस प्रतिशत अपराध वृत्ति इनमें पाई जाती है।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 7, 2011

पूजा और प्रार्थना के प्रभाव—

पूजा और प्रार्थना के प्रभाव—

कहते हैं प्रार्थना में बड़ी शक्ति होती है, इससे व्यक्ति अपने उन कार्यों को भी सिद्ध कर लेता है, जो उनको असंभव दिखाई देते हैं। । कोई इसे हिंदू समाज की परंपरा बता रहा है तो कोई प्रतिकूल ग्रहों की शांति के लिए आवश्यक उपाय। मंदिरों में अक्सर सूर्यास्त के बाद गोरज मुहूर्त में पीपल के वृक्ष व भगवान की मूरत के आगे युवतियों को दीप जलाते देखा जा सकता है।

श्रद्धास्वरूप जलाती हैं दीपक—
ग्रहों की शांति के लिए केले व बरगद के वृक्ष तले दीप जलाने से जीवन में आने वाली समस्त बाधाओं से मुक्ति मिलती है। अपने जीवन को शांत व सुखमय करने के लिए ईश्वर पर एक श्रद्धा होती है। यही श्रद्धास्वरूप दीपक हम प्रतिदिन शाम को मंदिर में लगाने जाते हैं। और परीक्षा के दिनों में एक हौंसला रहता है।

परमात्मा को पाने का माध्यम —
अपने जीवन में खुशहाली व ग्रहों की शांति के लिए लगातार प्रयास किए जाते हैं कि उनसे बचाव हो। इसके लिए हम कभी पीपल के पे़ड़ के नीचे दीपक जलाते हैं तो कभी साँझ होते ही मंदिर में दियाबत्ती करते हैं। क्योंकि जीवन में सफलता के लिए भगवान का साथ होना जरूरी है। उस परमात्मा का साथ पाने के लिए व उसे मनाने के लिए दीप जलाना एक माध्यम होता है, तभी तो हम दीप जलाकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अर्जी लगाकर ईश्वर को प्रसन्न करते हैं।

शुभ होता है दीपक जलाना —
जब परीक्षा का समय आता है तो याद आता है भगवान, जिससे हम मन्नते माँगते हैं कि भगवान हमें परीक्षा में पास करा दो। पाँच सोमवार आपके दर पर दीपक जलाएँगे। कुछ इसी आस्था के साथ शुरू हो जाता है मंदिर में दीप जलाने का सिलसिला। जो धीरे-धीरे हमारी दैनिक दिनचर्या में शामिल हो जाता है। ग्रहों से होने वाले अनिष्ट के निवारण के लिए घी या तेल का दीपक जलाना शुभ माना जाता है।

परंपरा का निर्वहन —-

दीपक जलाने की महत्वता बताते हुए प्रीति ने कहा कि ये परंपरा हिंदू समाज में वर्षों से चली आई है। हम तो बस इसका निर्वहन कर रहे हैं। चूंकि हमारे समाज में स्त्री द्वारा पीपल के पे़ड़ पर या भगवान के मंदिर में दीपक जलाना शुभ माना जाता है, इसलिए प़ढ़ाई-लिखाई में चाहे जितनी भी व्यस्तता क्यों न हो, हम मंदिर में दीपक जलाना नहीं भूलते। चूंकि यह तो हमारे परिवार द्वारा दिए गए संस्कार व हमारे भारतवर्ष की संस्कृति है।

ग्रहों की शांति के लिए जरूरी —-
राशियों पर ग्रहों का प्रभाव चलता ही रहता है, जिसमें शनि को अनिष्टकारी ग्रह माना गया है। इस ग्रह से प्रभावित राशि वाले लोगों का परेशानियों से चोली-दामन का साथ रहता है। अन्य ग्रह भी कभी-कभी अपना प्रभाव राशियों पर दिखाते हैं, लेकिन ग्रहों की शांति व उनमें अनुकूलता बनाए रखने के लिए प्रभावित लोगों को मंदिर या पीपल के वृक्ष के नीचे घी या तेल का दीपक अवश्य जलाना चाहिए।

क्या कहती हे आपके हाथ की जीवन रेखा(लाइफ लाइन).—????

हाथ की रेखाओं से हमें कई बातों का संकेत मिलता है। हमारी हथेली में स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाली रेखाओं में लाइफ लाइन का सबसे ज्यादा महत्व होता है। इसका ओरीजिन तर्जनी (फर्स्ट फिंगर) के नीचे से लेकर कलाई तक है। इसे ही पूर्ण आयु वाली रेखाGet Fabulous Photos of Rekha कहा जाता है। लाइफ लाइन स्पष्ट, गहरी लेकिन सुंदर हो तो सेहत के साथ लाइफ को भी खुशनुमा बना देती है।

- धागे के समान पतली लाइफ लाइन हो तो वह व्यक्ति अस्वस्थ होने के साथ अकाल मौत का शिकार हो सकता है।
- छोटी लाइफ लाइन कम आयु बताती है। तर्जनी (फर्स्ट फिंगर) से कलाई तक पूर्ण आयु को दर्शाती है। जहाँ रेखा समाप्त हो उतनी लंबाई देखकर आयु जानी जा सकती है।
- कहीं से टूटकर आगे बढ़ी या छिन्न-भिन्न रेखा हो तो उस आयु में दुर्घटना का शिकार होना पड़ता है या अकस्मात बीमारी से आयु कम होती है।
- चेन के समान जीवन रेखा हो तो ऐसा व्यक्ति नाजुक होगा व परिश्रम से घबराएगा, जल्द थकान व पसीने से तुरंत सराबोर होगा।
- गहरी लाल रंग की जीवन रेखा हो तो ऐसा जातक अत्यधिक गुस्सैल होगा। यदि मंगल पर्वत भी उभरा हो व कटा हो तो ऐसा जातक हत्या कर सकता है।
- यदि गहरी और चौड़ी रेखा दिखाई दे तो ऐसा व्यक्ति असभ्य भी हो सकता है।
- जिनकी लाइफ लाइन पीली आभा लिए हो तो उस जातक को एनिमिया या पीलिया की बीमारी हो सकती है।
- लाइफ लाइन गुरु पर्वत से निकलती हो तो ऐसा व्यक्ति उत्तम आचरण वाला होगा।
- लाइफ लाइन पर जितनी बार क्रॉस होंगे उसको उसके जीवन में उतनी ही बार खतरों से गुजरना पड़ सकता है।
- लाइफ लाइन पर बिन्दु हो या कटी रेखा भी हो तो उस जातक की मृत्यु हार्टअटैक से हो सकती है।
- लाइफ लाइन को चंद्रपर्वत से निकलने वाली रेखा काटे तो उस जातक की मृत्यु जल में डूबकर हो सकती है।
- लाइफ लाइन पर अन्य शाखाओं का होना उसके लाइफ में प्रॉब्लम्स का संकेत देता है।
- लाइफ लाइन को बारीक-बारीक रेखाएँ काटती हो तो उसे पारिवारिक जीवन में कष्टों का सामना करना पड़ता है।
- लाइफ लाइन से कोई शाखा बुध पर्वत तक जाए तो उस व्यक्ति को व्यापार के क्षेत्र में देश-विदेश में ख्याति दिलाती है।
- लाइफ लाइन के साथ कुछ दूर तक भाग्य रेखा चले तो उसका बुढ़ापा उत्तम कटेगा।
- लाइफ लाइन पर तारे का निशान शुभकारक नहीं होगा उसे तनाव, चिकचिक का सामना करना पड़ेगा।
- लाइफ लाइन पर काला तिल हो तो ऐसे जातक को अकस्मात दुर्घटना का शिकार होना पड़ सकता है।
- लाइफ लाइन मंगल पर्वत पर जाकर समाप्त हो जाए तो उसे किसी हथियार से खतरा हो सकता है।
- लाइफ लाइन पर गोल सर्कल का निशान अकस्मात मृत्यु का संकेत देती है।
- लाइफ लाइन यदि बीच में से कटी हो और उसके साथ कोई अन्य रेखा चल रही हो तो ऐसे जातक के दुर्घटना के योग तो बनेंगे लेकिन दुर्घटना इतनी छोटी होगी कि जिसका असर तनिक-सा होगा।
- लाइफ लाइन के साथ यदि भाग्य रेखा मिल जाए तो ऐसा जातक अपने जीवन में भाग्यशाली होने के साथ लंबी उम्र भी पाएगा।

इस तरह से रेखाओं से सरल और सहज तरीके से आप अपने बारे में जान सकते हैं। परंतु आप यदि अधिक जानकारी चाहते हैं तो किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह लेना चाहिए।

क्या आपकी अँगुलियों में है शुभ चक्र —
शुभ चक्र से सुधरें जीवन-चक्र—

हम सभी जानते हैं कि चक्र यानि गोल घेरा। यही चक्र जब हथेलियों में हो तो इसके अलग-अलग प्रभाव होते हैं। जिस व्यक्ति की अँगुली के सबसे ऊपर वाले पोर पर चक्र हो वह भाग्यशाली व धनवान होता है। ऐसे लोग जिसे भी अँगुली के इशारे से सामने वाले को कुछ कहें यह बात चक्र के समान तुरंत घूमकर पूरी होती है। चक्र स्पष्ट होना चाहिए, नहीं तो यही चक्रधारी को अनेक टेंशन भी दे सकता है।

जिनकी अँगुलियों के पोरों पर चक्र होता है, ऐसे जातकों का व्यवहार अपने विवेक और निर्णय से संचालित होता है। ये महत्वाकांक्षी भी होते हैं। इनके दिमाग में कोई न कोई योजना चलती रहती है। ऐसे जातक सेल्फ रिस्पेक्ट वाले होते हैं। ये अपनी इच्छानुसार कार्य करने वाले रसिक मिजाज भी होते हैं।

अगर अँगूठे पर चक्र का निशान हो तो वह ऐश्वर्यवान, प्रभावशाली, दिमागी कार्य में निपुण, पिता का सहयोग व धन पाने वाला होता है। ऐसे जातक कुछ न कुछ ऐसे कार्य करते हैं जिससे इनका यश बना रहे। तर्जनी अँगुली में चक्र का निशान हो तो ऐसे व्यक्ति धनवान, प्रभावी, मित्रों से लाभ पाने वाले होते हैं। महत्वाकांक्षी होने के साथ-साथ धन का भी लाभ पाते हैं। सांसारिक सुखों का भोग कर सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

ऐसे जातक कुशल चिकित्सक, नेता, व्यापारी, अधिवक्ता भी हो सकते हैं। दूसरों के मुकाबले इनकी तर्क शक्ति अधिक होती है। ये अनेक विधाओं के जानकार भी होते हैं। इनमें से कुछ आध्यात्म की ओर रुचि रखते हैं व तीनों कालों का ज्ञान रखने वाले महापुरुष भी हो सकते हैं।

मध्यमा अँगुली पर चक्र का निशान होने से व्यक्ति धार्मिक प्रवृत्ति का होता है। चूँकि यह अँगुली शनि की होती है इस कारण से उन पर शनि ग्रह की कृपा बनी रहती है व उनकी कृपा से ऐसे जातक धनवान भी होते हैं। ऐसे जातकों के बारे में देखा गया है कि वे पराक्रमी, अनेक उद्योगों के स्वामी, उत्तम ज्योतिषी, तांत्रिक, मठाधीश भी होते हैं।

अनामिका यानी सूर्य की अँगुली पर चक्र होना भाग्यशाली जीवन का प्रतीक माना जाता है। ऐसे जातक उत्तम व्यापारी, धनवान, उद्योग धंधों में सफल, प्रतिष्ठित, यशस्वी, ऐश्वर्यवान, राजनीतिज्ञ, कुशल प्रशासनिक अधिकारी भी हो सकते हैं। कुछ आई.ए.एस. अधिकारियों की अँगुली में अनामिका चक्र देखकर इस बात की पुष्टि भी की जा चुकी है।

सबसे छोटी अंगुली (लिटिल फिंगर) को बुध की अँगुली कहते है। इस पर चक्र का होना ही सफल व्यापारी होने की निशानी होती है। ये देश-विदेश में अपना व्यापार कर सफलता पाते हैं। ऐसे जातक सफल लेखक, प्रकाशक होते हैं व सम्पादन के क्षेत्र में भी सफलता पा सकते हैं।

संक्षेप में कहें तो जिस अँगुली पर चक्र होता है उस अँगुली से संबंधित ग्रहों का प्रभाव बढ़ जाता है। फर्स्ट फिंगर गुरु की, मध्यमा यानी बीच की अँगुली शनि की, अनामिका सूर्य की, लिटिल फिंगर बुध की तथा अँगूठा शुक्र व मंगल ग्रह का माना जाता है।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 7, 2011

TRAINING ON NEW SCIENTIFIC TECHNOLOGIES IN VAASTU–

TRAINING ON NEW SCIENTIFIC TECHNOLOGIES IN VAASTU–
BY- Mr. Ashok sachdeva-09820001660—
Vanue–Hotel karl Residency, Lallubhai Park, Andheri(west), Mumbai-
Date- 15 April2011 – 17 April,2011 ( Three Dayes Training Programme)—
Entry Fee- 10,000/- rupees only—-
THIS TRAINING IS ONLY FOR” VASTU EXPERTS” ONLY WHOSE VISION MAKE THEMSEF EXTREMELY GOOD IN REMIDIAL VASTU. YOU WILL HAVE SOLUTIONS TO EVERY VASTU PROBLEMS and YOU CAN VERIFY THE RESULTS. NO ASTROLOGY..NO BLIND VASTU…NO FOLLOWING WHAT IS WRITEN???VARIFY EVERYTHING BY YOURSELF..YOU WILL KNOW THEN THAT YOU ARE THE BEST…
( LIMITED SEATS AVAILEBLE–FIRST COME-FIRST JOIN)…INFORM IMMEDIATELY –BY SMS/ Email—YOUR NAME and YOUR CONTECT NUMBER…

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 7, 2011

How to Decorate House With Vastu Shastra—?????

How to Decorate House With Vastu Shastra—?????

Great importance is given for the decoration of the house with the paintings, idols and especially the main door decoration. The main door was considered very important in ancient days and even today as the people used to think that all the prosperity and money comes from the main door.

Main door decoration: Care should be taken to decorate the main door. The objects of the main door as prescribed in the text are:

Kula Devata: The image of the family deity. Its dimension should not be more than one hasta (18″) of length.
Two Prathiharis (Sentinels or guards): Well decorated in ornaments bearing staff and swords in their hands, well clothed, glowing with youth and beauty, along with lady Prathiharinis and placed on both the sides of the door.
Dhaatri (a dwarfish nurse): her maid companions should follow it, the happy jesters i.e. Vidhushakas.
Shanka and Padmanidhi emitting coins.
The Asthamangala: on the seat of lotus wearing a sacred garland of eight auspicious symbols.
Lakshmi: lotus seated and well decorated and being bathed by elephants.
Cow with her calf and well ornamented with flower garlands etc.
Motifs of serpents, giants, owl, wild animals, elephants, daityas, nudes, fight between God and demons, hunting, house on fire, trees devoid of flowers should not be placed on the main door.
Nowadays people in their over enthusiasm to decorate the house use figures of Gods like Krishna, Ganesh, Vishnu etc. and also many other prohibited motifs.
The following shlok explains the rules relating the above things:

“Grahe Na Ramayan bhatatha hawan chitram kurupanahvamindra jalikam . Shilocha yaarnyamayam sadhasuram bheeshmam kurutha krindhanaram thvanambaram.
Vaarah shaardhul shiva prudhakavo grudhabi golukapothavayasaa Sashye nagothadhi vakadhi patrino vichitratha no sharane shubhavaha.”

Meaning – To display the following in a house is not good – War scenes from Ramayan and Mahabharata, Fight scenes using swords, Inderjall (magic) scenes, Stone or wooden statues of terrifying giants or demons, Scenes of weeping and crying people in tears. Paintings, potraits, statues: Decorative lights, chandeliers, bookshelf, vases, flower pots and furniture etc. should be meticulously and tastefully selected and placed in appropriate settings so that they look attractive and follow vaastu principles etc.

The pictures, painting or models of the animals like pigs, snake and birds like eagle, owl, crow, pigeons, vultures should not be placed in a house.
All pictures or wooden or metal figures of wild beasts like tigers, lions, wolves, bears, jackals, and wild asses, hounds etc. should be avoided.
The heavy furniture should be placed in the SouthWest side of the room and the light furniture can accommodate in any corner.
Symbols like Swastik, Om, Rangoli decorations stop the entry of evil spirits and evil influences in the house.
The photographs of the ancestors should be placed on the southWestern side of the house.
The clock should be placed on the Eastern, Western or Northern wall.I

nstallation of Idols in homes and other buildings: A pooja or worship place is a must in a home; it is better to have one in office, factory, schools, colleges and other buildings too. The appropriate place is the north-east corner of the building and if not then the north-east corner of the room in house and central chowk or garden or lawn of other buildings. The deities like Brahma, Vishnu, Maheshwar, Surya, Inder should face east or West and four-headed Brahma, six-headed kartikeya, five faced Shiv can be placed facing any direction. Hanuman ji should face southwest.

Whatever is exhibited should be pleasing to the eyes and mind bringing joy and cheer to those who view them; aesthetic and cultural aspects also should be borne in mind, while selecting decorative pieces or paintings and pictures and placing them in our home.

एक जरूरी सवाल राजस्थान की जनता से–????

निः शुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम के तहत स्कूली एवं साक्षरता विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने संदर्भित स्कूलों में कक्षा एक से आठ तक अध्यापक के रूप में नियुक्ति की पात्रता हेतु न्यूनतम योग्यता में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् द्वारा निरूपित मार्गदर्शी सिद्धांतों के अधीन उपयुक्त सरकारों द्वारा आयोजित अध्यापक पात्रता परीक्षा (टीईटी) में उत्तीर्ण होना अनिवार्य शर्त माना है। चूंकि अनिवार्य शिक्षा कानून की एक आवश्यक शर्त यह भी है कि बालक को उसकी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षण करवाया जाए। यही वजह है कि एनसीटीई ने टीईटी में मातृभाषाओं को भी स्थान दिया है। चूंकि राजस्थानी राजस्थान की प्रमुख भाषा है और इसे अभी तक संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं हुआ है। इस वजह से इस परीक्षा का सबसे बड़ा खामियाजा राजस्थान को भुगतना पड़ेगा। आरटीईटी के लिए माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान ने जो पाठ्यक्रम जारी किया है उसमें एक भाषा समूह दिया गया है जिसमें से किन्हीं दो भाषाओं को क्रमश: प्रथम व द्वितीय भाषा के रूप में चुनना है और 150 अंकों के पूर्णांक वाले पेपर में से कुल 60 अंक इन भाषाओं की योग्यता के लिए निर्धारित किए गए हैं। भाषा समूह में अंग्रेजी, हिंदी, गुजराती, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी व उर्दू को शामिल किया गया है। राजस्थान के मूल निवासी अभ्यर्थियों जिनकी कि मातृभाषा राजस्थानी है, प्रथम भाषा रूप में हिंदी तथा द्वितीय भाषा के रूप में अंग्रेजी या संस्कृत चुनने को मजबूर होना पड़ रहा है क्योंकि उनकी मातृभाषा इस सूची में शामिल नहीं है, जबकि जिनकी मातृभाषा गुजराती, पंजाबी, सिंधी व उर्दू है वे द्वितीय भाषा के रूप में अपनी मातृभाषा का ही चयन कर रहे हैं। चूंकि अंग्रेजी और संस्कृत की बजाय अपनी मातृभाषा का पेपर हल करना कहीं ज्यादा आसान होगा और यही वजह है कि पड़ोसी प्रांत पंजाब, हरियाणा, गुजरात आदि से भी बड़ी तादाद में अभ्यर्थी यहां आएंगे और राजस्थान में अध्यापक पद की पात्रता आसानी से हासिल करेंगे। यहां यह भी उल्लेख कर देना आवश्यक है कि पड़ोसी प्रांत हरियाणा में पंजाबी तथा दिल्ली में पंजाबी तथा उर्दू को द्वितीय राजभाषा का दर्जा हासिल है और स्कूलों में इन भाषाओं की पढ़ाई होती है। राजस्थान मूल के अभ्यर्थी अंग्रेजी या संस्कृत में इतने अंक नहीं बना पाएंगे जितने कि बाहरी अभ्यर्थी अपनी मातृभाषाओं में हासिल करेंगे। फलस्वरूप राजस्थान में ही राजस्थानियों को वंचित रहना पड़ेगा। जबकि राजस्थान का अभ्यर्थी अन्य प्रांतों में आवेदन ही नहीं कर सकता क्योंकि उसके पास उन प्रांतों की भाषा-योग्यता नहीं है। मतलब राजस्थान को राजस्थान में पछाड़ने के लिए बाहरी अभ्यर्थी आ रहे हैं और राजस्थान का अभ्यर्थी न तो उनकी तरह अपने प्रदेश की हद को लांघने में सक्षम है और न ही राजस्थान में अपनी क्षमता का भरपूर प्रदर्शन करने का उसके पास अवसर। ऐसे में क्या मूक दर्शक बनकर यह तमाशा देखा जाए ?

डॉ. सत्यनारायण सोनी
प्राध्यापक (हिंदी)
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय,
परलीका (हनुमानगढ़) 335504

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 7, 2011

Vaastu for Happy Married Life— Net Guru

Vaastu for Happy Married Life— Net Guru–

All individuals on this world aim to pass their life with the person whom they love admire and cherish. But! This does not happen with everyone. In India only, there are numerous cases of domestic violence registered on daily basis. Though you might have chosen your partner yourself, it may not turn out as per your expectations later. You may find yourself and your relationship in dwindle, exactly opposite to what you had planned for your life. You might be quite surprised to hear, that the improper settlement of decoration in your house can also ruin your lovely relationship. Not only the love life but also your own health and the business can be affected by the same.
Guidelines for Blissful Married Life – Vaastu Way
Basically the main sleeping room should be faced in south-west part of home. The south-east side is the place of “GOD OF FIRE”, so just avoid to have a room there, it will create more differences with your beloved.
Your double bed should be placed in the south-west phase and also keep in mind while sleeping your head should be south facing. It’s also noted that, if the bed is placed in north and east face than couples face psychological illnesses and also financial crunch.
The recent trends have brought wrought iron bed in, but according to Vaastu only wooden beds should be considered while you design your home.
Many young couples try for some new designs like circles and other different art designs for bedroom. But basically room should have only square or rectangular shape for peaceful married life.
The color of energy- ‘Red’ is also color of blood, so this color should be neglected as paint. Some lavish colors like bottle-green, light sky-blue, pinkish are effective one to be used.
The two angels “GOD OF WATER” and “GOD OF FIRE” should be placed properly, and if not done, there will be dispute within family members according to Vaastu. Every individual have his own commanding planet that represent its characteristic in similar way, if the water and fire are not placed properly than this dispute may turn to worse.
Almost all family keeps penknife and cutters in open, for example individuals tend to keep nail cutters in bathroom. The other edible items like pickle and other sauces may also be kept in open. This should be totally avoided, it seems small in nature but there effects are larger than they look. This can lead to unhealthy and bitter affairs.
The young duo desiring for kid should avoid to rest in the north-east room. The hard alluring vibes will be dealing as hurdle. The next thing to be kept in mind is that the bedroom should not have any pointed accessories like knives; also the room color should be light. The toilet attached rooms sometimes have tanks placed below the ceiling which should be completely avoided.
The most common mistake made by architects these days is that they place LCD and dressing tables within room. It looks good and gives nice view to room, but Vaastu doesn’t allow this. Although you have LCD/computer in your room, than just try to cover it with a cloth while you go to bed.
The sculpture and art object of worriers or demise or anything that gives pessimistic vibration should not be kept in your home.
Completely avoid sitting, resting and eating under the beam, this will ruin your health and also will give mental and other anxiety.
The main locker of the home that is used as a reserve bank of home should be phase in north/east side. This way it will add on interest to your money and bring you more prosperity.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 7, 2011

Vaastu For Good Family Life–by Net Guru–

Vaastu For Good Family Life–by Net Guru–

One and all people want to be happy. Living in an environment surrounded with positive energy and freshness can enhance productivity and brings success in your life. Some people may keep on changing home décor or experiment new position for their furniture to bring positive energy or freshness in the home.
Home decoration or bringing positive energy for good family life is not merely changing home décor theme or color. But there is science called Vaastu which plays vital role in bringing peace, positive energy and enhances the productivity. Vaastu was initially used to refer to the homes and temples. However, with time, it came to be associated with the right location as well as design of almost any and every structure be it a plot, commercial complex, industry, shop/showroom, residential house or spiritual place like temple.

Vaastu Tips for good family life—-

The use of the knowledge of Vaastu in the construction of dwelling structures provides prosperity, peace and good family life. Vaastu Shastra is considered a sacred science for living in perfect harmony. Following are Vaastu recommended for your building.

Vaastu recommends that clutter be kept to a minimum. Clutter in your environment creates clutter in your mind. You can’t think as clearly or function as efficiently as you could in an orderly environment.

All the heavy and permanent items should be placed in the south-west corner of the building or plot. Family life will be more and more happy if more heavy items are placed in the rooms on the south-west and south sides.

The more is lighter items in the north, north-east and north-west directions, the more happy will be the life of the family in the house.

Almirah, Sofa Set, Table and other heavy items can be placed permanently at a place. Vaastu recommends placing them in the South-West corner or near it in the west.

Pictures and scenes of war and battles, idols/statues of demons, pictures of wild or deadly animals should not be put on the walls in the house for decoration.

Toilet (Latrine) is auspicious if constructed in north-west corner. The bathroom doors should remain closed at all times. Keep hallways clear so you can move about freely.

Displaying pictures that remind you of loved ones and happy memories will bring good energy to a room.
Door of the stair-case should face either east or south. It will be auspicious if the stairs are constructed in the west or south on the right side.

Shadow of trees falling on the building is inauspicious and causes troubles. It is better if there are no tall trees in the east. Trees in the west are good.

Flow of water and its outlet in the directions other than east, north-west, north-east and north is inauspicious and causes troubles.

Vaastu is the science of balancing cosmic energy field levels of a Plot, House, and Flat etc. Vaastu affects both positive and negative energies, so it is always believed that there should be a constant flow of energy at home. Positive energy should always flow inside the home and negative energy should flow out of the home.

A house designed and constructed taking into account the principles of Vaastu Shastra will transform the life of the person staying in it. If there is a vaastu dosh (defect) in the plot, Vaastu expert can help you in Vaastu correction without demolition of the building or structure. Today, leading builders and developers in India construct homes and apartment with compliance of Vaastu Shastra.

While investing in property or buying an apartment, ensure your builder or developer has constructed the building in compliance with Vaastu. Before investing, you should take the advice of a Vaastu expert so as to avoid complications at a later date.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 7, 2011

Vaastu Tips For Main Door–by Net Guru–

Vaastu Tips For Main Door–by Net Guru–

The main entrance door should be fixed on an auspicious day after performing Vastu Pooja. The Location of the Main door is also very important. To figure out where to place a main door, imagine that you are standing in front of the house and divide the front facade of the house into nine parts. The door should be in the fourth or the sixth module from the left, when facing the house.

North- facing door should be in the 4th module from the left when facing the house, that is favoring towards the North-East. The Reason – Its preferable to have more openings in the North and East to allow the useful sunlight constantly, through the day. Since the door is opaque, it should be placed more to the centre of the wall and windows should be kept in the North-East.

West facing door: can be located in the 4th module from the left when facing the house, that is favouring the North-West and not towards the South-West. The Reason – Its preferable to have more window openings towards the North and East to allow constant sunlight through the day. It is best to avoid openings in the South-West since the hot infra-red rays of the evening sunlight are projected maximum towards this direction.

South facing main door: must not be in the center of the building but should be in the 6th module from the left when facing the house, that is more towards the South-East. The Reason – It is always preferrable to have few openings in the South-West since the hot infra-red rays of the evening sunlight are projected maximum towards this direction.

East facing door: can be located in the 6th module from the left when facing the house, that is more to the North-East. The Reason – Since the North-East corner of a plot is to be left open for sunlight to enter the house, it makes sense to enter from this space but only after leaving as much of window openings towards the North and East.

A simpler way of deciding the right position of the main door is as follows: Imagine that you are standing outside the house, facing the front of the house. Divide the front facade of the house into two parts with an imaginary, middle, vertical line. The door should be placed towards the centre, either in the left or the right half, depending on the direction the house faces.

e house faces.—

For a North-facing house – Avoid placing a door in the right half (North-West), instead place it in the left half, that is in the North-East. The Reason – Its preferable to have more openings in the North and East to allow sunlight constantly, through the day. Since the door is opaque, it should be placed more to the centre of the wall and windows should be kept in the North-East.

The door should not be at the corner of the walls, but a few feet away from the corner junction. The Reason – Its preferable to have more window openings towards the North and East to allow constant sunlight through the day. Since the door is opaque, it should be placed away from the N-E corner, more to the centre.

For a West-facing house – Avoid placing a door in the right half (South-West), instead place it in the left half, that is in the North-West. The Reason – It is always preferrable to have few openings in the South-West since the hot infra-red rays of the evening sunlight are projected maximum to this direction.

If a house has a main entrance in the West it should have a corresponding door in the East also. The Reason -To allow maximum, useful UV rays found in the morning sunlight, into the house, since it is beneficial for health of the inamtes. (vitamin D synthesis)

For a South-facing House – Avoid placing a door in the left half (South-West), instead place it in the right half, that is in the South-East. The Reason – It is always preferrable to have minimum number of openings in the South-West since the hot infra-red rays of the evening sunlight are projected maximum to this direction.

If a house has a main entrance in the South there should be one more corresponding to it in the North direction also. The Reason – To allow the constant light from the North into the house.

For a East facing House – Avoid placing a door in the left half (South-East), instead place it in the right half, that is towards the North-East. The Reason – Since the North-East corner of a plot is to be left open, for sunlight to enter the house, it makes sense to enter from this space but only after leaving as much of window openings towards the North and East.

Thus you can see in Vastu, there is no bad location for a main door. Its the pseudo vastu pundits who claim that South and West entrances are bad and the entrance door should only be in the North or East, because they take the Vastu Shastra guidelines too literally – Since Vastu recommends more open space in the North and East, it makes sense to have the entrance from either of these directions. But it’s not a hard and fast rule.

IN VASTU SHASTRA, ARE THERE ANY SPECIFICATIONS FOR THE MAIN DOOR????—-

Avoid the main door directly facing the main door of the opposite house. The Reason- It is quite uncomfortable when both the doors are open, as one unconsciously tends to look into the other house.

Avoid the main door directly facing an abandoned, rundown or dilapidated building: The Reason- It is quite disconcerting, every time you open the door to see an eerie looking building right in front of you.

The entrance gate and the main door should be on the same side: It is not considered good if the main door to the house is on the opposite side to the entrance of the property. The Reason- It doesn’t make sense to have the entrance on one side and then have the main door on the opposite side as guests and outsiders are forced to walk right across the length of the site, thus invading into the privacy of the inmates.

Avoid having an underground tank, septic tank under the main entrance: The Reason – In case the tank has to be opened or cleaned, it can be very inconvenient if it is right in front of the main door.

Avoid locating the main entrance door in the corners of the house: The Reason- If the door is in the extreme corner, it will be difficult to have a neat furniture layout in the room, as the corner is used for movement.

Avoid locating a wall directly in front of the entrance door: There should be a door that opens to the next room in line of sight, opposite the main door. The Reason- The fresh air entering the house, every time you open the door, can flow into the rest of the house and finally go out through the exit. This allows the house to breathe properly.

It is preferable to have two doors, an entrance and an exit door: However, the exit door should be smaller than the entrance door. The Reason- The fresh air entering into the house through the entrance, will go out through the exit and thus be forced to pass through the rest of the house, thus allowing the house to breathe.

The main entrance door should be the largest door of the house: The Reason- A large main door looks inviting and allows big objects, like beds, to be brought in from outside without difficulty.

The main door should open inside and clockwise: The Reason- If the door swings open in a clockwise motion, you use your left hand to open the door for the guests, thus enabling you to guide them in with your right hand.

Avoid self-closing doors: The Reason- With the self closing locks available nowadays, the doors can shut and close by themselves, but there is the risk that the door will close accidentally in the breeze while the keys are inside the house.

Avoid creaking doors: The Reason- Doors that creak indicate bad workmanship and that the door hinges are not well oiled.

The main door should have a threshold: Shoes should not be kept in front of the door, but to the side. The Reason- The threshold will deter ants and other pests from entering into the house. The shoes in front of the door can be an eyesore and cause you to stumble.

Auspicious signs on the door like ‘Om’ and “Swastika’: The Reason- When you or a guest stand in front of the door it is better to see some pleasant images instead of just a plain door.

Wood of Teak, Honne, Matti are good for the main door: Wood from Peepal, Coconut, trees giving flowers and fruits out of season, Thorny trees, Fragrant trees, etc should not be used. The Reason – Its important to protect useful trees that provide us with fruit etc.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 7, 2011

PYAR KA MAZA….????

“”"”"”"”"”"”"PYAR KA MAZA….????”"”"”"”"”"”"”"”"”

Kuch khabar nahin hum ko apna ya paraya hai,
Dhoondne ye dil jis ko is gali mein aaya hai
Hum duayein dete hain tum ko phir bhi jan-e-jan
Magar tum ne is dil ko be-panah sataya hai
Maar kar mujhe qatil ghumzada sa lagta hai
Is liye to chalte huye thora larkhadaya hai
Kash apne dil ki aag ashk se bujha sakte
Rooth jab gaye ansu usne tab jalaya hai
Bewafa zamane mein kuch wafa shanason ne
Zikr-e-dil zamane se har qadam chhupaya hai
Jal raha tha dil mera phir bhi shukr hai itna
Unko is tamashe mein kuch maza to aaya hai…………….!!!!!!!!!!!!!!!!”"”"

कष्ट विमोचन मंगल स्तोत्र—आचार्य सुशील अवस्थी “प्रभाकर”—-

कष्ट विमोचन मंगल स्तोत्र—-

मंगल देवताओं का सेनापति है!
मंगल ग्रह मनुष्य मे साहस, वीरता, पराक्रम एवम शक्ति का कारक है !
इस ग्रह के यदि शुभ प्रभाव हों तो जातक नेत्रत्व करने वाला परक्रमी होता है !
यदि मंगल अशुभकारक हो तो फ़ोडा, ज्वर, मष्तिष्क ज्वर, अल्सर आदि रोग प्रदान करता है !
मंगल के अशुभ प्रभाव से जातक क्रोध तथा आवेश में अपने जीवन मे अशान्ति स्थापित
करता है ! मंगल के अशुभ प्रभाव वश दुर्घटनाएं आदि भी होती रहती है !

श्री स्कन्द पुराण में वर्णित मंगल स्त्रोत का नित्य श्रद्धा पूर्वक पाठ करने से मंगल के
अशुभ प्रभावों से मुक्ति एवम शुभ प्रभाव की ब्रद्धि होती है ! —-

!! कष्ट विमोचन मंगल स्तोत्र !!

मंगलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रद: !
स्थिरामनो महाकाय: सर्वकर्मविरोधक: !!
लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां। कृपाकरं!
वैरात्मज: कुजौ भौमो भूतिदो भूमिनंदन:!!
धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्!
कुमारं शक्तिहस्तं च मंगलं प्रणमाम्यहम्!!
अंगारको यमश्चैव सर्वरोगापहारक:!
वृष्टे: कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रद:!!
एतानि कुजनामानि नित्यं य: श्रद्धया पठेत्!
ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्रुयात् !!
स्तोत्रमंगारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभि:!
न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्!!
अंगारको महाभाग भगवन्भक्तवत्सल!
त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय:!!
ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यव:!
भयक्लेश मनस्तापा: नश्यन्तु मम सर्वदा!!
अतिवक्र दुराराध्य भोगमुक्तजितात्मन:!
तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्!!
विरञ्चि शक्रादिविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा!
तेन त्वं सर्वसत्वेन ग्रहराजो महाबल:!!
पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गत:!
ऋणदारिद्रयं दु:खेन शत्रुणां च भयात्तत:!!
एभिद्र्वादशभि: श्लोकैर्य: स्तौति च धरासुतम्!

महतीं श्रियमाप्रोति ह्यपरा धनदो युवा:!!
!! इति श्रीस्कन्दपुराणे भार्गवप्रोक्त ऋणमोचन मंगलस्तोत्रम् !!

बुध अष्टोत्तरशतनामवलिः , बुध स्तुति के १०८ मन्त्र—

बुध ग्रह के अशुभ प्रभाव से मुक्ति के लिये प्रतिदिन इन मन्त्रो का पाठ करना चाहिये !बुध ग्रह के अशुभ प्रभाव से मुख्यतः मस्तिष्क के रोग, पगलपन, पढाई मे
अरुचि, हकलाहट आदि मे आश्चर्य जनक लाभ इस स्त्रोत पाढ से प्राप्त होते है यह प्रयोग अनुभव किया हुआ है इसमे तनिक भी सन्देह नहीं है !

!! बुध अष्टोत्तरशतनामवलिः !!
बुध बीज मन्त्र – ॐ ब्राँ ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः !!

ॐ बुधाय नमः !!१
ॐ बुधार्चिताय नमः !!२
ॐ सौम्याय नमः !!३
ॐ सौम्यचित्ताय नमः !!४
ॐ शुभप्रदाय नमः !!५
ॐ दृढव्रताय नमः !!६
ॐ दृढफलाय नमः !!७
ॐ श्रुतिजालप्रबोधकाय नमः !!८
ॐ सत्यवासाय नमः !!९
ॐ सत्यवचसे नमः !!१०
ॐ श्रेयसां पतये नमः !!११
ॐ अव्ययाय नमः !!१२
ॐ सोमजाय नमः !!१३
ॐ सुखदाय नमः !!१४
ॐ श्रीमते नमः !!१५
ॐ सोमवंशप्रदीपकाय नमः !!१६
ॐ वेदविदे नमः !!१७
ॐ वेदतत्त्वाशाय नमः !!१८
ॐ वेदान्तज्ञानभास्कराय नमः !!१९
ॐ विद्याविचक्षणाय नमः !!२०
ॐ विदुषे नमः !!२१
ॐ विद्वत्प्रीतिकराय नमः !!२२
ॐ ऋजवे नमः !!२३
ॐ विश्वानुकूलसंचाराय नमः !!२४
ॐ विशेषविनयान्विताय नमः !!२५
ॐ विविधागमसारज्ञाय नमः !!२६
ॐ वीर्यवते नमः !!२७
ॐ विगतज्वराय नमः !!२८
ॐ त्रिवर्गफलदाय नमः !!२९
ॐ अनन्ताय नमः !!३०
ॐ त्रिदशाधिपपूजिताय नमः !!३१
ॐ बुद्धिमते नमः !!३२
ॐ बहुशास्त्रज्ञाय नमः !!३३
ॐ बलिने नमः !!३४
ॐ बन्धविमोचकाय नमः !!३५
ॐ वक्रातिवक्रगमनाय नमः !!३६
ॐ वासवाय नमः !!३७
ॐ वसुधाधिपाय नमः !!३८
ॐ प्रसन्नवदनाय नमः !!३९
ॐ वन्द्याय नमः !!४०
ॐ वरेण्याय नमः !!४१
ॐ वाग्विलक्षणाय नमः !!४२
ॐ सत्यवते नमः !!४३
ॐ सत्यसंकल्पाय नमः !!४४
ॐ सत्यबन्धवे नमः !!४५
ॐ सदादराय नमः !!४६
ॐ सर्वरोगप्रशमनाय नमः !!४७
ॐ सर्वमृत्युनिवारकाय नमः !!४८
ॐ वाणिज्यनिपुणाय नमः !!४९
ॐ वश्याय नमः !!५०
ॐ वाताङ्गाय नमः !!५१
ॐ वातरोगहृते नमः !!५२
ॐ स्थूलाय नमः !!५३
ॐ स्थैर्यगुणाध्यक्षाय नमः !!५४
ॐ स्थूलसूक्ष्मादिकारणाय नमः !!५५
ॐ अप्रकाशाय नमः !!५६
ॐ प्रकाशात्मने नमः !!५७
ॐ घनाय नमः !!५८
ॐ गगनभूषणाय नमः !!५९
ॐ विधिस्तुत्याय नमः !!६०
ॐ विशालाक्षाय नमः !!६१
ॐ विद्वज्जनमनोहराय नमः !!६२
ॐ चारुशीलाय नमः !!६३
ॐ स्वप्रकाशाय नमः !!६४
ॐ चपलाय नमः !!६५
ॐ जितेन्द्रियाय नमः !!६६
ॐ उदङ्मुखाय नमः !!६७
ॐ मखासक्ताय नमः !!६८
ॐ मगधाधिपतये नमः !!६९
ॐ हरये नमः !!७०
ॐ सौम्यवत्सरसंजाताय नमः !!७१
ॐ सोमप्रियकराय नमः !!७२
ॐ महते नमः !!७३
ॐ सिंहाधिरूढाय नमः !!७४
ॐ सर्वज्ञाय नमः !!७५
ॐ शिखिवर्णाय नमः !!७६
ॐ शिवंकराय नमः !!७७
ॐ पीताम्बराय नमः !!७८
ॐ पीतवपुषे नमः !!७९
ॐ पीतच्छत्रध्वजाङ्किताय नमः !!८०
ॐ खड्गचर्मधराय नमः !!८१
ॐ कार्यकर्त्रे नमः !!८२
ॐ कलुषहारकाय नमः !!८३
ॐ आत्रेयगोत्रजाय नमः !!८४
ॐ अत्यन्तविनयाय नमः !!८५
ॐ विश्वपवनाय नमः !!८६
ॐ चाम्पेयपुष्पसंकाशाय नमः !!८७
ॐ चारणाय नमः !!८८
ॐ चारुभूषणाय नमः !!८९
ॐ वीतरागाय नमः !!९०
ॐ वीतभयाय नमः !!९१
ॐ विशुद्धकनकप्रभाय नमः !!९२
ॐ बन्धुप्रियाय नमः !!९३
ॐ बन्धुयुक्ताय नमः !!९४
ॐ वनमण्डलसंश्रिताय नमः !!९५
ॐ अर्केशाननिवासस्थाय नमः !!९६
ॐ तर्कशास्त्रविशारदाय नमः !!९७
ॐ प्रशान्ताय नमः !!९८
ॐ प्रीतिसंयुक्ताय नमः !!९९
ॐ प्रियकृते नमः !!१००
ॐ प्रियभूषणाय नमः !!१०१
ॐ मेधाविने नमः !!१०२
ॐ माधवसक्ताय नमः !!१०३
ॐ मिथुनाधिपतये नमः !!१०४
ॐ सुधिये नमः !!१०५
ॐ कन्याराशिप्रियाय नमः !!१०६
ॐ कामप्रदाय नमः !!१०७
ॐ घनफलाश्रयाय नमः !!१०८
!!इति बुध अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णम् !!

बुध ग्रह को ज्योतिष मे विचार, सोच, विवेक, सूचना एवम लेखन आदि का कारक माना
जाता है कुण्डली मे बुध के नकारात्मक प्रभाव को कम एवम शुभ प्रभाव मे ब्रद्धि के लिये
बुध के इन एक सौ आठ मन्त्रों का श्रद्धा से बुध देव का स्मरण करते हुए पाठ करने से
बुध के अशुभ प्रभाव से मुक्ति एवम शुभ प्रभाव का लाभ प्राप्त होने लगता है !

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 7, 2011

शनिवज्रपंजरकवचम्—-

शनिवज्रपंजरकवचम्—-

!! शनिवज्रपंजरकवचम् !!

श्री गणेशाय नमः !!

नीलाम्बरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान् !
चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रसन्नः सदा मम स्याद् वरदः प्रशान्तः !! १ !!

!! ब्रह्मा उवाच !!

शृणुध्वमृषयः सर्वे शनिपीडाहरं महत् !
कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम् !! २ !!
कवचं देवतावासं वज्रपंजरसंज्ञकम् !
शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम् !! ३ !!
ॐ श्रीशनैश्चरः पातु भालं मे सूर्यनन्दनः !
नेत्रे छायात्मजः पातु पातु कणौं यमानुजः !! ४ !!
नासां वैवस्वतः पातु मुखं मे भास्करः सदा !
स्निग्धकण्ठश्च मे कण्ठं भुजौ पातु महाभुजः !! ५ !!
स्कन्धौ पातु शनिश्चैव करौ पातु- शुभप्रदः !
वक्षः पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितस्तथा !! ६ !!
नाभिं ग्रहपतिः पातु मन्दः पातु कटिं तथा !
ऊरू ममान्तकः पातु यमो जानुयुगं तथा !! ७ !!
पदौ मन्दगतिः पातु सर्वांगं पातु पिप्पलः !
अंगोपांगानि सर्वाणि रक्षेन् मे सूर्यनन्दनः !! ८ !!
इत्येतत् कवचं दिव्यं पठेत् सूर्यसुतस्य यः !
न तस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्यजः !! ९ !!
व्यय- जन्म- द्वितीयस्थो मृत्युस्थानगतोऽपि वा !
कलत्रस्थो गतो वाऽपि सुप्रीतस्तु सदा शनिः !! १० !!
अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे !
कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित् !! ११ !!
इत्येतत्कवचं दिव्यं सौरेर्यन्निर्मितं पुरा !
द्वादशाऽष्टमजन्मस्थदोषान्नाशयते सदा !
जन्मलग्नस्थितान् दोषान् सर्वान्नाशयते प्रभुः !! १२ !!
!! इति श्री ब्रह्माण्डपुराणे ब्रह्म- नारदसंवादे शनिवज्रपंजरकवचम् सम्पूर्णम् !!

आदरणीय पाठक गणॊं, शनि ग्रह के नाम मात्र से मनुष्य भयभीत हो जाता है कुण्डली में शनि के अशुभ प्रभाव से मुक्ति हेतु उक्त वर्णित स्त्रोत का श्रद्धा पूर्वक नित्य पाठ करने से शनि के प्रकोप से रक्षा होती है इसमे तनिक भी सन्देह नहीं है !

ग्रहों की शान्ती के साधारण उपाय—आचार्य सुशील अवस्थी “प्रभाकर”—

ज्योतिष जगत में ग्रहों के अशुभ प्रभाव से बचने के लिये अनेक उपाय बताये गये हैं यहां हम ग्रह शान्ती के अत्यन्त सरल उपायों के बारे मे चर्चा करेगें ! हम ग्रहों के बारे में बात करते हैं जब कि समस्त ग्रह हमारे परिवार मे उपस्थित हैं हम उनके प्रति अपने आचरण व्यवहार को सुधारलें तो कुण्डली के ग्रह अपने आप अनुकूल हो जयेंगे !

सूर्य : यदि कुन्डली मे सूर्य अशुभ प्रभाब दे रहा हो तो परिवार मे सुर्य अर्थात पिता या पिता तुल्य लोगों का आदर सत्कार करना चहिये उनकी सेवा करनी चहिये उन्हें प्रसन्न रखना चहिये , यदि परिवार मे पिता या पिता तुल्य लोग आपसे संन्तुष्ट रहेंगे तो सुर्य के अशुभ प्रभाव से आप बचे रहेंगे !

चन्द्रमा : यदि कुन्डली मे चन्द्रमा अशुभ प्रभाब दे रहा हो तो परिवार मे चन्द्रमा अर्थात माता या माता तुल्य लोगों का आदर सत्कार करना चहिये उनकी सेवा करनी चहिये उन्हें प्रसन्न रखना चहिये , यदि परिवार मे माता या माता तुल्य लोग आपसे संन्तुष्ट रहेंगे तो चन्द्रमा के अशुभ प्रभाव से आप बचे रहेंगे !

मंगल : यदि कुन्डली मे मंगल अशुभ प्रभाब दे रहा हो तो परिवार मे मंगल अर्थात भाई या भाईयों के तुल्य लोगों का आदर सत्कार करना चहिये उनकी सेवा करनी चहिये उन्हें प्रसन्न रखना चहिये , यदि परिवार मे भाई या भाई तुल्य लोग आपसे संन्तुष्ट रहेंगे तो मंगल के अशुभ प्रभाव से आप बचे रहेंगे !

बुध : यदि कुन्डली मे बुध अशुभ प्रभाब दे रहा हो तो परिवार मे बुध अर्थात बहनें या बहनों के तुल्य लोगों का आदर सत्कार करना चहिये उनकी सेवा करनी चहिये उन्हें प्रसन्न रखना चहिये , यदि परिवार मे बहनें या बहनों के तुल्य लोग आपसे संन्तुष्ट रहेंगे तो बुध के अशुभ प्रभाव से आप बचे रहेंगे !

गुरू : यदि कुन्डली मे गुरू अशुभ प्रभाब दे रहा हो तो परिवार मे गुरू अर्थात अध्यापक, धर्म आचार्य आदि या उनके तुल्य लोगों का आदर सत्कार करना चहिये उनकी सेवा करनी चहिये उन्हें प्रसन्न रखना चहिये, यदि अध्यापक, धर्म आचार्य आदि या उनके तुल्य लोग आपसे संन्तुष्ट रहेंगे तो गुरू के अशुभ प्रभाव से आप बचे रहेंगे !

शुक्र : यदि कुन्डली मे शुक्र अशुभ प्रभाब दे रहा हो तो परिवार मे शुक्र अर्थात पत्नी या सम्पर्की लोगों से मधुर सम्बन्ध रखने चहिये, उनकी भावनाओं का सम्मान करना चहिये और उनको संन्तुष्ट और प्रसन्न रखना चहिये, यदि पत्नी या सम्पर्की लोग आपसे संन्तुष्ट रहेंगे तो शुक्र के अशुभ प्रभाव से आप बचे रहेंगे !

शनि : यदि कुन्डली मे शनि अशुभ प्रभाब दे रहा हो तो परिवार मे शनि अर्थात परिवार य समाज के सेवक अर्थात घर के नौकर आदि से प्रेम भाव से व्यवहार करना चहिये उनकी सेवा का पूर्ण मूल्य देना चहिये उन्हें प्रसन्न रखना चहिये यदि परिवार के सेवक अर्थात घर के नौकर आदि आपसे संन्तुष्ट रहेंगे तो शनि के अशुभ प्रभाव से आप बचे रहेंगे !

राहू : यदि कुन्डली मे राहू अशुभ प्रभाब दे रहा हो तो परिवार मे राहू अर्थात दादा या दादा तुल्य लोगों का आदर सत्कार करना चहिये उनकी सेवा करनी चहिये उन्हें प्रसन्न रखना चहिये , यदि परिवार मे दादा या दादा तुल्य लोग आपसे संन्तुष्ट रहेंगे तो राहू के अशुभ प्रभाव से आप बचे रहेंगे !

केतू : यदि कुन्डली मे केतू अशुभ प्रभाब दे रहा हो तो परिवार मे केतू अर्थात नाना या नाना तुल्य लोगों का आदर सत्कार करना चहिये उनकी सेवा करनी चहिये उन्हें प्रसन्न रखना चहिये , यदि परिवार मे नाना या नाना तुल्य लोग आपसे संन्तुष्ट रहेंगे तो केतू के अशुभ प्रभाव से आप बचे रहेंगे !

ये उपाय अनुभव किये हुए हैं इन्हे लोगों ने प्रयोग किया और पुर्ण अनुकूल फल प्राप्त हुए……..

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 7, 2011

नव ग्रहों की शांति के सरल उपाय:-

नव ग्रहों की शांति के सरल उपाय–by आचार्य सुशील अवस्थी “प्रभाकर”

नव ग्रहों की शांति के सरल उपाय:—–

कुंडली में जब भी कोई ग्रह अशुभकारी होता है तो वो ग्रह अपनी दशा तथा गोचर में जातक को कष्ट प्रदान करता है जिससे निजात पाने के अनेक तरीके विद्वानों ने बताये है जिनमे से प्रमुख जो मैंने लोगो को बताये और जिनसे लोगो को फायदा हुआ है उनके बारे में यहाँ वर्णन कर रहा हूँ :-

सूर्य:- माणिक्य, ताम्र पात्र, गेहूँ, लाल चन्दन, लाल वस्त्र, का रविवार को दान करना चाहिए! प्रतिदिन प्रात: काल सूर्य को जल देना चाहिए ! “ओम ह्रां हीं सः सूर्याय नमः” मन्त्र का जप करना चाहिए !

चंद्र:- मोती, चाँदी, चावल, दूध, श्वेत मोती, का दान सोमवार को करना चाहिए ! प्रतिदिन शिवलिंग पर दूध चढ़ाना
चाहिए ! “ओम श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः” मन्त्र का प्रतिदिन जप करना चाहिए !

मंगल:- मूँगा, ताम्रपात्र, मसूर की लाल दाल, लाल मूँगा, का दान मंगलवार को करना चाहिए ! यदि मंगल अधिक अशुभकारी हो तथा दुर्घटना का भय हो तो खून (रक्त) का दान किसी अंजान जरूरतमंद को करना चाहिए !
“ओम क्रां क्रीं क्रों सः भौमाय नमः” मन्त्र का जप करना चाहिए !

बुध:- पन्ना, कांसा, मूँग हरा, का दान बुधवार को करना चाहिए ! बच्चो को हरे रंग की टॉफी या अन्य सामग्री का दान करना चाहिए ! गाय को हरा चारा खिलाना चाहिए ! “ओम ब्रां ब्रीं ब्रों सः बुधाय नमः” मन्त्र का जप करना चाहिए !

गुरु:- पुखराज, सोना, चनादाल, पीली हल्दी, धार्मिक ग्रन्थ का दान गुरुवार के दिन विद्वान एवम सात्विक ब्राम्हण को करना चाहिए !
“ओम ग्रां ग्रीं ग्रों सः गुरुवै नमः” मन्त्र का जप करना चाहिए !

शुक्र:- हीरा, चाँदी, चावल, श्वेत स्फटिक, स्वेत वस्त्र, इत्र का दान करना शुक्रवार को चाहिए !
“ओम द्रां द्रीं द्रों सः शुक्राय नमः” मन्त्र का जप करना चाहिए !

शनि:- नीलम, लोहा, उड़ददाल काला, नीलमणि, सरसों का तेल दान शनिवार को करना चाहिए ! यदि शनि अधिक अशुभकारी हो तो लोहे की कटोरी में सरसों का तेल ले कर उसमे अपने चेहरा देखने के बाद उस तेल में काले तिल दाल कर शनिवार को दान करना चाहिए !
“ओम प्रां प्रीं प्रों सः शनैश्चराय नमः” मन्त्र का जप करना चाहिए !

राहु:- गोमेद, सीसा, तिल काला, काला वस्त्र का दान शनिवार को करना चाहिए ! राहु अधिक अशुभकारी हो तो जिन्दा मछलियों को जल में छोड़ना चाहिए ! “ओम भ्रां भ्रीं भ्रों सः राहवे नमः” मन्त्र का जप करना चाहिए !
केतु:- लहसुनिया, लोहा, तिल काला, ध्रूमवर्ण वस्त्र, का दान शनिवार को करना चाहिए !
“ओम स्रां स्रीं स्रों सः केतवे नमः” मन्त्र का जप करना चाहिए !

हमारे यहां जब भी कोई बड़ा पूजन पाठ करवाया जाता है तो कहा जाता है कि पूर्व की ओर मुंह करके बैठना चाहिए। लेकिन केवल विशेष पूजा-पाठ के समय ही नहीं बल्कि हमेशा पूजा करते समय पूर्व दिशा की ओर ही मुंह रखना चाहिए क्योंकि किसी भी घर के वास्तु में ईशान्य कोण यानी उत्तर-पूर्व या पूर्व दिशा का बड़ा महत्व है।

वास्तु के अनुसार ईशान कोण स्वर्ग दरवाजा कहलाता है। ऐसा माना जाता है कि ईशान कोण में बैठकर पूर्व दिशा की और मुंह करके पूजन करने से स्वर्ग में स्थान मिलता है क्योंकि उसी दिशा से सारी ऊर्जाएं घर में बरसती है। ईशान्य सात्विक ऊर्जाओं का प्रमुख स्त्रोत है। किसी भी भवन में ईशान्य कोण सबसे ठंडा क्षेत्र है। वास्तु पुरुष का सिर ईशान्य में होता है। जिस घर में ईशान्य कोण में दोष होगा उसके निवासियों को दुर्भाग्य का सामना करना पड़ता है।

साथ ही पूर्व दिशा को गुरु की दिशा माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार गुरु को धर्म व आध्यात्म का कारक माना जाता है। ईशान्य कोण का अधिपति शिव को माना गया है। मान्यता है कि इस दिशा की ओर मुंह करके पूजा करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का निवास होता है बाद में ये ऊर्जाएं पूरे घर में फैल जाती हैं। पूर्व दिशा में बैठकर सुबह सूर्य की किरणों का सेवन करने से कई रोगों से मुक्ति मिल जाती है।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 8, 2011

गुरुवार को क्या करना चाहिए?

गुरुवार को क्या करना चाहिए?????

ज्योतिष शास्त्र में गुरु अर्थात् बृहस्पति ग्रह को विवाह के संबंध महत्वपूर्ण ग्रह माना जाता है। किसी व्यक्ति का विवाह कब होगा? यह काफी हद तक बृहस्पति की दशा पर निर्भर करता है। यदि आपका विवाह होने में कोई बाधा आ रही है तो आप गुरुदेव अर्थात् बृहस्पति ग्रह की विशेष पूजा-अर्चना कर उन्हें खुश करें, निश्चित ही आपके विवाह की सारी अड़चने समाप्त हो जाएगी। यह कुछ उपाय दिए जा रहे हैं जिनसे बृहस्पति देव जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं:

- यदि आपकी कुंडली में गुरु अशुभ प्रभाव दे रहा है तो आप पीला रंग निजी उपयोग में ना लें। पीला रंग बृहस्पति का रंग है। जिससे वह और अधिक सक्रिय हो जाता है। यदि आपकी कुंडली बृहस्पति शुभ फल देने वाला है तो पीला रंग अधिक से अधिक उपयोग में लाएं। जिससे आपकी बहुत सारी समस्याएं जल्द से जल्द समाप्त हो जाएंगी।

- प्रति गुरुवार घोड़े को चने की दाल खिलाएं। विवाह जल्दी होगा।

- दान या उपहार में पीले रंग की वस्तु ना लें।

- नहाने का पानी में कुछ सोना डुबोकर रखें फिर उस जल से स्नान करें।

- भगवान विष्णु की नित्य पूजा करें।

- अपने गुरु को, किसी गरीब को, ब्राह्मण को या किसी सुहागिन स्त्री को गुरु ग्रह से संबंधित वस्तुएं दान में दें।

- 27 गुरुवार तक निरंतर मंदिर में गाय के घी का दीपक लगाएं।

- प्रति गुरुवार चमेली के 9-9 पुष्प नदी में प्रवाहित करें।

- अधिक से अधिक पीले रंग का खाना खाएं, जैसे आम, पपीता, बेसन से बने खाद्य पदार्थ आदि।

- पुखराज का दान करें।

- प्रति गुरुवार को व्रत-उपवास करें।

मानसिक तनाव दूर करते हे–वास्तु टिप्स / उपाय—

आजकल हर किसी की जिंदगी भागदौड़ से भरी है। हर कोई इस तरह अपने काम में लगा हुआ है कि मानसिक शांति तो बिल्कुल ही नहीं है। किसी के भी पास अपने आप के लिए वक्त ही नहीं है। अगर आप मानसिक तनाव से मुक्ति चाहते हैं तो नीचे लिखे वास्तु प्रयोग जरूर अपनाएं इनको अपनाने से आप खुद को सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर महसूस करेंगे।

- रात में झूठे बर्तन न रखें।

- संध्या समय पर खाना न खाएं और नही स्नान करें।

- शाम के समय घर में सुगंधित एवं पवित्र धुआ करें।

- दिन में एक बार चांदी के गिलास का पानी पीएं। इससे क्रोध पर नियंत्रण होता है।

- शयन कक्ष में मदिरापान नहीं करें। अन्यथा रोगी होने तथा डरावने सपनों का भय होता है।

- कंटीले पौधे घर में नहीं लगाएं।

- किचन में अग्रि और पानी साथ न रखें।

- अपने घर में चटकीले रंग नहीं कराये।

- घर में जाले न लगने दें, इससे मानसिक तनाव कम होता है।

- किचन का पत्थर काला नहीं रखें।

- भोजन रसोईघर में बैठकर ही करें।

- इन छोटे-छोटे उपायों से आप शांति का अनुभव करेंगे।

- घर में कोई रोगी हो तो एक कटोरी में केसर घोलकर उसके कमरे में रखे दें। वह जल्दी स्वस्थ हो जाएगा।

- घर में ऐसी व्यवस्था करें कि वातावरण सुगंधित रहे। सुगंधित वातावरण से मन प्रसन्न रहता है।

आज के मुहूर्त और राशिफल—( 08 अप्रेल ,2011)——-

April 8, 2011: Friday, Sukla Panchami till 5:18*,
Rohini till 2:31*, Ayushman yoga till 12:13,
Bava karana till 16:47, Balava karana till 5:18*,
RahuK: 10:39* – 12:09*, GulikaK: 7:39* – 9:09*, YamaG: 15:09* – 16:39*,
Sunrise at 6:07*, Sunset at 18:39,
Moonrise at 8:53, Moonset at 23:05, Moon in Vrish (whole day)
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8 अप्रैल 2011:
शुक्रवार, Sukla, 5:18 पंचमी तक *
* 02:31 रोहिणी तक, जब तक 12:13 योग Ayushman,
जब तक 16:47 करण बावा, 5:18 * तक Balava करण,
RahuK: * 10:39-0:09 *, GulikaK: 7:39 * – 9:09 *, YamaG: 15:09 * – 16:39 *,
18:39 पर सूर्योदय पर 6:07 सूर्यास्त, *,
8:53 पर Moonrise, 23:05 पर Moonset,) दिन चंद्रमा में Vrish (पूरी )
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दैनिक राशिफल—-

राशि फलादेश मेष—-
आर्थिक परिस्थिति में अनुकूलता रहेगी। मन में अच्छा आभास होगा। निर्णय लेने में विलंब न करें। मकान आदि की खरीदी का योग बनेगा।

राशि फलादेश वृष—
आपका कारोबार ठीक चलेगा। परिवार में खुशी रहेगी। उत्साह का वातावरण रहेगा। कार्य पूर्ण सफलता के साथ पूरे होंगे।

राशि फलादेश मिथुन—
व्यापार में नई योजनाएँ बनेंगी। खान-पान में सावधानी बरतें। प्रयास सार्थक होंगे। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा में लाभ होने के योग हैं। कार्यक्षमता में वृद्धि होगी।

राशि फलादेश कर्क—
आपकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी। वाद-विवाद को टालें। व्यापारिक यात्रा लाभप्रद होगी। संतान की ओर से सुखदायक समाचार मिलेंगे। समय का सदुपयोग करें।

राशि फलादेश सिंह—
रुका पैसा प्राप्त होगा। प्रयत्नों का पूरा फल मिलेगा। मांगलिक कार्य की रूपरेखा बनेगी। व्यवहारकुशलता से व्यापार में सफलता प्राप्त करेंगे। संतान की तरफ से चिंता रह सकती है।

राशि फलादेश कन्या—
आर्थिक परिस्थिति में अवरोध आएँगे। नए शत्रु बनेंगे, जो आगे जाकर दुखदायी साबित होंगे। व्यापार-व्यवसाय में सावधानी बरतें। अपनों का विरोध सहन करना पड़ेगा।

राशि फलादेश तुला—
व्यापार-धंधे में सफलता की उम्मीद कम है। मानसिक शांति बनाए रखें। कानूनी फैसला आपके हित में होगा। पारिवारिक सदस्यों से मदद मिलेगी।

राशि फलादेश वृश्चिक—
पारिवारिक उलझनें दूर होंगी। दूसरों की आलोचना से बचना जरूरी। भौतिक सुख साधनों की प्राप्ति होगी। अभीष्ट सिद्धि और मनोनुकूल लाभ मिलेगा।

राशि फलादेश धनु—
दिन प्रसन्नतापूर्वक बीतेगा। सामाजिक क्षेत्र विकसित होगा। पारिवारिक जीवन उत्साहपूर्ण रहेगा। दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप से बचें।

राशि फलादेश मकर—
नई योजनाएँ बनेंगी। संगीत के क्षेत्र में रुचि बढ़ेगी। जीवनसाथी से संबंध प्रगाढ़ होंगे। व्यापारिक यात्रा लाभप्रद होगी। व्ययों में कमी करें।

राशि फलादेश कुंभ—
परिवार में सुख-शांति रहेगी। ऋण की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए। अच्छे संबंधों के कारण उन्नति पथ प्रशस्त होगा। धैर्य, सहनशीलता रखना होगी।

राशि फलादेश मीन—
लेन-देन के मामले में राहत महसूस करेंगे। दांपत्य जीवन सुखद रहेगा। भागदौड़ लाभदायी एवं सार्थक सिद्ध होगी। व्यापार का क्षेत्र विस्तृत होगा।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 9, 2011

Friendship

Friendship Is Like… NOKIA!
Connecting People!

Friendship Is Like… SAMSUNG
Every One Is Invited!

Friendship Is Like… CELL ONE
Changing Life Style!

Friendship Is Like… PHILIPS
Lets Makes Things Better!

Friendship Is Like… TAPAL
Jaisay Chaho Jeoooo!

Friendship Is Like… SPRITE
Sirf Yeh Bhujaye Pyas Baki All Bakwass!

Friendship Is Like… PEPSI
Ask For More!

Friendship Is Like… LG
Digitally Yours!

Friendship Is Like… NIKE
Just Do It!

Friendship Is Like… HABIB
Kyoun Kay Ye Dil Ka Mamla Hai!

Friendship Is Like… WAVES
Naam Hi Kafi Hai!

Friendship Is Like… BUTTER SCOTCH (hmmm)
Chalti Jayee Chalti Jayee Chali Jayeeeee!

Friendship Is Like… COCA COLA
Enjoyyyyyyyyyyyyyyyy

अप्रैल में कौन-कौन से अद्भुत योग कब हैं?

शास्त्रों के अनुसार कई ऐसे योग बताए गए हैं जब किसी भी शुभ कार्य को करने से अक्षय पुण्य और सफलता की प्राप्ति होती है। ऐसे योग हर माह बनते हैं। इन खास योगों में सभी मांगलिक कार्य शुभ फल प्रदान करते हैं। जानिए इस माह कौन-कौन से अद्भुत योग बन रहे हैं-

सर्वार्थ सिद्धि योग- इस योग में पूजन आदि कर्म करने से हमारे सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। इस माह दिनांक 3 अप्रैल को सूर्योदय के बाद दिन के 1.42 के तक यह योग रहेगा। 5 अप्रैल सूर्योदय के बाद शाम 6.30 तक यह योग बनेगा। 6 अप्रैल को रात 8.30 के बाद रात अंत तक सर्वार्थ सिद्धि योग बनता है। 17 अप्रैल को सूर्योदय से दिन के 3.11 तक, 20 अप्रैल को दिन के 10.50 से 21 अप्रैल को दिन के 10 बजे तक, दिनांक 24 को दिन में 9.35 से रात तक। दिनांक 25 को दिन के 10.25 से रात तक सर्वार्थ सिद्धि योग बनेगा।

पुष्य नक्षत्र- इस माह 11 अप्रैल को रात के 11.20 से दिनांक 21 के 10.30 रात तक पुष्य नक्षत्र योग रहेगा।

मेष संक्रांति- अप्रैल 14 को 2.30 के बाद।

त्रिपुष्कर योग- 19 अप्रैल को दिन के 12 बजे से रात 4.10 तक। दिनांक 24 अप्रैल को सुबह के 9.35 बजे से रात के 11 बजे तक त्रिपुष्कर योग रहेगा।

अमृत सिद्धि योग- 5 अप्रैल को सूर्योदय के बाद शाम 6.30 तक यह योग रहेगा। इसके बाद 17 अप्रैल सूर्योदय से दोपहर 3.10 बजे तक। 20 अप्रैल को सुबह 10.50 से रात के आखिरी पहर तक अमृत सिद्ध योग रहेगा।

अगर हो पैसों की कमी, करें यह उपाय—–

वर्तमान समय में जिस तरह से मंहगाई दिनों दिन बढ़ती जा रही है। आम आदमी की इनकम कम लगने लगी है। आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपय्या की तर्ज पर जीने वाले आम लोगों के लिए इस मंहगाई में गुजारा करना मुश्किल हो गया है। आज के इस महंगाई के जमाने में घर में बरकत ना होना। आमदनी से अधिक खर्च होना एक आम समस्या है। इसी कारण घर में कभी पूरी तरह से सम्पन्नता नहीं आ पाती है। अगर आपको भी आर्थिक तंगी परेशान कर रही है तो नीचे लिखे उपायों को जरूर अपनाएं।

उपाय—-

- लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए हर एकादशी को घर के पूजा स्थल पर ग्यारह दीपक जलाएं।
- घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर तांबे के सिक्के को लाल रंग के नए कपड़े में बांधने से कभी घर में आर्थिक तंगी नहीं होती।
- रोज सूर्य को नियमित रूप से अघ्र्य दें।
- शनिवार को काले कुत्ते को रोटी जरूर डालें।
- घर का कोना-कोना साफ रखें।
- घर के मुख्य द्वार पर रंगोली बनाएं।
- अपनी कमाई का कुछ प्रतिशत हिस्सा दान करें।

इन उपायों को करने से निश्चित ही आपकी आर्थिक स्थिति में सुधार आने लगेगा।

घुंघरुओं की आवाज आए तो होंगे मालामाल—–

जीवन में यदि आर्थिक स्वतंत्रता हो तो किसी बात की परेशानी नहीं होती। लेकिन पैसे के अभाव में जीवन एकदम नीरस लगता है। यदि आपके जीवन में भी पैसे की तंगी है तो नीचे लिखे उपाय से आप भी धनवान हो सकते हैं। यह उपाय अक्षय तृतीया, दीपावली, धनतेरस या किसी शुक्रवार की रात को करना चाहिए। यह इस प्रकार है-
उपाय—–

कांसे या पीतल की थाली में काजल लगाकर इसे काली कर दें और फिर चांदी की डण्डी से उस पर लक्ष्मीजी का चित्र बनाएं। फिर उस चित्र पर ऐश्वर्य लक्ष्मी यंत्र स्थापित कर दें और सिर्फ एक सफेद धोती पहनकर उत्तर दिशा की ओर मुंह करके सामने गेहूं के आटे के चार दीपक बनाएँ और उसमें तेल भर कर जला लें। थाली के चारों कोनों पर रखे मूंगे की माला से इस मंत्र का 51 माला जप करें।

मंत्र- ऊँ ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं ह्रीं ह्रीं फट्…….

जब मंत्र पूरा हो जाए तो रात्रि में वहीं जमीन पर ही सो जाएं। सुबह जब घुंघरुओं की आवाज सुनें तो समझ लें कि लक्ष्मी का आगमन आपके घर हो गया है। फिर कभी आपको धन संबंधी परेशानी नहीं होगी।

एक कल्पना कीजिए …..

जिसने जन्म लिया है उसे एक दिन अवश्य मरना भी है, आपको भी 3 दिन बाद मरना है. 3 दिन बाद आपको फांसी दे दी जायेगी. आपकी मौत निश्चित है….
अब आप उस मौत के दर्द को महसूस कीजिये ….. आपका परिवार और सब कुछ छूट जायेगा …..
क्या आप अपने गले मे फांसी का फन्दा सोच कर कांप गये ????
अब सोचो भगत सिंह जैसे अनगिनत शहीदों को जो हंसते हंसते देश के लिये फांसी पर चढ़ गये थे …..
महसूस करो उनके दर्द को, और देखो आज के भ्रष्टाचार से भरे भारत को , क्या ऐसा भारत बनाने के लिये उन्होने अपनी जान की कुर्बानी दी थी ….
अब मरने की कल्पना से बाहर आइये और सोचिये ……
जब वो लोग देश के लिये मर सकते है तो क्या आप देश के लिये जी भी नहीं सकते ?????????
देश के लिये जिएँ और अच्छा भारत बनाएँ, अपने आप से शुरुआत करें. आप बदलेंगे तभी देश बदलेगा .
भगवान आपको लम्बी उम्र दे ………

अब एक और कल्पना कीजिये ……………
आप लम्बी उम्र जिएँ, लेकिन ना आप बदलें, ना देश बदले, 20-25 साल बाद आपके बच्चे, पोते, नाती सब एक ऐसे देश मे जी रहे हों जिसकी हालत सोमालिया आदि देशो से भी बदतर है, बेहिसाब आबादी है , हर तरफ मारकाट मची है, कोई कानून नहीं है, जंगलराज की सी हालत है , सभी जातियाँ कबीलों की तरह लड़ रही है . भूख से बेहाल गरीब अमीरों को लूट रहें हैं, अमीर उनपर गोलियां चला रहे हैं , एक पल का भी भरोसा नहीं है कब कौन आपके बच्चों को अनाथ कर दे या बच्चो का अपहरण कर ले.
क्या आप अपने बच्चों को ऐसा भारत देना चाहते हो ? आप अपने बच्चों को हर चीज देते है , अच्छी शिक्षा , अच्छे कपड़े, अच्छे गेजेट्स ….
फिर क्या आप उन्हे अच्छा भारत नहीं देंगे ??????
एक लाख अस्सी हजार करोड़ (18,00,00,00,00,000) का 2G स्पेक्ट्रम घोटाला, सत्तर हजार करोड का CWG घोटाला जैसे अनेक घोटालों ने देश को हिला कर रख दिया है. और आप चुपचाप है, आप कर भी क्या सकते है ?
आप सबकुछ कर सकते है , आप ही ने उन नेताओ को वोट देकर नेता बनाया था…………
आप क्या क्या कर सकते हैं ?
1. देश मे भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून (जन लोकपाल) बनाने के लिये “भारत बनाम भ्रष्टाचार” के बेनर तले देश में एक अन्दोलन चल रहा है जिसका नेतृत्व गणमान्य लोग जैसे स्वामी रामदेव, श्री रवि शंकर, अन्ना हजारे, महमूद मदानी, दिल्ली के आर्कबिषप, किरण बेदी, अरविन्द केजरीवाल, स्वामी अग्निवेश, न्यायमूर्ति लिंगदोह , मल्लिका साराभाइ आदि अनेक लोग कर रहे हैं (अधिक जानकारी के लिये साइट देखें http://www. indiaagainstcorruption.org/)

2. लोकतंत्र मे आप सबसे ताकतवर हैं क्योंकि आप से वोट से सरकार बनती है, सोचसमझ कर वोट दें , सिर्फ जाति और धर्म के आधार पर वोट ना दें . भारत के सभी सभ्य और ईमानदार लोगभ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होकर एक वोट बैंक बना रहे हैं आप उसमें अपने आप को रजिस्टर करें (http://voteforindia. org/).
3. अगर आप फेसबुक का उपयोग करते हैं तो जुड़ जाएं http://www.facebook.com/ IndiACor से ( इस लिंक पे क्लिक करे और फिर like पर क्लिक करे )
4. शक्ति संघे कलयुगे ( कलयुग में संगठन ही सबसे बड़ी शक्ति है ) , आज देश के सभी भ्रष्ट लोग (20% ) संगठित हैं , जबकि हम सभी ईमानदार ( 80%) लोग बिखरे पड़े हैं , जिस से भ्रष्ट लोग हावी हैं, और हम लोगो को संगठित नहीं होने देते, हमे धर्म, जाति, क्षेत्र आदि के नाम पे लड़वाते हैं जिस से हम एक ना हो. तथा देश की अधिकतर आबादी अनपढ़ बनी रहे. शोषित होने के लिये बाध्य रहे. आप संगठित बनो, अपने दोस्तो को , पड़ोसियों को इस अन्दोलन के बारे में बताएं (फूट डालो और राज करो की कुनीति पहले अंग्रेज अपनाते थे अब ये नेता अपना रहे हैं )

जय हिन्द

Posted by: vastushastri08 | जून 5, 2011

Profile of Pt. Dayananda Shastri —

Profile of
Pt. Dayananda Shastri
Career Objective : To become a successful vastu- astro adviser.
Looking for a challenging job / assignment where I can prove my ability working knowledge & problem solving capacity through my sincerely dedication and hard work.

Experience :—-

1. I worked with M/s. Nicholas Piramal India Ltd., Pithampur as an Operator. – One year (1992-93)
2. I worked with M/s. Manoj Surgical India Ltd., Pithampur as an Electrician. – Three year (1993-96)
3. I worked with M/s. Somya Agencies, Jhalrapatan as a Marketing Executive – Four year (1996-2000)
4. I worked with M/s. Priyal Enterprises, Jhawar as a Marketing Executive – Two year (2000-2002)
5. I worked with A.P. Enterprises as a project head for a MNC.
6. I am a QMS ( ISO 9001: 2000 ) Consultent.
7. I am a Pyra Vastu Consultant.( Vaastu Correction without Demolitiuon )
8. Presently I am working as a vastu- astro adviser ( till last 5 years).
9. Presently I am working as a editor / publisher of “VINAYAK VASTU TIMES” ( Forinightly) & “VIPRA-PRAGYA”newspaper in Hindi.

Professional Qualification :—-
1. I have a Diploma in Computer S/W Management from M/s I.C.S.T. Jhalrapatan.
2. I have a Computer Hardware Course from ETDC (Govt. of India), Malviya Nagar, Jaipur.
3. I have a Internal Auditor Course (Four Days Training Program) on “ISO 9000 : 2000 …
4. I attended four days training program on foreign export documentation & procedure, organized by Indian Institute of foreign trade, Delhi & Indian Institute of craft and design, Jhalana Dungaree, Jaipur .
5. I have a Pyra Vastu Expert [Consultant] Course by Prof.Dr. Jiten Bhatt, Vadodara.(2004)
6. I have Vastu Ratna & Samudrik Ratna Course by from AIFAS (DELHI).
Membership—-
1. I am a member of National Center for Quality Management, Mumbai.
2. I am a member of Anuvrat Samiti, Jaipur.
3. I am a member of Bharat Scout & Guide, Jhalawar.
4. I am a member of Akhil Bhartiya Sudharm Ahinsa Prachar Samiti.
5. I am a member of Bharat Scout & Guide, Jhalawar
6. I am a Exicutive Life member of Bharat-Nepal Astro counsil, Kathmandu (Nepal)
7. I am a Life member of Vastu Vigyan Nepal, Kathamandu.(Nepal)
8. I am a member of Indian Astrology Council, New Delhi, INDIA.
9. I am a life member of South Ashian Astrology Fedration, Kathamandu (Nepal)
10. I am a well wisher member of World Astrologers Society, Kolkata (India)
11. I am a life member of All India Falodi Astological Reserch Society,Kota (Raj.)
12. I am a member of JAR & Jhalrapatan Press Club.
Training Organized :—-
I have organized one day awareness programme on Vastu at Kota, Jhalawar, Baran, Bikaner, Neemuch (M.P.) & many other places.
Spacial Awards and Titles :—-
I have received various titels, momentos and awards (with Gold Medels) like-Jyotish Marmagya, Jyotish Samrat, Jyotish Shree,Jyotish Bhasker, Vastu Maharshi,Jyotish Vrahmihir,Jyotish Divya Bhasker,Devgya Shiromani,Vastu Bhasker,Jyotish Ratnaker,Vastu-Purush Gourav, Vastu Shiromani,Jyotish mani etc.

Special awards :—-
01. I have awarded by Shanti-Doot (Culture & Peace Award ) on 4th oct.,2008 at Ujjain(M.P.) in 1st world Peace Confrence.( World Peace Day).
02. I have awarded by Rajasthan Univercity as Jyotish Ratna( Dr. M.K.Jain-Vice chansler) 2007.
03. I have awarded by Smt. Pratibha Patil (Governer Of Rajasthan) as Jyotish Vishawkama award in 2006.
04. I have awarded by Gold Medal & Jyotish Tara Titel in 2006 at 3rd south asian astrologers conference.
Also got Mata Guhyeshwari Award. By Mr. Lokendra Bahadur Chand (Ex-Prime Minister Of Nepal)
05. I have awarded by KATHMANDU Mteropolitian city council-commishner by a special momento 0f Swayambhu mandir.
Extra Activities :—–
1. N.C.C. (Naval Wing “A” Certificate )
2. Participate various activities of N.C.C. & Scout.
3. Participated in various culture activities at school and I.T.I.
4. Participated in social activities at Jhalrapatan.
5. I have attended One Day Training Program on Rural Insurance arrange by I.I.R.D., Jhalawar.
6. I am working as a Freelons Journalist till last 8 years for various news papers.
7. I have attended (Participated) various astro-vastu conference (seminars/ sammelans) in major part of India also with “NEPAL”.I ALSO HELP TO ORGENISED IN MORE THEN 60 SAMMELANS/CONFRENCES.
8. I have written articles on Vastu-Astrology,palmistry & other releted subjectets which publish in various
newspapers & magazines WITH online news portels.

Father’s Name : Shri Bheru Lal Sharma
Mother’s Name : Late Smt. Kamla Devi Sharma
Date of Birth : 14th July, 1971
Time Of Birth : 16:15 PM
Place Of Birth : Jhalrapatan City (Rajasthan)

Language Know : Hindi, English

Regional Language: Malvi,Rajasthani,Gujrati,

Contact No. : 09024390067;; 09413103883

Postal / Communication Address :

Pt. Dayananda Shastri,
(Editor- Vinayak Vastu Times )
(R.N.I. No.:- RAJHIN/2008/25671)
Vinayak vastu Astro Shodha Sansthan,
Near Old Power House, Kasera Bazar,
JHALRAPATAN CITY (RAJ.) 326023 INDIA

E-Maii:- vastushastri08@gmail.com;vastushastri08hotmail.com;
-dayanandashastri@yahoo.com; vastushastri08@rediffmail.com;

Blogs– 1.- http://vinayakvaastutimes.mywebdunia.com//;;;;
— 2.- https://vinayakvaastutimes.wordpress.com///;;;
— 3.- http://vinayakvaastutimes.apnimaati.com//;;;;
—4.- http://www.mediaclubofindia.com/profile/PtDAYANANDASHASTRI ;;;;;///

(Pt.Dayananda Shastri)

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 9, 2011

आज पंचांग और राशिफल- 09 अप्रेल,2011

9 अप्रैल 2011: शनिवार, 5:55 * तक Sukla Shashthi,
* 03:48 Mrigasira तक, जब तक 11:58 योग Soubhagya,
जब तक 17:41 करण Kaulava, 5:55 * तक Taitula करण,
RahuK: * 9:08-10:38 *, GulikaK: 6:08 * – 7:38 *, YamaG: 13:38 * – 15:08 *,
18:39 पर सूर्योदय पर 6:06 सूर्यास्त, *,
9:40 पर Moonrise, 23:59 पर Moonset, 15:14 तक Vrish में मून
———————————————————————————————————-
April 19, 2011: Tuesday, Krishna Dwitiya till 1:29*,
Swaati till 10:12, Siddhi yoga till 23:13,
Taitula karana till 15:01, Garija karana till 1:29*,
RahuK: 14:57* – 16:27*, GulikaK: 11:57* – 13:27*, YamaG: 8:57* – 10:27*,
Sunrise at 5:55*, Sunset at 18:45,
Moonrise at 20:24, Moonset at 6:37, Moon in Tula till 2:27*
————————————————————————————————————-

दैनिक राशिफल—-

राशि फलादेश मेष–
व्यापार लाभप्रद रहेगा। आपकी बुद्धिमानी से कार्यों में सफलता मिलेगी। अचानक धन मिलने के भी योग हैं। व्यापार अच्छा चलेगा।

राशि फलादेश वृष—
आत्मीयजनों के सहयोग से मिलेगा। लापरवाही से काम न करें। नौकरी में दिन सुधारात्मक रहेगा। महत्वपूर्ण लाभ के अवसर प्राप्त होंगे।

राशि फलादेश मिथुन—
स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना आवश्यक है। महत्वाकांक्षाएँ फलीभूत होंगी। स्थायी संपत्ति प्राप्ति के योग हैं। व्यापार में इच्छित सफलता प्राप्त करेंगे।

राशि फलादेश कर्क—
समाज में आपके कार्यों की प्रशंसा होगी। दांपत्य जीवन सुखद। क्रोध पर नियंत्रण रखें। व्यापार-व्यवसाय में ठीक-ठीक अवसर प्राप्त हो सकेंगे।

राशि फलादेश सिंह—-
लाभ होने की संभावना बनती है। पारिवारिक जीवन में संताप हो सकता है। नया प्रस्ताव मिलेगा। धार्मिक रुचि बढ़ेगी। सुख-समृद्धि बढ़ेगी।

राशि फलादेश कन्या—
व्यापारिक निर्णय लेने में दुविधा होगी। जिससे कार्य की गति प्रभावित हो सकती है। पारिवारिक चिंता एवं प्रतिस्पर्धा से उत्तेजना बढ़ेगी। आने वाले धन में विलंब होगा।

राशि फलादेश तुला—-
कार्य में जल्दबाजी नुकसानदायक रहेगी। व्यापार में नई योजनाओं का प्रारंभ होगा। आपके पराक्रम की प्रशंसा के कारण समाज में सम्मान मिलेगा।

राशि फलादेश वृश्चिक—
परिवार, समाज में आपका महत्व बढ़ेगा। सोच-समझकर निर्णय लेने पर लाभ होगा। स्वाध्याय में रुचि बढ़ेगी। व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में न पड़ें।

राशि फलादेश धनु—
किसी अजनबी व्यक्ति का विश्वास न करें। कार्य की व्यस्तता रहेगी। अर्थ की प्राप्ति होगी। जनकल्याण की भावना के कारण प्रतिष्ठा बढ़ेगी। मनोबल की अधिकता रहेगी।

राशि फलादेश मकर—
कार्यक्षेत्र में वृद्धि के योग। व्यापारिक संबंध व परिचय क्षेत्र बढ़ेगा। व्यापार अच्छा चलेगा। परिवार से सहयोग मिलेगा। अपनी जिम्मेदारी की ओर विशेष ध्यान दें।

राशि फलादेश कुंभ—
रुके कार्य में सफलता मिलेगी। पूँजी निवेश में लाभ होगा। अपनी कार्ययोजना पर अमल करना जरूरी है। दुस्साहस हानिकारक हो सकता है।

राशि फलादेश मीन—-
अनुकूल परिणाम के लिए निश्चितता आवश्यक है। विशेष लाभ मिलेगा। उन्नतिकारक योगों के कारण मन में प्रसन्नता रहेगी। ऋण लेना पड़ सकता है।

वन्दे मातरम् – बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय

वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्य श्यामलां मातरं |

शुभ्र ज्योत्स्ना पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम् .
सुखदां वरदां मातरम् .. वन्दे मातरम्

सप्त कोटि कण्ठ कलकल निनाद कराले
निसप्त कोटि भुजैर्ध्रुत खरकरवाले
के बोले मा तुमी अबले
बहुबल धारिणीं नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीं मातरम् .. वन्दे मातरम्

तुमि विद्या तुमि धर्म,
तुमि हृदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राणाः शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारै प्रतिमा गडि मंदिरे मंदिरे .. वन्दे मातरम्

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी,
नमामि त्वाम् नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम् .. वन्दे मातरम्

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम् धरणीं भरणीं मातरम् .. वन्दे मातरम्

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Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 9, 2011

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Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 9, 2011

अष्टविनायक वर्णन —

Birth of Shri Ganesha ( Ganapati or Lambodara )—

Decapitated and reanimated by Shiva—-

Once, while Goddess Parvati wanted to take a bath, there were no attendants around to guard her and stop anyone from accidentally entering the house. Hence she created an image of a boy out of paste which she prepared to cleanse her body, and infused life into it, and thus Ganesha was born. Parvati ordered Ganesha not to allow anyone to enter the house, and Ganesha obediently followed his mother’s orders. After a while Shiva returned from outside, and as he tried to enter the house, Ganesha stopped him. Shiva was furious at this strange little boy who dared to challenge him. He told Ganesha that he was Parvati’s husband, and demanded that Ganesha let him go in. But Ganesha refused to hear him. Shiva lost his patience and had a fierce battle with Ganesha. At last he severed Ganesha’s head with his Trishula. When Parvati came out and saw her son’s lifeless body, she was very angry and sad. She demanded that Shiva restore Ganesha’s life at once. Unfortunately, Shiva’s Trishula was so powerful that it had hurled Ganesha’s head very far off. All attempts to find the head were in vain. As a last resort, Shiva approached Brahma who suggested that he replace Ganesha’s head with the first living being that came his way which lay with its head facing north. Shiva then sent his disciples to find and take the head of whatever creature they happened to find asleep with its head facing north. They found a dying elephant which slept in this manner, and after its death took its head, attaching the elephant’s head to Ganesha’s body and bringing him back to life. From then on, he was called Ganapati, or head of the celestial armies, and was to be worshipped by everyone before beginning any activity. SHREE MORESHWAR – MORGAON

NIJE BHUSWANANDJADBHARAT BHUMYA PARATARE |
TURIYOSTIRE PARAMSUKHDETVA NIVASASI ||
MAYURAYA NATH STAWAMASICH MAYURESH BHAGWAN |
ATASWA SANDHYAYE SHIVHARINI BRAHMAJANAKAM ||

Meaning : O! Lord Mayureshwar of Morgaon,you stay on sage jadbharat’s land, on the banks of river Karha which is known as “Bhuswanand’ (means happiness on land). Shree Moreshwar, who is far from three qualities, who rsembles Omkar, who is always in fourth state of yoga & who rides on peacock mayu accept my salutation. Morgaon, situated on the banks of river Karha comes in Baramati Taluka, in District Pune. It is said that shape of this place is like a peacock & once upon a time there were so many peacocks in the Morgaon, as such it is called as “Morgaon’. SHREE CHINTAMANI – THEUR

Brahma Srushtyadisakta Sthirmatirahittam Pidito Vighnasandhe |
Aakranto Bhutirakta Krutiganrajasa Jeevita Tyaktu Mischina ||
Swatmanan Sarvyakta Ganapatimamal Satyachintamaniyam |
Mukta cha stapayant sthirmatisukhadam sthavare dhudhi Midhe ||

Meaning : The one who is search of happiness, whose mind is wavering like Lord Brahma, who is in the midst all calamities should go to Sthavar means Theur & worship Shree Chintamani & get rid of all Chintas (worries) & calamities.
Lord Brahma meditated here to subdue his waveringmind. As his worries (chinta) were removed the idol is called Chintamani. The place is called Sthar (stable) or Theur. Theur is the nearest place of Ashtavinayak from Pune. Having mythological & historical importance, Theur is popular for various reasons. SHREE SIDDHIVINAYAK – SIDDHATEK

Sthitho Bhimatire jagadvan kamen Harina |
Vijetu Daityo Tachuti Malbhavou Kaitabhmadhu ||
Mahavighnarten Prakhar Tapasa Seitpado |
Ganesh Siddhisho Girivarvapu Panchjanak ||

Meaning : Lord shri Hari Vishnu, Who was surrounded by fierce calamaties, performed penance on mountain Siddhetekwhich is on the bank of river Bhima. On receiving boon from Lord Shri Ganesh, Lord Vishnu killed two demons Madhu & Kaitabh. Oh! Lord Siddheswar Shri Ganesh accept my salutation.
Lord Vishnu got Siddhi at Siddhatek as such Ganesh idol here is called as Siddhivinayak . It is believed that Siddhivinayak leads work to the completion. Shree Siddhivinayak is supposed to be Jagrut place (awakened) of Shree Ganesh. Morya Gosavi of Morgaon & Narayan Maharaj of Kedgaon have attained siddhi here. Peshva Senapati Shree Haripant Phadke resume his lost post by performing Vinayak’s penance for 21 days. SHREE MAHAGANAPATI – RANJANGAON

Shree Shambhuvarprada Sutapasa Namna Sahastra Swakam |
Datwa Shree Vijay padam shivkar Tasme Prasanna Prabhu ||
Ten Sthapit Eva Sadgunavapu Kshetre Sadatishtati |
Tam vande Manipurke Ganapati Devam Mahant Mudra ||

Meaning : Lord Shivshankar obtained a boon by propitiating Lord Shree Ganesh who stays at Manipur, who gave boon to Mahadev, whose appearance is beautiful & pleasing & who is statue of good qualities.
Mahaganapati means powerful Ganapati. Mahaganapati has eight, ten or twelve hands.Lord Shivshankar got victory over Tripurasur (demon) on worshipping Mahaganapati. Therefore it is called “tripurari Varado Mahaganapati. (Lord Shivshankar is called as Tripurari after his victory over Tripurasur) SHREE GIRIJATMAJA – LENYADRI

Mayesh Bhuvaneshwari Shivsati Dehashrita Sunday |
Vighnesham Sutmaptukam Sanhita Kurvetapo Dushkaram ||
Takhya Bhutprakat Prasanna vardo Tishtataya Sthapitam |
Vandeh Girijatmaj Parmaj Tam Lekhanadristhitam ||

Meaning : Mother of universe, beautiful wife of Lord Shiva Goddess Parvati performed long penance of Shri Ganesh & at last obtained Shree Ganesh as her son. I salute Girija Parvati’s son Girijatmaj
who stayson mountain Lekhanadri(i.e.Lenyadri) Lenyadri is the only place among Ashtavinayaka places,which is situated on mountain & in the vicinity of the Buddhist caves. SHREE VIGHNESHWAR – OZAR

Bhaktanugrahe Gajmukho Vigheshwaro Brahamapam |
Nana Murti Dharopi Naijamahima Khanda Sadatma Prabhu ||
Sweccha Vighnahar Sadasukhkar Sidha Kallo Swayepum |
Kshetre Chozarke Namostu Satatam Tasme Parabrahamne ||

Meaning : Let my mind be concentrated to the God, who is elephant headed, benignant and remover of obstacle. He has defeated demon Vighnasur.He himself is Brahma. His greatness is undisturbed in his different forms. He is greatest artist, he gives happiness to his devotees, who abodes at Ozar.
Vighneshwara’s temple is situated on the banks of river Kukadi. Among Ashtavinayak Kshetra Vighneshwara Temple is the only temple with golden dome and pinnacle . SHREE BALLALESHWAR – PALI

Vedo Sanstuvaibhavo Gajmukho Bhaktabhimaniyo |
Ballaleravya Subhaktapal Narat; Khyat Sada Tishtati ||
Kshetre Pallipure Yatha Krityuge Chasmistha Laukike |
Bhakterbhavite Murtiman Ganapati Siddhiswar Tam Bhaje ||

Meaning : I worshipped God Ganesh, who is elephant headed, who has been praised in vedas, who is popular by the name of his devotee (Ballal),who take care of his devotees & in this kritayuga who abodes is Pallipur or Pali. Village Pali is situated between fort Sarasgad & river Amba flowing on the other side. On being pleased by devotion of Ballal, Shri Ganesh remained in the stone worshipped by Ballal & hence is called as Ballaleshwar of Pali. Among Ashtavinayakas, Pali’s Ballaleshwar is the only vinayak who is famous by his devotee’s name & who is dressed up as Brahmin.Since vinayaka gave his darshan in the guise of Brahmin, idol of vinayaka at Pali is dressed up as Brahmin.
This place is vey famous & spiritually awakened. It is said that in Peshva regime justice was done by taking kaul(answer to the question asked in the form of flower, leaves etc.)from Ballaleshwar. SHREE VARADVINAYAK – MAHAD

Bhaktabhimani Ganaraj Ekam|
Kshetre MadhaKhye Varadam Prasanam|
Yastishtati Shree Varado Ganesham|
Vinayakasta Pranamami Bhaktam||8||

Meaning : I salute Ganaraj who is leader of Ganas, who is proud of his devotees & who abodes at Mahad & has pleasant appearance.
In the temple of Varadvinayak, one Nandadeep (lamp) is alighten for last 107 years. Mahad has beautiful surroundings. In the ancient period it was called as Bhadrak or Mahad & so many sages & sects had resided in this place.

1. Introduction—
In India, astrology is called Jyotish, a Sanskrit word that is derived from two roots, “Jyoti and Isha” which respectively mean ‘Light and God’. Jyotish is the science of light, both the light of the celestial bodies and the internal light of the soul. It is a gift was bestowed upon humanity by the ancient rishis (sages) and has been passed on from generation in an oral and written form. Jyotish unfolds the knowledge of how the planets and the stars influence an individual human life as well as the life of the nations, and the globe. It sheds light on our lives.
Vedic Astrology uses extremely accurate astronomical calculations to determine the position of the stars and the planets to predict the future of individuals as well as mundane affairs; therefore, Jyotish is referred to as predictive astrology.

Jyotish has numerous practical applications. The main one is predicting one’³ life events, as well as understanding how the heavenly bodies influence our lives and which particular planets are responsible for favorable occurrence in specific areas of life. A human being is a creation of the cosmos; therefore, all the facets of human existence, including the past, present and future are intimately connected to the influence of the planets and the stars.

Through Vedic Astrology one can analyze and interpret the quality and intensity of an individual’s karma within various aspects of life. One of the most important areas of Vedic Astrology is important areas of Vedic Astrology is ‘Upaya’ (Sanskrit word for method), the body of knowledge that deals with remedial measures for improving and correcting adverse planetry influences, as well as strengthening and promoting the positive ones. Vedic Astrology provides us with tools and means to predict and time the events that are going to take place in one’³ life but more so, it renders instructions on how to improve the quality of life in order to enjoy the totality of existence.

2. Astronomical Basis of Vedic As–
The imaginary sphere in the space surrounding our entire solar system in known as the celestial sphere. The projections the earth’s equator on this sphere is known as celestial equator. The apparent path of Sun around the Earth is known as ecliptic. The zodiac is a belt of heavens extending about 8° on both sides of the ecliptic. It encircles the space through which the planets travel in their orbits. When the Sun moves of celestial equator towards the north the point where it cuts the celestial equator is called vernal equinox and the point of intersection during sun,³ motion from north to south in called autumnal equinox. It has been observed that the vernal equinox- that is the first point of Aries from where the longitudes of all the planets are measured in not a fixed point. Each year when sun reaches the vernal equinox the position of earth with respect to a fixed star known as Revati is found to be nearly 50.3 seconds of arc of space farther West than the Earth was at the same equinoctial moment of the previous year. Thus the equinoxes recede back along the ecliptic. The angular distance between the first point from where the fixed Zodiacs commences and the vernal equinox point is known as Ayanamsha.

The Hindu system of astrology observes the fixed zodiac also known as Niryana zodiac that is the first degree of Aries is reckoned from a particular star in Revati group of stars, which is fixed. However, the Western System of astrology observes movable zodiac also known as Sayana, a zodiac that reckons the first degree of Aries from the vernal equinox. It is estimated that both these zodiacs coincided in the year 285 AD. The value of Ayanamsha as on 1.1.2003 is 23°53’ 40.97”. The Niryana positions of the planets in Hindu astrology are calculated by deducting the value of Ayanamsha thus calculate from the corresponding Sayana position of planets as followed in Western astrology.

The starting points of the sidereal (fixed) and tropical zodiacs (movable) coincide once every 25, 800 years. After that the starting points separate from each other by an approximate 1-degree of an arc per each 72 years (approximately 50.3 second arc per year). The difference between the longitude of the starting points of the sidereal and topical zodiacs at any given time is the Ayanamsha.

Due to the existing controversy about the year in which two starting points coincided last, there are several ayanamashas used by different school of Vedic Astrologers. Some of them are Lahiri, Krishnamurti, Raman and Fagan Ayanamasha. Lahiri is the most widely used ayanamsha, which is based on the last coincidence point taking place in the year for the birth of the native born in 1975 is 23:31:09 degrees.
If you want to convert sidereal (Vedic) planetary positions into tropical (Western, you can do so by adding this ayanamsha to the degrees of the planets in natives Vedic chart. To arrive to the sidereal positions by converting the tropical ones, you will need to subtract the ayanamsha from the tropical positions. For example, a native’s Sun is placed in 15:07 degrees of the constellation of Gemini in native’s Vedic chart. When you add the ayanamsha for the year of birth, which is 23:31:09 degree, you will derive the tropical (Western Astrology) horoscope position of natives Sun, which happens to be placed in the sign of Cancer. Therefore native’s Jyotish (sidereal) Sun sign is Gemini and natives Western (tropical) Sun sign is Cancer.

For predictive purposes yotish looks at the position of the planets in relation to their placement in the Zodiac at the time of one’³ birth. These positions reveal how the universe was functioning at that instance. In a way, planets are like 9 special measuring points from which the entire subtle state of natural law can be measured. At the time of birth, when the body enters the world, this state of the universe gets projected into the structure of the life of the individual. Therefore, the conditions of the nine planets, define the entire life span of events and circumstances for an individual.

3. The Planets- The 9 Planets
We just mentioned nine planets, even though not all of them are actual planets. Only five of them are planets, one is a star, one is a moon, and the remaining two are special mathematical points. Everyone is familiar with the Sun, the Moon, Mars, Mercury, Jupiter, Venus and Saturn. The other two elements included into the group are Rahu and Ketu as the North and South Lunar nodes. Rahu and Ketu do not have physical substance; they are two mathematical points that make the point of intersection of the plane of the Moon’s orbit around the Earth with the ecliptic plane. Lunar or solar eclipses occur when the Sun and Moon are close to one of the nodes. This group of “Planets” is also referred with a Sanskrit term Planets.

Each Planet (planet) represents certain facets of human life: Traditional Vedic astrology does not consider the influence of Neptune, Uranus and Pluto.

The Planets Mercury and Venus orbit in the space between the Sun and the Earth and are known as inner planets or inferior planets. Mars, Jupiter and Saturn, whose orbits are on the outer side of the Earth, are known as outer planets or superior planets. Rahu and Ketu always move in the reserve direction, i.e. they have retrograde motion. The Sun and the Moon are never retrograde. The remaining planets are direct in their motions but in the course of their journey in the Zodiac. The two relative motions they appear to become stationary for a while, get backward movement and again after some time, they regain their natural courses. This phenomenon of going backward is known as retrograde when they are at a certain distance from the Sun. These planets have natural friendship and enmity amongst themselves. Here are the names of the Planets in Sanskrit:

Sun is Surya

Moon is Chandra

Mars is Mangala

Mercury is Budha

Jupiter is Guru

Venus is Shukra

Saturn is Shani

The North Node is Rahu

The South Node is Ketu

Planets have primary and secondary significations. Here is the list of the primary planet significations assigned by the sage Parashara (the author of Birhat Parashara Hora Shasta):

Sun signifies the soul.

Moon signifies the mind.

Mars signifies energy.

Mercury signifies speech.

Jupiter signifies knowledge.

Venus signifies reproduction.

Saturn signifies grief.

The Sun’s annual path is known as ecliptic. The belt of Heavens expending 8 degree on either side of the ecliptic is known as the zodiac. The Planets (planets) are constantly moving through the Zodiac. The circle of the Zodiac is divided into 12 equal segments called constellations or rashi (signs), Each rashi (sign) occupies 30 degrees of the celestial space. Each of the rashis (signs) has a unique set of attributes, which affect any Planet (Planet) travelling through the sign. The signs are environments that affect the way a planet feels and behaves. here is the 12 rashis (signs) listed in their natural order:

1. Aries (Mesha)

2. Taurus (Vrishabha)

3. Gemini (Mithuna)

4. Cancer (Karka)

5. Leo (Singha)

6. Virgo (Kanya)

7. Libra (Tula)

8. Scorpio (Vrishika)

9. Sagittarius (Dhanu)

10. Capricorn (Makara)

11. Aquarius (Kumbha)

12. Pisces (Meena)

4. Rashi Ruler ships

Every rashi (sign) has its particular ruler. The Sun and the Moon rule over one sign each, where as the rest of the Planets hold ruler- ship over two signs. Traditionally, Rahu and Ketu to rule the signs of Taurus (Alter: Gemini), Scorpio (Alter: Sagittarius) respectively. The sign ruler ship is a permanent value.

Aries (Mesha) & Scorpio (Vrishika) are ruled by Mars.
Taurus (Virshabha) & Libra (Tula) are ruled by Venus
Gemini (Mithuna) & Virgo (Kanya) are ruled by Mercury
Cancer (Karka) is ruled by the Moon
Leo (Singha) is ruled by the Sun
Sagittarius (Dhanu) & Pisces (Meena) are ruled by Jupiter
Capricorn (Makara)& Aquarius (Khumbha) are ruled by Saturn

5. The 12 Bhava (Houses)

The Zodiac is divided in one more way. Relative to the position of the Earth, the zodiac is divided into 12 bhava (houses). Just as the proper motion of planets is reflected by their degree positions in rashis (signs) the diurnlas (illusionary, relative motion of the planets are perceived from the Earth) motion of the planets is shown by their placement in astrological houses. The houses represent the various areas of life. The areas of life are affected by the planets and signs that occupy the corresponding bhava (houses). The twelve bhava (houses) represent the totality of existence as experienced by a human being.

The sign where the Lagna (Ascendant) falls is known as the first house or Lagna. The next Sign is second houses, next the third and so on. In Vedic system the sign and the house are deemed synonymous. However, in Western astrology they cusp of a house is the commencing point and the first house is constituted by space covering about 30 degree beyond the cusp; but in Vedic astrology, the cusp is the midpoint of a house and extends to 15 degree on either side. Zodiac is constantly moving and all the 12 signs get an opportunity to become lagna in the 24 hours comprising a day. Janma Rashi means the sign- containing Moon at the time of birth and this sign is called Chandra lagna and is as important as the lagna itself. Here is a main signification’s of each house:

The First House represents the self

The Second House represents financial assets.

The Third House represents courage

The Fourth House represents happiness

The fifth House represents children

The Sixth House represents enemies

The Seventh House represents spouse

The Eight House represents vulnerable points

The Ninth House represents fortune

The Tenth House represents your career

The Eleventh House represents income

The Twelfth House represents the end of everything

So far, we have briefly covered the general principles of the three main components of Jyotish: the Planets (Planets) the Rashis (sign) and the Bhavas (Houses). The positions of the planets in the sign and houses are depicted in what is called the Horoscope. Evaluation the understandinfg of the interactive influence of these three main elements constitutes the interpretation of your horoscope.

6. Stars of Nakshatras

The entire zodiac has been divided into 27 equal parts 13 degrees and 20 minutes each known as nakshatra or asterism or a constellation (Moon mansion). Every constellation has been assigned a planetary ruler. Ketu is the ruler of the first constellation starting from 0 degree of Aries and then the ruler ship of Venus, Sun, Moon, Mars, Rahu, Jupiter, Saturn and Mercury follow in this sequence till the end of the Sign Cancer. The same sequence starts from 0 Degree Leo and 0 degree Sagittarius and continues till Scorpio and Pisces end respectively.

7. Time

All are aware of the time measure known as local mean time, standard time for any country or Zone and the Greenwich Mean Time. There is another system/ measure of time known as Sidereal Time that is derived from the Earth’s rotation with respect to a fixed star. The duration of sidereal day is 23 hour 56 minutes. Whenever the time is reckoned with reference to the sidereal day, it is called Sidereal time. The Sidereal time. The Sidereal Time is zero hour when the beginning of Aries (in Sayana system) crosses the observer’s meridian.

In astrology, the first house in reckoned from lagna (Ascendant) point. The lagna or the ascendant is the rising Sign in the Eastern horizon at a particular epoch. It is the point on intersection of the ecliptic at a given time with the horizon of a place. The lagna is dependent on the rotation of the Earth on its axis and so it is dependent on the Sidereal Time of a place at a given moment or epoch. The longitude of the lagna point (cusp) of the first house.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 9, 2011

Head Line–Dr. Shanker Adawal

In Hindu palmistry the head line is called dhan rekha and Marti rekha. From this line we can make out the mentality, the power of mental concentration and the ability to exert self control, possessed by the subject. It should be obvious that the mind plays a very vital role in the shaping of out destiny. However good the human machinery may be, it cannot function properly unless there is a proper mental attitude. Mind is the force that enables the subject to alter his life. The king of mind possessed by the subject indicates the future course of life. Further, from the study of the headline it is possible to determine the quality and quantity of brain power.

The construction of the headline mirrors the working of the brain. There are numerous types of headline, with varying effects. The variations are the size of the line, the course the line follows, the placement and position of the line on the palm, and so on. The variations are so many that the subject requires intensive study.

There is no difference of opinion with regard to the starting point and the ending point of the head line. The line is found under the line of heart, more or less parallel to it. The head line starts about midway between the Jupiter finger and the thumb. Any abnormality in the position of the head line indicates an abnormal tendency. Normally, the head line beings under the Jupiter finger either joined to the life line or a little apart from it. It can, however, start from a place inside the life line. The three different positions for the start of the head line are—

Rising inside the life line on the lower mount of Mars. (A)

Line of head and line are closely joined together. (B)

Line of head starts away from the line of life. (C)

Persons whose headline rises inside the life line on the lower mount of Mars have qualities designated by the planet Mars. They would have a tendency for argumentative fighting, and generally are of a quarrelsome disposition. These qualities will be intensified if the head lines goes straight to the upper mount of Mars on the percussion under the mount of Mercury. If the head line, towards the end, takes an upward turn to the line of heart, the person concerned will have a quarrelsome and irritable nature, generating murderous instincts. If the head line slops and the end, downwards towards the mount of Moon, the quarrelsome disposition will get reduced or softened due to introspection.

Persons who have a head line which is closely joined with the life line from the starting point and continues to be merged with it for some distance are of cautious nature they are possessed of shyness and timidity. According to one view, those who have such a head line about themselves during the tie period signified by the merger in other words, they enjoy the guidance of their parents and elders. We can say that they possibly do not have the confidence required to decide matters concerning their life. The availability of guidance can prove a boon as well as hindrance.

Persons who have the third type of head line, which is set a little apart from the life line, are self- confident and determined. They also have the gift of intuition. The demise of parents or if parents are not in a position to render any guidance, leaves these individuals to their own device. Self- confidence and the determination will be moderate if the space between the head line and life line is not very wide. If the gap is very wide, the subject will have excessive determination and a reckless spirit, as a result of which he may not give due consideration to the pros and cons of his actions.

As with the starting point, there are three normal positions for the termination of this line on the opposite side of the palm. The first is a perfect straight line, from one end to other. This type of line indicates that the subject is extremely practical, has sound judgment and is level- headed. The possessors of this type of line have great organizational ability in whatever sphere of life they may engage themselves. Women who have such a head line are also gifted with good organization ability, business acumen and entrepreneurship, qualities earlier associated with men. The second type is when the head line turns up slightly at the end, or a branch goes in an upward direction. This line indicates strong mental power and a very acquisitive nature. For those who like to amass wealth, such a head line plays a helpful role. The third type of termination is of the head line sloping slightly downwards. This line shows a blend of practical and artistic tendencies. The line of head may be straight, from one end to other or it may rise or fall, and shore a deep depression towards the mount of moon or in the center of the palm.

The course of the head line affects the size of the quadrangle (the space between the heart line and the head line. When the quadrangle is even, well shaped, neither narrow nor very broad even. The running of the head line close to the heart line, thereby making the quadrangle narrow, indicates a tendency for asthma. Persons with a narrow quadrangle are narrow- minded and do not like to spend money on other. In a bad hand the line makes one meticulous and very disciplined, and in order to achieve one’s aim, one may hesitate to behave in a way that may hurt the feeling of others.

नींद की समस्या दो तरह से होती है -
हाइपो सोमनिया ( कम नींद आना )
और हाइपर सोमनिया ( ज्यादा नींद आना ) ।

पहली कैटिगरी में प्रमुख समस्याएं हैं : –

इनसोमनिया :

पूरी कोशिश के बाद भी मरीज को नींद नहीं आती और वहबिस्तर पर लेटकर करवटें बदलता रहता है।
मेनिया :
मरीज बहुत खुश और कुछ ज्यादा ही जोश में रहने लगता है। ऐसेमें उसे सोने की जरूरत ही महसूस नहीं होती।
अर्ली मॉर्निंग अवेकनिंग : मरीज तड़के 3-4 बजे उठ जाता है और उसकेबाद उसे नींद नहीं आती।
स्लीप वॉकिंग :
मरीज बिस्तर से उठकर नींद में ही चलने लगता है। जागनेके बाद उसे यह घटना याद नहीं रहती।
स्लीप टेरर व नाइट मेअर :
मरीज घबराकर अचानक उठ जाता है याउसे बार – बार डरावने सपने दिखते हैं। किसी बुरे हादसे का सामनाकरनेवाले लोग अक्सर इस समस्या से पीड़ित होते हैं। ।
ब्रुक्सिजम या नाइट ग्रैंडिंग :
मरीज सोते हुए दांत कटकटाता है। लगातारऐसा करने पर उसके दांत घिस जाते हैं और ज्यादा सेंसिटिव हो जाते हैं।इसके लिए डेंटिस्ट गार्ड बनाते हैं , ताकि मरीज सोते हुए दांत पीसे तो दांतघिसें नहीं।
इलाज
सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि नींद न आना अपने आप में बीमारी हैया किसी और बीमारी के लक्षण हैं। फिर यह जानें कि ऐसा क्यों हो रहा है ?सही जानकारी पाने के लिए डॉक्टर से मिलें। लेकिन अगर मजबूरी हो औरडॉक्टर के पास फौरन नहीं जा सकते तो नींद नहीं आने पर सोने से पहलेएलप्राजोलम (alprazolam) की एक गोली ले सकते हैं। यह माइल्डमेडिसिन है लेकिन इसे भी आदत न बनाएं।
हाइपर सोमनिया में ये समस्याएं आती हैं :
नार्कोलेप्सी : मरीज कहीं भी , कभी भी बैठे – बैठे सो जाता है , यहां तककि हंसते हुए या रोते हुए भी। मरीज दिन भर उनींदा और थका हुआ रहताहै। कितना भी सो ले लेकिन ऐसा लगता है , जैसे वह सोया ही नहीं है।ज्यादातर मोटे और बुजुर्ग लोगों में होती है यह बीमारी। डॉक्टर मरीज कोअस्पताल की स्लीप लैब में सुलाते हैं और स्लीप स्टडी करके एंटी डिप्रसेंट ,स्टिमुलेटर और चुस्ती के लिए मोटाफिनिल आदि दवा देते हैं।
स्लीप एपनिया :
मरीज की सांस की नली में रुकावट होती है। कई बारसोते हुए मरीज की मौत भी हो जाती है। स्लीप एपनिया में मरीज की सांसकी नली में सीटैप ( कंटिन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर ) मशीन लगाई जातीहै। मशीन 40-50 हजार रुपये की आती है और 15 हजार बाकी इलाज काखर्च होता है। डेंटिस्ट एक अपलायंस भी बनाते हैं , जिसमें नीचे का जबड़ाथोड़ा आगे चला जाता है , इससे सांस लेने में होनेवाली रुकावट खत्म होजाती है।
बाकी समस्याएं
केटालेप्सी या स्लीप पैरालिसिस : मरीज की नींद खुल जाती है लेकिनवह बिस्तर से उठ नहीं पाता। उसे ऐसा महसूस होता है जैसे उसके ऊपर कोईबैठा है और उसे हिलने नहीं दे रहा। गांव – देहात में इसे भूत – प्रेतों सेजोड़कर देखा जाता है। कई बार मरीज अचानक गिर भी जाता है।
इनयूरेसिस :
बिस्तर गीला करने की यह बीमारी ज्यादातर बच्चों में होतीहै। उन्हें सोने से डेढ़ – दो घंटे पहले लिक्विड न दें। हो सके तो बच्चे को बीच मेंजगाकर पेशाब करा दें।
पुअर परसेप्शन ऑफ स्लीप :
मरीज को लगता है कि उसे नींद नहीं आतीलेकिन असल में वह सो रहा होता है।
स्नोरिंग :
खर्राटे मारना बेहद आम समस्या है। इसमें काग ( युविला ) पीछेगिर जाता है और सांस की नली को ब्लॉक कर लेता है। इससे सांस लेने मेंदिक्कत आती है और मुंह से सांस लेने पर आवाज आती है। खर्राटे बंद करने केलिए सर्जरी भी की जाती है। इसमें रेडियो फ्रीक्वेंसी एब्लेशन से युविला कोकाटा जाता है। दो सिटिंग्स में मरीज ठीक भी हो जाता है। लेकिन अगरस्नोरिंग के साथ मरीज को स्लीप एपनिया भी है तो अलग ट्रीटमेंट होता है।स्लीप डिस्ऑर्डर का इलाज ईईसी फीडबैक थेरपी से भी किया जा सकता है।
होम्योपैथी :
होम्योपैथी में भी दवा हमेशा नींद न आने की वजह जानकर जाती है।
अगर एंजाइटी और बेचैनी की वजह से नींद न आ रही हो तो कालिफॉस(Kaliphos) की छह – आठ गोलियां रात में सोने से दो – तीन घंटे पहले लें।
नर्वस महसूस कर रहे हैं या बहुत सेंसिटिव हैं तो नक्सवम 30 (Nuxvom 30) या पल्साटिला (Pulsatilla) छह – आठ गोलियां रात में ले सकते हैं।
मन में एक साथ बहुत सारे विचार आ रहे हैं तो कॉफिया 30 (Coffea 30) की छह – आठ गोलियां लें।
दिमाग बहुत थक गया है तो एविना सैट (Avena Sat(Q) की 10-15 बूंदेंचौथाई कप पानी में डालकर लें।
इनसोमनिया यानी नींद न आने की बीमारी हो तो पैसिफ्लोरा इंक . (Passiflora (Q) Inc) की 10-12 बूंदें चौथाई कप पानी में लें।
सबसे सेफ कलिफॉस है , जो कि किसी तरह का प्रेशर या तनाव होने पर लीजा सकती है। वैसे , कोई भी दवा डॉक्टर की सलाह से ही लें। अगर इमरजेंसीमें लेनी भी पड़े तो दो दवाएं एक साथ न लें।
कैसे लें बेहतर नींद
क्या करें
फिक्स्ड रुटीन के मुताबिक सोना चाहिए। इससे तय वक्त पर नींद आएगीऔर टूटेगी।
बेडरूम सोने के लिए होना चाहिए। अगर वहां टीवी देखते हैं या लैपटॉपपर काम करते हैं तो ब्रेन कन्फ्यूज हो जाता है कि सोना है या कुछ और कामकरना है। इससे नींद आने में दिक्कत हो सकती है।
बेडरूम साफ – सुथरा हो।
हमारी बॉडी सूरज की रोशनी के अनुसार काम करती है। लाइट जलते रहनेपर दिन जैसी फीलिंग होती है और नींद नहीं आती। बेडरूम में घुप अंधेराहोना चाहिए। ज्यादा – से – ज्यादा नाइट लैंप की हल्की रोशनी रख सकते हैं।
किसी भी शख्स के लिए सूरज की रोशनी और अंधेरा , दोनों देखना जरूरीहै। स्लीप हार्मोन मेलाटॉनिन तभी निकलता है , जब सूरज की रोशनी में भीजाएं। यह स्लीप साइकल को मेंटेन करता है।
दिन में एक्सरसाइज करें। इससे शरीर थकता है और रात में अच्छी नींदआती है।
रात में कुछ दिलचस्प पढ़ने से बचना चाहिए। बोरिंग – सी किताब पढ़ें।इससे नींद जल्दी आएगी।
सोने से पहले गुनगुना दूध पिएं। इससे मेलाटॉनिन निकलता है।
सोने से पहले प्राणायाम करें।
क्या न करें
बेडरूम में बाहर की आवाजें और तेज रोशनी न आए।
तेज म्यूजिक सुनने और फास्ट डांस करने से बचें।
देर रात तक कंप्यूटर गेम्स न खेलें , न ही टीवी देखें।
सोने से पहले तेज एक्सरसाइज न करें। वर्कआउट के तुरंत बाद खून में स्ट्रेसहार्मोन बढ़ जाता है।
सोने से करीब दो घंटा पहले खाना खा लें।
सोने से पहले चाय , कॉफी और मसालेदार खाना न खाएं। इनसे नींद कीक्वॉलिटी गिर सकती है।
सोने से पहले खाने से बचें क्योंकि इससे शुगर लेवल बढ़ जाता है। भूख लगेतो फल खाएं या गुनगुना दूध पिएं।
अगर रात में बार – बार टॉयलेट जाना पड़ता है तो सोने से डेढ़ घंटे पहलेकुछ न पिएं।
ज्यादा शराब पीनेवालों को भी बाद में नींद आने में परेशानी हो सकती है।निकोटिन का सेवन न करें।
काम या किसी और तरह का तनाव न लें।
जरूरत नहीं है तो दिन में न सोएं। कम – से – कम लंबी नींद न लें।
जब नींद न आए …
जबरन बिस्तर पर लेटकर जबरन सोने की कोशिश न करें। उठकर कुछकाम करें। पढ़ें , टीवी देखें या हल्की एक्सरसाइज भी कर सकते हैं। मेडिटेशनकरें। इससे मन रिलैक्स होता है।
जब जागना हो …
अगर कभी नींद आ रही हो और जागना जरूरी हो तो चाय और कॉफी पिएं।एंटी स्लीप टैब्लेट डॉफिनल (dofinal) ले सकते हैं। लेकिन इसे आदत नबनाएं।
कैसा हो गद्दा और तकिया
सोने के लिए सख्त बेड होना चाहिए। जमीन पर सोने से बचना चाहिए।मेट्रेस का खास ध्यान रखें। कॉयर का मेट्रेस बेहतर होता है। स्पंज से बचनाचाहिए। तकिए की मोटाई कम होनी चाहिए। उसे इस तरह लगाएं कि गर्दनको सपोर्ट मिले।
नींद और डायबीटीज
डायबीटीज और नींद का आपस में गहरा नाता है। नींद न आने पर शुगर होनेकी आशंका बढ़ जाती है तो डायबीटीज के 40 फीसदी मरीजों में स्लीपडिस्ऑर्डर होते हैं। नींद पूरी न होने पर तनाव होता है। इससे बीपी औरशुगर लेवल बढ़ता है। इसी तरह स्लिप डिस्ऑडर्र का मरीज रात में सोतानहीं है तो अक्सर बार – बार खाता रहता है। इससे मोटापा बढ़ता है औरशुगर की आशंका भी। अगर डायबीटीज के मरीज का प्रोस्टेट बढ़ा हुआ है याशुगर कंट्रोल में नहीं है तो वह बार – बार टॉयलेट जाता है। इससे नींद खराबहोती है। साथ ही , यूरीन इन्फेक्शन की आशंका भी ज्यादा होती है। कुछमरीजों को पैरों में जख्म हो सकते हैं। उससे भी नींद डिस्टर्ब होती है।इसलिए डायबीटीज के मरीजों को नींद का खास ख्याल रखना चाहिए।
कुछ खास सवाल
खाना खाने के बाद नींद आती है खासकर , चावल , मट्ठा , दहीआदि। क्यों ?
खाना खाने के बाद हम रिलैक्स महसूस करते हैं। साथ ही , हमारा ब्लडसर्कुलेशन भी पेट की तरफ ज्यादा हो जाता है और दिमाग की तरफ कम।इससे भी सुस्ती महसूस होती है। ब्रेन का वजन शरीर का सिर्फ 2 फीसदीहोता है , लेकिन उसे 20 फीसदी ब्लड सप्लाई की जरूरत महसूस होती है।चावल , दही खाने पर कुछ लोगों को नींद या भारीपन महसूस होता हैलेकिन सभी के साथ ऐसा नहीं होता।
पढ़ते वक्त या ऑफिस में काम करते वक्त नींद आती है। खेलते हुए यामूवी देखते हुए नींद नहीं आती। क्यों ?
कोई भी ऐसा काम जिसमें दिमाग बहुत रिलैक्स या बोरिंग महसूस करे ,इसमें नींद आती है। शरीर में सिरोटोनिन ( खुशी और जोश फील करानेवाला हार्मोन ) का लेवल ज्यादा हो तो अच्छा महसूस होता है और आलसमहसूस नहीं होता। खेलते हुए शरीर में सिरोटोनिन हार्मोन निकलता है ,जिससे तरोताजा महसूस होता है।
क्लासिकल म्यूजिक सुनना क्या नींद लाने में मदद करता है ?
जिन लोगों को क्लासिकल म्यूजिक पसंद है , उन्हें इससे नींद आने में मददमिल सकती है। जो ब्रेन वेव्स सोने में मददगार होती हैं , क्लासिकल म्यूजिकसे वे ज्यादा निकलती हैं।
अचानक नींद खुल जाए तो सिर में दर्द क्यों होने लगता है ?
कच्ची नींद में आंख खुलने से सिरदर्द करने लगता है। इसकी वजह स्लीपिंगएंग्जाइटी है यानी बॉडी की जरूरत के मुताबिक हमारी नींद पूरी नहीं होतीतो सिर दर्द करने लगता है।

10 अप्रैल 2011: रविवार, Sukla Sapthami * 05:52 तक,
* 04:28 Aardra तक, जब तक 11:15 योग Sobhana,
जब तक 17:59 करण Garija, 5:52 * तक Vanija करण,
RahuK: 16:35 GulikaK: YamaG, 15:05: 16:35-18:05 – 12:05-13:35,
18:40 पर सूर्योदय पर 6:05 सूर्यास्त, *,
10:33 पर Moonrise,) दिन Moonset पर 0:52 पूरे (चंद्रमा में Mithun )
—————————————————————————————————————
April 10, 2011:Sunday, Sukla Sapthami till 5:52*,
Aardra till 4:28*, Sobhana yoga till 11:15,
Garija karana till 17:59, Vanija karana till 5:52*,
RahuK: 16:35 – 18:05, GulikaK: 15:05 – 16:35, YamaG: 12:05 – 13:35,
Sunrise at 6:05*, Sunset at 18:40,
Moonrise at 10:33, Moonset at 0:52*, Moon in Mith (whole day)
——————————————————————————————————————
दैनिक राशिफल—

राशि फलादेश मेष—
परिवार में सुख-शांति रहेगी। पराक्रम के प्रति निष्क्रियता से मन अप्रसन्न रहेगा। व्यापार-व्यवसाय पर ध्यान दें। खर्च अनावश्यक रूप से बढ़ेंगे।

राशि फलादेश वृष—
समय का दुरुपयोग न करें। मित्रों के सहयोग से समस्या का समाधान हो सकेगा। व्यापार में प्रगति के योग हैं। दुस्साहस नहीं करें। आर्थिक निवेश लाभदायक रहेगा।

राशि फलादेश मिथुन—
धार्मिक आस्था बढ़ेगी। नवीन गतिविधियाँ लाभकारक रहेंगी। बुद्धि चातुर्य से अनेक कठिनाइयाँ दूर हो सकेंगी। अनावश्यक क्रोध न करें।

राशि फलादेश कर्क—
कार्य व्यवसाय में सफलता मिल सकेगी। प्रयत्न एवं दूरदर्शिता से सहयोग मिलेगा। नौकरी में समर्थन प्राप्त होगा। आय में वृद्धि होगी।

राशि फलादेश सिंह—
पिता से मनमुटाव हो सकता है। कार्य के प्रति दृढ़ता अनुकूल सफलता दिलाएगी। नौकरी में तबादला व पदोन्नति के योग हैं। व्यर्थ के दिखावे एवं आडंबरों से दूर रहें।

राशि फलादेश कन्या—
वाद-विवाद से मानसिक कष्ट बढ़ेगा। मानसिक द्वंद्व के कारण आपकी निर्णय क्षमता प्रभावित होगी। किसी भी कार्य में प्रमाद हानिकारक होगा। आर्थिक तंगी रहेगी।

राशि फलादेश तुला—
आय में वृद्धि होगी। अपनी बुद्धिमानी से स्थिति सुदृढ़ बना सकेंगे। संतान उज्ज्वल भविष्य की ओर अग्रसर होगी। जल्दबाजी में कोई काम न करें।

राशि फलादेश वृश्चिक—
व्यापार अच्छा चलेगा। नवीन अनुबंध व समझौतों के कारण लाभ में वृद्धि होगी। सामाजिक कार्यों में सम्मान प्राप्त होगा। स्थायी संपत्ति क्रय करने में जल्दी न करें।

राशि फलादेश धनु—
पारिवारिक सुख व धन बढ़ेगा। पठन-पाठन में रुचि बढ़ेगी। मन में प्रसन्नता रहेगी। परिचय क्षेत्र का विस्तार होगा। व्यापार में लाभकारी परिवर्तन हो सकते हैं।

राशि फलादेश मकर—
व्यापार में वृद्धि होगी। काम आपकी योजनाओं के अनुसार होंगे। पूँजी निवेश लाभदायी रहेगा। परिवार की समस्या रहेगी। रचनात्मक काम होंगे।

राशि फलादेश कुंभ—
सामाजिक कार्यों से सुयश मिलेगा। आपके प्रभाव में वृद्धि होगी। स्थायी संपत्ति की प्राप्ति के योग। व्यापार में नई योजनाओं का शुभारंभ होगा।

राशि फलादेश मीन—-
बोलचाल में कटुता न आने दें। मानसिक दृढ़ता से निर्णय लेकर काम करें। व्यवसाय का तनाव समाप्त हो सकेगा। संबंधियों के कारण आपकी कीर्ति बढ़ेगी

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

MAPE of JHALRAPATAN CITY (RAJASTHAN)

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View Larger Map“>JHALRAPATAN CITY

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

Invite from WAVES for 22 April program- lecture by Prof. Abel Hernandez

Invite from WAVES for 22 April program- lecture by Prof. Abel Hernandez
(In attachment for print)

Wider Association for Vedic Studies (WAVES)
A Multidisciplinary Academic Society,
Registered under Societies Act xxi of 1860

SPECIAL LECTURE
Impact of Agnihotra on Health and Environment
(Svasthya evam Pryavarana per Agnihotra ka Prabhava)

Key Speaker:
Prof. Abel Hernandez
Director, Agrohoma, U.S.A.

Chairman:
Prof. K.V. Paliwal
Vedic Scholar & Former Project Director, IARI, Delhi

Chief Guest:
Prof.Usha Chowdhary
Former Professor of Sanskrit, University of Delhi, Delhi

Guests of Honour:
Shri Ish Narang
Dr.Ganesh Dutt Sharma
Shri Subodh Kumar

You are requested to make it convenient to attend the program.

VENUE:
Sawan Adhyatmic Satsang Society, Between Rail Vihar & Bank Vihar, Sharda Niketan Chowk,Saraswati Vihar, Delhi- 110034

DATE & TIME:
Friday, April 22, 2011 at 4.00 p.m.

RSVP:
Dr. Chand Bhardwaj, Member-WAVES; Ph.9818585151

Professor Shashi Tiwari
General Secretary, Wider Association for Vedic Studies (WAVES) Regd.
WAVES website – www.waves-india.com

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

Shaktipat…–

Shaktipat…

The Primordial Energy of Consciousness gives birth to the universe, nurtures it, and bestows manifold spiritual blessings. This Evolutionary Energy dwells within all beings as Kundalini. Great Spiritual Preceptors have the rare ability to awaken this Divine Energy and lead seekers to the experience of their own true essence – Being, Consciousness and Bliss. This is the path of Mahashakti Yoga. The uniqueness of this Yoga is that it includes all other Yogas. The type of Yoga exactly suited to the seeker occurs spontaneously. This is propitiated from within by the workings of the awakened Kundalini Shakti Energy.

There are many spiritual practices that are generally recommended, including maintaining subjective awareness, mantra repetition, meditation, chanting, satsang and living the teachings. These are activities that you can do. Yet, around Great Beings, something else happens. You are done! Just as a candle lights another candle, the master injects a current of Divine Power (Shakti) into the subtle body of the aspirant. This ignites or releases their inner prana (life force). This prana then works freely, generating the various yogic processes – asanas, mudras, pranayamas, etc. This is known as Shaktipat (descent of Grace) or the awakening of Kundalini. It is initiation of the highest order.

There is no conscious effort or sense of doership involved in these spontaneous yogic processes. One watches as a witness. The workings of this Energy thin the Self-limiting impressions of past actions stored in the mind stuff by converting them into Kriyas (movements). With this, the binding tendencies that limit one’s consciousness are lifted. Whatever path one may follow, it is inevitably through the release of prana that one enters deep meditation and ultimately, Union with God.

The importance of the Guru cannot be overemphasized on this journey. First, because it is extremely rare for an aspirant to be able to awaken this indwelling Divine Energy, and second, because after Its awakening, various purification processes occur where the stabilizing influence of the Guru is very important.

The Secrets of Shaktipat—-
Precis: The idea of Shaktipat is almost unknown in the West. It is an ancient method of awakening and activating the Kundalini in the shortest possible time. In most cases it is instantaneous and effortless. Automatic movements in the body — ranging from jerking and making various sounds to spontaneously assuming Hatha Yoga asanas — reverse the flow of vital fluids, which enrich and prepare the brain to receive enlightenment. Accumulated karma is released and calmness, or inner contentment and synchronicity with life prevail. In this groundbreaking article, the author of Kundalini for Beginners reveals the secrets of this ancient practice.

THE SECRETS OF SHAKTIPAT–
(By Ravindra Kumar, Ph.D.)

SHAKTI AND KUNDALINI—-

The term “Shakti” is very popular today, but is usually misunderstood. Shakti can be understood by thinking about electricity. The fan will function as long as electricity powers it; the moment electricity is withdrawn, it stops working and become useless. The same is true of humans. We are alive as long as Shakti powers us. The moment Shakti life force withdraws, we die.

When Cosmic Energy or Universal Shakti comes into contact with Its residual Shakti, called Kundalini, hitherto lying dormant in the individual, It awakens, activating the sleeping Kundalini. The awakening of Kundalini is a sure sign of active Shakti (although even in its inactive state it still supplies the energy that keeps us alive). The individual consciously feels the oneness of one’s own Shakti Kundalini with the Universal Shakti, just as a drop of water feels the union when it contacts the ocean. With the rising of the serpent power or Kundalini comes the intuitive knowledge that there is no death. When this happens, the inner state of the aspirant quickly changes; there is calmness, an inner contentment, and a synchronicity with life not present before. Accumulated karma from other lifetimes gradually loses its potency until all karmic debt dissolves. The practitioner then experiences Shakti active within him/her as an all-encompassing, expansive energy. The body of the practitioner becomes the entire cosmos as the cosmos and the practitioner complement each other. Practitioners experience a unified, eternal flow of life force or energy circulating between them and Universal Consciousness. The physical limits of the practitioner now extend to the cosmic level and all distances come within his/her reach; one’s third eye is opened, so that other dimensions can be seen and travel to higher realms becomes a reality. One begins to live fully and become totally awake for the first time. At this level, the Self-Realized person can do anything on earth except the Divine processes of creation, preservation and destruction. A kind of “mechanical switch” develops enabling the person to live either in this world or another world, if and when one likes.

Traditionally, Kundalini energy can be awakened through three main practices:——————–

Asanas (yogic postures), mudras (hand positions), and pranayama (breath-control exercises)
Grace of the Guru
The accumulated results of devotional practices through several lifetimes.
For the first set of practices, there are several rules to be adhered to for the energy to rise. One has to learn unnatural yogic postures, mudras, and breath control practices of Hatha Yoga. These may not be easy for everyone, and having embarked on the path of learning these postures and mudras there is no certainty how long the person will have to practice before Kundalini rises and the person “awakes.” For this reason finding a Guru and receiving his/her grace is helpful; then there is no need for rules or regulations.

Awakening Kundalini through the grace of a Guru is traditionally seen as the best and most natural way of stirring this energy. When Kundalini energy awakens through the grace of the Guru, yogic postures, mudras, and breath control exercises do not need to be performed in an unnatural way. Rather, everything unfolds by itself according to the individual’s karmic history. Awakening through the grace of the Guru is sure and quick, although finding a Guru is not so easy. When the consciousness of the inner and the external Guru is integrated, the external or physical Guru is not needed for awakening. Where it is not possible to receive grace from a Guru then the first set of practices can work but may be slower.

Using examples we can compare the three methods of awakening. The first method is comparable to someone who works very hard, tolerates the sun and heat of the day, working relentlessly to earn a living. The second method is similar to receiving great wealth from a rich person through an act of compassion. The third method is comparable to suddenly discovering wealth on the way home or while sitting at home, it is instant and without too much effort. Whatever the method, those who have had successful Kundalini Awakening can be recognized by their healthy body, happy countenance, appearance of anahat-shabd or the “inner sound” known as AUM or WORD, beautiful, peaceful eyes, becoming an urdhvareta or one in whom the reversal of the flow of semen has taken place or the one who has attained the power of retaining the semen, and the purification of body and nerves.

In my own experience, when the Kundalini awakened I felt extra activities in my testicles, a squeezing sensation that seemed to be directing some fluid upward to the brain through unseen capillaries. Sexual arousal passes on to other parts of the body as sublimated energy. There is a cooling down and an upsurge of pure love for every one (Kumar 2000, p. 83). Swami Muktananda and Pundit Gopi Krishna have described similar experiences in their books. Female practitioners have reported similar experiences, for example, a college professor and Siddha-Yoga practitioner, Karen felt energy rocket up from the first chakra (Mooladhara) at times, causing her whole body to vibrate and shake. In the case of Beth, from Arkansas, there was often a sucking sensation around the cervix, as if vaginal fluid was needed by the energy (Greenwell 1990, p. 203). Thus, whether the person is male or female, it seems that vital sexual fluids are used to enrich and strengthen the brain making it strong enough to receive enlightenment.

SHAKTIPAT OR KUNDALINI MAHA-YOGA—-

Kundalini Maha-Yoga is a self-proven and self-perfecting spiritual practice. The power of Kundalini can cause an initiate to perform kriyas (automatic movements) through the power of Kundalini itself. The force of the Kundalini is such that the body performs these asanas unconsciously. Another name is Siddha-yoga, or the self-proven path of meditation. In all aspects, body, mind and intellect, Shakti uses Kundalini to perform the meditation. The initiate is drawn into flowing with the energy and must surrender to the process. When and how Kundalini-Shakti manifests is the work of the divine power (Shakti) Itself. To practice Siddha Yoga one must allow the divine power the opportunity to perform the meditation and yogic postures without interference.

Traditionally, it is believed that without initiation it is difficult to realize the fruits of knowledge, meditation, yoga, japa (chanting), tapa (austerities), devotion, karma, and dharma (religious duties). Kundalini Maha-Yoga (Shaktipat) as a path of initiation is different from other paths of meditation and/or initiation, because on other paths one has to learn certain tasks or master specific techniques. Practitioners are responsible for doing meditation or they may have to learn about different stages in meditation. Ceremonies may have to be performed or different yogic postures or asanas assumed, or they may have to struggle to eject undesirable thoughts from their mind.

In Shaktipat it is not necessary to do any of these things. All the person has to do is sit with a complete sense of surrender to the present moment and experience. To achieve Shaktipat a person should be warm and welcoming to all thoughts or emotions as they occur, allowing inner life to flow effortlessly through the body without interference or judgement. Then, according to the nature and state of the spiritual consciousness of each initiate, different meditative experiences — emotional, intellectual, or creative in nature — will occur by themselves.

GURU AND INITIATE—-

In the Shaktipat tradition, a Guru is a person who can awaken Kundalini energy in another. The one receiving the energy from the Guru is the initiate. A person in whose presence or by whose touch one feels inner happiness and bliss is a Guru. In fact, one’s Atman or Soul is the real and ultimate Guru — there is none above Atman. But this concept is too abstract for many on the spiritual path which is why they take a physical Guru. One may adopt a Guru until the realization of Atman (the inner Guru) takes place. Sometimes one is dissatisfied with the Guru. There is always the freedom to choose another, but this should only be done when following the same Guru doesn’t feel right intuitively anymore. A Guru is there to reveal and dissolve the ego, which is never easy. Vigilance as to why there is discomfort working with the Guru is vital, because when the ego feels threatened it will find reasons to leave the Guru to stop any further spiritual advancement. Just as a bee goes from one flower to another in search of honey, a practitioner can also go from Guru to Guru in search of knowledge but one needs to be aware that superficial flitting about will not aid spiritual unfoldment.

In an initiation, if the initiate does not feel inner happiness or bliss — and certainly if one year after initiation (and having rigorously followed instructions and been vigilant with the ego) one does not experience bliss and intuitive knowledge — then it may be time to look for another Guru. Finding a self-declared Guru who is ready to work for money is easy; finding an authentic Guru is difficult.

The aspirant needs to be prepared for the initiation, too. This means the mind and body must be made as strong as possible. If cement is put on mud, its utility is weak like mud; but when applied to brick, it becomes as strong as stone. Similarly, when practitioners prepare themselves through the training of Hatha yoga and achieve renunciation of the world before Shaktipat initiation, they will attain a high state of spiritual development soon after initiation. However, Gurus normally do not insist on prior preparation. In cases where the aspirant is unprepared, after initiation some of the Shakti is used for clarifying and transforming the neo-initiate, strengthening the body and mind. After being initiated, one should build better foundations for spiritual advancement by assuming a spiritual practice of life. Yogic postures provide physical stability, mudras give the body strength, and pranayama or breath-control provides subtlety, cleansing the nerves and prompting focus on the inner world. Determination and meditation provide single-pointed-concentration on consciousness, and samadhi (inner absorption) provides the final absorption of consciousness. The Vedanta points out that knowledge without practical application in the form of spiritual practice is insufficient for Self-Realization.

Building strong spiritual foundations generate in the practitioner two qualities. First, Non-attachment, the state of controlled Chitta (mind-stuff) containing no movement toward anything desired or away from anything not desired. This does not mean that there is a physical disassociation with the world, but more a sense of detachment at the mental level breaking the cycle of desire and attachment. When this happens, the second quality of renunciation follows. Discarding materialistic attachment completely is renunciation. A practitioner develops non-attachment first and then renunciation follows naturally. Non-attachment and renunciation are the result of a meditative and contemplative life and are the pillars for the highest good. They are called Parmarth (for the highest good). These two are very important for the initiate to possess, in order to experience successful and effective Shaktipat.

To understand the above and the suffering that arises when one hasn’t these qualities, one has only to look at the average person and how they suffer because of their attachment to worldly affairs. The physical body is everything for them, and the fear of death is often paramount in their thoughts. Little spiritual progress is made when the mind is consumed with the fear of death. Nevertheless, by controlling the Chitta through making it dispassionate in gradual steps, non-attachment can be achieved. Slowly, one understands that this world is transitory, changing constantly, and ultimately decaying. The pursuit and satisfaction of desires cannot lead to inner happiness, since one desire leads to another in an unending chain of dissatisfaction. Combining this understanding with the study of spiritual literature, contemplation and meditation, increases detachment from the objective world. This results in corresponding gains in spiritual advancement. An initiation at this stage can produce wonderful direct experiences with Shakti.

Also important is the relationship between the path of knowledge and the path of yoga. Those on the path of knowledge experience yoga (joining the Soul with Super-soul or Self-Realization) after many lifetimes. A yogi acquires knowledge through the practice of yoga becoming liberated in a single lifetime. Therefore Yoga is a method by which results can be achieved in a single lifetime. Just as a monkey jumps from one branch to another to finally reach the desired tree laden with fruit, so the yogi moves from one chakra to another. He/she gradually crosses the first six chakras until he/she finally arrives at the seventh/crown center, where consciousness and prana are anchored. At this stage the yogi acquires intuitive knowledge and liberation at the same time. An ideal way for spiritual advancement is to pursue the path of knowledge and the path of yoga simultaneously, as they complement each other. This may also be the fastest way to achieve spiritual advancement.

SHAKTIPAT INITIATION—-

Awakening through a Guru is called Shaktipat. In this method, “divine energy” passes directly from the Guru to the initiate. The initiation can be performed in four ways: through touch, sight, mental concentration, and a mantra. The easiest way of understanding how these four processes work is through an example. A bird affects the growth of the chick inside an egg by sitting on it or touching it with its body. In the same way, the Guru awakens the power of the disciple by his/her touch. As a fish nourishes its children through its sight, so, the Guru passes the energy to the disciple by his/her sight or look. As a tortoise brings out the children from the eggs under the ground by concentration and determination, so, the Guru awakens the energy in the disciple through mental concentration. A Guru can also awaken the energy by speaking and passing on a mantra to the disciple. A mantra contains the subtle seeds of divinity and is not just a combination of words or letters. Traditionally, the divine power of mantra is realized when it passes from the Guru to the initiate.

It is the duty of the Guru to determine the ability of the practitioners — in terms of their prior preparation with Hatha yoga and the degree of their faith and surrender — before initiation. The desirable effects in the practitioner are brought forth through Shaktipat. Once activated, Shakti will first purify and transform the practitioner, and then the automatic movements will come into manifestation.

Sometimes Kundalini Shakti is activated but its manifestation takes time. Activation and manifestation are two different things. To make Kundalini manifest either the Guru has to impart additional Shakti or the practitioner has to engage oneself in spiritual discipline. Inactive Shakti can be caused by a number of reasons.

Nervous disorders or the continuous loss of seminal fluid can cause inactivation. Energy activates quickly in a sound body.
Since the organs and senses become weak with age, activation is faster among younger practitioners.
Because women tend to be more in tune with their emotions, they have a greater chance of activating the energy.
Indifference or annoyance on the part of the Guru towards the disciple can impede the process.
High spiritual values and a pure heart trigger activation. Impurities of any kind slow the process down.
Evil deeds or impure thoughts such as theft, murder, or a determination to harm someone in any way will impede the process of activation.
However, the practitioner has no reason to worry if he/she has truly surrendered to the Guru, since the Guru’s additional supply of energy will guide the practitioner through. Ultimately the practitioner is responsible for his/her own actions and intentions. Given the initiate’s karmic history, a Guru can only act as a catalyst for what is ready to be reborn. No Guru can short circuit karma, and for this reason each person who is intending to awaken Kundalini — either with or without a Guru — must take the responsibility and karmic consequences of such actions.

Sometimes Shakti may manifest more intensely, affecting how a person behaves in public. There may be imbalances in walking, trembling, or perhaps crying at holy places. When this happens, the Guru should be consulted. The Guru has the power to slow or accelerate Shakti manifestation. The practitioner should continue to practice yoga and avoid going to public places since the transmigration of energy into non-initiates can result in automatic movements by the unknowing bystanders. This surprising experience can result in the need for hospitalization of the unprepared.

If the Guru dies there is no need to be afraid that the grace of the Guru will be lost, since the activation of Shakti in the practitioner is permanent and will always be a part of his/her experience. The power comes from God since the Guru, inner Guru, Universal Consciousness, and God are one. If the practitioner dies before the achievement of the final result, the activated Kundalini continues in the next incarnation. The process continues until the achievement of samadhi. The spiritual force then merges into the cause, that is, the Soul. In some cases the successor of the Guru, usually appointed by him/her before his death, continues to help practitioners toward the goal.

LIBERATION—-

Traditionally, Shakti-Kundalini, when awakened, transforms the seeds of past actions into automatic movements which results in reduced passions. The thought currents of Chitta (mind-stuff) transform themselves from disturbing ones to calm ones, ultimately losing their power. Similarly, the mind is also freed of desires. The vices of lust, anger, passion, attachment, pride, and jealousy are transcended. These vices are veils of ignorance which delude the mind. The awakened Shakti destroys the veil of Maya (illusion). Shakti originates in the Soul, by which Chitta appears to be conscious and is responsible for the creation of the veil of Maya, which when shattered, returns and reunites with the Soul. Thus, the identification of Chitta with Soul is broken, and with the destruction of the Chitta activity, the state of Self-realization is attained. In this way the individual soul attains the state of super-consciousness.

As the automatic movements become progressively subtler, the aspirant experiences greater joy from these movements. For example, one may experience jerking, vibrating, rolling, or rigorous yogic postures in the beginning, with little or no peace and bliss. In later stages vibrations become rhythmic and soft, with experiences of light and sound and entering into trance. The aspirant is inwardly absorbed in bliss and after the initiate’s mind has been purified the movements disappear. The practitioner now experiences oneness with Ultimate Reality.

EXPERIENCES ON AWAKENING—-

Because yoga is practiced widely and produces results felt by everyone, it is not surprising that the personal experiences of hundreds are being recorded as their Kundalini Shakti awakens and becomes active. Through pranayama or meditation or through Shaktipat the inner power awakens and the indicators described below are observed in the practitioner. However, no two practitioners experience the same thing. The symptoms are not permanent and their intensity is proportional to the karmic balance of the practitioner. They fade away with acquired maturity. A practitioner who has less karmic debt is likely to have milder indicators than one who has more karma to work through. At the end of the process, only the feelings of inner bliss and intuitive knowledge are left. Everything else vanishes.

I witnessed the manifestation of kriyas (automatic movements) at the annual conference of Kundalini Research Network in Philadelphia in 1995 for the first time. The person was a male practitioner from Rishikesh, India. For almost one minute he called out the name of the holy river Ganges and made movements with his hands, while he was seated on the ground. Immediately his movements looked to be taken over by some invisible controller and he began to perform various yoga postures, one after the other. Many of the postures he performed were not ordinarily possible and he demonstrated some pain while performing them. But the genuineness of the performance was felt and appreciated by everyone present. As was said earlier, a practitioner will automatically go into those movements which are necessary for his/her development. One has no control or authority over them. After about half-an-hour the practitioner came back to normal and reported feeling fine. The next demonstration I saw was in India by some practitioners in the presence of their Guru.

Here are some more examples of differing indicators of awakening:

Nan was a college student in the Midwest in the 1960s. She had been a drug addict, but later lived in an ashram in India where she meditated for up to eight hours a day and did not eat much. Nan frequently experienced kriyas such as making sounds, humming, jerking her body, rolling around on the floor, and falling over. She said: “I experienced twisting-snaking energy that was blissful, moving from the lower back or base of the spine upward, that caused my body to writhe around, moaning and groaning, twisting, swaying, falling forward or backward and then having a sudden backward jerk of the head accompanied by the sound of ‘hum.’ There was also an arching backward until falling over.” Sometimes she fell over and rolled on the ground or moved into asanas or mudras, and once she danced in a trance of ecstasy. (Greenwell 1990, p. 189–190)

Karen, a slim and graceful college professor in her 40s, studied Self-Realization Fellowship courses of Yogananda and practiced Kriya Yoga. She began Jungian analysis, and had lucid dreams. One night she began spontaneous rapid breathing and felt like jumping into an abyss. She saw an image of a door opening and some kind of energy passing through her. Another time, vibrations and tremors passed through her legs, spine, and face and she performed yoga asanas (postures) spontaneously for about three hours. Energy streamed upwards and vibrations shook her entire body. She felt that the energy wanted to do things with her body that she was unable to do, and her body felt like clay. She was pulled into extreme postures — she fell backward and upside down, her fingers rigid; she performed a headstand; she stood up with a full body vibration and went forward to the ground; she heard the words “siddha yoga” and her head jerked from side to side; she had a sense of a butterfly body living within her as if her body was its cocoon. It seemed to break out as a new body through her back with still wet wings beginning to unfold; an unusual breathing pattern took over; she began growling and pawing at the floor and said, “I am a leopard; I’m a South-American leopard.” (Greenwell 1990, p. 208–209)

ORDER OF EXPERIENCES—

When the awakening of Kundalini is first experienced, the practitioner feels that the body, mind, and prana have become powerless, since all activities are stilled. When Kundalini receives light from Shakti, the practitioner feels the active energy of prana in one’s consciousness. Later, one hears an internal Sound but cannot find the origin of the Sound. When Kundalini assumes the form of nada (unstruck continuous sound) then one begins to hear its form very faintly. Next the practitioner begins to see divine lights that gradually take the form of a fine flame, whereupon the nada takes the clear form of sounds from the violin, flute, humming of bees, and other similar sounds. Finally nada takes the form of OM or AUM, which is Brahman Itself, and then whatever one determines comes to pass. The subtle form of OM eradicates sin and the deeper form of OM provides liberation. All other forms of automatic movement cease and only the sound of OM remains. One is sightless, only the state of peacefulness and single-pointed concentration remains. On physical death one attains the Brahma-lok or the plane of the residence of Brahman, the final achievement.

As the consciousness becomes pure one sees the Guru, Brahman, and various demi-gods or saints clearly. One may also have visions of the spiritual identities one is most familiar with, such as Krishna, Buddha, Jesus, Mother Mary, formless Light, or any other representations of pure and compassionate energy — they are seen by the practitioner either in dreams, visions or in trance states. Their appearance indicates successful spiritual practice. One may witness such things while walking, sitting or in spiritual practice.

One experiences divine flavors, divine smells, and divine touches, too. The enjoyment of worldly pleasures by people without divine knowledge leads them to grief and suffering, while spiritually perfected individuals receive everything to enjoy without longing and attachment and remain ever happy.

MY OWN EXPERIENCES—-

I have passed through most of the experiences described above. I wrote about them in chronological order and gave complete details in Kundalini for Beginners. I first saw the manifestation of Light in 1984 and the appearance of Sound in 1987, which exists today. I have also experienced Soul-travel to Higher Realms continually since 1987. I can vouch by my own experiences that it is not necessary to cut oneself off from life to achieve them. One can be successful in yoga while living a practical conventional life. These two things are inclusive and they do not interfere with each other. On the contrary, yoga practices generate the energy necessary for success in the world while also enjoying life more fully. By enjoying life’s experience in full one achieves liberation and breaks the cycle of death and rebirth, once and for all. By the grace of God, I have received a number of initiations from respected Gurus but I also worked as a professor of mathematics for more than 30 years. After experiencing Kundalini in 1987, I retired in order to devote myself completely to my spiritual path in 1994.

I have seen the manifestation of kriyas in some practitioners in the presence of the Guru. This same Guru initiated me, although I had my Kundalini awakened many years ago. When I asked about the purpose of this initiation (since I already had an awakened Kundalini) the Guru told me that although my Kundalini was awakened it was not active. The Guru passed his power into me by his touch. For the next three days I underwent automatic movements of my body, although the movements were gentle and rhythmic and not as violent and varied as in the case of some beginners. I also experienced fast and deep inhalations and exhalations accompanying the movements. After 30 to 45 minutes of movements I would go into a trance witnessing inner bliss and oneness with the Reality. For the rest of the day I was filled with an inner happiness and was indifferent to the outer world. Afterwards and for the next two weeks I had an itchy back and burning in my spine. Gradually these symptoms disappeared.

When Kundalini is both awakened and active for some time, and the Shaktipat becomes stabilized in the practitioner, he/she becomes a Guru him/herself and begins to help others raise their Kundalini. I saw that some practitioners who had spent time preparing themselves would go into samadhi when I touched their third eye. An Australian couple came to see me after reading Kundalini for Beginners. The man had been practicing Hatha Yoga and Pranayama for several years. In the morning he came for lessons. I gave him instruction in performing asanas and touched him. He began to perform several yogic postures perfectly and effortlessly, which he could not do earlier. His eyes were closed all the time, and he did not see what he was doing. After about half-an-hour of this performance he became still and normal, and was looking very peaceful and happy. He told me that he had some kriyas in the past but not as intensely as that day.

Although the art of Shaktipat is the easiest and most direct method of awakening Kundalini, its use is uncommon and rare in the present age. The teachings of Shaktipat had been secret, passed from mouth to ear, and were not written. They were almost lost in antiquity. To look for a Master, practitioners searched the Himalayan caves for many years with little success. Nevertheless, for some, there has always been and will continue to be the Guru-initiate Shaktipat.

WHAT HELP IS OFFERED?—

The theory of Kundalini and the Integral Path of yoga has been described in some detail, and a practical formula has been presented in Kundalini for Beginners. There I have given details of other worlds, discussed the power of Soul, and have elaborated on various possible ways of achieving higher consciousness. This book is part of a self-help program which practitioners can follow to prepare themselves for initiation. We have established centers in New Delhi, Copenhagen, London, and Bradenton (Florida) for practical spiritual growth. It is advisable for practitioners to practice the Integral Path of yoga for a period of six months to one year. Depending on the personal progress and wishes of the individual during this period, practitioners are accepted as disciples for Shaktipat initiation. Suggestions from readers are very welcome.

Acknowledgements
Thanks are due to my wife Jytte Kumar Larsen for help in administration of the centers. I wish to thank Jonathan Barber for editing and for assistance in guiding practitioners. Sincere thanks are due to Margaret Dempsey for her editing and for suggesting some useful changes. Thanks are also due to Michael E. Tymn, book-review editor, JRPR, for comments and suggestions.

References
Greenwell, Bonnie 1990. Energies of Transformation: A Guide to the Kundalini Process. Shakti River Press, Cupertino, CA.
Kumar, Ravindra 2000. Kundalini for Beginners. Llewellyn Worldwide Ltd., MN, U.S.A.

Shaktipat ???

Shaktipat or Shaktinipata is a Sanskrit word in the Hindu spiritual tradition that refers to the act of a guru or spiritual teacher conferring a form of spiritual “power” or awakening on a disciple/student. “Shakti” translates as energy and “pat” as touch. Shaktipat can be carried out by the spiritually enlightened master either by transmission of sacred word or mantra, a look, a thought or by touch. The touch is usually given to the ajna chakra or third eye of the disciple. Shaktipat can be transmitted in person or at a distance, through an object such as a flower or fruit, or via telephone or letter.

**सरस्वती सिद्ध विश्वजयं कवच**********
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ॐ ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहेति श्रोत्रे पातु निरन्तरम! ॐ श्रीं ह्रीं भगवत्यै सरस्वत्यै स्वाहा नेत्रयुग्मं सदावातु!!
ऐं ह्रीं वाम्वादिन्ये[यै] स्वाहा नासां मे सर्वदावातु! ॐ ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वहा चोष्ठं सदावतु!!
ॐ श्रीं ह्रीं ब्राह्मयें [यै] स्वाहेति दन्तपंगपंग्क्ति सदावतु! ऐमित्येकाक्षारो मंत्रो मम कण्ठे सदावतु!!
ॐ श्रीं ह्रीं पातु मे ग्रीवां स्कन्धौ मे श्रीं सदावतु! ॐ ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा वक्ष: सदावतु!!
ॐ ह्रीं विद्याधिस्वरूपायै स्वाहा मे पातु नाभिकाम! ॐ ह्रीं क्लीं वाण्यै स्वाहेति मम हस्तौ सदावतु!!
ॐ सर्ववर्णात्मिकायै पादायुग्मं सदावतु! ॐ वागधिष्ठतृदेव्यै स्वाहा सर्वें सदावतु!!
ॐ सर्वकन्ठवासिन्ये स्वाहा प्राच्यां सदावतु! ॐ सर्व जिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहाग्निदिशी रक्षतु!!
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा! सततं मन्त्रोराजोsयं दक्षिणे मां सदावतु!!
ऐं ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरो मन्त्रो नैर्त्रित्यां सर्वदावातु ! ॐ ऐं जिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहा मां वारुणेsवतु !!
ॐ सर्वाम्बिकायै स्वाहा वायव्ये मां सदावतु! ॐ ऐं श्रीं क्लीं गद्यवासिन्यै स्वाहा मां मामुत्तरेsवतु !!
ऐं सर्वशास्त्रवासिन्यै सवाहैशान्यां सदावतु! ॐ ह्रीं सर्वपूजितायै स्वाहा चोर्ध्वं सदावतु!!
ह्रीं पुस्तकवासिन्यै स्वाहाधो मां सदावतु! ॐ ग्रन्थबीजस्वरूपायै स्वाहा मां सर्वतोsवतु!!
इति ते कथितं विप्र ब्रह्म मंत्रौघविग्रहम ! इदं विश्वजयं नाम कवचं ब्रह्मस्वरूपकम !!
पूरा श्रुतं धर्मवक्त्रात पर्वते गंधमादाने! तव स्त्रेहान्मयाssख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित !!
गुरुमभ्यर्च्य विधिवद्वस्त्रा लंकारचन्दनै! प्रणम्य दण्डवद्भुमौ कवचं धारयेत सुधी:!!
पंचलक्षजपेनैव् सिद्धं तु कवचं भवेत्! यदि स्यात सिद्धकवचो वृहस्पतिसमो भवेत्!!
महावाग्मी कवीन्द्रश्च त्रैलोक्यविजयी भवेत्! शक्रोती सर्वें जेतुं च कवचस्य प्रसादत:!!

यह “विश्वविजय कवच” है! जैसा इस कवच का नाम है वैसे ही इसका फल है! इसके करने पर महामूर्ख भी ज्ञानी बन जाता है!

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

*दुर्गा चालीसा—पवन तलहन

*****दुर्गा चालीसा*****
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नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥
निराकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूं लोक फैली उजियारी ॥
शशि ललाट मुख महा विशाला । नेत्र लाल भृकुटी विकराला ॥
रुपमातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे ॥
तुम संसार शक्ति लय कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना ॥
अन्नपूर्णा हु‌ई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥
रुप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्घि ऋषि मुनिन उबारा ॥
धरा रुप नरसिंह को अम्बा। प्रगट भ‌ई फाड़कर खम्बा ॥
रक्षा कर प्रहलाद बचायो। हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ॥
लक्ष्मी रुप धरो जग माही। श्री नारायण अंग समाही ॥
क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी ॥
मातंगी धूमावति माता। भुवनेश्वरि बगला सुखदाता ॥
श्री भैरव तारा जग तारिणि। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥
केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी ॥
कर में खप्पर खड्ग विराजे। जाको देख काल डर भाजे ॥
सोहे अस्त्र और तिरशूला । जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥
नगर कोटि में तुम्ही विराजत । तिहूं लोक में डंका बाजत ॥
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे । रक्तबीज शंखन संहारे ॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी । जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥
रुप कराल कालिका धारा । सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब । भ‌ई सहाय मातु तुम तब तब ॥
अमरपुरी अरु बासव लोका । तब महिमा सब रहें अशोका ॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजें सदा नर नारी ॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावै । दुःख दारिद्र निकट नहिं आवे ॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन ला‌ई । जन्म-मरण ताको छुटि जा‌ई ॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी । योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥
शंकर आचारज तप अति कीनो । काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को । काहू काल नहिं सुमिरो तुमको ॥
शक्ति रुप को मरम न पायो । शक्ति ग‌ई तब मन पछतायो ॥
शरणागत हु‌ई कीर्ति बखानी । जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥
भ‌ई प्रसन्न आदि जगदम्बा । द‌ई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो । तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥
आशा तृष्णा निपट सतवे । मोह मदादिक सब विनशावै ॥
शत्रु नाश कीजै महारानी । सुमिरों इकचित तुम्हें भवानी ॥
करौ कृपा हे मातु दयाला । ऋद्घि सिद्घि दे करहु निहाला ॥
जब लगि जियौं दया फल पा‌ऊँ । तुम्हरो यश मैं सदा सुना‌ऊँ ॥
दुर्गा चालीसा जो नित गावै । सब सुख भोग परम पद पावै ॥
मोको मात शरण निज जानी । करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥

॥ जय माता दी ॥

श्री हनुमान जी का व्रत खंडित हुआ
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:- श्री हनुमान जी का व्रत खंडित हुआ —–हनुमान जी ने कहा आज मेरा व्रत खंडित हुआ! बड़ा पश्चात्ताप, महान दुःख! इस अंतर्वेदना की कक्पना करना सर्वसामान्य के लिये संभव नहीं है! जिसने कोई व्रत, कोई नियम दीर्घकाल तक पालन किया हो, उससे किसी प्रमादवश अनजान में वह नियम टूट जाय, तब उसे कुछ थोड़ा अनुभव होता है कि व्रत-भंग की वेदना कैसे होती है!

हनुमान जी कहते हैं– मैं मरणांत प्रायश्चित करूंगा!

हनुमान जी ने लंका में प्रवेश किया था रात्रि में और उन्हें पता तो था नहीं कि रावण ने श्री जनकनंदिनी को कहाँ रखा है! अत: वे राक्षसों के घर में घूमते फिरे! रावण का अन्त:पुर छान मारा उन्होंने! श्री जानकी को ढूँढ़ना है तो स्त्रियाँ जहाँ रह सकती हैं वहीँ तो ढूँढ़ना पड़ता! वे राक्षसों के अन्त:पुर थे, संयमियों के नहीं! सुरापान एवं उन्मत्त विलास ही राक्षसों का व्यसन था! वे अपनी उन्मद-क्रीडा के अनन्तर निद्रामग्न हो चुके थे! लगभग प्रत्येक गृह में अस्त-व्यस्त वस्त्राभरण,नग्न, अर्धनग्न निद्रा में पड़ी युवतियां ही देखने को मिलीं! उस अवस्था में परस्त्री को देखना सदगृहस्थ के लिये भी बहुत बड़ा दोष है! हनुमान जी तो ब्रह्मचारी थे!

कोई अनर्थ हो, कुछ कर बैठे, इससे पूर्व जैसे हृदय में प्रकाश हो गया! अन्तस्थित रघुवंशविभूषण अपने आश्रितों की रक्षा ही करते हैं! हनुमान जी के मन में बात स्पष्ट हुई–किसी नारी के सौन्दर्य पर तो मेरी दृष्टि नहीं गयी! मैं तो माता जानकी को ढूँढ़ रहा था! मेरे मन में तो कहीं कोई विकार आया नहीं! ये जो स्त्रियों के देह मुझे देखने पड़े, यह सब शव-जैसे ही तो हैं मेरी दृष्टि में! तब मेरा व्रत-भंग कैसे हुआ? मेरा व्रत भंग नहीं हुआ, मेरा व्रत भंग नहीं हुआ कहते हुए उछल पड़े!

व्रत का मूल मन है, देह नहीं! हनुमान जी के व्रत में कोई त्रुटी नहीं आयी थी! उनके मन में जो पश्चात्ताप जगा था, वह ब्रह्मचर्य-व्रत के प्रति उनकी जो प्रबल निष्ठा और सतत जाग रूकता है, उसी का सूचक है!

‎******भगवती दुर्गा की पूजा का विधान**************************************

जिसके श्रवनमात्र से घोर विपत्तियाँ स्वयं भाग जाती हैं! जो इन भगवती दुर्गा की उपासना नहीं करता हो, ऐसा तो इस जगत में हो ही नहीं सकता, क्योंकि वे सब की उपासना, सबकी जननी, शैवी एवं शक्ति देवी बड़ी ही अद्भुत हैं! ये भगवती दुर्गा सबकी बुद्धि की अधिदेवी हैं, अंतर्यामीरूप से सब के भीतर इनका वास रहता है! घोर संकट से रक्षा करने के कारण जगत में ये दुर्गा नाम से प्रसिद्द हैं! शैव और वैष्णव पुरुषों द्वारा निरंतर इनकी उपासना होती है! इन मूलप्रकृति श्री दुर्गा देवी के सत्प्रयास से जगत की सृष्टि, स्थिति और संहार होते हैं! अब इनके उत्तम नवाक्षर मन्त्र का वर्णन करता हूँ!

सरस्वती बीज { ऐं}
भुवनेश्वरी बीज { ह्रीं }

और कामबीज {क्लीं}—इन तीनों बीजों का आड़ू में क्रमश: प्रयोग करके ” चामुंडायै” इस पद को लगाकर, फिर “विच्चे” यह दो अक्षर जोड़ देना चाहिये, { ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे} यही मनुप्रोक्त नवाक्षर मन्त्र है! उपासकों के लिये यह कल्पवृक्ष के समान है! इस नवार्ण मन्त्र के ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र–ये तीन ऋषि कहे जाते हैं! महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवता हैं तथा रक्तदंतिका, दुर्गा एवं भ्रामरी बीज हैं! नंदा, शाकम्भरी और भीमा शक्तियां कही गयी हैं! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिये इस मन्त्र का प्रयोग किया हाता है! ऐं ह्रीं क्लीं —तीन बीज मन्त्र, चामुंडायै ये वहार अक्षर तथा विच्चे में दो अक्षर–ये मन्त्र के अंग हैं! प्रतेयक के साथ नम:, स्वाहा, वषट, हुम, वौषट और फट –ये छ: जातीसंज्ञक वर्ण लगाकर शिखा, दोनों नेत्र, दोनों कान, नासिका, मुख और गुदा आदि स्थानों में इस मन्त्र के वर्णों का न्यास करना चाहिये!

ध्यान —–इस प्रकार है———
महाकाली जी का ध्यान —–

तीन नेत्रों से शोभा पाने वाली भगवती महाकाली की मैं उपासना करता हूँ! वे अपने हाथों में खडग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिध, शूल, भुशुण्डी, मस्तक और शंख धारण कराती हैं! वे समस्त अंगों में दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं! उनके शरीर की कान्तिनीलमणि के समान है!तथा वे दस मुख और दस पैरों से युक्त हैं! कमलासन ब्रह्मा जी ने मधु-कैटभ का वध करने के लिये इन महाकाली की उपासना की थी! इस प्रकार काम बीज स्वरूपिणी भगवती महाकाली का ध्यान करना चाहिये!
महालक्ष्मी जी का ध्यान———–

जो अपने हाथों में अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, पद्म, धनुष, कुण्डिका, दंड, शक्ति, खडग, ढाल, घंटा, मधुपात्र, त्रिशूल, पाश और सुदर्शनचक्र धारण कराती हैं, जिनका वर्ण अरुण है, तथा जो लाल कमल पर विराजमान हैं, उन भगवती महिषासुरमर्दिनी भगवती महालक्ष्मी जी का मैं भजन करता हूँ!
महासरस्वती जी का ध्यान—–

जो अपने करकमलों में घंटा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, कुंद के समान जिनकी मनोहर कान्ति है, जो शुम्भ आदि दैत्यों का नाश करने वाली हैं, वाणी बीज जिनका स्वरुप है तथा जो सच्चिदानन्दमय विग्रह से संपन्न हैं, उन भगवती महासरस्वती जी का मैं भजन करता हूँ!
इस प्रकार विनियोग लगा कर माँ भगवती दुर्गा जी का पूजा विधान कहा गया है! जो पुरुष विधानानुसार पाठ करता है, उसकी सभी कामनाएं भगवती दुर्गा जी अतिशीघ्र पूरी कराती हैं!——

{सत्यं सत्यं न संशय———सत्य है सत्य है, इस में कोई संशय नहीं है!}
—–ऐसा जान———
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*****श्रीसरस्वतीस्तोत्रम*****
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या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रस्त्रावृता
या वीनावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना!!
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता
सा माँ पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा!!१!!
आशासु राशीभवदंगवल्ली
भासैव दासीकृतदुग्धसिन्धुम!
मन्दस्मितैर्निन्दितशारदेन्दुं
वन्देsरविन्दासनसुन्दरि त्वाम!!२!!
शारदा शारादाम्भोजवदना वदनाम्बुजे!
सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात!!३!!
सरस्वतीं च तान नौमि वागधिष्ठातृदेवताम!
देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यद् नुग्रहतो जाना:!!४!!
पातु नो निकषग्रावा मातिहेम्न: सरस्वती!
प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव करोति या!!५!!
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदानं जाडयान्धकारापहाम!
हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम !!६!!
वीणाधरे विपुलमंगलदानशीले
भक्तार्तिनाशिनी विरंचिहरीशवन्द्ये!
कीर्ति प्रदेsखिलमनोरथदे महार्हे
विद्याप्रदायिनी सरस्वती नौमि नित्यम!!७!!
श्वेताब्जपूर्णविमलासनसंस्थिते हे
श्वेताम्बरावृत मनोहरमंजुगात्रे !
उद्यन्मनोज्ञसितपंकजमुन्जुलास्ये
विद्याप्रदायिनी सरस्वती नौमि नित्यम!!८!!
मातस्त्वदीयपदपंकजभक्तियुक्ता
ये त्वां भजन्ति निखिलानपरान्विहाय!
ते निर्जरत्वमिह यान्ति कलेवरेण
भूवह्विवायुगगनाम्बूविनिर्मितेन!!९!!
मोहान्धकारभरिते हृदये मदीये
मात: सदैव कुरु वासमुदारभावे!
स्वीयाखिलवयवनिर्मल सुप्रभाभी:
शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम!!१०!!
ब्रह्मा जगत सृजति पालयतीन्दिरेश:
शुम्भर्विनाशायति देवि तव प्रभावै:!
न स्याप्रिपा यदि तव प्रकटप्रभावे
न स्यु:कन्चिदपि ते निजकार्यदक्षा:!!११!!
लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तुष्टि: प्रभा धृति:!
एताभि: पाहि तनुभिर्ष्टाभिर्मां सरस्वती !!१२!!
सारस्वत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नम:!
वेदावेदांतवेदांगविद्यास्थानेभ्य एव च !!१३!!
सरस्वती महाभागे विद्ये कमललोचने !
विद्यारूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोs स्तु ते !!१४!!
यद्क्षरं पदं भ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत !
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरी!!१५!!
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Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

हनुमान स्तुति—पवन तलहन

‎सप्ताह के सात दिनों के सात वार नाम क्रमशः सोम,मंगल,बुध, गुरु,शुक्र,शनी,रवी और इन वारों का अलग अलग महत्व बताया गया है! ऐसी मान्यता है कि मंगलवार और शनीवार श्री हनुमानजी का दिन/वार है इस दिन इनका प्रभाव अधिक रहता है लकिन यह भी सत्य है कि जब भी किसी को कष्ट आता है तो श्री हनुमानजी को याद करतें हैं उस समय दिन/वार कोइ याद नहीं आता है!

हमारे सभी मंदिरों में श्री हनुमानजी का विग्रह(मूर्ति) स्थापित की जाती है!इन्हें कई नामों से पुकारा जाता है और उन नामों में अंजनीनंदन, पवनपुत्र, बजरंगबली, महाबीर, संकटमोचन, बालाजी मुख्य हैं! इनका प्रभाव हर दिन हर समय रहता है !

आईये इसी भाव में श्री हनुमानजी का गुण-गान करें:—
कोइ कहता मंगल,शनिवार तुम्हारा है मै तो कहता हर पल,
हर वार तुम्हारा है जय राम सियाराम,जय राम सियाराम …
तेरे वार के आगे ,क्या वार कोइ करता हो भुत या पिशाच,
तेरे नाम से है डरता महाबीर,बजरंगी जो नाम तुम्हारा है मै तो कहता …..
कोइ कहता मंगल,शनिवार तुम्हारा है मै तो कहता हर पल,
हर वार तुम्हारा है जय राम सियाराम ,जय राम सियाराम …
तूं बल बुधि का दाता,कष्ट सभी हरता मनोकामना पुरी,
भक्तों की तूं करता जो सुमिरे नाम प्रभु का,लगता तुझे प्यारा है मै तो कहता ….
कोइ कहता मंगल,शनिवार तुम्हारा है मै तो कहता हर पल,
हर वार तुम्हारा है जय राम सियाराम ,जय राम सियाराम …
तूं सियाराम दुलारा,भक्तों को लगता प्यारा तेरी शक्ति को सबने ,
मिलकर जो था ललकारा लाँघ गए सागर को ,लंका को जारा है मै तो कहता …..
कोइ कहता मंगल,शनिवार तुम्हारा है मै तो कहता हर पल,
हर वार तुम्हारा है जय राम सियाराम ,जय राम सियाराम …
ओ पवन पुत्र बलकारी ,माता के आज्ञाकारी सुर नर मुनिजन सबने ,
तेरी आरती उतारी ‘टीकम’ संकट मोचन,भव तारण हारा है |मै तो कहता …
कोइ कहता मंगल,शनिवार तुम्हारा है मै तो कहता हर पल,
हर वार तुम्हारा है जय राम सियाराम ,जय राम सियाराम …
जय राम-राम,जय राम-राम,जय राम-राम सियाराम जय राम-राम,
जय राम-राम,जय राम-राम सियाराम

(भजन के भाव:स्वरचित)

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

आपको अपने कुछ लेख भिजवा रहा हु

श्रीमान जी, आपकी सेवा में आपको अपने कुछ लेख भिजवा रहा हु जी,
आशा हे आपको पसंद आयेंगे—कृपया ठीक लगने पर प्रकाशित कर कृतार्थ करे,
आभारी रहूँगा/ धन्यवाद/ प्रतीक्षा रत—
आपका—अपना-
पंडित दयानंद शास्त्री
प्रिय मित्रो. आप सभी मेरे ब्लोग्स पर जाकर/ फोलो करके – शेयर करके – जानकारी प्राप्त कर सकते हे—-
नए लेख आदि भी पढ़ सकते हे….. धन्यवाद…प्रतीक्षारत….
Contact No. :— 09024390067;; 09413103883
Postal / Communication Address :—

Pt. Dayananda Shastri,
(Editor- Vinayak Vastu Times )
(R.N.I. No.:- RAJHIN/2008/25671)
Vinayak vastu Astro Shodha Sansthan,
Near Old Power House, Kasera Bazar,
JHALRAPATAN CITY (RAJ.) 326023 INDIA

E-Maii:- — vastushastri08@gmail.com;vastushastri08hotmail.com;;;
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Blogs– 1.- http://vinayakvaastutimes.mywebdunia.com//;;;;

— 2.- https://vinayakvaastutimes.wordpress.com///;;;

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—4.- http://www.mediaclubofindia.com/profile/PtDAYANANDASHASTRI ;;;;;///

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

हे इश्वर रहम कर…??

क्या खोया क्या पाया मैंने,मिलते और बिछुड़ते जग में.मुझे किसी से नहीं शिकायत,यद्यपि छला गया पग पग में …कइयो ने बनाया/ समझा मुझे बेवकूफ…लेकिन मेने भी नहीं हरी हे हिम्मत..चलता जा रहा हु अकेला ही अपनी मंजिल/लक्ष्य की तरफ..बिना किसी साथी/ हमसफ़र/ चिंता या सहयोग के….ईश्वर की कृपा..अपनों का प्यार…बड़ो का मार्गदर्शन और आशीर्वाद मेरे साथ हे…अभी तक तो मुझे सभी मांगने वाले (लेने वाले )ही मिले हे….देने वाले कब मिलेंगे ..?? पता नहीं ..हे इश्वर रहम कर…?????

नवरात्रि में कुमारी पूजन— डॉ. रामकृष्ण डी. तिवारी

दस वर्ष या उससे कम अवस्था की कन्या को देवी स्वरूप कहा गया है। नवरात्र में हुई साधना का फल इनकी पूजा के अभाव में कठिन है। कुमारी के पूजन से ही इस साधना पर्व की सिद्धि होती है।

दो वर्ष तक की कन्या को कुमारी, उससे अधिक व तीन वर्ष से कम त्रिमूर्ति, उससे अधिक व चार वर्ष से कम कल्याणी, उससे अधिक व पाँच वर्ष से कम रोहिणी, उससे अधिक व छः वर्ष से कम कालिका, उससे अधिक व सात वर्ष से कम चंडिका, उससे अधिक व आठ वर्ष से कम शाम्भवी, उससे अधिक व नौ वर्ष से कम दुर्गा, इससे लेकर दस वर्ष की आयु को सुभद्रा नाम से संबोधित किया गया है।

इस आयु की कुमारी को आमंत्रित करके चरण धुलाकर पवित्र स्थान व आसन पर बैठाकर उनके सामने अपनी कामना का स्मरण या उच्चारण करें। इसके पश्चात अपनी शक्ति व श्रद्धानुसार वस्त्र, अलंकार, पुष्प, माला, सुगंधित तेल, चंदन, सिंदूर, काजल, इत्र इन कन्याओं को देवी स्वरूपमानते हुए अर्पित करें। यदि संभव हो तो उन्हें यह धारण करवाएँ। इसके पश्चात भोजन पूर्ण श्रद्धा व पवित्रता से परोसें।

भोजन पूर्ण होने पर हाथ-मुँह का शुद्धिकरण करवाकर मुख शुद्धि की वस्तुएँ, फल व दक्षिणा देकर उन्हें घर के द्वार तक बिदा करने जाएँ। कन्या भोज में मिष्ठान्न तो अवश्य चाहिए। भोजन चलते रहने तक धूप व दीपक जलना चाहिए। भोजन की सामग्री स्वयं उपासक को परोसना चाहिए। जूठन व भोजन किए हुए पात्र भी उठाने का प्रयास करना चाहिए। कन्या भोज एक महापूजा है।

इस बात का पूर्ण ध्यान रखकर ही इस कर्म में भावना रखनी चाहिए। आवेश, क्रोध का परित्याग करके ही यह क्रम होना चाहिए। विपरीत परिस्थिति अर्थात कन्या द्वारा जल का ढुलना, पात्रों को गंदा करना, वमन आदि का आना, किसी सामग्री का त्याग करना अथवा किसी सामग्री पर विशेष अनुराग रखकर खाना आदि को भी देवी लीला समझकर यह कर्म करने से देवी अनुष्ठान की पूर्ति होती है।

शीघ्र विवाह एवं विवाह में रुकावट दूर करने के उपाय…–by Net Guru

यहाँ कुछ ऐसे उपाय बताये जा रहे हैं जिनके करने से विवाह में आने वाली रुकावटें दूर होती हैं|यदि किसी अन्य कारण से विवाह नही हो पा रहा है तो आप इन उपायों के माध्यम से लाभ उठा सकते हैं|इससे सबसे पहली बात यह है की आपकी पत्रिका में विवाह योग होना आवश्यक है|आप सर्वप्रथम किसी ज्ञानी से बारीकी से अपनी पत्रिका का अध्यन करवा लें|उनसे यह पता करें आपकी पत्रिका में विवाह योग हैं भी या नहीं|यदि है तो विवाह क्यूँ नही हो पा रहा है |अगर कोई गृह रूकावट डाल रहा है तो सर्वप्रथम उस गृह की शान्ति आवश्यक है|यदि आपकी पत्रिका के अनुसार कोई गृह ही समस्या दे रहा है,विवाह योग भी है और विवाह नहीं हो पा रहा है तो आप आगे दिए जा रहे उपाय कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं|
विवाह योग्य लोगों को प्रत्येक गुरूवार को नहाने वाले पानी में एक चुटकी हल्दी डालकर स्नान करना चाहिए|केसर का भी प्रयोग करना चाहिए|
यदि ऐसे लोग गुरूवार को गाय को भोग अर्थात दो आटे के पेड़े पर थोड़ी हल्दी लगाकर थोडा गुड तथा चने की गीली दाल का भोग देना चाहिए|
भूलकर भी बजुर्गों का अपमान न करें|बजुर्ग व्यक्तियों का सम्मान करना चाहिए|
यह प्रयोग शुकल पक्ष के प्रथम गुरूवार से करना चाहिए|गुरूवार की शाम को पांच प्रकार की मिठाई के साथ हरी इलाइची का जोड़ा तथा शुद्ध घी के दीपक के साथ जल अर्पित करना चाहिए|यह लगातार तीन गुरूवार करना चाहिए|
गुरूवार को केले के वृक्ष के समक्ष गुरु के १०८ नामों के उच्चारण के साथ शुद्ध घी का दीपक तथा जल अर्पित करना चाहिए|
अब यहाँ आपको ऐसा उपाय बताया जा रहा है जिसका प्रयोग करने से विवाह में कोई भी रूकावट नही आएगी|जिस समय का योग आपकी कुंडली में है,तो विवाह उसी समय होगा|इसके लिए मंगलवार को प्रातः सूर्योदय काल में एक सुखा नारियल लें|३०० ग्राम बूरा यानि पीसी शक्कर तथा ११ रूपए का पंचमेवा मिला लें|नारियल मैं इतना बड़ा छेद करें,जिसमे आपकी ऊँगली जा सके|उसमे पीसी शक्कर व पंचमेवा मिलाकर भर दें,और किसी पीपल के नीचे थोडा गद्दा कर दबा दें|जो शक्कर बच जाये उसे गद्दे के ऊपर ही डालकर एक पत्थर रख दें|जिससे कोई जानवर उसे निकाल न सके|ऐसा आप सात मंगलवार को करें|किसी भी कन्या के लिए इसे लगातार सात मंगलवार करना नामुमकिन है तो अस्वस्थ दिनों में न कर के उसके बाद शुद्ध होने पर पुन:आरम्भ कर सकती है|इस प्रयोग में यह सावधानी रखनी है की सोमवार की रात्रि से मंगलवार प्रयोग होने तक जल नहीं पीना है और किसी से भी बात नहीं करनी है|सात मंगल होने के बाद आप स्वयं ही चमत्कार देखेंगे|
यदि किसी कन्या की पत्रिका में मंगली योग होने के कारण विवाह में बाधा आ रही है तो व कन्या मंगल चंडिका स्त्रोत का मंगलवार तथा शनिवार को सुंदर काण्ड का पाठ करे|इससे भी विवाह बाधा दूर होती है|
शुक्रवार की रात्रि में आठ छुआरे जल में उबाल कर जल के साथ ही अपने सोने वाले स्थान पर सिरहाने रख कर सोयें तथा शनिवार को प्रात:स्नान करने के बाद किसी बहते जल में प्रवाहित कर दें|यह प्रयोग भी चमत्कारी है|
शीघ्र विवाह के लिए सोमवार को १२०० ग्राम चने की दाल व सवा लीटर कच्चा दूध दान करें|जब तक विवाह न हो ,तब तक यह प्रयोग करते रहना है|इस प्रयोग में आपका विवाह होना आवशयक है|
कन्या जब किसी कन्या के विवाह में जाये और यदि वहन पर कन्या को मेहँदी लग रहे हो तो अविवाहित कन्या कुछ मेहँदी उस कन्या के हाथ से लगवा ले तो विवाह का मार्ग प्रशस्त होता है|
कन्या सफेद खरगोश को पाले तथा अपने हाथ से उसे भोजन के रूप में कुछ दे|यदि विवाह में बुध रूकावट दे रहा हो तो खरगोश को हरी घास खिलाएं|
कन्या के विवाह की चर्चा करने उसके घर के लोग जब भी किसी के यहाँ जायें तो कन्या खुले बालों से,लाल वस्त्र धारण कर हँसते हुए उन्हें कोई मिष्ठान खिला कर विदा करे|विवाह की चर्चा सफल होगी|
पूर्णिमा को वाट वृक्ष की १०८ परिक्रमा देने से भी विवाह बाधा दूर होती है|गुरूवार को वाट,पीपल,केले के वृक्ष पर जल अर्पित करने से विवाह बाधा दूर होती है|

माता वैष्णोदेवी : वास्तु ‍की दृष्टि से —- कुलदीप सलूजा

माँ वैष्णोदेवी भवन के पूर्व में त्रिकुट पर्वत की ऊँचाई है। मंदिर के अंदर माँ की पिंडी के आगे पश्चिम दिशा में चरण गंगा है, जहाँ हमेशा जल प्रवाहित होता रहता है। भवन के बाहर सामने पश्चिम दिशा में पर्वत में काफी ढलान है, जहाँ पर पर्वत का पानी निरंतर बहता रहता है।

माता वैष्णोदेवी के दरबार में महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली तीन भव्य पिंडियों के रूप में विराजमान हैं। पूर्व दिशा में ऊँचाई होना और पश्चिम दिशा में ढलान व पानी का स्रोत होना अच्छा नहीं माना जाता है, परंतु देखने में आया है कि ज्यादातर वो स्थान, जो धार्मिक कारणों से प्रसिद्ध हैं, चाहे वह किसी भी धर्म से संबंधित हों, उन स्थानों की भौगोलिक स्थिति में काफी समानताएँ देखने को मिलती हैं।

ऐसे स्थानों पर पूर्व की तुलना में पश्चिम में ढलान होती है और दक्षिण दिशा हमेशा उत्तर दिशा की तुलना में ऊँची रहती है। उदाहरण के लिए ज्योर्तिलिंग महाकालेश्वर उज्जैन, पशुपतिनाथ मंदिर मंदसौर इत्यादि। वह घर जहाँ पश्चिम दिशा में भूमिगत पानी का स्रोत जैसे भूमिगत पानी की टंकी, कुआँ, बोरवेल इत्यादि होता है। उस भवन में निवास करने वालों में धार्मिकता दूसरों की तुलना में ज्यादा ही होती है।

फेंगशुई के सिद्धांत : –

* किसी भवन के पीछे की ओर ऊँचाई हो, मध्य में भवन हो तथा आगे की ओर नीचा होकर वहाँ जल हो, वह भवन प्रसिद्धि पाता है और सदियों तक बना रहता है। इस सिद्धांत में किसी दिशा विशेष का महत्व नहीं होता है।

* माँ वैष्णोदेवी भवन के पूर्व में त्रिकुट पर्वत की ऊँचाई है। मंदिर के अंदर माँ की पिंडी के आगे पश्चिम दिशा में चरण गंगा है, जहाँ हमेशा जल प्रवाहित होता रहता है। भवन के बाहर सामने पश्चिम दिशा में पर्वत में काफी ढलान है, जहाँ पर पर्वत का पानी निरंतर बहता रहता है।

इस प्रकार माता वैष्णोदेवी का दरबार वास्तु एवं फेंगशुई दोनों के सिद्धांतों के अनुकूल होने से माता का यह दरबार विश्व में प्रसिद्ध है। इन्हीं विशेषताओं के कारण ही यहाँ भक्तों का ताँता लगा रहता है। यहाँ खूब चढ़ावा आता है और भक्तों की मनोकामना भी पूर्ण होती है।

वास्तु के सिद्धांत : –

* त्रिकुट पर्वत पर स्थित माँ का भवन (मंदिर) पश्चिम मुखी है, जो समुद्र तल से लगभग 4800 फुट ऊँचाई पर है। माँ के भवन के पीछे पूर्व दिशा में पर्वत काफी ऊँचाई लिए हुए हैं और भवन के ठीक सामने पश्चिम दिशा में पर्वत काफी गहराई लिए हुए हैं, जहाँ त्रिकुट पर्वत का जल निरंतर बहता रहता है।

* भवन की उत्तर दिशा ठीक अंतिम छोर पर पर्वत में एकदम उतार होने के कारण काफी गहराई है। यह उत्तर दिशा में विस्तृत गहराई पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ती गई है। भवन के दक्षिण दिशा में पर्वत काफी ऊँचाई लिए हुए हैं, जहाँ दरबार से ढाई किलोमीटर दूर भैरवजी का मंदिर है, समुद्र तल से इसकी ऊँचाई 6583 फुट है और यह ऊँचाई लगभग पश्चिम नैऋत्य तक है, जहाँ पर हाथी मत्था है।

* गुफा का पुराना प्रवेश द्वार, जो कि काफी सँकरा (तंग) है। लगभग दो गज तक लेटकर या काफी झुककर आगे बढ़ना पड़ता है, तत्पश्चात लगभग बीस गज लंबी गुफा है। गुफा के अंदर टखनों की ऊँचाई तक शुद्ध जल प्रवाहित होता है, जिसे चरण गंगा कहते हैं। वास्तु का सिद्धांत है कि जहाँ पूर्व में ऊँचाई हो और पश्चिम में निरंतर जल हो या जल का प्रवाह हो वह स्थान धार्मिक रूप से ज्यादा प्रसिद्धि पाता है।

* भवन के उत्तर-ईशान कोण वाले भाग में सन 1977 में दो नई गुफाएँ बनाई गईं, इनमें से एक गुफा में से लोग दर्शन करने अंदर आते हैं और दूसरी गुफा से बाहर निकल जाते हैं। इन दोनों गुफाओं के फर्श का ढाल भी उत्तर दिशा की ओर ही है। ये दोनों ही गुफाएँ भवन में ऐसे स्थान पर बनीं, जिस कारण इस स्थान की वास्तुनुकूलता बहुत बढ़ गई है।

फलस्वरूप इस मंदिर की प्रसिद्धि में चार चाँद लगे हैं, इन गुफाओं के बनने के बाद इस स्थान पर दर्शन करने वालों की संख्या पहले की तुलना में कई गुना बढ़ गई है और वैभव भी बहुत बढ़ गया है।

कैसा होगा लाइफ पार्टनर–क्या आपको मिलेगा बंगला और बैलेंस— मृदुला दशोरिया

हर लड़की की इच्छा होती है कि उसका होने वाला पति अमीर हो, आकर्षक हो और प्यार करने वाला हो। हर युवक की इच्छा वाइफ के मामले में होती है कि वह सुंदर हो, पढ़ी-लिखी हो, घर-परिवार को लेकर चलने वाली हो। आइए जानते हैं कुछ ऐसे प्लेनेट कॉम्बिनेशन ‍जो बताते हैं कि कैसा होगा आपका लाइफ पार्टनर :

- यदि मेष लग्न हो और सातवें भाव में शुक्र हुआ तो लाइफ पार्टनर सुंदर होगा, वहीं वह फाइनेंशियली साउंड भी होगा।

- वृषभ लग्न हो और सप्तम भाव में मंगल हो व चंद्र लग्न में हो तो वह जीवनसाथी उग्र स्वभाव का होगा लेकिन धन के मामलों में सौभाग्यशाली होगा।

- मिथुन लग्न हो और सप्तम भाव का मालिक भी सातवें भाव में ही बैठा हो तो ऐसी पत्रिका ‍जिसकी होगी वह ज्ञानी, न्यायप्रिय, मधुरभाषी, परोपकारी, धर्म-कर्म को मानने वाला या वाली होगी।

- कर्क लग्न वालों के लिए शनि सप्तम भाव में या सप्तमेश उच्च का होकर चतुर्थ भाव में हो तो वह साँवला या साँवली होगी, लेकिन जीवनसाथी सुंदर होगा या होगी व शनि उच्च का हुआ तो विवाह सुख उत्तम मिलेगा।

- सिंह लग्न हो और सप्तमेश सप्तम में हो या उच्च का हो तो वह साधारण रंग-रूप की होगी पर उसका पति या पत्नी पराक्रमी होगें लेकिन भाग्य में रुकावटें आएँगी।

- कन्या लग्न हो और सप्तम भाव में गुरु हो तो पति या पत्नी सुंदर मिलता है। स्नेही व उत्तम संतान सुख मिलेगा। ऐसी स्थिति वाला प्रोफेसर, जज, गजेटेट ऑफिसर भी हो सकता है। लाइफ पार्टनर सम्माननीय होगा।

- तुला लग्न हो और सप्तम भाव में मेष का मंगल हो तो वह उग्र स्वभाव, साहसिक, परिवार से अलग रहने वाली होगा। लाइफ पार्टनर की पारिवारिक स्थिति मध्यम होगी व नौकरी या व्यापार में बाधा होगी।

- वृश्चिक लग्न हो और सप्तम भाव में शुक्र हो तो स्वराशि का होने से उसे सुसराल से धन मिलेगा। पति पत्नी से लाभ पाने वाला और पत्नी पति से लाभ पाने वाली होगी।

- धनु लग्न हो और सप्तम भाव में बुध हो तो लाइफ पार्टनर समझदार, विद्वान, विवेकी, पढ़ी-लिखा होगा। अगर पत्रिका लड़के की है तो लड़की सर्विस में हो सकती है।

- मकर लग्न हो और चंद्रमा सप्तम भाव में हो तो ऐसा युवा सुंदर, सॉफ्ट स्पोकन, शांतिप्रिय होगा। लाइफ पार्टनर बेहद खूबसूरत होगा।

- कुंभ लग्न हो और सप्तम भाव में सूर्य हो तो वह साहसिक, महत्वाकांक्षी, तेजस्वी स्वभाव की होगी व हुकूमत करने वाली होगी। परिवार से भी अलग हो सकती है।

- मीन लग्न हो और सप्तम में उच्च का बुध हो तो वह युवा प्रतिष्ठित होगा, ऐसी प्लेनेट कंडीशन वाली वाली युवती पढ़ी-लिखी, समझदार, माता-पिता, भूमि-भवन से लाभ पाने वाली होगी। परिवार में सम्माननीय होगी।

यदि इन प्लेनेट कॉम्बिनेशन पर अशुभ प्रभाव हुआ तो फल में परिवर्तन आ सकता है। उसी प्रकार अन्य ग्रहों की स्थिति भी देखी जानी चाहिए। उसी प्रकार सप्तमेश सप्तम में ही हो, लेकिन वक्री या अस्त हो तब भी फल में अंतर आ जाएगा।

नवरात्रि में चण्डी हवन का महत्व — ज्योतिर्विद डॉ. रामकृष्ण डी. तिवारी

चण्डी हवन किसी भी दिन व किसी भी समय संपन्न हो सकता है। हवन कुण्ड का पंचभूत संस्कार करें। सर्वप्रथम कुश के अग्रभाग से वेदी को साफ करें। कुण्ड का लेपन करें गोबर जल आदि से।

तृतीय क्रिया में वेदी के मध्य बाएँ से तीन रेखाएँ दक्षिण से उत्तर की ओर पृथक-पृथक खड़ी खींचें, चतुर्थ में तीनों रेखाओं से यथाक्रम अनामिका व अँगूठे से कुछ मिट्टी हवन कुण्ड से बाहर फेंकें। पंचम संस्कार में दाहिने हाथ से शुद्ध जल वेदी में छिड़कें।

पंचभूत संस्कार से आगे की क्रिया में अग्नि प्रज्वलित करके अग्निदेव का पूजन करें। इन मंत्रों से शुद्ध घी की आहुति दें-

ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम।
ॐ इन्द्राय स्वाहा। इदं इन्द्राय न मम।
ॐ अग्नये स्वाहा। इदं अग्नये न मम।
ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय न मम।
ॐ भूः स्वाहा। इदं अग्नेय न मम।
ॐ भुवः स्वाहा। इदं वायवे न मम।
ॐ स्वः स्वाहा। इदं सूर्याय न मम।
ॐ ब्रह्मणे स्वाहा। इदं ब्रह्मणे न मम।
ॐ विष्णवे स्वाहा। इदं विष्णवे न मम।
ॐ श्रियै स्वाहा। इदं श्रियै न मम।
ॐ षोडश मातृभ्यो स्वाहा। इदं मातृभ्यः न मम॥

नवग्रह के नाम या मंत्र से आहुति दें। गणेशजी की आहुति दें।

सप्तशती या नर्वाण मंत्र से जप करें। सप्तशती में प्रत्येक मंत्र के पश्चात स्वाहा का उच्चारण करके आहुति दें। प्रथम से अंत अध्याय के अंत में पुष्प, सुपारी, पान, कमल गट्टा, लौंग 2 नग, छोटी इलायची 2 नग, गूगल व शहद की आहुति दें तथा पाँच बार घी की आहुति दें। यह सब अध्याय के अंत की सामान्य विधि है।

तीसरे अध्याय में गर्ज-गर्ज क्षणं में शहद से आहुति दें। आठवें अध्याय में मुखेन काली इस श्लोक पर रक्त चंदन की आहुति दें। पूरे ग्यारहवें अध्याय की आहुति खीर से दें। इस अध्याय से सर्वाबाधा प्रशमनम्‌ में कालीमिर्च से आहुति दें। नर्वाण मंत्र से 108 आहुति दें।

धन प्राप्ति के सामान्य टोटके …by Net Guru–

आज के युग में सबसे महवपूर्ण कार्य धनप्राप्ति है|कई लोग ऐसे हैं की अज्ञात कारणों से उनके धन प्राप्ति में कोई न कोई रोड़ा अटकता ही रहता है|नीचे कुछ टोटके बताये जा रहें हैं जो धन प्राप्ति में महतवपूर्ण है|जिस स्थान पर इन टोटकों का पालन होता हैं उस स्थान पर माँ लक्ष्मी अपना स्थाई वास बनाती है|
जिस घर में नियमित रूप से अथवा प्रत्येक शुक्रवार को श्रीसूक्त अथवा श्री लक्ष्मी सूक्त का पाठ होता है वहां माँ लक्ष्मी का स्थाई वास होता है|
पर्त्येक सप्ताह घर में फर्श पर पोचा लगते समय थोडा सा समुंदरी नमक मिला लिया करें ऐसा करने से घर में होने वाले झगरे कम होते हैं|इसके अतिरिक्त यह भी लाभ मिलता है आपको नहीं मालूम की आपके घर में आने वाला अतिथि n कहाँ से आया है,तथा उसके मन में आपके प्रति क्या विचार है,नमक मिले पानी से पोचा लगाने से सारी नकारात्मक उर्जा समाप्त हो जाती है|
प्रात: उठ कर गृह लक्ष्मी यदि मुख्य द्वार पर एक गिलास अथवा लोटा जल डाले तो माँ लक्ष्मी के आने का मार्ग प्रशस्त होता है|
यदि आप चाहतें हैंकि घर में सुख शांति बनी रहे तथा आप आर्थिक रूप से समर्थ रहें तो प्रत्येक अमावस्या को अपने घर की पूर्ण सफाई करवा दें|जितना भी फ़ालतू सामान इकठा हुआ हो उसे क्बारी को बेच दें अथवा बाहर फेंक दें ,सफाई के बाद पांच अगरबती घर के मंदिर में लगायें|
यदि आप प्रत्येक पूर्णिमा हवन कर सकें तो बहुत ही शुभ है |इसके लिए यदि आपको कोई मन्त्र नहीं आता है तो सिर्फ इतना करें की किसी कंडे(गोहा)अथवा उपले पर अग्नि प्रजव्लित कर ॐ के उच्चारण से १०८ आहुति दें|यह आपकी धार्मिक भावना को जताता है|
महीने में दो बार किसी भी दिन उपले पर थोड़ी सी लोबान रख कर उसके धुएं को पूरे घर में घुमाएं|
यदि आप के पूजा काल में कोई मेहमान आता है तो यह बहुत शुभ है,इस समय उस मेहमान को जल पान अवश्य करवाएं|यदि संध्या काल की पूजा में कोई सुहागिन स्त्री आती है तो आपका बहुत ही सोभाग्य है|आप यह समझें की आपके घर माँ लक्ष्मी का परवेश हो चूका है|
आप जब भी घर वापिस आयें तो कभी खली हाथ न आयें|यदि आप बाज़ार से कुछ लेने की स्थिति में नही हैं तो रास्ते से एक कागज़ का टुकड़ा उठा लायें |
आपकी साधना अर्थात पूजा काल में कोई बच्चा रोता है तो यह आपके लिए शुभ नही है|इसके लिए आप ज्ञानी व्यक्ति से संपर्क कर पता लगायें की क्या वजह है|इसका सामान्य कारन यह हो सकता है की आपके घर में कोई नकारात्मक शक्ति अवश्य है|
आप के निवास में अग्नेकोण(पूर्व वह दक्षिण का होना)में यदि गलती से कोई पानी की वयवस्था हो गयी है तो यह वास्तु शास्त्र के अनुसार बहुत बड़ा दोष है|इसके लिए आप उस स्थान पर चोबीस घंटे एक लाल बल्ब जलता रहने दें|शाम को उस स्थान पर एक दीपक अवश्य रखें|
घर में कभी नमक किसी खुले डीबे में न रखें|
घर के जितने भी दरवाजे हों उनमें समय समय पर तेल अवश्य डालते रहना चाहिए|उनमें से किसी भी प्रकार की आवाज़ नही आनी चाहिए|
घर में अगर किसी दिन कोई बच्चा सुबह उठते ही कुछ खाने को मांगे अथवा बिना कारन के रोने लगे तो उस दिन घर प्रत्येक सदस्य को सावधान रहने की आवश्यकता है,क्यूंकि यह बात कुछ असुविधा को जताती है|
कभी भी किसी को दान दें तो उसे घर की देहली में अन्दर न आने दें,दान घर की देहली के अन्दर से ही करें|
यदि नियमित रूप से घर की प्रथम रोटी गाय को तथा अंतिम रोटी कुते को दें तो आपके भाग्य के द्वार खोलने से कोई नही रोक सकता|
आप अपने निवास में कुछ कच्चा स्थान अवश्य रखें|यदि संभव हो तो यह घर के मध्य स्थान में रखें|यदि यहाँ तुलसी का पौधा लगा है तो फिर आपके कार्यों में कोई भी रूकावट नही आ सकती|
आप यदि अपने व्यस्त जीवन में गुरूवार को केले के वृक्ष पर सदा जल अर्पित कर घी का दीपक तथा शनिवार को पीपल के वृक्ष में गुड,दूध मिर्षित जल वह सरसों के तेल का दीपक अर्पित करें तो कभी भी आर्थिक रूप से परेशान नही होंगे|
आर्थिक सम्पनता के लिए आप नियम बना लें की नित्य ही किसी भी पीपल के दरखत में जल अवश्य दें|

घर की कोई भी परेशानी में अपनाएं वास्तु…by Net Guru

हमारे घरों में सभी सुख-सुविधा का सामान है,परन्तु शान्ति पाने के लिए तरस जातें हैं|वास्तु शतर द्वारा घर में कुछ मामूली बदलाव कर समस्याओं को दूर कर आप घर एवं बाहर शान्ति का अनुभव कर सकते हैं|
घर के मुख्यद्वार के दोनों और पत्थर या धातु का एक-एक हाथी रखने से सौभाग्य में वृद्धि होती है|
भवन में आपके नाम की प्लेट को बड़ी एवं चमकती हुई रखने से यश की वृद्धि होती है|
स्वर्गीय परिजनों के चित्र दक्षिणी दीवार पर लगाने से उनका आशीर्वाद मिलता रहता है|
विवाह योग्य कन्या को उत्तर-पश्चिम के कमरे में सुलाने से विवाह शीघ्र होता है|
किसी भी दूकान या कार्यालय के सामने वाले द्वार पर एक काले कपड़े में फटकरी बांधकर लटकाने से बरकत होती है|धंधा अच्छा चलता है|
दुकान के मुक्ष्य द्वार के बीच निम्बू व हरी मिर्च लटकाने से नज़र नहीं लगती है|
घर में स्वास्तिक का निशाँ बनाने से नेगटिव उर्जा का क्षय होता है|
किसी भी भवन में प्रात:व सायंकाल को शंख बजाने से गनाय्नों में कमी होती है|
घर के उत्तर पूर्व में गंगा जल रखने से घर में सुख सम्पन्नता आती है|
पीपल की पूजा करने से श्री तथा यश की वृद्धि होती है|इसका स्पर्श मात्रा से शरीर में रोग प्रतिरोधक तत्वों की वृद्धि होती है|
मुख्य द्वार में आम,पीपल,अशोक के पत्तों का बन्दनवार लगाने से वंश वृद्धि होती है|

जी हाँ, हमारी हथेली में हृदय रेखा का अपना विशिष्ट स्थान है, जिससे हृदय रेखा को देखा-जाना जा सकता है। यह रेखा अधिकांश विवाह रेखा यानि सबसे छोटी अँगुली के लगभग एक इंच नीचे से निकल कर किसी क्षेत्र पर जा सकती है व किन्हीं भी रेखाओं से इनका संबंध हो सकता है।

इसकी समाप्ति स्थान मुख्यतः गुरु पर्वत यानि तर्जनी अंगुली के नीचे होता है, लेकिन कभी-कभी इसका अंत शनि पर्वत या सूर्य पर्वत पर ही हो जाता है। किसी-किसी के हाथ में ये रेखा होती ही नहीं और किसी- किसी की हथेली में इस रेखा का मिलन मस्तिष्क रेखा पर होता है। तो आइए जाने क्या कहती है हमारी हृदय रेखा-

* हृदय रेखा अपने उद्गम स्थान से निकल कर गुरु पर्वत तक जा पहुँचे तो ऐसा जातक धार्मिक, न्यायाधीश, प्रोफेसर, धर्म का ज्ञाता, पुजारी, राजनेता होकर सदैव प्रसन्न रहने वाला होगा। हाँ यह स्पष्ट व कहीं से भी कटी या जंजीरदार नहीं होना चाहिए।

* यदि हृदय रेखा का कहीं से कटा होना, फिर आगे बढ़ना उस जातक को हृदय से संबंधित विकार या अन्य कष्ट जैसे प्रेम में आघात लगना, झेलनेपड़ते हैं।

* हृदय रेखा यदि शनि पर्वत पर मुड़ जाए तो ऐसा जातक या तो बहुत निर्दयी होगा या बहुत ही दयावान-परोपकारी हो सकता है, क्योंकि शनि मोक्ष का भी कारक है।

* हृदय रेखा का मिलाप यदि मस्तक रेखा से हो जाए तो ऐसा व्यक्ति सिर्फ अपने मन की ही करता है, दूसरों की बातों पर ध्यान नहीं देता।

* हृदय रेखा का न होना उस जातक को कठोर बना देता है। उसके मन में दया का भाव ही नहीं होता।

* हृदय रेखा जंजीर के समान हो तो वह व्यक्ति कपटी होता है, मन की बात किसी को भी नहीं बताता।

* हृदय रेखा पर काला तिल होना उस जातक के लिए अनिष्ठकारी होता है। ऐसा जातक निश्चित ही कलंकित होता है।

* हृदय रेखा पर द्वीप का चिह्न होना ही उसे बार-बार धोखे दिलाता है।

* हृदय रेखा पर वृत्त का चिह्न हो तो उसका मन अत्याधित कमजोर होगा।

* हृदय रेखा के मध्य गुच्छा जैसे कोई चिह्न दिखाई दे तो वह जातक घमंडी होता है।

* गुरु पर्वत के नीच पहुँचकर कई शाखाएँ हो तो वह जातक शक्ति संपन्न व भाग्यशाली होगा।

* बहुत पतली हृदय रेखा या बहुत गहरी लाल रंग की हो तो वह जातक दुर्भाग्यशाली व कठोर होगा।

* सामान्य से अधिक चौड़ी रेखा हो तो वायु विकार से ग्रस्त रहता है व उच्च रक्तचाप भी होता है।

* शुक्र पर्वत से निकल कर कोई रेखा हृदय रेखा से जा मिले तो वह जातक अत्यधिक भोगी होगा।

* चंद्र पर्वत से निकल कर हृदय रेखा पर जा पहुँचे तो उस जातक को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ होता है।

इन वास्तु उपायों से भरेगा आपका घर…by Net Guru

अगर आप पैसों की कमी से जूझ रहे हैं|घर में आमदनी से अधिक खर्च आपके लिए अक्सर मानसिक तनाव का कारण बन जाता है तो नीचे लिखे वास्तुप्र्योग अपना कर आप माँ लक्ष्मी की प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं|

साल में एक दो-बार हवन करें|
घर में अधिक कबाड़ इकठ्ठा न करें|
शाम के समय एक बार पूरे घर की लाइट जरूर जलाएं|इस समय घर में लक्ष्मी का प्रवेश होता है|
सुबह-शाम सामूहिक आरती करें|
महीने में एक या दो बार उपवास करें|
घर में हमेशा चन्दन और कपूर की खुशबु का प्रयोग करें|
जो व्यक्ति श्रेष्ट धन की इच्छा रखते हैं व रात्रि में सताईस हकिक पत्थर लेकर उसके ऊपर लक्ष्मी का चित्र स्थापित करें,तो निश्चय ही उसके घर में अधिक उन्नति होती है|
यदि ग्यारह हकिक पथेर लेकर किसी मंदिर में चदा दें|कहें की अमुक कार्य में विजय होना चाहता हूँ तो निश्चय ही उस कार्य में विजय प्राप्त होती है|

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

तिल से जानिए पर्सनेलिटी —

तिल से जानिए पर्सनेलिटी —

गोरे-गोरे मुखड़े पर काला-काला तिल चेहरे की सुंदरता बढ़ा देता है। आइए, जानते हैं कि चेहरे पर या शरीर के किसी भी भाग पर तिल का क्या अर्थ है। तिल के अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग परिणाम होते हैं। तिल काला व कत्थई रंग का होता है, काले तिल का गाल पर होना या ऊपरी अधर पर होना जहाँ सुंदरता में चार चाँद लगा देता है, वहीं यह कामुकता का प्रतीक भी बन जाता है। ऊपरी अधर पर तिल व्यक्ति को कामुक बनाने वाला होता है, उसी प्रकार निचले होंठ पर तिल दरिद्रता का सूचक होता है।

- दोनों भौंहों के मध्य तिल हो तो एसा जातक परोपकारी और उदार होगा।

- सिर के राइट साइड में पाया जाने वाल तिल समाज में मान-प्रतिष्ठा दिलाने वाला होगा।

- मस्तक पर बीच में पाया जाने वाला तिल उस जातक की फाइनेंशियल कंडीशन को मजबूत बनाता है।

- गले पर दिखाई पड़ने वाला तिल उस जातक को तेज दिमाग का, पैसा कमाने में सफल व सेल्फ मेड बनाता है।

- ठोड़ी पर पाया जाने वाला तिल व्यक्ति को स्वार्थी व समाज से कटा हुआ बनाता है।

- राइट गाल पर तिल उन्नतिशील और मेघावी होने की सूचना देता है।

- लेफ्ट गाल पर तिल शुभ नहीं माना जाता है, ऐसा तिल गृहस्थ जीवन में धन का अभाव बताता है।

- नाक के सीधे भाग पर तिल सुखी, धन संपन्न और नाक के लेफ्ट हिस्से पर तिल परिश्रमी, कठिनाई से सफलता का सूचक होता है।

- नाक के मध्य तिल हो तो ऐसा जातक स्थिर न रहकर इधर-उधर भटकता रहने वाला होता है।

- दाएँ हाथ पर तिल शुभ व बाएँ हाथ की हथेली में तिल अति व्यय का सूचक होता है।

इस प्रकार तिल भी शुभ-अशुभता के संकेत देते हैं। महिलाओं में लेफ्ट साइड पर तिल शुभ होता है जबकि पुरुषों में राइट साइड पर तिल शुभ होता है।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

कालसर्प टोटके…by Net Guru—

कालसर्प टोटके…by Net Guru

यह एक बहुत ही कष्टदायक योग है|इस योग की यह विशेषता होती है की यह व्यक्ति को मध्यम स्थिति में नही रखता है|यह व्यक्ति को अत्यधिक उंचाई प्रदान नही करता|अथवा निम्न स्तर का कर देता है|यह व्यक्ति को संघर्ष तो देता है,इसके प्रभाव से संतानहीनता,विवाह में बाधा अथवा संघर्षमय जीवन भी देता है|
जब जनमपत्रिका में राहू व केतु के मध्य सारे ग्रह आ जायें और यदि एक-दो ग्रह राहू-केतु की पकड़ से बाहर हों तो कालसर्प योग की छाया कहा जाता है|यहाँ पर आपको कुछ सामान्य उपाय बता रहें हैं जिनके करने से इस योग के विषय में कुछ कमी अवश्य आती है|

१०८ नारियल पर चन्दन से तिलक पूजन कर “ॐ भ्रां भ्रीं भ्रों स:राहवे नमः “का १०८ बार जाप कर पीड़ित व्यक्ति के ऊपर से उसार कर बुधवार को नदी या बहते जल में प्रवाहित करना चाहिए|

प्रथम बुधवार से नीले कपड़े में काली उड़द बाँध कर वट वृक्ष की १०८ परिक्रमा आरम्भ करें|परिक्रमा के बाद उस उरद की दाल किसी को दान कर देनी चाहिए|ऐसा लगातार ७२ बुधवार करना चाहिए|

नागपंचमी को सपेरे से अपने धन से नाग-नागिन के जोड़े को पूजन के बाद मुक्त करवा देना चाहिए|

प्रथम बुधवार से आरम्भ कर लगातार आठ बुधवार को क्रमश :स्वर्ण,चांदी,ताम्बा,पीतल,कांसा,लोहा,रांगे व सप्तधातु के नाग-नागिन के जोड़े को पूजन के बाद दूध के दोने में रख कर बहते जल में प्रवाहित करना चाहिए|

प्रत्येक शिवरात्रि,श्रावण मास तथा ग्र्ह्काल में शिव अभिषेक अवश्य करवाना चाहिए|

नियमित रूप से हनुमान जी उपासना के साथ शनिवार को सुंदरकांड के पाठ के साथ एक माला “ॐ हं हनुमंते रुद्रात्मकाये हुं फट”का जाप करने से भी लाभ प्राप्त होता है|
नाग मंदिर का निर्माण करवाएं|

कार्तिक अथवा चेत्र मास में सर्पबलि करवानी चाहिए|

नागपंचमी को सर्पाकार की सब्जी अपने वजन के बराबर लेकर गाय को खिलाएं|

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

Vastu Tips for Your Office–by Net Guru–

Vastu Tips for Your Office–by Net Guru–

Vastu principles are practical for all buildings whether it is a home, factory, temple or even an office. Office is mainly built to generate financial growth of business. Vastu suggests some rules in building offices that prove to be very functional for economic growth of the organization.

Vastu principles are applied keeping in mind various energy fields originating from different directions. First of all a site should be selected, which is free from any Vastu defect. After selection of the site, the layout of office should be planned by following these Vastu norms. Construction of Office The plot of office should be rectangular or square. Heavy structure should be built in the South and the West as these are negative zones.

More open space should be in the East or north direction. The slope of floor should be towards East, North or Northeast. The height of building should be equal in all sides. Water bodies should be built in northeast or eastern zone. Water sump is good in the North or East. But overhead tank in northeast is a big Vastu defect. So, the tank should be built in southwest direction. Staircase should be built in southern or western part of the office. Staircase in the center of office is not good. Toilets can be built in the west or northwest.

Northeast and southwest directions should not be used for toilet. Office should not be built near temple, grave yard or hospital. Interior of Office Design reception in northeast of office and receptionist should sit facing the North or East. Waiting room can be in northeast or northwest direction of the building. But northeast corner should be left for temple and flowers can be placed in northeast direction. The office of Chairman or General Manager should be built in southwest or south direction of the building.

He should sit in southwest direction facing north. His desk should be rectangular. Employees should sit facing the North or East. Employees should not sit under beam. If any other alternative is not possible, the loft of beam can be covered with wooden board. Place heavy almirah or safe in the southwest in which important documents are stored.

Pantry of office should be built in southeast of the building as southeast direction is a place for fire. The center of office should not have any heavy structure. Paint office in light colors. Avoid dark colors as they make us short tempered. Doors and windows of office should be in the north and east direction. Don’t use paintings depicting sadness in the office. These painting may affect harmony among office staff.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

Vastu Tips for Your Kitchen–by Net Guru–

Vastu Tips for Your Kitchen–by Net Guru–

According to vastu shastra health and prosperity of the family is highly depends upon the kitchen arrangement. More the pleasant, welcoming and efficient your kitchen, more healthier & prosperous you are. If you would like to enhance the power of your kitchen, take a look at following suggestions:-

Fire, an important element of vastu should be placed at the south east corner of the kitchen. Second best option available is at North west direction . Placement of stove is a great thing according to the vastu shastra.

In some duplex houses, there is a bedroom above the kitchen. It is quite probable that the bed is just located above the stove. This is not a good arrangment. You should either reposition the bed or the stove. Also check for the toilet on the upper level. It should not be located directly on top of the fire. It is important that your plumbing is working properly.

Dripping tap or leaking pipes symbolizes that wealth is being drained from your life. You should use the colours like green, lemon yellow & orange which are very supportive colours to fire. Avoid using black, grey and blue in the kitchen.

Toilet door just opposite the kitchen is considered unfavorable placement. You can either reposition the door or install an automatic door closer. Case Study:- A highly qualified lady called me few months ago for an appointment to audit her house, as she was facing a relationship problem since last one year. This problem floated soon after family moved to new place. A vastu analysis of her house revealed that stress in the relationship was just due to the kitchen interior. The gas (fire) was just too closed to water.

There was hardly distance of one feet between fire and water. Sadly she has spent huge amount in kitchen interior . Here both the element i.e. fire and water are having a clash, causing family members to have disagreements resulting in to stress. We have adviced two possible solutions to cure this vastu defect. They were making a wooden partition or shifting a water (which was also at wrong corner) to other side. A lot of pain in the relationship could have been avoided if they have been alert on vastu arrangement in the kitchen at begining.

लव-मैरिज का मतलब होता है अपनी पसंद से विवाह करना, अब चाहे लाइफ पार्टनर हमारी जाति के हों या नहीं।

* किसी भी व्यक्ति की कुंडली में पाँचवें भाव से प्रणय संबंधों का पता चलता है जबकि सातवाँ भाव विवाह से संबंधित है। शुक्र सातवें भाव का कारक ग्रह है अतः जब पंचमेश-सप्तमेश एवं शुक्र का शुभ संयोग होता है तो पति-पत्नी दोनों में गहरा स्नेह संबंध होता है। ऐसी ग्रह स्थिति में प्रेम विवाह संभव है।

* शुक्र सप्तमेश(सेवंथ हाउस में मौजूद राशि का स्वामी) से संबंधित होकर पाँचवें भाव में बैठा हो तो भी प्रेम विवाह संभव होता है।

* पंचमेश व सप्तमेश का राशि परिवर्तन हो तो भी प्रेम विवाह संभव होता है। यानी पाँचवी राशि सातवें घर में बैठी हो और सातवीं राशि पाँचवें घर में।

* मंगल, शुक्र का परस्पर दृष्टि प्रेम विवाह का परिचायक है।

* पंचम या सप्तम भाव में सूर्य एवं हर्षल की युति होने पर भी प्रेम विवाह हो सकता है।

इस प्रकार के योग यदि जन्म कुंडली में होते हैं, तब प्रेम विवाह के योग बनते हैं। यह जरूरी नहीं है कि प्रेम विवाह मतलब जाति से बाहर विवाह होना। लव मैरिज यानी जहाँ आपका दिल कहे वहाँ शादी। तो लव और मैरिज दोनों से पहले अपना होरोस्कोप जरा चैक कीजिए।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

Tips for Early Marriage of Daughter—by Net Guru

Tips for Early Marriage of Daughter—by Net Guru

Here under are given some tips to come over the obstacles that come in the way of settling the marriage of daughter.

1. On Thursday one should get (1) seven supari (2)seven Janeue (3) seven pieces of haldi (4) seven pieces of gur (5) seven yellow flowers (6) seventy grams chane ki daal (7) seventy centimeter yellow cloth (8) seven yellow coinds or seven brass pieces (9) one pandreh yantra. After worshipping Ma-Parvati, keep in your house and wish and pray fro marriage for forty days. Soon omens of marriage will appear.

2. Get (1) Lal Chura (2) Lal Chunaria (3) Red Flowers (4) Henna (5) Roli (6) Lal Jora (7) Red Ribbon (8) Seven glass bangles of red color; take it to ‘Shiv temple’ and offer to Ma Parvati. Pray to virgin Parvati for early marriage and suitable husband. By doing this faithfully marriage is celebrated within a year.

3. Goto Shiva Temple and worship and pray Shiva Parvati with faith. Put a tilak of the moss of the water channel and take the water flowing from the channel outside as Prasad.

4. Offering 108 peopal leaves on shivaling everyday in the month Shravan helps in early marriage of the boy or a girl.

कुंडली से जानें दीर्घायु योग–

कुंडली में कुछ योग ऐसे होते है जो मनुष्य को दीर्घायु बनाते है। कुंडली में 8वाँ स्थान आयु का होता है और अष्टम से अष्टम होने से तीसरा स्थान भी आयु का ही माना जाता है। दीर्घायु का निर्धारण करते समय लग्न के स्वामी के बलाबल के साथ इन स्थानों के स्वामी के बलाबल और उनकी स्थिति तथा इन स्थानों में बैठे ग्रहों के स्थिति का भी आकलन किया जाना जरूरी होता है। कुछ दीर्घायु योगों की चर्चा मनीषियों ने की है जिन्हें नीचे बताया जा रहा है :

1. सभी ग्रह बलवान हो, लग्नेश प्रबल स्थिति में हो।

2. दसवे स्थान में मंगल, नवम में गुरु और पंचम में चन्द्र हो।

3. लग्न, दशम और अष्टम स्थान के स्वामी शनि के साथ केंद्र में हो।

4. कर्क, धनु या मीन राशि का गुरु केंद्र में हो, शुभ ग्रह बली होकर केंद्र में हो और शुभता लिए सूर्य 11वें भाव में हो।

5. राहू 3, 6 या 11वें स्थान में हो और पाप प्रभाव से रहित हो।

6. अष्टम में शुभ ग्रह (गुरु नहीं) हो या स्वगृही शनि हो।

7. सारे ग्रह विषम राशियों में गए हो या सारे ग्रह अपनी स्वराशि में या मित्र ग्रहों की राशि में हो। चन्द्रमा पर और लग्न पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो।

7. चन्द्रमा स्वराशि का भाग्य में हो, लग्नेश मजबूत हो।

इन सभी योगों के रहते या इनमें से कुछ योगों के होने पर आयु योग मजबूत हो जाते है। मानव पूर्ण आयु को भोगता है। यहाँ यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि आयु योग मजबूत होने का अर्थ मनमानी दिनचर्या को जीना कदापि नहीं है।

शरीर रूपी मशीन को पूरी सावधानी से ही चलाना होगा अन्यथा उचित देखरेख के अभाव में, व्यसनों या गलत खान-पान के चलते शरीर बीमारियों का घर बन सकता है। गलत कर्मों से आयु योग क्षीण हो सकते हैं।
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कुंडली में होते हैं अल्पायु योग –

ज्योतिष मनुष्य के जीवन के हर पहलू की जानकारी देता है। उसकी आयु का निर्धारण भी करता है। मगर जीवन-मरण ईश्वर की ही इच्छानुसार होता है अतः कोई भी भविष्यवक्ता इस बारे में घोषणा न करें ऐसा गुरुओं का निर्देश होता है। हाँ, खतरे की पूर्व सूचना दी जा सकती है। जिससे बचाव के उपाय किए जा सके।

इसके अलावा व्यक्ति के जीवन पर केवल उसकी कुंडली का ही नहीं, वरन उसके संबंधियों की कुंडली के योगों का भी असर पड़ता है। जैसे किसी व्यक्ति की कुंडली में कोई वर्ष विशेष मारक हो मगर उसके पुत्र की कुंडली में पिता का योग बलवान हो, तो उपाय करने पर यह मारक योग केवल स्वास्थ्य कष्ट का योग मात्र बन जाता है। अतः इन सब बातों का ध्यान रखते हुए मनीषियों ने आयु निर्धारण के सामान्य नियम बताते हुए अल्पायु योगों का संकेत दिया है। पेश है उन्हीं की चर्चा :

1. आयु निर्धारण में मुख्य ग्रह यानि लग्न के स्वामी का बड़ा महत्व होता है। यदि मुख्य ग्रह 6, 8,12 में है तो वह स्वास्थ्य की परेशानी देगा ही देगा और उससे जीवन व्यथित होगा अतः इसकी मजबूती के उपाय करना जरूरी होता है।

2. यदि सभी पाप ग्रह शनि, राहू, सूर्य, मंगल, केतु और चंद्रमा (अमावस्या वाला) 3, 6,12 में हो तो आयु योग कमजोर करते हैं। लग्न में लग्नेश सूर्य के साथ हो और उस पर पाप दृष्टि हो तो आयु योग कमजोर पड़ता है।

3. यदि आठवें स्थान का स्वामी यानि अष्टमेश 6 या 12 स्थान में हो और पाप ग्रहों के साथ हो या पाप प्रभाव में हो तो आयु कम करते है। लग्नेश निर्बल हो और केंद्र में सभी पाप ग्रह हो, जिन पर शुभ दृष्टि न हो तो आयु कम होती है।

4. धन और व्यय भाव में (2 व 12 में) पाप ग्रह हो और मुख्य ग्रह कमजोर हो तो आयु कम होती है।

5. लग्न में शुक्र और गुरु हो और पापी मंगल 5वें भाव में हो तो आयु कमजोर करता है।

6. लग्न का स्वामी होकर चन्द्रमा अस्त हो, ग्रहण में हो या नीच का हो तो आयु कम करता है।

विशेष : यदि ये सारे योग या इनमें से कुछ भी योग कुंडली में हो तो विशेष ध्यान रखना चाहिए। सभी तरह के व्यसनों से बचना चाहिए। इष्ट का जप ध्यान-दान करते रहना चाहिए। गुरु की शरण लेना चाहिए और मुख्य ग्रह को मजबूत करने के उपाय करते रहना चाहिए।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

Vastu for Bathroom and Toilet–by Net Guru

Vastu for Bathroom and Toilet–by Net Guru

According to bathroom vastu, bathroom should be located in North or North-West portion of the house. If bathroom is located in wrong direction, it can cause health and financial problems. Bathroom should not be in South, South-East and South-West direction. South sided bathroom can cause adverse effects on the health of female members.
As per Toilet Vastu, toilet should be located in west or northwest direction. Avoid construction of toilet at the centre and in the east, northeast of the house. The toilet seat should be placed in such a way that the person sitting could face the North or the South. Now a day toilet combined with bathroom is becoming popular due to lack of space. Combined bathroom and toilet should be in north-west direction. It should not be adjacent to Pooja Room, kitchen and under the stairs.

Geyser and other electrical appliances like heater and switchboard should be installed in south-east corner of bathroom. Taps and showers are fixed in north direction. Placing bath tubs in east, west or north-east direction is good. Wash basin and shower can be either in north-east, north or east direction. The North is a good direction for vanity mirror.

Water closet should be placed in the West and the South direction of the toilet. A water closet should be placed near a window or an outer wall.

Exhaust fans are necessary if there is no window in the bathroom. The slope of bathroom floor should be in the North. It should not to be in south-west or south-east direction.

Septic tank should be in northwest of the house. It should not be in south-east, north-east, north or east directions. The tank should be higher than floor level of the building.

The door of bathroom should be in North or East direction. It should not be placed in south-west direction. In a bathroom there should be a small and airy window either in East, West or North direction. If the window is in south direction, it would have adverse effects on health.

The color of bathroom tiles can be white, sky blue and light blue. It helps in giving a fresh look to bathroom. Avoid dark colors like black or red. The slope of floor in bathroom should be towards East or North direction.

समस्त तीर्थों का वास है हाथों में –कराग्रे वसते लक्ष्मी, कर मध्ये सरस्वती—डॉ. गोविन्दवल्लभ जोशी

शास्त्रों एवं पुराणों में मानव शरीर में अनेक दिव्य शक्तियों के केंद्र बताए गए हैं। प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों एवं ज्योतिर्विज्ञानियों ने पृथ्वी में रहते हुए ब्रह्मांड के अनंत रहस्यों को खोज निकाला जो ग्रंथों के रूप में आधुनिक काल में भी विद्वानों के अध्ययन का सशक्त माध्यम बने हुए हैं। गणितज्ञ भास्कराचार्य, वराहमिहिर एवं आर्यभट्ट जैसे नामों की चर्चा आज भी लोगों की जुबान पर रहती है। कहा जाता है कि हमारे सिर जिसे ब्रह्मांड भी कहा जाता है उसमें स्थित मेघा शक्ति के जागरण से नक्षत्रलोक आकाश गंगाएँ एवं ब्रह्मांड के रहस्य सुलझने लगते हैं।

इसी प्रकार शरीर के अंग-अंग में अनेक देवता निवास करते हैं लेकिन कर्म के प्रतीक हाथों में तीर्थों का वास है जिनमें अँगुलियों का अग्रभाग देवतीर्थ, तर्जन और अँगूठे के पास पवित्र तीर्थ, हथेली का मध्य भाग अग्नितीर्थ, छोटी अँगुली से नाड़ी तक का कायतीर्थ एवं नाड़ी के पास मणिबंध के पास ब्रह्मतीर्थ क्षेत्र कहलाता है। इसीलिए देवकर्म और पितृ कर्मों में इन स्थानों से जलधार देने का विधान है। इसीलिए संध्यावंदन के समय गायत्री जप के समय की जाने वाली मुद्राओं से शक्ति केंद्र जागृत होने लगते हैं और मनुष्य सुख समृद्धि वान बनता है।

इसी प्रकार हाथों में नवग्रहों की भी स्थिति होने से रत्न धारण, जप एवं मुद्राओं के द्वारा उन्हें अनुकूल करके प्रभावशाली बनाने की बात मुद्रा विज्ञान में कही गई हैं क्योंकि तर्जनी अँगुली बृहस्पति का स्थान मध्यमा शनि, अनामिका सूर्य, कनिष्ठा बुध का स्थान निर्धारित है। इसी प्रकार मणिबँध (नाड़ी) के ऊपर से छोटी अँगुली के बीच का उभरा हुआ क्षेत्र चंद्रमा का एवं अँगूठे के नीचे उभरा हुआ स्थान शुक्र ग्रह का है। हथेली के ऊपर चंद्र क्षेत्र के ऊपर का हिस्सा मंगल ग्रह का क्षेत्र माना गया है।

इसीलिए संध्या एवं अनुष्ठानों के समय इन मुद्राओं का अभ्यास करने से ग्रहजनित दोषों का निवारण होता है। मनुष्य अलौकिक उन्नति की ओर बढ़ता है। इस बारे में हस्तरेखा ज्ञाता डॉ. रामधर द्विवेदी आचार्य कहते हैं-जो जिस प्रकार हाथों से परिम करके मनुष्य ने अनेक असंभव कार्य कर दिए उसी प्रकार हाथों के द्वारा होने वाली मुद्राओं के सतत्‌ अभ्यास से मनुष्य असंभव को संभव कर सकता है। इसी सिद्धांत के द्वारा हमारे ऋषि-मुनियों ने मुद्रा विज्ञान को दैनिक संध्योपासना के लिए अति आवश्यक बना दिया। गायत्री जप से पूर्व 24 मुद्राएँ एंव जप के बाद 8 प्रकार की मुद्राएँ मानव की शक्तियाँ जागृत करती हैं।

आज भी जो साधक संध्योपासना के समय गायत्री जप से पूर्व एवं बाद में इन मुद्राओं को करते हैं वह प्रखर विद्वता के धनी बन जाते हैं। इसके अभाव में जो केवल कपोल कल्पित बातों से समाज को उलझाए रखना चाहते हैं वे स्वयं भ्रम में रहते हुए समाज को भ्रमित करने के अलावा कुछ नहीं करते। मनुष्य स्वाभवतः कर्मयोगी है। इसीलिए कर्म करने के लिए हाथ शरीर के सबसे प्रमुख अंग है। इसीलिए मुद्राओं का अभ्यास करने से ग्रहों के क्षेत्र हाथों की रेखाएँ विकसित होकर मनुष्य की बुद्धि का विकास करते हुए महान कर्मयोगी बना देती हैं।

क्या प्लेनेट कराते हैं सुसाइड–मेंटल हेल्थ को बनाए रखें—

एक्जाम में फेल हो या जीवन में कोई और प्रॉब्लम, कुछ लोग तो हर कंडीशन में सरवाइव कर लेते है जबकि कुछ लोग निराश हो जाते है, तुरंत परेशान हो जाते है, डिप्रेशन में आ जाते है और कभी-कभी सुसाइड का भी रास्ता अपना सकते है, आइए देखें प्लेनेट क्या बताते है इस बारे में :-

मेंटल हेल्थ को मून बताता है, फिजिकल हेल्थ को मंगल और मुख्य ग्रह बताता है और आत्मा की शक्ति को सन बताता है। यदि इनमें कोई एक भी कमजोर हो, पाप प्रभाव में हो या गलत हाउस में बैठा हो तो स्वभाव में डर, घबराहट और शंका आ जाती है। इसी तरह यदि मून कमजोर हो तो इमोशन कमजोर हो जाते हैं और विल पावर भी कम हो जाती है।

हम स्थिति से एडजेस्ट नहीं कर पाते और गलत डिसीजन भी ले डालते हैं। यह डिसीजन सब्जेक्ट के चुनाव से लेकर गलत जॉब या मैरिज कुछ भी हो सकता हैं। हम दूसरों के सामने अपनी बात नहीं रख पाते और जल्दी परेशान हो जाते है।

अब यदि ऐसे मून पर शनि, केतु या मंगल का प्रभाव हो तो वह जल्दी डिप्रेस करने और इससे जल्दबाजी में भयानक गलत डिसीजन लेने को इंस्पायर करता है। मार्स की कमजोरी लो ब्लडप्रेशर या हाई ब्लडप्रेशर को दिखाती है, रेजिस्टेंस पॉवर कम करती है और फाइट करने की ताकत कम करती है। सन यानी सूर्य की कमजोरी पावर, फेम नहीं देती और किए गए कामों का सही समय पर रिजल्ट न मिलने से निराशा बढ़ती है।

इनमें से कुछ कुयोग कुण्डली में हो तो चिंता, डिप्रेशन, टेंशन आदि देख सकते हैं। मगर सभी योग हो तो व्यक्ति निराशा की वजह से सुसाइड तक कर सकता है। ऐसे सारे योग यदि किसी की कुंडली में हो तो उसे शुरू से ही बहुत मेहनत की आदत होनी चाहिए, चीजों को पॉजिटीव लेना चाहिए, गुरु और पेरेंट्स की सलाह से ही काम करना चाहिए, रूटीन सेट रखना चाहिए और इष्ट का ध्यान और व्यायाम-प्राणायाम रेग्युलर करना चाहिए।

इसके अलावा प्लेनेट के हिसाब से दान करने, नग पहनने से और मंत्र जाप करने से भी कमियों को दूर किया जा सकता हैं। माँ और गुरु का प्यार मिले इसका ध्यान रखना चाहिए।

प्रेम विवाह (लव मेरिज ) करवाते हे –चन्द्र, शुक्र और मंगल का योग – डॉ. प्रदीप पंड्या

प्रेम के लिए कोई स्पेशल डे या मुहूर्त मान्य नहीं होता है। यह तो दो व्यक्तियों के बीच हो जाता है। प्राचीन ग्रंथों में आठ प्रकार के विवाह संस्कारों को मान्यता दी गई है। इनमें ‘गंधर्व’ विवाह भी एक है। गंधर्व विवाह लव-मैरिज का पर्याय है। लव शब्द अपने आप में प्योर और डिवाइन है। ह्यूमन कल्चर को गतिशील रखने का आधार भी प्रेम है।

प्रेम में सैक्रिफाइज और मर मिटने की भावना छुपी है। युवक और युवती को एक-दूसरे के प्रति जो आकर्षित करती है, उस फीलिंग्स का नाम प्रेम है। प्रेम हसबैंड-वाइफ, ब्रदर-सिस्टर, मदर-फादर के बीच भी होता है। स्नेह के आधार पर ही यह दुनिया टिकी हुई है। प्रेम ही धीरे-धीरे ‍कमिटमेंट और डेडिकेशन का रूप ले लेता है।

राशि चक्र बारह राशियों में डिवाइडेड है। किसी भी युवा की होरोस्कोप में लव मैरिज का योग है या नहीं यह जानकारी हमें राशियों की नेचुरल क्वॉलिटी से मिलती है। इन राशियों की स्टडी के बाद लव-मैरिज, लव-रिलेशन, लॉंग टर्म बॉंडिंग आदि की जानकारी मिलती है। लव होने या लव-मैरिज के लिए होरोस्कोप के सेंटर, फोर्थ, सेवंथ और ट्वेल्थ हाउस पर खास विचार किया जाता है। लव या लव-मैरिज का विचार नौ प्लेनेट में मून, मार्स और वीनस से किया जाता है। वीनस प्रेम का कारक है।

कुंडली में पाँचवाँ घर यानी फिफ्थ हाउस से गहरे लव रिलेशन का पता चलता है। जब कुंडली में मंगल यानी मार्स यदि सातवें घर या उसके मालिक से संबंध रखे तो युवा के लव रिलेशन बनते ही हैं या लव-मैरिज के योग बनते हैं। जब पंचमेश-सप्तमेश एवं शुक्र का शुभ संयोग होता है तो पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका में घनिष्ठ संबंध होते हैं। यानी सेवंथ हाउस के मालिक और फिफ्थ हाउस के मालिक के होरोस्कोप में वीनस से संबंध हो तो हसबैंड-वाइफ या लवर्स में मधुर संबंध होते हैं। यही कंडीशन लव-मैरिज भी करवाती है।

शुक्र-चंद्र का कॉम्बिनेशन युवा में लव-एट्रैक्शन को जन्म देता है। वीनस और ज्यूपिटर का रिलेशन युवाओं में स्प्रिच्युअल लव का योग बनाता है। लव कैसा भी हो उसमें पर्मानेंसी होना जरूरी है। अतः लव में पीस और स्वीटनेस के लिए सेंटर हाउस से रिलेटेड स्टोन एंगेजमेंट या मैरिज के अवसर पर ‘कपल’ को अवश्य पहनना चाहिए।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

Vastu for Drawing Room–by Net Guru–

Vastu for Drawing Room–by Net Guru–

Drawing room is as important as any other part or corner of a house. Just as the rest of the house should be planned according to Vastu guidelines, so should be the drawing room. It is one part of the house where the members spend a lot of time and which is also used to entertain guests. Therefore, it is extremely important to do a careful setting of your drawing room, so that it exudes positive energy and fosters healthy relationships. The article brings you some valuable vastu tips to plan the drawing room in the best way possible. Follow the advice given here to keep your drawing room a positive and happy place.

Vastu Tips For Drawing Room—

The north direction is ideal for the construction of drawing room.
As per Vastu, it is advisable to keep square or rectangle shape furniture in the drawing room. Southern and western corners of the room are perfect for placing the furniture.

The telephone should be placed in the southwest and other electrical appliances (except TV) are best in the southeast direction. The perfect place for keeping sofa lies in northwest. Avoid placing L-shaped sofa in your drawing room.

TV can be kept in the southeast direction and showcase cum almirah in the southwest corner. On either side of the TV, pictures or idol of family or clan deities, along with a deity you worship more, should be put up. This will enable one to look at these holy pictures while watching TV. Thus entertainment plus positive energy and pure thoughts will come together.

Cooler or A.C should be placed in west or north direction. Avoid keeping AC or Cooler in southeast or northwest direction.
The head of the house and his wife should sit in the southwest corner of the room, facing east or north-east. This will ensure stability and positive energy.

The guests should be seated in the northwest or southeast. Seating arrangement for the guests should be done in such a manner that they face southern or western direction.

Pictures showing water bodies, aquariums or water fountains should preferably be placed in north to east area, as this brings fortune. The flow of water shown in the picture should point towards the interior of the house. Such pictures inspire positive energy and keep your mind calm.

The color of the walls in living room should be white, yellow, blue or green. Prefer light color over dark colors. Avoid black and red color in living room. Light colors in the living room will continue to brighten up the mood and convey a feeling of warmth.
Square, rectangle and round shapes are best, when it comes to the center table that has to be kept in the drawing room.
According to the Vastu advice for drawing rooms, there should more of open space in the northern and eastern corners.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

Vastu For Bedroom–by Net Guru

Vastu For Bedroom–by Net Guru

Vastu for bedroom is registering increased searches since it has become imperative to adhere to Vastu Principles to ensure peace and harmony in the shrinking world. Vaastu Shastra gives effective Vastu architecture that balances the cosmic energy flow in this part of your house where you spend around one third of your life. Below we give you some Vastu Tips for planning the right bed direction and the placement of other furniture in your bedroom.

Vastu Tips for Bedroom—-

The master bedroom is best suitable for the South West corner of the house for complete control over the household.

Children’s room should lie either on the North or East of the master bedroom.

The South West corner should not be for the children’s room or for an unmarried girl in the family.

The guest room should occupy the North West corner.

The Vastu bed direction is South to North that allows you a sleeping position of your head in the South and feet pointing North. Vastu advocates avoiding head in North or West while sleeping.

The South West portion of your bedroom can be occupied with heavy furniture like almiras and wardrobes.

The dressing table or mirror should be placed on the Eastern or Northern walls and strictly not facing the bed. This ensures a blissful married life.

The Vastu Colors ideal for your bedroom are soft pastel shades of blue, green and off white. Avoid cark & very bright colors in the bedroom.

It is not advisable to have an aquarium or real plants in the bedroom.

If you have an attached bathroom, make sure it does not directly face your bed and the door is closed at all times.

अपने आभामंडल को बनाएँ ऊर्जावान-ओरा को चमकदार बनाने के टिप्स— डॉ. हीरा तापड़िया

1. अपने प्रवेश द्वार पर 2 इंच ऊँची दहलीज लगवाएँ। यह दहलीज लकड़ी की ही हो।

2. प्रवेश स्थल को साफ-सुथरा एवं ठीक रखें।

3. प्रवेश द्वार के सामने बाथरूम का दरवाजा न दिखे, अगर ऐसा हो तो प्रयास करें कि उसका दरवाजा दूसरी तरफ खुले अथवा उसके दरवाजे पर बाँस की चिक का पर्दा लगाएँ।

4. घर के अंदर दरवाजे के सामने कचरे का ‍डिब्बा न रखें।

5. घर के किसी भी कोने में अथवा मध्य में जूते-चप्पल (मृत चर्म) न रखें।

6. जूतों के रखने का स्थान घर के प्रमुख व्यक्ति के कद का एक चौथाई हो, उदाहरण के तौर पर 6 फुट के व्यक्ति (घर का प्रमुख) के घर में जूते-चप्पल रखने का स्थल डेढ़ फुट से ऊँचा न हो।

7. द्वार के बाहर दरवाजे के दोनों तरफ प्रमुख व्यक्ति की आँखों की सतह की ऊँचाई पर काले स्वस्तिक बनाएँ, जिससे नेगेटीव आकाशीय एनर्जी घर में प्रवेश न कर सके।

8. द्वार के सामने खाली दीवार हो तो काँच के कटोरे को ताजे फूलों से भरकर रखें।

9. बैठक के कमरे में द्वार के सामने की दीवार पर दो सूरजमुखी के या ट्यूलिप के फूलों का चित्र लगाएँ।

10. घर के बाहर के बगीचे में दक्षिण-पश्चिम के कोने को सदैव रोशन रखें।

- तीन व्यक्तियों की एक सीध में एकाकी फोटो हो तो घर में न रखें।

- फोटो कभी भी टाँगें नहीं।

- अगर दीवार पर फोटो लगानी हो तो उसके नीचे एक लकड़ी की पट्टी लगाएँ, अर्थात वह फोटो लकड़ी के पट्टे पर टिकें।

- बाथरूम की ओर न हो।

- प्रमुख द्वार की ओर कदापि न हो।

- सीढ़ियों की ओर न दिखे।

- तलघर में कभी भी परिवार के सदस्यों की अथवा ईश्वर की फोटो न लगाएँ।

- उपहार में आई कैंची अथवा चाकू न रखें। चाहे मायके से ही क्यों न आई हो।

- उत्तर-पश्चिम में तेज रोशनी का बल्ब न लगाएँ।

- कैक्टस तथा अन्य काँटे के पौधे घर में न रखें।

- धुले कपड़े पूरी रात घर के बाहर न रखें।

- धुलने के लिए खोले हुए कपड़े इधर-उधर न डालें, व्यवस्थित किसी स्थान पर ढँक कर रखें।

- उत्तर-पूर्व में संसार का नक्शा अथवा ग्लोब रखें।

- पूरब तथा उत्तर में नीले तथा बैंगनी फूल सजाएँ।

- पश्चिम में सफेद फूल रखें।

- दक्षिण में पीले-लाल फूल रखें।

- कमरों के द्वार के सामने बिस्तर न लगाएँ।

- रसोई में पानी कभी भी न टपके इसका ध्यान रखें।

- कार्यालय में आपके कार्यशील हाथ की ओर टेलीफोन रखने से आपको सहायता मिलेगी।

- कार्यशील हाथ की ओर कागजों का ढेर न लगाएँ।

- टेबल के नीचे कचरे की टोकरी न रखें, यह आपके चमकते प्रभामंडल में व्यवधान डालती है।

- कार्यस्थल में अपने बैठने की कुर्सी के पीछे कोई सामान न रखें तथा कोई खिड़की न रखें।

- नाखुनों को जल में बहाएँ।

कुंडली बताती हे दुर्घटना योग (एक्सीडेंट के कारण) —

युवावस्था यानी जोश-खरोश, एडवेंचर और ढेर-सी रिस्क लेना- नया पहनने-ओढ़ने के साथ तेज रफ्तार से वाहन चलाना यह सभी प्रमुख शौक होते हैं। नए से नया वाहन लेना यह हरेक का सपना होता है मगर क्या चाहने भर से या केवल सपना देखने से वाहन सुख मिलता है।

नहीं! वाहन सुख के लिए भी ग्रह योगों का प्रबल होना जरूरी है। यदि चतुर्थ भाव प्रबल हो, वीनस की राशि हो या शुक्र की दृष्‍टि में हो तो नया व मनचाहा वाहन प्राप्त होता है।

यदि चतुर्थ भाव में शनि की राशि हो और शनि यदि नीचस्थ या पाप प्रभाव में हो तो सेकंडहैंड वाहन मिलता है।

यदि चतुर्थ का स्वामी लग्न, दशम या चतुर्थ में हो तो माता-पिता के सहयोग से, उनके नाम का वाहन चलाने को मिलता है।

चतुर्थेश यदि कमजोर हो तो वाहन सुख या तो नहीं मिलता या फिर दूसरे का वाहन चलाने को मिलता है।

चतुर्थेश युवावस्था में हो (डिग्री के अनुसार) तो वाहन सुख जल्दी मिलता है, वृद्ध हो तो देर से वाहन सुख मिलता है।

वाहन की खराबी : चतुर्थेश यदि पाप ग्रह हो, कमजोर हो, पाप प्रभाव में हो तो वाहन प्राप्त होने पर भी बार-बार खराब हो जाता हैं। मंगल खराब हो तो (चतुर्थेश होकर) इंजन में गड़बड़ी, शनि के कारण कल-पुर्जों में खराबी, राहु की खराबी से टायर पंचर होना व अन्य ग्रहों की कमजोरी से वाहन की कार्यप्रणाली में गड़बड़ी आना दृष्‍टिगत होता है।

दुर्घटना योग : वाहन है तो दुर्घटना, चोट-खरोंच का भय बना ही रहता है। यदि सेंटर हाउस का स्वामी, लग्न, अष्‍टम भाव मजबूत है मगर तीसरा भाव या उसका स्वामी कमजोर हो तो वाहन के साथ छोट‍ी-मोटी टूट-फूट हो सकती है, व्यक्ति को भी छोट‍ी-मोटी चोट लग सक‍ती है।

यदि लग्न व सेंटर हाउस का स्वामी दोनों पाप प्रभाव में हो, तीसरा भाव खराब हो मगर अष्‍टम भाव मजबूत हो तो दुर्घटना तो होती है, मगर जान को खतरा नहीं रहता।

यदि अष्‍टम भाव व तीसरा भाव कमजोर हो तो भयंकर दुर्घटना के योग बनते हैं जिससे जान पर भी बन सकती है।

शनि के कारण दुर्घटना में पैरों पर चोट लग सकती है, जब कि मंगल सिर पर चोट करता है।

उपाय : यदि कुंडली में एक्सीडेंट योग दिखें तो उस प्लेनेट को मजबूत करें, वाहन जीवन भर सावधानी‍ से चलाएँ और वाहन के रख-रखाव का विशेष ध्यान रखें। इंश्योरेंस अवश्‍य कराएँ।

विशेष : वाहन सुख प्राय: चतुर्थेश की दशा-महादशा-अंतरदशा में प्राप्त होता है। उसी तरह दुर्घटना योग भी तृतीयेश-अष्टमेश की दशा-महादशा में बनते है अत: पूर्वानुमान कर सावधानी बरती जा सक‍ती है।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

समाज सेवा योग से चमकाएं किस्मत ::—

समाज सेवा योग से चमकाएं किस्मत ::—

सामान्यत: यंग एज और सोशल सर्विस एक नदी के दो किनारे समझे जाते हैं। युवावस्था को प्राय: करियर से जोड़कर ही देखा जाता है और जब सारे सपने साकार हो जाते हैं, जीवन में सबकुछ मिल जाता है तब रिटायरमेंट के रूप में सोशल सर्विस की ओर रूख किया जाता है। मगर क्या आप जानते हैं कि यदि युवावस्था से ‍बल्कि किशोरावस्था से ही आप सोशल सर्विस में संलग्न होते हैं तो न केवल होरोस्कोप के कमजोर ग्रह योग बदल सकते हैं बल्कि मिलने वाल‍ी दुआओं से भाग्य भी बदला जा सक‍ता है।

आइए पहले यह जाने कि लक में बाधा के मुख्य कारण कौन-से है :-

* भाग्य में अवरोध आता है जब राहु, शनि, मंगल, केतु बुरा फल दे रहे हो।
* भाग्य में अवरोध आता है जब बुध, गुरु, शुक्र मुख्य ग्रह होकर कमजोर या पाप भाव में हो।
* ज्यूपिटर यानी गुरु नॉन-फेवरेबल हो तो एजुकेशन से वंचित करता है, शुक्र यानी वीनस वैभव कम करता है, बुध वाणी खराब करता है, राहु-केतु मेंटली परेशान करते हैं, शनि स्थायित्व नहीं देता, मंगल व शनि स्वास्थ्य कष्‍ट व एक्सीडेंट के कारण बन जाते हैं।

यदि होरोस्कोप में ये सारे या इनमें से कुछ भी प्रभाव दिखते हो तो समाज सेवा के कार्य में हाथ बढ़ाइए :-
* वृद्ध, असहायों की सहायता से गुरु प्रसन्न होते है।
* छोटी बालिकाओं की सेवा करने से शुक्र प्रसन्न होता है।
* एन्वॉयरमेंट शुद्ध रखने व गाय की सेवा से बुध प्रसन्न होता है।
* अपाहिजों की सेवा से राहु प्रसन्न होता है।
* ब्लड डोनेशन से मंगल का गुस्सा शां‍त होता है।
* कुत्ते की सेवा से केतु प्रसन्न होता है।

इसके अलावा स्टूडेंट्स की स्टडी में हेल्प करने से या टीचिंग से भी गुरु का अच्छा फल मिलता है और सोसाइटी में मान बढ़ता है।

इसी तरह किसी कन्या के विवाह में मदद देने से, कन्या दान करने से या अनाथ कन्या को गोद लेने से शुक्र प्रसन्न होता है।

यदि कुंडली में गुरु-शुक्र भी प्रबल हो तो अन्य बुरे योग खुद ही निष्‍फल होते जाते हैं।

अत: यदि कार्य असफल हो रहे हो, भाग्य में रूकावट आ रही हो, विद्या में कठिनाई हो,जॉब में तकलीफ हो तो एक हाथ बढाएँ सहायता का किसी जरूरतमंद की ओर ताकि उनकी दुआएँ आपकी किस्म‍त में मजबूती लाएँ और आप धन-वैभव के साथ सोसाइटी में सम्मान भी पा सकें।

सूर्य पर्वत से जानें यश और पराक्रम–हथेली के पर्वत बताते हैं स्वभाव—-

हथेली पर पर्वतों की स्थिति अलग-अलग स्थानों पर बनती है। हथेली में गुरु, शनि, सूर्य, बुध अँगुली के निचले हिस्से में रहते हैं, वहीं मंगल तर्जनी व अँगूठे के मध्य, शुक्र पर्वत अँगूठे के नीचे, चंद्र पर्वत कनिष्ठिका अँगुली के नीचे व कलाई के ऊपर वाले भाग में स्थित है।

अनामिका अँगुली के मूल में तथा हृदय रेखा के ऊपर का भाग सूर्य पर्वत कहलाता है। यदि सूर्य पर्वत विकसित है तो सफलता का सूचक होता है। हाथ में सूर्य पर्वत का न होना व्यक्ति के लिए साधारण स्थिति व उपेक्षित जीवन का परिचय होता है। सूर्य पर्वत का विकास ही मनुष्य को प्रतिभावान और यशस्वी बनाता है।

सूर्य पर्वत यदि पूर्णरूपेण उन्नत, विकसित तथा आभायुक्त हो तो ऐसा जातक उच्च स्थान पर पहुँचने वाला होता है। ऐसा जातक हँसमुख तथा मित्रों में घुल-मिलकर चलने वाला होता है। ऐसे जातक विख्यात होकर जनसाधारण में लोकप्रिय होते हैं। ये व्यक्ति सफल कलाकार, श्रेष्ठ संगीतज्ञ, यशस्वी चित्रकार भी होते हैं। इनमें प्रतिभा जन्मजात होती है। व्यावहारिक दृष्टि से ये ईमानदार तथा वैभवशाली जीवन जीने के इच्छुक होते हैं। ऐसे जातक सफल व्यापारी एवं उत्तम आय वाले होते हैं।

सूर्य पर्वत वाले जातक सामने वाले के मन की थाह पाने वाले होते हैं। हथेली में यदि सूर्य पर्वत विकसित हो तो सामान्य व्यक्ति भी श्रेष्ठ धन-संपन्न बन जाता है। इनके जीवन में कई बार आकस्मिक धन की प्राप्ति होती है। इनका रहन-सहन राजसी और वैभवपूर्ण होता है।

ऐसे व्यक्ति हृदय से कोमल होते हैं और बड़ी सहजता से अपनी गलती स्वीकार करने वाले होते हैं। ऐसे जातक सुलझे विचारों और प्रतिभा के धनी होने से अपना विरोध सह नहीं पाते और मुँह पर स्पष्ट बात कह देते हैं। ऐसे जातक कुछ कर गुजरने की क्षमता लिए रहते है।

हथेली में सूर्य पर्वत न होने पर वह जातक मंद बुद्धि या निरक्षर होता है। यदि यह पर्वत कम विकसित हो तो ऐसे व्यक्ति सौंदर्य के प्रति रुचि होते हुए भी उसमें पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर पाते। स्पष्ट रूप से विकसित सूर्य पर्वत आत्मविश्वास, सज्जनता, दया, उदारता तथा धन वैभव की सूचना देता है।

ऐसे व्यक्ति समाज में दूसरों को प्रभावित करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। ऐसे जातक सम्मानित भी होते हैं। सूर्य पर्वत जरूरत से ज्यादा विकसित (उभरा) होने पर वह व्यक्ति अत्यधिक घमंडी, झूठी प्रशंसा करने वाला, फिजूलखर्ची वाला झगड़ालू भी होता है। ऐसे लोग जीवन में पूर्ण सफलता नहीं पाते। इनकी मित्रता भी सामान्य लोगों तक रहती हैं।

यदि सूर्य पर्वत शनि की ओर झुका हो तो वह व्यक्ति एकांतप्रिय और निराशावादी होता है एवं उसके पास सदैव धन की कमी बनी रहती है। ऐसे जातक एक कार्य को पूर्ण होने से पहले दूसरे कार्य में लग जाते हैं। इस वजह से दोनों कार्य पूरे नहीं होते। शनि की ओर झुका सूर्य पर्वत भाग्यहीनता की निशानी होती है।

यह पर्वत यदि बुध की ओर झुका हो तो ऐसा जातक सफल व्यापारी और धनवान होकर समाज में सम्मान पाता है। सूर्य पर्वत पर ज्यादा रेखाएँ व्यक्ति को बीमार बनाती है।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

बुध रेखा और आपका भाग्य —-

बुध रेखा और आपका भाग्य —-

सामुद्रिक शास्त्र समुद्र के समान अथाह सागर है। इसमें जो जितना पारंगत होता है, वो उतना ही जान पाता है। हाथ की रेखाएँ सदैव एक समान नहीं रहतीं। यह रेखाएँ बनती-बिगड़ती रहती हैं, अतः भविष्य कथन में परिवर्तन आता रहता है। स्वच्छ सीधी रेखाएँ जहाँ उत्तम स्वास्थ्य को दर्शाती हैं, वहीं प्रगति में भी सहायक मानी जाती हैं। अस्त-व्यस्त, कटी-टूटी हो तो वह अस्वस्थ व प्रगति में बाधक रहती हैं।

बुध रेखा हथेली में किसी भी स्थान से निकल सकती है। इसकी सबसे अच्छी स्थिति यह मानी गई है कि बुध रेखा की स्थिति भाग्य रेखा और जीवन रेखा से जितनी अधिक दूर हो उतनी ही शुभ फलदायक होती है। बुध रेखा कहीं से भी जाए इसका अंत कनिष्ठिका अँगुली पर ही होता है। यदि किसी भी हथेली में यह रेखा है परंतु जीवन रेखा से पर्याप्त दूर है, साथ ही मणिबंध विघ्नरहित है तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से दीर्घायु होगा।

अशुभ चिन्हों से मुक्त निर्दोष बुध रेखा वाला व्यक्ति पाचन शक्ति का धनी और स्वस्थ, सबल गुर्दों का स्वामी होता है। निर्दोष बुध रेखा के साथ-साथ यदि हथेली में हृदय, मस्तिष्क और भाग्य रेखाएँ निर्दोष रूप में विद्यमान हों, तो ऐसी हथेली वाली बुध रेखा व्यक्ति की शारीरिक क्षमता, आरोग्य और जीवन शक्ति की वृद्धि करती है।

यदि बुध रेखा टूटी, छिन्न-भिन्न टेढ़ी-मेढ़ी और मार्ग से हटी हुई हो तो समझना चाहिए कि ऐसा व्यक्ति उदर विकारों से ग्रस्त होगा। पाचन शक्ति की कमी स्नायु तंत्र में अतिक्रम जोड़ों का दर्द अन्य प्रकार के वात-विकार, मानसिक व्याधियों की आशंका और दुर्बलता क्षीणता जैसे रोग होते हैं। बुध रेखा अशुभ मानी जाती है। जन्म लग्न में भी बुध नीच का या शत्रु मैत्री होगा।

बुध रेखा का लहरदार होना यह संकेत देता है कि जातक को लीवर संबंधित रोग होगा। लहरदार या जंजीरदार रेखा टूटी, अस्त-व्यस्त हो तो वह मंदबुद्धि, आलसी, निकम्मे, दुविधाग्रस्त तथा कार्य क्षेत्र में पिछड़े हुए होते हैं। अपने दैनिक जीवन के कार्यकलाप, व्यवसाय, आगामी योजना और अन्य व्यावहारिक क्षेत्रों में भी ऐसे लोग प्रायः अस्थिर मन, अनिश्चित और आत्मविश्वास से रहित होते हैं।

ये कोई भी कार्य करें सफलता की उम्मीद बहुत कम कर पाते हैं। ऐसे जातक आशंका में रहते हैं। यदि बुध रेखा ऊपर अँगुलियों की ओर, बुध पर्वत की ओर अग्रसर है और उसके मार्ग में कोई बिंदु दिख रहा है, साथ ही किसी पर्वत पर विभिन्न रेखाओं का चक्रव्यूह जैसा दिखाई दे रहा है तो यह निश्चित है कि वह अवश्य ही अस्वस्थ्ता के दौर से गुजर रहा है अथवा कोई रोग-विकार इसे शीघ्र होगा।

बुध रेखा पर कहीं भी द्वीप का चिह्न होना यह तथ्य प्रकट करता है कि इस जातक को आयु रेखा से निर्दिष्ट व्यय-क्रम में स्वास्थ्य संबंधित समस्याएँ पीड़ित करेंगी। बुध पर्वत तक पहुँचने वाली निर्दोष बुध रेखा व्यक्ति की लंबी आयु का वरदान होती है। यदि यह रेखा चंद्र पर्वत से प्रारंभ हो तो व्यक्ति अपने जीवन में अनेक यात्राएँ करता है।

बुध रेखा से निकलकर जाने वाली रेखाएँ व्यक्ति को व्यापारिक सफलता दिलाती हैं। इसके विपरीत नीचे जाने वाली रेखाएँ असफलता की सूचना देती हैं। यदि बुध रेखा की कोई शाखा गुरु पर्वत पर पहुँच जाती है तो व्यक्ति को अत्याधिक सफलता मिलती है। ऐसे व्यक्ति में नेतृत्व, प्रतिभा और महत्वाकांक्षाओं की कमी नहीं रहती।

बुध रेखा की प्रशाखा यदि शनि पर्वत पर पहुँच रही हो तो व्यक्ति अध्ययनशील और गंभीर होता है। सूर्य पर्वत पर पहुँचने वाली प्रशाखा व्यक्ति को तेजस्वी और प्रतिभावान बनाती है। ऐसे व्यक्ति को सूर्य पर्वत के अनुरूप जीवन में अनेक विधियों द्वारा सफलता मिलती है। जीवन रेखा से निकलने वाली बुध रेखा यदि अस्त-व्यस्त हो और जीवन रेखा पर लाल या नीले बिंदु हों तो व्यक्ति हृदय रोगों से पीड़ित होता है।

यदि मस्तिष्क रेखा और हृदय रेखा पास-पास हो और निर्बल हो तो व्यक्ति मूर्च्छा रोगों का शिकार होता है। यदि बुध रेखा दोनों हाथों में मस्तिष्क रेखा को काटकर गुणक चिन्ह बनाती हो तो व्यक्ति रहस्य-विद्या तथा पराविज्ञान में रुचि रखने वाला होता है। यदि बुध रेखा की कोई शाखा मस्तिष्क रेखा को स्पर्श करती हो तो वह व्यक्ति बुद्धिमान होता है।

यदि बुध रेखा मस्तिष्क रेखा पर समाप्त हो जाए और जीवन रेखा पर अनेक छोटी-छोटी रेखाएँ हों तो व्यक्ति मानसिक रोगों का शिकार होता है। चंद्र पर झुकी हुई मस्तिष्क रेखा पर गुणक चिन्ह बनाने वाली बुध रेखा कल्पनाशीलता का संकेत देती है। बुध रेखा शनि और मस्तिष्क रेखाओं के साथ एक त्रिकोण बनाती हो तो व्यक्ति धार्मिक विचारों वाला होता है।

यदि मस्तिष्क रेखा के मार्ग में वृत्त हो और बुध रेखा पर ऊपर की तरफ गुणक चिन्ह स्थित हो तो व्यक्ति को अंधेपन का खतरा रहता है। बुध रेखा के पास बना क्रॉस आकस्मिक दुर्घटनाओं का संकेत देता है।

इस प्रकार बुध रेखा पर आड़ी रेखा सफलता के मार्ग में बाधक रहती है व बुध पर्वत पर बुध रेखा अनेक भागों में हो तो उसको सफलता भी अनेक क्षेत्रों में मिलती है। बुध रेखा को स्वास्थ्य रेखा कहा जाता है। बुध रेखा जितनी निर्दोष होगी, वह जातक कार्यक्षमता में उतना ही प्रवीण होगा।

यदि मन भटकता है तो, सोमवार को अपनाएं ये टिप्स—Eeshay Sansthan

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक मात्र चंद्र ऐसा ग्रह है तो बहुत तेज गति से चलता है। चंद्र मात्र ढाई दिन ही एक राशि में रुकता है। इसके चंचल स्वभाव के कारण इसे मन का देवता भी कहा जाता है। चंद्र हमारे मन को पूरी तरह प्रभावित करता है। यदि चंद्र नीच का या अशुभ फल देने वाला हो तो व्यक्ति पागल भी हो सकता है। चंद्र विपक्ष में होने पर व्यक्ति कोई भी निर्णय ठीक से नहीं कर पाता। मन भटकता रहता है। किसी भी कार्य को लगन से नहीं कर पाता। यदि आपको भी निर्णय लेने में काफी समय लगता है या सही निर्णय नहीं ले पाते है तो आपको यह उपाय करने चाहिए:—

- प्रति सोमवार भगवान शिव की विशेष पूजा करें।

- प्रतिदिन शिव पर जल चढ़ाएं।

- प्रति सोमवार छोटी कन्याओं को दूध का सेवन कराएं।

- प्रति सोमवार बबूल के पेड़ की जड़ों में दूध चढ़ाएं।

- पीपल को रोज जल चढ़ाएं।

- सोमवार को सफेद गाय का दान करें।

- सोमवार को सफेद गाय को गुड़, चावल आदि खिलाएं।

- सोमवार नदी में चांदी का सिक्का प्रवाहित करें।

- अपने साथ हमेशा एक चांदी का सिक्का रखें।

- चंद्र से संबंधित दान स्वीकार न करें।

- गरीबों को दूध दान में दें।

- आपकी कुंडली किसी ज्योतिषी को दिखाकर परामर्श लें।

हाथों की बनावट से जानें स्वभाव–मोटे हाथ वाले होते हैं आरामपसंद—

किसी भी व्यक्ति के साथ जब तक कुछ समय न बिताया जाए, उसके स्वभाव का अनुमान लगाना संभव नहीं होता। जन्मकुंडली से मनुष्य का खाका अवश्य खींचा जा सकता है, मगर यदि जन्मकुंडली न हो तो केवल हाथों का अवलोकन करें और जान लें कि व्यक्ति आपके लिए लाभदायक है या नहीं -

1. हाथ बड़ा व चौड़ा है तो व्यक्ति हर काम को खूब बारीकी से, देख परख करता है। ये व्यक्ति परफेक्शनिस्ट हो सकते हैं। छोटे हाथ वाले व्यक्ति जरा जल्दबाज होते हैं व काम जल्द निपटाने में दिलचस्पी रखते हैं।

2. हाथ छूने में पतला, कठोर और सूखा हो तो व्यक्ति रिस्क नहीं लेते। एक बँधी बँधाई लीक पर चलने के लिए तैयार होते हैं। ये जल्दी घबरा जाते हैं, चिंता करना इनका स्वभाव होता है।

3. हाथ लचीला, मजबूत हो, संतुलित हो तो व्यक्ति अच्छे स्वभाव का, स्फूर्तिवान, समझदार होता है। ये सकारात्मक सोच वाले होते हैं।

4. यदि हाथ वर्गाकार, मोटा, भरा हुआ और कोमल हो तो व्यक्ति आराम पसंद होता है। मेहनत करने से घबराता है और विषय-भोग में रुचि रखता है।

5. हाथ कोमल, शिथिल व पिलपिला हो, पीली रंगत लिए हो तो ये व्यक्ति रोग का शिकार जल्दी होते हैं। जीवन के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण अपनाते हैं व अविश्वासी होते हैं।

6. हाथ अत्यधिक गद्देदार हो, रेखाएँ गहरी न कालापन लिए हो, बीच का गड्‍ढा गहरा हो तो ये व्यक्ति अपनी गलतियों के कारण जीवन में असफल रहते हैं और फ्रस्ट्रेशन का शिकार हो जाते हैं।

7. अधिक लंबी उँगलियाँ देखने में भले ही सुंदर लगती हों मगर ये अधिक कल्पनाशीलता व ख्याली पुलावों की प्रतीक हैं। यदि हाथ का आकार नुकीला हो तो ये व्यक्ति अपनी सादगी, अति विश्वास व असावधानी के चलते धोखे का शिकार हो सकते हैं।

8. हाथ यदि चपटा, चमचाकार व कठोर हो तो ये व्यक्ति आत्मनिर्भर, लगन रखने वाले और खोजी होते हैं मगर जिद और चिड़चिड़ाहट भी इनका मूल स्वभाव होता है।

9. जब उँगलियाँ और हथेली एकदम बराबर लंबाई की हो तो ये व्यक्ति समय के पाबंद अनुशासन प्रिय व व्यावहारिक होते हैं। अच्छे मार्गदर्शक हो सकते हैं।

विशेष : जब उँगलियाँ हथेली की तुलना में छोटी हो तो जीवन में सफलता का प्रतिशत कम हो जाता है। बराबर (उँगलियाँ व हथेली) लंबाई सफलता सुनिश्चित करती है।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

कैसी है आपकी जीवन रेखा——

कैसी है आपकी जीवन रेखा——

हाथों की रेखाओं द्वारा हम अपने भविष्य के बारे में जान सकते हैं। जीवन में होने वाली ऊँच-नीच, बीमा‍री, आपकी उम्र आदि के बारे में आसानी से सबकुछ पता चल सकता है। आपके हाथों की रेखाएँ आपके जीवन में आनेवाली मुसीबतों को पहले से आगाह करके हमें संभलने के मौका देते है।

- जिस जातक की जीवन रेखा गुरु पर्वत से निकलती हो तो ऐसा व्यक्ति उत्तम आचरण वाला, गुणी-धर्मात्मा भी होगा।

- जीवन रेखा पर जितनी बार क्रास होंगे उस जातक को उसके जीवन में उतनी ही बार खतरों से गुजरना पड़ सकता है।

- जीवन रेखा पर बिन्दु हो या कटी रेखा भी हो तो उस जातक की मृत्यु हार्ट अटैक से हो सकती है।

- जिस जातक की जीवन रेखा को चंद्रपर्वत से निकलने वाली रेखा काटे तो उस जातक की मृत्यु जल में डूबकर हो सकती है।

- जीवन रेखा पर अन्य शाखाओं का होना उसके जीवन में परेशानियों का संकेत देता है।

- जिस जातक की जीवन रेखा को बारीक-बारीक रेखाएँ काटती हो तो उसे पारिवारिक जीवन में कष्टों का सामना करना पड़ता है।

- जीवन रेखा से कोई शाखा बुध पर्वत तक जाए तो उस जातक को व्यापार के क्षेत्र में देश-विदेश में ख्याति दिलाती है।

- जीवन रेखा के साथ कुछ दूर तक भाग्य रेखा चले तो उसका बुढ़ापा उत्तम कटेगा।

- जीवन रेखा पर तारे का निशान शुभकारक नहीं होगा उसे तनाव, चिकचिक का सामना करना पड़ेगा।

- जीवन रेखा पर काला तिल हो तो ऐसे जातक को अकस्मात दुर्घटना का शिकार होना पड़ सकता है।

- जीवन रेखा मंगल पर्वत पर जाकर समाप्त हो जाए तो उसे किसी हथियार से खतरा हो सकता है।

- जीवन रेखा पर गोल वृत्त का निशान आत्मघात या अकस्मात मृत्यु का संकेत देती है।

- जीवन रेखा का अंतःशिरा स्पष्ट साफ-सुथरा हो तो उस जातक का बुढ़ापा उत्तम कटेगा।

- जीवन रेखा यदि बीच में से कटी हो और उसके साथ कोई अन्य रेखा चल रही हो तो ऐसे जातक के दुर्घटना के योग तो बनेंगे लेकिन दुर्घटना इतनी छोटी होगी कि जिसका असर तनिक-सा होगा।

- जीवन रेखा के साथ यदि भाग्य रेखा मिल जाए तो ऐसा जातक अपने जीवन में भाग्यशाली होने के साथ लंबी उम्र भी पाएगा।

- इस तरह से रेखाओं से सरल और सहज तरीके से आप अपने बारे में जान सकते हैं। परंतु आप यदि अधिक जानकारी चाहते हैं तो आपको किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह लेना चाहिए।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

Remedy For Excellent Education —-

Remedy For Excellent Education —-

Keep Saraswati Yantra on your Puja place and always pray or show Dhoop- deep to yantra for received Saraswati’s blessings and grace.
If you studying towards east or north to face studies good for excellent education.
Study time you will wearing white or lite colors clothes its give you concentrated of your mind for excellent education. If you wearing darker colors dress it will disturb your concentrated and disturbing your peace of mind.
Keep Molly’s (pancharangi suta, kalava) in your study books for benefits to improve your knowledge and excellent education.
Keep Peacock’s feathers are in the book would benefit to improve your knowledge and excellent education.
For Knowledge increased try Gyan Mudra daily only 5 minutes.

Sarasvati Mantra:—-

ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः।
Om Hreem em Hreem Saraswatye Namah

Do not placing mirror or Glass on your Studying table. If placing mirror or Glass on your Studying table you face mental disturbance or loss of memory and you do not get excellent education.
Studying time will never wake studies behind empty concrete, Studying time Wall Bete and behind you. But it should not wake open Betn Place is a lack of confidence. Children who try for long hours of studying in the open position his memory will not improved.
For Studying time keep your right hand site full water glass and after time to time Drink Some Water Regularly Recall fro Fast Recharge and concentration in improved memory and get excellent education.
For Studying time keep as possible Less Content placed on Table it will be Increases your concentration. If you placed Content on Table it will be generate negative power (negative energy) it will disturb your concentrated.
Do not touches your study table to wall keep little distance between study table and wall, touched table harmed your concentrated.
Before sleep at night keep water in one silver glass and early morning drink filling water at empty stomach. It will give opportunity to achieve success in education. Or fill water in any glass and get one pure silver coin in it and early morning drink filling water at empty stomach. It will also give opportunity to achieve success in education.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

रिश्ते और ग्रह-नक्षत्र—

रिश्ते और ग्रह-नक्षत्र —

ग्रह नक्षत्र हमारे आपसी रिश्ते-नाते पर क्या प्रभाव डालते हैं, इस संबंध में लाल किताब में बहुत ‍कुछ लिखा हुआ है। लाल किताब अनुसार प्रत्येक ग्रह हमारे एक रिश्तेदार से जुड़ा हुआ है अर्थात् कुंडली में जो भी ग्रह जहाँ भी स्थित है तो उस खाने अनुसार वह हमारे रिश्तेदार की स्थिति बताता है।

1. सूर्य : पिता, ताऊ और पूर्वज।
2. चंद्र : माता और मौसी।
3. मंगल : भाई और मित्र।
4. बुध : बहन, बुआ, बेटी, साली और ननिहाल पक्ष।
5. गुरु : पिता, दादा, गुरु, देवता। स्त्री की कुंडली में इसे पति का प्रतिनिधित्व प्राप्त है।
6. शुक्र : पत्नि या स्त्री।
7.शनि : काका, मामा, सेवक और नौकर।
8. राहु : साला और ससुर। हालाँकि राहु को दादा का प्रतिनि‍धित्व प्राप्त है।
9. केतु : संतान और बच्चे। हालाँकि केतु को नाना का प्रतिनि‍धी माना जाता है।

ठीक इसके विपरीत लाल किताब का विशेषज्ञ रिश्तेदारों की स्थिति जानकर भी ग्रहों की स्थिति जान सकता है। ग्रहों को सुधारने के लिए रिश्तों को सुधारने की बात कही जाती है अर्थात् अपने रिश्ते प्रगाढ़ करें।

अंतत: यह माना जा सकता है कि कुंडली का प्रत्येक भाव किसी न किसी रिश्ते का प्रतिनिधित्व करता है तथा प्रत्येक ग्रह मानवीय रिश्तों से संबंध रखता है। यदि कुंडली में कोई ग्रह कमजोर हो तो उस ग्रह से संबंधित रिश्तों को मजबूत करके भी ग्रह को दुरुस्त किया जा सकता है।

दूसरी ओर ग्रहों को मजबूत करके भी किसी रिश्तों को मजबूत तो किया ही जा सकता है। साथ ‍ही वे रिश्तेदार भी खुशहाल हो सकते हैं, जैसे कि बहन को किसी भी प्रकार का दुख-दर्द है तो आप अपने बुध ग्रह को दुरुस्त करने का उपाय करें। (वेबदुनिया डेस्क)

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

कैसे होते हैं अरिष्ट योग –

कैसे होते हैं अरिष्ट योग –
कुंडली के त्रिक भाव से जानें शारीरिक कष्ट—

कुंडली में ग्रहों के बलाबल व स्थिति के अनुरूप बीमारियों के योग देखे जाते हैं। हालाँकि आजकल चिकित्सा क्षेत्र में प्रगति के चलते हर बीमारी का निदान संभव हो चला है अत: यदि कुंडली में अरिष्ट योग हो तो सावधानी रखकर कष्ट से बचा जा सकता है।

1. लग्नेश षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव में हो तो शरीर कष्ट होता है।

2. लग्नेश कमजोर हो व लग्न तथा चंद्रमा पाप प्रभाव में हो तो स्वास्थ्य गड़बड़ाता है।

3. चंद्रमा राहु के साथ हो या बारहवाँ हो तो रोग देता है।

4. लग्नेश सप्तम में पाप प्रभाव में हो तो स्वास्थ्य कष्ट बना रहता है।

5. लग्नेश अष्टम में व अष्टमेश लग्न में हो तो बीमारियाँ घेरती हैं।

6. राशि स्वामी पाप ग्रहों से दृष्ट या युक्त हो, अष्टम में हो तो स्वास्थ्य हानि करता है।

7. सूर्य-चंद्र-शनि एकत्र हो 6-8-12 में हो तो भयंकर कष्ट देते हैं।

8. चंद्र-बुध केंद्र में हो व शनि-मंगल की दृष्टि में हो तो भयंकर कष्ट होता है।

विशेष : स्वास्थ्‍य रक्षा के लिए लग्नेश को मजबूत करें व इष्ट की साधना करें।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 10, 2011

सावधान रहें,इन अशुभ संकेतों से..

सावधान रहें,इन अशुभ संकेतों से..—by प० अनिल जी शर्मा सहारनपुर

यदि गृहस्वामिनी के हाथ से बार बार बिना किसी कारण के भोजन नीचे जमीन पर गिरता है तो, यह संकेत शुभ नहीं होता है, समझ लो कि धन हानि या दरिद्रता का आगमन होने वाला है. ऐसे अशुभ संकेत प्रकृति हमारे सामने प्रगट करती रहती है परन्तु हम उन्हें समझ नहीं पाते या हमे इस बात का कोई ज्ञान नहीं होता कि इस संकेत का अर्थ क्या है. इस लेख से पहले लेख में मेने शुभ संकेतों की चर्चा की थी,जो कि भविष्य की सूचना देने वाले शुभ संकेत.. नामक लेख था, आज अशुभ संकेतों की बात करते है.—

१:- घर के परिसर में बिल्ली या बिलाव का रोना या आपस में झगड़ा करना विपत्ति या घर में क्लेश का सूचक है.

२:- यदि घर के मुख्य द्वार से सांप का प्रवेश होता है तो, यह गृहस्वामी या गृहस्वामिनी के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता है.

३:-यदि घर में कोई चोट खाया या घायल पक्षी या उसका कोई काटा हुआ अंग आँगन में गिरता है तो, समझ लीजिए कि महासंकट आने वाला है.

४:- घर में यदि कुतिया प्रसव करती है तो यह गृहस्वामी के लिए अच्छा संकेत नहीं है, इसके कारण शत्रु की वृद्धि होती है तथा अपने ही परिवार में मतभेद होने लगते है.

५:- यदि घर में कौवा, गिद्ध, चील या कबूतर नित्य बैठते है और छह मास तक लगातार निवास बनाए हुए है तो गृहस्वामी पर नाना प्रकार की विपत्ति आने का सूचक होता है.

६:- यदि घर में काले रंग के चूहे बहुत अधिक तादाद में दिन और रात भर घूमते रहते हो तो, समझ लीजिए कि किसी रोग या शत्रु का आक्रमण होने वाला है.

७:- यदि घर की छत पर, दीवार पर या घर के किसी भी कोने में लाल रंग की चींटिया घुमती या रेंगती हुई दिखाई दे, तो समझ लीजिए कि संपत्ति का क्षय होता है. या संपत्ति का कोई नुक्सान हो जाता है. और यदि पंख वाली चींटियां हो तो घर में बिना किसी कारण के क्लेश की स्थिति उत्पन्न होने लगती है.

८:- यदि पालतू गाय अपना दूध पीती हो या अत्यधिक सिर हिलाती हो, तो घर के गृहस्वामी के ऊपर कर्ज बढ़ता है और भाग्य खराब होने लगता है.

९:- यदि किसी खुशी के कार्य पर घर में आग लग जाय तो धन हानि की संभावना बन जाति है.

१०:- यदि घर में बने मंदिर की कोई मूर्ति या चित्र अपने आप खंडित या जल जाए, या जमीन पर हाथ से छूट कर टूट जाए तो, यह संकेत पूरे परिवार के लिए शुभ नहीं होता तथा इसके कारण समाज में मां हानि और कलंक लगता है. घर में विवाह आदि शुभ कार्यों में अनावश्यक बाधाओं का सामना करना पडता है.

११:- यदि घर में रसोई का प्लेटफार्म का चटकना या टूटना, चाकले का टूटना या तड़क जाना दरिद्रता की निशानी होती है.

१२:- यदि घर में दूध बार बार जमीन पर गिरता हो, किसी भी कारण से तो घर में क्लेश और विवाद की स्थिति बनती है.

१३:- यदि सुबह के समय या शाम के समय कौवा मांस या हड्डी लाकर गिराता है तो, समझ लीजिए कि अमंगल होने वाला है और बिमारी, चोट आदि पर धन खर्च होगा.

१४:- यदि कोई भी पक्षी घर में किसी भी समय कोई लोहे का टुकड़ा गिराता है तो, यह अशुभ संकेत होता है जिसके कारण अचानक छापा या कारावास होने की पूरी पूरी संभावना बनने लगती है.

१५:- यदि जिस दिन नए घर में प्रवेश करना हो तो, उसी दिन सूर्योदय के समय कोई भी पशु रोता है तो उस दिन गृह प्रवेश टाल दें यह संकेत शुभ नहीं होता है घर में प्रवेश करते ही दुःख आरम्भ हो जायेंगे.

1. कार्य पर जाते समय यदि बिल्ली रास्ता काट जाए तो कार्य असफल होने की आशंका रहती है। आप घर वापस आकर या थोड़ा विश्राम कर आगे जाएँ। तब कार्य सफल होगा।

2. कार्य पर जाते समय कोई दुष्ट प्रकृति वाला, व्यभिचारी अथवा अन्यायी, व्यभिचारिणी सामने आ जाए तो कार्य सफल नहीं होता।

3. शुभ कार्य के लिए विचार चल रहा हो तब यदि छिपकली की आवाज सुनाई दे तो कार्य की असफलता होती है।

4. घर में किसी देवता की मूर्ति अथवा चित्र टूट जाए तो मृत्यु या मृत्यु समान कष्ट हो सकता है। निवारण के लिए रामरक्षास्तोत्र अथवा दुर्गा माँ की आराधना करें।

5. यदि आपको आकाश में तारे टूटते दिखाई दें तो स्वास्थ्‍य खराब होने की सूचना होती है। इसी के साथ नौकरी में खतरा एवं आर्थिक तंगी आने लगती है।

6. आपके घर उल्लू के चिल्लाने की आवाज आ रही हो तो भूत बाधा का डर रहता है अथवा ऊपरी बाधा से ग्रसित हो सकते हैं, विशेषकर स्त्री।

7. कुत्ते का रोना अथवा सियार के रोने से रिश्तेदार, पड़ोसी या मोहल्ले में कष्ट (मृत्यु) की संभावना रहती है।

विशेष : घर में उल्लू गिरे तो मानहानि, आयुहानि होती है। इसकी शांति के लिए यज्ञ-पूजन अथवा जाप करना चाहिए। जंगली कबूतर नहीं पालें, अशुभ माना गया है।

कुछ सूक्ष्म उपाय (टोटके)—-

1. कबूतर की बीट एवं लोभान की कंडे पर धूप देकर पूरे घर में धुआँ करें, सुबह-शाम अथवा रविवार, बुधवार घर में शांति मिलेगी।

2. घर का मुखिया रात्रि में चौराहे पर बाटी (आटे से गोल लड्‍डूनुमा) बनाए, बाटी सिर्फ पाँच बनाए। फिर उसका क्षेत्रपाल देवता के नाम से उसी स्थान पर कोण लगाकर रास्ता बदलकर घर आए। घर में पूर्ण शांति मिलेगी। यह कार्य चौदस, रविवार, अथवा अमावस्या पर करने से विशेष लाभ मिलेगा।

उपरोक्त शुभ-अशुभ शकुन का भारतीय परंपरा एवं संस्कार में बड़ा महत्व माना गया है। इन छोटे टोटकों से आप लाभ ले सकते हैं।
इस प्रकार के अशुभ संकेत यदि सामने आटे है तो इनका उपचार भी शास्त्रों में दिया गया है कि संकेत देखने के बाद उसी समय मंदिर में जाकर सरसों के तेल का मिट्टी का दिया भगवान एक सामने अर्पण कर शुभ फल की प्रार्थना करें और किसी गाय को रोटी के अंदर गुड़ रख कर खिलाए. तथा श्री हनुमान चालीसा के पांच पाठ करे तो यह अशुभ संकेतों का दोष समाप्त हो जाता है.

भविष्य की सूचना देने वाले शुभ संकेत..–by प० अनिल जी शर्मा सहारनपुर

यदि घर में बिल्ली प्रसव करती है तो यह शुभ संकेत है कि जल्दी ही धन संपदा की प्राप्ति होगी, ऐसे कई संकेत प्रकृति हमारे सामने नित्य रखती है, परन्तु हम समझ नहीं सकते है. यह कुदरत का नियम है कि जो भी शुभ या अशुभ होना है, उसकी पूर्व सुचना मनुष्य को ऐसे ही संकेतों से मिलती है.हमारे ऋषि मुनि चिन्तक और आत्म दर्शी थे. और वह मानव जीवन की, प्रकृति परिवर्तन की, पशु-पक्षियों के व्यवहार, बोली अथवा बार बार होने वाली घटनाओं का अत्यंत सूक्ष्म दृष्टि से विश्लेषण किया करते थे. वृहत संहिता में एक सम्पूर्ण अध्याय इसी विषय पर लिखा गया है, मनुष्यों के मार्ग दर्शन के लिए जो शुभ व् अशुभ संकेतों का वर्णन किया है उनमे से कुछ की चर्चा आज आपके सामने कर रहा हूं.

१:- घर के दरवाजे के अंदर आकार अचानक गाय रम्भाना शुरू कर दें तो, यह संकेत सुख सौभाग्य का सूचक है.

२:- बन्दर यदि आपके घर के आँगन में आम की गुठली कहीं से लाकर डाल दे तो. यह संकेत आपके व्यापार में लाभ होने का सूचक होता है.

३:- सुबह सुबह यदि कौवा आपके घर के मुख्य द्वार के पास बोलता है तो समझ लीजिए कि आज आपका कोई प्रिय आने वाला है. यदि दोपहर को बोलता है तो कोई पत्र या अतिथि आपसे मिलने आएगा.

४:- घर के दक्षिण दिशा में तीतर यदि आवाज करता है तो अचानक सुख सौभाग्य और धन प्राप्ति का योग बनता है.

५:- यदि आपके घर में कोई भी पक्षी चांदी का टुकड़ा या चांदी की अन्य चीज ला कर डाल देता है तो आपको कहीं से अचानक लक्ष्मी की प्राप्ति होगी.

६:- यदि आपके घर की मुंडेर या चाहरदीवारी पर कोयल या सोन चिड़िया बैठ कर मधुर स्वर करती है तो घर के स्वामी का भाग्योदय होता है तथा सुखी जीवन का प्रतीक संकेत है.

७:- घर की छत या दीवार पर काली चींटियों का घूमना या रेंगना घर की उन्नति के लिए शुभ संकेत माना जाता है.

८:- यदि हाथी आ कर आपके घर के मुख्य द्वार के सामने अचानक अपनी सूंड उठा कर जोर से स्वर करता है तो विवाद में आपकी जीत होती है और मुकद्दमा आपके पक्ष में होता चला जायगा.

९:- सफेद कमेड़ी यदि आपके घर की किसी भी दीवार पर बैठ कर आवाज करती है तो यह संकेत आपकी व्यापार वृद्धि में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा.

१०:- घर में बिल्ली यदि छत या किसी कमरें में अपना प्रसव करती है तो समझ लीजिए कि धन संपदा की वृद्धि होने वाली है.

शुभ शकुन –

1. यदि आप किसी कार्य से जा रहे हैं तो आपके सामने सुहागन स्त्री अथवा गाय आ जाए तो कार्य में सफलता मिलती है।

2. जाते समय आप कपड़े पहन रहे हैं और जेब से पैसे गिरें तो धन प्राप्ति का संकेत है। कपड़े उतारते समय भी ऐसा हो तो शुभ होता है।

3. यदि आपके यहाँ सोकर उठते से ही कोई भिखारी माँगने आ जाए तो ये समझना चाहिए आपके द्वारा दिया गया पैसा (उधार) बिना माँगे वापस आ जाएगा।

4. आप सोकर उठे हों उसी समय नेवला आपको दिख जाए तो गुप्त धन मिलने की संभावना रहती है।

5. आप किसी कार्य से जा रहे हों, तब आपके सामने कोई भी व्यक्ति गुड़ ले जाता हुआ दिखे तो आशा से अधिक लाभ होता है।

6. लड़की के लिए आप वर तलाश करने जा रहे हों। तब घर से निकलते समय चार कुँवारी लड़कियाँ बातचीत करते मिल जाएँ तो शुभ योग होता है।

7. यदि शरीर पर चिड़िया गंदगी कर दे तो आपने समझना चाहिए आपकी दरिद्रता दूर होने वाली है। ये शुभ शकुन हैं,

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 11, 2011

आज का पंचांग(11- April- 2011)

आज का पंचांग(11- April- 2011) विक्रम संवत 2068
दिनाकं: 11 अप्रैल 2011वर्ष: विक्रम संवत 2068, शक संवत 1932
वार:सोमवार
मास:चैत्र
पक्ष:शुक्ल
तिथि:अष्टमी
चंद्रमा:मिथुन रात 10:31 बजे कर्क
नक्षत्र:पुनर्वसु
योग:अतिगंड
करण:विष्टि
सूर्योदय:06:01 बजे
सूर्यास्त:06:44 बजे
राहुकाल:04:30 से 06:00 (दोपहर)
( राहुकाल में शुभ कार्य करना वर्जित हैं।)

तिथि विस्तार से:

दुर्गाष्टमी-महाष्टमी व्रत, अशोकाष्टमी, अशोकाष्टमी (बंगाल), श्रीअन्नपूर्णाष्टमी व्रत एवं परिक्रमा (काशी), महानिशा पूजा, सांईबाबा उत्सव 3 दिन (शिरडी),
पुष्‍य नक्षत्र (रात्रि 11.19 से),

11 अप्रैल 2011: सोमवार, Sukla, 5:08 अष्टमी तक *
* 04:26 Punarvasu तक, जब तक 10:02 योग Atiganda,
जब तक 17:35 करण Vishti, 5:07 * तक बावा करण,
RahuK: 15:04 GulikaK: YamaG, 13:34: 7:35-9:05 – 10:34-0:04,
18:41 पर सूर्योदय पर 6:04 सूर्यास्त, *,
11:31 पर Moonrise, 22:31 तक 01:42 में * Mith चंद्रमा, पर Moonset
————————————————————————————————-
April 11, 2011: Monday, Sukla Ashtami till 5:08*,
Punarvasu till 4:26*, Atiganda yoga till 10:02,
Vishti karana till 17:35, Bava karana till 5:07*,
RahuK: 7:35 – 9:05, GulikaK: 13:34 – 15:04, YamaG: 10:34 – 12:04,
Sunrise at 6:04*, Sunset at 18:41,
Moonrise at 11:31, Moonset at 1:42*, Moon in Mith till 22:31
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दैनिक राशिफल–11 अप्रैल 2011

राशि फलादेश मेष—
इच्छित कार्य पूर्ण होंगे। रिश्तेदारों से भेंट होगी। व्यापार अच्छा चलेगा। सामाजिक कार्यों में रुचि लेंगे। भौतिक सुख के साधन मिलेंगे।

राशि फलादेश वृष—
व्यापार में लाभदायी अनुबंध होंगे। अल्प परिश्रम से ही लाभ होगा। रुका कार्य होने से हर्ष होगा। नए विचार, योजना पर चर्चा संभव है। आपसी संबंधों को महत्व दें।

राशि फलादेश मिथुन—
खान-पान में सावधानी रखें। मांगलिक उत्सवों में शामिल होने के अवसर आएँगे। अपने प्रयासों से उन्नति पथ प्रशस्त करेंगे। आय से अधिक व्यय नहीं करें।

राशि फलादेश कर्क—-
विरोधी परास्त होंगे। नौकरी में कार्य की प्रशंसा के योग हैं। राज्यपक्ष से लाभ होगा। व्यर्थ के दिखावे एवं आडंबरों से दूर रहें।

राशि फलादेश सिंह—
कार्यक्षेत्र में बाधाएँ आ सकती हैं। दांपत्य सुख में कमी आएगी। व्यर्थ समय नष्ट न करें। खर्चों में कमी करने का प्रयत्न आवश्यक है।

राशि फलादेश कन्या—
सुख वृद्धि एवं पारिवारिक उन्नति होगी। भूल करने से विरोधी बढ़ेंगे। पारिवारिक समस्याएँ सूझ-बूझ से निपटाएँ। दूसरों से बिना कारण नहीं उलझें।

राशि फलादेश तुला—-
अधीनस्थों के मध्य आपका महत्व कम होगा। घर-परिवार की परेशानी से दुःख होगा। नए संबंधों के प्रति सतर्क रहना होगा।

राशि फलादेश वृश्चिक—
धनलाभ के अवसर आएँगे। व्यापार में उन्नति होगी। नई योजनाओं का सूत्रपात होगा। निवेश में वृद्धि होगी। रचनात्मक रुचि बढ़ेगी।

राशि फलादेश धनु—
व्यापार में सफलता मिलेगी। कार्य समय पर होने से संतोष रहेगा। व्यावसायिक श्रेष्ठता का लाभ मिलेगा। विरोधी आपका काम बिगाड़ने का प्रयत्न करेंगे।

राशि फलादेश मकर—
संचय की बात बनेगी। यात्रा हो सकती है। कार्यक्षेत्र में हितकारकों की पूर्ण कृपा रहेगी। क्रोध पर संयम आवश्यक है।

राशि फलादेश कुंभ—
स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा। कर्ज की चिंता कम होगी। अपने काम से काम रखें। पूर्व में किए गए कार्यों के लाभदायी परिणाम देखने को मिलेंगे। गृह उपयोगी वस्तुएँ क्रय करेंगे।

राशि फलादेश मीन—
आर्थिक सलाह उपयोगी रहेगी। मानसिक प्रसन्नता का वातावरण बनेगा। स्वयं के निर्णय लाभप्रद रहेंगे। व्यापार-व्यवसाय संतोषप्रद रहेगा। दांपत्य जीवन सुखमय रहेगा।

Religious importance of Five. [पञ्च का धार्मिक महत्व ]—–Vijay goyal

पंचदेव : सूर्य, गणेश , शिव , शक्ति और विष्णु ये पंचदेव कहलाते है. सूर्य को दो परिक्रमा, गणेश को एक, शक्ति को तीन, विष्णु की चार तथा शिव की आधी परिक्रमा की जाती है.

पंच उपचार पूजा : गंध, पुष्प, धुप, दीप, और नैवेध अर्पित करना पञ्च उपचार पूजा कहलाती है.

पंच पल्लव : पीपल, गुलर, अशोक, आम और वट के पत्ते सामूहिक रूप से पंच पल्लव के नाम से जाने जाते है.

पंच पुष्प : चमेली, आम, शमी (खेजड़ा), पदम (कमाल) और कनेर के पुष्प सामूहिक रूप से पंच पुष्प के नाम से जाने जाते है.

पंच गव्य : भूरी गाय का मूत्र (८ भाग), लाल गाय का गोबर (१६ भाग ), सफ़ेद गाय का दूध (१२ भाग), काली गाय का दही (१० भाग), नीली गाय का घी (८ भाग ) का मिश्रण पंच गव्य के नाम से जाना जाता है.

पंच गंध : चूर्ण किया हुआ, घिसा हुआ, दाह से खीचा हुआ, रस से मथा हुआ, प्राणी के अंग से पैदा हुआ , ये पंच गंध है.

पंचामृत : दूध, दही, घी, चीनी, शहद का मिश्रण पंचामृत है.

पंच मेवा : काजू, बादाम, किसमिस , छुआरा, खोपरागित (नारियल का खोपरा ), पंच मेवा है.

पंचांग : तिथि, वार, नक्षत्र, करण, और योग को सम्मिलित रूप से दर्शाया जाने वाली तालिका को पंचांग कहते है.

अगर हम ज्योतिष से हिसाब से सोचे तो सूर्य, चन्द्रे , राहू, केतु को छोड़ दे तो केवल पांच स्थूल ग्रह बचते है :
बुध, मंगल, शुक्र, बृहस्पति और शनि, यह पंच ग्रह है, इसी प्रकार पंच तत्त्व [आकाश, वायु, जल, अग्नि, भूमि ], भी ऊपर के पंच को सम्भोधित करते है.

Posted by: vastushastri08 | जून 5, 2011

 Lal Kitab Remedies—Vijay Goel

 Lal Kitab Remedies—Vijay Goel

Q.1 नौकरी बार बार छूट जाती है ?
Ans :- 10 साधुओं को हर साल खाना खिलाए पर उनको पैसे ना दें, 43 दिन तक गेंहू और गुड़ मिला कर उनके लड्डू बनाए और स्कूल के बच्चो को बाँटे, हर रोज केसर का तिलक माथे ज़ुबान और नाभि मे लगाए, 43 दिन तक तीन केले मंदिर मे दान दें

Q.2 बहुत इंटरव्यू दिए पर पास नही हो पाता, कोई ना कोई बात रह जाती है ?
Ans:- 43 दिन दो मुट्ठी सौंफ सरकारी संस्थान मे दान दें, 43 दिन पतीसा पिता को खिलाएँ, पिता को 7 रत्ती का मूँगा सोने मे डाल कर पहनाए

Q.3 सरकार के द्वारा परेशानी रहती है ?
Q.4 सरकारी कामो मे हाथ डालता हूँ, पर काम नही बनता ?
Ans:- राहु की वस्तु से परहेज करें जैसे काले नीले रंग से, आदित्या ह्रदय स्तोत्र का पाठ करें, बंदरो को गुड़ खिलाते रहे, मंदिर से पैसा उठा कर लाल कपड़े मे बाँध कर जेब मे रखे (तांबे का पैसा हो तो सही), हर सूर्या ग्रहण मे 4 नारियल 400 ग्राम साबुत बादाम जल प्रवाह करें, इन लोगो की पिता से नही बनती या इनके पिता किसी काबिल नही होते है |

Q. 5 घर मे रोज झगड़ा होता रहता है ?
Ans:- 43 दिन सिरहाने पानी रख कर कीकर के पेड़ मे डाले, 43 दिन 3 केले मंदिर मे दें, चाँदी के बर्तन मे गंगा जल और चाँदी का चकोर टुकड़ा डाल कर रखे, विद्वान या माता के पावं मे हाथ लगाकर आशीर्वाद ले, घर के उत्तर पूर्व कोने से संदूक, ट्रंक या किसी भी प्रकार की गंदगी हो तो हटा दे.

Q. 6 जो काम करता हूँ, पूरा नही होता ?
Ans:- 43 दिन गाय के घी का दीपक मंदिर मे जलाएँ, ज़मीन मे पैदा हुई सब्जी धार्मिक स्थान मे दे.

Q.7 मुझे रात को नींद नही आती है ?
Ans :- 2 किलो सौंफ सूती लाल कपड़े मे बाँध कर सोने वाले कमरे मे रखे, 2 किलो देसी खंड, लाल कपड़े मे बाँध रखें, हर रोज सिरहाने पानी रख कर सोए, और रोज किसी बड़े पेड़ मे डाल दे पिए नही, पूरब और उत्तर की तरफ सर रख कर ना सोए, 48 दिन 3 केले मंदिर मे दे, कुत्तो की सेवा करें, और कमर पावं मे दर्द हो तो उल्टे हाथ मे सोना शुरू करें.

Q. 8 उदास रहता हूँ ?
Ans :- हरे और नीले रंग से परहेज रखे, बुध और राहु की वस्तुएँ घर से निकालें, बुध राहु मार्तंड यंत्र गले मे डाले, 6 दिन के लिए नाक छेदन करवाएँ, सोना या चाँदी की तार या सफेद धागा नाक मे पहने, 6 दिन 6 कन्याओं को 6-6 साबुत बादाम दें.

Q.9 हमेशा डर लगा रहता है ?
Ans:- सोने वाले तकिये मे लाल रंग की फिटकरी रखे, 43 दिन नारियल बादाम मंदिर मे रखे या जल प्रवाह करे, जल्दी से कान छेदन करवा कर सोना धारण करें.

Q10 . मरने का डर लगता है ?
Ans :- 96 दिन के लिए नाक छेदन करवा कर चाँदी धारण करे, 43 दिन खाली मटका जल प्रवाह करें, लोहे का छल्ला बीच वाली उंगली मे धारण करे और तांबे के छेड़ वाला पैसा गले मे पहने.

Q.11 पढ़ाई मे मन नही लगता है ?
Ans :- 43 दिन 500 ग्राम दूध मंदिर मे दें, सूर्या अस्त के बाद दूध और चावल का इस्तेमाल ना करे, चाँदी के बर्तन मे गंगा जल रखे, हर रोज केसर का तिलक माथे ज़ुबान और नाभि मे करे, 43 दिन बड़ के पेड़ पर दूध चड़ा कर गीली मिट्टी का तिलक करे, हर गुरुवार और सोमवार को सफेद घोड़े या पीले घोड़े को चने की दाल खिलाएँ.

Q.12 किसी काम मे मन नही लगता है ?
Ans :- 43 दिन 500 ग्राम दूध मंदिर मे दें, सूर्य अस्त के बाद दूध और चावल का इस्तेमाल ना करे, चाँदी के बर्तन मे गंगा जल करें, हर रोज केसर का तिलक माथे ज़ुबान और नाभि मे करे, 43 दिन बड़ के पेड़ पर दूध चड़ा कर गीली मिट्टी का तिलक करे, हर गुरुवार और सोमवार को सफेद घोड़े या पीले घोड़े को चने की दाल खिलाए.

Q.13 सब से अधिक अपने आपको ग़रीब बेसहारा समझता हूँ ?
Ans :- हर सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण पर 4 नारियल और 400 ग्राम साबुत बादाम जल प्रवाह करें, घर के उत्तर पूर्व मे पानी का कुंभ लगाएँ, चाँदी तन मे धारण करें, हर शुक्रवार अपने वजन के बराबर हरा चारा गाए को खिलाए, हर रोज इत्र का इस्तेमाल करें, हर रोज नहा कर साफ़ कपड़े प्रेस किए हुए पहने, हर रोज उगते हुए सूरज के सामने खड़े हों.

Q.14 कुछ ऑपर्चुनिटी मिलती है, पर डर के कारण उसको ले नही पाता?
Ans :- अंडर गारमेंट मे पीले रंग के कपड़ो का इस्तेमाल करें, पीले कपड़ो मे 9 लाल मिर्च बांद कर घर में कील पर टाँगे, 43 दिन फिटकरी से दाँत सॉफ करन.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 11, 2011

Spiritual Remedies for Marriages.—Vijay Goel

Spiritual Remedies for Marriages.—Vijay Goel

We give hereunder some of the ancient mantras for the benefit of the readers whose marriage get delayed due to various reasons. With the blessings of Goddess Durga Devi, I give some mantras which should be recited with utmost devotion and faith to get their wish fulfilled.

KATYAYANI MANTRA
‘Katyayani Mahamaye
Mahayoginiyadheeshwari
Nand Gop Sutam Devi Patim Me
Kuru te Namah’
This prayer should be recited a number of times according to one’s convenience by unmarried girls whose wishes will be fulfilled early.

PARVATI SWAYAMVAR MANTRA
‘Ballarkayutsatprabhaam kartale
lolbru malakulam
Malamsanddahatim manohartanum
Mandsmitadhomukheem
Mandam mandmupesushee
Bariyitum shambhum jaganmohimim
Vanditpadamishtarthadaam
Parvateem’
This sloka should be recited every Friday evening regularly with utmost devotion. The natives get the desired husband early.

VIVAH SIDDHIDAYAKA MANTRA
‘ Om vahri presyasi swaha’
This mantra should be recited ten thousand times and should be started on an auspicious day without Durmuhurtam or Varjam and should be continued till Navaratri.

SWAYAMVARKALA MANTRA
‘Om hreem yogini yogini yogeshwari
yogeshwari yog bhayankari
Sakalsthavarjangmasya mukham
Hradyam mum ashmakarshayakarshaya
Swaha’
This mantra should be recited ten thousand times and should be started on an auscipicious day without Durmuhurtam or Varjam.

BHAGVATI MANTRA
‘Haristvamaradhya pranatjana
saubhagya jannim Pura nari
bhootwa pur ripumpi
Kshobhmanayt Samroapi twam
Natwa ratinayanlehyen vapusha
Muninamapyantah prabhavati hi
Mohay mahataam’

PARVATI MANTRA
‘Sudhamapyaswadya pratibhaya jara
mrituharini
vidhishatamkhadya divishadah
Karlam yatkshvelam kavalitvatah
Kaalkalana
Na shambhostanmoolam tav janani
Tatakmahima’

VED MANTRAS
‘Sa devi nityam paritapyamanah
twameva seetetyabhibhaashanah
Dradhvrato rajsuto mahatma tavalva
Laabhaya kratpraytnah’

PRITHVI MANTRA
‘mahamaha Indro ya ojasa parjanyo
vrashtim tamarind iv
upayaamgraheetosi
mahendrayatwesh tey
yonimmahindraya twa’

AMBA MANTRA
‘Om Ambe Ambike Ambalike na
Manayati Kashchana
Sasatyashwakah Subhadrikam
Kampeelvasinim’

For Male Natives

Durga mantra
‘Patneem Manoramaam Dehi
Manovratanusarineem
Tarineem Durg Sansara Sangarasya
Kulodbhavaam

SUCHI DEVI MANTRA
‘ Om devendirani Namstubhyam
Devendra Priya Bhamini
Vivaham Bhagyamarogyam
Sheeghram labham cha Dehi me’

VIJAYA SUNDARI MANTRA
‘Om Vijayasundari kleem’
Mantra for Sreegrha (Fast) Marriages and to avoid delays in Marriage

“Om Devemdrani Namastubyam
Devendra priyabhamini
Vivaha Bhagyam Arogyam
Sreeghra labhincha Dehime”
The unmarried girls and boys whose marriage proposals are being get delayed due to various reasons are advised to recite the above mantra with utmost faith at recite the same at least 21 times daily or 108 times daily to fulfill their desire. This mantra is also useful for those who want to go for second marriage may be benefited.
Especially, on Tuesdays, this mantra should be recited at least 108 times for 41 days regularly and feed red grams with jaggary to the cow as food will give faster results.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 11, 2011

For Happy Marriage life : Mangala Gouri Vrat—VIJAY GOEL

For Happy Marriage life : Mangala Gouri Vrat—VIJAY GOEL

Mangala Gauri Puja or Mangal Gowri Vrata is observed on Shravan Mangalvars (Tuesdays during Shravan month).
Mangala Gauri Vrat is dedicated to Goddess Mangala Gauri, who is popularly known as Goddess Parvati Devi.
The Mangla Gari Vrat is observed on every Tuesday of the month of Shravan, around July-August. As Mondays of this month are the day for worship of Lord Shiva. The Tuesday of this month are the adoration of Mangla Gauri (one of the nine Durga Shobshi). This Fast is only observed by women. Mainly this is done for 16 or 20 Tuesdays. This vrat is dedicated to Goddess Parvati.

Mangala Gouri Vrat is observed by married women for the good health and long life of the husband. They will be blessed with wealth and good children.

Mangala Gauri Vratam is observed by married women for first five years after their marriage and the final year puja is concluded with Shravana Mangala Gouri Vrata Udhyapana.

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Shri Gauri Astottara Satanamavali or 108 names of Mangala Gowri is the stotram to recite during Gauri Puja, especially on Mangala Gauri Puja, Maha Gouri Puja or Shodasa Gauri Puja.

Devotees recite Gouri Astottaram on every Friday.

Om Murari priyardhamgyai namah
Om Putra poutra varapradayai namah
Om Punyayai namah
Om Krupa prurnayai namah
Om Kalyanyai namah
Om Anchit yayai namah
Om Tripurayai namah
Om Trigunam bikayai namah
Om Purushardha pradayai namah
Om Satya dharma ratayai namah
Om Sarva sakshinyai namah
Om Shashamka rupinyai namah
Om Sarasvatyai namah
Om Virajayai namah
Om Svahayai namah
Om Svadhayai namah
Om Pratyamgi rambikayai namah
Om Aaryayai namah
Om Dakshaenyai namah
Om Deekshayai namah
Om Sarvottamotta mayai namah
Om Shivabhinama deyayai namah
Om Sreevidyayai namah
Om Pranavardha svarupinyai namah
Om Hrinkaryai namah
Om Naada rupayai namah
Om Sundaryai namah
Om Shodashakshara devatayai namah
Om Mahagouryai namah
Om Shyamalayai namah
Om Chandyai namah
Om Bhaga malinyai namah
Om Bhagalayai namah
Om Matrukayai namah
Om Shulinyai namah
Om Amalayai namah
Om Annapurnayai namah
Om Akhilagama samstut yayai namah
Om Ambayai namah
Om Bhanukoti sandyatayai namah
Om Parayai namah
Om Seetamshu kruta shekha rayai namah
Om Sarvakala sumangalyai namah
Om Soma shekharyai namah
Om Amara samsev yayai namah
Om Amrutai shvaryai namah
Om Sukha sachi chudara sayai namah
Om Balyaradita bhutidayai namah
Om Hiranyayai namah
Om Sukshmayai namah
Om Haridra kumkuma radhyayai namah
Om Sarvabhoga pradayai namah
Om Markandeya varapradayai namah
Om Sree nityagouree devatayai namah
//108//
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Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 11, 2011

विशेष उपाय : More General Remedies.–Vijay Goel

विशेष उपाय : More General Remedies.–Vijay Goel

उपाय विशेष :

घर में सुख-शान्ति न हो तो पीपल पर सरसों के तेल का दीया जलाना और जला कर काले माह (उड़द ) के तीन दाने दीये में डालना चाहिए, ऐसा तीन शनिवार शाम को करें।

दुर्घटना या सर्जरी का भय हो तो तांबें के बर्तन में गुड़ हनुमान जी के मन्दिर में देने से बचाव होता है और अगर सरसों के तेल का दीया वहीं जलाये और वहीं बैठ कर हनुमान चालीसा पढ़े और हलवा चढाये तो काफ़ी बचाव होता है, ऐसा चार मंगलवार रात्रि करें।

बहन भाईओं से कोई समस्या हो तो सवा किलो गुड़ जमीन में दबाने से समझौता होता है, ऐसा मंगलवार को करें।

बच्चों की पढ़ाई के लिए सवा मीटर पीले कपडें में २ किलो चने की दाल बांधकर लक्ष्मी-नारायण जी के मन्दिर में चढाये, ऐसा पाँच शाम वीरवार को करें।

कमर, गर्दन में तकलीफ रहती हो तो दोनों पैरों के अंगूठे में काला सफ़ेद धागा बांधें।

मूलांक से कीजिये रंगों का चयन और जानिए रोग का कारण—

मूलांक 1 से 9 होते हैं। प्रत्येक मूलांक के लिए कुछ विशेष रंग निर्धारित हैं जो व्यक्ति के भाग्य को ‘सपोर्ट’ करते हैं और उसे सफलता दिलाते हैं।

मूलांक 1 : हलका पीला, भूरा, सुनहरा रंग इनके लिए विशेष शुभ है।
मूलांक 2 : सफेद, क्रीम, हलका व गहरा हरा रंग इन्हें शुभता देता है। काले, बैंगनी, गहरे रंग न पहनें।
मूलांक 3 : बैंगनी, जामुनी, पीला, नीला, रंग इनके लिए विशेष है। इसके अलावा गाढ़े रंगों से बचना चाहिए।
मूलांक 4 : चमकदार नीला रंग इनके लिए विशेष है। इसके अलावा गाढ़े रंगों से बचना चाहिए।
मूलांक 5 : सभी हलके रंग (भूरे-क्रीम-सफेद-गुलाबी) पहनें। गाढ़ें रंगों से बचें।
मूलांक 6 : नीला, आसमानी, नेवी ब्लू, गुलाबी रंग इनके लिए शुभ हैं। गहरे लाल रंग से बचें।
मूलांक 7 : इनके लिए हरे, सफेद, पीले व सुनहरे रंगों के शेड्‍स उपयुक्त हैं। काले-नीले रंग से बचें।
मूलांक 8 : गहरे नीले, गहरे भूरे, स्लेटी व बैंगनी के सारे शेड्‍स अच्छे रहते हैं। हलके रंग इन्हें ‘डिप्रेस’ करेंगे।
मूलांक 9 : लाल, गुलाबी, बैंगनी रंग व गहरे शेड्‍स इनके लिए सही हैं। पीला-नारंगी रंग न पहनें।

विशेष : कई बार दिन के अनुसार ‘स्पेसीफिक रंग’ पहनना संभव नहीं होता। ऐसे में उस रंग का रूमाल, पर्स, टाई या हाथ में बँधा धागा इसका बेहतर उपाय हो सकता है। कार्य की शुभता के लिए इसे अपनाना चाहिए।
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मूलांक के आधार पर संभावित रोगों को जाना जा सकता है व उनके लिए सावधानी बरती जा सकती है।

1. मूलांक 1 : रक्तचाप, हृदय रोग व आँखों से संबंधित रोग हो सकते हैं।
2. मूलांक 2 : पेट तथा पाचन की गड़बड़ी, ट्‍यूमर, फोड़ा, कान व श्वास के रोग हो सकते हैं।
3. मूलांक 3 : मानसिक तनाव, तंत्रिकाओं में सूजन, सायटिका व त्वचा रोग हो सकते हैं।
4. मूलांक 4 : मानसिक असंतुलन, मनोरोग, रक्ताल्पता, सिर दर्द, मूत्राशय के रोग हो सकते हैं।
5. मूलांक 5 : अनिद्रा, आँखों के रोग, नर्वस ब्रेक डाउन, लकवा आदि रोग संभावित होते हैं।
6. मूलांक 6 : गले, नाक व फेफड़ों के रोग, रक्त संचार व हृदय रोग की संभावना होती है।
7. मूलांक 7 : फोड़े-फुंसी, मस्से, बवासीर, मानसिक रोग, रक्तचाप व पाचन समस्या होती है।
8. मूलांक 8 : सिरदर्द, गठिया, आँतों के रोग व लिवर की कमजोरी रह सकती है।
9. मूलांक 9 : खसरा, बुखार, इन्फेक्शन, रक्त की कमी, त्वचा पर धब्बे आदि समस्याएँ हो सकती हैं।

सपने बताते हे आपका स्वास्थ्य -(शुभ -अशुभ )–

हम रोजमर्रा की जिंदगी से अलग जो कुछ सपनों में देखते है, उसके कुछ न कुछ अर्थ या परिणाम जरूर होता है। सपने दिन और रात में दिखाई देते हैं, लेकिन राते के सपने भावी घटनाओं का पूर्वाभास देते हैं।

स्वप्न विज्ञान में इन सपनों की विस्तार से व्याख्या की गई है।

- सपने में आकाश, ध्रुव, तारा, ग्रहण, सूर्य दर्शन या स्वर्ण आदि दिखाई पड़ना शारीरिक कष्‍ट का द्योतक है।

- मानवीय शरीर का स्थूल से सूक्ष्म होना अथवा सूक्ष्म से स्थूल होना, पैर के स्थान पर हाथ से चलना, जानवरों की तरह चलना, वाणी मानवीय न होकर पशु या पक्षी की तरह सुनाई देना, घास खाना या पशु के समान आहार लेना, पक्षी की तरह चुगना या दृश्‍य अगर सपने में दिखाई दे तो स्वास्थ्य में किसी प्रकार की समस्या आने का लक्षण है।

- किसी वस्तु को फोड़ते हुए देखना या किसी सामग्री को ‍स्वयं के द्वारा काटना, चीरना या सिलना आदि के दृश्य सपने में दिखाई दे तो शल्य क्रिया (ऑपरेशन) की संभावना बनती है।

- स्वप्न में विषैले जीव दिखाई देना अपच रोग होना का द्योतक है।

- विषधारी जीव के साथ गमन करना, खेलना अथवा उनके साथ सोने का दृश्य देखने से दुर्घटना होने की संभावना बनती है।

सपने में लाल वस्तुओं का दिखाई देना, उनका क्रय-विक्रय करना, रक्तिम तरल पदार्थ का क्रय-विक्रय करना, लाल रंग की किसी भी वस्तु का तीव्र गति से गमन करते हुए या घूमते हुए दिखाई देने की स्थिति यदि स्वप्न में दिखाई पड़े तो रक्त प्रकृति के रोग होने की संभावना बनती है।

सपने देखना एक सहज प्रवृत्ति है। जब व्यक्ति को दिनचर्या में हुए क्रियाकलाप से पृथक प्रकार के दृश्य सपने में दिखाई देने लगे तो उसका कुछ न कुछ परिणाम अवश्‍य रहता है। सामान्यत: दिन में देखे गए सपनों का कोई फल नहीं मिलता है, किंतु रात्रि के उत्तरार्द्ध के उपरांत दिखाई देने वाला सपना भावी घटना का पूर्वाभास कराता है।

- अग्नि में जलना, आग में से‍ निकलना, हवन के अतिरिक्त किसी अन्य आग की लपटों को देखना, अग्निकांड के दृश्य दिखाई देना, अग्नि को प्रज्ज्वलित करना, किसी चीज को अग्नि में जलाना आदि दिखाई दे तो शरीर में पित्त प्रकृति के रोग होने की आशंका बनती है।

- नदी, तालाब आदि में स्नान करना, पानी में डूबना, पानी पीना, पानी का छिड़काव करना, तैरना, बर्फीले मार्ग पर चलना, ओले या बर्फ गिरते हुए देखना, नाव चलाना, जल में गमन करने वाली वस्तुओं में किसी भी प्रकार से अपने आपको संबो‍धित करते हुए दिखाई देने वाले स्वप्न बार-बार दिखाई देने से शरीर में शीत या कफ प्रकृति के रोग होने का योग बनता है।

- हवा में उड़ना, हवाई यात्रा करना, हवाई वाहनों को चलाना, बहुत ऊपर से नीचे गिरना, नीचे से उड़कर ऊपर जाना, पंतग उड़ाना, गुब्बारे देखना या उनसे खेलना, पैराशूट का लुफ्त उठाना, जमीन से ऊपर उठना, किसी के साथ हवा में गोते लगाना ‍आदि सपने दिखाई दें तो वात प्रकृति के रोग होने की आशंका बनती है।

यदि इस प्रकार के स्वप्न दिखाई दे तो स्वप्न के उपरांत पुन: सो जाने से उसकी अशुभता में कमी आती है।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 11, 2011

ज्योतिष की प्रमुख विधाएं –

ज्योतिष की प्रमुख विधाएं –

भारतीय ज्योतिष शास्त्र में अलग-अलग तरीके से भाग्य या भविष्य बताया जाता है। माना जाता है कि भारत में लगभग 150 से ज्यादा ज्योतिष विद्या प्रचलित हैं। प्रत्येक विद्या आपके भविष्य को बताने का दावा करती है। माना यह ‍भी जाता है कि प्रत्येक विद्या भविष्य बताने में सक्षम है, लेकिन उक्त विद्या के जानकार कम ही मिलते हैं, जबकि भटकाने वाले ज्यादा। मन में सवाल यह उठता है कि आखिर किस विद्या से जानें हम अपना भविष्य, प्रस्तुत है कुछ प्रचलित ज्योतिष विद्याओं की जानकारी।

1. कुंडली ज्योतिष :- यह कुंडली पर आधारित विद्या है। इसके तीन भाग है- सिद्धांत ज्योतिष, संहिता ज्योतिष और होरा शास्त्र। इस विद्या के अनुसार व्यक्ति के जन्म के समय में आकाश में जो ग्रह, तारा या नक्षत्र जहाँ था उस पर आधारित कुंडली बनाई जाती है।

बारह राशियों पर आधारित नौ ग्रह और 27 नक्षत्रों का अध्ययन कर जातक का भविष्य बताया जाता है। उक्त विद्या को बहुत से भागों में विभक्त किया गया है, लेकिन आधुनिक दौर में मुख्यत: चार माने जाते हैं। ये चार निम्न हैं- नवजात ज्योतिष, कतार्चिक ज्योतिष, प्रतिघंटा या प्रश्न कुंडली और विश्व ज्योतिष विद्या।

2. लाल किताब की विद्या :- यह मूलत: उत्तरांचल, हिमाचल और कश्मीर क्षेत्र की विद्या है। इसे ज्योतिष के परंपरागत सिद्धांत से हटकर ‘व्यावहारिक ज्ञान’ माना जाता है। इसे बहुत ही कठिन विद्या माना जाता है। इसके अच्‍छे जानकार बगैर कुंडली को देखे उपाय बताकर समस्या का समाधान कर सकते हैं। उक्त विद्या के सिद्धांत को एकत्र कर सर्वप्रथम इस पर एक ‍पुस्तक प्रकाशित की थी जिसका नाम था ‘लाल किताब के फरमान’। मान्यता अनुसार उक्त किताब को उर्दू में लिखा गया था इसलिए इसके बारे में भ्रम उत्पन्न हो गया।

3. गणितीय ज्योतिष :- इस भारतीय विद्या को अंक विद्या भी कहते हैं। इसके अंतर्गत प्रत्येक ग्रह, नक्षत्र, राशि आदि के अंक निर्धारित हैं। फिर जन्म तारीख, वर्ष आदि के जोड़ अनुसार भाग्यशाली अंक और भाग्य निकाला जाता है।

4. नंदी नाड़ी ज्योतिष :- यह मूल रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित विद्या है जिसमें ताड़पत्र के द्वारा भविष्य जाना जाता है। इस विद्या के जन्मदाता भगवान शंकर के गण नंदी हैं इसी कारण इसे नंदी नाड़ी ज्योतिष विद्या कहा जाता है।

5. पंच पक्षी सिद्धान्त :- यह भी दक्षिण भारत में प्रचलित है। इस ज्योतिष सिद्धान्त के अंतर्गत समय को पाँच भागों में बाँटकर प्रत्येक भाग का नाम एक विशेष पक्षी पर रखा गया है। इस सिद्धांत के अनुसार जब कोई कार्य किया जाता है उस समय जिस पक्षी की स्थिति होती है उसी के अनुरूप उसका फल मिलता है। पंच पक्षी सिद्धान्त के अंतर्गत आने वाले पाँच पंक्षी के नाम हैं गिद्ध, उल्लू, कौआ, मुर्गा और मोर। आपके लग्न, नक्षत्र, जन्म स्थान के आधार पर आपका पक्षी ज्ञात कर आपका भविष्य बताया जाता है।

6. हस्तरेखा ज्योतिष :- हाथों की आड़ी-तिरछी और सीधी रेखाओं के अलावा, हाथों के चक्र, द्वीप, क्रास आदि का अध्ययन कर व्यक्ति का भूत और भविष्य बताया जाता है। यह बहुत ही प्राचीन विद्या है और भारत के सभी राज्यों में प्रचलित है।

7. नक्षत्र ज्योतिष :- वैदिक काल में नक्षत्रों पर आधारित ज्योतिष विज्ञान ज्यादा प्रचलित था। जो व्यक्ति जिस नक्षत्र में जन्म लेता था उसके उस नक्षत्र अनुसार उसका भविष्य बताया जाता था। नक्षत्र 27 होते हैं।

8. अँगूठा शास्त्र :- यह विद्या भी दक्षिण भारत में प्रचलित है। इसके अनुसार अँगूठे की छाप लेकर उस पर उभरी रेखाओं का अध्ययन कर बताया जाता है कि जातक का भविष्य कैसा होगा।

9. सामुद्रिक विद्या:- यह विद्या भी भारत की सबसे प्राचीन विद्या है। इसके अंतर्गत व्यक्ति के चेहरे, नाक-नक्श और माथे की रेखा सहित संपूर्ण शरीर की बनावट का अध्ययन कर व्यक्ति के चरित्र और भविष्य को बताया जाता है।

10. चीनी ज्योतिष :- चीनी ज्योतिष में बारह वर्ष को पशुओं के नाम पर नामांकित किया गया है। इसे ‘पशु-नामांकित राशि-चक्र’ कहते हैं। यही उनकी बारह राशियाँ हैं, जिन्हें ‘वर्ष’ या ‘सम्बन्धित पशु-वर्ष’ के नाम से जानते हैं।

यह वर्ष निम्न हैं- चूहा, बैल, चीता, बिल्ली, ड्रैगन, सर्प, अश्व, बकरी, वानर, मुर्ग, कुत्ता और सुअर। जो व्यक्ति जिस वर्ष में जन्मा उसकी राशि उसी वर्ष अनुसार होती है और उसके चरित्र, गुण और भाग्य का निर्णय भी उसी वर्ष की गणना अनुसार माना जाता है।

11. वैदिक ज्योतिष :- वैदिक ज्योतिष अनुसार राशि चक्र, नवग्रह, जन्म राशि के आधा‍र पर गणना की जाती है। मूलत: नक्षत्रों की गणना और गति को आधार बनाया जाता है। मान्यता अनुसार वेदों का ज्योतिष किसी व्यक्ति के भविष्य कथक के लिए नहीं, खगोलीय गणना तथा काल को विभक्त करने के लिए था।

12. टैरो कार्ड :- टैरो कार्ड में ताश की तरह पत्ते होते हैं। जब भी कोई व्यक्ति अपना भविष्य या भाग्य जानने के लिए टैरो कार्ड के जानकार के पास जाता है तो वह जानकार एक कार्ड निकालकर उसमें लिखा उसका भविष्य बताता है।

यह उसी तरह हो सकता है जैसा की पिंजरे के तोते से कार्ड निकलवाकर भविष्य जाना जाता है। यह उस तरह भी है जैसे कि बस स्टॉप या रेलवे स्टेशन पर एक मशीन लगी होती है जिसमें एक रुपए का सिक्का डालो और जान लो भविष्य। किसी मेले या जत्रा में एक कम्प्यूटर होता है जो आपका भविष्य बताता है।

उपरोक्त विद्या जुए-सट्टे जैसी है यदि अच्छा कार्ड लग गया तो अच्छी भविष्यवाणी, बुरा लगा तो बुरी और सामान्य लगा तो सामान्य। हालाँकि टैरो एक्सपर्ट मनोविज्ञान को आधार बनाकर व्यक्ति का चरित्र और भविष्य बताते हैं। अब इसमें कितनी सच्चाई होती है यह कहना मुश्किल है।

इसके अलावा माया, हेलेनिस्टिक, सेल्टिक, पर्शियन या इस्लामिक, बेबिलोनी आदि अनेक ज्योतिष धारणाएँ हैं। हर देश की अपनी अलग ज्योतिष धारणाएँ हैं और अलग-अलग भविष्यवाणियाँ।

अशुभ सूर्य देता है नौकरी में कष्ट — पं. अशोक पँवार ‘मयंक’

दशम भाव जन्मकुण्डली में महत्वपूर्ण माना गया है। इस भाव से कर्म क्षेत्र, पिता, व्यापार, उच्च नौकरी, राजनीति, मंत्री पद आदि का विचार किया जाता है। यह भाव खराब हो या अशुभ प्रभाव में हो या अशुभ ग्रहों से दृष्ट हो, नीच के ग्रहों के साथ हो तो वह जातक भटकता ही रहता है। इस भाव में अशुभ सूर्य की स्थिति अनेक बाधाओं का कारण बनती है।

जब सूर्य नीच का हो तो वह पिता का सहयोग नहीं पाता, राजनीति में हो तो असफलता का मुँह देखना पड़ता है। व्यापार में हो तो अनेक बाधाएँ आती रहती हैं, नौकरी में परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस भाव में सूर्य के साथ शनि हो तो पिता-पुत्र में नहीं बनती, सूर्य के साथ राहु होने पर पितृ दोष रहता है व उसके कार्य में बाधा आती रहती है।

सूर्य चन्द्र की स्थिति अमावस्या योग होने से भी उस भाव से संबंधित मामलों मे रुकावटों का सामना करना पड़ता है। शनि की सूर्य पर दृष्टि भी शुभ नहीं कही जा सकती। इस भाव में उच्च का सूर्य प्रत्येक क्षेत्र में उत्तम सफलतादायक होता है वहीं स्वराशिस्थ सूर्य भी उत्तम परिणाम देने वाला होता है।

सूर्य के साथ गुरु का होना अनेक प्रकार से लाभदायक होता है, ऐसा जातक राजनीति में भी सफल होता है। उच्च पदाधिकारी भी बन सकता है, पिता का उसे भरपूर सहयोग भी मिलता है। सूर्य- मंगल साथ हो तो उसको पुलिस प्रशासन में अच्छी सफलता मिल सकती है। सूर्य के साथ बुध का होना भी कई मायनों में उत्तम परिणामदायक होता है। ऐसा जातक विद्वान, उच्च प्रशासनिक सेवाओं में भी हो सकता है।

इस भाव में अशुभ सूर्य हो तो पवित्र नदी में ताँबे का सिक्का बहाएँ, काले, नीले रंगों का प्रयोग ना करें। अपनी परेशानी दूसरे को न बताएँ। घर के पूर्वोत्तर में नल या जल का स्रोत कायम करें। अपने पिता का सम्मान करें व प्रातः सूर्य को दूध-मिश्री मिला जल चढ़ाएँ। इस प्रकार सूर्य के अशुभ प्रभाव को कम किया जा सकता है।

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 11, 2011

सुख और सफलता

जीवन में सुख और सफलता पाना हर मनुष्य का सपना होता है। एस्ट्रो में ऐसे कितने ही सरल उपाय है जिन्हें नियमित रूप से करके आप आसानी से सुख की प्राप्ति कर सकते है। आइए ऐसे ही कुछ उपायों की चर्चा करे :—

- घर का हर व्यक्ति सूर्योदय के पहले उठे और उगते सूर्य के दर्शन करे। इसी समय जोर से गायत्री मंत्र का उच्चारण करे तो घर के वास्तु दोष भी नष्ट हो जाते है।
- सूर्य दर्शन के बाद सूर्य को जल, पुष्प और रोली-अक्षत का अर्घ्य दे, सूर्य के साथ त्राटक करे।
- बिस्तर से उठते समय दोनों पैर जमीन पर एक साथ रखे, उसी समय इष्ट का स्मरण करे और हाथों को मुख पर फेरे।
- स्नान और पूजन सुबह 7 से 8 बजे के बीच अवश्य कर ले।
- घर में तुलसी और आक का पौधा लगाए और उनकी नियमित सेवा करे।
- पक्षियों को दाना डाले।
- शनिवार और अमावस्या को सारे घर की सफाई करें, कबाड़ बाहर निकले और जूते-चप्पलों का दान कर दे।
- स्नान करने के बाद स्नानघर को कभी गंदा न छोड़े।
- जितना हो सके भांजी और भतीजी को कोई न कोई उपहार देते रहे। किसी बुधवार को बुआ को भी चाट या चटपटी वस्तु खिलाएँ।
- घर में भोजन बनते समय गाय और कुत्ते का हिस्सा अवश्य निकाले।
- बुधवार को किसी को भी उधार न दे, वापस नहीं आएगा।
- राहू काल में कोई कार्य शुरू न करें।
- श्री सूक्त का पाठ करने से धन आता रहेगा।
- वर्ष में एक या दो बार घर में किसी पाठ या मंत्रोक्त पूजन को ब्राह्मण द्वारा जरूर कराए।
- स्फटिक का श्रीयंत्र, पारद शिवलिंग, श्वेतार्क गणपति और दक्षिणावर्त शंख को घर या दुकान आदि में स्थापित कर पूजन करने से घर का भण्डार भरा-पूरा रहता है।
- घर के हर सदस्य को अपने-अपने इष्ट का जाप व पूजन अवश्य करना चाहिए।
- जहाँ तक हो सके अन्न, वस्त्र, तेल, कंबल, अध्ययन सामग्री आदि का दान करें। दान करने के बाद उसका उल्लेख न करें।
- अपने राशि या लग्न स्वामी ग्रह के रंग की कोई वस्तु अपने साथ हमेशा रखे।

कैसे देखें तलाक और पुनर्विवाह योग—-

तलाक :–
सप्तम स्थान, शुक्र व सप्तमेश पाप प्रभाव में हो, सप्तम स्थान में मंगल, शनि, राहु, केतु, हर्षल, नेपच्यून जैसे ग्रहों की दृष्टि हो या ये ग्रह सप्तम स्थान से रहित हो तो वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण होकर तलाक तक की नौबत आती है। विशेष कर राहु-केतु, मंगल, नेपच्यून तलाक व संबंध विच्छेद कराते हैं।

अकेला शनि (निर्बल) तलाक तो नहीं कराता मगर वैवाहिक जीवन को नारकीय बना देता है।

पुनर्विवाह योग :–
पुनर्विवाह देखने के लिए नवम स्थान का विचार किया जाता है। सप्तम स्थान व शुक्र पाप प्रभाव में हो, मगर नवम स्थान शुभ हो, प्रबल हो तो पुनर्विवाह योग बन जाता है। विशेषकर यदि शुक्र राहु-केतु-नेपच्यून के साथ हो तो वैवाहिक जीवन में दरार-संशय निर्माण हो, पुनर्विवाह योग बनाता है।

विशेष :–
यह ध्यान रखना चाहिए कि मंगल, राहु, केतु, नेपच्यून तीव्र गति से कार्य करते हैं अर्थात शीघ्र बुरा-अच्‍छा फल देते हैं मगर शनि देर से प्रभाव दिखाता है। यदि शुक्र व बुध नवम भाव के स्वामी हो तो पुनर्विवाह योग जल्दी बनता है।
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लेखक बनाती है बुध-शनि युति —

बुध व शनि मित्रग्रह हैं। इनकी युति-प्रतियुति या केंद्र योग शुभ फल देने वाला होता है। ये व्यक्ति सुलझी हुई व गहरी सोच रखने वाले होते हैं। हर बात को विचार कर फिर कहना इनके स्वभाव में होता है।

इस युति के प्रभाव से व्यक्ति लेखन कार्य में रूचि लेता है। उपन्यासकार, इतिहासकार, प्रकाशक, संशोधक, आलोचक, भाषा शिक्षक व लेखकों आदि की कुंडली में यह युति प्रमुखता से देखने में आती है। ये व्यक्ति व्यावसायिक बुद्धि भी रखते हैं। अत: लिखे गए साहित्य को प्रकाशित कैसे किया जाए, यह जुगत लगाने में भी कुशल होते हैं।

समाज में इन व्यक्तियों को मान-सम्मान मिलता है। हाँ, धन की आकस्मिकता रह सकती है। यदि बुध-शनि पर पाप प्रभाव हो तो कार्यों में विलंब तथा श्रवण व वाणी दोष संभव है। ऐसे में बुध व शनि को मजबूत करने के उपाय करना चाहिए।

विशेष : बुध-शनि युति यदि शुभ हो तो इन व्यक्तियों को साढ़ेसाती काल में अत्यंत शुभ फल मिलते हैं।

जीवन की उमंग और उत्साह का त्योहार वैशाखी—Sunil Kuamr Chaube—

भारतीय संस्कृति अनेकता में एकता का मूल भाव ही पूरी दुनिया को भारत के करीब लाता है। इसी मूल भावना को मजबूत करने वाले अलग-अलग धर्मों के अनेक त्योहार यहां साल भर मनाए जाते हैं। वैशाखी एक ऐसा ही राष्ट्रीय त्योहार है। जिसे देश के विभिन्न भागों में रहने वाले सभी धर्मपंथ के लोग अलग-अलग तरीके से मनाते हैं।

जहां हिंदू धर्म पंचांग के अनुसार यह त्योहार मेष संक्रांति एवं वैशाख मास के प्रारंभ होने पर मनाया जाता है। वहीं देश के पंजाब प्रांत में और सिक्ख धर्मावलंबियों के बीच यह त्योहार बहुत उत्साह और उमंग से मनाया जाता है। सिक्ख समाज के लिए यह त्योहार धार्मिक एवं सामाजिक दृष्टि से बहुत महत्व रखता है।

सिक्ख धर्म के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने वैशाखी के दिन ही खालसा-पंथ की नींव डाली। ‘खालसा’ खालिस शब्द से बना है। जिसका अर्थ होता है- शुद्ध, पावन या पवित्र। खालसा-पंथ की स्थापना के पीछे गुरु गोविंद सिंह का मुख्य लक्ष्य लोगों को तत्कालीन मुगल शासकों के अत्याचारों से मुक्त कर उनके धार्मिक, नैतिक और व्यावहारिक जीवन को श्रेष्ठ बनाना था। इस पंथ के द्वारा गुरु गोविंद सिंह ने लोगों को धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव छोड़कर इसके स्थान पर मानवीय भावनाओं को आपसी संबंधों में महत्व देने की भी दृष्टि दी। इसलिए छुआछूत की भावना को खत्म करने के उद्देश्य से ही उन्होंने वैशाखी के पवित्र दिन ही श्री गुरु गोविंद सिंह ने पंजाब के श्री केशगढ़, आनंदपुर साहिब में अपने चेलो, जो पंच प्यारे के नाम से प्रसिद्ध हैं और अलग-अलग जाति के थे, को अमृत पिलाया और उन चेलों के हाथों स्वयं अमृत पीकर सिंह नामक उपाधि प्राप्त की। साथ ही उन्होंने अपने गुरु का पद छोड़कर गुरुग्रंथ साहिब को सर्वोपरी मानकर गद्दी पर रख नई परंपरा की शुरुआत की। इस प्रकार इस शुभ दिन से ही गुरु गोविंद सिंह ने सिक्ख धर्म के साथ ही पूरे मानव समाज की धार्मिक, सामाजिक विचारधारा को नई दिशा दी।

इस दिन गुरुद्वारों में विशेषकर आनंदपुर साहिब में अरदास, शबद कीर्तन सहित कड़ा प्रसाद का वितरण, लंगर आदि विशेष धार्मिक आयोजन किये जाते हैं।

सामाजिक दृष्टि से विचार करें तो पंजाब देश का मुख्य कृषि प्रधान प्रांत है। जहां गेंहू की पैदावार काफी अधिक मात्रा में होती है। अत: इस क्षेत्र के अनके लोगों की आजीविका खेती से जुड़ी है। यही कारण है कि जब भी रबी की फसल पककर तैयार होती है, तब यहां पर उमंग और उत्साह का माहौल बन जाता है। वैशाखी पर्व पर यह सभी लोग मिलकर अच्छी फसल होने की खुशी को एक-दूसरे से बांटते हैं। इस पर्र्व पर सभी विशेष रूप से पंजाब का लोकनृत्य भांगड़ा और गिद्दा करते हैं। वास्तव में इन नृत्यों के पीछे भाव यही होता है कि सालभर की कड़ी मेहनत के बाद अच्छी फसल के रूप में जो सुपरिणाम मिला, अब उसकी कटाई के बाद सारी थकान मिटाकर आने वाले मौसम के लिए तन और मन को एक नई ऊर्जा से भरा जाए। ऐसा कर वे अपनी प्रसन्नता को इस अवसर पर प्रकट करते हैं। इस प्रकार वैशाखी मूलत: नई फसल की कटाई का उत्सव है। समय बीतने के साथ इस पर्व के साथ धार्मिक परंपराएं भी जुड़ गई। संभवत: इसीलिए कि समाज के संपन्न वर्ग के साथ ही कमजोर और निर्धन भी इस अवसर पर शामिल हो खुशीयों का आदान-प्रदान करें।

देश के विभिन्न भागों में यह त्योहार मनाया जाता है। बिहार में यह दिन ‘सतुआ संक्रांति’ या ‘सतुआयी’, मणिपुर में ‘चेरोवा’, तमिलनाडु में ‘चितरार पिरावि’ के नाम से मनाते हैं। बंगाल में भी इस दिन को नववर्ष के रूप में मनाते हैं। इस प्रकार यह पर्व एक ही दिन पूरे देश में नई ऊर्जा का संचार करता है।

पर्व की वैज्ञानिक दृष्टि यही है कि यह पर्व अप्रैल माह में मनाया जाता है, तब यह समय ग्रीष्म के आगमन और शीत ऋतु के मौसम की समाप्ति की ओर होता है। मध्यम तापमान होने से जहां पेड़-पौधे फलते-फूलते हैं, वहीं प्राणी जगत भी नई ऊर्जा से भर जाता है।

भारत की संस्कृ्ति में अनेक राज्य, अनेक धर्म, अनेक भाषाएं, अनेक रीति-रिवाजों को मानने वाले लोग एक साथ रहते है. अनेक संस्कृ्तियों का एक साथ रहना, हमें विश्व में एक नई पहचान देता है. साथ ही यह हमारी देश की अंखण्डता को ठिक उसी प्रकार सौन्दर्य प्रधान करता है, जिस प्रकार एक गुलदस्ते में कई रंग के फूल हों, तो उसकी सुन्दरता स्वयं ही दोगुनी हो जाती है.वैशाखी का पर्व भी भारत के लोगों को आपस में बांधे रखने में सहयोग करता है. क्योकि इस पर्व को भारत के प्रत्येक भाग में किसी न किसी रुप में मनाया जाता है. कई धर्म इसे अपने ढंग से मनाते है. ऎसे में इस पर्व का महत्व बढ जाता है.

उडिसा में वैशाखी पर्व एक नये रुप में
उडिसा समाज वैशाखी के दिन अर्थात 14 अप्रैल को पोणा संक्रान्ति पर्व के नाम से मनाता है. इस दिन यहां महिलाओं द्वारा शिवजी की पूजा कर दही-गुड से बनाया गया पोणा अर्पित किया जाता है. मंदिरों में अन्न और वस्त्र दान किये जाते है. इस दिन बनने वाले व्यंजनों में चावल की खीर विशेष रुप से मनाई जाती है. बैंगन, केला, आलू, कद्दू का डालमा बनाया जाता है. तथा अपने ईष्ट देव की पूजा कर पूरे वर्ष बारिश की कामना के साथ ही सुख-समृ्द्धि की प्रार्थना भगवान से की जाती है.

बंगाल में नववर्ष प्रारम्भ
बंगाल का नया वर्ष वैशाख महीने के पहले दिन अर्थात 14 अप्रैल से प्रारम्भ होता है. इस दिन को यहां शुभो नाँबो बाँरसो के नाम से जाना जाता है. बंगाल में इस दिन से ही फसल की कटाई शुरु होती है. यहां के लोग 14 अप्रैल के दिन नया काम करन शुरु करते है. महिलाएं इस दिन घर आई नई फसल के धान से पकवान बनाती है.

केरल का नववर्ष प्रारम्भ
भारत के दक्षिणी प्रदेश केरल में इस दिन धान की बुआई का काम शुरु होता है. इस दिन को यहां मलयाली न्यू ईयर विशु के नाम से पुकारा जाता है. 14 अप्रैल के दिन हल और बैलों को रंगोली से सजा कर, इनकी इस दिन पूजा की जाती है. और बच्चों को उपहार दिये जाते है.

असम का नववर्ष प्रारम्भ
13 अप्रैल के दिन असम के लोग नये वर्ष के दिन “बिहू” के रुप में मनाते है. बिहू अवसर पर यहां लोक नृ्त्य के साथ-साथ सार्वजनिक रुप से खुशी मनाई जाती है. वैशाखी क्षेत्रिय पर्व न होकर पूरे भारत में किसी न किसी रुप में मनाया जाता है.

तमिल का नववर्ष प्रारम्भ
तमिल के लोग 13 अप्रैल से नये साल का प्रारम्भ मानते है. इस दिन को तमिल लोग पुथांदु पर्व के नाम से मनाते है.

कश्मीर में नववर्ष का प्रारम्भ
शास्त्रों में उल्लेखित सप्तऋषियों के अनुसार 14 अप्रैल का दिन नवरेह नाम से, नववर्ष के महोत्सव के रुप में मनाया जाता है. यहां इस दिन लोग एक -दुसरे को बधाई देते है, तथा हर्ष और खुशी के साथ एक -दूसरे के घर मिलते आते है. कोई नया कार्य प्रारम्भ करने के लिये इस दिन को यहां विशेष रुप से प्रयोग किया जाता है.

आंघ्रप्रदेश का नववर्ष प्रारम्भ
भारत के अधिकतर त्यौहार कृ्षि आधारित है. भारत के जिन प्रदेशों में आजीविका का मुख्य साधन कृ्षि है, उन सभी प्रदेशो में फसल के पकने या घर आने पर उस दिन को एक पर्व के रुप में मनाया जाता है. आंध्रप्रदेश भी क्योकि एक कृ्षि क्षेत्र है. इसलिये 14 अप्रैल के दिन का किसानो के लिये यहां विशेष महत्व हो जाता है. इसे उगादि तिथि अर्थात युग के प्रारम्भ के रुप में मनाया जाता है.

महाराष्ट्र का नववर्ष प्रारम्भ
महाराष्ट् प्रदेश में 14 अप्रैल के दिन को सृ्ष्टि के प्रारम्भ का दिन मानकर हर्षोउल्लास से मनाया जाता है. 14 अप्रैल से जुडी मान्यता के अनुसार इस दिन से समय ने चलाना शुरु किया था. महाराष्ट में नववर्ष के अवसर पर श्रीखंड और पूरी बनाकर इस पर्व को मनाया जाता है. नवर्ष के दिन यहां गरीबों को भोजन व दान आदि किया जाता है. और घरों में बच्चे नये वस्त्र धारण करते है.

इस प्रकार भारत के कोने-कोने में यह पर्व किसी न किसी रुप में मनाया जाता है. वैशाखी जैसे पर्व भारत कि संस्कृ्ति को अखंड बनाये रखने में सहयोग करते है. यह पर्व भारतियों को एकता, भाईचारे और उन्नति के सूत्र में बांधे रखने में सहायता करता है.

वैशाखी पर्व देश के अन्य राज्यों में
वैशाखी पर्व केवल सिक्ख समाज का पर्व नहीं है. अपितु इस दिन केरल, उडिसा, आसाम राज्यों में यह दिन नये वर्ष के आगमन का दिन होता है. इस दिन समाज में नये साल के आने की खुशी में संकल्प और नये कार्य प्रारम्भ किये जाते है.

मलयालम समाज के लिये “विशु” पूजन का दिवस
वैशाखी के दिन को मलयालम समाज नये साल के रुप में मनाता है. इस दिन मंदिरोम में विशुक्कणी के दर्शन कर समाज के लिये नव वर्ष का स्वागत करते है. इस दिन केरल में पारंपरिक नृ्त्य गान के साथ आतिशबाजी का आनन्द लिया जाता है. विशेष कर अय्यापा मंदिर में इस दिन विशेष पूजा अर्चना की जाती है. विशु यानी भगवान “श्री कृ्ष्ण” और कणी यानी “टोकरी”

विशुक्कणी पर्व के नाम से जाना जाने वाले इस पर्व पर भगवान श्री कृ्ष्ण को टोकरी में रखकर उसमें कटहल, कद्दू, पीले फूल, कांच, नारियल और अन्य चीजों से सजाया जाता है. सबसे पहले घर का मुखिया इस दिन आंखें बंद कर विशुक्कणी के दर्शन करता है. कई जगहों पर घर के मुखिया से पहले बच्चों को देव विशुक्कणी के दर्शन कराये जाते है. नव वर्ष पर सबसे पहले देव के दर्शन करने का उद्देश्य, शुभ दर्शन कर अपने पूरे वर्ष को शुभ करने से जुडा हुआ है.

असम में वैशाखी पर्व का एक नया रुप “बिहू”
14 अप्रैल का दिन अर्थात वैशाखी पर्व को असमिया समाज एक नये रुप में मनाता हे. यहां यह पर्व दो दिन का होत है. वैशाखी से एक दिन पहले असम के लोग बिहू के रुप में इस पर्व को मनाते है. जिसमें मवेशियों कि पूजा की जाती है. तथा ठिक वैशाखी के दिन यहां जो पर्व मनाया जाता है, उसे रंगीली बिहू के नाम से जाना जाता है.

इस दिन असम में कई सांस्कृ्तिक आयोजन किये जाते है. क्योकि कोई भी पर्व बिना व्यंजनों के पूरा नहीं होता है. इसलिये खाने में इस दिन यहां “पोहे” के साथ दही का आनन्द लिया जाता है. असम का जीवन कृ्षि से जुडा हुआ होने के कारण लोग यह कामना करते है कि पूरे वर्ष अच्छी बारिश होती रहे.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 11, 2011

विवाह समय के योग –

विवाह समय के योग (Some Combinations To Predict The Time of Your Marriage Through Vedic Astrology)—-

अक्सर बच्चों के बड़े होने पर उनके माता-पिता उनकी शादी के लिए चिंतित होते हैं कि बच्चों की शादी कब होगी. वास्तव में संसार में हर कार्य अपने निश्चित समय पर होता है. मतलब यह है कि व्यक्ति की शादी कम होगी यह भी ईश्वर जन्म के साथ लिखकर भेजता है.

व्यक्ति चाहे तो किसी अच्छे ज्योतिषी से अपनी कुण्डली दिखवाकर जान सकता है कि शादी कब होगी. कुण्डली में ग्रहों के अच्छे योग होने पर जल्दी विवाह की उम्मीद रहती है जबकि विवाह से सम्बन्धित भाव एवं ग्रह पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने पर शादी देर से हो सकती है.

1. जब किसी व्यक्ति की कुण्डली में गुरु सप्तम भाव में स्थित हों तथा किसी शुभ ग्रह से दृ्ष्टि संम्बन्ध बना रहे हों अथवा सप्तम में उच्च का हों तो 21 वर्ष की आयु में विवाह होने की संभावना बनती है. (Jupiter in Seventh House suggests marriage in 21st Year)

2. अगर कुण्डली में शुक्र सप्तम भाव में स्वगृही हो, द्वितीय भाव में लग्न द्वारा दृष्ट हों तो व्यक्ति का विवाह यौवनावस्था में होने के योग बनते है. (Venus in own-house signifies early marriage)

3. लग्नेश व सप्तमेश का आपस में स्थान या दृष्टि संबन्ध शुभ ग्रहों से बने, विशेष रुप से गुरु से तो स्त्री का विवाह 18 से 20 वर्ष व पुरुष का विवाह 21 से 23 वर्ष के मध्य होने की संभावना बनती है.

4. इसके अलावा सप्तमेश और लग्नेश दोनों जब निकट भावों में स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह 21 वर्ष में प्रवेश के साथ ही होने की संभावना बनती है.

5. जब लग्नेश कुण्डली में बलशाली होकर स्थित हो (Ascendant-lord in powerful position) और लग्नेश द्वितीय भाव में स्थित हो तो ऎसे व्यक्ति का विवाह शीघ्र होने के योग बनते है. इस योग के व्यक्ति का विवाह सुखमय रहने की संभावनाएं बनती है.

6. अगर किसी स्त्री की कुण्डली में चन्द्र उच्च अंश क स्थित हो तो स्त्री व उसके जीवनसाथी की आयु में अन्तर अधिक होने की संभावना बनती है. (Higher longitude of Moon means difference in the age of marriage partners)

7. अगर सप्तमेश वक्री हो तथा मंगल षष्ठ भाव में हो तो ऎसे व्यक्ति का विवाह विलम्ब से होने की संभावना बनती है. सप्तमेश के वक्री होने के कारण वैवाहिक जीवन कि शुभता में भी कमी हो सकती है.

8. इसके अलावा चन्द्र अगर सप्तम में अकेला या शुभ ग्रहों से दृष्ट हों तो ऎसे व्यक्ति का जीवनसाथी सुन्दर व यह योग विवाह के मध्य की बाधाओं में कमी करता है.

9. अगर लग्न, सप्तम भाव, लग्नेश और शुक्र चर स्थान में स्थित हों तथा चन्द्रमा चर राशि में स्थित हों तो ऎसे व्यक्ति का विवाह विलम्ब से होने के योग बनते है. (Venus in a Moveable sign gives delayed marriage)

10. जब सप्तमेश छठे, आठवें और बारहवें भाव, लग्न भाव या सप्तम भाव में स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह देर से होने के योग बनते है.

11. इसके अतिरिक्त जब शनि और शुक्र लग्न से चतुर्थ भाव में हों तथा चन्द्रमा छठे, आठवें या बारहवें भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह तीस वर्ष के बाद होने की संभावना बनती है.

12. किसी व्यक्ति की कुण्डली में राहु और शुक्र जब प्रथम भाव में हों तथा मंगल सप्तम भाव में स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह 28 से 30 वर्ष की आयु में होने की संभावनाएं बनती है. (Rahu and Venus in the first house and Mars in seventh gives marriage in late 20s)

13. अगर शुक्र कर्क, वृश्चिक, मकर में से किसी राशि में सप्तम भाव में स्थित हों तथा चन्द्रमा व शनि एक साथ प्रथम, द्वितीय, सप्तम या एकादश भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह 32 वर्ष के बाद होने कि संभावना बनती है.

14. कुण्डली में सप्तमेश बलहीन हो तथा शनि व मंगल एक साथ प्रथम, द्वितीय, सप्तम या एकादश में हों तो व्यक्ति का विवाह 30 वर्ष की आयु के बाद होने के योग बनते है.

15. इसके अतिरिक्त मंगल या शुक्र एक साथ पंचम या सप्तम भाव में स्थित हो एवं दोंनो को गुरु देख रहे हों, तो व्यक्ति का विवाह वयस्क आयु में होने की संभावना बनती है.

विवाह के लिये सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र का विचार किया जाता है. ये तीनों शुभ स्थिति में हों तो विवाह शीघ्र होता है तथा वैवाहिक जीवन भी सुखमय रहने की संभावनाएं बनती है.

इसके विपरीत जब सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र तीनों किसी भी प्रकार के पाप प्रभाव में हों तो विवाह में विलम्ब की संभावना बनती है. विवाह के समय का निर्धारण करने में कुण्डली में बन रहे योग विशेष भूमिका निभाते है.

किसी व्यक्ति को जीवन में कितना सुख मिलेगा यह सब कुण्डली के योगों पर निर्भर करता है. शुभ ग्रह, शुभ भावों के स्वामी होकर जब शुभ भावों में स्थित हों, तथा अशुभ ग्रह निर्बल होकर अशुभ भावों के स्वामी होकर, अशुभ भावों में स्थित हों तो व्यक्ति को अनुकुल फल देते हैं.

आईये देखे कि कुण्डली के योग विवाह समय को किस प्रकार प्रभावित करते है.

1. जब जन्म कुण्डली में अष्टमेश पंचम में हों व्यक्ति का विवाह विलम्ब से होने की संभावना बनती है. अष्टम भाव व इस भाव के स्वामी का संबन्ध जिन भावों से बनता है. उन भावों के फलों की प्राप्ति में बाधाएं आने की संभावना रहती है.

2. इसके अलावा जब जन्म कुण्डली में सूर्य व चन्द्र शनि से पूर्ण दृष्टि संबन्ध रखते हों तब भी व्यक्ति का विवाह देर से होने के योग बनते है. इस योग में सूर्य व चन्द्र दोनों में से कोई सप्तम भाव का स्वामी हो या फिर सप्तम भाव में स्थित हों तभी इस प्रकार की संभावना बनती है.

3. शुक्र केन्द्र में स्थित हों और शनि शुक्र से सप्तम भाव में स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह वयस्क आयु में प्रवेश के बाद ही होने की संभावना बनती है.

4. शनि सप्तमेश होकर एकादश भाव में स्थित हों और एकादशेश दशम भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह 21 से 23 वर्ष में होने की उम्मीद रहती है.

5. अगर शुक्र चन्द्र से सप्तम भाव में स्थ्ति हो और शनि शुक्र से सप्तम भाव में स्थित हों तो भी व्यक्ति का विवाह शीघ्र हो सकता है.

6. इसके अतिरिक्त सप्तमेश और शुभ ग्रह द्वितीय भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह 21 वर्ष में हो सकती है.

7. जब जन्म कुण्डली में शुभ ग्रह प्रथम, द्वितीय या सप्तम भाव में हों तब व्यक्ति का विवाह 21 वर्ष के आसपास होने के योग बनते है.

8. चन्द्र जब कुण्डली में शुक्र से सप्तम भाव में हो व बुध चन्द्र से सप्तम भाव में और अष्टमेश पंचम में हो तो व्यक्ति का विवाह 22 वें वर्ष में होने की संभावना बनती है.

9. इसके अतिरिक्त जब शुक्र द्वितीय में और मंगल अष्टमेश के साथ हों तो व्यक्ति बाईस से सताईस वर्ष की आयु में विवाह करता है.

10. चन्द्र शुक्र से सप्तम में और लग्नेश शुक्र एकादश भाव में स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह 27 वें वर्ष में होने की संभावनाएं बनती है.

11. अगर कुण्डली में सप्तमेश नवम में हो, शुक्र तीसरे में हो तो व्यक्ति का विवाह 27 से 30 के मध्य की आयु में होने के योग बनते है.

12. अष्टमेश स्व-राशि में स्थित हों और लग्नेश शुक्र के साथ हो तो व्यक्ति का विवाह विलम्ब से होने की संभावना बढ़ जाती है.

13. सप्तमेश त्रिकोण भावों में क्रूर ग्रहों के साथ हों और शुक्र भी पाप ग्रहों से पीड़ित होकर द्वितीय भाव में स्थित हों तो 30 वर्ष के बाद विवाह की संभावना रहती है.

14. लग्नेश या सप्तमेश स्वराशि में स्थित होकर पंचम या छठे भाव से दूर स्थित हो तो व्यक्ति की शादी देर से हो सकती है.

सप्तम भाव के स्वामी ग्रहों के अनुसार विवाह समय का निर्णय:-

1. अगर सप्तम भाव का स्वामी सूर्य हों तो व्यक्ति का विवाह 24 से 26 वर्ष के मध्य होने की संभावना बनती है.

2. चन्द्र सप्तमेश होने पर व्यक्ति का विवाह 21 से 22 वें वर्ष के मध्य होने का योग बनाता है.

3. मंगल सप्तमेश हो तो 24 से 27 के मध्य की आयु में विवाह संभव है.

4. बुध सप्तमेश होने पर 28 से 30 की आयु में विवाह का योग बनता है.

5. जिस व्यक्ति की कुण्डली में गुरु सप्तमेश हो उस व्यक्ति का विवाह 22 से 24 वर्ष की आयु में होने की संभावना बनती है.

6. शुक्र के सप्तमेश होने पर 21 से 23 वर्ष की आयु में विवाह हो सकता है.

7. शनि सप्तमेश होने पर 30 वर्ष के पश्चात विवाह होने की उम्मीद रहती है.

इन योगों में ग्रहों की स्थिति के अनुसार विवाह समय में परिवर्तन हो सकता है. अगर सप्तमेश उच्च हो, बलवान हो, शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तथा अशुभ ग्रहों के पाप प्रभाव से मुक्त हो तो विवाह की आयु में परिवर्तन होना संभव है.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 11, 2011

महावीर जयंती

जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का जीवन ही उनका संदेश है। उनके सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य और अस्तेय आदि उपदेश एक खुली किताब की तरह है। जो सत्य परंतु आम आदमी को कठिन प्रत‍ीत होते हैं। कहने को तो वे एक राजा के परिवार में पैदा हुए थे। उनके घर-परिवार में ऐश्वर्य, धन-संपदा की कोई कमी नहीं थी। जिसका वे मनचाहा उपभोग भी कर सकते थे।

परंतु युवावस्था में कदम रखते ही उन्होंने संसार की माया-मोह, सुख-ऐश्वर्य और राज्य को छोड़कर दिल दहला देने वाली यातनाओं को सहन किया और सारी सुविधाओं को त्याग कर वे नंगे पैर पैदल यात्रा करते रहे।

पिता ने दिया वर्द्धमान का नाम : जन्मोत्सव के बाद ज्योतिषों द्वारा चक्रवर्ति राजा बनने की घोषणा करने के बाद उनके कई किस्से इस बात को सच साबित करते पाए गए। उनके जन्म से पूर्व ही कुंडलपुर के वैभव और संपन्नता की ख्याति ‍दिन दूनी रा‍त चौगुनी बढ़ती गई। अत: महाराजा सिद्धार्थ ने उनका जन्म नाम ‘वर्द्धमान’ रख दिया। चौबीस घंटे लगने वाली दर्शनार्थिंयों की भीड़ ने राज-पाट की सारी मयार्दाएँ ढहा दी। इस प्रकार वर्द्धमान ने लोगों में यह संदेश प्रेरित किया कि उनके घर के द्वार सभी के लिए हमेशा खुले रहेंगे। वर्द्धमान ने यह सिद्ध कर दिखाया।

वीर नाम की प्राप्ति : जैसे-जैसे महावीर बड़े होते जा रहे थे वैसे-वैसे उनके गुणों में बढ़ोतरी हो रही थी। एक बार जब सुमेरू पर्वत पर देवराज इंद्र उनका जलाभिषेक कर रहे थे। तब कहीं बालक बह न जाए इस बात से भयभीत होकर इंद्रदेव ने उनका अभिषेक रुकवा दिया। इंद्र के मन की बात भाँप कर उन्होंने अपने अँगूठे के द्वारा सुमेरू पर्वत को दबा कर कंपायमान कर दिया। यह देखकर देवराज इंद्र ने उनकी शक्ति का अनुमान लगाकर उन्हें ‘वीर’ के नाम से संबोधित करना शुरू कर दिया।

दो मुनियों ने दिया भेंट सन्मति का नाम : बाल्यकाल में महावीर महल के आँगन में खेल रहे थे। तभी आकाशमार्ग से संजय मुनि और विजय मुनि का निकलना हुआ। दोनों इस बात की तोड़ निकालने में लगे थे कि सत्य और असत्य क्या है? उन्होंने जमीन की ओर देखा तो नीचे महल के प्राँगण में खेल रहे दिव्य शक्तियुक्त अद्‍भुत बालक को देखकर वे नीचे आएँ और सत्य के साक्षात दर्शन करके उनके मन की शंकाओं का समाधान हो गया है। इन दो मुनियों ने उन्हें ‘सन्मति’ का नाम दिया और खुद भी उन्हें उसी नाम से पुकारने लगे।

पराक्रम की चर्चा ने बनाया अतिवीर : युवावस्था में लुका-छिपी के खेल के दौरान कुछ साथियों को एक बड़ा फनधारी साँप दिखाई दिया। जिसे देखकर सभी साथी डर से काँपने लगे, कुछ वहाँ से भाग गए। लेकिन वर्द्धमान महावीर वहाँ से हिले तक नहीं। उनकी शूर-वीरता देखकर साँप उनके पास आया तो महावीर तुरंत साँप के फन पर जा बैठे। उनके वजन से घबराकर साँप बने संगमदेव ने तत्काल सुंदर देव का रूप धारण किया और उनके सामने उपस्थित हो गए। उन्होंने वर्द्धमान से कहा- स्वर्ग लोक में आपके पराक्रम की चर्चा सुनकर ही मैं आपकी परीक्षा लेने आया था। आप मुझे क्षमा करें। आप तो वीरों के भी वीर ‘अतिवीर’ है।

इन चारों नामों को सुशोभित करने वाले महावीर स्वामी ने संसार में बढ़ती हिंसक सोच, अमानवीयता को शांत करने के लिए अहिंसा के उपदेश प्रसा‍रित किए। उनके उपदेशों को जानने-समझने के लिए कोई विशेष प्रयास की जरूरत नहीं। उन्होंने लोक कल्याण का मार्ग अपने आचार-विचार में लाकर धर्म प्रचारक का कार्य किया। ऐसे महान चौबीस ‍तीर्थंकरों के अंतिम तीर्थंकर महावीर के जन्मदिवस प्रति वर्ष चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को मनाया जाता है। महावीर जयंती के अवसर पर जैन धर्मावलंबी प्रात: काल प्रभातफेरी निकालते हैं। उसके बाद भव्य जुलूस के साथ पालकी यात्रा निकालने के तत्पश्चात् स्वर्ण एवं रजत कलशों से महावीर स्वामी का अभिषेक किया जाता है तथा शिखरों पर ध्वजा चढ़ाई जाती है। जैन समाज द्वारा दिन भर अनेक धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन ‍करके महावीर का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है।

‘जियो और जीने दो’ का महान संदेश विश्‍व भर मैं फैलाने वाले ऐसे वर्द्धमान महावीर की जय हो। जय महावीर…। जय जिनेंद्र!

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 11, 2011

रामनवमी—

मंगल भवन अमंगल हारी,

दॄवहुसु दशरथ अजिर बिहारि ॥

अगस्त्यसंहिताके अनुसार चैत्र शुक्ल नवमीके दिन पुनर्वसु नक्षत्र, कर्कलग्‍नमें जब सूर्य अन्यान्य पाँच ग्रहोंकी शुभ दृष्टिके साथ मेषराशिपर विराजमान थे, तभी साक्षात्‌ भगवान्‌ श्रीरामका माता कौसल्याके गर्भसे जन्म हुआ।

चैत्र शुक्ल नवमी का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। आज ही के दिन तेत्रा युग में रघुकुल शिरोमणि महाराज दशरथ एवं महारानी कौशल्या के यहाँ अखिल ब्रम्हांड नायक अखिलेश ने पुत्र के रूप में जन्म लिया था।

दिन के बारह बजे जैसे ही सौंदर्य निकेतन, शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कि‌ए हु‌ए चतुर्भुजधारी श्रीराम प्रकट हु‌ए तो मानो माता कौशल्या उन्हें देखकर विस्मित हो ग‌ईं। उनके सौंदर्य व तेज को देखकर उनके नेत्र तृप्त नहीं हो रहे थे।

Ram Navami is commemorated in Hindu households by puja (prayer). The items necessary for the puja are roli, aipun, rice, water, flowers, a bell and a conch. After that, the youngest female member of the family applies teeka to all the members of the family. Everyone participates in the puja by first sprinkling the water, roli, and aipun on the Gods, and then showering handfuls of rice on the deities. Then everybody stands up to perform the aarti, at the end of which ganga jal or plain water is sprinkled over the gathering. The singing of bhajans goes on for the entire puja. Finally, the prasad is distributed among all the people who have gathered for worship.

श्रीराम के जन्मोत्सव को देखकर देवलोक भी अवध के सामने फीका लग रहा था। देवता, ऋषि, किन्नार, चारण सभी जन्मोत्सव में शामिल होकर आनंद उठा रहे थे। आज भी हम प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल नवमी को राम जन्मोत्सव मनाते हैं और राममय होकर कीर्तन, भजन, कथा आदि में रम जाते हैं।

रामजन्म के कारण ही चैत्र शुक्ल नवमी को रामनवमी कहा जाता है। रामनवमी के दिन ही गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना का श्रीगणेश किया था।

उस दिन जो कोई व्यक्ति दिनभर उपवास और रातभर जागरणका व्रत रखकर भगवान्‌ श्रीरामकी पूजा करता है, तथा अपनी आर्थिक स्थितिके अनुसार दान-पुण्य करता है, वह अनेक जन्मोंके पापोंको भस्म करनेमें समर्थ होता है।

रामनवमी—–

रामनवमी राजा दशरथ के पुत्र भगवान राम की स्‍मृति को समर्पित है। उसे “मर्यादा पुरूषोतम” कहा जाता है तथा वह सदाचार का प्रतीक है। यह त्‍यौहार शुक्‍ल पक्ष की 9वीं तिथि जो अप्रैल में किसी समय आती है, को राम के जन्‍म दिन की स्‍मृति में मनाया जाता है।

भगवान राम को उनके सुख-समृद्धि पूर्ण व सदाचार युक्‍त शासन के लिए याद किया जाता है। उन्‍हें भगवान विष्‍णु का अवतार माना जाता है, जो पृथ्‍वी पर अजेय रावण (मनुष्‍य रूप में असुर राजा) से युद्ध लड़ने के लिए आए। राम राज्‍य (राम का शासन) शांति व समृद्धि की अवधि का पर्यायवाची बन गया है।

रामनवमी के दिन, श्रद्धालु बड़ी संख्‍या में मन्दिरों में जाते हैं और राम की प्रशंसा में भक्तिपूर्ण भजन गाते हैं तथा उसके जन्‍मोत्‍सव को मनाने के लिए उसकी मूर्तियों को पालने में झुलाते हैं। इस महान राजा की कहानी का वर्णन करने के लिए काव्‍य तुलसी रामायण से पाठ किया जाता है।

भगवान राम का जन्‍म स्‍थान अयोध्‍या, रामनवमी त्‍यौहार के महान अनुष्‍ठान का केंद्र बिन्‍दु है। राम, उनकी पत्‍नी सीता, भाई लक्ष्‍मण व भक्‍त हनुमान की रथ यात्राएं बहुत से मंदिरों से निकाली जाती हैं।

हिंदू घरों में रामनवमी पूजा करके मनाई जाती है। पूजा के लिए आवश्‍यक वस्‍तुएं, रोली, ऐपन, चावल, जल, फूल, एक घंटी और एक शंख होते हैं। इसके बाद परिवार की सबसे छोटी महिला सदस्‍य परिवार के सभी सदस्‍यों को टीका लगाती है। पूजा में भाग लेने वाला प्रत्‍येक व्‍यक्ति के सभी सदस्‍यों को टीका लगाया जाता है। पूजा में भाग लेने वाला प्रत्‍येक व्‍यक्ति पहले देवताओं पर जल, रोली और ऐपन छिड़कता है, तथा इसके बाद मूर्तियों पर मुट्ठी भरके चावल छिड़कता है। तब प्रत्‍येक खड़ा होकर आ‍रती करता है तथा इसके अंत में गंगाजल अथवा सादा जल एकत्रित हुए सभी जनों पर छिड़का जाता है। पूरी पूजा के दौरान भजन गान चलता रहता है। अंत में पूजा के लिए एकत्रित सभी जनों को प्रसाद वितरित किया जाता है।

12 अप्रैल 2011: मंगलवार, 3:39 * तक Sukla नवमी,
* 03:41 Pushyami तक, जब तक 8:14 योग Sukarman, 5:51 * तक Dhriti योग,
जब तक 16:29 करण Balava, 3:39 * तक Kaulava करण,
RahuK: 13:33 GulikaK: YamaG, 12:03: 15:03-16:33 – 9:03-10:33,
18:41 पर सूर्योदय पर 6:02 सूर्यास्त, *,
12:32 पर Moonrise,) दिन Moonset पर 2:28 पूरे (*, चंद्रमा कर्क में )आज रामनवमी हे, साथ ही पुष्य नक्षत्र भी हे
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April 12, 2011:
Tuesday, Sukla Navami till 3:39*,
Pushyami till 3:41*, Sukarman yoga till 8:14, Dhriti yoga till 5:51*,
Balava karana till 16:29, Kaulava karana till 3:39*,
RahuK: 15:03 – 16:33, GulikaK: 12:03 – 13:33, YamaG: 9:03 – 10:33,
Sunrise at 6:02*, Sunset at 18:41,
Moonrise at 12:32, Moonset at 2:28*, Moon in Kark (whole day)
Today is “”RAMNAVAMI”" .also Today is “pushya”nakshtra.
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भये प्रगट कृपाला मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जो समस्त लोकों को शान्ति देने वाले हैं, धर्म की स्थापना एवं लोक कल्याण के लिये, चैत्र शुक्ल नवमी के दिन, अयोध्या नरेश महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में प्रगट हुए। भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी . हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी .. लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी . भूषन वनमाला नयन बिसाला सोभासिन्धु खरारी .. कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता . माया गुन ग्यानातीत अमाना वेद पुरान भनंता .
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राम से भी बढ़कर राम का नाम -
राम नवमी विशेष-

लोगों! बलशालियों में बलशाली राम है।
राम से भी बलशाली राम का नाम है।

‘राम’ यह शब्द दिखने में जितना सुंदर है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है इसका उच्चारण। राम कहने मात्र से शरीर और मन में अलग ही तरह की प्रतिक्रिया होती है जो हमें आत्मिक शांति देती है। हजारों संत और महात्माओं ने राम का नाम जपते-जपते मोक्ष को पा लिया है।

कहते हैं कि बलशालियों में सर्वाधिक बलशाली राम है, लेकिन राम से भी बढ़कर श्रीराम जी का नाम है। हनुमान, लक्ष्मण, सुग्रीव, रावण से लेकर कबीर, तुलसी और गाँधी तक सभी राम का नाम ही जपते रहे हैं। राम नाम की महिमा ही कुछ ऐसी है कि इसको जपने से संपूर्ण मानसिक ताप मिट जाते हैं।
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श्री रघुवीर भक्त हितकारी । सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ।।
निशिदिन ध्यान धरै जो कोई । ता सम भक्त और नहिं होई ।।

ध्यान धरे शिवजी मन माहीं । ब्रहृ इन्द्र पार नहिं पाहीं ।।
दूत तुम्हार वीर हनुमाना । जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना ।।

तब भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला । रावण मारि सुरन प्रतिपाला ।।
तुम अनाथ के नाथ गुंसाई । दीनन के हो सदा सहाई ।।

ब्रहादिक तव पारन पावैं । सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ।।
चारिउ वेद भरत हैं साखी । तुम भक्तन की लज्जा राखीं ।।

गुण गावत शारद मन माहीं । सुरपति ताको पार न पाहीं ।।
नाम तुम्हार लेत जो कोई । ता सम धन्य और नहिं होई ।।

राम नाम है अपरम्पारा । चारिहु वेदन जाहि पुकारा ।।
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो । तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो ।।

शेष रटत नित नाम तुम्हारा । महि को भार शीश पर धारा ।।
फूल समान रहत सो भारा । पाव न कोऊ तुम्हरो पारा ।।

भरत नाम तुम्हरो उर धारो । तासों कबहुं न रण में हारो ।।
नाम शक्षुहन हृदय प्रकाशा । सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ।।

लखन तुम्हारे आज्ञाकारी । सदा करत सन्तन रखवारी ।।
ताते रण जीते नहिं कोई । युद्घ जुरे यमहूं किन होई ।।

महालक्ष्मी धर अवतारा । सब विधि करत पाप को छारा ।।
सीता राम पुनीता गायो । भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ।।

घट सों प्रकट भई सो आई । जाको देखत चन्द्र लजाई ।।
सो तुमरे नित पांव पलोटत । नवो निद्घि चरणन में लोटत ।।

सिद्घि अठारह मंगलकारी । सो तुम पर जावै बलिहारी ।।
औरहु जो अनेक प्रभुताई । सो सीतापति तुमहिं बनाई ।।

इच्छा ते कोटिन संसारा । रचत न लागत पल की बारा ।।
जो तुम्हे चरणन चित लावै । ताकी मुक्ति अवसि हो जावै ।।

जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरुपा । नर्गुण ब्रहृ अखण्ड अनूपा ।।
सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी । सत्य सनातन अन्तर्यामी ।।

सत्य भजन तुम्हरो जो गावै । सो निश्चय चारों फल पावै ।।
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं । तुमने भक्तिहिं सब विधि दीन्हीं ।।

सुनहु राम तुम तात हमारे । तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे ।।
तुमहिं देव कुल देव हमारे । तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ।।

जो कुछ हो सो तुम ही राजा । जय जय जय प्रभु राखो लाजा ।।
राम आत्मा पोषण हारे । जय जय दशरथ राज दुलारे ।।

ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरुपा । नमो नमो जय जगपति भूपा ।।
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा । नाम तुम्हार हरत संतापा ।।

सत्य शुद्घ देवन मुख गाया । बजी दुन्दुभी शंख बजाया ।।
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन । तुम ही हो हमरे तन मन धन ।।

याको पाठ करे जो कोई । ज्ञान प्रकट ताके उर होई ।।
आवागमन मिटै तिहि केरा । सत्य वचन माने शिर मेरा ।।

और आस मन में जो होई । मनवांछित फल पावे सोई ।।
तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै । तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ।।

साग पत्र सो भोग लगावै । सो नर सकल सिद्घता पावै ।।
अन्त समय रघुबरपुर जाई । जहां जन्म हरि भक्त कहाई ।।

श्री हरिदास कहै अरु गावै । सो बैकुण्ठ धाम को पावै ।।
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दैनिक राशिफल—

राशि फलादेश मेष—
आपको कई आर्थिक समस्याओं से छुटकारा मिल सकेगा। जीवनसाथी से सहयोग मिलेगा। पराक्रम की वृद्धि होगी। समाज, परिवार में आदर मिलेगा।

राशि फलादेश वृष—
सुसंगति से लाभ होगा। संतान की ओर से अच्छे समाचार मिलेंगे। किसी समस्या का हल आपके प्रयत्नों से निकलेगा। अनावश्यक कार्यों से दूर रहें।

राशि फलादेश मिथुन—
मन में शांति रहेगी। नवीन कार्य के अवसर बनेंगे। परिवार के सदस्यों पर विशेष ध्यान दें। आर्थिक स्थिति मनोबल में वृद्धि करेगी।

राशि फलादेश कर्क—
नई योजना में लाभ प्राप्ति के योग हैं। साहित्यिक रुचि बढ़ेगी। वाहन सावधानी से चलाएँ। पूँजी निवेश बढ़ेगा। आय-व्यय बराबर रहेंगे।

राशि फलादेश सिंह—
रुके कार्य पूर्ण होने के अवसर हैं। ऋण लेना पड़ सकता है। पारिवारिक संबंध मधुर एवं प्रगाढ़ होंगे। दिन उत्साहवर्धक एवं मनोरंजनमयी रहेगा।

राशि फलादेश कन्या—
धन संबंधी मामलों में सचेत रहना आवश्यक। अधिकारी सहयोग नहीं करेंगे। परिवार में कलह का माहौल रहेगा। कार्यकुशलता में कमी आएगी।

राशि फलादेश तुला—
लाभकारी योग बनेंगे। मनोबल में वृद्धि होने के कारण तनाव की कमी रहेगी। आर्थिक स्थिति उत्तम रहेगी। बुरी आदतों पर संयम रखना होगा।

राशि फलादेश वृश्चिक—
कोई शुभ समाचार प्राप्त हो सकता है। प्रतिष्ठित व्यक्ति से भेंट होगी। आपके लाभ में वृद्धि व प्रयास में सफलता के योग हैं। जल्दबाजी में निर्णय न लें।

राशि फलादेश धनु—
किसी प्रिय व्यक्ति से भेंट हो सकती है। जोखिम जवाबदारी के कामों में सावधानी रखें। साझेदारी में लाभदायी सौदे होंगे। आर्थिक स्थिति मनोबल में वृद्धि करेगी।

राशि फलादेश मकर
आपकी बुद्धिमत्ता सामाजिक सम्मान दिलाएगी। व्यापारिक कार्यों में किसी भी तरह की लापरवाही न करें। आर्थिक स्थिति अच्छी रहेगी।

राशि फलादेश कुंभ—
लाभदायी परिवर्तन का योग बनेगा। शुभचिंतकों का मार्गदर्शन समस्याओं को हल करेगा। स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही न करें। ईश्वर में आस्था बढ़ेगी।

राशि फलादेश मीन—
मान-सम्मान बना रहेगा। कार्यक्षेत्र में स्पष्टता आपकी प्रगति में सहायक होगी। क्रोध व शीघ्रता का त्याग करके विवेक से काम लें। जीवनसाथी का सहयोग मिलेगा।

श्रीराम की गुरु भक्ति —

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अपने शिक्षागुरु विश्वामित्र के पास बहुत संयम, विनय और विवेक से रहते थे। गुरु की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे। उनकी सेवा के विषय में भक्त कवि तुलसीदास ने लिखा है-

मुनिवर सयन कीन्हीं तब जाई।
लागे चरन चापन दोऊ भाई॥
जिनके चरन सरोरुह लागी।
करत विविध जप जोग विरागी॥
बार बार मुनि आज्ञा दीन्हीं।
रघुवर जाय सयन तब कीन्हीं॥
गुरु ते पहले जगपति जागे राम सुजान।

सीता-स्वयंवर में जब सब राजा धनुष उठाने का एक-एक करके प्रयत्न कर रहे थे तब श्रीराम संयम से बैठे ही रहे। जब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा हुई तभी वे खड़े हुए और उन्हें प्रणाम करके धनुष उठाया।

सुनि गुरु बचन चरन सिर नावा। हर्ष विषादु न कछु उर आवा।
गुरुहिं प्रनाम मन हि मन किन्हा। अति लाघव उठाइ धनु लिन्हा॥

श्री सद्गुरुदेव के आदर और सत्कार में श्रीराम कितने विवेकी और सचेत थे, इसका उदाहरण जब उनको राज्योचित शिक्षण देने के लिए उनके गुरु वशिष्ठजी महाराज महल में आते हैं तब देखने को मिलता है। सद्गुरु के आगमन का समाचार मिलते ही सीताजी सहित श्रीराम दरवाजे पर आकर सम्मान करते हैं-
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आप सभी को “राम नवमी ” की बधाइयाँ और शुभकामनायें..आज भारत में कई जगहों पर हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ किया जायेगा..सायं- ७ से ८ बजे तक,, इसे आस्था और संस्कार टी.वि. चेनल्स पर भी देखा जा सकेगा …प्रणेता – पंडित श्री विजयशंकर मेहता जी(उज्जैन )

गजकेसरी योग फलादेश को प्रभावित करने वाले तत्व (What are the combinations that affect Gaja Kesari Yoga)—-

गुरु-चन्द्र का एक दुसरे से केन्द्र में होना गजकेसरी योग (Gaja Kesari Yoga) का निर्माण करता है. गजकेसरी योग व्यक्ति की वाकशक्ति में वृ्द्धि होती है. इसकी शुभता से धन, संमृ्द्धि व संतान की संभावनाओं को भी सहयोग प्राप्त होता है. गुरु सभी ग्रहों में सबसे शुभ ग्रह है.

इन्हें शुभता, धन, व सम्मान का कारक ग्रह कहा जाता है. इसी प्रकार चन्द्र को भी धन वृ्द्धि का ग्रह कहा जाता है. दोनों के संयोग से बनने वाले गजकेसरी योग (Gaja Kesari Yoga) से व्यक्ति को अथाह धन प्राप्ति की संभावनाएं बनती है. परन्तु गजकेसरी योग (Gaja Kesari Yoga) से मिलने वाले फल सदैव सभी के लिये एक समान नहीं होते है.

अनेक कारणों से गजकेसरी योग (Gaja Kesari Yoga) के फल प्रभावित होते है. कई बार यह योग कुण्डली में बन रहे अन्य योगों के फलस्वरुप भंग हो रहा होता है. तथा इससे मिलने वाले फलों में कमी हो रही होती है. परन्तु योगयुक्त व्यक्ति को इसकी जानकारी नहीं होती है.

गजकेसरी योग का फलादेश करते समय किस प्रकार की बातों का ध्यान रखना चाहिए. आईये यह जानने का प्रयास करते है.
“गजकेसरी योग” फलादेश सावधानियां:- (Precautions While Predicting on Gaja Kesari Yoga)

1. गुरु-चन्द्र स्वामित्व:- (Jupiter-Moon Lordship)
गजकेसरी योग से मिलने वाले फलों का विचार करते समय विश्लेषणकर्ता इस बात पर ध्यान देता है कि चन्द्र तथा गुरु किन भावों के स्वामी है. इसमें भी गुरु की राशियां किन भावों में स्थित है, इसका प्रभाव योग की शुभता पर विशेष रुप से पडता है.

जन्म कुण्डली में चन्द व गुरु की राशि शुभ भावों में होंने पर गजकेसरी योग की शुभता में वृ्द्धि व अशुभ भावों में इनकी राशियां स्थित होने पर योग की शुभता कुछ कम होती है.

2. चन्द्र नकारात्मक स्थिति:- (Moon in afflicted state in Gaja Kesari Yoga) —
जब कुण्डली में चन्द्र पीडित होना गजकेसरी योग के अनुकुल नहीं समझा जाता है. अगर चन्द्र केमद्रुम योग में न हों, चन्द्र से प्रथम, द्वितीय अथवा द्वादश भाव में कोई ग्रह नहीं होने पर चन्द्र के साथ-साथ गजकेसरी योग के बल में भी वृ्द्धि होती है.

इसके अलावा चन्द का गण्डान्त में होना, पाप ग्रहों से द्रष्टि संबन्ध में होना, या नीच का होना गजकेसरी योग के फलों को प्रभावित कर सकता है.

3. गुरु, चन्द्र के अशुभ योग (Inauspicious Combinations of Moon and Jupiter)
कुण्डली में जब ग्रुरु से चन्द छठे, आंठवे या बारहवें भाव में होंने पर शकट योग बनता है. यह योग क्योकि गुरु से चन्द्र की षडाष्टक स्थिति में होने पर बनता है इसलिये अनिष्टकारी होता है.

इसलिये गजकेसरी योग भी शुभ भावों में बनने पर विशेष शुभ फल देता है. तथा गुरु व चन्द्र की स्थिति इसके विपरीत होने पर गजकेसरी योग की शुभता में कमी होती है.

4. गजकेसरी योग व केमद्रुम योग (Gaja Kesari Yoga and Kemadruma Yoga)
गजकेसरी योग क्योकि गुरु से चन्द्र के केन्द्र में होने पर बनता है. इस योग के अन्य नियमों का वर्णन इससे पहले दिया जा चुका है. इन नियमों में यह भी सम्मिलित करना चाहिए. कि चन्द्र के दोनों ओर के भावों में सूर्य, राहू-केतु के अलावा अन्य पांच ग्रहों में से कोई भी ग्रह स्थित होना चाहिए.

5. गुरु नकारात्मक स्थिति:- (Moon in inauspicious Position)
गुरु का वक्री होने पर गजकेसरी योग की गुणवता में कमी होती है. जो पाप ग्रह इनसे युति, द्रष्टि संबन्ध बना रहा हों उस ग्रह की अशुभ विशेषताएं योग में आने की संभावनाएं रहती है.

6. गुरु-चन्द सकारात्मक पक्ष- (Moon in auspicious Position)
अगर गुरु अथवा चन्द्र उच्च, गुरु सुस्थिति में हों तो यह गजकेसरी योग व्यक्ति को उतम फल देगा. व अगर चन्द अथवा गुरु दोनों में से कोई अपनी मूलत्रिकोण राशि में स्थित हों, अच्छे भाव में हों और दूसरा ग्रह भी शुभ स्थिति में हों तब भी गजकेसरी योग की शुभता बनी रहती है.

7. “गजकेसरी योग’ दशाओं का प्रभाव:- (The impact of dasha on Gaja Kesari Yoga)
सभी योगों के फल इनसे संबन्धित ग्रहों कि दशाओं में ही प्राप्त होते है. कई बार किसी व्यक्ति की कुण्डली में अनेक धनयोग व राजयोग विधमान होते है. परन्तु उस व्यक्ति को अगर धनयोग व राजयोग बना रहे, ग्रहों की महादशा न मिलें तो व्यक्ति के लिये ये योग व्यर्थ सिद्ध होते है. इसी प्रकार गजकेसरी योग के फल भी व्यक्ति को गुरु व चन्द्र की महादशा प्राप्त होने पर ही प्राप्त होते है.

व्यवहारिक रुप में यह देखने में आया है कि गजकेसरी योग के सर्वोतम फल उन्हीं व्यक्तियों को प्राप्त हुए है. जिनकी कुण्डली में यह योग बन रहा हों तथा जिनका जन्म गुरु या चन्द्र की महादशा में हुआ हों. उस अवस्था में गजकेसरी योग विशेष रुप से लाभकारी रहता है.

इसके अलावा गजकेसरी योग के व्यक्तियों को जन्म के समय गुरु या चन्द्र की अन्तर्दशा प्राप्त होना भी शुभ फलकारी होता है. या फिर गुरु में गुरु की महादशा या चन्द्र में चन्द्र कि महादशा में जन्म होने पर भी गजकेसरी योग का व्यक्ति अपने जीवन में धन व यश की प्राप्ति करता है.

8. “गजकेसरी योग” प्रसिद्ध व्यक्तियों की कुण्डली में:- (Gaja Kesari Yoga in the kundlis of famous people)

गजकेसरी योग की शुभता से जिन व्यक्तियों ने प्रसिद्धि व लाभ प्राप्त किया, उनमें से कुछ निम्न है.

महात्मा गांधी

जार्ज कैनेडी

बिल क्लिंटन

रणवीर कपूर ( फिल्म स्टार)

अक्षय कुमार ( फिल्म स्टार)

राहूल द्रविड ( क्रिकेट खिलाडी)

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 12, 2011

नाग पंचमी पर्व महत्व –

नाग पंचमी पर्व महत्व –
Significance of Naag Panchmi Festival—

भारत की अधिकतर जनसंख्या आज भी अपनी आजीविका के लिये कृ्षि पर आश्रित है. हमारे यहां पर पेड- पौधों की पूजा करने का विधान भी प्राचीन समय से चला रहा है. यही कारण है कि आज भी हर घर में तुलसी के पौधे की पूजा की जाती है. “वनोत्सव” जैसे पर्व हमारी संस्कृ्ति की पहचान है.

नाग पंचमी पर्व कृ्षि रक्षा पर्व–
Naag Panchami – Agriculture Saviour Festival
हमारे यहां उन सभी वस्तुओं को विशेष महत्व दिया जाता है, जो वस्तुएं आजीविका से जुडी होती है. साथ ही कृ्षि प्रधान देश होने के कारण, कृ्षि को बचाने वाले या खेती में प्रयोग होने वाली सभी वस्तुओं को यहां पूजा जाता है. उदाहरण के लिये पौराणिक कथाओं के अनुसार श्री कृ्ष्ण ने भी कहा है कि इन्द्र या अन्य देवों की पूजा करने के स्थान पर गाय, बैल और खेती के उपकरणों की पूजा की जानी चाहिए.

इसके बाद ही गौवर्धन पर्वत की पूजा का प्रसंग सामने आता है. पंचमी तिथि के देव के रुप मे नागों को मान्यता दी गई है. इसलिये पंचमी तिथि में जन्म लेने वाले व्यक्तियों के लिये यह तिथि और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है.

चिकित्सा जगत में महत्व—
Importance in the Medicinal Field
आधुनिकता की दौड में तकनीकि क्षेत्रों का विस्तार तो हुआ है, पर नाग पंचमी जैसे पर्वों की महत्वता में कोई कमी नहीं हुई है. बल्कि देखा जाये तो आज के संदर्भों में नागों को बचाना और भी तर्कसंगत लगता है. आज का चिकित्सा जगत काफी हद तक दवाईयों के निर्माण के लिये नागों से प्राप्त होने वाले जहर पर निर्भर है. इनके जहर की हलकी सी मात्रा ही कई लोगों का जीवन बचानें में सहयोग करती है.

हिन्दू शास्त्रों में नाग पंचमी
Naag Panchami in Hindu Scriptures
शास्त्रों के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का दिन नाग पंचमी के रुप में मनाया जाता है. इसके अलावा भी प्रत्येक माह की पंचमी तिथि के देव नाग देवता ही है. परन्तु श्रवण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी में नाग देवता की पूजा विशेष रुप से की जाती है. इस दिन नागों की सुरक्षा करने का भी संकल्प लिया जाता है. श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन नागपंचमी का पर्व प्रत्येक वर्ष पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ मनाया जाता है.

नाग पूजन प्राचीन सभ्यताओं से साथ
Worshiping of Snakes as per the Ancient Civilization
नाग पंचमी के दिन नागों का दर्शन करना शुभ होता है. सर्पों को शक्ति व सूर्य का अवतार माना जाता है. हमारा देश धार्मिक आस्था और विश्वास का देश है. हमारे यहां सर्प, अग्नि, सूर्य और पितरों को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है. प्राचीन इतिहास की प्रमाणों को उठाकर देखे तो भी इसी प्रकार के प्रमाण हमारे सामने आते है.

इतिहास की सबसे प्राचीन सभ्यताएं जिसमें मोहनजोदडों, हडप्पा और सिंधु सभ्यता के अवशेषों को देखने से भी कुछ इसी प्रकार की वस्तुएं सामने आई है, जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है, कि नागों के पूजन की परम्परा हमारे यहां नई नहीं है. इन प्राचीन सभ्यताओं के अलावा मिस्त्र की सभ्यता भी प्राचीन सभ्यताओं में से एक है. यहां आज भी नाग पूजा को मान्यता प्राप्त है. शेख हरेदी नामक पर्व आज भी यहां सर्प पूजा से जुडा हुआ पर्व है.

पर्यावरण से मनुष्य जाति को जोडने वाला पर्व
Festival of joining Humanity with Environment
हिन्दु धर्म-संस्कृ्ति में प्रकृ्ति के प्रत्येक प्राणी, वनस्पति, यहां तक की चल – अचल जगत को भगवान के रुप में देखता है. प्राचीन ऋषि- मुनियों ने सभी पूजाओं, पर्वों, उत्सवों को धर्म भाव से जोडा है. इससे एक ओर ये पर्व व्यक्ति की धार्मिक आस्था में वृ्द्धि करते है. दूसरी ओर अप्रत्यक्ष रुप से ये व्यक्ति को पर्यावरण से जोड रहे होते है. इसी क्रम में नाग को देवप्राणियों की श्रेणी में रखा गया, तथा नागदर्शन और पूजन को विशेष महत्व दिया गया.

पुराणों में नागो को देवता मानने के प्रमाण
Evidence of Believing Snake as God, in Mythology
पुराणों की एक कथा के अनुसार इस दिन नाग जाति का जन्म हुआ था. महाराजा परीक्षित को उनका पुत्र जनमेजय जब नाग तक्षक के काटने से नहीं बचा सका तो जनमेजय ने सर्प यज्ञ कर तक्षक को अपने सामने पश्चाताप करने के लिये मजबूर कर दिया. तक्षक के द्वारा क्षमा मांगने अर उन्हें क्षमा कर दिया. तथा यह कहा गया की श्रावण मास की पंचमी को जो जन नाग देवता का पूजन करेगा, उसे नाग दोष से मुक्ति मिलेगी.

नाग- पंचमी में क्या न करें
What Not to Do on Naag Panchami
नाग देवता की पूजा -उपासना के दिन नागों को दूध पिलाने का कार्य नहीं करना चाहिए. उपासक चाहें तो शिवलिंग को दूध स्नान करा सकता है. यह जानते हुए की दूध पिलाने से नागों की मृ्त्यु हो जाती है. ऎसे में उन्हें दूध पिलाने से अपने हाथों से अपने देवता की जान लेने के समान है. इसलिये भूलकर भी ऎसी गलती करने से बचना चाहिए. इससे श्रद्वा व विश्वास के शुभ पर्व पर जीव हत्या करने से बचा जा सकता है.

नाग पंचमी (“कालसर्प योग शान्ति महोत्सव”) —
Nag Panchami( An Occasion to Pacify Kalsarp Yoga)—

नाग पंचमी श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है. यह श्रद्धा व विश्वास का पर्व है. इस दिन नागों को धारण करने वाले भगवान भोलेनाथ की पूजा आराधना करने का विशेष विधान है.

नाग पंचमी की विशेषता
Importance of Nag Panchami
शास्त्रों के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग देवता है. श्रवण मास में नाग पंचमी होने के कारण इस मास में धरती खोदने का कार्य नहीं किया जाता है. श्रवण मास के विषय मेम यह मान्यता है कि इस माह में भूमि में हल नहीं चलाना चाहिए, नीवं नहीं खोदनी चाहिए. इस अवधि में भूमि के अंदर नाग देवता का विश्राम कर रहे होते है. भूमि के खोदने से नाग देव को कष्ट होने की संभावना रहती है.

नाग पंचमी के उपवास की विधि
Method of Fasting on Nag Panchami
देश के कई भागों में श्रावण मास की कृ्ष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को भी नाग पंचमी मनाई जाती है. नाग पंचमी में व्रत उपवास करने से नाग देवता प्रसन्न होते है. इस व्रत में पूरे दिन उपवास रख कर सूर्य अस्त होने के बाद नाग देवता की पूजा के लिये प्रसाद में खीर मनाई जाती है. खीर का भोग सबसे पहले नाग देवता को लगाया जाता है.

अथवा भगवान शिव को भोग लगाया जाता है. इसके बाद इस खीर को प्रसाद के रुप में सभी लोग ग्रहण करते है. इस उपवास में नम व तली हुई चीजों को ग्रहण करना वर्जित माना जाता है. उपवास रखने वाले व्यक्ति को उपवास के नियमों का पालन करना चाहिए.

दक्षिण भारत में नाग पंचमी का रुप
Nag Panchami South India
भारत के दक्षिण क्षेत्रों में श्रवण शुक्ल पक्ष की नाग पंचमी में शुद्ध तेल से स्नान किया जाता है. वहां अविवाहित कन्याएं इस दिन उपवास करती है. और मनोवांछित जीवनसाथी पाने की कामना करती है.

नाग पंचमी में बासी भोजन ग्रहण करने का विधान
System of Consuming Stale Food on Nag Panchami
नाग पंचमी के दिन मात्र पूजा में प्रयोग होने वाला भोजन ही तैयार किया जाता है. बाकि भोजन एक दिन पहले ही बनाया जाता है. परिवार के जो सदस्य उपवास नहीं कर रहे हे. उन्हें बासी भोजन ही ग्रहण करने के लिये दिया जाता है. वैसे ताजे भोजन में खीर, चावल -सैवईयां इस दिन लोग घरों में बनाते है.

मुख्य द्वार पर नाग देवता की आकृ्ति पूजा
Worshiping Nag at the Main Entrance
नाग पंचमी के दिन उपवासक अपने घर की दहलीज के दोनों और गोबर से पांच सिर वाले नाग की आकृति बनाते है. गोबर न मिलने पर गेरु का प्रयोग भी किया जा सकता है. इसके बाद दुध, दुर्वा, कुशा, गंध, फूल, अक्षत, लड्डूओं से नाग देवता की पूजा कि जाती है. तथा नाग स्त्रोत या निम्न मंत्र का जाप किया जाता है.

” ऊँ कुरुकुल्ये हुँ फट स्वाहा”

इस मंत्र की तीन माला जप करने से नाग देवता प्रसन्न होते हैं. नाग देवता को चंदन की सुगंध विशेष प्रिय होती है. इसलिये पूजा में चंदन का प्रयोग करना चाहिए. इस दिन की पूजा में सफेद कमल का प्रयोग किया जाता है. उपरोक्त मंत्र का जाप करने से “कालसर्प योग’ के अशुभ प्रभाव में कमी आती है यानी कालसर्प योग की शान्ति होती है.

मनसा देवी को प्रसन्न करना
Making Goddess Mansa Happy
उतरी भारत में श्रवण मास की नाग पंचमी के दिन मनसा देवी की पूजा करने का विधान भी है. देवी मनसा को नागों की देवी माना गया है. इसलिये बंगाल, उडिसा और अन्य क्षेत्रों में मनसा देवी के दर्शन व उपासना का कार्य किया जाता है.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 12, 2011

गजकेसरी योग कैसे बनता है? ???

गजकेसरी योग कैसे बनता है? ???
How is Gaja Kesari Yoga Formed…????

वैदिक ज्योतिष में शुभ योगों में गजकेसरी योग (Gaja Kesari Yoga) को विशेष रुप से शुभ माना जाता है. यह योग गुरु से केन्द्र अर्थात लग्न, चतुर्थ, सप्तम व दशम भाव में चन्द्र हो तो ‘गजकेसरी योग’ बनता है. गुरु जो धन, ज्ञान, संमृ्द्धि, सौभाग्य, संतान के कारक ग्रह है वहीं चन्द्र मन, गतिशिलता, तरलता, मनोबल, शीतलता, सुख-शान्ति के ग्रह है.

गजकेसरी योग को लग्न से केन्द्र भाव में भी देखने का विचार है. इसकी शुभता केन्द्र भावों के अतिरिक्त अन्य भावों में बनने वाले योग की तुलना में उतम होती है.

गज केसरी योग निर्माण (Formation of Gaja Kesari Yoga)

गुरु चन्द्र से केन्द्र में होना चाहिए. या (Jupiter must be in Kendra from Moon)

गुरु लग्न से केन्द्र में होना चाहिए. (Jupiter must be in Kendra from Ascendant)

इस योग में देवगुरु वृ्हस्पति लग्न से केन्द्र में होने चाहिए या चन्द्र से तथा शुभ ग्रहों से द्र्ष्ट होने चाहिए. इसके साथ ही ऋषि पराशर ने यह भी कहा है कि :-

1 गुरु नीच स्थिति में

2 शत्रु भाव में

3. अस्त नहीं होना चाहिए

अगर गुरु गजकेसरी योग बनाते समय इनमें से किसी स्थिति में हों तो योग कि शुभता अवश्य प्रभावित होती है. इस स्थिति में “गजकेसरी योग’ प्रतिमाह जन्म लेने वाले 20% से 33 % व्यक्तियों की कुण्डली में होता है. इसके अतिरिक्त ऋषि पराशर के अनुसार गजकेसरी योग बना रहा गुरु कुण्डली में वक्री या पाप ग्रह से द्र्ष्ट नहीं होना चाहिए. यहां पर ध्यान देने योग्य एक विशेष बात यह है कि इस योग में गुरु का चन्द्र से केन्द्र में होना आवश्यक नहीं है.

शुक्र व बुध से बनने वाला गजकेसरी योग (Gaja Kesari Yoga formed through Venus and Mercury)

एक अन्य मत के अनुसार यह अगर शुक्र, चन्द्र से केन्द्र ( 1,5,7, 10 ) में हों तब भी ‘गजकेसरी” योग बनता है. पर व्यवहारिक रुप से यह पाया गया है कि शुक्र व बुध जब चन्द्र से केन्द्र में हों तब इस योग की शुभता में वृ्द्धि होती है. इस योग में चन्द्र का शुक्र व बुध से द्रष्टि संबन्ध भी होना चाहिए.

अगर बुध, गुरु, शुक्र से चन्द्र का योग गजकेसरी योग में शामिल किया जाता है तो गजकेसरी योग को शुभ योगों में जो मान्यता प्राप्त है उसमें कमी आयेगी. कई बार वह निरर्थक भी हो जायेगा. क्योकि इस स्थिति में यह योग नब्बे % व्यक्ति की कुण्डली में बनेगा. ऎसे में यह उतम श्रेणी के शुभ धन योगों में से नहीं रहेगा.

वास्तविक रुप में यह देखा गया है कि शुक्र से चन्द्र केन्द्र में होने पर बनता ही नहीं है. शुक्र कि दोनों राशियां सदैव एक दूसरे से षडाष्टक योग रखती है. इस स्थित में शुक्र की एक राशि केन्द्र में हो भी तो दूसरी राशि हमेशा पाप भाव में होगी. इस स्थिति में गजकेसरी योग भंग हो जाता है तथा योग की शुभता, अशुभता का स्थान ले लेती है.

बुध से बनने वाले गजकेसरी योग में गुरु व बुध पर चन्द्र की द्रष्टि होने की बात कही गई है. ऎसे में चन्द्र को इन दोनों ग्रहों से सप्तम भाव में होना चाहिए. तभी चन्द्र व गुरु एक- दूसरे से केन्द्र में हो सकते है.

गजकेसरी योग में किस प्रकार के फल प्राप्त होते है? ??
(What are the results of the Gaja Kesari Yoga)

“गजकेसरी” योग (Gaja Kesari Yoga) के विषय में यह मान्यता है कि यह योग व्यक्ति को “गज के समान” स्वर्ण देने की संभावनाएं देता है. राजयोगों व धनयोगों के बाद इस योग के फलों का विचार किया जाता है. गजकेसरी योग जब पूर्ण रुप से किसि व्यक्ति कि कुण्डली में बन रहा हो तो व्यक्ति को गुरु व चन्द्र की दशा – अन्तर्दशा में इसके शुभ फल प्राप्त होते है.

जिस प्रकार अन्य प्रसिद्ध योग सभी के लिये एक समान फल नहीं देते है. उसी प्रकार एक व्यक्ति को गजकेसरी योग (Gaja Kesari Yoga) धनवान व प्रसिद्धि देता है तो दूसरे को इसके फल सामान्य से भी कम प्राप्त होते है. योग के फल, भाव, ग्रहों, राशियों व इस योग में युक्त गुरु व चन्द्र कि स्थिति से प्रभावित होते है.

आईये गजकेसरी योग (Gaja Kesari Yoga)) से मिलने वाले फलों को जानने का प्रयास करते है.

गजकेसरी योग के फल (Result of Gaja Kesari Yoga)
गजकेसरी योग में गज (हाथी) व केसरी (सिंह) दोनों ही जानवर प्रकृ्ति से सबसे प्रभावशाली व शक्तिशाली है. ऋषि परासर के अनुसार गजकेसरी योग के फलस्वरुप व्यक्ति योग्य, कुशल, राजसी सुखों को भोगने वाला, जीवन में उच्च पद, अति बुद्धिशाली, वाद-विवाद व भाषण में निपुण होता है.

गज को बुद्धिमता व ज्ञान के प्रतीक के रुप में जाता है. गज अर्थात हाथी में अपने योग्यता का अभिमान नहीं होता है. उसे अपनी ताकत का समझ -बूझ कर प्रयोग करना आता है. यह योग व्यक्ति को यशस्वी व कुशाग्र बुद्धि वाला बनाता है. गजकेसरी योग के कारण व्यक्ति की आयु में भी वृ्द्धि होती है.

जिस व्यक्ति की जन्म कुण्डली में गजकेसरी योग (Gaja Kesari Yoga) होता है, उसमें भी उपरोक्त सभी गुण व सुख प्राप्त होने की संभावनाएं बनती है.

‘गज’ समान धन प्राप्ति योग (Combinations that bring wealth from Gaja Kesari Yoga)
सभी ग्रहों में ग्रुरु को धन का कारक ग्रह कहा है. चन्द्र भी तरल धन के कारक ग्रह के रुप में जाने जाते है. यही कारण है कि यह माना जाता है कि यह योग उतम रुप में बने तो व्यक्ति को “गज” के समान धन प्राप्त होने की संभावनाएं देता है. अर्थात इस योग के फलस्वरुप व्यक्ति को जीवन में अत्यधिक धन प्राप्ति के अवसर प्राप्त हो सकते है.

” गजकेसरी ” हाथी + सिंह की योग्यताएं (Special qualities given by Gaja Kesari Yoga)
यह योग हाथी व शेर के संयोग से बनता है इसलिये इस योग का व्यक्ति सिंह के समान अपने शत्रुओं को हराने वाला, शत्रुओं पर अपना प्रभाव बनाये रखने वाला, परिवक्व वाणी, सभाओं में उच्च पद, अधिकारिक शक्तियां पाने वाला, चतुर बुद्धि व नियोजन करने के बाद कार्य करने वाला बनाता है. चूंकि यह योग गुरु से बन रहा है इसलिये व्यक्ति को धन लाभ की प्राप्ति भी होती है.

गजकेसरी योग के फल व्यवसायिक क्षेत्र में (Influence of Gaja Kesari Yoga on business)
गुरु व चन्द्र यह योग जिन भावों में स्थित होकर बना रहे होते है. व्यक्ति को उन भावों के फल शुभ रुप में प्राप्त होते है. गजकेसरी योग जब चतुर्थ व दशम भाव में बनता है तो व्यक्ति के अपने कार्यक्षेत्र में उच्च स्थान, उच्चाधिकार व यश प्राप्त करने की संभावनाएं बनती है.

ऎसे में चन्द्र अकेला नहीं होगा. तथा अशुभ माने जाने वाले केमद्रुम योग का निर्माण नहीं हो रहा है. जब कुण्ड्ली में चन्द किसी अशुभ योग में शामिल न हो तो गजकेसरी योग अपने पूर्ण फल देता है. इसलिये जब गुरु या चन्द्र दोनों में से कोई उच्च का, बली होकर गजकेसरी योग बना रहा हों, तथा केमद्रुम योग भी कुण्डली में बन रहा हों हो पीडित चन्द्र अपने फल नहीं दे पाता है.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 12, 2011

वैशाख मास के पर्व:

वैशाख मास के पर्व:—-
वैशाख संक्रान्ति 2011, 14 अप्रैल —

Festival in the Month of Vaishakh : Vaishakh Sankranti 2011, 14 April—

14 अप्रैल, 2011, गुरुवार, चैत्र शुक्ल पक्ष , एकादशी तिथि को दोपहर 03.00 बजे पर मघा नक्षत्र कालीन कर्क लग्न में प्रवेश करेगी. वैशाख संक्रान्ति का पुण्य़काल सूर्योदय से प्रारम्भ होगा. इस मास में प्रतिदिन श्री विष्णु सहस्त्रणाम एवं “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का पाठ करने का विशेष महत्व होता है.

वैशाख मास में नित्यप्रति प्रात: काल सूर्योदय से पूर्व शुद्ध जल में तीर्थस्थान यथाशक्ति अनाज, वस्त्रों, फलादि का दान करने का विधान व महत्व कहा गया है. यह विधान करने वाले व्यक्ति के जीवन से रोग-शोक दूर होते है. तथा आरोग्य, धन, सम्पादि सुखों की प्राप्ति होती है.

माघ नक्षत्र में वैशाख संक्रान्ति का प्रारम्भ होने के कारण घोरा नाम घोरा नाम है. यह संक्रान्ति दुष्जनों को लाभ व सुख देने वाली होती है. चैत्र पूर्णिमा को चित्रा नक्षत्र होने से उस दिन स्नान करने के बाद इस दिन अनाज व रंगबिंरगें वस्त्रों कादान करना सौभाग्य में वृ्द्धि करता है. इस संक्रान्ति में पांच मंगलवार होने से देश के कुछ भागों में आग संबन्धी दुर्घटनाएं अधिक हो सकती है.

कामदा एकादशी व्रत 2011, 14 अप्रैल
Fast of Kamada Ekadashi 2011, 14 April
इस दिन गुरुवार के दिन कामदा एकादशी व्रत है. इस व्रत को पूर्ण नियम व श्रद्धा से करने पर उपवासक की व्रत से जुडी मनोकामना पूरी होती है. इस व्रत को रखने से सुख-शान्ति प्राप्त होती है. और अंत में मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है. एकादशी का व्रत अन्न रहित रखा जाता है. केवल एक समय फलाहार किया जा सकता है. उपवासक को उपवास वाले दिन भगवान श्री देव वासुदेव कि मूर्ति की विधि-विधान से पूजा कर फलों का भोग लगाया जाता है. तथा मूर्ति के पास ही भूमि पर शयन किया जाता है.

श्री महावीर जयन्ती (जैन) 2011, 16 अप्रैल
Sri Mahavir Jayanti 2011, 16 April
श्री महावीर जयन्ती का महोत्सव जैन समाज के लिये विशेष महत्व रखता है. इस दिन सभी महावीर मंदिरों में उत्सव की धूम होती है. की जगह पांच दिवसीय मेले लगते है. मेले में ध्वजारोहण, जयन्ती जुलूस, जलयात्रा, रथयात्र और कलाशाभिषेक जैसे कार्यक्रम होते है. रथयात्रा जुलूस के पश्चात प्रतिमा को धूमधाम के साथ मंदिर में पुनस्थापित कर दिया जाता है. श्रद्दालु भारी तादाद में मंदिर परिसर में पूजा – अर्चना करने के लिये एकत्रित होते है. और श्री महावीर की आराधना की जाती है. सायं काल में मंदिरों को दीपों से सजाया जाता है.

श्री हनुमान जयन्ती 2011, 18 अप्रैल
Sri Hanuman Jayanti 2011, 18 April
श्री हनुमान जयन्ती का उत्सव चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है. इस दिन श्री राम के परम भक्त हनुमान जी का जन्म दिन होता है. श्री राम व हनुमान के श्रद्धालुओं के लिये यह दिन विशेष महत्व रखता है. इस तिथि में हनुमान जी का पूजन होता है. हनुमान जी श्रंगार कर, विधि-वत पूजन किया जाता है. उपवासक इस दिन का उपवास भी रखते है. सायंकाल में भोग के साथ आरती की जाती है. श्री हनुमान चालिसा का पाठ और स्त्रोतों का पाठ हनुमान जी को प्रसन्न करता है.

श्री गणेश चतुर्थी व्रत 2011, 21 अप्रैल
Fast of Sri Ganesha Chaturthi 2011, 21 April
भगवान श्रीगणेश को चतुर्थी तिथि अत्यधिक प्रिय है. सभी देवों से पहले श्री गणेश का पूजन किया जाता है. चतुर्थी व्रत को करने से उपवासक के कार्य सिद्ध होते है. तथा श्री गणेश कल्याणकारी है. कार्यो में सफलता और कामनापूर्ति, संतान, धन व संमृ्द्धि के लिये या फिर अचानक से आय किसी संकट के निवारण के लिये इस व्रत को किया जा सकता है.

वरुथिनी एकादशी व्रत, श्री वल्लाभाचार्य जयन्ती 2011, 28 अप्रैल
Fast of Varuthini Ekadashi, Sri Vallabhacharya Jayanti 2011, 28 April
28 अप्रैल के दिन वरूथिनी नामक एकादशी रहेगी. एकादशी का व्रत जब निर्जल रहकर किया जाता है, तो सबसे उतम फल देता है. एक वर्त में चौबीस से छबीस एकादशियां होती है. एकादशी व्रत भगवान श्री विष्णु जी को प्रसन्न करने के लिये किया जाता है. इस दिन “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय: का जाप करके गौ दान, वस्त्र दान, छत्र, फल आदि का दान करना चाहिए.

सोमवती अमावस्या 2011, 02 मई
New Moon of Somavati 2011, 02 May
02 मई, 2011 के दिन सोमवती अमावस्या का योग होने से गंगादि तीर्थो पर स्नान, जप- पाठ व ब्राह्माणों को यथा शक्ति भोजन, वस्त्र फलों, व जल -पूर्ण घडे का दान करना व भगवान विष्णु का पूजन करके पीपल वृ्क्ष को पुष्पाक्षत्र सहित जल देन से कई यज्ञों का पुन्य प्राप्त होता है.

भौमवती अमावस्या 2011, 03 मई
New Moon of Bhaumavati 2011, 03 May
भौमवती अमावस्या के दिन स्नान दान कार्य करने चाहिए. इस दिन हनुमान जी के हनुमान चालिसा का पाठ करना भी विशेष शुभ रहता है.

भगवान परशुराम जयन्ती 2011, 05 मई
Bagavan Parashuram Jayanti 2011 , 05 May
भगवान श्री परशुराम राष्ट्रीय़ एकता, देश भक्ति, त्याग तथा वीरता के प्रतीक है. परशुराम जी भगवान विष्णु के छठे अवतार है. गुरुओं में इन्हें विशेष रुप से पूजा जाता है. परशुराम जयन्ति के दिन ईश्वर भक्त, परम त्यागी का जन्म दिवस पिता सम्मान और गुरु की महत्वता का प्रतीक है.

अक्षय तृ्तिया 2011, 06 मई
Akshay Trithiya 2011, 06 May
06 मई, 2011 के दिन अक्षय तृ्तिया रहेगी. अक्षय तृ्तिया के दिन जो भी विषय वस्तु क्रय कि जाती है. क्रय करने वाले व्यक्ति के पास वह वस्तु सदैव बनी रहती है. यह दिन अचल संपति, सोना, चांदी या लम्बे समय के लिये धन का विनियोजन करने के लिये विशेष शुभ रहता है.

मोहिनी एकादशी व्रत 2011, 14 मई
Mohini Ekadashi 2011, 14 May
14 मई के दिन मोहिनी नामक एकादशी रहेगी. एकादशी के दिन का व्रत भगवान श्री विष्णु जी की पूजा -उपासना का होता है.

Posted by: vastushastri08 | अप्रैल 12, 2011

ज्येष्ठ मास के पर्व:—

ज्येष्ठ मास के पर्व:—

ज्येष्ठ संक्रान्ति 2011, 15 मई –

Festival in the Month of Jyeshtha : Jyeshtha Sankranti 2011, 15 May—

15 मई, 2011 रविवार, वैशाख शुक्ल त्रयोदशी तिथि को प्रात 09:50, चित्रा नक्षत्र काल, कर्क लग्न में प्रारम्भ होगी. इस संक्रात्नि का पुन्य कल प्रात; सूर्योदय से सायं 16:14 तक रहेगा. वार अनुसार इस संक्रान्ति का नाम घोरा है. अपने नाम के अनुसार यह संक्रान्ति दुष्ट ओर नीच प्रकृ्ति के लोगों को लाभ पहुंचाने वाली कही गई है.

इस मास में संक्रान्ति, एकादशी, अमावस, गंगां दशहरा व निर्जला एकाद्शी आदि पर्व मुख्य रुप से रहेगें. संक्रान्ति के दिन व्रत-उपवास रख कर घडा, गेहूं, चावल, सतु, अनाज व दूध -चीनी, फल, वस्त्र, छाता, पंखा आदि अन्य गर्मियों में प्रयोग होने वाली वस्तुओ का दक्षिणा सहित दान करने का विशेष महत्व होता है. व्रत के दिन भगवान श्री विष्णु का पूजन व “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय ” मंत्र व विष्णु सहस्त्र नाम आदि स्त्रोतों का जप-पाठ करना शुभ रहता है.

श्री सत्यनारायण व्रत 2011, 16 मई
Fast of Sri Amavasya 2011, 16 May
16 मई, 2011 के दिन श्री सत्यनारायण का व्रत रख, उपवास करना कल्याणकारी रहता है. उपावस के साथ जब उपावसक सत्यनारायन कथा करायें, या कथा का श्रवण करें, तो इसके फल विशेष कहे गये है.

वैशाख पूर्णिमा , श्री बुध पूर्णिमा 2011, 17 मई
Vaishakh Poornima 2011, 17 May
17 मई का दिन वैशाख पूर्णिमा का रहेगा. इस दिन स्नानादि कार्य किये जा सकते है. वैशाख पूर्णिमा को अम्रतसर में विशेष रुप से मनाया जाता है. वहां धार्मिक क्रियाकलापों की दिनभर धूम रहती है. प्रात: काल में जल स्त्रोतों में ब्रह्मामुहूर्त में स्नान और पीपल की पूजा अर्चना की जाती है. वैशाखी के दिन गर्मी की तपन से बचाने वाली वस्तुओं का दान विशेष रुप से किये जाते है. इसमें हाथ का पंखा, मटकी, आम शर्बत आदि प्रमुख रहते है.

श्री गणेश चतुर्थी व्रत 2011, 20 मई
20 May, 2011 – Sri Ganesha Chaturthi
श्री गणेश की कृ्पा प्राप्त करने के लिये श्री गणेश चतुर्थी का व्रत किया जाता है. श्री गणेश कार्यो को सिद्ध करने वाले, तथा शुभता के प्रतीक है. सभी देवों में सर्वप्रथम श्री गणेश का पूजन किया जाता है. गणेश चतुर्थी के दिन उपवास करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते है. यह चतुर्थी पत्थर चौथ के नाम से भी जानी जाती है.

पंचक प्रारम्भ 2011, 24 मई
Beginning of Panchak 2011, 24 May
प्रात:1:30 से पंचक शुरु होगें. पंचकों में शुभ कार्य आरम्भ नहीं किये जाते है. पंचक लगभग साढे चार दिन के होते है. पंचकों में किसी की मृ्त्यु हो जाने पर, अंतिम संस्कार करने से पूर्व पांच फूस के पुतले बनाकर, शव के साथ इनका भी विधिवत संस्कार किया जाता है. इससे पंचक की अशुभता में कमी होती है. पंचक समय के लिये वर्जित कार्यो में ईंधन एकत्रित करना, छत डालना, दक्षिण दिशा की यात्रा और छत डालना प्रमुख है.

सोम प्रदोष व्रत 2011, 30 मई
Fast of Soma Pradosh 2011, 30 May
चन्द्र मास की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है. सूर्यास्त के बाद के 2 घंटे 24 मिनट का समय प्रदोष काल कहलाता है. प्रदोष व्रत भगवान भोलेनाथ का आशिर्वाद प्राप्त करने के लिये किया जाता है. 30 मई, 2011 के दिन यह व्रत सोमवार के दिन होने के कारण सोम प्रदोष व्रत कहा जायेगा. शास्त्रों में प्रदोष व्रत से मिलने वाले फलों के विषय में कहा गया है, कि जो जन इस व्रत को करता है उस पर भगवान भोलेनाथ की कृ्पा सदैव बनी रहती है.

अमावस्या 2011, 01 जून
New Moon 2011, 01 Jun
शुक्ल पक्ष प्रारम्भ होने से ठिक एक दिन पहले अमावस्या होती है. अमावस्या के दिन पितरों की शात्नि से संबन्धित कार्य किये जाते है. पितर दोष से मुक्त होने के लिये अमावस्या के दिन पूर्वजों का नाम ले, तर्पण करना, तथा चावलों कि खीर बनाकर, कौओं को रोटी और खीर का भोग लगाने का कार्य इस दिन किया जाता है. इसके अतिरिक्त जिन्हें संतान प्राप्त करने में परेशानियां हो रही हों, उनके लिये भी अमावस्या का पूजन कल्याणकारी रहता है.

श्री गंगा स्नान प्रारम्भ 2011, 02 जून
Beginning of Sri Ganga Snan 2011, 02 Jun
प्राचीन काल से ही यह मान्यता रही है कि माता गंगा सभी को पाप मुक्त करती है. सभी धार्मिक पर्वों में गंगा में स्नान करना, दानादि करना शुभ रहा है. 02 जून, 2011 के दिन ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को श्री गंगा स्नान पर्व मनाया जाता है. मान्यता के अनुसार इस दिन स्नान करने से व्यक्ति को अपने जाने – अनजाने में किये गये पापों से मुक्ति मिलती है. गंगा स्नान के दिन गंगा के किनारों पर स्थित तीर्थों पर माता गं